Kya Govind yunhi tarasta rahe ga - Page 4 - SexBaba
  • From this section you can read all the hindi sex stories in hindi font. These are collected from the various sources which make your cock rock hard in the night. All are having the collections of like maa beta, devar bhabhi, indian aunty, college girl. All these are the amazing chudai stories for you guys in these forum.

    If You are unable to access the site then try to access the site via VPN Try these are vpn App Click Here

Kya Govind yunhi tarasta rahe ga

EPISODE – 24

गोविन्द विक्रम के शोरूम पोहंच कर खुद अंदर जा कर विक्रम से मिला और उस को बर्गर दिया और कहा के आज जल्दी छुट्टी लेले तो शाम को जल्दी निकलते हैं… उस वक़्त 3 बज रहे थे…

विक्रम ने कहा… “तू फ़िक्र न कर… में 4 बजे की परमिशन ले लूंगा सेठ से… तू बस आ जा 4 बजे…”

गोविन्द वह से निकल कर घर पोहंचा और फ्रेश हो कर शलवार कमीज पहन ली… सीमा को bye किया और गंगा देवी से गले मिला… गंगा देवी भी उस को गले मिल कर बोहत खुश हुई और उस को ढेर साडी दुआएं दी… गंगा देवी ने एक नयी साड़ी अपने पास से निकल कर गोविन्द को उस की माँ के लिए दी और कुछ स्वीट्स और चॉकलेट्स दिए ेषणा के लिए…

गोविन्द ने कपड़े जो मल्टी भाभी और शकुंतला देवी के टेलर से लिए थे वो उठाये और जो कपड़े और चीज़ें उस ने ली थीं सब के लिए वो भी उठायीं… कार में सारा सामान रख कर विक्रम की तरफ गया और उस को पिक किया…

दोनों दोस्त हंसी मज़ाक़ करते गाँव पोहंच गए… विक्रम को घर छोरा और किरण को उस का सूट दिया… किरण भी ख़ुशी से सब के सामने उस के गले लग के… “थैंक यू भैया…” सब हंसने लगे… यहाँ पर गोविन्द ने ज़रा देर रुक कर आशा बक्शी पर धयान लगाया तो पता चला के कोई खास क्राइम रिपोर्ट नहे हुआ और रघु की फाइल और फोटोस दिल्ली पुलिस ने पोस्ट कर दिए हैं जो के मंडे या ट्यूसडे को पोहंचे गए… और आशा अब अपने रेजिडेंस में आ चुकी थी…

फिर गोविन्द हवेली गया… वहां शकुंतला देवी अपने कमरे में थी… ठाकुर और सिमर सिंह भी घर पे नही थे… गोविन्द ख़ामोशी से लाउन्ज में आया जहाँ मल्टी भाभी फ़ोन पर अपने मइके बात कर रही थी… गोविन्द को देखते hi उस ने फ़ोन कट किया और खरी हो गयी अपनी जानेमन के इस्तक़बाल के लिए… साफ लग रहा था के वो उस को अपने गले से लगाना चाहती हे मगर गोविन्द ने उस को रोका ुर कहा के वो ए गए रत में… जब सिमर सिंह शराब पीने जाता हे मर्दाने में… भाभी की आँखें चमक उठी और सब कपड़े और सामान उठा कर ले गयी कमरे में रखने के लिए… साड़ी उस को बोहत पसंद आई थी…

फिर गोविन्द घर पोहंचा और कार घर के बहार ही पार्क कर दी… अभी बापू और प्रकाश घर नहे पोहंचे थे… उस ने सरे कपड़े और गिफ्ट्स उठाये घर में दाखिल हुआ… घर का दरवाज़ा मामूल के मुताबिक़ खुला था… जैसा के गाँव में होता हे…

माँ और ेषणा दोनों बोहत खुश हुई उससे देख कर और सरे गिफ्ट्स उन्हें अचे लगे…

इतनी देर में बापू और प्रकाश भी आ गए… और आते हे पूछने लगे बहार कार किस की हे… गोविन्द ने उन्हें बताया के लाला जी ने ले कर दी हे… वो भी खुश हुए… ेषणा ज़िद करने लगी के उस को कार में बैठना हे… गोविन्द ने सब को कहा चलने को तो बापू और माँ और प्रकाश ने कहा अभी तू इस को घुमा ला… हम बाद में चले जये गए अभी थके हुए हैं और फ्रेश भी होना हे…

गोविन्द, ेषणा को ले कर बहार आया और अगली सीट का दरवाज़ा खोल कर एक प्रिंसेस की तरह बिठाया और बिठा कर हाथ अपने सीने पर रख कर झुका जेसे सेवक अपनी प्रिंसेस को ताज़ीम देते हैं… ेषणा ज़ोर ज़ोर से हंसने लगी…

गोविन्द बोहत खुश हुआ अपनी प्यारी सी गुड़िया सी बहन को हँसते देख कर… और दूसरी तरफ से ड्राइविंग सीट पे बेथ कर कार को निकला गाँव से बहार रोड पर और हलकी स्पीड में लॉन्ग ड्राइव करने लगा…

शाम का वक़्त… हल्का हल्का अँधेरा… रोड पर बोहत कम ट्रैफिक… और सॉफ्ट म्यूजिक में सांग्स प्ले हो रहे थे…

ेषणा का चेहरा दमक रहा था… “भैया में आप से बोहत प्यार करती हूँ…”

गोविन्द… “में भी अपनी गुड़िया से बोहत पियर करता हूँ…” यह कह कर उस ने अपना बाज़ू ेषणा के गिर्द दाल कर उससे अपने क़रीब कर लिया…

ेषणा… “भैया…” धीमी आवाज़ में सिसक पारी…

और ख़ामोशी से इस लम्हे का आनंद लेने लगी…

गोविन्द… “क्यों चुप हो गुड़िया…?? ाचा नहे लग रहा क्या…??”

ेषणा… मधुर आवाज़ में… “बोहत ाचा लग रहा हे… गोविन्द…”

गोविन्द ने नोटिस नहे किया के ेषणा ने उस को नाम से पुकारा हे और भैया नहे कहा… कुछ देर बाद ेषणा बोली…

ेषणा… “किरण से भी पियर करते हो आप…??”

गोविन्द एक डैम घबरा गया… “तुम्हें किसी ने कुछ कहा क्या…??”

ेषणा… “कोई नहे… परेशां न हो… मुझे कोई ऐतराज़ नहे… बल्कि मुझे ाचा लगा… किरण ने मुझे बताया के तुम ने उस को बारे प्यार से गले लगाया था… उसे बोहत ाचा लगा था… कभी हम दोनों को साथ ले कर गारी में चलो न… या अगर उसे अकेले में ले जाओ तो भी मुझे ाचा लगे गए… वो आप से अकेले में मिलना चाहती हे…”

गोविन्द सोचने लगा… “ोये बहनचोद ये क्या हे…”

फिर बोलै… “देखें गए…” और गारी मोर ली अब घर की तरफ…

ेषणा ने अब आहिस्ता से अपना एक हाथ गोविन्द की छाती पे रख दिया और हलके हलके दबाने लगी… गोविन्द ने शलवार कमीज डाली हुई थी… इस वजा से उस का लुंड खरा होने लगा… गोविन्द को ाचा लग रहा था… ेषणा अपना हाथ होल से उस के सीने पर फेर रही थी… और फिर उस ने अपना हाथ सीने के ऊपरी हिस्से और गले के निचले हिस्से पर… जो नज़र आ रहा था… वह रखा और हल्का सा दबाया… लुंड ने झटका मारा… ज़रूर ेषणा ने देखा होगा… ेषणा ने गोविन्द की कमीज का एक बटन खोल दिया और और अपना हाथ उस के सीने पर फेरने लगी… कमीज के अंदर… अब तो गोविन्द का भी बोहत बुरा हल था… उस के लिए कार चलना मुश्किल हो रहा था… ाचा था उस वक़्त ट्रैफिक नहे थी और कार को उस ने गाँव की तरफ मोर लिया था…

ेषणा का हाथ गोविन्द के सीने पर चलता हुआ उस के निप्पल पर पोहंच गया… गोविन्द के मुंह से सिसकी निकल गयी… ेषणा अपनी ऊँगली से उस के निप्पल को चरने लगी… निप्पल सख्त हो गया… गोविन्द ने अपनी ग्रिफ्ट और मज़बूत कर ली ेषणा पर… और गोविन्द का हाथ नीचे चला गया और गांड की साइड से टच होने लगा… बोहत नरम और रेशमी जिस्म था ेषणा का… कार अब बिलकुल घर की तरफ आ चुकी थी… गोविन्द ने अपना बाज़ू हटाया… ेषणा भी सीढ़ी हो गयी… और कहने लगी… “अब रत को हलकी ठण्ड होती जा रही हे… आप अंदर सो जाओ मेरे पास…”

गोविन्द… “हम्म्म… में अभी जॉन गए हवेली सिमर भइया से मिलना हे…”

कार पार्क कर के… दोनों घर आ गए… सब खुश थे… सब ने मिल कर खाना खाया… खाने से फ़ारिग़ हो कर गोविन्द ने अपने बापू और प्रकाश से कहा के एक ज़रूरी बात करनी हे… तो बापू ने कहा ठीक हे चाय भी पीते हैं और बात करते हैं… माँ और ेषणा किचन की तरफ चलीं गयी चाय बना ने…

गोविन्द ने सारा क़िस्सा सुनाया के कैसे लाला जी को उन का मैनेजर और कुछ कर्मचारी फ्रॉड कर के नुकसान पोहंचा रहे हैं और अब उन के पास मुख्लिस और वफादार लोग नहे हैं जो उन के साथ मिल कर काम करें… और साथ में गोविन्द ने कहा के वो चाहता हे के बापू और प्रकाश, शहर से बहार वाले गोदामों और दूसरी कंस्ट्रक्शन को अपनी निगरानी में कार्यें और फिर बापू वहां पर रह कर मवेशी भी परचेस करे और वह पर जो कर्मचारी हों गए उन को सुपरवाइज़ करे… इसी तरह अगर प्रकाश राज़ी हो तो आस पास के गाँव से ट्रक पे अनाज उठाये और गोदाम तक लये… उस ने अपने बापू को बताया के दौलत पुर के आस पास 15 गांव हैं जहाँ से अनाज और स्पिकेस शहर ज़मींदार खुद लेकर आते हैं और वहां पर अनाज की बोली लगती हे और वहां पे मुंशी अपने मनपसंद बोपारी को नाजायज़ फ़ायदा देता हे और तमाम सौदे / ट्रेडिंग पहले से तय शुदा होती हे या दुसरे लफ़्ज़ों में कहें तो फिक्स होती हे… इस लिए इस बार वो छटा हे के ज़मींदारो से अनाज का सौदा डायरेक्ट उन के गाँव में जाकर करें इस तरह ज़मींदारो के ट्रांसपोर्ट का खर्चा भी बचे गए और मुंशी की बेईमानी भी ख़तम हो जये गई… गोविन्द ने अपने बाप से कहा के अगर वो राज़ी हो जयें तो वो और प्रकाश वहां मुलाज़िम नहे मालिक हों गए और इस तरह हमारी माली हालत भी कुछ बेहतर हो जये गई… गोविन्द ने बताया के लाला जी एक अचे और दयालु इंसान हैं हमें ज़रूर उन की सहयता करनी चाहिए…

बापू और प्रकाश ने एग्री कर लिया पर यह भी सवाल उठाया के अगर वो भी शहर में जा कर रहें गए तो माँ और ेषणा अकेले हो जयें गए…

गोविन्द ने उन को समझाया के कुछ दिनों की बात हे वहां पर कंस्ट्रक्शन अगर 10-15 दिन में हो जये तो माँ और ेषणा भी वह शिफ्ट हो सकते हैं… क्यों के वहां पर 4 कमरे और 2 वाशरूम्स बने गए… और उस पोरशन को अलग किया जा सकता हे फॅमिली के रहने के लिए…

बापू और प्रकाश ने एग्री कर लिया और कहा के कल सुबह वो ज़मींदार से बात कर के अगले रोज़ आ जयें गए शहर… गोविन्द ने उन को प्लाट का पूरा एड्रेस समझा दिया… और कहा के वो भी उन के साथ राब्ते में रहे गए…

उस के बाद गोविन्द ने अपने बाप और माँ को 50,000 दिए खर्च करने के लिए… उन को बताया के वो सिमर भैया से मिलने हवेली जा रहा हे… और निकल आया… उस वक़्त रत के 9 बज रहे थे… सिमर भैया तो बेथ चुके होंगे शराब पीने के लिए और मल्टी भाभी अपने कमरे में हों गई… अब बस गोविन्द को ख़ामोशी से उन के कमरे तक पोहंचना था…
 
EPISODE – 25

गोविन्द ने अपने बाप और माँ को बताया के वो सिमर भैया से मिलने हवेली जा रहा हे… और निकल आया… उस वक़्त रत के 9 बज रहे थे… सिमर भैया तो बेथ चुके होंगे शराब पीने के लिए और मल्टी भाभी अपने कमरे में हों गई… अब बस गोविन्द को ख़ामोशी से उन के कमरे तक पोहंचना था…

गोविन्द ने भाभी के दिमाग़ में पहले से ख्याल डाला हुआ था तो वो नाहा कर त्यार हो गयी…

सिमर भैया मर्दाने में जा चुके थे… उन के सामने बोतल खुल चुकी थी अब वो किसी हल में 2-3 घंटे से पहले वह से उठने वाले नहे थे…

