Kya Govind yunhi tarasta rahe ga - Page 7 - SexBaba
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Kya Govind yunhi tarasta rahe ga

EPISODE – 52

रिया पहले hi अपने कमरे में जा चुकी थी और उस ने स्लीवलेस निघ्त्य पेह ली थी… ब्रा और पंतय पहले से उतर चुकी थी… निघ्त्य भी ओने पीेछे थी जो के पीछे एक ज़िप को खोलने से पूरी उतर जाती… वर्षा और अक्षरा भी अपने अपने पति के साथ अपने कमरे में जा कर चेंज करके निघ्त्य पहन ली और सोने लगी… गोविन्द कमरे में आ कर नाईट सूट जो पहले से ढीला था उतर कर पूरा नंगा हो गया… वो पूरी तरह से तैयार था एक्शन के लिए… अब इंतज़ार करना उस के तन्ने हुए लुंड के लिए मुमकिन नहे था… सब के दिमाग़ चेक किये… कही से कोई इशू नहे था… सेठ, उस की पत्नी सो चुके थे… चेतन और बिपिन मदहोश थे… वर्षा और अक्षरा भी निघ्त्य पहन कर अपने अपने पति के पास लेट गयी थी… उस ने रिया के दिमाग़ में आ कर उस को गाइड करते हुए अपने कमरे में ले आया… रिया जेसे अंदर आयी… गोविन्द ने दरवाज़े को लॉक कर दिया…. रिया उस का तन तना तन लुंड देख कर शर्मा गयी और तिरछी नज़रो से देकने लगी…

रिया… “में वर्जिन हु…”

गोविन्द… “don’t वोर्री… बोहत प्यार से छोडूं गए अपनी जान को…”

छोड़ने का शब्द सुन कर रिया शरमाते हुए उस के गले लग गयी…

दोनों की बांहे और होंठ आपस में मिल गए… गोविन्द ने देर न करते हुए… उस की ज़िप खोल दी और निघ्त्य वही फर्श पे गिर गयी… अब दोनों hi नंगे थे पूरे के पूरे….

ठीक उसी शामे… अक्षरा बेचैन सी हो कर उठी… उस को घबराहट भी हो रही थी… उससे कुछ समझ नहीं आया तो अपने बीएड से उठ कर बहार निकल आयी… बिपिन तो बेहोश पारा था बीएड पर… और अक्षरा ने होल से वर्षा के कमरे का दरवाज़ा नॉक कर दिया… वर्षा भी जग रही थी… चेतन पूरी तरह मदहोश था और ज़ोर ज़ोर से खर्राटे ले रहा था… वर्षा ने दरवाज़े पर दस्तक सुनी तो उठ कर दरवाज़ा खोल दिया…

वर्षा… “तू यहाँ इस वक़्त…. क्या हुआ अक्षरा…??”

अक्षरा… “मुझे सख्त बेचैनी हो रही हे… क्यों न कुछ देर गोविन्द से बात कर लें… वो देखो उस के कमरे की लाइट ों हे… वो जग रहा हे…”

वर्षा… “बेवक़ूफ़… वो कोण सा हमारा सागा लगता हे जो रत के इस पहर उस के कमरे में चले जाएँ… वो क्या सोचे गए हमारे बारे में…”

अक्षरा… “दीदी वो बारे अचे सुबहो का लड़का हे… देखा नहे था वो तो हमें दीदी कह कर बुला रहा था… वो बुरा नहे समझे गए इससे… चलो न प्लस कुछ देर उस के साथ बाटे कर के फिर वापिस आकर सो जयें गए…”

वर्षा… “हम्म्म ठीक हे… चलो…”

वो दोनों गोविन्द के कमरे के दरवाज़े के बहार पोहंच गयी… और अक्षरा ने हाथ उठा लिया के दस्तक दे दरवाज़े पर… फ़ौरन से वर्षा ने उस का हाथ पाकर के रोक लिया… अक्षरा उस की तरफ आश्चर्य से देखने लगी… के क्यों रोका…

वर्षा… “मुझे अंदर से किसी की बात करने की आवाज़ आ रही हे… ठहरो…”

अंदर कमरे में… गोविन्द ने रिया को खरे खरे पलट दिया और पीछे से लुंड उस की गांड में दबाते हुए… उस के कान और गर्दन पर किश करने लगा और एक हाथ से उस के चुके दबाने लगा… और दूसरा हाथ उस से उसकी छूट को दबाने लगा…

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रिया को बोहत ाचा लग रहा था… “हम्म्म …. ऐसे hi छतो मेरी गर्दन… बोहत मज़ा आ रहा हे… हम्म्म… ाः आह” छूट पे हाथ महसूस कर के सिसकने लगी और उस की आवाज़ काफी बुलंद थी बहार साफ सुनी जा रही थी…

वो दोनों कमरे में दरवाज़े के बिलकुल पास थे…

वर्षा और अक्षरा भी कमरे के बहार दरवाज़े के बिलकुल पास थी… वो दोनों शादी शुदा थी… समझ गयी के अंदर क्या हो रहा हे…

अक्षरा… हेरात से … “अंदर लड़की कोण हे…???”

वर्षा… “शठ… आहिस्ता बोलो… रिया हे…”

अक्षरा का मुंह शॉक से खुल गया और उस ने अपने मुंह पर हाथ रख लिया…

वर्षा उस का हाथ पकड़ते हुए कमरे की साइड में बानी खिरकी की तरफ ले गयी… अंदर से खिरकी पर पर्दा ज़रा सा हटा हुआ था और अंदर का पूरा मंज़र नज़र आ रहा था… लाइट्स फुल ों थी कमरे की…

अंदर का नज़ारा देख कर दोनों की आँखें फटी की फटी रह गयी… दोनों अंदर नंगे थे… गोविन्द, रिया के पीछे खरा एक हाथ से उस के चुके दबा रहा था और दुसरे हाथ से छूट सेहला रहा था…

वर्षा और अक्षरा बट सी बन गयी… उन के कदम वही जम गए और आँखें गोविन्द के बदन पर… दोनों को साइड से गोविन्द का लुंड पूरा नहे दिख रहा था क्यों के उस का लुंड इस वक़्त… काफी सारा रिया की गांड की फैंको के अंदर ग़ुस्सा वह की सैर कर रहा था…

वर्षा… “रिया बेशरम को देखो… क्यों आयी यहाँ इस से छुड़वाने…”

अक्षरा… “रिया को चोरो… गोविन्द को देखो… इस का बदन कितना मज़बूत और खूबसूरत हे… इस का लुंड भी मोटा लग रहा हे…”

बहार की लाइट्स ऑफ थी और अंदर रौशनी फुल थी तो बहार से अंदर तो पूरा नज़र आ रह था मगर अंदर से बहार नहे देखा जा सकता था और वैसे भी पर्दा बस ज़रा सा हटा हुआ था मगर इस एंगल से हटा हुआ था के पूरा कमरा बहार से साफ साफ दिख रहा था…

रिया की छूट पूरी गीली हो चुकी थी… उस की छूट में अब एक ऊँगली अंदर बहार होने लगी थी… मज़े से रिया ने अपनी कमर दोहरी कर ली… और उस की गांड पूरे निशाने पर थी लुंड के… गोविन्द ने चुके वाला हाथ अपने लुंड पर रखते हुए जेसे hi लुंड गांड के छेद पर टिकाया वो उछाल कर सीढ़ी हो गयी… “यहाँ नहे डालो…”

वो समझ रही थी के गोविन्द उस की गांड में लुंड डालने वाला हे… गोविन्द हंसने लगा ये देख कर और फिर से उस के होंठ चूसने लगा…

रिया के पोजीशन चेंज करने की वजा से गोविन्द का लुंड पूरा नज़र में आया वर्षा और अक्षरा के… और दोनों के मुंह हेरात से खुल गए…

अक्षरा… “ये इंसान हे या बेल… इस का लुंड कितना बारे और मोटा हे…”

वर्षा… सहमति दिखते हुए… “हम्म्म…. पता नहे रिया कुंवारी हे या पहले लुंड ले चुकी हे… अगर कुंवारी हे तो इस की छूट आज पहात जये गई…”

और फिर बारे घोर से अंदर का मंज़र देखने लगी….

अब रिया अपने घुटनो पर बेथ कर लुंड को चूसने लगी…

कुछ देर के बाद गोविन्द ने उस के चेहरे को दोनों तरफ से पाकर कर एक जगा रोक लिया और अपने लुंड से उस के मुंह को छोड़ने लगा…

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फिर गोविन्द ने पूरा लुंड उस के मुंह में दाल दिया…

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अब थूक निकलने लगी थी… रिया के मुंह से….

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और उस को मुश्किल हो रही थी पूरे लुंड को मुंह में लेने से… नहीं लिया जा ारः था मुंह में…

बहार: वर्षा… “पूरी रांड हे साली कैसे चूस रही हे…”

अक्षरा अपने होंटो पर ज़बान फेरते हुए… “हम्म्म इस को ाचा लग रहा हे ये लुंड अपने मुंह में… मज़े से चूस रही हे…”

मुखछोडन की रफ़्तार बढ़ने लगी और फिर रिया बर्दाश्त न कर सकीय और उस का गाला जेसे बंद सा होने लगा था और आँखों से आंसू आ गए… उस ने फ़ौरन अपना मुंह चुराया और ज़ोर ज़ोर से खांसने लगी… कुछ साँस बहाल होने के बाद… “जान ज़ुल्म तो न करो… प्यार से करो न…”

और उठ कर उस के गले लग गयी…. अब गोविन्द ने उस को अपनी बांहो में उठाते हुए बिस्तर पे लिटा दिया… और उस के बराबर में लेट कर उस की छूट के दाने को सहलाने लगा… और सहलाते सहलाते उस की छूट में ऊँगली करने लगा… छूट पूरी गीली थी… रिया ने आँखे बंद कर ली और पूरा आनंद ले रही थी… इस लम्हे का….

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वर्षा… “ये कुंवारी हे… सिर्फ एक ऊँगली जा रही हे इस की छूट में…”

अक्षरा… “हम्म्म… इस को बोहत मज़ा आ रहा हे…” और एक हाथ से अपनी छूट को सहलाने लगी…

गोविन्द उस की छूट में ऊँगली करने के साथ साथ उस के चुके भी चूसने लगा… और कुछ देर के बाद उस के निप्पल पर काट भी रहा था…. Aaah…aaah…aah…aaah….aaah…mmmm…aaammm.. सिसकिया निकल रही थी रिया के मुंह से… गोविन्द ने उस के होंटो को भी चूसना शुरू कर दिया… और अब हाथ से उस की छूट को रगड़ने लगा… और फिर से एक ऊँगली अंदर दाल दी और अंगूठे से छूट के डेन को दबाने लगा…

आआह…. Aaaa……aaa….mmmm….mmmaamm…. aaa…mmm… उस ने अपना पूरा मुंह खोल लिया… गोविन्द भी अब उस को देखने लगा के कितने मज़े में हे वो…

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और अपनी टंगे आपस में जोर कर उस के हाथ को दबाने लगी टैंगो में और अपनी छूट को ऊपर उठाने लगी और फिर एक ज़ोरदार चीख के साथ झरने लगी…. एक पानी का फुवारा निकल पारा और छींटे फर्श पर दूर जा कर गिरे… रिया बारे ज़ोर से झरि थी… और उस का जिस्म अब तक झटके खा रहा था… उस ने एक हाथ से गोविन्द का बाज़ू दबोच लिया और अपने नाख़ून गर दिए उस की खाल में…

वर्षा… मज़े से सिसकी लेते हुए… “मममम अअअअअअअ… ककक… बोहत मज़ा आया हे इस को….” और अपनी छूट सहलाने लगी निघ्त्य के ऊपर से… अक्षरा पहले hi अपना हाथ अपनी निघ्त्य की छड़ी में दाल चुकी थी…

रिया कुछ देर बेसुध रही… गोविन्द ने जब उस के चुके फिर से चूसने स्टार्ट किये तो उस को होश आया और उस ने अब गोविन्द के लुंड की तरफ हाथ बढ़ा दिया जेसे अब उस को इस मुसल को अपने वश में करना था… गोविन्द उस के उतावले पैन को देखते हुए खुद लेट गया और रिया को खेंच कर 69 की पोजीशन में ले आया… उस के मुंह में लुंड दे कर खुद उस की छूट चाटने लगा…

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रिया की साडी शर्म अब ख़तम हो चुकी थी वो पूरे मज़े से गोविन्द के लुंड को चूसने लगी… गोविन्द भी उस के चूतरो को पूरा खोलते हुए… उस के छेद और छूट दोनों के ऊपर ज़बान फेरने लगा… गोविन्द ने देखा के जब वो गांड के छेद पर और छूट के डेन को छत्ता हे तो रिया उछाल जाती हे तो उस ने इन दोनों जगा को टारगेट कर लिया…

अब अक्षरा से बर्दाश्त न हुआ और उस ने अपनी पंतय उतर कर हाथ को छूट पे ज़ोर ज़ोर से मसलते हुए कहा… “दीदी… में अंदर जा रही हु… उन के साथ में भी करू गई…”

वर्षा अपनी छूट को मसलते हुए… अपनी अध् खुली आँखों से अक्षरा को जाते हुए देखा और बेबसी से अपनी छूट को और ज़ोर से मसलने लगी…
 
