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रिस्तोमे प्यारकी अनुभुती
अध्याय - २८६
सृती अपने हादसेके बाद ढाइ तीन महीना लखनसे दुर रही थी.. फीर लखनको भी भावीकासे परमीशन मील चुकी थी.. ओर इस रात लखनने राधीकाको दो दो बार ठंडी करते सुला दीया.. फीर सृती ओर लखन कइ दीनोके बाद मीले.. इस रात सृतीको फीरसे अपनी सुहागरातकी फीलींग्स आइ.. लखन बडी ही सावधानीसे सृतीको सुबह चार बजे तक चोदता रहा.. ओर सृतीको पुरी तरह तृप्त करदीया.. फीर दोनो नंगे ही अेक दुसरेसे चीपकके सोगये.... अब आगे
दुसरे दीन सन्डे था.. तो पंचायतमे भी छुटी थी.. तो लखन मुनाके दीये हुअे पेपर लेके सीधे ही रश्मीके नये घरपे चला गया.. देखा तो रश्मी सोफेपे बैठकर अपनी बच्चीको दुध पीला रही थी.. लखनको देखते ही सरमा गइ.. ओर पलुसे अपना आंचल ढक लीया.. ओर हसने लगी..
रश्मी : (जोरोसे हसते) अरे देवजी.. आज आप रास्ता कैसे भुल गये..? कही मे गलत तो नही देख रही..? हें..हें..हें..
लखन : (हसते) हां.. अब आप भी मेरी खीली उडाओ.. क्या मे अपनी भाभीओको मीलने नही आ सकता..? घर भी नही देखा था.. तो सोचा दोनो काम हो जायेगे..
रश्मी : (भवे चडाते मुस्कुराते) दोनो काम..? मतलब कीसी ओर कामसे आये हे.. बैठीये..
तभी दोनोकी बाते सुनकर वंदना ओर टीना भी बहार आगइ.. जी हां.. सेटरडे सन्डे था तो दो दीनसे टीना भी अपनी कार लेकर रश्मीको मीलने आइ हुइ थी.. वो लखनकी ओर देखते मुस्कुराती रही.. तो वंदना भी सरमाते लखनको नमस्ते करने लगी.. तभी..
लखन : (जोरोसे हसते) देखो.. मेरी भाभी होगइ फीर भी कैसे अजनबीकी तराह नमस्ते कर रही हे..? (पेपर देते) येलो.. आपके कामके लीये ही आया हु..
वंदना : (हसते) मे कोइ अजनबीकी तराह नमस्ते नही कर रही.. ये तो आपको इतनो दीनोके बाद देखा इसीलीये.. अब तो देवरके साथ मेरे जीजु भी होगये हो.. (पेपर लेते) कीसके पेपर हे..?
लखन : (मुस्कुराते रश्मीके पास बैठते) क्यु..? हमारे नये स्कुलके लीये.. अेक टीचरकी अेप्लीकेशन आइ हे.. इसे लेना ही पडेगा..
वंदना : (पेपर देखते) कही आपके बडे भैया केह रहेथे.. वोतो नही..? कोइ गीता नाम बता रहे थे.. हां.. वो ही हे.. ठीक हे.. मे उपर भीजवा दुगी.. अच्छा बोलो.. क्या पीयोगे..? चाइ या ठंडा..
लखन : (रश्मीकी ओर देखते हसते) भाभी.. ना चाइ पीनी हे ना ठंडा.. दुध पीला दीजीये..? हें..हें..हें..
रश्मी (दांत पीसते अेक मुका पीठमे मारते) बेसर्म कहीके.. अगर दुध पीना हेतो अपनी बीवीको कहो.. उनको भी बच्चा हुआ हे.. हें..हें..हें..
लखन : (कानमे धीरेसे) उनका तो रोज पीता हु.. आज आप ही पीला दीजीये.. हें..हें..हें..
कहा तो रश्मी सर्मसार होगइ.. ओर जुठा गुस्सा करते अपने दांत पीसते लखनकी पीठमे तीन चार मुके जड दीये.. जीसे लखन जोरोसे हसते उनसे दुर बैठ गया.. तो वंदना ओर टीना भी उन दोनोको लडते देखकर हसती रही.. तभी लखनका ध्यान टीनाकी ओर गया तो टीना बडी ललचाइ नजरोसे लखनकी ओर देखते हस रही थी..
लखन : (टीनाकी ओर देखते) भाभी.. ये.. मेने पहेचाना नही..
रश्मी : (टीनाकी ओर देखते मुस्कुराते) ओह.. ये टीना हे.. मेरी बचपनकी सहेली.. आपहीके सहेरमे बुटीक चलाती हे.. आपको कपडेका बहुत सौक हेनां..? तोये नइ नइ डीजाइन खुद बनाती हे..
लखन : (नमस्ते करते हसते) अच्छा..? तब तो पहेचान करनी पडेगी.. क्युकी कपडेकी खरीदी मेही करता हु..
