Kya Govind yunhi tarasta rahe ga - Page 9 - SexBaba
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Kya Govind yunhi tarasta rahe ga

EPISODE – 66

और ऐसा hi हुआ… कुछ देर के बाद आशा ने सरेंडर करते हुए… अपनी छूट उस के मुंह पर रख दी… अब गोविन्द सब से पहले उस के छूट के लबो को छत्ता और फिर वह पे अपनी ज़बान से चोट मरने लगा…

ाः… ोोोोीी… मम्मा…. ोोोीी …. आए अह्ह्ह ा ा अझह्ह्ह

ासः की सांसे अब बेकाबू थी… वो अब जहटके खा रही थी और झटके कहते कहते झरने लगी… और उस ने अपनी छूट रख दी गोविन्द के मुंह पर…

और 69 पोजीशन में आगयी…

गोविन्द भी उस का सारा रास चाट गया…

कुछ देर तक आशा उस का लुंड मुंह में ले कर चूसती रही और गोविन्द उस की छूट छत्ता रहा और फिर आशा उठी…

गोविदं ने उस की आँखों में देखते हुए इशारा किया के उस को खोल दे मगर आशा ने इंकार करते हुए अब उस के लुंड पे अपनी छूट सेट कर दी…

और एक hi झटके में उस का पूरा लुंड ले लिया अंदर…

और खुद hi चीख मरी……. Oooooiiiiiiiiiiiii

लुंड सीधा जा टकराया था बचे दानी से….

कुछ देर वो यूँही बैठी रही….

फिर आहिस्ता से उस ने अपनी गांड हिलायी… और थोड़ा सा ऊपर उठी और फिर से नीचे हो कर पूरा लुंड लेलिया अंदर…

आशा अब बस एक इंच ऊपर को उठ कर लुंड को पूरी तरह से छूट के लबो से पकड़ती हुई रगड़ने लगी…

गोविन्द को ऐसा मज़ा पहले कभी नहीं आया था… वो चाहता था के नीचे से ढके लगाए मगर वो देख रहा था के आज आशा ने अपनी मर्ज़ी से पूरे खेल को एन्जॉय किया हे तो वो उस के दिन को ख़राब नहे कर सकता था… उस का प्यार और बढ़ गया था आशा के लिए जिस ने गोविन्द को अपना मानते हुए उस के साथ अपनी दिल की मस्ती पूरी की थी…

कुछ देर के बाद आशा अपनी पूरी रफ़्तार से ऊपर नीचे होने लगी… आधा लुंड बहार निकलती और फिर से उस को अंदर लेलेती…

गोविन्द को भी मज़ा आरहा था… उस ने अपनी आँख के इशारे से उस को करीब आने को कहा… आशा झुकी उस के ऊपर तो गोविन्द ने किश किया… और फिर से सीढ़ी हो गयी… आज प्यार में दीवानगी थी… क्कुह अधूरी खाव्हिशे तकमील प् रही थी…

अउ फिर आशा पूरा लुंड अंदर ही रखते हुए लेट गयी उस के ऊपर और अपने चुके मसलने लगी गोविन्द के सीने पर और साथ साथ सिर्फ गांड को हिलाते हुए छूट के दाने को रगड़ने लगी…

ाः… ूई… ममम… आह… आह… आह… मममम… ोोोीी…

अभी गोविन्द ये सोच hi रहा था के कब ख़तम होगा ये खेल… एक ज़ोर का झटका लिया आशा के जिस्म ने और फिर एक झटको की सीरीज लग गयी…

आशा की सांसे बेकाबू और आवाज़े बोहत वहशतनाक… ाः.. ममम… ghghh…hhhmmm… ऊऊह्ह्ह्हआ…

गोविन्द को उस का सारा रास अपने लुंड पर और अपनी टैंगो पर निकलता महसूस हो रहा था… क्या ग़ज़ब झरि थी वो…

और फिर से लेट गयी… ख़ामोशी से गोविन्द के सीने पर…

लुंड अब तक छूट के अंदर था… एकरा हुआ तन्ना हुआ… इस का काम अभी ख़तम नहीं हुआ था…

गोवंड… “मज़ा आया…??”

आशा… “हम्म्म… बोहत… तुम्हे…??”

गोविन्द… “नहीं…”

आशा… ये सुन कर… हार्ट से अपना सर उस के सीने उठाते हुए गोविन्द की तरफ देखा… “क्यों… इतना तो ाचा था… और तुम भी तो एन्जॉय कर रहे थे…”

गोविन्द… “यार वो तो ाचा था… बूत… मेरे हाथ जो लॉक्ड हे… और ये लुंड अब तक खरा हुआ हे…”

आशा… मुस्कुराते हुए… “हाथ तो फ़िलहाल लॉक्ड रहे गए… मगर हाँ… इस का कुछ करती हु…” ये कहते उस ने अपनी गांड ज़रा हिलायी… और खुद hi इस के मुंह से सिसकी निकल गयी…

और आहिस्ता से ऊपर होने लगी… और ऊपर होने से लुंड छूट से बहार निकलने लगा…

जब पूरा नीला तो गोविन्द ने देखा के लार की एक लम्बी तार सी बन गयी थी… वो हैरान हुआ के आशा का इतना पानी निकला हे आज…

वो उठी और उठ कर वाशरूम में चली गयी… शायद पी करने… 10 मिनट्स में वापिस आ कर उस की टैंगो में बैठते हुए लुंड को किश करने लगी… लौंद उस की छूट क ेरस से सना हुआ था मगर वो बरी कामुकता से लुंड को चूसने लगी… और साथ में देखती जा रही थी गोविन्द की आँखों में… गोविन्द ने लुत्फ़ और आनंद में अपना सर पिलो पे दबाया तो उस की नज़र गयी चाट पर लगे मिरर पर… तो उससे अपनी आँखों अपर यकीन नहीं हो रहा था के वो इतना कामुक मंज़र देख रहा हे… ऊपर नीचे नोने से और लुंड चूसने से आशा की गांड के दोनों पातर या चूतर साथ मिलते फिर अलग हो जाते…

वो सहन न कर सका… उस ने आशा को कहा… “जान अपनी गांड इधर करो मेरी तरफ…”

आशा ने आँख के इशारे से पुछा के क्यों…

गोविन्द ने दो उनलगियो का इशारा बनाते हुए कहा …

आशा ने मुस्कुराते हुए अपनी गांड उस के तरफ करते हुए फिर से 69 की पोजीशन में आ गयी… मगर अब की बार गोविन्द उस के चूतरो पर किश करने लगा… और ज़बान से चाटने लगा पहल एक चूतर फिर दूसरा चूतर… और फिर उस के दोनों चूतर खोल कर अपनी ज़बान से उस के गांड के छेद को चेरना लगा….

ोीीी… आअह्ह्ह… आशा अपनी सिसकिया न रोक सकीय… और फिर अचानक… आशा ने उस का लुंड चोर कर… उस की गोलिओ को मुंह में ले लिया और ची तरह से चूसने के बाद गोविन्द की गांड के सूराख पर अपनी ज़बान फेरी…

गोविन्द भी चटपटा गया…

अब दोनों एक दुसरे की गांड के सूराख को चाट रहे थे…

गोविन्द ने पूरी तरह से चूतर खोल कर हाथ से अंगूठो से छेद को ज़रा सा खोलते हुए अपनी ज़बान अंदर डालने की कोशिश की… ज़ाहिर हे के अंदर तो न दाल सका ज़बान मगर आशा ने बोहत hi ग़ज़ब का झटका खाया…. ोीी… मा… आआह…

आशा भी जैसे उस का पूरा मुक़ाबला कर रही थी… उस ने बोहत सारा थूक गोविन्द की गांड पे दाल कर अपनी एक ऊँगली उस के छेद में डालने लगी… अब गोविन्द भी …. ोोोुयी… mmmm…aaah…

आशा ने फिर से ज़बान भी डालने की कोशिश की…

दोनों एक दुसरे को लुभा रहे थे और सीखा रहे थे….

