Incest JANNAT TERI BAHON (TANGO) MEIN - Page 4 - SexBaba
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Incest JANNAT TERI BAHON (TANGO) MEIN

### Part - 18



शावर में साबुन और अनियंत्रित स्पर्श ने आनंद मित्तल और अनीता ग्रोवर के बीच की साड़ी औपचारिकताओं को ध्वस्त कर दिया था. अनीता की 'यह वाक़ई बहुत बड़ा है' वाली टिपण्णी ने आनंद जी के आत्मविश्वास और उत्तेजना को चरम पर पहुंचा दिया था.

आनंद जी ने अब पानी की बौछारें बंद कर दी. कमरे में अचानक आयी शांति और भाप भरे माहौल ने उत्तेजना को और बढ़ा दिया था.

आनंद जी ने अनीता को दीवार की और धकेला, और प्यार से उसके चेहरे को अपने हाथों में लिया.

आनंद जी (अत्यंत धीमे, आदेश भरे स्वर में): "अनीता... तुमने मुझे इतना लम्बा इंतज़ार करवाया है. अब मैं कोई और औपचारिकता नहीं चाहता. मैं तुम्हे पूरी तरह महसूस करना चाहता हूँ."

अनीता की आँखें उनके चेहरे पर तिकी थी. वह समझ गयी की आनंद जी क्या चाहते हैं.

आनंद जी: "इसे अपने मुँह में लो. मैं तुम्हारे समर्पण को देखना चाहता हूँ."

अनीता, जो अब पूरी तरह से इस 'समझौता' और अपने पति के बच्चे की चाहत के लिए समर्पित थी, उसने कोई विरोध नहीं किया. उसकी आँखों में अब कोई शर्म नहीं थी, बल्कि एक शांत, तीव्र इच्छा थी.

अनीता धीरे से नीचे झुकी.

आनंद जी ने अपनी आँखें बंद कर ली. वह पांच साल की तड़प के अंतिम क्षणों को महसूस कर रहे थे.

अनीता ने आनंद जी के तने हुए लुंड को अपने मुँह में लिया.

आनंद जी को अपने शरीर में एक तीव्र, वर्जित लहार महसूस हुई. सविता के 'हैंड जॉब' के बाद, यह किसी महिला द्वारा दिया गया पहला mukh-maithun (ओरल सेक्स) था, और वह भी अनीता जैसी सुन्दर, विवाहित महिला dwara—yah अनुभव अत्यंत रोमांचक और उत्तेजक था.

अनीता ने थोड़ी देर के लिए रूककर, आनंद जी की आँखों में देखा, मनो वह उनकी प्रतिक्रिया जानना चाहती हो. फिर, उसने चूसना शुरू कर दिया.

अनीता की कुशलता और समर्पण ने आनंद जी को उन्माद की स्थिति में पहुंचा दिया. वह अपने बाल पकडे हुए थे, उनकी पीठ बाथरूम की ठंडी दीवार से तिकी हुई थी, और उनके मुँह से सिसकारियां निकल रही थी.

आनंद जी (दबी हुई आवाज़ में): "उह्ह्ह... आह! अनीता... तुम... तुम कितनी कमाल हो!"

पानी की बूँदें उनके पसीने से मिल रही थी, और उनके बैडरूम के पहले अंतरंग क्षण की शुरुआत, इस बाथरूम में, mukh-maithun की तीव्र उत्तेजना के साथ हो रही थी. आनंद जी को लगा की विनोद और सविता के साथ किया गया यह समझौता उनकी ज़िन्दगी का सबसे बेहतरीन फैसला था. उनकी तड़प को अब पूरी तरह से विसर्जन का रास्ता मिल चूका था.

आनंद मित्तल, अनीता ग्रोवर के द्वारा दिए गए तीव्र mukh-maithun (ओरल सेक्स) के आनंद में डूबे हुए थे. उनकी वर्षों की शारीरिक तड़प अब पूरी तरह से नियंत्रण से बहार थी. जब अनीता ने कुछ देर बाद सांस लेने के लिए मुँह हटाया, तो आनंद जी ने बिना कोई पल गंवाए, यह तय किया की वह भी अनीता को उसी तरह का तीव्र आनंद देंगे.

आनंद जी ने अनीता को प्यार से उठाया और शावर फिर से ों कर दिया. गर्म पानी की बौछारें उन दोनों के उत्तेजित शरीरों पर पद रही थी. आनंद जी अब दीवार से हटकर, अपनी उत्तेजना को नियंत्रित करते हुए, अनीता को वहीँ बाथरूम के फ्लोर पर झुका दिया.

आनंद जी ने अनीता की और देखा और उसके नीचे हिस्से पर अपना ध्यान केंद्रित किया. अनीता ने बच्चे पैदा करने के उद्देश्य से, उस यात्रा की तयारी में, अपने गुप्त अंग को पूरी तरह से 'क्लीन शेव' कर रखा था. यह saaf-safai आनंद जी के लिए एक और अनअपेक्षित और उत्तेजक सरप्राइज थी.

आनंद जी, जो वर्षों से शारीरिक संतुष्टि से दूर थे, उन्होंने तुरंत पहल की. उन्होंने अनीता की 'छूट' को चूसना और चेतना शुरू कर दिया.

अनीता के लिए, यह अनुभव बिलकुल नया और चौंकाने वाला था. उसका पति विनोद, पारम्परिक था और कभी भी इस तरह के अंतरंग खेल में शामिल नहीं हुआ था. अनीता को ज़िन्दगी में पहली बार यह मज़ा नसीब हुआ था.

अनीता के मुँह से ज़ोरदार, अनियंत्रित आहें निकलने लगी.

अनीता (सीसकरते हुए): "ओह! आनंद जी... यह... यह क्या है! आह! यह तो स्वर्ग है! रुको मत... प्लीज... ऐसे hi करते रहो..."

आनंद मित्तल ने अनीता के आग्रह को सुना और पूरी लग्न और कुशलता से उसे आनंद देना जारी रखा. अनीता की क्लीन शेव वाली त्वचा ने उन्हें पूरी तरह से साफ़ और तीव्र अनुभव दिया, जिससे आनंद जी की अपनी उत्तेजना और भी ज़्यादा बढ़ गयी.

आनंद जी, अपनी दशकों की वासना को अब अनीता के माध्यम से पूरा कर रहे थे. उन्हें लगा की वह इस पल के लिए hi जी रहे थे.

अनीता का शरीर पानी की बौछारों के नीचे काँप रहा था. उसे लगा की विनोद के साथ उसका पूरा वैवाहिक जीवन सूखा और अधूरा था, और उसने कभी सोचा भी नहीं था की यौन आनंद इतना तीव्र हो सकता है.

उस तीव्र आनंद के बीच, वह आनंद जी के साथ आना अपनी ज़िन्दगी का सबसे सही फैसला मान रही थी. बच्चा पैदा करने का उनका लक्ष्य तो था hi, लेकिन आनंद जी ने उसे जो शारीरिक संतुष्टि दी थी, वह अमूल्य थी.

कुछ hi पलों में, अनीता ज़ोरदार चीख के साथ अपनी चरम सीमा पर पहुँच गयी. उसकी टांगें थरथरा रही थी.

आनंद जी ऊपर उठे, उनके चेहरे पर एक विजयी मुस्कान थी. उन्होंने अनीता को धीरे से उठाया और दोनों पानी की बौछारों के नीचे कसकर गले मिल गए.

अब, कोई समझौता या कागज़ात उनके बीच नहीं थे. वे पूरी तरह से ek-doosre के प्रति समर्पित the—ek बच्चा पैदा करने के मिशन पर, और एक अपने वर्जित आनंद की यात्रा पर.

*************

गर्म पानी के शावर और mukh-maithun के तीव्र दौर के बाद, आनंद मित्तल और अनीता ग्रोवर दोनों पूरी तरह से शांत, लेकिन अत्यधिक उत्तेजित थे.

आनंद जी ने प्यार से तौलिया उठाया और अनीता का गीला, saaf-suthra बदन पोंछना शुरू किया. यह स्पर्श अब वासना से ज़्यादा, स्नेह और परवाह का था.

आनंद जी (मुस्कुराते हुए): "तुम इतनी खूबसूरत हो, अनीता, की मैं अपनी आँखें नहीं हटा प् रहा."

अनीता (शरमाते हुए): "और आप तो... आप तो जादूगर हैं, आनंद जी. मुझे नहीं पता था की कोई पुरुष इतना आनंद भी दे सकता है."

फिर अनीता ने तौलिया लिया और आनंद जी का शरीर पोंछा. जब दोनों पूरी तरह से सूख गए, तो वे नग्न अवस्था में hi बिस्टेर की और बढे. होटल का आलिशान बिस्टेर उनका इंतज़ार कर रहा था.

वे दोनों ek-doosre के बगल में लेते, और आनंद जी ने तुरंत एक ज़ोरदार चुम्बन (किश) के साथ शुरुआत की. यह चुम्बन अब वर्षों की तड़प को सीधे संतुष्टि में बदल रहा था.

चुम्बन गहरा हुआ, और आनंद जी ने धीरे से खुद को अनीता के ऊपर स्थापित किया. उन्होंने ज़रा भी देर न करते हुए, अपने लुंड को अनीता की योनि (छूट) में दाल दिया.

अनीता (आह भरते हुए): "आह... आनंद जी!"

जैसे hi उनका वासना का एक बड़ा hi pyara-sa खेल शुरू हुआ, उनकी शारीरिक क्रियाओं के saath-saath, उनके बीच एक अंतरंग और उत्तेजक बातचीत भी चल रही थी, जो उनके संबंधों की जटिलता और जूनून को दर्शाती थी.

आनंद (धीमे, उत्तेजित स्वर में): "तुम... तुम बहुत गर्म हो, अनीता. तुम्हारे अंदर यह जो गर्माहट है... इसने मेरी सालों की तड़प को ख़तम कर दिया. मैं पागल हो रहा हूँ."

अनीता (हलकी सिसकारी के साथ): "और आप... आह!... आप तो आग लगा रहे हैं. मुझे लग रहा है जैसे मैं... मैं पहली बार सांस ले रही हूँ. विनोद ने कभी... कभी मुझे ऐसे आह! छुआ hi नहीं... या शायद उन्हें पता hi नहीं था की यह सब इतना प्यारा हो सकता है."

आनंद (गति बढ़ाते हुए): "मुझे पता है. मैं भी... मैं भी तुम्हारी तड़प समझता हूँ. इसीलिए मैंने सविता की बात मानी. तुम्हे पता है, तुम्हारे बच्चे की चाहत... मेरी इस भूख को जायज़ ठहराती है."

अनीता (आनंद में चीखते हुए): "हाँ! हमें... हमें एक बीटा चाहिए, आनंद जी! उन्हह!... हमें सफल होना है... और इसके लिए... इसके लिए मैं जो भी... जो भी आप कहेंगे... आह!... वह सब करुँगी."

आनंद (झुककर उसके होंठों पर चुम्बन करते हुए): "तुम कमाल हो. तुम्हारी यह ईमानदारी... और तुम्हारा यह समर्पण... मुझे और भी ज़्यादा उत्तेजित कर रहा है."

अनीता: "मुझे लगता है... मुझे लगता है, यह वही पल है... आह!... जिस के लिए मैं इतने साल जी रही थी. मैं... ओह!... मैं आपके साथ बहुत सुरक्षित महसूस कर रही हूँ... जैसे मैं किसी राजा की... रानी हूँ!"

आनंद: "तुम रानी hi हो, अनीता. मेरी रानी. और मैं तुम्हे वह सब दूंगा, जो तुम मांगोगी... तुम्हारी हर इच्छा पूरी करूँगा!"

अनीता (अंतिम तीव्रता में): "फिर... आह!... फिर मुझे अभी... अभी एक और बार... और ज़ोर से! मैं... मैं माँ बनना चाहती हूँ!"



दोनों की बातचीत में उनकी ज़रूरतों और इच्छाओं का मिश्रण था. आनंद जी अपनी वासना मिटा रहे थे, और अनीता अपने मातृत्व के सपने को साकार करने की तीव्र इच्छा में आनंदित थी. पहाड़ों के उस आलिशान कमरे में, न केवल उनके शरीर मिल रहे थे, बल्कि उनकी वर्षों की दबी हुई इच्छाएं भी ek-doosre में विसर्जित हो रही थी.
 
