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अपडेट-55 (ा) (मेघा अपडेट)
अभी भी वो लुम्बी लुम्बी सांसें ले रही थी .........वहीँ उसकी बुर से बेहटा रघु का मूट अब धीरे धीरे बहार की तरफ बेहटा जा रहा tha............kareeb 5 मिनट तक काव्य पर जैसे एक नशा सा चाय रहता हैं और जब उसे होश आता हैं वो फ़ौरन उठकर बैठ जाती hain..........raghu उसी के तरफ देखता हुआ मुस्कुराये जा रहा tha...........wahin काव्य के चेहरे पर शर्म की लखीरें भी अब नज़र आने लगी thi...........magar ये शर्म अब सिर्फ नाम के लिए मात्रा रह गयी thi............kyon की इससे बड़ा बेशर्मी का जीता जगता उदाहरण और भला हो भी क्या सकता tha..............................dekhna था की अभी ये सिर्फ एक हुड्ड hain.................................ya हुड्ड की एक शुरुआत...............................................
अब आगे..........................................................................
काव्य पर तो जैसे जवानी का नशा ज़ोरों पर चाय tha.................wo इस वक़्त सब कुछ भूल चुकी थी की उसके लिए क्या सही हैं aur............kya galat....................bus होश इतना था की वो अपने बुर में उठ रहे उस प्यास ko...................kisi भी कीमत पर शांत करना चाहती thi..........chahe उसके लिए उसे कोई भी कीमत क्यों न चुकानी pade..........usey सब मंज़ूर tha...........wo आज अपने कदम पीछे नहीं हटाने देना चाहती थी...........
रघु तो जैसे काव्य की बुर में मूतने का पूरा पूरा मज़ा ले चूका tha........magar कहीं न कहीं अब जीतू को भी इस बात की खटक सी होने लगी thi.........ki उसके जगह पर आज वो क्यों नहीं tha.............magar रघु की वजह से वो अपने इच्छाओं को पूरा नहीं कर पा रहा tha........is वजह से वो अब अंदर hi अंदर रघु पर छिड़ने लगा tha.........aur काव्य की ऐसी बाटिओं से उसका रहा सहा गुस्सा भी अब और भड़क गया था.......
" तुम तो मेरी जान हो raghu.............main तुम्हारी ख़ुशी के लिए आज सब कुछ करने को तैयार hoon...........bus एक बार तुम हुकुम तो karo.........dekhna तुम्हारी ये दासी तुम्हारे हर इशारों पर नाचेगी........" और काव्य रघु की तरफ प्यार से देखती हुई धीरे से हंस पड़ती हैं वहीँ जीतू गुस्से से अपना मुँह दूसरी तरफ फेर लेता हैं और अगले hi पल फ़ौरन बोल पड़ता हैं..........
" हाँ haan............tumhare लिए तो बस रघु hi सब कुछ hain.........main कुछ nahin............kitna भी हैं तो वो तुम्हारा ख़ास हैं na........uski इच्छा उसके सपने ...............सब अपने hain.......aur हमारी इच्छा का कोई मोल nahin............hum तो बस रघु के इशारों पर नाच रहे hain..........jaisa वो चाहेगा हम karnegey.........agar उसका मुन्न हुआ तो हमें तुम्हें छोड़ने को milega.......nahin तो बस अपने आँखों से तुम्हारी चुदाई देखते हुए बस अपना घंटा हिलाते rahengey.............yehi न..........." और जीतू के चेहरे पर नज़रगी के भाव उमड़ पड़ते hain...........wahin इससे पहले रघु कुछ बोलता काव्य बीच में बोल पड़ती हैं.........
" तुम न jeetu...............poorey पागल ho...........maine तुम्हें कभी किसी चीज़ के लिए मन किया हैं क्या!!!!!!! कब तुमसे ये कहा की रघु जो चाहे मेरे साथ करे और तुम वो न karo............nahin कहा na.........to फिर तुम ऐसा क्यों कहते हो........." और इस बार काव्य जीतू की तरफ देखती हुई धीरे से मुस्कुरा पड़ती हैं वहीँ जीतू गुस्से से काव्य को घूरे जा रहा tha.........wahin कुछ दूर पर बैठा रघु बिलकुल चुप tha........ussey कुछ समझ में नहीं आ रहा था की वो क्या bole...................aur जीतू को आखिर कैसे समझाए..................