आशा ने फिर से अपनी ऊँगली दबाते हुए गोविन्द के छेद पर लुंड अपने मुंह में लेलिया ुर ज़ोर ज़ोर से चूसने लगी… जैसे होश खो बैठी हो….

गोविन्द भी जोश से गांड को जान से कुरदने लगा और अपना एक अंगूठे छूट के दाने को सहलाने लगा…

आआह …. ाअम्मम्म… ोीी… mmm….mmmmaaa…. आआह….

आशा भी अब मज़े में अपने मुंह के साथ सतह अपनी गांड भी हिलने लगी… जैसे गोविन्द को कह रही और ज़ोर ज़ोर से गांड छतो… छूट के डेन को रागरो….

आशा को ऐसा लगा रहा था जैसे उस की छूट फिर से पानी चोर्ने वाली हे… परमानंद के मारे वो लुंड की टोपी पर काटने लगी… गोविन्द भी पागल सा हो कर उस की छूट को काटने और चाटने लगा और फिर दोनों के जिस्म लरज़ने लगे… दोनों हिम्मत हारते हुए फिर से झरने लगे… इस बार दोनों ने हार का ऐलान एक साथ किया था…

कर्मा गूँज रहा था…. ाः… मममम… ोीोोीी… हहममम…

दोनों ने एक दुसरे का सारा मॉल पि लिया था…

फिर आशा सीढ़ी हुई और गोविन्द के होंटो पर प्यार करने लगी और लेट गयी उस के सीने पर सर रख के…

गोविन्द… “यार अब तो खोल दो…”

आशा… मुस्कुराते हुए उस की आँखों में देखते हुए… “ग़ुस्सा तो नहीं करो गए…”

गोविन्द… “करूँ गए यार… इतनी देर सा बंधा हुए हे तुम ने…”

अब जैसे hi देर और टाइम का ज़िकर किया गोविन्द ने तो दोनों की नज़रे सामने लगे वाल क्लॉक पर गयी… वो दोनों 7 बजे से ज़रा पहले यहाँ आये थे और अब 10 बज रहे थे… ये सारा खेल खेलते उन को 3 घंटे लग गए थे…

“ओह हो…” कहते हुए आशा उठी और बैग में से कीस निकल कर गोविन्द की हथकड़ी खोल ली और फिर उस की टंगे भी खोल दी…

गोविन्द ने उठ कर अपने जिस्म को कुछ स्ट्रेच किया और फिर पास खरी आशा को अपनी बांहो में लेकर किश करने लगा… कुछ देर यूँही किश करते रहे फिर दोनों वाशरूम में आ आगये और गोविन्द ने खरे खरे पेशाब किया तो आशा उस को देख कर हनसने लगी… जब गोविन्द ने पुछा क्या हे तो अपना सर को ना में हिलती शावर खोल कर जल्दी से नहाने लगी… गोविन्द भी उस के साथ खरा हो गया… देर हो चुकी थी मगर दोनों का दिल नहीं भरा था एक दुसरे से… इतने कामुक और धुआंधार चुदाई और सेक्स के बाद भी दोनों का मैं नहीं था एक दुसरे से अलग होने का… दोनों नाहा कर बहार निकले और कपड़े पहने… गोविन्द ने जूस निकला और खुद भी पिया ुर आशा को भी पिलाया… फिर जैसे आये थे वैसे hi निकले और गोविन्द ने ड्राप करदिया आशा को पार्क के पास और उस के जाते hi खुद भी घर पोहंच गया…
 
jiaik तो मैं आभारी हूँ की आपने विस्तृत विश्लेषण पोस्ट करने के लिए समय निकाला.

साथ hi ये भी जान कर ाचा लगा के कुछ लोगो को सेक्स एक लक्ज़री की तरह से लगता हे... हम तो इस को आज तक नेसेसिटी hi समझते रहे....

दुसरे ये के जिस मात्रा में मैं ने सेक्स को अपनी स्टोरी में प्रेजेंट किया हे... क्या अब भी इस को लक्ज़री समझना चाहिए.... :यूरोक:

खैर आप के उदार शब्दों ने मुझे और आगे लिखने के लिए प्रोत्साहित किया.

एक बार फिर धन्यवाद. :थैंक्स:
 
EPISODE – 67

गोविन्द और आशा की कामुक और धुआंधार चुदाई के बाद भी दोनों का मैं नहीं था एक दुसरे से अलग होने का… दोनों नाहा कर बहार निकले और कपड़े पहने… गोविन्द ने जूस निकला और खुद भी पाया ुर आशा को भी पिलाया… फिर जैसे आये थे वैसे hi निकले और गोविन्द ने ड्राप करदिया आशा को पार्क के पास और उस के जाते hi खुद भी घर पोहंच गया…

गोविन्द अब तक जितनी बार भी सेक्स कर चुक्का था उस को उन सब में बोहत आनंद आया था… मगर आज जो उस को अनुभव हुआ था वो अद्भुत था… ऐसा कभी पहले उस ने महसूस नहीं किया था…

आज वो 2 बार फ़ारिग़ हुआ था… फिर भी इस वक़्त कुछ कसक सी थी… कोई कमी सी थी… ऐसा मैं छह रहा था के वो दोनों अभी कुछ दिएर और साथ रहते या काम से काम एक दुसरे को अपनी बांहो में लेकर लेते रहते… उस को अब आशा की उन फीलिंग्स का अहसास हो रहा था जो उस ने महसूस की थी पहली बार सेक्स के बाद और वो चाहती थी के दोनों कुछ और साथ रहें…

ये सब सोचते वो घर पोहंच गया… सब अपने रूम्स में जा चुके थे… गोविन्द के लिए खाना डाइनिंग टेबल पर रखा था… गोविन्द उस माकन पर पहले hi नाहा चुक्का था तो उसे नहाने की ज़रोरवत नहीं थी… उस ने थोड़ा सा खाना खाया और कमरे में आ गया… और कपड़े उतर कर काफी दिएर ऐसे hi बीएड पर लेता रहा नंगा… आज पहली बार वो इस तरह से लेता था जैसे कुछ प्यास रह गयी हे बाक़ी… फिर उस ने सोचा के कुछ पहन लिया जये… उस ने कैबिनेट खोली तो सामने उसे एक “बॉक्सर” नज़र आया… ुए ने सोचा के चलो अभी यही पहन लेते हे… बॉक्सर काफी छोटा था और ऊपर से उस ने एक लूसे t-shirt पहन ली…

बीएड पर लेट कर पहले तो उस का धयान गया सेठ राजेंदर के मैनेजर की ओर… उस ने बैग्स चेक नहीं किये थे… और उस के ख्याल के अनुसार बैग्स जैसे वो सेठ की हवेली से लाया था अब तक उसी कंडीशन में होंगे… वो ट्रैन में बेथ चुक्का था मुंबई जाने के लिए…