EPISODE – 53

रिया की साडी शर्म अब ख़तम हो चुकी थी वो पूरे मज़े से गोविन्द के लुंड को चूसने लगी… गोविन्द भी उस के चूतरो को पूरा खोलते हुए… उस के छेद और छूट दोनों के ऊपर ज़बान फेरने लगा… गोविन्द ने देखा के जब वो गांड के छेद पर और छूट के डेन को छत्ता हे तो रिया उछाल जाती हे तो उस ने इन दोनों जगा को टारगेट कर लिया…

अब अक्षरा से बर्दाश्त न हुआ और उस ने अपनी पंतय उतर कर हाथ को छूट पे ज़ोर ज़ोर से मसलते हुए कहा… “दीदी… में अंदर जा रही हु… उन के साथ में भी करू गई…”

वर्षा अपनी छूट को मसलते हुए… अध् खुली आँखों से अक्षरा को जाते हुए देखा और बेबसी से अपनी छूट को और ज़ोर से मसलने लगी…

अक्षरा जैसे hi कमरे के बहरी कोने पर पोहंची … और दरवाज़े की तरफ मरने वाली थी के… वर्षा को होश आया और वो लपकी और अपनी बहन का बाज़ू पाकर लिया… “होश करो अक्षरा… वो दोनों हो सकता हे तुम को देखते अपना काम ऐसे hi ख़तम कर दें… और तुम्हारी दखल अंदाज़ी उन को पसंद न ए… मत भूलो के हमारी इस घर में क्या हैसियत हे और रिया हमारी ननद हे… गोविन्द सब की आँख का तारा हे… तुम और में क्या हैं… प्लस शांत हो जाओ… मेरी बहन…”

अक्षरा… को अपनी बहन की बातें ठीक लगी और वो उस के गले लग कर रोने लगी… और वर्षा उस को चुप करने लगी और उस को बस एक hi तरीक़ा सूझा अक्षरा को चुप करने का…

वर्षा… “यार अक्षरा… आज बरी मुश्किल से इतना शानदार कामुक मंज़र देखने को मिल रहा हे और तुम इस को एन्जॉय करने के बजाये रोये जा रही हो…” वर्षा अपनी छोटी बहन को बोहत प्यार करती थी और वो जानती थी के वो सही हे… जिस्म की प्यास उस को भी बोहत तंग करती थी… वो हमेश अपने आप को काबू में रखती थी… मगर आज तो वर्षा के सबर का पैमाना भी लबरेज़ हो गया था… और इस बार वर्षा ने अक्षरा को खिरकी के आगे करते हुए खुद उस के पीछे आ गयी और ज़िन्दगी में पहली बार वो किया जो उस ने कभी नहीं किया था… उस ने अक्षरा के पीछे खरे हो कर उस की गांड के साथ अपनी छूट रगरते हु अपने हाथ से अक्षरा की छूट सहलाने लगी…

इस से अक्षरा बोहत खुश हुई और प्यार भरी नज़रो से वर्षा को देखा और दोनों बहने मुस्कुराने लगी… और फिर से अपनी नज़रें लगा दी अंदर के नज़ारे पर…

अंदर गोविन्द ने रिया को बोहत उत्तेजित कर दिया था उस के छेद और छूट के डेन को चाट चाट कर… वो अब खुल के गोविन्द से कहने लगी थी…

रिया… “आह हम्म्म मममम मेरी जान ममम बस अब और नहे… में मर जॉन गई अब अपने इस को मेरे अंदर डालो… मममम ाहह्ण नहे बर्दाश्त हो रहा जणू… डालो…. छोड़ो मुझे प्लस… छोड़ो…”

गोविन्द ने अब उस को नीचे लिटाते हुए उस के होंटो पर प्यार किया और बोलै…

गोविन्द… “मेरी जान… में बोहत प्यार से करू गए फिर भी पहली बार पैन होता हे तो थोड़ा बर्दाश्त करना…”

रिया… “हाँ मुझे पता हे… बस जल्दी डालो अंदर… तरपओ मत…”

रिया की टंगे खोलते हुए… गोविन्द ने लुंड को कई बार छूट के सूराख पर ऊपर नीचे घुमाया और हलके हलके टोपी को अंदर घुसाने लगा… रिया थोड़ा सा चटपटे और उस का मुंह खुल गया… थोड़ा सा दर्द उससे महसूस हुआ और उस ने अपने हाथ गोविन्द की छाती पर रख कर उससे रोका और कहा … “थोड़ा ठहरो…. मममम ोीी…”

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गोविन्द थोड़ी देर के लिए रुक गया…

बहार… अक्षरा… “उफ़ दीदी रिया का क्या होगा…”

वर्षा जो के अक्षरा की छूट के डेन को सेहला रही थी… “कुछ नहे होगा मेरी जान… दर्द तो होगा पर बर्दाश्त कर लेगी… आज तक कोई लड़की छुड़वाने से नहे मरी…”

दोनों हलकी आवाज़ में हंसने लगी… और अब अक्षरा ने अपना हाथ पीछे ले जाते हुए वर्षा की भी छूट सेहलनि शुरू कर दी…

अंदर कमरे में गोविन्द कुछ देर उस के होंठ चूसने के बाद फिर से थोड़ा सा दबाओ बढ़ाने लगा… टोपी का कुछ हिस्सा पहले hi अंदर जा चुक्का था… और फिर एक हल्का सा झटका मारा तो लुंड कुछ मज़ीद आगे दाखिल हो गया… रिया ने हलकी सी चीख मरी और उस के बाज़ू ज़ोर से पाकर लिए…

गोविन्द फिर से रुक गया और इस बार उस के दिमाग़ में जा कर उस को शांत किया… और उस के चुके चूसने लगा… कुछ देर के बाद रिया कुछ पुरसुकून नज़र आयी तो इस बार ज़रा ज़यादा ज़ोर का झटका मारा और उस का पूरा लुंड अंदर चला गया… और साथ hi उस ने अपने होंठ फ़ौरन से रख दिए रिया के होंटो पर तो उस की चीख डाब गयी… मगर आँखों से आंसू और साथ साथ बदन में छटपटाहट हो रही थी… उस का जिस्म कम्प रहा था… दबी दबी घुटी घुटी… चीखें निकल रही थी… oiii..mmm…ummm ोीी.. ममम… आयी… निकल बाहर… ोीी… में नई करना… ोीी निकालो… बाहर… ोोोीी…

गोविन्द उस को शांत करने के साथ उस के होंठ चूसता रहा और चकचे भी हाथो से दबाने लगा…

काफी देर के बाद रिया कुछ बेहतर हुई और अपनी आँखे बंद कर ली तो गोविन्द, जिस का लुंड पूरा छूट के अंदर था, वो अब लेट गया उस ऊपर और उस के होंटो चूमने लगा….

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रिया ने भी टंगे और चोरी कर के उस के नीचे अब अपनी गांड हिलने लगी… बस गांड को नीचे से घुमा कर उस के लुंड को अपनी ग्रिफ्ट में ले रही थी जेसे के कोई अपराधी हो और उस को ग्रिफ्तार करना हो…

फिर गोविन्द ऊपर को हुआ और एक बार आहिस्ता से लुंड पूरा बहार निकला सिर्फ टोपी अंदर रहने दी और फिर से बिलकुल आहिस्ता से पूरा अंदर डाला और इस तरह से पूरा बहार और फिर पूरा अंदर मगर बोहत आराम से… इस से रिया की छूट और पानी चोर्ने लगी और अब रिया ने आँखे खोलते हुए कहा के अब ठीक हे और अब उस की सिसकिया मज़ा लेने वाली थी… ाः… ऐसे… छोड़ो… हम्म्म मां.. बोहत ाचा लग रहा हे…

अब गोविन्द ने ढको की स्पीड बढ़ा ली और आधे लुंड के साथ छोड़ने लगा… मगर तेज़ स्पीड से…

अक्षरा… “ये तो पूरा लुंड ले गयी…”

वर्षा… “में ने कहा था न के लुंड लेने से कोई लड़की नहे मरती चाहे कितना बारे और मोटा हो…”

दोनों फिर से मुस्कुराते हुए एक दुसरे की छूट को सहलाने लगी…

गोविन्द ने काफी आनंद लेने के बाद उस को पलट दिया और रिया को उस के घुटनो पर बिठाते हुए उस के पीछे आ गया और पीछे से उस की छूट में लुंड दाल दिया….

रिया दर्द से कराहने लगी… उस को इस पोजीशन से बोहत दर हो रहा था…

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जब दर्द रिया की बर्दास्त से बहार हो गया तो बोली… “दर्द हो रहा हे यार बोहत… ऐसे नहीं छोड़ो… अभी थोड़ी छूट और खुलने दो फिर जैसे चाहे छोड़ लेना…”

गोविन्द ने उस की बात मानते हुए उस को पहलु के बल लिटा दिया और उस की एक तंग उठा कर नीचे से लुंड दाल दिया और आराम से अंदर बहार करने लगा और साथ साथ उस के चुके भी दबाने लगा…

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और साथ साथ दोनों एक दुसरे को किश भी कर रहे थे… अब रिया मुस्कुरा रही थी और बोहत खुश थी…

अक्षरा… “देखो न दीदी… रिया कितनी खुश हे…”

वर्षा… “हाँ… खुशनसीब हे वो जो इस की किस्मत में गोविन्द का लुंड हे…” अब वो भी बोहत दुखी हो चुकी थी…

गोविन्द इसी तरह उस के साइड में लेता उस को छोड़ता रहा और साथ सतह हाथ बढ़ा कर बग़ल से उस के चुके दबा रहा था… और फिर उस ने हाथ रख दिया रिया के छूट के दाने पर… और उससे मसलने लगा…

रिया ने मज़े से आँखे बंद करते हुए… छोड़ो मेरे राजा… ऐसे hi छोड़ो… साडी रत छोड़ो… में बस आज से तेरी घुलम… राजा… ो मेरे राजा… आ ाः आए ाः….

और फिर से वो झरने लगी… गोविन्द का हाथ और बाज़ू ज़ोर से पाकर कर बोहत ज़ोर से मज़े से चीखती हुई झटके लेने लगी और फिर से पानी की छींटे फर्श पर भी जा गिरे… ोीीी…. ाःमममम…. ोीीी…. मममममआ…. ाअम्मणमममन्त्र…. गोविन्द राजा…. ममममम मममम मममम ोीोीी…

अक्षरा… “दीदी प्लीज कुछ करो न… हम भी गोविन्द से छुड़वा लें किसी तरह…”

वर्षा… “हाँ… तू ठीक कह रही हे… कुछ तो करना परे गए… मेरा भी बोहत मन हो रहा हे इस घाबरू से छोड़ने का…”

अब दोनों बहने एक दुसरे के होंटो को चूमने लगी… ये पहली बार था उन दोनों के बीच इतने सरे परदे इतनी जल्दी उठ गए थे…

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EPISODE – 54

गोविन्द ने धुआं धार चुदाई के बाद रिया को फ़ारिग़ कर दिया… रिया का चरमसुख पर पोहचने का अंदाज़ बारे आकर्षित था वो ज़ोर ज़ोर से चीखती हुई झरती थी और उस का पानी भी ताक़त के साथ बहार फुवारा चोरता था और रास के छींटे दूर तक जाते थे…

इस सब मंज़र को देखते हुए… वर्षा और अक्षरा न सिर्फ एक दुसरे की छूट को सहलाती रही और अब तो एक दुसरे को किश भी करने लगे थी…

दोनों बहने एक दुसरे के होंटो को चूमने लगी… ये पहली बार था उन दोनों के बीच इतने सरे परदे इतनी जल्दी उठ गए थे… और दोनों बहने सहमत थी के गोविन्द से छोड़ना हे… कब और कैसे ये सब शामे तय करे गए…

रिया अब बिलकुल शांत थी और उस ने अपना चेहरा रख दिया गोविन्द के सीने पर… मगर गोविन्द ने उस को यद् दिलाया… “मेरी जान… में अभी डिस्चार्ज नहे हुआ…”

रिया… “यार अब में क्या करू… नीचे दर्द हे और अब हिम्मत भी नहे.. दो बार तो में फ़ारिग़ हुई हूँ… और शर्माने लगी…”

गोविन्द उस की समस्या समझ रहा था और जनता था के पहली बार जो लड़की चुदती हे उस के साथ नरमी से पेश आना hi ठीक हे… और कहा… “ठीक हे जणू तुम इसे चूस कर शांत कर दो…”

गोविन्द अब लेट गया बीएड पर और रिया ने उस के पास बेथ कर लुंड को साफ किया अपनी निघ्त्य से थोड़ा खून लगा हुआ था… उस की अपनी छूट पर भी खून लगा हुआ था और कुछ छींटे बीएड शीट पर भी थे… लुंड साफ करके उस ने लुंड अपने मुंह में ले लिया और ज़ोर ज़ोर से चूसने लगी….