रश्मी : (टीनाको) हां टीना.. ये हे लखन.. हमारे अेक लौते देवर.. ओर इनको कपडे खरीदनेका बहुत सौक हे.. घरकी सभी लेडीसके कपडे येही लेते हे.. ओर हमारे लीये भी.. हें..हें..हें..
टीना : (नमस्ते कहेते खुस होते) अच्छा..? तब तो जान पहेचान बढानी ही पडेगी.. मेरा नया कस्टमर जो मील गया.. हें..हें..हें..
रश्मी : (मुस्कुराते) हां देवरजी.. टीनाके वहा नये नये डीजाइनके कपडे मील जायेगे.. वोही सब डीजाइन करती हे.. बहुत बडी बुटीक हे इनकी.. हम वहा गये थे तब हमने इनकी बुटीक देखी थी..
टीना : (मुस्कुराते) हां लखनजी.. मे ही सब लेडीस कपडे डीजाइन करती हु.. हमेसा लेटेस्ट कपडे मील जमायेगे.. अभी मे अपना कार्ड देती हु.. कभी देखनेके लीये आइअेगा..
कहेते टीना बडे ही उत्साहसे अपने मोबाइलमे लखनको कपडेकी डीजाइन दीखाने लगी.. तभी दरवाजा खुला.. देखातो चारु नीशा ओर वसुधा मुस्कुराते अंदर आगये.. वंदना उनकी मम्मीके गले लग गइ.. कीसीको पता नही चलाकी टीना ओर लखनने अपने नंबर अेक्सचेन्ज करलीये.. फीर सबलोग टीनाको भी गले मीले.. तभी चारुकी नजर लखनपे गइ..
चारु : (जोरोसे हसते) अरे.. आज तो हमारे अेक लोते देवर भी आये हे.. हें..हें..हें..
लखन : (खडा होते गले मीलते) क्यु..? मे अपनी भाभीओको मीलने नही आ सकता क्या..? लगता हे यहा कोइ पार्टी बार्टी हे..
फीर लखन नीशाको भी गले मीला.. तो नीचे वही चुनवाला अहेसास.. नीशा बहुत ही सरमा गइ.. फीर लखन वसुधाको देखकर मुस्कुराया.. ओर उनको गले लगा.. तो वसुधाको थोडा जोरोसे भीच लीया.. जीसे वसुधा सर्मसार होगइ.. उनको भी नीचे चुंभन महेसुस हुइ.. तभी..
अध्याय - २८६
सृती अपने हादसेके बाद ढाइ तीन महीना लखनसे दुर रही थी.. फीर लखनको भी भावीकासे परमीशन मील चुकी थी.. ओर इस रात लखनने राधीकाको दो दो बार ठंडी करते सुला दीया.. फीर सृती ओर लखन कइ दीनोके बाद मीले.. इस रात सृतीको फीरसे अपनी सुहागरातकी फीलींग्स आइ.. लखन बडी ही सावधानीसे सृतीको सुबह चार बजे तक चोदता रहा.. ओर सृतीको पुरी तरह तृप्त करदीया.. फीर दोनो नंगे ही अेक दुसरेसे चीपकके सोगये.... अब आगे
दुसरे दीन सन्डे था.. तो पंचायतमे भी छुटी थी.. तो लखन मुनाके दीये हुअे पेपर लेके सीधे ही रश्मीके नये घरपे चला गया.. देखा तो रश्मी सोफेपे बैठकर अपनी बच्चीको दुध पीला रही थी.. लखनको देखते ही सरमा गइ.. ओर पलुसे अपना आंचल ढक लीया.. ओर हसने लगी..
रश्मी : (जोरोसे हसते) अरे देवजी.. आज आप रास्ता कैसे भुल गये..? कही मे गलत तो नही देख रही..? हें..हें..हें..
लखन : (हसते) हां.. अब आप भी मेरी खीली उडाओ.. क्या मे अपनी भाभीओको मीलने नही आ सकता..? घर भी नही देखा था.. तो सोचा दोनो काम हो जायेगे..
रश्मी : (भवे चडाते मुस्कुराते) दोनो काम..? मतलब कीसी ओर कामसे आये हे.. बैठीये..
तभी दोनोकी बाते सुनकर वंदना ओर टीना भी बहार आगइ.. जी हां.. सेटरडे सन्डे था तो दो दीनसे टीना भी अपनी कार लेकर रश्मीको मीलने आइ हुइ थी.. वो लखनकी ओर देखते मुस्कुराती रही.. तो वंदना भी सरमाते लखनको नमस्ते करने लगी.. तभी..
लखन : (जोरोसे हसते) देखो.. मेरी भाभी होगइ फीर भी कैसे अजनबीकी तराह नमस्ते कर रही हे..? (पेपर देते) येलो.. आपके कामके लीये ही आया हु..
