EPISODE – 42
गोविन्द स्वचालित अंदाज़ में पलटा और फायर कर दिया रघु की तंग पर मगर गोली ज़रा सा दूर लगी फर्श पर…
रघु दरवाज़े के पास पोहंच चुक्का था…
फिर से फायर किया गोविन्द ने…
और इस बार रघु की तंग पे गोली लगी तो वो नीचे गिर गया…
गोविन्द अब रस्सी खोलने लग गया द्क्प की और साथ साथ उस के चुके भी देख रहा था…
द्क्प… “क्या देख रहे हो… गोविन्द…”
गोविन्द मुस्कुराने लगा मगर उस ने नज़रें न हटाईं…
द्क्प शरमाते हुए… “बदमाश हो पूरे… पहले खोलो मुझे बाद में देख लेना…”
राशि पूरी खुल चुकी थी…
गोविन्द… “मैडम… बाद में कब…”
द्क्प मुस्कुराते हुए… धीमी आवाज़ में… “शट उप… बदमाश”
और उस ने अपनी शर्ट कुछ ठीक कर ली…
रघु सामने ज़ख़्मी पारा था… और गोविन्द को अब ख्याल आया पक्रिया का… उस ने बहार देखा तो वो होश में आ चुक्का था और उठने की कोशिश कर रहा था…
गोविन्द ने उसे भी आवाज़ लगाई और साथ फायर कर दिया तो वो भी रुक गया और हाथ ऊपर उठा लिए…
गोविन्द और द्क्प ने मिल कर रघु और पक्रिया को राशि से बांध दिया और राशि बढ़ते वक़्त दोनों कई बार एक दुसरे से टकराये और सट्टे और दोनों के बदन आपस में टच हुए… हाथ भी टच हुए… द्क्प मुस्कुराती रही… उस को ाचा लग रहा था…
गोविन्द तो उस के सरे विचार जान प् रहा था तो वो भी मुस्करा रहा था…
गोविन्द ने वह पर परे एक कपड़े को रघु के ज़ख़्म पर बांध दिया टेक खून ज़यादा न बहे…
दोनों को कार की पिछली सीट पर दाल कर गोविन्द और द्क्प भी बेथ गए कार में…
द्क्प… “पहले हॉस्पिटल चलो…”
गोविन्द फ़ौरन रघु से ब्रेन इन्फ्लुएंस करते हुए उस के दुसरे साथी जहा थे वह का एड्रेस ले लिया… द्क्प ने नोट कर लिया…
हॉस्पिटल पोहंच कर गोविन्द ने अपनी शर्ट उतर कर द्क्प को दे दी जो उस ने ले कर अपनी शर्ट के ऊपर hi पहन ली… गोविन्द अब सिर्फ पंत और बनियान में था…
द्क्प ने हॉस्पिटल से अपने ऑफिस कॉल कर के फाॅर्स मंगवा ली और गोविन्द ने घर कॉल कर के बता दिया के वो कुछ देर से आये गए… सब परेशां थे घर पर… उस के फ़ोन आने पर सब को सकूं मिला…
इस दौरान इंस्पेक्टर्स अपनी फाॅर्स के साथ पोहंच चुके थे और द्क्प से कहने लगे वो अकेली क्यों गयी…
द्क्प… “में अकेली कहाँ थी … मर. गोविन्द मेरे साथ थे… हे इस वैरी ब्रेव यंग मन… हे हेल्पेद एंड रेसक्यूएड में…”
एक इंस्पेक्टर अपने साथ रघु और उस के साथी को ले गया पुलिस स्टेशन और दूसरा इंस्पेक्टर अपनी फाॅर्स के साथ चला गया रघु के दुसरे साथिओ के ठिकाने पर उन को पकड़ने…
सब से फ़ारिग़ हो कर गोविन्द… “मैडम… आप की ऑफिस चोर दू या आप की रेजिडेंस…”
द्क्प… “मेरी रेजिडेंस चलो…”
रेजिडेंस पोहंच कर द्क्प… “आओ गोविन्द अंदर आओ… कॉफ़ी पीते हैं साथ में…”
गोविन्द कार पार्क कर के… उस के साथ अंदर आ गया…
द्क्प… “नहे ऐसा करते हे डिनर करते हे…” और अपने कुक से कहा “…जो बनाया हे टेबल पर लगा दो… आज हमारे खास मेहमान ए हैं…” फिर गोविन्द की तरफ मुस्कुरा कर देखते हुए… “में ज़रा चेंज कर लून… और आप की शर्ट आप को वापिस कर दूँ…”
गोविन्द ने कहा… “मैडम मेरी शर्ट यही उतर कर दे दें”
द्क्प… “अगर आप के सामने उतरी तो आप फिर से मुझे घूरने लग जये गए…”
गोविन्द… “इस में मेरा क्या क़सूर… आप हैं hi इतनी खूबसूरत…”
