Mere Khandan Ki Anmol Phuddiyan - Page 2 - SexBaba
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Mere Khandan Ki Anmol Phuddiyan





आठवीं क़िस्त

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मैंने दूर नॉक किया. अंदर से भाभी बोली

भाभी - दरवाज़ा खुला है.

ये इशारा था दूर नॉक करने वाला अंदर दखल हो सकता है. और मई दरवाज़ा खोल अंदर दखल हो गया. भाभी बीएड पर तक लगाए बैठी हथु में नावेल पकडे हुए थी. मुझे देख एक बार तो भाभी का मोह हैरत से खुल गया.. फिर नावेल साइड रखती हुई बोली

भाभी - तुम नहीं गए बारिश में नहाने

मई - आप के बिना बारिश में नहाने को दिल नहीं मन

भाभी - क्यों मेरा तुम्हारा तुम्हारे दिल का और बारिश का क्या कनेक्शन है

मई बीएड के करीब चेयर घसीट कर उसपर बैठता हुआ बोलै - बारिश हम मर्दों को इतनी पसंद नहीं आती जितनी आप औरतों को. भाभी जी मानिये न मानिये आप का दिल उदास है. कोई परेशानी ऐसी है. जिसने बारिश के मज़े को भी फीका बना दिया

भाभी अपने माथे पर हाथ मारती हुई बोली - बाबा तुम तो एक hi बात के पीछे hi पद गए हो. कहा न मुझे कोई परेशानी नहीं है

मई - ऐसी बात है तो फिर चलिए मेरे साथ और बारिश का लुत्फ़ उठाइये

भाभी - नहीं.. मेरा मूड नहीं है बारिश में भीगने का भी.. नहाना तो दूर की बात है

मई - मई मूड बना दूंगा.. आप उठिये.. नहीं उठना है तो फिर आप अपनी परेशानी मुझे बता दीजिये

भाभी मुझे घूर कर देखती रही.. फिर एक सांस लेकर छोड़ती हुई बीएड से उत्तरी और बोली

भाभी - तुम कितने ज़िद्दी हो फिरोज.. चलो मई चलती हों तुम्हारे साथ छत.. मई भीगोंगि.. बीमार पद गई तो फिर अफ़सोस मत करना

मई भी उठ चूका था. भाभी का हाथ थम कर बोलै - मेरी भाभी इतनी भी नाज़ुक नहीं हाँ.. मुझे यकीन है.. आप को कुछ नहीं होगा

भाभी - तुम और तुम्हारा यकीन.. अब तो बारिश में भीगना hi पड़ेगा.. फिर चाहे मुझे ठण्ड लगे या सर दर्द हो जाए.. बुखार हो या कुछ और.. अब मई नाहा कर दिखाऊँगी

मई भाभी के साथ छत पर जा पोहंचा. हम दोनों को देख माहिरा एपीआई और किन्ज़ा एपीआई दोनों भाभी को घूरने लगी.. फिर मोह टेढ़ा करती नाराज़गी जताने लगी

माहिरा - भाभी मैंने कहा तब आपने इंकार कर दिए.. अब बाबू ने कहा तो आप मान गई. क्या हम इसका ये मतलब समझें. हमारी वैल्यू आपकी नज़र में बाबू से काम है

भाभी तेज़ी से बोली - अरे नहीं नहीं. वो तो फिरोज ने ज़िद्द पकड़ ली थी.. मैंने मन भी किया.. कहा बीमार पद जाउंगी.. लेकिन ये नहीं मन. बड़ा ज़िद्दी है

किन्ज़ा - क्या आप से ज़िद्द करके कोई भी बात मनवाई जा सकती ह

भाभी बारिश में भीग चुकी थी. बारिश ज़यादा तेज़ नहीं थी. हलकी भी नहीं थी. थोड़ी सी hi देर में मई और भाभी दोनों पूरी तरह भीग गए. भाभी दोनों बाहें पहला कर अपना चेहरा ऊपर उठा गई.. मई दिल थाम कर रह गया.. कितने खुश नसीब थे बारिश के क़तरे.. भाभी के इतने हसीं चेहरे को चूमते हुए नीचे भाभी के गले से होते हुए भाभी के कपड़ो में उतर रहे थे.. वहां जहाँ दुन्या के दो अनमोल ख़ज़ाने छुपे थे.. वहां जहाँ की खुशबु दुन्या की मस्त कर देने वाली खुशबुओं से बेहतर थी. वहां से होते हुए फिर नीचे वहां से भाभी की बंद मोह वाली केव को चूमते हुए नीचे गिर रहे थे.. uffffffffff... काश मई बारिश का कोई कटरा होता.. और भाभी के हसीं जिस्म के नशेब ो फ़राज़ को पूरी तरह से जाना लेता.. भाभी की लम्बी टांगों बीच गुलाबी लबों वाली घर जो यकीनन हज़ारों शराबों से बानी कॉकटेल से भी बढ़कर नशा अवर थी. वहां से गुज़रता हुआ घर के मोह को चुम कर टांगों को चूमता हुआ नीचे बाह जाता.

किन्ज़ा एपीआई की बात के जवाब में भाभी मोह ऊपर उठाये हुए बोली - मई बारिश में नहाने आ hi गई हों तो बातों के जवाब बाद में दूंगी.. बीमार पड़ना मेरी किस्मत में है भी तो मई इस वक़्त कुछ और नहीं सोचूंगी..

फिर भाभी ने मुझे देखा. मई भाभी के गोर भीगे गाल ताड़ रहा था..

भाभी - मुझे क्यों घूर रहे हो तुम.. तुमने कहा था न कमरे में.. तुम मर्दों की निस्बत हम लड़कियों को बारिश ज़यादा पसंद है.. तो मई कहती हों हाँ... मुझे बारिश से इश्क़ है.. बारिश जब भी बरसती है मई बड़े शौक के साथ नहाया करती हों.. ाचा किया जो तुम मुझे छत पर ले आये फिरोज..

माहिरा एपीआई मूड में आती थोड़ी दूर कड़ी होकर बारिश के मज़े लेने लगी.. भाभी आगे बढ़कर माहिरा एपीआई को पीछे से हुग कर गई... मई और किन्ज़ा एपीआई दोनों भाभी और माहिरा एपीआई को देखने लगे

मई तो बारिश में भीग रही अपनी दोनों बहनो और भाभी को मस्त नज़रों से देखने लगा.. इस बार की बारिश मेरी बदल चुकी सोचों में पहली आई थी... आज बारिश में नहाने और तीनो तितलियों को देखने में अलग hi मज़ा मिल रहा था.. तीनो की ब्रा नज़र आ रही थी.. गोर बदन जितने दिख सक्के थे. दिखाई दे रहे थे. भाभी ने ब्लैक ड्रेस पहन रखा था. फिर भी उसके जिस्म की झलक साफ़ पता चल रही थी. किन्ज़ा एपीआई और माहिरा एपीआई मेरे सामने खुल कर नहाया करती थी बारिश में.. उनकी ब्रा घुटनो से नीचे का पूरा गोरा गोरा जिस्म साफ़ दिखाई दे रहा था..

फिर किन्ज़ा एपीआई ने जैसे मेरी नज़रों को भटकता हुआ देख लिए.. मेरे करीब आ कर बोली

किन्ज़ा - ये तुम टुकर टुकर क्या देख रहे हो

मई किन्ज़ा एपीआई को देख मुस्कुरा पड़ा.. यहाँ मई कंफ्यूज होता तो दिल का चोर पकड़ा जाता.. लेकिन मैं तो पहले से hi सब सोच चूका tha.iradon का कमज़ोर नहीं था मई

मई - जो भी देख रहा हों.. आप मेरी आँखों से सब देख नहीं पा रही हाँ क्या ??

किन्ज़ा एपीआई ने मुझे गहरी नज़र से देखा. फिर बोली

किन्ज़ा - देखा हम बहने और भाभी तुमपर कितना ट्रस्ट करती हाँ..

मई - क्या मई ट्रस्ट करने के काबिल नहीं हों

किन्ज़ा एपीआई ने मेरे कंधे पर हाथ रख दिया - तुम तो हम सब की जान हो

मई - हाँ एपीआई.. मई आप सब की और आप सब मेरी जान हाँ. एपीआई ये बात कभी भूलियेगा.. बचपन से हम ऐसी सैंकड़ों बारिशों में भीगते आ रहे हाँ.. और---

फिर रुक कर बोलै - आगे की बात आप कहे बिना hi समझ लें तो ाचा है

किन्ज़ा एपीआई मुझे बेशर्मों की न बोल कर इशारे में बात समझने वाली बात पर मुस्कुरा पड़ी

किन्ज़ा - बाबू तुम बहुत अच्छे बहुत प्यारे हो

मई - एहि भरोसा कायम रखना एपीआई.. मैंने कसम खाई है.. आप सब को इतना प्यार दूंगा. कोई भाई अपनी बहन को दे सका हो.. बास अपने दिल और आँखों में मेरे लिए फर्क न आने देना.. बाकि सब कुछ क़ुबूल है

माहिरा और भाभी पलट कर हमें देखती हुई एक साथ बोली - तुम दोनों क्या खुसर फुसर कर रहे हो

मई - आप दोनों क्या खुसर फुसर कर रही थी

माहिरा एपीआई - ये हम गर्ल्स के बीच की बातें हाँ मुंडिया

मई - यहाँ भी कुछ ऐसा hi मटर है

भाभी - हेहेहे... मतलब कल जो तुमने कहा.. वो सच कहा था

मई भी हस्ता हुआ बोलै - हाँ उसे सच hi समझिये

माहिरा - तो क्याआआ मई अपना मेकअप बॉक्स तैयार रखूं

मई - आप को पूछने की ज़रूरत hi नहीं है..

मैंने किन्ज़ा एपीआई के सर पर हाथ रख दिया.. फिर बोलै - एपीआई की कसम... मई आप के दिल की ख़ुशी के लिए अपणु की ख़ुशी के लिए कुछ भी कर जाऊँगा.. खास भाभी और अपनी बहनो के लिए कुछ भी.. ये फिरोज हर हद से गुज़र जाएगा...

मैंने खास भाभी को देख कर बोलै था.. भाभी चौंक कर मुझे देखने लगी थी.. जैसे मेरी बात को टोल रही हों....

माहिरा - फिर तो मज़ा आएगा

किन्ज़ा एपीआई के सर पर मेरा हाथ अभी भी था... वो मेरा हाथ पकड़ अपने सीने के साथ लगा कर बोली

किन्ज़ा - बाबू.. तुमने मेरी कसम खाई... मेरी कसम खा कर तुमने लड़के होकर लड़की का मेकअप कर लोगे..

किन्ज़ा एपीआई बड़ी हैरान हुई थी

मई - हाँ एपीआई.. मैं खुद को बदल चूका हों. और भी बदलना चाहता हों.. एपीआई आज हमारे मुल्क में कितने एक्टर हाँ.. जो पैसों के लिए मर्द से औरत बन जाया करते हाँ...

माहिरा एपीआई और भाभी करीब ा कर मेरी बात सुनने लगी

मई - क्या वो एक्टिंग करते हुए मर्द से औरत बनकर हमेशा के लिए लोगो की नज़रों से गिर जाते है.. नहीं.. जो जितना ाचा एक्ट करता है.. उसे उतनी hi ज़यादा इज़्ज़त दी जाती है.. नाम शोहरत में कई गुना इज़ाफ़ा हो जाता है.. मई तो आप सब से प्यार इन्तहा की हद तक करना चाहता हों.. आप सब की ख़ुशी के लिए क्या इतना सा भी नहीं कर सकता... नहीं एपीआई.. नहीं भाभी... ये तो कुछ भी नहीं.....

फिर मैंने फ़िल्मी स्टाइल मारने का सोच लिया.. ऐसे hi स्टाइल की तो लड़कियां फैन हुआ करती हाँ... जो मैंने करनी की सोची थी.. वैसा करने के बाद एक अलग hi तमाशा बनता.. और क्या खूब तमाशा बनता..

मई बात अधूरी छोड़ कर सब से अलग होकर कोठी की छत की दीवार जो 5फट ऊँची थी.. उसपर चढ़ गया..

मई तीनो को देख बोलै - मई आप सब के लिए जान दे भी सकता हों.. कोई शक हो तो मई अभी कूद-------

भाभी का मोह खुल गया.. ऑंखें बड़ी बड़ी हो गई.. रंग उड़ गया..

किन्ज़ा एपीआई और माहिरा एपीआई दोनों ज़ोर से चीख पड़ी

किन्ज़ा - नाहीईई.. नहीं नहीं बाबू... तुझे मेरी कसम से नीचे उतर आ.. देख दीवार पर पानी है.. तू स्लिप हो जाए... गिर जाएगा..

माहिरा - देख बाबू तेरा ऐसा मज़ाक मुझे सख्त न पसंद है..

मैंने ज़यादा परेशां करना मुनासिब नहीं समझा.. और नीचे उतर आया.. मेरे नीचे उतारते hi तीनो भाग कर मेरे करीब आयी.. और फिर मेरे गालों पर ज़िन्दगी में पहली बार दो चांटे पड़े.. एक किन्ज़ा एपीआई का दूसरा माहिरा एपीआई.. फिर दोनों रोटी हुई मेरे आगे से पीछे से मेरे सीने से लग गई.. आज तो कमल hi हो गया था.. दोनों कभी ऐसे खुल कर मेरे गले से नहीं लगी थी.. मुझे क्या पता था. ऐसा ड्रामा मुझे इतना ज़यादा इन दोनों के करीब कर देगा..

किन्ज़ा एपीआई ने मुझे आगे से जपहि डाली हुई थी.. माहिरा एपीआई ने पीछे से.. भाभी भी पास कड़ी मुझे नाराज़गी से घूर रही थी.

किन्ज़ा एपीआई - तुमने तो मेरी जान hi निकल कर रख दी बाबू

माहिरा - बाबू ऐसा हत्या मज़ाक फिर कभी मेरे साथ नहीं करना

भाभी - ये पागल भी है.. मुझे पता नहीं था.. बारिश में दीवार पर ज़यादा फिसलन होती है.. ये पागल को पता नहीं क्याआआआ ??? पूरा क्रैक है कमीना

मई स्माइल करता किन्ज़ा एपीआई और भाभी को देखने लगा

किन्ज़ा - हस्स मत बाबू... सुन मेरे दिल की धड़कन...

किन्ज़ा एपीआई सांस लेने को रुकी.... मैंने ऑंखें बंद कर ली

मई - हाँ बहुत स्पीड से धड़क रहा है आप दिल.. और माहिरा एपीआई आप का भी.. लेकिन आप तो किन्ज़ा एपीआई से ज़यादा स्ट्रांग हाँ.. फिर आप के दिल की ये हालत...

माहिरा एपीआई मुझसे अलग होकर नाराज़गी भरा एक मुक्का मेरी पीठ पर मारा.. फिर मेरे सामने आ कर बोली

माहिरा - तू जनता है न बाबू. तेरे अंदर हमारी जान है. फिर भी तूने ये ड्रामा किया

मई - प्यार सबत करने के लिए ड्रामा करना ज़रूरी होता होता है एपीआई... सच कहूं तो पता नहीं मुझे क्या हो गया है इन थोड़े से दिनों में.. लेकिन मई ये कहूंगा.. मई खुल कर जीना चाहता हों. जिनसे प्यार हो.. उनसे खुल कर प्यार करते हुए जीना चाहता हों..

बारिश अब धीमी पड़ने लगी थी..

किन्ज़ा एपीआई मुझसे अलग हो गई.. शुक्र है अलग हो गई थी. जितनी देर से वो मुझसे लिपटी रही थी.. मई खुद से लड़ रहा था. देर होती तो एपीआई के भीगे बदन के नशे में मस्त हो जाता.. फिर मेरा लुंड खड़ा हो जाता.. जो एपीआई की भीगी फुद्दी को चूमने लगता.. बारिश हो रही थी.. लुंड थोड़ा सा भी मूड में आता तो तीनो को दिखाई दे जाता.. और हो जाता मेरी फुड़दियों में घुसने वाले प्लान का पूरा का पूरा कबाड़ा.. धीरे धीरे hi काम बनने वाला था..

अब देखो.. कैसे मैंने दोनों बहनो को करीब कर लिए था.. दोनों के भीगे गरम बदन मेरे भीगे बदन से जुड़ गए थे.... जवान होने के बाद ये पहला मौका था.. और मज़ा hi आ गया था मुझे...

फिर हम नीचे जाने लगे... छत वाले दरवाज़े पर पोहंचे... तो किन्ज़ा एपीआई मेरा चेहरा देख चौंकी

फिर मेरे गाल पर हाथ फेरती हुई दुखी होकर बोली

किन्ज़ा - सॉरी बाबू मैंने तुम्हे चांटा मारा

माहिरा एपीआई को भी अहसास हुआ .. वो भी मेरे गाल पर हाथ फेरती हुई सॉरी बोली

भाभी अपने हाथ देखती हुई बोली - मैंने कभी अपने भाई को चांटा नहीं मारा. कई बार दिल भी किया... लेकिन मौका नहीं बन सका..

भाभी किन्ज़ा एपीआई और माहिरा को नॉटी स्माइल के साथ देखती हुई बोली

भाभी - तुम दोनों मेरी सिफारिश करो न.. मई भी एक हल्का सा चांटा फिरोज के गाल पर सजा दूँ.. मेरा दिल खुश हो जायेगा.. मेरा रिकॉर्ड भी टूट जायेगा

मैंने किन्ज़ा एपीआई के कान में कुछ कहा.. पहले तो वो शरमाई.. फिर माहिरा एपीआई के कान के भी वही बोली... दोनों को खुसर फुसर करते देख भाभी को दाल में कुछ कला लगा...

फिर किन्ज़ा एपीआई और माहिरा एपीआई ने भाभी को देखा.... फिर एक साथ बोली - ठीक है.. हमें कोई ऐतराज़ नहीं है

भाभी दोनों को घोर से देखती हुई बोली - कुछ लोचा लग रहा है मुझे..

किन्ज़ा - नहीं.. कोई लोचा नहीं है. आप आएं सामने.. और बाबू को चांटा मारें

माहिरा - हम दोनों बाबू के साइड कड़ी हो जाती है. आप ैसिलय बाबू को चांटा मर सकती है..

भाभी उलझी नज़रों से दोनों को देखने लगी. पहले कैसे वो मूड में आती मस्ती पर उतर आई थी. भाभी कड़ी रही. दोनों को बरी बरी देखती रही.. मुझे देखा.. मई मासूम बनकर खड़ा हो गया

भाभी मुझे ऑंखें दिखती हुई बोली - इसका दिमाग आज कल कुछ ज़यादा hi चल रहा है.. ज़रूर कुछ तो गड़बड़ है.. नहीं मई अपनी बात वापिस लेती हों

माहिरा - नहीं भाभी जी.. आप ने कहा. हमने मान लिया. अब हम कह रही हाँ तो आप को चांटा मारना hi पड़ेगा

किन्ज़ा - इंकार का कोई ऑप्शन नहीं बचा भाभी जी आपके पास

भाभी कश्मकश में पद गई.. फिर जैसे फैसला करती हुई मेरे सामने आई और हाथ उठा कर मेरे गाल पर चांटा मार दिया...

