Kya Govind yunhi tarasta rahe ga - Page 3 - SexBaba
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Kya Govind yunhi tarasta rahe ga

EPISODE – 15

ज़रा दूर चल कर वहां पर एक लेडी डिप्टी पुलिस कमिश्नर थी… उस के साथ एक और मर्द पुलिस वाला और एक लेडी कांस्टेबल थी…

आशा बक्शी” डिप्टी पुलिस कमिश्नर, एक ऑनेस्ट पुलिस अफसर, बोहत सख्त और ुनमर्रिएद हे जिस ने अपनी लाइफ पब्लिक सर्विस के लिए वक़्फ़ कर दी हे… 35 साल की महिला आईपीएस अफसर… दौलत पुर की इंचार्ज…

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अभी बस स्टैंड पे वो मौजूद हे एक मशकूक शख्स के आने की इनफार्मेशन पर… वो एक खतरनाक क्रिमिनल हे…

आशा बक्शी, डीपीसी, नाराज़ हो जाती हे अपने कॉन्स्टेबल्स पर जो के गोविन्द को ले ए हैं मशकूक समझ कर…

गोविन्द बारे एतमाद के साथ बात करता हे और कहता हे… “डीपीसी ma’am… कोई बात नहे आप इन बेचारों पर ग़ुस्सा न हों… में ने मंद नहे किया…”

और बारे ग़ौर से देखते हुए आशा बक्शी की तरफ जो के पुलिस यूनिफार्म में बोहत स्मार्ट लग रही थी… लम्बा ऊंचा क़द 5.10 इंच, न ज़यादा मोती न पतली, 34-26-35 का साइज… बोहत आकर्षित हो उठा गोविन्द…

गोविन्द… आशा की आँखों में ऑंखें डालते हुए… “ma’am सुक्रिया के इसी बहाने आप जैसी स्मार्ट अफसर से मुलाक़ात हो गई… कोई हुकुम हो तो में हाज़िर हूँ…”

आशा बक्शी… गोविन्द के एतमाद, हौसले और नज़रों से चौंक गई… और सोचने लगी… “देखने में ये नौजवान बोहत शरीफ और बहादुर लगता हे… मगर इस का किलर एतमाद समझ नहे आ रहा… कुछ तो बात हे इस में…”

आशा बक्शी ने खिलाफ इ मामूल अपना कार्ड गोविन्द को दे दिया और कहा अगर कोई प्रॉब्लम हो तो इस नंबर या एड्रेस पे बात या कांटेक्ट कर सकता हे…

गोविन्द बस की तरफ चला तो देखा के बस में ज़रा सी भी जगा नहीं थी मगर प्रॉब्लम ये थी के अगली बस आधे घंटे के बाद जनि थी… और वो टाइम वास्ते नहे करना चाहता था तो किसी न किसी तरह बस में अंदर घुस गया… बस चल पारी… रश में ढके लगते रहे… उस को काफी दूर जाना था तो वो कोने की तरफ सरक गया… अपने राइट हाथ से उस ने बस में लगे पोल को थम लिया ताकि किसी के ऊपर न गिरे… कुछ देर बाद उस का लेफ्ट हैंड किसी नरम मखमली हाथ से मास हुआ… इक बिजली सी कोंडी उस के जिस्म में… वो उस तरफ देख न सका … जाने क्यों… उस नौख़ेज़ बदन ने अपना हाथ पीछे कर लिया… बस में इक और क़यामत का झटका लगा और वो मखमली हाथ ने गोविन्द का बाज़ू थम लिया… गोविन्द को बर्क़ी लहरें डर्टी महसूस हुईं सरे जिस्म में… हए ऋ क़िस्मत.. गोविन्द बेचारे के लिए एक और इम्तेहान उस के दिल पर दस्तक देने लगा… लड़की ने अपना हाथ न हटाया और थामे रही गोविन्द का बाज़ू… लड़की को भी ऐसा लग रहा था के एहि हे जो उस को थम सकता हे और तहफूज़ दे सकता हे… ये नौजवान तो दिलों को रहत देने वाला न की तकलीफ…

बस रूकती हे… एक मुसाफिर उतरता हे और एक औरत और एक मर्द चढ़ जाते हैं… फिर से धकाम पेल और इसी के चलते कैसे गोविन्द और वो लड़की एक दुसरे के आमने सामने आ जाते हैं… गोविन्द लड़की की तरफ देखते hi जेसे खो सा जाता हे…

5.5 क़द… गोरा रंग… जिस्म भरा हुआ… आँखें बरी बरी… जेसे काली मगर रोशन चमकदार रत… काळा बल जेसे घनघोर काळा बदल च्ये हुए… चुके बारे… तन्ने हुए… ग़रूर से… हिमालय से ऊंची चोटियां… दुपट्टा सीने पर मगर माज़ूर कुछ भी छुपाने से…. पेट पे गोश्त न होने के बराबर… गांड ख़म खाई हुई… डल… कपड़े बोहत क़ीमती… किसी अमीर घर की… ज़यादा से ज़यादा 20 साल की होगी…

अभी भी लड़की ने गोविन्द का बाज़ू थमा हुआ हे… छोरा नहे… देखने वाले ये समझ रहे हैं के ये दोनों साथ हैं… गोविन्द बस ख़ामोशी से उस चेहरे को देखता जा रहा हे… पलके भी नहे झपक रहा… लड़की ने उस की आँखों में देखा तो वो हिम्मत न कर पेयी उन आँखों में देखने से… जहाँ दिलों को तस्खीर करने का जादू था… लड़की ने अपनी आँखे यूँ हटाईं जेसे और देखती रही तो बस उसी की हो जये गई… और फिर कहीं की न रहे गई…

और फिर एक और क़यामत टूटी… दिलों पर…

बस ने एक ब्रेक लगाया सरक पर खड़े की वजा से… और गोविन्द और वो लड़की दोनों आपस में सात गए… लड़की ने अपने हाथ से उस के बाज़ू पर ग्रिफ्ट मज़ीद मज़बूत कर ली… गोविन्द ने भी देर न करते हुए अपना हाथ उस के दुसरे हाथ पर रख दिया… और कास के पाकर लिया… लड़की ने हाथ न चुराया…

गोविन्द और लड़की दोनों खामोश थे… मगर दो जवान जिंसों ने आपस में बातें करना शुरू कर दिया…

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लड़की ऐसी नहीं थी के कोई मर्द यूँ रह चलते उस का हाथ पाकर ले और वो ख़ामोशी से अपने आप को उससे सौंप दे… 20 साल की हनोई को ए थी और आज तक… बालूघाट से लेकर… किसी मर्द के नज़रे अल्तिफ़ात को क़बूल न किया था… पर इस नौजवान में कुछ ऐसा था जो उससे यूँ खामोश किये दे रहा था… उस के दिल की धरकने आज पहली बार यूँ बेतरतीब हुई थीं… वो भी इस अजनबी नौजवान के हाथों का स्पर्श प् कर… क़रीब था वो वो अपने दिल पे काबू पति और उसे दूर धकेलती अपना हाथ चुराती…

गोविन्द ने चुपके से धीमी आवाज़ में कहा….

उस जैसा कोई मासूम कहाँ होगा,

उस जैसा कोई हसीं भी कहाँ होगा


लड़की नज़र उठाते उठाते रुक गयी…

और भूल गयी के अभी उस ने हाथ चुराने का सोचा था…

गोविन्द मज़ीद बोलै धीमी आवाज़….

तेरे चेहरे के नक़्श ऐसे हैं

नज़र उठता हूँ, भटक जाता हूँ


लड़की का हाथ जो की गोविन्द के हाथ में था… अब लड़की के उस हाथ ने हरकत की और अब उस हाथ ने गोविन्द का हाथ अपने हाथ में ले लिया… और सख्ती से पाकर लिया… लड़की को होश भी नहे था के वो क्या कर बैठी हे…

गोविन्द ने एक और शेर पढ़ा…

हो न जय हुसैन की शान मैं गुस्ताखी कहीं

तुम चले जाओ के तुम्हें देख केर पियर अत है


और जब गोविन्द ने कहा…

बहारों की जान पैर बन आयी है

आज देखा है उन्हें सुर्ख लिबास मैं


लड़की जो सुर्ख लिबास में थी… उस का गाल भी सुर्ख हो गए… शर्म से लज्जा से… और उस का दूसरा हाथ जो की गोविन्द का बाज़ू थामे था… उस बाज़ू पे उसने ज़ोर से अपने नाख़ून गर दिए…

हल्का दर्द हुआ गोविन्द को, नाख़ून चुबने पर, मगर मजाल हे जो ज़रा उफ़ की हो…

लड़की ने अब होल होल पलकें उठाईं और देखा वलिहना अंदाज़ से इस दिलकश, ख़ूबरू, जवान को जिस ने इस लड़की बोलने की शक्ति चीन ली थी…

जब दोनों की नज़रे मिलीं, तो गोविन्द ने पुछा… “ऐ… नाज़नीन, क्या नाम हे तुम्हारा…??”

लड़की नज़रें झुकाते हुए होल से बोली… “रिया…”

रिया ने झुकी नज़रों से पुछा… “आप का नाम…??”

गोविन्द थोड़ा सा और नज़दीक होते हुए लड़की के… “तुम्हारा गोविन्द…”

तुम्हारा” शब्द पे गोविन्द ने कुछ ज़यादा hi ज़ोर दिया था…

रिया सुन कर शर्म से मज़ीद दोहरी हो गई और इसी दौरान एक झटका लगा बस को … रिया और क़रीब हो गई गोविन्द के…

अब पोजीशन ये थी के गोविन्द ने एक हाथ से बस का पोल पाकर रखा था और दुसरे हाथ में रिया का हाथ था… रिया ने एक हाथ से गोविन्द का एक बाज़ू थमा हुआ था और दूसरा हाथ से गोविन्द का हाथ पकड़ा हुआ था… गोविन्द की एक तंग रिया के टैंगो के दरमियान थी और रिया की एक तंग गोविन्द की टैंगो के दरमियान थी… दोनों को एक दुसरे के गुप्त अंगो का स्पर्श बखूबी हो रहा था…

रिया के लिए लुत्फ़ बढ़ता जा रहा था…

गोविन्द ने सोच पढ़ी रिया की…

रिया की सोच… “उफ़… कितना ाचा लग रहा हे… में ने कभी नहे सोचा था के मर्द का वो जब जिस्म के साथ लगता हे तो इतना मज़ा आता हे… ये किसी सख्त चीज़ हे जो किसी नरम चीज़ से भी ज़यादा लाज़त दे रही हे… किसी गर्मी हे जो ठंडक दे रही हे… ये गोविन्द भी न… बोहत शरीर हे… इस ने मेरे दिल के तारों को चेर दिया हे… अब इस के बग़ैर कर कहाँ…”

रिया की सोच… जेसे किसी नींद से जगती हुई… “ओह्ह्ह्ह यद् hi नहीं रहा… “शबो” का घर आने वाला हे… कैसे पूछूं गोविन्द से फिर कब और कैसे मिले गए… बोहत शर्म ए गई पूछने में… में क्या करूँ… इतनी बेबस कभी नहीं थी में…”

गोविन्द समझ गया के उस को पहल करनी परे गई…

गोविन्द… “रिया मेरी जान… कहाँ उतरना हे तुम ने…??”

रिया… खुश हो गई और मुस्कुराने लगी… “बस मेरा स्टॉप आने वाला हे… मेरी दोस्त का घर हे… शबाना का… मेरे साथ यूनिवर्सिटी में पढ़ती हे… हम कंबाइंड स्टडी करें गए… उस के घर पे…”

गोविन्द… “तुम इसी बस पे आती जाती हो…??”

रिया… “नहे… आज पहली बार इस बस पे चढ़ी हूँ… कार ख़राब हो गई थी रस्ते में…”

गोविन्द… “तो अब मुलाक़ात कैसे हो गई…”

रिया ने आँखें उठा कर गोविन्द की तरफ देखा… और उस को बताया के अभी एक्साम्स हैं दो दिन बाद… यूनिवर्सिटी में आर्ट्स में ग्रेजुएशन कर रही हूँ… वहां मिल सकते हैं… 4 बजे शाम को क्लासेज ख़तम होती हैं…

(प्लीज नोट के जिस दौर की कहानी हे उस दौर में सिर्फ लैंडलाइन थी और सेल फ़ोन नहे थे….)