" फर्क hain..........mere और रघु में बहुत फर्क hain.............agar वो तुम्हारी बुर के अंदर मूट सकता hain............to फिर मैं क्यों nahin.........kya मेरा मन नहीं हैं ऐसा करने का!!!!!!! और जीतू के दिल की बात जैसे उसकी जुबान पर आ जाती हैं वहीँ इस बार काव्य उसकी बाटिओं को सुनकर ज़ोरों से हंस पड़ती हैं.............
" बस इतनी सी baat.........to इस लिए तुम रघु se......aur मुझसे नाराज़ ho.............chalo मैं तुम्हारी ये नाराज़गी अभी दूर किये देती hoon...........magar पहले ये बताओ की मैंने कब तुम्हारे रघु और राम के बीच भेदभाव kiya............ram तो मेरी जान hain........to क्या मैं राम के लिए कुछ नहीं कर rahi............tum जो चाहते हो एक बार मुझसे मांग कर तो dekho...........agar न मैं उसे दे पवन तो फिर kehna...............aur रही बात तुम्हारे इच्छा की तो तुम एहि चाहते हो न की तुम भी रघु की तरह मेरी बुर के अंदर mooto.........to मैं तुम्हारी ये इच्छा अभी पूरी कर देती hoon............meri बुर hi क्या!!!!! अगर तुम मेरी गांड के अंदर भी मूतना चाहोगे तो भी मैं तुम्हें मन नहीं करने wali.......aur जो कुछ भी तुम्हारे मुन्न में हैं वो भी तुम मुझसे अभी बोल do........agar मेरे बस में रहा तो मैं वो सब कुछ करुँगी जो मैं रघु और राम के लिए करना चाहती हूँ............" और काव्य धीरे से मुस्कुराती हुई जीतू की तरफ देखने लगती हैं वहीँ इस बार रघु बोलना शुरू करता hain........aab जीतू शर्मिंदगी की वजह से पूरी तरह चुप था..............
" तू बहनचोद चुटिया hain............kya hain........chutiya...........maine तेरे लिए कितना मस्त प्लान सोच रखा था मगर तूने सब एक hi पल में गुड़ गोबर कर diya.........kahan मैं तुझे काव्य की गांड के अंदर मोटवाने की सोच रहा था और तू बस अभी तक वहीँ पे अटका पड़ा hain............tera कुछ नहीं होने wala..........jaa और अपनी ये इच्छा पूरी कर le.......jaa के मूट ले मेरी जान की बुर mein..........aagey से मैं तुझे कोई राइ मश्वरा नहीं देने wala.........tera जो दिल में आये सो करना........." और रघु इस बार जैसे भड़क उठता हैं वहीँ जीतू रघु के सामने माफ़ी मांगने लगता hain........aab उसकी भी ग़लतफहमी रघु के प्रति दूर हो गयी thi...........aab वो भी पूरी तरह से नार्मल हो गया था......
" चल मैं तुझे नास्ता करा देता hoon.....tujhe अब भूख लगी hogi.............naaste में बिस्कुट चलेगा naa.........agar घर में बिस्कुट नहीं हैं तो मैं अभी बहार से उसे मंगवा देता हूँ......." और रघु काव्य की तरफ देखता हुआ धीरे से बोल पड़ता हैं .......वहीँ काव्य हाँ में कहकर अपनी गुर्दें धीरे से हिला देती hain..........wahin सामने बैठा जीतू बिलकुल चुप tha..........aab उसके पास कहने के लिए कुछ बचा hi कहा था............
रघु फ़ौरन किचन में जाता हैं और एक शीशे की कतरौरी और एक स्पून (चमच) और एक मारिए गोल्ड की बिस्कुट का पैकेट लेकर आता हैं वहीँ काव्य उसके तरफ बड़े गौर से देख रही thi...........wo भी जानती थी की रघु अगर उसे बिस्कुट खिला रहा हैं तो वो कुछ न कुछ तो खुरापात उसमें ज़रूर सोच रखा होगा................