द्क्प बग़ैर कोई जवाब दिए… मुस्कुराती… अपने कमरे की तरफ चली गयी…
गोविन्द… लाउन्ज में बने कॉमन वाश रूम में चला गया और उस की पंत पे जो मिटटी वग़ैरा लग गयी थी उसे साफ करके हाथ मुंह धो कर बहार आया और वही लाउन्ज में बेथ गया…
आशा बक्शी भी अपने कमरे से बहार आयी… उस ने एक खूबसूरत सी साड़ी पहनी हुई थी… साड़ी एक डैम फिट और जिस्म पर कस्सी हुई लग रही थी… बाल खुले थे हिप्स तक आ रहे थे… होंटो पर हलकी सी लिप स्टिक गुलाबी रंग की, हल्का सा मेक उप, कानो में एअर रिंग्स, ख़ुशी से दमकता चेहरा और हाथ में गोविन्द की शर्ट… बहार चलती हुई ऐसे आयी जैसे झूम रही हो… रक़्स कर रही हो… एक मोरनी की तरह…
गोविन्द मुंह खोले उस को देखता रह गया और खो सा गया… बस देखता रहा आशा की तरफ… वो बोहत ख़ूबसूरत लग रही थी…
आशा… गोविन्द की हालत देख कर हंसने लगी… उस को बोहत ाचा लगा के गोविन्द उस को इतनी पसन्दीदगी से देख रहा हे…
आशा ने अपने हाथ में जो गोविन्द की शर्ट थी उस को उस की आँखों के सामने लहराते हुए …. हँसते हुए कहा… “क्या हुआ मिस्टर…??”
गोविन्द… “वो वो में में…”
आशा फिर से हंसने लगी…
फिर गोविन्द का ख्याल गया शर्ट की तरफ…. शर्ट कुछ गिल्ली सी लग रही थी…
आशा… “वो मेने इस पे लगी मिटटी साफ कर दी हे तो ज़रा पानी से गीली हो गयी…”
गोविन्द… अपना हाथ आगे किया के शर्ट ले कर पहन ले… “मुझे दी जिए में ऐसे hi पहन लेता हु…”
आशा… “नहे गोविन्द… आप बैठो … में शर्ट को आयरन कर देती हु…”
और वही लाउन्ज में रखे आयरन स्टैंड पे शर्ट रख कर उसे प्रेस करने लगी…
गोविन्द भी वही बेथ गया और उस को प्रेस करते हुए देखने लगा… ऐसा लग रहा था जेसे कोई पत्नी अपने पति की शर्ट प्रेस कर रही हो…
आशा को पता था के गोविन्द उसे पीछे से देख रहा हे…
आशा… “क्या देख रहे हो….”
गोविन्द… “क क क कुछ नहे…”
आशा के दिल में लाडू फूट रहे थे… ये नौजवान जो इतना बहादुर हे … घुँडो से लड़ने वाला और अब इस के मुंह से आवाज़ नहे निकल रही… उस के हुस्न की वजा से…
“और में क्या कर रही हूँ… एक पत्नी की तरह गोविन्द की शर्ट को आयरन कर रही हूँ…” ये सोचते hi वो भी शर्माने लगी…
गोविन्द वाक़ई बोहत प्रभावित था आशा की और… और चाहता था के उस को गले से लगाए, चूमे और प्यार करे…
दोनों hi एक दुसरे के क़रीब आना चाहते थे मगर पहल कोण करे… एक पर्दा था… एक झिझिक थी… इस परदे को कोण उठाये…
कुक लाउन्ज में आया… “मैडम… खाना लगा दिया हे…”
आशा… “ाचा तुम जाओ… हम आते हैं…”
आशा शर्ट को आयरन कर चुकी थी उस ने शर्ट उठाई और उस को अपने कमरे में ले जार कर हेंगर कर दिया…
आशा… “शर्ट अभी हॉट हे… खाना खा कर पहन लेना…”
गोविन्द उठाते हुए… और आशा की आँखों में देखते हुए… “आप भी तो हॉट हो…”
आशा ये सुन कर शर्मा गयी… और बरी खुमार बहरी नज़रों से देखने लगी गोविन्द को… गोविन्द को ऐसा लगा जैसे आज वो बिलकुल घायल हो गया हे…
फिर आशा बरी शरारत से … “खाना भी हॉट हे…”
दोनों हंसने लगे…
और डाइनिंग रूम की तरफ आ कर बेथ गए खाना खाने और एक दुसरे की आँखों में देखते खाना ख़तम किया… इस बीच आशा कॉफ़ी के लिए कह चुकी थी…
दोनों एक दुसरे की दिल की बात समझ रहे थे पर जाने क्यों चुप थे… असल मुड़े पर कोई बात नहे कर रहा था… दोनों की आँखों ने अलबत्ता दिल खोल कर साडी बातें कह डाली थीं…