Kya Govind yunhi tarasta rahe ga - Page 2 - SexBaba
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Kya Govind yunhi tarasta rahe ga

EPISODE – 6

गोविन्द वहां से निकला तो उस को याद आया के उससे लाला जी ने जो इनाम दिया हे वो चेक नही किया… देख कर रुपया गिनने तो पुरे 10,000 थे… वो बोहत खुश हुआ ये उस के पूरे महीने की पाय से ज़यादा अमाउंट था…

गोविन्द ने गाँव के स्वीट्स शॉप से 2 किलो स्वीट पैक करवाई सब की पसंद के हिसाब से और फिर चला गया भोला राम की शॉप पर ेषणा के लिए चॉकलेट लेने…

भोला राम ने जनरल स्टोर, अपने घर के एक हिस्से में हे बनाया हुआ था… और एक दरवाज़ा घर से भी खुलता था और जब भोला राम शहर गया हुआ होता था तो उन की बीवी, करिश्मा भाभी स्टोर चलाया करती थीं… इन की औलाद नही थे इसलिए गाँव के हर बचे को प्यार करते थे… गाँव के लोग भी इन दोनों को इन की खुश मिज़ाजी की वजह से बोहत पसंद करते थे…

भोला राम के लिए एक और बात भी मशहूर थे के उन के घर महीने में एक बार शहर से एक मेहमान ज़रूर आ कर रुकता हे 2 य 3 दिन के लिए और हर बार मेहमान नया होता हे… भोला राम की आगे 35 साल और करिश्मा भाभी की आगे 25 साल थी…

गोविन्द को भोला राम ने स्माइल के साथ वेलकम किया और पूरा चॉकलेट का डिब्बा लेने पर पुछा तो सारा क़िस्सा गोविन्द ने सुन्ना दिया… भोला राम बोहत खुश हुआ के अपने गाँव का नौजवान इतना बहादुर और दिलेर हे… फिर उस ने आवाज़ दी करिश्मा भाभी को जो के चाय और पकोड़े बना रही थीं… वो भी स्टोर में आ गयी और क़िस्सा सुन कर बोहत खुश हुई और ज़बरदस्ती गोविन्द को अंदर बुला लिया और चाय और पकोड़ों के साथ खातिर की… भोला राम ने करिश्मा भाभी को कहा के गोविन्द अब बारे हो गया हे किसी रोज़ इससे घर बुलाओ खाने के लिए… जब गोविन्द निकलने लगा उन के घर से तो भोला राम और करिश्मा भाभी दोनों ने गल्ले लगा कर अलविदा किया… जब करिश्मा भाभी मिलीं तो अपने सीना गोविन्द के सीने पर ज़ोर से रगर दिया और अलग होते वक़्त भाभी ने अपना हाथ नीचे करते हुए गोविन्द के लुंड को सेहला सा दिया… गोविन्द को ये सब अब ाचा लगने लगा था… भाभी ने सब अपने शोहर के सामने किया… ये बात गोविन्द की समझ में न आयी… उस ने सोचा के भोला राम या भाभी की सोच पढ़े मगर फिर उस ने सोचा पहले hi बोहत देर हो गयी है… मिठाई का मज़ा तो गरम खाने में हे तो गोविन्द फ़ौरन घर की तरफ चल दिया…

घर पर माँ और ेषणा hi थे… दोनों बोहत खुश हुए सारा किसे सुन कर… फिर गोविन्द ने सरे इनाम के पैसे और दुसरे बचे हुए रुपया माँ के हाथ पे रख दिए… माँ ने गले से लगा कर लम्बी उम्र की दुआएं दी और ेषणा चॉकलेट्स देख कर उछलने लगी और भाई के गाल पर चूम लिया… ेषणा तो मनो चिपक गयी भाई से और जब कुछ देर भाई को न छोरा तो जाने क्यों गोविन्द उस की सोच पढ़ने लगा…

ेषणा की soch…“apna हाथ भाई के डोलों पर फेरते हुए… भाई के ये कितने सख्त हैं… किरण (ेषणा की सहेली) कह रही थी के जीतनेय मर्द के डोले सख्त होते उतना hi उस मर्द का हथियार भी साख होता हे…”

ये सोचते सोचते ेषणा ने अजीब हरकत की, अपनी एक तंग गोवंड की दोनों टैंगो के बीच करदी एंड काफी देर तक भाई के लुंड को महसूस किया… गोविन्द का लुंड ाकरने लगा था… माँ वहीँ थी, गोविन्द ने फ़ौरन ेषणा को दूर किया…

ेषणा की soch…“uff कितना सख्त हो रहा हे बही का लुंड… छूट में चींटियां रींग रही हैं… कितना मज़ा हे इस एहसास में…”

गोविन्द के लिए ये बात बोहत अनोखी थी के अभी ेषणा ने जवानी की देलीज़ पे क़दम रखा हे और फिर भी इस के अंदर इतनी तड़प हे तो बाक़ी लोगों का तो कोई क़सूर नही…

माँ… “ेषणा, अभी शाम के चाय आज तू बना…”

ेषणा ख़ुशी से किचन के तरफ चली गयी…

माँ, मिटहि चेक करने लगी, जब माँ ने बर्फी देखि तो एक चमक आयी उन की आँखों में जो गोविन्द ने महसूस की और फ़ौरन उन की सोच पढ़ने लगा…

माँ की सोच… “मेरा बीटा बर्फी भी लाया हे… बर्फी तो गोविन्द के बापू को बोहत पसंद हे… जब भी बर्फी कहते हैं उस रात तो ज़रूर छोड़ते हैं… हए आज भी छोड़ें गए??… पूरा हफ्ता हो गया हे….”

यह एक और झटका था गोविन्द के लिए… आज भी उस के माता पिता सेक्स करते हैं और माँ इतनी एक्ससिटेड होती हे सेक्स के लिए… जनता था के इन की इतनी आगे ज़यादा तो नहे हुई लेकिन एक सोच होती है हर एक की के हमारे माँ बाप ये नहे करते… वो नहे करते… ऐसा नहे करते… वैसा नहे करते..

माँ (रजनी)

Rajni.jpg


गोविन्द ने माँ की सोच पढ़ना जारी रखा…

माँ की सोच… “मेरी छूट गीली हो रही हे… जिस्म सिहार रहा हे… चूचूं में मीठा मीठा दर्द हो रहा he…Pehle जब गोविन्द के बापू छोड़ते थे तो 30 मिनट तक उन का पानी नहे निकलता था… छुड़वा छुड़वा कर मेरी कमर दोहरी हो जाती थी… में तीन चार भर झरती तो वो एक बार झरते थे…”

ाचा हुआ के गोविन्द चारपाई पे बैठा हुआ था वर्ण ये सब सुन कर जो उस का लुंड खरा हुआ था उस की माँ को दिख जाता…

माँ… “बीटा में ज़रा आती हूँ कमरे में एक काम हे…”

माँ की सोच… “अब जल्दी से छूट में ऊँगली करके शांत करना परे गए वर्ण दिल बेचैन रहे गए….”

गोविन्द ने धयान लगा लिया ेषणा की तरफ…

ेषणा की सोच… “जेसे मेने पिछले महीने भैया का लुंड रात को मुठी में लिया था… भैया सो रहे थे…. भैया को पता hi न चला… आज फिर दिल कर रहा हे… रात को तरय करूँ गई… प्रकाश भैया का इतना मोटा और बारे नहे जितना मोटा और बारे गोविन्द भैया का हे…”

ेषणा का ये रवैया समझ से बहार tha…magar गोविन्द आहिस्ता आहिस्ता सब समझ रहा था… एक राज़ की दुनिया थी जिस से सारे परदे उठ रहे थे… सेक्स की दुनिया… न रिश्तों को देखती हे और न hi मर्यादा और न hi सोसाइटी के नॉर्म्स को…

गोविन्द सोचने लगा… “के अगर मेरी मुलाक़ात साधु महाराज से न हुई होती और न मुझे ये शक्ति पर्पट हुई होती… तो में इस दुनिया को सिर्फ अपनी समझ और सोच के हिसाब से देखता रहता… एक ऐसी दुनिया के जिस में किसी की भी सेक्सुअल नीड्स की कोई अहमियत नहे हे… किसी और का चोरो, मुझे अपना भी पता नहे था के मुझे भी सेक्स से इतना लुत्फ़ और मज़ा आ सकता हे… और ये लुत्फ़, यह मज़ा, सब नशों से ज़यादा नशीला हे…”

गोविन्द सोचने laga…“mein ने आज रात तीन अलग अलग जगा धयान लगाना हे… बापू और माँ की तरफ, राजन काका और रुक्मणि की तरफ और सिमरन भैया और मल्टी भाभी की तरफ…”

Govind…“ye कैसे मुमकिन होगा…??”

फिर उससे ख़याल आया…

Govind…“Bapu और माँ तो रात का खाना जल्दी खा कर कमरे में चले जाते हैं 9 बजने से पहले पहले… रुक्मणि रात के 10 बजे तक अपने कमरे में जाती हे…. और सिमर भैया तो 8 बजे शराब पीना शुरू करते हैं और 11 या 12 तक पीते रहते हैं… तीनों जोरों का टाइम अलग हे तो ये मुमकिन हे…”

फिर गोविन्द को ेषणा का ख़य्यल आया…

Govind…“ye ेषणा क्या करती हे…?? आज रात देखते हैं…”

शाम होने लगी थी … के प्रकाश भैया और बापू घर आ गए… घर का दरवाज़ा बंद कर दिया गया…

माँ ने गोविन्द की बहादुरी का क़िस्सा कैलाश नाथ और प्रकाश को सुनाया… कैलाश खुश हुआ और बेटे को दुआ दी… प्रकाश उठ कर भाई से गले लग गया…

कैलाश नाथ… “गोविन्द बीटा, तुम ने जो लाला जीवट राम के पास शहर जाने का सोचा हे, इस बारे में तुम्हें रोकूं गए नहीं, लेकिन ख़याल रहे ये शहर के लोगों की मकारी समझ नहे आती… ”

कैलाश को सेठ गिरधारी लाल के द्वारा दिए गए दग़ा और धोका याद आ गया…

Govind…“Bapu, में शहर किसी को नुकसान पुहंचने के इरादे से नहे जा रहा… में तो बस ये चाहता हूँ के आगे पढ़ सकूँ और आप सब लोगों के लिए कुछ करूँ… मेरी नियत ख़राब नहे और न ही में किसी के खिलाफ कोई मंसूबा लेकर शहर जा रहा हूँ… अगर मेरी नियत ठीक हे तो मुझे डरने की ज़रुरत नहे..”

कैलाश नाथ को अंदाज़ा हो गया था के जवान खून हे इस को रोकना ठीक नहे… ये अपने हिस्से के तजरुबे और फैसले करे गए और अपनी ग़लतियों से सीखे गए… अगर भगवन ने चाहा तो सफल होगा…

Kailash…“Beta, मेरा और तुम्हारी माँ का आशीर्वाद सदा तुम्हारे साथ होगा…”

कैलाश ने अपनी पत्नी से कहा… “भगवान 5,000 गोविन्द को देदो ताकि जब ये शहर जये तो कुछ कपड़े और जूते अपने लिए ले ले…”

फिर सब ने मिल कर खाना खाया… और खाने के बाद भी कुछ देर तक बैठे बातें करते रहे… आज सब खुश थे…

रजनी ने अपने पति, कैलाश, की तरफ देखते हुए कहा के गोविन्द अप्प सब लोगों के लिए मिठाई भी लाया हे… और मिठाई निकाल कर सब को देदी…

कैलाश ने जब मिठाई मांगी तो रजनी ने मुस्कुराते हुए कहा…

Maa…“aji आप तो बर्फी कहते हैं न तो में ने आप के लिए बर्फी प्लाट में दूध के गिलास के साथ कमरे में रख दी हे… चलिए वहीँ चल कर खा लीजिए… बच्चों को आपस में बात करने दीजिये…”

कैलाश भी मुस्कुराते hue…“theek हे बचो… सुबह मुलाक़ात होगी…” और उठ कर दोनों पति पत्नी कमरे की तरफ चल दिए…
 
EPISODE – 7

Govind…“chalo ेषणा तुम भी जा कर अब सोने की तैयारी करो…. तुम ने सुबह स्कूल जाना हे और हम ने काम पे…”

Eshana……“nhe... भैया अभी नहे… कुछ देर बेथ कर बातें करतें हैं ना…”

और यह कहते हुए ेषणा फ़ौरन उठ कर गोविन्द की चारपाई पर आ गयी… और उस से सात कर बेथ गयी… कोई और मौक़ा होता तो गोविन्द कभी भी ेषणा को अपने पास से उठने ना देता… वो बोहत पायरी थी उसे… जान थी उस की… मगर इस वक़्त ज़रूरी था बापू और माँ की चुदाई महसूस करना और अगर ज़रूरी हो तो बापू की सहयता करना…

ेषणा बुरा सा मुंह बनाते हुए और चारपाई से उठ कर कमरे की तरफ जाते hue…“Bhaiya बोहत बुरे हो…”

प्रकाश ये सब देख कर मुस्कुरा दिया….

