Intehah................(A टेल ऑफ़ लस्ट) - Page 14 - SexBaba
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Intehah................(A टेल ऑफ़ लस्ट)

Update-63(B) (मेघा अपडेट)

अपनी निकाह से पहले वो अक्सर टॉप और जीन्स अक्सर पहना करती थी मगर निकाह के बाद शायद अख्तर को ये मॉडर्न ड्रेसेस पसंद नहीं थी तो वो उसे पहनने नहीं देता tha...............aur सना भी अपने शौहर की ख़ुशी के लिए उसके हिसाब से वैसी hi रहती thi.............jaisa अख्तर उसे देखना चाहता ttha...................ya पसंद करता tha.....................arrange मैरिज होने से सना की शादी थोड़ी जड़ली हो गयी thi.............waise वो शादी के मूड में नहीं थी मगर घरवालों की वजह से उसे झुकना पड़ा....................

जैसा सना को अपने शौहर की चाह थी वैसा hi अख्तर उसे मिला tha................bus कमी एक रह गयी थी की वो अपने पति के साथ ज़्यादा समय नहीं बीता पायी thi..............ya जवानी का मज़ा सही ढंग से नहीं ले पायी thi.............wahin अख्तर उसे जड़ली छोड़कर विदेश चला गया tha................magar वो ये भी जानती थी की अख्तर उसे एक न एक दिन विदेश अपने साथ ज़रूर ले jayega..............bus कुछ दिन की hi बात थी..............

सना हमेशा बल खुले रखती थी जिससे उसकी छोटी उसकी कमर तक लटकती thi.............bal थोड़े करले होने की वजह से उसके चेहरे पर कुछ बाल हमेशा लटटके rehtey...........jo उसके नरम और नाजुक से गलों को छूटे रहते they...............aankhein बड़ी बड़ी थी जो किसी को भी अपने तरफ आखरषित karti.............honth रूस से भरे गुलाबी थे जब वो बोलती तो लगता जैसे होंठों से रूस टपक रहे ho.........chehra थोड़ा लुम्बा था जिससे उसकी सुराही जैसी गुर्दें और भी ाची लगती thi..............kanon में बड़े बड़े झुमके हमेशा लटकते rehtey.................kul मिलजुलकर वो एक सेक्स बम thi...............aisi सेक्स बम जिसे हर कोई पाना चाहता tha............usey जी भर के भोगना चाहता tha......................uske जवानी का रूस पीना चाहता था...................23 साल की उम्र होने के बावजूद वो अभी भी 16 साल की लड़की लगती...............

" ये तुझे क्या हुआ kavya.................teri तबियत तो ठीक हैं न..............." और सना अपनी दोनों आँखों को गोल गोल नाचते हुए काव्य के चेहरे की तरफ एक तुक देखने लगती हैं वहीँ काव्य फ़ौरन अपनी निगाहें नीचे की तरफ झुका लेती हैं.............

" wo...........sana............meri तबियत ठीक नहीं hain.........bus..........." और काव्य आहिस्ता से बोल पड़ती हैं वहीँ सना इस बार काव्य के पास आती हैं और उसके कान में धीरे से बोल पड़ती हैं.............

" तबियत नहीं ठीक हैं ...........या फिर कुछ aur............kahin तेरी बुर गांड में किसी ने कुछ दाल तो नहीं दिया na............jo तेरी चाल बदली बदली सी लग रही हैं................" और सना मुस्कुराते हुए धीरे से हंस पड़ती हैं वहीँ काव्य राम की तरफ पहले देखती हैं और फिरर सना की तरफ बड़े गौर से देखने लगती हैं...........

" तू भी na.............kuch भी कहीं भी बोल देती hain..........ram खड़ा हैं इस कमरे mein......agar वो तेरी बातें सुन लेता तो............" और काव्य हौले से सना के कान में कहती हैं वहीँ सना धीरे से मुस्कुरा पड़ती हैं..............

" चल chal...........badi आयी सटी सावित्री कहीं ki...........tu तो ऐसे बोल रही हैं जैसे तूने अभी तक कुछ किया hi नहीं.............." और सना फिर से हौले से बोल पड़ती हैं वहीँ काव्य इस बार उसकी बाटिओं को सुनकर मुस्कुरा पड़ती हैं.........

" बाटिओं से तुझसे कोई नहीं जीत sakta................main तेरे लिए अभी मार्किट से चिकन मंगवा देती hoon..........tera favorite............fir आराम से बातें hongi............tu जाकर पहले फ्रेश हो jaa...........aur ram...........tum जाकर बाजार से सामान लेकर आवो..............." और काव्य अपने पर्स से कुछ रुपये निकलकर राम को देती हैं वहीँ सना उसके हाथों को फ़ौरन रोक लेती हैं और अपने पर्स में रखा पैसा निकलकर राम के हाथों में थमा देती हैं.............

" ये तेरा घर नहीं हैं kavya.............aaj से अब मेरा भी hain............is लिए इस घर पर जितना तेरा हक़ hain......utna hi मेरा...................." और सना मुस्कुराते हुए काव्य के तरफ बड़े गौर से देखने लगती हैं व्वहिं काव्य भी जवाब में धीरे से मुस्कुरा देती हैं............

" ाचा baba.......jaisi तेरी मर्ज़ी.............." और काव्य अपने दोनों हाथों को उसके सामने जोड़ती हुई राम को मार्किट जाने का इशारा करती हैं वहीँ सना भी जवाब में मुस्कुरा पड़ती hain..........ram के जाते hi काव्य सना का एक हाथ उसके हाथों पर हौले से रखती हैं और बड़े गौर से सना की आँखों में आँखें डेल बस देखती रहती हैं.............

" sana......................tujhse एक बात कहती थी ........बहुत ज़रूरी..........." और काव्य धीरे से बोल पड़ती हैं वहीँ सना बड़े गौर से कववया के तरफ देखने लगती हैं.............

" बात क्या हैं kavya...............any थिंग सीरियस................" और सना लुम्बी सांस छोड़ती हुई काव्य की तरफ बड़े गौर से एक तुक देखने लगती hain..............wahin काव्य कुछ देर तक चुप रहती हैं फिर वो आगे बोलना शुरू करती हैं..........

" मैं कल गुडगाँव जा रही hoon................aab तू ये मुट्ठ पूछना की क्यों!!!!!!!! क्यों की कुछ अधूरे सवाल अब भी हैं जो मेरे अतीत में............ जो आज भी मुझे परेशां कर रहे hain.........aur अगर मुझे अपने अतीत से अगर पीछा छुड़ाना हैं तो मुझे एक बार उसी सेहर फिर से जाना hoga.............aur उन सरे सवालों के जवाब को ढूढ़ना hoga...............yaad हैं वो दो लड़कों की maut.............yu समझ ले की मैं उसी सिलसिए में वहां कुछ पता लगाने जा रही hoon..........aur बस एक या दो हफ्ते में मैं वहां से लौट ावुंगी,..............." और काव्य सना की आँखों में देखती हुई अपनी बात ख़तम करती हैं वहीँ सना आँखें फाड़े काव्य के चेहरे को अजीब सी नज़रियों से देखने लगती hain..........usey ज़रा भी यकीन नहीं हो रहा था की काव्य उससे ऐसा कुछ डिमांड करेगी.............

" magar.......kavya.............." और सना आगे कुछ पूछती काव्य बीच में hi बोल पड़ती हैं...........

" प्लीज sana..............bus कुछ दिन की बात hain..........main जल्द लौट aawungi..............mera विश्वास करो............" और काव्य सना के हाथों पर अपने हाथ रखते हुए फिर से बोल पड़ती हैं वहीँ सना धीरे से मुस्कुरा देती हैं..........

" वो तो ठीक हैं काव्य मगर तुम अब वहां किसी को जानती भी nahin........agar तुम्हारे साथ कुछ उल्टा सीधा हो गया to..........aur अगर तुम्हें वहां तुम्हारे सवालों के जवाब न मिले to..............aur अगर मिले भी तो अगर तुम्हें कुछ करना पड़े to............mera मतलब............." और सना धीरे से बोल पड़ती hain.......wahin काव्य उसकी बाटिओं को सुनकर मुस्कुरा पड़ती हैं................

" मैं समझ रही हूँ की तू कहना क्या चाहती hain............agar मुझे मेरे सवालों के जवाब के लिए कुछ भी करना पड़े तो मैं उससे पीछे नहीं hatungi...........chahe जो ho.............aur हाँ एक बात तो मैं तुझे बताना भूल gayi...............yahan के नौकर बड़े हरामखोर hain............unse ज़रा बचके रहना..............." और काव्य धीरे से गहरी सांस छोड़ती हुई अपनी बायत ख़तम करती हैं वहीँ सना टकटकी लगाए काव्य के चेहरे को देखे जा रही thi........................usey कुछ समझ में नहीं आ रहा था की वो अब काव्य से क्या kahe...............kya पूछे.................

दोपहर के खाना खाने के बाद सना और काव्य आपस में बाटें करते हैं और काव्य सना को सब कुछ समझती जाती hain.............wahin दूसरी तरफ रघु के चेहरे पर कमीनी मुस्कान फिर से तैर जाती हैं जब उसने सना को यहाँ आते देखा tha...............wo भी बैग lekar...............itna तो वो जनता था की सना यहाँ पर रहने आयी hain............aur अब उसका दिमाग कुछ ज़्यादा hi तेज़्ज़ चलने लगा tha............wo घंटों बैठा एहि सोच रहा था की ऐसा क्या करे की वो काव्य को अपनी क़दमों पर नीचे झुका de..............aur काफी सोचने के बाद आखिर उसके दिमाग में कुछ ऐसा आईडिया आता हैं जिससे उसके चेहरे पर फिर से एक कमीनी मुस्कान तैर जाती hain........................jo शायद काव्य के लिए कहीं न कहीं फिर से घातक साबित होने वाली थी..................................

टिल कॉन्टिनोएड................................................
 
अपडेट- 64 (ा) (मेघा अपडेट)

दोपहर के खाना खाने के बाद सना और काव्य आपस में बाटें करते हैं और काव्य सना को सब कुछ समझती जाती hain.............wahin दूसरी तरफ रघु के चेहरे पर कमीनी मुस्कान फिर से तैर जाती हैं जब उसने सना को यहाँ आते देखा tha...............wo भी बैग lekar...............itna तो वो जनता था की सना यहाँ पर रहने आयी hain............aur अब उसका दिमाग कुछ ज़्यादा hi तेज़्ज़ चलने लगा tha............wo घंटों बैठा एहि सोच रहा था की ऐसा क्या करे की वो काव्य को अपने क़दमों पर नीचे झुका de..............aur काफी सोचने के बाद आखिर उसके दिमाग में कुछ ऐसा आईडिया आता हैं जिससे उसके चेहरे पर फिर से एक कमीनी मुस्कान तैर जाती hain........................jo शायद काव्य के लिए कहीं न कहीं फिर से घातक साबित होने वाली थी..................................

अब आगे...........................................................

रघु को ऐसे ख्यालों में डूबा हुआ देखकर जीतू बड़े गौर से उसके चेहरे की तरफ देखने लगता hain...........wahin जीतू उसके पास आता हैं और उसके कन्धों को कसकर झंझोरता hain...............jiisey रघु अपने ख्यालों की दुनिया से बहार निकलता हैं...........

" ये क्या अकेले बैठे बैठे ख्याली पुलाव पका रहा hain..........main तो कहता हूँ की अब यहाँ हमारी दाल बिलकुल भी नहीं गलने wali............dekha नहीं काव्य की एक और सहेली आ गयी हैं यहाँ पर rehney..............aur उसके रहते तो हम अब काव्य का कुछ भी नहीं कर sakte...............is लिए बेकार का दिमाग मुट्ठ चला और ........................." जीतू की बातें अभी पूरी होती तभी रघु बीच में hi बोल पड़ता हैं...............

" और ..............हम यहाँ से अपनी बोरिया बिस्टेर समेत le................aur कहीं और चले जाये ............एहि naa..................wo तो हम यहाँ से जाएंगे hi ..............मगर तू जैसा सोच रहा हैं वैसा कुछ नहीं होने wala.............bus तू देखता jaa..........aagey मैं क्या करता hoon............ek बार किस्मत आज़माकर देखने में कोई बुराई थोड़ी न hain............kismet ाचा रहा तो सब theek..........nahin तो इस घर से वैसे भी बहार जाना hi हैं.............." और रघु जीतू को बिना कुछ बताये फ़ौरन बहार की तरफ निकल जाता हैं वहीँ जीतू बड़े गौर से रघु की तरफ देखने लगता हैं.............

" साला पागल hain..................main तो कहता हूँ की अब यहाँ और कुछ नहीं होने wala..................wo राम भी अब हमारे खिलाफ हो गया hain...........sala देखने के बावजूद हमसे बातें तक नहीं karta............wo भी अब हमारे किसी काम का नहीं raha...........aur ये उसकी सहेली भी साली बहुत तेज़ लगती hain..........lekin जो भी हैं साली बहुत मस्त माल hain..................isey भी छोड़े में बड़ा मज़ा aayega.............ye भी मेमसाहेब की तरह मस्त मज़ा degi...............magar साली हाथ आये तब तो कोई बात बने............" और जीतू अकेले में बड़बड़े लगता हैं वहीँ एक बार फिर से उसका हाथ उसके लौड़े पर चला जाता हैं जो वो सना के बारे में सोच सोचकर अपने लुंड को धीरे धीरे से मसलने लगता हैं...............