उस के बाद फिर से ख्याल सताया आशा का तो वो पोहंच गया आशा के दिमाग़ में और हैरान हुआ के आशा के जिस्म पे कोई कपड़ा नहीं हे और वो बीएड पर नंगी लेट कर एक हाथ से अपने चुके और दुसरे हाथ से अपनी छूट के दाने को सेहला रही थी… आँखे बंद थी और ाः… गोविन्द…. ममम आआह… गोविन्द… कर रही थी… गोविन्द ने उस के दिमाग़ को टटोला तो देखा के उस का भी दिल नहीं भरा था और वो अभी अधिक सेक्स करना चाहती थी… इसी लिए गोविन्द को याद कर रही थी… पहले तो गोविन्द ने सोचा के फिर से कोई चक्र चला कर आशा के पास पोहंच जये मगर फिर सोचा के ये ठीक नहीं होगा… उस की ऑफिसियल रेजिडेंस हे… कोई लफड़ा हो गया तो उस की नौकरी को भी इशू न हो जये…

फिर से आशा के दिमाग़ में गया तो वो अब अपनी एक ऊँगली अंदर बहार कर रही थी… और दुसरे हाथ से अब दाने को सेहला रही थी… इस मंज़र ने गोविन्द को भी उत्तेजित कर दिया और उस का लुंड भी होशियारी पकड़ने लगा…

और देखते देखते बॉक्सर के एक साइड से तंग के पास से बहार निकल आया… गोविन्द खुद भी ये देख कर हंसने लगा … ऐसे जैसे सांप निकल आया हो…

जितना हिस्सा बहार निकला हुआ था… गोविन्द उसी को सहलाने लगा…

गोविन्द ने भी अपनी आँखे बंद कर ली और आशा के दिमाग़ में उस को मज़ा लेते हुए आनंद लेने लगा…

अचानक बहार से किसी चीज़ के गिरने की आवाज़ आयी… गोविन्द एक डैम से बीएड से छलांग लगा कर उतरा और कमरे से बहार आ गया…

बहार आने पर उस को पाप और माँ के बीच ज़ोर ज़ोर से बाटे करने की आवाज़ आयी… वो किसी बात पर झगड़ा कर रहे थे… वो जैसे hi उन के कमरे के दरवाज़े के पास हुआ तो पापा ने उसी वक़्त दरवाज़ा खोल दिया कमरे का… और घुसे में बहार आने लगे… और कमरे में सामने खरी माँ रो रही थी…

पापा… “बीटा तुम hi कुछ इस को समजाओ… में तुम्हारे कमरे में जा कर ज़रा लेटता हु…” और वह से निकल कर गोविन्द के कमरे में चले गए…

माँ, गोविन्द को देखते hi और ज़ोर ज़ोर से रोने लगी…

गोविन्द परेशां हो कर उन के पास गया और उन को चुप करने की कोशिश करने लगा… चुप तो वो न हुई मगर खुद से गोविन्द के गले लग गयी…

गोविन्द उन के दिमाग़ में गया तो पता चला के पापा ने आज उन के साथ ज़बरदस्ती करने की कोशिश की जिस कारन से दोनों के बीच झगड़ा हो गया…

गोविन्द उस वक़्त अपनी स्तिथि के बारे में भूल चुक्का था के वो इस वक़्त सिर्फ बोसेर्स में हे और उस के लुंड का उभार साफ़ दिख रहा हे… उस वक़्त माँ भी टैंगो तक आती एक निघ्त्य पहने हुए थी…

माँ चुप न हुई तो गोविन्द उन को अपने गले से लगा कर चुप करने लगा… और दोनों काफी करीब थे… माँ के चुके धंस गए थे गोविन्द के सीने में… गोविन्द को भी आकर्षक लगने लगा… और उस के सीधा खरे होने के कारन उस का लुंड सीधा ताँता हुआ कुछ हिस्सा बॉक्सर की एक साइड से निकल आया… गोविन्द का धयान इस तरफ़ा न था… वो तो परेशां था के पापा को ज़बरदस्ती नहीं करनी चाहिए थी और अब गोविन्द को क्या करना चाहिए…

गोविन्द को इस बात का अहसास न था के माँ का चेहरा नीचे होने की वजा से उन को ये सब दिख रहा हे और अब उन का रोना काम होता गया… और उन की साँस कुछ तेज़ सी होने लगी…

गोविन्द ये समझ रहा था के शायद उस के समझने पर माँ चुप हो रही हे… और वो उसी तरह से उन का सर सहलाता रहा…

माँ ये समझ रही थी के गोविन्द का लुंड उन के कारन खरा हो रहा हे और वो प्रभावित हे उन की ओर…

गोविन्द… बस सोचने पर लगा हुआ था के कैसे इस समस्या को सुलझाना हे और वो माँ के दिमाग़ में अगर उस वक़्त जाता तो कुछ अपने आप को ठीक कर लेता या दूर कर लेता खुद को माँ से…

माँ के दिल में क्या समायी के उन्हों ने अपने आप को और करीब करते हुए गोविन्द से अपनी एक टांग गोविन्द के लुंड के पास कर दी… उस वक़्त माँ की टंगे दिख रही थी क्यों के निघ्त्य बस उन को ज़रा सा hi ढांप रही थी… इस लिए जब उन की नंगी तंग करीब हुई बॉक्सर से निकले हुए लुंड की टोपी से तो गोविन्द सचेत हो गया मगर हटा नहीं न माँ को दूर किया…

उस का दिमाग़ फिर से सोचने लगा उस प्यास की तरफ जो रह गयी थी आशा के साथ कामुक सम्भोग करने के बाद… और उस को भी लुंड की टोपी पर माँ की नंगी तंग का स्पर्श आनंद देने लगा…

7-8 साल से माँ ने सेक्स नहीं किया था… मगर वो अब भी एक्टिव थी और अचे खाने खोराक और खुश रहने की वजा से उन की सेहत भी काफी ठीक थी बस एक खौफ था सेक्स करने के प्रति… उस ऑपरेशन के बाद…

मगर गोविन्द की ओर वो भी आकर्षक थी… गोविन्द के अंदर एक जिस्मानी आकर्षण पैदा हो चुक्का था औरतो के लिए… शक्ति प्राप्त होने के बाद… माँ अपने पति की ओर इतना आकर्षक नहीं थी जीता के गोविन्द की ओर…

ऐसा नहीं था के वो दोनों एक दुसरे ेके साथ सम्भोग करने के लिए नज़दीक हुए थे बस एक दुसरे के लिए आकर्षण होना और उस पर इस वक़्त एक अचानक हुए घटना की वजा से एक दुसरे के करीब आना और माँ का ये समझना के गोविन्द उन को पसंद करता हे और गोविन्द की दिमाग़ी स्तिथि इस तरह की बन चुकी थी आशा के साथ सम्भोग के बाद…

इस लिए दोनों कुछ दिएर ऐसे hi खरे रहे खामोश और बग़ैर कोई हरकत किये…

गोविन्द ने जब उन की सोच पढ़ी तो वो अब सेक्स करने के लिए मेंटली तैयार हो रही थी… गोविन्द के जिस्म की गर्मी के कारन वो प्रभावित हो रही थी… पहले जब पापा उन को टच कर रहे थे तो वह उन को ाचा नहीं लग रहा था…

अब गोविन्द को ये बात समझ में आयी के वो उन को अपने जिस्म की गर्मी की आंच दे कर कुछ और प्रभावित कर ले और फिर पापा को बुलवा कर दोनों को एक दुसरे के पास कर दिया जये तो हो सकता हे के कुछ बात बन जये…

चाहे ये गोविन्द का ख्याल ग़लत सही और शायद खुद उस की अपने यौन रूप से तैयार होने के कारन हो मगर ज़ाहिरी टूर पर नियत ठीक थी उस की… और न hi वो खुद सेक्स करने की सोच रहा था माँ से… वो बस उन को थोड़ी सी आंच देना चाहता था… अपने बदन की… जैसे के एक कार की बैटरी डाउन हो और उस के साथ दूसरी कार की बैटरी को मिलाया जये तो पहली वाली कार भी स्टार्ट हो जाती हे…

गोविन्द ने माँ के अचेतन (सबकसकीयस) में सोच पैदा की… “गोविन्द के पापा के साथ सम्भोग कर के में संतुष्ट हो जॉन गई…”

माँ के सचेत (कॉन्ससियस) में विचार उभरे… “मेरा मैं गोविन्द के साथ सम्भोग करने का हे… में गोविन्द की ओर आकर्षण हु…”

इस तरह से गोविन्द की प्रयास को माँ के सचेत (कॉन्ससियस) से विरोध मिलता रहा.