वर्षा… “गोविन्द अब तक डिस्चार्ज नहे हुआ… बरी जान हे इस के लुंड में…”

अक्षरा… “दीदी ये तो एक साथ हम दोनों को भी छोड़ सकता हे… इस के अंदर बरी जान हे… उफ़ काश में रिया की जगा इस विशाल लुंड को चूस रही होती…”

वर्षा… “बस कुछ सबर और कर लो… कुछ सोचती हु में…”

गोविन्द अब आराम से लेता लुंड चुसवाते हुए सोच रहा था के आशा की छूट ज़यादा टाइट थी… ये रिया अपनी छूट में ऊँगली करती रही थी इस लिए इससे छोड़ना ज़रा आसान था… और साथ साथ उस ने ये भी तुलना की के रिया के अंदर बर्दाश्त ज़यादा हे… और इस ने दर्द को अचे तरीके से सहा…

फिर रिया ने लुंड चूसते चूसते उस की गोलिओं को भी सहलाना शुरू कर दिया… कुछ देर के बाद गोविन्द के मुंह से एक आह निकली और उस के लुंड से मलाई निकलने लगी… रिया के लिए ये पहला मौक़ा था और पहले तो उस ने कुछ बहार निकल दी… फिर चाटने लगी… पूरी तरह साफ करने के बाद… अपने ज़बान से चटखारे लेने लगी… गोविंद ये देख कर हंसने लगा…

गोविन्द… “किसी हे मलाई…”

रिया… मुस्कुराते हुए… ज़बान चटकाते हुए… “हम्म्म बोहत टेस्टी…”

और फिर से लेट गयी उस के सीने पर सर रख के…

वस्र्शा और अक्षरा भी फ़ारिग़ हो गयी थी आज इन दोनों की छूट ने भी ढेर सारा पानी छोरा था…

वर्षा… “पता नहीं केसा टास्ते होता हे लुंड के रास का… हमें तो न कभी लुंड चूसने का मौक़ा मिला न इस राबड़ी जेस्सी मलाई को खाने का…”

अक्षरा… “दीदी बस अब देख लो तुम ने प्रॉमिस किया हे हमारी आग ठंडी करने के लिए कुछ करो… आज मुझे रोक लिया था वर्ण में तो चली जाती अंदर…”

वर्षा… “ठीक हे मेरी जान बस अब चलो अपने अपने कमरे में चलते हे… रिया भी अब बहार निकले गई अपने कमरे में जाने के लिए…”

अक्षरा… बुरा सा मुंह बनाते हुए… “दीदी आज नींद बिलकुल नहे ए गई… इस गोविन्द ने तो हमारी उलझने और बढ़ा दी हैं…”

वर्षा… “बस मेरी जान… आज की रत निकल लो… कल कुछ करती हूँ…”

फिर अक्षरा ने अपनी पंतय ज़मीन पर से उठाई और दोनों बहने अपने अपने कमरे को चली गयी…

गोविन्द… रिया के बालो में उंगलिया फेरते हुए… “केसा लगा मेरी जान…”

रिया… “बोहत बोहत ाचा… बोहत मज़ा आया…”

रिया… अपना सर थोड़ा सा ऊपर उठाते हुए… “इतने दिन कहाँ ग़ायब थे… मिले क्यों नहे…”

गोविन्द… “यार कुछ झमेलों में फँस गया था… सॉरी यार…”

रिया… “में बोहत नाराज़ थी तुम से… मगर आज तुम ने मेरा दिल जीत लिया हे इतना मज़ा दिया हे मुझे…”

गोविन्द… “अब तो नाराज़ नहे हो न…”

रिया… “नहे मेरी जान… अब तो में बोहत खुश हु… ऐसा लग रहा हे जैसे हवाओं में ुर्र रही हु…”

गोविन्द… “तो एक बार फिर करें…”

रिया… “नहे मेरी जान… अगर हिम्मत होती तो में कभी मन न करती… अब वाक़ई टैंगो में जान नहे हे और वह पर दर्द भी हे… एक दो दिन लगे गए ठीक होने में… फिर जितना मर्ज़ी ए करना…”

रिया… “एक बात पूछू… नाराज़ तो नहे होंगे…”

गोविन्द… “पूछो… तुम तो जान हो मेरी… तुम से क्यों नाराज़ होने लगा…”

रिया… “वो मेरी फ्रेंड हे न शबाना…. उस को भी छोड़ लो ना…”

गोविन्द… “ाचा उस का बाद में सोचे गए… क्यों उस ने कहा हे क्या…”

रिया… “नहे उस ने अपने मुंह से नहे कहा मगर उस दिन की मुलाक़ात के बाद न वो हंसती हे न ज़यादा बोलती हे… खामोश सी हो गयी हे… वो मेरी बचपन की दोस्त हे… में जानती हु के वो भी तुम से छोड़ना चाहती हे…”

गोविन्द… “अगर ऐसी बात हे तो कुछ न कुछ तरीक़ा ढूंढते हैं…”

रिया …. “मगर उस से मिलने में सावधान रहना परे गए क्यों के उस का भाई बोहत खतरनाक फाइटर हे…”

गोविन्द… “कोण हे उस का भाई… क्या नाम हे उस का…”

रिया… “मुश्ताक़ पहलवान…”

गोविन्द ने कुछ न कहा चुप रह कर मुस्कुराने लगा… “hi ऋ क़िस्मत… कैसे खेल हे तेरे… आज यहाँ रिया से मुलाक़ात हो गयी और उधर शबाना निकल आयी मुश्ताक़ पहलवान की बहन…

थे वर्ल्ड इस सो स्माल…”

रिया… “शबाना के माँ और बाप दोनों नहे हे बस एक भाई हे उस के साथ रहती हे…”

फिर अचानक से रिया बोली… “मेरी जान… अब उठो… में ज़रा ये चादर साफ कर दूँ… सुबह भाभी न देख ले… और मुझे सुबह यूनिवर्सिटी भी जाना हे… शबाना को सारा क़िस्सा भी सुनौ गई… बोहत मज़ा ए गए… कल आओ गए यूनिवर्सिटी मिलने…??”

गोविन्द ने बीएड से उठाते हुए कहा… “एक दो दिन ठहर जाओ… कुछ तुम्हारी हालत भी ठीक हो जये फिर मिलते हे…”

रिया बीएड शीट को उतर कर वाश रूम से साफ कर के आयी और बीएड पर बिछा दिया… चाल में तरोई सी लंगड़ाहट थी… अपनी निघ्त्य उठा कर कमरे का दरवाज़ा खोल के बहार झाँका… बिलकुल ख़ामोशी देख कर गोविन्द को bye करती अपने कमरे में चली गयी… इस वक़्त 1 बज रहा था….

गोविन्द भी फ्रेश हो कर सो गया… ढीला सा नाईट सूट पहन कर… सोते वक़्त वो सोच कर सोया था के कल कॉलेज शायद बंक करना परे…

वर्षा और अक्षरा को साडी रत नींद न आयी… वो सुबह सवेरे उठ जाती थी और दोनों सब घर वालो का नाश्ता टायर करती थी… सास और ससुर और रिया जल्द नाश्ता कर लेते थे… 8 बजे रिया यूनिवर्सिटी, ससुर ऑफिस और सास मंदिर चली जाती थी… 11 बजे तक सास की वापसी होती थी … उसी वक़्त बिमला (माइड) भी आ जाती थी… दोनों के पति भी 10 – 11 तक उठ कर तैयार होते और ऑफिस निकल जाते…

गोविन्द 8 बजे से ज़रा पहले जाग गया था मगर था अब भी बिस्तर में था… और सेठ गिरधारी लाल, उन की पत्नी और रिया के निकलते hi वर्षा के दिमाग़ में पोहंच गया… वह पोहंच केर फिर से उस को झटका लगा के उस की दोनों बहनो ने रात को उस की और रिया की पूरी चुदाई देख ली थी और वो दोनों बोहत डिस्टर्ब थी… और गोविन्द से छोड़ना चाहती थी… अक्षरा दीदी की ओर उस का मन पहले से आकर्षित था उस वक़्त से जब उस ने दीदी के दिमाग़ से उस को नहाते देखा था… मगर वो इस वक़्त कुछ कंफ्यूज सा था के क्या उस को अपनी डीडीओ के साथ जिस्मानी सम्बन्ध बनाना चाहिए या नही…
 
EPISODE – 55

फिर उस ने एक फैसला ले लिया के उस की दिदिया शादी शुदा हैं और अगर वो उन के मन को शांति देने के लिए कुछ कर सकता हे तो ज़रूर करे गए… उन को वो किसी दुःख या तकलीफ में अकेले तो नहे चोर सकता था न… वैसे भी वो जान चुक्का था के उन के पति दिल के बुरे नही बस शराब और आयाशी की वजा से अपने आप को तबाह कर लिया हे और वो अब इस क़ाबिल नहे रहे के औरत को संतुष्ट कर सके… सास भी अचे सुभाऊ की हे बस अगर प्रॉब्लम इस घर में हे तो वो सेठ गिरधारी लाल जो के एक लालची और अहंकार से भरा हुआ इंसान हे… उस की रुपए पैसे की हवस रिश्तो से बढ़ कर हे… वो अगर चेंज हो जये तो ये घर ठीक हो सकता हे… इस लिए वो अपनी डीडीओ को अकेला न चोर्ने का फैसल कर चुक्का था…

वो फिर से अक्षरा दीदी के मन में गया तो वो बोहत परेशां थी के कैसे वर्षा दीदी गोविन्द को रिझाये गई… फिर वो वर्षा दीदी के दिमाग़ में गया तो देखा के उस ने आज बोहत hi खुले गले की क़मीज़ पहनी हे जिस में से आधे से ज़यादा चुके नज़र आ रहे थे… और साथ साथ टाइट लेग्गिंग भी इस तरह से थी के उस के चूतर पूरी तरह से उभर कर अपना दिलकश आकर दिखा रहे थे…

जब तक उस की सास और सुसार थे तब तक उस ने साड़ी के पलु से सीने को अछि तरह से ढाका हुआ था और ये लोग चले गए तो उस ने फटाफट च्ये बना ली और अक्षरा को कहा के वो गोविन्द के पास जये गई च्ये ले कर और उस को अपने जलवे दिखाए गई… देखते हे वो क्या करता हे…

अब गोविन्द को भी इस खेल में मज़ा आ रह था… वो सोता सा बन गया और इन सब बातो के बारे में सोचते सोचते उस का लुंड तो पहले hi से खरा हो चुक्का था… उस ने चादर ऊपर से हटा कर… अपने नाईट सूट के पजामा को इस तरह से कर दिया के पेट के नीचे का हिस्सा जहाँ से बल शुरू होते हे लुंड के वो दिख रहे थे और लुंड का उभर भी बारे क्लियर था पजामा में से…

वर्षा ऊपर आयी और दरवाज़ा नॉक किया तो अंदर से कोई आवाज़ न आयी तो उस ने हैंडल को घुमाया… दरवाज़ा खुल गया… अंदर से लॉक नहे था…

गोविन्द इस तरह से सो रहा था के उस के जिस्म का निचला हिंसा बिलकुल सीधा था… टंगे खुली हुई… मुंह के ऊपर एक बाज़ू रखा था जेसे सोते में रख लेते हे… मगर एक आंख थोड़ी सी खुली थी और वो सब देख रहा था…

वर्षा के हाथ में छाए का कप था… वो उस ने साइड टेबल पर रख दिया और ग़ौर से खरे लुंड को देखने लगी… वर्षा को लुंड के पास के छोटे छोटे बल नज़र आ रहे थे… उस के सरे जिस्म में जेसे करंट डरने लगा… और रत का मंज़र फिरने लगा उस के दीमघ में… बारे, मोटा और विशाल लुंड…. अभी भी खरा था… उस को ऐसा लगा जेसे फिर से मंज़र हे रत का और वो रिया हे… उस ने एक खाव्ब वाली हालत में जाते हुए… लुंड पर हाथ फेरा… लुंड ने कोमल सा स्पर्श अपने ऊपर पते hi एक झटका खाया… वर्षा को उस झटके कहते लुंड का स्पर्श आकर्षित कर गया और उस ने हाथ से लुंड को पाकर लिया… फिर देखा गोविन्द की तरफ जो के सो रहा था…

अब वर्षा वही बीएड के पास बेथ गयी और अपना दूसरा हाथ लुंड के छोटे छोटे बल पर फेरने लगी…

उस की छूट गीली होने लगी….

उस का हाथ बालो के पास से थोड़ा सा अंदर को सरका तो ढीले नाईट सूट की ढीले पाजामे में उस की उंगलिया जा टकरई लुंड की जार से… उस ने अपनी आँखे बंद कर लीं… ाः… सिसकी निकल गयी उस के मुंह से… उंगलिया कुछ और आगे को बढ़ी… सख्त लुंड के निचले हिस्से से टकराई… वर्षा ने अब हिम्मत दिखते हुए… अपना पूरा हाथ पजामा के अंदर डालते हुए… उस के लुंड को थम लिया और उस पल को जीने लगी… उससे ऐसा महसूस हुआ जेसे के अब वो ज़िंदा हे… जब तक ये लुंड उस के हाथ में हे तब तक वो ज़िंदा हे… जैसे hi ये लुंड उस के हाथ से निकले गए… इस की सांसे बंद हो जये गई…

वर्षा भी जज़्बात में आ कर अपनी छूट सहलाने लगी दुसरे हाथ से… और हाथ से हल्का सा दबाओ दाल दिया लुंड पे…

गोविन्द जो के पहले hi लाज़त से भरे अनुभव के आनंद में था… उस के मुंह से… ममममम… हलकी सिसकी निकल गयी…

वर्षा जैसे दर सी गयी और जल्दी से हाथ बहार निकल लिया… हाथ जल्दी से बहार निकलने की वजा से ढीले पजामा में से लुंड पूरा बहार आ गया… वर्षा मज़ीद घबरा गयी… उसे ऐसा लगा के जैसे गोविन्द जग गया हे… उसे और कुछ समझ न आया तो वो गोविन्द के पास आते हुए… गोविन्द का बाज़ू पाकर कर हिला दिया… और बोली… “गोविन्द छाए ले लो…”