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वक़्त गुज़रता गया और अगले दिन काव्य अपना कुछ सामान एक बैग में लेकर गुडगाँव के लिए निकल padi..............wahin उसे छोड़ने सना और राम बहार तक आये हुए they.............ram फिर अपनी कार निकलता हैं और काव्य को उस कार में बैठकर सीधा रेलवे स्टेशन की तरफ ले जाता hain................idher सना कमरे को लॉक करके वापस अंदर चली जाती hain.............wahin कुछ दूर पर छुपकर जीतू और रघु काव्य को जाता हुआ बड़े गौर से देख रहे they.................wahin रघु का दिमाग पूरा घूम गया tha.............usey ये समझ में नहीं आ रहा था की काव्य इस तरह बैग लेकर आखिर जा कहाँ सकती हैं..............

खैर जो भी था उसके रास्ते का सबसे बड़ा काँटा फिलहाल दूर हो गया tha..............kavya के रूप mein...........kyon की वो एहि सोच सोचकर परेशां था की काव्य के रहते आखिर सना को वो कैसे अपनी मुट्ठी में कर सकता hain...........aab तो जैसे उसका रास्ता पूरा साफ़ हो गया tha...............ye देखकर वो मुन्न hi मुन्न ख़ुशी से झूम ुहता हैं..............

" चलो ..............जिस चीज़ का मुझे टेंशन था वो अपने आप दूर हो gaya.............kavya कहीं गयी ho............kum से कम उसके न रहने से हम यहाँ पर अपने तरीके से रह तो सकते hain..............main तो मनाता हूँ की साली वो कम से कम 15 दिनों के बाद hi यहाँ aaye..........taki इस बीच हम उस नयी लौंडिया को अपनी मुट्ठी में कर sake..............aur उस लड़की को काव्य के प्रति हथियार बनाकर उसका सही ढंग से उसके ऊपर इस्तेमाल कर sake...............jissey साला सांप भी मुरर जाये और लाठी भी न toote............................magar साला सवाल ये हैं की वो इस तरह से बिन बताये अचानक से जा कहाँ सकती hain............ye सोचने वाली बात hain...............khair वो तो बाद में पता लग hi jayega............jo काम हमें यहाँ रहकर करना हैं अब उसे अंजाम देने का सही वक़्त आ गया हैं................" और रघु अपने चेहरे पर कमीनी मुस्कान लिए जीतू की तरफ देखता हुआ बोल पड़ता हैं वहीँ जीतू उसकी बाटिओं को सुनकर हंस पड़ता हैं................

" तुझे क्या लगता हैं की वो तुझे कहीं अब बताकर jayegi............jab तू उसका कुछ लगता था .........तब लगता tha............magar अब तू उसका कोई नहीं hain.............khair अब बता तेरा आईडिया क्या hain............kya करना हैं हमें................" और जीतू सवाल भरे नज़रियों से रघु की तरफ देखता हुआ धीरे से बोल पड़ता हैं वहीँ रघु कुछ देर तक सोचने के बाद फिर से बोलना शुरू करता हैं............

" हमें nahin...............aab जो कुछ भी करेगा वो बस तू hi karega...............main nahin...........kyon की अब मुझसे ये नाटक और नहीं होने wala............tujhe अब उस लड़की को कैसे भी करके अपनी मुट्ठी में कैद करना hain..............usey अपने प्यार के जाल में जितनी जल्दी हो सके फंसना hain...............aur ये काम कम से कम एक हफ्ते के अंदर हो जाने chahiye.................kyon की काव्य का कोई भरोसा nahin..........wo कभी भी आ सकती hain............aur अगर वो आ गयी तो ये काम हमारे लिए और भी बहुत मुश्किल हो जायेगा................" और रघु अपनी बात ख़तम करते हुए फिर से हंस पड़ता हैं वहीँ जीतू बड़े गौर से उसका चेहरा देखने लगता hain..............sach तो ये था की उसे रघु की बातें कुछ भी समझ में नहीं आयी थी.................

" main......akela...........kya कर सकता hoon..........mujhse नहीं होगा और कुछ..............." और जीतू फ़ौरन ना में अपनी गुर्दें धीरे से हिला देता हैं वहीँ रघु फिर से उसकी बाटिओं सुनकर हंस पड़ता हैं.............

" तुझे इस बार भी वहीँ करना हैं जो तू राम के साथ करता आया tha................aab कहने की मुझे और कुछ ज़रूरत nahin...........aagey तू खुद hi समझदार हैं............." और रघु फिर से अपने ख्यालों में डूबता चला जाता हैं वहीँ जीतू भी अपने सोच में खोता चला जाता hain.............dekhna था की आने वाला वक़्त कौन सा मोड़ लेकर उनकी ज़िन्दगी में आने वाला था........................

" अब यहाँ बैठे रहने से कुछ नहीं होने wala.....................jaa अंदर jaa..............jaa और उससे ये पूछ की घर का काम करना हैं की nahin..........agar वो ना कहे तो फ़ौरन उसके पवन में गिर jana............aur कोई रोनी वाली कहानी उसे सुना dena............aur हाँ कहे तो फिर जैसा मैंने कहा था वैसा hi karna..............magar होशियारी se...............ye याद रख की काव्य को मैंने पटाया tha.........to मैंने उसे तुझे और उन सब में खाने के लिए बनता tha...............usi तरह अगर ये लौडिया भी पैट गयी तो तू इसे भी हम सब में bantega..................fir हम सब भी इसे मिलकर अपनी मर्ज़ी से जैसा चाहेंगे वैसा खाएंगे............." और रघु बीड़ी की एक काश लेता हुआ फिर से ख्यालों में डूब जाता हैं वहीँ जीतू हाथ में झाड़ू लेता हुआ फ़ौरन मैं दूर के तरफ चल पड़ता hain..............wahin जीतू का दिल ज़ोरों से धहदक रहा था.............

जैसे हो वो मैं दूर के पास पहुँचता हैं वो थोड़ी देर रुक जाता हैं और फिर कुछ सोचकर वो उस बेल्ल को धीरे से प्रेस करता hain..............thode देर बाद सामने का मैं दूर खुलता हैं और सना सामने कड़ी हुई नज़र आती hain...............wahin जीतू अपना सर झुकाये खामोश खड़ा था और सना उसके तरफ बड़े गुजर से डकही जा रही थी............

" कौन हो तुम.................." और सना जीतू की तरफ देखती हुई धीरे से सवाल करती हैं वहीँ जीतू अपनी गुर्दें ऊपर की तरफ करके उसकी तरफ देखता हुआ धीरे से जवाब देता हैं..............

" jee..............main इस घर का naukar............main ये पूछने आया था की आपको किसी चीज़ की अगर ज़रुरत हो तो आप हमसे कह सकती हैं................" और जीतू धीरे से सना की तरफ देखता हुआ बोल पड़ता हैं वहीँ सना उसके हुलिए को बड़े गौर से देखती जा रही थी.........

" magar...............kavya ने तो मुझे तुमसे कोई काम लेने से मन किया tha...............fir.........." और सना धीरे से जीतू की तरफ देखती हुई बोल पड़ती हैं वहीँ जीतू इस बार धीरे से मुस्कुरा पड़ता हैं...............

" बड़े लोग हैं न आप लोग memsaheb...............hum छोटे लोगों की क्या aukaat............meri तबियत ठीक नहीं थी इस वजह से मैं कुछ दिनों से यहाँ पर काम पर नहीं आ saka..............ho सकता हैं मेमसाहेब इसी बात को लेकर मुझसे गुस्सा ho...............agar आप नहीं मुझसे कोई काम करना चाहती हैं तो कोई बात nahin............main जैसे यहाँ आया था .......वैसे hi बहार चले जाता हूँ............." और जीतू बात बनाते हुए धीरे से बोल पड़ता हैं वहीँ सना बड़े और से उसके तरफ देखे जा रही thi.............kuch देर की छुपी के बाद आखिर जीतू मायूस होकर पीछे घूमता हैं और जैसे hi वो दो कदम जाने लगता हैं सना की आवाज़ सुकर उसके बढ़ते कदम फिर से रुक जाते हैं.............

" ruko...............jab तुम यहाँ आ hi गए हो तो काम ख़तम करके चले jawo..............waise तुम्हारा नाम क्या हैं.............." और सना जीतू को अजीब सी नज़रियों से देखती हुई बोल पड़ती हैं वहीँ जीतू जवाब में धीरे से मुस्कुरा देता हैं............

" लोग मुझे जीतेन्द्र के नाम से जानते hain............par आप मुझे जीतू कहकर बुला सकती hain.........pyaar से ................आपका बहुत बहुत शुक्रिया memsaheb................waise आप मेमसाहेब की बहुत ख़ास सहेली hain...........aap उन्ही की तरह बहुत खूबसूरत भी हैं............." और जीतू बात बनाते हुए धीरे से सना की आन्ह्कों में देखता हुआ बोल पड़ता हैं वहीँ सना फ़ौरन अपनी नज़रें नीचे की तरफ झुका लेती hain.............shayad शर्म se.............usey जीतू का यु टैरिफ करना कुछ अजीब सा लग रहा था...........

" कौन कौन से काम कर लेते हो तुम............." और सना जीतू को अंदर बुलाती हैं और उसकी तरफ देकहति हुई उससे सवाल करती हैं वहीँ जीतू फिर से मुस्कुरा पड़ता हैं................

" मैं घर के सरे काम कर सकता हूँ memsaheb..................aap एक बार हुकुम करके तो dekhiye...........humari मेमसाहेब हमसे बहुत खुस रहती थी ............हम लोग उन्हें कभी शिकायत का मौका नहीं देते they.........aapko भी नहीं देंगे..............." और जीतू सना को सर से लेकर पवन तक अजीब सी नज़रियों से घूरने लगता hain.............uske चूचियों ko......to कभी उसके कमर ko.........uska दिल तो अभी कर रहा था की वो सना पर अभी चढ़ jaye...........magar............jab चिड़िया प्यार से जाल में फंस जाये तो ज़बरदस्ती करने से क्या फायदा..................

" वैसे एक बात kahun...................aap हमारी मेमसाहेब से भी ज़्यादा खूबसूरत hain...............memsaheb तो बहुत सूंदर हैं मगर आपके मुकाबले थोड़ी फीकी हैं............." और जीतू सना को अपनी बाटिओं में उलझना शुरू कर देता हैं वहीँ इस बार सना उसकी बाटिओं को सुनकर मुस्कुरा पड़ती hain................jeetu भी ये बात ाचे से जनता था की कौन सी ऐसी लड़कियां हैं जिन्हें तारीफ ाची नहीं लगती..............." जीतू के इस तरह तारीफ करने से सना के चेहरे पर हल्की सी मुस्कान तैर जाती हैं वहीँ जीतू भी उसकी तरफ देखता हुआ हौले से हंस पड़ता हैं.......................

कंटिन्यू.......................................................................
 
अपडेट-64 (बी) (मेघा अपडेट)

" ाचा aacha...............bahut hua...............jawo और जाकर अपना काम करो..............." और सना मुस्कुराते हुए अपने कमरे में चली जाती हैं वहीँ जीतू बड़े गौर से सना के थिरकती हुई गांड को देख रहा tha..................aur साथ hi साथ अपने लौड़े पर हाथ भी धीरे धीरे फेर रहा tha................uske चेहरे पर एक बार फिर से कमीनी मुस्कान तैर गयी थी......................

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उधर राम काव्य को रेलवे स्टेशन पर छोड़ आता hain...............kavya दिल्ली जाने वाली ट्रैन में बैठ चुकी thi..........uska दिल बहुत घबरा रहा tha................usey राम और सना को इस तरह छोड़कर जाना कुछ ठीक नहीं लग रहा tha.............magar वो ये भी ाचे से जानती थी की अगर वो नहीं गयी तो आने वाला समय उसपर कितना भरी पढ़ सकता hain............uski पर्सनल लाइफ भी खतरे में पढ़ सकती hain.............aur तो काव्य को अब रघु के द्वारा बनायीं गयी उस वीडियो का भी टेंशन होने लगा tha................waise तो वो उसे बहुत सेफ जगह पर राखी थी मगर रघु का क्या भरोसा की वो कब क्या कर जाये..........

अगर अगर वो वीडियो उसके हाथ लग गयी तो रघु अपनी दुश्मनी उससे ाचे तरीके से निकल सकता hain.............kavya को यु सोच में डूबा हुआ देखकर राम हौले से बोल पड़ता हैं................

" bhabhi.............kya hua............kya सोचने लगी aap.............aapka यु जाना मुझे कुछ ठीक नहीं लग raha....................aap कोशिष कीजियेगा की आप वहां से जल्दी लौट आइयेगा................" और राम थोड़ा मायूस होता हुआ धीरे से बोल पड़ता हैं वहीँ काव्य बड़े प्यार से उसके गलों पर अपना हाथ फेरती हुई उसकी तरफ देखकर हौले से मुस्कुरा पड़ती hain..............wahin जवाब में राम भी मुस्कुरा डेट हैं...............

" तुम फ़िक्र मुट्ठ करो ram...............main बहुत जल्द लौट aawungi...........bus तुम सना का और अपना ख्याल रखना..............." तभी ट्रैन की सीटी बज उठती हैं और घडी के टाइम से ट्रैन अपनी मंज़िल की तरफ धीरे धीरे बढ़ने लगती hain.............wahin राम बस काव्य को अपने से दूर जाता हुआ देख रहा tha..............kavya से यु बिछड़ना उसे ाचा नहीं लग रहा tha............magar वो जनता था की ये जुदाई ज़्यादा लुम्बी नहीं रहने wali...........wo तब तक उसी जगह पर खड़ा रहता हैं जब तक की ट्रैन उसकी नज़रियों से ओझल नहीं हो jati.........aur फिर मायूस होता हुआ वो वापस अपने घर को लौट आता हैं..............