अब एक जंग चल रही थी माँ के अचेतन (सबकसकीयस) और सचेत (कॉन्ससियस) में और दूसरा खेल दोनों के सट्टे हुए बदन खेलने लगे… समस्या ये हुई के गोविन्द का धयान इस ओर नहीं था के भले hi वो माँ के अचेतन (सबकसकीयस) में विचार फूँक रहा हे मगर दोनों के बदन भी एक दुसरे से बात कर रहे थे और जिस्मो की बात तो हमेसाह hi बाज़ी ले जाती हे और दिमाग़ या अकाल कहा काम करती हे उस समय…

गोविन्द तो व्यस्त था दिमाग़ में विहारों को मोर्ने में और माँ अपना हाथ फेरने लगी गोविन्द के सीने पर… और अपने चुके रगड़ने लगी… अब गोविन्द को जैसे होश आया… मगर बात अब पोहंच चुकी थी वहां जहाँ वापसी के लिए कोई मोर नहीं था… और शायद गोविन्द अपनी पहले से चल रही शारीरिक उत्सुकता के कारन या फिर माँ की गुदाज़ चुके के स्पर्श के कारन… वजा कुछ भी हो वो अब विरोध नहीं कर रहा था…

माँ इस पल के आनंद में इतना बहक गयी के वो मर्यादा की लकीर को लांघते हुए अपना हाथ नीचे ले जाते हुए गोविन्द के लुंड को सहलाने लगी और साथ hi गोविन्द को बाज़ू से पाकर के बीएड की ओर खेंचने लगी…

गोविन्द ने फ़ौरन चेक किया पापा को… तो वो उस के रूम में बीएड पर लेट कर इंतज़ार कर रहे थे के गोविन्द जब बुलाये गए तो जयें गए अपने कमरे में वापिस… अब ये गोविन्द जनता था के पापा ने नहीं आना वापिस खुद से लेकिन फिर भी वो बोलै माँ से…

गोविन्द… “माँ… न करें… पापा ाज्येन गए वापिस कमरे में…”

माँ फुसफुसाए… “दरवाज़ा लॉक कर दो…”

गोविन्द के लिए ये बोहत मुश्किल था उस का जिस्म उस की बात नहीं मान रहा था और माँ पूरी तरह से तैयार थी रिश्तों की उलंघन के लिए और गोविन्द कुछ शर्म के मारे के माँ उस शख्स की पत्नी हे जिस ने उस के ऊपर अहसान किया हे अपना बीटा बना कर…

फिर शायद एक कमज़ोर सी दलील या तर्क आया गोविन्द के ज़ेहन में के अगर वो कुछ आगे बढ़ जाता हे माँ के साथ तो उन का सेक्स के द्वार दर खौफ निकल जये गए…

ये सोचते उस ने मज़ीद विरोध न करते हुए माँ के साथ बीएड पर लेट गया…

माँ ने उस के होंटो पर अपने होंठ रख दिए… अब गोविन्द ने भी मरदाना वॉर जवाब देते हुए माँ के होंठ चूसे और फिर उन की ज़बान पाकर कर चूसने लगा…

गोविन्द अपने हाथो से चुके भी मसलने लगा…

माँ ने अपने हाथ से अब तक गोविन्द का लुंड बॉक्सर से बहार निकल चुकी थी

गोविन्द ने कुछ देर उन के कान और गले पर किश किया और ज़बान फेरी और फिर पुछा माँ से…

ाः… aaah…mmmm… सिसकियाँ निकलने लगी माँ के मुंह से… गोविन्द समझ गया के वो पूरी तरह से तैयार हे सम्भोग के लिए…

गोविन्द… “माँ… मेरी एक बात मनो गई…”

माँ… “बोलो बीटा…” फुलपुसते हुए…

गोविन्द… “माँ… अभी प्लस आप पापा के साथ कर लें… में और आप फिर कभी मुनासिब समय पर करे गए… पापा अगर आगये तो सारा मज़ा ख़राब हो जये गए…”

माँ हेरात से उस की ओर देखने लगी… मगर फिर शायद उन को गोविन्द की बात ठीक लगी…

माँ… “ठीक हे बीटा… मगर अपना प्रॉमिस याद रखना…”

गोविन्द बीएड से उठाते हुए अपना लुंड बॉक्सर के अंदर दाल कर कपड़े ठीक करते हुए हुए… “थैंक यू माँ बस पापा को इंकार मत की जिए गए…. ी लव यू सो मच… में पापा को भेजता हु…”

माँ… “ी लव ु तू बीटा…” दोनों ने किश की और गोविन्द अपने कमरे में आ कर पापा को कहा के वो कमरे में जयें…

गोविन्द… “पापा… माँ बोहत शर्मिंदा हे अपने व्यवहार पर और आप से भी रिक्वेस्ट हे के किसी पुरानी बात को न दोहराते हुए बस प्यार से पेश ाएँ माँ के साथ…”

पापा भी उस को थैंक यू कहते हुए अपने कमरे में चले गए…

और गोविन्द अपने बीएड पर लेट कर सोचने लगा के वो और माँ क्या करने जा रहे थे…. शुकार हे के नहीं किया…
 
EPISODE – 68

मॉर्निंग में पापा और माँ का मूड काफी ाचा था… और दोनों आपस में ाची तरह से बात भी कर रहे थे…

गोविन्द ने सब के साथ नाश्ता किया… नाश्ता करने के बाद निकल आया कॉलेज के लिए… कार चलते हुए उस का धयान इस तरफ गया के पापा ने रात को आखिर माँ के साथ ज़बरदस्ती करने की कोशिश क्यों की… उस ने पापा का दिमाग़ टटोला तो पता चला के उन को कल शाम को मैसेज भिजवाया था तेजस्वी बाई ने और ये धमकी दी थी के अगर वो उन के हाँ न गए कोठे पे तो प्रेस को और सब को पापा की कथित और झूट मूट की बेटी के बारे में बता देगी. गोविन्द को काफी ग़ुस्सा आया इस बात पर… वो बराबर हफ्ते के पैसे भिजवा रहे थे तेजस्वी बाई को इस लिए उस का धमकी देना नाजायज़ था…

गोविन्द ने भी सोचा के आज डीडीओ को शाम को उन के घर वापिस चोर्ने के बाद वो ज़रूर कोठे का रुख करे गए और सामना करे गए तेजस्वी बाई का…

कॉलेज अटेंड करने के बाद वो विक्रम के पास शोरूम पोहंचा और विक्रम को कहा के वह के किसी कर्मचारी को लिस्ट देदे वेजटेबल्स की जो के ले जनि थी वापसी में दीदी ने साथ… और गोविन्द ने पैसे भी डेडिये उस कर्मचारी को… फिर वो विक्रम को साथ लेकर उन के घर की साड़ी पेमेंट कर के उस को मोटर साइकिल भी दिलवा दी और विक्रम को ये भी कहा के वो एक कार और एक मोटर साइकिल देखे बापू और प्रकाश के लिए… फिर दोनों ने प्रॉपर्टी डीलर को घर की रिपेयर और पेंट वग़ैरा की बात भी कर ली... के 2-3 दिन तक पूरा काम करवा दे… विक्रम किरण और ेषणा के स्कूल ट्रांसफर सर्टिफिकेट भी ले आया था गाँव के स्कूल से… वो गोविन्द ने ले लिए और अगले दिन शहर के स्कूल में एडमिशन का सोच लिया… प्रॉपर्टी डीलर के पास से वापसी पर उस ने वेजिटेबल के शॉपिंग बैग्स कार की डिग्री में रख दिए…