भाभी ने चांटा ज़ोर का मारा था.. अछि खासी आवाज़ हुई.. और मेरा गाल थलथला कर रह गया. मुझे दर्द भी हुआ.. लेकिन मई बर्दाश्त कर गया

किन्ज़ा - भाभी आप ने जैसे बाबू से दुश्मनी निकली है.. कितनी ज़ोर का चांटा मारा आपने

माहिरा एपीआई ने किन्ज़ा एपीआई के कण में कुछ कहा.. फिर किन्ज़ा एपीआई सर उठा कर भाभी को स्माइल से देखने लगी.. किन्ज़ा एपीआई की स्माइल देख भाभी कुछ घबराई. वह कुछ समझ नहीं पाई थी... लेकिन इतना तो समझ hi गई थी. कोई बड़ा लोचा है..

और लोचा सामने आ गया. भाभी का मोह हैरत के मारे पूरा का पूरा खुल गया.. पहले माहिरा एपीआई ने मेरे चेहरे को थाम मेरे गाल को तसली के साथ चूमा. फिर किन्ज़ा एपीआई ने मेरे गाल पर अपने होंठ सबत कर दिए...

भाभी ये देख वहां से भागने लगी.. लेकिन माहिरा एपीआई भी काम नहीं थी.. वो ऐसा hi कुछ एक्सपेक्ट कर रही थी. उन्हों ने भाभी की कलाई पकड़ ली..

भाभी घबरा कर बोली - नहीं... मई ऐसा कुछ नहीं करुँगी.. मई पहले से hi समझ गई थी.. फिरोज कमीने के दिल में कोई उल्टा सीधा hi आया होगा

माहिरा - तभी आप ने बाबू को ज़ोर का चांटा मारा..

किन्ज़ा - आप भी समझ गई थी. कीमत भरी चुकानी पड़ेगी.. इसलिए तसली से चांटा मारा.. अब शराफत एक साथ जिस गाल पर चांटा मारा है.. उसे चुम कर अपने चांटे की भरपाई कीजिये..

भाभी - मैंने कहा न.. मई नहीं करुँगी ऐसा..

किन्ज़ा - वह तो आप को करना hi पड़ेगा

माहिरा - भाभी जी आप के पास दो hi रस्ते हाँ.. या तो वही कीजिये जो हम कह रही हाँ.. वर्ण हम एहि बात बाबू से कहेंगी... फिर बाबू का मोह होगा और आप का---

भाभी - माहिरा कुछ तो शर्म कर.. मई तेरी भाभी हों.. तेरे भैया की बीवी हों.. मई भला ऐसा कैसे कर सकती हों..

किन्ज़ा - वो तो करना hi पड़ेगा आप को भाभी जी.. बड़े होने के बाद हम दोनों बहनो ने कभी बाबू के गाल को प्यार नहीं दिया.. लेकिन चांटा मार कर हमने जो गलती की.. फिर भरपाई भी की.. अब आप की बरी है.. बिना भरपाई के छुटकारा मुमकिन नहीं.. हमारे बाबू का गाल बहुत कीमती है भाभी जी

भाभी जी बहुत ज़यादा झिझक रही थी.. शर्म से उनके गाल बिना चांटे के hi लाल पड़ते जा रहे थे... फिर फिरसे कश्मकश में दिखाई देने लगी..

मई - किन्ज़ा एपीआई माहिरा एपीआई छोड़ दें भाभी जी.. हमारा और आप का मामला खून का दूध का दिलों है.. भाभी को आये ज़यादा वक़्त नहीं हुआ.. भाभी हमारे साथ खुल कर भी इतना कभी नहीं खुलना चाहेंगी तो हमें चाहिए हम भाभी को फाॅर्स न करें..... प्यार कहे जाने पर नहीं किया और दिया जाता api...pyar लेने और देने के लिए दिल में प्यार का होना भी ज़रूरी है..

माहिरा एपीआई ने भाभी की कलाई छोड़ दी.. भाभी दूसरे हाथ से अपनी कलाई पकड़ कर मसलने लगी.. मुझे तेज़ नज़र से देखने लगी.. फिर मेरे करीब आ गयी..

भाभी - बहुत बड़ी बड़ी बातें करना सीख गए हो न तुम.. मज़ा आता है न तुम्हे ऐसी बातें करके.. हर दूसरी लड़की की ज़िन्दगी में एक देवर ज़रूर आता है.. हर लड़की को तुम जैसा देवर नहीं मिला करता.. ये मई कह रही हों... सराह खान.. जिसे उसके खंडन में सबसे ज़यादा चाहा जाता है.. मेरे भी भाई हाँ. मई उनसे बहुत प्यार करती हों.. और तुममे मुझे मेरा भाई नज़र आता है. लेकिन मई अपने सेज भाई के साथ भी कभी इतनी नहीं खुल सकीय हों.. लेकिन ये भी सच है.. मेरे सेज भाइयों ने कभी तुम्हारी तरह खुल कर प्यार की बातें करना नहीं सीखा है.. खुल कर प्यार करना नहीं सीखा है.. हम ऐसे खंडन से ताल्लुक़ रखती हाँ.. जहाँ लड़की जवान होते hi अपने भाइयों से अपने बाप अपने मां और चाचा सभी से फैसले बना लेती है. ऐसे में तुम मुझे वो काम करने को कह रहे हो फिरोज. जो मैंने कभी नहीं किया.. हमारे खंडन में कभी किसी ने नहीं किया...

भाभी सांस लेने को रुकी.. फिर बोली - ठीक है.. लेकिन मेरी भी एक बात सुन लेना तुम फिरोज... लड़की कोई भी हो, बहन हो, कजिन हो, भाभी हो या खंडन में कोई भी हो.. उसे अगर खुल कर प्यार करने पर त्यार कर hi दिए जाता है तो फिर एक बात कान खोल कर तुम मेरी सुन्ना.. प्यार काम हो या ज़यादा.. ज़ाहिर में हो या बटन में.. लेकिन मेरे जैसी लड़की कभी ये बर्दाश्त नहीं कर पाएगी. कोई उसपर ऊँगली उठाये.. मई अगर मेरे hi माँ बाप के घर में महमानो के सामने अपने hi भाई के मोह को चूमुंगी तो कोई रिश्तेदार देख कर ये नहीं कहेगा. कितना प्यार करती है ये फरहा अपने भाई से. बालकः ये कहेगा... कितनी बेशरम है.. भाई से प्यार है तो क्या ऐसे hi किसी के भी सामने भाई का मोह चुम लेगी... फिरोज तुम.. किन्ज़ा तुम और माहिरा तुम... मानती हों तुम सब फिरोज से बहुत ज़यादा प्यार करती हो.. ये भी मानती हों फिरोज जैसे भाई मेरे तुम्हारे खंडन में कोई दूसरा नहीं होगा.. मई फिरोज का गाल चूमुंगी.. लेकिन अगर किसी ने किसी ने मेरे किरदार पर ऊँगली उठाई... तो कसम है मुझे.. मई जान पर खेल जाउंगी...

भाभी बड़ी जज़्बाती हो गई थी.. अपनी बात का जवाब पाने का भाभी ने इंतज़ार नहीं किया.. और मेरा चेहरा थम कर जहाँ चांटा मारा था..... वहां मेरे गाल पर अपने होंठ रख दिए... हल्का सा चुम कर अलग हुई.. और तेज़ी एक साथ नीचे उतरती चली गई..

माहिरा - भाभी क्या समझती हैं. जैसी बातें वो कर के गई han...kyaa हम भी अपनी ज़ात पर ऐसी ऊँगली उठते देख ज़िंदा रहने का सोच सकती हाँ.. हमें भी हमारी इज़्ज़त हमारी जान से बढ़कर प्यारी है

किन्ज़ा - भाभी भी सही है माहिरा... बाबू का प्यार अनमोल है.. लेकिन जिस खंडन से हम ताल्लुक़ रखते हाँ.... वहां इतना सब भी नहीं होता..

फिर मुझे घूरती हुई बोली - क्या ज़रूरत थी तुम्हे ऐसा करने के कहें की.. मेरी भी मैट मरी गई थी... जो ऐसा इरादा बना बैठी...

माहिरा - इस बाबू के बच्चे ने दीवार पर चढ़ कर हमारे सोचने समझने की सलाहियत को hi जंग लगा दिया था..

मई - क्या जो हुआ वो गलत था

किन्ज़ा एपीआई मेरा हाथ थाम कर प्यार से बोली - बाबू... यहाँ बात गलत सही की नहीं है.. प्यार की भी नहीं है. जैसी ज़िन्दगी जीने को हमें मिली है.. जैसी लेक्चर हम सुनती हुई बड़ी हुई हाँ.. हमारे खून के साथ साथ वो सरे लेक्चर दौड़ रहे हाँ.. हम अपने खंडन से अलग रह कर भी नहीं जी सकते.. तुम्हारा प्यार अनमोल है बाबू.. लेकिन अगर अनजाने में किसी गैर के सामने खुल कर ऐसा सब हो गया तो.. क़यामत से पहले क़यामत आ जाएगी बाबू.....

मई दोनों हथु से किन्ज़ा एपीआई के गीले कंधे पकड़ कर अपना चेहरा किन्ज़ा एपीआई के चेहरे के करीब करता हुआ बोलै

मई - यहाँ मई आप सब के इतने करीब इसलिए हों एपीआई.. के यहाँ कोई बेगाना देखने वाला नहीं है. क्या मई सूरत से ऐसा hi उल्लू दीखता हों.. जैसे लेक्चर आप गर्ल्स की रगों में खून के साथ दौड़ रहे हाँ ना.. मेरी रगों में भी वही खून है.. वही सरे लेक्चर हाँ.. मई पठान हों. इज़्ज़त के लिए जान दे सकता हों तो ले भी सकता हों.. मई आप सब को वो प्यार देना चाहता हों. जो कोई भाई न दे सका हों.. लेकिन आप सब के डर को समझते हुए बास इतना hi कहूंगा.. अगर मेरे डर आप में से किसी के अंदर डर बाकि रहा.. तो एक कसम मई भी खता हों एपीआई... मई एक नार्मल लड़का बनकर बाकि की ज़िन्दगी गुज़र दूंगा.. एक ऐसा नार्मल पठान.. जो खाने पीने और ज़रूरी बात करने के लिए hi अपनी बहनो के पास आया करता है.

मेरी आखरी बात पर माहिरा एपीआई और किन्ज़ा एपीआई दोनों तड़प क्र रह गई

किन्ज़ा एपीआई नाम आवाज़ में बोली - नहीं बाबू.. अपनी कसम वापिस ले. देख हम सब तुझसे इतना प्यार करते हाँ.. तू दूसरी बहनो के भाइयों जैसा बनकर जियेगा तो कैसे हम बहने जी पाएंगी.. नहीं बाबू. ऐसा मत बोल

माहिरा - देख बाबू.. मैंने इतने काम वक़्त में इतना ज़यादा जज़्बाती होना नहीं सीखा है.. लेकिन जब से तू बदला है न.. नजाने मुझे क्या हो गया है... मई बहुत ज़यादा जज़्बाती होने लगी हों.. देख मेरी आँखों में देख.. देख तेरे लिए नमी है इन आँखों में.. तीन दिनों में ये तेरे लिए कई बार भीग चुकी हाँ बाबू.. जो तूने जोश में आ कर कहा है... जो कसम खाई है न तू उसे वापिस ले.. और ख़बरदार जो तूने प्यार में कमी लेन की सोची भी तो.. पता है तेरा ये थोड़े दिनों वाला प्यार कितना कीमती है.. इतना कीमती है.. हम बहनो को ऐसा लग रहा है.. जैसे हमारे सरों पर सायादार घने दरख्तों की ठंडी मीठी छाओं अब hi उतरी है.. दादा जान डैड और नदीम भाई के होते हुए भी हमें ऐसा ऐसा कुछ कभी महसूस नहीं हुआ.. लेकिन तुम्हारे बदल जाने से सब हो गया है..

किन्ज़ा एपीआई मेरे गाल को सहलाती हुई बोली - तू चाहता है न.. हम तेरी तरह खुल कर प्यार करें.. तो ठीक है.. तूने तीन दिन पहले बंद कमरे में मेरा गाल चूमा था न..

माहिरा एपीआई ने चौंक कर किन्ज़ा एपीआई को देखा.. किन्ज़ा एपीआई माहिरा एपीआई को नज़र अंदाज़ करती आगे बोली - देख मई आज माहिरा के सामने तेरे गाल को चूमती हों. तू भी चाहे तो मेरे गाल को फिरसे चुम सकता है.. पहले शायद मई ऐसा न बोलती.. न करती.. लेकिन तेरे प्यार की जैसी शिद्दत और पाकीज़गी मैंने अभी महसूस करि है न.. पहले कभी महसूस नहीं की. अभी जब तुमने कहा न तू टिपिकल भाई बनकर जियेगा.. तो मुझे तेरा मेरे गाल को चूमना याद आ गया.. मुझे अहसास हुआ.. मुझे कभी तेरा ऐसा करना बुरा लग hi नहीं सकता.. मई तड़प कर रह गई.. मेरा दिल मचल गया.. अंदर से आवाज़ आई.. किन्ज़ा तेरा भाई कभी तुझसे प्यार नहीं करेगा.. अगर तू बुज़दिल बन गई तो.. देख बाबू मई तेरे लिए अपना डर दिल से हमेशा के लिए निकल देती हों.. लेकिन फराह भाभी की आखरी बातें मेरे दिल की भी आवाज़ है.. वही एक ऊँगली.. और जान हार---

मैंने किन्ज़ा एपीआई के होंटो पर हाथ रख दिया.. एपीआई खुल कर आंसू बहा रही थी..

माहिरा एपीआई अपनी फ्रेंड के साथ लेस्बियन सेक्स करती रहती थी.. वो मेरे साथ इसलिए नहीं खुल रही थी.. माहौल उसके हिसाब से नहीं था.. और वो नज़रों में गिरना नहीं चाहती थी..

किन्ज़ा एपीआई खुल कर बोली तो माहिरा एपीआई बोली - किन्ज़ा एपीआई आप ने बाबू का प्यार अपने गाल पर प् लिया. लेकिन मई तो बरसों से बाबू के प्यार से दूर हों.. बाबू आज मई भी किन्ज़ा एपीआई के जैसे तुमपर यकीन करती हों. और ये hi कहती हों. तू hi हमारा सच्चा मुहाफ़िज़ है. तू hi है.. जो हमेशा वो प्यार दे सकता ह.. जो कोई भाई किसी बहन को नहीं दे सकता.. देख मई खंडन में सबसे अलग सोच रखने वाली लड़की हों. मई मॉडल बनना चाहती थी. लेकिन नहीं बन सकती.. देख एक मॉडल बनने वाली लड़की की सोच कितनी एडवांस होती होगी. लेकिन देख मैंने आज तक तेरा प्यार खुल कर नहीं पाया.. न तेरे चेहरे को चुम सकीय. न hi तुझे भाई का दर्जा देते हुए अपने गालों पर मोहरे मोहब्बत सबत करने का कोई मौका दिया.. आज मई भी वही सब कहूँगी. जो अभी किन्ज़ा एपीआई ने कहा.. चल आ और अपना प्यार मेरे गालों पर सबत कर दे. फिर मैं भी अपने प्यार तुझे दिखाउंगी..

माहिरा एपीआई ने भीगी आँखों के साथ मेरे गले में बाहें दाल दी. खूब अचे से मेरे गले से लगने के बाद मेरे दोनों गालों पर एक बार नहीं दो बार नहीं तीन तीन बार अपने होंठ रखे.. बड़े सुकून के साथ माहिरा एपीआई ने मेरे गलों को चूमा था. माहिरा एपीआई की भीगे ब्रा के अंदर भीगे गरम नरम मुम्मे मेरे सीने के साथ लगे मेरे दिल की धड़कनो को बढ़ा रहे थे..

माहिरा एपीआई - चल अब.. तू दिखा अपना प्यार

मैंने धयान दिए तो मुझे माहिरा एपीआई की आँखों में श्रम की गहरी छाप दिखाई दी. पहली बार मेरे ऐसे गले लग कड़ी थी वह.. कितनी प्यारी लग रही थी माहिरा एपीआई.

मई मुस्कुराता हुआ बोलै - पहले कोनसे गाल पे प्यार दूँ

माहिरा एपीआई मुस्कुरा पड़ी - तू अपने दिल की कर

मई - खुल कर प्यार करने की बात करने वाली अब भी झिझक रही है

माहिरा - मई इतनी झिझिको भी नहीं हों

मई - तो फिर बताइये

माहिरा - चल ाचा काम सीढ़ी साइड से शुरू करते हाँ न तू भी सीधे गाल से शुरू कर. मैंने तो अपना प्यार तुझे दिखा दिए.. जब से तू बड़ा हुआ है.. तेरा ये अनमोल प्यार मुझसे दूर था. देर न कर.. और दे मुझे अपना प्यार..

किन्ज़ा एपीआई कुछ श्रम से लेकिन बहुत ज़यादा ख़ुशी के साथ हमें देख रही थी

मैंने किन्ज़ा एपीआई को देखा - आप बताएं एपीआई. पहले किस साइड प्यार की मोहर लगाऊं

किन्ज़ा एपीआई शर्म से पलकें झुका कर बोली - मई क्या बताओं.. तुम्हारा जो दिल कहे

मई - मई आप से पूछना चाहता हों.. आपको देख कर hi तो माहिरा एपीआई ने हिम्मत पकड़ी है. अब आप hi मुझे गाइड करें

किन्ज़ा एपीआई शर्म से धीरे से बोली - माहिरा ने जैसा कहा है.. सही काम सीढ़ी साइड से शुरू करते हाँ

मई - हाँ ऐसे बरकत भी मिलती है

दोनों मुस्कुरा पड़ी

मैंने माहिरा एपीआई के राइट गाल पर अपने होंठ रख दिए.. uffffffffff... जब से माहिरा एपीआई जवान हुई थी. तब से इनके ये गोर गाल मेरे होंटो से दूर थे.. कितने लम्बे आरसे के बाद मेरे होंटो ने माहिरा एपीआई के गालों का चखा था.. कितना लज़ीद था माहिरा एपीआई का गाल.. मई होंठ रख कर जैसे भूल hi गया.