" आज मैं तुझे एक दम स्पेशल बिस्कुट खिलता hoon...........isey खाने के बाद तुझे मज़ा आ जायेगा................" और रघु उस शीशे की कटोरी में 5 बिस्कुट एक के ऊपर एक रखता चला जाता हैं और काव्य के तरफ देखता हुआ धीरे से मुस्कुरा पड़ता hain........wahin सबकी नज़रें अब उस बिस्कुट पर जाकर टिक गयी thi..........wahin पैकेट में अभी और भी कई साडी बिस्किट्स रखे हुए थे.......
" jeetu........aab यहाँ खड़ा खड़ा मेरा मुँह क्या देख रहा hain..........tujhe मूतना हैं न मेमसाहेब की बुर mein............to chal.......aakar मूट ले aabhi.........magar ये याद रहे की तेरी मूट बस थोड़ी सी निकालनी chahiye........jissey इसमें रखा बिस्कुट तेरे मूट के पानी से पूरी तरह से सं jaye.........aur मैं उसका पेस्ट बनाकर अपनी जान को खिला sakun.........khawogi न मेरी जान.............." और रघु काव्य की तरफ देखता हुआ फिर से हंसी लगता हैं वहीँ काव्य धीरे से हाँ में अपनी गुरनें हिला देती हैं..........
" अरे waah..............ye क्या बात hui.........apni बरी थी तो अपने आखरी कतरे तक तू मेमसाहेब की बुर में मूतता raha...........aur जब मेरी बरी आयी to......thoda सा बस मूट lena.........main कुछ नहीं janta..........jab तक मेरे लुंड का पानी की आखरी बूँद नहीं निकल जाती मैं अपने लुंड को मेमसाहेब की बुर में से नहीं निकलूंगा............" और जीतू थोड़ा चिढ़ते हुए फिर से बोल पड़ता हैं वहीँ इस बार रघु उसपर जैसे भड़क सा जाता हैं..........
" behanchod...............tujhe कभी अकाल आएगी भी या nahin...............theek हैं ........तू अब अपने रास्ते और मैं अपने raaste.........kar ले जो तुझे करना hain.........nikal ले भड़ास अपने दिल की .............वैसे भी तुझे तेरी मेमसाहेब कुछ बोलने वाली तो हैं nahin...........magar इतना याद रखना जो खेल तू मेरे साथ रहकर खेलेगा उस खेल में मैं तुझे मज़े की बुलंदियों तक pahuchaunga............main वो साडी चीज़ें करूँगा जो तेरा भी कभी सपना हुआ करता tha...........is लिए तू एक बार और ाचे से सोच समझ le.......aagey तेरी marzi...........aur हाँ अगर इसके बाद भी तू अगर बीच में न नुकुर किया to............fir मुझसे बुरा कोई नहीं होगा............." और इस बार जैसे रघु जीतू की तरफ देखता हुआ जैसे अपना फैसला सुनाता हैं वहीँ जीतू कुछ देर की चुप्पी के बाद आखिर रघु के पक्ष में आकर उसकी बात मान लेता हैं............
" ठीक hain..........khel तेरे हिसाब से hi chalega.............jaisa तू चाहता hain.........magar मुझे मज़ा नहीं आया to.........fir बाद में मैं अपने मुन्न की hi karunga..........fir मुझे तू दोष मुट्ठ देना.............." और इस बार जीतू धीरे से बोल पड़ता हैं वहीँ रघु अपना एक हाथ उसके कंधे पर हौले से रखता हुआ उसकी आँखों में देखने लगता हैं और फिर धीरे से मुस्कुरा देता हैं.......
फिर रघु आगे कहना शुरू करता हैं जिसे सुनने के बाद जीतू का चेहरा ख़ुशी से खिल उठता hain........wahin इस बार राम भी मुस्कुरा देता hain...........wahin दूसरी तरफ काव्य अब समझ चुकी थी की आज उसकी पूरी माँ छोड़ने का प्लान बन चूका hain..........khel चाहे जैसा ho.........jo भी खेल रहा ho..........ussey फर्क नहीं padta...........aakhir............fategi hi तो उसकी hi बुर और gand...........bus देखना ये था की वो इस खेल में ज़्यादा देर तक टिक पति हैं या सामने वाला .............खिलाडी.................