जैसे जैसे ट्रैन की रफ़्तार बढ़ती जा रही थी काव्य के दिमाग में हज़ारों सवाल उमड़ते जा रहे they..................ek बार फिर से उसे उसी सेहर में जाना बहुत अजीब सा लग रहा tha.............us सेहर से जुडी हर वो यादें जिन्हें वो बहुत पहले पीछे छोड़ आयी thi..........aaj एक एक कर साडी यादें उसके जेहन में ताज़ा होती जा रही thi..............ithihas का वो पाना धीरे धीरे अब फिर से खुलता जा रहा tha................lumbe समय के जर्नी के बाद आखिर काव्य गुडगाँव सेहर पहुँच hi जाती hain.............jaise hi वो रेलवे स्टेशन पर जब उतरती हैं उसके दिमाग में वो साडी चीज़ें एक एक कर ताज़ा होने लगती हैं..............

वो sehar........wo gali.............wahan का ghar..........sab कुछ धुंदला धुंदला सा उसके दिमाग में किसी फिल्म की तरह घूमता जा रहा tha...............wo उस स्टेशन से बहार की तरफ निकलती हैं और सामने बहुत सरे ऑटो की लाइन लगी रहती hain..............dopahar का समय था ो धुप बहुत्त तेज़्ज़ thi.......kavya अपना बैग लिए आगे बढ़ती जा रही थी तभी उसके कानों में किसी की आवाज़ सुनाई देती हैं जिसे सुनकर वो फ़ौरन पीछे की तरफ पलटती hain................samney एक ऑटोरिक्शा वाला खड़ा उसी के तरफ देखकर मुस्कुरा रहा था.............

" मैंने कहा कहाँ चलेंगी ..............आप .......memsaheb................kahiye तो मैं छोड़ दूँ............." और वो साक्ष मुस्कुराता हुआ काव्य की तरफ बड़े गौर से देखे लगता hain.............wahin काव्य रुक जाती हैं और बड़े गौर से उस साक्ष की तरफ देखने लगती hain...............wo साक्ष अपने हरे रंग के ऑटो के सामने खड़ा काव्य की तरफ देखता हुआ मुस्कुराये जा रहा था.............

" hotel..................royal palace.......................jana हैं मुझे............" और काव्य एक नज़र उस साक्ष की ओरे देखती हुई धीरे से बोल पड़ती हैं वहीँ वो साक्ष काव्य के उस रूप को बड़े गौर से देखता रह जाता hain..............dikhney में वो करीब 40 साल का hoga.........pet उसका बहार की तरफ निकला हुआ सा tha..........kapdey उसके खाखी कलर के they..............kandhey पर उसने एक तौलिया रखा हुआ tha...........aur रंग उसका सांवला सा था...............

" कोई बात नहीं memsaheb..............aap बैठिये तो sahi............main आपको अभी उसी जगह पर छोड़ देता hoon..............aur मेरी उस होटल के मैनेजर से जान पहचान भी ाची hain..............agar आप कहेंगी तो मैं आपके रहने और खाने का भी वहां पर इंतेज़ाम कर dunga.............wo भी कम से कम दाम में........................" और वो साक्ष मुस्कुरा हुआ काव्य के हाथों से उस बैग को चीन लेता हैं और उस बैग को अपनी ऑटो के पीछेवाली सीट पर रखकर काव्य को अंदर बैठने का इशारा करता hain...............kavya भी आराम से जाकर उस ऑटो में बैठ जाती हैं और वो साक्ष उस ऑटो लेकर फ़ौरन उस होटल के तरफ चल पड़ता हैं.............

" वैसे memsaheb................aapko देखने से तो नहीं लगता की आप कहीं बहार की hain............lagta हैं आप इसी सेहर की हैं............" और वो ऑटोवाला अपनी ऑटो चलते हुए धीरे से बबूल पड़ता हैं वहीँ काव्य उसकी बाटिओं को सुनकर थोड़ी हैरान ज़रूर होती hain............magar कुछ सोचकर अगले hi पल वो बोल पड़ती हैं..........

" तुम्हारा नाम क्या hain.........mr..............." और काव्या धीरे से इतना hi उसके सवालों का जवाब देती हैं वहीँ वो ऑटो वाला हँसता हुआ आगे बोलना शुरू करता हैं........

" mahendra.................naam हैं मेरा memsaheb..............magar मुझे तो हैरानी इस बात की हो रही हैं की आज से पहले किसी ने मुझसे मेरा नाम तक नहीं poocha..............aap पहली कस्टमर हैं जो मेरे ऑटो में बैठने के बाद मेरा नाम पूछ रही hain.............aaj एहसास हो रहा हैं की साला हम गरीबों का कोई नाम भी होता hain.............waise आपने मेरे सवालों का जवाब नहीं दिया..............." और महेंद्र मुस्कुराता हुआ धीरे से बोल पड़ता हैं वहीँ काव्य भी उसके बत्तियों को सुनकर धीरे से मुस्कुरा पड़ती हैं...........

" haan..............main पहले भी इस सेहर में रह चुकी hoon...........aur मेरी शादी दूसरे सेहर में हो gayi..........to इस वजह से मुझसे ये सेहर छोड़ना pada..............khair .............कब से यहाँ इस सेहर में हो................." और काव्य गहरी सांस छोड़ते हुए धीरे से मुस्कुरा पड़ती हैं वहीँ महेंद्र के चेहरे पर भी मुस्कान और गहरी हो जाती हैं............

" 20 साल हो गए मुझे ये काम करते memsaheb..................aab तो मैं इस सेहर के गली गली से वाकिफ hoon.............aap होटल में रुकेंगी इसका मतलब आप यहाँ पर अकेली आयी hain..........aur जहाँ ताम मुझे ऐसा लगता हैं की आपका इस सेहर में कोई नहीं aab.............khair ये आपका पर्सनल लाइफ हैं तो मैं उसमें कोई हत्यस्कीप नहीं karunga..............waise एक बात बोलूं memsaheb...........aap बहुत खूबसूरत hain..............aap जैसे कस्टमर अगर मेरे ऑटो में रोज़ बैठेंगे तो मेरे ऑटो के तो भाग्य hi खुल jayengey...........roz रोज़ थोड़ी न मिलते हैं आपके जैसे कस्टमर.........." और महेंद्र ऑटो टर्न करता हुआ बैक मिरर में काव्य को देखता हुआ फिर से बोल पड़ता hain..........wahin काव्य जवाब में धीरे से मुस्कुरा पड़ती हैं............

" तुम na...............waise मैं यहाँ पर किसी की तलाश में आयी hoon............shayad हो सकता हैं तुम उसे जानते भी ho.............uska नाम रघु hain..............wo यहीं का रहने वाला हैं..............." और काव्य गहरी सांस छोड़ती हुई हौले से बोल पड़ती हैं वहीँ महेंद्र उसकी बाटिओं को बड़े गौर से सोचने लगता हैं..............

" कौन रघु memsaheb..............is सेहर में तो हज़ारों रघु रहते hongey..........uske बारे में कुछ तो batawo...........ho सकता हैं वो मेरा जान पहचान वाला hi हो............." और महेन्द्द्र ऑटो चलते हुए बैक मिरर से काव्य को देखते हुई धीरे से बोल पड़ता हैं वहीँ काव्य फिर से गहरे सोच में डूबती चली जाती hain.............wo क्या बतात्ति उस ऑटो वाले को की रघु कौन हैं........

सच तो ये था की उसे रघु के नाम के अलावा कुछ नहीं पता tha.............aur इस बड़े से सेहर में उसका पता ढूढ़ना बहुत मुश्किल काम tha...............aab काव्य की मुश्किलें धीरे धीरे बढ़ती जा रही thi..............aab वो इस मैदान में कूद hi चुकी थी तो अब उसे लड़ना hi नहीं बल्कि जीतना भी आना चाहिए tha..............tabhi वो इस लड़ाई को अकेले जीत सकती thi...........dekhna था की अब इस लड़ाई में काव्य की जीत होती hain............................ya फिर हार......................

टिल कॉन्टिनोएड..............................................................
 
अपडेट- 65 (ा) (मेघा अपडेट)

सच तो ये था की उसे रघु के नाम के अलावा कुछ नहीं पता tha.............aur इस बड़े से सेहर में उसका पता ढूढ़ना बहुत मुश्किल काम tha...............aab काव्य की मुश्किलें धीरे धीरे बढ़ती जा रही thi..............aab वो इस मैदान में कूद hi चुकी थी तो अब उसे लड़ना hi नहीं बल्कि जीतना भी आना चाहिए tha..............tabhi वो इस लड़ाई को अकेले जीत सकती thi...........dekhna था की अब इस लड़ाई में काव्य की जीत होती hain............................ya फिर हार......................

अब आगे.............................................................

काव्य कुछ देर तक महेंद्र की बाटिओं में खोयी हुई सी रहती हैं फिर अचानक उसके दिमाग में कुछ ख्याल आता हैं जिससे उसके चेहरे पर मुस्कान फिर से गहरी होती चली जाती हैं..............

" haan.......ek बात और hain...............aaj से करीब एक साल पहले उसका बीटा यहीं पास के कॉलेज में पड़ता tha..............jis कॉलेज में मैं भी पड़ती thi..................uska नाम शायद रोहित या फिर प्रशांत tha.............theek से कुछ बता नहीं sakti...........wo पिछले साल सुसाइड किया tha................ye तो नहीं मालूम की उसने चाट पर से कूदकर जान दी thi..................ya फिर ज़हर peekar.............magar ये न्यूज़ कन्फर्म hain...........ye हिंट तुम्हारे लिए बहुत hoga...............raghu नाम के साक्ष को तलाश करने के लिए............." और काव्य गहरी सांस छोड़ते हुए अपनी बात ख़तम करती हैं वहीँ महेंद्र भी उसकी बाटिओं को कुछ देर तक सोचने लगता हैं................

" वो सब तो ठीक हैं memsaheb...............magar ये बताइये की मैं उस साक्ष का पता अगर लगा लिया to...............badle में मुझे क्या मिलेगा..................." और महेंद्र इस बार बैक मिरर में से काव्य के चेहरे की ओरे घूरता हुआ धीरे से बोल पड़ता hain.........wo ललचायी हुई नज़रियों से काव्य की तरफ देख रहा tha.................jaise वो कुछ उससे मांगना चाहता ho................wahin काव्य भी उसके आँखों को पढ़ने की लगातार कोशिश कर रही थी................

" जो चाहिए वो सब कुछ dungi..............jitna रूपया पैसा कहोगे वो सब तुम्हें milega............bus एक बार मुझे उसका पता लगाकर बता दो............" और काव्य इस बार जैसे पूरे कॉन्फिडेंस से होती हुई धीरे से बोल पड़ती hain...................wahin महेंद्र इस बार उसकी बाटिओं को सुन्करर मुस्कुरा देता हैं..............

" मुझे रूपया पैसा नहीं चाहिए memsaheb.............wo तो मैं कमाता hi हूँ हर roz............mujhe तो वो चीज़ चाहिए जो सिर्फ आप चाहे तो hi मुझे मिल सकता hain..........warna nahin...............aur औरत होने के नाते ये आप ाची तरह से समझ सकती हैं की एक मर्द को और क्या चाहिए होता हैं औरत se...............bus समझदार को इशारा काफी होता हैं..............." और इस बार महेंद्र थोड़ी हिम्मत जुटते हुए बोल पड़ता हैं वहीँ काव्य कुछ देर तक सोच में डूबी रहती हैं फिर वो मुस्कुराते हुए अपना एक हाथ महेंद्र के कंधे पर हौले से रख देती hain...........wahin महेंद्र ख़ुशी से मुन्न hi मुन्न झूम उठता हैं.............

" ठीक hain...................jo तुम चाहोगे वो तुम्हें milega..............jaisa चाहोगे वो सब कुछ मैं तुम्हें dungi.............bus मेरा काम दो दिन में हो जाना chahiye...........chahe जैसे ho............aur haan......jab तक तुम्हें सफलता न mile..............tum न hi मेरे पास aana............aur न hi मुझसे मिलने की कोशिश करना.............." और काव्य गहरी सांस छोड़ते हुए हौले से अपनी बात ख़तम करती हैं वहीँ महेंद्र हाँ में अपनी गुर्दें धीरे से हिला देता hain.............tabhi रॉयल पैलेस होटल आ जाता हैं और महेंद्र अपना ऑटो वहीँ उस होटल के सामने कड़ी कर देता हैं...............

" मेरा यकीन मानिये memsaheb.............main आपको निराश नहीं karunga............is दो दिन के अंदर मैं आपके लिए इस सेहर का छापा छापा छान loonga............aur उसका पता लगाकर hi rahunga..........aur आप जैसी पारी को कौन पाना नहीं chahega.............ye मेरे लिए किसी सपने से कम थोड़ी न hain.........aur मैं तो चाहता हूँ की मेरा सपना सच हो जाये............" और महेंद्र ऑटो से उतारकर काव्य के सामान को अपने हाथों में ले लेता हैं और उसके साथ उस होटल के अंदर उसके साथ साथ चलने लगता हैं..............

" वैसे आपने अपना नाम नहीं बताया .............memsaheb.............agar वो साक्ष मुझे मिल भी गया तो मैं कैसे आपसे milunga........ye इतना बड़ा होटल hain.............kahan कहाँ मैं आपको तलाश करता फिरूंगा.............." और महेंद्र इस बार अपनी परेशानी बताता हुआ काव्य की आँखों में देखता hua.............haule से बोल पड़ता hain...............uski बाटिओं में शरारत साफ़ झलक रही thi........wahin काव्य उसकी बाटिओं को सुनकर धीरे से मुसकुरा देती हैं.............

" kavya.................kavya मेहता नाम हैं mera.............aur मेरे साथ तो तुम चल hi रहे हो na.............ander इस होटल mein..........wahan मेरा फ़ोन no और रूम no भी तुम्हें मिल hi जायेगा जब मैं इस होटल में चेक इन करुँगी................" और काव्य हौले से मुस्कुराते हुए रेसेप्शन पर जाती हैं और अपना ईद निकलकर उस होटल में चेक इन करती हैं................