ठाकुर और शकुंतला देवी रत का खाना खा कर अपने कमरे में जा चुके थे…

रुक्मणि किचन में खाना बना रही थी सिमर सिंह के लिए…

हवेली का चौकीदार तो जनता था… गोविन्द को… उस ने गेट खोल दिया… गोविन्द चुपके से लाउन्ज में आया… कोई नहे था और चेक किया भाभी के दिमाग़ में तो कमरे का दरवाज़ा अंदर से लॉक नहे था… गोविन्द उसे खोल कर अंदर आ गया और अंदर से लॉक कर दिया… भाभी लेती हुई थी बीएड पर… गोविन्द को देख कर उठी और हंसती हुई उस के गले से लग गयी…

भाभी ने गोविन्द की लाई हुई ग्रीन कलर चिफून की साड़ी बंधी हुई थी उस के साथ उस ने ब्लाउज और पेटीकोट एक और साड़ी का दाल लिया था… हल्का सा मेक उप भी किया हुआ था… बोहत सुन्दर लग रही थी…

Saree-Bhabhi.jpg


यूँही एक दुसरे के लम्स को महसूस करते हुए बोहत ाचा लग रहा था… और फिर भाभी ने अपने होंठ रख दिए गोविन्द के होंटो पर… दोनों एक दुसरे के होंटो को चूमते रहे… गोविन्द ने ज़बान डाली भाभी के मुंह में तो जेसे वो इस लम्हे का इंतज़ार कर रही हो… फ़ौरन पाकर ली ज़बान और इससे चूसने लगी जेसे के इस के बाद मौक़ा नहे मिले गए…. फिर कुछ देर बाद गोविन्द ने भाभी की ज़बान पाकर ली और उससे चूसने लगा… भाभी अपने पूरे शरीर में लाज़त की लहरें उठती हुई महसूस कर रही थी… और अपने चुचों में मीठा सा दर्द होता हुआ महसूस कर रही थी…

गोविन्द ने भाभी को अपने से कुछ दूर किया और सामने खरा के देखने लगा… भाभी की आँखें गुलाबी… खुमार से भरी… जेसे के उस ने भी ढेर साडी शराब पि ली हो…

चेहरा ख़ुशी से दमक रहा था… और क्यों न होता… आज फिर मिलान की घरी थी…

सीना ऊपर नीचे हो रहा था… ब्लाउज में क़ैद चुके आज़ाद होने के लिए बेताब थे…

नीचे गोरा पेट नंगा था… और वहां गोविन्द की नज़र ठहर गयी… भाभी की नाभि गहरी सी… जेसे वहां भी कोई रास्ता हो… गुप्त रास्ता…

गोविन्द जेसे के किसी ट्रांस में आ गया और घुटनो के बल बेथ कर भाभी के चूतर अपने हाथों में दबोच लिए और अपनी ज़बान रख दी नाभि पर… और कुरेदने लगा… उस गुप्त रस्ते को… भाभी सिहर उठी… अपना हाथ ले गयी गोविन्द के सर पर … बालो को बारे प्यार से सहलाने लगी…

bhabhi-nabhi.jpg




छूट जो पहले hi गीली थी… अब तो जेसे सैलाब सा उमड़ पारा था… भाभी की आँखें बंद और सर पीछे को दाल दिया… जेसे सरेंडर कर दिया हो… इस नट खत घाबरू जवान के सामने… होंठ लरज़ रहे थे… कहीं प्यार की धुन सी बज रही थी… जैसे वायलिन बज रहा हो… कितना खबनाक माहौल था… ये पल कभी ख़तम न हो… शामे यही रुक जये…

आहें बढ़ती जा रही थी…

आह… आह… ाः… ाः… आआह… आआह…. उम्म्मेह… ोूई…

आहें तब्दील हो रही थीं कराहों में….

Ha…ha…haa.. है… हां… हआ… हआ…

गोविन्द ने साथ साथ अब चूतर भी सहलाने शुरू कर दिए…

भाभी… बरी कामुक आवाज़ में… “राजा… तुम ने इसी गांड के लिए तो मुठ मरी थी… हे ना…”

गोविन्द बस जिस्म की आवाज़ सुन रहा था… और अपने पसंदीदा काम में लगा रहा…

भाभी ने बारे प्यार से गोविन्द को ऊपर उठाया और कहा… “अब मुझे खिदमत करने दो…” और एक एक करके गोविन्द के सरे कपड़े उतर दिए… और उस को बीएड पर लिटा दिया… और चाटने लगी उस के सीने को…

गोविन्द किसी राजकुमार की तरह लेता हुआ था और भाभी किसी दासी की तरह उस के बदन को चाट रही थी…

gentle-sex-23-gap.jpg


गोविन्द के निप्पल जी भर कर चाटने के बाद भाभी उस की टैंगो की तरफ आयी और उस की बालों से भरी मरदाना टाँगें चाटने लगी… केसा सवाद हे… उफ़… भाभी सोचने लगी अउ रसाथ साथ चाटती जा रही थी…

गोविन्द का लुंड फरफरा रहा था… मगर भाभी किसी माहिर खिलाड़ी की तरह लुंड की तरफ कोई तवजा न दे ते हुए आग भरका रही थी गोविन्द के अंदर…

भाभी टैंगो से नीचे आती हु गोविन्द के पैरों की तरफ आ गयी… भाभी अभी तक साड़ी में थी… उस ने अपना कोई कपड़ा नहे उतरा था…

गोविन्द पूरा का पूरा नंगा और भाभी साड़ी में…

जब भाभी ने गोविन्द के पैर चाटने शुरू किया तो गोविन्द छटपटाने लगा… अब उस से बर्दाश्त नहे हो रहा था… वो छह रहा था के वो भी एक्टिव हो जये… उठने की कोशिश की तो भाभी ने उस को रोक दिया और फिर से उस के पैर चाटने लगी…

अब भाभी ऊपर को उठी और गोविन्द की नज़रों में देखती हुई उस के लुंड पर आ रुकी… और आँखें बंद कर के नाक से सूंघने लगी… जेसे कुत्ता अपने मालिक को सूंघता हे पहचान करता हे… उस ने गोविन्द के लुंड को अपना मालिक मान लिया था पूरे ईमान के साथ…. पूरे समग्रता से….

और फिर अपने गुलाबी लरज़ते होंठ खोले और एक मादक सा चुम्बन लुंड की टोपी पर दे दिया…

और सूराख पर ज़बान फेरने लगी…

गोविन्द ने अपने दोनों हाथ सर के नीचे रख कर आँखें बंद कर लीं और समझ गया के आज भाभी का दिन हे… और आनंद लेने लगा…

भाभी ने अपने होंठ खोले और गोलाई में लबों को लुंड की टोपी पर रखा… पहले टोपी गयी मुंह के अंदर और फिर… भाभी पूरे लुंड को अंदर लेने लगी… पर पूरा लुंड उस के मुंह में न आय तो दो बार मुंह से ऊपर नीचे चूस कर आज़ाद कर दिया लुंड को… और हाथ रख दिए नीचे गोलिओं पर और बारे प्यार से वहां ज़बान फेरने लगी… और फिर एक ा एक… पूरे तटों को मुंह में ले लिए… गोलिओं को चूसने लगी…

गोविन्द ने सोचा… “बहनचोद ये तो साडी रत नहे चोरे गई मुझे…” और भाभी को खेंचने लगा अपने ऊपर…

भाभी ने अपनी गांड कर दी गोविन्द की तरफ… तो गोविन्द ने भी देर न करते हुए भाभी के शूटरों को अपने हाथों में जाकर लिए…

अब दोनों 69 की स्तिथि में थे…

भाभी की गांड ज़यादा मोती न थी … मगर चूतर गोल और डल थे… मुनासिब और दिलकश… गोविन्द ने भाभी के चूतर और टंगे चटनी शुरू कर दीं… और आहिस्ता आहिस्ता सरकता गया अपनी ज़बान… गांड के सूराख पर और चाटने लगा…

पूरी वेह्शत और हैवानियत के साथ… काट भी रहा था…

भ्भी ने अब तटों को चोर कर लुंड ले लिया अपने मुंह में और ज़ोर ज़ोर से चूसने लगी… जेसे के कुल्फी खा रही हो…

गोविन्द ने थोड़ा सा हिंसा छूट का भी छठा तो उससे सुगंध आयी… बरी रोमांचक… हल्का नमकीन टास्ते… खुशबूदार छूट… कोई बल नहे… बिलकुल साफ… और चाटने लगा… फिर ज़बान अनादर दाल दी और ज़बान से छोड़ने लगा… साथ अस्त एक ऊँगली भाभी की गांड के छोटे से छेद में दाल दी…

भाभी लुंड चूसते हुए कराहने लगी….

ोूई… ोू… उम्म्म… एआई… ाहूह… ाः… ाः…. माँ…

कमरे में कोई आवाज़ थी तो बस छूट लुंड चूसै की और आहों की… सिसकियों की…

थूक से लपा लैप भर दिया था पूरे लुंड को… दासी ने चमका दिया था अपने मालिक को…

भाभी एक जहटके से उठी और खुमार भरी नज़रों से गोविन्द को देखती हुई उस के लुंड के ऊपर बैठती हुई अपनी छूट रगड़ने लगी… और फिर आहिस्ता आहिस्ता लुंड को छूट के अंदर लेने लगी … नज़र जमाये हुए अपने मेहबूब के चेहरे पे… गोविन्द ने मस्ती से आँखे बंद कर लीं…

रेशमी छूट ने करक लुंड को पूरा अंदर ले लिए था… पूरा अंदर लेने के बाद भाभी के मुंह से लम्बी सी aaaaaaaaaaaaah निकली…

और आहिस्ता आहिस्ता ऊपर नीचे होने लगी… छोड़ने लगी अपने मालिक को…

gentle-sex-4-gap.jpg




रफ़्तार ऊपर नीचे होने की बढ़ने लगी…. छूट अभी भी टाइट थी और दोनों को पूरा मज़ा आ रहा था… छूट पानी चूरति जा रही थी…

भाभी की रफ़्तार तेज़ होने लगी और बुलेट ट्रैन से भी तेज़ हो गई… और एक चीख के साथ झरने लगी… झटके थे भाभी के ग़ज़बनाक… गद्दार…

ाः… आह… आह… ाः… आए… ाः… ोी… मा… ोीी…

फिर से भाभी उठी और गोविन्द को कहा के अब वो ाज्ये कण्ट्रोल संभल ले… और खुद लेट गयी… गोविन्द ने फ़ौरन महज़ संभाला और पूरा लुंड पेल दिया छूट में… अचानक हमले में पहले से घायल छूट वर न सहन कर सकीय और … फिर से झरने लगी… एक पल पहले… पानी बहा चुकी छूट… फिर से पानी बहाने लगी…

gentle-sex-2-gap.jpg




गोविन्द ने महसूस किया के काफी देर हो चुकी हे तो वो भी ज़ोरदार झटके मरने लगा डिस्चार्ज होने के लिए… और फिर कुछ देर बाद वो भी जरह गया… सारा माल दाल दिया छूट के अंदर…

और दे गया भाभी के ऊपर… दोनों फिर से एक दुसरे को अपनी बांहो में लेते हुए होंठ चूमने लगे…
 
EPISODE – 26

और दे गया भाभी के ऊपर… दोनों फिर से एक दुसरे को अपनी बांहो में लेते हुए होंठ चूमने लगे…

फिर दोनों एक दुसरे को थामे बाज़ून में लेट गए…

गोविन्द की निगाह वाल क्लॉक पर पारी तो उस के होश ुर्र गए… 1.30 घंटा हो गया था उन दोनों को और पता hi नहे चला था… 11.45 हो रहे थे रत के…

गोविन्द… “भाभी… अब सिमर सिंह आने वाला होगा… में चलता हूँ…”

भाभी… “मेरे मालिक… मेरी जान… अभी न जाओ चोर कर… के दिल अभी भरा नहे…”

भाभी की आवाज़ में एक मस्ती, एक दर्द, एक सचाई थी…

गोविन्द… “जान में फिर आऊं गए… बस ख़ुशी खुसी जाने दो…”

भाभी भी समझ गयी के ये लाज़तें अगर जारी रखनी हैं तो जुदाई बर्दाश्त करनी होगी…

गोविन्द जल्दी से बाथरूम गया और तेज़ी से पानी की धार पूरे बदन पे दाल कर साफ किया खुद को और अपने कपड़े पहन के भाभी के कमरे से निकला… उस का प्लान पहले तो ये था के… जाते हुए रुक्मणि से भी मिले गए मगर रत बोहत हो चुकी थी… और रुक्मणि का दिमाग़ चेक करने पर पता चला के वो भी सो चुकी थी… कल वीक का आखिरी दिन था और उस को कल 4 से पहले शहर पोहंचना था रिया से मिलने के लिए… तो उस ने सोचा के उस दौरान अगर मौक़ा मिला तो रुक्मणि से भी मुलाक़ात कर ले गए…

गोविन्द… चौकीदार के दिमाग़ को कण्ट्रोल करते हुए हवेली से निकला… और घर आ गया अपने… गाँव में घर के दरवाज़े इंटरलॉक नहे होते उन को बस अंदर से खोला जा सकता हे…