और फिर रिया का स्टॉप आया और वो उतर के चली गई…
 
EPISODE – 16

जब “रिया” उतरने लगी तो सब ने बस में जगा बनाई ताकि वो उतर सके… वो उतर गयी… फिर भी सब जगा बनाये खरे रहे अब गोविन्द के लिए… वो समझ रहे थे के ये लड़के और लड़की का जोड़ा जो इतनी देर से चिपक कर कहरा हुआ था साथ… ये हस्बैंड वाइफ हैं और दोनों साथ उतरें गए बस से… जब सिर्फ रिया उतर गयी और गोविन्द वहीँ बस में खरा रह और बस आगे चल पारी तो पहले तो सरे अस्चर्या से एक दुसरे को देखते रहे… फिर एक एक हंसने लगे और आपस में हंसी मज़ाक़ करते रहे गोविन्द की तरफ इशारे करके… 3 औरतें जो वाहन थीं वो भी हंस रही थीं… और बार बार गोविन्द को देख रहीं थीं… गोविन्द न किसी की तरफ देख रहा था न किसी की बात सुन रहा था… वो मन मोजी बन गया था… लापरवाह दुनिया से… अपने आप में खुश और शांत… दुनिया को मुठी में करने वाला… दिलों को तस्खीर करने का जादू सीख लिया था उस ने…

अनाज मंडी बस स्टॉप की सदा लगते hi वो उतर पारा… थोड़ा आगे चलते hi उस के सामने अनाज मंडी आ गयी… एक बारे सा गेट… हर तरफ चहल पहल… बरी रौनक थी वहां… वो भी गेट से अंदर दाखिल हो गया और सोचने लगा के किसी से पूछे मुंशी के दफ्तर का… उस किन ाज़ार एक तरफ बने छोटे से रेस्टोरेंट पर पारी… दोपहर का 1.00 बजने वाला था… एक एक उस की भूक जग उठी… उस ने सोचा कुछ खा पि लिया जये फिर मुंशी के दफ्तर का रुख करते हैं…

रेस्टोरेंट छोटा सा पर साफ सुथरा था… वो एंट्रेंस से थोड़ा अंदर आ कर एक साइड टेबल पर बेथ गया… और वेटर को आवाज़ दी आर्डर करने के लिए… वेटर ने मेनू दिया तो गोविन्द ने उस को नज़रअंदाज़ करते हुए कहा… “यार… कोई हल्का फुल्का सा ले आओ और फिर अछि सी चाय पीला दो…”

वेटर आर्डर नोट कर रहा hi था के पीछे से रेस्टोरेंट के मालिक की आवाज़ आयी… “ोये जल्दी कर… मुंशी जी की टेबल साफ की या नहे… उन का खाना भी देख तैयार हुआ के नहे… मुंशी जी आने वाले होंगे…”

शब्द “मुंशी” सुन कर, गोविन्द चौंक गया…

वेटर… “हाँ सेठ… कहाँ तैयार हे अभी चेक किया और उन की पसंद की तीनो डिशेस हैं…”

वेटर एपनिया प से बात करते हुए… “अभी मुंशी ए गए तो कहे गए के इस अनाज मंडी मेरे इशारों पे चलती हे… ये रेस्टोरेंट एक सेकंड में बंद कर व सकता हूँ… खाना अगर मेरी पसंद का न हुआ तो…” यह कह कर हंसने लगा…

गोविन्द चुप रहा ुर समझ गया के जिस मुंशी की तलाश में वो आया हे… वो अभी इस रेस्टोरेंट में आने वाला हे लंच करने के लिए…

जब तक गोविन्द खाना खा कर फ़ारिग़ होता… एक कला सा… मोटा… छोटे क़द का… अछि खासी तौंद बहार निकली हुई… पैन या तंबाकू चबाता हुआ अंदर दाखिल हुआ… और चीखते हुए बोलै… “अरे निकामो मेरी टेबल साफ हे या नहे… खाना मेरी पसंद का न हुआ तो एक सेकंड में रेस्टोरेंट को टाला लगा दूँ गए… साडी अनाज मंडी में मेरा राज हे…”

रेस्टोरेंट का मालिक भागता हुआ आया… और कहा… “आये आये… मुंशी जी… आप तो मई बाप हो… आप के सहारे तो चल रहे हैं हम लोग…”

मुंशी बारे अहंकार से चलता हुआ अपनी रिजर्व्ड टेबल पर जा बैठा जो के गोविन्द की टेबल से खासी दूर थी… गोविन्द ने खाना ख़तम किया और आज का नेवसपपेर मांग लिया वेटर से और नेवसपपेर को अपने चेहरे के आगे इस तरह कर लिया जेसे उस को किसी और चीज़ की चिंता न हो और सिर्फ ख़बरें देख रहा हे…

मुंशी कहना खाने में मसरूफ हो गया और गोविन्द उस का दिमाग़ खंगालने लगा… बरी सुर्प्रिसिंग इनफार्मेशन मिलीं मुंशी के दिमाग़ से…

गोविन्द ने वेटर से एक पेपर और पेन लिया और कुछ पॉइंट्स नोट करने लगा पेपर पर…

मुंशी फ़ारिग़ हुआ खाने से और अपने लिए चाय का आर्डर किया… इसी दौरान एक शख्स एंटर हुआ रेस्टोरेंट में… उस ने बोहत कीमती सूट पहना हुआ था…

वो सीधा मुंशी की टेबल पे जाकर बेथ गया… दोनों ने एक दुसरे को नमस्कार किया…

मुंशी… “एक और चाय ले आओ…”

फिर मुंशी अपने मेहमान की तरफ… “जी मैनेजर साहिब… किया सोचा आप ने… अगले महीने से मंडी में अनाज पोहंचना शुरू हो जये गए और आप अपनी डिमांड बताओ…”

गोविन्द मौजूद था मुंशी के दिमाग़ में और बारे ग़ौर से दोनों की बातें सुन रहा था…

अपने मेहमान को मुंशी ने मैनेजर कह कर बुलाया था तो उस की बात सुन कर गोविन्द पर हेरात के पहर टूट परे…

मैनेजर… “मुंशी जी आप तो जानते हो के लाला जीवट राम ने तो आना नहे बोली पर और में hi आऊं गए तो आप किस बात की चिंता कर रहे हो… जो रेट आप बोलो गए वो में लगा दूँ गए और आप की मर्ज़ी के बोपारी को सारा अनाज मिल जये गए… आप चिंतित न हों बस मेरे हिस्से पानी का ख्याल रखिये गए… 10 टेक ज़यादा लून गए इस बार…”

गोविन्द तो इस बात पे खुश था के मुंशी को ढूंढ़ना नहे पारा और वो खुद चल कर आ गया… परन्तु अब तो गोविन्द की ख़ुशी का ठिकाना नहे था क्यों के लाला जी का मैनेजर भी वहीँ पोहंच गया था… और गोविन्द उस के दिमाग़ में भी पोहंच गया और बोहत उसेफुल इनफार्मेशन मिल गयी उस मैनेजर के दिमाग़ से… उस ने साडी इनफार्मेशन नोट की... कुछ देर बाद दोनों उठ कर चले गए…

गोविन्द ने एक और कप चाय आर्डर किया और वेटर से एक और पेपर भी मांग लिया…

जो इनफार्मेशन मिली थी मुंशी और मैनेजर के दिमाग़ से… उस के अनुसार अब गोविन्द अपना प्लान तैयार करने लगा और उस को नोट करने लगा पेपर पर…

गोविन्द व्हाना से निकलकर एक ऑटो पे चल पारा लाला जी के घर की और…

3.00 बजे आफ्टरनून को गोविन्द लाला जी के बंगला पर पोहंचा…

क्या शानदार बंगला था… 1000 स्क्वायर यार्ड्स पे बोहत खूबसूरत ग्राउंड और 1सत फ्लोर पर बना हुआ था… बोहत बारे लॉन और एक एनेक्सी भी बानी हुई थी गेस्ट्स के लिए…

गोविन्द बारे हैरान हुआ जब गेट पर खरे शख्स ने उस का नाम सुनते hi बरी इज़्ज़त से उस को अंदर पोहंचाया… लाला जी ने उन सब को इन्फॉर्म कर रखा था गोविन्द के बारे में…

अंदर लाला जी की पत्नी मौजूद थीं… लाला जी कहीं बहार गए हुए थे… और सीमा यूनिवर्सिटी से अभी नहे आयी थी… लाला जी की पत्नी ने बोहत इज़्ज़त से और प्रेम से उस का स्वागत किया… और माइड से कह के एक कमरा खुलवा दिया और गोविन्द को कहा के वो आराम करले या फ्रेश हो जये… गोविन्द कपड़े तो साथ लाया न था… नहाने चला गया बहार निकला तो देखा एक नया कुरता पायजामा बीएड पर रखा था उस के लिए… उस ने वो पहन कर देखा तो उस पर बिलकुल फिट था… पहन कर बहार आया तो लाला जी की पत्नी इंतज़ार कर रहीं थी… चाय नाश्ते के साथ…

सीमा उसी वक़्त एंटर हुई घर में… यूनिवर्सिटी से वापिस आ चुकी थी… गोविन्द को देखते hi ख़ुशी से उछाल पारी और चीखती हुई उस के पास आ गयी… “थैंक यू थैंक यू आप आ गए… और थैंक यू की प ने ये ड्रेस स्वीकार किया… यू अरे लुकिंग हैंडसम…”

गोविन्द भी मुस्कुराया पर बोलै कुछ नहीं….

सीमा… “मैं अभी फ्रेश हो कर आती हूँ…”

इतने में लाला जइब hi आ गए… और गोविन्द को ज़ोर से गले लगा लिया… बारे खुश हुए लाला जी… अपनी पत्नी से… “मेरा बीटा आया हे घर में… तुम ने खिदमत की ठीक से…”

गोविन्द भी खुश हुआ… “लाला जी… बोहत कुछ खिला पीला दिया हे मुझे… आप चिंता न करें… और ये कपड़े भी नए पहने दिए मुझे…”

लाला जी… “बीटा… सीमा मुझे पापा कहती हे… जब हम सब को अपना मन लो तो पापा hi कहना मुझे ाचा लगे गए…”

लाला जी… “और कपड़े तो सीमा खुद ले कर आयी थी तुम्हारे लिए और कुछ शूज भी… तुम्हारे कमरे में रखवा दिए हैं…”

गोविन्द हैरानगी से…. “मेरा कमरा…??”

लाला जी… “हाँ बीटा अब तुम कहीं जाने की बात मत करना और अपनी एजुकेशन कम्पलीट करो… यहाँ रह कर…”

सीमा भी फ्रेश हो कर आ गई थी और वहीं बेथ गयी…

गोविन्द… “अभी कुछ देर पहले बीटा बन ने को कह रहे थे और अब एहसान चुकाने की बात कर रहे हैं… में ज़रूर एडमिशन लूँ गए कॉलेज में मगर में छह ता हूँ के आप के साथ काम करूँ… और आप का हाथ बताऊँ धंदे, बीऑपर में…”

लाला जी… “ये तो बरी ख़ुशी की बात हे बीटा…”

गोविन्द… “आप दान पुण्य ज़रूर कीजिये मगर ये भी ठीक नहे के बिना देखे के आप का बीऑपर का प्रॉफिट दिन बा दिन काम हो रहा हे… अगर ये सब यूँही चलता रहा तो आप जो अपनी माता जी श्रीमती विज्यन्ति देवी के नाम से जो हॉस्पिटल, कॉलेज और अनाथ आश्रम के लिए दान करते हैं वो आप को बंद करना परे गए…”

लाला जी सर झुकाये सुन रहे थे…
 
EPISODE – 17

गोविन्द… “आप दान पुण्य ज़रूर कीजिये मगर ये भी ठीक नहे के बिना देखे के आप का बीऑपर का प्रॉफिट दिन बा दिन काम हो रहा हे… अगर ये सब यूँही चलता रहा तो आप जो अपनी माता जी श्रीमती विज्यन्ति देवी के नाम से जो हॉस्पिटल, कॉलेज और अनाथ आश्रम के लिए दान करते हैं वो आप को बंद करना परे गए…”

लाला जी सर झुकाये सुन रहे थे…

गोविन्द… “5-6 साल पहले तक आप अनाज के बीऑपर के हिसाब से दौलत पुर में नंबर 1 पे थे… इन 6 सैलून में आप का नंबर गिर कर 5 पे आ गया हे… आप ने इन 6 सैलून में अनाज का कोई बारे सौदा, ट्रेडिंग, नही किया हे… आप के बीऑपर का काम घटता जा रहा हे मगर आप के सेवको की तादाद में कोई कमी नहे आयी… में हरगिज़ आप से ये नहे कहूं गए के आप सेवको या वर्कर्स को नौकरी से निकल दें हाँ ये ज़रूर रिक्वेस्ट करूँ गए के आप अपने काम को बढ़ाएं टेक सब को काम पे लगाया जा सके और इनकम भी बढ़े…”

