- Joined
- Dec 5, 2013
- Messages
- 138,041
EPISODE – 15
ज़रा दूर चल कर वहां पर एक लेडी डिप्टी पुलिस कमिश्नर थी… उस के साथ एक और मर्द पुलिस वाला और एक लेडी कांस्टेबल थी…
“आशा बक्शी” डिप्टी पुलिस कमिश्नर, एक ऑनेस्ट पुलिस अफसर, बोहत सख्त और ुनमर्रिएद हे जिस ने अपनी लाइफ पब्लिक सर्विस के लिए वक़्फ़ कर दी हे… 35 साल की महिला आईपीएस अफसर… दौलत पुर की इंचार्ज…
अभी बस स्टैंड पे वो मौजूद हे एक मशकूक शख्स के आने की इनफार्मेशन पर… वो एक खतरनाक क्रिमिनल हे…
आशा बक्शी, डीपीसी, नाराज़ हो जाती हे अपने कॉन्स्टेबल्स पर जो के गोविन्द को ले ए हैं मशकूक समझ कर…
गोविन्द बारे एतमाद के साथ बात करता हे और कहता हे… “डीपीसी ma’am… कोई बात नहे आप इन बेचारों पर ग़ुस्सा न हों… में ने मंद नहे किया…”
और बारे ग़ौर से देखते हुए आशा बक्शी की तरफ जो के पुलिस यूनिफार्म में बोहत स्मार्ट लग रही थी… लम्बा ऊंचा क़द 5.10 इंच, न ज़यादा मोती न पतली, 34-26-35 का साइज… बोहत आकर्षित हो उठा गोविन्द…
गोविन्द… आशा की आँखों में ऑंखें डालते हुए… “ma’am सुक्रिया के इसी बहाने आप जैसी स्मार्ट अफसर से मुलाक़ात हो गई… कोई हुकुम हो तो में हाज़िर हूँ…”
आशा बक्शी… गोविन्द के एतमाद, हौसले और नज़रों से चौंक गई… और सोचने लगी… “देखने में ये नौजवान बोहत शरीफ और बहादुर लगता हे… मगर इस का किलर एतमाद समझ नहे आ रहा… कुछ तो बात हे इस में…”
आशा बक्शी ने खिलाफ इ मामूल अपना कार्ड गोविन्द को दे दिया और कहा अगर कोई प्रॉब्लम हो तो इस नंबर या एड्रेस पे बात या कांटेक्ट कर सकता हे…
गोविन्द बस की तरफ चला तो देखा के बस में ज़रा सी भी जगा नहीं थी मगर प्रॉब्लम ये थी के अगली बस आधे घंटे के बाद जनि थी… और वो टाइम वास्ते नहे करना चाहता था तो किसी न किसी तरह बस में अंदर घुस गया… बस चल पारी… रश में ढके लगते रहे… उस को काफी दूर जाना था तो वो कोने की तरफ सरक गया… अपने राइट हाथ से उस ने बस में लगे पोल को थम लिया ताकि किसी के ऊपर न गिरे… कुछ देर बाद उस का लेफ्ट हैंड किसी नरम मखमली हाथ से मास हुआ… इक बिजली सी कोंडी उस के जिस्म में… वो उस तरफ देख न सका … जाने क्यों… उस नौख़ेज़ बदन ने अपना हाथ पीछे कर लिया… बस में इक और क़यामत का झटका लगा और वो मखमली हाथ ने गोविन्द का बाज़ू थम लिया… गोविन्द को बर्क़ी लहरें डर्टी महसूस हुईं सरे जिस्म में… हए ऋ क़िस्मत.. गोविन्द बेचारे के लिए एक और इम्तेहान उस के दिल पर दस्तक देने लगा… लड़की ने अपना हाथ न हटाया और थामे रही गोविन्द का बाज़ू… लड़की को भी ऐसा लग रहा था के एहि हे जो उस को थम सकता हे और तहफूज़ दे सकता हे… ये नौजवान तो दिलों को रहत देने वाला न की तकलीफ…
बस रूकती हे… एक मुसाफिर उतरता हे और एक औरत और एक मर्द चढ़ जाते हैं… फिर से धकाम पेल और इसी के चलते कैसे गोविन्द और वो लड़की एक दुसरे के आमने सामने आ जाते हैं… गोविन्द लड़की की तरफ देखते hi जेसे खो सा जाता हे…