" ये मेरे जान पहचान की हैं saheb..............is लिए इनका इस होटल में ख़ास ध्यान rakhiyega...........aur इनका चार्ज भी दूसरों से कम hi होना चाहिए.............." और इस बार महेंद्र सामने बैठे मैनेजर की तरफ देखता हुआ धीरे से बोल पड़ता हैं वहीँ मैनेजर जवाब में धीरे से मुस्कुरा पड़ता हैं.............

" ठीक हैं ठीक hain..............aab तुम्हारी जैसी किस्मत हमारी थोड़ी न हैं जो ऐसे बढ़िया कस्टमर्स से हमारी जान पेहान hogi..........tum तो कस्टमर्स भी ले आते हो तो चूँ चूँ ke..............khair............main कम कर दूंगा तुम टेंशन न लो..............." और वो मैनेजर काव्य की ओरे घूरता हुआ महेंद्र की तरफ देखकर धीरे से बोल पड़ता हैं वहीँ महेंद्र जवाब में धीरे से मुस्कुरा पड़ता हैं.........

" आप पहले अपनी ईद दीजिये फिर मैं आपको यहाँ पर चेक इन करता hoon...........aur इस बार मैनेजर काव्य के हाथों को थमता हुआ उसके हाथ से वो ईद ले लेता हैं और काव्य की ओरे मुस्कुराते हुए एक तुक देखने लगता hain...........manager जब तक एंट्री कर रहा था तब तक बार बार उसका सारा ध्यान काव्य की तरफ hi जा रहा tha...........entry करने के बाद काव्य अपने पर्स से पैसे निकलती हैं और उसे धीरे से थमा देती हैं वहीँ वो मैनेजर अपने हाथ में एक चाभी लेता हैं और इस बार फिर से काव्य के हाथ को पकड़ते हुए उस चाभी को धीरे से काव्य के हाथों में थमा देता hain...........wahin काव्य उस चाभी को अपने हाथ में ले लेती हैं और मुस्कुराते हुए सीधा अपने रूम की तरफ चल पड़ती hain............wahin एक वेटर जैसे दिखने टाइप का आदमी भी काव्य के आगे आगे चल पड़ता hain..........beech में kavya............aur उसके पीछे महेंद्र..........

जो की बड़े गौर से काव्य के उस साड़ी में उसकी मटकती हुई गांड को खा जाने वाली नज़रियों से देखे जा रहा tha...........jab भी काव्य चलती उसके गांड के बीच जो दरार बनती जिससे वो एक पल के लिए भी अपनी नज़र काव्य से गांड से नहीं हटाता हैं और न hi वो एक पल के लिए अपनी पालक झपकते हैं...........

" ये रहा आपका रूम ......memsaheb..............room no 4002........." और वो वेटर उस रूम का लॉक खोलते हुए धीरे से वो उस चाभी को काव्य के हाथों में पकड़ा देता हैं और कोई सर्विस चाहिए ऐसा पूछता हुआ फ़ौरन वहां से बहार की तरफ निकल जाता hain...........us वेटर के जाते hi महेंद्र अपनी नज़र हटाता हैं और काव्य के तरफ बड़े गौर से देखने लगता हैं.............

" आप अपना नंबर दीजिये memmsaheb...............agar मेरे पास कुछ जानकारी होगी तो मैं आपको कांटेक्ट कर लूंगा.............." और महेंद्र मुस्कुराता हुआ काव्य की तरफ फिर से देखने लगता हैं वहीँ काव्य एक कार्ड पर अपना नंबर लिखकर उस कार्ड को महेंद्र की तरफ थमा देती हैं............

" चलता हूँ memsaheb.............bahut जल्द आपसे मिलूंगा............." और महेंद्र इतना कहकर फ़ौरन वहां से चला जाता हैं और काव्य फिर उस रूम को बंद करती हैं और अपने बैग से सामान निकलकर सीधा नहाने बाथरूम में घुस जाती hai............nahane के बाद काव्य अपना सूट पहनती हैं और आकर उस बीएड पर आराम से लेट जाती hain.............itne लम्बे सफर से वो बुरी तरह थक गयी थी इस लिए वो अब थोड़ा आराम करना चाहती thi.............jaise hi वो बीएड पर लेटती हैं उसके दिमाग में फिर से अजीब अजीब से ख्याल आने शुरू हो जाते hain...............aur वो एक बार फिर से उन सब में खोटी चली जाती हैं.............

कंटिन्यू.........................................................
 
अपडेट- 65(बी) (मेघा अपडेट)

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Prashant......................yehi वो लड़का और नाम था जब काव्य उससे पहली बार मिली thi.............hostel mein..........aur पहली hi नज़र में प्रशांत उसका दीवाना बन बैठा tha.............kaha जाता हैं न पहली नज़र का pyaar..........shayad प्रशांत को एहि हुआ tha..........kavya se...........gayi तो थी वो भी उसकी रैगिंग lene...........magar शायद वो ले न saki..............kyon की प्रशांत तो कुछ और hi मूड में tha............jaisa की काव्य सीनियर थी तो उस ग्रुप में और भी कई साडी लडकियां उसके साथ रहती thi..............aur उन्ही ग्रुप्स में से सना भी एक thi..............magar काव्य उनकी हेड thi............to जो काव्य कहती वही hota...........wahin बाकि लड़कियां करती..............

वैसे तो बॉय हॉस्टल में लड़कियों को जाना अल्लोव नहीं था मगर काव्य अगर जो चाह लेती वो उसे करके hi manti..........khoobsurati और फ्रैंकनेस की वजह से सरे स्टाफ के मेंबर्स उसकी मुट्ठी में rehtey...........halanki वो खुले विचारों वाली थी तो कोई भी बात वो ज़्यादा सीरियसली नहीं leti............aur न hi ज़्यादा sochti..........bus अपने तरीके से ज़िन्दगी jeeti.............prashant अपने कमरे में बैठा हुआ tha.............ya शायद कुछ और कर रहा tha..........raat के 11 बजे they...........kavya प्रशांत का दूर नॉक करती हैं और थोड़े देर बाद प्रशांत दरवाज़ा खोलता हैं..............

जब उसकी नज़र अपने सीनियर्स पर पड़ती हैं वो भी एक साथ इतने सरे लड़कियों पर तो......... जैसे उसके दुर्र से पसीने छूटने लगते hain...............magar जब उसकी नज़र काव्य पर पड़ती हैं तो उसका दुर्र अपने आप जैसे गायब सा हो जाता hain..............wo टकटकी लगाए बस काव्य को देखता रहता hain.............halanki उसने खूबसूरत लडकियां तो कई देखि थी मगर काव्य में कुछ तो ख़ास बात ज़रूर thi..........ya शायद वो उन सब से अलग थी................

" तो तुम इस कॉलेज में नए ho.........aur जैसा की तुम जानते हो की रैगिंग लेना कानूनन अपराध hain...........to हम एहि चाहते हैं की तुम हमारे साथ पूरा co-orporate karo...............issey तुम्हें भी फायदा hoga..............aur हमें bhi...........kyon girls...........kya ख्याल हैं............" और काव्य सभी लड़कियों की तरफ देखती हुई आहिस्ता से बोल पड़ती हैं वहीँ सभी लडकियां जवाब में हाँ में उसका समर्थन करती hain.............magar प्रशांत तो कुछ और hi नशे में tha............usey न hi कुछ सुनाई दे रहा था और न hi कुछ dikhayi..............wo तो बस काव्य को एक तुक देखे जा रहा tha................jab वो बोल रही थी वो उसके होंठों को dekhta........uske बंद होते खुलते लिप्स को dekhta...........to कभी उसके गलों ko...............to कभी उसके आँखों ko..........wo तो जैसे काव्य में खो सा गया tha...........tabhi सना कसकर उसके सर पर एक ज़ोर का झापड़ मरती हैं और वो जैसे अपने सोच की दुनिया से बहार निकलता हैं............

" कहाँ खो गए mr...............hum सब तुम्हारे सीनियर्स hain..................to ाचा होगा की तुम हमारे साथ co-orporate karo.............warna.........." और सना प्रशांत की तरफ देखती हुई बोल पड़ती हैं वहीँ प्रशांत इस बार आगे बढ़ता हैं और काव्य का हाथ थम लेता हैं............

" मैं तो आपलोगों के साथ co-orporate करने को बिलकुल तैयार hoon...............bus तुम अपना नाम तो बता दो मरस..................." और इस बार प्रशांत काव्य का हाथ पकड़ते हुए आहिस्ता से बोल पड़ता हैं वहीँ सभी लडकियां काव्य की ओरे देखती हुई ज़ोरों से हंस पड़ती hain..............wahin काव्य का शर्म से बुरा हाल हो जाता hain...........wo फ़ौरन अपनी नज़रें शर्म से नीचे की तरफ झुका लेती हैं वहीँ प्रशांत उसकी तरफ बस देखता रहता हैं.............

" छोड़ो मेरा हाथ.............." और काव्य लदखती हुई आवाज़ में प्रशांत की ओरे देखती हुई धीरे से बोल पड़ती hain..........wahin उसका कलेजा ज़ोरों से धड़क रहा tha............nazrein उसकी ऊपर की तरफ नहीं उठ रही thi...........sharam से...............

" तुम्हें शर्म नहीं आती अपने सीनियर्स पर लाइन मरते hue.............tumhara तो कुछ ाचे से इलाज़ करना होगा............." और इस बार काव्य के साथ आयी उनमें से एक लड़की बोल पड़ती हैं वहीँ काव्य सना का हाथ पकड़ती हुई फ़ौरन उस कमरे से बहार की तरफ जाने लगती hain...........kavya का मूड ऑफ हो गया tha...........usney कभी सपने में भी नहीं सोचा था की कोई जूनियर्स उसके साथ इस तरह का हरकत भी करेगा............... वहीँ प्रशांत आगे बढ़ता हैं और उसके आगे जाकर घुटन के बल उसके पैरों के पास जाकर बैठ जाता हैं और टकटकी लगाए उसकी तरफ बस देखता रेठा हैं..........

" मैं ये तो नहीं जनता की तुम कौन ho............magar जो भी हो पूरी क़यामत ho............kaash तुम मेरी सीनियर नहीं होती तो कितना ाचा hota..........aab तो जान भी चली गयी तो मुझे कोई गम नहीं hoga...........iam दिए हार्ट फैन फॉर यू..........." और प्रशांत काव्य की ओरे देखता हुआ शायराना अंदाज़ में धीरे से बोल पड़ता हैं वहीँ काव्य का चेहरा शर्म से पूरा लाल पढ़ जाता hain............aisa पहली बार हुआ था जब कोई जूनियर्स उसे इस तरह से चढ़ रहा tha...........waise तो सीनियर्स हमेशा उसके पीछे पड़े रहते थे मगर वो ज़्यादा किसी को भाव नहीं देती थी...............

" ोये mr............mind योर language..............naye हो इस लिए मैं तुम्हें कुछ बोल नहीं rahi..........magar आज के बाद कभी तुम मेरे रास्ते में आये to...............theek नहीं होगा........" और काव्य सना का हाथ पादकते हुए गुस्से से अपने दोनों पवन पटकताके हुए उस कमरे से बहार की तरफ चली जाती hain.............wahin प्रशांत टकटकी लगाए बस काव्य को एक तुक देखता रह जाता hain.........aur मुस्कुरा भी रहा tha................aur उसी रात बाकि सीनियर्स लकियों ने प्रशांत के कपड़े भी उतरवाए थे काव्य के साथ बढ़तमीज़ी की वजह se...........wey सब उसे सजा के तौर पर ये सब करवाए थे..............

दूसरे दिन जब प्रशांत अकेला बैठा हुआ था अपने कैंपस mein............tabhi उसकी नज़र फिर से काव्य पर चली जाती hain..........jo अपनी सहेलियों के बीच घिर हुई उन सब से बातें कर रही thi..............aur सामने की तरफ आ रही thi..............prashant अपने हाथ में एक डेरी लेता हिन् और उसमें एक रेड रोज रखकर सीधा काव्य के तरफ चल पड़ता hain...............aur सीधा जाकर काव्य के हाथों में वो डेरी और वो फूल सबके बीच दे देता hain.............wahin काव्य के चेहरे का रंग जैसे फीका पढ़ जाता हैं..........

" ये क्या बढ़तमीज़ी hain.........na hi मैं तुम्हें जानती hoon.........aur न hi तुम mujhe...........aur या क्या तरीका हैं ऐसे सबके बीच फूल देने ka..............meri भी कोई इज़्ज़त hain.............sab लोग यहाँ मेरे बारे में क्या सोचेंगे................" और इस बार काव्य गुस्से से वो डेरी और उस फूल को वहीँ प्रश्नात के सामने फेंककर सीधा उससे दूर जाने लगती hain..............issey पहले की वो कुछ आगे बढ़ती .............प्रशांत इस बार फिर से उसके हाथ सबके बीच थमा लेता hain.............wahin काव्य ख़ामोशी से बस किसी तमाशे की तरह बस कड़ी रहती हैं............

" प्यार में कोई जान पहचान ....उनन्च नीच नहीं hoti............tum मुझे बहुत पसंद हो इस लिए बिना देर किये hi तुम्हें कह diya.............waise मेरा नाम प्रशांत hain.............aur तुम्हारा kavya.............lo हो गयी जान पहचान........." और इससे पहले प्रशांत कुछ आगे कहता उसके गलों पर एक ज़ोर का थपाद पड़ता हैं जिससे उसका चेहरा पूरा लाल पढ़ जाता hain...............thaapad की गूँज इतनी तेज़्ज़ तह की काव्य के हाथ झनझना गए they................uski पाँचों उंगलियां उसके गलों पर जैसे चाप सी गयी थी..............