वंदना : (हसते) मे कोइ अजनबीकी तराह नमस्ते नही कर रही.. ये तो आपको इतनो दीनोके बाद देखा इसीलीये.. अब तो देवरके साथ मेरे जीजु भी होगये हो.. (पेपर लेते) कीसके पेपर हे..?
लखन : (मुस्कुराते रश्मीके पास बैठते) क्यु..? हमारे नये स्कुलके लीये.. अेक टीचरकी अेप्लीकेशन आइ हे.. इसे लेना ही पडेगा..
वंदना : (पेपर देखते) कही आपके बडे भैया केह रहेथे.. वोतो नही..? कोइ गीता नाम बता रहे थे.. हां.. वो ही हे.. ठीक हे.. मे उपर भीजवा दुगी.. अच्छा बोलो.. क्या पीयोगे..? चाइ या ठंडा..
लखन : (रश्मीकी ओर देखते हसते) भाभी.. ना चाइ पीनी हे ना ठंडा.. दुध पीला दीजीये..? हें..हें..हें..
रश्मी (दांत पीसते अेक मुका पीठमे मारते) बेसर्म कहीके.. अगर दुध पीना हेतो अपनी बीवीको कहो.. उनको भी बच्चा हुआ हे.. हें..हें..हें..
लखन : (कानमे धीरेसे) उनका तो रोज पीता हु.. आज आप ही पीला दीजीये.. हें..हें..हें..
कहा तो रश्मी सर्मसार होगइ.. ओर जुठा गुस्सा करते अपने दांत पीसते लखनकी पीठमे तीन चार मुके जड दीये.. जीसे लखन जोरोसे हसते उनसे दुर बैठ गया.. तो वंदना ओर टीना भी उन दोनोको लडते देखकर हसती रही.. तभी लखनका ध्यान टीनाकी ओर गया तो टीना बडी ललचाइ नजरोसे लखनकी ओर देखते हस रही थी..
लखन : (टीनाकी ओर देखते) भाभी.. ये.. मेने पहेचाना नही..
रश्मी : (टीनाकी ओर देखते मुस्कुराते) ओह.. ये टीना हे.. मेरी बचपनकी सहेली.. आपहीके सहेरमे बुटीक चलाती हे.. आपको कपडेका बहुत सौक हेनां..? तोये नइ नइ डीजाइन खुद बनाती हे..
लखन : (नमस्ते करते हसते) अच्छा..? तब तो पहेचान करनी पडेगी.. क्युकी कपडेकी खरीदी मेही करता हु..
रश्मी : (टीनाको) हां टीना.. ये हे लखन.. हमारे अेक लौते देवर.. ओर इनको कपडे खरीदनेका बहुत सौक हे.. घरकी सभी लेडीसके कपडे येही लेते हे.. ओर हमारे लीये भी.. हें..हें..हें..
टीना : (नमस्ते कहेते खुस होते) अच्छा..? तब तो जान पहेचान बढानी ही पडेगी.. मेरा नया कस्टमर जो मील गया.. हें..हें..हें..
रश्मी : (मुस्कुराते) हां देवरजी.. टीनाके वहा नये नये डीजाइनके कपडे मील जायेगे.. वोही सब डीजाइन करती हे.. बहुत बडी बुटीक हे इनकी.. हम वहा गये थे तब हमने इनकी बुटीक देखी थी..
टीना : (मुस्कुराते) हां लखनजी.. मे ही सब लेडीस कपडे डीजाइन करती हु.. हमेसा लेटेस्ट कपडे मील जमायेगे.. अभी मे अपना कार्ड देती हु.. कभी देखनेके लीये आइअेगा..
कहेते टीना बडे ही उत्साहसे अपने मोबाइलमे लखनको कपडेकी डीजाइन दीखाने लगी.. तभी दरवाजा खुला.. देखातो चारु नीशा ओर वसुधा मुस्कुराते अंदर आगये.. वंदना उनकी मम्मीके गले लग गइ.. कीसीको पता नही चलाकी टीना ओर लखनने अपने नंबर अेक्सचेन्ज करलीये.. फीर सबलोग टीनाको भी गले मीले.. तभी चारुकी नजर लखनपे गइ..
चारु : (जोरोसे हसते) अरे.. आज तो हमारे अेक लोते देवर भी आये हे.. हें..हें..हें..
लखन : (खडा होते गले मीलते) क्यु..? मे अपनी भाभीओको मीलने नही आ सकता क्या..? लगता हे यहा कोइ पार्टी बार्टी हे..
फीर लखन नीशाको भी गले मीला.. तो नीचे वही चुनवाला अहेसास.. नीशा बहुत ही सरमा गइ.. फीर लखन वसुधाको देखकर मुस्कुराया.. ओर उनको गले लगा.. तो वसुधाको थोडा जोरोसे भीच लीया.. जीसे वसुधा सर्मसार होगइ.. उनको भी नीचे चुंभन महेसुस हुइ.. तभी..






