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- Dec 5, 2013
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EPISODE – 6
गोविन्द वहां से निकला तो उस को याद आया के उससे लाला जी ने जो इनाम दिया हे वो चेक नही किया… देख कर रुपया गिनने तो पुरे 10,000 थे… वो बोहत खुश हुआ ये उस के पूरे महीने की पाय से ज़यादा अमाउंट था…
गोविन्द ने गाँव के स्वीट्स शॉप से 2 किलो स्वीट पैक करवाई सब की पसंद के हिसाब से और फिर चला गया भोला राम की शॉप पर ेषणा के लिए चॉकलेट लेने…
भोला राम ने जनरल स्टोर, अपने घर के एक हिस्से में हे बनाया हुआ था… और एक दरवाज़ा घर से भी खुलता था और जब भोला राम शहर गया हुआ होता था तो उन की बीवी, करिश्मा भाभी स्टोर चलाया करती थीं… इन की औलाद नही थे इसलिए गाँव के हर बचे को प्यार करते थे… गाँव के लोग भी इन दोनों को इन की खुश मिज़ाजी की वजह से बोहत पसंद करते थे…
भोला राम के लिए एक और बात भी मशहूर थे के उन के घर महीने में एक बार शहर से एक मेहमान ज़रूर आ कर रुकता हे 2 य 3 दिन के लिए और हर बार मेहमान नया होता हे… भोला राम की आगे 35 साल और करिश्मा भाभी की आगे 25 साल थी…
गोविन्द को भोला राम ने स्माइल के साथ वेलकम किया और पूरा चॉकलेट का डिब्बा लेने पर पुछा तो सारा क़िस्सा गोविन्द ने सुन्ना दिया… भोला राम बोहत खुश हुआ के अपने गाँव का नौजवान इतना बहादुर और दिलेर हे… फिर उस ने आवाज़ दी करिश्मा भाभी को जो के चाय और पकोड़े बना रही थीं… वो भी स्टोर में आ गयी और क़िस्सा सुन कर बोहत खुश हुई और ज़बरदस्ती गोविन्द को अंदर बुला लिया और चाय और पकोड़ों के साथ खातिर की… भोला राम ने करिश्मा भाभी को कहा के गोविन्द अब बारे हो गया हे किसी रोज़ इससे घर बुलाओ खाने के लिए… जब गोविन्द निकलने लगा उन के घर से तो भोला राम और करिश्मा भाभी दोनों ने गल्ले लगा कर अलविदा किया… जब करिश्मा भाभी मिलीं तो अपने सीना गोविन्द के सीने पर ज़ोर से रगर दिया और अलग होते वक़्त भाभी ने अपना हाथ नीचे करते हुए गोविन्द के लुंड को सेहला सा दिया… गोविन्द को ये सब अब ाचा लगने लगा था… भाभी ने सब अपने शोहर के सामने किया… ये बात गोविन्द की समझ में न आयी… उस ने सोचा के भोला राम या भाभी की सोच पढ़े मगर फिर उस ने सोचा पहले hi बोहत देर हो गयी है… मिठाई का मज़ा तो गरम खाने में हे तो गोविन्द फ़ौरन घर की तरफ चल दिया…
घर पर माँ और ेषणा hi थे… दोनों बोहत खुश हुए सारा किसे सुन कर… फिर गोविन्द ने सरे इनाम के पैसे और दुसरे बचे हुए रुपया माँ के हाथ पे रख दिए… माँ ने गले से लगा कर लम्बी उम्र की दुआएं दी और ेषणा चॉकलेट्स देख कर उछलने लगी और भाई के गाल पर चूम लिया… ेषणा तो मनो चिपक गयी भाई से और जब कुछ देर भाई को न छोरा तो जाने क्यों गोविन्द उस की सोच पढ़ने लगा…
ेषणा की soch…“apna हाथ भाई के डोलों पर फेरते हुए… भाई के ये कितने सख्त हैं… किरण (ेषणा की सहेली) कह रही थी के जीतनेय मर्द के डोले सख्त होते उतना hi उस मर्द का हथियार भी साख होता हे…”