5.5 क़द… गोरा रंग… जिस्म भरा हुआ… आँखें बरी बरी… जेसे काली मगर रोशन चमकदार रत… काळा बल जेसे घनघोर काळा बदल च्ये हुए… चुके बारे… तन्ने हुए… ग़रूर से… हिमालय से ऊंची चोटियां… दुपट्टा सीने पर मगर माज़ूर कुछ भी छुपाने से…. पेट पे गोश्त न होने के बराबर… गांड ख़म खाई हुई… डल… कपड़े बोहत क़ीमती… किसी अमीर घर की… ज़यादा से ज़यादा 20 साल की होगी…
अभी भी लड़की ने गोविन्द का बाज़ू थमा हुआ हे… छोरा नहे… देखने वाले ये समझ रहे हैं के ये दोनों साथ हैं… गोविन्द बस ख़ामोशी से उस चेहरे को देखता जा रहा हे… पलके भी नहे झपक रहा… लड़की ने उस की आँखों में देखा तो वो हिम्मत न कर पेयी उन आँखों में देखने से… जहाँ दिलों को तस्खीर करने का जादू था… लड़की ने अपनी आँखे यूँ हटाईं जेसे और देखती रही तो बस उसी की हो जये गई… और फिर कहीं की न रहे गई…
और फिर एक और क़यामत टूटी… दिलों पर…
बस ने एक ब्रेक लगाया सरक पर खड़े की वजा से… और गोविन्द और वो लड़की दोनों आपस में सात गए… लड़की ने अपने हाथ से उस के बाज़ू पर ग्रिफ्ट मज़ीद मज़बूत कर ली… गोविन्द ने भी देर न करते हुए अपना हाथ उस के दुसरे हाथ पर रख दिया… और कास के पाकर लिया… लड़की ने हाथ न चुराया…
गोविन्द और लड़की दोनों खामोश थे… मगर दो जवान जिंसों ने आपस में बातें करना शुरू कर दिया…
लड़की ऐसी नहीं थी के कोई मर्द यूँ रह चलते उस का हाथ पाकर ले और वो ख़ामोशी से अपने आप को उससे सौंप दे… 20 साल की हनोई को ए थी और आज तक… बालूघाट से लेकर… किसी मर्द के नज़रे अल्तिफ़ात को क़बूल न किया था… पर इस नौजवान में कुछ ऐसा था जो उससे यूँ खामोश किये दे रहा था… उस के दिल की धरकने आज पहली बार यूँ बेतरतीब हुई थीं… वो भी इस अजनबी नौजवान के हाथों का स्पर्श प् कर… क़रीब था वो वो अपने दिल पे काबू पति और उसे दूर धकेलती अपना हाथ चुराती…
गोविन्द ने चुपके से धीमी आवाज़ में कहा….
“उस जैसा कोई मासूम कहाँ होगा,
उस जैसा कोई हसीं भी कहाँ होगा”
लड़की नज़र उठाते उठाते रुक गयी…
और भूल गयी के अभी उस ने हाथ चुराने का सोचा था…
गोविन्द मज़ीद बोलै धीमी आवाज़….
“तेरे चेहरे के नक़्श ऐसे हैं
नज़र उठता हूँ, भटक जाता हूँ”
लड़की का हाथ जो की गोविन्द के हाथ में था… अब लड़की के उस हाथ ने हरकत की और अब उस हाथ ने गोविन्द का हाथ अपने हाथ में ले लिया… और सख्ती से पाकर लिया… लड़की को होश भी नहे था के वो क्या कर बैठी हे…
गोविन्द ने एक और शेर पढ़ा…
“हो न जय हुसैन की शान मैं गुस्ताखी कहीं
तुम चले जाओ के तुम्हें देख केर पियर अत है”
और जब गोविन्द ने कहा…
“बहारों की जान पैर बन आयी है
आज देखा है उन्हें सुर्ख लिबास मैं”
लड़की जो सुर्ख लिबास में थी… उस का गाल भी सुर्ख हो गए… शर्म से लज्जा से… और उस का दूसरा हाथ जो की गोविन्द का बाज़ू थामे था… उस बाज़ू पे उसने ज़ोर से अपने नाख़ून गर दिए…
हल्का दर्द हुआ गोविन्द को, नाख़ून चुबने पर, मगर मजाल हे जो ज़रा उफ़ की हो…
लड़की ने अब होल होल पलकें उठाईं और देखा वलिहना अंदाज़ से इस दिलकश, ख़ूबरू, जवान को जिस ने इस लड़की बोलने की शक्ति चीन ली थी…
जब दोनों की नज़रे मिलीं, तो गोविन्द ने पुछा… “ऐ… नाज़नीन, क्या नाम हे तुम्हारा…??”