गोविन्द जिस को वर्षा का हाथ अपने लुंड पर बोहत आकर्षित लग रहा था उसे एक आईडिया सूझा… और उस ने ऐसे बेहवे किया जैसे के वो नींद में हो और रिया उसे छाए देने आयी हो… आँखे बंद रखते हुए बोलै… “ओह रिया थैंक ु तुम ने मेरा कहा मानते हुए यूनिवर्सिटी नहीं गयी” और वर्षा को कमर से पाकर कर बीएड पर लिटा दिया अपने साथ… और आँखे बंद रखते हुए जल्दी से वर्षा के होंटो पर अपने होंठ रख कर चूसने लगा…

वर्षा कुछ भी न समझते हुए बस इतना समझ सकीय के गोविन्द नींद में हे और उस को रिया समझ रहा हे… वर्षा अपने आप को उसे सौंपते हुए उस की किश का भरपूर जवाब देने लगी… क्यों के वो भी यही तो चाहती थी के गोविन्द के साथ कुछ सन बन जये… और मौक़ा मिले… बात आगे बढ़े… और दोनों बहने उस से छुड़वा सकें…

वर्षा ने भी अपनी आँखे बंद कर ली और बहरपुर अंदाज़ में उस की ज़बान को चूसने लगी और अपना एक हाथ फिर से उस के लुंड पर रख के… सहलाने लगी…

गोविन्द ने अपनी आँखे बंद राखी और होल से बोलै “आह रिया…” और अपने एक हाथ से वर्षा की छूट को पहले लेग्गिंग के ऊपर से मसला और फिर इलास्टिक वाली लेग्गिंग को नीचे करते हुए एक ऊँगली पूरी की पूरी वर्षा की पानी चोरटी छूट में दाल दी…

वर्षा तो जैसे जानत में पोहंच गयी और गोविन्द की मोती ऊँगली भी उस के लिए काफी थी और उस पे अपनी छूट को रगड़ने लगी…

नीचे किचन में अक्षरा परेशां थी के दीदी को इतनी देर क्यों लगा गयी… फिर उस से सबर न हुआ तो वो ऊपरी फ्लोर पर गोविन्द के कमरे की ओर बढ़ गयी और कमरे में दाखिल हो कर रोमांचक मंज़र को देखते हुए ये समझ बैठी के वर्षा दीदी ने गोविन्द को राज़ी कर लिया हे…

और तेज़ी से अपनी साड़ी उतर फेंकी और अब वो सिर्फ एक ब्लाउज और पेटीकोट में थी… और लेट गयी बीएड पर गोविन्द के पीछे और पूरा बदन उस से सताते हुए… अपना हाथ वर्षा के हाथ के साथ जोरते हुए गोविन्द का लुंड पाकर लिया… वर्षा के हाथ के साथ… और अपने होंटो से उस की गार्डन चाटने लगी…

अक्षरा के बीएड पर लेटने से गोविन्द को तो कोई अचम्भा न हुआ मगर वर्षा ने आँखे खोल कर देखा उस की तरफ और अक्षरा को हटाने के लिए आँखों से इशारे करने लगी… मगर अक्षरा क्यों देखती उस की तरफ… वो भी आँखे बंद किये गोविन्द की गार्डन चाट रही थी… अपने चुके उस के कमर पर रगरते हुए उस के लुंड को सेहला रही थी…

वर्षा के होंठ जुड़े हुए थे गोविन्द के होंटो के साथ वहां से उस ने न हटाए… मगर अपना हाथ लुंड से उठाते हुए अक्षरा को अपने हाथ से हिलाते हुए अपनी तरफ तवजा कराई…

अक्षरा ने आँखे खोल के बहन की तरफ देखा तो वर्षा उससे आँख के इशारे से वह से जाने का कह रही थी… इस बात पे अक्षरा को घुसा आगया…

और वो वही लेते लेते बोली.. “क्यों दीदी ये क्या सिर्फ तुम्हे चोदे गए और में ऐसे hi प्यासी राहु गई…”

अब गोविन्द को यही ठीक लगा के आँखे खोले और मामले को संभाले….

तो गोविन्द ने एक्टिंग करते हुए अपनी आँखे खोली और अपने होंठ हटाए वर्षा के होंटो से मगर अपनी ऊँगली नहीं निकली उस की छूट से और बोलै… “ओह्ह्ह्ह दीदी आप… रिया कहा गयी…??”

वर्षा भी पूरी तरह से गरम थी… इस लिए वो न उठी वहां से न गोविन्द की ऊँगली निकली अपनी छूट से… बोली धीमी आवाज़ में… “रिया नहीं हे यहाँ… वो तो यूनिवर्सिटी चली गयी… तुम ने मुझे रिया समझ कर पाकर लिया था…”

अब अक्षरा भी परेशां हो गयी ये सुन कर मगर वो भी अपनी जगा से नहीं हटी… लेती रही… और चूमती रही गोविन्द की गार्डन…

फिर गोविन्द ने गार्डन घुमा कर पीछे देखा तो अक्षरा का मुस्कुराता चेहरा उस के सामने था… बोलै… “दीदी आप भी यहाँ हो…??”

अक्षरा बोली… “प्लस गोविन्द में भी प्यासी हु तरप रही हु… मुझे भी प्यार करो…”

अब गोविन्द सीधा होते हुए वर्षा की छूट में से ऊँगली निकली… और ऊँगली को सामने ले आया… वर्षा और अक्षरा भी ऊँगली को देखने लगी… ऊँगली पूरी तरह से वर्षा की छूट के रास से सनी हुई थी… और रास टपकने वाला था… उस ने ऊँगली जैसे दोनों बहनो को दिखते हुए अपने मुंह में दाल कर चूसने लगा और फिर ऊँगली अपने मुंह से निकल कर दुबारा से दोनों बहनो को दिखाया… ये मंज़र देख कर वर्षा की छूट से रास की नदी बहने लगी और अक्षरा की छूट भी गीली होने लगी…

गोविन्द का एक बाज़ू पहले hi वर्षा के नीचे था उस ने उस बाज़ू से वर्षा को अपने क़रीब कर लिया और दूसरा बाज़ू भी अक्षरा के नीचे करते हुए उससे भी अपने सीने से लगा लिया…
 
EPISODE – 56

गोविन्द का एक बाज़ू पहले hi वर्षा के नीचे था उस ने उस बाज़ू से वर्षा को अपने क़रीब कर लिया और दूसरा बाज़ू भी अक्षरा के नीचे करते हुए उससे भी अपने सीने से लगा लिया…

फिर गोविन्द ने दोनों बहनो के माथे पर बरी बरी बोसा दिया…

दोनों बहने उस से लिपट गयी और अपनी अपनी तंग उस के नंगे लुंड के पास रखते हुए अपना अपना हाथ उस के लुंड पे रख लिया…

गोविन्द मुस्कुराते हुए दोनों की तरफ देखते हुए… “आप दोनों मेरी प्यारी प्यारी दीदी हो… मुझे ये बताओ के इतनी प्यास क्यों हे तुम दोनों के जिस्म में के मुझ से यूँ चिपक कर छुड़वाना चाहती हो…”

वर्षा और अक्षरा उस का यूँ बहन या दीदी कहना न समझी और ये अनुमान लगते हुए के ये हमें कल रत से दीदी hi मानते हुए बरताव कर रहा हे तो इस लिए अभी दीदी बोल रहा हे…

वर्षा ने खुल के बात करने का फैसला करते हुए… “गोविन्द… सच ये हे के हमारे पति हमें संतुष्ट नहे कर पते… कई कई दिन गुज़र जाते हे के हमारे पास hi नहीं आते… जैसा रत को किया के शराब पि कर बिलकुल बेहोश से हो गए… तुम न होते तो हम दोनों बहने मिल कर उन दोनों को कमरे तक ले जाते घसीट कर… और फिर कल रत हम दोनों ने तुम्हारी और रिया की पूरी चुदाई देख ली हे और अब प्लीज हम दोनों की आग भी ठंडी कर दो… ये विनती हे तुम से… प्लीज इंकार मत करना…”

गोविन्द ने दोनों के होंटो बरी बरी चूमा फिर बोलै…

गोविन्द… “में इंकार नहे करूँ गए मगर में चहु गए के हम आगे बढ़ने से पहले कुछ हक़ीक़तों को जान ले…”

दोनों बहनो का हाथ अभी तक गोविन्द के लुंड पर हे…

अक्षरा… उस के कण को प्यार से छत्ते हुए… “प्लीज प्यारे गोविन्द मन न करो…”

गोविन्द ने अपने हाथो से दोनों के चुके दबाते हुए… “आप दोनों मुझे जानती हो…?? में कोण हूँ…??”

चुके दबाने पर वर्षा की सिसकी निकली… “aaa…mmm… तुम गोविन्द हो… लाला जी के bête…”

गोविन्द अब भी दोनों के चुके मसल रहा हे… “ये ठीक हे के में अब लाला जी का भी बीटा हु पर उस से पहले में आप दोनों का मुन्ना हु…”

अक्षरा… आँखे बंद करते हुए… “हाँ हाँ तुम हमारे प्यारे मुन्ना हो…”

वर्षा पहले तो समझ न पायी के गोविन्द ने क्या कहा हे मगर जैसे hi अक्षरा ने उस की बात को दोहराया तो वर्षा ने फ़ौरन अपना हाथ उस के लुंड से हटा लिया ुर घर कर गोविन्द को देखते हुए बोली… “मुन्ना मतलब…??”

गोविन्द ने फिर से उस के होंटो को चूमा… इस बार भी वर्षा ने उस का साथ दिया मगर घूरती रही उस के चेहरे को…

गोविन्द बराबर उस के चुके मसल रहा था…

गोविन्द… वर्षा की तरफ बारे प्यार से देखते हुए बोलै… “में आप को बोहत प्यार करता हु दीदी…”

अक्षरा बोली… “और मुझे नहे करते प्यार… क्यों…???”

गोविन्द… “में आप दोनों से बोहत प्यार करता हु… मेरी दीदियां दुन्या की सब से खूबसूरत लड़कियां हैं… और में समझता था के मुझे कोई और पहचाने न पहचाने मेरी दीदियां अपने मुन्ने को ज़रोरो पहचान लें गई…”

अब वर्षा कुछ परेशां सी होने लगी… कसमसाई… जैसे अपने आप को चुराना चाहती हो… उठना चाहती हो वह से…

मगर अक्षरा उसी तरह से गोविन्द के कण और गार्डन को चाट रही थी….

गोविन्द प्यार से वर्षा के बाज़ू को सहलाते हुए… “दीदी लेती रहो न… मत उठो… यहाँ से…”

वर्षा बरी बेचैनी से उस के चेहरे को देख रही थी… फिर से अपने जिस्म को ढीला चोर कर चिपक गयी थे गोविन्द से… और फिर एक एक गोविन्द के पूरे चेहरे को चूमने लगी… और रोने लगी… जैसे राज़ जान गयी हो… वो समझ चुकी थी के ये नैन नक़्श उस के प्यारे मुन्ने भाई के हैं जो सारा दिन उस के आगे पीछे फिरता था… वो उस को नहलाती, कपड़े बदलती, उस की आँखों में सुरमा लगाती, और तो और कभी कभी माँ भी कहती थी “वर्षा ऐसा लगता हे ये मेरा नहे तेरा बीटा हे…”

और रुंधी हुई आवाज़ में बोली… “मेरा मुन्ना इतना बारे हो गया… कितना प्यारा हो गया हे रे तू… शानदार मर्द बन गया हे रे…”

अक्षरा भी जैसे अब कुछ समझने लगी थी… “तुम वाक़ये मुन्ना हो हमारे छोटे भाई… गोविन्द मुन्ना… हाँ???”

गोविन्द…. “हाँ दीदी में hi आप दोनों का मुन्ना हूँ… आप दोनों को देखने और प्यार करने को ऑंखें तरस गयी थे…”

अब तीनो बहन भाई एक दुसरे से चिपके रो रहे थे… और दोनों बहने बरी बरी गोविन्द के चेहरे को दीवाना वॉर चूम रही थी…

इस सच्ची मोहबत भरी दीवानगी को कितना शामे बीत गया किसी को कुछ अंदाज़ा न हुआ…

वर्षा… “तुम लाला जी के bête… ये क्या माजरा हे…???”

गोविन्द ने ज़यादा तफ्सील में न जाते हुए थोड़े शब्दों में साडी दास्ताँ सुना दी मगर शक्ति का ज़िकर न किया…

वर्षा… “माँ, बापू, ेषु और प्रकाश कैसे हैं…”

दोनों अब भी उस के साथ चिपकी हुई लेती हुई थी…

और गोविन्द के बाज़ू भी उन को जाकर हुए थे… और वो अब भी उन के चुके मसल रहा था…

गोविन्द ने बताया के सब ठीक हे और अब शहर में आगये हे सब…

अब दोनों बहने उस का हाथ चुराते हुए… उस के पास बेथ गयी… और कहा… “हम ने मिलना हे सब से…”

गोविन्द का लुंड अब भी अपनी पूरी आकर में नंगा तना हुआ खरा था… “दीदी… बस थोड़ा सबर और कर लो… जल्द आप दोनों की मुलाक़ात सब से होगी…”

वर्षा को अब उस के लुंड की तरफ देखने से शर्म आ रही थी… “मुन्ना अपने कपड़े ठीक कर लो…”

और साथ साथ अपनी लेग्गिंग जो के नीचे हो गयी थी उस को ऊपर करते हुए ठीक कर लिया…

अक्षरा ने अपना बाज़ू अपने सीने के आगे कर लिए… उस की तरफ देखती वर्षा ने कहा… “छोटी… मेरा दुपटा तो दे…” जब अक्षरा उठने लगी तो उस का हाथ गोविन्द की नंगी राण पर आगया और उस ने भरपूर नज़र अपने बही के लुंड पर डालते हुए कहा… “ये तेरा इतना बारे कैसे हो गया…”

गोविन्द… “क्या ये बोहत बारे हे…??”