गोविन्द ने चेक किया… सिर्फ ेषणा जग रही थी… उस ने हलके से कुण्डी खटखटाई… थोड़ी देर बाद ेषणा ने दरवाज़ा खोला… वो अंदर आ गया और वाशरूम जा कर कपड़े चेंज किये… आज उस ने लुंगी और बनियान पहन ली थी… गाँव में कभी कभी वो लुंगी पहन के सोता था और कभी लोअर…

ेषणा कमरे में जा चुकी थी…

सहन में बस प्रकाश की चारपाई थी…

वो हैरान हुआ…

ेषणा के दिमाग़ को पढ़ा तो पता चला के उस ने माँ को कहा था के गोविन्द को अब रत को बहार थोड़ी ठण्ड लगती हे… तो माँ ने कहा था के गोविन्द की चारपाई अपने कमरे में दाल ले… वो कमरे म आ गया और दरवाज़ा भीड़ दिया… लॉक नहे किया… हलकी चाँद की रौशनी जो रोशनदान से आ रही थी… उस ने देखा के ेषणा अपनी चारपाई अपर लेती हे और गोविन्द की चारपाई और ेषणा की चारपाई बिलकुल जुड़ी हे आपस में…

वो ख़ामोशी से अपनी चारपाई पे लेट गया… ज़बरदस्त चुदाई के बाद वो कुछ थकन महसूस कर रहा था…

ेषणा ने करवट ली गोविन्द की तरफ… “भैया इतनी देर लगा दी… कहाँ रह गए थे…”

गोविन्द… “सिमर भैया ने बिठा लिया था अपने पास… तुम सोइ नहे अब तक… चलो सो जाओ…”

ेषणा… “भाई… मैं तुम्हारे पास आ जॉन…”

गोविन्द… “हम्म्म… ठीक हे पर चारपाई छोटी हे देख लो तुम्हे तकलीफ न हो…”

ेषणा ने कोई जवाब नहे दिया और झट से उस की चारपाई पर आ गयी… गोविन्द भी ज़रा सा सरक गया एक तरफ और जगा बना दी ेषणा के लिए… और करवट ले ली दूसरी तरफ और सोने लगा…

दोनों एक hi तकिये पर सर रखे हुए थे…

ेषणा… “ये क्या भाई… तुम तो सोने लगे हो… कुछ देर बातें करते हे ना…”

गोविन्द… उसी तारा लेता रहा और कहा… “तुम बोलो में सुन रहा हूँ…”

ेषणा सरक कर उस के करीब हो गयी और पीछे से बिलकुल सात गयी… ेषणा के चुके छोटे थे पर करक थे… गोविन्द नरम से चुके महसूस करने लगा अपनी पीठ पर और उस का लुंड फिर से तन ने लगा…

थोड़ी देर बाद, ेषणा ने पीछे से अपनी टंगे जोर दी गोविन्द की टैंगो से और गोविन्द की गांड पर ेषणा का जिस्म पूरी शिदत से सात गया…

गोविन्द… “अबे बहनचोद ये क्या कर रही हे…”

गोविन्द ने महसूस किया के ेषणा की छूट वाली जगा से गरमी उस की गांड को लग रही थी…

गोविन्द ने सोचा… “बीटा बर्दाश्त कर… कोई नहे बहन हे उस को भी हक़ हे के मरदाना जिस्म काम से काम महसूस तो करे…” और सोने की कोशिश करने लगा… आँखें भी बंद कर लीं…

ेषणा… “भाई… कल किरण से मिलो न… वो बोहत रिक्वेस्ट कर रही हे…”

गोविन्द… नींद की खुमारी में जाते हुए… “हम्म्म… कल देखे गए…”

ेषणा ने अपने एक बाज़ू उस के गिर्द रख दिया… ेषणा ने भी स्लीवलेस शर्ट पहनी और गोविन्द भी बनियान में था…

दोनों के बाज़ू का नंगा स्पर्श एक दुसरे को मिल रहा था…

और फिर ेषणा ने अपनी एक तंग उठा कर गोविन्द की तंग पर रख दी… दोनों के पैरों का लम्स भी ग़ज़बनाक था… ेषणा के चुके पूरी तरह गोविन्द की पीठ में धंस चुके थे…

गोविन्द को नींद भी आ रही थी और उस का लुंड भी तन चुक्का था… लुंगी में होने के वजा से ज़रा सा कपड़ा हैट गया था… और लुंड की टोपी बहार निकल आयी थी…

हवा जब लगी टोपी पर तो गोविन्द ने हाथ आगे कर के लुंगी को ठीक करना चाहा तो उस का हाथ टकरा गया ेषणा की तंग से… लुंगी डाब गयी थी… ेषणा की तंग के नीच… ेषणा ने अपने हाथ से गोविन्द का हाथ पाकर कर अपनी तंग अपर रख दिया… और… उस के ऊपर अपना हाथ रख दिया…

गोविन्द की सोच… “कितनी नरम जांघ हे…”

Eshana…boli… “भाई मेरी तरफ मुंह कर लो न…”

गोविन्द आधी नींद में जेसे किसी घुलम की तरह उस का होकुम मानते हुए… करवट ले कर अपना रुख कर लिया ेषणा की तरफ… जगह बोहत काम थी… दोनों के बदन आपस में जेसे जुड़े हुए थे… करवट लेने की वजा से लुंगी पूरी हैट गयी लुंड के ऊपर से…

लुंड अब नंगा था और पूरा सात गया ेषणा की राण पर…

ेषणा ने एक सिसकी ली… “ाः… भाई… सुबह मुझे और किरण को कार पर सैर करवाओ न… प्लीज…”

गोविन्द… “स्कूल नहे जाना क्या…??”

ेषणा… “प्लीज भाई… लेट चले जये गए स्कूल और कल वैसे भी क्लासेज मॉर्निंग में नहे हैं…”

गोविन्द … “ाचा ठीक हे… अब सो जाओ…”

गोविन्द ने उससे ज़ोर से कास लिया अपनी बांहो में और सोने लगा…

ेषणा ने अपनी टंगे थोड़ी खोल लीं और लुंड को अपनी रनो के दरमियान दबा कर सोने लगी…

थोड़ी देर बाद दोनों सो चुके थे… एक दुसरे की बांहो में…

सुबह पहले आँख ेषणा की खुली…

लुंड… लुंगी से पूरा बहार था… और फुल तना हुआ था…

ेषणा… “इतना मोटा और लम्बा… ये छूट में कैसे जाता होगा… तभी तो कहते हे छूट फर देता हे… बोहत दर्द होता होगा…”

ये सोचते सोचते उस ने अपने भाई के लुंड को अपनी मुठी में ले कर महसूस करने लगी… वो अभी भी लेती हुई थी वहीं…

उससे बोहत ाचा लग रहा था…

ेषणा… “कैसा विशाल हे ये… बोहत खूबसूरत… दिल कर रहा हे के हर वक इससे पकड़े राहु… कभी न चोरुन…”

अब गोविन्द भी हिलने लगा… जग गया वो… नरम हाथ महसूस हुआ लुंड पर… ाचा लगा… उस ने आँखें न खोली…

ेषणा को पता चल गया था के भाई जग गया हे… मगर उस ने लुंड पे से हाथ नहे हटाया… झिझक के परदे हूत रहे थे…

बहार से माँ और बापू के बात करने की आवाज़ ेषणा के कानो में पारी तो फ़ौरन हाथ हटा लिया और लुंगी ठीक करदी और चादर भी दाल दी भाई पर… अपने कपड़े ठीक किये और शाल दाल कर बहार निकल गई…

गोविन्द फिर से सो गया… घर में सब उठ गए थे… सिर्फ गोविन्द सो रहा था…

बापू और प्रकाश निकल गए… आज उन्हों ने ज़मींदार से बात करके छुट्टी लेनी थी ताकि शहर जा कर गोविन्द के बताये गए प्लाट पर रह कर कंस्ट्रक्शन के काम को सुपरवाइज़ कर सकें… गोविन्द ने प्रकाश को साथ में ट्रक की रिपेयर को भी सुपरवाइज़ करने को कहा था….

ेषणा तैयार हो रही थी… स्कूल के लिए… “माँ… भैया को उठाओ न… कल उस ने प्रॉमिस किया था के मुझे कार पे चोरे गए स्कूल…”

माँ… हंसने लगी… “पगली… सोने दे भाई को… 10 मिनट का रास्ता हे स्कूल का… वो भी तुझे जाना हे कार पे…”

ेषणा… “प्लीज न … माँ … बस आज…”

माँ… “ाचा ठीक हे उठाती हु गोविन्द को….”

ये कहते हुए माँ कमरे में जाती हे… गोविन्द सो रहा हे… चादर ऊपर डेल हुए…

माँ… “ये क्या हे…???”

माँ की नज़र गोविन्द के खरे लुंड पर चली गयी…

माँ करीब हो गई चारपाई के… और अपना हाथ आगे बढ़ा दिया…
 
EPISODE – 27

ेषणा तैयार हो रही थी… स्कूल के लिए… “माँ… भैया को उठाओ न… कल उस ने प्रॉमिस किया था के मुझे कार पे चोरे गए स्कूल…”

माँ… हंसने लगी… “पगली… सोने दे भाई को… 10 मिनट का रास्ता हे स्कूल का… वो भी तुझे कार पे जाना हे…”

ेषणा… “प्लीज न … माँ … बस आज…”

माँ… “ाचा ठीक हे उठती हु गोविन्द को….”

ये कहते हुए माँ कमरे में जाती हे… गोविन्द सो रहा हे… चादर ऊपर डेल हुए…

माँ… “ये क्या हे…???”

माँ की नज़र गोविन्द के खरे लुंड पर चली गयी…

माँ करीब हो गई चारपाई के… और अपना हाथ आगे बढ़ा दिया…

गोविन्द के बाज़ू को हिला दिया… “बीटा… उठ जाओ…”

नज़रें अभी भी जम्मी हुई हे तन्ने हुए लुंड पर…

गोविन्द… “सोने दो न… माँ”

माँ… “बीटा… उठ जा… वो ेषणा ज़िद कर रही के तेरे साथ स्कूल जाना हे कार पर…”

गोविन्द… माँ की तरफ करवट लेते हुए… आँखें खोलता हे तो ममता से भरा चेहरा उस के सामने था… उस ने अपने बाज़ू खोल लिए माँ की तरफ… गले लगाने के लिए… गोविन्द को ज़रा भी अहसास नहे था के उस का लुंड तन्ना हुआ हे और माँ देख चुकी हे…

माँ ने खुले बाज़ू देखे बेटे के… तो रोक न सकीय खुद को और आगे बढ़ कर गले लगा लिया अपने प्यारे बेटे को… वो भी भूल गई लुंड के नज़ारे को…

जेसे hi दोनों माँ बीटा गले मिले… गोविन्द तो लेता हुआ था चारपाई पर और उस ने जज़्बात में अपनी माँ को अपने ऊपर खेंच सा लिया…

रजनी का पूरा जिस्म आ गया गोविन्द के ऊपर और टैंगो पर महसूस हुआ करक लुंड…

रजनी सिहर उठी… बेचैन हो गयी… ऐसा सख्त और मोटा और लम्बा…

गोविन्द जो के अपनी माँ के आग़ोश का आनंद ले रहा था उस को भी ये महसूस हो गया के लुंड माँ की टैंगो से सात गया हे… एक झटका खाया लुंड ने मज़े से…

गदराये रनो से जो स्पर्श मिला था वो बेमिसाल था…

मगर गोविन्द को थोड़ी शर्मिंदगी भी हुई के माँ क्या सोचे गई…

माँ भी कुछ शर्मिंदा सी हो रही थी… मगर उठ नहीं रही थी… अद्भुत अहसास था उस के लिए… ऐसा तो कभी नहे मेहसोसो किया… इतना बारे भी होता हे क्या मर्द का लुंड… और गोविन्द तो अभी छोटा हे… इस का इतना बारे…??

गोविन्द भी नहे हटा रहा था माँ को और न माँ हूत रही थी… लुंड दबा हुआ था मोती गदरायी टैंगो के नीचे… होल होल झटके कहा रहा था… एक सदाए एहतजाज थी लुंड की गोविन्द से क्यों के वो तो गुप्त रेशमी गुफाओ का रही था.. ये किस बोझ टेल दे दिया… मगर बोझ भी कम गुदाज़ न था…

दोनों की हालत बरी अजीब थी… शर्म और शर्मिंदगी का अहसास और साथ में दो जिस्मो की गर्मी…

और… एक मर्द और औरत होने के नाते कुछ फिटरी तक़ाज़ों के ज़ेरे असर होना और आनंद लेते रहना एक दुसरे के बदन का…

ेषणा… बहार से बोली… “माँ…. भैया उठे के नहे…?”