गोविन्द ने प्रकाश की तरफ धयान लगा दिया…

प्रकाश की soch…“kitni प्यारी गुड़िया हे हमारी बहन… सदा खुश रहे … कभी इससे कोई दुःख न हो…”

प्रकाश की soch…“behna अब बरी हो रही और हम जवान भाइयों के साथ इससे ाचा लगता हे… ये नेचुरल हे के इक जवान जिस्म दुसरे जवान जिस्म को महसूस करना चाहता हे और कितना ाचा लगा था जब कुछ दिन पहले रात के वक़्त ेषणा ने मेरे लुंड को सहलाया था… ेषणा समझ रही थी के में सो रहा हूँ… मगर में जग रहा था और बोहत ाचा लगा… ेषणा अभी डर्टी हे मज़ीद आगे बढ़ने से… बस लुंड को महसूस कर के अपने जज़्बात को ठंडा करती हे… ाचा हे घर की बात घर में रहे…”

गोविन्द की सोच… “प्रकाश भैया कितने प्रैक्टिकल इंसान हैं… में इन को लापरवाह और इर्रेस्पोंसिबले समझता था…”

गोविन्द ने इन सब ख्यालों को ज़ेहन से निकला और सेहन में रखे लैंप को बंद कर दिया… हर तरफ अँधेरा हो गया… प्रकाश भी अपनी चारपाई पे लाइट गया… गोविन्द ने भी अपनी चारपाई पे लेटते हुए अपने बापू पर धयान लगा दिया…

बापू ार माँ बीएड पर लेटते किश कर रहे थे… बापू का एक हाथ माँ के एक चूचे को डब्बा रहा था और दूसरा हाथ उन की गांड को सेहला रहा था… माँ भी अपने हाथों से बापू का सर और पीठ सेहला रही थी…

गोविन्द को ऐसा लगा जेसे वो भी इस खेल में शामिल हो … ये एहसास बोहत hi अद्भुत था… गोविन्द को माँ का बदन फील हो रहा था… और ऐसा लग रहा था जेसे वो फिर से छोटा बचा बन गया हे और माँ की आग़ोश में हे… गोविन्द का लुंड तन गया था और वो अपने हाथ से अपना लुंड सहलाने लगा… और साथ साथ बापू के ज़ेहन में ये ख़य्यल भी डाला के माँ की चूचियां चूसे…

कैल्श नाथ जेसे के इक घुलम था… ये ख़य्यल आते hi उस ने रजनी के मम्मी नंगे करदिये… गोविन्द को इक मखमली सा एहसास हुआ माँ की मुम्मे फील कर के… जब बापू ने माँ के इक चूचे पर मुंह रखा तो गोविन्द फिर बचपन वाले ममता बहरे एहसास को फील करने लगा… और बचे की तरह निप्पल चूसने लगा…

रजनी को ऐसा लगा जेसे उस के पति ने नहे बल्कि उस के बचे ने उस का निप्पल अपने मुंह में ले लिए हे और आँखें बंद कर के ा.. आह.. आह …. आहें भरने लगी… ये एहसास बोहत खूबसूरत था रजनी के लिए… उस की छूट पानी चोर्ने लगी…

रजनी… “गोविन्द के पिता, आज तो आप मुझे जवानी से भी ज़यादा लुत्फ़ और मज़ा दे रहे हो… मेरी छूट से पानी की नदियन बह रही हे… अभी तो आप ने अपना लौड़ा मेरी छूट में पेला hi नहे… आज में फिर से दुल्हन बन गयी हूँ…”

कैलाश भी अपनी पत्नी के मुंह से ये बातें सुन कर जेसे पागल सा हो गया और पूरी शिद्दत से उस के चूचे चूसने लगा… और एक हाथ उस की लहंगे की तरफ बढ़ा कर… लेहंगा नीचे सरका दिया… नीचे से रजनी नंगी थी… कैलाश ने इक ऊँगली और फिर फ़ौरन दूसरी ऊँगली भी रजनी की छूट में दाल दी… रजनी के दाने को अनघोटे से चरने लगा…

रजनी की सिसकियाँ और आहें बे काबू हो रहीं थी… रजनी भी अपनी गांड उठा उठा कर अपने पति की उँगलियों को छोड़ने लगी…

दोनों एक दुसरे के होंटो को चूस ने लगे…. होंठ चूस रहे थे… काट रहे थे… एक दीवानगी थी… जज़्बात का शोर था… एक तूफ़ान आया हुआ था… आज सब कुछ नया था… हर तरफ एक नशा था… जिस्मों की पयास थी… या सदियों की प्यास जो बुझ hi नहे रही थी… ये केसा तूफ़ान था जो थम नहे रहा था…

रजनी और बर्दाश्त न कर सकीय और इक चीख के साथ झरने लगी…

उस ने अपनी कमर पूरी दोहरी करदी थी और गांड ऊपर नीचे कर रही थी… कैलाश को भी यक़ीन नहे हो रहा था … वो आज अपनी पत्नी को इक नए रूप में देख रहा था… अब उस से भी और बर्दाश्त न हुआ और उस ने अपनी लुंगी हटा दी और अपना तना हुआ लुंड रजनी के हाथ में दे दिया… कैलाश का लुंड 5 इंच था और खासा मोटा था मगर वक़्त के साथ कुछ ढीला पर रहा था… पर आज लुंड तन के खरा था पूरी सख्ती के साथ… रजनी भी हैरान थी के ये सख्ती तो कभी जवानी में भी नहे थी… ऐसा लग रहा था जेसे कोई लोहे की चीज़ उस के हाथ में आ गई हे… उस ने भी भरपूर मज़े से लुंड को आगे पीछे करना शुरू कर दिया…

रजनी ने अब सबर नहे हो रहा था… उस ने अपनी टाँगें खोल दीं और अपने पति को अपने ऊपर खेंचने लगी…

कैलाश भी देर न करते हुए फ़ौरन उस की टैंगो की दरम्यान बेथ गया और थोड़ा थूक अपने लौड़े पर लगे और छूट के सूराख पे सेट किया… छूट पूरी गीली थी…

कैलाश ने जेसे अपना लौड़ा अंदर करना शुरू किया, गोविन्द ने छूट का रेशमी लम्स महसूस किया और उस का लुंड उस के हाथ में झटके खाने लगे… गोविन्द की सोच में मज़ीद शिद्दत आ गई और इस के साथ कैलाश को ऐसा लगा जेसे उस का जिस्म फिर से जवान हो गया हे और उस ने एक hi झटके में पूरा लौड़ा रजनी की छूट में दाल दिया… रजनी, मनो जन्नत की सैर करने लगी…

Rajni…“uff… उफ़… हए हए… आज में किस के साथ हूँ … आज मुझे कोण छोड़ रहा हे… हए आज में मज़े से और ख़ुशी से मर न जॉन…”

Rajni…“Hye.. गोविन्द के बापू… छोड़ो और ज़ोर से छोड़… हए मज़ा आ गया… हए मज़ा.. हए मज़ा…”

तकरीबन इसी तरह कैल्श 10 मिनट तक रजनी की छूट में लौड़ा अंदर बहार करता रहा… और रजनी इक बार फिर …. आहें भरते हुए झरने लगी… इतना पानी निकला के न सिर्फ कैलाश और रजनी की टाँगें गीली हो गयीं बल्कि चादर भी गीली हो गई…

रजनी बेसुध हो गई… और अपने पति से कहने लगी अब बस करो में थक गई हूँ… रजनी बेचारी भी सच्ची थी… कहाँ तो पिछले दस सैलून से 5 से 10 मिनट में hi सारा किस्सा निमत जाता था और कहाँ ये हाल के पूरे 20 मिनट हो चुके थे के उस का पति अभी तक फ़ारिग़ नहे हुआ था…

कैल्श भी हैरान था…

Rajni…“Govind के पिता… आज कोई हकीम जी से दवा लेकर ए हो… ??”

Kailash…“nhe मेरी जान… ऐसा कुछ नहे हे… शायद आज में खुश हूँ इस लिया…”

रजनी मुस्कुराते hue…“to फिर आप हमेशा ऐसे खुश रहा करें…”

कैलाश ने ये बात सुनते hi फिर से रजनी के होंठों को चूसना शुरू कर दिया… कुछ देर के बाद रजनी के सांस भी बहाल हुए तो वो भी अपने शोहर का भरपूर साथ देने लगी…

कैलाश ने कुछ देर रजनी के होंठ चूसने के बाद उस को उल्टा कर दिया और उस की गांड सहलाने लगा… रजनी को बोहत ाचा लग रहा था…

गोविन्द भी सेक्स करना सीख रहा था… उस को ऐसा लग रहा था के जेसे कभी उस को माँ और बाप ने ऊँगली पाकर कर चलना सिखाया था आज उसी तरह लुंड पाकर कर छोड़ना सीखा रहे थे…

उस ने आँखें खोल कर देखा तो प्रकाश अपनी चारपाई पर दूसरी तरफ करवट लेकर सोया हुआ था… गोविन्द ने फिर से अपनी आँखें बंद कर के अपने बापू की तरफ धयान लगा दिया…

कैलाश ने अब इक तकिया रजनी के पेट के नीचे रखा जिस से रजनी की गांड थोड़ी ऊपर को उठ गई… कैल्श उठा और रजनी टैंगो में बेथ गया और हाथ से उस की छूट को सहलाया और आगे झुकते हुए अपने तने हुए लोहे जेसे सख्त लौड़े को छूट में दाल दिया… छूट अब भी गीली थी…

कैलसाह रजनी के ऊपर लेट गया और दोनों के नंगे बदन का स्पर्श इक हिजां पैदा कर रहा था… कैलाश ने इस बार आहिस्ता आशिता अपना लौड़ा रजनी की छूट में अंदर बहार करने लगा… रजनी बिलकुल सर्किट थी… उस ने अपनी टाँगे पूरी खोल ली थी… गांड थोड़ी और ऊपर उठा कर चुदाई का आनंद लेने लगी…

मज़ीद 10 मिनट तक रजनी चुदवाती रही और फिर बर्दाश्त न कर सकीय और इक चीख के साथ फिर से झरने लगी… अब रजनी को ऐसा लग रहा था के जेसे उस की टैंगो में जान न हो… और वो सोचने लगी के आज कहीं उस का पति उससे छोड़ छोड़ कर न मर डेल… उस ने फ़ौरन अपने आप को सीधा किया और बोली…

Rajni…“Govind के पिता… अब बस भी कीजिये… क्या साडी चुदाई आज hi कर लेंगे… में कही भागी थोड़े न जा रही हूँ… बाक़ी फिर सही…”

और साथ hi अपने पति का लौड़ा पाकर कर अपने हाथ से मुठ मरने लगी… लौड़ा तो पहले hi रजनी के रास में भीगा हुआ था… दोनों के बदन खिरकी से आती हुई चाँद की रौशनी में चमक रहे थे… पसीने से शराबोर…

रजनी तेज़ी से हाथ चलने लगी और फिर कुछ ऐसा हुआ जो रजनी के लिए इक और झटका था…. जेसे hi कैलाश झरा और उस के लौड़े ने माननी का फवररा छोरा… रजनी को कैलाश के चेहरे पर गोविन्द का चेहरा दिखा… और ये छवि इतनी वाज़िह थी के किसी संदेह या शक की कोई गुंजाईश नहे थी…
 
दोस्तों अब तक जितने अपडेट थे वो सारे गोविन्द के किरदार को वाज़िह करने के लिए ... ये पहला प्रॉपर सेक्स से भरा अपडेट हे ...

आशा हे के आप को पसंद ए गए...

अपनी वैल्युएबल सुग्गेस्टियन्स या कमैंट्स ज़रूर दीजिये...

में ये सुब कुछ आप के मनोरंजन के लिए hi तो कर रहा हूँ तो फिर अगर आप की तरफ से रिप्लाई पोस्ट न हो तो मुझे केसा लगे गए...

अपना ख़याल रखिये एंड कीप कनेक्टिंग...

सलाम एंड नमस्कार....
 