2 बजने वाले थे… वो अपनी डीडीओ को चेक करता हुआ उन के घर के पास पोहंचा hi था के दोनों घर के दरवाज़े से निकलती दिखयी दी… दोनों ने बोहत ख़ूबसूरत साड़ी पहनी हुई थी और चेहरे ख़ुशी से दमक रहे थे…

गोविन्द ने कार उन के पास रोकते हुए पहले अक्षरा को पीछे बिठाया दरवाज़ खोल कर… फिर वर्षा का हाथ पाकर कर उस को दूसरी तरफ ले जाकर अपनी साथ वाली अगली सीट पर बिठा दिया… वर्षा शर्मा रही थी उस के यूँ हाथ पकड़ने पर बीच रोड पर… अक्षरा हंस रही थी… दोनों बोहत खुश थी…

अक्षरा… “हम तो घर से निकलते हुए ये बात कर रहे थे के मुन्ना का इंतज़ार करना परे गए रोड पर… तुम तो वक़्त के बारे पाबंद निकले… पहले से hi खरे थे बहार…”

गोविन्द… “क्या करू दीदी… तुम दोनों के हुस्न ने तो मुझे इतना दीवाना कर दिया हे के में तो आज सुबह से यहाँ खरा था के कब 2 बजे गए और कब तुम दोनों परिओ की मोहिनी सी शकल देखने को मिले गई…”

वर्षा… “झूठे… तुम ने इतनी साड़ी बाटे कहाँ से सीख ली हैं…”

गोविन्द… “कोण सी वाली बात के बारे में कह रही हो… उस दिन सुबह को कमरे वाली या फिर…” गोविन्द ने बात को आधे में चोरते हुए वर्षा को आँख मार दी…

वर्षा हँसते और शरमाते हुए उस को मुक्के मरने लगी…

यूँही बहन भाई के बीच हंसी मज़ाक़ के चलते घर आ गया… वर्षा और अक्षरा दोनों लाला जी के बंगला को देख कर बोहत हैरान हुई के कितना शानदार हे…

गोविन्द कार पार्क कर के दोनों को लेकर लाउन्ज में आया तो एक डैम से माहौल पूरा जज़्बाती और भावक हो गया…

पहले तो दोनों माँ के गले लग कर खूब रोने लगी… माँ भी रोने लगी… और फिर बापू और सब रोने लगे…

ेषणा, सीमा और माँ भी रो रही थी…

पापा की आँखें भी नाम थी…

गोविन्द hi था बस जो शांत था… और वो बोलै…

गोविन्द… “माँ… माँ… क्या खूब स्वागत कर रही हो आप दोनों घर आयी बेटियों का…”

ये सुनते hi सब चुप हो गए और रोना चोर कर बैठने लगे… माँ ने कहा के बस तैयार हे लंच वग़ैरा… और चली गयी किचन में… सीमा और ेषणा भी साथ चली गयी किचन में… वर्षा और अक्षरा को गोविन्द ने पहले hi कह दिया था के लंच साथ करे गए… खाना खाने के बाद सब बेथ गए लाउन्ज में… हंसी मज़ाक़ चलता रहा… सब बोहत खुश थे… पापा ने 3 बजे कहा के वो जा रहे हे ऑफिस तो गोविन्द उन के साथ बहार निकल आया…

माँ और सीमा ने भी ये सोचते हुए के इस परिवार को कुछ समय देना चाहिए दोनों अपने रूम्स में चली गयी… अब लाउन्ज में बस माँ, बापू, प्रकाश, दिदिया और ेषु रह गए…

गोविन्द ने पापा के साथ बहार आते हुए पुछा के सब ठीक हे… तो पहले तो पापा समझे के गोविन्द रत के बारे में पूछ रहा हे… तो पापा कुछ हँसते हुए कहा के ठीक रहा तुम ने ठीक समझाया अपनी माँ को…

गोविन्द… “फिर पापा आप परेशां क्यों लग रहे हैं…??”

पापा कुछ दिएर के लिए चुप रहे और फिर गोविन्द को तेजस्वी बाई की धमकी के बारे में बताया तो गोविन्द ने उन को तस्सली देते हुए कहा के चिंता न करे वो संभल ले गए…

पापा… “कभी तो में परेशां हो जाता हु के तुम इतने सरे काम अकेले कैसे कर लेते हो…”

गोविन्द उन को दिलासा देते हुए… उन को कार में बिठा कर रुखसत करते हुए लाउन्ज की तरफ जाते हुए सेठ राजिंदर के मैनेजर के पास चला गया… मैनेजर होटल में रूम ले चूका था… और इस वक़्त रेस्ट कर रहा था… 4 से 5 तक उस ने लॉबी में बैठना था…

लाउन्ज में 3-सीटर सोफे पर माँ और उस की तीनो बहने बैठी थी… बापू और प्रकाश भी बोहत खुश थे…

गोविन्द भी उन की हंसी मज़ाक़ में शामिल हो गया…

4 बजे के करीब माँ और सीमा भी आगये थे लौंग में और फिर छाए का दौर चला…

इस बीच गोविन्द मैनेजर को चेक करता रहा…

वर्षा और अक्षरा के रुखसत के वक़्त फिर से कुछ भावक हो रही थे तो गोविन्द ने उन को संभाला... माँ ने उन को एक एक साड़ी दी और माँ ने सोने के कंगन दोनों को दिए… फिर दोनों बहने गोविन्द के साथ निकल आईं वहां से और 5 बजे ठीक गोविन्द ने दोनों को ड्राप करते हुए सबज़ियो के शॉपिंग बैग्स भी निकल कर दिए उन को… और उन दोनों को चोर कर गोविन्द ने रुख किया तेजस्वी बाई के कोठे का…

कार कुछ पहले hi रोक दी गोविन्द ने और पार्क करदी… आगे से एक नयी दुनिया थी जिस की ओर कभी गोविन्द गया न था… आगे गालियां थी तंग सी… बादाम… घुटन से बाहरी… गोविन्द कुछ ऐसे hi विचार लिए उन गलियों में दाखिल हुआ…

चहल पहल इतनी नहीं थी… अभी तो बस शाम हो रही थी….