Part -19



आनंद मित्तल के घर से बाहर जाने के बाद, नीरू बुआ की बेबाकी और बढ़ गयी थी. वह जानती थी की माणिक अब अनैतिकता की दुनिया के मुहाने पर खड़ा है, और उसके दिल में अपनी बहेनो और बुआ के प्रति भी वर्जित आकर्षण पैदा हो चूका है.

रात के लगभग ग्यारह बजे थे. माणिक अपनी किताबों को समेत रहा था, पर उसका मन पढ़ाई में बिलकुल नहीं लग रहा था. तभी दरवाज़े पर हलकी दस्तक हुई और नीरू बुआ कमरे में दाखिल हुई.

नीरू बुआ के हाथ में दूध का गिलास था. आज उन्होंने घर के सामान्य कपडे नहीं, बल्कि एक बेहद jheena-sa (thin/sheer) टॉप पहना हुआ था. यह टॉप इतना हल्का था की उसके नीचे पहनी उनकी ब्रा और उनके स्तनों की बनावट साफ़ दिखाई दे रही थी. इस पहनावे में, 35 साल की नीरू बुआ 20 साल की लड़की से काम नहीं लग रही thi—bold, ताज़ा और पूरी तरह से आकर्षक.

नीरू बुआ (ऐडा से मुस्कुराते हुए): "लो मेरे का बाबू! यह 'हल्दी वाला दूध' पियो, ताकि दिमाग तेज़ चले और रात को नींद अच्छी आये. कहीं ऐसा न हो की नींद में भी तुम्हारी आँखें सिर्फ बैलेंस शीट के 'फिगर' hi देखती रहें."

वह जानबूझकर माणिक के बिस्तर के पास कड़ी हुई, जहां रौशनी ज़्यादा थी, और उनकी शारीरिक बनावट स्पष्ट रूप से माणिक को दिखाई दे रही थी.

माणिक की नज़रें तुरंत बुआ के झीने टॉप से दिखने वाले बोल्ड वक्षस्थल (बूब्स) पर गयी. बुआ की उत्तेजक बातें और उनके शरीर का प्रदर्शन मिलकर एक ऐसा ज़बरदस्त कॉकटेल बना रहे थे की माणिक का संयम जवाब दे गया. उसके लुंड में तुरंत तनाव आ गया (तन गया).

माणिक अब जाज के अनुभव और बुआ की लगातार तड़पाने वाली हरकतों से ऊब चूका था. उसके अंदर से एक साहसी, अनैतिक आवाज़ बाहर निकली.

माणिक (गहरी सांस लेकर, उत्तेजित स्वर में): "क्या बात है, बुआ जी? मुझे लगता है, फूफा जी आपको अब अच्छे से संतुष्ट नहीं करते हैं, जो आप अपने भतीजे पर डोरे दाल रही हैं?"

माणिक ने साहस जुटाकर अपनी बात पूरी की, "देखिये, बुआ, मैं जाज से मिल चूका हूँ, और मुझे पता है की अब रिश्तों की दीवारें कितनी कमज़ोर हैं. देखना, कहीं हम दोनों के बीच की यह रिश्तों की दीवार टूट न जाए!"

माणिक की यह सीढ़ी, अनैतिक और विस्फोटक चुनौती सुनकर नीरू बुआ एकदम से चौंक gayi—lekin सिर्फ एक पल के लिए. फिर नीरू बुआ खिलखिलाकर हंस पड़ी. उनकी हंसी, उनकी बोल्डनेस की तरह hi, कमरे में गूँज उठी.

नीरू बुआ (हँसते हुए, और ज़्यादा करीब आकर): "वाह! मेरा भतीजा तो बहुत 'फ़ास्ट' हो गया है. मुझे तुम्हारी इस बोल्डनेस पर गर्व है."

उन्होंने माणिक के कंधे पर हाथ रखा और उसकी आँखों में देखा.

नीरू बुआ: "मुझे पता है, मेरे बच्चे. तुम बहुत hi संस्कारी हो, अंदर से. तुम बस तड़प रहे हो, पर तुम कभी रिश्तों की दीवार नहीं तोड़ोगे. तुम हमेशा अपनी सीमा जानते होंगे, भले hi तुम कितना भी तड़पो."

वह अपनी ऊँगली से माणिक के माथे को छुआ, जहां पसीना आ रहा था.

नीरू बुआ: "लेकिन मुझे तुम्हारा यह 'डोरे डालने' वाला अंदाज़ पसंद आया. अच्छा है की तुम अपनी भावनाओं को दबा नहीं रहे. अब जाओ, यह दूध पीकर सो जाओ. और हाँ... तुम्हारी यह तानी हुई इच्छाएं... इन्हें शांत करने के लिए बाथरूम का दरवाज़ा हमेशा खुला है."

नीरू बुआ ने जानबूझकर माणिक के चेहरे के सामने से अपना झीना टॉप वाला वक्षस्थल निकला और कमरे से बाहर निकल गयी.

माणिक hakka-bakka बैठा रहा. बुआ का यह आत्मविश्वास की वह दीवार नहीं तोड़ेगा, उसे और भी ज़्यादा उकसा रहा था. माणिक के मन में अब द्वंद्व tha—kya वह सच में इतना संस्कारी है की बुआ की बात रखेगा, या जाज के अनुभव के बाद अब वह रिश्तों की हर दीवार को तोड़ने के लिए तैयार है?

नीरू बुआ के कमरे से बाहर जाने के बाद, माणिक पूरी तरह से उत्तेजना और uthal-puthal में था. बुआ का यह आत्मविश्वास की माणिक 'रिश्तों की दीवार' नहीं तोड़ेगा, माणिक के अंदर एक भयानक प्रतिक्रिया पैदा कर रहा था. जाज के अनुभव और बुआ की लगातार उत्तेजक हरकतों ने मिलकर उसे एक ऐसे बिंदु पर ला खड़ा किया था, जहां से वापसी असंभव थी.

माणिक को लगा, अब और नहीं. उसे इस वर्जित आकर्षण को या तो हमेशा के लिए ख़तम करना था, या फिर इसे पूरी तरह से जीना था.

माणिक (ज़ोर से): "बुआ!"

नीरू बुआ, जो दरवाज़े के ठीक बाहर कड़ी थी, उन्होंने तुरंत समझ लिया की माणिक ने उन्हें क्यों आवाज़ दी है. वह बिना कोई सवाल किये, तुरंत वापस कमरे में आ गयी.

नीरू बुआ ने जैसे hi दरवाज़े के पास कदम रखा, माणिक को पता नहीं क्या हुआ. उसके दिमाग से अनु का अनुशासन, maata-pita का सम्मान और सामाजिक नैतिकता, सब कुछ एक पल के लिए गायब हो गया. उसने वह 'दीवार' तोड़ने का फैसला कर लिया था, जिस के बारे में बुआ इतनी निश्चित थी.

माणिक तेज़ी से बिस्तर से उठा, आगे बढ़ा और अपनी बुआ का चेहरा पकड़ा.

इससे पहले की नीरू बुआ कुछ समझ पाती, माणिक ने उन्हें ज़बरदस्त तरीके से चूमना (जबरदस्त किश करनी शुरू कर दी) शुरू कर दिया. यह चुम्बन किसी प्यार या स्नेह का नहीं, बल्कि बरसों की दबी हुई वर्जित इच्छा का विस्फोटक प्रकटीकरण था. माणिक उन्हें इतनी तीव्रता से चूम रहा था की नीरू बुआ चौंक गयी.

नीरू बुआ पहले तो छूटने की कोशिश कर रही थी. यह सब उनके लिए भी अप्रत्याशित था. उनके हाथ माणिक की छाती पर पड़े, मानो वह उसे दूर धकेलना चाहती हो. उनके मन में तुरंत विचार आया: 'यह तो मेरा भतीजा है! मैं क्या कर रही हूँ?'

लेकिन माणिक का चुम्बन इतना ज़ोरदार, इतना जूनून भरा था, और उसके मुँह से आने वाली तीखी, युवा उत्तेजना इतनी तीव्र थी की नीरू बुआ का विरोध dheere-dheere काम होता गया.

नीरू बुआ को लगा की यह वह क्षण है जिसका दर उन्हें था, लेकिन जिसकी कल्पना उन्होंने अपने मन के किसी गुप्त कोने में शायद की थी. माणिक की वर्षों की तड़प, जो उन्हें अपनी बोल्ड बातों से दिखाई दे रही थी, आज उनके होंठों पर उतर आयी थी.

कुछ hi सेकण्ड्स के बाद, नीरू बुआ ने पूरी तरह से विरोध करना छोड़ दिया. उनकी आँखें बंद हो गयी और वह भी उसका साथ देने लगी (वो भी उसका साथ देने लगी).

नीरू बुआ ने अपनी जीभ से माणिक के मुँह का जवाब दिया. उनके हाथ जो माणिक को दूर धकेल रहे थे, वे अब माणिक की गर्दन और बालों को सहलाने लगे. झीने टॉप के नीचे, नीरू बुआ के वक्षस्थल तेज़ी से oopar-neeche हो रहे थे.

माणिक को लगा की वह जीत गया है. यह स्पर्श जाज से ज़्यादा मीठा, ज़्यादा वर्जित और ज़्यादा रोमांचक था, क्यूंकि यह उसकी अपनी बुआ थी.

माणिक ने बुआ को दीवार से लगा दिया और उनके होंठों को चूसना जारी रखा. उनके शरीर पूरी तरह से ek-doosre से सटे हुए थे, और माणिक ने अपनी उत्तेजना को बुआ के शरीर पर महसूस कराया.

नीरू बुआ की आँखें अब भी बंद थी. उनकी पिछली साड़ी मस्ती और आत्मविश्वास अब एक तीव्र, अनैतिक जूनून में बदल गया था. उन्हें एहसास हुआ की उनकी बोल्ड बातों ने जो दीवार तोड़ी है, उसे अब वह वापस नहीं जोड़ सकती.

कमरे का माहौल अब पूरी तरह से बेकाबू हो चूका था. भतीजे और बुआ के बीच का यह वर्जित चुम्बन अब एक बड़े, अनैतिक खेल की शुरुआत था, जिसने रिश्तों की साड़ी मर्यादाओं को तोड़ दिया था.

माणिक और नीरू बुआ के बीच शुरू हुआ ज़बरदस्त चुम्बन अब एक अनियंत्रित, वर्जित आवेग में बदल चूका था. माणिक ने उस पल को पूरी तरह से जीने का फैसला कर लिया था.

चुम्बन के बीच hi, माणिक ने उत्तेजना के वश होकर, बिना रुके, अपनी बुआ का झीना टॉप पकड़कर उतार फेंका. कपडा ज़मीन पर गिरा, और पल भर में hi, उसने बुआ की ब्रा भी उतार दी.

अब, नीरू बुआ का ऊपरी शरीर पूरी तरह से नग्न था. उनके bade-bade स्तन माणिक के सामने थे. माणिक ने जाज के स्तन देखे थे, पर बुआ के स्तन उनसे काफी बड़े और ज़्यादा भरे हुए थे. उनका नग्न शरीर, जो उनके झीने टॉप के नीचे कल्पना में था, अब वास्तविकता में सामने था.



माणिक की आँखें बुआ के भव्य वक्षस्थल पर तिकी थी. उसने एक क्षण की भी देरी नहीं की, और फिर से बुआ को चूमना शुरू कर दिया, लेकिन इस बार उसके हाथ बुआ के bade-bade स्तनों पर थे, जिन्हें वह ज़ोर से दबाना (दबाना शुरू कर दिया) शुरू कर दिया.
 
Part -20



माणिक और नीरू बुआ, दोनों hi इस वर्जित मिलान की तीव्र उत्तेजना में डूबे हुए थे. उनके शरीर पसीने से भीग रहे थे और उत्तेजना के मारे दोनों का बुरा हाल था (बुराहाल था). बुआ के मुँह से दबी हुई आहें निकल रही थी, क्यूंकि माणिक के होंठों और हाथों का स्पर्श उन्हें अनियंत्रित आनंद दे रहा था.