लाला जी हेरात से गोविन्द की तरफ देख रहे थे और ख़ामोशी से सुन रहे थे…

गोविन्द… “दयालु होना कोई बुरी बात नहे… मगर सयाने कहते हैं दूसरों की सहयता करने से पहले अपने आप को मेहफ़ूज़ कर लें… आप को एनुअल इनकम का एक परसेंटेज या हिस्सा मुक़र्रर करना परे गए… जो आप दान कर सकते हों… अगर इनकम बढ़े गई तो उस हिसाब से परसेंटेज भी ओथोमाटिकल्ल्य बढ़ जये गई… आइंदा से हर क़िस्म की पेमेंट करने से पहले आप खुद चेक करें गए… और जीतनेय माली इख्तिआरात अथॉरिटी आप ने अपने कर्मचारियों को दी हे वो आज से कैंसिल… अब हर पेमेंट आप के अप्रूवल और जांच के बाद हो गई…”

गोविन्द… “आप के गोदाम की हालत बोहत खस्ता और ख़राब हो गई हे… पिछले 8 साल से कोई रिपेयर वर्क नहे हुआ कोई रंग रोग़न नहे हुआ… उस की वजा से गोदाम में रखे अनाज को नुकसान पहंच रहा हे… और गोदाम में रखे रखे क्वालिटी ख़राब हो रही हे… अनाज जिन गुणनि बैग्स या कार्टून्स में पैक कर के फ्लौर मिल्स या राइस मिल्स या दूसरी मिल्स में भेजा जाता हे वो गुणनि बैग्स 5 साल पुराने हैं… जिस वजा से न सिर्फ लोडिंग / अनलोडिंग के वक़्त और रस्ते में अनाज वास्ते होता हे… मिल्स से मुसलसल कम्प्लेंट्स आती हैं मगर कोई उन पे तवजा नहे करता…”

गोविन्द… “आप के बाप दादा ने म्हणत से जो आलिशान बीऑपर की बुन्याद राखी थी… वो आहिस्ता आहिस्ता कमज़ोर हो रही हे… और भी कुछ बातें हैं जो में आप से आगे चल कर डिसकस करूँ गए…”

गोविन्द चुप हुआ तो… लाला जी ने अपनी जगा से उठ कर गोविन्द को अपने गले से लगा लिया और फूट फूट कर रोने लगे…

गोविन्द उन को चुप करने की कोशिश करता रहा मगर वो चुप न हुए… ये देख कर उन की पत्नी और सीमा की आँखों में भी आंसू आ गए…

काफी देर के बाद जब गोविन्द उन को चुप करने में कामयाब हुआ तो लाला जी ने कहा… “बीटा जो कुछ तुम ने कहा हे वो सब 100% दुरुस्त हे… में नहे जनता इतनी साडी इनफार्मेशन तुम ने कैसे खोजी और तुम्हें बीऑपर का क्या तजरुबा हे मगर में समझता हूँ के अगर तुम मेरी बात मन लो और मेरे बेटे बन कर सरे कारोबार में मेरा हाथ बताओ तो सब कुछ ठीक हो सकता हे…”

सीमा फ़ौरन बोली… “प्लीज गोविन्द पापा की बात मन लो… एक और एहसान कार्डो हम पर…”

लाला जी की पत्नी (श्रीमती गंगा देवी)… “बीटा मत ठुकराना हमारी रिक्वेस्ट को…”

गोविन्द… इतना सारा प्यार देख कर अपने आप पर काबू न रख सका और लाला के गले लग कर रो पारा… और बोलै … “पापा में आप के साथ हूँ…”

लाला जी बोहत खुश हो गए… गंगा देवी भी खुश हो गयीं… सीमा का चेहरा खिल उठा और वो फ़ौरन उठी … “पापा आज तो सेलिब्रेट करना चाहिए…”

लाला… “हाँ बीटा तुम ठीक कह रही हो… गंगा… आज अपने बेटे के पसंद के खाने बनवाओ… रत को खाना साथ खाएं गए… ”

गोविन्द… “पापा मुझे कुछ चीज़ें लेनी हैं बाजार से तो वो में ले के आता हूँ…”

सीमा… “में भी चलूँ गई आप के साथ…”

लाला… “में ज़रा आराम करूँ गए… गोविन्द बीटा तुम सीमा को साथ ले जाओ इस को पूरे शहर का पता हे कोनसी चीज़ कहाँ से मिलती हे…”

गंगा देवी रत के खाने की तैयारी के लिए किचन की तरफ चली जाती हे…

सीमा… “गोविन्द, में कपड़े चेंज कर के आती हूँ… फिर निकलते हैं…”

गोविन्द… सुख की साँस लेते हुए धयान लगा देता हे आशा बक्शी, द्क्प, की तरफ…

उसी वक़्त द्क्प नाकाम हो कर अपने ऑफिस वापिस आई थी… उस ने अपने 2 इंस्पेक्टर्स को कॉल कर लिया था और उनसे ब्रीफिंग ले रही थी…

इंस्पेक्टर – 1… “मैडम… मैं ने पूरी फाॅर्स के साथ रेलवे स्टेशन और उस के अतराफ़ पूरी अछि तरह सर्च किया मगर कोई ऐसा शख्स नहे मिला जिस की आप ने डिटेल्स दी थी…”

इंस्पेक्टर – 2… “मैडम… आप ने बस स्टॉप की सर्विलांस खुद की और में ने अपनी फाॅर्स के साथ जो दुसरे रस्ते थे जहाँ से लोग अपनी कार और दुसरे ज़राई से आ सकते उन सब को चेक किया… मगर कोई क्लू नहे मिला…”

आशा बक्शी… “हम्म्म ये ठीक नहे हुआ… “रघु” एक बोहत डेंजरस और सफाक क्रिमिनल हे… हर तरह का क्राइम… मर्डर, रॉबरी, किडनैपिंग, ड्रग्स, खास तौर पर आर्गनाइज्ड क्राइम में खासा बदनाम हे… दिल्ली में उस पर 4 मर्डर का आरोप हे… केस भी कोर्ट में चल रहा हे… उस पर पाबन्दी हे के वो स्टेट से नहे निकल सकता… में ने चेक किया हे वो वहां के लोकल पुलिस स्टेशन से 2 दिन हुए राब्ते में नहे… घेयाब हे… में हेडक्वार्टर्स और दिल्ली पुलिस को उस की फोटो और डुप्लीकेट फाइल की रिक्वेस्ट की हे… जो 2 दिन में आ जये गई… में बोहत वरीड हूँ… रघु का दौलत पुर में होना यहाँ के अमन के लिए खतरा हे… में ने पिछले 6 महीने में अपनी पोस्टिंग होने के बाद पूरी म्हणत से क्राइम बोहत हद तक कम किया हे…”

आशा बक्शी… “तुम दोनों अपनी पूरी फाॅर्स लगा दो… हर तरफ सर्विलांस और सर्च बढ़ा दो… इन्फोर्मेर्स के साथ डेली मीटिंग्स करो… छोटे से छोटे क्राइम की मुझे रिपोर्ट डेली दो… शैयद हमें कोई क्लू मिले और हम कामयाब हो जयें उस को रोकने में वर्ण शहर के लिए बोहत बुरा होगा…”

आशा बक्शी… “हाँ एक और बात जो सब से इम्पोर्टेन्ट हे… कोई पैनिक नहे करना हे… प्रेस इस तरह की इनफार्मेशन को बेस बना कर पुलिस को बदनाम करता हे…”

गोविन्द… मुझे भी हेल्प करना चाहिए … मगर कैसे…???

ये सोचते सोचते… गोविन्द फिर से द्क्प के दिमाग़ में पोहंच जाता हे…

इस वक़्त 2 दोनों इंस्पेक्टर्स द्क्प को सलूट कर के निकल जाते हैं उन के ऑफिस से… द्क्प अपने प् को इण्टरकॉम पे बताती हे के वो आधे घंटे में ऑफिस से निकले गई… इस दौरान अगर कोई इम्पोर्टेन्ट फाइल हे तो अंदर भेज दे… और एक कप कॉफ़ी भी…

द्क्प बोहत थक चुकी थी… पूरे दिन की करवाई को अपने दिमाग़ में रिवाइंड करने लगी और अचानक उस के दिमाग़ में वो नौजवान क्लिक कर गया… “उस नौजवान ने बताया था के वो उस वक़्त शहर पोहंचा था… क्या उस का कोई कनेक्शन हे रघु से… नहे नहे वो तो बोहत शरीफ लग रहा था… क्राइम करने वालों के चेहरे इतने साफ पाकीज़ा तो नहे होते… मगर वो मुझे देख कैसे रहा था… वो मुझ से खौफ ज़ादा नहे था… उस की नज़रें ऐसी थी जेसे कोई मर्द एक लड़की को देखता हे… आज उस के देखने से एहसास हुआ के में भी एक लड़की हूँ… पुलिस सर्विस करते करते अपनी शनाख्त भूल hi चुकी थी…” ये सोचते सोचते द्क्प अपनी कुर्सी से उठी और दीवार पे लगे मिरर में अपने वजूद, सरपे, को देखने लगी… “क्या में किसी मर्द की तालाब हो सकती हूँ…?? नहे नहे में ये क्या सोच रही हूँ… में एक ज़िम्मेदार पुलिस अफसर हूँ… वो पता नहे कोण हे…”
 
EPISODE – 18

द्क्प अपनी कुर्सी से उठी और दीवार पे लगे मिरर में अपने वजूद, सरपे, को देखने लगी… “क्या में किसी मर्द की तालाब हो सकती हूँ…?? नहे नहे में ये क्या सोच रही हूँ… में एक ज़िम्मेदार पुलिस अफसर हूँ… वो पता नहे कोण हे…”

गोविन्द मुस्कुराने लगा… “साली मुझे क्रिमिनल समझती हे… इस की तो… बुरी बात!!! द्क्प हे साली… कुछ तो इज़्ज़त बनती हे और पुलिस वालों का काम hi शक करना हे… कोई नहे…”

द्क्प की सोच… “आज तक जीतनेय मर्दों ने मुझ से बात की, डाब कर बात की… जब के वो नौजवान तो मेरी यूनिफार्म, पोजीशन से बिलकुल भी मुतासिर नहे नज़र आया… उस की निगाह में पसन्दीदगी ज़रूर थी मगर हवस नहे थी… क्या में किसी मर्द की चाहत बन सकती हु…” फिर से वो अपने बदन को निहारने लगी मिरर में…

द्क्प… “कुछ भी हो… मेरा कर्त्तव्य इस बात की इजाज़त नहे देता के में इन फज़ूल चक्रों में परूँ… मगर वो हे कहाँ…?? क्या वो राब्ता करे गए…??”

गोविन्द मुस्कुराते हुए दिल में थान लेता हे के… “मुझे सहयता करनी है एक द्क्प की क्राइम को ख़तम करने में और एक महिला की जो अपने आप को भुला चुकी हे और सिर्फ और सिर्फ पब्लिक सर्विस के लिए सोच रही हे… मगर वो अपने जिस्म की नीड्स को सप्रेस कर रही हे… ये ठीक नहे… ये मेरा कर्तिव्य हे के में उस की भी सहयता करूँ…”

ठीक उसी शामे दौलत पुर शहर के रियल एस्टेट टाइकून सेठ राजेंदर सिंह के ठिकाने पर… रघु, सेठ के मैनेजर से कहता हे मुझे साइट और वो इलाक़ा कब दिखाओ गए… मैनेजर… “आप आज hi तो पधारे हो शहर में… सेठ साहिब का हुकुम हे के आप की 2 – 3 दिन खूब खिदमत की जये… शराब और शबाब के साथ… फिर एक बार काम स्टार्ट हो गया तो शायद मॉक न मिले…”

रघु… “अरे भय… मौके का क्या हे… मौके पे चुका तो अपुन मरता हे… अपुन काम करे गए तो भी दारू पिए गए… और काम नहे करे गए तो भी दारू पिए गए… तू चिंता मत कर…”

रघु… “अरे भय इस लिए… तू कल सुबह हमारा अरेंजमेंट कर इलाक़े पे जाने का…”

मैनेजर… “रघु भाई… जेसे आप का हुकुम…. कल का इंतज़ाम में कर लेता हूँ… सेठ को भी बता दूँ गए…”

रघु… “अरे भय… सेठ की चिंता कोनो नहीं… अपुन की चिंता कर… मैनेजर बाबू…” और ज़ोर ज़ोर से हंसने लगा…

मैनेजर… “रघु भाई… आज सारा दिन आप के लिए पुलिस चौकस रही हे… और उन को इनफार्मेशन मिल चुकी हे आप के दौलत पुर आने की…”

रघु… “अरे भय… अपुन का और पुलिस का तो चूहा बिल्ली का खेल चलता रहे गए… तू चिंता मत कर… जैसा तुझ को बोलै वैसा कर…”

मैनेजर… “ठीक हे, रघु भाई…”