गोविन्द अब जल्दी से उठने लगा तो उस का लुंड मज़ीद आगे को हो गया…

और इस बार सीधा तीर निशाने पर था…

लुंड सीधा जा टकराया छूट से… एक आह निकली रजनी के मुंह से… और फिर न चाहते हुए भी वो हटी वह से…

गोविन्द वाशरूम चला गया… और नाहा कर कपड़े चेंज कर लिए…

ेषणा ने ब्रेकफास्ट स्टार्ट कर दिया था… गोविन्द भी अब किचन में आ गया… बहन को कहा…

गोविन्द… “इतना खाये गई तो मोती हो जये गई…”

ेषणा… “माँ… देखो न… बहिया तुंग कर रहा हे…”

माँ अपने आप को समबहलती हुई अपने विचारों से बहार आयी वो अभी तक गोविन्द के लुंड के स्पर्श के आनंद में थी…

और गोविन्द के लिए नाश्ता डालने लगी तो गोविन्द ने कहा के वो सिर्फ चाय पीये गए और एक घंटे का काम हे बहार… जब वापिस आये गए तो नाश्ता कर ले गए…

गोविन्द और ेषणा निकल परे… कार पर… गोविन्द ने विक्रम को चेक किया वो निकल गया था घर से शहर के लिए… कार जेसे hi रुकी किरण भी अपने घर से बहार आ गयी… और खुश हो गयी दोनों को देख कर…

किरण… “वह गोविन्द भैया… आप की कार तो बोहत शानदार हे…”

ेषणा… “चल अब बातें चोर… जल्दी बेथ गारी में…”

गोविन्द नीचे उतर आया और अपने पीछे वाली सीट के साइड का पिछले दरवाज़ा खोल दिया किरण के लिए…

किरण… को गोविन्द का यूँ अपने लिए कार का दरवाज़ा खोलना बोहत रोमांचक लगा… वो मुस्कुराती और शर्माती पिछली सीट पर बेथ गयी… कार चल पारी गाँव से बहार….

ेषणा और किरण दोनों स्कूल यूनिफार्म में थीं…

किरण… ेषणा की तरफ देखते हुए… “ेषु तुम पीछे बैठो ना… मुझे बैठने दो भैया के साथ…”

ेषणा… मुस्कुराते हुए… “ऐसा क्या करना हे तुझे जो यहाँ बैठना हे… कार में तो कुछ हो नहे सकता… चाहे आगे बैठो या पीछे… क्यों भैया…”

ेषणा की डबल मीनिंग बातें सुन कर गोविन्द मुस्कुराने लगा…

गोविन्द … “बोहत शरीर हो गई हो तुम…”

किरण भी कहाँ पीछे रहने वाली थी… “हो तो बोहत कुछ सकता हे कार में… अगर भैया चाहे तो…”

और हंस पारी ज़ोर से… ेषणा भी हंस पारी…

गोविन्द हैरान हो गया के क्या कहे इन दो आफत की पुरिया को…

उससे ऐसा लगा के घुंडा फँस गया था दो रज़िया के बीच…

ये ख्याल आते hi वो भी हंस पारा…

किरण हलकी आवाज़ में बोली… “हंसा तो फंसा…”

दोनों फिर से हंसने लगीं…

कार… राइट ड्राइव थी… मतलब ये के कार चलने वाला राइट साइड पे और उस के साथ वाला पास्सेनेगर ड्राइवर के लेफ्ट पे…

गोविन्द को पीछे से अपने राइट साइड पे बाज़ू और कमर के दरमियान एक हाथ महसूस हुआ…

गोविन्द समझ गया के किरण का हाथ हे… उस ने कोई आपत्ति न दिखाई… हाथ गोविन्द का बदन सहलाने लगा… कार अब गाँव से बहार रोड पर आ चुकी थी… कार ऑटो गियर थी… गोविन्द का राइट हैंड स्टीयरिंग पे था… लेफ्ट हैंड फ्री था… उस ने लेफ्ट हैंड रख दिया किरण के हाथ पे… ेषणा को मालूम न था के गोविन्द और किरण कुछ कर रहे हैं…

गोविन्द… अपने लेफ्ट हैंड से किरण का हाथ सहलाने लगा… किरण ने अपने हाथ की ग्रिफ्ट सख्त कर ली… और क्लोज हो गयी गोविन्द की सीट के पीछे से… और हाथ से गोविन्द का सीना सहलाने लगी…

ये ेषणा ने देख लिया… और मुस्कुराने लगी…

ेषणा… “भइया… ज़रा कार साइड में करो न खेतो की तरफ…”

रोड के दोनों तरफ दरख़्त और खेत थे… गोविन्द ने कार एक साइड पे कच्चे रस्ते पर कर दी… और थोड़ी आगे कर के साइड में खरी कर दी… एक बारे दरख़्त के साये में…

ेषणा… “भइया… मुझे ज़ोर का पेशाब लगा हे… में अभी आती हूँ…” ये कहते हुए कार से उतर गयी… वो असल में किरण को मौक़ा देना चाहती थी… वो समझती थी के गोविन्द शायद उस के सामने रिजर्व्ड रहे और आगे न बढ़े किरण के साथ….

गोविन्द… “ेषणा… ज़यादा दूर मत जाना…”

किरण… ेषणा के उतारते hi… “भैया… मुझे बैठना हे आप की गॉड में स्टीयरिंग को पकड़ना हे… देकना हे केसा लगता हे…”

गोविन्द ने सोचा के क्लियर नहे हुआ के किरण को गॉड में बेथ कर क्या देखना हे “केसा लगता हे” गॉड में बैठना या फिर स्टीयरिंग पकड़ना…
 
EPISODE – 28

ेषणा… “भइया… मुझे ज़ोर का पेशाब लगा हे… में अभी आती हूँ…” ये कहते हुए कार से उतर गयी… वो असल में किरण को मौक़ा देना चाहती थी… वो समझती थी के गोविन्द शायद उस के सामने रिजर्व्ड रहे और आगे न बढ़े किरण के साथ….

गोविन्द… “ेषणा… ज़यादा दूर मत जाना…”

किरण… ेषणा के उतारते hi… “भैया… मुझे बैठना हे आप की गॉड में स्टीयरिंग को पकड़ना हे… देकना हे केसा लगता हे…”

गोविन्द ने सोचा के क्लियर नहे हुआ के किरण को गॉड में बेथ कर क्या देखना हे “केसा लगता हे” गॉड में बैठना या फिर स्टीयरिंग पकड़ना…

गोविन्द… “ठीक हे… आगे आ जाओ…” और कार का दरवाज़ा खोल दिया… किरण भी दूर खोल कर आ कर उस की गॉड में बेथ गयी… कार दूर बंद कर दिया गोविन्द ने…

Kiran.jpg




बैठते शामे… किरण ने पीछे से अपनी कमीज उठा ली थी और अब शलवार में ढके अपने शूटरों के साथ उस की गॉड में उस के लुंड पे बैठी थी… गोविन्द का लुंड पूरी तरह तन्ना हुआ था किरण की चेर चार की वजा से और अब सीधा उस के शूटरों के बीच में आ गया…

किरण… सख्त लुंड महसूस करते hi… उस के मुंह से सिसकी निकल गई… आआह…

गोविन्द हैरान था किरण की हिम्मत पर…

किरण अपने चूतर रगड़ने लगी लुंड पे…

आगे पीछे होने लगी…

और कुछ देर के बाद अपनी टंगे खोल कर लुंड को एडजस्ट किया ताकि पूरा उस के शूटरों में आ सके…

गोविन्द को भी ाचा लगा… गोविन्द ने अपने दोनों हाथ उस के चुके पर रख दिए और दबाने लगा…

किरण ने सिसकी ली… “ाः… भैया ज़ोर से दबाओ…”

उधर ेषणा… खेतों में 2 क़दम hi आगे जा कर पलट कर दरख़्त की ओट से सारा मंज़र देखने लगी और अपने हाथ से अपनी छूट सहलाने लगी…

किरण के चुके बोहत नरम थे… 34 बी साइज के… हाथ लगते hi उस के निप्पल हार्ड हो गए… गोविन्द भी उस के निप्पल अंगूठे और ऊँगली में पाकर कर दबाने लगा मसलने लगा…

किरण की सिसकियाँ और चूतर हिलना बढ़ गया…

गोविन्द उस की गर्दन पर बोसे देने लगा और हल्का सा काट भी रहा था…

अचानक किरण ने अपना मुंह फेरा ुर गोविन्द को किश करने लगी… गोविन्द ने भी उस का पूरा साथ दिया…

किरण ने अपना एक हाथ अपनी टैंगो के बीच दाल कर आगे से लुंड को पाकर लिया और लुंड को अपनी छूट से लगाने लगी…

कुछ देर किश करते रहे… फिर किरण ने अपनी आँखें बंद कर लीं और बंद आँखों से कहने लगी…

किरण… “भैया… पिछली सीट पर चलें…??”

गोविन्द… “ेषणा आ जये गई…”

किरण… “भैया प्लीज उस की फ़िक्र न करो… टाइम वास्ते न करो… फिर पता नहे कब मौक़ा मिले…”

गोविन्द का लुंड भी अपने पूरे आकर में था और उस ने भी दिमाग़ से सोचना बंद करदिया था और लुंड से सोचने लगा था…

गोविन्द ने कार का दरवाज़ा खोल दिया… दोनों उतरे… दोनों ने एक दुसरे को बांहो में ले लिया… लुंड छूट के ऊपर थिरक रहा था…

दोनों किश करने लगे… किरण के चूतर सहलाने लगा…

गोविन्द… “तुम्हारा जिस्म बोहत नरम हे…”

किरण… “और आप का ये बोहत सख्त हे…” किरण ने लुंड पाकर लिया था और पनि छूट पे रगड़ने लगी शलवार के ऊपर से…

किरण… “ये अंदर जये गए तो बोहत दर्द होगा…??”

गोविन्द… “तुम अंदर लेना चाहती हो…??”

किरण… “हाँ…”

किरण बिलकुल नहे शर्मा रही थी… मगर उस के सवाल से लग रहा था के वो वर्जिन हे…

गोविन्द… “अभी तक तुम ने किसी के साथ सेक्स नहे किया…???”

किरण… “नहे… आप पहले हो….”

गोविन्द… “तो फिर बेहतर हे की अंदर न लो… बहार बहार से मज़े ले लो… और ये जगा भी मुनासिब नहे हे…”

किरण… “पहले प्रॉमिस करो के बाद में किसी ठीक जगा पर इंतज़ाम कर के अंदर डालो गए… मेरा बोहत दिल करता हे…”

गोविन्द … “प्रॉमिस…”

किरण… “अभी कैसे मज़ा दो गए…???”

गोविन्द जनता था के इस शामे इन खेतो पर कोई नहे आता जाता…

गोविन्द ने उसे हाथ से पाकर कर कार की पिछली सीट पर लिटा दिया और खुद 69 वाली पोजीशन में उस के ऊपर आ गया…

और ऊपर आ कर पहले उस ने अपनी शलवार नीचे की और फिर किरण की शलवार के साथ साथ उस की पंतय भी नीचे कर के उस की छूट नंगी की…

किरण लुंड देख कर… “ोये… इतना बारे और मोटा… ये तो मेरी योनि में नहे जये गए…”

गोविन्द… “जब ठीक जगा होगी तो बिलकुल जये गए तुम्हारी छूट में… अब लुंड को अपने मुंह में ले कर चूसो जेसे कुल्फी चूसते हैं…”

और साथ hi गोविन्द उस की छूट देखने लगा… बिलकुल बंद… छूट के लैब नरम और छोटे से… गुलाबी… जेसे कोई अध् खिला फूल… जेसे कोई गुलाबी लकीर… उस ने अपनी ज़बान फेरी छूट की होंटो पर… बरी प्यारी सौगन्द थी…

किरण ने ज़बान लगते hi झटका कहाया…

ाः… उस के मुंह से निकली और अब उस ने भी लुंड को चूमा और फिर अपने मुंह में लेकर चूसने लगी… किरण एक हाथ गोविन्द की गांड पर फेर रही थी….

किरण अब पूरे जोश में चूस रही थी… गोविन्द ने छूट के ऊपर से ज़बान लगनी शुरू कर दी… और चोट मरने लगा छूट पर ज़बान से…

हाथ पोहंचा गोविन्द की गोलिओं पर… गोविन्द को ाचा लगा… और हाथ सहलाने लगा गोविन्द के तट और गांड… गोविन्द को मालून न था के ये हाथ ेषणा का हे… वो भी इस खेल में शामिल हो गयी थी…

अब गोविन्द ने भी जोश में छूट के लैब खोलते हुए चेतना शुरू कर दिया…

सिसकियाँ और आहें निकलने लगीं किरण के मुंह से…

गोविन्द छूट चाटने में इतना मगन हुआ के नोटिस हे नहे कर सका के एक और मुंह भी उस का लुंड चूस रहा हे… अब दो अलग अलग मुंह चूस रहे थे गोविन्द के लुंड को…

गोविन्द ने देखा के छूट के ऊपर दाना अपनी साइज बढ़ा रहा था और फूल रहा था… गोविन्द ने दाने को अपने मुंह में जेसे hi लिया… किरण ने अपने नाख़ून उस के गांड पर गर दिए और सिसकियाँ लेने लगी ज़ोर ज़ोर से…

Oiuuee…oooiieee… उम्म्मेह… ाः आह… आह…

और फिर हलकी चीख के साथ छूट उठा उठा कर गोविन्द के मुंह पर मरने लगी और झरने लगी…

दो (2) मुंह की ीखते चूसै… लुंड भी बर्दाश्त न कर सका और गोविन्द भी डिस्चार्ज होने लगा… माल कुछ किरण के मुंह पर गिर रहा था और कुछ ेषणा के मुंह के में अंदर जा रहा था…

गोविन्द ने मुर के देखा तो उस की आँखें पहात गयी… ेषणा भी किरण के साथ उस की मलाई चाट रही थी…

ेषणा बोहत खुश नज़र आ रही थी… गोविन्द ने उससे कुछ कहना मुनासिब न समझा…

किरण बोली… “भैया… थैंक यू… ऐसा मज़ा पहले कभी नहे आया…”