" मैं कुछ कह नहीं रही इसका मतलब ये नहीं की मैं तुमसे डर्टी hoon............bus सच तो ये हैं की मैं ज़ाहीहरों के मुँह नहीं लगती ............और ाचा होगा की तुम अपना फैसला और इरादा भी बदल lo........kyon की तुम मुझे पाना तो door.............tum मेरी परछाई को भी कभी छु नहीं sakogey.............is लिए बेकार की कोशिश करना छोड़ दो..........." और काव्य गरजते हुए वहां से निकल जाती हैं मगर प्रशांत की ये हरकतें किसी और से छुपी नहीं thi............wo थे उस कॉलेज के टपोरी और आवारा किसम के ladke............jo हर खूबसूरत लड़की को अपना माल और अपना चीज़ samjtey..............to ज़ाहिर हैं काव्य भी उनकी माल या उनकी चीज़ hi thi...........jisey वो अपना समझते थे.............

उस दिन शाम के वक़्त प्रशांत का सामना उस कॉलेज में रॉकी नाम के बदमाश से hua.........jo वहां उस कॉलेज का यूनियन लीडर tha.............aur सबसे बड़ा गुंडा bhi..............wo तो काव्य के पीछे न जाने कब से पड़ा हुआ था मगर काव्य उसे ज़रा भी घास नहीं डालती thi.................magar फिर भी वो इसी कोशिश में लगा था की कभी न कभी काव्य उसे हाँ ज़रूर bolegi............aur अगर कोई उसकी माल को हाथ लगाए तो उसे कैसे बर्दास्त hoga............hua wahi.......jo रॉकी चाहता tha...............prashant की ाचे से उसने 5 या 6 लोगों से मिलकर उसकी कुटाई करवा di.............aur छोड़ दिया उसे हॉस्पिटल के बीएड par...........aaram करने के लिए.............

वक़्त गुज़रता गया और प्रशांत के अंदर काव्य को पाने के प्रति कोई बदलाव नहीं aaya........din बा दिन उसका दीवानापन बढ़ता चला gaya.............wo कई बार काव्य को कहकर प्रोपोज़ कर चूका था मगर काव्य का एक hi जवाब hota.....................naa............halanki प्रशांत के कई दोस्तों ने उसे समझाया भी मगर आशिकी का नशा इतनी जड़ली थोड़ी न उतरता हैं..............

एक दिन काव्य एक लड़के के साथ घूम रही thi..............aur उससे अकेले में बातें कर रही thi.........halanki वो लड़का भी कोई बहार का नहीं tha................magar ये नज़ारा देखकर तो प्रशांत का जैसे खून खौल utha...............jaisa फिल्मों में होता hain..........wo अब किसी भी कीमत पर उस लकड़ी को अपने रास्ते से हटा देना चाहता tha................aur जब प्रशांत ने उस लड़के के बारे में जब पता करवाया तो एक बात जो सबके सामने निकलकर आयी वो था उस लड़के का naam..............jo की अपने आप में एक अलग hi कहानी को बयाना कर रहा tha...............................aur वो नाम tha........................rohit...................wo रोहित जिसने कुछ दिन बाद ज़हर खाकर काव्य के नाम की सुसाइड की thi..................jo अपने आप में एक अलग hi कहानी को बयां कर रही थी.........................

टिल कॉन्टिनोएड.....................................
 
अपडेट- 66 (ा) (मेघा अपडेट)

एक दिन काव्य एक लड़के के साथ घूम रही thi..............aur उससे अकेले में बातें कर रही thi.........halanki वो लड़का भी कोई बहार का नहीं tha................magar ये नज़ारा देखकर तो प्रशांत का जैसे खून खौल utha...............jaisa फिल्मों में होता hain..........wo अब किसी भी कीमत पर उस लकड़ी को अपने रास्ते से हटा देना चाहता tha................aur जब प्रशांत ने उस लड़के के बारे में जब पता करवाया तो एक बात जो सबके सामने निकलकर आयी वो था उस लड़के का naam..............jo की अपने आप में एक अलग hi कहानी को बयाना कर रहा tha...............................aur वो नाम tha........................rohit...................wo रोहित जिसने कुछ दिन बाद ज़हर खाकर काव्य के नाम की सुसाइड की thi..................jo अपने आप में एक अलग hi कहानी को बयां कर रही थी.........................

अब आगे......................................................................

" कौन था ये रोहित..................." अब ये सवाल बार बार प्रशांत को परेशां करने लगा tha...............agar काव्य इतनी hi शरीफ हैं और उसका कोई बॉयफ्रेंड नहीं हैं तो फिर ये रोहित उसका क्या लगता hain.............kyon वो उसके साथ इस तरह से घूम रही thi.............aur अगर रोहित उसका अगर बॉयफ्रेंड hi हैं तो ऐसा क्या ख़ास बात हैं उस रोहित mein................jo उसमें नहीं..............

रोहित प्रशांत की तरह दुबला पतला सा लड़का tha...............padhta तो वो उसकी के क्लास में hi tha............dikhney में कोई ख़ास तो नहीं था मगर रंग उसका सावला सा ज़रूर tha................rohit की मुलाकात काव्य से उस दिन हुई जब काव्य अपने सहेलियों के साथ घूमती फिरती ग्राउंड में मस्ती कर रही thi..............sabhi लडकियां छुपा छुपाई वाला खेल खेल रही थी और इस बार काव्य के आँखों पर पाती बंधी हुई thi.........wo अपने किसी भी सहेलियों को अगर छु लेती तो वो आउट हो jati...........magar इसी दौरान रोहित उस खेल के बीच में चला गया और काव्य अपनी सहेली समझकर उसे पकड़ li............aur जब उसकी आँखों से पाती हटा तो काव्य का चेहरा शर्म से लाल पढ़ gaya............wahin रोहित जवाब में मुस्कुरा पड़ा...........

उस दिन से वो काव्य का दीवाना बन gaya..............uski खूबसूरती ka............class में भी वो चुप छुपकर उसे बस देखता rehta...........uske करीब आने के नए नए बहाने ढूढ़ता rehta.............notes लेने के बहाने वो काव्य से मुलाकातें बढ़ाता rehta............magar काव्य कभी भी उसे भाव नहीं deti.............din बा दिन उसका भी काव्य के प्रति उसकी दीवानगी बढ़ती चली gayi.............aur एक दिन उसने भी काव्य को सबके सामने प्रोपोज़ कर diya............wahin काव्य जवाब में उसके नादानी पर हंस पड़ी.............

" तुम पागल हो rohit...............main प्यार नहीं करती tumse...............you know............mujhe ऐसी बेकार सी चीज़ीओन में कोई दिलचस्पी nahin..................haan अगर बात फ्रेंडशिप की हैं तो फिर ठीक hain...............magar शादी वादी ये मुझसे नहीं hoga..............main खुलकर अपनी लाइफ को एन्जॉय करना चाहती hoon...............in आसमानों में उड़ना चाहती हूँ.............." और काव्य के उस जवाब से रोहित का चेहरा उदास पढ़ जाता हैं और वो मायूस होता हुआ वहां से चुप चाप चला जाता हैं......................

दिन गुज़रते गए और वक़्त बीतता gaya................rohit का काव्य के प्रति उसकी चाहत और भी बढ़ती चली gayi..............aise hi एक दिन काव्य कॉलेज से अकेले घर जा रही थी तभी उधर से रोहित आता हुआ उसे नज़र आता hain.............jawab में काव्य भी उसकी तरफ देखती हुई धीरे से मुस्कुरा पड़ती hain..............october की शुरुवात थी और मौसम बिगड़ने लगी thi...........aasmaan में घने बदल they..............aisa लग रहा था ये बदल जैसे कभी भी बरस पड़ेंगे.................

" तुम अगर कहो तो मैं छोड़ दूँ tumhein.........tumhare घर तक ...................काव्य............." और रोहित अपनी बाइक मोड़ता हुआ धीरे से काव्य के करीब जाता हैं और उसकी तरफ मुस्कुराता हुआ धीरे से बोल पड़ता hain...........wahin काव्य मुस्कुराते हुए उसे मन नहीं कर पति और उसकी बाइक पर जाकर चुप चाप से बैठ जाती hain.............jo भी था ये रोहित के लिए बहुत बड़ी बात thi.............thode दूर जाने पर बारिश तेज़्ज़ हो जाती हैं और रोहित किसी सेफ जगह की तलाश करने लगता hain.............baarish से छुपने के liye..............kuch दूर जाने पर उसे एक सेफ जगह दिखाई पड़ती हैं जो की रोड से करीब 200 मीटर की दूरी पर thi.........ye एक खंडहर जैसा माकन था जो शायद बरसों से खाली पड़ा tha..........aur काफी सुनसान bhi............jahan कोई आता जाता नहीं था..............

इतने देर में काव्य और रोहित दोनों बुरी तरह से भीग चुके they..........kavya के सूट से पानी टपकने लगा था और उसका बदन उस बारिश में भीग जाने से और भी खुलकर एक्सपोज़ हो रहा था जो सामने खड़े रोहित के दिल पर अब बिजलियाँ गिराने लगा tha............rohit टकटकी लगाए बस काव्य को घूरे जा रहा था वहीँ काव्य का दिल अब ज़ोरों से धड़कता जा रहा tha................aise अकेले में वो अपने कॉलेज के लड़के के साथ thi............wo भी इस मौसम mein...........bilkul akele..............jahan दूर दूर तक कोई नज़र नहीं आ रहा tha..............dheere धीरे बारिश और भी बढ़ती जा रही थी मनो आज वो खुलेगी भी नहीं...................

ऊपर से काव्य को अब ठंडा लगने लगा tha.............rohit काव्य के करीब आता हैं और आगे बढ़कर काव्य के बदन से पूरा सात जाता hain............aise मौसम में दोनों का फिसलना लाज़मी tha................kavya न hi रोहित को मन कर रही थी और न hi उसका कोई विरोध कर रही thi...............shayad वो भी इस मौसम में गरम हो गयी thi...............uska बदन भले hi भीग गया हो मगर अंदर hi अंदर वो अपने जिस्म के आग में सुलग रही thi...........upar से रोहित के उस स्पर्श से काव्य की रही सही हिम्मत भी टूट रही thi.............wo अब किसी भी विरोध करने के स्थिति में नज़र नहीं आ रही thi............fir वही हुआ जो होता हैं एक जवान लड़की और लड़के के beech..............chudai का खेल.....................

रोहित भी धीरे धीरे उसके होनों को चूमने चटनी laga...........wo भी पूरी तरह से एक्ससिटेड हो गया tha............aur साथ hi साथ अब वो काव्य के बदन के हर हिस्से को धीरे धीरे से सहलाने laga.........kavya की आँखें बांड हो चुकी थी और वो लुम्बी लुम्बी सांसें ले रही thi..........shayad उसपर भी मदहोशी पूरे उफान पर thi.............guzarte वक़्त के साथ साथ काव्य के बदन से कपड़े भी उतरते चले गए और साथ hi साथ रोहित के भी ..............काव्य वहीँ जमीन पर नंगी लेती हुई थी और रोहित उसके बदन पर चढ़ा हुआ उसकी बुर में अपना लुंड पेले हुए आहिस्ता आहिस्ता से उसकी चुदाई कर रहा tha...........wahin काव्य के मुँह से हल्की हल्की सिसकारी भी फुट रही थी जो इस बारिश के मौसम में और भी आग लगा रही thi..............is तेज़्ज़ बारिश में काव्य की आहें भी घुटती जा रही thi...............ye दौर काफी लुम्बा चला और करीब 1 घंटे के बाद दोनों एक दूसरे पर ऐसे hi पड़े rahe.........apne दुरुस्त सांसों को संभालते हुए.............

बारसिह अब धीरे धीरे थमने लगी थी और काव्य को भी होश आ गया था की आज उसने जाने अजनाने में कितनी बड़ी भूल की hain..........pachtawa उसके चेहरे पर साफ़ नज़र आ रहा tha..........wo फ़ौरन अपने कपड़े समिति हैं और उसे पहनकर उसी बारिश में रोहित से बिना कुछ कहे सीधे अपने घर की तरफ चाल पड़ती hain................na hi रोहित के अंदर उसे रोकने की हिम्मत होती हैं ..............और न hi उससे कुछ पूछने ki..........aur न कुछ कहने ki.....................kavya को अपने किये पर पछतावा भी था मगर रोहित तो जैसे अब काव्य के लिए पागल हो गया था...............

उसकी बदन की khusboo............uska वो ehsaas.............wo बर्रिश के हसीं pal............wo चाहकर भी नहीं भूला पा रहा tha..........aise hi एक हफ्ता गुज़र गया और काव्य ने रोहित से बात तक नहीं ki..............wahin रोहित अब काव्य के लिए और भी बेचैन रहने laga.........aur आख़िरकार एक दिन जब उसे रहा नहीं गया तब उसने काव्य का हाथ फिर से पकड़ लिया और काव्य फिर से उसे सवालों भरी नज़रियों से देखने लगी..................

" ये की बढ़तमीज़ी हैं rohit..............main कहती हूँ छोड़ो मेरा हाथ............." और काव्य गुस्से से रोहित की तरफ देखने लगती हैं वहीँ इस बार न रोहति उसका कहा मंटा hain...............aur न hi उसका हाथ छोड़ता हैं............

" एक hi शर्त पर मैं तुम्हारा हाथ छोडूंगा kavya.............pehle तुम कहो की तुम भी मुहसे प्यार करती हो.............." और रोहित काव्य की आँखों में देखता हुआ धीरे से बोल पड़ता हैं वहीँ काव्य भी हौले से उसके सवालों का जवाब देती हैं............

" magar.........main प्यार नहीं करती तुमसे rohit............maine तुमसे पहले भी कहा था की मुझे इन सब चीज़ों में कोई दिलचस्पी नहीं................" और काव्य अपना हाथ छुड़ाते हुए बोल पड़ती हैं वहीँ इस बार रोहित भी उसका हाथ धीरे से छोड़ देता हैं...........