वापिस आते हैं गोविन्द की तरफ…

सीमा भी आ चुकी थी ड्रेस चेंज कर के और पूरा क़तल करने का इरादा ले कर आयी थी…

सीमा की 34-26-34 की फिगर, लम्बा क़द, झील जैसी गहरी काली आँखें, हिप्स तक लम्बे काळा बाल, होंठ न पतले न मोठे, गुलाबी रास से भरे, आँखों पर चश्मा, मुस्कराहट ऐसी के बाँदा फ़िदा हो जये… और इस वक़्त सीमा ने हलके गुलाबी रंग की शार्ट शर्ट और नीचे ब्लैक कलर की लेग्गिंग डाली हुई थी…

वो बोहत आकर्षित लग रही थी…

मगर आज जो गोविन्द ने जो लाला जी को अपना पापा बोलै था… अब वो अपना रिश्ता सीमा के साथ भाई बहन वाला रखना छह रहा था… लाला जी ने शॉपिंग के लिए जो पैसे गोविन्द को दिए… वो उस ने एक बेटे के हक़ से hi लिए थे…

वो और सीमा बहार आ गए… कार पोर्च में ड्राइवर कार के साथ खरा था… सीमा ने ड्राइवर से चाबी ले ली और ड्राइविंग सीट पर बेथ गई… और गोविन्द को साथ में बैठने को कहा… ड्राइवर परे हूत गया…

सीमा … “जी गोविन्द बताइये आप ने काया लेना हे…”

गोविन्द ने टेलर की शॉप का बताया…

सीमा ने कार उस तरफ मोर ली… वहां पोहंच कर गोविन्द ने टेलर से सिले कपड़ों का पैकेट लिया और कार में रख दिया… और फिर सीमा उस के कहने पर एक बोहत अचे शॉपिंग मॉल में ले गयी…

गोविन्द ने कुछ कपड़े अपने बापू, माँ, ेषणा, प्रकाश के लिए ख़रीदे… फिर उस ने एक बोहत खूबसूरत साड़ी ली मल्टी भाभी के लिए और एक ड्रेस किरण के लिए भी लिया… एक शाल लाला जी के लिए और एक उन की पत्नी के लिए… फिर उस ने सीमा को कहा के वो अपनी पसंद की कोई चीज़ ले ले… सीमा… “आप ने सब के लिए अपनी पसनद से कपड़े लिए हैं तो मेरे लिए भी भी आप hi ले लीजिये…”

गोविन्द… “जो यहाँ मौजूद नहे उन के लिए मेरा लेना बनता था… मगर तुम तो यहाँ हो… इस लिए खुद ले लो…”

सीमा ने मज़ीद ज़िद न करते हुए… एक बोहत प्यारा सा स्कार्फ़ ले लिया अपने लिए… और बोली आगे विंटर आने वाला हे…

सीमा… “में ने जो आप के लिए कपड़े लिए थे वो अप्प को पसनद आये…”

गोविन्द… “ये देख लो ये कुरता और पायजामा तुम्हारा लाया हुआ पहना हे… देखो बिल्कु फिट हे… बाक़ी कपड़े में ने देखे नहे… वो वापस चल कर डेक लेते हैं… अगर ज़रुरत हुई तो चेंज करवा लेंगे…”

गोविन्द… “चलो सीमा तुम्हें आइस क्रीम खिला ता हूँ…”

सीमा बोहत खुश हुई…

दोनों मॉल में hi अचे आइस क्रीम पार्लर में एक साइड पे टेबल पर बेथ गए और आइस क्रीम आर्डर कर ली…

सीमा… “गोविन्द… में आप से कुछ कहना चाहती हूँ…”

गोविन्द… “हाँ सीमा कहो…”

सीमा कुछ नर्वस हो गई और अपने हाथ की उँगलियों को मरोड़ने लगी… नज़रें नीची करते हुए… “गोविन्द… ी लिखे यू…”

गोविन्द… “ये तो बोहत अछि बात हे… इवन ी लिखे यू…”

सीमा… “वैसे वाला लिखे नहे… ी लव यू…” और गोविन्द की आँखों में देखने लगी…

गोविन्द… “देखो सीमा… तुम बोहत अछि लड़की हो… में ने आज जो पापा की बात मन कर उन का बीटा बन ने का फैसला किया हे उस के अनुसरण अब तुम्हरी बात मेरे लिए एक्सेप्ट करना मुश्किल हे… हाँ अगर तुम ने मुझ से ये पहले कहा होता तो में ज़रूर सोचता इस बारे में… अब में तुम्हें एक बहन और एक बोहत अछि दोस्त समझता हूँ…”

सीमा… “अगर आप मेरी बात मन लें तो दामाद भी तो बीटा होता हे…”

गोविन्द… “सीमा अभी में ने तुम्हारा प्यार क़बूल किया नहे और तुम शादी की बात कर रही हो…”

सीमा… “आप जो भी कहें मेरे लिए अब वापसी मुश्किल हे… मैं आप को अपने मन का देवता मन चुकी हूँ…”

आइस सरम सर्वे हो चुकी थी… दोनों आइस क्रीम कहते कहते बातें करने लगे…

गोविन्द… “तुम ने ये फैसला इस लिए लिया के तुम मुझ से मुतासिर हुई क्यों के में ने बहादुरी से तुम्हारी जान बचाई… अभी तुम मेरे बारे में जानती कितना हो…”

सीमा… “मेने आज तक किसी लड़के से दोस्ती नहे की मगर में जानती हूँ के आप बोहत शरीफ नौजवान हैं और आप हैंडसम हैं… मुझे आप जैसा hi मज़बूत जिस्म और किरदार वाला जीवन साथी चाहिए था…” और शर्म से उस की आँखें झुक गयीं… गलों पर लाली आगयी…

गोविन्द… जब महसूस किया के आर्ग्यूमेंट्स सीरियस हो रहे हैं तो उस ने खुल के बात करने का फैसला कर लिया ताकि सीमा डिस्कुरागे हो जये… “देखो सीमा… तुम ने भले hi किसी के साथ दोस्ती न की हो और वर्जिन हो मगर में सेक्सुअली एक्टिव हूँ और 2-3 लड़कियों के साथ सेक्स भी कर चुक्का हूँ… मुझे सेक्स करना ाचा लगता हे… तो इस लिए जिस्म की मज़बूती की बात तो ठीक हे मगर किरदार की मज़बूती की बात दुरुस्त नहे…”

सीमा… अभी भी आँखें नीची थी… “गोविन्द… मुझे आप की खातिर ये भी मंज़ूर हे के अगर आप किसी के साथ तालुक रखना चाहे तो मुझे कोई आपत्ति नहे हो गई… अगर आप चाहें तो में भी आप के लिए हाज़िर हूँ…” और अपना चेहरा दोनों हाथों में छुपा लिया…

गोविन्द का दिल कुछ पिघलने लगा ये दिलकश मंज़र देख कर… सीमा के गुलाबी लाल, लरज़ते होंठ, सीमा को बोहत आकर्षित बना रहे थे…

गोविन्द ने माहौल को चेंज करने के लिए… एक लाइटर टोन में बात की… “देखो सीमा अभी तो में और तुम भाई बहन हैं अगर आगे चल कर तुम मुझे अछि लगी तो में सोचूं गए इस बारे में…”

सीमा उसी तरह अपने चेहरे को छुपाये हुए शोख लहजे में बोली… “तो आप वो बन न चाहते हैं…??”

गोविन्द… हेरात से… “वो क्या….??”

सीमा चुप रही और चेहरा भी उसी तरह ढके रही…

गोविन्द… परेशां होते हुए… “बोलो… वो क्या….??”

सीमा… “वही जो पहले बहन बनाओ और फिर उस बहन के साथ सेक्स करता हे जो उससे शब्द कहते हैं…”

गोविन्द मुस्करा कर कुछ कुछ समझते हुए… उस के दिमाग़ में झाँका… तो वहां वो शब्द ब्लिंक कर रहा था…

सीमा की सोच… “बहनचोद…”

गोविन्द के मुंह से न चाहते हुए भी निकल गया… “बहनचोद…???”

सीमा खिलखिला कर हंस पारी… चेहरा उसी तरह ढाका हुआ था… “गोविन्द आप बोहत बेशरम हो…”

गोविन्द… शरारती अंदाज़ से.. “चलो उठो … वक़्त आने पर देखें गए…”

सीमा हेरात से उठती हुई… “हैं…?? रियली…?? अरे यू सीरियस…???”

गोविन्द ने कोई जवाब नहे दिया और सारा सामान उठा कर बहार निकल ए… वापसी में गोविन्द ने कीस ले लीं… और कार ड्राइव करने लगा…

सीमा ने कार कद ों कर दी… म्यूजिक प्ले होने लगा… और गण रफ़ी की मधुर आवाज़ में “दिल को न मेरे तड़पाओ… प्यार को मत ठुकराओ”चलने लगा…

गाने ने माहौल को भावक कर दिया… सीमा ने अपना हाथ रख दिया गोविन्द के हाथ पे जो गियर पे था…

गोविन्द ने कोई आपत्ति न दिखाई न कोई ऐतराज़ किया… और सीमा का हाथ रहने दिया अपने हाथ पे…

सीमा के लिए इतना भी बोहत था… वो कुश हो गयी…
 
EPISODE – 19

घर पोहचने पर सब ने मिल कर खाना खाया… और फिर सब लोग बेथ कर साथ में चाय पीने लगे… लाला को और उन की पत्नी को शॉल्स बोहत पसंद आईं…

लाला जी… “बीटा तुम ने लोस्स के कारन बताये वो सब ठीक हैं पर तुम ने सोचा… के उपाए क्या हे और कुछ खर्च भी होगा जब हम गोदाम को रिपेयर करें गए… ?? और दुसरे खर्चे भी हैं…”

गोविन्द… “पापा वो आप मुझ पर चोर दाएं… मगर आप को मुझ से एक प्रॉमिस करना होगा… जिस तरह में ने आप से आज पैसे लेने में कोई ऐतराज़ नहे किया इसी तरह में अगर पैसों का कुछ अरेंजमेंट करूँ गए तो आप भी ऐतराज़ नहे करें गए…”

लाला जी… “में ने तुम को सिर्फ अपना बीटा कहा नहे… बल्कि दिल से मना भी हे… तुम जैसा चाहो वैसा करो… तुम्हें पूरा अधिकार हे… मुझे तुम पर यक़ीन हे के तुम कोई ग़लत काम नहे करो गए…”

गोविन्द… “पापा… में अभी आप के कर्मचारियों के सामने नहे आऊं गए… बस में आप को प्लान बना कर दूँ गए… आप ने खुद ऑफिस जा कर उस पर अमल करवाना हो गए… और कण्ट्रोल को अपने हाथ में लेना होगा…”

लाला जी… “ठीक हे बीटा… जेसे तुम कहो…”

उस के बाद, सीमा ने इशू चेरा गोविन्द की एजुकेशन का…

सीमा… “नई सेशन स्टार्ट हुए 4 मोनथस हो चुके हैं और इस शामे गोविन्द को कोई भी कॉलेज एडमिशन नहे दे गए… पापा आप गोविन्द को सिर्फ उस कॉलेज में एडमिशन दिलवा सकते हैं जहाँ आप दान करते हैं… ताकि ये साल वास्ते न हो…”

लाला जी… “बीटा में ने पहले hi प्रिंसिपल से बात कर ली हे… गोविन्द बीटा… कल तुम चले जाओ अपनी 4 फोटोज लेकर… फॉर्म वग़ैरा वहीँ वो लोग खुद भर लें गए… बस तुम्हारा एडमिशन हो जये गए…”

गोविन्द… “थैंक यू पापा…”

लाला जी और गंगा देवी अपने कमरे में चले गए…

सीमा बोहत हेरात से गोविन्द की तरफ देख रही थी…

सीमा… “कैसे करो गए फंड्स का अरेंजमेंट…??”