माहिरा एपीआई ने थोड़ी देर इंतज़ार किया.. फिर बोली - क्या सो गए हो

मई - आज कल झूठे प्यार में इतना नशा है.. दुन्या सब कुछ भुला बैठती है.. सच्चे और अनमोल प्यार के नशे की कोई हद कहाँ हो सकती है एपीआई.. मैं तो फिर भी बरसों बाद आप के गुलाबी गाल को चुम रहा है.. जल्दी कैसे कर सकता हों

माहिरा - देख बाबू. बारिश रुक चुकी है.. देर करेगा तो फिर किन्ज़ा का नंबर रह जायेगा.. मुझ एक से hi काम चलने पड़ेगा फिर तुम्हे

मई है पड़ा.. अपने होंठ माहिरा एपीआई के गाल रखे हुए hi मई है पड़ा था..

ऐसे hi गाल पर मोह रखे मई बोलै - किन्ज़ा एपीआई की मुझे जल्दी नहीं है. उनके गाल मेरे चखे हुए हाँ.. लेकिन मई उन्हें भी सुकून के साथ फिरसे चखना चाहता हों. मेरे पास वक़्त की कोई कमी नहीं है.. अभी न सही. बाद में सही.. यहाँ न सही कमरे में सही...

फिर मैंने अपने होंठ माहिरा एपीआई के दूसरे गाल पर लगा दिए. अब मेरे लुंड में सनसनी सी दौड़ने लगी थी. मई और माहिरा एपीआई ऊपर से साथ जुड़े हुए थे. लेकिन नीचे ाचा खासा गपे था.. लुंड मूड में आता भी तो माहिरा को टच नहीं हो सकता था. लेकिन अलग होने के बाद दिखाई तो दे hi सकता था..

मैंने ज़यादा देर नहीं की.. बारिश के मौसम के वजूद के अंदर करंट कुछ ज़यादा hi बढ़ जाया करता है.. इससे पहले के मेरा जिस्म मूड में आते हुए मेरे लुंड को सख्त करता.. मैंने माहिरा एपीआई के दोनों गालों को अच्छे से प्यार देते हुए उन्हें खुद से अलग कर दिए..

किन्ज़ा एपीआई को देखा.. उनका चेहरा शर्म से टिमटिमाने लगा था..

मैंने किन्ज़ा एपीआई का हाथ पकड़ लिया.. एक हाथ से किन्ज़ा एपीआई की चीन को पकड़ चेहरा उठा हुआ बोलै - अभी हम नीचे चलते हाँ. हम बाद में प्यार का लें दें करेंगे..

किन्ज़ा एपीआई ने जैसे सुख की सांस ली..

लेकिन माहिरा एपीआई - नहीं मेरे सामने hi ये लें दें करना होगा.... जैसे मैंने किया.. शामे वैसे hi किन्ज़ा एपीआई को भी मेरे आँखों के सामने सब करना होगा..

किन्ज़ा एपीआई ने माहिरा एपीआई को घूरा

माहिरा - एपीआई ऑंखें दिखने से काम नहीं चलेगा

मई - ठीक है.. किन्ज़ा एपीआई के कमरे में जाते हुए मई आप को लेता जाऊँगा..

बात दोने हो गई थी.. हम वहां से नीचे उतरने लगे.. जैसे hi हम नीचे उतरे.. हमें अम्मी जान आती हुई दिखाई.. हमें देख मुस्कुराती हुई वह करीब आई.. फिर हम तीनो को बरी बरी गले से लगा कर प्यार देते हुए हम तीनो के मोह चुम गयी..

फिर हम अपने अपने कमरों में घुस गए.. एक बात जो हम अभी नहीं जानते थे.. जब हम स्टैर्स उतारते हुए नीचे उतरे थे. तो हमें नीचे से ऊपर आने वाली स्टैर्स पर अम्मी जान ऊपर अति दिखी थी...

असल में बात कुछ और थी.. जब बारिश हो रही थी.. अम्मी जान छत पर आ रही थी.. वहां भाभी जो बात बोल रही थी.. अम्मी जान ने सब सुन लिया था.. छत पर जाने वाली स्टैर्स के नीच ाचा खासा गपे है.. कोई नीचे उतरता भी है तो धयान देने से hi स्ट्रिस के नीचे खड़े हुए को देख सकता है.. अम्मी जान वही कड़ी होकर हमारी बातें सुनती रही थी.. जब भाभी नीचे उत्तरी.. तो भाभी ने धयान नहीं दिए है.. अम्मी जान छुप कर कड़ी हो गयी थी. भाभी के जाने के बाद देर तक अम्मी जान वहीँ कड़ी रही... मेरी किन्ज़ा एपीआई और माहिरा एपीआई की साड़ी बातें अम्मी जान ने सुन ली थी..

जब हम नीचे उतरने लगे.. तो अम्मी जान जल्दी से स्टैर्स से गौरण्ड फ्लोर पर जाने लगी.. फिर वापिस आने लगी. तभी वो हमें दिखी थी...

हम अनजान थे.. लेकिन हमारी हर एक बात और हरकत से अम्मी जान वाक़िफ़ हो चुकी थी..

 
नवी क़िस्त

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नदीम - तीन दिन बचे हाँ. उम्मीद करता हों इन तीन दिनों में तुम अपने अंदर से डर को निकल बहार करोगी. चौथी रात पुरे दिल से मेरा साथ डौगी.

नदीम भाई की बात सुनकर भाभी के होश उड़ गए. मेरे और भाभी के बीच बातें और बारिश के वक़्त हुए वाके ने भाभी को कुछ घंटों के लिए ये बात भुला दी थी. नदीम भाई की बात सुन उनके होश उड़ गए.

भाभी घबरा कर बोली - नदीम! मुझे और वक़्त चाहिए होगा. मई फैसला नहीं कर प् रही हों. खुद को तैयार नहीं कर प् रही हों.. प्ल्ज़ नदीम मई बहुत अपसेट हों कसम से. प्ल्ज़ तुम मुझे और वक़्त दो

नदीम - no... नेवर... इससे ज़यादा मई और वक़्त नहीं दे सकता.. 4 महीने दे दिए हाँ तुम्हे यार.. इससे ज़यादा मई क्या कर सकता हों. वर्ण कोण शोहर बीवी के इतने नखरे बर्दाश्त करता है. पहली hi रत अपनी मन मणि करता हुआ आगे और पीछे के दोनों रस्ते खोल देता है.. यार तुम ख़म खः घबरा रही हो.. दर्द काम और मज़ा ज़यादा मिलता है.. पहली रात क्या दर्द के बाद तुम मुझसे समां नहीं गई थी. कितनी गरम हो गई थी तुम. कितनी चाहत के साथ तुम खुद को फरामोश करती हुई मेरे संग दूर तलाक चलती गई थी.. अब भी कुछ नहीं होगा यार.. थोड़ा सा दर्द.... फिर मज़े hi मज़े

नदीम भाई स्माइल करते हुए अपने लुंड को मसलने लगे.. फिर भाभी को खेंच किश करने लगे. भाभी के दिल की दुन्या ज़ेर ो ज़बर हो रही थी. किश का मज़ा कहाँ से आता. उनका दिल डूब रहा था. नदीम भाई ने अच्छे से किश करि..

नदीम - दिल तो बहुत छह रहा है... आज hi अभी से कर जाऊं.. लेकिन तुम्हारे साथ मुझे पूरी उम्र जीनी है. तुम्हे हर्ट नहीं कर सकता. तुम्हारी पूरी पूरी रज़ामंदी होनी ज़रूरी है.

भाभी भीगी आवाज़ में बोली - हर्ट नहीं कर सकता!!... मेरी जान ये सोच सोच कर निकली जा रही है. पता नहीं मेरा क्या होगा. और तुम हो कह दन्त पर दन्त निकले जा रहे हो.. नदीम क्या तुम अपना इरादा बदल नहीं सकते.. क्या ज़रूरी है पीछे के रस्ते से करना. क्याआ सही रस्ते से मैं तुम्हे सारा सुख नहीं दे प् रही हों.

नदीम भाई को भाभी पर बड़ा प्यार आया. भाभी को अपने ऊपर गिरा कर भाभी की नक् को चूमता हुआ बोलै

नदीम - तुम हर जगा से लाजवाब हो. लेकिन एक चीज़ और भी खास है तुममे. तुम मुझे वहां के मज़े से दूर रख रही हो.. ये गलत है...... मई तुम्हे पूरा पाना चाहता हों सराह.. हर साइड से मैं तुम्हारा प्यार पाना चाहता हों.

भाभी - हम दोनों एक दूसरे को पूरी तरह प् चुके हाँ नदीम. जहाँ घुसने की तुम सोचे बैठे हो.. वो एक्स्ट्रा भी है और बेहूदा भी.. वहां से करने से एक तो मुझे सोच कर hi शर्म आती है. दूसरा सच में मेरे दिल से डर नहीं जा प् रहा है.

ऐसी hi बातें देर तक होती रही.. भाई अपनी बात पर अड़े रहे. और भाभी का खून खुश्क करते रहे.

अगली सुबह भाभी के चेहरे का रंग और भी फीका था.

मैंने भाभी के चेहरे को देखा. लेकिन नज़र अंदाज़ कर गया. लेकिन आज मैंने भी फैसला कर लिया था. कुछ भी हो जाए भाभी से जान कर hi रहूँगा.

कॉलेज से वापिस आया.. तो अम्मी जान को उलझे हुए पाया. मई समझ नहीं पाया अम्मी जान के चेहरे पर उलझन कैसी है. लंच तक अम्मी जान मुझमे नार्मल बात चीत करती रही. फिर मुझसे बोली.. कमरे में ा कर मेरी बात सुनो

मई अम्मी के कमरे में गया. अम्मी जान ने कमरे का दरवाज़ा अंदर से लॉक करने को कहा. तो मई कुछ हैरान हुआ. लेकिन अंदर से लॉक लगता हुआ अम्मी जान के पास बीएड पर जा पोहंचा..

अम्मी जान कुछ पल सोचती रही. मई अम्मी जान को सोचते प् कर ख़ामोशी से उन्हें देखने लगा.. फिर अम्मी जान ने सर उठा कर मेरी आँखों में देखा. देखती रही. जैसे कुछ जाँच रही हों

फिर अम्मी जान बोली - बाबू!. बीटा जब जवान हो जाए. तो माँ बाप को सोच समझ कर बात करनी चाहिए.. अक्सर हम अंदाज़ा नहीं हो पता.. और बात बिगड़ जाती है..

मैंने अम्मी जान का एक हाथ थम लिया

मई - अम्मी जान.. मेरे मामले में आप कभी भी ऐसा मत सोचियेगा.. आप को मुझसे कैसी भी बात करने के लिए सोचने की ज़रूरत नहीं है. मई आप के दिल का टुकड़ा हों.. मई आप की और आप मेरी जान हाँ

अम्मी जान के चेहरे पर ख़ुशी से भरपूर चमक आ गयी..

अम्मी जान - बाबू... तुम्हारा प्यार अनमोल है.. लेकिन जितना प्यार तुम आज कल बरसाने लगे हो न बीटा. जैसे सावन की मूसला धार तेज़ बारिश अक्सर नुकसान देह सबत हो जाया करती है.. ऐसे hi कभी कभी प्यार की कसरत भी नुकसान दे जाती है.

मई - मई कुछ समझा नहीं अम्मी जान

अम्मी जान - देखो बाबू.. एक बात जो नहीं होनी चाहिए थी. वो हुई है

एक बार तो मेरा दिल धड़का. लेकिन फ़ौरन hi मैंने अपने दिल की ज़ेर ो ज़बर हालत पर काबू पाया.. फिर बोलै - क्या बात हुई है अम्मी जान

मेरे चेहरे पर सकूं था. और अम्मी जान मेरे चेहरे पर नज़रें गाढ़े हुए थी.. अम्मी नज़रें फेर कर बोली

अम्मी जान - बाबू बारिश के वक़्त मई भी छत पर गई थी

मई - हाँ मैंने देखा था

अम्मी जान - नहीं मई बहुत पहले से सीढ़ियों के पास कड़ी थी.. और

अम्मी जान मेरी आँखों में देखने लगी - और मैंने साडी बातें सुन ली हाँ. वो जो तुम चरों के बीच हुई हाँ

एहि एक बात थी. जिसे जान एक माँ को बेटे के करैक्टर पर शक हो सकता है. लेकिन मैं चूँकि पहले से hi खुद पर काबू पा गया था. इसलिए मई नार्मल रहा

अम्मी जान मेरे चेहरे को देखती रही.. फिर बोली - देखो बाबू बच्चे जवान हो जाएँ.. तो पेरेंट्स और बच्चों के बीच प्राइवेसी आ जाया करती है.. यहाँ मई ऐसा समझती हों.. मुझसे ऐसी गलती नहीं होनी चाहिए थी.

मैंने अम्मी जान की बात नहीं टोकि

अम्मी जान - लेकिन छत पर जैसा सब सुनने को मिला.. मई छत पर न जा कर वही सीढ़ियों के करीब कड़ी रह कर तुम चरों के बीच की साडी बातें सुनने लगी.. मई एक माँ हों बाबू.. और बच्चों की ऐसी बातें कभी कभी सुनने का मौका मिले तो सुन लेने में कोई हर्ज भी नहीं है... बात तो गलत है. लेकिन बच्चों की जवान होने पर जैसी सोच उनके अंदर जनम ले जाती है.. उनसे वाक़फ़ियत हासिल करना भी पेरेंट्स के लिए ज़रूरी होता है... बास एहि मैंने भी किया...

अम्मी जान - देखो बाबू.. मई तुमसे और अपने दूसरे बच्चों से भी बेइंतेहा प्यार करती हों.. उनपर मुझे मेरी जान से भी बढ़कर भरोसा है. लेकिन बाबू तुम्हारा ऐसा और इतनी शिद्दत से प्यार मेरी समझ में नहीं आया.. फराह तुम्हारी भाभी ने जो कहा.. वो भी एक कड़वा सच है.. हमारा रहन सहन हमारा खंडन हमें ऐसे खुल कर प्यार देने की इजाज़त नहीं देता. दीवारों के कान होते हाँ.. हवाएं बेवफा होती हाँ.. बात को उदा कर कहाँ की कहाँ ले जाती हाँ... ऐसे में अगर बात बिगड़ जाए तो सराह के बक़ौल क़यामत से पहले क़यामत आ जाया करती है.. मई मानती हों ज़माना बदल गया है.. बहुत ज़यादा बदल गया था.. लेकिन हम पठान ज़यादा नहीं बदले.. जितना भी बदले हाँ.. लेकिन हमारे खून में वहीँ साडी रस्में वो सरे रिवाज दौड़ रहे हाँ.. तुमने जो रात हमारे साथ गुज़री थी. उस रत की सुबह तुमने खुल कर मुझसे एक बात कही थी.. मई माँ होकर वो बात सुन नहीं पाई थी.. ऐसा लगा जैसे मई बेटे के सामने बेलिबास हो गई हों.. लेकिन तुम्हारे डैड ने इसे गलत नहीं मन.. तब मैंने सोचा... इतना तो आज कल आम है. आज कल के बेटे मस्ती मज़ाक में इतना खुल कर बोलने लगे हाँ. मैंने भी अपने दिल को समझा लिया. तुम्हारे लफ़्ज़ों को टोला फिर खुद को टटोला.. फिर तुम्हारा प्यार तुम्हारी ऑंखें मुझे याद आई. जहाँ मेरे लिए वही इज़्ज़त वही मुक़ाम मुझे दिखा.. कुछ भी गन्दा गन्दा नहीं दिखा मुझे तो मैं पुरसुकून हो गई...

मई हैरान था.. आज अम्मी जान कैसे खुल कर बोल रही हाँ.

अम्मी जान - तुम खामोश हो.. क्या मेरी बात दिल को ठेस पोहंचा रही है

मई मुस्कुरा कर अम्मी जान के गाल को चुम गया - भला आप की कोई भी बात मेरे दिल को ठेस कैसे पोहंचा सकती है.. आप के बक़ौल मई आप के दिल का टुकड़ा हों.. ऐसे में तो मेरा दिल का भी आप के दिल का हिस्सा हुआ न.. दिल की बात पर भला को कैसी ठेस पुहंचेगी..

अम्मी जान के चेहरे पर ख़ुशी का रंग गहरा हो गया

अम्मी जान फिर परेशां होती हुई बोली - देखो बाबू.. तुम खुल कर प्यार करने लगे हो. लेकिन मई छह कर भी तुमसे खुल कर बात नहीं कर सकती. सच कहूं तो शर्म भी आती है झिझक भी महसूस होती.. दिल में डर भी है. कहीं तुम बुरा न मन जाओ..

मई - नहीं मई बुरा नहीं मानाओंगा.. आप खुल कर कहें

अम्मी जान - तेरी आँखों में मुझे सचाई की झलक पूरी ईमानदारी से दिख रख रही है बाबू.. इसलिए मई कहने जा रही हों. वर्ण एक माँ कभी अपने जवान बेटे से ऐसी बात नहीं कहती.

मई - बे झिझक कहिये अम्मी जान

अम्मी जान - बाबू तुम्हारा प्यार कुछ ज़यादा hi है..

अम्मी जान मेरे चेहरे पर जैसे अपनी बात के ाचा या बुरा होने की जाँच करने लगी. मई नार्मल रहा

अम्मी जान आगे बोली - देखो! बाबू पहले मुझे लगे.. ये सब गलत है. कुछ ज़यादा hi है.. लेकिन फिर किन्ज़ा और माहिरा का तुझे प्यार करना.. ये ऐसी बात है बाबू. मैं बहुत कुछ सोचने पर मजबूर हो गई. किन्ज़ा और माहिरा की परवरिश मैंने की है.. उन दोनों के करैक्टर पर शक करना अपनी तरबियत पर शक करने जैसा है. और मई आज तक अपनी तरबियत पर फखर करती आ रही हों.. मेरी hi तरह मेरी बेटियां भी शर्म ो हाय की पैकर हाँ.. जब दोनों ने तुझे गले से लगा कर चेहरे पर प्यार दिया.. तब मुझे अजीब तो लगा लेकिन बुरा नहीं लगा. तुम सब अब जवान हो गए हो.. और हमारे खंडन में जवान बच्चों के बीच इतनी कुर्बत की गुंजाइश कहीं नहीं निकलती.. ऐसे में फराह का वह सब बोलना सही था. वो भाभी है तुम्हारी. और भाभी कभी भी देवर को ऐसा प्यार दे नहीं सकती.. जैसा तुम तीनो के उसे एमोशनालय मजबूर करने पर किया.. देखो बाबू मेरी तुम्हारी बहनो की बात अलग है. लेकिन सराह... सराह की बात अलग है... मई सराह को अपसेट देख रही हों. मैं उससे बात भी करने की कोशिश करि.. लेकिन वो बात को ताल गई.. मई समझ सकती हों बाबू.. कल की बात ने उसे अंदर से परेशां कर रखा है.. वह खुद को संभल नहीं प् रही है.. मुझे डर है कहीं उसके दिल में दरार न पद जाए..