" अब तू उसी अंदाज़ में आकर यहाँ इसी डाइनिंग टेबल पर आकर चढ़ ja..........jis पोजीशन में मैं तेरे बुर के अंदर मूट रहा tha........theek वैसे hi अब जीतू भी तेरी बुर के अंदर mootega..........aur ये याद रहे की मूट का सारा पानी नीचे रखे इस बिस्कुट वाली कटोरी में गिरने chahiye........uske बाद तुझे मालूम हैं की तुझे क्या करना हैं.........." और रघु जैसे काव्य को आदेश देता हैं वहीँ काव्य फिर से अपने दोनों हाथ पीछे की तरफ करती हुई लेट जाती हैं और अपने बुर को हवा में ऊपर की तरफ उठा लेती hain.........aur अपने दोनों पवन पूरा फैला लेती hain.........jeetu अगले hi पल अपने सरे कपड़े पूरा उतर देता हैं और काव्य के टांगों के बीच अपना लुंड सेट करता हुआ उसके ऊपर चढ़ जाता हैं...........
इस वक़्त उसका लुंड भी अकड़ा हुआ tha............wo एक तेज़्ज़ ढाका मरता हैं जिससे उसका लुंड पूरा एक hi झटके में काव्य के बुर के अंदर समां जाता hain.......wahin काव्य की लाजत से आँखें बंद हो जाती हैं और उसकी चीख निकल पड़ती हैं .........और जब जीतू को एहसास होता हैं की उसका लुंड पूरा अंदर चला गया हैं वो अपने लुंड पर प्रेशर डालना शुरू करता hain.............lund थोड़ा खड़े होने की वजह से उसकी मूट जल्दी नहीं निकलती मगर थोड़ी म्हणत के बाद वो आखिर काव्य के बुर के अंदर मूतना शुरू करता hain.........wahin काव्य को अपने अंदर पानी इक्कठा होता हुआ सा महसूस होने लगता हैं.........
वो वहीँ ज़ोरों से सिसक पड़ती हैं और मज़े से उसकी आँखें बंद होने लगती hain............jeetu को भी बहुत मज़ा आ रहा था मगर जैसे तैसे वो थोड़ा सा मूतने के बाद अपना मूट अंदर hi रोक लेता हैं वहीँ काव्य के बुर से अब धीरे धीरे मूट नीचे की तरफ गिरना शुरू हो जाता hain.............pehle कुछ बूंदों के रूप mein...........fir एक तेज़ धार की रूप mein.......wahin काव्य का अब बुरा हाल tha.........uski प्यास बुझने के बजाये और भी भड़कती जा रही thi............aab उसे ये सब कण्ट्रोल नहीं हो रहा था..........
जीतू थोड़े देर तक अपने लुंड को काव्य के बुर के अंडे hi रखे रहता हैं फिर वो अगले पल अपना लुंड एक hi झटके में पूरा बहार खींच लेता हैं और जैसे हु उसका लुंड बहार आता हैं एक ज़ोर की ppppppppppphhhhhhhhhuuuuuuuccchhhhhhhhhhhhhhhhkkkkkkkkkkkkk की आवाज़ के साथ काव्य की आहें भी फुट पड़ती hain..........wahin उसकी बुर से ढेर सारा पानी नीचे उस कटोरे में रखे बिस्कुट में गिरने लगता hain........jo पानी की वजह से अब धीरे धीरे वो बिस्कुट घुलने लगा tha.......to कुछ मूट की बूँदें फिर से उस टेबल के इधर उधर गिरने लगती hain..........wahin काव्य तब तक अपनी बुर को वैसे hi फैलाये रहती हैं जब तक की उसके बुर से जीतू का मूट पूरी तरह से टपकना बंद नहीं हो jata............ye देखकर रघु काव्य की तरफ धीरे से मुस्कुरा देता हैं.......
" लावो ram..........aab ये कैमरा मुझे do............main इसे sambhlunga........aur जैसा मैंने कहा हैं वैसा karo.........tum भी अब पूरा नंगा हो जाओ और जाकर अपनी भाभी के साथ पूरे मज़े करो............." और इस बार रघु जैसे राम को हुकुम देता हैं वहीँ राम भी एक एक कर अपने सरे कपय निकलन शुरू करता हैं और देखते hi देखते वो भी पल भर में पूरा नंगा हो जाता hain.........udher जीतू काव्य को अपने गॉड में उठा लेता हैं और उसे उठाकर सामने के सोफे के तरफ ले जाने लगता हैं.........