अक्षरा… वर्षा का दुपटा उठा कर उस को देते हुए… मुस्कुरा कर… “हाँ बोहत बारे हे… में ने इतना बारे कभी नहे देखा…”

वर्षा… दुपटे से अपने चुके ढकते हुए… धीमी आवाज़ में… “मुन्ना अपना पजामा ठीक कर लो प्लीज… शर्म आ रही हे…”

गोविन्द थोड़ा सीरियस होते हुए… “मगर आप दोनों तो कह रही थे के आप को सेक्स करना हे…”

अक्षरा ने अपनी आँखे नीची कर ली और चुप रही…

वर्षा बोली… “वो जो हम ने तुम्हे बताया था वो बिलकुल ठीक था… मगर अब ये नहे कर सकते हम तुम्हारे साथ… तुम हमरे मुन्ना हो…”

गोविन्द… “किसी और के साथ करो गई…??”

दोनों ने कोई जवाब नहे दिया… सर झुकाये रही…

गोविन्द… “दीदी में तो तैयार हु क्यों के में नहे चहु गए के तुम किसी और के साथ कर के रुस्वा हो जाओ… हाँ अगर तुम दोनों मेरे साथ नहे करना चाहो गई तो में कोई ज़बरदस्ती नहे करूँ गए…”

गोविन्द फिर बोलै… “मेरा काम तो वैसे भी चल जाता हे… रत को तुम ने देख hi लिया रिया को मेरे साथ…”

दोनों अब भी चुप थी… सर नीचे… आँखे झुकी हुई…

गोविन्द ने दोनों की सोच पढ़ी…

दोनों के दिमाग़ में एक जुंग चल रही थी…

कभी “हाँ” की… कभी “ना” की…

अक्षरा साथ में ये भी सोच रही थी के “अगर वर्षा दीद इजाज़त दे दे तो में तो कर लुंगी… आखिर हमारा मुन्ना hi तो हे.. कोनसा घेर हे… कही बदनामी भी नहे होगी…”

गोविन्द अब तक पूरा नंगा नहीं था मगर अब उस ने अपने सरे कपड़े उतारते हुए कहा… “में ज़रा वाशरूम से हो कर आता हु… आप दोनों सोच लो…”

और फिर दोनों की नज़र उठी उस को वाशरूम जाते देखा… उस की बैक भी खासी मरदाना और मज़बूत थी… चोरे सहने… पीछे से भी वो पूरा मर्द लग रहा था… जो किसी भी लड़की के सपनो का राजकुमार हो सकता हे…
 
EPISODE – 57

दोनों बहने जो के कुछ देर पहले गोविन्द को कह चुकी थी के वो उस से छोड़ना चाहती हे… अब ये पता चलने के बाद के गोविन्द hi उन का मुन्ना भाई हे तो शर्म और लजा के मरे उन की ज़बान खमोश हो गयी थी और उन के अंदर एक जंग चल रही थी… एक तरफ शरीर की भूक थी जो कह रही थी के कर लो सेक्स और मिटा लो बरसो की प्यास और दूसरी तरफ मर्यादा भाई बहन के रिश्ते की जिस की वजा से आँखे लाज के मरे उठा नहे प् रही थी… दोनों बहनो में से अक्षरा बस इतना चाहती थी के वर्षा उससे इजाज़त दे दे तो वो तो कर लेगी…

गोविन्द अब तक पूरा नंगा नहीं था मगर अब उस ने अपने सरे कपड़े उतारते हुए कहा… “में ज़रा वाशरूम से हो कर आता हु… आप दोनों सोच लो…”

गोविन्द वाश रूम ज़रूर चला गया फ्रेश होने के लिए मगर दिमाग़ी टूर पर अपनी बहनो के बीच था…

अक्षरा… “दीदी तुम तो रत को कह रही थी के हमारी आग ठंडी करने के लिए कुछ करो गई… ये किया हे तुम ने… खुद तो मुन्ना की ऊँगली भी ले कर मज़ा ले लिए… मेरा क्या होगा… बस तुम्हे आपत्ति न हो तो में तो काम से काम कर लू इस के साथ…”

वर्षा… “तुम क्या समझ रही हो सिर्फ तुम तरप रही हो… में भी तुम्हारी तरह प्यासी हु और मर्द का आनंद चाहती हु… और में भला कौन होती हु तुम्हे मन करने वाली… लेकिन ये तो सोचो के ये हमारा मुन्ना हे… जिस को में ने तो अपने hi संतान की तरह पला हे… इस को हमेशा एक छोटे बचे के रूप में… जैसे मेरा hi बीटा हो… अब उसी का लुंड अपने अंदर डलवा लूँ… कुछ तो होश कर…”

अक्षरा… “फिर तुम्हारे पास इस समस्या का क्या हल हे… वो पति हमारे जो अभी तक मदहोश हे… या उस भड़वे मनिंदर, बिपिन के भाई, का इंतज़ार करू… या कोई और ढूंढो तुम… ये क्यों नहे समझ रही के गोविन्द को कोई आपत्ति नहे हे और वो तो राज़ी ख़ुशी से हमारी मदद करने के लिए त्यार हे…”

वर्षा… “अगर वो त्यार हे तो ये भी समझो के वो मर्द हे उस के लिए शायद आसान हो रिश्तो की मर्यादा लांघना… मेरे लिए ये इतना आसान नहे… और अगर वो चाहता हे तो खुद कर ले हमारे साथ… न तुम्हे कोई आपत्ति होगी न में कोई ऐतराज़ करू गई… सवाल ये हे के वो खुद क्यों नहे कर लेता… मर्द तो मन मणि कर hi लेते हे…”

गोविन्द ने देखा के दोनों बहनो के ख्याल और विचारो में अंतर हे और गोविन्द खास टूर पर बहन के साथ ज़बरदस्ती रिश्ता बनाने के हक़ में नहे था… उस ने सोच लिया के वर्षा की सोच के अनुसार उस ने नहे चलना और उलट करना हे ताकि वो खुद से अपनी जिस्म की ज़रूरतों को समझते हुए अपने आप को वरीयता देते हुए फैसला लेते हुए खुद पे लगायी गयी प्रतिबन्ध से बहार निकले… और वो ये चाहता था के उस की बहने जो सोचे या जो फैसला ले वो ुक के स्वाभिमान को बढ़ाये… न के बाद में शर्मिंदगी का सबब बने…

गोविन ये सब सोचते हुए वाशरूम से बहार आया… वो अब भी पूरा नंगा हे था… दोनों बहने अब तक बीएड पर hi थी… और अब चुप हो गयी थी… वाशरूम से निकलते hi उस के नज़दीक बीएड पर अक्षरा थी… उस ने अक्षरा के पास आते हुए कहा… “कभी अपने मुन्ना को यद् नहीं किया था…??”

अक्षरा… एक डैम जज़्बाती होकर खरी होते हुए उस के गले लग गयी… “क्यों नहे मेरे प्यार मुन्ना… रोज़ तुम को यद् करती थी…”

जज़्बात में अक्षरा उस के गले लगी तो उस को अहसास हुआ के वो पूरा नंगा हे… मगर वो हटी नहे उस के गले लगी रही… गोविन्द ने आहिस्ता से उस के कण में कहा ताकि वर्षा न सुने… “दीदी एक किश करो न मुझे…”

अक्षरा ने अपनी आँखे उठा कर गोविन्द की तरफ देखा और मुस्कुराते हुए गोविन्द के होंटो को चूमने लगी…

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बीएड पर बैठी वर्षा को ऐसा लगा जैसे अक्षरा ने खुद से गोविन्द को किश करना स्टार्ट किया हे… वो उस की हिम्मत और हौसले को डैड देने लगी दिल hi दिल में…

अक्षरा को गोविन्द का तन्ना हुआ लुंड अब अपनी छूट के ऊपर महसूस हो रहा था…

वो सिसकने लगी… और अपनी बांहे ज़ोर से कास ली गोविन्द के गिर्द…

वर्षा जम गयी थी बीएड पर… उस की नज़रे भी जम गयी थी गोविन्द और अक्षरा पर…

फिर गोविन्द अक्षरा को अपनी बांहो में hi उस के होंटो को चूसते हुए बीएड पर ले आया… और बीएड पर लिटा कर उस के कण के पास और गर्दन पर चूमने लगा… अक्षरा ने अपनी आँखे बंद कर ली और सिसकिया लेने लगी… साथ साथ उस के चुके भी दबाने लगा… अक्षरा अपनी साड़ी को पहले hi हटा चुकी थी और इस वक़्त सिर्फ ब्लाउज और पेटीकोट में थी…

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गोविन्द नीचे आते हुए उस की नाभि पर रुक गया… अक्षरा का रंग गुलाबी था… वो पूरी की पूरी माँ पर गयी थी… नाभि का सूराख काफी गहरा और छोटा था… गोविन्द ने उस में अपनी ज़ुबान घुमाई तो अक्षर सटपटा गयी… ोीी… oiii…aah… आह मुन्ना… ममम… मुन्ना…. तू बोहत ाचा हे रे…. चाट ऐसे… ममम… aah…aaa… ममम…. आए… ाः…. मममम…

कुछ देर के बाद वो उस की पैरों की तरफ आ गया और उस के अंघूठे को अपने मुंह में ले कर चूसने लगा… अक्षरा की तरप अब और बढ़ गयी…. ोीी…. कितना प्यार करता हे रे तू… कहा से सीखा… मुन्ने… ोीी…. आ …. ाः… ममममम…

वर्षा उस की बाटे सुनते हुए अपने होंटो को काटने लगी अपने दांतो से और एक हाथ ले गयी अपनी छूट पर और लेग्गिंग के ऊपर से सहलाने लगी… दुसरे हाथ से अपने चुके मसलने लगी… वो भी सिसकिया ले रही थी….

गोविन्द अब तंग को चाटते चूमते अक्षरा के पेटीकोट को नीचे से ऊपर उठाने लगा और रनो पर ज़बान फेरने लगा… गुदाज़ राणे थी… उस की प्यारी बहन की…

अक्षरा से अब बर्दाश नहे हो रहा था… वो पूरी मस्ती में थी… और अपनी गांड को ऊपर उठाने लगी…

गोविन्द ने पेटीकोट को पूरा ऊपर उठा दिया… और सामने अक्षरा की छूट देख कर हैरान रह गया… दो साल हो चुके थे उस की शादी को … छूट के लैब ऐसे मिले हुए थे जैसे कोई कुंवारी लड़की हो… दोनों लबो के बीच की लकीर बोहत बारीक बोहत प्यारी नज़र आ रही थी… गुलाबी लैब… गुलाबी लकीर… गलबी दाना छूट का… ऊपर से छूट के रास की वजा से लकीर में जैसे पानी के मोती चमक रहे थे…

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गोविन्द तरप गया और उस से सबर न हुआ… अब गोविन्द भी अपने होश खो रहा था…. उस ने अपनी ज़बान रख दी छूट के लबो पर…

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वर्षा ये सब देखते हुए… वो भी अपने होश खो कर अपनी लेगिंग नीचे कर के अपना हाथ सीधा छूट पर रख के एक ऊँगली दाल दी अंदर और यद् करने लगी के गोविन्द की ऊँगली केसा मज़ा दे रही थी… इस की अपनी ऊँगली तो फीकी सी लग रही थी… कोई मज़ा नहे आ रहा था… गोविन्द क्या बस अक्षरा से प्यार करता हे… क्यों नहे फिर से अपनी ऊँगली घुसा देता इस की छूट में…

गोविन्द तो बस खो गया था अक्षरा के आकर्षक छूट के लबो पे… पंखरिया लग रही थी गुलाब की… रास से भरी… जैसे रअस्पभरि… और दाना ऐसा जैसे स्ट्रॉबेरी… वो ऊपर नीचे ज़बान फेरता रह और अक्षरा के मुंह से निकला… ओह्ह्ह्हह मुन्ना…

सुनते hi वर्षा ने अपनी आखें खोली और गोविन्द और अक्षरा को इस हालत में देख कर उस का दिल बोहत दुखने लगा और ग़ुस्सा आने लगा गोविन्द पर… “मुन्ना तो जैसे मेरा भाई रहा hi नहे… कितना ख्याल किया इस का मेने जब छोटा था… अब देखो बस अक्षरा से प्यार किये जा रहा हे…”

अब वर्षा ने जेलस होते हुए ज़ोर ज़ोर से सिसकियाँ लेने लगी…. गोविन्द का कुछ धयान वर्षा की ओर गया… और उस को भी अब तरस आने लगा था वर्षा पर… के ये बेचारी ऐसे तड़पते हुए अकेली अपनी छूट में ऊँगली कर रही हे… वर्षा की क़मीज़ अब भी ढके हुए थी उस की छूट को बस लेग्गिंग गांड तक नीचे कर ली थी वर्षा ने…

गोविन्द ने अक्षरा की छूट छत्ते हुए अपना हाथ बढ़ा दिया वर्षा की टैंगो में और वर्षा की ऊँगली बहार निकलते हुए अपनी ऊँगली दाल दी उस की छूट में….

वर्षा ने अपनी आँखे खोल कर आए… आह… सिसकी लेते हुए बरी कृतज्ञता भरी नज़रों से देखने लगी गोविन्द को जेसे के अपने मुन्ना का शुक्रिया ऐडा कर रही हो….