लड़की नज़रें झुकाते हुए होल से बोली… “रिया…”
रिया ने झुकी नज़रों से पुछा… “आप का नाम…??”
गोविन्द थोड़ा सा और नज़दीक होते हुए लड़की के… “तुम्हारा गोविन्द…”
“तुम्हारा” शब्द पे गोविन्द ने कुछ ज़यादा hi ज़ोर दिया था…
रिया सुन कर शर्म से मज़ीद दोहरी हो गई और इसी दौरान एक झटका लगा बस को … रिया और क़रीब हो गई गोविन्द के…
अब पोजीशन ये थी के गोविन्द ने एक हाथ से बस का पोल पाकर रखा था और दुसरे हाथ में रिया का हाथ था… रिया ने एक हाथ से गोविन्द का एक बाज़ू थमा हुआ था और दूसरा हाथ से गोविन्द का हाथ पकड़ा हुआ था… गोविन्द की एक तंग रिया के टैंगो के दरमियान थी और रिया की एक तंग गोविन्द की टैंगो के दरमियान थी… दोनों को एक दुसरे के गुप्त अंगो का स्पर्श बखूबी हो रहा था…
रिया के लिए लुत्फ़ बढ़ता जा रहा था…
गोविन्द ने सोच पढ़ी रिया की…
रिया की सोच… “उफ़… कितना ाचा लग रहा हे… में ने कभी नहे सोचा था के मर्द का वो जब जिस्म के साथ लगता हे तो इतना मज़ा आता हे… ये किसी सख्त चीज़ हे जो किसी नरम चीज़ से भी ज़यादा लाज़त दे रही हे… किसी गर्मी हे जो ठंडक दे रही हे… ये गोविन्द भी न… बोहत शरीर हे… इस ने मेरे दिल के तारों को चेर दिया हे… अब इस के बग़ैर कर कहाँ…”
रिया की सोच… जेसे किसी नींद से जगती हुई… “ओह्ह्ह्ह यद् hi नहीं रहा… “शबो” का घर आने वाला हे… कैसे पूछूं गोविन्द से फिर कब और कैसे मिले गए… बोहत शर्म ए गई पूछने में… में क्या करूँ… इतनी बेबस कभी नहीं थी में…”
गोविन्द समझ गया के उस को पहल करनी परे गई…
गोविन्द… “रिया मेरी जान… कहाँ उतरना हे तुम ने…??”
रिया… खुश हो गई और मुस्कुराने लगी… “बस मेरा स्टॉप आने वाला हे… मेरी दोस्त का घर हे… शबाना का… मेरे साथ यूनिवर्सिटी में पढ़ती हे… हम कंबाइंड स्टडी करें गए… उस के घर पे…”
गोविन्द… “तुम इसी बस पे आती जाती हो…??”
रिया… “नहे… आज पहली बार इस बस पे चढ़ी हूँ… कार ख़राब हो गई थी रस्ते में…”
गोविन्द… “तो अब मुलाक़ात कैसे हो गई…”
रिया ने आँखें उठा कर गोविन्द की तरफ देखा… और उस को बताया के अभी एक्साम्स हैं दो दिन बाद… यूनिवर्सिटी में आर्ट्स में ग्रेजुएशन कर रही हूँ… वहां मिल सकते हैं… 4 बजे शाम को क्लासेज ख़तम होती हैं…
(प्लीज नोट के जिस दौर की कहानी हे उस दौर में सिर्फ लैंडलाइन थी और सेल फ़ोन नहे थे….)