EPISODE – 8

रजनी और कैलाश दोनों बेसुध हो गए… दोनों के अंदर इतनी ताक़त भी नहीं थी के कपड़े पहन सकें… और ऐसे hi नंगे इक दुसरे के साथ लिपट कर आँखें बंद कर लीन… और सोने लगे…

जिंसों का जवाला तो थम चुक्की थी, बुझ चुक्का थी… मगर रजनी के लिए इक नया तूफ़ान सर उठा चुक्का था… उससे ऐसा लग रहा था जैसा के अभी उस ने सम्भोग अपने पति के साथ नहे बल्कि अपने बेटे… गोविन्द के साथ किया हो…

गोविन्द अपने बापू के दिमाग़ से बहार आ चुक्का था और उस ने भी सारा लुत्फ़ और मज़ा उठाया था… साडी लताफ़तें और नज़ाक़तें भरपूर अंदाज़ में महसूस के… और ऐसा था के जेसे इस जिस्मानी लज़्ज़त में दो (2) नहे बल्कि तीन (3) व्यक्ति शामिल थे… जैसा के इस खेल में तीनो (3) ने पूरा पूरा भाग लिया हो…

मगर फिर भी गोविन्द का लुंड फुल आकर में तना हुआ था… उस की सख्ती में कोई कमी नहे ए…

गोविन्द को ऐसा लगा जेसे के वो समादर में डुबकी लगाने के बावजूद भी पैसा हे…

गोविन्द कब तक यूँही तरसता रहे गए….

गोविन्द को अब शक्ति के हवाले से इक और अन्वेषण, इदराक, हुआ के वो लुत्फ़ तो ले रहा हे इस खेल में पर वो लुत्फ़ जिस्मानी नहे बल्कि दिमाग़ी हे…

मगर अब गोविन्द को किसी तरह का भी सुख प्राप्त हो रहा था या नहे… किसी तरह का भी फायदा हो रह था या नहे… इस बात को नज़र अनदाज़ करते हुए… गोविन्द को सहयता करनी थी लोगों की…

गोविन्द ने अपनी वाच में टाइम देखा इस वक़्त रत के सिर्फ 9.30 बजे थे… उस ने राजन काका की तरफ धयान लगाया तो देखा के राजन काका ने थोड़ी देर पहले रुक्मणि को किचन में सिमर सिंह के लिए खाना बनाते देखा था… और उस का अंदाज़ा था के अभी मज़ीद 20 से 30 मिनट लगें गए फिर रुक्मणि अपने कमरे की तरफ चली जये गई सोने…

गोविन्द ने अपना धयान ेषणा की तरफ लगाया तो उससे समझ में आ गया के ेषणा इतनी छोटी उम्र में बे क़रार क्यों हे… ेषणा, दरअसल, माँ और बाप की चुदाई की साड़ी आवाज़ें सुनती रही थी… दोनों कमरों के दरमियान वाली दीवार बोहत पतली थी और साडी आवाज़ों को अपने पूरे अनुभव या तासुर के साथ एक कमरे से दुसरे कमरे तक मुन्तक़िल कर दिया था…. ेषणा इस वक़्त बोहत बेचें थी… और इक हाथ से अपने मम्मी को डब्बा रही थी और दुसरे हाथ से छूट के डेन को छेद रही थी…

ेषणा की सोच… “गोविन्द भैया अभी जग रहे होंगे… हए… कैसे सबर करूँ… भैया का लुंड छु लून तो क़रार ए…”

गोविन्द का भी बारे मन था के वो ेषणा को अपनी बांहों में भर कर उस के जिस्म के स्पर्श को अपनी रूह में बसा ले… और अपने जिस्मानी आनंद की तकमील कर ले… लेकिन अभी वक़्त काम था… अपने आनंद से ज़यादा गोविन्द को फ़िक्र थी राजन काका की सहयता करने की…

गोविन्द के लिए इम्तेहान की घरी थी… अपने आनंद से ज़यादा वरीयता या प्रायोरिटी किसी और की सहयता थी….

फिर से गोविन्द ने धयान राजन काका की तरफ लगाया तो महसूस किया के काका ने नाहा धो कर साफ कपड़े पहने हुए थे और जिस्म पर टेलकम पाउडर भी चिरका था जिस से बदन में खुशबू सी आ गई थी…. गोविन्द मुस्कराया…

गोविन्द ने सोचा… “काका, कोण कहता हे के तुम बूढ़े हो… तुम ने तो पूरा एहतेमाम कर लिया हे रुक्मणि को क़तल करने का…”

काका इक बाज़ की तरह अपने शिकार पर नज़र रखे हुए था..

राजन काका… “हुंह, साली ने खाना तो परोस दिया हे सिमर बाबू के लिए, ये अब अपने कमरे की तरफ जा रही हे और ज़रूर सोने से पहले नहाये गई या फ्रेश होगी और कपड़े तब्दील करे गई… तो मुझे 15 मिनट मज़ीद वेट करना चाहिए…”

काका ने 20 मिनट बाद अपने क़दम बढ़ा दिए रुक्मणि के कमरे की तरफ… हवेली के अंदरूनी हिस्से में कहीं कहीं लाइट्स जल रही थी मगर बहार का हिस्सा मुकम्मल खामोश और रौशनी से खली था… काका के अंदर इक शोर था… हिजां सा बरपा था…

लरज़ते क़दमों और खरे लुंड के साथ, काका ने रुक्मणि के कमरे का दरवाज़ा खटखटा दिया…

रुक्मणि… “कोण हे…??”

राजन… “में हूँ… रुक्मणि बीटा… तुम्हारा काका…”

रुक्मणि… “काका, तुम इस वक़्त…?? क्या हे…??”

राजन… “बेटी दरवाज़ा खोल… कुछ बात करनी हे ज़रूरी…”

राजन काका अंदर से परेशां था के रुक्मणि से बात कैसे करे गए और कैसे कहे गए के उससे छोड़ने आया हे…

रुक्मणि दरवाज़ा खोलती हे और काका को अंदर आने देती हे… पर दरवाज़ा बंद नहे करती… और सवालिया नज़रों से काका की तरफ घूरने लगती हे…

काका बोलना छह रहा था पर लफ्ज़ साथ नहे दे रहे थे… आँखें फर्श की तरफ थी… होंठ लरज़ रहे थे… सिर्फ लुंड अपने जौबन पर था… इक ग़रूर के साथ सर उठए… अपने शिकार के सामने…

गोविन्द ने फ़ौरन रुक्मणि के दिमाग़ का रुख किया और उस के अंदर सोच पैदा की के काका के लुंड की तरफ देखे…

रुक्मणि की नज़र जेसे राजन काका की लुंगी में तन्ने हुए उभार को देखा तो उस का गाला खुश्क हो गया… वो समझ गई आज उस को दुनिया की कोई ताक़त बचा नहे सकती शिकार होने से…

बचना चाहता भी कोण था….

रुक्मणि तो प्यासी थी सैलून की…

35 साल की घेर शादी सुदा (ुनमर्रिएद) गदराई हुई औरत, 5.5 क़द, भरा हुआ जिस्म, बड़े चूचे, मोती गांड, प्यासी आँखें…

रुक्मणि की छूट ने बोलना शुरू किया, गिल्ली हो कर… और उस की ज़बान ने काम करना बंद कर दिया… हलक़ खुश्क… ऑंखें काका के लौड़े पर जम्मी हुई…

रुक्मणि सेक्स की पायस में जल रही थी इस से पहले उस ने काका को कई बार बातों बातों में छेड़ा था के वो बूढ़ा हो गया हे और कभी हिम्मत हो तो उस के कमरे में आये… आज काका उस के कमरे में आ चुक्का था…

कमरे में मुकम्मल ख़ामोशी थी… पिन ड्राप साइलेंस…

गोविन्द समझ चुक्का था के दोनों के लिए पहल करना मुश्किल हे… और उस को hi दोनों की सहयता करनी होगी…

गोविन्द ने रुक्मणि के अंदर सोच पैदा की… “काका ने बरी हिम्मत दिखाई में तो इन को नाकारा समझती थी… अब काका ने इतने हिम्मत कर्ली हे के चल कर मेरे कमरे तक आ गए हैं तो मेरा भी फ़र्ज़ बनता हे के में भी इक क़दम आगे बढ़ूँ…”

रुक्मणि को जेसे हौसला आ गया और आगे बढ़ कर कमरे का दरवाज़ा अंदर से बंद कर दिया… कमरा अभी भी मुकम्मल रोशन तह… रुक्मणि ने काका के सामने आते हुए आहिस्ता आहिस्ता से अपनी कमीज उठा दी…

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राजन काका जो पहले से hi बट बना खरा था… रुक्मणि के ब्रा में क़ैद बड़े बड़े चूचूं ने उस के बोलने, हिलने, की शक्ति बिलकुल hi ख़तम करदी… सिर्फ उस का लुंड झटके मर रहा था और काका के ज़िंदा होने का एकलौता सबूत था…

जब चाहा यारा तुम ने

आँखों से मरा तुम ने

होंठों से ज़िंदा कर दिया


फिर रुक्मणि ने अपनी कमीज और ब्रा भी उतर दी और पास पड़े सोफे पर बेथ कर अपने नंगे चूचूं को चुप्पा लिया और काका की तरफ बारे शरारती अंदाज़ में देखने लगी…

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काका को कुछ समझ नहे आ रह था के वो क्या करे… वो बस रुक्मणि के आकर्षित चुके नेहरे जा रहा था…

रुक्मणि… “काका… कुछ तुम्हारे पास भी हे दिखने को…??” और खुल के हंसने लगी…

गोविन्द को भी हंसी आ गई, काका की हालत पर…

गोविन्द ने काका का कण्ट्रोल अपने हाथ में ले लिया… और सोच पैदा की… “लानत हे मुझ पर… क्या हो गया हे मुझे… अभी दिखता हूँ इस को अपना हथियार और बंद करता हूँ इस का मुंह…”

काका ने अपनी लुंगी अपने लौड़े से हटा दी…

अब रुक्मणि की बरी थी… वो आगे बरही और काका के 5 इंच के तन्ने हुए लौड़े को अपनी मुठी में ले लिए… सख्त लोहे की रॉड जैसा काका का लौड़ा… रुक्मणि के हाथ में आते hi किसी नाग की तरह फुँफनाने लगा…

रुक्मणि सोफे से उठ कर घुटनों के बल बेथ गयी और काका के लौड़े का पहन अपने मुंह में ले लिया और बारे प्यार से टोपी को ज़बान से चाटने लगी… काका ने अपनी आँखें बंद कर लीं…

काका ने हाथ आगे बढ़ा कर रुक्मणि के निप्पल को टटोलने लगा…

अब तीनो (3)… काका, रुक्मणि और गोविन्द अपना अपना काम करने लगे…

रुक्मणि अब अपनी ज़बान काका के लौड़े की पूरी लम्बाई पर फेर रही थी… जरह से ज़बान फेरना शुरू करती और टोपी टोपी तक लती और फिर टोपी को अपने मुंह में ले लेती… और इक हाथ से काका की गोलियां सहलाने लगी… काका भी अब रूमानी के चूचे ज़ोर ज़ोर से दबाने लगा…

गोविन्द ने रुक्मणि को राह दिकहि और रुक्मणि कक का लौड़ा हाथ में पकड़ते हुए बिस्तर पर ले गयी और उस खुद लेट गई… काका ने उस के चूचे अपने मुंह में ले लिए और बरी बरी चूसने लगा… चूचे काफी बारे थे… पूरे मुंह में नहे आ रहे थे… जितना भी काका मुंह में ले सकता था उतना मुंह में लेकर बारे ज़ोर से चूसै कर रहा था…

रुक्मणि… मद्धम आवाज़ mein…“kitne दिन लगा दिए तुम ने काका…”

रुक्मणि… “तुम्हारी बेटी तरस रही थी तुम्हारा प्यार पाने के लिए… बारे कठोर हो तुम…”

काका का लुआंडा रुक्मणि के घुटने को छु रहा था…

Rukmani…“mein ने सोचा भी नहे था के इतना सख्त मुसल हे तुम्हारे पास…”

काका ये सुनते जेसे वेह्शी हो गया… ज़ोर ज़ोर से चूचे मसलने लगा… रुक्मणि की आहें बुलंद होने लगी… काका ने अपने हाथ की दो उँगलियाँ काठी रुक्मणि की छूट में दाल दी… रुक्मणि सिहार उठी… ज़ोर से आह भरी… और आहिस्ता आहिस्ता अपनी गांड आगे पीछे करने लगी…

काका ने अचानक रुक्मणि को पलट दिया और उस को पेट के बल बिस्तर पे लिटा दिया… अब काका ने उस की गांड पर थप्पड़ मरने शुरू कर दिए…

रुक्मणि की गांड बोहत चोरी और बरी थी… काका के थापरों ने उस को मज़ीद लाल कर दिया… रुक्मणि भी अब आप से बहार हो गई… चूतर हर थापर पर हिल कर रह जाते और कुछ देर के लिए हिलते रहते…

रुक्मणि… “भोस्डिके काका… तू क्या गांड का दीवाना हे… पहले छूट को ठंडा कर… फिर तुझे गांड भी दूँ गई… अगर छूट ठंडी न की तो यद् रख कुछ नहे मिले गए…”

काका… “बहनचोद… अभी सबर कर तेरी गांड बरी मस्त हे…”

फिर काका ने उस की गांड चेतना शुरू कर दी… काका उस की गांड को चाट भी रहे थे और हलके हलके काट भी रहे थे… रुक्मणि तरप रही थी… मगर उससे ाचा भी बोहत लग रहा था…

काका ने नीचे बेथ कर रुक्मणि गांड की फैंको को हाथों से अलग कर के बीच में मुंह दाल दिया और लपा लैप उस के छेद को चाटने लगे… जेसे hi काका ने अपनी ज़बान उस के छेद के अंदर डालने की कोशिश की… रुक्मणि चीक के साथ गांड ऊपर उठाई और झरने लगी… उस की प्यासी छूट सैलून के बाद जहर रही थी…

काका ने कुछ देर के बाद इक ऊँगली उस के गांड के छेद में दाल दी… और गांड छोडन करने लगे… थोड़ी देर बाद ढेर सारा थूक उस के छेद पे डाला और फिर दो उँगलियाँ अखती उस के छेद में पेल दी… रुक्मणि की कुंवारी गांड ये हमला बर्दाश्त न कर सकीय…

रुक्मणि के मुंह से गलियों कई क तूफ़ान निकलने लगा… ो काका बहनचोद.. मादरचोद… बुरचोदा… गांडू… चोर मेरी गांड को.. हरामी..