कंटिन्यू.......................................................
अभी भी वो लुम्बी लुम्बी सांसें ले रही थी .........वहीँ उसकी बुर से बेहटा रघु का मूट अब धीरे धीरे बहार की तरफ बेहटा जा रहा tha............kareeb 5 मिनट तक काव्य पर जैसे एक नशा सा चाय रहता हैं और जब उसे होश आता हैं वो फ़ौरन उठकर बैठ जाती hain..........raghu उसी के तरफ देखता हुआ मुस्कुराये जा रहा tha...........wahin काव्य के चेहरे पर शर्म की लखीरें भी अब नज़र आने लगी thi...........magar ये शर्म अब सिर्फ नाम के लिए मात्रा रह गयी thi............kyon की इससे बड़ा बेशर्मी का जीता जगता उदाहरण और भला हो भी क्या सकता tha..............................dekhna था की अभी ये सिर्फ एक हुड्ड hain.................................ya हुड्ड की एक शुरुआत...............................................
अब आगे..........................................................................
काव्य पर तो जैसे जवानी का नशा ज़ोरों पर चाय tha.................wo इस वक़्त सब कुछ भूल चुकी थी की उसके लिए क्या सही हैं aur............kya galat....................bus होश इतना था की वो अपने बुर में उठ रहे उस प्यास ko...................kisi भी कीमत पर शांत करना चाहती thi..........chahe उसके लिए उसे कोई भी कीमत क्यों न चुकानी pade..........usey सब मंज़ूर tha...........wo आज अपने कदम पीछे नहीं हटाने देना चाहती थी...........
रघु तो जैसे काव्य की बुर में मूतने का पूरा पूरा मज़ा ले चूका tha........magar कहीं न कहीं अब जीतू को भी इस बात की खटक सी होने लगी thi.........ki उसके जगह पर आज वो क्यों नहीं tha.............magar रघु की वजह से वो अपने इच्छाओं को पूरा नहीं कर पा रहा tha........is वजह से वो अब अंदर hi अंदर रघु पर छिड़ने लगा tha.........aur काव्य की ऐसी बाटिओं से उसका रहा सहा गुस्सा भी अब और भड़क गया था.......
" तुम तो मेरी जान हो raghu.............main तुम्हारी ख़ुशी के लिए आज सब कुछ करने को तैयार hoon...........bus एक बार तुम हुकुम तो karo.........dekhna तुम्हारी ये दासी तुम्हारे हर इशारों पर नाचेगी........" और काव्य रघु की तरफ प्यार से देखती हुई धीरे से हंस पड़ती हैं वहीँ जीतू गुस्से से अपना मुँह दूसरी तरफ फेर लेता हैं और अगले hi पल फ़ौरन बोल पड़ता हैं..........
" हाँ haan............tumhare लिए तो बस रघु hi सब कुछ hain.........main कुछ nahin............kitna भी हैं तो वो तुम्हारा ख़ास हैं na........uski इच्छा उसके सपने ...............सब अपने hain.......aur हमारी इच्छा का कोई मोल nahin............hum तो बस रघु के इशारों पर नाच रहे hain..........jaisa वो चाहेगा हम karnegey.........agar उसका मुन्न हुआ तो हमें तुम्हें छोड़ने को milega.......nahin तो बस अपने आँखों से तुम्हारी चुदाई देखते हुए बस अपना घंटा हिलाते rahengey.............yehi न..........." और जीतू के चेहरे पर नज़रगी के भाव उमड़ पड़ते hain...........wahin इससे पहले रघु कुछ बोलता काव्य बीच में बोल पड़ती हैं.........
" तुम न jeetu...............poorey पागल ho...........maine तुम्हें कभी किसी चीज़ के लिए मन किया हैं क्या!!!!!!! कब तुमसे ये कहा की रघु जो चाहे मेरे साथ करे और तुम वो न karo............nahin कहा na.........to फिर तुम ऐसा क्यों कहते हो........." और इस बार काव्य जीतू की तरफ देखती हुई धीरे से मुस्कुरा पड़ती हैं वहीँ जीतू गुस्से से काव्य को घूरे जा रहा tha.........wahin कुछ दूर पर बैठा रघु बिलकुल चुप tha........ussey कुछ समझ में नहीं आ रहा था की वो क्या bole...................aur जीतू को आखिर कैसे समझाए..................