ेषणा… “भैया… मेरी भी छतो न…”

गोविन्द… “अभी डिअर हो रही हे… फिर कभी…”

अब सब वापिस उसी तरह कार में बेथ गए जेसे ए थे… और गोविन्द ने कार गाँव की तरफ मोर दी…

किरण… “आप की मलाई तो बोहत मज़ेदार थी…”

ेषणा… “हाँ भाई… मुझे भी पता नहे था के इतना मज़ेदार टास्ते होता हे… किरण की योनि का केसा टास्ते था…”

गोविन्द मुस्कुराते हुए… “बोहत कामुक… और मज़ेदार…”

किरण खुश होने लगी और कहा… “भैया… अंदर डालने का इंतज़ाम जल्दी करना…”

दोनों अपने स्कूल के पास उतर गयीं और गोविन्द ने कार वापिस घर की तरफ मोर ली… जहाँ माँ इंतज़ार कर रही थी…
 
EPISODE – 29

गोविन्द ने कार गाँव की तरफ मोर दी…

किरण… “आप की मलाई तो बोहत मज़ेदार थी…”

ेषणा… “हाँ भाई… मुझे भी पता नहे था के इतना मज़ेदार टास्ते होता हे… किरण की योनि का केसा टास्ते था…”

गोविन्द मुस्कुराते हुए… “बोहत कामुक… और मज़ेदार…”

किरण खुश होने लगी और कहा… “भैया… अंदर डालने का इंतज़ाम जल्दी करना…”

दोनों अपने स्कूल के पास उतर गयीं और गोविन्द ने कार वापिस घर की तरफ मोर ली… जहाँ माँ इंतज़ार कर रही थी…

गोविन्द ने सोचा… “ेषणा कब आये थी लुंड चूसने के वक़्त… क्या उस ने भी चूसा था… इतना आगे शायद जाना बहन के साथ ठीक नहे… ऊपर ऊपर से टच करना या गुप्त अंग फील करना तो अलग बात हे… मगर लुंड चूसना या छूट चेतना ये कुछ ज़यादा हो गया हे… ऐसा नहे होना चाहिए था… मगर जो कुछ हुआ उस का मुझे पता भी नहे था… ेषणा से बात करनी परे गई… उससे समझाना ज़रूरी हे…”

गोविन्द जब घर आया तो देखा के माँ कपड़े धो रही हे…

वाशिंग मशीन तो थी नहे… माँ हाथ से धो रही थी…

माँ… “बीटा… नाश्ता रखा हे किचन में… कर ले…”

गोविन्द नाश्ता करते हुए… सब के दिमाग़ में गया ताकि लेटेस्ट इनफार्मेशन मिल जये…

आशा बक्शी ऑफिस पोहंच चुकी थी… कोई खास क्राइम रिपोर्ट नहे हुआ था शहर में… कोई खास बात भी इन्सपेकर्स ने रिपोर्ट नहे की थी… रत फिर बेचैनी में गुज़री थी गोविन्द को यद् करते करते…

सीमा ठीक थी… रिया भी ठीक थी… लाला जी ऑफिस के लिए तैयार हो रहे थे और उन का कॉन्फिडेंस लेवल भी ाचा था… मल्टी भाभी बोहत खुश थी… अभी शावर ले रही थी और गुनगुना रही थी… गोविन्द के साथ हुई रात की चुदाई भी यद् कर रही थी… गोविन्द मुस्कुराता हुआ… रुक्मणि सोच रही थी के गोविन्द कब ए गए… प्रकाश भैया और बापू ने ज़मींदार से बात कर ली थी… और ज़मींदार को कोई ऐतराज़ नहे था… मगर वो छह रहा था के बकाया काम दोनों आज ख़तम कर लें…

रिया का एक पेपर स्टार्ट हो चुक्का था… 9 से 12… दूसरा पेपर 1 से 4 तक था और 4 बजे तक यूनिवर्सिटी से फ़ारिग़ होनी थी…

नाश्ता ख़तम होने के बाद उससे चाय की तालाब हुई तो उस ने सोचा माँ को न कहे और खुद बना ले चाय… मगर माँ ने बर्तन का आवाज़ सुन लिया … “बीटा… क्या कर रहा हे… किचन में…??”

गोविन्द… “माँ … चाय बना रहा हूँ…”

जब तक बर्तन में पानी भरता… माँ आगयी… माँ के कपड़े गीले थे… गीले कपड़ों की वजा से सब कुछ दिख रहा था… गदरायी टंगे… बारे बारे चुके… ऊपरी हिस्सा गीले होने की वजा से चमक रहा … बोहत आकर्षित मंज़र था… माँ उस से बर्तन लेने लगी … वो नहे दे रहा था… इस खिंचा तानी में वो पूरा माँ के साथ सात गया… और माँ के जिस्म का स्पर्श भी उस उत्तेजित करने लगा… लुंड फिर से तन ने लगा…

गोविन्द… “चल माँ … दोनों साथ करते हैं…”

माँ हंसने लगी… “पगला गया हे क्या… दोनों साथ कैसे करे गए…”

अब स्तिथि ये थी के माँ आगे आ कर उस के और नल के दरमियान आ गई थी जहाँ से पानी भरते हे बर्तन में… माँ के हाथ बर्तन को पकड़े हुए थे और गोविन्द के हाथ ने माँ के हाथ… माँ के पीछे खरा था सात के गोविन्द और उस का लुंड टच हो रहा था चूतर के एक साइड पर…

माँ कुछ और आगे को हुई तो लुंड उस की चूतरो के बीच में आ गया और अंदर धंसने लगा…

माँ… “आह… बीटा में कर लूँ गई तू चोर न…”

गोविन्द… “माँ… सारा दिन लगी रहती हे अकेली… मिल कर करते हे न…”

माँ… “मेरा लाल… न तुंग कर…”

माँ पानी भर चुकी थी मगर वह से हूत नहे रही थी… तेज़ तेज़ सांसे ले रही थी… साफ पता चल रहा था के उसे भी ाचा लग रहा हे… वो भी आनंद ले रही हे लुंड के स्पर्श का…

गोविन्द को भी बोहत मज़ा आ रहा था…

माँ के चूतर गदराये हुए और भरे भरे थे…

माँ… “बीटा… तुम, तुम्हारा बापू और प्रकाश… सब चले जाओ गए तो मैं और ेषु अकेले रह जयें गए…”

गोविन्द… “माँ… तू चिंता न कर… में आ जाया करूँ गए तेरे पास और बस 15 दिन की तो बात हे…”

माँ थोड़ा सा पीछे को हुई और लुंड और अंदर खूब गया चूतड़ों के बीच…

अब माँ के मुंह से साफ़ दो बार आह… आह… निकली…

फिर माँ ने वही खरे खरे… बर्तन को चूल्हे पे रख दिया…

न माँ वह से हिल रही थी न गोविन्द…

अब गोविन्द ने ज़रा सा लुंड को और अंदर दबाया…

माँ ने बेसिन के स्लैब थाम लिया और थोड़ा सा झुक गयी…

झुकने से चूतर थोड़ा खुल गए और लुंड और अंदर समां गया… उस ने लुंड और दबाया तो माँ को छेद पर फील हुआ… ोीीे माँ… सिसकी निकली रजनी के मुंह से…

माँ… जज़्बात में रुंधी हुई आवाज़… “बीटा… चाय की पति का डिब्बा उस तरफ हे… तू अपना हाथ बढ़ा कर उठा दे मुझे…”

गोविन्द ने एस यही किया … इस दौरान दोनों उसी जगा खरे रहे…. कोई न हिला… माँ थोड़ा और झुकी और इस बार लुंड न सिर्फ गांड के छेद को पूरा छुआ बल्कि थोड़ा सा छूट को भी टच हुआ ुर माँ काबू न रख सकीय और पलट गयी और गोविन्द को अपनी बांहो में ले लिए…

माँ का मुंह छुपा हुआ हे गोविन्द के सीने में… “बीटा न तुंग कर… में बर्दाश्त नहे कर पौन गई… बहक जॉन गई… तू बरामदे में बेथ… तुझे चाय देती हु…”

अब गोविन्द ने ज़िद करना मुनासिब न समजहा और माँ को अपने गले लगाया ज़ोर से और एक किश किया माँ के गाल पर और जा कर बेथ गया बरामदे में राखी कुर्सी पर…

माँ चाय ली आयी… माँ की नज़रे झुकी हुई थी… हाथ लरज़ रहे थे… और चाय गोविन्द के हाथ में देते hi… कोई बात किये बिना… भगति हुई… सहन में चली गयी… कपड़े धोने…

चाय पीते पीते… गोविन्द चला गया लाला जी के पास और देखा वह ठेकेदार और अर्चितचत बैठे हे… उस ने दोनों को गाइड किया उन के दिमाग़ में नक़्शे के बारे में और कंस्ट्रक्शन के बारे में… गोविन्द ठेकेदार के साथ था जब वो अधिकारिओं के पास गया और वहां भी उन के दिमाग़ को इन्फ्लुएंस किया जिस वजा से सारा काम मैप अप्रूवल का और दूसरी फॉर्मलिटीज का एक hi दिन में हो गया… 4 कमरों और वाशरूम्स का रिवाइज्ड प्लान समझाया और एक सेपरेट घर का प्रपोजल ज़ेहन में बिठाया… जिस में 5 बेडरूम्स, 3 आत्ताच बाथ एक सेपरेट बाथ लाउन्ज में, एक ड्राइंग रूम और किचन और गेराज 500 सक यार्ड्स पे शामिल थे….

लाला जी भी हैरान हुए… के इतनी जल्दी कैसे काम हो गए सरे…

कंस्ट्रक्शन वर्कर्स और ज़रूरी मशीनरी भी पोहंचना शुरू हो गई थी…

पुराने गोदाम पैर भी काम शुरू हो गया था…

ट्रक मैकेनिक के पास पोहंच गया था…

गोविन्द ने वर्कर्स की मंद फोकस को रिप्रोग्राम करते हुए जिस तरह राजन काका की पावर को एनहान्स किया था उसी तरह तमाम कंस्ट्रक्शन वर्कर्स को भी गाइड किया ताकि कंस्ट्रक्शन जल्द कम्पलीट हो सके… इस तरह वर्कर्स ने 4 दिन का काम एक दिन में करना था… गोविन्द ने लाला जी के दिमाग़ में बात डाली के वर्कर्स के लिए अचे खाने का और दूसरी सहूलतों का अरेंजमेंट किया जये ताकि वो खुश खुश अपना काम करें…

गोविन्द का साधु महारज से मिली शक्ति पर कण्ट्रोल भी बेहतर हो रहा था और वो नए तरीके भी सीख रहा था… मंद कण्ट्रोल के…

ेषणा की तरफ धयान लगाया…

ेषणा और किरण अब कैंटीन की तरफ आ चुकी थी और स्नैक्स खा रहीं थीं… सुबह की एक क्लास नहे थी और दूसरी क्लास स्टार्ट होने से पहले पोहंच गयी थी… अभी फ्री पीरियड था…

ेषणा… “यार किरण… मुझे लगता हे भाई मेरे साथ ये सब नहे करना छठा…”

किरण… “यार तू ऐसा क्यों बोल रही हे… कितन प्यार करते हैं गोविन्द भैया तुझे… और में ने तुझे पहले hi कहा था के अगर तू चाहे तो विक्रम भाई के साथ तेरा चाकर चलने में में हेल्प कर सकती हु…”

ेषणा… “मगर तुम ने hi तो बताया था के विक्रम भाई का 5 इंच से बारे nhe…jab तुम ने चुप के उन्हें मुठ मरते देखा था… अब यार तुम hi बताओ… एक बार गोविन्द भाई जैसा विशाल लुंड देख कर कोई कहीं और कैसे जा सकता हे… और तू खुद भी तो पहले यही कह रही थी के गोविन्द भाई के साथ सेटिंग कर… और अब तू कह रही हे कही और कर लूँ… और वैसे भी में तो सिर्फ भाई के साथ ओरल सेक्स hi करना चाहती हूँ… उन को इस पर तो ऐतराज़ नहे होना चाहिए…”

किरण… “हम्म्म… तू ठीक कह रही हे… बस अब ज़यादा परेशां न हो… जो होगा ाचा होगा…”

ेषणा… “और हाँ यद् रखना जो तू भाई से अंदर डलवाने का कह रही थी न वो भी मेरे सामने करे गई… ऐसा न हो मुझे भूल जये…”

किरण… “ाचा… मेरी माँ समझ गयी… तू चुदाई भी देखना चाहती हे…”
 
EPISODE – 30

ेषणा… “और हाँ यद् रखना जो तू भाई से अंदर डलवाने का कह रही थी न वो भी मेरे सामने करे गई… ऐसा न हो मुझे भूल जये…”

किरण… “ाचा… मेरी माँ समझ गयी… तू चुदाई भी देखना चाहती हे…”

ेषणा… “हाँ तो और क्या… चल अब तू बता केसा लगा था छूट चटवा कर…”

किरण… “यार मत पूछ… इतना मज़ा कभी नहीं आया… और यार अभी रहने दे ये क़िस्सा… अभी क्लास स्टार्ट होने वाली हे 15 मिनट में और अगर में ने ये कहानी अभी कही तो मेरी छूट फिर से गीली हो जये गई और में नहे बेथ सकूँ गई चैन से…”

ेषणा… “ठीक हे फिर बात करें गए इस मुड़े पे…”