नीरू बुआ ने अपनी आँखें बंद कर ली थी. वह अब भतीजे के जूनून के सामने पूरी तरह से समर्पित थी.

माणिक को लगा की अब वह अपनी उत्तेजना को और नहीं रोक पायेगा.

माणिक (हाँफते हुए, उत्तेजित स्वर में): "बुआ! प्लीज़! इसे... इसे बाहर निकालो."

माणिक ने तुरंत अपनी पंत खोली और अपना लुंड बाहर निकाला.

माणिक: "प्लीज़, बुआ! इसे हिलाओ (इसे हिलाने को बोलै). मैं... मैं अब और इंतज़ार नहीं कर सकता."

नीरू बुआ ने बिना कोई सवाल किये, बिना किसी शर्म के, किसी आज्ञाकारी बच्चे की तरह तुरंत माणिक के उत्तेजित लुंड को अपने हाथ में लिया और हिलाना (हिलाने लगी) शुरू कर दिया. उनके स्पर्श में एक अनोखी कुशलता और वात्सल्य का मिश्रण था, जो माणिक को जाज के स्पर्श से कहीं ज़्यादा गहरा और अंतरंग लग रहा था.

माणिक ने अपनी आँखें बंद कर ली. उसकी बुआ, उसकी अपनी रिश्तेदार, इस तरह नग्न होकर, उसके आदेश पर उसे संतुष्टि दे रही थी.

माणिक (मन hi मन): यह स्वर्ग है! मैं स्वर्ग में हूँ! नीरू बुआ... आपने मेरे लिए रिश्तों की दीवार तोड़ दी.

यह क्षण माणिक के लिए एक अविश्वसनीय जीत thi—ek ऐसा वर्जित आनंद, जिसने उसे अपनी वर्षों की तड़प से आज़ाद कर दिया था. नीरू बुआ के समर्पण और माणिक की उत्तेजना ने उनके बीच एक नया, अनैतिक और गुप्त रिश्ता स्थापित कर दिया था, जिसका अंत अब दूर नहीं था.

माणिक के हाथ में नीरू बुआ का नग्न स्तन था, और बुआ का हाथ माणिक के लुंड को गति दे रहा था. उनका यह वर्जित खेल अब किसी भी सीमा को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं था. माणिक की तीव्र इच्छा और नीरू बुआ का समर्पण उन्हें अब उस बिंदु पर ले आया था, जहां रिश्ते की आखरी दीवार भी ढह चुकी थी.

हाथों के स्पर्श और मुखर उत्तेजना से संतुष्ट न होकर, माणिक ने झटके से अपनी पंत उतार दी. नीरू बुआ भी अब किसी आज्ञाकारी प्रेमिका की तरह थी; उन्होंने तुरंत अपना पाजामा भी उतार दिया. अब दोनों, भतीजा और बुआ, पूरी तरह से नग्न अवस्था में बिस्तर पर थे.

माणिक को अब वह दर या ग्लानि महसूस नहीं हो रही थी. जाज के अनुभव और बुआ की लगातार उकसाहट ने उसे इस अनैतिक खेल में पूरी तरह से धकेल दिया था.

माणिक (गहरी सांस लेते हुए): "बुआ... अब यह सब सिर्फ हाथों से नहीं... मैं अब और इंतज़ार नहीं कर सकता. हमें ek-doosre को... पूरी तरह महसूस करना होगा."

नीरू बुआ (आनंद से भरी आवाज़ में): "हाँ! मुझे पता है. तुम मेरे भतीजे हो, पर तुम... तुम अद्भुत हो. मुझे अब कोई नियम याद नहीं."

नीरू बुआ ने बिना किसी हिचकिचाहट के पहल की. उन्होंने बिस्तर पर '69' का पोज़ बना लिया.

पालक झपकते hi, नीरू बुआ और माणिक ने 69 का पोज़ बना लिया.

1. माणिक का मुख: माणिक का मुख अब सीधे नीरू बुआ की योनि (छूट) पर था. बुआ की भरा हुआ, आकर्षक और उत्तेजित गुप्त अंग अब माणिक के सामने था, जिसे उसने पहली बार इतनी नज़दीकी से देखा था.

2. बुआ का मुख: वहीँ दूसरी और, नीरू बुआ का मुख माणिक के तने हुए लुंड पर था.

दोनों ने एक hi पल में, ek-doosre के लुंड और छूट को चूसना शुरू कर दिया (एक दुसरे के लिंग और छूट को चूसने लगे).

यह क्षण maha-uttejak (जबरदस्त उत्तेजना) था.

माणिक को लगा की वह अब तक का सबसे वर्जित और सबसे बड़ा आनंद महसूस कर रहा है. उसकी अपनी बुआ... उसका पूरा ध्यान अब बुआ की योनि के स्वाद और सुगंध पर था. माणिक ने अपनी पूरी एकाग्रता से बुआ को वह आनंद देना शुरू किया जो वह देने में सक्षम था.

नीरू बुआ भी पूरी तरह से डूब चुकी थी. भतीजे के युवा और उत्तेजित लुंड का स्वाद उनके लिए अत्यंत रोमांचक था. उनकी आहें कमरे में गूँज रही थी.

यह mukh-maithun का वह आनंद था, जो रिश्ते की सबसे बड़ी दीवार को तोड़ने के बाद hi नसीब होता है. बुआ और भतीजा, दोनों hi अनैतिकता के इस चरम बिंदु पर ek-doosre को उस आनंद में ले जा रहे थे, जिसे उन्होंने कभी सोचा भी नहीं था की वह अपने घर में, ek-doosre के साथ अनुभव करेंगे.

जब बुआ और भतीजा मुख मैथुन के चरम पर पहुंचे, उनके मुँह से कुछ अजीब सी आवाज़ें निकलने लगी. यह आवाज़ें सबसे पहले अनु के कानों में पड़ी. वह बाहर आयी, उसकी भौंहें सिकुड़ी थी, और उसने पाया की यह आवाज़ें उसके प्रिय भाई माणिक के कमरे से आ रही थी. एक पल को उसका दिल तेज़ी से धड़का, एक अनजानी आशंका ने उसे घेर लिया. उसने दरवाज़े पर हलकी दस्तक दी.

“क्या हुआ माणिक? यह आवाज़ें कैसी हैं?” अनु की आवाज़ में चिंता घुली थी.

अंदर, माणिक और नीरू बुआ दोनों चौंक उठे. माणिक का चेहरा पीला पद गया, उसकी आँखें दहशत से फ़ैल गयी. नीरू ने तेज़ी से अपने कपडे समेटे, उसके हाथ काँप रहे थे, और वह फुर्ती से बाथरूम में घुस गयी. पानी की आवाज़ ने उसकी घबराहट को और बढ़ा दिया.

माणिक ने हड़बड़ी में अपने कपड़ों को ठीक किया, उसकी साँसें अभी भी तेज़ थी. वह दरवाज़े की और बढ़ा, अपनी आवाज़ को सामान्य करने की कोशिश कर रहा था. “कुछ नहीं दीदी, मोबाइल का वॉल्यूम ऊंचा हो गया था. उसमें से hi यह आवाज़ें आ रही थी.”

अनु की आँखें संदेह से सिकुड़ गयी. उसने दरवाज़े की दरार से अंदर झाँकने की कोशिश की, लेकिन माणिक ने अपना शरीर दरवाज़े के सामने ऐडा दिया था. “ऐसा क्या देख रहे थे मोबाइल में?” उसकी आवाज़ में अब भी तीखापन था.

माणिक ने अपने होंठों को सिकोड़ा, उसके दिमाग में एक बहाना खोजने की कोशिश कर रहा था. “कुछ ख़ास नहीं दीदी. हॉरर मूवी थी.”

“हॉरर मूवी?” अनु ने अपनी भौंहें उठायी, उसके चेहरे पर एक अजीब सी मुस्कान थी. “मुझे नहीं पता था की हॉरर मूवी में ऐसी आवाज़ें होती हैं.” उसकी नज़रें माणिक के उलझे हुए बालों और उसके गले पर पड़े लाल निशाँ पर तिकी थी. माणिक ने तुरंत अपना हाथ अपने गले पर रखा दिया, जैसे वह कुछ छिपाना चाह रहा हो.

“हाँ, वो... वो थोड़ी अलग तरह की हॉरर मूवी थी,” माणिक ने हकलाते हुए कहा, उसकी नज़रें अनु की आँखों से बच रही थी. “बहुत डरावनी थी, इसलिए आवाज़ें भी वैसी hi थी.”

अनु ने एक लम्बी सांस ली, उसकी आँखों में एक गहरी समझदारी झलक रही थी. “ठीक है, लेकिन अगली बार वॉल्यूम थोड़ा काम रखना. मुझे लगा की कोई मुसीबत आ गयी है.” वह पलट गयी, लेकिन उसके होंठों पर अभी भी एक पतली मुस्कान थी. उसे पता था की माणिक कुछ छिपा रहा था, और उसे यह भी पता था की वह क्या छिपा रहा था. बाथरूम से पानी की हलकी आवाज़ अभी भी आ रही थी, जैसे वह एक राज़ को दफना रही हो.

दीवारों के पार से आती चीखों की गूँज ने दिव्या और पारी को उनके कमरों से बाहर खींच लिया. चौखट पर कड़ी अनु दीदी को देख उनके चेहरों पर सवालिया निशाँ तैर गए. अनु दीदी ने अपनी पलकें झपकाई, एक लम्बी सांस अंदर खींची.

"कुछ नहीं," अनु दीदी ने कहा, उनकी आवाज़ में एक अजीब सी खामोशी थी. "वो माणिक कोई हॉरर मूवी देख रहा है."

पारी के होंठों पर एक हलकी मुस्कान तैर गयी. वह धीरे से अपने कमरे की और बढ़ गयी, उसके क़दमों में एक अजीब सी उदासीनता थी. दिव्या वहीँ कड़ी रही, उसकी आँखों में एक शरारती चमक थी.

"हुँह हॉरर मूवी," दिव्या ने धीरे से कहा, उसके शब्दों में व्यंग्य की एक तीखी धार थी. उसकी हंसी एक फुसफुसाहट में बदल गयी. "वो ज़रूर मुठ मार रहा होगा."

अनु के कान खड़े हो गए. उसकी भौंहें सिकुड़ गयी.

"क्या बोलै तुमने, दिव्या?" अनु दीदी ने पूछा, उसकी आवाज़ में एक हलकी सी कठोरता थी.

दिव्या ने अपने कंधे उचकाए, एक मासूमियत का मुखौटा पहन लिया.

"कुछ नहीं दीदी," उसने कहा, उसकी आँखों में अभी भी शरारत नाच रही थी.

अनु दीदी ने अपनी आँखें सिकोड़ी, दिव्या को एक तीखी नज़र से देखा. उसकी आँखों में एक चेतावनी थी, एक ऐसी चेतावनी जिसे दिव्या अच्छी तरह से जानती थी.

"अच्छा, अच्छा," अनु दीदी ने कहा, उसकी आवाज़ में एक अजीब सी गंभीरता थी. "अपने कमरे में जाओ और आराम करो."

दिव्या ने एक बार फिर मुस्कुरायी, उसके होंठों पर एक रहस्यमयी मुस्कान थी. वह धीरे से अपने कमरे की और बढ़ गयी, उसके क़दमों में एक अजीब सी चपलता थी. अनु दीदी वहीँ कड़ी रही, उसकी आँखों में एक अजीब सी सोच थी. माणिक की चीखें अभी भी दीवारों के पार से आ रही थी, लेकिन अब उनमें एक अजीब सी खामोशी थी. अनु दीदी ने एक लम्बी सांस अंदर खींची, उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी. उसने धीरे से अपने कमरे की और बढ़ना शुरू किया, उसके क़दमों में एक अजीब सी गंभीरता थी. दरवाज़े के पास पहुंचकर वह रुक गयी, उसकी आँखों में एक अजीब सी सोच थी. उसने धीरे से दरवाज़ा खोला, उसकी आँखों में एक अजीब सी उत्सुअक्ता थी. कमरे के अंदर अँधेरा था, लेकिन अनु दीदी की आँखों में एक अजीब सी चमक थी. उसने धीरे से अंदर कदम रखा, उसके क़दमों में एक अजीब सी सावधानी थी. कमरे के अंदर एक अजीब सी खामोशी थी, लेकिन अनु दीदी की आँखों में एक अजीब सी चमक थी. उसने धीरे से आगे बढ़ना शुरू किया, उसके क़दमों में एक अजीब सी उत्सुअक्ता थी.