" फर्क hain..........mere और रघु में बहुत फर्क hain.............agar वो तुम्हारी बुर के अंदर मूट सकता hain............to फिर मैं क्यों nahin.........kya मेरा मन नहीं हैं ऐसा करने का!!!!!!! और जीतू के दिल की बात जैसे उसकी जुबान पर आ जाती हैं वहीँ इस बार काव्य उसकी बाटिओं को सुनकर ज़ोरों से हंस पड़ती हैं.............
" बस इतनी सी baat.........to इस लिए तुम रघु se......aur मुझसे नाराज़ ho.............chalo मैं तुम्हारी ये नाराज़गी अभी दूर किये देती hoon...........magar पहले ये बताओ की मैंने कब तुम्हारे रघु और राम के बीच भेदभाव kiya............ram तो मेरी जान hain........to क्या मैं राम के लिए कुछ नहीं कर rahi............tum जो चाहते हो एक बार मुझसे मांग कर तो dekho...........agar न मैं उसे दे पवन तो फिर kehna...............aur रही बात तुम्हारे इच्छा की तो तुम एहि चाहते हो न की तुम भी रघु की तरह मेरी बुर के अंदर mooto.........to मैं तुम्हारी ये इच्छा अभी पूरी कर देती hoon............meri बुर hi क्या!!!!! अगर तुम मेरी गांड के अंदर भी मूतना चाहोगे तो भी मैं तुम्हें मन नहीं करने wali.......aur जो कुछ भी तुम्हारे मुन्न में हैं वो भी तुम मुझसे अभी बोल do........agar मेरे बस में रहा तो मैं वो सब कुछ करुँगी जो मैं रघु और राम के लिए करना चाहती हूँ............" और काव्य धीरे से मुस्कुराती हुई जीतू की तरफ देखने लगती हैं वहीँ इस बार रघु बोलना शुरू करता hain........aab जीतू शर्मिंदगी की वजह से पूरी तरह चुप था..............
" तू बहनचोद चुटिया hain............kya hain........chutiya...........maine तेरे लिए कितना मस्त प्लान सोच रखा था मगर तूने सब एक hi पल में गुड़ गोबर कर diya.........kahan मैं तुझे काव्य की गांड के अंदर मोटवाने की सोच रहा था और तू बस अभी तक वहीँ पे अटका पड़ा hain............tera कुछ नहीं होने wala..........jaa और अपनी ये इच्छा पूरी कर le.......jaa के मूट ले मेरी जान की बुर mein..........aagey से मैं तुझे कोई राइ मश्वरा नहीं देने wala.........tera जो दिल में आये सो करना........." और रघु इस बार जैसे भड़क उठता हैं वहीँ जीतू रघु के सामने माफ़ी मांगने लगता hain........aab उसकी भी ग़लतफहमी रघु के प्रति दूर हो गयी thi...........aab वो भी पूरी तरह से नार्मल हो गया था......
" चल मैं तुझे नास्ता करा देता hoon.....tujhe अब भूख लगी hogi.............naaste में बिस्कुट चलेगा naa.........agar घर में बिस्कुट नहीं हैं तो मैं अभी बहार से उसे मंगवा देता हूँ......." और रघु काव्य की तरफ देखता हुआ धीरे से बोल पड़ता हैं .......वहीँ काव्य हाँ में कहकर अपनी गुर्दें धीरे से हिला देती hain..........wahin सामने बैठा जीतू बिलकुल चुप tha..........aab उसके पास कहने के लिए कुछ बचा hi कहा था............
रघु फ़ौरन किचन में जाता हैं और एक शीशे की कतरौरी और एक स्पून (चमच) और एक मारिए गोल्ड की बिस्कुट का पैकेट लेकर आता हैं वहीँ काव्य उसके तरफ बड़े गौर से देख रही thi...........wo भी जानती थी की रघु अगर उसे बिस्कुट खिला रहा हैं तो वो कुछ न कुछ तो खुरापात उसमें ज़रूर सोच रखा होगा................