किरण… “यार अगर एक बात कहु तो तू नाराज़ तो नहे होगी…”

ेषणा… “अरे बोल यार… तेरी बात पे कहाँ नाराज़ होती हूँ…”

किरण… “यार गोविन्द भैया ने जिस तरह प्यार किया ुर छूट छाती… मुझे लगता हे के वो ये सब करते रहते हे और उन के चाकर और लड़किओं से भी होंगे…”

ेषणा… “ये सुन कर चुप हो गयी” फिर हँसते हुए बोली… “यार मेरा भाई इतना हैंडसम और विशाल लुंड का मालिक हे तो ज़रूर और लड़कियां भी तो दीवानी हों गई भाई की… में वैसे पूछूं गई उन से ज़रूर…”

अब गोविन्द निकल आया ेषणा के दिमाग़ से और सोचने लगा के बरी तेज़ हे दोनों…

अब गोविन्द को 2 बजे तक निकलना था… शहर के लिए ताकि 4 बजे तक यूनिवर्सिटी पोहंच जये रिया के पास…

उस ने धयान लगाया बापू और प्रकाश की और… वो काफी काम कर चुके थे… मगर ज़मींदार उन को चोरता शाम तक… गोविन्द ज़मींदार के दिमाग़ में गया और उस को आमादा किया के वो कैलाश और प्रकाश को 12 बजे तक अभी इजाज़त दे जाने की… और यही हुआ… ज़मींदार ने उन को बुला कर कहा के 12 बजे तक चले जयें… अभी हो रहे थे 11.00… गोविन्द ने बापू और प्रकाश को समझाया के घर पोहंच कर तैयार होना हे और गोविन्द अगर शहर जये तो उस के साथ निकल जयें गए…

गोविन्द ने फिर माँ को सम्जहय के अगर बापू और प्रकाश जल्द आ जयें तो उन्हें कह दे के 2 बजे निकले गए वो तैयार रहें…

और फिर गोविन्द घर से निकल कर चला गया हवेली… वहां सिमर सिंह जग चुक्का था… सिमर सिंह उस को देख कर खुश हुआ… गोविन्द ने सिमर सिंह को सम्जहय के अगर वो शहर अनाज लेकर न जयें और यहाँ पर hi सौदा कर लें तो उन का ट्रांसपोर्ट का खर्चा भी बचे गए और उन को मंडी वालो को अनाज रखने के लिए कमीशन भी देना नहे परे गए… और वो उन को रेट से 5 टक्का ज़यादा दिलवा दे गए… सिमर सिंह को बात समझ में आ गयी उस ने सौदा पक्का कर लिया और गोविन्द को शाबाश दी के वो ठीक कर रहा हे… और प्रॉमिस भी किया के वो मल्टी के बाप से भी और जो दुसरे ज़मींदार हैं उन से भी बात करे गए… गोविन्द को ये इत्मीनान था के जो ज़मींदार नहे मने गए उस को मंद कण्ट्रोल कर के मनवाया जा सकता हे… बहरहाल उस की पहली कोशिश ये थी के शक्ति इस्तेमाल न की जये और ख़ुशी से सब को उन का फ़ायदा समझते हुए उन की मर्ज़ी से सुआदा किया जये…

सिमर सिंह ने बताया के वो ज़मीनो पर जा रहा हे… गोविन्द ने कहा के वो राजन काका से मिल कर चला जये गए… गोविन्द पहले hi चेक कर के आया था के शकुंतला देवी और मल्टी भाभी सरपंच के घर गयी हुई थी पुरसा देने…

सिमर सिंह के निकलते hi… गोविन्द काका की तरफ मर्दाने में जाने के बजाये… किचन की तरफ चला गया जहाँ रुक्मणि बैठी सब्ज़ी काट रही थी…

गोविन्द को देख कर… रुक्मणि… “आ गए सर्कार… कल से यहाँ ए हो गाँव में और अब मिलने ए हो…”

गोविन्द ने कोई जवाब नहे दिया और जा कर रुक्मणि को उठाया हाथ पाकर कर और साथ में चलता हुआ चला ऊपरी मंज़िल की तरफ… जो के खली पारी रहती थी और कोई ऊपर जाता भी नहे था… सिर्फ रुक्मणि कपड़े डालने और उतरने जाती थी… वह दो कमरे बने हुए थे… रुक्मणि कुछ बोल नहे रही थी मगर आँखों में चमक थी उस के…

गोविन्द ने कमरे में आ कर दरवाज़ा अंदर से लॉक कर दिया… कमरे में हलकी रौशनी थी… जो रोशनदान से आ रही थी… गोविन्द, रुक्मणि को अपनी बांहो में लेकर किश करने लगा होंटो पर… रुक्मणि भी मज़े से किश करती हे…

गोविन्द, उस की गर्दन पर किश और फिर ज़बान फेरने लगता हे… अभी रुक्मणि किचन में थी और सुबह से काम कर रही थी तो उस के बदन पसीने में तरबतर था और सरे जिस्म से पसीने की सौगन्द आ रही थी… गोविन्द को अजीब सा अहसास हो रहा था… उस का मन खिंच रहा था… भली लग रही थी ये पसीने की सौगंध…

उस ने हलके काट लिया… गर्दन पर…

रुक्मणि… “ाः… ो मेरे बहनचोद राजा… काट क्यों रहा हे… खाये गए या चोदे गए…”

गोविन्द को इस तरह का अनुभव पहली बार हुआ था…

औरत के यूँ गली देना और उस के बदन से पसीने की महक…

गोविन्द के अंदर का वेह्शी जग रहा था…

गोविन्द… “तुझे खून गए साली… मोठे चुचु वाली… गांड भी मरुँ गए तेरी… कितना बारे पिछवाड़ा हे तेरा…”

और उस की साडी उतर कर पास पारी एक पुराणी सी लकड़ी की बेंच पर लिटा दिया रुक्मणि… ब्लाउज के ऊपरी बटन खोल कर… अपना लुंड निकल लिया बहार… और रुक्मणि के हाथ में दे दिया…

रुक्मणि… “तू इंसान हे या घोरा… इतना बारे लौड़ा… भोस्डिके.. तू तो मेरी छूट का भोसड़ा बना दे गए… आज तो तू मर hi डेल गए मुझे… अब करूँ क्या… छोड़ ले तू भी छोड़ ले… रुक्मणि को छोड़… अपनी रांड बना…”

और तेज़ी से उस के लुंड को मुठिएने लगी…

गोविन्द ने चुचो को चूसना शुरू कर दिया… चुके बारे बारे दूध के टैंकर लग रहे थे… गोविन्द के मुंह में नहे आ रहे थे…

गोविन्द… मन में… “ये साली बोहत गरम माल हे… इस को छोड़ना एक अकेले का काम नहे… इस के ऊपर तो 3 से 4 अखाते चढ़े तो कुछ इस की गर्मी ठंडी होगी…”

गोविन्द की हैवानियत बढ़ती जा रही थी उस ने अब चुचो पर काटना स्टार्ट कर दिया था…

रुक्मणि की आहे और गालियां साथ निकल रही थीं…

मादरचोद… रजनी का बीटा हे न तू… छोड़ू… वो हरामज़ादी भी बरी गांड वाली हे … उस को छोड़ न… उस को काट न हरामी…

आज तू ने मुझे ठंडा न किया तो तेरी गांड में डंडा दे दूँ गई…

गोविन्द अब निप्पल पे काट रहा था…

रुक्मणि… चटपटा रही थी… ोीी… अम्मा… ो मोरी मिया… हए राम… ोीी… ाः … हरामी… भोस्डिके… कब चोदे गए… तारपा रहा हे… मादरचोद…

लुंड को रुक्मणि के मुंह में दाल दिया… लुंड चूस कर उस ने गिला किया तो गोविन्द ने बहार निकल लिया….

गोविन्द ने चूस चूस कर चुके अचे खासे गिल्ले कर दिया थे फिर भी काफी सारा थूक दोनों चुचो के बीच डाला और दोनों चुचो को हाथो से दबा कर लुंड चुचो के दरमियान घाटी में रैगर ने लगा… या यूँ कहें के चुके छोडन कर रहा था… चुचों के अंदर दबा लुंड जब घिसते हुए आगे को होता तो रुक्मणि के होंटो को छू लेता…. जेसे के लुंड अपनी टोपी से उस के हनोतो को चुम रहा हो…..

उसी वक़्त एक ज़ोर का खटका हुआ और दोनों की पहात कर हाथ में आ गयी…
 
EPISODE – 31

गोविन्द ने चूस चूस कर चुके अचे खासे गिल्ले कर दिया थे फिर भी काफी सारा थूक दोनों चुचो के बीच डाला और दोनों चुचो को हाथो से दबा कर लुंड चुचो के दरमियान घाटी में रैगर ने लगा… या यूँ कहें के चुके छोडन कर रहा था… चुचों के अंदर दबा लुंड जब घिसते हुए आगे को होता तो रुक्मणि के होंटो को छू लेता…. जेसे के लुंड अपनी टोपी से उस के हनोतो को चुम रहा हो….

उसी वक़्त एक ज़ोर का खटका हुआ और दोनों की पहात कर हाथ में आ गयी…

रुक्मणि ने उठने की कोशिश की मगर गोविन्द ने उस को उठने न दिया… वो देख चुक्का था के सामने ऊपर बने रोशनदान से एक बिल्ली कुड़ी थी…

गोविन्द… “चुप रह साली… लेती रह… बिल्ली हे…”

और फिर से चुके छोड़ने लगा…

रुक्मणि ने आँखें बंद कर लीं और उस के टट्टे टटोलने लगी अपने हाथ से….

सहलाने लगी गोलिओं को….

काफी देर तक गोविन्द ऐसे हे चुचो को छोड़ता रहा… और अचानक रुक्मणि ने जज़्बात में गोलिओं को दबाया जिस से गोविन्द की चीख निकली और साथ में माननी का फवारा छूटा… साडी मलाई रुक्मणि की आँखों… नक् और माथे पर चली गयी…

फिर से रुक्मणि की गालिया शुरू हो गयी…

अबे बहनचोद के बचे… मेरा मुंह पे अपनी माँ की साडी मलाई परोस दी हे तू ने… गांडू का बचा…

गोविन्द का लुंड अब भी खरा हुआ था… उस ने रुक्मणि को पलट दिया और पेट के बल लिटा दिया… अब रुक्मणि की फूली हुई बरी … बोहत बरी… गांड सामने थी … गोविन्द ज़ोर ज़ोर से अपने लुंड को मरने लगा गांड के ऊपर… पहले एक चूतर पे ज़राब लगता फिर दुसरे पर…

रुक्मणि… “आअह्ह्ह… हरामी… मुझे पता था तू मेरी गांड के पीछे आया हे… सब को बस मेरी गांड चाहिए… छूट कोण चोदे गए… तेरा बाप… अरे बहनचोद… आग की भट्टी तो छूट में हे…”

रुक्मणि गालिया दे रही थी और उंगलियों से मुंह पे लगी माली भी साफ कर के चाट रही थी…

रुक्मणि… “तेरी मलाई तो मस्त हे लोंदे…. हम्म्म … लपा… लैप.. हम्म्म…”

गोविन्द बेथ गया घुटनो पर और अपने मुंह लगा दिया उस की गांड पर और दांत गर कर काटने लगा… रुई जेसे नरम… हिलते चूतर…

खाने लगा चुतरों को…

और फिर दोनों चूतरो को खोला अपने हाथो से…

छूट और गांड के छेद को सूंघा… और गोविदं फिर से पागल होने लगा… होश खोने लगा… चेतना और खाना शुरू कर दिया… छूट को कभी गोल छेद को…

गालिया बराबर निकल रहीं थीं रुक्मणि के मुंह से… और अब अचानक… पड़ने लगी… फररर… पह्रररर…

गोविन्द ज़रा देर के लिए हटा और फिर ज़बान लगा दी उस ने छेद पर जो मधुर गैस चोर रहा था…

और फिर एक एक उठा और अपना तन्ना हुआ लुंड उस की छूट में पेल दिया और तूफानी ढके लगाने लगा…

गलियों के साथ अब रुक्मणि के मुंह से सिसकियाँ निकलने लगी थी..

Aaa…aaah…aaaah…. हरामी …. छोड़ ऐसे छोड़…. ज़ोर ज़ोर से छोड़… भोसड़ा बना दे मेरी बुर को… बोहत तंग करती हे….

ोीीईए… ोईए… और झरने लगी…

बारे खतरनाक झटके थे रुक्मणि के….

ऐसा रूप औरत का गोविन्द के लिए… कभी नहे देखा था उस ने औरत को ऐसा… जंगल बिल्ली थी रुक्मणि… सेक्स की भूकी… मगर इतना वक़्त नहे था गोविन्द के पास इस बारे में सोचने का…

उस ने फ़ौरन बोहत साडी थूक… टपका दी … छेद पर और लुंड छूट से निकल कर गांड में एक झटके में पेल दिया…

एक ज़ोरदार चीख मरी रुक्मणि ने…. और ज़ोर ज़ोर से टंगे चलने लगी अपने आप कप चुराने के लिए… पर गोविन्द ने पहले hi एक आहत से उस की गर्दन पकरि हुई थी और दूसरा हाथ रखा हुआ था उस की कमर पर…

रुक्मणि अपने आप को चुरा न सकीय… जंगली बिल्ली हर गयी जंगली बाज़ से…

रुक्मणि के लिए वो दर्द बर्दाश्त करना मुमकिन नहे था…

अब उस के मुंह से बस कराहें निकल रहीं थी… गलियां नहे…

ोूई.. मर गयी… ोीी… माँ… ोीीे… माँ…. मर गयी…

आंसूओ बहने लगे थे उस की आँखों से…

कुछ देर पहले छूट रोई थी लज़्ज़त की वजा से… और अब आंखें नुम थी इस दर्द से….