मई - ोू मई अब संभा आप के उलझे चेहरे का राज़.

अम्मी जान हैरान होकर - मई उलझी हुई हों. ये तुमने कैसे नोटिस कर लिया. किन्ज़ा या माहिरा ने तो नहीं ऐसा कुछ भी महसूस किया..

मई मुस्कुरा पड़ा - अम्मी जान... क्या मई सिर्फ बातों से hi बदलो हों.. नहीं अम्मी जान.. मेरे अंदर और भी कई चंगेस आये हाँ.. पहले मई सब देख कर नज़र अंदाज़ कर दिए करता था. इसलिए कह हर एक की पर्सनल लाइफ है. मई कैसे इंटरफेरे कर सकता था. लेकिन फिर मैंने बहुत ज़यादा घोर किया तो पता चला.. मुझे खामोश नहीं रहना चाहिए.. हो सकता है.. कोई ऐसी परेशानी हो.. जिसे मई दूर कर सकता हों.. और अम्मी जान.. बदलते वक़्त ने मेरे अंदर कुछ खूबियां एक्स्ट्रा पैदा करनी शुरू कर दी है.. ये जो आप मुझे बदला हुआ देख रही हाँ न. ज़यादा प्यार का इज़हार करते हुए देख रही हाँ न... तो इसके पीछे भी एक बड़ी वजा है

अम्मी जान हैरान थी.. वो हैरानी से बोली - वजा ?? .. कैसी वजा ??

मई - अम्मी जान.. कुछ देर पहले आपने कहा.. बच्चे जवान हो जाएँ तो न चाहते हुए भी कभी कभी मौका मिलने पर उनकी बातें सुन लेनी चाहिए.. ऐसे में बच्चों की नेचर और बदलती सोच का पता चल जाता है.. फिर उसी हिसाब से उन्हें ट्रीट किया जाता है.

अम्मी जान - हाँ मैंने ये सब कहा था. और मई समझती हों.. कुछ भी गलत नहीं है इससे.. देखो.. मैंने साडी बातें सुनी... लेकिन किन्ज़ा और माहिरा या सराह से कुछ नहीं कहा.. मई उन तीनो से बात करके उन्हें शर्मिंदा नहीं करना चाहती थी.. और फिर मुझे तुमपर और उन तीनो पर पूरा पूरा भरोसा है.

मई स्माइल करता हुआ आगे बोलै - माँ बाप ऐसी बातों की खोज इसलिए करते हाँ. वो बच्चों के लिए सही गलत को जान सकें.

अम्मी जान - बाबू! तुम तो ऐसी बातें कर रहे हो.. जैसी हम बच्चों वाले किया करते हाँ... कहाँ से सीखी तुमने ऐसी बातें.

मई - आप से अम्मी जान.. आप के दिल से.. दिल को दिल से राह होती है.. प्यार बहुत ज़यादा बढ़ जाए तो ऐसी सोच आटोमेटिक पैदा होने लगती है..

अम्मी जान मुस्कुराती नज़रों से मुझे देख रही थी

मई सीरियस होता हुआ बोलै - मेरा सब से खुल कर प्यार करने और बोलने का एक hi मकसद है.. मई आप सभी की साडी परेशानियों को जान कर उन्हें हल कर सकूँ.. भाभी जान कल वाले वाके से नहीं 4 दिन पहले से परेशां हाँ...

अम्मी जान भुचाक्की रह गई - क्याआ ?? लेकिन मैंने तो ऐसा कुछ मौसुस नहीं किया

मई - याद है अम्मी जान.. आप और मई ड्राइंग रूम में बैठी थी. भाभी कुछ अपसेट थी.. उलझी हुई थी. आप ने पुछा था.. सराह क्या बात है.. कोई परेशानी है क्या आप को..

अम्मी जान - अरे हाँ.. मुझे यद् आया.. ुफ्फु मैं भी कितनी भुलक्कड़ हों..

मई - मई तब से भाभी के पीछे हों. मैंने देखा है. कोई बात है जो भाभी को अंदर hi अंदर परेशां किये हुए है.. मैंने भाभी से पूछा था.. लेकिन भाभी ने नहीं बताई.. मैंने समझ लिया.. जब तक मई भाभी के साथ और नहीं खुलूँगा.. भाभी मुझसे अपना सुख दुःख शेयर नहीं करेंगी

अम्मी जान मेरी बात सुनकर मुझे अपनी आग़ोश में भर्ती हुई मेरा मोह चूमने लगी

अम्मी जान - अब मुझे यकीन हो गया है.. मेरा बीटा सच में बड़ा हो गया है. मई जिस बात को नज़र अंदाज़ कर गई थी. मेरे बाबू ने नज़र अंदाज़ कर दिए.. सच में मई आज सुबह से परेशां थी सराह को लेके.. एहि समझती रही.. कल वाली बात पर वो अपसेट है.. लेकिन बात कुछ और निकली.. 4 दिन पुराणी बात थी और मई समझ hi नहीं पाई..

मई - अब आप बताएं.. क्या भाभी के साथ कल बारिश में खुल कर मैंने कुछ गलत किया..

अम्मी जान - बिलकुल भी नहीं.. मुझे तो फखर हो रहा है.. मेरे बेटे ने कितना ाचा स्टेप लिया अपनी भाभी के करीब होने का.. किन्ज़ा और माहिरा के सामने सराह को अपना ये सोहना मुखर चूमने को कहा. अकेले में ऐसी बात होती तो सराह कभी नहीं मानती.. और सच कहूं तो अकेले में मई भी कुछ ऐसा देखती तो तुम दोनों पर शक करती

मई - और अगर अब मई आप की बहु का मोह अकेले में चुम लून तो

अम्मी जान खिलखिला कर है पड़ी.. फिर बोली - बेशरम.. अपनी अम्मी जान के सामने ऐसी बेशरमी वाली बात करता है.

मई - अम्मी जान.. हम जितने खुल रहे हाँ.. थोड़ा सा और खुल जाते हाँ.. हम अच्छे दोस्त बन जाते हाँ.. फिर मई आप को खुल कर ऐसी बातें बताया करूँगा. देखें न अम्मी जान.. अगर ऐसी बातें गलत होती तो न आप करती और न hi मई करता.. इतना तो बनता hi है...

अम्मी जान कुछ पल सोचने के बाद बोली - ठीक है.. लेकिन तुम मेरे साथ किसी और के सामने खुल कर बात कभी मत करना.. हाँ अकेले में तुम खुल कर बात कर सकते..

मई दोस्ताना अंदाज़ में हाथ बढ़ता हुआ मुस्कुरा कर बोलै - तो फिर हम आज से दोस्त हुए

अम्मी जान मेरे हाथ को देख हस्ती हुई मेरे हाथ पर हाथ रख कर बोली - हैं दोस्त..

मई - पक्के दोस्त

अम्मी जान फिरसे हस्ती हुई - हेहेहे हाँ पक्के दोस्त

मई नॉटी होता हुआ अपना गाल आगे कर गया - तो फिर चलिए जैसा प्यार मुझे किन्ज़ा एपीआई माहिरा एपीआई ने दिया है. आप भी वही प्यार मुझे दीजिये.. फिर मई आप को दूंगा

अम्मी जान एक पल में सीरियस हुई.. फिर भरी सांस छोड़ स्माइल के साथ अम्मी भी नॉटी मूड में आती हुई होंटो पर स्माइल ला कर बोली

अम्मी जान - माहिरा और किन्ज़ा के चांटों कर तो मुझे पता नहीं. लेकिन सराह का चांटा खूब था.. प्यार पाना है तो मुझे भी तुम्हारा गाल सराह के जैसे hi लाल करना पड़ेगा..

मई रोनी सूरत बना कर अम्मी जान का चेहरा ताकता हुआ अपने दाहिने गाल पर हाथ रखता हुआ बोलै

मई - सराह भाभी का हाथ बहुत भरी था अम्मी जान.. और आप का हाथ...

मई अम्मी जान का हाथ देख कर कंपनी की एक्टिंग करता हुआ बोलै - नहीं.. नहीं अम्मी जान.. प्ल्ज़ बिना चांटे के hi प्यार की बौछाड़ कर दें मेरे गालों पर.. कभी चांटे नहीं खाये मैंने.. लेकिन कल तीन तीन खा कर मुझे नानी याद आ गई है.

अम्मी जान क़हक़हे लगाने लगी. मेरा अंदाज़ अम्मी जान को बहुत भय था.. खूब हसने के बाद अम्मी जान सीढ़ी हुई और मज़ा लेती हुई बोली

अम्मी जान - नहीं.. चांटे से काम में बात नहीं बनेगी.. और फिर प्यार तो मई तुझे बचपन से अब तक देती आ रही हों. लेकिन चांटा कभी नहीं मारा.. कल सराह के दिल के शौक जगा.. और उसने चांटा मार दिए.. कोई मेरे चाँद से बेटे के फूल से चेहरे को बुरी नज़र से छू भी जाये.. तो मई उसका खून पि जाऊं... लेकिन बाबू यहाँ बात अलग है.. कल मुझे पहली बार पता चला. प्यार से चांटा भी मारा जा सकता है..

अम्मी जान खूब लुत्फ़ उठा रही थी..

मई अम्मी जान की मिन्नतें करने लगा.. लेकिन अम्मी जान अपनी बात पर अदि रही.. नहीं वो पहले चांटा मारेंगी.. फिर मेरे गाल को चूमेंगी.. आखिर मैंने ड्रामा बंद किया.. और हार मानता हुआ बोलै

मई - ठीक है. मई कर भी क्या सकता हों.

अपना गाल आगे करता हुआ - लें मार लें चांटा..

घर में हम सब एक से बढ़कर एक थे.. खूब मस्ती किया करते थे. आखिर हम सब भाई बहन अम्मी जान की कोख के जन्मे थे.. अम्मी जान भी कभी जवान रही थी.. उससे पहले अम्मी जान भी बच्ची रही थी.. मस्ती में कहाँ काम रही होंगी अपनी उम्र में.. अब खुल कर प्यार करने का मौका मिला तो अम्मी जान ज़िन्दगी में पहली बार इतनी फ्रैंकली होने लगी थी..

अम्मी जान अपने दोनों हथु की हथेलियों को रगड़ती हुई उँगलियों में उँगलियाँ फंसा कर अपने मोह के करीब करती गरम साँसें अपनी हथेलियों पर मारने लगी..

अम्मी जान - आप तो ऐसे रेडी हो रही हाँ अम्मी जान.. जैसे यस्सु पंजू खेलने की ठान गई हों

अम्मी जान - हेहेहे.. यस्सु पंजू hi समझ लो.. लेकिन मई सराह से बढ़कर प्यार देना चाहती हों अपने चाँद से बेटे के फूल जैसे गलों को.. चांटा भी उसी हिसाब से लग्न चाहिए न.. चल अब त्यार हो जाओ..

फिर अम्मी मूड में आती हाथ उठा कर पहला कर थोड़ा सा पीछे करती हुई स्पीड के साथ मेरे सीधे गाल की तरफ लायी.. मई अम्मी जान के चेहरे को देखने लगा.. जहाँ अम्मी जान की जगा आज एक कमसिन बच्ची दिखाई दे रही थी..

मेरे गाल के करीब आता अम्मी जान का हाथ रुक गया.. फिर अम्मी जान ने झपट कर मुझे अपने सीने से लगा लिया..

अम्मी जब - मई माँ हों तेरी बाबू.. तू कोई गलती भी करे तो भी मई तुझे चांटा मारने की सोच भी नहीं सकती.. तू तो मेरी जान है बाबू.. मई तुझसे कितना प्यार करती हों.. मई तुझे गरम हवा लगते नहीं देख सकती.. चांटा मारना तो दूर की बात है...

फिर अम्मी जान मेरे चेहरे को थाम मेरी आँखों में देखती हुई मेरी आँखों को चुम गई. बरी बरी दोनों आँखों को चुम मेरे माथे को चूमती हुई मेरे सीधे गाल पर अपने होंठ रख गयी...

ये मेरी जीत थी.. आज अम्मी जान को मैंने अलग hi मूड में ला कर अपने चेहरे को चूमने पर मजबूर कर दिए था.. अम्मी जान मेरे एक गाल को चुम कर दूसरे गाल को चूमने लगी..

फिर मेरी आँखों में देख कर बोली - वह सुल्ताना तुझे सब के सामने खुल कर प्यार करती है न. और मई तेरी सगी माँ होकर तुझे किसी के सामने खुल क्र सुल्ताना के जैसा प्यार नहीं दे सकीय.. लेकिन सुल्ताना मेरे जितना प्यार तुझे दे hi नहीं सकती.. सुल्ताना थोड़ी सी खुले माहौल की है. लेकिन मई अलग माहौल की हों.. आज से मैं भी तुझे खुल कर प्यार दिया करुँगी बाबू.. आज से मैं भी तेरे लिए तेरे प्यार के लिए बदल जाउंगी.. सुल्ताना बदल सकती है. किन्ज़ा माहिरा बदल सकती हाँ तो मई क्यों नहीं.. एक माँ hi वो इकलौती हस्ती है.. वो किसी के भी सामने अपने बेटे को प्यार दे सकती. खुल कर गले से लगा कर पुरे चेहरे को चुम सकती है.. बाबू मई अब बिलकुल भी नहीं झिझक महसूस नहीं करुँगी..

इतना बोल कर माँ मेरे दोनों गाल बार बार चूमने लगी.. देर तक चूमती चली गई.. ऐसा प्यार अम्मी जान पहली बार लुटा रही थी..

मई - अब बास भी करें अम्मी जान.. मेरी बरी भी तो आने दें

अम्मी जान हस्ती हुई - तू मुझे बिना चांटे के प्यार करेगा या ऐसे hi

मई - चांटा तो मैंने भी आज तक किसी को नहीं मारा है अम्मी जान.. मेरे दिल में भी तो हसरत बाकि है.. एक बार.. ज़िन्दगी में एक बार किसी को तो चांटा मार hi दूँ

अम्मी जान हैरान हो कर - तू मुझे.. अपनी अम्मी जान को चांटा मरेगा

मई - नहीं

अम्मी जान ने सुख की सांस ली

मई - अपनी दोस्त को तो चांटा मार सकता हों न

अम्मी जान चौंकी

मई - हाहाहा.... अब हम दोस्त हाँ न.. आप माँ होकर मुझे चांटा नहीं मार सकीय.. अगर दोस्त बनकर मारने का सोचती तो शायद आप का दिल मान भी जाता

अम्मी जान - तू दोस्त बनकर भी क्यों मुझे चांटा मारना चाहता है

मई - बास दिल कर रहा है

अम्मी जान - ाचा.. क्या सच में

मई - हम्म्म

अम्मी जान अपना गाल मेरी तरफ करती हुई बोली - चल फिर दिल को खुश कर ले.. और मार ले चांटा

मई हसने लगा.. फिर जल्दी से अम्मी जान के गाल पर अपने होंठ रख दिए..

अम्मी जान - तूने चांटा क्यों नहीं मारा

मई - अम्मी जान.. कितना सुकून मिल रहा है न हमें ऐसे महुअल में जी कर

अम्मी जान हैरान होकर बोली - हाँ बाबू... सच में इतना मज़ा मुझे पहले कभी नहीं आया

मई - देखा अम्मी जान.. बच्चे बड़े होकर दोस्त बन जाए.. खुल कर बातें करें और अपने दिल में कोई भेद न रखें तो ज़िन्दगी कितनी खुश गवर हो जाती है..

अम्मी जान - हाँ बाबू.. इन कुछ दिनों की ज़िन्दगी में मैं कई रंग अपने इर्द गिर्द बिखरते देख रही हों. सब रंग बहुत hi ज़यादा दिल को भा रहे हाँ.. इतने भ रहे हैं.. दिल चाहने लगा है... ये सरे रंग और भी गहरे होते चले जाए.. फिर हमेशा के लिए एहि हमारे इर्द गिर्द बसेरा कर लें.. ये ज़िन्दगी अब तक की जी ज़िन्दगी से कहीं बढ़कर पायरी और हसीं है

मई फिर अम्मी जान के चेहरे को थाम कर बड़े सुकून के साथ बरी बरी दोनों गलों को चूमने लगा.. और ऐसा मई अपनी ज़िन्दगी में पहली बार कर रहा था.. पहली बार मई पुरसकून हो कर अम्मी जान के कश्मीरी सेब के जैसे गालों पर अपने तरसे मचलते हुए होंठ रख कर कश्मीरी सेब का टास्ते कश्मीरी सेब की स्मेल अपने अंदर उतरने लगा..

किन्ज़ा एपीआई के गलों को अचे से रस्ते नहीं कर पाया था. लेकिन माहिरा एपीआई के गलों का मैंने पूरा पूरा मज़ा लिया था. और क्या कमल के गाल थे माहिरा एपीआई के... दिल बाघ बाघ हो गया था.. लेकिन अम्मी जान के गालों की बात hi क्याआ थी. सबसे बढ़कर लज़ीद थे अम्मी जान के गोर चमकते हुए गाल.

अम्मी जान का चेहरा ख़ुशी से ममता की चमक से चमक रहा था. लेकिन शर्म की गहरी छाप भी अम्मी जान के गलों पर उभर आई थी.. आँखों में ममता का समंदर ठाठें मार रहा था.. लेकिन सुकून और शर्म की इन्तहा भी थी अम्मी जान की आँखों में.. मेरे लिए प्यार का क्या बयां करना.. जो हो रहा था. मेरे प्यार hi की वजा से हो रहा था... एक माँ अपने बेटे को अपने गाल ऐसे भला कहाँ चूमने देती है.. और मेरी अम्मी जान जो शर्म ो हाय की बेमिसाल देवी थी. उनके नायब गाल भला मेरे जैसे बेटे के नसीब में हो भी कैसे सकते थे.. लेकिन हो गए थे.. ये सब मेरे प्यार मेरी मेहनत का समर था..

बहुत सबर किया था मैंने और आज मुझे सबर का फल मिल गया था. और सबर करता तो अम्मी जान के असली phal(mumme) भी मुझे मिल जाते.. वो मिल जाते तो अम्मी जान पूरी की पूरी मेरी हो जाती... एक बार... सिर्फ एक बार अम्मी जान के जिस्म का कोई छुपा हुआ हिस्सा मेरे सामने आ जाता.. और अम्मी जान पुरे दिल से उसे मेरे हवाले कर देती.. फिर सब कुछ प् लेना मेरे लिए मुश्किल नहीं होता...