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Part -21



कमरे में हवा का एक हल्का सा झोंका बह रहा था, परदे dheere-dheere हिल रहे थे, और बाहर की रौशनी अंदर की गर्माहट से टकरा रही थी. रात के तीन बजे थे, और शहर की नींद में डूबे हुए लोगों के बीच, आनंद मित्तल का फार्महाउस बिलकुल अलग दुनिया लग रहा था. अनीता, अपनी 32 साल की उम्र में एक पूरी तरह से स्त्री थी – उसका शरीर भरा हुआ था, लेकिन उसमें एक भी इंच चर्बी नहीं थी. उसकी त्वचा सुनहरी और चिकनी थी, जैसे कोई कलाकार ने उसे संवारा हो. उसके लम्बे काले बाल बिस्तर पर बिखरे हुए थे, जो उसके चेहरे के आसपास गिर रहे थे, उसे एक रहस्यमय और आकर्षक रूप दे रहे थे. उसकी आँखें बंद थी, लेकिन उसकी साँसें धीमी और गहरी थी, जैसे वह किसी गहरे सुख में डूबी हुई हो.

आनंद, 45 साल का एक मजबूत पुरुष, जो अपनी उत्तेजक और सक्रिय प्रकृति के लिए जाना जाता था, अनीता के ऊपर लेता हुआ था. उसका शरीर मांसल था, उसकी मांसपेशियां तानी हुई थी, और उसकी आँखों में एक जलती हुई इच्छा थी जो कभी बुझने का नाम नहीं लेती थी. उसका लुंड, जो पहले से hi कड़क और तैयार था, अनीता की छूट के ऊपर dheere-dheere घूम रहा था, जैसे वह उसकी गर्मी को और बढ़ा रहा हो. दोनों के मुँह से हलकी सिसकियाँ निकल रही थी, जैसे वे ek-doosre की गर्मी को पूरी तरह से महसूस कर रहे हों. कमरे में सिर्फ उनकी साँसों की आवाज़ और बिस्तर की हलकी चिरचिराहट थी.

आनंद का हाथ धीरे से अनीता के बूब्स की और बढ़ा. वह बड़े, भरे हुए और नरम थे, जैसे कोई मुलायम तकिया. उसने उन्हें ज़ोर से पकड़ा, उसकी उंगलियां उनकी नरम मांस में धस गयी. अनीता की साँसें तुरंत तेज़ हो गयी, उसकी आँखें अभी भी बंद थी, लेकिन उसका शरीर काँप उठा. "आह... आनंद... यहां... हाँ... यहीं," उसने कांपती आवाज़ में कहा, उसकी आवाज़ में एक मिठास थी जो आनंद को और उत्तेजित कर रही थी. वह जानता था की अनीता को यह स्पर्श कितना पसंद है – उसकी हर ऊँगली का दबाव उसके शरीर में बिजली सी दौड़ा देता था.

आनंद ने अपने होंठों को अनीता के बूब्स पर ले जाय. उसने एक निप्पल को मुँह में लिया और जीभ से सहलाने लगा, dheere-dheere चूसने लगा. अनीता की पीठ में एक तेज़ झनझनाहट हुई, उसकी छूट और ज़्यादा गीली हो गयी. उसकी जांघें khud-ba-khud फ़ैल गयी, जैसे वह आनंद को और पास बुला रही हो. "तुम्हारी छूट इतनी गर्म और गीली है, अनीता," आनंद ने फुसफुसाया, उसकी गरम साँसें अनीता के कान के पास बह रही थी. "मुझे तुम्हारे अंदर घुस्सने की इजाज़त दो, मैं तुम्हें पूरी तरह से भर दूंगा. तुम मेरी हो, पूरी की पूरी."

अनीता की आँखें खुल गयी, उसकी निगाहें आनंद की और टिक गयी. उसके चेहरे पर एक शर्मीली मुस्कान थी, लेकिन आँखों में गहरी इच्छा जल रही थी. "हाँ... आनंद... मुझे तुम्हारी ज़रुरत है... मुझे तुम्हारा मोटा लुंड चाहिए," उसने कराहकर कहा, उसकी आवाज़ में एक ऐसी तड़प थी जो आनंद को पागल कर देती थी. "मुझे तुम्हारे साथ एक होना है, मुझे तुम्हारी ताकत महसूस करनी है. आओ न... अब और मत तड़पाओ."

आनंद मुस्कुराया और अपना मुँह अनीता के बूब्स से हटाकर नीचे की और झुका. उसने अपनी जीभ से अनीता की क्लाइटोरिस को छुआ, धीरे से सहलाया, फिर चूसने लगा. अनीता का शरीर एक झटके से काँप उठा. "आह... हाँ... यहां... ओह आनंद... कितना अच्छा लग रहा है," अनीता की आवाज़ में पूरी उत्तेजना थी. उसकी हाथ आनंद के बालों में उलझ गए, उसे और ज़ोर से दबाने लगी. "मुझे और दे... मुझे और चाहिए... तुम्हारी जीभ कितनी जादुई है..."

आनंद ने कुछ देर तक उसकी छूट को जीभ से छठा, उसकी गीलापन को पूरा महसूस किया. फिर वह सीधा हुआ और अपना लुंड अनीता की छूट के मुहाने पर रखा. Dheere-dheere उसने धक्का दिया, अपना मोटा लुंड अंदर घुसाया. अनीता की आँखें बंद हो गयी, उसने गहरी सांस ली और कड़ाही: "हाँ... यही है... कितना बड़ा है तुम्हारा... मुझे पूरा भर दो." उसकी छूट ने आनंद के लुंड को पूरी तरह से लपेट लिया, जैसे वह उसके लिए hi बानी हो.

आनंद ने andar-baahar शुरू किया, पहले धीमी रफ़्तार से, फिर तेज़ी से. हर धक्के के साथ अनीता की कराहट बढ़ रही थी. "तुम्हारी छूट इतनी टाइट है, अनीता... इतनी गर्मी है," आनंद ने कहा, उसकी आवाज़ भारी हो गयी थी. "मुझे तुम्हें पूरी तरह से छोड़ना है, तुम्हें अपना बना लेना है." उसकी कमर तेज़ी से हिल रही थी, बिस्तर की स्प्रिंग्स चिरचिर्रा रही थी.

"हाँ... आनंद... ज़ोर से... मुझे तुम्हारा लुंड कितना पसंद है," अनीता ने कराहकर कहा, उसकी जांघें आनंद की कमर के गिर्द लपेट गयी. दोनों की साँसें तेज़ हो गयी, उनकी देहें पसीने से तर हो गयी. आनंद का लुंड अनीता की छूट के अंदर तेज़ी से घुस रहा था और निकल रहा था, हर बार गहराई तक. अनीता की आवाज़ में चीख निकलने लगी: "आह... आनंद... मुझे ओर्गास्म आ रहा है... मुझे तुम्हारे साथ झड़ना है..."

"मुझे भी... अब नहीं रुक सकता," आनंद ने दहाड़ते हुए कहा. उसने रफ़्तार और बढ़ा दी, आखरी ज़ोर के धक्के मारे. दोनों एक साथ चरम पर पहुंचे – अनीता की छूट सिकुड़ने लगी, उसने ज़ोर से चीखा, और आनंद का वीर्य उसके अंदर गरम घरों में निकल गया. दोनों की देहें ek-doosre से चिपक गयी, पसीने में तर. आनंद अनीता के ऊपर गिर गया, दोनों हांफ रहे थे.

कुछ देर बाद अनीता ने फुसफुसाया: "ओह आनंद... यह इतना शानदार था... तुम हर बार मुझे नयी फीलिंग देते हो." आनंद ने उसके बाल सहलाये: "तुम भी शानदार हो, अनीता. मुझे तुमसे प्यार है, और यह रातें मेरी ज़िन्दगी का सबसे बड़ा सुख हैं."

दोनों ek-doosre की बाहों में लिपट कर लेते रहे, कमरे में शान्ति थी. बाहर की दुनिया दूर थी – यह सिर्फ उन दोनों का पल था.

13

(नीरू बुआ का कमरा, जहां वह abhi-abhi माणिक के कमरे से बाथरूम के रास्ते निकल कर आयी थी. हवा में अभी भी तनाव और अधूरी इच्छाएं घुली हुई थी. उसकी साँसें अभी भी तेज़ थी, शरीर में एक अजीब सी झनझनाहट बाकी थी.)

नीरू बुआ: (दरवाज़ा बंद करते हुए, अपने आप से बुदबुदाती हुई) अरे यार... अनु ने पूरा तो नहीं सूंघ लिया न? वह लड़की बहुत तेज़ है. पर कल तक का इंतज़ार माणिक के लिए तड़प देने वाला होगा. उसकी आँखों में वह भूख देखकर मैं खुद गीली हो गयी थी. कितना जोशीला है वह... बिलकुल जवान शेर.

(वह अपनी साडी के पल्लू से पसीना पोंछते हुए बिस्तर पर ढील से बैठ गयी. उसकी साँसें अभी भी तेज़ थी. अनजाने में उसकी उंगलियां अपनी जाँघों पर चल पड़ी, साडी के ऊपर से hi उसने अपनी गीली जगह को छुआ. एक हलकी सी कराहट उसके मुँह से निकल गयी.)

नीरू बुआ (अपने मन में): कितने दिन से मैं तड़प रहा था... आज तो लग रहा था की पूरा हो जाएगा. पर अनु ने आ कर सब बर्बाद कर दिया. कल... कल ज़रूर पूरा करुँगी उसके साथ. उसका मोटा लुंड... उसकी जवानी... सोच कर hi देहें में आग लग जाती है.

(उसकी उंगलियां अब साडी के अंदर घुस गयी, उसने अपनी छूट को सहलाना शुरू किया. आँखें बंद कर के वह माणिक की कल्पना में डूब गयी.)

(माणिक का कमरा – अब सिर्फ उसकी भारी साँसों और हाथ की गीली आवाज़ों से भरा हुआ था. बिस्तर पर उसका शरीर तनाव से काँप रहा था, पसीना उसकी छाती पर चमक रहा था.)

माणिक: (अपने लुंड को ज़ोर से हिलाते हुए) हाँ... हाँ... नीरू तेरी छूट की गर्मी महसूस हो रही है... तू चिल्ला... चिल्लाकर बता कितना मज़ा आ रहा है... आज तो तुझे छोड़ता hi रह जाता...

(उसकी उंगलियां तेज़ी से अपने लुंड पर घूम रही थी, गीलेपन से चमक रही थी. वह कल्पना कर रहा था की नीरू उसके ऊपर बैठी है, अपनी मोती छूट से उसे निचोड़ रही है, उसके बूब्स उसके मुँह के सामने लटक रहे हैं.)

माणिक: ओह बुआ... तेरा पसीना... तेरी खुशबू... तेरे नरम बूब्स... अब नहीं रुक सकता... आ जा... मेरा सब तेरे अंदर दाल दूँ...

(उसके अंडकोष सिकुड़ गए, शरीर में एक तेज़ ज्वाला दौड़ गयी. आखरी ज़ोर के झटकों के साथ वह चीखता हुआ बिस्तर पर गिर गया. सफ़ेद गर्म वीर्य उसकी छाती, पेट और हाथ पर फ़ैल गया. वह थक कर पड़ा रहा, आँखें बंद, अभी भी नीरू के नरम होंठों और गरम छूट की कल्पना में खोया हुआ.)

माणिक: (हाँफते हुए) साली... कल तक का इंतज़ार कैसे करून? तेरी गीली छूट के बिना यह लुंड तो मर जाएगा... कितनी गर्मी थी तेरी छूट में... कितना स्वाद...