कुछ देर को गोविन्द ठहरा और फिर बोहत सारा थूक दाल दिया छेद के ऊपर… और आहिस्ता आहिस्ता अपना लुंड बहार निकलने लगा…

रुक्मणि ने अपना बदन ढीला चोर दिया था… जेसे बेहोश हो गयी हो…

लुंड फिर से अंदर जाने लगा …. इस बार आहिस्ता आहिस्ता…

इसी तरह कुछ देर तक लुंड अंदर बहार होता रहा… होल होल…

गोविन्द के लिए ये बारे अजीब था… इतना तुंग सूराख… लुंड पर भी दबाओ था… लुंड अंदर बहार होता रहा… और आहिस्ता आहिस्ता छेद कुछ जगा दे रहा था… कुछ देर के बाद छेद मज़ीद खुला और अब गोविन्द को लगा के उस के लुंड पे जो ग्रिफ्ट बनाई थी गांड के सूराख ने वो काम हो रही हे…

गोविन्द ने अब अपने ढके बढ़ा दिए…

और कुछ देर बाद तो फुल मोशन में आ गया…

और साथ साथ थापर मरने लगा चूतरो पर…

रुक्मणि के मुंह से फ़क़त कराहे निकल रहीं थी.. अब कोई गली नहे थी…. उस के मुंह पे…

गोविन्द ने रफ़्तार बढ़ा दी… अब रुक्मणि की कराहें सिसकियों में बदल गयी… और वो भी गांड उठाने लगी…

सूराख काफी जगा बना चुक्का था विशाल लुंड के लिए…

और फिर एक ज़ोर का झटका लिया रुक्मणि ने… और फिर से झरने लगी…. ाः… ाः… में गयी… हहह गयी… ाः…

और फिर से गोविन्द ने लुंड निकला गांड से और कोई मौक़ा दिए बग़ैर दाल दिया छूट में… और अब रुक्मणि जो के जहर hi रही थी… और ज़ोर से झरने लगी….

आह… ases…aah aese…aah ऐसे.. aah…aaaah….aaaah

और शिदत से अपनी छूट वापिस मरने लगी लुंड पे….

अब गोविन्द छोड़ रहा था छूट को बारे ज़ोर से…

पहले के लगाए गए सब ढको से ज़यादा तेज़ ढके…

गद्दार ढके….

रुक्मणि अब बोहत मज़े से छुड़वा रही थी और बस मुंह से आहें निकल रही थी… एक आनंद था जो प्राप्त हो चुक्का था…. रुक्मणि को… कुछ थेरो सा आ गया था रुक्मणि के सुभाऊ में….

काफी देर तक यूँही छोड़ने के बाद गोविन्द झुक गया… और लेट गया उस के ऊपर… और हाथ नीचे से ले जा कर चरने लगा छूट के डेन को…

रुक्मणि… “हम्म्म… मज़्ज़ा आज्ञा… हम्म्म ऐसे hi… आह… ाचा लग रहा हे…”

गोविन्द, लेते लेते उस की पीठ पर, लुंड को घूमता हुआ छूट में… दाने को छेरता रहा….

उस की म्हणत रंग लाई और रुक्मणि फिर से झरने लगी…

ाः… ोूई… आह… ोूई … में गयी… ोीी… ाः….

अब गोविन्द ने सीधा कर के रुक्मणि को पीठ के बल कर दिया और लुंड को अब उस के मुंह में दाल दिया… लुंड जो के छूट और गांड के रास से सना हुआ था… रुक्मणि उसे बारे मज़े से चूसने लगी… और चूस चूस कर फ़ारिग़ कर दिया… साडी मलाई सीधे रुक्मणि के हलक़ में उतरने लगी….

अब दोनों साथ लेट गए… बेंच पर जगा काम थी तो दोनों एक दुसरे के ऊपर hi थे…. रुक्मणि ने गोविन्द के बालों को सहलाया और प्यार किया उस के गलो पर…

रुक्मणि… “मेरे राजा… आज से तेरी घुलम हु… तेरी रांड हु… तेरी दासी हु… जो सुख आज मिला हे… वो कभी नहे मिला… आज साडी पायस बुझ गयी…”

गोविन्द चुप था बस सुन रहा था बातें रुक्मणि की… कुछ थक सा गया था…

अचानक एक झटके से उठी… रुक्मणि… ोये तेरी… कितनी देर हो गयी… चल नीचे चले…

दोनों ने कपड़े पहने और गोविन्द ने पहले चेक किया के कोण कहा हे और क्या कर रहा हे… शकुंतला और मल्टी बस कार में बैठने वाली थी सरपच के घर से निकल कर और राजन काका मर्दाने में थे… दोनों नीचे उतरे… गोविन्द चुपके से निकल कर बहार आ गया… और अपनी कार को स्टार्ट कर के… थोड़ा आगे जा कर रुका… और पानी की बोतल निकली कार की डिग्री से और अपने मुंह को धोया अछि तरह से और बल भी ठीक किये…
 
EPISODE – 32

दोनों ने कपड़े पहने और गोविन्द ने पहले चेक किया के कोण कहा हे और क्या कर रहा हे… शकुंतला और मल्टी बस कार में बैठने वाली थी सरपंच के घर से निकल कर और राजन काका मर्दाने में थे… दोनों नीचे उतरे… गोविन्द चुपके से निकल कर बहार आ गया… और अपनी कार को स्टार्ट कर के… थोड़ा आगे जा कर रुका… और पानी की बोतल निकली कार की डिग्री से और अपने मुंह को धोया अछि तरह से और बल भी ठीक किये…

और घर की तरफ चला… बापू और परकसह घर आ चुके थे… दोनों तैयार हो कर लंच कर रहे थे…

गोविन्द भी फ़ौरन चला गया… वाशरूम की तरफ और नाहा कर पंत शर्ट पेहेन ली…

और बहार आ कर प्रकाश और बापू के साथ दो तीन निवाले लिए खाने के…

ेषणा भी घर आ चुकी थी… बापू, प्रकाश और गोविन्द उठे शहर को निकलने के लिए… माँ और ेषणा को मिले और कार में बथ गए…

बापू कार में बेथ कर खुश हुए… कार अछि लगी उन को… प्रकाश भी खुश था…

आपस में बातें करते हुए शहर पोहंचे… प्लाट शहर से बहार hi था… गोविन्द भी उतरा वह पर और ठेकेदार को मिलाया बापू और परकसह से… आज लास्ट वर्किंग डे था वीक का… मगर ठेकेदार से बात हो चुकी थी के उन्हों ने संडे को भी काम जारी रखना था… एक्स्ट्रा पेमेंट पर… गोविन्द फिर वह से निकल आया… और यूनिवर्सिटी की तरफ कार का रुख था… 4 बजने में 20 मिनट थे… यूनिवर्सिटी पोहंचा तो 5 मिनट कम थे 4 से…

सीधा कैंटीन गया… रिया वहीं बैठी थी … 15 मिनट पहले उस का पेपर ख़तम हो गया था तो गोविन्द ने उस के दिमाग़ में ख्याल डाला था के कैंटीन में बेथ कर वेट करे… शायद… गोविन्द ए… और गोविन्द आ चुक्का था रिया से मिलने… रिया बोहत खुश हुई गोविन्द को आते देख कर… रिया के साथ शबाना भी थी… रिया अब शबाना को गोविन्द के बारे में बता चुकी थी… शबाना ने भी कहा अगर उस ने कहा हे तो ए गए… कुछ देर वेट कर्त हे…

गोविन्द ने दोनों को hello किया… रिया और शबाना दोनों बोहत खूबसूरत लग रही थी…

रिया… का तो पहले ज़िक्र हो चुक्का हे…. 5.5 क़द… गोरा रंग… जिस्म भरा हुआ… आँखें बरी बरी… काली… काळा बल लम्बे हिप्स तक… चुके बारे… टाइट… गांड खुम खाई हुई… गोल और डल…

36-30-34 का साइज…

शबाना… 20 साल की लम्बे क़द की लड़की …. 5.9 क़द… जिस्म भी छोरा… चुके भी बारे और गांड भी भरी हुई… पेट अंदर…

36-28-36, गोरा रंग… ब्राउन आँखें… बाल भी ब्रोनिश ब्लैक… चेहरा भी छोरा…

रिया… “मुझे यक़ीन नहे हो रहा… तुम वाक़ई आ गए…”

गोविन्द… हाथ आगे बढ़ाते हुए… “लो छू कर देख लो के में हूँ या मेरा बहुत हे…”

रिया… शर्मा कर इधर उधर देखने लगी… कैंटीन में इस वक़्त ज़यादा रश नहे था मगर फिर भी कुछ लड़के और लडकिया थी…

शबाना ने आगे हाथ बढ़ा कर गोविन्द के हाथ को पकड़ा और चोर दिया… “चलो में देख लेती हु के गोविन्द हे या उस का भूत…”

और ज़ोर ज़ोर से हंसने लगी….

रिया भी हंस दी…

गोविन्द को शबाना का हाथ नरम और मुअलयीम लगा… गोविन्द ने सोचा इस का जिस्म भी नरम होगा… और एक नज़र डाली शबाना के चुचो पर… और फिर से रिया की तरफ देखने लगा…

रिया… अपनी हंसी को कण्ट्रोल करते हुए… “क्या खाओ गए…”

गोविन्द… “तुम्हारे होंठ…”

रिया… सुन कर फिर से शर्मा गयी…

शबाना… “ोये होये… गोविन्द तुम तो बारे रोमांटिक हो यार… और क्या क्या खाओ गए रिया का…”

गोविन्द… “और क्या खिलाये गई आप की दोस्त…”

रिया… “शबो… बकवास नहे…” और साथ में मुस्कुराने लगी…

शबाना… गोविन्द की तरफ देखते hue…“garam कर के खाएं गए या ठंडा…”

गोविन्द… “मुझे तो लगता हे के पहले से hi गरम हे… म्हणत करने की ज़रुरत नहे परे गई…”

रिया फिर से शर्माने लगी और शबाना खुल कर हंसने लगी…

गोविन्द… रिया की आँखों में देखते हुए बारे प्यार से… “चलो जानेमन कहीं बहार चलते हैं…”

रिया ने कोई जवाब नहे दिया… बस अपनी गर्दन नीचे कर के शर्माने लगी… मुस्कुरा भी रही थी…

शबाना… “तुम गोविन्द के साथ थोड़ी देर में बहार आना पहले में तुम्हारे ड्राइवर को कह देती हूँ के रिया मेरे साथ जाये गई…”

रिया और शबाना दोनों ड्राइवर के साथ अपनी अपनी गारी में यूनिवर्सिटी आती थी…

रिया… सर नीचे था अभी भी… “तुम भी चलो साथ…”

साफ लग रहा था रिया ने ऐसे hi कह दिया हे शबाना को साथ चलने का… मगर शबाना तो फ़ौरन तैयार हो गयी और कहा ठीक हे… तुम अपने ड्राइवर को बोलो के तुम मेरे साथ जा रही हो मेरे घर और में अपने ड्राइवर को कहती हु के तुम्हारे घर जा रही हूँ… इस तरह दोनों के ड्राइवर चले जयें गए…

अब सब चुप हो गए… न रिया बोल प् रही थी न गोविन्द… दोनों के मन में यही था “कबाब में हदी”… मगर अब क्या हो सकता था…

रिया और शबाना पहले निकली और अपने अपने ड्राइवर को भेज दिया और बाद में गोविन्द कैंटीन से निकला तो दोनों उस की तरफ बढ़ीं और उस की कार में बेथ गयी…

रिया आगे बैठी और शबाना पीछे…

शबाना को भी गोविन्द ाचा लगा था…

यूनिवर्सिटी से कार बहार निकली तो गोविन्द ने रिया का हाथ पाकर लिया… रिया मुस्कुराने लगी… चेहरे पर लाली थी…

गोविन्द… “कहाँ चलें…”

रिया चुप थी… शबाना बोली… “कोई जगा नहे हे क्या… और अगर नहे तो … ऐसी जगा चलो जहा कोई आता जाता न हो…” और गुनगुने लगी…

गोविन्द ने कार शहर से बहार की तरफ कर दी… वहां कोई आता जाता नहे था…

वहां पोहंचे तो रिया ने कहा… “यार ये तो बिलकुल वीरान जगा हे… ”

शबाना… “मेरी जान… जो तुम लोग करने ए हो वो इन्ही वीरानो में आसानी से हो सकता हे…”

गोविन्द ने कार से बहार आकर रिया को भी बहार आने का कहा… मगर रिया ने कहा यार बहार दर लगे गए… कार में hi बैठो…

शबाना… “ऐसा करो तुम दोनों पिछली सीट पर आ जाओ… में आगे बेथ जाती हूँ…”

ये ठीक लगा रिया को… वो भी कार से बहार निकल कर पीछे बेथ गयी… शबाना भी उतर गयी… और ड्राइविंग सीट पर आ गयी… गोविन्द के पास से गुज़रते हुए उस के लुंड पर अपने मोठे चूतर टच करती हुई गयी… गोविन्द का लुंड होश्यारी पकड़ने लगा… वो पिछली सीट पर आ गया…

वक़्त न जाया करते हुए… गोविन्द ने रिया को अपनी बांहो में ले लिया और उस के होंठ चूमने लगा… रिया भी गोविन्द को किश कर रही थी मगर कुछ झिझकते हुए…

रिया और शबाना दोनों वर्जिन थी…. रिया ने तो आज तक किसी को किश भी नहे किया था… शबाना को सिर्फ एक बार एक शादी में उस के कजिन ने किश किया था… मगर वो बोहत थोड़ी देर के लिए…

शबाना भी उत्सुकता के साथ बैक मिरर से ये मंज़र देख रही थी…

और रिया के लिए तो मरदाना होंठ अपने होंटो पर महसूस करना अद्भुत अनुभव था… उस का जिस्म कैंप रहा था….