गोविन्द… “कुछ न कुछ हो जये गए… don’t वोर्री… ok bye हैवे स्वीट ड्रीम्स…”

सीमा… “अभी से…?? अभी तो सिर्फ 10 बजे हैं रत के… में कुछ देर आप के साथ बैठना चाहती हूँ… बातें करें गए ना…”

गोविन्द… को अभी तन्हाई चाहिए थी… “यार सीमा… आज नहे… आज में बोहत थक गया हूँ… जल्दी सौं गए…”

सीमा न चाहते हुए भी उठ आकर अपने कमरे में चली गयी और गोविन्द अपने कमरे में आ गया…

गोविन्द ने अपने कमरे में आ कर सब से पहले धयान लगाया माँ और ेषणा की तरफ… वहां सब खैरियत थी… बस उस को यद् कर रही थी… मल्टी भाभी और रुक्मणि को देखा तो वो भी उस को यद् कर रही थी…

उस के बाद गोविन्द ने रुख किया लाला जी के मैनेजर के दिमाग़ का… वो इस वक़्त अपने घर पर बैठा शराब से लुत्फ़ अन्दोज़ हो रहा था… बोहत खुश था के आज उस की मीटिंग मुंशी के साथ सफल रही थी… गोविन्द ने उस के दिमाग़ को पढ़ना शुरू किया तो हैरान रह गया… वो अब तक लाला जी को 2 करोड़ से ऊपर का चुना लगा चुक्का था… उस 2 करोड़ में से कुछ उस ने खर्च किये थे, एक बरी सी कार ली थी और एक बारे सा माकन जिस में वो रह रहा था, गहने लिए थे… बाक़ी… 1 कोर के कॅश आयरन सेफ में रखा था.. आयरन सेफ उस के बैडरूम में थी… जिस का लॉक नंबर गोविन्द ने नोट कर लिया और फिर… गोविन्द ने उस की पत्नी के दिमाग़ को चेक किया… पत्नी के दिमाग़ के अनुसार… उस का पति थोड़ी और शराब पि कर बैडरूम में सो जये गए… 2 बेटे थे 7 और 8 साल के वो दोनों अपने कमरे में सो चुके थे… गोविन्द ने चेक किया के काया उन के घर में कोई स्लीपिंग पिल्स हैं… तो पता चला के… एक पैक रखा हुआ हे जो के उस का पति कभी कभार लेता हे जब ब्लड प्रेशर ज़यादा होता हे… गोविन्द ने मैनेजर की पत्नी का दिमाग़ अपने कण्ट्रोल में करते हुए… एक गोली उस को खिला दी और एक गोली वो लेकर चली गयी अपने पति के पास और नज़र बचा कर उस के गिलास में दाल दी… ½ घंटा था गोविन्द के पास और उन को सोने में और टेबलेट के असर होने में… और उन का माकन लाला के घर से 30 मिनट की कार ड्राइव पर था… कार कीस अभी तक गोविन्द के पास थीं…

गोविन्द ने 15 मिनट के बाद निकलने का फैसला किए… और रुख किया आशा बक्शी की तरफ…

गोविन्द सिर्फ उस को दिमाग़ी तौर पर गाइड करना चाहता था और खुद एक्शन से दूर रहना चाहता था…

आशा बक्शी रत 10 बजे तक सो जाती थी क्यों के उससे आदत थी सुबह सवेरे उठने की… वो रोज़ सुबह उठ कर एक्सरसाइज और जॉगिंग करती थी… वो पुलिस अफसर रेजिडेंस में अकेली रहती थी… वैसे भी उस के माता पिता का बोहत पहले देहांत हो चुक्का था… और वो अकेली संतान थी…

मगर आज नींद उस की आँखों से कोसों दूर थी… आँखें जेसे किसी के इंतज़ार में खुली थी और खुली आँखों से सपने देख रही थी… उस का धयान गोविन्द से हैट hi नहे रहा था…

गोविन्द ने उस के दिमाग़ में आ कर सोच पैदा की…

गोविन्द… आशा के दिमाग़ में… “बस अब मुझे उस नौजवान के बारे में मज़ीद नहे सोचना चाहिए… जब क़िस्मत में होगा मिलना तो मिल कर उस को खूब प्यार कर लून गई… बस अब सिर्फ रघु के बारे सोचना हे के उसे कैसे पकड़ा जये…” प्यार करने वाली सोच के बारे विचार करने पर आशा शर्मा गयी और सोचने लगी…

आशा… “धत… में तो सेक्स मणिअक हो गई हु… अब लगता हे मेरी विर्जिनिटी ख़तम हो कर रहे गई… बस वो नौजवान मिल जये… में उससे चोरुन गई नहे… में भी कितनी बेवक़ूफ़ हूँ… न उस का नाम पूछा न पता…”

अब गोविन्द ने उस की सोच को मोरा रघु की तरफ… “रघु एक हार्डकोर क्रिमिनल हे… उस को यहाँ कोई बारे गनग या कोई इन्फ्लुएंटीएल शख्स hi हैंडल कर रहा होगा…”

“मुझे मॉर्निंग में इंस्पेक्टर्स को इंस्ट्रक्शंस देनी होंगी के जितने बारे क्रिमिनल्स, गैंग या और बुरी शोहरत वाले इन्फ्लुएंटीएल लोग हैं उन के हाँ कोई मामूल से हैट कर एक्टिविटी हे तो फ़ौरन नोट करे और जांच करे…” अब आशा भी शांत हो गई और उस को एक राह नज़र आने लगी रघु को ट्रेस करने के लिए और वो एहि सोचती सोचती सो गई…

गोविन्द ने भी अपने कपड़े चेंज किये और एक टाइट ट्रॉउज़र और t-shirt निकली… एक स्कार्फ़ भी उठा लिया…. चेहरा ढकने के लिए…

कार ड्राइव करते हुए 25 मिनट में मैनेजर के माकन के पास पोहंच गया और कार थोड़ी दूर पार्क कर के लॉक कर दी… पैदल चलता हुआ माकन के पास पोहंचा और गेट खोल कर अंदर दाखिल हो गया… पहले hi चेक कर चुक्का था वाहन कोई सिक्योरिटी अलार्म, कैमरा या डॉग नहे था… मैनेजर की पत्नी के दिमाग़ को कण्ट्रोल करने के कारन… मैनेजर की पत्नी ने मैं गेट का लॉक नहे लगाया था और न hi लाउन्ज एंट्रेंस दूर को लॉक किया था…

गोविन्द ख़ामोशी से चलता हुआ… लाउन्ज में आया और एक बार फिर मैनेजर और उस की पत्नी के दिमाग़ को चेक किया… दोनों बेहोश थे… उस ने हाथों पे कपड़ा बंधा हुआ था ताकि उँगलियों के निशान न परे किसी चीज़ पर और चेहरे पर स्कार्फ़ बंधा हुआ था… ग्लव्स का उस के ज़ेहन से निकल गया था तो उस ने कपड़े हाथों पर लप्पेट लिए थे… बस गुज़ारा हो रहा था… गोविन्द ने पहले hi मैनेजर के दिमाग़ से चेक कर लिया था के ओर रोज़ रोज़ आयरन सेफ नही खोलता था… तो उस को इस करवाइए का पता फ़ौरन चलने का इमकान नहे था…

गोविन्द बैडरूम में एंटर हुआ… बैडरूम में हलकी ब्लू कलर की लाइट ों थी… A/C ों था… कमरा चिल्ड था… बीएड पर एक तरफ मैनेजर और दूसरी तरफ उस की पत्नी सो रही थी… लग रहा था के दोनों को ब्लैंकेट डालने की फुर्सत नहीं मिली और उस से पहले hi टेबलेट के असर से बेहोश हो गए… मैनेजर तो पहले hi ड्रंक था… गोविन्द ने ब्लैंकेट पहले मैनेजर के ऊपर डाला फिर उस की पत्नी के ऊपर डालने लगा तो वो अपने आप पर काबू न रख सका और उस औरत के जिस्म को निहारने लगा… वो 40 साल की गदराये जिस्म की औरत थी… इस वक उस ने महीन सी निघ्त्य पहनी हुई थी… न नीचे पंतय न hi ऊपर ब्रा… चुके आधे बहार थे निघ्त्य में से… निघ्त्य भी फुल खुले गले की थी… नीचे से निघ्त्य सोने की वजा से ऊपर को सर्कि हुई थी और औरत की गांड की लकीर तक नज़र आ रही थी… उसी कोने में आयरन सेफ रखा था… उस ने अपने आप को कण्ट्रोल किया और सेफ की तरफ तवजा करते हुए उस का लॉक खोल लिया… अंदर कॅश रखा था और कुछ गहने भी थे…

गोविन्द ने इधर उधर देखा तो उस को पास राखी क्लोथ्स कैबिनेट में से एक छोटा सा शोल्डर बैग मिला वो उस ने खली किया उसी कैबिनेट में… कैबिनेट बंद की और उस बैग में सरे पैसे और गहने ट्रांसफर कर दिए… आयरन सेफ लॉक की पहले की तरह… इस सरे काम में उससे सिर्फ 15 मिनट लगे… उस ने सोचा के ज़यादा शामे नहे लगा… उस ने बैग एक तरफ रखा और अपना हाथ औरत के चुचों की तरफ बढ़ा दिया…
 
EPISODE – 20

गोविन्द ने इधर उधर देखा तो उस को पास राखी क्लोथ्स कैबिनेट से एक छोटा सा शोल्डर बैग मिला वो उस ने खली किया उसी कैबिनेट में… कैबिनेट बंद की और उस बैग में सरे पैसे और गहने ट्रांसफर कर दिए… आयरन सेफ लॉक की पहले की तरह… इस सरे काम में उससे सिर्फ 15 मिनट लगे… उस ने सोचा के ज़यादा शामे नहे लगा… उस ने बैग एक तरफ रखा और अपना हाथ औरत के चुचों की तरफ बढ़ा दिया…

गोविन्द ने ब्लैंकेट डालते हुए औरत के चुके और गांड की लकीर देखि थी तो उस का लुंड तन चुक्का था… अब जब उस को लगा के उस को ज़यादा शामे नहे लगा और वो थोड़ी बोहत चेर चार कर के आनंद ले सकता हे… इस से ज़यादा न उस के दिमाग़ में था न वो सोच रहा था… इस वक़्त उस के ऊपर शेहवानी जज़्बात अपना असर दिखा रहे थे…

गदराया बदन सामने था… गोविन्द ने हाथ निघ्त्य के अंदर दाल कर चुके को पूरा अपने हाथ में भर लिया… और होल होल दबाने लगा… फिर दुसरे चुके पर दूसरा हाथ रख लिया और उस को भी दबाने लगा… हाथों पे लिप्त हुआ कपड़ा वो हटा चुक्का था… निप्पल सख्त हो गए थे… औरत के बदन में लतीफ़ सा इरतआश था… ऊँगली और अंगूठे के दरमियान मसल रहा था निप्पल को… होल होल उस का बदन लरज़ रहा था… फिर गोविन्द का हाथ गया गांड की लकीर पर और उस के चूतरो पे हाथ फिसलने लगा… क्या भरे भरे गदराये हुए चुतर थे… क्या लुत्फ़ था… इस जिस्म की अपनी चाशनी थी… चूतर चमक रहे थे नीली रौशनी में… हाथ ढूंढ रहा था कुछ दरार में… एक तंग सूराख… एक गोल… छोटा सा… चुनातों का डेरा… हाथ लगते hi वो बंद सूराख ज़रा सा खुल गया… औरत करवट ले कर सोयी थी और उस की गांड थी गोविन्द की तरफ… हाथ गांड के सूराख पे आवारा गर्दी करता रहा… बदन में लर्ज़िश थी… नींद की गोली ने औरत को मदहोश किया हुआ था… और उस मदहोशी पर एक और मदहोशी अपना रंग दिखा ने लगी… नशीली मदहोशी… औरत का तुंग सूराख खुल रहा था और बंद हो रह अतः… ामान्तरण था किसी को मेहमान करने के लिए… एक न्योता था किसी ज़ोरावर के लिए… जो आये और फतह करे… सिकंदर की तरह… इस दुनिया को खोजे… हाथ अब टांगों के अंदर हुआ एक लकीर की तरफ… टैंगो में मौजूद लकीर की तरफ… जो के कुछ खुली थी… और उस वक़्त पूरी गिल्ली थी… बेहोशी में भी बदन पर फिरते मरदाना हाथ अपना असर दिखा रहे थे… छूट का गिला पैन बढ़ता जा रहा था… गोविन्द ने ज़िप खोली और अपना लुंड बहार निकल कर उस को सेट किया छूट के मुहाने पर एक हाथ में लुंड और दुसरे हाथ से तंग को थोड़ा सा ऊपर उठाते हुए हुए… लुंड आहिस्ता आहिस्ता अनादर जाने लगा… कोई मज़ाहिमत न थी… फ़तेह… क़िले में अंदर दाखिल हुआ… इस बात का अंदाज़ा ज़रूर हुआ के इस से पहले इस क़द ो क़ामत का जंगजू इस क़िले में दाखिल नहे हुआ था… लुंड अंदर और बहार होने लगा… औरत की सांसें तेज़ चलने लगीं… चुके हिल रहे थे… सांसों की आवाज़ भी आ रही थी… जेसे फुंकार हो किसी छिपकिली की… किसी सांप की… लुंड अंदर बहार हो रहा था… गोविन्द के लिए ये लुत्फ़ बोहत कामुक था…