" तो उस दिन जो हमारे बीच हुआ क्या वो प्यार नहीं tha..............kya कोई किसी से प्यार किये बगैर hi उसके साथ ये सब कर सकता hain..............bolo..........jawab दो..............." और रोहित थोड़ा उदास होता हुआ धीरे से बोल पड़ता हैं वहीँ काव्य कुछ देर की ख़ामोशी के बाद आगे बोलना शुरू करती हैं..........

" उस दिन जो कुछ भी हुआ जाने अनजाने में hua..........main बहक गयी thi............aur तुम bhi......uske लिए ीाम सॉरी ........rohit................tum भी ाची तरह से जानते हो की हालत कैसे बन गए थे हमारे beech............us दिन का मुझे भी पछतावा hain................aur ये तुमसे किसने कह दिया की सेक्स हो जाने के बाद प्यार भी उसी से किया जाता hain...........viashyawon के साथ भी तो लोग सेक्स करते हैं मगर लोग उनसे प्यार तो नहीं करते na...............common yaar..............sex और प्यार में बहुत फर्क होता hain.............ye कोई ज़रूरी तो नहीं की लोग जिसके साथ सेक्स करे उसी से प्यार भी करते rahe.............agar ऐसा चलता रहा तो न जाने हर रोज़ कितनी लडकियां या कितने लड़के न जाने किस्से किस्से प्यार करते firengey.................main नहीं मानती प्यार जैसी बेकार सी चीज़ ko............grow उप rohit..............tum मॉडर्न युग में जी रहे ho...............to ऐसी छोटी छोटी चीज़ों को दिल पे मुट्ठ lo............aur लाइफ को फुल्ली एन्जॉय करो.............." और काव्य मुस्कुराते हुए रोहित की तरफ देखने लगती हैं वहीँ रोहित की गुस्से से आँखें लाल हो जाती हैं............

कंटिन्यू...........................................................
 
अपडेट- 66 (बी) (मेघा अपडेट)

" तुम्हारे लिए ये कोई मज़ाक होगा kavya.......................lekin मेरे लिए nahin.................sach तो ये हैं की मैं अब तुम्हारे बगैर जी नहीं sakta............tum तो ऐसे कह रही हो जैसे कोई बाजार की रंडी कहती hain.............aaur तुम कोई रंडी नहीं हो kavya...............ki सेक्स किसी और से करो और प्यार किसी और se..............aaj रात मैं तुम्हारे आने का इंतज़ार करूँगा kavya..............agar आज की रात तुम मुझसे मिलने नहीं आयी to.............kal को तुम मेरा मारा मुँह dekhogi.............aab फैसला तुम्हारे हाथ में हैं की तुम मेरी ज़िन्दगी चाहती ho................ya फिर मेरी maut...........aur haan..........isey तुम मज़ाक में मुट्ठ lena.............main बोलने वालों में से नहीं हूँ.............. चलता हूँ अब............" और रोहित इतना कहकर काव्य के जवाब का इंतज़ार किये बगैर सीधा अपने रास्ते पर चल पड़ता hain...............wahin कुछ दूर पर कड़ी उसकी सहेली में से सना आगे बढ़ती हैं और काव्य का हाथ कसकर झटकती हैं.............

" kavya................rok ले तू usey..............kahin वो सच में ऐसा न कर baithey..............agar उसने अपनी जान दे दी तो................" और सना डरते हुए अपनी बात धीरे से अपनी जुबान पर लती हैं वहीँ काव्य उसकी बाटिओं को सुनकर मुस्कुरा देती हैं...........

" तू भी ऐसे लोगों की बाटिओं में आ गयी sana..........ye सब बस कहना जानते hain...........kuch करना nahin..........dekhna कल ये फिर आएगा और फिर से नया नाटक karega............aur ये प्यार व्यार सब बकवास हैं yaar.............sex करो और कपड़े की तरह लड़के बदलते raho............wo सब भी खुस ...............और हम भी khus............ye लड़की फंसने के नए नए ट्रिक hain............tu नहीं समझेगी......." और काव्य हँसते हुए वहां से सना का हाथ पकड़ती हुई सीधा उस कॉलेज कैंपस की ओरे चल पड़ती हैं वहीँ कुछ दूर पर खड़ा प्रशांत ये सब नाटक देख रहा था.............

उसी shaam....................rohit और प्रशांत दोनों नशे में धुत they...............halanki इतने दिनों से प्रशांत ने रोहित से ाची खासी दोस्ती कर ली thi.........kyon की उसके अंदर टीश थी रोहित के prati..............ander hi अंदर वो रोहित से छिड़ने लगा tha..............wo तो जैसे उसके रास्ते का काँटा बन गया tha..............ek वजह ये भी था की उसने काव्य के बदन को भोग भी लिया था और प्रशांत को अब तक कुछ नहीं मिला tha................is वजह से उसका गुस्सा रोहित के प्रति और बढ़ गया था..............

" वो नहीं आएगी rohit.................sach कहती हैं वो .............की वो तुझसे प्यार नहीं karti..............ek काम kar..............tu उसे भूल jaa..............aur अपने लिए कोई और लड़की तलाश कर ले............." और इस बार प्रशांत उसके कंधे पर हाथ रखता हुआ ........थोड़ा मायूस होता हुआ धीरे से बोल पड़ता hain..................wahin प्रशांत मुन्न hi मुन्न मुस्कुरा रहा tha..............shayad अपनी जीत पे...........

" अगर वो न मिली तो मैं इस ज़हर को पीकर अपनी जान दे dunga........................main कहने वालों में से नहीं hoon............karney वालों में से हूँ..........." और रोहित शराब के नशे में झूमता हुआ अपने दिल की बात उससे कहता हैं वहीँ प्रशांत उसकी तरफ देखता हुआ धीरे से मुस्कुरा पड़ता हैं...........

" तू भी औरों की तरह कहने वाला hi हैं मेरे dost...............karney वालों में से nahin..............agar तुझमें दम हैं तो इस शीशी में रखा ज़हर पीकर तो dikha.............main भी मान जावूंगा की तुझमें बहुत दम hain.......fir काव्य को तेरी होने से कोई नहीं रोक sakta.................aur तू फ़िक्र मुट्ठ kar..........agar तू इस ज़हर को पी भी लेता हैं तो मैं तुझे हॉस्पिटल pahunchawunga..............iski जवाब दरी meri............main तुझे किसी भी हाल में मरने नहीं देने wala................dost हैं तू mera...............main तुझे कैसे मरने दे सकता हूँ..........." और इस बार प्रशांत उस ज़हर की शीशी को रोहित के हाथों में धीरे से थमा देता हैं और बड़े गौर से उसकी तरफ एक तुक देखने लगता hain............wahin रोहित बड़े गौर से कभी उस ज़हर की शीशी की तरफ देख रहा tha...............to कभी प्रशांत के चेहरे की तरफ..............

" ठीक हैं prashant..............mujhe तुझपर पूरा भरोसा हैं............" और इतना कहकर रोहित उस शीशी का धाकन धीरे से खोलता हैं और प्रशांत की तरफ देखता हुआ उस ज़हर को अपने होंठों से लगता हुआ धीरे धीरे उसे अपने हलक के नीचे उतरने लगता हैं वहीँ प्रशांत मुन्न hi मुन्न मुस्कुरा पड़ता hain...............jis मकसद के लिए वो यहाँ आया था उसका मकसद अब पूरा हो गया tha........................uske रास्ते का काँटा अब हमेशा हमेशा के लिए दूर होने वाला tha..................rohti के हाथ तब तक नहीं रुकताते जब तक वो उस ज़हर को पूरा पी नहीं jata...............rohit के ज़हर पीते hi प्रशांत उसके तरफ देखता हुआ ज़ोरों से हंस पड़ता हैं.............

" hahahahaa............kisi ने सच hi कहा हैं की प्यार आधा होता hain.........aaj देख भी liya...............jaise तू हो गया हैं उस काव्य के प्यार mein..............arey काव्य को तो हासिल तब करेगा न जब तू खुद ज़िंदा rahega................chalo ाचा hua............jo तूने खुद hi ये ज़हर पी liya..........warna मैं तुझे ये ज़हर अपने हाटों से pilata.................kyon की तू अब मेरे रास्ते का कान्त बन गया tha...............kavya और मेरे बीच की deewar..................jo मुझे किसी भी कीमत पर हटानी thi...............aur तुझे क्या लगता हैं की मैं तेरी जान bachaunga...............kabhi nahin............tu यहाँ ऐसे hi तड़प तड़पकर marega................jin हाथों से तूने उसे चुवा था जी तो करता हैं की मैं तेरे वो हाथ काट doon.........magar आज एहि हाथ तेरी मौत की वजह भी बन gaye...........good bye मर rohit............aab उम्मीद करूँगा की तेरी मेरी मुलाकात कभी न हो.............." और प्रशांत अपने जूठे गिलास और शराब की बोतल को एक एक कर समेटने लगता है और अपने वो सरे निशान मिटाने लगता हैं जो वहां उसके मौजूदगी के होने की सबूत they................wahin रोहित फर्श पर तड़पता हुआ गिर पड़ता हैं और दर्द से चीखने चिल्लाने लगता हैं...............

धीरे धीरे उसके जिस्म नीला पड़ता जा रहा tha..................aur आँखें और उसकी सांसें अब धीरे धीरे बंद होने लगी thi...........dheere धीरे उसका जिस्म मौत के आगोश में समता जा रहा tha...............prashant उसकी तरफ देखता हुआ मुस्कुराये जा रहा था और एक एक कर सरे सबूत को साफ़ भी करता जा रहा tha..............fir वो रोहित की तरफ देखता हुआ मुस्कुराता हैं और उस कमरे से बहार चला जाता hain..............aur कुछ देर में रोहित का जिस्म तड़पकर बिलकुल शांत हो जाता हैं............

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ये खबर गुडगाँव में आयी थी की रोहित ने काव्य के लिए सुसाइड किया tha...............magar इस घटना के पीछे प्रशांत का पूरा पूरा हाथ tha.............kavya तो पूरे कॉलेज में बदनाम हो गयी थी और सभी लड़के लडकियां उसे ताने देते rehtey.............halanki उसकी निजी लाइफ में भी इसका असर हुआ था मगर गुज़रते वक़्त के साथ साथ सब ठीक हो gaya...........kareeb 4 महीने तक किसी को कानों कान खबर भी नहीं हुई............. और ये केस सुसाइड केस बनकर इसे क्लोज कर दिया gaya..............magar इस घटना को बीते अभी 4 महीने hi हुए थे तभी काव्य को दूसरा बड़ा झटका लगने वाला tha....................prashant के रूप में.............

14 फेब्रुअय का दिन tha..............prashant आज फिर से काव्य को प्रोपोज़ करने वाला tha..............aur उसे काव्य को प्रोपोज़ भी किया मगर काव्य का वहीँ जवाब aaya..............humesha की तरह naa..............shaam होते होते उसने काव्य को उठवला लिया और सीधा अपने फ्लैट पर उसे ले गया...........15 मंज़िल pe...............jahan वो अकेले रहता tha................wahin काव्य प्रशांत के इस बर्ताव से भड़क गयी थी..........

" ये क्या बढ़तमीज़ी हैं prashant............maine कह दिया सो कह diya.............main नहीं करती तुमसे प्यार............" और काव्य जैसे प्रशांत की तरफ देखती हुई अपना आखरी फैसला सुनती हैं वहीँ प्रशांत का चेहरा और भी उदास हो जाता हैं...........

" ठीक हैं अगर तुम्हारा फैसला ना हैं तो एहि sahi.................magar ये भी सच हैं की मैं तुम्हारे बगैर जी नहीं sakta.............itne दिनों से तुमने जो मेरे साथ दिल्लगी की उसका kya.............main तो अब इस दुनिया में नहीं रहूँगा मगर जाते जाते तुम्हें भी यहाँ से बदनाम करके jawunga..............tum अब बेशक चाहे तो जा सकती ho.............magar मेरी मौत की वजह सिर्फ तुम hogi...............sirf tum.........main अब इस बुलिडिंग से कूदने जा रहा हूँ............." और प्रशांत फिर से दारू अपने मुँह में लगाकर पीने लगता हैं वहीँ काव्य गुस्से से उस कमरे से बहार निकल जाती हैं............

" मरना हैं तो maro...........mujhe kya.............main नहीं ावुंगी तुम्हें रोकने............" और इस बार काव्य उस कमरे का दरवाज़ा कसकर बंद करती हैं और उस लिफ्ट में चढ़कर नीचे उतरने लगती hain..............aabhi वो लिफ्ट से नीचे उतर hi रही थी तभी प्रशांत धीरे धीरे अपने कदम आगे बढ़ता हैं और जैसे hi वो उस बिडिंग के किरणे पहुँचता हैं उसके चेहरे पर एक मुस्कान फिर से तेज़्ज़ हो जाती हैं...............

मरना तो वो अब चाहता था मगर उसके अंदर हिम्मत नहीं हो रही thi.........bade मुश्किलों से वो थोड़ी हिम्मत करके फिर से आगे बढ़ता हैं और फिर हौले से अपनी दोनों आँखें मूँद लेता हैं और फ़ौरन नीचे की तरफ कूद पड़ता hain.............kuch देर तक उसका जिस्म हवा में लहराता hain.............aur आखिर हवा में लहराने के बाद उसका जिस्म जमीन पर गिरकर हमेशा के लिए शांत हो जाता हैं..............

काव्य जब नीचे पहुंचती हैं तो भीड़ देखकर वो फ़ौरन वहां से अपने आपको छुपकर अपने घर की तरफ चल पड़ती hain................usney प्रशांत की लाश को देखा था और वो जानती थी की आएगी उसके साथ क्या हो सकता hain.............poorey रास्ते भर उसका जिस्म दुर्र से थार थार कांपता रहा और एक दो दिन के अंदर उसके माँ बाप ने उसकी शादी भी कहीं और तय कर दी थी जिसके वजह से उसे अपनी पढ़ाई बीच में छोड़नी padi...........aur साथ hi ये सेहर bhi.............uske हालात उसके माँ बाप भी ाचे से समझ रहे they............ki काव्य के लिए क्या सही hain............aur क्या galat................kyon की वो ाचे से जानती थी की इस सेहर में रहकर उसका अब कुछ भला नहीं होने wala..............is लिए वो अपनी ज़िन्दगी अब नए सिरे से जीना चाहती थी सब कुछ भूलकर..................