ये सोचते सोचते ेषणा ने अजीब हरकत की, अपनी एक तंग गोवंड की दोनों टैंगो के बीच करदी एंड काफी देर तक भाई के लुंड को महसूस किया… गोविन्द का लुंड ाकरने लगा था… माँ वहीँ थी, गोविन्द ने फ़ौरन ेषणा को दूर किया…
ेषणा की soch…“uff कितना सख्त हो रहा हे बही का लुंड… छूट में चींटियां रींग रही हैं… कितना मज़ा हे इस एहसास में…”
गोविन्द के लिए ये बात बोहत अनोखी थी के अभी ेषणा ने जवानी की देलीज़ पे क़दम रखा हे और फिर भी इस के अंदर इतनी तड़प हे तो बाक़ी लोगों का तो कोई क़सूर नही…
माँ… “ेषणा, अभी शाम के चाय आज तू बना…”
ेषणा ख़ुशी से किचन के तरफ चली गयी…
माँ, मिटहि चेक करने लगी, जब माँ ने बर्फी देखि तो एक चमक आयी उन की आँखों में जो गोविन्द ने महसूस की और फ़ौरन उन की सोच पढ़ने लगा…
माँ की सोच… “मेरा बीटा बर्फी भी लाया हे… बर्फी तो गोविन्द के बापू को बोहत पसंद हे… जब भी बर्फी कहते हैं उस रात तो ज़रूर छोड़ते हैं… हए आज भी छोड़ें गए??… पूरा हफ्ता हो गया हे….”
यह एक और झटका था गोविन्द के लिए… आज भी उस के माता पिता सेक्स करते हैं और माँ इतनी एक्ससिटेड होती हे सेक्स के लिए… जनता था के इन की इतनी आगे ज़यादा तो नहे हुई लेकिन एक सोच होती है हर एक की के हमारे माँ बाप ये नहे करते… वो नहे करते… ऐसा नहे करते… वैसा नहे करते..
माँ (रजनी)
गोविन्द ने माँ की सोच पढ़ना जारी रखा…
माँ की सोच… “मेरी छूट गीली हो रही हे… जिस्म सिहार रहा हे… चूचूं में मीठा मीठा दर्द हो रहा he…Pehle जब गोविन्द के बापू छोड़ते थे तो 30 मिनट तक उन का पानी नहे निकलता था… छुड़वा छुड़वा कर मेरी कमर दोहरी हो जाती थी… में तीन चार भर झरती तो वो एक बार झरते थे…”
ाचा हुआ के गोविन्द चारपाई पे बैठा हुआ था वर्ण ये सब सुन कर जो उस का लुंड खरा हुआ था उस की माँ को दिख जाता…
माँ… “बीटा में ज़रा आती हूँ कमरे में एक काम हे…”
माँ की सोच… “अब जल्दी से छूट में ऊँगली करके शांत करना परे गए वर्ण दिल बेचैन रहे गए….”
गोविन्द ने धयान लगा लिया ेषणा की तरफ…
ेषणा की सोच… “जेसे मेने पिछले महीने भैया का लुंड रात को मुठी में लिया था… भैया सो रहे थे…. भैया को पता hi न चला… आज फिर दिल कर रहा हे… रात को तरय करूँ गई… प्रकाश भैया का इतना मोटा और बारे नहे जितना मोटा और बारे गोविन्द भैया का हे…”
ेषणा का ये रवैया समझ से बहार tha…magar गोविन्द आहिस्ता आहिस्ता सब समझ रहा था… एक राज़ की दुनिया थी जिस से सारे परदे उठ रहे थे… सेक्स की दुनिया… न रिश्तों को देखती हे और न hi मर्यादा और न hi सोसाइटी के नॉर्म्स को…
गोविन्द सोचने लगा… “के अगर मेरी मुलाक़ात साधु महाराज से न हुई होती और न मुझे ये शक्ति पर्पट हुई होती… तो में इस दुनिया को सिर्फ अपनी समझ और सोच के हिसाब से देखता रहता… एक ऐसी दुनिया के जिस में किसी की भी सेक्सुअल नीड्स की कोई अहमियत नहे हे… किसी और का चोरो, मुझे अपना भी पता नहे था के मुझे भी सेक्स से इतना लुत्फ़ और मज़ा आ सकता हे… और ये लुत्फ़, यह मज़ा, सब नशों से ज़यादा नशीला हे…”
गोविन्द सोचने laga…“mein ने आज रात तीन अलग अलग जगा धयान लगाना हे… बापू और माँ की तरफ, राजन काका और रुक्मणि की तरफ और सिमरन भैया और मल्टी भाभी की तरफ…”
Govind…“ye कैसे मुमकिन होगा…??”