मगर काका तो जेसे पागल हो गया था…

अजब बात ये थी के रुक्मणि गलियां दे रही थी… तरप रही थी पर वाहन से हैट नहीं रही थी…

गोविन्द का हाथ फिर से अपने लुंड पे था… क्या लुत्फ़… क्या आनद था…

कुछ देर बाद जब काका का रुक्मणि की गांड खा के दिल कुछ भरा तो उस ने रुक्मणि को सीधा कर दिया और अपने लौड़ा को उस के होंटो के साथ जोर दिया…

रुक्मणि ने सुख का साँस लेते हुए उस के लौड़ा को चूसना शुरू कर दिया… काका भी झुक गए और अपना मुंह उस की छूट पे लगा दिया… रुक्मणि के अंग अंग में खुशी की लहर डोर गई… रुक्मणि लौड़ा चूस रही थी और काका छूट चाट रहे थे… सलारप… सलारप… सलारप… अजीब सी आवाज़ें थी कमरें में…

कुछ देर के बाद काका को ऐसा लगा के वो झरने के करीब हे तो उस ने फ़ौरन अपना लौड़ा रुक्मणि के मुंह से निकला और उस की टांगों के बीच आ गया और जितनी तेज़ी से उस की टैंगो में आया था उतनी hi तेज़ी से उस की छूट में अपना लौड़ा पेल दिया…

रुक्मणि… “बहनचोद आराम आराम से छोड़… मुफ्त का माल हे क्या… तेरे बाप की जागीर हे क्या… भड़वे…”

काका ने बड़े तेज़ ढके लगाना शुरू कर दिए…

अब कमरे में पहच… पहच… पहच… की आवाज़े थी… छूट पूरी गिल्ली थी रुक्मणि की और दोनों के जिस्म पसीने से तर बतर… काका ने एक हाथ से रुक्मणि गर्दन पाकर ली और और अपना अंघूटा उस के मुंह में दाल दिया… छूट में काका का लौड़ा और मुंह में काका का अंगूठा… रुक्मणि अंगूठा चूस रही थी और बोले जा रही थी… आवाज़ें कुछ समझ में आ रही थी और कुछ नहीं…

रुक्मणि… “आह.. स्लुर्प.. आह… स्लुर्प… बच्चो स्लुर्प… छोड़ स्लुर्प…”

काका ने कोई 10 मिनट ढके लगाए… क्या धांसू ढके थे… रुक्मणि झरने लगी… काका ने अजीब सी आवाज़ निकली जेसे भैंसा दकरता हे… रुक्मणि समझ गई काका फ़ारिग़ होने वाला हे… फ़ौरन बोली…

रुक्मणि… “ो काका भड़वे पानी अंदर मत चूर्ण…”

काका ये सुनते hi लौड़ा छूट से निकला और रुक्मणि के मुंह को निशाने पर रख लिया और पूरा चेहरा रुक्मणि का अपने मॉल से भर दिया… जेसे hi काका झरा और उस के लौड़े ने माननी का फवररा छोरा… रुक्मणि को काका के चेहरे पर गोविन्द का चेहरा दिखा… और ये छवि इतनी वाज़िह थी के किसी संदेह या शक की कोई गुंजाईश नहे थी… रुक्मणि को कुछ देर के लिए सकता हो गया… ये काका मुझे छोड़ रहे थे या गोविन्द…

इतने में काका… जिन का काम पूरा हो चुक्का था… फ़ौरन कपड़े पहने और कमरे से बहार निकल गए…

जब रुक्मणि को होश आया तो वो चिल्लाई… “अरे बहनचोद बूढ़े रुक रुक… कुछ देर तो रुक… तेरा बचा गिर रहा हे क्या जो यूँ भाग रहा हे…”

मगर काका ने कमरे से बहार आ कर फ़ौरन वाशरूम की तरफ रुख किया…
 
EPISODE – 9

रुक्मणि के लिए ये बात किसी अचंभे से काम न थी के चुदाई के शामे उस का ख़याल गोविंदा की तरफ गया… क्या वो गोविन्द को पसंद करती हे… ऐसा ज़रूर था के वो गोविन्द की मर्दानगी से मुतास्सिर थी और उस से छोड़ना भी चाहती थी मगर ये के चोदे कोई और… और छवि किसी और की दिखे…

ये बारे hi अजीब था…

रुक्मणि जो की 2 बार जहर चुकी थी मगर फिर से गोविन्द का ख़याल आते hi बाइकाल होने लगी…

गोविन्द ने एक बार फिर बारे आनंद उठाया था… इस सरे खेल में वो फूरी तरह से शामिल था मगर फिर भी उस का लुंड फुल आकर में तना हुआ था… उस की सख्ती में कोई कमी नहे आई… और वो अभी के अभी रुक्मणि को छोड़ना चाहता था… और गोविन्द को फिर ये ख़याल सताने लगा के वो सरे दरिया का पानी पि कर भी पयसा हे….

गोविन्द कब तक यूँही तरसता रहे गए….

राजन काका और रुक्मणि की चुदाई तकरीबन 45 से 50 मिनट तक चली… अब रत के 11 बजने में कुछ देर थी…

गोविन्द ने सिमर सिंह पे धयान लगा दिया… तो उस के टूटते ुर गए… ये क्या किया सिमर भैया ने… इन्हों ने तो आज बोहत पि ली थी और उन की सोच घेर वाज़िह थी जैसा के एक शराबी की होनी चाहिए मदहोश होने के बाद…

गोविन्द ने कई बार उन के ज़ेहन में विचार पैदा किये… “में ने बोहत पि ली हे… आज बोहत मज़ा आया… बोहत भूक लगी हे… खाना खाना चाहिए…”

गोविन्द को पता था के जब सिमर सिंह खाना खयें गए तो उन का नशा कुछ काम हो जये गए… भले hi कितना भी किसी को दिमाग़ी तौर पर विचार द्वारा गाइड किया जये लेकिन अगर वो व्यक्ति टॉक्सीकॉटेड (नाशी में) हो तो कण्ट्रोल मुश्किल होता हे…

बहरहाल बरी मुश्किल से गोविन्द ने सिमर सिंह को शराब से दूर किया और खाने की टेबल पर ले गया जहाँ वो खाना खाने लगा...

गोविन्द दो (2) चूड़ियां देख चुक्का था और उस का लुंड बैठने का नाम hi नहे ले रहा था… इतना टाइम था नहे के नलके के पास जा कर मुठ मर लेता… इस स्थिति में उस के लिए खाना कहते हुए सिमर सिंह के पास थेर पाना मुश्किल था…

गोविन्द ेषणा के बारे में सोचने लगा के अब तक वो बहार नहे आयी… और सोचते सोचते ेषणा की तरफ धयान लगा दिया… ेषणा के विचारों के अनुसार वो सिर्फ अपने भाई का जिस्म महसूस करना चाहती थी… उस का धयान सेक्स करने की तरफ नहे था… वो हर नौजवान लड़के या लड़की की तरह अपने विपरीत जेंडर के बारे में जिज्ञासा रखती थी और इसी तरह ेषणा को भी किसी लड़के का लुंड फील करने का मन था और उस के लिए ये बारे आसान था के भाई सो रहा हे और ये भी घर में आसानी से वो सोते हुए भाई के गुप्त हिस्सों को छू कर आनंद लेना चाहती हे…

गोविन्द ेषणा के विचार पढ़ कर मुत्मइन हो गया…

ेषणा… “शायद भाई सो गए हों थोड़ी देर में चेक करती हूँ…”

गोविन्द ये सोच रहा था के काश ेषणा अभी न ए पहले में सिमर और मल्टी बहभी की चुदाई देख लून वर्ण वो मेरा खरा लुंड देख कर कुछ और न समझ बैठे…

गोविन्द ने चेक किया सिमर सिंह को… तो देखा के वो तो खाने की टेबल पर सर रख के सो गया हे तो गोविन्द ने बरी मुश्किल से उस को जगाया और गाइड करते हुए वाशरूम तक लेकर गया जहाँ सिमर सिंह ने काफी बार अपना मुंह पानी से धोया तो कुछ फ्रेश सा हुआ और फिर… गोविन्द उस को बैडरूम की तरफ गाइड करने लगा जहाँ मल्टी भाभी इंतज़ार कर रही थी…

मल्टी भाभी की सोच… “कितनी देर हो गई हे… अभी तक सिमर नहे आया कमरे में…”

मल्टी भाभी ने अब निघ्त्य पहन ली थी जो के ओने पीेछे थी… नीचे ब्रा या पंतय नहे थी… निघ्त्य ब्लैक कलर ओने पीेछे नेट की बारीक जिस में से उस के तन्ने हुए चुके चुप नही रहे थे और न hi भाभी की इन को छुपाने की कोई खाव्हिश थी…

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निप्पल झांकते हुए निघ्त्य में से… मुन्तज़िर थे के कोई आये और इन को चेरे… चूसे… कहते… निघ्त्य स्लीवलेस थी और भाभी के बाज़ू भी नंगे थे… निघ्त्य शार्ट थी और घुटनो से कुछ ऊपर थी… नीचे छूट कुछ कुछ गीली थी और एक आध आंसू कुछ देर में टपका देती थी … इक फर्याद थी जो ख़तम होने का नाम नहे ले रही थी… हर तरह से बहभी तैयार थी… इंतज़ार था किसी दिलबर का… जो बारे प्यार से बरी मोहब्बत से… आग में दहकते जिस्म की प्यास बुझा दे… और आज तो वैसे भी भाभी सुबह गोविन्द का खरा लुंड देखने के बाद बोहत गरम थी… और भाभी को रह रह कर गोविन्द का ख़याल आ रहा था…

गोविन्द मल्टी भाभी की प्यास की दास्ताँ, उन के विचार द्वारा सुन कर, मज़ीद उत्तेजित हो उठा…

आखिर कर, भाभी का इंतज़ार ख़तम हुआ और सिमर सिंह झूमता झमता शराब के नशे में लरखरता कमरे में आ गया… मल्टी जो की बीएड पास परे सोफे पे बैठी थी उठ कर उस को सहारा दिया… और हमशा की तरह उस को लिटाने लगी… जैसा की हमेशा होता था…

सिमर सिंह कभी जब शराब में ज़यादा मदहोश होता था तो सीधे बिस्तर पे गिर जाता और सो जाता…

मगर आज तो सिमर की कमान गोविन्द ने संभाली हुई थी…

जेसे hi भाभी ने सिमर को थमा… तो सिमर ने अपने बाज़ू से मल्टी को कास के पकड़ लिया… शराब की स्मेल भाभी को बिलकुल भी अछि नहे लग रही थी मगर फिर भी वो खुश हुई के चलो पति ने अपने बाज़ून में तो पकड़ा… मल्टी के 36 इंच के बारे बारे चुके सिमर की छाती में धंस गए… मल्टी ने भी कास के सिमर के गिर्द अपने बाज़ू कर लिए… सिमर होल होल मल्टी की गर्दन पर किश करने लगा और चाटने लगा…

मल्टी भाभी… “ये सिमर hi हे न… कोई और तो नहे…”

भाभी, सिमर की कमर को सहलाने लगी… सिमर ने अपने एक हाथ से भाभी की कमर को कास लिया और दुसरे हाथ से निघ्त्य को पीछे से ऊपर उठा कर गांड नंगी करदी और नंगी गांड पर हाथ फेरने लगा… इक सिसकी निकली भाभी के मुंह से… आह…

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सिमर का हाथ गांड की फांकों के दरमियान चला गया… और उँगलियाँ गिल्ली छूट की तरफ बढ़ने लगी… भाभी ने अपनी टाँगें चोरी कर दीं… ताकि उँगलियाँ छूट के अंदर चली जये… मगर ऊँगली छूट के बहरी मोहने पर गश्त करती रही… और भाभी की उतेजिना बढ़ती रही…

आह… आह … आह… मल्टी भाभी तपने लगी…

सिमर ने पीछे हटते हुए भाभी की निघ्त्य को पूरा ऊपर उठा कर भाभी के शरीर को पूरा नंगा कर दिया… भाभी को उठा कर बीएड पर लिटा दिया… गोविन्द भी भाभी के खूबसूरत, तन्ने हुए चुके देख कर आहें भरने लगा और उस का लुंड झटके मरने लगा…

भाभी के चुके 36 इंच के गोल, दूधिया… और उन के ऊपर छोटे साइज के गुलाबी निप्पल… जेसे मोती के दाने…

बोहत कामुक नज़ारा था…

भाभी की छूट पूरी साफ… इक बाल भी नहे था… पूरी चिकनी और गिल्ली…

गोविन्द ने जल्दी से सिमर को चुके की तरफ राग़िब किया… सिमर बोहत तेज़ी से भाभी के चुके चूसने लगा और थोड़ी थोड़ी देर बाद हल्का हल्का काट भी रहा था… और निहार रहा था भाभी आँखों में…

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मल्टी बरी खुश थी आज… पर कुछ हैरान भी थी…

कमरा पूरी तरह रोशन था….