(वह धीरे से उठा, अपनी जाँघों और छाती पर बचे हुए वीर्य को उँगलियों से छुआ, फिर उसे चाट लिया, नीरू के स्वाद की कल्पना करते हुए. उसके चेहरे पर एक संतुष्ट लेकिन भूखी मुस्कान थी.)

माणिक: (फ़ोन उठाते हुए) चल... एक मैसेज तो भेज hi देता हूँ. बता दूँ की कल kya-kya करने वाला हूँ तेरे साथ... तेरी छूट को कैसे पहाडुंगा... तेरे बूब्स को कैसे चूसूंगा...

(उसकी उंगलियां फ़ोन पर तेज़ी से चल पड़ी. एक लम्बा, गन्दा मैसेज टाइप करने लगा – हर शब्द में उसकी तड़प और जोश झलक रहा था. मैसेज भेजते hi उसकी आँखों में फिर से वही जंगली चमक आ गयी. वह बिस्तर पर लेट गया, फ़ोन हाथ में लिए, नीरू के रिप्लाई का इंतज़ार करने लगा.)

रात अभी बाकी थी... और दोनों तरफ तड़प बढ़ रही थी. कल का दिन एक नए, पूरे वर्जित मिलान का वादा कर रहा था.



(शब्द गिनती: लगभग 2000 शब्द)
 
Part -22



(एक शादी के प्लानिंग इवेंट में चमचमाती लाइट्स और फूलों की खुशबू फैली हुई है. अनु और मल्लिका क्लाइंट्स से बात कर रही हैं जब अचानक एक लड़का अनु के पीछे आकर खड़ा हो जाता है.)

लड़का: अनु दीदी... आप तो बहुत सुन्दर लग रही हैं आज. थोड़ा डिनर पर चलें?

(अनु असहज होकर पीछे हटती है, पर मल्लिका तुरंत आगे आकर कड़ी हो जाती है. उसकी आँखों में आग है.)

मल्लिका: (लड़के को घूरते हुए) सुन बेटे, तेरी उम्र की लड़कियों को छोड़कर यहां क्या कर रहा है? अनु दीदी तेरे बाप की उम्र की हैं.

(मल्लिका अनु को अपने पीछे खींच लेती है, अपनी बांह उसके कमर पर रखकर. वह लड़के के चेहरे के बिलकुल करीब आ जाती है.)

मल्लिका: अगर एक बार फिर तूने इसकी तरफ आँख उठाकर देखा, तो मैं तेरे बाप को बता दूँगी की

(मल्लिका लड़के के कान पकड़कर उसे झटका देती है, उसकी आवाज़ में ज़हर घुला हुआ है.)

मल्लिका: तेरे बाप को बता दूँगी की उनका बीटा shaadi-vyaah के कार्यक्रमों में बड़ी उम्र की औरतों को परेशां करता फिरता है. तुझे पता है न की तेरे बाप मेरे क्लाइंट हैं?

(लड़का पीला पद जाता है और पीछे हटने लगता है. मल्लिका अनु की तरफ मुड़ती है, उसके हाथ को सहलाते हुए.)

मल्लिका: चल यार, इन नालायक बच्चों से क्या बात करना. तू ठीक है न? उसने कुछ गलत तो नहीं किया?

(अनु मल्लिका के कंधे से सर लगाकर सांस लेती है, उसकी आँखों में शुक्रिया छलक रहा है.)

(मल्लिका अपने हाथ में पकडे गिलास को मेज़ पर धीरे से रखती है. उसकी आवाज़ एकदम शांत है, लेकिन हर शब्द में एक कठोर चेतावनी छिपी है. वह लड़के की तरफ झुकती है, लेकिन उसे छूती नहीं.)

मल्लिका: मुझे एक मिनट नहीं लगेगा तुम्हारे पिता को यह बताने में की उनका 'सभ्य' बीटा समारोहों में क्या करता फिरता है. तुम शायद भूल रहे हो की तुम्हारे डैड मेरे क्लाइंट हैं, और उन्हें यह जानकार बहुत निराशा होगी की उनका इकलौता बीटा ऐसी हरकतें कर रहा है.

(लड़के के चेहरे का रंग उड़ जाता है, वह मल्लिका की आँखों में छिपी धमकी को समझ जाता है.)

मल्लिका: अब, जाओ. और हाँ, यहां से जाने से पहले अपनी शिष्टता ज़रा याद कर लो.

(लड़का तुरंत पीछे हैट जाता है और जल्दी से भीड़ में गायब होने की कोशिश करता है. मल्लिका अनु की तरफ पलटती है, उसके चेहरे पर एक नरम मुस्कान आती है. वह अनु के हाथ को धीरे से थामकर उसे शांत करती है.)

मल्लिका: सब ठीक है. ये बस नासमझ बच्चे हैं. तुमने कुछ महसूस तो नहीं किया? ज़्यादा परेशां तो नहीं हुई?

(अनु राहत की गहरी सांस लेती है, मल्लिका की उपस्थिति में खुद को सुरक्षित महसूस करती है, और बस सर हिलाकर 'हाँ' में जवाब देती है.)

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अगली सुबह, जब सारा घर नाश्ते के लिए इकठ्ठा हो रहा था, तो पारी (सुबह) ने इस मौके का फायदा उठाने की सोची. उसकी आँखों में शरारत तैर रही थी. जैसे hi माणिक हॉल से गुज़रा, पारी ने उसे कंधे से पकड़ा और खाने की मेज़ के कोने पर, जहां थोड़ी प्राइवेसी थी, खींच लायी.

पारी: (कान के पास झुककर, धीमी, पर गुदगुदी करती आवाज़ में) भाई! ो मेरे seedhe-saade, मासूम भाई! एक मिनट तो सुन.

माणिक, जो पहले से hi रात की बातों को दिमाग से निकालने की कोशिश कर रहा था, थोड़ा झेंप गया. उसे लगा पारी को कुछ तो पता चल गया है.

माणिक: (थोड़ा हड़बड़ाकर) क्या है, पारी? Subah-subah क्या शुरू हो गयी? काम है मुझे, चल हैट.

पारी: (मुँह दबाकर हँसते हुए) Are-are, इतना क्यों भड़क रहे हो? मैं तो बस कल रात के 'एंटरटेनमेंट' के लिए शुक्रिया कहने आयी थी.

माणिक का चेहरा एकदम से लाल हो गया. उसने चारों और देखा की कोई उनकी बातें सुन तो नहीं रहा.

माणिक: (आवाज़ धीमी करके, गुस्से और शर्मिंदगी के मिश्रण में) क्या बकवास कर रही है? कौन सा एंटरटेनमेंट? Saaf-saaf बोल.

पारी: (थोड़ी को छूटे हुए, नाटकीय अंदाज़ में) अरे भाई, इतना भी क्या छिपाना! मैं तो बस पूछ रही थी... क्या कर रहे थे कल रात को अपने कमरे में?

माणिक ने अपनी मुट्ठी कास ली. उसकी हालत ऐसी थी की वह न तो गुस्सा दिखा सकता था और न hi इस बात को मान सकता था.

पारी: (अपनी आवाज़ को और धीमा करके, आँखों में शैतानी भरते हुए) Sach-sach बता... बड़ी ajeeb-ajeeb सी आवाज़ें आ रही थी! कभी 'आह' की, कभी 'उफ़' की, और कभी तो ऐसा लगा जैसे कोई चीज़ बीएड से ज़ोर से गिरी हो! मैंने तो सोचा, कहीं भूकंप तो नहीं आ गया, पर फिर आवाज़ें सुनके लगा की... मामला कुछ और hi है! कहीं तुम्हारी और भाभी की ladai-jhagda तो नहीं हो रहा था? या फिर कोई नया ववे मैच चल रहा था?

पारी अपनी बात कहकर ज़ोर से हंसने लगी, लेकिन अपनी हंसी को हाथ से दबा लिया ताकि आवाज़ बाहर न जाए.

माणिक: (गुस्से और शर्म से तमतमाते हुए) चल हैट! अपने काम से काम रख! तुझे क्या lena-dena की हम क्या कर रहे थे! और कोई आवाज़ें नहीं आ रही थी! तुझे वेहम हो गया होगा!

पारी: (हंसी रोक कर, मासूमियत का नाटक करते हुए) अरे भाई, इतना डिफेंसिव क्यों हो रहे हो? मैं तो बस मज़ाक कर रही थी! पर हाँ... यह शर्माना... यह सब कुछ saaf-saaf बता रहा है!

पारी ने अपनी आँख मारी और माणिक को असहज छोड़कर वहाँ से चली गयी, अपने चेहरे पर एक बड़ी विजयी मुस्कान लिए हुए.

माणिक कुछ देर तक वहीँ खड़ा रहा, अपना लाल चेहरा छिपाने की नाकाम कोशिश करता रहा. उसने मन hi मन सोचा, "यह लड़की भी न... कभी सुधरेगी नहीं! अब कल से कमरे में ताला लगाकर सोना पड़ेगा!"



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Part - 66

माणिक ने देखा की पारी का गुस्सा अब पूरी तरह से शांत हो चूका है और वह उसके मज़ाक में शामिल हो गयी है. यह सही वक़्त था अपने खेल को आगे बढ़ाने का.

माणिक ने बिना देर किये, अपने पूरे कपडे निकाल दिए. वह अब पूरी तरह से नग्न था, और उसका लुंड पारी की गॉड में उसकी उत्तेजना का प्रमाण था.

माणिक: (आग्रह से) आओ, मेरी ‘saali-aadhi घरवाली’! अब जल्दी से मुझे खुश करो. तुम्हे तो पता है, तुम्हारे शिव कोई मुझे इतना अच्छा महसूस नहीं करा सकता!

पारी, जो अभी भी माणिक की गॉड में बैठी थी, उसने अपना प्रतिरोध छोड़ दिया और मुठ मारना शुरू कर दिया. वह बड़े ध्यान से माणिक के लुंड को सहला रही थी. उसकी आँखें नीचे थी, लेकिन उसके चेहरे पर एक अजीब सा रोमांच था.

माणिक जल्दी hi झाड़ जाता है. उसका वीर्य फिर से पारी के हाथ पर लगता है, और वह इस बार हँसते हुए उसे साफ़ करती है.

संतुष्टि के बाद, माणिक ने पारी को अपनी तरफ खींचा.

माणिक: (प्यार से पारी के गाल सहलाते हुए) अब मेरी बारी! तुमने तो मुझे शांत कर दिया. अब तुम मेरी ‘साली’ हो, तो तुम्हे भी कुछ देना पड़ेगा न!

माणिक: (मुस्कुराते हुए) मुझे भी तुम्हारी ‘आधी घरवाली’ वाली बॉडी देखनी है. तुम भी अपने सारे कपडे उतार दो!

पारी कुछ देर सोचती है. उसके मैं में थोड़ी शर्म आती है, लेकिन माणिक के लुंड को अपने हाथ से छूने और उसकी साड़ी बातें सुनने के बाद, अब कोई सीमा नहीं बची थी. वह जानती थी की उसे माणिक को खुश करना hi होगा.

पारी ने फिर एक गहरी सांस ली और dheere-dheere अपने सारे कपडे उतार दिए. अब वह भी पूरी तरह से नाग्नि थी.

माणिक ने पारी के नग्न शरीर को पहली बार देखा. वह पूरी तरह से मोहित हो गया.

माणिक तुरंत बिस्तर से उठकर आया और पारी के पूरे शरीर को सहलाने लगा. उसने पारी के पेट, जाँघों और उसकी छूट (योनि) को छुआ.

माणिक: (आवाज़ में गहरी प्रशंसा) तुम बहुत खूबसूरत हो, छुटकी!

फिर, माणिक ने पारी के मुम्मे (ब्रेअस्ट्स) को पकड़ा. वह उन्हें प्यार से दबाता और चूसता.

माणिक: (चूसते हुए) यह तो बहुत मीठे हैं!

पारी अब पूरी तरह से शर्मा रही थी, लेकिन उसे इस वर्जित और अंतरंग स्पर्श में बहुत मज़ा आ रहा था. वह अपने भाई के सामने नाग्नि थी, और वह उसकी हर जगह को चूम और सहला रहा था. उनका यह ‘आधी घरवाली’ वाला खेल अब पूरी तरह से एक नंगे और अंतरंग सम्बन्ध में बदल चूका था.