और फिर रिया का स्टॉप आया और वो उतर के चली गई…
ज़रा दूर चल कर वहां पर एक लेडी डिप्टी पुलिस कमिश्नर थी… उस के साथ एक और मर्द पुलिस वाला और एक लेडी कांस्टेबल थी…
“आशा बक्शी” डिप्टी पुलिस कमिश्नर, एक ऑनेस्ट पुलिस अफसर, बोहत सख्त और ुनमर्रिएद हे जिस ने अपनी लाइफ पब्लिक सर्विस के लिए वक़्फ़ कर दी हे… 35 साल की महिला आईपीएस अफसर… दौलत पुर की इंचार्ज…
अभी बस स्टैंड पे वो मौजूद हे एक मशकूक शख्स के आने की इनफार्मेशन पर… वो एक खतरनाक क्रिमिनल हे…
आशा बक्शी, डीपीसी, नाराज़ हो जाती हे अपने कॉन्स्टेबल्स पर जो के गोविन्द को ले ए हैं मशकूक समझ कर…
गोविन्द बारे एतमाद के साथ बात करता हे और कहता हे… “डीपीसी ma’am… कोई बात नहे आप इन बेचारों पर ग़ुस्सा न हों… में ने मंद नहे किया…”
और बारे ग़ौर से देखते हुए आशा बक्शी की तरफ जो के पुलिस यूनिफार्म में बोहत स्मार्ट लग रही थी… लम्बा ऊंचा क़द 5.10 इंच, न ज़यादा मोती न पतली, 34-26-35 का साइज… बोहत आकर्षित हो उठा गोविन्द…
गोविन्द… आशा की आँखों में ऑंखें डालते हुए… “ma’am सुक्रिया के इसी बहाने आप जैसी स्मार्ट अफसर से मुलाक़ात हो गई… कोई हुकुम हो तो में हाज़िर हूँ…”
आशा बक्शी… गोविन्द के एतमाद, हौसले और नज़रों से चौंक गई… और सोचने लगी… “देखने में ये नौजवान बोहत शरीफ और बहादुर लगता हे… मगर इस का किलर एतमाद समझ नहे आ रहा… कुछ तो बात हे इस में…”
आशा बक्शी ने खिलाफ इ मामूल अपना कार्ड गोविन्द को दे दिया और कहा अगर कोई प्रॉब्लम हो तो इस नंबर या एड्रेस पे बात या कांटेक्ट कर सकता हे…
गोविन्द बस की तरफ चला तो देखा के बस में ज़रा सी भी जगा नहीं थी मगर प्रॉब्लम ये थी के अगली बस आधे घंटे के बाद जनि थी… और वो टाइम वास्ते नहे करना चाहता था तो किसी न किसी तरह बस में अंदर घुस गया… बस चल पारी… रश में ढके लगते रहे… उस को काफी दूर जाना था तो वो कोने की तरफ सरक गया… अपने राइट हाथ से उस ने बस में लगे पोल को थम लिया ताकि किसी के ऊपर न गिरे… कुछ देर बाद उस का लेफ्ट हैंड किसी नरम मखमली हाथ से मास हुआ… इक बिजली सी कोंडी उस के जिस्म में… वो उस तरफ देख न सका … जाने क्यों… उस नौख़ेज़ बदन ने अपना हाथ पीछे कर लिया… बस में इक और क़यामत का झटका लगा और वो मखमली हाथ ने गोविन्द का बाज़ू थम लिया… गोविन्द को बर्क़ी लहरें डर्टी महसूस हुईं सरे जिस्म में… हए ऋ क़िस्मत.. गोविन्द बेचारे के लिए एक और इम्तेहान उस के दिल पर दस्तक देने लगा… लड़की ने अपना हाथ न हटाया और थामे रही गोविन्द का बाज़ू… लड़की को भी ऐसा लग रहा था के एहि हे जो उस को थम सकता हे और तहफूज़ दे सकता हे… ये नौजवान तो दिलों को रहत देने वाला न की तकलीफ…
बस रूकती हे… एक मुसाफिर उतरता हे और एक औरत और एक मर्द चढ़ जाते हैं… फिर से धकाम पेल और इसी के चलते कैसे गोविन्द और वो लड़की एक दुसरे के आमने सामने आ जाते हैं… गोविन्द लड़की की तरफ देखते hi जेसे खो सा जाता हे…