" आज मैं तुझे एक दम स्पेशल बिस्कुट खिलता hoon...........isey खाने के बाद तुझे मज़ा आ जायेगा................" और रघु उस शीशे की कटोरी में 5 बिस्कुट एक के ऊपर एक रखता चला जाता हैं और काव्य के तरफ देखता हुआ धीरे से मुस्कुरा पड़ता hain........wahin सबकी नज़रें अब उस बिस्कुट पर जाकर टिक गयी thi..........wahin पैकेट में अभी और भी कई साडी बिस्किट्स रखे हुए थे.......
" jeetu........aab यहाँ खड़ा खड़ा मेरा मुँह क्या देख रहा hain..........tujhe मूतना हैं न मेमसाहेब की बुर mein............to chal.......aakar मूट ले aabhi.........magar ये याद रहे की तेरी मूट बस थोड़ी सी निकालनी chahiye........jissey इसमें रखा बिस्कुट तेरे मूट के पानी से पूरी तरह से सं jaye.........aur मैं उसका पेस्ट बनाकर अपनी जान को खिला sakun.........khawogi न मेरी जान.............." और रघु काव्य की तरफ देखता हुआ फिर से हंसी लगता हैं वहीँ काव्य धीरे से हाँ में अपनी गुरनें हिला देती हैं..........
" अरे waah..............ye क्या बात hui.........apni बरी थी तो अपने आखरी कतरे तक तू मेमसाहेब की बुर में मूतता raha...........aur जब मेरी बरी आयी to......thoda सा बस मूट lena.........main कुछ नहीं janta..........jab तक मेरे लुंड का पानी की आखरी बूँद नहीं निकल जाती मैं अपने लुंड को मेमसाहेब की बुर में से नहीं निकलूंगा............" और जीतू थोड़ा चिढ़ते हुए फिर से बोल पड़ता हैं वहीँ इस बार रघु उसपर जैसे भड़क सा जाता हैं..........
" behanchod...............tujhe कभी अकाल आएगी भी या nahin...............theek हैं ........तू अब अपने रास्ते और मैं अपने raaste.........kar ले जो तुझे करना hain.........nikal ले भड़ास अपने दिल की .............वैसे भी तुझे तेरी मेमसाहेब कुछ बोलने वाली तो हैं nahin...........magar इतना याद रखना जो खेल तू मेरे साथ रहकर खेलेगा उस खेल में मैं तुझे मज़े की बुलंदियों तक pahuchaunga............main वो साडी चीज़ें करूँगा जो तेरा भी कभी सपना हुआ करता tha...........is लिए तू एक बार और ाचे से सोच समझ le.......aagey तेरी marzi...........aur हाँ अगर इसके बाद भी तू अगर बीच में न नुकुर किया to............fir मुझसे बुरा कोई नहीं होगा............." और इस बार जैसे रघु जीतू की तरफ देखता हुआ जैसे अपना फैसला सुनाता हैं वहीँ जीतू कुछ देर की चुप्पी के बाद आखिर रघु के पक्ष में आकर उसकी बात मान लेता हैं............
" ठीक hain..........khel तेरे हिसाब से hi chalega.............jaisa तू चाहता hain.........magar मुझे मज़ा नहीं आया to.........fir बाद में मैं अपने मुन्न की hi karunga..........fir मुझे तू दोष मुट्ठ देना.............." और इस बार जीतू धीरे से बोल पड़ता हैं वहीँ रघु अपना एक हाथ उसके कंधे पर हौले से रखता हुआ उसकी आँखों में देखने लगता हैं और फिर धीरे से मुस्कुरा देता हैं.......
फिर रघु आगे कहना शुरू करता हैं जिसे सुनने के बाद जीतू का चेहरा ख़ुशी से खिल उठता hain........wahin इस बार राम भी मुस्कुरा देता hain...........wahin दूसरी तरफ काव्य अब समझ चुकी थी की आज उसकी पूरी माँ छोड़ने का प्लान बन चूका hain..........khel चाहे जैसा ho.........jo भी खेल रहा ho..........ussey फर्क नहीं padta...........aakhir............fategi hi तो उसकी hi बुर और gand...........bus देखना ये था की वो इस खेल में ज़्यादा देर तक टिक पति हैं या सामने वाला .............खिलाडी.................