आज पहली सीढ़ी मैंने चढ़ ली थी... अब मंज़िल दूर नहीं थी.. मुझे बहुत पास दिखाई दे रही थी.. वक़्त का क्या है.. वो तो बुलेट ट्रैन की स्पीड से दौड़ रहा था.. दिन महीने साल बड़ी तेज़ी के साथ आगे बढ़ रहे थे..

अम्मी जान के गाल को चुम कर मई हर बार अम्मी जान की आँखों में देख कर पूछता था. कैसा लगा.. अम्मी जान है कर कहती.. बहुत अच्छा.. बहुत मीठा... बहुत लज़ीज़...

वैसे मुझे उम्मीद नहीं थी अम्मी जान के साथ मई इतने काम वक़्त में इतना ज़यादा खुल जाऊँगा.. ये मेरी एक बड़ी कामयाबी थी.. लेकिन इस सब के बावजूद अम्मी का मेरे सामने बेलिबास होना अभी बहुत कठिन मरहला था.. अम्मी जान के होंटो पर मेरे होंटो प् आना और फिर अम्मी जान का मेरे होंटो के नशे में खुद को भूल जाना... ये सब देर तालाब काम था.. लेकिन अभी शिकार करने के लिए निर्हियों की कमी नहीं थी.. थोड़ी थोड़ी मेहनत सब पर करता रहता तो जल्द hi मुझे खंडन में कोई न कोई मिल hi जनि थी.. और हिम्मत हारना तो मैंने सीखा hi नहीं था..

अम्मी जान को मैंने भाभी से उसकी परेशानी जान्ने के लिए भाभी को भी ऐसे hi प्यार के लिए क़ायल कर लिया.. अम्मी जान तो बहुत खुश हुई... उनका बाबू एक तो भाभी की परेशां दूर करने वाला था. दूसरा वो सब के दिलों पर छा जाने वाला था.. एक माँ के लिए इससे बढ़कर ख़ुशी की बात भला और क्या हो सकती थी...

ये तो आने वाला वक़्त hi बताता.. अम्मी जान को मेरे प्यार की सचाई का पता जब चलता तो अम्मी जान को ख़ुशी मिलती या अम्मी जान ग़मों की लपेट में आ जाती...

खैर मई बाद में भाभी को तलाश करता रहा.. भाभी जान से फिरसे कुछ बहस करि.. भाभी जान तस से मास न हुई.. मुझे ताल गई.. अगले दिन भी मैंने अपनी तरय जारी राखी... और भाभी जान की नक् में दम कर दिए.. पर भाभी जान ने मुझसे अपनी परेशानी शेयर नहीं की......

ऐसे hi सातवां दिन आ गया.. मतलब आखरी दिन... और आज की रात भाभी जी की गांड फटने वाली थी.. भाभी के चेहरे पर परेशानी साफ़ दिखाई देने लगी थी.. किन्ज़ा एपीआई माहिरा एपीआई दादी जान ने भी बथेरा पूछा.. लेकिन भाभी बता के नहीं दे रही थी..

अम्मी जान ने तंग आए कर कहा - मैं तुम्हारी माँ से बात करती हों

तब भाभी तंग आ कर बोली - इससे ाचा है.. मई वही चली जाती हों.

भाभी की इस बात पर अम्मी जान किन्ज़ा एपीआई और दादी जान परेशां हो गई थी.. मैंने कॉलेज न जाने की सोच कर भाभी की परेशानी को जान लेने की ठान ली....

ब्रेकफास्ट के बाद मई अम्मी जान को बता कर भाभी को ज़बरदस्ती अपने साथ गाड़ी में बिठा कर शहर से बहार निकल पड़ा.. भाभी फ्रंट सीट पर मेरे साथ बैठी ग़मगीन चेहरा लिए बहार देख रही थी.. मैंने जब भी भाभी को देखा. भाभी का चेहरा बहार hi रहा..

मैं भाभी को लिए रवि रिवर किनारे जा पोहंचा. वो ऐसी जगा थी.. जहाँ तनहि मयस्सार आ सकती थी.. लेकिन वहां किसी तरह का कोई खतरा नहीं था.

गाड़ी रुकी तो भाभी ने चौंक कर देखा.. खुद को रवि किनारे पाया तो हैरान होकर मुझे देखती हुई बोली

भाभी - फिरोज... ये मुझे यहाँ क्यों ले आये हो.. नहीं.. मई तुम्हारे साथ ऐसी किसी वैरान जगा पर नहीं देखि जाना चाहती.. लोग बातें बनाएंगे.. चलो गाड़ी वापिस मोड़ो.. मुझे यहाँ एक पल भी नहीं ठहरना है...

मई भाभी की न सुनता हुआ गाड़ी का दरवाज़ा खोल कर बहार निकल पड़ा

भाभी चीखी - सुनाई नहीं दिया फिरोज तुम्हे... मैंने कहा मुझे यहाँ से वापिस जाना है... अभी के अभी.... वापिस गाड़ी में बेठू.. और चलो यहाँ से

मई भाभी की साइड आया और दूर पकड़ कर खोलता हुआ बोलै - नहीं... मई यहाँ आया हों.. तो आप की परेशानी जान कर hi लौटूंगा.. और आप अच्छे से जानती हाँ. मई कितना ज़िद्दी भी हों...

भाभी बड़ी बेरुखी से बोली - मई तुम्हे क्यों बताऊँ. तुम मेरे देवर हो.. मेरे सेज भाई भी नहीं हो. होते तो भी मई तुम्हे क्यों बताती..

भाभी की बात सुनकर मुझे गहरा सदमा पोहंचा.. मई पागलों का सा चेहरा लिए भाभी का मोह ताकने लगा.. ऐसे लफ़्ज़ों का इस्तेमाल आज तक मेरे लिए किसी ने नहीं किया था. भाभी ने तो मेरी इज़्ज़त दो कोड़ी की कर के रख दी थी.. मुझे एक बार तो बड़ा गुसा आया..

फिर मेरे दिल ने कहा.. भाभी परेशां है. जल्द ने मैंने अपने दिमाग को गरम से ठंडा कर लिया.. एक तोह भाभी मेरे घर की फारद थी. दूसरा मुझसे प्यार करती थी. तीसरा वो मेरे भाई की बीवी और मेरी भाभी थी. चौथा भाभी मुझसे पायरों जैसा hi ताल्लुक़ रखना चाहती तो कभी भी किन्ज़ा एपीआई और माहिरा की बातों में आ कर मेरे गाल को न चूमती.. और वो चांटा.. वो चांटा नहीं था.. भाभी का वह प्यार था. जो हर देवर के नसीब में नहीं हुआ करता. और भाभी का मुझे चांटा मारना ऐसा hi था.. जैसे मई भाभी के लिए देवर से कहीं बढ़कर था..

ये साडी बातें एक hi पल में मेरे अंदर घूम कर रह गई.. मेरे चेहरे की चमक लौट आई.. मेरे होंटो की मुस्कराहट जो हर दिल में उतर जाया करती थी, लौट आई. भाभी हैरान होकर मुझे देख रही थी. वो तो सोच रही थी. जैसी बेरुखी से वो मुझसे बोली थी. मई एक सेकंड भी वहां न ठहर कर गाड़ी को बड़े घुसे से वहां से ड्राइव करता हुआ भाभी को घर जा पोहंचता.

लेकिन मैं भाभी को मुस्कुरा कर देखता हुआ भाभी का हाथ पकड़ भाभी को गाड़ी से बहार निकलने लगा

मई - आप का हक़ बनता है मुझपर. गुसा क्या, बेरुखी क्या, आप कुछ भी मुझसे बोल सकती है.. मई मन नहीं करूँगा. लेकिन पहले आप गाड़ी से उतरें.

भाभी ज़िद्दी बची की तरह - नहीं फिरोज.. मई गाड़ी से बहार नहीं आऊँगी.. तुमने गलत किया जो मुझे ऐसी सुनसान जगा पर ले आये.. यहाँ किसी ने देख लिया तो गलत समझेगा.. नहीं फिरोज.. मई ऐसी कोई निगाह अपनी ज़ात के लिए उठी बर्दाश्त नहीं कर सकती.

मई - ठीक है.. मई आप की मान लेता हों.. आप को यहाँ से लेकर वापिस घर चला जाता हों.. लेकिन

भाभी - लेकिन क्याआ ??

मई - आप को मुझे अपनी परेशानी बतानी पड़ेगी.. मई इससे शिव किसी और बात पर एग्री नहीं हो सकता. मुझसे नहीं तो अम्मी जान से, दादी जान, किन्ज़ा एपीआई या फिर माहिरा एपीआई से बात करनी होगी..

भाभी बेबसी से बोली - नहीं कर सकती.. मई किसी से भी नहीं कर सकती..

मई - क्यों नहीं कर सकती

भाभी घुसे में आई बोली - कहा न.. नहीं कर सकती.. तो नहीं कर सकती.. चलो अब गाड़ी में बैठो.. और चलो यहाँ से.. मुझे सख्त कोफत हो रही है यहाँ.. ये जगा मेरी जैसी लड़की के शयन इ शान नहीं है

भाभी की ये बात "ये जगा मेरी जैसी लड़की के शयन इ शान नहीं है" मई बिना कुछ और बोले वापिस से ड्राइविंग सीट पर आया और गाड़ी को वहां से वापिस घर ले जा पोहनः..

भाभी को गाड़ी से बहार निकल भाभी का हाथ थम मई घर के अंदर दखल हुआ. मुझे अम्मी जी, दादी जी और दादा जान ने देखा.. लेकिन मई किसी को न देख कर भाभी का हाथ थामे छत पर जा पोहंचा. वापिस आ कर छत वाला दरवाज़ा बंद किया. छत पर दूर एक ऐसी जगा भाभी को ले के जा पोहंचा.. जहाँ कोई भी बात किसी और के कानो तक नहीं पोहंच सकती थी..

वहां टेबल कुरियन एक बड़ी छाती धुप से बचने के लिए मौजूद थी. मई सब सेट करने के बाद भाभी के साथ छतरी के नीचे बेथ गया..

मई - भाभी अब मेरी पहली और आखरी बात एक hi है.. आप के और भैया के बीच कोई उन बन है.. वो आप सब मुझसे शेयर कर दें

भाभी का मोह हैरत से खुल गया - तुम कैसे कह सकते हो. मेरी मौजूदा परेशानी का ताल्लुक़ नदीम से है

मई - भाभी मई भी ऑंखें रखता हों. और कमल की बात है. मई ऑंखें कुछ अलग hi रखता हों. घर में किसी के चेहरे का कुछ भी मुझसे आज कल छुप नहीं प् रहा है. न आप का छुपा रह सका.. न hi अम्मी जान का और न hi किन्ज़ा एपीआई.

भाभी का मोह हैरत के मारे और भी खुल गया.. वो यकीन न करने वाली निगाह से मुझे देखने लगी.

फिर जैसे भाभी मेरे लफ़्ज़ों पर धयान देती हुई बोली - ये अम्मी जान किन्ज़ा को ज़िक्र कहाँ से आ गया.. और ऐसा क्या है अम्मी जान और किन्ज़ा एपीआई का. जिससे मई अनजान हों

मई - सॉरी वो मई आप को नहीं बता सकता

भाभी - क्यों.. मुझे क्यों नहीं बता सकते.. मई भी तो घर की फारद हों. तुम्हारी भाभी हों. अगर अम्मी जान और किन्ज़ा को कोई परेशानी है तो मुझे खबर होनी चाहिए.. क्या पता मई उनकी परेशानी काम करने में मदद दे सकूँ

मई मुस्कुरा कर भाभी को देखने लगा. भाभी मेरी मुस्कराहट का मतलब समझने लगी. और जब उनकी समझ में आया.. वो हड़बड़ा कर साइड देखने लगी

मई है पड़ा

भाभी फिर मुझे देख कर बोली - देखो फिरोज.. मेरी परेशानी मई तुम्हे तो क्या किसी को भी नहीं बता.

मई - वो तो बतानी hi पड़ेगी आप को.. वो भी मुझे.. पहले मैंने सोचा था. आप किसी को भी बता दें.. लेकिन नहीं.. अब मई hi जान कर रहूँगा. और आप को मुझे बताना पड़ेगा.. आप के और भैया के बीच ऐसी क्या बात हुई.. कह आप का दिन रात का सुकून hi उड़ गया.

भाभी मुझे देख चेहरा फेर गई.. मई उठा और भाभी के करीब लेफ्ट साइड कुर्सी रख कर भाभी का हाथ थाम गया. भाभी ने तेज़ी से सर घुसा कर मुझे देखा.. आँखों देर गहराई तक देखा..

मई - क्या आप को मेरी इन आँखों में आप के लिए परवा और फ़िक्र दिखाई नहीं दे रही

भाभी - आज कल मई आँखों से कमज़ोर हो गई हों फिरोज. मुझे तुम्हारी तो क्या किसी की भी आँखों से साफ़ दिखना बंद हो गया है

मई - मई आप की आँखों के बीमारी और दिल पर छाये ग़म के बदल को हटा दूंगा.. मेरे प्यार में इतनी ताकत है भाभी जान..

भाभी - नहीं.. फिर भी नहीं.. फिरोज.. देखो पहले hi बहुत परेशां हों.. मुझे और परेशां मत करो प्ल्ज़..

भाभी उठने लगी.. मैंने उठने नहीं दिया

भाभी - फिरोज ये सही नहीं है. पहले तुम मुझे मेरी मर्ज़ी के बिना घर से बहार ले गए.. फिर यहाँ छत पर ले आये.. और बेकार की ज़िद्द पकड़ कर बेथ गए.. प्ल्ज़ अब मुझे जाने दो. देखो मई तुमसे बड़ी हों.. लेकिन मिन्नत करती हों.. मुझे अकेला छोड़ दो..

मई - एहि तो नहीं कर सकता हों मई. न तो आप को अकेला छोड़ सकता हों. और न hi आप को यौन परेशान देख सकता हों.. बताइये.. क्या परेशानी है.

भाभी - मई नहीं बता सकती

मई - चलें मई hi बता देता.

भाभी का मोह ऐसे खुल गया. जैसे दुन्या की सबसे हिरणकूं खबर को सुनकर बाँदा हैरत में पद जाता है

भाभी - तुम... नहीं तुम ऐसे hi हवा में तीर छोड़ रहे हो.. भला तुम कैसे मेरी परेशानी जान सकते हो

मई भाभी को न देख कर साइड रखता हुआ थोड़ा सा चेहरा नीचे करता हुआ बोलै

मई - भाभी मई आज के ज़माने के एक इंटेलीजेंट लड़का हों. मैंने पहले भी आप से कहा था. मई चेहरे देख कर परेशां भांपना सीख गया हों. किन्ज़ा एपीआई अम्मी जान और फिर आप के चेहरे को देख मैंने बहुत कुछ जान लिया था. किन्ज़ा एपीआई का मटर मैंने किसी हद तक सोल्वे कर दिया. अम्मी जान की परेशां मैंने अपने सर ली तो अम्मी जान खुश हो गई.. मैंने आप से आप की परेशानी पूछी.. लेकिन आप ने सिरा नहीं थमाया.. मई फिरोज उर्फ़ बाबू भला कैसे अपणु को परेशां में देख सकता था.. आप कुछ नहीं बता प् रही थी. तो मैंने नदीम भाई के चढ़े पर धयान बढ़ा दिए.. फिर मुझे नदीम भाई के चेहरे पर कुछ ऐसे तासरत दिखे.. जो अलग थे, बहुत hi अलग..

भाभी हकला कर बोली - कैसे तासरत ??

मैंने भाभी को नहीं देखा.. ऐसे hi बोलै - भाभी मैंने कहा न.. मई दुन्या को कुछ ज़यादा hi स्पीड के साथ समझ रहा हों. और हम लड़कों के चेहरों पर जो एक्सप्रेशन होते हाँ.. वो हम लड़के बखूबी समझ सकते हाँ.. मई भी समझ गया हों.. समझने में आसानी मुझे इसलिए भी हुई.. क्यूंकि हम पठान हाँ... और पठानों में जहाँ हज़ारों खूबियां हाँ.. वही एक बात तक़रीबन हर पठान में मुश्तरक है.. और वह है---

भाभी ने झट से मेरे मोह पर अपना हाथ रख दिए.. कनपटी हुई आवाज़ में बोली

भाभी - kh**a के लिए इससे आगे मत बोलना फिरोज.. मुझे तो तुमने मार hi दिए.. ये बात करके.. अब मई तुम्हे मोह दिखने के क़ाबिल नहीं रही.. शर्म से मई अपनी जान दे दूंगी....

भाभी कनपटी हुई बड़ी शर्म और दुःख के साथ रोने लगी.. फिर मेरे मोह पार्स हाथ उठा कर वहां से उठने लगी.. लेकिन यहाँ इतनी ढेर साडी मेहनत करने के बाद मई भाभी को कैसे जाने दे सकता था.. मैंने भाभी का हाथ नहीं छोड़ा

भाभी ज़ोर लगा कर अपना हाथ छोड़ने लगी..... मैंने नहीं छोड़ा तो सारा चेहरा दूसरी तरफ hi रखे हुए बोली

भाभी - देखो.. तुम ज़रूरत से ज़यादा hi बकवास कर चुके हो.. मेरा हाथ छोड़ दो तो अच्छा होगा... मेरे होश गम हो रहे हाँ. ऐसा न हो मई होश खो बेथुन.. पहले hi कई दिन से मई सुख की सांस नहीं ले प् रही हों.. ऐसे में तुमने ऐसी हत्या बात ज़ुबान पर ला कर मेरा होश वळून से रिश्ता तोड़ डाला है. मई सोच भी नहीं सकती थी. तुम नदीम को नोटिस कर लोगे.. फिर तुम इतनी दीदा दलेरी का साबुत देते हुए मेरे मोह पर साडी घलज़त उगल डोज.. छोडो मेरा हाथ feroz..isse पहले के मई भूल जाऊं.. तुम मेरे देवर.. और मैंने कभी तुम्हे भाई बराबर मन था.....

मई - मई अब भी आप का भाई hi हों

भाभी ज़ेहरेले लहजे में बोली - भाई होते तो श्रम से मर जाते. लेकिन ऐसी बात करने की कभी सोचते hi नहीं... तुमने न सिर्फ सोची.. मुझसे कह भी दी.. नहीं फिरोज... अब मई तुम्हारा कभी सामना नहीं करना चाहूंगी..

खंडन में फुड़ियाँ मारने की छह दिल में पालने वालो.... अब बताओ... क्या इतना hi आसान है फुद्दी मारना.. अरे मेरे जैसे को कितने पापड़ बेलने पद रहे थे... कितनी बर्दाश्त का साबुत देना पद रहा था मुझे भाभी की फुद्दी पाने के लिए. कितना ज़हर भी भाभी मेरे मोह पर उगल रही थी.. ज़हरीली नागिन भी ऐसा ज़हर नहीं मोह से निकलती होगी.. जैसा ज़हर भाभी मेरे लिए अपने मोह से निकाल रही थी. लेकिन मेरे जैसा तुममे से कोई ज़िद्दी भी न हुआ होगा...