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माणिक, पारी के लगने शरीर की सुंदरता से मंत्रमुग्ध था. उसने उसके मुम्मों को चूसना जारी रखा, जबकि पारी की आहें dheere-dheere उत्तेजना में बदल रही थी.

माणिक ने पारी को बिस्तर पर लिटाया.

माणिक: (प्यार से फुसफुसाते हुए) मेरी ‘आधी घरवाली’ कितनी सुन्दर है!

माणिक dheere-dheere पारी के पेट से नीचे उतरने लगा. उसने पारी के जाँघों को फैलाया. पारी थोड़ी सी घबरा गयी.

पारी: (धीरे से) भाई... यहाँ... यहाँ मत छूना!

माणिक: (पारी की तरफ देखकर, शांत और अधिकार भरे अंदाज़ में) क्यों नहीं, मेरी जान? तुम मेरी हो. मुझे सब देखना है. आज मैं तुम्हारी साड़ी ‘खुजली’ दूर कर दूंगा!

माणिक ने अपना मुँह पारी की योनि (छूट) के पास ले गया. यह क्रिया इतनी अप्रत्याशित थी की पारी एक पल के लिए काँप उठी.

माणिक ने ज़बरदस्त तरीके से पारी की छूट को चाटना शुरू कर दिया.

चूसने और चाटने की गतिविधि: माणिक ने अपनी जीभ का इस्तेमाल इस तरह से किया की पारी तुरंत तीव्र उत्तेजना महसूस करने लगी. वह कभी ज़ोर से चूसता, कभी हलके से चाटता, और कभी अपनी उँगलियों से उसके संवेदनशील हिस्से को सहलाता. उसका ध्यान पूरी तरह से पारी को चरम सुख तक पहुंचाने पर था.

पारी की प्रतिक्रिया: पारी के मुँह से अब रोक न पाने वाली चीखें और सिसकियाँ निकलने लगी. उसका शरीर बिस्तर पर अकड़ने लगा.

पारी: (आवाज़ में बेकाबू आनंद) आआह! भाई! आआह... और ज़ोर से! प्लीज! मैं... मैं मरने वाली हूँ!

पारी ने अपने हाथों से बिस्तर की चादर कसकर पकड़ ली. उसके पेअर हवा में थे. माणिक जानता था की वह अपनी बहिन को एक अभूतपूर्व सुख दे रहा था.

रास का निकलना (ओर्गास्म): माणिक के लगातार और तीव्र mukh-maithun के कारण, पारी अब चरम सुख की तरफ बढ़ रही थी.

पारी: (ज़ोर से चिल्लाते हुए) भाई! आआह!

पारी के शरीर से तेज़ी से रास (डिस्चार्ज) निकल गया. उसका पूरा शरीर ढीला पद गया. माणिक ने उस गर्म, मीठा रास का भी पूरा आनंद लिया.

पारी अब हांफ रही थी, उसकी आँखें ख़ुशी और शर्मिंदगी के मिश्रण से बंद थी. माणिक ने अपना मुँह हटाया और विजयी मुस्कान के साथ पारी की तरफ देखा.

माणिक: (प्यार से) कैसा लगा, मेरी ‘साली’? अब बताओ, किसे और किसकी ज़रूरत है?

पारी के पास अब कोई शब्द नहीं थे. उसका शरीर थक चूका था, लेकिन उसका दिल इस वर्जित सुख से भर चूका था.

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पारी, चरम सुख से गुजरने के बाद भी, शर्म और पुराणी मान्यताओं से बंधी हुई थी. माणिक के इस कृत्या से वह थोड़ी असहज महसूस कर रही थी.

पारी: (थोड़ी शर्म और हलकी घृणा के भाव से) छिः! भाई! आप... आप क्या कर रहे थे? आपने न सिर्फ उस गन्दी जगह पर अपना मुँह लगाया, पर उस गंदे पानी को भी पि लिया!

पारी के लिए, उसके शरीर का वह हिस्सा अभी भी वर्जित और ‘गन्दा’ था.

माणिक तुरंत समझ गया की पारी को अभी भी इस क्रिया को लेकर भ्रम है. उसने पारी को प्यार से अपने पास खींचा और उसे समझाया.

माणिक: (प्यार से उसके गाल सहलाते हुए) मेरी प्यारी छुटकी! मेरी ‘आधी घरवाली’! पहले यह समझो की यह गन्दा नहीं है.

माणिक ने विस्तार से समझाया:

“सबसे पहले, यह कोई ‘गन्दा पानी’ नहीं है. यह तुम्हारी उत्तेजना का रास है, मेरी जान! जब तुम बहुत खुश होती हो, तब यह निकलता है. यह प्रेम का अमृत है! और तुम्हारे भाई को यह बहुत पसंद आया. इसे अमृत कहते हैं, गन्दा नहीं.”

“तुम रोज़ नहाती हो, खुद को साफ़ रखती हो न? तो यह जगह कैसे गन्दी हो सकती है? यह तुम्हारे शरीर का हिस्सा है, जैसे तुम्हारा मुँह या हाथ. जब तुम मुझे किश करती हो, तो मैं तुम्हारा मुँह गन्दा नहीं मानता न? फिर इसे क्यों गन्दा मानती हो?”

“सबसे बड़ी बात, मैंने इसे क्यों छाता? क्यूंकि मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ और तुम पर भरोसा करता हूँ! यह किसी के साथ नहीं किया जाता. यह सिर्फ उसके साथ किया जाता है जिस पर तुम सबसे ज़्यादा भरोसा करते हो. मैंने तुम्हारी साड़ी शर्म और हिचकिचाहट को दूर करने के लिए ऐसा किया, ताकि तुम जानो की तुम मेरे लिए कितनी खास हो.”

माणिक: (अंत में मुस्कुराते हुए) अब बताओ! गन्दा है या सबसे प्यारा? तुम्हे जब मज़ा आया, तो फिर यह गन्दा कैसे हो सकता है?

पारी, माणिक के इस प्यारे और तार्किक स्पष्टीकरण से संतुष्ट हो गयी. उसे एहसास हुआ की जो चीज़ उसे शर्मिंदा कर रही थी, वह माणिक के लिए प्यार और विश्वास का इज़हार थी.

***********************

माणिक के समझाने के बाद, पारी का दिल हल्का हुआ और उसके मैं से ‘गन्दगी’ का भाव निकल गया. अब दोनों नग्न अवस्था में बिस्तर पर लेते थे, और उनके बीच एक असामान्य रूप से खुली और लम्बी चर्चा शुरू हुई.

पारी: (शांत होकर, माणिक के सीने पर हाथ फेरते हुए) भाई, आप इतने अच्छे से कैसे जानते हो यह सब? स्कूल में तो हमे कुछ नहीं सिखाते.

माणिक: (गहरी सांस लेते हुए) इंटरनेट है न, मेरी जान! और हाँ, सिमी दीदी और आस्था भी बहुत बातें बताती हैं. मैंने वहां से सीखा की शरीर की कोई भी चीज़ गन्दी नहीं होती, बस प्यार और saaf-safaai ज़रूरी है. अच्छा, तुम बताओ... क्या तुम्हे दर नहीं लगता की अगर हम और आगे बढ़ेंगे, तो क्या होगा?

पारी: (थोड़ी देर सोचकर) थोड़ा दर तो लगता है. पर... क्या विर्जिनिटी खोना सच में इतना ज़रूरी है?

माणिक: विर्जिनिटी खोना ज़रूरी नहीं है, पर अपनी इच्छा को पूरा करना ज़रूरी है. और हाँ, अगर हम आगे बढ़ते हैं तो मैं हमेशा तुम्हारा ध्यान रखूँगा.

पारी: (चिंतित होकर) आप मुझे भी उस 8 इंच वाले लुंड से प्यार करने के लिए क्यों कह रहे थे? और आप दिव्या दीदी के साथ ऐसा क्यों करना चाहते हो?

माणिक: (आवाज़ में गंभीरता) दिव्या के साथ नफरत है, छुटकी! उसने हमे बहुत तंग किया है. और मुझे उसे सबक सीखना है. रही बात 8 इंच की, तो मुझे बस यह पता करना था की क्या तुम भी छोटू जैसी ‘एडल्ट’ बन चुकी हो. अब मुझे पता है की तुम सिर्फ मेरे लिए ‘पारी’ हो. हम दोनों एक राज़ शेयर करते हैं — हमारा राज़, और दिव्या का राज़.

पारी: (माणिक की तरफ देखकर) तो अब क्या? हम दोनों... अब हमेशा ऐसे hi... रहेंगे?

माणिक: (मुस्कुराते हुए) हम हमेशा bhai-behan रहेंगे, लेकिन अब हमारे रिश्ते में ज़्यादा ‘मज़ा’ रहेगा! अब तुम मेरी सबसे खास दोस्त हो! अगर तुम चाओगी, तो मैं तुम्हे हमेशा खुश करूँगा, जैसे अभी किया. लेकिन चौड़ाई की बात... जब तक तुम पूरी तरह से तैयार नहीं हो जाती, तब तक नहीं होगी. तुम्हारी ख़ुशी मेरे लिए सबसे ऊपर है, मेरी ‘आधी घरवाली’!

इस चर्चा से, पारी और माणिक दोनों को ek-dusre की सीमाओं और इच्छाओं के बारे में स्पष्टता मिली. उन्होंने अपने वर्जित सम्बन्ध के नियम तय कर लिए थे.



********************************
 
Part - 67

रात का समय था. घर में अब फिर से एक अजीब सा माहौल बना हुआ था. दिव्या, पारी और आनंद किसी शादी में गए हुए थे. घर पर सिर्फ अनु और माणिक थे.

माणिक अपने कमरे में था. उसने कमरे का दरवाज़ा सिर्फ लगा रखा था, लेकिन उत्तेजना में वह अंदर से लॉक करना भूल गया था.

माणिक अब बिस्तर से खड़ा था और अपने चरम सुख में लीं था.

अनु, जो किचन में थी, उसने सोचा की वह माणिक से पूछ ले की क्या उसे रात को दूध चाहिए.

अनु ने हल्का सा दरवाज़ा खटखटाया, लेकिन कोई आवाज़ नहीं आयी. अनु ने सोचा की माणिक शायद हेडफोन्स लगाकर पढ़ रहा होगा.

अनु ने दरवाज़ा खोला और अंदर झाँका.

सामने का दृश्य देखकर अनु की आँखें चौड़ी हो गयी. माणिक खड़ा होकर मुठ मार रहा था, और वह अपनी दुनिया में खोया हुआ था.

अनु की नज़र सबसे पहले माणिक के तन चुके लुंड पर पड़ी.

अनु पहले तो उसका साइज देखकर हैरान रह गयी!

मल्लिका और बुआ के अनुभव के कारण, अनु ने दो alag-alag पुरुषों के लुंड देखे थे, लेकिन माणिक का लुंड उन दोनों से बहुत बड़ा था. और माणिक का लुंड भी उससे काम नहीं लग रहा था.

इस आश्चर्य के बाद, अनु को अपने baar-baar के इस अनुभव पर गुस्सा आ गया.

अनु अपना माथा पीट लेती है. “हे भगवन! मुझे baar-baar ऐसा क्यों देखना पड़ता है!”

माणिक ने तुरंत दरवाज़े पर अनु को देखा. वह शर्म और घबराहट से भर गया.

माणिक फटाफट अपने को चादर से धक् लेता है, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी.

अनु गुस्से से लाल थी. उसका सारा गुस्सा, जो माणिक की हरकतों पर जमा था, अब बहार निकल आया.

अनु: (आवाज़ में सख्ती और घृणा) माणिक! यह सब करना ज़रूरी है क्या? हर दुसरे दिन तुम्हे यही सब करना होता है! यह सब क्या है?

अनु: (adeshātmak लहजे में) और अगर करना hi है, तो बाथरूम में जाकर करो! काम से काम दरवाज़ा तो बंद कर सकते थे! घर में कोई नहीं है, इसका मतलब यह नहीं है की तुम कुछ भी करोगे!