फिर उससे ख़याल आया…
Govind…“Bapu और माँ तो रात का खाना जल्दी खा कर कमरे में चले जाते हैं 9 बजने से पहले पहले… रुक्मणि रात के 10 बजे तक अपने कमरे में जाती हे…. और सिमर भैया तो 8 बजे शराब पीना शुरू करते हैं और 11 या 12 तक पीते रहते हैं… तीनों जोरों का टाइम अलग हे तो ये मुमकिन हे…”
फिर गोविन्द को ेषणा का ख़य्यल आया…
Govind…“ye ेषणा क्या करती हे…?? आज रात देखते हैं…”
शाम होने लगी थी … के प्रकाश भैया और बापू घर आ गए… घर का दरवाज़ा बंद कर दिया गया…
माँ ने गोविन्द की बहादुरी का क़िस्सा कैलाश नाथ और प्रकाश को सुनाया… कैलाश खुश हुआ और बेटे को दुआ दी… प्रकाश उठ कर भाई से गले लग गया…
कैलाश नाथ… “गोविन्द बीटा, तुम ने जो लाला जीवट राम के पास शहर जाने का सोचा हे, इस बारे में तुम्हें रोकूं गए नहीं, लेकिन ख़याल रहे ये शहर के लोगों की मकारी समझ नहे आती… ”
कैलाश को सेठ गिरधारी लाल के द्वारा दिए गए दग़ा और धोका याद आ गया…
Govind…“Bapu, में शहर किसी को नुकसान पुहंचने के इरादे से नहे जा रहा… में तो बस ये चाहता हूँ के आगे पढ़ सकूँ और आप सब लोगों के लिए कुछ करूँ… मेरी नियत ख़राब नहे और न ही में किसी के खिलाफ कोई मंसूबा लेकर शहर जा रहा हूँ… अगर मेरी नियत ठीक हे तो मुझे डरने की ज़रुरत नहे..”
कैलाश नाथ को अंदाज़ा हो गया था के जवान खून हे इस को रोकना ठीक नहे… ये अपने हिस्से के तजरुबे और फैसले करे गए और अपनी ग़लतियों से सीखे गए… अगर भगवन ने चाहा तो सफल होगा…
Kailash…“Beta, मेरा और तुम्हारी माँ का आशीर्वाद सदा तुम्हारे साथ होगा…”
कैलाश ने अपनी पत्नी से कहा… “भगवान 5,000 गोविन्द को देदो ताकि जब ये शहर जये तो कुछ कपड़े और जूते अपने लिए ले ले…”
फिर सब ने मिल कर खाना खाया… और खाने के बाद भी कुछ देर तक बैठे बातें करते रहे… आज सब खुश थे…
रजनी ने अपने पति, कैलाश, की तरफ देखते हुए कहा के गोविन्द अप्प सब लोगों के लिए मिठाई भी लाया हे… और मिठाई निकाल कर सब को देदी…
कैलाश ने जब मिठाई मांगी तो रजनी ने मुस्कुराते हुए कहा…
Maa…“aji आप तो बर्फी कहते हैं न तो में ने आप के लिए बर्फी प्लाट में दूध के गिलास के साथ कमरे में रख दी हे… चलिए वहीँ चल कर खा लीजिए… बच्चों को आपस में बात करने दीजिये…”
कैलाश भी मुस्कुराते hue…“theek हे बचो… सुबह मुलाक़ात होगी…” और उठ कर दोनों पति पत्नी कमरे की तरफ चल दिए…
गोविन्द वहां से निकला तो उस को याद आया के उससे लाला जी ने जो इनाम दिया हे वो चेक नही किया… देख कर रुपया गिनने तो पुरे 10,000 थे… वो बोहत खुश हुआ ये उस के पूरे महीने की पाय से ज़यादा अमाउंट था…
गोविन्द ने गाँव के स्वीट्स शॉप से 2 किलो स्वीट पैक करवाई सब की पसंद के हिसाब से और फिर चला गया भोला राम की शॉप पर ेषणा के लिए चॉकलेट लेने…