यहाँ तो बस रातें जवान होती हे… दिन ढल जाते हे… एक अलग दुनिया हे ये… रातो को रोज़ शादियाने बजते हे… महफिले जमती हे… रक़्स होता हे… हवा की बेटी को एक बिकाऊ माल बना कर पेश करते हे इस बाजार में… इसी लिए तो जब वो हवा की बेटी की रूह पूरी तरह से कुचल दी जाती हे तो वो भी एक ज़ख़्मी नागिन की तरह अपने पास आने वाले हवस के मारे मर्दो को किसी तरह से भी माफ़ी न देते हुए उन के तन के कपड़े तक उतार लेती हैं… क्यों के ये सब उन हवा की बेटियों ने उन हवसी मर्दो से hi तो सीखा होता हे… के जिस्म का बीऑपर hi यहाँ का धरम हे ईमान हे…

यहाँ दुनिया के सब से पवित्र रूप औरत के नहीं मिलते… माँ का नूरानी रूप… बहिन का लजा से भरा रूप और बीवी का हमदर्द दोस्त या साथी का रूप

यहाँ कोई माँ नहीं जो अपने bête के लिए दुआ का घर हो… यहाँ कोई बहन नहीं जो बही के लिए ग़रूर हो… यहाँ कोई बीवी नहीं जो शोहर के लिए एक ज़िन्दगी की साथी हो…

यहाँ बस जिस्म हैं… रूह से खाली…

मर्दो की इस बनायीं दुनिया में औरत बीऑपर की अलामत हे सदियों से… कहते हे के जसीम फरोशी दुनिया का सब से क़दीम धंदा हे… मगर उस का सौदा करने वाले मर्द ये नहीं जानते के वो बस जिस्म खरीद रहे हे… जज़्बात नहीं…

जिस्म तो बिक सकते हैं मगर जज़्बात नहीं…

बोझल क़दम जैसे जैसे आगे बढ़ रहे थे गोविन्द के… पहले उस को फूलों और ित्तर की शॉप्स नज़र आईं और दुकान वाले उस को अजीब नज़रो से देख रहे थे के लगता तो किसी शरीफ और अचे घर का नौजवान हे ये यहाँ कैसे…

कोठे तो क़ब्रस्तान होते हे शरीफो की शराफत के…

गोविन्द को इन गलियों में अपने एक एक क़दम पर ये गुमान हो रहा था के वो बोहत भरी हो गए हे… क़दम उस के साथ नहीं जाना चाहते… दिल की धरकने भी तेज़ थी के इस गुनाहो की बस्ती को बसने वाले वो कैसे हवसी मर्द होंगे जो के औरत ... जो के इस दुनिया की सब से खूबसूरत तख़लीक़ हे… उस के जिस्म को रोंडा जये और हर शाम वो फिर जागे उठे और फिर से सितम करने वालो के लिए सज्जे सांवरे और ामान्तरण करे के आओ अपनी भें बेटी को फिर से रोण्डो… उस के जिस्म की धजिया ुराओ और उस की रूह पे ज़ख़्म लगते जाओ गहरे…

एक मर्द को बचपन से सिखाया जाता हे के मर्द रट नहीं मगर कोई माँ अपने बचो को ये क्यों नहीं सिखाती के मर्द रुलाते भी नहीं…

गोविन्द के खयालो की तान उस वक़्त टूटी जब उस ने एक मोर मुरा और सामने कुछ लोग जमा थे और कुछ शोर सा था वह पर…

वो तेज़ क़दमों से उन के पास पोहंचा तो देखा के एक साइकिल टेंगा में एक लड़की बैठी बरी चादर में लिपटी और उस के पास एक घुंडा सा मर्द जी के हाथ में रामपुरी चाकू हे वो चाकू को लहराते हुए… कह रहा हे के…

घुंडा… “आज तेरी जवानी की पूरी क़ीमत वसूल करके रहे गए ये नामू दादा… में अब रोज़ के धोके में आने वाला नहीं…”

और शायद लड़की के साथ एक हिजड़ा सा मर्द हे जो के हाथ लहरा लहरा कर कह रहा हे…

लड़की का साथी हिजड़ा… “अरे तो दादा तेरे से रुप्पे पैसे लिए बाई ने तू इस बेचारी के पीछे क्यों पारा हे… हम तो बस दर्ज़ी तक जा रहे हे… बीबी के कपड़े लेने…”

नामू दादा… “नहीं… में अब बाई के रोज़ के बहनो में नहीं आने वाला आज में इस को अपने साथ ले जॉन गए… बोहत माल खा लिया बाई ने मेरा…”

सब लोग खामोश खरे बस तमाशा देख रहे है…

गोविन्द अब कुछ और क़रीब हुआ तो देखा के लड़की ने एक बरी सी चादर ली हुई हे सरे बदन पर और बस उस की आँखे हे परदे से बाहर थी…

गोविन्द और उस लड़की की आँखे बस एक पल के लिए मिले और फिर गोविन्द को ऐसा लगा के जेसे ज़िन्दगी वही ठहर गयी हो… काली खूबसूरत आँखों में वेह्शत, बेबसी, बेचैनी, फर्याद सब कुछ था...

"हम हसीं होने का दावा तो नहीं करते,

पर आँख भर देख ले जिसे उससे उलझन मई दाल दे"
 
में दिल से माफ़ी चाहता हु के इतनी दिएर से आप के मैसेज का रिप्लाई किया...

मगर मैं पूरी सचाई से कहना चाहता हु के ये मेरी पहली स्टोरी हे और मैं पूरी म्हणत रिसर्च और जज़्बात से कहानी लिख रहा हु.. इस लिए नेक्स्ट अपडेट था के गोविन्द को जाना था कोठे पर और मैं खुद तो कभी गया नहीं किसी भी कोठे पर तो ये मेरे लिए जानना ज़रूरी था के कोठे पर आयाशी के लिए जाने वालो के और साथ साथ वैशियो और तवाइफ़ों के क्या इमोशंस होते हैं... इस लिए मुझे स्टडी करना पारा जैसा के में हमेशा हर अपडेट से पहले करता हु तो इस लिए दिएर हो गयी रिप्लाई करने मैं.... उम्मीद हे अप्प माफ़ करें गए अपने भाई को और इसी तरह से कहानी को पसंद करते रहे गए.... रिप्लाई पोस्ट करते रहे गए...
 
jiMain आपकी उदार टिप्पणियों के लिए आभारी हूँ.

यह भी आवश्यक है की पाठक भी ऐसे लेखकों को प्रोत्साहित करते रहें ताकि अच्छी मानसिकता बनी रहे और कायम रहे.

तेजस्वी बाई का आगे चल कर बोहत महत्वपूर्ण रोले होने वाला हे... ऑलमोस्ट 360 डिग्री चेंज... हाउ तहत वे विल सी .... सो वो अपने नाम की लाज कैसे रखती हे...

खैर आप के उदार शब्दों ने मुझे और आगे लिखने के लिए प्रोत्साहित किया.

एक बार फिर धन्यवाद. :यूरोक:
 
पहले तो में आप से एक रिक्वेस्ट करूँ गए के रेगुलर मैसेज पोस्ट कीजिये...

दुसरे दोस्त ये जल्दी नहीं हुआ हे... ये सब हुआ हे 68 उपदटेस में...

घलती मेरी ये हे के में ने 35 दिन में हे में 68 अपडेट दे दिए हे... आगा र ये साडी कहानी 1 से 2 साओल में आती... और इन सब के चलते बीच में 3 या 4 बारे 5 या 6 बरअक्स आते... कुछ दोस्त गलियां देते... कुछ दोस्त हाथ जोरते के प्लस अपडेट दीजिये... तो आप को भी ऐसा न लगता...

मुझे प्लस ऐसी स्टोरी ज़रूर बताइये जहाँ पर 35 या 40 दिन में 70 के करीब अपडेट पोस्ट हो गए हों...

दोस्त दूसरा हर स्टोरी का अपना प्लाट होता हे... अपना फ्लो होता हे... किरदारों की भूमिका अलग अलग होती हे... सो ओने स्टोरी कन्नोत हैवे आल थे गुड थिंग्स इन आईटी... नथिंग इस परफेक्ट... बूत वे शुड लर्न तो टेक एंड पाय ग्रटीटुडे तो थे गुड साइड...

खुश रहिये....
 