गोविन्द का एक हाथ रिया के सर पर था और दूसरा हाथ उस ने रख दिया रिया के चुके पर और दबाने लगा…

रिया को जेसे मदहोशी होने लगी … उस ने अपना पूरा मुंह खोल दिया जिस में गोविन्द ने अपनी ज़बान दाल दी और रिया ने ज़बान लपक कर पाकर ली और चूसने लगी… फितरत सीखा रही थी रिया को…

कुछ देर के बाद गोविन्द ने ज़बान पाकर ली रिया की और उस की ज़बान को बोहत ज़ोर से चूसने लगा… ज़बान चूसै की आवाज़ शबाना के कानो तक भी पोहंच रही थी… शाबान भी कसमसा रही थी अगली सीट पर और अपने हाथ से मसलने लगी अपने बारे और भरे हु चुके…

गोविन्द अब चुचो को और ज़ोर से दबा रहा था… और फिर उस ने लिटा दिया रिया को सीट पर… और एक हाथ दाल दिया रिया की टैंगो में….

रिया ने झट से आँखें खोली और कहा प्लीज यहाँ मत करना…

गोविन्द… “मेरी रानी… फ़िक्र न करो में तुम्हे इस जगा छोडूं गए नहीं… सिर्फ तुम्हारी छूट में ऊँगली करू गए…”

रिया और शबाना दोनों छूट और चुदाई शब्द सुन कर शर्म से लाल हो गयी…
 
EPISODE – 33

गोविन्द… “मेरी रानी… फ़िक्र न करो में तुम्हे इस जगा छोडूं गए भी नहीं… सिर्फ तुम्हारी छूट में ऊँगली करू गए…”

रिया और शबाना दोनों छूट और चुदाई शब्द सुन कर शर्म से लाल हो गयी…

अब रिया न रोक सकीय गोविन्द का हाथ… गोविन्द अब रिया की गर्दन पे किश करते हुए हाथ पहले फेरा रिया की छूट पर जो के गीली थी… और फिर उस के लेग्गिंग में हाथ दाल दिया… नीचे पंतय थी… पंतय के अंदर जब हाथ गया तो रिया ने कमर उठा ली जेसे खुद ामान्तरण दे रही हो ऊँगली को घुसने के लिए…

हलके हलके बल थे छूट पर… हाथ छूट को सहलाता रहा बारे प्यार से… रिया की आँखें बंद थीं… गोविन्द उस की गर्दन चाट रहा था…

शबाना ने भी अपना एक हाथ अपनी छूट पर रख लिया… और अब वो मिरर से नहे बल्कि गर्दन मोर सीधा देख रही थी और उस की निगाह जमी हुई थी गोविन्द के लुंड पर…

शबाना से बर्दाश्त न हुआ और उस ने हाथ बढ़ा कर रख दिया लुंड पे… और पंत के ऊपर से सहलाने लगी…

गोविन्द ने तिरछी नज़र से देखा शबाना की तरफ और फिर से लग गया गर्दन चाटने पर… रिया की सिसकिया वाज़िह हो गयी थी… ाः.. aa…aaaah… न करो naa…aaah… ोीी…. छूट गीली हो चुकी थी… मुंह से न करो की आवाज़ मगर…. रिया अपनी टंगे खोल रही थी… ये इशारा था के छूट के अंदर डालो ऊँगली मगर गोविन्द भी अब खिलाड़ी बन चुक्का था वो तारपा रहा था रिया को…

रिया और पीछे ढलक गयी सीट पर… और लेट hi चुकी थी… गोविन्द ने उस की लेग्गिंग को दोनों साइड से पकड़ा और उतरने लगा नीचे… रिया ने गांड उठा दी ताकि जल्दी से लेग्गिंग उतर जये और वो पेश करदे अपनी ख़ज़ाने से भरी घाटी अपने मेहबूब को…

शबाना भी अब पूरी तरह गरम थी… उस ने ज़िप खोल दी… गोविन्द की पंत की… और अंडरवियर को नीचे खेंचते हुए लुंड बहार निकल लिया…

रिया की छूट सामने थी गोविन्द के… वो अपनी ज़बान फेरने लगा… नाभि से लेकर छूट की आखरी हद तक…

रिया की आँखें बंद थी…

शबाना का हाथ चल रहा था मोठे लुंड पर ऊपर नीचे…

गोविन्द ने हाथ बढ़ा कर शबाना का सर पकड़ा और झुका दिया लुंड पर… शबाना अब घूम चुकी थी पूरी सीट पर और उस ने अपनी ज़बान से लुंड की टोपी को चेतना शुरू कर दिया…

गोविन्द की ज़बान अब छेद तक जाने लगी थी… टंगे कांप रही थी रिया की… आँखें अभी भी बंद थी… वो नहे जानती थी के शबाना लुंड चाट रही हे… उस के लिए तो अब कुछ भी मौजूद नहे था वह पर…

सिर्फ वो थी… गोविन्द था…

उस की छूट थी और गोविन्द की ज़बान थी…

उस के लिए साडी दुनिया बस यही तक सिमट गयी थी…

शबाना ने लुंड अब पूरा मुंह में ले लिए… उस का मुंह छोरा था… उस ने पूरा लुंड मुंह में ले लिया…

गोविन्द का लुंड पूरा मुंह में लेने वाली ये पहली लड़की थी…

अब वो दीवानो की तरह चूसने लगी लुंड को… ऊपर नीचे… ऊपर नीचे…

गोविन्द भी अब सिर्फ छूट के ऊपरी हिस्से से लेकर गांड तक चाट रहा था… ऊपर नीचे… ऊपर नीचे…

रिया की आँखें बंद थी…

ज़बान छूट चाट रही थी….

मुंह लुंड चूस रहा था…

इस खेल ने 3 तीन लोगो को बांध दिया था एक चक्रव्यू में…

सब से पहले हर मानी रिया की छूट ने… जेसे hi गोविन्द ने उस के दाने को मुंह में लिया… उस की गांड पूरी की पूरी ऊपर उठ गयी… मनो कार की चाट से जा लगी और सिसकियाँ लेते हुए झरने लगी…. Aah…aaaah….aah….aaah…aaah…

रिया अब बेसुध हो गयी… कोई होश नहे था उसे….

छूट के रस्ते उस का पानी नहे… जान निकल रही थी…

अब गोविन्द ने शबाना का सर पाकर लिया और उसे ज़ोर ज़ोर से चुसवाने लगा अपना लुंड…

जेसे hi गोविन्द फ़ारिग़ हुआ उस ने शबाना का मुंह अपने हाथ से नीचे दबा दिया और उसे उठने न दिया…

शबाना को मजबूरन साडी मलाई अपने अंदर उतरनी पारी… फिर भी कुछ उस की चीन अपर लग गयी… गोविन्द भी अब शांत हो गया… शबाना ने अपना सर ऊपर को उठाया… उस की आँखों में शिकायत थी गोविन्द के लिए… उस ने बेरहमी से उस का मुंह दबाया था और पिलाया था अपना माल…

शबाना ने पहली बार न सिर्फ लुंड चूसा था बल्कि माल भी गटकना पारा… वो भी ज़बरदस्ती तो उस के मन में एक शिकायत भरी नाराज़गी उभरी…

मगर गोविन्द को परवाह न थी…

शबाना अब सीढ़ी हुई अगली सीट पर और टिश्यू से अपना मुंह साफ किया…

अब रिया को भी होश आ रहा था… वो उठी और गोविन्द के गले लग गयी… उस ने देखा के शबाना का चेहरा आगे हे और वो बहार देख रही हे और लुंड बहार निकला हुआ हे गोविन्द का… वो अंदाज़ा न कर सकीय के शबाना ने लुंड चूसा हे अभी… वो समझी के गोवंड ने निकला हे लुंड रिया के लिए…

उस ने भी बारे प्यार से अपने मेहबूब का आधा खरा लुंड ले लिया अपने हाथ में और सहलाने लगी… गीला सा लगा लेकिन उस को काया पता… उस ने कभी इस से पहले लुंड पकड़ा hi नहे था…

अब गोविन्द ने रिया को इशारा किया के वो अपने मुंह में ले कर लुंड को चूसे… रिया निगाहों निगाहों में मना करती रही मगर गोविन्द ने ज़बरदस्ती उस का सर पाकर कर उस का मुंह लगा दिया लुंड पर… अब रिया के लिए कोई रहे फरार नहे थी… उस ने पहले तो सूंघा … बरी मादक सौगंध लगी… फिर सु ने किश किया और फिर अपने मुंह में ले कर चूसने लगी…

फितरत सीखा रही टी रिया को…

गोविन्द ने देखा के शबाना की आँखें नुम हैं…

रिया का मुंह नीचे था लुंड पर… शबाना की नज़रें बहार विंड स्क्रीन से देख रही हैं…

गोविन्द ने हाथ से शबाना का सर सहलाया प्यार से… और प्यार से उस की गर्दन भी सहलाने लगा… शबाना को ाचा लगा… और उस के दिल का ग़ुबार काम होने लगा…

लुंड अब फिर से पूरा आकर गया था…

रिया ने अपना सर ऊपर उठाया और गोविन्द से कहा… “मेरी जान शाम होने वाली हे… अभी चोरो… में नेक्स्ट टाइम तुम्हारा ज़रूर चूसूं गई… प्लीज घर चोर दो…”

गोविन्द ने हाथ हटा लिया था शबाना की गर्दन से…

रिया सीट से उतरती हुई बोली में बस पेशाब कर के आयी… बोहत ज़ोर का लगा हे… और किसी के जवाब का इंतज़ार किये बग़ैर पास वाले दरख़्त के पीछे चली गयी…

गोविन्द पिछली सीट से निकला और आगे का दरवाज़ खोल कर शबाना को बाहर निकला और ज़ोर से अपनी बांहो में ले कर उस के होंटो पर प्यार भरा चूमा दे दिया और उस की आँखों में देखते हुए बोलै… “सॉरी शबाना जी… प्लीज माफ़ कार्डो… तुम इतना ाचा लुंड चूस रही थी के मुझ से बर्दाश्त न हुआ…”

लुंड शब्द सुन कर शबाना का ग़ुस्सा पूरा ग़ायब हो गया और वो भी मुस्कुरा दी और अपने बाज़ू से गोविन्द को जाकर लिया.. और उस के होंटो चूमने लगी… दरख़्त के पीछे से पेशाब की धार की आवाज़ आ रही थी…. “सुरर्र सुरर्र सुरर्र”

जब तक ये आवाज़ आती रही तब तक गोविन्द और शबाना एक दुसरे को बांहो में लेकर होंठ चूसते रहे…

जेसे hi पेशाब की आवाज़ ख़तम हुई दोनों अलग हुए और पिछली सीट की तरफ जाते हुए शबाना ने ज़ोर से गोविन्द का लुंड मसल दिया… जो के अभी भी खरा था…

गोविन्द के मुंह से आआह निकल गयी… तो शबाना खिलखिला कर हंस पारी… और पिछली सीट पर बेथ गयी… गोविन्द ड्राइविंग सीट पर बेथ गया…

रिया भी वापस आ गयी पेशाब कर के… और उस ने अगली सीट का दरवाज़ा खोल कर बेथ गयी…

अब फिर से 3 तीनो मुस्कुरा रहे थे…

गोविन्द ने कार मोरी शहर की तरफ…

शबाना… “रिया… मेरी रानी… केसा लगा छूट चटवा कर…”

अब शबाना खुल कर बात कर रही थी…

रिया… “चल बेशरम… तू ने सब देखा…??”

शबाना… “तो और क्या… में कोई अंधी हूँ… या मेरी आँखों पर पति बंधी थी… और मेने कोण सी नयी चीज़ देख ली… तुम्हारी छूट तो में पहले भी देख चुकी हूँ…”

थोड़ी देर खामोश रह कर फिर बोली…

शबाना… “हाँ यार एक नयी चीज़ देखि … इंसान के पास घोड़े का लुंड…”

रिया भी अब हंसने लगी और सब की हंसी शामिल हो गयी…

रिया और शबाना ने गोविन्द को कहा एक स्टॉप पे उतर दे वहां से वो दोनों एक ऑटो पर जयें गई क्यों के दोनों के घर बरी सख्ती हे अगर किसी ने देख लिया गोविन्द के साथ तो उन की सहमत आ जये गई…

शाम के 6 बज रहे थे… अँधेरा हो चला था…

गोविन्द भी उन दोनों को स्टॉप पर चोर कर प्लाट की तरफ चला गया…
 
Back
Top