गोविन्द पूरी शिद्दत से सिमर के अंदर समय हुआ था…

भाभी को सिमर के चेहरे पर हलकी हलकी छवि दिख रही गोविन्द की... भाभी ये समझ रही थी के सुबह से गोविन्द को यद् कर रही हे इस लिया उस को गोविन्द दिख रहा हे…

कुछ देर बाद सिमर भाभी की टांगों की तरफ बढ़ा… और उस की छूट सूंघी… काया मादक सुगंध थी… और फिर सिमर ने ज़बान निकल कर छूट के होंटो पर ज़बान फेरना शुरू कर दी… और दो उँगलियाँ मुहाने पर रख दीं… गोविन्द की छवि मज़ीद वाज़िह हो गई… बल्कि भाभी को ये लगने लगा के गोविन्द hi उन की योनि चाट रहा हे…

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भाभी धीमी आवाज़ में… “आह गोविन्द तुम तो मेरे मन में बस गए हो… मेरे प्यारे गोविन्द काश तुम मेरे पास होते… मेरे राजकुमार मेरे मालिक…”

गोविन्द भाभी के मुंह से ये शब्द सुन कर पिघल सा गया और उस का दिल भी चाहने लगा के कसह वो वहां होता और खुल के प्यार करता भाभी को….

सिमर ने अपनी ज़बान बहार निकली और जितना हो सकता था उतना अंदर दाल दिया छूट में… और ज़बान को अनादर बहार करते हुए छोड़ने लगा… छूट को….

भाभी तड़पने लगी और अपनी गांड उठा उठा कर अब बोहत ज़ोर ज़ोर से “गोविन्द… आह”… “गोविन्द… आह”… “गोविन्द… आह”… भाभी को अब ये दर नहे था के कोई सुन ले गए गोविन्द का नाम उन के मुंह से…

फिर भाभी चार्म सीमा पे पोहंची और जरहने लगी… बोहत शिद्दत से… हर तरफ पानी पानी फेल गया…

गोविन्द ने जज़्बात में आ कर जेसे hi सिमर का कण्ट्रोल छोरा… तो सिमर पूरी मदहोशी में जाते हुए वहीँ गिर कर ढेर हो गया और हलके हलके खर्राटे लेने लगा…
 
EPISODE – 10

मल्टी भाभी के लिए सिमर सिंह का यूँ अचानक नशे में मदहोश हो कर सो जाना “गीली छूट पे धोका” साबित हुआ…

वो फिर से तड़पने लगी… आज कितने दिनों बाद उससे कुछ शारीरिक सुख मिला था और उस की आरज़ू, छूट में लुंड लेने की पूरी हो जाती अगर सिमर यूँ बेहोश न हो जाता…

और गोविन्द के लिए तो पहले hi से “खड़े लुंड पे धोका” वाला मामला चल रहा था…

गोविन्द भी प्यासा था…

गोविन्द कब तक यूँही तरसता रहे गए….

उसी वक़्त… गोविन्द को अपने लुंड पर इक नरम सा स्पर्श महसूस हुआ…

ाचा हुआ के गोविन्द ने जज़्बात को कण्ट्रोल में रखा और फ़ौरन आँखें न खोलीं…

गोविन्द ने हलकी सी आँखें खोलीं और देखा के ये ेषणा थी… जो की अपने कमरे से बहार आ चुकी थी… अपने भाई के लुंड का स्पर्श पाने के लिए…

गोविन्द के राइट साइड में 4 फ़ीट के फैसले पर प्रकाश की चारपाई थी… मगर प्रकाश पूरी तरह नींद में था और उस का मुंह भी दूसरी तरफ था…

गोविन्द लोअर पहने हुआ था… और जज़्बात में, सिमर और भाभी के दरमियान चलते हिजां अंगेज़ मनाज़िर की वजा से कुछ देर पहले जब उस ने अपना हाथ लोअर में डाला था तो… लोअर कुछ नीचे सरक गया था… गोविन्द उस को वापिस खेंचना भूल गया था… अब लुंड का ऊपरी हिस्सा, पेट से नीचे वाला, नज़र आ रहा था… लुंड के इर्द गिर्द बल साफ किये हुए 5 दिन हो गए थे तो अब हलके हलके बल थे वहां पे…

चांदनी मद्धम थी… मगर इतनी रौशनी ज़रूर थी के ेषणा के दमकते चेहरे के खुमार आलूद तासुरत को वाज़िह कर सके…

ेषणा के गुलाबी होंठ लरज़ रहे थे… उस ने अपने बालों को इक जुड़े की तरह बंधा हुआ… उस की लम्बी और पतली गर्दन भी चमक रही थी… जिस्म जज़्बात की शिद्दत से काँप रहा था… दिल की धड़कनें बेतरतीब थीं…

ेषणा ने उँगलियों से गोविन्द के तन्ने हुए लुंड को छुआ…

वो सिहार उठी…

ेषणा… “कितना सख्त हे… अभी भाई का लुंड क्यों खरा हुआ हे… क्या भाई कोई सपना देख रहे हैं??”

ेषणा… “किया देख रहे होंगे सपने में… किया चुदाई कर रहे हों गए… किस के साथ…???”

ेषणा सोहते सोचते, शर्म से मुस्कुराने लगी… “उफ़ भाई बारे बेशरम हैं…”

सीने की धरकने और भरने लगी… 34 बी के मुम्मे भरी सांस के साथ ऊपर नीचे होने लगे…

ेषणा ने पूरा हाथ आगे कर के, गोविन्द का लुंड ंथी में ले लिया… और आहिस्ता आहिस्ता सहलाने लगी…

ेषणा झुकी हुई थी… उस ने दुपट्टा नहे लिया हुआ था…

गोविन्द ने ज़रा सी आँखें खोली हुई थीं… और उस को सामने का दिलकश नज़ारा दिखा…

सफ़ेद… दूधिया… दो छोटी चोट चोटियां शबाब से भरपूर…

गोविन्द के लुंड ने हल्का सा झटका लिया… जैसे अपनी प्यारी, छोटी बहन का स्वागत किया हो…

ेषणा अपने होंठ हलके हलके से कभी काटती और कभी उन पे ज़बान फेरती… वो खुमार में पूरी तरह डूब चुकी…

ेषणा कुछ देर गोविन्द का लुंड सहलाती रही… फिर उस किन ाज़ार लोअर के ऊपरी हिस्से की तरफ गई… जो के ज़रा सा निचे सरका हुआ था… और पेट का निचला हिस्सा जो के लुंड का ऊपरी हिसस था … दिख रहा था… बोहत आकर्षित मंज़र था…

ेषणा ने दुसरे हाथ से अपने मुम्मे दबाये… और लज़्ज़त आमेज़ सिसकारी भरी…

ेषणा के लबों से लज़्ज़त आमेज़ अंदाज़ में निकला… “ाः… गोविन्द भैया…”

ेषणा ने अपनी ऑंखें बंद कर लीं…

और बारे प्यार से अपने भाई का लुंड दबाने लगी… कभी मुठी में पकड़ती… कभी टोपी पे उँगलियाँ फेरती… कभी पूरा हाथ खरा कर के लुंड की लम्बाई का नाप लेती…

दुसरे हाथ से मुसलसल अपने मुम्मे दबती जा रही थी…

ब्रा पहले hi कमरे में उतार चुकी थी… अब उस से और सबर न हुआ तो कमीज के नीचे से हाथ अंदर दाल कर मुम्मे दबाने लगी… निप्पल सख्त हो चुके थे… और एक निप्पल को हाथ में पकड़ा और उस को खेंचने लगी… मरोड़ने लगी…

फिर ेषणा ने अपना हाथ लोअर के ऊपरी हिस्से पे जहाँ से लुंड का ऊपर वाला और पेट के निचे वाला part दिख रहा था… हलके हाथ से पहले उँगलियों से छुआ… फिर पूरा हाथ फेरा… हलके हलके बल, ेषणा को उत्तेजित कर रहे थे… छोटे छोटे बल भी सख्त और मरदाना थे…

ेषणा के मुंह से सिकियाँ निकल रही थीं…

गोविन्द अब ये छह रहा था के ेषणा लोअर के अंदर हाथ दाल कर लुंड को डायरेक्ट पाकर ले…

उधर प्रकाश अपनी चारपाई पे, नींद में, ज़रा सा हिला तो चारपाई की हलकी आवाज़… चिर चिर… आयी…

ेषणा एक डैम खरी हो गई… जेसे किसी खवाब से जग गई हो… और फ़ौरन वहां से अपने कमरे की तरफ डोर लगा दी…

गोविन्द… “बहनचोद भैया, तुम्हें भी अभी हिलना था…??”

और फिर गोविन्द समझ गया के और कुछ तो अब होगा नहे… और करवट लेकर अपना लुंड बिस्तर पे सत्ता दिया … जेसे बिस्तर को छोड़ रहा हो और आँखें बंद कर लीं…

गोविन्द कब तक यूँही तरसता रहे गए….

गाँव में वैसे तो सब, सुबह सवेरे hi उठे जाते हैं… पर गोविन्द बोहत जल्दी उठ गया था… उठाते hi उस ने अपने आप से वचन किया और दिल में ठान ली के, अब वो ज़िन्दगी की साडी लाज़तों का मज़ा ले गए…

***...*** गोविन्द अब तरसता नहे रहे गए…. ***...***

उस ने प्रकाश की तरफ देखा… वो अभी सो रहा था… गोविन्द जल्दी से फ्रेश हुआ और कपड़े चेंज किये… उस के बापू काम पे जा चुके थे… वो मुंह अँधेरे hi निकल जाया करते थे… माँ भी सुबह सवेरे उठ जाया करती थी… इस वक़्त सिर्फ माँ hi जग रही थी और गोविन्द को देखते hi कमरे से निकल आयी…

माँ आज बोहत सुन्दर, खुश और खिल्ली खिल्ली नज़र आ रही थी…

माँ… “मेरा बीटा उठ गया… आज इतनी जल्दी…??”

गोविन्द… माँ के पास जाते हुए… “जी माँ… आज काफी काम करने हैं… इसी लिए जल्दी उठ गया…”

और माँ के पास पोहंचा और रोज़ाना माँ के पाऊँ छूटा था मगर आज माँ को गले से लगा लिया और पुछा… “माँ किसी हो…”

माँ ने भी ख़ुशी से उससे गले से लगा लिया…

माँ … खुश होते हुए… “आज माँ पे इतना प्यार…?? सब ठीक तो हे ना…??”