पहली बार मल्टी भाभी को छोड़ा तो उस का पति वही बीएड पर बेसुध पारा था… और अब मैनेजर ग़ाफ़िल था… और उस की पत्नी की छूट फरफरा रही थी एक लुंड के हमलों से… विशाल लुंड काफी देर तक छोड़ता रहा छूट को… गोविन्द ने एक बात का ख़याल रखा के अपने जिस्म का बोझ उस औरत पर न डाला… औरत का बदन एकरा और नींद में झटके खाने लगा… गिल्ली छूट मज़ीद गिल्ली हो कर रिसने लगी… सैलाब का बंद टूट चुक्का था…

लुंड भी पूरा का पूरा औरत के पानी से सं चुक्का था… गोविन्द ने लुंड बहार निकला और छूट से निकलते लेसदार पानी को गांड के सूराख पे अछि तरह से मॉल दिया और एक ऊँगली अंदर दाल दी… औरत का जिस्म थोड़ा सा हिला और फिर साकित हो गया… ऊँगली अंदर बहार होने लगी… एक के बाद दूसरी ऊँगली ने भी साथ देते हुए गांड के तंग सूराख में प्रवेश किया… अब औरत चटपटा रही थी… बदन का लरज़ने बढ़ चुक्का था… गोविन्द ने उस के दिमाग़ को चेक किया… वो बेहोश थी मगर ज़रा सा दर्द का अहसास था… शायद उस के पति ने इस इलाक़े में कभी पेश क़दमी नहे की थी… कुछ देर के बाद वो औरत थोड़ी शांत हुई तो गोविन्द ने अपने लुंड उस के गांड के गोल सूराख पर रखा और हल्का सा दबाया… मगर दो उँगलियाँ कहाँ, और कहाँ एक मोटा लम्बा विशाल लुंड… गोविन्द ने ढेर सारा थूक अपने मुंह में जमा कर के गांड के सूराख पे डाला और फिर आहिस्ता आहिस्ता लुंड को अंदर दबाने लगा… औरत का बदन फिर से हिलने लगा… दर्द का अहसास जग रहा था औरत के अंदर… मगर गोविन्द कहाँ मन ने वाला था… उस ने दबाना जारी रखा… टोपी वाला हिस्सा अंदर ग़ुस्सा तो औरत के मुंह से ाः निकली… गोविन्द ज़रा देर के लिए रुका और फिर ढेर सारा थूक गांड के सूराख पे डाला… कुछ देर के बाद आधा लुंड अंदर दाल दिया… औरत की तंग हवा में खुद से उठ गयी… और उस के मुंह से आह आह आह … कराहें निकलने लगी…

गोविन्द जेसे के हैवान बन चुक्का था… उस को ये दर भी नहे था के वो औरत उठ सकती हे चाहे नींद की गोली का असर हो या न हो … पहली बार गांड में लुंड जा रहा था और वो भी विशाल गधे जैसा लुंड…

ये खुशकिस्मती थी गोविन्द की के औरत बैडर न हुई और लुंड पूरा अंदर दाखिल हो गया… गोविन्द को अपने लुंड पर भी तकलीफ हो रही थी… इतना तंग सूराख…

कुछ देर के बाद जेसे औरत के गांड से गैस निकली… इन्तेहाई गरम हवा लुंड को चीरती निकली… अलग किस्म की सौगंध थी… गोविन्द सोचने लगा ये अभी पॉटी न करदे… ख़ैर गोविन्द ने ढके लगाने शुरू कर दिए और कुछ देर के बाद औरत का जिस्म फिर से झटके लेने लगा…

फिर गोविन्द ने लुंड बहार निकला गांड से और उस को टिश्यू पेपर बॉक्स नज़र आया… उस ने बोहत सरे तिसुएस निकल लिए और अपना सारा माल उन तिसुएस पर दाल के वाशरूम का दरवाज़ा खोल कर अंदर कमोड में बहा दिए… और फ्लश कर दिया… हाथ और लुंड वाश बेसिन से धोया, ज़िप लगाई… और बहार आकर वाशरूम का दरवाज़ा बंद किया… औरत के ऊपर कम्बल दाल दिया…

कपड़े उठा कर हाथो पे लपेटे… बैग उठा कर शोल्डर्स पर फिक्स किया… और बैडरूम से बहार आ कर दरवाज़े को बंद किया… लाउन्ज दूर को लॉक किया… और मैं गेट को ज़रा सा खोल कर बहार झाँका… बिलकुल सनता था… बहार निकल कर मैं गेट के इंटरलॉक को एक्टिव करते हुए गेट लॉक करदिया… और चल पारा अपनी कार की तरफ… 5 मिनट की वाक के बाद अपनी कार में जा बैठा… शोल्डर बैग उतर कर पिछली सीट पर रखा… 40 मिनट लगे थे उस को… 12.00 के बाद वो वापिस पोहंच गया… लाला जी के घर… गेट पैर खरे गार्ड ने गेट खोल दिया… कार पार्क करके, गोविन्द अपने कमरे में आ गया… अब कार कीस उस ने बहार लाउन्ज में टेबल पर चोर दीं थीं… कमरे में आ कर सब से पहले गार्ड के दिमाग़ से अपना जाना और आना दोनों इरेस किया… अब गोविन्द ब्रेन कण्ट्रोल & मैनीपुलेशन टेक्निक्स बराबर अप्लाई कर रहा था… कपड़े चेंज किये और फ्रेश हो कर कॅश काउंट किया… बारे बारे नोट थे… 1 करोड़ से कुछ ऊपर… गहने कोई 50 लाख के होंगे…

गोविन्द ने कॅश में से 40 लाख अलग किये और पैकेट बना कर अलग से अलमारी में रख कर अलमारी लॉक कर दी…

गोविन्द को औरत को छोड़ने में बोहत लुत्फ़ आया था… सोचते सोचते पता नहे कब वो नींद की आग़ोश में चला गया… सुबह सवेरे उससे पूजा की आवाज़ आयी… वो उठ बैठा और फ्रेश होने चला गया वाश रूम… फ्रेश होने के दौरान hi वो चला गया मैनेजर के दिमाग़ में तो अभी वो सो रहा था… और उस की पत्नी के दिमाग़ में गया तो वो उठ चुकी थी… उस के सर में ज़रा सा दर्द था और कुछ गांड में तकलीफ थी… वो उस को समझ न आयी… मगर बदन उस का बोहत हल्का था… बोहत लतीफ़ सा अहसास था बदन में… उस ने शावर लिया तो सब ठीक हो गया… बस गांड ज़रा अब भी दर्द कर रही थी…

गोविन्द अपनी सोच को वापिस लाया और नाहा धो कर नया ड्रेस पहन लिया… वो भी एक डैम फिट था… नए शूज निकले… वो भी ठीक थे… अपने आप को मिरर में देखा तो एक हैंडसम नौजवान का रूप देख कर खुद उससे भी ाचा लगा…

ब्रेकफास्ट सब ने ीखते किया… सीमा सब को bye बोल कर यूनिवर्सिटी की तरफ निकल गयी… कमरे में से 40 लाख निकल कर गोविन्द ने लाला जी को दे दिए…. और उन को पूरा प्लान समझा दिया तफ्सील से…
 
EPISODE – 21

ब्रेकफास्ट सब ने ीखते किया… सीमा सब को bye बोल कर यूनिवर्सिटी की तरफ निकल गयी… गोविन्द ने कमरे में से 40 लाख निकल कर लाला जी को दे दिए…. और उन को पूरा प्लान समझा दिया तफ्सील से…

गोविन्द… “सब से पहले, पापा, आप ने ऑफिस जा कर मैनेजर की डिस्बर्समेंट अथॉरिटी और फाइनेंसियल अप्प्रोविंग अथॉरिटी कैंसिल करनी हे और ये इंस्ट्रक्शंस इशू करनी हैं के आप इजाज़त के बग़ैर कोई भी काम न किया जये…”

गोविन्द… “गोदाम की रिपेयर के लिए काम आज से शुरू होना चिहिए… जितना अनाज वहां हे वो फ़ौरन शिफ्ट करें छोटे गोदाम में… जब बारे गोदाम की रिपेयर और कलर हो जये तो साडी इलेक्ट्रिक वायरिंग और नई बल्ब लगाने हैं… रोशनदान, खिड़कियां, दरवाज़े ठीक होने चाहिए… जहाँ रौशनी की ज़रुरत हे वहां रौशनी परनि चाहिए… विंडोज ग्लासेज भी रेप्लस होनी चाहिए… उस के बाद छोटा गोदाम भी उसी तरह रिपेयर होगा… हमारे पास सिर्फ 10 दिन का वक़्त हे…”

गोविन्द… “आप के गोदाम के बहार जो पुराण लोडिंग ट्रक पार्क किया हुआ हे उससे आज hi गेराज मैकेनिक के पास भेजी और 5 दिन के अंदर चाहिए पूरा रिपेयर हो कर…”

गोविन्द… “शहर से बहार जो आप का प्लाट 3000 स्क्वायर यार्ड्स का हे वहां आज hi एक और बारे गोदाम (1000 स्क्वायर यार्ड्स) की कंस्ट्रक्शन और साथ में 4 कमरे 2 वाशरूम्स और एक गेराज की कंस्ट्रक्शन शुरू होगी… उस गोदाम के दो हिस्से होंगे… एक हिस्सा अनाज के लिए 700 स्क्वायर यार्ड्स पर होगा और दूसरा छोटा हिस्सा 300 स्क्वायर यार्ड्स का होगा जहाँ स्पिकेस स्टोर हों गई… इस बार, इस सीजन में, हम न सिर्फ अनाज खरीदें गए बल्कि साथ में स्पिकेस भी खरीदें गए… 4 कमरे और 2 वशरूम्स और गेराज बने गए 500 स्क्वायर यार्ड्स पर… और 500 स्क्वायर यार्ड्स पर एक एनिमल फार्म हाउस बने गए जो के ग्राउंड प्लस 2 मंज़िला होगा… ग्राउंड पर हम बारे मवेशी, 1सत फ्लोर पर छोटे मवेशी और 2ंद फ्लोर पर पेट बर्ड्स (रेयर स्पीशीज) रखें गए… बकाया 1000 स्क्वायर यार्ड्स अभी खुला छोरा जये गए… उस के लिए बाद में सोचें गए… बर्ड पेट्स के लिए लाइसेंस भी अप्लाई करना होगा…”

गोविन्द… “आप ने अपने आधे कर्मचारिओं को हिदायत देनी हे के वो फ़ौरन शिफ्ट हो जयें शहर से बहार प्लाट पर और वो वहीं काम करें गए… किसी एम्प्लोयी को नौकरी से नहे निकले गए…”

गोविन्द… “मैनेजर के साथ एक भरोसे मंद और नौजवान कर्मचारी आज hi लगाया जये गए जो के मैनेजर के न होने की सूरत में साडी ज़िम्मेदारी ऐडा कर सके…”

गोविन्द… “पापा हमारे पास सिर्फ 10 दिन का वक़्त हे… आप ने आज से रोज़ाना ऑफिस जाना हे और किसी दिन भी छुट्टी नहे करनी…”

(इस बात का खुलासा बाद में होगा के लाला जी 5 – 6 साल से बीऑपर में दिलचस्पी क्यों नहे ले रहे थे…)

गोविन्द… “पापा और एक आखरी बात… आप की जो ज़मीन 100 एकर… शहर के नार्थ साइड पे हे… वो भी हमें आगे चल कर सोचना होगा के कैसे कल्टीवेट करे… बस वहां पानी का मसाला हे…”

लाला जी… “बीटा… तुम ने ठीक कहा... एक तो वह पानी कम है और खेती पानी के बग़ैर हो नहे सकती… दूसरे, बीटा, में ने वह कुछ खाना बदोश लोगो को इजाज़त दे राखी हे… वो वह अपनी झोपड़ियों में रहते हैं… बोहत ग़रीब लोग हैं… फ़िलहाल उन को नहे उठा सकते वहां से…”

लाला जी… “कुछ दिन पहले ज़मीन के लिए एक पार्टी ने अछि ऑफर भी दी थी और वो अभी तक कहते हैं और कल तो उन्हों ने ऑफर भी बढ़ा दी हे मगर में ने उन को साफ बता दिया हे जब तक ये खाना बदोश लोग यहाँ बैठे में ज़मीन नहे बेचू गए…”

गोविन्द… “ठीक हे पापा… उस ज़मीन को बाद में देखें गए…”

लाला जी… “बीटा यद् रखना तुम्हें आज जाना हे प्रिंसिपल के पास कॉलेज… कार आ जये गई तुम्हारे पास मुझे चोर कर…”

एक कार सीमा के लिए थी और एक लाला जी के लिए…

गोविन्द… “पापा… आप चिंता न करें … में मैनेज कर लूँ गए… बस आप यद् रखिये गए हमारे पास सिर्फ 10 दिन हैं…”

लाला जी कुछ देर के बाद निकल गए अपने ऑफिस… आज उन के कंधे झुके हुए नहे थे… आज वो अपने आप को बोहत स्ट्रांग महसूस कर रहे थे… आज उन का बीटा उन के साथ था…