5.5 क़द… गोरा रंग… जिस्म भरा हुआ… आँखें बरी बरी… जेसे काली मगर रोशन चमकदार रत… काळा बल जेसे घनघोर काळा बदल च्ये हुए… चुके बारे… तन्ने हुए… ग़रूर से… हिमालय से ऊंची चोटियां… दुपट्टा सीने पर मगर माज़ूर कुछ भी छुपाने से…. पेट पे गोश्त न होने के बराबर… गांड ख़म खाई हुई… डल… कपड़े बोहत क़ीमती… किसी अमीर घर की… ज़यादा से ज़यादा 20 साल की होगी…
अभी भी लड़की ने गोविन्द का बाज़ू थमा हुआ हे… छोरा नहे… देखने वाले ये समझ रहे हैं के ये दोनों साथ हैं… गोविन्द बस ख़ामोशी से उस चेहरे को देखता जा रहा हे… पलके भी नहे झपक रहा… लड़की ने उस की आँखों में देखा तो वो हिम्मत न कर पेयी उन आँखों में देखने से… जहाँ दिलों को तस्खीर करने का जादू था… लड़की ने अपनी आँखे यूँ हटाईं जेसे और देखती रही तो बस उसी की हो जये गई… और फिर कहीं की न रहे गई…
और फिर एक और क़यामत टूटी… दिलों पर…
बस ने एक ब्रेक लगाया सरक पर खड़े की वजा से… और गोविन्द और वो लड़की दोनों आपस में सात गए… लड़की ने अपने हाथ से उस के बाज़ू पर ग्रिफ्ट मज़ीद मज़बूत कर ली… गोविन्द ने भी देर न करते हुए अपना हाथ उस के दुसरे हाथ पर रख दिया… और कास के पाकर लिया… लड़की ने हाथ न चुराया…
गोविन्द और लड़की दोनों खामोश थे… मगर दो जवान जिंसों ने आपस में बातें करना शुरू कर दिया…
लड़की ऐसी नहीं थी के कोई मर्द यूँ रह चलते उस का हाथ पाकर ले और वो ख़ामोशी से अपने आप को उससे सौंप दे… 20 साल की हनोई को ए थी और आज तक… बालूघाट से लेकर… किसी मर्द के नज़रे अल्तिफ़ात को क़बूल न किया था… पर इस नौजवान में कुछ ऐसा था जो उससे यूँ खामोश किये दे रहा था… उस के दिल की धरकने आज पहली बार यूँ बेतरतीब हुई थीं… वो भी इस अजनबी नौजवान के हाथों का स्पर्श प् कर… क़रीब था वो वो अपने दिल पे काबू पति और उसे दूर धकेलती अपना हाथ चुराती…
गोविन्द ने चुपके से धीमी आवाज़ में कहा….
“उस जैसा कोई मासूम कहाँ होगा,
उस जैसा कोई हसीं भी कहाँ होगा”
लड़की नज़र उठाते उठाते रुक गयी…
और भूल गयी के अभी उस ने हाथ चुराने का सोचा था…
गोविन्द मज़ीद बोलै धीमी आवाज़….
“तेरे चेहरे के नक़्श ऐसे हैं
नज़र उठता हूँ, भटक जाता हूँ”
लड़की का हाथ जो की गोविन्द के हाथ में था… अब लड़की के उस हाथ ने हरकत की और अब उस हाथ ने गोविन्द का हाथ अपने हाथ में ले लिया… और सख्ती से पाकर लिया… लड़की को होश भी नहे था के वो क्या कर बैठी हे…
गोविन्द ने एक और शेर पढ़ा…
“हो न जय हुसैन की शान मैं गुस्ताखी कहीं
तुम चले जाओ के तुम्हें देख केर पियर अत है”
और जब गोविन्द ने कहा…
“बहारों की जान पैर बन आयी है
आज देखा है उन्हें सुर्ख लिबास मैं”
लड़की जो सुर्ख लिबास में थी… उस का गाल भी सुर्ख हो गए… शर्म से लज्जा से… और उस का दूसरा हाथ जो की गोविन्द का बाज़ू थामे था… उस बाज़ू पे उसने ज़ोर से अपने नाख़ून गर दिए…
हल्का दर्द हुआ गोविन्द को, नाख़ून चुबने पर, मगर मजाल हे जो ज़रा उफ़ की हो…
लड़की ने अब होल होल पलकें उठाईं और देखा वलिहना अंदाज़ से इस दिलकश, ख़ूबरू, जवान को जिस ने इस लड़की बोलने की शक्ति चीन ली थी…
जब दोनों की नज़रे मिलीं, तो गोविन्द ने पुछा… “ऐ… नाज़नीन, क्या नाम हे तुम्हारा…??”