माँ, बीटा दोनों को एक दुसरे की बांहों में बारे सकूं और आनंद मिल रहा था…

गोविन्द ने अपनी माँ के शरीर को पूरा महसूस किया… उस के चुके गोविन्द के मज़बूत सीने में धंस गए थे… और दोनों की टाँगें तक एक दुसरे से मिल गई थी…

माँ… “कितना मज़बूत और सख्त जिस्म हे मेरे बेटे का…”

गोविन्द… “माँ, आज तुम इतनी खिली खिली लग रही हो… जेसे दिन में चाँद चमक रहा हो…”

माँ… शर्मा गई… “धत, किसी बातें कर रहा हे… में अब खूबसूरत कहाँ…”

गोविन्द… “माँ… तू बोहत खूबसूरत हे, तू बोहत सुन्दर हे…”

रजनी… अपने बेटे के मुंह से अपनी तारीफ़ और इतने मीठे शब्द सुन कर कहीं खो सी गयी…

दोनों की गिरफ्त एक दुसरे पर और मज़बूत हो गई… गोविन्द की राइट लेग माँ के दोनों टांगों के दरमियान थी और इसी तरह माँ की राइट लेग गोविन्द की टांगों के दरमियान थी…

दोनों ने एक दुसरे के गुप्त अंगों को महसूस किया…

गोविन्द का लुंड थोड़ा सा तन गया… और उस ने माँ के गाल और फिर गले को चूम लिया…

माँ… “बीटा, तू बोहत प्यार करता हे मुझे…”

गोविन्द… “माँ… तुम हो तो में हूँ…”

रजनी के चुचों में मीठा मीठा सा दर्द होने laga…chut गिल्ली होने लगी… रजनी को लगा के वो कुछ देर और यूँही रही तो पिघल जये गई… न चाहते हुए भी उस ने अपने बेटे को अपने से दूर किया…

माँ… “बीटा तू अपनी बहन और भाई को उठा… में नाश्ता बनती हूँ…” और तेज़ी से धड़कते दिल के साथ किचन की और चल पारी… जेसे rah-e-farar अख्तियार की हो…

गोविन्द, माँ की हालत देख कर मुस्कुरा दिया और बोहत खुश और मुत्मइन भी था…

गोविन्द ने प्रकाश को उठाने के बाद ेषणा को उठाने कमरे की तरफ चला…

ेषणा, सोती हुई बोहत मासूम सी गुड़िया लग रही थी… चादर पेट तक थी… करवट ले कर राइट साइड पे सो रही थी… गोविन्द उसी तरफ से चारपाई पैर बेथ गया… ेषणा बेखबर सो रही थी… ब्रा न होने की वजा से दोनों मुम्मे ीखते हुए परे थे… जिस वजा से ाचा खासा हिंसा कमीज से बहार नज़र आ रहा था… होल होल साँस चलने की वजा से, मुम्मे ऊपर उठाते फिर नीचे जाते…

बाल बिखरे हुए थे… आधे चेहरे पर और आधे तकिये पर थे… बोहत कामुक और सुन्दर लग रही थी…

गोविन्द का लुंड तन चुक्का था…

गोविन्द ने अपना हाथ बढ़ा कर ेषणा के गाल पे रख दिया… इक रेशमी एहसास… नरम गाल… रुई जेसे…

ेषणा के लैब हलके से खुले हुए थे… गोविन्द अपने होंटो को उस के अध् खुले होंटो के पास ले गया और हलके से मास किये… जेसे कोई बिजली का झटका लगा गोविन्द के होंटो को और असर मेहुस किया गोविन्द ने अपने लुंड पे…

ेषणा की आँखें बंद थीं… नींद में कसमसाई और अपने बाज़ू खोल कर अपने भाई को अपनी बांहो में ले लिया… और अपने तरफ झुका लिया…

गोविन्द के जिस्म का ऊपरी हिस्सा पूरा का पूरा ेषणा पर आ गया… ेषणा भी सीढ़ी हो गई और भाई को कास लिया अपनी बांहों में…

ेषणा नीड में… “भैया मेरी जान… यूँही मेरी बांहो में रहो… कहीं न जाओ…”

गोविन्द भी ेषणा को चूमने लगा गर्दन पर…

ेषणा अभी तक नींद में थी और सिसकियाँ लेने लगी…

गोविन्द एक हाथ से ेषणा की मखमली कमर को सहलाने लगा… और आहिस्ता आहिस्ता ेषणा के चूतर पैर ले गया… कपास से भी ज़यादा नरम चूतर थे ेषणा के…
 
EPISODE – 11

अब धीरे धीरे ेषणा ने अपनी आँखें खोली… दोनों की स्तिथि में कोई फ़र्क़ न आया… दोनों एक दुसरे को अपनी बांहों में लिए हुए लेते रहे…

ेषणा… “भैया, बोहत ाचा लग रहा हे… रोज़ ऐसे hi उठाया करो मुझे…”

फिर दोनों ने एक दुसरे के गाल चूमे…

ेषणा… “थैंक यू भैया… इतने सरे प्यार के लिए…”

गोविन्द… “तू तो मेरी जान हे गुड़िया… अब उठ जाओ जल्दी वर्ण स्कूल को लेट हो जाओ गई…”

फिर गोविन्द… ेषणा के माथे पर बोसा दे कर बहार निकल आया… और माँ के पास बेथ गया किचन में…

माँ मुस्कुराने लगी… गोविन्द को देख कर… “बस नाश्ता तैयार होने वाला हे… तू बहार बेथ… तेरे कपड़े ख़राब हो जयें गए… नाश्ता देती हूँ तुझे…”

गोविन्द… “में तो अपनी माँ, अपनी जान, के पास बेथुन गए… भले कपड़े ख़राब हो जयें…”

माँ… शर्मीली मुस्कराहट के साथ… “धत बदमाश…”

प्रकाश भी तरोई देर में आ गया था… दोनों ने मिल कर नाश्ता किया…

प्रकाश खेतों की तरफ और गोविन्द अपने दोस्त विक्रम के घर की तरफ चल पारा… अभी 8 बजने में कुछ शामे था… विक्रम की बहन, “किरण” (ेषणा की सहेली और क्लास फेलो) घर से निकल रही थी स्कूल जाने के लिए… दोनों की मुलाक़ात दरवाज़े पर hi हो गई…

किरण … “नमस्कार… भैया…”

नोर्मल्ली, गोविन्द दूर रह कर उस के सलाम का जवाब देता था मगर आज गोविन्द का स्वाभिमान और ऐतेमाद बहाल हो चुक्का था… तो उस ने आगे बढ़ कर किरण को गले से लगा लिया और किरण कुछ देर तो हैरानगी से गोविन्द की तरफ देखती रही फिर उस ने भी कास के अपनी बांहें गोविन्द की कमर की तरफ पहला दिन…

किरण… शोखी से… शरमाते हुए… नज़रे चुराते हुए… “भैया… आज ये कैसे…”

गोविन्द… “बस आज दिल चाहा के अपनी प्यारी सी बहन की खुशबू पास से, क़रीब से, ले लून… तुम बोहत प्यारी हो किरण…”

किरण खुशी से झूम उठी… और कास के गोविन्द के गले लग गयी…

शायद दोनों कुछ देर और इस लाज़त का मज़ा लेते मगर घर के अंदर से विक्रम की आवाज़ आयी … जो के अपनी माँ से कह रहा था “ाचा… माँ… दरवाज़ा बंद करले में शहर के लिए निकलता हूँ…”

गोविन्द ने किरण को गाल पे किश कर के चोर दिया और कहा जाओ स्कूल देर हो रही हे…

किरण मुस्कुराती हुई स्कूल के रस्ते की तरफ चल पारी और कुछ दूर आगे जा कर मुर कर देखा… गोविन्द, किरण के हिलते चूतर देख रहा था पीछे से… किरण फिर मुस्कुराई, शरमाई और स्कूल की तरफ चल पारी…

विक्रम भी दरवाज़ा खोल कर बहार आ गया…

साथ उस की माँ भी थी… गोविन्द ने माँ से आशीर्वाद लिया और विक्रम से गले मिला…

विक्रम के बापू बोहत पहले इस दुनिया से परलोक सुधर गए थे और अब बस विक्रम, उस की माँ और छोटी बहन किरण hi थे…

विक्रम, उम्र में गोविन्द से बारे हे और मेट्रिक तक एजुकेशन हे… वो “दौलत पुर” शहर में एक कार शोरूम में सेल्समेन हे… अचे खासे पैसे कमा लेता हे… सुबह 8 बजे निकलता हे और तकरीबन 1.30 से 2.0 घंटे में बस से शहर पोहंच जाता हे… कभी शाम को वापिस गाँव आ जाता हे और कभी शहर रह जाता हे दोस्तों के पास…

गाँव से… मैं रोड, जहाँ से शहर के लिए बस मिलती हे, 15 से 20 मिनट की वाक हे…

दोनों दोस्त बाटे करते हुए जा रहे हैं… गोविन्द कुछ मश्वरा करना चाहता हे विक्रम से तो इस लिए उस के साथ बस स्टैंड तक जा रहा हे…

विक्रम पूरा क़िस्सा सुनने के बाद… “देख यार गोविन्द… तेरे एहसान के बदले लाला जी तेरी एजुकेशन का खर्च तो उठा लें गेन मगर तेरे लिए इस से भी बढ़ कर ये होगा के वो तुझे कोई काम भी दें ताकि तू अपनी फॅमिली के लिए कुछ कमा भी सके और अपने आप को तैयार कर सके दुनिया को फेस करने के लिए… और लाला जी से काम मांगने का मतलब ये होगा के वो तुम पे एक और एहसान करें… इस लिए तू अपने आप को ऐसा पेश कर लाला के सामने के तू उन की ज़रुरत बन जये न के बोझ… और उन को भी ख़ुशी हो के तुम्हारी मदद करने का उन का फैसला ग़लत नहे था…”

गोविन्द ख़ामोशी से सुन रहा था और उस को विक्रम की बात ठीक लगी… गोविन्द ने विक्रम को अपनी शक्ति के बारे में नहे बताया था…

विक्रम… “और जेसे की तू ने बताया हे के लाला जी अनाज के बोपारी हैं तो शहर में अनाज मंडी हे और वहां का मुंशी अनाज के बीऑपर / धंधे के बारे में सरे राज़ों से वाक़िफ़ होता हे और वो एक ऐसा मुख्या किरदार हे जो के इस सरे धंधे में मामलात को ऊपर नीचे कर सकता हे… किसी को फ़ायदा भी दे सकता हे और नुकसान भी…”

गोविन्द… “अनाज मंडी कहाँ हे…??”

विक्रम… “मेरे शोरूम से कोई 10 मिनट की वाक हे और तुम ने तो मेरा शोरूम देखा hi हुआ हे…”

विक्रम… “और हाँ एक बात और… तेरे वहां रहने का भी कोई प्रॉब्लम नहे हे… मेरे शोरूम के मालिक का एक अलग मकान हे जो उस ने अयाशी के लिए रखा हुआ हे… तुझे जब भी शहर में रहना हो वहां चले जाना… वहां के चौकीदार को में बता दूँ गए के मेरा भाई हे… वो तुझे हर तरह की मदद करे गए… तू वहां चाहे तो रुक भी सकता हे…”

गोविन्द बोहत खुश हुआ और विक्रम से उस माकन का एड्रेस अछि तरह समझ लिया…

यूँ बातों बातों में पता hi न चला के बस स्टॉप आ गया… यहाँ से गोविन्द ने विक्रम को bye कहा और खुद वापिस गाँव की तरफ चल दिया…

अभी सुबह के सिर्फ 8.20 हुए थे…

हवेली में इतनी सुबह सिर्फ सिमर सिंह था जो की सोया होता था बाकि सब लोग सुबह सवेरे उठ जाते थे…

गोविन्द हवेली पोहंचा तो ज़मींदार नाश्ता कर के खेतों पर जा चुके थे…

शकुंतला देवी मंदिर के लिए निकल रही थी और गोविन्द को देखते कहा के उस के आने तक हवेली में रहे कुछ काम हे… और उस का 2 घंटे से पहले वापिस आना मुमकिन नहे था…

किआरा कॉलेज के लिए सुबह 7 बजे ड्राइवर के साथ निकल जाती थी… और शाम को वापिस आती थी…

राजन काका ने पोड़ों को पानी देना शुरू किया था और उन को इस काम में 2 घंटे लगते थे…

रुकमणी कपड़े निकल कर वाशिंग मशीन सेट कर रही थी… उस को भी 2 घंटे लगने थे कपड़े धोने में…

सिमर सिंह 11 बजे से पहले उठता नहे था और रात को जितनी उस ने पि थी उस हिसाब से आज वो दोपहर 12 बजे से पहले उठने वाला नहे था…

अब… हवेली में सिर्फ मल्टी भाभी रह जाती हैं… वो भी सुबह सवेरे उठ जाती हैं … तो वो कहाँ हैं और क्या कर रही हैं??
 