गोविन्द ने फिर से मैनेजर को चेक किया… वो उठ चुक्का था… उस का सर भरी था… नहाने के बाद वो ठीक हो गया और ऑफिस के लिए निकल पारा… कोई चीज़ नोट नहे की उस ने…

गोविन्द सिर्फ ये चाहता था के मैनेजर को पता चले 2 या 3 दिन बाद ताकि कहीं फिंगर प्रिंट्स हों भी तो ख़तम हो जयें…

गोविन्द ने अब आशा की तरफ रुख किया… उस ने अपने इंस्पेक्टर्स को इंस्ट्रक्शंस दे दीं थीं और इस वक़्त वो कुछ और काम कर रही थी…

गोविन्द ने अपना ज़ेहन लगाया विक्रम की तरफ… वो अभी थोड़ी देर में पोहचने वाला था शहर… गोविन्द ने विक्रम का मन टटोला किसी कार के बारे में जो पावरफुल इंजन वाली हो और भागने में बेमिसाल हो… विक्रम से पता चला के एक कार हे 10 लाख की…

गोविन्द ने 10 लाख अलमारी से निकले और अलमारी फिर से लॉक करदी…

और बंगला से बहार निकला और ऑटो पर बेथ कर विक्रम के शोरूम पोहंच गया… विक्रम भी आ गया थोड़ी देर में…

विक्रम, गोविन्द से मिल कर बोहत खुश हुआ…

गोविन्द ने विक्रम को लाला के बारे में बताया और ये भी कहा के लाला जी ने उस को अपना बीटा बना लिया हे और पैसे दिए हैं कार खरीद ने के लिए…

विक्रम ने उस को 3 गाड़ियां दिखाईं… गोविन्द ने वही पसंद की जो के विक्रम अपनी सोच में बता चुक्का था…

गोविन्द… “यार केसा इत्तेफ़ाक़ हे… लाला जी ने मुझे 10 लाख hi दिए थे… और कार भी इतने की हे…”

गोविन्द ने पेमेंट कर दी तो विक्रम ने डाक्यूमेंट्स तैयार कर व दिए…

गोविन्द… “आज में वापिस जॉन गए गाँव… अभी जा रहा हु कॉलेज एडमिशन के लिए… शाम को तुझे पिक करूँ गए फिर दोनों यार चलें गए कार पर गाँव…”

विक्रम भी खुश हुआ सुन कर… “तेरा इंतज़ार करूँ गए…”

गोविन्द… लाला जी के दिमाग़ में पोहंचा तो खुश हुआ के लाला ने गोविन्द के कहने के मुताबिक़ सरे इंतज़ाम शुरू कर दिए थे… मैनेजर बोहत परेशां था… और कुछ दुसरे एम्प्लाइज भी जो हरामखोर थे…

गोविन्द अब निकल पारा… कॉलेज के लिए… कार अछि थी… पावरफुल इंजन और फुल्ली लोडेड…

प्रिंसिपल ने किसी विप की तरह गोविन्द को वेलकम किया… आधे घंटे में उस का एडमिशन हो गया… गोविन्द ने रिक्वेस्ट की के 4 महीनो के नोट्स उस को मिल जयें तो वो अपनी स्टडी स्टार्ट कर दे गए और नेक्स्ट मंडे से रेगुलर क्लासेज अटेंड करे गए…

प्रिंसिपल ने सारा अरेंजमेंट कर दिया… बुक्स और नोट्स गोविन्द को मिल गए… और प्रिंसिपल के कमरे से निकल कर कॉलेज की लाइब्रेरी की तरफ चल देता हे… लाइब्रेरी कार्ड के लिए फॉर्म फइलल करता हे और एक किताब पढ़ने के बहाने बेथ कर दिमाग़ की दौर लगा देता हे…

उसी शामे रघु, सेठ राजेंदर सिंह के मैनेजर के साथ इलाक़े का विजिट कर रहा था… उस ने कुछ सामान जिस में गन्स भी शामिल थीं वो अर्रंगे करने के लिए मैनेजर को बोलै… और कहा के 5 बन्दे चाहिए शाम को ठिकाने पर… वहां उन को प्लान बताया जये गए…

इधर गोविन्द धयान लगता हे रिया पर… रिया अपनी फ्रेंड शबाना के साथ पढ़ रही हे… आज शबाना रिया के घर आयी हुई हे… गोविन्द… रिया के दिमाग़ में अपना ख़याल रखता हे…

रिया… “पता नहे कहाँ होगा वो कमीना… मेरे जिस्म में आग भारहका कर कहाँ गेयब हो गया… अब पता नहे कल यूनिवर्सिटी ए गए या नहे… अगर न आया तो में तो मर जॉन गई… साडी रत नींद भी नै आयी बस उसी ज़ुल्मी का ख्याल तंग करता रहा…”

रिया… “में ने तो किसी से उस का ज़िकर तक नहे किया… शबाना को भी नहे बताया… क्यों के अगर वो कल मिलने न आया तो शबाना भी मेरा मज़ाक़ बनाये गई…”

गोविन्द… “हम्म्म… अब कल का कुछ सोचना तो परे गए…”

फिर गोविन्द ने मल्टी भाभी का और रुक्मणि का दिमाग़ चेक किया... दोनों उस को मिस कर रही थीं…
 
दोस्तों... आप से कमैंट्स की रिक्वेस्ट हे... जो दोस्त कमैंट्स पोस्ट कर रहे हैं में उन का बोहत आभारी हूँ.... बूत रिस्पांस मेरी एक्सपेक्टेशंस से कम हे...

माज़रत के साथ दोस्तों मुझे ऐसा लग रहा हे के दोस्तों को कहानी पसंद नहे आ रही...

तो क्या मुझे स्टोरी मज़ीद आगे नहे लिखनी छाइये...???

आप के व्यूज का इंतज़ार रहे गए....
 
EPISODE – 22

कॉलेज में एडमिशन होने के बाद और नोट्स और बुक्स ले कर, गोविन्द प्रिंसिपल के ऑफिस से निकल कर लाइब्रेरी आ गया… वहां लाइब्रेरी का फॉर्म भरा और कार्ड के लिए सबमिट कर दिया… फिर एक स्टडी टेबल के पास चेयर पे बेथ कर एक किताब पढ़ने के बहाने अपने दिमाग़ को दौरा देता हे … सब के ख्याल पढ़ने के लिए… रिया उस को मिस कर रही थी और सोच रही थी के काश गोविन्द उस से मिलने ए कल यूनिवर्सिटी… उस ने भी सोचा के जये गए रिया से मिलने… मल्टी भाभी और रुक्मणि भी उस को याद कर रही थीं…

काफी देर हो चुकी थी लाला जी को ऑफिस गए हुए… तो गोविन्द लाला जी के दिमाग़ में पोहंचा और सोच पढ़ने लगा… वो बोहत निराश लग रहे थे…

लाला जी की सोच… “सुबह 10 कर्मचारी जॉब चोर गए और अभी ये दोनों 2 सुपरवाइजर भी चोर गए हैं… अब क्या होगा… पुराने गोदाम की तो रिपेयर हो जये गई… मगर शहर से बहार प्लाट पर जो नई गोदाम बन ने हैं वो सारा प्लान तो फ़ैल हो जये गए…”

गोविन्द उठ कर फ़ौरन लाइब्रेरियन के पास गया और उस से एक कॉल करने की परमिशन मांगी… लाइब्रेरियन को बता दिया गया था के गोविन्द लाला जी का बीटा हे… लाइब्रेरियन ने इजाज़त देते हुए कहा के शोर मत करना… उस ने थैंक यू करते हुए कॉल लगा दी लाला जी के ऑफिस…

कॉल लाला जी ने hi अटेंड की थी…

गोविन्द… “पापा… आप कैसे हैं…??”

लाला जी उस की आवाज़ सुन कर बोहत खुश हुए… “ठीक हूँ बीटा… कॉलेज का काम हो गया….???”

गोविन्द… “जी पापा… हो गया… में अभी लाइब्रेरी से बात कर रहा हूँ… एक ज़रूरी बात आप को बताना भूल गया था…”

लाला जी… “हाँ बीटा … कहो में सुन रहा हूँ…”

गोविन्द… “पापा… आप के फैसले हो सकता हे कुछ कर्मचारिओं को पसंद न ाएँ तो परेशां होने की ज़रुरत नहे… उन को फ़ौरन उन की पेमेंट रिलीज़ कर के… गुड bye कर दीजिये गए… हमारे पास plan–B है… आप परेशां न होई गए…”

लाला जी… “वह बीटा… तुम ने एक और प्रॉब्लम सोल्वे कर दी… जीते रहो बीटा…”

फिर गोविन्द ने बताय के आज वो गाँव जये गए… लाला ने उस को ख्याल रखने का कहते हुए जल्द वापिस आने को कहा…. गोविन्द वापिस आ कर फिर उसी चेयर पर बेथ गया…

गोविन्द पोहंच गया मैनेजर के दिमाग़ में तो उससे पता चला के उस ने उकसाया हे 15 कर्मचारिओं को और दो (2) सुपरविसोर्स को नौकरी चोर्ने के लिए ताकि लाला जी का प्लान फ़ैल किया जये… ये भी पता चला के मैनेजर के साथ फ्रॉड में 2 सुपरवाइजर भी हैं और उन्हों ने भी काफी मॉल बनाया हे… गोविन्द ने सोचा इन को बाद में देखें गए… और गोविन्द ने सलूशन भी सोच लिया इस प्रॉब्लम का…

गोविन्द का धयान अपनी डीडीओ वर्षा दीदी और अक्षरा दीदी की तरफ गया… वो भी तो इसी शहर में हैं उन से कैसे मिला जये…

2 साल गुज़र चुके थे… उस ने अपनी डीडीओ को नहे देखा था न उनसे मिला था… कोई भी घर का सदस्य नहे मिला था उन से… न उनकी कोई खबर थी न कोई पता…

उन के बारे में सोच कर उस की आँखों में आंसू आ गए…

उसने एपनिया प पर कण्ट्रोल किया और खुद को समझाया के ये लाइब्रेरी हे… आंसू साफ किये…

मन शांत न हुआ… धयान लगाया… वर्षा दीदी पर… और जो हुआ उस पे उस को यक़ीन न हुआ…

वो वर्षा दीदी के दिमाग़ में था… वापिस आया चेक करने के कहीं उस का वहीं तो नहे… यक़ीन करने के बाद फिर से धयान लगा दिया वर्षा दीदी पर और उन के दिमाग़ में पोहंच गया… वो अपने घर में किचन में थी और कह रही थी…

वर्षा… “बिमला जल्दी से 4 चपाती दाल दे… और तो कोई घर पे हे नहे… बस में अक्षरा और माँ जी हैं और तुम हो तो दोपहर का खाना खा लें…”

गोविन्द ख़ुशी से झूमने लगा…

अक्षरा दीदी का धयान लगा दिया… यहाँ उस से अनजाने में ग़लती हो गई…

वो शायद किसी और लड़की के पास पोहंच गया…

वो लड़की… नंगी बाथरूम में एक स्टूल पे बैठी अपनी छूट के बल साफ कर रही थी… उस ने वापिस आना चाहा तो आ न सका… क्यों के उस का धयान उस लड़की के चुचो की तरफ गया…

उफ़ किसी के इतने खूबसूरत चुके भी हो सकते हैं…

संगे मर मर से तराशे हुए… मख़रूति शकल में जेसे एक बारे सा आम हो पर गोआल नहे… तन्ने हुए और बहार को निकले हुए… लॉ ऑफ़ ग्राविताशन को डेफी करते हुए… ऊपर को उठे हुए… निप्पल गुलाबी रंग के दो मोती लग रहे थे… दमक रहे थे दो छोटे दहकते अंगारों की तरह… कोहे नूर के हीरे… अपनी मिसाल आप… पक्के हुए आम की तरह… रास से भरे… ज़रा दबाया तो रास निकल परे गए… और प्रयासों की पायस भुजा दे गए…

शावर ज़रा सा खुला हुआ था और वहां से पानी की बूँदें टपक रहीं थीं… और एक आध बूँद चुके पर पढ़ जाती थी… पानी की बूँदें भी न ठहर प् रही थीं… फिसल रही थीं… जेसे कोई रेशमी सी चीज़ हो और उस को गवारा न हो के कोई उन पे ठहरे…

लड़की के हाथ धो रहे थे… छूट को… क्रीम लगन ेके बाद बल साफ हो चुके थे… ये क्या… छूट की लकीर के बिलकुल ऊपर बालों की एक लकीर चोर दी थी लड़की ने जेसे कोई स्टाइल या डिज़ाइन बनाया हो लड़की ने… बोहत आकर्षित और रोमांचिक… छूट भी बिलकुल गुलाबी जेसे अनार की 2 दो फांकें… ये कोण लड़की हे…

लड़की की सोच… “12 दिन हो गए हैं और पति परमेश्वर हैं के जेसे छोड़ना hi भूल गए हैं… आज तो खुद कुछ कोशिश करना परे गई…”

गोविन्द… “ोये ये तो मैरिड हे… मगर कुंवारी से ज़यादा आकर्षित हे… अति सुन्दर… ये हे कौन…??”