भोला राम ने जनरल स्टोर, अपने घर के एक हिस्से में हे बनाया हुआ था… और एक दरवाज़ा घर से भी खुलता था और जब भोला राम शहर गया हुआ होता था तो उन की बीवी, करिश्मा भाभी स्टोर चलाया करती थीं… इन की औलाद नही थे इसलिए गाँव के हर बचे को प्यार करते थे… गाँव के लोग भी इन दोनों को इन की खुश मिज़ाजी की वजह से बोहत पसंद करते थे…
भोला राम के लिए एक और बात भी मशहूर थे के उन के घर महीने में एक बार शहर से एक मेहमान ज़रूर आ कर रुकता हे 2 य 3 दिन के लिए और हर बार मेहमान नया होता हे… भोला राम की आगे 35 साल और करिश्मा भाभी की आगे 25 साल थी…
गोविन्द को भोला राम ने स्माइल के साथ वेलकम किया और पूरा चॉकलेट का डिब्बा लेने पर पुछा तो सारा क़िस्सा गोविन्द ने सुन्ना दिया… भोला राम बोहत खुश हुआ के अपने गाँव का नौजवान इतना बहादुर और दिलेर हे… फिर उस ने आवाज़ दी करिश्मा भाभी को जो के चाय और पकोड़े बना रही थीं… वो भी स्टोर में आ गयी और क़िस्सा सुन कर बोहत खुश हुई और ज़बरदस्ती गोविन्द को अंदर बुला लिया और चाय और पकोड़ों के साथ खातिर की… भोला राम ने करिश्मा भाभी को कहा के गोविन्द अब बारे हो गया हे किसी रोज़ इससे घर बुलाओ खाने के लिए… जब गोविन्द निकलने लगा उन के घर से तो भोला राम और करिश्मा भाभी दोनों ने गल्ले लगा कर अलविदा किया… जब करिश्मा भाभी मिलीं तो अपने सीना गोविन्द के सीने पर ज़ोर से रगर दिया और अलग होते वक़्त भाभी ने अपना हाथ नीचे करते हुए गोविन्द के लुंड को सेहला सा दिया… गोविन्द को ये सब अब ाचा लगने लगा था… भाभी ने सब अपने शोहर के सामने किया… ये बात गोविन्द की समझ में न आयी… उस ने सोचा के भोला राम या भाभी की सोच पढ़े मगर फिर उस ने सोचा पहले hi बोहत देर हो गयी है… मिठाई का मज़ा तो गरम खाने में हे तो गोविन्द फ़ौरन घर की तरफ चल दिया…
घर पर माँ और ेषणा hi थे… दोनों बोहत खुश हुए सारा किसे सुन कर… फिर गोविन्द ने सरे इनाम के पैसे और दुसरे बचे हुए रुपया माँ के हाथ पे रख दिए… माँ ने गले से लगा कर लम्बी उम्र की दुआएं दी और ेषणा चॉकलेट्स देख कर उछलने लगी और भाई के गाल पर चूम लिया… ेषणा तो मनो चिपक गयी भाई से और जब कुछ देर भाई को न छोरा तो जाने क्यों गोविन्द उस की सोच पढ़ने लगा…
ेषणा की soch…“apna हाथ भाई के डोलों पर फेरते हुए… भाई के ये कितने सख्त हैं… किरण (ेषणा की सहेली) कह रही थी के जीतनेय मर्द के डोले सख्त होते उतना hi उस मर्द का हथियार भी साख होता हे…”
ये सोचते सोचते ेषणा ने अजीब हरकत की, अपनी एक तंग गोवंड की दोनों टैंगो के बीच करदी एंड काफी देर तक भाई के लुंड को महसूस किया… गोविन्द का लुंड ाकरने लगा था… माँ वहीँ थी, गोविन्द ने फ़ौरन ेषणा को दूर किया…
ेषणा की soch…“uff कितना सख्त हो रहा हे बही का लुंड… छूट में चींटियां रींग रही हैं… कितना मज़ा हे इस एहसास में…”