EPISODE – 12

गोविन्द अस्चर्या में पर गया के मल्टी भाभी कहाँ हैं… धयान लगाने पर देखा के भाभी बाथरूम में नहाने के बाद तोलिये से अपने बदन को पांच रही हैं… शायद आज कुछ देर से उठी हैं वर्ण तो वो सुबह hi उठ के नाहा लेती हैं… वो अपने कमरे के अटैच्ड बाथ रूम में थीं… अब भी उन का दिमाग़ अटका हुआ था गोविन्द पे… के आये तो कुछ जुगाड़ बनाई जये छुड़वाने के लिए… सिमर पर अब उन का ऐतबार ख़तम हो चुक्का था…

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गोविन्द ने वक़्त न जाया करते हुए, फ़ौरन कमरे की तरफ बढ़ा… जनता था के आम तौर पर कमरे का दरवाज़ा लॉक नहे होता…

और हुआ भी यही… कमरे का दरवाज़ा हैंडल पे हाथ रखने से खुल गया… सिमर सिंह बीएड पर बेसुध पारा था और खर्राटे ले रहा था… गोविन्द ने कमरे के दूर को अंदर से लॉक कर दिया और फ़ौरन अपने सरे कपड़े उतरे और बिलकुल नंगा हो गया और बाथरूम के दरवाज़े को चेक किया तो वो भी लॉक नहे था… अपनी खुशकिस्मती पे खुश होते हुए बाथरूम में दाखिल हो गया… गोविन्द का लुंड अपनी पूरी औक़ात में था और तन तन्ना तन भाभी को पेलने के लिए तैयार था…

भाभी अपने जिस्म को खुश्क कर चुकी थी और बालों का जुड़ा खोल रही थी के गोविन्द को नंगा देख कर कुछ देर के लिए जेसे समझ में न आया के ये क्या हे… फिर उस की नज़र गोविन्द के लुंड पे पारी तो उस ने अपनी पहले से गिल्ले होंठों पर ज़बान फेरी… गोविन्द भाभी की आँखों में चमक देखते हुए आगे बढ़ा और भाभी को अपनी बांहों में जाकर कर उस के होंटो पर अपने होंठ रख दिए…

भाभी ने भी अपनी बांहे गोविन्द के गले में दाल कर उस को कास लिया और उस के मज़बूत सीने में अपने 36 इंच के बारे बारे चुके धंसा दिए…

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गोविन्द भाभी के होंठ चूस रहा था… भाभी ने फ़ौरन अपने लैब खोल लिए… गोविन्द इतनी शिद्दत से चूस रहा था के भाभी को अपने होंटो पर दर्द होने लगा… उस ने फ़ौरन इक हाथ से गोविन्द के हिप पे चुटकी काट ली…

गोविन्द ने फ़ौरन भाभी के होंठ चोरे और भाभी की आँखों में देखा तो शरत से बोली…

भाभी… “गोविन्द राजा… ज़रा आराम से…”

और फिर मुस्कुराते हुए गोविन्द के होंटो पे चूमना शुरू कर दिया और अपनी ज़बान उस के मुंह में दाल दी… गोविन्द भी फ़ौरन भाभी की ज़बान चूसने लगा… कुछ देर के बाद भाभी ने गोविन्द की ज़बान पाकर ली… और चूसने लगी…

गोविन्द ने भाभी की टाँगें थोड़ी खोली और अपने तन्ने हुए लुंड को भाभी के छूट की फांकों पर रगड़ने लगा…

दोनों की ग्रिफ्ट एक दुसरे पर और सख्त हो गई… दोनों एक दुसरे के होंठ चूसते जा रहे थे और साथ गोविन्द भाभी की छूट के ऊपर लुंड रैगर रहा था…

कुछ देर के बाद… गोविन्द ने महसूस किया के भाभी की छूट काफी गिल्ली हो चुकी हे और साँसे भी ुकारः रही हैं तो उस ने भाभी को अपनी गॉड में उठा लिया… और बाथरूम के बहार जाने लगा…

भाभी, गोविन्द को रोकते हुए… “यहीं करते हैं न… बहार सिमर सो रहा हे…”

गोविन्द ने भाभी की एक न सुनी और कमरे में लेकर आ गया भाभी को…

बीएड किंग साइज था… सिमर सिंह बीएड पे एक साइड पे सो रहा था… बाक़ी काफी जगह थी बीएड पर…

गोविन्द ने भाभी को बीएड पर लिटा दिया और उन के चुके पाकर कर चूसने लगा… भाभी कभी गोविन्द की तरफ देखती तो कभी सिमर सिंह की तरफ… लुत्फ़ भी ले रही थी और परेशान भी थी…

गोविन्द ने ज़ोर ज़ोर से चुके चूसना शुरू कर दिए… चुके बारे होने की वजा से पूरे मुंह में नहे आ रहे थे… फिर भी गोविन्द कोशिश कर रहा था जितना मुंह खोल सके और पूरे चुके को चूस रहा था… जब एक चुके को चूसता तो दुसरे को हाथ से दबाता… गोविन्द को भी बोहत मज़ा आ रहा था… चुके थूक की लार से भरते जा रहे थे…

भाभी की छूट भी रिसना शुरू हो गई थी… सिसकियाँ भरने लगी थी…

भाभी… “आह… आह… आह… अपनी भाभी को शोहर के सामने छोड़ रहे हो… शर्म नहे आती…”

गोविन्द ने चूसना जारी रखा और बोलै… “मुझे तो मज़ा आ रहा हे…”

भाभी की उतेजिना अब बढ़ने लगी थी… गोविन्द के सख्त लुंड को अपनी मुठी में लेने की कोशिश करने लगी… जब हाथ में आया तो फ़ौरन बोल उठी… बस गोविन्द अब इससे दाल दो मेरी छूट में… और पानी अंदर चूर्ण… छोड़ो मुझे जल्दी… मुझ से बर्दाश्त नहे हो रहा…

गोविन्द ने भी देर न करते हुए… लुंड को एक hi झटके में पूरा भाभी की छूट में घुसेड़ दिया… भाभी चीख उठी…

भाभी… “आराम से मेरे राजा… इतना बारे, मोटा और सख्त लुंड तो आज तक मेरी प्यासी छूट को नसीब नहे हुआ…”

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गोविन्द को भी ये बात सच लगी क्यों के उस के लुंड ने ऐसा लगा जेसे छूट को चीयर दिया हो…

कुछ देर तकलीफ से कराहने के बाद, भाभी भी अपने चूतर उठाने लगी और मज़े से छुड़वाने लगी…

अब बीएड भी थोड़ा थोड़ा हिल रहा था ज़ोरदार चुआड़ी की वजा से और पहच… पहच… की ौज़ें भी आ रही थीं जेसे hi लुंड अनादर जाता गिल्ली छूट के और नीचे गोलियां टकराती भाभी के गांड के पास…

गोविन्द ने धयान लगाया सिमर सिंह पर और देखा के अब भी उस के ज़ेहन में बेरब्त और मुन्तशिर ख़यालात थे और वो पूरी तरह ग़ाफ़िल था…

गोविन्द ने उधर से मुत्मइन हो कर फिर से ढके लगाने शुरू कर दिए… गोविन्द छूट की नरमी महसूस कर रहा था और किसी वक़्त ऐसा लगता जेसे छूट लुंड को ग्रिफ्ट में लेना चाहती हे… पकड़ना चाहती हे… बोहत नरम और लतीफ़ एहसास…

गोविन्द की ज़िन्दगी की पहली चुदाई… फिर छोड़ते छोड़ते वो झुका और भाभी के होंटो को चूमने लगा… भाभी की आंखें बंद थीं और होंठ खुले थे जिन से सिसकियाँ निकल रहीं थी… मज़े और लुत्फ़ की आहें… एक पुराणी प्यास थी जो बुझ रही थी… भाभी की और गोविन्द की…

जेसे गोविन्द ने अपनी ज़बान भाभी के होंटो पे फेरी भाभी उससे अपने मुंह में लेकर ज़ोर से चूसने लगी और अपने बाज़ू गोविन्द के गले में दाल दिए… एक हाथ से बल सहलाने लगी गोविन्द के और दुसरे हाथ से गोविन्द की सख्त पीठ को महसूस करने लगी…

गोविन्द को ऐसा लगा जेसे कुछ तेज़ी आ गई थी भाभी के चूसने में और उन के हाथ भी ाकरने लगे थे….

भाभी… “ोये ोये… में गयी”

और साथ hi भाभी आह… आह… आह.. करते हुए झरने लगी और अपनी टाँगें भींच दीं गोविन्द की कमर पर… और गांड उठा दी ऊपर… कमर कमान बन गयी…

गोविन्द को ऐसा लगा जेसे उस के लुंड पे पानी की धरें पर रही हो… साडी छूट लपा लैप गिल्ली हो गई और टाँगें भी…

भाभी ने ज़ोर से पाकर लिया गोविन्द को और अपने आप से सत्ता लिया… और गोविन्द को अब काफी देर तक हिलने न दिया… बस अपनी आग़ोश में अपनी बांहों में ज़ोर से भींचती रही…

गोविन्द ने कुछ देर बाद अपने आप को चुराया और फिर से लुंड को अंदर बहार करने लगा…

मल्टी फ़ारिग़ होने के बाद फिर से सिमर की वजा से परेशां होने लगी…
 
EPISODE – 13

मल्टी फ़ारिग़ होने के बाद फिर से सिमर की वजा से परेशां होने लगी…

भाभी… “गोविन्द जल्दी करो… और कितनी देर लगे गई तुम्हें… कहीं सिमर न उठ जाये…”

गोविन्द का ये सेक्स का पहला अनुभव था और वो इस का भरपूर आनंद लेना चाहता था… बोहत तरसा था वो इस पल के लिए…

गोविन्द… “मेरी प्यारी भाभी… बस कुछ देर और… तुम इतनी सुन्दर हो के तुम्हें चोर्ने का मन नहे हे… बस दिल यही छह रहा हे के तुम्हारी छूट में यूँही अपना लुंड पेलता रहूं…”

मल्टी अपनी तारीफ सुन कर और गोविन्द की चाहत देख कर मुस्कुराई और उस का दिल कुछ पिघल सा गया… और वो भी जज़्बात में आ गई और बोली… “ठीक हे उठता हे बहनचोद सिमर तो उठाने दो… इस ने तो कभी मुझे शारीरिक सुख दिया नहे …”

छोड़ो मेरे राजा… और ज़ोर से छोड़ो… और फिर से अपनी गांड को नीचे हिलने लगी…

गोविन्द ने अपना सारा वज़न मुन्तक़िल किया अपने घुटनों पर और भाभी की दोनों टाँगें हवा में उठा कर ीखती कर लीं… ऐसा करने से भाभी की छूट का सूराख भींच सा गया और दोनों को इस का लुत्फ़ आने लगा… लुंड अब सुकर कर… फँस कर… जा रहा था…

गोविन्द के ढके बढ़ते जा रहे थे… अब कुछ वेह्शी पैन सा था… गोविन्द के ढकों में… ये बात मल्टी महसूस करके आकर्षित होने लगी… और उस ने भी अपने हाथों से गोविन्द के बाज़ू कास कर पाकर लिए…

मल्टी… “और ज़ोर से छोड़ो… और ज़ोर से छोड़ो….”

लुंड, छूट को बोहत बुरी तरह से रैगर रहा था…

मल्टी… “भोसड़ा बना दो मेरी छूट का…”

और िका एक… मल्टी फिर से झरने लगी… मल्टी झटके खा रही थी…

और साथ साथ गोविन्द ने माननी के फवारे चोरे सीधे मल्टी की बचे दानी पर…

मल्टी… “आह मेरे राजा… तेरा पानी मुझे सेराब कर रहा हे… मेरी प्यास बुझ रही हे…”

मल्टी की छूट कसने लगी लुंड को… निचोर्ने लगी लुंड को…

मल्टी की सिसकियाँ अब बाक़ायदा घुराहट में बदल गई थी… शेरनी बन गयी थी मल्टी…

गोविन्द के लिए इस तरह छूट का, इस तरह उस के लुंड को अंदर से पकड़ना और फिर चूर्ण और फिर पकड़ना, बोहत लाज़त आमेज़ था… ऐसा अनुभव छूट में झरने का बोहत खूबसूरत था…

दोनों साथ झरे थे… मल्टी तो दूसरी बार झरि थी… तो कुछ थकावट महसूस कर रहे थे दोनों… दोनों एक दुसरे की बांहों में बीएड पर लेट गए…

किसी को यद् भी नहे था के सिमर वहीँ सोया हुआ हे और उठ न जये…

केसा रोमांचक सम्भोग था…. बोहत दिलकश… अति सुन्दर…

काफी देर दोनों एक दुसरे के नंगे बदन का स्पर्श लेते रहे…

मल्टी… “तुम तो बारे तेज़ निकले… छुपे रुस्तम हो तुम… कल तुम ने मेरे लिए मुठ मरी और आज मेरी छूट भी मर ली… हेहही”

मल्टी हंस रही थी और प्यार से गोविन्द को मुक्के मर रही थी…

मल्टी… “बोहत ाचा छोड़ते हो मेरे राजा… ऐसे hi छोड़ते रहो गए न अपनी भाभी को…”

और यह कह कर मल्टी दीवानो की तरह चूमने लगी गोविन्द के चेहरे को…

फिर कुछ देर के बाद दोनों होंटो पे किश करते रहे…

मल्टी… “बस अब तुम जाओ… मुझे नहाना हे…”

यह सुन कर गोविन्द उठा और मल्टी को अपने बाज़ू में भर कर उठा लिया…

मल्टी… “अरे अरे… ये क्या कर रहे हो…??”