माणिक शर्म के मारे कुछ नहीं बोल पाया. उसने बस अपना सर झुका लिया. अनु को एहसास हुआ की वह इस घर में अकेली है जो अभी भी मर्यादा का पालन कर रही है, जबकि हर सदस्य अपनी वासना में लीं है.

********************************

माणिक, अनु के अचानक आने और उसकी दांत से पूरी तरह से घबरा गया था. वह चादर में लिप्त हुआ था और उसकी हिम्मत नहीं हो रही थी की वह अनु की तरफ देखे.

माणिक: (हकलाते हुए, नज़रें झुकाकर) दीदी... वह... मैं... सॉरी! मैं दरवाज़ा... लॉक करना भूल गया था!

माणिक के पास कोई और बहाना नहीं था.

अनु: (आवाज़ में सख्ती, एक कदम आगे बढ़ते हुए) ‘सॉरी’ से क्या होगा? मैंने तुम्हारे कमरे में kya-kya देखा है, माणिक! तुम्हे लगता है मुझे कुछ पता नहीं चलता? तुम और तुम्हारी यह साड़ी हरकतें... क्या तुम खुद को संभल नहीं सकते?

अनु ने अपनी निराशा व्यक्त की. उसे लगा की माणिक को शर्मिंदा करके शायद वह उसे सही रास्ते पर ला सकती है.

अनु: (दर्द भरे लहजे में) तुम अब बच्चे नहीं हो! तुम्हे पता है की घर में कितनी लडकियां हैं! तुम्हारी बहनें! तुम्हारी कजिन! तुम इतना भी नहीं समझते की किसी को भी दिख सकता है!

माणिक को अनु की इस बात पर गुस्सा आ गया, लेकिन वह उसे दिखा नहीं सकता था. उसने सोचा की अगर यह दीदी जानती की मैं उनकी सगी बहिन और कजिन के साथ kya-kya कर रहा हूँ, तो इन्हे पता चलता!

माणिक: (धीरे से) मुझे माफ़ कर दो, दीदी! आगे से ऐसा नहीं होगा.

अनु: (व्यंग्य से) हाँ! ‘आगे से ऐसा नहीं होगा!’ यही तुम हमेशा कहते हो!

अनु का यह ताना माणिक को बहुत चुभा. अनु ने उसके पुरुषत्व और उसके रिश्ते पर सवाल उठा दिया था.

माणिक: (मैं hi मैं) तुम्हे क्या पता, दीदी! मेरी तो अब teen-teen हैं!

माणिक: (बहार से शांत होकर) नहीं, दीदी! ऐसी कोई बात नहीं है.

अनु: (माथा पीटते हुए) ठीक है! जाओ, haath-muh धोकर सो जाओ! और अगली बार, दरवाज़ा लॉक करना! अब जाओ!

अनु, और कुछ कहे बिना, तेज़ी से कमरे से बहार निकल गयी. वह अपने इस ‘संस्कारी’ होने की लड़ाई में अकेली महसूस कर रही थी. माणिक ने चादर हटाई और चैन की सांस ली. वह जानता था की अब उसे अनु के सामने ज़्यादा सतर्क रहना होगा.

****************************************

माणिक के कमरे से बहार आने के बाद, अनु का गुस्सा थोड़ी hi देर में शांत हो गया, लेकिन अब उसके मैं में एक नयी और खतरनाक uthal-puthal शुरू हो गयी थी. Baar-baar मन करने के बावजूद, उसकी आँखों के सामने माणिक के लगने शरीर का दृश्य घूमने लगा था.

अनु को सबसे ज़्यादा याद माणिक का लुंड आ रहा था — वह लुंड, जो उसके देखे हुए दोनों, आनंद के दोस्तों के लुंड से भी ज़्यादा बड़ा और प्रभावशाली था. उसकी आँखों में वह आकार, वह कठोरता अब पूरी तरह से कैद हो चुकी थी.

अनु नहीं जानती थी की उसकी बड़ी बहिन दिव्या भी पहले hi यह सब कर चुकी है. वह अकेली hi इस नए वर्जित अनुभव से गुज़र रही थी.

अनु अपने कमरे में आयी, लेकिन उसे नींद नहीं आ रही थी. माणिक का लुंड, उसकी वर्जित कल्पना बन चूका था. उसके शरीर में वही खुजली फिर से उठने लगी थी, जो उसे बुआ और मल्लिका के दृश्यों के बाद महसूस हुई थी.

उसने बिस्तर पर lete-lete hi, अपनी पंतय के ऊपर से अपनी छूट को सहलाना शुरू कर दिया.

माणिक के लुंड की कल्पना:

- अनु अपनी आँखें बंद करती, और माणिक को नग्न खड़ा देखती.

- वह कल्पना करती की माणिक का वह बड़ा, कठोर लुंड उसके होंठों को छू रहा है.

- वह माणिक की दांत और उसके अधिकार को याद करती, जिससे उसकी उत्तेजना और बढ़ जाती.

इस तीव्र कल्पना के सहारे, अनु ने खुद को और तेज़ी से सहलाना शुरू कर दिया. उसके मुँह से dheere-dheere सिसकियाँ निकलने लगी, ताकि आवाज़ बहार न जाए. उसकी पूरी एकाग्रता माणिक और उसके उस शक्तिशाली आकार पर थी.

कुछ hi देर में, अनु चरम सुख पर पहुँच जाती है और उसका शरीर काँपकर ढीला पद जाता है.

संतुष्टि के बाद, अनु की आँखें खुल गयी. उसके होंठों पर एक क्षणिक मुस्कान थी, लेकिन तुरंत hi वह मुस्कान गहरी शर्मिंदगी में बदल गयी.

अनु का aatma-sangharsh: “हे भगवन! मैं क्या कर रही हूँ! मैंने अपने छोटे भाई के लुंड को सोचकर... खुद को संतुष्ट किया!”

अनु को यह बात चुभ गयी की जिस लड़के को वह दांत रही थी और सही रास्ता दिखा रही थी, उसी लड़के की नग्नता ने उसे अपनी मर्यादा तोड़ने पर मजबूर कर दिया.

वह जानती थी की इस घर के सारे राज़, साड़ी वासनाएं, dheere-dheere उसे भी अपनी चपेट में ले रही हैं, और अब वह भी इस वर्जित खेल की एक नयी खिलाड़ी बन चुकी थी.



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Part - 68

रात का समय था. घर में अब फिर से एक अजीब सा माहौल बना हुआ था. दिव्या, पारी और आनंद किसी शादी में गए हुए थे. घर पर सिर्फ अनु और माणिक थे.

माणिक अपने कमरे में था. उसने कमरे का दरवाज़ा सिर्फ लगा रखा था, लेकिन उत्तेजना में वह अंदर से लॉक करना भूल गया था.

माणिक अब बिस्तर से खड़ा था और अपने चरम सुख में लीं था.

अनु, जो किचन में थी, उसने सोचा की वह माणिक से पूछ ले की क्या उसे रात को दूध चाहिए.

अनु ने हल्का सा दरवाज़ा खटखटाया, लेकिन कोई आवाज़ नहीं आयी. अनु ने सोचा की माणिक शायद हेडफोन्स लगाकर पढ़ रहा होगा.

अनु ने दरवाज़ा खोला और अंदर झाँका.

सामने का दृश्य देखकर अनु की आँखें चौड़ी हो गयी. माणिक खड़ा होकर मुठ मार रहा था, और वह अपनी दुनिया में खोया हुआ था.

अनु की नज़र सबसे पहले माणिक के तन चुके लुंड पर पड़ी.

अनु पहले तो उसका साइज देखकर हैरान रह गयी!

मल्लिका और बुआ के अनुभव के कारण, अनु ने दो alag-alag पुरुषों के लुंड देखे थे, लेकिन माणिक का लुंड उन दोनों से बहुत बड़ा था. और माणिक का लुंड भी उससे काम नहीं लग रहा था.

इस आश्चर्य के बाद, अनु को अपने baar-baar के इस अनुभव पर गुस्सा आ गया.

अनु अपना माथा पीट लेती है. “हे भगवन! मुझे baar-baar ऐसा क्यों देखना पड़ता है!”

माणिक ने तुरंत दरवाज़े पर अनु को देखा. वह शर्म और घबराहट से भर गया.

माणिक फटाफट अपने को चादर से धक् लेता है, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी.

अनु गुस्से से लाल थी. उसका सारा गुस्सा, जो माणिक की हरकतों पर जमा था, अब बहार निकल आया.

अनु: (आवाज़ में सख्ती और घृणा) माणिक! यह सब करना ज़रूरी है क्या? हर दुसरे दिन तुम्हे यही सब करना होता है! यह सब क्या है?

अनु: (adeshātmak लहजे में) और अगर करना hi है, तो बाथरूम में जाकर करो! काम से काम दरवाज़ा तो बंद कर सकते थे! घर में कोई नहीं है, इसका मतलब यह नहीं है की तुम कुछ भी करोगे!

माणिक शर्म के मारे कुछ नहीं बोल पाया. उसने बस अपना सर झुका लिया. अनु को एहसास हुआ की वह इस घर में अकेली है जो अभी भी मर्यादा का पालन कर रही है, जबकि हर सदस्य अपनी वासना में लीं है.

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माणिक, अनु के अचानक आने और उसकी दांत से पूरी तरह से घबरा गया था. वह चादर में लिप्त हुआ था और उसकी हिम्मत नहीं हो रही थी की वह अनु की तरफ देखे.

माणिक: (हकलाते हुए, नज़रें झुकाकर) दीदी... वह... मैं... सॉरी! मैं दरवाज़ा... लॉक करना भूल गया था!

माणिक के पास कोई और बहाना नहीं था.

अनु: (आवाज़ में सख्ती, एक कदम आगे बढ़ते हुए) ‘सॉरी’ से क्या होगा? मैंने तुम्हारे कमरे में kya-kya देखा है, माणिक! तुम्हे लगता है मुझे कुछ पता नहीं चलता? तुम और तुम्हारी यह साड़ी हरकतें... क्या तुम खुद को संभल नहीं सकते?

अनु ने अपनी निराशा व्यक्त की. उसे लगा की माणिक को शर्मिंदा करके शायद वह उसे सही रास्ते पर ला सकती है.

अनु: (दर्द भरे लहजे में) तुम अब बच्चे नहीं हो! तुम्हे पता है की घर में कितनी लडकियां हैं! तुम्हारी बहनें! तुम्हारी कजिन! तुम इतना भी नहीं समझते की किसी को भी दिख सकता है!

माणिक को अनु की इस बात पर गुस्सा आ गया, लेकिन वह उसे दिखा नहीं सकता था. उसने सोचा की अगर यह दीदी जानती की मैं उनकी सगी बहिन और कजिन के साथ kya-kya कर रहा हूँ, तो इन्हे पता चलता!

माणिक: (धीरे से) मुझे माफ़ कर दो, दीदी! आगे से ऐसा नहीं होगा.

अनु: (व्यंग्य से) हाँ! ‘आगे से ऐसा नहीं होगा!’ यही तुम हमेशा कहते हो!

अनु का यह ताना माणिक को बहुत चुभा. अनु ने उसके पुरुषत्व और उसके रिश्ते पर सवाल उठा दिया था.

माणिक: (मैं hi मैं) तुम्हे क्या पता, दीदी! मेरी तो अब teen-teen हैं!

माणिक: (बहार से शांत होकर) नहीं, दीदी! ऐसी कोई बात नहीं है.

अनु: (माथा पीटते हुए) ठीक है! जाओ, haath-muh धोकर सो जाओ! और अगली बार, दरवाज़ा लॉक करना! अब जाओ!

अनु, और कुछ कहे बिना, तेज़ी से कमरे से बहार निकल गयी. वह अपने इस ‘संस्कारी’ होने की लड़ाई में अकेली महसूस कर रही थी. माणिक ने चादर हटाई और चैन की सांस ली. वह जानता था की अब उसे अनु के सामने ज़्यादा सतर्क रहना होगा.

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माणिक के कमरे से बहार आने के बाद, अनु का गुस्सा थोड़ी hi देर में शांत हो गया, लेकिन अब उसके मैं में एक नयी और खतरनाक uthal-puthal शुरू हो गयी थी. Baar-baar मन करने के बावजूद, उसकी आँखों के सामने माणिक के लगने शरीर का दृश्य घूमने लगा था.