अक्षरा का हाथ आ गया गोविन्द के सर पर और वो उस के मुंह को दबाने लगी अपनी छूट पर…

गोविन्द उस का इशारा समझते हुए… अपनी ज़बान उस की छूट के सूराख में डालने लगा…. और अक्षरा भी नीचे से अपनी गांड ऊपर करने लगी मज़े में…

वर्षा भी अपनी गांड आगे पीछे कर के गोविन्द की ऊँगली को जैसे छोड़ने लगी… और अपने हाथ से बाज़ू पाकर लिया गोविन्द का जैसे अगर न पकड़ा तो चोर न दे ऊँगली करना…

अब दोनों बहनो के मुंह से सिसकिया निकल रही थी… दोनों की आँखे बंद थी… एक बहन गोविन्द का मुंह अपनी छूट पर दबा रही थी और दूसरी उस के बाज़ू को पाकर कर उस की ऊँगली पर छूट को रैगर रही थी…

रोमांचक और कामुक मंज़र… बहनो का भाई से मिलान…

दो प्यारी सी अप्सराएं… अपने मन की ख़ुशी को पते हुए… झूमते हुए जैसे रक़्स कर रही थी… कालिया चटख रही थी… दूर कही से साज़ बज रहा था… जैसे किशन जी अपनी मुरली बजा रहे हो… या फिर ये दो राधा और एक किशन…

गोविन्द ने जब डेन को अपने मुंह में लेकर चूसना शुरू किया तो अक्षर अब न रोक सकीय और रास का एक सैलाब बह निकला उस की छूट से और सारा मुंह गीला हो गया गोविन्द का… गांड उठा उठा कर रास चोर्ने लगी…. गोविन्द ने अपना मुंह पूरा खोल लिया और लपा लैप चाटने लगा रास को… और साथ साथ अपनी ऊँगली ज़ोर ज़ोर से अंदर बहार करने लगा वर्षा की छूट में…

अक्षरा तो बेसुध हो गयी… बीएड पर….

गोविन्द जो के ज़ोर से ऊँगली अंदर बहार कर रहा था… फिर उसी हाथ का अंगूठे से डेन को चरने लगा…

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वर्षा के लिए भी बस ये सहना क़यामत की सूरत में निकला और वो भी फ़ारिग़ होने लगी ज़ोर से चीखते हुए…. ोये मुन्ना… और ज़ोर से… ज़ोर से… और ज़ोर से…. मुन्नाहा….. ोईई… ोीी… मममम... ोीी… और कुछ देर बाद … पूरी तरह झरने के बाद लग गयी गोविन्द के सीने से और उस के कंधे पर सर रख दिया….
 
EPISODE – 58

गोविन्द ने अपनी जिगर के टुकड़े… अपनी बहनो की छूट का रास निकल दिया… अक्षरा तो ज़िन्दगी में पहली बार छूट चटवामे के बाद ऐसी झरि थी के मदहोश सी जो कर सो चुकी थी… शायद साडी रत जागते रहने के कारन भी उस की आँखों को नींद ने बंद कर दिया था… कहते हे नींद तो सूली पर भी आ जाती हे और ये तो सेज थी कामुक फूलों की जिस में काम शक्ति ने अपना जादू दिखाया था…

गोविन्द ने बरी बेरहमी से वर्षा की छूट में ऊँगली की थी… वर्षा ने भी दिल खोल कर अपनी गांड को अपनी जान से प्यारे भाई की ऊँगली पर अपनी रेशमी छूट को रगड़ा था… फ़ारिग़ होने के बाद वो अपने भाई के सीने से लगते हुए उस के कंधे पर सर रखते हुए शिकायत करने लगी… “मुन्ने… अपनी दीदी को प्यार नहे करता अब…?? बोल न… छोटा था तो साडी फरमाइशें सरे लाड तेरे में उठती थी… और अब अक्षरा के साथ ज़यादा प्यार…?? क्यों रे…??”

वर्षा की शिकायत किसी हद तक दुरुस्त भी थी… जिस तरह से गोविन्द ने उस के सामने अक्षरा की छूट छाती थी उस से वर्षा के मन में जलापा घर करते हुए उस को तारपा रहा था…

गोविन्द… “दीदी आप तो मेरी जान हो… माँ के बाद सब से ज़यादा प्यार में आप से hi करता हु… मगर मुझे लगा के शायद आप मुझ से सेक्स करना नहीं चाहती…”

वर्षा… “करना तो चाहती हु मुन्ना… मगर रिश्ते की लजा और मर्यादा कैसे भूल जॉन… कैसे भूल जॉन के तुम मेरे भाई हो…”

गोविन्द… “और में कैसे भूल जॉन के जिन बहनो ने बाप की इज़्ज़त की कहतीर शादी कर ली थी वो पैसि रहे और वो किसी भी महरूमी या रंज में रहे…”

वर्षा… गोविन्द की ये बात सुन कर उस का चेहरा ताकने लगी …“ये तू ने बारे और सयाने लोगों की तरह बाटे करना कहा से सीख लिया… सच कहु तो तेरी जवानी देख कर खुद पर रस्क आ रहा हे… तेरी पत्नी तो बरी भाग्य शैली होगी…”

गोविन्द… “में चाहता हु के मेरी दीदी भी भगाया शैली बने… में आप को भी सरे सुख देना चाहता हु जो मेरे बस में हों और जिन से आप को ख़ुशी मिले…”

वर्षा गोविन्द की बात समझते हुए अपने नज़रे शरमाते हुए जैसे hi नीचे की तो उस ने देखा के गोविन्द का लुंड अब तक पूरा तन्ना हुआ हे… उस के मुंह से निकल गया…

वर्षा… “मुन्ना… तेरा लुंड तो अब तक शांत नहे हुआ…”

वर्षा को जब अहसास हुआ के उस ने क्या कह दिया हे तो फिर से उस ने शर्मा कर अपने चेहरे को गोविन्द के सीने में छुपा लिया…

गोविन्द… “तुम कार्डो न दीदी… इससे शांत”

वर्षा… की आवाज़ जज़्बात में रुंध सी गयी… जैसे गाला खुश हो गया हो… “कैसे करूँ…??”

गोविन्द ने उस की बात सुनते हुए उस को अपने साथ साथ बीएड से उठा लिया और उस के सरे कपड़े उतर दिए… एक एक कर के…

वर्षा ने कोई विरोध न किया… बस सर झुकाये खरी रही… होंटो पे न मुस्कराहट न कोई परेशानी बस अपने लबो पर ज़बान फेरती रही बार बार… उत्साह की वजा से के… जाने… गोविन्द अब क्या करे गए….

अब गोविन्द के साथ साथ वर्षा भी पूरी नंगी थी… गोविन्द ने एक भरपूर नज़र डाली अपनी बहन पर… वर्षा का रंग भी गोरा था मगर माँ, अक्षरा और ेषणा के मुक़ाबले में ज़रा दबता हुआ था… माँ, अक्षरा और ेषणा का जिस्म गुलाबी था मगर वर्षा में जो खूबी थी वो ये के उस का जिस्म पूरी तरह से कामुक था… उस के शरीर के अंग वर्षा को एक भरपूर औरत बनाते थे… उस के चेहरे के नैन तीखे… चेहरा कुछ लम्बा सा, गाल अंदर को दबे हुए, जब हंसती तो उस के गलो पर डिम्पल्स पर जाते… लम्बी गार्डन, बरी बरी आँखे गहरी कुछ अखरोटी रंगत लिए…

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चुके ऐसे तन्ने हुए जेसे 2 छोटी चोटियां… उन के ऊपर निप्पल छोटे से किशमिश के दाने, मगर उस के गिर्द कुछ बारे सा गोल भूरे रंग का डेरा… चुचो पर नीले रंग की नसे भी उभरी हु थी जो के और ग़ज़ब दाह रही थी…

पेट सपाट मगर साइड से थोड़ा सा गोश्त था… नाभि छोटी मगर गहरी…

और उस के नीचे टीकों पेट के नीचे टैंगो के बीच… हलके हलके से बल… पीछे चूतर कुछ भरी… बहार को निकले हुए… मर्द को लुभाने का पूरा सामान था वर्षा के पास… और वो पूरी सेक्स दिवा दिखती थी…

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वर्षा भांप गयी के गोविन्द उस के जिस्म का पूरा इन्तिहाँ कर रहा हे तो उस ने अपने चेहरे को अपने हाथो से धक् लिया… “मुन्ने तंग न कर… क्या देख रहा हे… ऐसे… मुझे शर्म आ रही हे…”

गोविन्द मुस्कुराता हुआ उस के पास आया… और बोलै… “दीदी तुम बोहत प्यारी हो… बोहत सुन्दर हो… तुम्हारा पूरा बदन कोहे नूर हेरे की तरह से चमकता हे…”

इस बात पर वर्षा ने अपने चेहरे से हाथ हटते हुए बोहत शर्मीली मुस्कराहट से गोविन्द की तरफ देखा… “तेरी बातें न… अगर तू मेरा भाई न होता तो में तुम्हे अपना आशिक़ बना लेती…”

गोविन्द उस के पास आ गया और बारे प्यार से उस का हाथ थमते हुए कहा… “तुम मनो या न मनो मुझे अपना आशिक़… मगर मेरे लिए तो तुम मेरी प्रेमिका hi हो… जिस को मेने बचपन से प्यार किया हे…”

वर्षा हंसने लगी… और मख्मूर नज़रो से देखने लगी अपने मुन्ना को…

गोविन्द ने फिर उस का हाथ पकड़े hi… ले आया वाश रूम में और उस को बोलै के वो थोड़ी झुक कर वाश बेसिन की स्लैब को पाकर ले…

वर्षा के चेहरे पर हेरात और शर्म के आसार थे… लाली पूरे चेहरे पर थी लाज की… मगर बोली कुछ नहीं…

गोविन्द ने कैबिनेट से आयल की बोतल निकली जो के वो पहले देख चुक्का था…

और उस में से ढेर सारा आयल लिया अपने हाथो पर और वर्षा के चूतर और छूट के पास रनो को लगा कर उस की वो साडी जगा पर फिसलन कर दी… कुछ आयल वर्षा की गांड के छेद पर भी लगा तो वो ये समझी के ये लुंड मेरी गांड में डेल गए मगर उस ने सोच लिया था के गोविन्द को अब रोके गई नहे… जो चाहे वो करे… बस अपने धड़कते दिल को काबू में करते हुए हर आने वाले पल के लिए तैयार हो गयी…

वर्षा झुकी हुई थी बेसिन की स्लैब को थामे हुए जिस वजा से उस की गांड कुछ उभर सी गयी थी… उस की गांड पहले से hi बहार को निकली हुई थी और अब झुकने की वजा से मज़ीद आकर्षक लग रही थी…

गोविन्द का दिल तेज़ी से धरकने लगा और लुंड भी झटके खाने लगा…

गोविन्द बार बार वर्षा के दिमाग़ को भी चेक कर रहा था… वो उस को इन्फ्लुएंस नहे करना छठा था और न hi ज़रदस्ती लुंड छूट में खुद से दाल कर छोड़ना चाहता था… वो बस चाहता था के उस की बहने खुद से कहे छोड़ने के लिए क्यों के इस से उन का आत्मविश्वास, खुद पे भरोसा, और आत्म सम्मान बढ़ता…

और वर्षा जो के मन से तैयार थी मगर चाहती थी के गोविन्द खुद से कर ले… एक तो शर्म और लजा की वजा से और दुसरे उस का भाई उस के करैक्टर के हवाले से जज न करने लग जये…

एक खेल था चूहे बिल्ली का जो दोनों बहन भाई खेल रहे थे एक दुसरे के साथ…

वो आहिस्ता से वर्षा के पीछे आ खरा हुआ और उस की गार्डन पे किश करते हुए अपना लुंड वर्षा के शूटरों में दबाने लगा… आयल लगे होने की वजा से, लुंड फिसलता हुआ गांड के छेद और छूट के नीचे सेट हो गया… फिर हाथ से गोविन्द ने वर्षा की टैंगो को मिलते हुए अपने लुंड पे उस की ग्रिफ्ट सख्त कर ली…

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और अपने हाथ उस ने वर्षा के चुचो पर रखते हुए वर्षा की टैंगो को छोड़ने लगा…

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बारे रोमांचक था मंज़र… लुंड गांड के छेद और साथ सतह छूट पर भी रैगर खा रहा था…

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वर्षा ने अपनी आँखे बंद कर ली और गोविन्द के आयल लगे हाथ चुचो के ऊपर मालिश करने लगे…

आयल की फिसलन अपनी जगा मगर अब वर्षा की छूट ने फिर से पानी चूर्ण शुरू कर दिया था… और लसलसे पानी ने फिसलन और बढ़ा दी थी…

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कुछ देर वो छोड़ता रहा वर्षा की गुदाज़ टैंगो को और फिर वर्षा से बर्दाश्त करना मुश्किल था अब… एक बार उस ने कोशिश की गांड को लुंड से दूर किया ताकि लुंड छूट पे लगते हुए अंदर चलजए मगर लुंड उल्टा हो कर बहार को फिर से गांड से रैगर खाने लगा...