लड़की नज़रें झुकाते हुए होल से बोली… “रिया…”
रिया ने झुकी नज़रों से पुछा… “आप का नाम…??”
गोविन्द थोड़ा सा और नज़दीक होते हुए लड़की के… “तुम्हारा गोविन्द…”
“तुम्हारा” शब्द पे गोविन्द ने कुछ ज़यादा hi ज़ोर दिया था…
रिया सुन कर शर्म से मज़ीद दोहरी हो गई और इसी दौरान एक झटका लगा बस को … रिया और क़रीब हो गई गोविन्द के…
अब पोजीशन ये थी के गोविन्द ने एक हाथ से बस का पोल पाकर रखा था और दुसरे हाथ में रिया का हाथ था… रिया ने एक हाथ से गोविन्द का एक बाज़ू थमा हुआ था और दूसरा हाथ से गोविन्द का हाथ पकड़ा हुआ था… गोविन्द की एक तंग रिया के टैंगो के दरमियान थी और रिया की एक तंग गोविन्द की टैंगो के दरमियान थी… दोनों को एक दुसरे के गुप्त अंगो का स्पर्श बखूबी हो रहा था…
रिया के लिए लुत्फ़ बढ़ता जा रहा था…
गोविन्द ने सोच पढ़ी रिया की…
रिया की सोच… “उफ़… कितना ाचा लग रहा हे… में ने कभी नहे सोचा था के मर्द का वो जब जिस्म के साथ लगता हे तो इतना मज़ा आता हे… ये किसी सख्त चीज़ हे जो किसी नरम चीज़ से भी ज़यादा लाज़त दे रही हे… किसी गर्मी हे जो ठंडक दे रही हे… ये गोविन्द भी न… बोहत शरीर हे… इस ने मेरे दिल के तारों को चेर दिया हे… अब इस के बग़ैर कर कहाँ…”
रिया की सोच… जेसे किसी नींद से जगती हुई… “ओह्ह्ह्ह यद् hi नहीं रहा… “शबो” का घर आने वाला हे… कैसे पूछूं गोविन्द से फिर कब और कैसे मिले गए… बोहत शर्म ए गई पूछने में… में क्या करूँ… इतनी बेबस कभी नहीं थी में…”
गोविन्द समझ गया के उस को पहल करनी परे गई…
गोविन्द… “रिया मेरी जान… कहाँ उतरना हे तुम ने…??”
रिया… खुश हो गई और मुस्कुराने लगी… “बस मेरा स्टॉप आने वाला हे… मेरी दोस्त का घर हे… शबाना का… मेरे साथ यूनिवर्सिटी में पढ़ती हे… हम कंबाइंड स्टडी करें गए… उस के घर पे…”
गोविन्द… “तुम इसी बस पे आती जाती हो…??”
रिया… “नहे… आज पहली बार इस बस पे चढ़ी हूँ… कार ख़राब हो गई थी रस्ते में…”
गोविन्द… “तो अब मुलाक़ात कैसे हो गई…”
रिया ने आँखें उठा कर गोविन्द की तरफ देखा… और उस को बताया के अभी एक्साम्स हैं दो दिन बाद… यूनिवर्सिटी में आर्ट्स में ग्रेजुएशन कर रही हूँ… वहां मिल सकते हैं… 4 बजे शाम को क्लासेज ख़तम होती हैं…
(प्लीज नोट के जिस दौर की कहानी हे उस दौर में सिर्फ लैंडलाइन थी और सेल फ़ोन नहे थे….)
और फिर रिया का स्टॉप आया और वो उतर के चली गई…