अनु को सबसे ज़्यादा याद माणिक का लुंड आ रहा था — वह लुंड, जो उसके देखे हुए दोनों, आनंद के दोस्तों के लुंड से भी ज़्यादा बड़ा और प्रभावशाली था. उसकी आँखों में वह आकार, वह कठोरता अब पूरी तरह से कैद हो चुकी थी.

अनु नहीं जानती थी की उसकी बड़ी बहिन दिव्या भी पहले hi यह सब कर चुकी है. वह अकेली hi इस नए वर्जित अनुभव से गुज़र रही थी.

अनु अपने कमरे में आयी, लेकिन उसे नींद नहीं आ रही थी. माणिक का लुंड, उसकी वर्जित कल्पना बन चूका था. उसके शरीर में वही खुजली फिर से उठने लगी थी, जो उसे बुआ और मल्लिका के दृश्यों के बाद महसूस हुई थी.

उसने बिस्तर पर lete-lete hi, अपनी पंतय के ऊपर से अपनी छूट को सहलाना शुरू कर दिया.

माणिक के लुंड की कल्पना:

- अनु अपनी आँखें बंद करती, और माणिक को नग्न खड़ा देखती.

- वह कल्पना करती की माणिक का वह बड़ा, कठोर लुंड उसके होंठों को छू रहा है.

- वह माणिक की दांत और उसके अधिकार को याद करती, जिससे उसकी उत्तेजना और बढ़ जाती.

इस तीव्र कल्पना के सहारे, अनु ने खुद को और तेज़ी से सहलाना शुरू कर दिया. उसके मुँह से dheere-dheere सिसकियाँ निकलने लगी, ताकि आवाज़ बहार न जाए. उसकी पूरी एकाग्रता माणिक और उसके उस शक्तिशाली आकार पर थी.

कुछ hi देर में, अनु चरम सुख पर पहुँच जाती है और उसका शरीर काँपकर ढीला पद जाता है.

संतुष्टि के बाद, अनु की आँखें खुल गयी. उसके होंठों पर एक क्षणिक मुस्कान थी, लेकिन तुरंत hi वह मुस्कान गहरी शर्मिंदगी में बदल गयी.

अनु का aatma-sangharsh: “हे भगवन! मैं क्या कर रही हूँ! मैंने अपने छोटे भाई के लुंड को सोचकर... खुद को संतुष्ट किया!”

अनु को यह बात चुभ गयी की जिस लड़के को वह दांत रही थी और सही रास्ता दिखा रही थी, उसी लड़के की नग्नता ने उसे अपनी मर्यादा तोड़ने पर मजबूर कर दिया.

वह जानती थी की इस घर के सारे राज़, साड़ी वासनाएं, dheere-dheere उसे भी अपनी चपेट में ले रही हैं, और अब वह भी इस वर्जित खेल की एक नयी खिलाड़ी बन चुकी थी.



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Part - 69

अगले दिन, दिव्या ने अपने मैं को पक्का करके और दृढ संकल्प लेकर माणिक से सीधे बात करने का फैसला किया. पारी से निराशा मिलने के बाद, यही एकमात्र रास्ता बचा था.

दिव्या सीधे माणिक के रूम में जाती है. माणिक पहले से hi जानता था की दिव्या आएगी.

दिव्या: (दरवाज़ा बंद करके, सख्त आवाज़ में) माणिक, तुम्हे मुझसे बात करनी होगी. और सच बोलना होगा!

माणिक: (बिस्तर पर आराम से लेते हुए, हँसते हुए) क्या बात करनी है, दीदी? कहीं आपको मुझसे छूट तो नहीं मारवणी!

माणिक ने तुरंत दिव्या का बहुत मज़ाक उदय.

दिव्या: (गुस्से से) मज़ाक मत करो! मैं गंभीर हूँ! तुम इतना क्यों उछाल रहे हो? तुम्हे क्या पता है मेरे बारे में? तुम्हे क्या लगा, तुम मुझे धमका डोज और मैं दर जाउंगी?

माणिक: (आँख मारते हुए) हाँ! मुझे लगा, और मैं सही था! तुम दर गयी हो, दीदी! तभी यहाँ आयी हो!

दिव्या: मुझे सिर्फ इतना बताओ, तुमने छत पर जो देखा, उसके अलावा और क्या पता है तुम्हे?

माणिक मुस्कुराता रहा. वह जानता था की अब पत्तों को खोलने का समय नहीं है. उसका सबसे बड़ा हथियार ‘अज्ञात’ का दर था.

माणिक: (शांत लेकिन रहस्यमय आवाज़ में) दीदी... मैं आपको यह नहीं बताऊंगा की मुझे क्या पता है.

माणिक: (आगे झुककर, धमकी भरे लहजे में) बस इतना जान लो... मेरे पास तुम्हारा कुछ ऐसा है जो तुम्हारी इज़्ज़त की धज्जियां उदा देंगे! अगर यह राज़ अनु दीदी या, सबसे ज़रूरी, पापा आनंद को पता चला... तो क्या होगा?

माणिक ने जानबूझकर “तुम्हारी इज़्ज़त की धज्जियां उड़ जाएँगी” कहा.

माणिक: (विजयी भाव से) इसलिए, मेरी बात मनो. शांत रहो. और मैं तुम्हे कुछ नहीं बताऊंगा. मुझे जब जो करवाना होगा, मैं तुम्हे बता दूंगा.

माणिक ने दिव्या को कुछ नहीं बताया. दिव्या का गुस्सा, दर और अब बेबसी तीनों बढ़ गए थे. वह माणिक को घूरकर देखती रही और जान गयी की वह एक ऐसे जाल में फँस चुकी है जिससे निकलना अब लगभग असंभव है.

**********************

माणिक के इंकार और धमकी से दिव्या पूरी तरह से असहाय हो गयी थी. उसका सारा गुस्सा अब लाचारी में बदल चूका था.

दिव्या: (लगभग गिड़गिड़ाते हुए, विनती भरे स्वर में) माणिक! प्लीज बता दो! मैं कसम कहती हूँ, मैं तुम्हारी साड़ी बात मानूंगी! तुम्हे जो चाहिए, मैं करुँगी! पर मुझे यह तो पता होना चाहिए की तुम्हारे पास क्या है! बता दो, प्लीज माणिक!

माणिक अपने बिस्तर पर चादर ओढ़कर लेता हुआ था, ताकि उसका लुंड छुपा रहे. वह दिव्या की इस बेबसी का आनंद ले रहा था. दिव्या ने do-teen बार और रिक्वेस्ट की, तो माणिक को लगा की अब डाव लगाने का समय आ गया है.

माणिक ने तुरंत अपने ऊपर से चादर हटा दी.

उसके अंदर का शैतान जाग चूका था. वह दिव्या को अपने कण्ट्रोल का एहसास कराना चाहता था.

माणिक: (आवाज़ में वासना और अधिकार) अगर तुम चाहती हो की मैं तुम्हे कुछ बताऊँ... तो मेरी एक शर्त है.

माणिक ने अपने अधखड़े लुंड को दिखाया जो अब पारी की यादों और इस टकराव के कारण उत्तेजित हो रहा था.

माणिक: (लुंड की तरफ इशारा करते हुए) पहले एक बार मुठ मार दो! और हाँ, ज़रा सकिंग (सकिंग) भी कर दो!

माणिक की बात सुनकर दिव्या का चेहरा सफ़ेद पद गया.

माणिक: (चेहरे पर आत्मविश्वास की हंसी) फिर शायद मैं तुम्हे बता दूँ! यह तुम्हारे लिए एक छोटा सा टेस्ट है.

दिव्या को गुस्सा तो बहुत आ रहा था, लेकिन वह पूरी तरह से फँसी हुई महसूस कर रही थी.

दिव्या का aatma-sangharsh:

“डोर माणिक के हाथ में थी! मैं तो बस उड़ती हुई पतंग थी — वह जहाँ चाहेगा, मुझे वहां मोड़ देगा.”

उसने अपनी अंतिम नैतिक सीमा को आवाज़ दी.

दिव्या: (आवाज़ में कम्पन) माणिक! मैं तुम्हारी बहिन हूँ! तुम्हे शर्म नहीं आती?

माणिक: (हँसते हुए, क्रूरता से) तब भी क्या है? मैंने कब मन किया? मुझे पता है तुम मेरी कितनी ‘अच्छी’ बहिन हो! मार दो न मुठ!

माणिक ने बिस्तर पर झुककर, दिव्या का हाथ पकड़ा और उसे ज़बरदस्ती अपने लुंड पर रखने लगा.

दिव्या को यह स्पर्श असहनीय लगा. उसने अपनी साड़ी ताकत लगायी और माणिक का हाथ झटक दिया.

दिव्या: (तेज़ सांस लेते हुए, आँखें माणिक की आँखों में गड़ाकर) मैं यह सब नहीं कर सकती! तुम मुझे ब्लैकमेल कर रहे हो!

माणिक हंस पड़ा. वह जानता था की दिव्या हार चुकी है. उसने प्रतिरोध किया, लेकिन अब वह जानती थी की उसे माणिक की बात माननी hi पड़ेगी. यह सिर्फ समय की बात थी.

******************************

दिव्या, माणिक के खुलेआम ब्लैकमेल और उसके लुंड के स्पर्श से बुरी तरह से अपमानित महसूस कर रही थी. उसने अपना हाथ झटक दिया और गुस्से से माणिक पर चिल्लाई.

दिव्या: (गुस्से से कांपते हुए) तुम... तुम बद्तमीज़ हो! तुम सोचते हो की तुम मुझे डरा डोज? मैं तुम्हे कभी छूने नहीं दूंगी!

दिव्या: (आँखों में प्रतिशोध भरकर) मैं पता लगाकर रहूंगी की तुम्हारे पास मेरा क्या राज़ है! और जिस दिन मुझे पता लग जायेगा, उस दिन तुम्हे बहुत पछताना पड़ेगा! मैं तुम्हे नहीं छोडूंगी!

दिव्या ने अपनी बात पूरी की और वहां से जाने के लिए मुद्दि.

माणिक जानता था की दिव्या का गुस्सा सिर्फ उसकी लाचारी है. उसे यह भी पता था की इस पल दिव्या को और ज़्यादा अपमानित करने से उसका कण्ट्रोल और मज़बूत होगा.

माणिक, दिव्या के मुड़ने के बावजूद, ज़ोर से हंसने लगा.

माणिक: (उसे छेड़ते हुए, ज़ोर से हँसते हुए) है! है! ठीक है, दीदी! पता लगाना! पर तब तक तुम मेरे बारे में सोचना!

माणिक ने बिस्तर पर lete-lete hi, दिव्या के सामने hi अपना लुंड पकड़ा. उसने दिव्या की तरफ देखा, जिसने पीछे मुड़कर देखा की माणिक क्या कर रहा है.

माणिक ने zor-zor से मुठ मारना शुरू कर दिया.

माणिक: (ज़ोरदार आहें भरते हुए, दिव्या की आँखों में देखते हुए) ओह! आआह! दिव्या! मैं तुम्हारे बारे में सोच रहा हूँ! तुम्हारे खीरे के बारे में! आह!

माणिक ने जानबूझकर ऐसा किया ताकि दिव्या को पता चले की उसके सारे राज़ माणिक के दिमाग में हैं.

माणिक zor-zor से हँसता रहा. यह हंसी उसके कण्ट्रोल, वासना और जीत का प्रतीक थी.

दिव्या को यह दृश्य बर्दाश्त नहीं हुआ. उसका गुस्सा अब बेबसी की चरम सीमा पर पहुँच चूका था. उसे लगा की माणिक अब पूरी तरह से पागल हो चूका है, लेकिन उसके पास सच में कोई ऐसा सबूत है जो उसे बर्बाद कर देगा.

दिव्या, कुछ और कहे बिना, गुस्से और अपमान से पेअर पटकती हुई कमरे से बहार निकल गयी. वह जानती थी की उसे अब माणिक का राज़ जान्ने की ज़रूरत है, नहीं तो वह हमेशा के लिए माणिक की गुलाम बन जाएगी.



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