मई ज़हरीला नहीं था. लेकिन भाभी का ज़हर मुझे मार नहीं सका. मेरे इरादों को मुतज़लज़ल नहीं कर सका... अरे मैंने तो बिना देखे hi भाभी की फुद्दी की खुशबु अपनी नस नस में उतार ली थी.. भला कैसे हार मान जाता..

मई भाभी को फिरसे ज़बरदस्ती कुर्सी पर बिठा गया.. भाभी सच में मेरा चेहरा नहीं देखना चाहती थी.. शर्म से भी, नफरत होने लगी थी भाभी को मुझसे या नहीं.. ये अभी नहीं कह सकता था.. लेकिन घुसे से भी भाभी मेरा चेहरा नहीं देखना छह रही थी....

मई - इस सब का एक बड़ा सलूशन है मेरे पास भाभी जी... आप की परेशानी भी दूर हो जायेगी.. हमारे बीच का सारा झगड़ा साडी नाराज़गी भी दूर हो जायेगी.. सबसे बड़ी बात कहूं भाभी जी..... अब से ले के मरते दम तक कभी भी मेरी आँखों में आप के लिए पाकीज़गी से हटकर कुछ दिखा न तो कसम है मुझे आप hi की भाभी जी.. मई अपनी ऑंखें hi नोच डालूंगा. और मई जनता हों.. आप अचे से समझती हाँ.. मई अपने कहे से फिरता नहीं हों.. आप ने फिर भी जाने की सोची.. ये पास में वही दीवार है. जो उस दिन बारिश में थी.. आप थी किन्ज़ा एपीआई और माहिरा आपि थी.. आप श्रम से जान देने की बात कर रही हाँ.. आप ने यहाँ से जाने के लिए एक भी कदम जाने के लिए बढ़ाया तो मई आप को दूसरा कदम बढ़ने का मौका नहीं दूंगा.. दीवार पर चढ़ कर सर के बल नीचे कूद पडूंगा...

भाभी ने मेरी आँखों में देखा.. और डर गई.. मेरी आँखों में अब खून उतर आया था. मई जोश में आ गया था... और ये जोश मेरे प्लान के हिसाब से नहीं सिचुएशन और भाभी के दर्द को लेके रियल में था.

भाभी - तुम ऐसा नहीं कर सकते

मैंने भाभी का हाथ छोड़ दिए - मई इजाज़त देता हों.. आप चाहें तो जा सकती हाँ..

भाभी - तुम क्या समझते हो.. मई तुम्हारी बातों में आ जाउंगी..

फिर बुरा सा मोह बना कर बोली - तुमने जो मेरे लिए कहा.. वो सोचने के बाद मुझे तुम्हारी जान की परवा भी क्यों रहेगी अब.. एक लड़की की इज़्ज़त उसके लिए दुन्या की हर चीज़ से बढ़कर होती है.. और तुमने.. तुमने फिरोज मुझे मेरी hi नज़रों में शर्मिंदा कर दिए..

मई - अपनी अपनी सोच की बात है भाभी जी.. आप बैठी हाँ अभी तक.. जा नहीं रही हाँ

भाभी घुसे से उठती हुई बोली - तुम मुझे चलेंगे मत करो.. मई तुम्हारी कोई नहीं हो समझे.. तुम मारो या जिओ मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता अब..

मई मुस्कुराया - मतलब पहले फर्क पड़ता था

भाभी पजल हुई.. फिरसे हकले - नहीं.. पहले भी मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता था..

मई भाभी को फिरसे बिठा गया - मैंने कहा था मेरे पास एक सलूशन है हर मसले का

भाभी - मुझे नहीं सुन्नी कोई ऐसी बात.. मुझे नहीं चाहिए कोई सलूशन भी

मई - मई अब खामोश हो रहा हों.. आप ने दो काम करने हाँ.. एक तो आप जाना चाहें तो जा सकती हाँ.. दूसरा अब आप मुझसे खुद कहेंगी.. मई त्यार हों फिरोज.. बताओ क्या है सलूशन..

भाभी इस्रेहजैया अंदाज़ में है पड़ी - हँ! ऑप्शन रखते हो मेरे सामने.. मई फराह खान.. तुम जैसों को चुटकियों में उदा दूँ.. तुम कल के लड़के मुझे ऑप्शन दे रहे हो

मई खामोश रहा

भाभी उठती हुई - तुम क्या समझते हो. मई तुम्हारी बातों में आ जाउंगी.. यहाँ से जा नहीं सकती.. और मुझे तुम्हारी और कोई भी बात नहीं सुन्नी है.. कोई भी सलूशन मुझे तुमसे नहीं चाहिए है.... समझे..

मई खामोश रहा. भाभी मुझे ताड़ती रही.. मई साइड देखता रहा. भाभी फिरसे पुराणी बात बोलने लगी. जाने को कहने लगी. लेकिन वही कड़ी रही..

5 मिनट... बस 5 मिनट.. भाभी ढीली पड़ती हुई कुर्सी पर बेथ बोली

भाभी - देखो फिरोज मई इतनी अपसेट हों.. ऐसा लग रहा है दिमाग कोई नस पहात जायेगी.. एक तो तुमने मेरी नक् में दम कर रखा है.. दूसरा वो तुम्हारा भाई नदीम.. कमीना है पूरा..... शर्म तो जैसे तुम दोनों भाइयों में पैदा होते hi मर गई थी..

मई फिर भी खामोश रहा..

भाभी मेरे कंधे पर हाथ रख झंझोड़ कर बोली - कमीने मई कितनी देर से बकवास करती जा रही हों.. और तुम हो कह कण पर मक्खी तक नहीं बैठने दे रहे... हीरो नहीं हो तुम.. न hi मई कोई हीरोइन.. मेरे सामने ऐसा तुम्हारा ये अटिट्ड ये ड्रामा ज़हर लग रहा है

मई अभी भी खामोश hi था.. दूसरी तरफ देख रहा था.. लेकिन दिल hi दिल में खूब है रहा था.

भाभी ने मुझे ज़ोर से अपनी तरफ घुमा दिया..... लेकिन मैंने चेहरे भाभी की तरफ नहीं होने दिए

भाभी ने मेरे चढ़े को पकड़ अपनी तरफ मोड़ दिया.. मैंने खुद को सख्त बना लिया. भाभी की कोशिश नाकाम रही.. फिर हार मानती हुई बोली

भाभी - तुम इतने ज़िद्दी..... इतने बेशरम भी हो सकते हो.. मुझे गुमान तक नहीं था.... तुमने एक पल के लिए भी नहीं सोचा.. मई तुम्हारी भाभी हों.. और भाभी का रिश्ता ऐसा मोहतबर होता है.. कोई देवर भाभी के साथ ऐसा करने की सोच भी नहीं सकता.. लेकिन तुम...... खैर अब मई क्या कहूं तुमसे... बास इतना hi कहूँगी.... बाबा तुम जीते मई हारी.... अब बताओ क्या है सलूशन.... मेरी हालत किसी मुर्दे से कम् नहीं है.. रही सही कसम तुमने पूरी कर दी....

मैंने मुस्कुरा कर भाभी को देखा.. पहले गुसा था. शर्म भी बहुत आई थी भाभी को.. जब मैंने इशारे में भाभी को ये बताया.. भैया आप की गांड मारने को फाॅर्स कर रहे हाँ.. लेकिन आप हाँ कह मान के नहीं दे रही हाँ...

ये सरे इशारे थे. और भाभी जैसी तेज़ दिमाग वाली, शर्मा हाय वाली आज के ज़माने की लड़की सब एक hi पल में जान गई थी.. कैसे वो देवर के मोह से ऐसी बात सुनकर घुसे से पागल नहीं हो जाती... लेकिन मैंने भाभी के घुसे को भी जीत लिया था..

मई - एक hi सलूशन है भाभी जी... जब से आप इस घर में आई है.. मई आप के लिए फिरोज हों... बाकि सब के लिए बाबू.... आप भी मुझे बाबू बना लें.. पुरे दिल से.. मुझे बाबू बना कर आप को मिलेगा एक ऐसा अहसास जो आज से पहले आप ने कभी नहीं पाया होगा. एक भरोसा.. जिस के बाद भरोसा का कोई और लेवल नहीं बचेगा.. ऐसा प्यार प् जाएंगी आप.. जैसा प्यार उम्र की आखरी सांस तक आप को नदीम भैया भी नहीं दे सकेंगे... आज नहीं जानती.. कुछ भी नहीं जानती हाँ.. इन कुछ दिनों में घर में क्या से क्या हो गया है... अम्मी जान किन्ज़ा एपीआई और माहिरा एपीआई के साथ मेरे प्यार का लेवल किस ऊंचाई तक जा पोहंचा है... आप भी प्यार की उस ऊंचाई को प् लें भाभी जी.. फिर आप की साडी परेशानी दूर हो जाएगी.. आप ने उस दिन मेरे गाल पर जो अपने होंठ रखे थे न भाभी जी.. वो सबत करते थे.. आप मुझे दिल से बाबू तस्लीम करना चाहती हाँ.. आज खुले दिल के साथ, खुले लफ़्ज़ों और खुले इज़हार के लिए आप मुझे बाबू कह दें... बाबू मां लें..

इतना बोल कर मैंने अपना राइट गाल भाभी के होंटो के करीब कर दिया

मई - आज पुरे दिल से आप मेरे गाल पर उसी जगा अपने प्यारे होंटो से मोहरे मोहब्बत सबत कर दें.. साडी परेशानियां पल भर में hi ख़तम हो जाएंगी..

इतना बोल मई ज़िन्दगी में पहली बार करीब से भाभी की आँखों में देखने लगा.. फिर मैंने आँखों से इशारा कर दिया.. और अपनी ऑंखें बंद कर लीन....

मुझे यकीन था.. भाभी ज़रूर मेरे गाल पर अपने होंठ रखेंगी.. मुझे खुद पर यकीन था. अपने लफ़्ज़ों और लफ़्ज़ों की सचाई पर यकीन था.. भाभी की आँखों में देख मैं ये जाएं लिया था.. अब भाभी खुद को मेरी बातों में आने से रोक नहीं पाएंगी..

मई इंतज़ार करता रहा.. वक़्त धीरे धीरे सरकता हुआ आगे बढ़ने लगा... फिर फिर भाभी के गरम नरम होंठ मेरे गाल पर ठीक उसी जगा पर आ ठीके.. जहाँ उस दिन भाभी ने घुसे दुःख और नाराज़गी में रखे थे...

मई एक बाज़ी और मार गया था.... अब भाभी का बेलिबास जिस्म भी मुझसे ज़यादा दूर नहीं रहा था...
 




दसवीं क़िस्त

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भाभी के होंठ अगरचे कुंवारे नहीं थे.. लेकिन मुझ नामहरम के लिए तो कभी भी नहीं थे.. मैं अपनी मेहनत से भाभी को इस मुक़ाम तक ले आया था. उनके अनमोल रास भरे शराबी होंठ मेरे गालों पर प्यार से चिपक गए थे. और खुशबु बखेर गए. इक नशा था जो मेरी राग राग में उतरने लगा था. एक सुरूर था जिसकी कोई हद नहीं थी. इतने पास से उनके चेहरे की जिल्द की उमड़ती हुई महक और सांसों की गर्मी मेरी नक् के नथनों से होती हुई मेरे दिमाग में गई. मेरा दिमाग मदहोश भी हुआ और रोशन भी. दिमाग में जैसे आतिश बाज़ी होने लगी. आतिश बाज़ी से फूटने वाली रंगों भरी रौशनी मेरे पुरे जिस्म में उतरती चली गई.

अब भला मई ऑंखें कैसे खोले रख पता. मेरी ऑंखें बंद होती चली गई. और भाभी भी मेरे गालों पर अपने होंठ रख जैसे हटाना भूल गई. उनकी सांस कुछ तेज़ हुई.

ये सब इतना पायरा था. दिल पुकार उठा था.. ये सिलसिला कभी थामना नहीं चाहिए. सांस ख़तम हो जाए. लेकिन साँसों की ये खुशबु लबों की ये मिठास और हरारत कभी मुझसे दूर न हो..

लेकिन भाभी अभी इतनी भी नहीं खुली थी. आखिर वो मशरकी लड़की थी. पठान जड़ी थी. शर्म तो उसके उसका गहना थी. कैसे उतार सकती थी. वो भी इतनी जल्दी. मई उनके लैब अपने गाल पर प् कर होश में नहीं रहा था. भाभी अपने होंठ मेरे गाल से अलग करती मेरे सर के बाल पकड़ कर मुझे झंझोड़ने लगी

मई हड़बड़ा कर अपनी ऑंखें खोल गया. और भाभी को देखा... तो क्या दिलकश नज़ारा देखने को मिला.. भाभी नदीम भाई की हो चुकी थी. नदीम भाई के शिव उनका शर्माना, लजाना और साडी अदाएं किसी और के लिए नहीं थी.. शर्म ो हाय और प्यार के सरे रंग नदीम भाई के लिए थे.. लेकिन मेरे लिए मुझे बिखरे नज़र आये.. भाभी का चेहरा शर्म से लाल सुर्ख हो चूका था. पलकें कैंप रही थी. ऑंखें झुक गई थी. उनके हथु की उँगलियाँ एक दूसरे में फँसी उलझ रही थी. भाभी छह कर भी अपना सर नहीं उठा प् रही थी..

मई कुछ पल भाभी को देखता रहा... भाभी बोलना तो बहुत कुछ चाहती थी.. लेकिन शर्म की इन्तहा ने जैसे उनकी हिम्मत सल्ब कर ली थी. मैंने दोनों बाहें भाभी के गले में दाल कर भाभी के गाल को चुम लिया.. भाभी को झटका लगा. वो फ़ौरन hi सर घुमा कर मुझे देखने लगी. लेकिन शर्म ज़यादा थी.. उनके होंठ कांपने कुछ कहने को. लेकिन भाभी के होंठ भी जैसे लफ्ज़ ऐडा करने की सलाहियत खो बैठे थे..

कहाँ मेरे गाल पर अपने लैब रखने से पहले वो खुद को स्ट्रांग बना गई थी.. मेरी इतनी बेशरमी वाली बात सुनकर भी वो हिम्मत कर गई थी.. मुझसे बातें करती रही थी.. मुझसे बहस करती रही थी... और अब.... अब तो जैसे पहली बार, लव ात फर्स्ट वाला मामला हो गया था. भाभी ऐसे hi शर्मा रही थी. जैसे उनका फर्स्ट टच अपनी प्रेमी के साथ हुआ हो..

मैंने भाभी के गाल को चूमा.. तो भाभी मुझे देखने लगी. लेकिन फ़ौरन hi नज़रें झुका भी गई... कांपते होंटो से वो कुछ कह नहीं पाई.. मुझसे कितनी बड़ी थी.. लेकिन जो हुआ था.. वो उम्र का फर्क मिटा गया था.

मैंने फिरसे अपने होंठ भाभी के गाल पर रख दिए..

भाभी हिम्मत करती हुई बोली - फिरोज... न करो... जितना हो चूका.. वो भी बहुत ज़यादा है.. मेरे दिल की धड़कन काबू से बहार हुई जा रही है फिरोज

मई - फिर से फिरोज.. अपना स्पेशल प्यार दे कर आपने आपके दिल ने मुझे बाबू मान लिया है. अब मुझे कभी आप के मोह से फिरोज नहीं सुन्ना है भाभी.. सिर्फ और सिर्फ बाबू....

भाभी - बाबू प्ल्ज़ चेहरा हटा लो.. ये मुझे ज़यादा लग रहा है..

मैंने अपने होंठ हटा लिए और भाभी का चेहरा थाम कर अपनी आँखों के सामने कर दिए

मई - जानती हाँ आप भाभी.. मई देवर बनकर कभी इतनी हिम्मत नहीं कर सकता था.. ऐसा करना गुस्ताखी भी होती... लेकिन बाबू बनकर मई इससे ज़यादा करूँगा.

भाभी हरैं हुई बोली - इससे भी ज़यादा.. नहीं बाबू.. इससे ज़यादा मई अफ़्फोर्ड नहीं कर सकती..

मई - मई बाबू बनकर एक भाई और दोस्त बन गया हों आपका. ाचा मेरी एक बात का जवाब देंगी आप

भाभी - हम्म्म्म... कहो

मई - आप औरतज़ाद हो.. एक लड़की एक लड़के के साथ तन्हाई में बैठी हो... वह भी इतने पास.. क्या उस लड़के की जिस्म में हलचल नहीं मचेगी.. क्या उसकी आँखों का रंग बदलेगा नहीं.. आप लड़की हो.. आप की इस मामले में सेंस हम मर्दों से कहीं बढ़कर तेज़ होती है. मेरी आँखों में देखिये भाभी जी.. मेरे चेहरे को देखिये. मेरा जिस्म आप के सामने है.. मेरे हथु ने आप के चेहरे को थाम रखा है.. मई जानना चाहता हों. आप इस बारे में क्या कहती हाँ.

भाभी मेरी बात घोर से सुनती हुई वही सब करने लगी.. जो मैंने कहा था. वो मेरे चेहरे को देख मेरे हथु को अपने चेहरे पर देखने लगी. फिर मेरी आँखों में देखने लगी.. लेकिन न देख सकीय.. शर्म से उनकी ऑंखें झुक गई

मई - भाभी ये बहुत ज़रूरी है

भाभी - नहीं मई नहीं देख सकती बाबू.. पता नहीं तुम्हारी बातों में क्या जादू है.. कैसा नशा है.. मेरी ज़िन्दगी में इस अंदाज़ में आज तक कोई भी लड़का नहीं आया है. नदीम भी नहीं.. मई समझ नहीं प् रही हों.. ये मेरे दिल को क्या हो रहा है..

मई - क्या हो रहा

भाभी - कुछ अजीब अजीब सा.. कुछ समझ में न आने वाला

लेकिन मई समझ रहा था.

मई - भाभी आप ने कभी किसी से प्यार किया है

भाभी की नज़रें झुकी हुई थी. वो खामोश रही

मई - बताएं न

भाभी न में सर हिला कर जवाब दे गई

मई - भाभी चलिए एक अलग सा तजुर्बा करते हाँ.. मूवीज में देखा है. किताबो में पढ़ा है.. लेकिन कभी तरय नहीं किया..