EPISODE – 69

लड़की ने जिस तरह से गोविन्द को देखा था उसी तरह वह पर मौजूद हर व्यक्ति को देखा था… सब के सर या तो झुके हुए थे या फिर ये उन के लिए एक अधिक तमाशा था… और सब लोग तमाशबीन थे…

हिम्मत की तो सिर्फ गोविन्द ने जिस ने नामू दादा को बोहत शांत लहजे में कहा…

गोविन्द… “जाने दो इस लड़की को… और मुझे बताओ कितने पैसे रुपए खर्च किये हे तुम ने…”

नामू दादा… “तुम कोण हो… इस लड़की से तुम्हारा क्या सम्बन्ध हे…”

गोविन्द… “में इस लड़की को जनता भी नहीं… बस तुम से कहता हु के जाने दो इस को… और जितना तुम ने खर्च किया हे वो मुझ से लेलो…”

नामू दादा… “इस लड़की को तो में लेकर जॉन गए… और लौंडे में तुम्हे आखरी बार कह रहा हु के तुम मुझे जानते नहीं हो… तरोई दिएर में तुम्हरी लाश यहाँ पारी होगी…”

अब लड़की की आँखों में गोविन्द के लिए हमदर्दी नज़र आने लगी थी और वो दिल hi दिल में अपनी हिफाज़त के साथ इस बहादुर नौजवान के लिए भी दुआ करने लगी…

गोविन्द ने समझ लिया था के दादा ऐसे मने गए नहीं… और उस के सामने खरा हो गया तन्न के… जैसे कह रहा हो के में तो नहीं डरता तुम से…

नामू दादा, गोविन्द का ये एतमाद देख कर कुछ दिएर के लिए खामोश हुआ मगर फिर उस ने अचानक वार किया…. गोविन्द पहले से तैयार था और जान चूका था... उस ने भी अपने सर को ज़रा सा पीछे किया और चाकू बस उस की गार्डन के पास से गुज़र गया… बस हल्का सा गोविन्द की शर्ट के बाज़ू को टच करता एक छोटा कट लगा दिया…

चाकू वाला हाथ जैसे hi गोविन्द के सर के पास से गुज़रा… उस ने चाकू वाले हाथ को अपने हाथो में पकड़ते हुए नीचे की ओर झटक दिया… दादा का चाकू वाला हाथ गोविन्द के दो हाथो की मज़बूत ग्रिफ्ट न सेह सका और वो नीचे झुक गया… गोविन्द ने उस के हाथ को छोरा नहीं और साथ hi जब वो झुका तो उस के पीछे आते हुए उस के घुटने वाली जगा पे अपना घुटना मारा…

दादा पहले से झुका हुआ था और घटने पे चोट पीछे से लगने से उस का संतुलन बिगड़ गया और वो धरम से ज़मीन पर जा गिरा…

दादा के हाथ से चाकू भी दूर जा गिरा…

और फिर गोविन्द ने दादा के पास आते हुए अपना हाथ आगे बढ़ा दिया जैसे वो उस की मदद करना चाहता हो उठाने के लिए…

उस ने गोविन्द का हाथ पाकर कर … उठाने की बजाये उस को भी नीचे hi खेंचा… गोविन्द तो जनता था ये तो उस ने नीचे गिरते हुए अपना घुटना मरते हुए गिरा दादा के सीने पर…

दादा चाहता तो ये था के उस को नीचे गिरा कर खुद ऊपर चढ़ बैठे उस के मगर गोविन्द ने उस के उलट करते हुए उस के सीने पर भरपूर चोट मरी…

अब दादा भी चीख पारा दर्द के कारन और समझ गया के नौजवान भी तगड़ा हे…

अगला वार भी कर दिया गोविन्द ने… एक ज़ोर का मुक्का मारा पहले उस के चेहरे के एक तरफ और फिर दूसरी तरफ… गोविन्द चढ़ा हुआ था दादा के सीने पर और उस ने अब सर ऊपर उठा कर हिजड़े को जो के लड़की साथ था उस को इशारा कर दिया के वो निकल जयें… तो साइकिल टेंगा वाले ने फ़ौरन अब कोठे की गली से बहार जाने के बजाये साइकिल टेंगा वापिस मोर कर कोठो की तरफ चलते हुए जाने लगा…

इतनी दिएर में दादा ने मौके से फ़ायदा उठाते हुए अपने हाथो से गोविन्द के गले को ग्रिफ्ट में ले कर उस को गिराने लगा… वो कामयाब भी हो जाता अगर गोविन्द उस के दिमाग़ में न जाते हुए उस को कण्ट्रोल करते हुए न शरीफ हाथ हटाए उस के और साथ में फिर से दो मुक्के मर दिए दादा के मुंह पे… मगर दादा भी ज़िद्दी था क्यों के यहाँ उस को कभी मर नहीं पड़ी थी…

ये सब समझते हुए गोविन्द ने फिर से दो मुक्के मारे उस के मुंह पर… इस बार दादा के मुंह से और नाक से खून निकलने लगा और उस ने भी अब हाथ दाल दिए… वो अब ढीला पर गया था…

अब गोविन्द ने उठाते हुए… दादा को भी अपने साथ ऊपर उठा लिया और वह खरे लोगो से पानी के लिए कहा… गोविन्द ने पानी की बोतल ले कर पहले पानी मारा दादा के चेहरे पर फिर बूटले उस के मुंह से लगाई…

अब दादा ये सोच रहा था के ये हे कोण… पहले मरता हे फिर पानी भी पिलाता हे…

दादा का ग़ुस्सा अब कुछ ठंडा हो रहा था… गोविन्द ने उस का गिरा हुआ चाकू भी उठा कर उस को दे िया…

दादा अब अजीब नज़रो से देखता हुए वह से निकल गया…

बाकि बचे पानी से गोविन्द ने अपने हाथ धोये… और बाज़ू पे लगे ज़ख़्म को देखा… हल्का सा कट था… कोई परेशानी की बात नहीं थी… गोविन्द ने उस पान वाली शॉप वाले से जिस ने पानी दिया था उस से तेजस्वी बाई के कोठे का पुछा… उस ने एक तरफ बने हुए 4 कोठो में से एक बारे कोठे की तरफ इशारा कर दिया…

पान वाले ने पान खाने का पुछा तो गोविन्द ने मना हारते हुए कोठे की तरफ चल पारा…

कोठे को ऊपर जाती लकड़ी की सीढ़ियां थी… गोविन्द उन पर चढ़ कर ऊपर आ या तो सामने एक बारे सा दरवाज़ा लकड़ी का बंद था… गोविन्द के दरवाज़ा खटखटाने पर वही हिजड़ा जो के उस लड़की के साथ था उस ने दरवाज़ा खोला… और गोविन्द को देखते hi बोलै बाबू तुम ठीक तो हो… गोविन्द ने हाँ कहते हुए अंदर आ गया और बाई का पुछा…

अंदर एक छोटी सी राहदारी थी… उस के बाद एक बारे हॉल था जिस में नीचे कारपेट और उस ऊपर सफ़ेद रंग की चादर… एक गोल दायरे में गोल तकिये… यहाँ शायद मैफिल होती होगी…

गोविन्द… “तुम्हारा नाम क्या हे…”

हिजड़ा… “सरला…”

सरला… “बाबू आप यहाँ ानिका बीबी के पीछे आये हो…”

गोविन्द सोचते यूए… “हम्म्म तो ये थी ानिका… आँखें तो ग़ज़ब की हैं…”

गोविन्द… “नहीं… में तेजस्वी बाई से मिलने आया हूँ…”

सरला… “आप बैठिये…”

गोविन्द यहाँ एक बात सोच चूका था के तेजस्वी बाई से सख्ती से बात नहीं करनी… वो भी एक औरत हे… सामान की चाहत उससे भी तो होगी…

इससे पहले की कोइ व्यक्ति अपना परिचय दे, उसका व्यवहार उसे दुनिया के सामने प्रस्तुत करता है और उसका परिचय देता है.