उस सेहर से कहीं दूर rehkar...........jahan उसके अतीत कभी उसका पीछा न कर sake..............magar काव्य शायद ये भूल गयी थी की इंसान का अतीत और गुज़ारे हुए यादें एक ऐसी निशान छोड़ जाते हैं जो कभी भुलाये नहीं bhooltey............aur ज़िन्दगी कभी कभी ऐसी करवट ज़रूर बदलती हैं जहाँ पे इंसान अगर न जाना चाहे फिर भी उसे वहां पर एक बात तो लौटना hi पड़ता hain.............kuch ऐसे hi आज काव्य के साथ भी हो रहा था.......................

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बिस्टेर पर लेते लेते वो अतीत के एक उन पन्नों को फिर से याद कर रही थी जिसे वो कभी दुबारा से याद नहीं करना चाहती thi.............aur न hi कभी किसी से इस बारे में ज़िकरा करना चाहती thi................magar संजोग देखो की आज काव्य फिर से उसी मोड़ पर दुबारा से कड़ी थी जहाँ वो उस मोड़ को कभी बहुत पहले कहीं दूर पीछे छोड़ आयी thi..............ek बार फिर से उसे ये सफर अब अकेले तय करना tha.............chahe जैसे ho................chahe उसे अब कोई भी कीमत क्यों न चुकानी pade................aab वो पीछे हटने वाली नहीं thi........................kisi भी कीमत पर नहीं................................

टिल कॉन्टिनोएड........................................................
 
अपडेट- 67 (ा) (मेघा अपडेट)

बिस्टेर पर लेते लेते वो अतीत के एक उन पन्नों को फिर से याद कर रही थी जिसे वो कभी दुबारा से याद नहीं करना चाहती thi.............aur न hi कभी किसी से इस बारे में ज़िकरा करना चाहती thi................magar संजोग देखो की आज काव्य फिर से उसी मोड़ पर दुबारा से कड़ी थी जहाँ वो उस मोड़ को कभी बहुत पहले कहीं दूर पीछे छोड़ आयी thi..............ek बार फिर से उसे ये सफर अब अकेले तय करना tha.............chahe जैसे ho................chahe उसे अब कोई भी कीमत क्यों न चुकानी pade................aab वो पीछे हटने वाली नहीं thi........................kisi भी कीमत पर नहीं................................

अब आगे.................................................................

काव्य का दिमाग इस समय हज़ारों सवालों जवाब में उलझा हुआ tha.........................aaj से पहले उसने जो बातें कभी गौर नहीं की थी आज एक एक कर साडी बातें वो सोच रही thi.............uspar गौर कर रही थी...............

" मेरा अंदाज़ा जहाँ तक कहता हैं की रघु ने ज़रूर जीतू को अपने साथ मिलने के लिए कोई न कोई झूठी कहानी उसे सुनाई hogi............apne बेटे के बारे में उसने ज़रूर कुछ न कुछ उसे बताया होगा और मेरे खिलाफ उसने उसे भी भड़काया hoga................tabhi वो उसके कदम से कदम मिलकर चल रहा hain...............khair जो भी हो वो तो आने वाला वक़्त hi बताएगा की कौन सही hain..................aur कौन गलत..............

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दूसरे दिन राम नाश्ता करके सीधा अपने कॉलेज चला जाता hain.................sharmiley स्वाभाव के कारन वो सना से ज़्यादा खुलकर बात नहीं कर रहा tha............aur न hi उसके करीब जा रहा tha.............raat में भी वो खाना खाकर सीधा अपने कमरे में चला गया tha............halanki उसे सना बहुत ाची लगती थी मगर झिझक की वजह से वो उससे दूरी बनाये rakhta............agar काव्य इस वक़्त होती तो बात कुछ और thi..................magar सना भी जानती थी की उसे कैसे काबू में करना हैं.............

राम के बहार निकलते hi सना भी उसके पीछे पीछे बहार तक आ जाती hain.........usey chodhney...........bus में बैठते hi सना अपने हाथों को हिलाते हुए उसे bye करती हैं वहीँ राम के चेहरे पर एक प्यारी सी स्माइल आ जाती hain...........jawab में सना भी उसकी तरफ देखकर मुस्कुरा पड़ती hain..........ye सब नज़ारा अंदर बैठे रघु और जीतू बड़े गौर से देख रहे they.................wahin कुछ सोचकर रघु के चेहरे पर एक कमीनी सी मुस्कान फिर से तैर जाती hain................aur वो जीतू को फिर से सना के पास भेजता hain..........wahin जीतू भी आज पूरे तैयारी के साथ मैदान में उतर गया tha................apni जीत की मकसद लिए.....................

" memsaheb...................kahiye तो मैं आपके रूम की अभी साफ़ सफाई कर दूँ.............." और इस बार जीतू अपने काळा पीले दांत दिखता हुआ धीरे से बोल पड़ता हैं वहीँ सना की जब नज़र उसपर पड़ती हैं वो उसे देखकर हौले से मुस्कुरा देती हैं.........

" अरे तुम!!!!!!!!!! क्या नाम बताया था तुमने apna............jjjjjjeeeeeeeee......haan याद आया......... jeetu...........bilkul कर दो अपना काम..........." और सना इतना कहकर फिर से अपने कमरे की तरफ चल पड़ती हैं वहीँ जीतू गन्दी सी मुस्कान लिए सना के पीछे पीछे चल पड़ता hain..........uski नज़र तो जैसे सना की गांड पर जाकर टिक गयी thi.............jo अब हटाए नहीं हुत्त रही thi..................sana के चलने से उसकी थिरकती हुई गांड ऊपर नीचे हो रही थी वहीँ जीतू बड़े गौर से उसकी सूट के बीच बन रहे उस दरार को ललचायी नज़रियों से देख रहा tha............sana कुछ दूर चलने के बाद जैसे hi पीछे की तरफ मुड़ती हैं उसकी नज़र जीतू के नज़र को फ़ौरन पहचान जाती हैं की जीतू इस वक़्त क्या देख रहा hain...............sharam से वो अपनी पलकें नीचे की तरफ झुका लेती हैं वहीँ जीतू उसकी तरफ देखता हुआ धीरे से हंस पड़ता हैं............

इस वक़्त सना ने ग्रीन कलर का टाइट सूट पहना हुआ था और नीचे उसने वाइट रंग की लग्गी पहनी हुई thi.....................in कपड़ों में उसके बदन का हर एक कटाव साफ़ साफ़ उजागर हो रहा hain...........wahin बीच बीच में जीतू अपने लौड़े को भी अपने कपड़े के ऊपर से बार बार एडजस्ट कर रहा था जो सना की नज़रियों से नहीं छुपा tha................wo हॉल में जाती हैं और जाकर सोफे पर आराम से बैठ जाती hain..................wahin जीतू झाड़ू उठता हैं और कमरे की साफ़ सफाई में जुट जाता हैं..............

" तुम यहाँ पर कितने दिनों से काम कर रहे हो...................." और सना जीतू की तरफ देखती हुई धीरे से बोल पड़ती हैं वहीँ जीतू के चेहरे पर एक बार फिर से कमीनी मुस्कान तैर जाती hain...............wo ऐसे hi कुछ मौके की तलाश में था..............

" जी कुछ महीनों se..............da-asal मेरा इस दुनिया में कोई nahin............main बिलकुल अकेला hoon............bus यहाँ रहकर इस घर की सेवा और देखभाल करता हूँ और अब तो मेमसाहेब भी हमें इस घर से बहार निकल rahi........pata नहीं हमारी किस्मत हमें अब कहाँ लेकर जाएगी............" और जीतू थोड़ा मायूस होता हुआ बोल पड़ता हैं वहीँ सना बड़े गौर से उसके चेहरे को एक तुक देखे जा रही थी............

" मगर वो क्यों!!!! तुमने hi कुछ उल्टा सीधा काम किया hoga............tabhi वो तुम्हें बहार निकल rahi........usney मुझसे जाते जाते कहा था की तुम लोगों से दूर रहने के liye............nahin तो मैं काव्य को बहुत ाचे से जानती हूँ वो ऐसी बिलकुल नहीं हैं.........." और सना जीतू को घूरते हुए बोल पड़ती हैं वहीँ जीतू फ़ौरन अपनी गुर्दें नीचे की तरफ झुकल लेता हैं.............

" सच तो ये हैं मेमसाहेब की हम गरीब का इस दुनिया में कोई nahin............jahan सू लिए वही हमारा बिस्टेर और जहाँ दो वक़्त की रोटी मिली वही हमारा ghar..........issey ज़्यादा और कुछ nahin..........aur गलती तो हो जाती हैं इंसान से ऐसे hi मुझसे भी गलती हो गयी इस वजह se............"aur जीतू बात बनता हुआ बोल पड़ता हैं वहीँ सना बड़े अजीब से उसके चेहे को देखे जा रही थी...........

" कैसी galti...............main कुछ समझी नहीं............." और सना गहरी सांस छोड़ते हुए आहिस्ता से बोल पड़ती hain............wahin जीतू कुछ देर चुप रहता हैं फिर वो आगे बोलना शुरू करता हैं...........

" आप तो शादी शुदा हैं तो आप ये बात ाचे से जानती होंगी की अकेले जीवन काटना कितना मुस्खिल काम hain..........aise hi एक दिन हम दोनों अपने कमरे में बैठे हुए चुदाई वाली किताबें देख रहे थे तभी मेमसाहेब वहां अचानक से आ गयी और हमें अपना लुंड हिलाते हुए देख liya........bus उस दिन से वो हमपर भड़क uthi...........aur हमें यहाँ से जाने को कह diya.............aab आप hi बताइये की इसमें हमारा क्या dosh............jawani में तो ऐसी गलतियां सभी करते hain...........aur हमारे पास तो औरत भी नहीं की हम उसके पास जाकर अपनी ये आग वहां ठंडी करे..............." और जीतू मुन्न hi मुन्न मुस्कुरा पड़ता hain............usney जान बूझकर " चुदाई " और " लुंड " जैसे शब्द का इस्तेमाल किया tha...............wo देखना चाहता था की सना उसके बाटिओं पर क्या रिएक्शन करती हैं............

" तुम्हें ज़रा भी शर्म नहीं आती की औरत के सामने तुम्हें कैसी बातें करनी chahiye..........sach में तुम पूरे ज़ाहिल ho........ganwar हो..........." और सना लुम्बी लुम्बी सांसें लेती हुई बोल पड़ती hain.............uska कलेजा ज़ोरों से धड़क रहा था जिससे उसकी बड़ी बड़ी चूचियां तेज़ी से ऊपर नीचे की तरफ हो रही थी ............जिन्हें अब जीतू बड़े गौर से देखे जा रहा tha.............bina अपनी नज़रें हटाए.............

" आपने सच कहा मेमसाहेब की हम जाहिल लोग hain...........agar हमें ज़रा भी तमीज होती तो हम कहीं बड़े जगह पर काम कर रहे hote...........aise किसी के घर पर नौकरी नहीं karte...........yu नौकर banke.............khair जब हमारी मेमसाहेब हमारे जज़्बातैव को नहीं समझी तो आप भला क्या samjhengi..............mujhe माफ़ कर दीजिये मेमसाहेब............" और जीतू अपने हाथ जोड़ता हुआ फ़ौरन वहां से जाने लगता हैं तभी सना फ़ौरन उसे रोक लेती हैं............

" नहीं jeetu...........aisi बात नहीं hain...........bus तुम अपनी लैंग्वेज भूल गए they.............main बात करुँगी काव्य से ............की तुम्हें यहाँ आगे भी रहने de.............waise एक बात poochun................tumhari बीवी का क्या hua..........mera matlab...........wo इस दुनिया में hi नहीं हैं या फिर तुम्हें कहीं छोड़ कर चली गयी..........." और सना जीतू की बाटिओं में दिलचस्पी दिखते हुए आगे बोल पड़ती हैं वहीँ जीतू भी मुन्न hi मुन्न खुस हो रहा था की उसके बिछाये हुए जाल में अब चिड़िया खुद बा खुद फंस रही हैं...........

कंटिन्यू.............................................................
 
अपडेट- 67(बी) (मेघा अपडेट)

" वो साली मुझे छोड़कर भाग gayi...............kyon की मेरा लुंड ज़्यादा मोटा और बड़ा हैं na.............sambhal नहीं सकीय ..........इस लिए मुझे छोड़ diya...........aab इसमें मेरा क्या dosh..............agar ऊपर वाले ने मेरा लुंड बड़ा बनाया हैं तो इसमें मैं क्या कर सकता hoon............maine सुना था की अगर लौड़ा जितना मोटा और बड़ा होता हैं औरत को उतना hi ज़्यादा मज़ा आता hain............magar लगता हैं ये सब बातें केवल अफवाह hain............bakwaas hain...........agar ये बात अगर सच होता तो मेरी औरत मुझे यु छोड़कर कभी न jati..............ye सब अपने अपने नसीब की बात हैं........." और जीतू अपने चेहरे पर उदासी के बदल लता हुआ फिर से मायूस होकर बोल पड़ता हैं वहीँ सना की सांसें बढ़ती जा रही थी................" लुंड " जैसे शब्द उसके तन बदन में आग लगाने का काम कर रहे they.............uski छूट में गीलापन भी बढ़ने लगा tha............jaise तैसे वो अपने सांसों को संभालने की पल पल कोशिश कर रही थी मगर ये सांसें भी अब बेकाबू होते जा रहे थे..............