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वो समझ चुकी थी के पीछे से लुंड गांड को लगता छूट को रगरता नीचे रनो में डाब जाता हे और छूट के अंदर नहे जये गए पीछे से… तो वो एक डैम से मूर्ति और गोविन्द के सीने से अपना सीना मिलते हुए एक हाथ से उस का लुंड आगे से अपनी रनो के दरमियान दबा कर भींच ली ज़ोर से टंगे और खुद से आगे पीछे होने लगी… अब वो छोड़ रही थी… लुंड को और रैगर रही थी अपनी छूट के साथ… और ज़ोर ज़ोर से सिसकने लगी…. और कोशिश कर रही थी के लुंड अंदर चला जये छूट के…

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मगर गोविन्द चाहता था के परदे पूरे हैट जये… ये शर्म और लजा की ढूंढ चाट जये… बहने खुद से बोले… इस लिए वो इस चीज़ का ख्याल कर रहा था के लुंड फिसलता हुआ नीचे रनो की तरफ जये… छूट के सूराख में न घुसे…

ये चूहे बिल्ली का खेल था… और इस खेल में वर्षा ने इस से मिलते जुलते खेल तो काफी खेले थे मगर एक माहिर खिलाड़ी नहे थी दुसरे गोविन्द उस के दिमाग़ में से उस के विचारो को अछि तरह से जान प् रह था… चूहा बिल्ली से जीत रहा था…

ाः… आआह…. मममम…. मुन्ना…. ाः… ोी … माँ… ाः…

वो बोहत ज़ोर से अपनी टंगे आगे पीछे कर रही थी…. सिसकियाँ ले रही थी… अगर आयल न लगा होता तो उस की टंगे और गोविन्द का लुंड चील जाते… आयल और छूट का रास आसान कर रहे थे ढको को…

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कुछ देर के बाद दोनों बहन भाई इस छूट लुंड की रगड़ाई में इतने खोये के अपने असल लक्ष से हैट कर बस चरमसुख पर पोहचने की कोशिश में जुट गए… और फिर जैसे बिजली सी कुंडी और दोनों बहन बही झरने लगे… वर्षा ने कास के भाई को पाकर लिया और सिसकिया दोनों के मुंह से निकलने लगी…

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आह… ममम… आह… मुन्ना… दीदी… आह… ममम… आह… ममम…
 
EPISODE – 59

झरने के काफी देर के बाद दोनों अलग हुए… गोविन्द चला गया शावर के नीचे और वर्षा अपनी नज़रे झुकाये… कमोड पर बेथ कर गोविन्द की मलाई देखने लगी… और पानी से धोने लगी… उस को जैसे hi ये लगा के गोविन्द नहाने में मसरूफ हे और उस का धयान नहे हे तो जल्दी से थोड़ी सी मलाई ऊँगली में लगा कर चाट ली… और टास्ते अपनी ज़बान पर महसूस करने लगी… “बोहत मज़े का हे… मममम”

और जल्दी से अपनी टंगे साफ कर के वाशरूम से बहार निकलते हुए दरवाज़े के पास रुक कर नज़रे नीची रखते हुए गोविन्द से कहा “मुन्ना… वाशरूम में हम ने जो किया ये अक्षरा को मत बताना…” और उस के जवाब का इंतज़ार किये बग़ैर कमरे में आ गयी और जल्दी से कपड़े पहन लिए और अक्षरा को उठाने लगी… “उठ जल्दी से छोटी… सासु माँ आने वाली होगी…”

अक्षरा हार्बर कर उठी और देखा के अब तक उस की छूट नंगी थी… वो जल्दी से बीएड से उत्तरी और अपने कपड़े ठीक किये… साड़ी बंधी और वर्षा से मुन्ना का पुछा… “चोर उस को वो वाश रूम में हे… तू चल अपने कमरे से फ्रेश हो कर अपने पति को उठा और नीच आ में भी चेतन को उठती हु…”

गोविन्द जब नाहा कर बहार निकला तो दोनों दिदिया कमरे में नहे थी… जल्दी से अपने कपड़े और जूते पहन कर नीचे आ गया… 10.30 हो रहे थे… नीचे पोहंचा तो दोनों दिदिया किचन में थी… उस को वर्षा ने देखते hi आवाज़ दी… “मुन्ना जल्दी से डाइनिंग टेबल पर बेथ नाश्ता लगाती हु… सासु माँ आने वाली हों गई…”

थोड़ी देर में hi दोनों बहने बोहत साडी चीज़ो से डाइनिंग टेबल को सजाने लगी…

वर्षा… “मुन्ना… तेरे लिए फ्रेंच टोस्ट भी बनाया हे… तू शोक से खता था न…”

अक्षरा… “दीदी… बस अब मुन्ना न बोल… गोविन्द नाम से पुकार… बिपिन भी नीचे आते होंगे…”

गोविन्द ख़ामोशी से नाश्ता करने लगा और दोनों बहनो को बोलै… तुम दोनों भी खाओ न…

वर्षा… “हम ने सुबह खा लिया था… अभी सब लोग चले जयें गए तो नाहा कर फिर खाये गई…” नहाने की बात करते हुए फिर से वर्षा के गाल लाल होने लगे थे… अक्षरा भी मुस्कुराने लगी…

गोविन्द… “तो अभी नाहा लेती…”

वर्षा… “नहीं रे… वो सुबह सासु माँ हमें इन कपड़ो में देख के गयी थी तो अभी ए गई और फिर से कपड़े तब्दील हों गए तो जाने क्या सोचे… तू चिंता न कर… हम खा ले गई… तू खा.. और ये बता के कैसे मिले गए माँ, बापू, ेषु और प्रकाश भैया से…”

गोविन्द को नाश्ता बोहत ाचा लग रहा था… कहते हुए… “बस एक दो दिन में मिलते हे… बार वग़ैरा निकलती हो कभी दोनों…”

अक्षरा… “वेडनेसडे को बुधवार बाजार लगता हे वह से पूरे हफ्ते की सब्ज़ी लेट हे हम दोनों… यहाँ से लंच के बाद ऑटो पर जाते हे और वापसी भी ऑटो से होती हे… दो से तीन घंटे लगते हे…”

गोविन्द… “ऐसा करो… के जो सब्ज़ी लेते हो वह से उस की लिस्ट जल्दी से बना दो… में पहले से hi साडी सब्ज़ी ले लून गए और तुम लोगो को यहाँ से पिक करूँ गए वेडनेसडे 2.00 बजे फिर तुम लोगो को वापसी चोरो गए 5.00 बजे… तीन घंटे तुम दोनों माँ बापू और सब के साथ गुज़र लेना…

अक्षरा… “दीदी तुम जल्दी से लिस्ट बना लो… में फ्रेश छाए बना लेती हु…”

दोनों दिदिया अपने अपने काम के लिए उठ गयी तो गोविन्द भी उठ कर डाइनिंग रूम से लाउन्ज में आ गया और पापा को फ़ोन लगा कर कह दिया के बापू को प्लाट से बुलवा ले घर पर उन से उस को काम हे… पापा ने कहा के वो ड्राइवर भेज देते हे अभी…

उसी वक़्त सेठ गिरधारी लाल की पत्नी भी आ गयी… और उस से कहा के फ्रेश हो कर आती हैं और अपने कमरे में चली गयी…

छाए तैयार होने तक चेतन और बिपिन भी आ गए और फिर गोविन्द उन के साथ डाइनिंग टेबल पे बेथ कर हंसी मज़ाक़ करने लगा… सासु माँ भी वही आ गयी थी… छाए भी पीटा रहा साथ में… और फिर सब से विदा लेते हुए किचन के पास खरी वर्षा और अक्षरा के पाऊँ छूटे हुए लिस्ट ले ली सब्ज़ी की…

और वह से निकल कर सीधा घर पे पोहंचा और 50 लाख रुपया अलग कर लिए अलमारी से निकल कर… और बापू के आने पर उन को समझाया के 4 शॉप्स मार्किट की बिक रही हे… ड्राइवर के साथ उन्हों ने जाना हे प्रॉपर्टी डीलर के पास जो के पूरा एग्रीमेंट डील कर व देगा… और डीलर की कमीशन के पैसे अलग दे दिए…

बापू चले गए ड्राइवर के साथ और कुछ देर के बाद गोविन्द भी निकला उन के पीछे…

कैलाश नाथ पोहंचे प्रॉपर्टी डीलर के पास और जा कर बताया के वो इंटरेस्टेड हे 4 शॉप्स जो सेल्ल हो रही हे और कॅश भी लाया हे 50 लाख… प्रॉपर्टी डीलर और सुपरविसोर्स को गोविन्द इन्फ्लुएंस कर रहा था…

(2 सुपरविसोर्स की बात हो रही हे जो के लाला जी के पास काम करते थे और वह से फ्रॉड कर के उन्हों ने कला धन से शॉप्स खरीदी थी…)

मंद इन्फ्लुएंस होने की वजा से सुपरविसोर्स भी जल्द आ गए और डील पूरी हो गयी… कम्पलीट डाक्यूमेंट्स बन कर प्रॉपर्टी रजिस्ट्रार के ऑफिस चले गए कैलाश नाथ और सुपरविसोर्स 50 लाक रुपए ले कर निकल परे… रजिस्ट्रार के ऑफिस में भी मंद इन्फ्लुएंस हुआ तो कोई परेशानी न हुई कैलाश नाथ को और 4 शॉप्स उन के नाम पे ट्रांसफर हो गयी… और वो ड्राइवर के साथ फिर से प्लाट के तरफ चले गए…

अब खेल शुरू किया गोविन्द ने दूसरा… और सुपरविसोर्स में से जो के ज़रा ज़यादा होशियार था और झगड़े में भी जज़्बाती था उस ने दुसरे से कहा के वो रुपया ले कर जाता हे जो उन्हों ने फैक्ट्री देखि थी उस की डील के लिए और दुसरे सुपरवाइजर को कोई और काम बोल दिया…

दोनों सुपरविसोर्स अपनी अपनी मोटर बाइक पर थे…

गोविन्द उस सुपरवाइजर का रस्ते में एक जगा इंतज़ार करने लगा… ये जगा ऐसी थी जहा ज़यादा भीड़ नहीं थी… जब वो नज़दीक पोहंचा तो गोविन्द ने उस का मंद इन्फ्लुएंस किया और वो रुका गोविन्द की कार के पास और रुपया वाला बैग उस की कार में रख कर फिर से बाइक स्टार्ट कर के आगे निकल गया… सुपरवाइजर जब दुसरे प्रॉपर्टी डीलर के पास पोहंचा तो देखा बैग रुपया वाला नहे हे… वो वही बेथ गया परेशनी में और गोविन्द घर वापिस आ गया और बैग रख दिया अलमारी में… सुपरवाइजर को कुछ यद् नहे था के बैग कहा गया क्यों के वो उस वक़्त गोविन्द के इन्फ्लुएंस में था…

उस के बाद दोनों सुपरविसोर्स में बोहत झगड़ा हुआ क्यों के दूसरा सुपरवाइजर ये समझ रह था के जो रुपया ले कर गया था उस ने उस के साथ फ्रॉड कर दिया हे… अब दोनों सुपरविसोर्स की आपस में और दोनों की मैनेजर के बीच भी फूट पर चुकी थी… और गोविन्द ने 4 शॉप्स भी अपने बापू के नाम करवा दी थी और रुपया वापिस पोहंच गए थे गोविन्द के पास…

गोविन्द का आज कॉलेज बंक हो चुक्का था… तो वो चला गया मैनेजर के दिमाग़ में… वो इंतज़ार कर रहा था अनाज की बोली लगने की… और कुछ खास नहे था वह… उस के बाद गोविन्द आ गया सेठ राजिंदर के मैनेजर के दिमाग़ में… और वह से इनफार्मेशन लेने लगा और ये भी मालूम किया के उसे कब बात करनी हे अपने सेठ से… गोविन्द नहे चाहता था के बग़ैर वजा के मैनेजर सेठ राजिंदर को कॉल करे और सेठ राजिंदर पैनिक हो जये…

सेठ राजिंदर के मैनेजर के दिमाग़ से गोविन्द को उन के काळा धंदो की तफ्सील मिली… सेठ राजिंदर न सिर्फ रियल एस्टेट में घपले करता था… वो एक इंटरनेशनल ड्रग माफिया का माल ड्रग्स वग़ैरा कंट्री में पहला रहे थे… मैनेजर के पास ड्रग्स के हवाले कोई तफ्सील नहीं थी… बस ये था के सेठ इस वक़्त किसी काम के लिए होन्ग कोंग गया हुआ हे और उस से आज रत को बात होनी हे दुबारा… और वो खुद कॉल करे गए… रत के 12 बजे…

सेठ राजिंदर के मैनेजर के दिमाग़ से ये भी पता चला के रघु दौलत पुर शहर के एक बारे गुंडे, चंकी भाई, के साथ भी कांटेक्ट में था और यहाँ लोकल लोग और वेपन्स उसी ने सप्लाई किये थे और वो इस वक़्त अंडरग्राउंड चला गया था… रघु के अरेस्ट के बाद… उस के यहाँ पर 2 शराब के अड़े भी थे… जहा कच्ची शराब बनती थी और वो शराब शहर के आस पास गाँव में बेचीं जाती थी… एक और काम की बात ये पता चली के सेठ राजिंदर की एक पुराणी हवेली हे दौलत पुर में और खुद राजेंदर यहाँ काम आता हे लेकिन ये हवेली उस के पुरखों की हे और हवेली की देख बल के लिए 3 लोग हे और एक पुराण वफादार मुलाज़िम उन की निगरानी करता हे और हवेली का सारा इंतज़ाम भी वही देखता हे… और इस हवेली के अंदर एक बेसमेंट हे जिस में कोई नहे जनता के क्या हे… सिर्फ सेठ राजिंदर जनता हे या वो पुराण वफादार मुलाज़िम… हवेली के टेलीफोन का नंबर गोविन्द ने नोट कर लिया मैनेजर के दिमाग़ से…

गोविन्द ने एक इंस्पेक्टर को कॉल की घर के नंबर से और आवाज़ बदल कर उस को चंकी भाई के शराब के अड्डों की इनफार्मेशन दी… (ये कहानी उस शामे की हे जब कम्युनिकेशन का तरीक़ा बस लैंडलाइन फ़ोन हुआ करता था और कॉलर आइडेंटिफिकेशन भी नहे होती थी) ये इनफार्मेशन फिर जनि थी द्क्प तक इंस्पेक्टर के थ्रू…

फिर गोविन्द ने कॉल मिले सेठ राजिंदर के हवेली पर…
 
देखो भाई समस्या ये हे के गोविन्द ज़बरदस्ती करे गए नहे बहन के साथ और वर्षा हे बोहत शर्मीली... दोनों बहन बही अपनी अपनी जगा अरे हुए हे... अब हम बेचारे क्या कर सकते हे इस बीच... है ये हे के इंतज़ार करे कोई न कोई रास्ता तो निकले गए...