भाभी सवालिया नज़रों से देखने लगी

मई खड़ा हुआ.. फिर भाभी को खड़ा करता हुआ अपनी और भाभी की चेयर्स आमने सामने करता हुआ भाभी को मीठा कर खुद बेथ गया.. भाभी समझ नहीं पाई थी.. मई क्या करने वाला हों

मई अपनी कुर्सी आगे घसीट कर बैठा तो मेरे घुटने भाभी के घुटनो से टच हो रहे थे.. भाभी अपनी कुर्सी पीछे को सरकने लगी. मैंने रोक दिए

भाभी ने एक पल को उलझन भरी नज़रों से मेरी आँखों में देखा. फिर नज़रें झुका गई. भाभी देवर से शर्मा रही थी.. मैं आगे को झुकता हुआ भाभी का चेहरा थाम कर अपने सर भाभी के सर के साथ जोड़ गया. भाभी कुछ हैरान होकर मेरी आँखों में देखने लगी.. मेरा माथा भाभी के माथे के साथ और नक् मेरी नक् के साथ जुडी हुई थी...

मई धीरे से मदहोशी भरी आवाज़ में बोलै - भाभी अपनी ऑंखें बंद कर लीजिये.. भाभी ने ऑंखें बंद कर ली..

मई - अब जब तक मई न कहूं.. अपनी ऑंखें न खोलियेगा

भाभी - नहीं खुलेंगी.. लेकिन बाबू ऐसे तुम्हारी आवाज़ मुझे अपने अंदर कहीं से आती हुई आ रही है

मई हैरानी से बोलै - हाँ मुझे भी आपकी आवाज़ कुछ ऐसी hi लगी.

भाभी - तुम करने क्या वाले हो

मई - अब आप मेरे उस पूछे गए सवाल का जवाब दें.

भाभी - कोनसा सवाल

मई - भाभी हम दोनों आज पहली बार इतने करीब आये हाँ.. कोई भी शरीफ देवर आप जैसी शर्म ो हाय वाली भाभी के इतने करीब नहीं आया होगा. भाभी आप ने आप तक की लाइफ बड़ी hi साफ़ सुततरी गुज़री है

भाभी - ये बात तुम कैसे कह सकते हो

मई - मेरे दिल ने कहा और मैंने मान लिया..

भाभी ने ऑंखें दी थी.. भाभी की पलकें मेरी आंख से टकराई. तो मैंने समझ लिया..

मई - क्या देख रही हाँ.. ऑंखें नहीं खोलनी आप ने.. मैं भी नहीं खुलेंगा.. मुझे लग रहा है.. जैसे मई जो तजुर्बा करने जा रहा हों.. वो बड़ा मुफीद सबत होने वाला है..

भाभी ने फिरसे ऑंखें बंद कर ली

भाभी - बाबू.... पता नहीं क्यों.. जब से मैंने तुम्हे बाबू कहा है. तुम्हारे गाल को प्यार दिए है.. फिर तुमने भी वही किया.. तब से मई खुद को समझ में न आने वाला चेंज फील कर रही हों

मई - एहि सच्चा प्यार है भाभी जी

भाभी - प्यार... लेकिन एक देवर की हैसियत से मई तुमसे प्यार तो पहले से hi करती हों

मई - तब आप को मुझसे ऐसा प्यार नहीं हुआ था... ाचा अब जवाब दें

भाभी - तुम सवाल फिरसे दोहराओ.. इस बार तुम्हारी आवाज़ मेरे अंदर उतर रही है.. मई अच्छे से समझूंगी.. फिर जवाब दूंगी...

भाभी की धीमी आवाज़ में अजीब सा नशा था.. ये मेरे लिए एक नया सुरूर भी था एक्सपेरिमेंट भी.

मैंने अपना सवाल रिपीट किया

भाभी कुछ सेकण्ड्स खामोश रही.. फिर बोली - मई हैरान हों बाबू.. मई एक लड़की हों. जो कभी भी अनजान लड़के की तरफ नज़र उठा कर नहीं देखती. न महरम के इतने करीब आने का तो सोच भी नहीं सकती थी. उस दिन किन्ज़ा और माहिरा तुम्हारे साथ मिलकर मुझे तुम्हारा गाल पर किश करने को बोली.. तो मई अंदर से हिल कर रह गई थी. मई सोच भी नहीं सकती थी बाबू. अपने शोहर के शिव मेरे होंठ किसी और के गाल को छू भी सकते हाँ.

भाभी मेरी hi तरह सर जोड़े जाने से थोड़ी सी मदहोश होने लगी थी. हमारे फाडे जुड़े थे ऑंखें बंद थी. हमारी साँसों एक दूसरे के अंदर उतर रही थी. भाभी नार्मल हालत में कभी भी ऐसे लफ्ज़ खुल कर इस्तेमाल न करती. लेकिन ये सिचुएशन ट्रांस जैसी थी. भाभी खुलती जा रही थी.

मैंने भाभी को खुल कर बोलने का मौका दिया

भाभी - उस दिन मई बहुत अपसेट भी रही थी. लेकिन दूसरे मटर में उलझ कर मई वो सब फरामोश कर गई. तुम बहुत अच्छे हो बाबू.. मेरे दिल में कोई गुलित नहीं पैदा हुआ. फिर तुम्हारा बार बार मुझे परेशां करना. मुझसे मेरी परेशानी का जानने की ज़िद करना.. मई और अपसेट हो गई. फिर आज का दिन और तुम्हारा खुल कर बोलना, तुम्हारा मेरी परेशानी को भांप लेना मेरी जान निकल ले गया. पता नहीं मई इतनी शर्म वाली होकर भी मर क्यों नहीं गई. मेरे दिल की धड़कन रुक क्यों नहीं गई. लेकिन फिर तुम्हारी ज़िद लगन और तुम्हारे चेहरे पर सचाई की परछाई और अंदाज़ सब इतना यूनिक था. मई तुम्हारी बातों में आ गई. मई कुछ देर के लिए खुद को भूल गई. अपनी परेशानी अपनी शर्म को भूल गई. मई जैसे ट्रांस में आ गई

भाभी अब भी ट्रांस में hi थी..

भाभी - मई वो कर गई. तो होश में रहते हुए कभी नहीं करती. फिर तुम्हारा रिप्लाई में मेरे गाल को चूमना. मेरे अंदर अजीब से अहसासात को जनम देगा.. मैंने, मेरे दिल ने तुम्हे बाबू मान लिया.. अपना बाबू मान लिया. अपना दोस्त अपना भाई अपना खैर खः मान लिया. बाबू तुमने कहा. इतने करीब आ ने के बाद तुम्हारे अंदर मुझे क्या देखने को मिला. तुमने पुछा था. मेरे जैसी लड़की अकेले में एक गैर लड़के के साथ इतनी करीब हो. और लड़के के वजूद में उसकी आँखों में, उसके चेहरे पर क्या कुछ बदल कर आ जाता है.. तो मई कहती हों.. हाँ बाबू.. मैं एक लड़की होने की बिना कर कहती हों.. कोई भी लड़का मेरे जैसी लड़की के इतने करीब कर अपना होश क़ायम नहीं रख सकता. लेकिन तुम अपने पुरे होश में हो बाबू. तुम्हारी आँखों में मुझे वो पाकीज़गी दिखाई दी है. जो एक सच्चे प्यार करने वाले की आँखों में दिखाई देती है. इन आँखों में माँ और बहनो के लिए किसी अपनी जान्ने वाली औरतज़ाद के लिए जो प्यार की इन्तहा है. वो मुझे दिखाई दी है. तुम्हारे जिस्म में मुझे छिछोरे लड़को जैसा कुछ भी महसूस नहीं हुआ है बाबू. एक सेकंड के लिए तुम्हारी आँखों में रंग बदलता तो मई तुमसे बदल जाती. तुम्हारा जिस्म मेरे इतने करीब आ कर बगावत पर उतर आता तो मई तुम्हारे मोह पर थूक देती. हाँ बाबू... पता नहीं मई इतना सब कैसे बोल प् रही हों. इतने खुले लफ़्ज़ों में मैंने कभी नदीम से भी बात नहीं की है. तुम अनोखे हो बाबू.. तुम बहुत प्यारे हो.. बहुत ज़यादा भरोसे वाले लड़के हो.. इतने भरोसे वाले.. शायद मई तुम्हारे जितना भरोसा अपने सेज भाई पर भी न कर सकूँ. ये है तुम्हारे पूछे गए सवाल का जवाब.. दिल तो छह रहा है.. मई बोलती रहूं और अपने दिल का सारा हाल तुम्हे बताती रहूं.. एक और बात कहूं बाबू.

मई जैसे अब नशे में हो गया था. मुझे ऐसा लग रहा था. जैसे मई भाभी में और भाभी मेरे अंदर पूरी तरह समां चुके हाँ. भाभी के लफ्ज़ hi नहीं भाभी भी मेरे अंदर कहीं बेथ कर मुझसे बोल रही थी. मई जो तजुर्बा भाभी के साथ करने जा रहा था. खुद उस तजुर्बे के दौरान एक अजीब ो गरीब दुन्या में जा पोहंचा था.

मई - हाँ भाभी जी कहिये

भाभी तेज़ सांस लेती हुई बोली - बाबू.. जब से मैंने तुम्हे अपना अनमोल प्यार दिए है न. जब से हम दोनों सर जोड़े हाँ न.. तब से मई अपनी परेशानी भूली हुई हों. अब याद भी आ रही है तो ऐसा लग रहा है. जैसे वो कोई बड़ी परेशानी hi न हो.

भाभी अपनी गांड की उनतोच सील की बात कर रही थी.

मई - ये तो कमल हो गया

भाभी - हाँ बाबू सच में कमल हो गया है... लेकिन जब मई ऑंखें खोलूंगी. तब फिरसे वही सब होगा. ऐसा करती हों. मई ऑंखें hi नहीं खोलती. ऐसे मुझे बहुत सुकून मिल रहा है बाबू.

मई - मेरा भी दिल नहीं छह रहा है भाभी जी.. ऐसा मन कर रहा है. जैसे हम दोनों यौन hi बैठे रहे और ---

मेरी बात भाभी ने पूरी कर दी

भाभी - और ज़िन्दगी तमाम हो जाये.. हेहेहे.. बाबू.... ये कितना सुकून बख्श है न

मई - हाँ भाभी जी. मैंने तो सोचा भी नहीं था.. ऐसा करने से इतना सुकून मिलता है..

भाभी - और ये भी तो देखो न बाबू. मई कैसे तुमसे खुल कर बात कर रही हों. वर्ण खुली आँखों के साथ तुमसे इस टॉपिक पर हरगिज़ बात न करती.. जब तुमने वो बात करि. जो एक लड़की कभी नहीं सुन सकती. कसम से मेरा दिल करने लगा था. मेरे पास पिस्तौल हो. पहले मई तुम्हे जान से मार दूँ.. फिर खुद को शूट कर दूँ.. ऐसी hi शर्म मुझे आ रही थी.

मई - और अब---

भाभी - अब... पता नहीं मई किस दुन्या में पोहंची हुई हों बाबू.. जब बहार निकलूंगी तो शायद जितने लफ्ज़ मेरे मोह से निकले हाँ. वो मेरे दिल का रोग बन जाएँ.. बाबू मेरी एक hi राज़दार सहेली थी. लेकिन मई उससे भी अपनी ये परेशानी शेयर नहीं कर पाई.. लेकिन देखो. कैसे मई बेशर्मो की तरह तुमसे ऐसी बातें कर रही हों.. देखो बाबू.. मैंने दिल से तुम्हे बाबू मन है. एक सच्चा दोस्त मन है. मेरी अब भी वही बातें होंगी.. जो बारिश वाले दिन मैंने की थी. मई मर जाउंगी बाबू. अगर मेरी ज़ात पर एक भी ऊँगली उठी. प्ल्ज़ बाबू तुम मेरी कोई भी बात किसी से शेयर मत करना. यहाँ मई पता नहीं क्यों तुम्हारे सामने इतनी मजबूर हो गई हों. वर्ण मई इतनी कमज़ोर सोच की मालिक नहीं हों.

मई - मई जनता हों भाभी जी.. आप बहुत शर्म वाली और बहुत अज़ीम हाँ..

भाभी - अब क्या कहूं

मई - जो भी दिल में है. कह दें

भाभी - डर लगता है बाबू

मई - कैसा डर

भाभी - जितना बोल चुकी हों. ऑंखें खोलने के बाद वहीँ वो गले की हड्डी की तरह

मेरे दिल में फस कर न रह जाए. एक hi दिन में कितना कुछ हो गया.

मई - इसका भी एक सलूशन है

भाभी - पहले वाला सलूशन काम कर गया है. शायद दूसरा भी कर जाए. तुम बताओ.. दूसरा सलूशन क्या है

मई - हम खोल कर कुछ देर ऐसी hi बातें करते हाँ.. खुली आँखों से एक दूसरे की आँखों में उतर कर बात करेंगे तो डर भी जाता रहेगा.. भरोसा भी बढ़ जाये. प्यार भी बढ़ेगा और दिल को कोई रोग भी नहीं लगेगा.

भाभी - नहीं.. मुझसे खुली आँखों से कुछ कहा नहीं जाएगा.

मई - मुझपर भरोसा करें

भाभी - भरोसा तो करने लगी हों. वर्ण इतना कुछ होने के बाद, तुम्हारे मोह से वैसी बात सुनकर मई तुम्हे न तो अपनी शकल दिखाना चाहती थी. और न hi तुम्हारी शकल फिरसे देखना चाहती थी.. उफ्फ्फ्फफ्फ्फ्फ़.. तब मई होश खो कर कुछ उल्टा सीधा कर जाती तो क़यामत आ जाती.. सब कुछ रहस्य नहस हो जाता.. लेकिन तुमने सब बर्बाद होने से बचा लिया बाबू.. तुम कितने अचे हो.. लेकिन बड़े बेशरम भी हो.. भाभी माँ बराबर होती है. और तुम भाभी की ऐसी बात जान कर भाभी के hi मोह पर बोल गए..

मई - मई ऑंखें खोल रहा हों

भाभी - नहीं.. nahi..plz ऑंखें मत खोलो.. मई नहीं खोल पाउंगी.. शर्म से मर न जाउंगी मई

मैंने ऑंखें खोल दी.. भाभी को पता चल गया...

भाभी - बाबू तुमने ऑंखें खोल दें

मई - आप भी खोल दीजिये..

भाभी - बहुत मुश्किल है बाबू

मई - ाचा मई एक काम करता हों.. आप की ऑंखें खुद से खुल जाएंगी

भाभी - तुम क्या करने वाले हो बाबू

मैंने अपना चेहरा हटा लिया.. मेरी आँखों में इतना ज़यादा नशा उतर आया था. आँखों में रंग पहले हुए महसूस होने लगे. मई बहुत करीब से भाभी के चेहरे को, बंद आँखों को देखने लगा. ओह्ह्ह कितनी हसीं लग रही थी भाभी जी.. कितना दिलकश चेहरा था भाभी जी का.. कितने मस्त स्मेल आ रही थी भाभी के चेहरे से.. भाभी जी के लाल होंठ, गुलाबी गाल काजोल भरी ऑंखें, जो भीग जाने से कुछ और हो गई थी. लेकिन फिर भी बहुत ज़यादा दिलकश लग रही थी.

मैं भाभी की एक आंख पर अपने होंठ लगा कर चुम गया. भाभी बैठी बैठी कैंप गई.. कनपटी हुई आवाज़ में बोली - baaaaaaabuuuuuuuuuuuu

मैंने फिर दूसरी आंख चुम ली.. भाभी जैसे नशे से चूर लम्बी सांस लेने लगी.. फिर अपनी ऑंखें खोल दी. मेरा चेहरा बहुत करीब था. भाभी हड़बड़ा कर पीछे हटी.. और ऑंखें मीच कर बंद करती हुई खोलती हुई छत पर नज़र दौड़ने लगी. फिर मुझे देख फिरसे ऑंखें बंद कर गई.

भाभी शर्म से कनपटी हुई बोली - नहीं.. नहीं बाबू मई अपनी ऑंखें खुली नहीं रख सकती.. प्ल्ज़ तुम मुझे फाॅर्स मत करना

मई - सोच लें भाभी जी.. अभी दिन शुरू हुआ है.. जल्द hi ख़तम भी हो जाएगा. फिर रात आ जाएगी.. फिर नदीम भाई घर आ जायेंगे..

भाभी घबरा कर ऑंखें खोलती हुई मुझे देखने लगी. शर्म से भरी नज़रें मेरी नज़रें से जुडी नहीं रह सकीय.. नीचे गिर पड़ी

मई भाभी का हाथ थम कर उठता हुआ भाभी को भी उठा गया.. फिर खड़े खड़े hi भाभी को गले से लगा लिया.. ये भी पहली बार था.. भाभी के गरम और पसीने से भीगे मुम्मे मेरे सीने के साथ डाब से गए थे.

भाभी कैसे मेरी आँखों में देख सकती थी.

भाभी - बाबू मुझे छोड़ दो प्ल्ज़. ये और भी ज़यादा होने लगा है

मई - बाबू बनाया है तो थोड़ा सा और ज़यादा होने दें.. फिर आप का दिल पूरी तरह से मुझे अपना मान लेगा. फिर आप को मेरी कोई भी बात बुरी नहीं लगेगी.. आप आंख बनकर मुझपर भरोसा कर सकेंगी. फिर आप कोई भी बात मुझसे शेयर करते हुई झिझक फील नहीं करेंगी.. कुछ देर पहले आप ने कहा था. आप अपनी राज़दार सहेली से भी अपनी परेशानी शेयर नहीं कर सकीय. भाभी जी मेरा आप की परेशानी को जान लेने के बाद भी मेरी आँखों में आप के लिए कुछ हत्या नहीं आया तो कभी भी नहीं आएगा. हम एक डॉक्टर के पास जाते हाँ. वह हमारे लिए अनजान होता है. फिर भी हम उससे अपनी परेशानी शेयर कर देते हाँ.. एक औरत जो उम्र भर किसी गैर को नज़र भर के नहीं देखती.. ऑपरेशन थिएटर में वो पूरी की पूरी मेल फ्रेमलेस डॉक्टर्स की टीम के सामने बेलिबा हो जाती है

भाभी - न करो बाबू.. ऐसी बातें न करो. मई सब जानती हों. मुझे और भी शर्म आएगी.. अगर तुमने ऐसी बातें करि तो

मई - आपकी परेशानी का सलूशन भी इसी टॉपिक पर खुल कर बात करने में hi है भाभी जी

भाभी - वो कैसे ?