" अब तू उसी अंदाज़ में आकर यहाँ इसी डाइनिंग टेबल पर आकर चढ़ ja..........jis पोजीशन में मैं तेरे बुर के अंदर मूट रहा tha........theek वैसे hi अब जीतू भी तेरी बुर के अंदर mootega..........aur ये याद रहे की मूट का सारा पानी नीचे रखे इस बिस्कुट वाली कटोरी में गिरने chahiye........uske बाद तुझे मालूम हैं की तुझे क्या करना हैं.........." और रघु जैसे काव्य को आदेश देता हैं वहीँ काव्य फिर से अपने दोनों हाथ पीछे की तरफ करती हुई लेट जाती हैं और अपने बुर को हवा में ऊपर की तरफ उठा लेती hain.........aur अपने दोनों पवन पूरा फैला लेती hain.........jeetu अगले hi पल अपने सरे कपड़े पूरा उतर देता हैं और काव्य के टांगों के बीच अपना लुंड सेट करता हुआ उसके ऊपर चढ़ जाता हैं...........
इस वक़्त उसका लुंड भी अकड़ा हुआ tha............wo एक तेज़्ज़ ढाका मरता हैं जिससे उसका लुंड पूरा एक hi झटके में काव्य के बुर के अंदर समां जाता hain.......wahin काव्य की लाजत से आँखें बंद हो जाती हैं और उसकी चीख निकल पड़ती हैं .........और जब जीतू को एहसास होता हैं की उसका लुंड पूरा अंदर चला गया हैं वो अपने लुंड पर प्रेशर डालना शुरू करता hain.............lund थोड़ा खड़े होने की वजह से उसकी मूट जल्दी नहीं निकलती मगर थोड़ी म्हणत के बाद वो आखिर काव्य के बुर के अंदर मूतना शुरू करता hain.........wahin काव्य को अपने अंदर पानी इक्कठा होता हुआ सा महसूस होने लगता हैं.........
वो वहीँ ज़ोरों से सिसक पड़ती हैं और मज़े से उसकी आँखें बंद होने लगती hain............jeetu को भी बहुत मज़ा आ रहा था मगर जैसे तैसे वो थोड़ा सा मूतने के बाद अपना मूट अंदर hi रोक लेता हैं वहीँ काव्य के बुर से अब धीरे धीरे मूट नीचे की तरफ गिरना शुरू हो जाता hain.............pehle कुछ बूंदों के रूप mein...........fir एक तेज़ धार की रूप mein.......wahin काव्य का अब बुरा हाल tha.........uski प्यास बुझने के बजाये और भी भड़कती जा रही thi............aab उसे ये सब कण्ट्रोल नहीं हो रहा था..........
जीतू थोड़े देर तक अपने लुंड को काव्य के बुर के अंडे hi रखे रहता हैं फिर वो अगले पल अपना लुंड एक hi झटके में पूरा बहार खींच लेता हैं और जैसे हु उसका लुंड बहार आता हैं एक ज़ोर की ppppppppppphhhhhhhhhuuuuuuuccchhhhhhhhhhhhhhhhkkkkkkkkkkkkk की आवाज़ के साथ काव्य की आहें भी फुट पड़ती hain..........wahin उसकी बुर से ढेर सारा पानी नीचे उस कटोरे में रखे बिस्कुट में गिरने लगता hain........jo पानी की वजह से अब धीरे धीरे वो बिस्कुट घुलने लगा tha.......to कुछ मूट की बूँदें फिर से उस टेबल के इधर उधर गिरने लगती hain..........wahin काव्य तब तक अपनी बुर को वैसे hi फैलाये रहती हैं जब तक की उसके बुर से जीतू का मूट पूरी तरह से टपकना बंद नहीं हो jata............ye देखकर रघु काव्य की तरफ धीरे से मुस्कुरा देता हैं.......
" लावो ram..........aab ये कैमरा मुझे do............main इसे sambhlunga........aur जैसा मैंने कहा हैं वैसा karo.........tum भी अब पूरा नंगा हो जाओ और जाकर अपनी भाभी के साथ पूरे मज़े करो............." और इस बार रघु जैसे राम को हुकुम देता हैं वहीँ राम भी एक एक कर अपने सरे कपय निकलन शुरू करता हैं और देखते hi देखते वो भी पल भर में पूरा नंगा हो जाता hain.........udher जीतू काव्य को अपने गॉड में उठा लेता हैं और उसे उठाकर सामने के सोफे के तरफ ले जाने लगता हैं.........
कंटिन्यू.......................................................