ाचा बीआरओ ये बात चोरो... ये बताओ के क्या अब भी ऑनलाइन हो आप... मुझे बस अब आधा घंटा और लगे गए नया अपडेट तैयार करने में... तो अगर आप ऑनलाइन हुए तो पोस्ट करूँ गए वर्ण ये कल पोस्ट होगा...

में आप के मैसेज का वेट कर रहा हु... धनवाद...
 
EPISODE – 60

फिर गोविन्द ने कॉल मिले सेठ राजिंदर के हवेली पर…

रिंग मुसलसल बजती रही…. काफी देर तक… मगर किसी ने अटेंड नहीं किया कॉल…

गोविन्द ने सोचा… “हवेली खली रहती हे… कोई आता नहे तो हो सकता हे के कर्मचारीओ की रसाई न हो टेलीफोन तक या उन को आर्डर न हो टेलीफोन अटेंड करने का… ख़ैर या तो किसी और वक़्त कॉल करू या फिर कोई और तरीक़ा सोचा जये हवेली तक पुहंचने का… ये बेसमेंट में क्या हो सकता हे…?” फिर उस को ख्याल आया के 12 बजे मैनेजर ने हवेली आना हे… सेठ राजेंदर कॉल करे गए तो सब राज़ खुल जये गए…

गोविन्द ने अब रुख किया द्क्प का… इंस्पेक्टर ने चंकी भाई के हवाले से इनफार्मेशन शेयर कर दी थी और परमिशन भी ले ली थी छापा मरने की…

गोविन्द उस के दिमाग़ में जा कर उस को गाइड किया के पहले कोई अफसर सिविलियन कपड़ो में उन अड्डों का जाएज़ा ले… और उस के पीछे छापा मरने वाली टीम हो… एक sub-inspector तैयार किया जिस का पूरा हुलिया चेंज कर के एक मज़दूर के जैसे बना कर उस को आगे किया गया… टीम पहले उस sub-inspector के साथ पोहंची एक अड़े पर… ये इंडस्ट्रियल एरिया से कुछ हैट कर एक पुराणी फैक्ट्री थी… उस के गेट पर चौकीदार से sub-inspector ने पुछा के किया काम मिले गए… उस ने उस को धुत्कार कर भगा दिया… गोविन्द उस के दीमघ में से पूरे फैक्ट्री की इन्फो ले ली… वह सिर्फ तीन गुंडे वेपन्स के साथ थे… बाक़ी 6 दुसरे लोग थे… तो इस तरह उन पर आसानी से काबू प् लिया गया… गोविन्द उन को गाइड कर रहा था…

दूसरा ऐडा शहर से कोई 20 किलोमीटर बहार था एक ऐसी जगा जहा पर एक बोहत पुराणी बिल्डिंग थी… उस पे क़ब्ज़ा कर के और कुछ रिपेयर कर के काम चलाया जा रहा था…

वह से चूँकि भाई का राइट हैंड मुजरिम पकड़ा गया… वो भी पुलिस को केसेस में वांटेड था…

गोविन्द ने उस के दिमाग़ से चंकी भाई के हिडौट का एड्रेस नोट किया… एड्रेस सुनते hi उस के ज़ेहन में एक और क़िस्सा ताज़ा हो गया जिस के लिए उस की तवजा नहीं थी… ख़ैर उस ने इंस्पेक्टर और चंकी भाई के राइट हैंड के दिमाग़ को इन्फ्लुएंस करते हुए चंकी भाई के हिडौट का एड्रेस निकलवा लिया…

चंकी भाई एक तवायफ के कोठे पे चुप्पा हुआ था… और उस कोठे के साथ वाले कोठे पर जुड़ी हुई थी एक दास्तान… गोविन्द की दिलचस्पी का कुछ सामान था वह…

चंकी भाई को बोहत आराम से अरेस्ट कर लिया गया… लेकिन उस का स्टेटमेंट भी बस रघु को मुजरिम साबित करता था… उस के पास से कोई इनफार्मेशन ऐसी नहीं मिली जो के सेठ राजेंदर को रघु के साथ लिंक के लिए कोई प्रूफ बनती…

गोविन्द के लिए बस अब रहा गयी थी सेठ राजेंदर की हवेली… और उसे रत 12 बजे तक का इंतज़ार करना था…

ये ज़रूर हुआ चंकी भाई के अरेस्ट से के गोविन्द जिस एक खास मुड़े को भूल गया था वो क़िस्सा फिर से ताज़ा हो गया…

उस ने फ़ौरन रुख किया लाला जी के फॅमिली फिजिशियन के दिमाग़ का और वह से पता चला के जिस साइकेट्रिस्ट का वो वेट कर रहा था वो बाहिर मुल्क से आगया वापिस दौलत पुर… उस साइकेट्रिस्ट का नंबर उस के पास पहले से था… उस ने घर से कॉल किया उस नंबर पर और अपॉइंटमेंट के लिए रिक्वेस्ट किया… लाला जी और उन की पत्नी के लिए… ज़ाहिर हे के अपॉइंटमेंट उस के मंद इन्फ्लुएंस पर मिली…

(आयी दोस्तों अब उस मुड़े पर बात हो जये जिस की वजा से लाला जी पिछले 7-8 साल से अपने बिज़नेस पर तवजा नहे दे रहे थे और उन के मैनेजर, सुपरविसोर्स और दुसरे कर्मचारी उन के बिज़नेस को डैमेज करते हुए फ्रॉड से पैसा बना रहे थे…)

लाला जी की पत्नी, गंगा देवी, का 8 साल पहले ओवरीज़ में टूमओर की वजा से ऑपरेशन मुंबई में हुआ और वह पर उन की ओवरीज़ और उतेरुस रिमूव कर दिए गए… वो वह से वापिस दौलत पुर आ गए… मुंबई हॉस्पिटल से उन को ऑपरेशन के बाद की केयर के हवाले से ठीक तरह से गाइड न किया गया… जिस की वजा से एक तो गंगा देवी के दिमाग़ में कुछ दर बेथ गया और जब वो दौलत पुर वापिस ए तो रिकवरी टाइम से पहले एक रत लाला जी अपनी पत्नी के साथ सम्भोग के ग़र्ज़ से उन के क़रीब हुए तो गंगा देवी को फिर से दर्द उठा तो उन का दर और पक्का हो गया और उन्होंने अपने पति को अपने क़रीब आने से बिलकुल इंकार कर दिया… लाला जी एक तो शरीफ आदमी और ऊपर से अपनी पत्नी से बोहत प्यार करते थे तो इस वजा से उन्होंने ने भी अपनी पत्नी पर कभी ज़ोर ज़बरदस्ती न की… उन की परेशानी को देखते हुए उन के मैनेजर ने उन को कोठे और तवायफ की राह दिखाई… बाजार इ हुस्न में उस वक़्त “तेजस्वी बाई” के हुस्न का बारे चर्चा था…

तो लाला जी जब वह जाने लगे तेजस्वी बाई का गण सुनने और मुजरा देखने तो वो भी उस पर फ़िदा हो गए… और वो उन को बेवक़ूफ़ बना कर लूटने लगी और लत लग गयी लाला जी को बाजार इ हुस्न की और वह की नाज़ और अंदाज़ की…

इन 7-8 सालो में लाला जी और उन की पत्नी भी एक दुसरे से दूर होते गए और उन की पत्नी ने ये स्वीकार कर लिया था के वो अपने पति को कोई शरीरिक सुख नहीं दे सकती तो उस को ये हक़ भी नहे हे के वो अपने पति को रोके के वो कही और से वो सुख हासिल न करे…

लाला जी के साथ तेजस्वी बाई ने एक और भी झूट बोलै के वो उस के बचे की माँ बनने वाली हे और जब एक बची पैदा हुई तो उस की परवरिश के लिए महान खर्चा भी बांध दिया जो के लाला जी हर महीने ऐडा कर रहे थे तेजस्वी बाई को… वो बची भी अब 5 साल की हो चुकी थी… लाला जी नहीं चाहते थे के उन की बेटी की परवरसिंह एक कोठे पर हो और इस लिए वो बार बार तेजस्वी बाई से रिक्वेस्ट भी करते थे… मगर तेजस्वी बाई सोने की चिड़िया को हाथ से कैसे जाने देती और दुसरे वो तो जानती थी के वो बची लाला जी की औलाद नहे हे…

और साथ साथ जब तेजस्वी बाई ने ये देखा के अब लाला जी का उस से जी भर रहा हे तो उस ने एक नयी लड़की जिस की उम्र बस 18 साल थी और उस की नाथ अभी नहीं उतरी थी उस को भी पेश करदिया लाला जी के सामने और लाला को कहा के वो इस को खरीद लें… ये तो भला हुआ के इन्ही दिनों गोविन्द लाला जी की लाइफ में आगया और लाला जी को रोक लिया के वो कोठे में न जये…

लाला जी अब कोठे पर नहे जा रहे थे और सारा धयान अपना लगा रहे थे अपने बिज़नेस पर मगर उन का दिल अब भी अटका हुआ था अपनी बची पर और साथ साथ उस कच्ची काली पर जिस की नाथ नहे उत्तरी थी… उस का नाम था “ानिका…” और वह अब भी पैसे भेज रहे थे हफ्ते के...

गोविन्द ने इस समस्या का हल ये निकला उन के फॅमिली फिजिशियन की मदद से... एक तो साइकेट्रिस्ट काउन्सलिंग करे लाला जी और उन की पत्नी की जो के उन को ये यक़ीन दिलाये के वो दोनों शारीरिक समबध फिर से क़ाइम कर सकते हे और इस में कोई नुकसान नही और दुसरे ये के गोविन्द पहले तेजस्वी बाई को प्यार से सम्जहये के वो लाला जी का पीछा चोर दे और उन को उस बची के हवाले से भी सचाई बता दे टेक लाला जी ज़ेहनी दबाओ से बहार आएं… और फिर से पूरी फॅमिली ख़ुशी से पारिवारिक सुख से रहे… सीमा इस सब के बारे में नहे जानती थी…

अब वक़्त दोपहर का हो hi रहा था… और ड्राइवर लाला जी के लिए लंच ले कर जाता इस वक़्त घर से… जो के गनगा देवी से गोविन्द ने कहा के वो लंच लेकर जये गए और उन के साथ खुद भी लंच ऑफिस में करे गए… गंगा देवी भी बुहत खुश हुई इस बात पर… और लंच का टिफ़िन दे दिया गोविन्द को…

गोविन्द के ऑफिस आने पर लाला जी बारे सरप्राइज और खुश हुए… लाला जी और गोविन्द ने लंच किया और साथ में काम की प्रोग्रेस पर भी बात होती रही… लंच के बाद गोविन्द ने छाए की फरमाइश करते हुए लाला जी से कहा के वो उन के साथ कोई ज़रोरोइ बात करना चाहता हे तो कोई कर्मचारी ऑफिस में उन को डिस्टर्ब न करे…

छाए के दौरान… गोविन्द ने लाला जी से कहा….

गोविन्द… “पापा जब औलाद जवान हो जाती हे खास तौर पर बीटा बाप के क़द के बराबर आ जये तो दोनों के दरमियान पर्दा नहे होना चाहिए और बाप बीटा को चाहिए के वो एक दुसरे से खुल के हर मुड़े पर बात करें… आप प्लीज किसी भी बात के हवाले से मुझ से शर्म न महसूस करे में आप का सिर्फ बीटा नहे एक दोस्त हु…”

लाला जी… “में समझ रहा हु बीटा के तुम मुझ से कोई ज़रूरी बात करना चाहते हो और तुम्हारी वजा से hi में आज तक जो ग़लतिया करता आया वो ठीक हुई… तुम खुल के बात करो बीटा… में तुम्हे अपनी जान से भी प्यारा समझता हु…”

गोविन्द… “पापा में ने आप के और माँ के लिए साइकेट्रिस्ट से टाइम लिया हे क्यों के माँ का इशू शारीरिक नहे हे बस ये एक साइकोलॉजिकल दर खौफ हे…”

दोस्तों गोविन्द का ये मन्ना था के ये मुदा मंद इन्फ्लुएंस से नहीं बल्कि ठीक प्रोफेशनल तरीके से हल हो ताकि दिमाग़ी संतुलन भी ठीक रहे गंगा देवी का…

गोविन्द लाला जी के एग्री करने पर उठ कर उन के गले मिला और उन को बताया के उन की अपॉइंटमेंट आज शाम 6 बजे की हे तो वो खुद बता दे माँ को… और शाम को माँ के साथ साइकेट्रिस्ट के पास चले जयें… फिर वो वह से निकल कर घर आगया और 1 घंटे के लिए सो गया… उस को आज रत शायद देर तक जागना परे….
 
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