उसी वक़्त बाथरूम का दरवाज़ा बाहर से नॉक हुआ… “अक्षरा… जल्दी कर… चपाती भी तैयार हैं… बहार निकल तो खाना खा लें…”

Govind…library में एक झटके से वापिस आते हुए… “ोये बहनचोद.. ये तो अक्षरा दीदी थी… में साला बहनचोद…”

गोविन्द अपने आप को गलियां देने लगा… और फिर अपने आप को देखा तो हैरान रह गया… लाइब्रेरी में A/C चल रहा था मगर गोविन्द पूरा पसीने में तरबतर था…

और साला लुंड तना खरा था…

गोविन्द… “अब साला मुझे क्या पता के जिस के दिमाग़ में जा रहा हूँ वो किस हालत में हो गए…”

मज़े की बात ये थी के वो उस ख़ुशी की तरफ धयान नहे दे रहा था जो होनी चाहिए थी अक्षरा दीदी के साथ कनेक्ट करने पर… बल्कि वो गिलटी फील कर रहा था…

मगर उस का लुंड बिलकुल भी गिलटी फील नहे कर रहा था… उस ने तो आज एक नयी छूट देख ली थी…

बरी मुश्किल से गोविन्द ने अपने जज़्बात को ठंडा किया और अपने आप को गलियां दे दे कर ये समझाया के ये ग़लत था… कम से कम जेसे hi उसे पता चला था के दीदी बाथरूम में हे तो उसे उन के दिमाग़ से बहार आ जाना चाहिए था… और जब धयान दीदी का लगाया था तो जाना भी उन के hi दिमाग़ में था न… ये तो अब तक हुआ नहे के धयान किसी का लगाया हो और चला जॉन किसी और के दिमाग़ में… उस ने ये ग़लत सोचा के वो किसी और के दिमाग़ में हे… बस नंगी लड़की देखि नहे के कुत्ते की तरह राल तप का दी… उस ने अपने आप को लानत दी…

जब अपने आप को काफी लानत मलामत कर ली और कुछ ठंडा हुआ तो अब खुश होने लगा के उस की दीदियां ठीक हैं…

इस दौआर्ण, गोविन्द, लाइब्रेरी में दिमाग़ी तौर पर एक्टिव हो कर जो बुक उस के हाथ में थी उस के पैन पलट रहा था… ताकि ये लगे के वो बुक पढ़ रहा हे…

फिर गोविन्द ने सोचा… के जो उस ने अक्षरा दीदी कप नंगा देख लिया… उस में कुछ ग़लत नहे… एक तो ये के उस को पता नहे था और दुसरे ये के जिस तरह सब इंसानो की बॉडी की नीड्स हैं उसी तरह अक्षरा दीदी की भी तो नीड्स हैं…

गोविन्द ने फिर धयान लगा दिया वर्षा दीदी पर… वो लोग खाना खा चुके थे…
 
EPISODE – 23

गोविन्द ने फिर धयान लगा दिया वर्षा दीदी पर… वो लोग खाना खा चुके थे…

अब सिर्फ लाउन्ज में वर्षा और अक्षरा दीदी थे…

गोविन्द ने सोचा के … दीदी के मंद में ख़याल लॉन माँ, बापू, और सब का मगर सोचा के ऐसा करने से वो दोनों दुखी हो जयें गई… जब वक़्त ए गए मिलने का तो सब मिलें गए… अभी से क्यों इन बेचारियों को परेशां करना…

गोविन्द को ाचा लग रहा था दीदी के पास जा कर… ऐसा लग रहा था के वो फिर से बचा बन गया हे और पहले जेसे घंटो दीदी की आग़ोश में पारा रहता था… वैसी hi शांति मिल रही थी मन को…

वर्षा दीदी और अक्षरा दीदी आपस में बातें कर रही थीं… अक्षरा दीदी के हाथ में एक कटोरी हे जिस में हरे मसाले की चटनी (धनिया, पोदीना, प्याज़, गार्लिक, और सब चीज़ों की चटनी…) हे और वो उस में से ऊँगली से चाट रही हे थोड़ा थोड़ा…

वर्षा… “अक्षरा… तेरी ये चटनी की कटोरी चाटने की ाददत कब छूटे गई… अभी तक बची हे तू…”

अक्षरा… शोख लहजे में… “कभी नहे…”

अक्षरा… “दीदी… तुम बिलकुल माँ की तरह चटनी बनती हो…”

वर्षा… “तुम ने फिर चटनी के बहाने माँ को यद् करना स्टार्ट कर दिया… कभी कभी तो मुझे लगता हे के तू चटनी कहती hi इसी लिए हे के माँ को यद् कर सके…”

अक्षरा… “दीदी… तो माँ को यद् भी नहे कर सकती क्या… दो साल हो गए न कभी बापू माँ मिलने आये न hi हमें बुलाया मिलने को…”

वस्रहा… “तुझे सब यद् तो हे कैसे और किन हालत में हमारी शादियां हुई थी… तो कैसे मिल सकते हैं बस अब यही हमारा मुक़दर हे… बस औरत का यही नसीब होता हे…”

अक्षरा… “दीदी… तुम्हें मुन्ना भी यद् नहे आता…”

(दोनों दीदियां प्यार से गोविन्द को मुन्ना बुलाती थी)

वर्षा… “वो तो हर वक़्त यद् आता हे… कितना बारे हो गया होगा… बारे दिल करता हे उस को देखने का…”

अब दोनों की आँखें नुम हो गई थी…

गोविन्द बोहत दुखी हो गया मगर नहे चाहता था के उस की दीदियां यूँ रो परे… फ़ौरन दोनों के दिमाग़ में बरी बरी जा कर उन के पति का ख्याल ले आया ताकि दोनों का मूड ठीक हो जये…

अक्षरा… “ये कैसी शादी हे जिस में पति सुख भी नहे देता… 12 दिन हो गए हैं रत को नशे में धुत आता हे और बेहोश हो जाता हे बिस्तर पर…”

वर्षा हंसने लगी…. “खुशनसीब हे पगली जो 12 दिन पहले कोई सुख तो देखा होगा… तुम्हारे जेठ तो महीने से ऊपर हो गया हे ऐसे शराब के नशे में धुत दकरते हुए कमरे में आते हैं जेसे कोई भैंसा हो… और आते hi बीएड पर गिर जाते हैं आधे नीचे आधे ऊपर… बरी मुश्किल से उन को खेंच कर बीएड पर लिटा टी हूँ…”

अक्षरा… “दीदी इस घर में सब कुछ हे… किसी चीज़ की कमी नहे… मगर शारीरक सुख नहे… क्या हम ऐसे hi बूढ़ी हो जयें गई…”

वर्षा… “हम्म्म्म… बस यही मुक़दर हे हमारा… सबर कर…”

अक्षरा… “दीदी… बिपिन (अक्षरा का पति) का जो मस्सी का बीटा हे… मनिंदर, वो बरी अजीब सी नज़रों से देखता हे… कभी कभी डबल मीनिंग बात भी कह देता हे… जब दो महीने पहले आया था तो आते जाते मेरे पीछे हाथ लगा रहा था…”

वर्षा… ग़ुस्से में “तेरी बूढी बरषत हो गई हे क्या… जो ऐसा कह रही हे… तू ने डांटा नहे उस को…”

अक्षरा… “काया करूँ दीदी… एक मर्द अगर नसीब से कोई बात कर रहा हे और हाथ लगा रहा हे तो उस को भी मन कर दूँ… देखने में भी ाचा खासा हे… में तो सोचती हूँ के इस बार ए तो कुछ में भी क़दम आगे बारहों…”

वर्षा… “ख़बरदार जो तू ने ऐसा सोचा भी तो मुझ से बुरा कोई नहे होगा… में बात नहे करूँ गई तेरे साथ… चल अब उठ और देख बिमला क्या कर रही हे…” (बिमला माइड हे…)

गोविन्द का मन बोहत बोझल हो गया… अपनी बहनो को यूँ तरसता देख कर उस का दिल कट सा गया… बरी मुश्किल से उस ने अपने आंसू काबू में किये… वो लाइब्रेरी में बैठा अपना तमाशा नहे लगवा सकता था…

वो फ़ौरन अपनी बहनो के दिमाग़ से निकल आया…

वो अपना मूड अब ठीक करना चाहता था… तो सीमा के दिमाग़ में गया तो पता चला के उस की आखरी दो क्लासेज कैंसिल हो गई हैं और वो अभी थोड़ी देर में घर के लिए निकले गई यूनिवर्सिटी से… यूनिवर्सिटी कॉलेज के पास में hi थी… गोविन्द फ़ौरन बहार निकला और कार निकल कर यूनिवर्सिटी का रुख किया… जब वो यूनिवर्सिटी की पार्किंग में पोहंचा तो देखा के सीमा अपनी कार की तरफ जा रही और वहां ड्राइवर उस का वेट कर रहा था… उस ने फ़ौरन ड्राइवर से कहा के वो घर चला जये… और वो कूद सीमा को घर ले ए गए… ड्राइवर ने उस का कहा मान लिया… जब सीमा वह पोहंची तो कार और ड्राइवर को तलाश करने लगी… गोविन्द को देख कर उस की तरफ आ गयी और कहा…

सीमा… “तुम… यहाँ…?? कॉलेज नहे गए… आज तुम्हारा एडमिशन होना था न….???”

गोविन्द… “एक साथ इतने सरे सवाल… चल घर चल बताता हूँ…”

सीमा… “हाँ चलो… मगर ड्राइवर पता नहे कहाँ हे… और कार भी नज़र नहे आ रही…”

गोविन्द… “में ने उस को कहा के वो चला जये…”

सीमा… “तो घर कैसे जयें गए…”

गोविन्द ने सीमा का हाथ पाकर कर अपनी कार की तरफ ले गया… इस पे…

सीमा… “ये किस की गारी हे…??”

गोविन्द… “अरे यार चोरो इन बातो को… आओ बैठो…”

और उस का हाथ पाकर उस को कार में बिठा दिया अगली सीट पर… और खुद उधर से घूम कर आया और कार स्टार्ट कर दी… सीमा बारे ग़ौर से उस की तरफ देख रही थी…

सीमा… “गोविन्द… में अगर सही समझी हूँ तो यह कार तुम्हरी हे…”

गोविन्द… “ये मेरी नहे हमारी कार हे… किसी लगी…”

सीमा… “बोहत अछि… ट्रीट कब दो गए…”

गोविन्द… “इसी लिए तो आया हु तुम्हारे पास के तुम्हें हमारी कार भी दिकहु और एक राइड भी दूँ और आज सिर्फ हलकी सी ट्रीट अपनी डार्लिंग बहन के लिए…”

सीमा… डार्लिंग शब्द सुन कर खिल उठी… और शोखी से बोली… “डार्लिंग या बहन…??”

गोविन्द भी हंस पारा और समझ गया के सीमा उस की तंग खेंच रही हे… “दोनों…”

सीमा… अंदर hi अंदर सरशार हो गई और फिर से प्न हाथ गोविन्द के हाथ पर रख दिया… ये कार ऑटो गियर थी… तो वहां गियर नहे था… गोविन्द ने खुद सीमा का हाथ थम लिया… फिर उस को साथ लिए एक छोटे से साफé में आ गया जहाँ पर कुछ स्नैक्स और कॉफ़ी आर्डर की…

गोविन्द ने सीमा को बताया के वो आज गाँव जये गए… सीमा उदास हो गयी और बोली… “यार अपना गाँव तो दिखाओ…”

गोविन्द… ने भी शोखी से… “यार या भाई…??”

सीमा भी आँखें नाचती हुई… “दोनों…”

दोनों खिलखिला कर हंस परे…

और इसी तरह हंसी मज़ाक़ करते रहे… दोनों को एक दुसरे का साथ बोहत ाचा लग रहा था…

गोविन्द ने एक बर्गर पैक भी करवाया विक्रम के लिए… वहां से निकले तो सीधा गोविन्द, विक्रम के शोरूम पर गया… कार बहार खरी की और सीमा को कार में बैठे रहने का कहा…

गोविन्द खुद अंदर जा कर विक्रम से मिला और उस को बर्गर दिया और कहा के आज जल्दी छुट्टी ले ले तो शाम को जल्दी निकलते हैं… उस वक़्त 3 बज रहे थे…
 
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