" टटटूउम्मम्मम्म जावूऊऊ aaab...........yaaaahhhhaaannnn ससससीए.............." और सना जैसे तैसे अपनी बात ख़तम करती हैं वहीँ जीतू इस बार सना की तरफ देखता हुआ धीरे से मुस्कुरा देता हैं............

" memsaheb...........ek बात poochun..............agar मुझे इस वक़्त अपना लुंड हिलने का मुन्न हुआ तो क्या मैं उस किताब को देखकर अभी अपना लुंड हिला सकता hoon.............aapko कहीं ऐतराज़ तो नहीं..........." और जीतू थोड़ी हिम्मत करके दुबारा से सना को गरम करने लगता hain.............aab वो ाचे से समझ चूका था की सना को पाना अब ज़्यादा मुस्खिल काम नहीं hain..........wo अब बहुत जल्द उसके नीचे आने वाली hain..............wo उसकी बेचैनी को साफ़ मेहसूस कर रहा tha...........wahin सना की सांसें पल पल बेकाबू होती जा रही थी.........

" naaaaaaaaaaaaaahhhhhhin............tum जाओ ...........aaaaabbbbbbbbbbbbb......please.........." और सना तड़पती हुई आहिस्ता से बोल पड़ती हैं वहीँ जीतू इस बार कमीनी मुस्कान लिए फिर से हंस पड़ता hain........aur सीधा ऊपर के तरफ झाड़ू पुछा लेकर चल पड़ता hain...........wo ाचे से जनता था की इस वक़्त सना की बुर गीली हो चुकी hain............aur अब वो ऐसा कुछ करना चाहता तथा जिससे सना की रही सही हिम्मत भी टूट जाये............

जीतू ऊपर कमरे की साफ़ सफाई करने लगता हैं और बार बार नीचे बैठी सना की तरफ भी देखता रहता hain.............kareeb एक घंटे तक सना वहीँ सोफे पर बैठी रहती हैं और न जाने क्या क्या सोचती रहती hain...............jab एक घंटे में जीतू वापस नहीं आता तब सना को चिंता होने लगती हैं की आखिर ये इतने देर से ऊपर कर क्या रहा hain.............sana कुछ सोचकर अपने जगह से उठती हैं और ऊपर की तरफ एक नज़र डालती hain.............magar उसे जीतू कहीं नज़र नहीं आता.............

वो कुछ सोचकर फ़ौरन ऊपर की तरफ जाने लगती hain..............durr और घबराहट से उसके दोनों पवन बुरी तरह से काँप रहे they................jaise जैसे वो ऊपर की तरफ जा रही थी वैसे वैसे उसकी दिल की धड़कनें भी बढ़ती जा रही thi................jab वो ऊपर पहुँचती हैं उसे जीतू कहीं नज़र नहीं aata...............wo एक एक कर सरे कमरे में जाती हैं और जब वो आखरी के कमरे में घुसती हैं तो सामने का नज़ारा देखकर उसकी आँखें फटी की फटी रह जाती हैं...........

जीतू अपनी आँखें सामने राखी फर्श पर उस किताब की तरफ देखते hue.........apne पेण्ट और अंडरवियर को उतरे हुए ............अपना एक हाथ लगातार अपने लुंड पर चलाये जा रहा tha.............ya यु कहो की वो तेज़ी से अपने हाथ हिलता हुआ मुठ मार रहा tha....................is वक़्त उसका खड़ा लुंड सना की आँखों के बिलकुल सामने tha...........jo सना फटी आँखों से बस जीतू के काळा गंदे लौड़ा को बस देखती जा रही thi...............uski रही सही हिम्मत भी जवाब दे गयी thi...........wo जीतू से कुछ नहीं बोलती और फ़ौरन ुटले पवन वहां से वापस अपने कमरे की तरफ भगति हुई आती hain............magar जीतू उसके आने और जाने की आहात पहचान चूका tha.............wo अब ाचे से समझ चूका था की सना ने उसे मूठ मरते हुए देख लिया हैं.........

ये ख्याल आते hi एक बार फिर से सना का हसीं बदन उसकी आँखों के सामने नज़रर आने लगता हैं और उसके हाथ तेज़ी से और भी अपने लुंड पर चलने लगते hain..........kuch सेकण्ड्स hi गुज़ारे होंगे की उसके लुंड से फौव्वारा चूत पड़ता हैं जो की कुछ बूँद उस किताब par.......to कुछ सामने फर्श पर गिर पड़ता hain..............aur जब जीतू को होश आता हैं तो वो अपने कपड़े समेटता हुआ दुबारा से बाथरूम में घुस जाता हैं और आकर उस फर्श को फिर से साफ़ करता हैं जहाँ पर उसका छुम गिरा हुआ tha...........fir वो उस किताब को वहीँ बंद करके वहीँ रख देता हैं और वापस नीचे चला आता hain.............jahan सना अपने कमरे में लेती हुई ये सब अभी भी सोच रही थी...........

बार बार उसकी आँखों के सामने जीतू का मोटा कला नाग नज़र आ रहा tha.............wahin उसकी छूट में गीलापन भी बढ़ता जा रहा tha...........jeetu की आवाज़ सुन्करर वो फ़ौरन अपने बीएड से उठती हैं और बहार आती hain.........aur जब उसकी नज़र जीतू पर पड़ती हैं एक बार फिर से उसके चेहरे पर धरम की लखीरें साफ़ नज़र आने लगती hain...........sharam से वो दुबारा अपनी नज़रें नीचे की तरफ झुका लेती हैं.............

" memsaheb................chalta हूँ aab............maine सारा काम ख़तम कर दिया..........." और जीतू सना के जवाब की परवाह किये बगैर hi वहां से चला जाता हैं वहीँ सना एक शब्द कुछ नहीं बोल पति और जीतू को यु अपने से दूर जाता हु बस देखती रहती hain.................uska दिल इस वक़्त बहुत ज़ोरों से धड़क रहा था जिससे उसकी सांसें तेज़ी से ऊपर नीचे की तरफ हो रही thi...........jeetu के जाते hi वो थोड़े देर बाद बहार आकर मैं दूर का दरवाज़ा बंद करती हैं और कुछ सोचकर फिर से वो ऊपर की तरफ जाने लगती हैं जहाँ पर जीतू बैठा हुआ मूठ मार रहा था................

जब सना उस जगह पर पहुँचती हैं तो उसके चेहरे पर हैरानी के बदल फिर से नज़र आने लगते hain.......kyon की सामने वही किताब बंद पड़ी हुई राखी थी जहाँ जीतू अभी कुछ देर पहले बैठा मूठ मार रहा tha...................sana फ़ौरन उस किताब को अपने हाथों में उठा लेती हैं और इधर उधर देखने लगती hain...............jab उसे कोई नज़र नहीं आता वो फ़ौरन उस किताब को लेती हुई सीधा अपने कमरे में चली आती hain.............is वक़्त उसकी दिल की धड़कनें और भी तेज़्ज़ हो गयी thi...............dil तो ऐसे धड़क रहा था मनो कलेजा अभी बहार को आ jayega..............baar बार उसका गाला सूखने लगा tha.............bechaini और घबराहट साफ़ उसके चेहरे पर नज़र आ रही थी.................

जब वो अपने कमरे में पहुँचती हैं वो फ़ौरन अपने कमरे का दरवाज़ा बंद कर लेती हैं और धड़कते दिल से वो उस किताब को अपने बिस्टेर पर रखकर धीरे धीरे उस किताब के एक एक पानीय को पलटना शुरू करती hain.............jaise जैसे वो उस किताब के पन्नों को पलट रही थी वैसे वैसे उसकी बुर में गीलापन भी बढ़ता जा रहा tha............us किताब में कई साडी लडकियां अध्नंगी हालत में अलग अलग पोज़ में कड़ी थी मगर किसी भी लड़की का फुल नुदे फोटो नहीं tha..............aur न hi उसमें कुछ चुदाई की कोई ऐसी तस्वीर thi.......magar जो भी थी ये सना को गरम करने के लिए बस काफी थी...........

वो धीरे धीरे उस पानीय को पलट रही थी साथ hi साथ अपने कपड़े को भी उतरती जा रही thi.........kuch hi मिनटों में उसके सरे कपड़े एक एक कर उतरते चले जाते हैं और उसके हाथ तब तक नहीं रुकते जब तक की उसके जिस्म से पूरा कपडा नहीं उतर jata............fir वो आहिस्ता आहिस्ता से अपने चूचियों पर अपने हाथों को ले जाती हैं और उन्हें ाहहिस्ता आहिस्ता से मसलने लगती hain............wahi अपने दूसरे हाथों को नीचे की तरफ ले जाती हैं और बहुत आहिस्ता से अपने बुर पर धीरे धीरे से फेरने लगती hain............sehlaney लगती हैं..........

वहीँ उसका जिस्म अब धीरे धीरे गरम होता जा रहा tha............uske मुँह से लगातार आवाज़ें और सिसकारी फुट रही थी जो उस माहौल को और भी कटीलानं बनती जा रही thi............dil की धड़कने औरर तेज़्ज़ होती जा रही thi.........jaise hi वो उस किताब के बीच पानों पर पहुँचती हैं उसे उस किताब में कुछ सफ़ेद सा चिपचिप्सा सा नज़र आता hain...........jo दोनों बगल उस किताब के बंद हो जाने से लग गया tha.............ye जीतू का hi कुछ छुम था जो उसके लुंड से मूठ मरने के दौरान निकला tha............magar वो काफी हुड्ड तक अब सूख चूका था मगर अभी भी उसमें थोड़ा बहुत चिपचिपा सा tha...........sana फ़ौरन अपने हाथों को उस गीली जगह पर ले जाती हैं और कुछ चिपचपीसा सा दाग अब उसके उँगलियों पर भी लग जाते हैं जिन्हें वो अपने नाक के पास दुबारा से अपने उँगलियों को ले आती हैं और फिर से उसे सुनहगने लगती हैं............

और उसे समझते ये देर नहीं लगती की ये चिपचपीसा सा चीज़ आखिर हैं kya!!!!!ye यकीनन जीतू का छुम hi हैं जब वो मूठ मरते वक़्त कुछ इन पन्नों पर भी गिरा tha.............ye ख्याल आते hi सना तेज़ी से पाने बुर में एक ऊँगली अंदर डालती हैं और फिर अपनी उँगलियों को धीरे धीरे से रगड़ना शुरू करती hain..........aur साथ hi साथ जीतू के छुम को भी अपने नाक के पास सूंघती रहती hain.............na जाने क्यों वो अब मदहोश सी होने लगी थी ..............ढर्रे धीरे उसकी बेचैनी बढ़ती जा रही thi............kuch देर तक वो जीतू के उस छुम को अपने नाक से सूंघती रहती हैं फिर कुछ सोचकर वो उस छुम को अपने होंठों पर ले जाती हैं और फिर आहिस्ता से अपने मुँह को खोल देती hain............aur दुबारा से उसे चटनी लगती hain..............uske स्वाद को अपने मुँह में मर्हसूस करने लगती हैं...............

सना का जिस्म किसी आग के भाटी के सामान टप्प रहा tha..............dheere धीरे उसकी उँगलियों की रफ़्तार और तेज़्ज़ होती जा रही thi............sansein उसकी ूकधान्य लगी thi............dil की दहाड़ने पूरे उफान पर thi............wo अपने उँगलियों को बहुत तेज़ी से अपने छूट के अंदर बहार कर रही thi.............ye सिलसिला ज़्यादा देर तक नहीं चला और आखिर सना की सांसें उखाड़ने lagi..............uska जिस्म पसीने से बुरी तरह भीग गया था....................

उसकी उँगलियाँ उसके छूट रूस में बुरी तरह से सं चुकी thi............wahin कुछ उसकी छूट से बेहटा उसका रूस उसके छूट के रास्ते बेहटा हुआ उसके टांगों पर भी बह रहा tha.................reh रहकर उसके दिमाग में जीतू की वो बातें और उसका लुंड बस घूम रहा tha................uske मुँह से लगातार उसकी सिसकारी aaaaaaaaaaaaaasssssssssssssssssshhhhhhhhhhhhhh................aaaaaaaaaaaaaaaaaaaaiiiiiiiiiiiiiiii......jaisi आवाज़ें निकल रही thi............waise सना भी अपनी छूट को हमेशा साफ़ रखती thi..................kavya की तरह उसका जिस्म भी गोरा और साफ़ सुथरा tha...........guzarte वक़्त के साथ साथ सना की आहें भी तेज़्ज़ होती चली gayi........aur धड़कनें bhi........aur आखिरकार उसके छूट से ढेर सारा रूस निकल पड़ा और वो वहीँ बिस्टेर पर निढाल होकर लेट gayi...............aur अपने दुरुस्त हो रहे सांसों को पल पल संभालने lagi..............kafi देर तक वो अपनी दोनों आँखें बंद कर लेती rahi.............aur न जाने की क्या सोचती रही...............

सच तो ये था की उसे अख्तर की कमी आज महसूस हो रही thi............magar वो खुद इतनी गरम थी की अख्तर भी उसे सही से संभल नहीं पता tha.................aur ना ठीक से उसकी छूट की आग को बुझा पता tha.............magar जो भी था जैसा भी था वो अख्तर से खुस thi............thode देर बाद वो न जाने कुछ सोचकर मुस्कुरा पड़ती हैं और वो उस किताब को वहीँ अपने बीएड के नीचे रखकर सीधा बाथरूम में नहाने चले जाती hain..................aur काफी देर तक ठन्डे पानी से अपने गरम जवानी को शांत करने की कोशिश करती रहती हैं मगर ये पानी तो और भी उसकी आग को बढ़ाका रहा tha...................dekhna था की आगे सना कब तक अपनी इस जवानी को काबू में कर पति हैं..............................

टिल कॉन्टिनोएड...............................................
 
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