गोविन्द के लिए ये बात बोहत अनोखी थी के अभी ेषणा ने जवानी की देलीज़ पे क़दम रखा हे और फिर भी इस के अंदर इतनी तड़प हे तो बाक़ी लोगों का तो कोई क़सूर नही…
माँ… “ेषणा, अभी शाम के चाय आज तू बना…”
ेषणा ख़ुशी से किचन के तरफ चली गयी…
माँ, मिटहि चेक करने लगी, जब माँ ने बर्फी देखि तो एक चमक आयी उन की आँखों में जो गोविन्द ने महसूस की और फ़ौरन उन की सोच पढ़ने लगा…
माँ की सोच… “मेरा बीटा बर्फी भी लाया हे… बर्फी तो गोविन्द के बापू को बोहत पसंद हे… जब भी बर्फी कहते हैं उस रात तो ज़रूर छोड़ते हैं… हए आज भी छोड़ें गए??… पूरा हफ्ता हो गया हे….”
यह एक और झटका था गोविन्द के लिए… आज भी उस के माता पिता सेक्स करते हैं और माँ इतनी एक्ससिटेड होती हे सेक्स के लिए… जनता था के इन की इतनी आगे ज़यादा तो नहे हुई लेकिन एक सोच होती है हर एक की के हमारे माँ बाप ये नहे करते… वो नहे करते… ऐसा नहे करते… वैसा नहे करते..
माँ (रजनी)
गोविन्द ने माँ की सोच पढ़ना जारी रखा…
माँ की सोच… “मेरी छूट गीली हो रही हे… जिस्म सिहार रहा हे… चूचूं में मीठा मीठा दर्द हो रहा he…Pehle जब गोविन्द के बापू छोड़ते थे तो 30 मिनट तक उन का पानी नहे निकलता था… छुड़वा छुड़वा कर मेरी कमर दोहरी हो जाती थी… में तीन चार भर झरती तो वो एक बार झरते थे…”
ाचा हुआ के गोविन्द चारपाई पे बैठा हुआ था वर्ण ये सब सुन कर जो उस का लुंड खरा हुआ था उस की माँ को दिख जाता…
माँ… “बीटा में ज़रा आती हूँ कमरे में एक काम हे…”
माँ की सोच… “अब जल्दी से छूट में ऊँगली करके शांत करना परे गए वर्ण दिल बेचैन रहे गए….”
गोविन्द ने धयान लगा लिया ेषणा की तरफ…
ेषणा की सोच… “जेसे मेने पिछले महीने भैया का लुंड रात को मुठी में लिया था… भैया सो रहे थे…. भैया को पता hi न चला… आज फिर दिल कर रहा हे… रात को तरय करूँ गई… प्रकाश भैया का इतना मोटा और बारे नहे जितना मोटा और बारे गोविन्द भैया का हे…”
ेषणा का ये रवैया समझ से बहार tha…magar गोविन्द आहिस्ता आहिस्ता सब समझ रहा था… एक राज़ की दुनिया थी जिस से सारे परदे उठ रहे थे… सेक्स की दुनिया… न रिश्तों को देखती हे और न hi मर्यादा और न hi सोसाइटी के नॉर्म्स को…
गोविन्द सोचने लगा… “के अगर मेरी मुलाक़ात साधु महाराज से न हुई होती और न मुझे ये शक्ति पर्पट हुई होती… तो में इस दुनिया को सिर्फ अपनी समझ और सोच के हिसाब से देखता रहता… एक ऐसी दुनिया के जिस में किसी की भी सेक्सुअल नीड्स की कोई अहमियत नहे हे… किसी और का चोरो, मुझे अपना भी पता नहे था के मुझे भी सेक्स से इतना लुत्फ़ और मज़ा आ सकता हे… और ये लुत्फ़, यह मज़ा, सब नशों से ज़यादा नशीला हे…”
गोविन्द सोचने laga…“mein ने आज रात तीन अलग अलग जगा धयान लगाना हे… बापू और माँ की तरफ, राजन काका और रुक्मणि की तरफ और सिमरन भैया और मल्टी भाभी की तरफ…”
Govind…“ye कैसे मुमकिन होगा…??”