पुरुष अपना बीज स्त्री के गर्भ में रखता है और वह उस बीज को अपने रक्त, प्रेम और गर्मजोशी से ग्रहण करती है. 9 महीने के बाद, वह एक अद्भुत रचना को जन्म देती है; एक प्यारा बच्चा.

नवजात शिशु अपने गर्भ में डाले गए बीज की तुलना में और आकार के मामले में बहुत बड़ा होता है, सबसे महत्वपूर्ण बात यह है की यह जीवन और जीवित है.

एक महिला को जो कुछ भी दिया जाता है, वह दुनिया को अधिक परिमाण, मात्रा और तीव्रता में और kabhee-kabhee प्रकृति में वापस देती है.

औरत को जो दो गए… वो उससे कई सो प्रतिशत बारे करके लौटाए गई…

औरत को प्यार और सामान दो गए… वो बदले में अधिक रूप में सामान और प्यार लौटाए गई...

औरत को किरोध और नफरत से गुज़ारो गए… तो इतनी नफरत और ज़ख़्म दे गई बदले में के सोच भी नहीं सकते…

सरला ने अपनी बात फिर से दोहरई… “आप बैठिये…”

गोविन्द… “में यहाँ नहीं बेतहु गए… में तमाशबीन नहीं हु… में मिलने आया बाई जी से… कोई और जगा हे बैठने की तो वह बिठाओ…”

सरला आश्चर्य से उस यौन रूप में सुन्दर नौजवान को देख रही थी जो बहादुर भी हे और आँखों में नम्रता भी हे लेकिन तमाशबीनी के लिए नहीं आया कोठे पर…

सरला उस को साथ लेकर बग़ल में बने एक कमरे में ले आयी…

वो कर्मा सिटींग रूम लग रहा था… सोफे और कुर्सियां और दरमियान में टेबल्स…

गोविन्द एक सोफे पर बेथ गया…

सरला उस को बिठा कर चला गया या चली गयी…

कुछ दिएर के बाद सरला के साथ एक अधेड़ उम्र खूबसूरत औरत अंदर आयी…

तेजस्वी बाई… “में तेजस्वी हूँ… मुझे सरला ने बताया के तुम ने मेरी बची की जान बचायी… कैसे आना हुआ…?”

गोविन्द ये सुनते उठ खरा हुआ और तेजस्वी बाई के पेअर छु लिए… उस के पेअर छूटे hi तेजस्वी के चेहरे के भाव बिलकुल बदल गए… साथ साथ सरला भी हार्ट से देखने लगी… अब दोनों के चेहरे पर इस नौजवान के लिए आश्चर्य के साथ पसन्दीदगी के भाव थे…

गोविन्द… “तेजस्वी माँ… मुझे आशीर्वाद नहीं दें गई…??”

तेजस्वी का मुंह खुला का खुला रह गया और जेसे किसी मशीन की तरह से उस ने दुआ दी गोवंड को लम्बी उम्र की…

तेजस्वी की सोच… “तुम कोण हो नौजवान… बहादुर हो… आँखों में चमक हे… चमकदार पेशानी हे… चाल में वक़ार हे… आज तक किसी ने हमें माँ कह कर नहीं पुकारा.. और तुम हो के मुझे माँ के शब्द से बुला कर मेरे पाऊँ छू रहे हो… और तुम्हे दुआ भी चाहिए तो तवायफ की…”

सरला भी पास खरी हैरान और परेशां हे…

सरला की सोच… “hi रे… ये तो कोई देवता सामान लग रहा हे… अशुद्ध वेश्या का आशीर्वाद चाहिए इस को… ऐसा भेदभाव रहित व्यवहार तो बस देवता सामान लोग hi करते हे… ये कोई मनुष्य नहीं हे… क्या खबर किसी और दुनिया से भेस बदल कर आ गया हो…”

तेजस्वी जो आज पहली बार माँ शब्द सुन कर अपने आप में नहीं थी उस की अचानक नज़र पद गयी गोविन्द के बाज़ू के ज़ख्म पर… और बोली… “bête ये ज़ख्म कैसे लगा…”

गोविन्द चुप रहा…

सरला बोली… “बाई जी… ये तो उस मुये गुंडे ने चाकू मारा हे इन को…”

बाई जी… “तो मेरी शकल क्या देख रही हो… जाओ जल्दी से हल्दी गरम करो और दूध ले आओ… और ानिका को भी बुलाओ… पट्टी वग़ैरा बंधे…”

और गोविन्द की तरफ देखते हुए… “माँ वारि अपने bête पर… आ बेथ मेरे पास…”

गोविन्द वही तेजस्वी बाई के पास बेथ गया… और तेजस्वी बाई उस की कमर पर हाथ फेरने लगी… और उस के अंदर एक जंग चल रही थी… सदियों से सोइ हुई औरत आज बेदार हो रही थी तवायफ के जिस्म में… आज एक माँ अपने bête से मिल रही थी…

क़दमों की चाप थी और साथ में पाज़ेब की झंकार… कोण आ रहा हे इस तरफ जिस के आने से पहले पूरे माहौल में साज़ बज रहे हे… झंकार हे फ़िज़ा में… कोई हसीं पारी हे जिस के आने से पहले कमरे की फ़िज़ा में तरंग हे और नशा सा हे हर अतराफ़…

देखो ये कोण आया

देखो ये कोण आया

मेरी सदा पे

भूल के रास्ता

ऐ दिल ये कोण आया

मुझको उड़ा लाया

किस के सदा पे

झोका हवा का

मुझको उड़ा लाया

देखो ये कोण आया

मुझको उड़ा लाया

मेरे वीराने को

किसने सजा दिया

रौनक ज़रा देखो

खुश तो नहीं हैं

क्या जाने तुम को

कैसा नशा छाया

देखो ये कोण आया

बाते बनाते हो

क्यों सच्चे झूठे

सपने दिखते हो

फिर से तो कहना

मैंने सुना नहीं

क्या तुमने फ़रमाया

मुझको उड़ा लाया
 
100% एग्रीड!!!!

इस सुपर्ब!!!!

फ्रेंड्स में ने एक 🆕 बटन ऐड किया हे इंडेक्स वाली पोस्ट पर...

स्पेशल समथिंग!!!!

मैं ने कहानी में उद्धरण और सामाजिक सन्देश संकलित करना शुरू कर दिया है. कृपया ऊपर दिए गए बटन को दबाएं और मुझे अपने विचार दें. अभी सिर्फ स्टार्ट किया हे और इस में और भी मेस्सगेस शामिल होंगे...
 
कमेंडबले रिव्यु.... ब्यूटीफुल ेंकुरागिंग वर्ड्स....

आईटी इस ा फैक्ट तहत लव एंड रेस्पेक्ट अरे पावर्स बियॉन्ड one's कॉम्प्रिहेंशन...

थी अरे डिवीने इमोशंस... नोबडी कैन रेमें अवे फ्रॉम आईटी... थी इमोशंस अरे सो इन्फेक्शस तहत ओनेस क्रॉलड ईंटो ओनेस मंद बॉडी और सोल कन्नोत बे डेटशेड....

थे गेट इन्हिबिटेड ेवरलास्टिंगली.... ी डोंट क्नोव हाउ मच ा पर्सन कैन बे ब्यूटीफुल इनसाइड और आउटसाइड हूज वर्ड्स अरे सो पावरफुल, सूथिंग एंड इटरनल...

स्टे ब्लेस्ड एंड कीप ों स्प्रैडिंग मैजिक ऑफ़ थे वर्ड्स.... यू अरे ा मैजिशियन ऑफ़ योर काइंड.... लोट ऑफ़ रेस्पेक्ट फॉर ु.... :बाउ:

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