गोविन्द ने कोई जवाब नहे दिया और मल्टी को उठाये हुए बाथरूम में आ गया… और उस को अपने साथ शावर के नीचे खरा कर के शावर ों करदिया…

गोविन्द… “आओ मेरी जान… एक दुसरे को नहलाते हैं…”

मल्टी… मुस्कुराते हुए… “बारे रोमांटिक हो…”

गोविन्द भी मुस्कुरादिया…

मल्टी ने शावर जेल उठाया और ढेर सारा अपने और गोविन्द दोनों के जिस्म पे मॉल दिया… और अपने जिस्म को गोविन्द के जिस्म के साथ रगड़ने लगी… इस तरह जेल का झाग बनने लगा और फिर मल्टी ने स्क्रबर उठा कर उस से गोविन्द की पीठ साफ की फिर चेस्ट और फिर उस के लुंड की तरफ… जेसे hi मल्टी ने गोविन्द का लुंड अपने हाथ में पकड़ा… लुंड खरा होने लगा…

मल्टी… “बाप रे बाप…. ये तो फिर से तैयार हो रहा हे… इतनी डैम दर चुदाई के बाद भी ये चुटख़ोर ढेर नहे हुआ…” और ज़ोर ज़ोर से हंसने लगी… गोविन्द को ाचा लगा लुंड का नया नाम… “चुटख़ोर…

गोविन्द को, मल्टी को खुश देख कर ाचा लगा…

मल्टी अब अपने घुटनो पर बेथ गई… सारा झाग साफ किया और हाथ से लुंड को आगे पीछे करने लगी…

लुंड पूरा सख्त हो गया… मल्टी कुछ देर जिज्ञासा से लुंड को देखती रही और फिर अचानक अपने मुंह में ले लिया और बोहत तेज़ी से अपने मुंह में भर कर मुखछोडन करने लगी… एक हाथ से गोलियों को प्यार से सहलाने लगी…

गोविन्द ने भी आँखें बंद कर लीं और ज़िन्दगी की पहली लुंड चूसै का मज़ा लेने लगा…

मल्टी पूरा लुंड अपने मुंह में हलक़ तक लेने की कोशिश कर रही थी और इस वजा से बोहत सारा लार उस के मुंह से टपक रहा था…

काफी देर तक मल्टी चूसती रही कुल्फी की तरह… फिर थक कर खरी हो गयी…

मल्टी… “यार तुम बोहत देर लगते हो… फ़ारिग़ hi नहे होते… थका देते हो…”

गोविन्द ने मुस्कुरा के अपने होंठ रख दिए मल्टी के होंटो पर और चूसने लगा… शावर चल रहा था… दोनों के बदन फिर से सात गए…

फिर गोविन्द चूसने लगा मल्टी के निप्पल्स… कभी एक फिर दुसरे को…

मल्टी की आहे और सिकियाँ फिर से शुरू हो गई… गोविन्द अब नीचे बेथ चुक्का था घुटनो पर और सूंघने लगा मल्टी की छूट…

क्या सौगंध थी… मादक और कामुक… जेसे ज़ाफ़रान… छूट बिलकुल साफ थी… मल्टी ने आज सुबह hi बल साफ किये थे गोविन्द के आने से पहले… फिर गोविन्द ने एक चुम्बन ले लिया छूट का… मल्टी सिहार उठी… गोविन्द ने अब अपनी ज़बान निकली और छूट के लबों पर आहिस्ता से फेरने लगा… मल्टी ने अपनी आँखें बंद कर लीं… और अपने हाथ फेरने लगी गोविन्द के बालों में…

कुछ देर बाद गोविन्द छूट के डेन को चरने लगा… मल्टी जेसे पागल सी हो गई…

मल्टी… “ोोोीे… ोोोीे… में मर गयी… इतना मज़ा… इतना मज़ा… aaah…aaah…”

मल्टी… “चाट… चाट… कहा जा मेरी छूट मेरे आशिक़… मेरे जणू…”

और फिर गोविन्द ने अपनी ज़बान पूरी की पूरी मल्टी की छूट के अंदर करदी… छूट पानी पे पानी बहाये जा रही थी…

मल्टी ने गोविन्द के बल कास के पाकर लिए और अपनी छूट उस के मुंह पर ज़ोर ज़ोर से मरने लगी…

मल्टी की सांसें बेतरतीब थी और सीना बोहत तेज़ी से ऊपर नीचे हो रहा था… धारकानो की आवाज़ बहार तक आ रही थी…

गोविन्द अचानक खरा हुआ और मल्टी को उल्टा कर के वाश बेसिन स्लैब पे हाथ लगाने को बोलै और खुद उस के पीछे आगया और उस की टाँगें खोल कर पीछे से अपना लुंड पेल दिया मल्टी की छूट में…

और ज़ोर ज़ोर से छोड़ने लगा… मल्टी की आँखें बंद और मुंह खुला हुआ था… ाः… ाः… आह… सिसकियाँ… कराहें… ोी माँ… ूई माँ… ाः… आह… ोीी…

गोविन्द अब छोड़ भी रहा था और ज़ोर ज़ोर से मल्टी के चूतरो पर थापर भी मर रहा था…

सेहवानी जूनून था हर तरफ… सहर अंगेज़ माहौल था… दो बदन थिरक रहे थे… सदियों से जारी रक़्स में अपना भाग दाल रहे थे…

इक ज़ोरदार आह के साथ मल्टी झरने लगी और साथ hi गोविन्द ने भी अपना पानी छूट के अंदर निकल दिया…
 
EPISODE – 14

मल्टी ने जल्दी से गोविन्द को खूब सारा होंटो पे चूमा और बोली…

“मेरे राजा अब जाओ बहार… में भी आती हूँ कपड़े पहन के…”

गोविन्द ने फ़ौरन शावर के नीचे हो कर जल्दी से अपना बदन धोया और कमरे में आ कर कपड़े पहन लिए… सिमर सिंह सो रहा था… अब तकरीबन 9.40 बज रहे थे सुबह के… चुदाई करते 1.30 घंटा हो गया था… शकुंतला देवी की वापसी का शामे हो चुक्का था… वो किसी भी वक़्त मंदिर से आने वाली थी…

राजन काका अभी भी अपने काम में लगा हुआ था…

गोविन्द ने तवजा की रुक्मणि की तरफ… उस का काम भी ख़तम होने वाला था… गोविन्द उस की तरफ चला गया उस को चरने…

रुक्मणि वाशिंग मशीन पे झुक के एक लोट निकल रही थी धुले हुए कपड़ों की… और पास पारी हुई बास्केट में दाल रही थी…

गीले कपड़े मशीन से निकलने की वजा से उस के कपड़े भीग चुके थे… शलवार मोती टांगों के साथ चिपकी हुई थी… पीछे से चूतड़ों का पूरा आकर नज़र आ रहा था… और बीच में शूटरों की दरार में थोड़ा सा हिस्सा फंसा हुआ था…

रुक्मणि का सीना भी पुअर भीगा हुआ था… काळा रंग की ब्रा साफ नज़र आ रही थी… चुचों का ऊपरी सफ़ेद दूधिया हिस्सा चमक रहा था…

गोविन्द मुस्कुराते हुए पीछे से क़रीब हो गया रुक्मणि के… रुकमी ने तिरछी नज़र उस की तरफ की और फिर अपने काम में लग गयी…

गोविन्द का लुंड फिर से जागने लगा था… गोविन्द ने मुस्कुराते हुए बग़ैर किसी खौफ के… अपने हाथ से रुक्मणि के चूतर सहलाने लगा…

गोविन्द… बारे प्यार से “रुक्मणि… क्या कर रही हो”

रुक्मणि, गोविन्द का हाथ अपने चूतर पे लगते hi सिहर उठी… पर उस ने कोई ऐतराज़ नहे किया… रत से hi गोविन्द को मन hi मन में यद् कर रही थी…

रुक्मणि… धीमी आवाज़ में… “नज़र नहे आ रहा क्या कर रही हूँ…”

गोविन्द… फिर बारे प्यार से… चूतर सहलाते हुए… “मेरी नज़रें तो कहीं और हैं…”

रुक्मणि अपनी मुस्कान दबाते हुए… पीछे ज़रा सा मूर्ति और तिरछी नज़र से देखा गोविन्द को जो के मुस्कुराते हुए उस के चूतर सेहला रहा था…

रुक्मणि सोचने लगी… “हए राम… मेरी तो लाटरी निकल पारी हे… रत को काका ने छोड़ कर छूट को ठंडा किया और अब ये शेह्ज़ादा आ गया हे मुझे सताने…”

फिर रुक्मणि किन ाज़ार गई गोविन्द के लुंड पर जो के ठुमके मर रहा था कपड़ो के अंदर… और तन्ना खरा था…

रुक्मणि… “क्यों दिल्लगी कर रहा हे राजा… क्यों सत्ता रहा हे मुझ बिरहँ को…”

गोविन्द… एक क़दम आगे बढ़ाते हुए और अब दूसरा हाथ आगे लेट हुए इक चुके को थम लिया अपने हाथ में… और प्यार से दबाते हुए… “तुम तो शानदार माल की मालिक हो… तुम तो खुद रानी हो… जो किसी भी दिल पर बिजलियाँ गिरा सकती हे…”

इतने मीठे प्यारे शब्द सुन कर रुक्मणि झूम उठी… और एक डैम से मुर कर गोविन्द के होंठ चूम लिए…

रुक्मणि… “मेरे राजा अभी न सत्ता… शकुंतला किसी भी वक़्त आने वाली होगी… उस ने देख लिया तो बवाल मचा दे गई… बाद में जब तू कहे गए जेसे कहे गए ये तेरी दासी तेरे हुक्म का पालन करे गई…”

गोविन्द ने भी आगे बढ़ कर एक बार रुक्मणि के होंटो को चूमा और कहा… “मेरी रानी ठीक हे अभी तुम्हारी बात मन लेता हूँ पर यद् रहे में फिर आऊं गए…”

रुक्मणि… “में इंतज़ार करूँ गई… मेरे राजा” और पास परे खुश्क कपड़े से एक हाथ साफ कर के गोविन्द का लुंड दबा दिया बारे प्यार से… और ज़ोर ज़ोर से हंसने लगी…

गोविन्द भी हँसता हुआ… लाउन्ज की तरफ आ गया…

उसी वक़्त कार के हॉर्न की आवाज़ आयी और शकुंतला देवी कार से उतर कर सीढ़ी लाउन्ज की तरफ आयी और गोविन्द को इशारे से पास बुलाया…

शकुंतला… “सिमर बीटा कह रहा था के तू ने शहर जाना हे किसी काम से तो वहां से कपड़े लेते आना टेलर से… सील गए होंगे… में तुझे अभी रिसीप्ट और पैसे देती हूँ…”

ये कहते हुए शकुंतला देवी ने मल्टी भाभी को आवाज़ लगाई… “बहु वो कपड़ों की रिसीप्ट और पैसे जो सिमर ने कल दिए थे… ले आ… गोविन्द शहर जा रहा हे…”

मल्टी भाभी… “गोविन्द तू कब जये गए और कब वापिस ए गए…”

गोविन्द… “जी भाभी बस अभी निकलूं गए और शाम तक या कल वापिस आऊं गए”

शकुंतला देवी… उठाते हुए… “में जा रही हूँ ज़रा आराम करने कमरे में…”

मल्टी भाभी भी चली गयी अपने कमरे में पैसे और रिसीप्ट लेने… भाभी जल्द hi वापिस आ गयी…

मल्टी… गोविन्द की तरफ परेशां नज़रों से देखते हुए… “गोविन्द… ये पैसे हैं जो टेलर को देने है और ये कुछ और पैसे भी रख तुझे वहां काम आएंगे… और जल्द वापिस आना… अपना धयान रखना…”

गोविन्द… “भाभी… में तो अपना सारा धयान यहाँ चोर कर जा रहा हु आप के पास…”

मल्टी इन लफ़्ज़ों को अपनी रूह की गहराही तक महसूस करने लगी और बारे प्यार से देखा गोविन्द की तरफ…

गोविन्द भी मुस्कुराते हुए मुरा और चल पारा बस स्टैंड की तरफ…

बस में सीट आसानी से मिल गई… लोग बोहत काम थे… तकरीबन 1 से 1.30 घंटे में बस शहर के मैं बस स्टैंड पर पोहनचनि थी वहां से शहर की अन्तर सिटी बस पे गोविन्द को अनाज मंडी स्टॉप तक जाना था… और उस के बाद लाला जी के घर जाना था…

बस स्टैंड पे जा कर बस रुकी तो सरे मुसाफिरों के साथ गोविन्द भी बस से उतरा और इधर उधर देखने लगा… के इंटरसिटी बस कहाँ से मिले गई… अभी वो पूछने वाला था किसी से के दो पोइलिस वाले उस के पास ए और उस को कहा के उन के साथ चले…

गोविन्द थोड़ा सा परेशां ज़रूर हुआ मगर सोचा देखते हैं क्या हे… और उन के साथ चल पारा…
 
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