फिर उससे ख़याल आया…
Govind…“Bapu और माँ तो रात का खाना जल्दी खा कर कमरे में चले जाते हैं 9 बजने से पहले पहले… रुक्मणि रात के 10 बजे तक अपने कमरे में जाती हे…. और सिमर भैया तो 8 बजे शराब पीना शुरू करते हैं और 11 या 12 तक पीते रहते हैं… तीनों जोरों का टाइम अलग हे तो ये मुमकिन हे…”
फिर गोविन्द को ेषणा का ख़य्यल आया…
Govind…“ye ेषणा क्या करती हे…?? आज रात देखते हैं…”
शाम होने लगी थी … के प्रकाश भैया और बापू घर आ गए… घर का दरवाज़ा बंद कर दिया गया…
माँ ने गोविन्द की बहादुरी का क़िस्सा कैलाश नाथ और प्रकाश को सुनाया… कैलाश खुश हुआ और बेटे को दुआ दी… प्रकाश उठ कर भाई से गले लग गया…
कैलाश नाथ… “गोविन्द बीटा, तुम ने जो लाला जीवट राम के पास शहर जाने का सोचा हे, इस बारे में तुम्हें रोकूं गए नहीं, लेकिन ख़याल रहे ये शहर के लोगों की मकारी समझ नहे आती… ”
कैलाश को सेठ गिरधारी लाल के द्वारा दिए गए दग़ा और धोका याद आ गया…
Govind…“Bapu, में शहर किसी को नुकसान पुहंचने के इरादे से नहे जा रहा… में तो बस ये चाहता हूँ के आगे पढ़ सकूँ और आप सब लोगों के लिए कुछ करूँ… मेरी नियत ख़राब नहे और न ही में किसी के खिलाफ कोई मंसूबा लेकर शहर जा रहा हूँ… अगर मेरी नियत ठीक हे तो मुझे डरने की ज़रुरत नहे..”
कैलाश नाथ को अंदाज़ा हो गया था के जवान खून हे इस को रोकना ठीक नहे… ये अपने हिस्से के तजरुबे और फैसले करे गए और अपनी ग़लतियों से सीखे गए… अगर भगवन ने चाहा तो सफल होगा…
Kailash…“Beta, मेरा और तुम्हारी माँ का आशीर्वाद सदा तुम्हारे साथ होगा…”
कैलाश ने अपनी पत्नी से कहा… “भगवान 5,000 गोविन्द को देदो ताकि जब ये शहर जये तो कुछ कपड़े और जूते अपने लिए ले ले…”
फिर सब ने मिल कर खाना खाया… और खाने के बाद भी कुछ देर तक बैठे बातें करते रहे… आज सब खुश थे…
रजनी ने अपने पति, कैलाश, की तरफ देखते हुए कहा के गोविन्द अप्प सब लोगों के लिए मिठाई भी लाया हे… और मिठाई निकाल कर सब को देदी…
कैलाश ने जब मिठाई मांगी तो रजनी ने मुस्कुराते हुए कहा…
Maa…“aji आप तो बर्फी कहते हैं न तो में ने आप के लिए बर्फी प्लाट में दूध के गिलास के साथ कमरे में रख दी हे… चलिए वहीँ चल कर खा लीजिए… बच्चों को आपस में बात करने दीजिये…”
कैलाश भी मुस्कुराते hue…“theek हे बचो… सुबह मुलाक़ात होगी…” और उठ कर दोनों पति पत्नी कमरे की तरफ चल दिए…