भाभी अब भी मेरी आँखों में नहीं देख रही थी

मई - मेरी एक बात और मानेंगी आप.. फिर मई अपनी बात आगे बढ़ाऊंगा

भाभी - हम्म्म कहो

मैंने फिरसे अपना सर भाभी के सर के साथ जोड़ दिए.. भाभी ने झट से अपनी ऑंखें बंद कर ली

मई - ऑंखें खोलिये

भाभी - नहीं.. इतनी हिम्मत नहीं है मुझमे बाबू

मई - वही तो मई आप को देना चाहता हों.. सच्चे प्यार में हिम्मत की कमी हो तो वक़्त पड़ने पर प्यार को सबत करना मुश्किल hi नहीं नामुमकिन भी हो जाता है

भाभी - फिर भी बाबू

मई - देखिये भाभी जी. आप ऑंखें नहीं खोलेंगी तो आप को मुझसे बात करते हुए कॉन्फिडेंस नहीं आएगा.. फिर आप सबके सामने मुझसे बात करते हुई आज के सरे लम्हात को याद करने लगेंगी.. फिर जो आप की परेशानी शुरू होगी.. उसका सलूशन मेरे पास तो क्या शायद दुन्या में किसी के पास न हो. क्यूंकि आप ने hi कहा है.. कोई भी आप की ज़ात पर ऊँगली उठाये तो आप बर्दाश्त नहीं क्र सकती. ऐसे तो आप सब को खुद से मौका देंगी ऊँगली उठाने का..

भाभी बेबस हो चुकी थी मेरे आगे.. बेबसी से मेरी आँखों में देखती हुई बोली

भाभी - बाबू ये तुमने मेरी परेशानी को ख़तम करने की बजाये बढ़ा क्यों दिए. कितना मुश्किल काम करने को तुम मुझे कह रहे हो. कैसे कर पाउंगी मई नेक्स्ट क्रिएट हो जाने वाली सिचाईओं को फेस. तुम न खुलते. न मुझे खुल कर बोलना सिखाते. न मई बेशरम बनकर तुमसे इतनी बातें करती.. उफ्फफ्फ्फ़ साडी बातें कितनी गन्दी थी. मई तो होश खो कर बोलती hi चली गई. खुद को रोक hi नहीं पाई

मई - तो अब भी खुद को मत रोकिये.. एक hi बार में सारा दर्द सरे ग़म साडी परेशानियां मुझसे बाँट लीजिये

भाभी की ऑंखें झुकने लगी. लेकिन भाभी ने झुकने नहीं दी..

भाभी - अब एहि देख लो.. मेरी परेशानी ऐसी है. उसपर एक भी लफ्ज़ बोलना जान देने के जैसा है. लेकिन फिर भी बोलना पद रहा है.

मई - मुझे अपना सच्चा राज़दार बना लीजिये

भाभी - वह तो तुम ज़बरदस्ती बन hi गए हो.. मई क्या करूँ.. किस कोने में जा छुपों.. लेकिन तुम्हारी बातें मेरा वहां भी पीछा नहीं छोड़ेंगी.

मई - पता है भाभी आप के ज़माने के देवर अपनी भाभी को फर्स्ट नाईट को ले करके कितना परेशान करते हाँ

भाभी - इतनी खबर मुझे भी है बाबू... लेकिन उन लड़ियों में और मुझमे ज़मीन आसमान का फर्क है

मई - हाँ फर्क तो है.. लेकिन एक खास जो यहाँ है. वो वहां नहीं है

भाभी - कोनसी बात

मई - किसी और घर में बाबू नहीं होगा.. इतना मुझे यकीन है

भाभी - मैंने और मेरे दिल ने भी यकीन कर लिया.

मई - तो फिर अब जो बात शुरू करि थी. उसे आगे बढ़ाएं

भाभी - कोनसी बात

अब हम एक दूसरे की आँखों में देख रहे थे. हमारी ऑंखें जुडी हुई थी. हवा भी क्रॉस नहीं हो सकती थी.

मई - वही डॉक्टरों वाली बात

मेरी इस बात पर भाभी का बदन लरज़ा... आँखों में श्रम के बदल छाये...

मई - किन्ज़ा एपीआई डॉक्टर बन रही हाँ.. आप या आप की कोई बहन माहिरा एपीआई या फिर हिना या सजल.. इन सभी में कोई और डॉक्टर बन जाती है. और ऐसे में अगर मेरा एक्सीडेंट हो जाता है तो

एक्सीडेंट वाली बात कर भाभी कैंप उठी

भाभी - बाबू ऐसी बात मोह से मत निकालो

मई - भाभी जी आज बहुत कुछ हमारे मोह से निकल चूका है. और मोह से निकल चूका है. वो मौत से काम भी नहीं है. अगर मेरे अंदर ज़रा सी भी बुराई आ जाती.. तो क्या आप शर्म से मर न जाती. क्या फिर मई खुद को ज़िंदा रहने देता.. आज की हमारी बातें उम्र भर के लिए हाँ.. बहुत कुछ आज से हमारा बदलने वाला है. इसलिए हमें खुल कर बातें करनी चाहिए

भाभी - बात तो तुम्हारी सही है.. लेकिन तुम्हारे एक्सीडेंट वाली बात पर मेरा दिल डूबने लगा था

मई - एहि वो सच्चा प्यार है भाभी जी.. जिसे पाने के लिए लोग सदियों इंतज़ार करते हाँ... मई अपनी बात आगे बढ़ता हों.. ऐसे में किन्ज़ा एपीआई के साथ मेरी कोई सगी ऑपरेशन थिएटर में होगी.. मेरे जिस्म पर पौशीदा हिस्सों पर गहरे ज़ख़्म आये होंगे.. ऐसे में क्याआ किन्ज़ा एपीआई या फिर मेरी कोई सगी वहां होगी. तो क्या वो मेरी जिस्म को बेलिबास करते हुए शर्म फील करेगी. या मेरी जान बचने के लिए साडी शर्म हाय को के साइड रख कर मेरी जान बचाएगी

भाभी - ये तो सामने की बात है. ऐसे सीरियस मटर में कोण भला जान तुम्हारी जान बचने के शिव कुछ और सोच सकता है.. मई भी होती तो वही करती जो मौजूदा हालात में करना ज़रूरी होता

मई - अब ईमानदारी से बताएं.. क्या आज की मौजूदा सीटूशन ऑपरेशन थिएटर से मुख्तलिफ है क्याआआ ??

भाभी - मई पहले hi समझ गई थी. तुम एहि सब कहोगे.. तो फिर सुनो बाबू... मई मानती हों.. ये साडी बातें और अंदाज़ बेशर्मो वाले हाँ.. जैसे मई तुमसे लिपट कर कड़ी हों. अगर एक पल भी अपनी शर्म और अपने लाइफ स्टाइल को, खंडन को सामने रख कर सोचों.. तो दूसरे hi पल तुमसे अलग हो जाओं. और तुमसे इतने फैसले बढ़ा लून.. ज़िन्दगी में कभी मेरे करीब न आ सको.

मई - तो फिर आप का दिल क्या कहता

भाभी - सारा स्यापा hi इस कम्बख्त दिल का है. पता नहीं क्यों मुझसे दग़ा करने पर उतर आया है.. तुम्हे बाबू मान खुद में जैसे hi समाया.. मेरा तो जैसे रहा hi नहीं..

मई है पड़ा

भाभी - सच कहती हों.. मई ऐसी लड़की नहीं हों.. लेकिन देखो मेरा दिल अब भी मुझे तुमसे अलग नहीं होने दे रहा है. कहता है लिपटी रहो.. मई बड़े सुकून में हों. कमीना कहीं का

मई खुल कर मुस्कुरा पड़ा

भाभी को बड़ी शर्म आई अपनी कही बात पर.

मैंने भाभी का गाल चुम लिया. भाभी के गाल और भी लाल पड़ने लगे

मई - चलें अब आप की बारी

भाभी - नहीं.. अब नहीं

मई - क्या दिल नहीं मान रहा

भाभी की ज़ुबान चल पड़ी - वो तो कह रहा है. एक बार क्या हज़ार करो चुमू

मई - तो फिर अपने दिल की मान लें न

भाभी - शर्म आती है

मई - शर्म तो जनि भी नहीं चाहिए.. हाँ पर हमारा रिश्ता और भी स्ट्रांग हो जायेगा.. जब हम नीचे जायेंगे तो जब भी सबके सामने हमारा सामने हो. हमारी आँखों में सब कुछ पहले जैसा होना चाहिए

भाभी - ये भी मेरे दिल की बात है

मई - आप के दिल में कोण है

भाभी - बाबू

मई - और नदीम भाई

नदीम भाई नाम आया तो भाभी जैसे होश में आई... ज़ोर लगा कर खुद को मुझसे छुड़ाने लगी

भाभी - बाबू बहुत देर से ऐसे hi खड़े हाँ.. अब अलग हो जाना चाहिए

मई - ये आप कह रही हाँ या आप का दिल

भाभी - मई कह रही हों. एक शोहर की बीवी कह रही है

मई - यानि आप दिल की नहीं न मान कर किसी और की मानेंगी

भाभी - मई किसी और की अमानत हों न.. जिस की अमानत हों.. उसी के बारे में दिन रात सोचना मेरी ड्यूटी भी है और फ़र्ज़ भी

मई - लेकिन दिल की बात नज़र अंदाज़ कर देने से दिल उदास हो जाया करता है

भाभी - मेरे जैसी कितनी hi लड़कियां हाँ जो दिल की बात रेड करती हुई अपने फ़र्ज़ को निभाने में उम्र बिता देती हाँ

मई - क्या वो उम्र भर सुखी रहती हाँ

भाभी - मई ऐसा क्यों सोचों

मई - देखा आप कितनी देर से मुझसे लिपटी मेरी आँखों में देख कर बात कर रही हाँ. कुछ देर पहले आपने कहा था. खुली आँखों के साथ मेरा सामना नहीं कर पाएंगी

भाभी खिल उठी - हाँ कहा था. लेकिन ये सब तुम्हारा काम है.. थैंक्स बाबू.. तुमने मुझे इतनी हिम्मत बख्शी.. वर्ण तो कसम से सोच सोच कर मेरा दिमाग hi काम करना छोड़ देता

मई - तो अब चलें नीचे

भाभी - हाँ चलना चाहिए.. कितनी देर से मई तुम्हारे साथ छत पर अकेली हों. और सब घर वाले जानते हाँ.. उफ्फ्फ्फफ्फ्फ़ कैसे मई उनसे नज़रें मिला पाउंगी

मई - क्या आप के दिल में कोई खोट है

भाभी - नहीं.. मेरे दिल में कोई खोट क्यों आएगी

मई - मेरे साथ अकेले में टाइम स्पेंड करने पर क्या आप की इज़्ज़त पर हर्फ़ आएगा. क्या सब अपने मेरे बारे में ऐसी वैसी राय क़ायम कर सकते हाँ

भाभी - नहीं

मई - तो फिर डर कैसा

भाभी - हाँ मुझे डरना नहीं चाहिए.. लेकिन ये इतना भी आसान नहीं है.. सब पूछेंगे.. बाबू ने ऐसा क्या कहा.. जो मई सुकून से हो गई.. अगर किसी ने पूछह.. मसला क्या था.. मई क्यों परेशां थी.. अगर किसी ने तुमसे पुछ लिए.. तो.. तुम क्या जवाब डोज

भाभी परेशां हो गई थी

मई - इतनी देर से मैंने जो मेहनत करि है. क्या उसे मिटटी में मिला डौगी

भाभी - मई कुछ समझी नहीं

मई - मेरा अनमोल प्यार प् कर आप खुद में पहले से ज़यादा हिम्मत महसूस नहीं कर प् रही हाँ

भाभी - नहीं.. बहुत हिम्मत आ गई है मेरे अंदर.. न आई होती तो इतनी बातें भी मई तुमसे न कर रही होती

मई - जब इतनी हिम्मत आ गई है.. तो ज़रा सी और करें.. अपने चेहरे को नार्मल रखें... कोई भी पूछे तो कह दीजियेगा.. बाबू को मैंने बता दिए.. और मई सब संभल लूंगा... और मई आप का कोई राज़ मरते दम तक किसी को नहीं बताऊंगा.. जैसे किन्ज़ा एपीआई और अम्मी जान के राज़ मैंने आप को नहीं बताये

भाभी - ोोू... मई तो अपनी परेशानी में वो बात भूल hi गई थी. क्या है किन्ज़ा का वो राज़.. और अम्मी जान का क्या मामला है

मई - सॉरी वो मई आप को नहीं बता सकता

भाभी ने ऑंखें दिखाई - क्यों.. मुझे इतनी देर से परेशां कर रहे हो.. और मुझे hi नहीं बताओगे.. मई इस घर की बहु hi नहीं पूरा पूरा हक़ भी रखती हों.. चलो मुझे बताओ..

मई - मई तो नहीं बताऊंगा

भाभी - क्यों.. क्यों नहीं बताओगे तुम मुझे..

मई भाभी को छोड़ अलग होता हुआ - बास नहीं बताऊंगा तो नहीं बताऊंगा.. आप ज़बरदस्ती करेंगी क्याआआआआ

मई पीछे हटने लगा.. और भाभी मेरी तरफ बढ़ने लगी - देखो बाबू शराफत से मुझे बता दो... नहीं तो मई तुम्हारी पिटाई कर दूंगी

मई भाभी को ज़ुबान दिखा कर चिढ़ाने लगा.. और भाभी चीड़ गई..

मई - मुझे पकड़ लें.. फिर बता भी दूंगा

भाभी - अच्छा ये बात है

मई - बिलकुल एहि बात है

भाभी मेरे पीछे भागी. मई तेज़ी के साथ भागता हुआ छत वाला दरवाज़ा खोल कर तेज़ी से सीढ़ियां उतरता हुआ नीचे जाने लगा.. और भाभी जी मेरे पीछे पीछे

मई हस्ता हुआ भाग रहा था और

भाभी जी - बाबू के बच्चे.. रुको.. कहाँ भाग कर जाओगे.. मई तुम्हे पकड़ कर hi रहूंगी..

मई गौरण्ड फ्लोर पर आ गया.. भाभी भी अपना दुपट्टा काबू करती मेरे पीछे पीछे वही आ गई...

हमारा शोर सुन सब कमरों से बहार आ गए. और अम्मी जान दादी जान और दादा जान हम दोनों को आगे पीछे भागता देख हैरान रह गए.. भाभी आज परेशान थी. और घर में सब ये बात जानते थे.. मई बहुत देर से सबकी नज़रों में रहते हुए भाभी के साथ छत पर था.

एहि बात हैरान कर देने वाली थी.. अम्मी जान दादी जान भाभी की परेशानी जान नहीं पाई थी. उसे हँसा नहीं पाई थी. मैंने कर दिखाया था..

कुछ दिन पहले किन्ज़ा एपीआई, फिर फुफु की बेटी सजल और अब भाभी.. बचपन में खेले गए भाग दौड़ एक खेल भरी जवानी में फिरसे शुरू हो गए थे..

ये देख सब चेहरे खिल उठे थे.. अम्मी जान और दादी जान जैसे आँखों से मेरी नज़र उतार रही थी..

मई पूरी कोठी में भागता रहा.. और भाभी जी भी मेरे पीछे पीछे.. फिर लॉन के झूले के गिर्द भाभी जी थकन से चूर झूले पर गिर सी पड़ी..

भाभी की सांस बहुत तेज़ चल रही थी.. मेरी भी सांस फूली हुई थी.. मई वहीँ ग्रास पर बेथ खुद को नार्मल करने लगा.. पसीने से कपडे भी पुरे गीले हो चुके थे..

अम्मी जान, दादी जान और दादा जान तीनो वही आ गए. आते hi अम्मी जान ने बड़ी मोहब्बत के साथ, बड़े जोश के साथ मुझे अपनी आग़ोश में समेत लिया.. खूब प्यार बरसों अम्मी जान ने मुझपर.. अम्मी जान के बाद दादी जान फिर दादा जान ने मुझे गले से लगा कर मेरा माथा चुम लिया

दादा जान - आज मुझे पूरा यकीन हो गया है. मेरा शेर पोता कुछ भी कर सकता है.

सबकी ख़ुशी का कोई ठिकाना नहीं था..

लेकिन मेरी ख़ुशी को कोई पोहंच भी नहीं सकता था. भाभी पके हुए फल की तरह जैसे मेरी झोली में गिर पड़ी थी.. भाभी के दिल में नदीम भाई न होकर मई बसेरा कर गया था.. ये ऐसी बात थी. जिसपर मई पहला नहीं समां रहा था. हवाओं में जैसे उड़ने लगा था.. नदीम भाई से भाभी की अर्रंगे मैरिज थी.. और लव शादी करने से नहीं दिल के किसी के बास जाने से होता है..

मेरे अचानक से किये हुए तजुर्बे ने मुझे भाभी के दिल में उतार दिए था.. जैसे मई इतने करीब से भाभी की साँसों को अपने अंदर उतरने से नहीं रोक पाया था. ऐसे hi भाभी भी मेरे बदन की महक मेरी साँसों की गर्मी को अपने अंदर उतरने से रोक नहीं पाई थी..

कितने खुले लफ़्ज़ों में ट्रांस में आते हुए भाभी ने दिल की बात कह दी थी.. uffffffffffffff ये दिल भी न.. मेरा दिल भाभी को सोच के अलग hi ढंग से धड़कने लगा..

भाभी के रिलैक्स होते hi अम्मी जान और दादी जान ने भाभी को अपने गले से लगा कर खूब प्यार किया... और भाभी मुझे देख ज़ुबान निकल कर दिखने लगी.

भाभी की साडी हरकतें दिल हार बैठने वाली लड़कियों के जैसी थी... अब से इस घर के एक नयी कहानी शुरू होने जा रही थी.. मेरे और भाभी के प्यार की कहानी.....
 




गयावी क़िस्त

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अम्मी जान मुझे अपने कमरे में ले गयी. खुद से दूर अंदर से लॉक करती हुई मेरा हाथ कर मुझे बीएड पर जा बैठी. और बेपनाह ख़ुशी के साथ मुझे देखने के बाद मुझे गले से लगा कर प्यार करने लगी. अम्मी जान की ख़ुशी का कोई ठिकाना नहीं था. अम्मी जान माँ थी और एक माँ का बीटा वो कर गुज़रे. जो वो भी कर न सकीय हों. उस माँ की ख़ुशी की कोई हद भला कैसे हो सकती है.

अम्मी जान भी मेरे भाभी जान के चेहरे की परेशानी को मिटा देने पर ख़ुशी से झूम उठी थी.

अम्मी जान मेरे गाल को चूमती हुई बोली - सबसे सामने तुझे प्यार दे कर दिल नहीं भरा मेरा बाबू.. इसलिए मई तुझे मई अपने कमरे में ले आई हों. आज बहुत खुश हों बाबू.. आज इस माँ की झोली तूने बेहिसाब खुशियों से भर दी है.. सच में मुझे यकीन नहीं था तुमपर बाबू. तुम सराह को परेशानी से निकल कर उसे एक बच्ची की तरह हसने भागने खेलने और क़हक़हे लगाने पर मजबूर कर डोज. कितनी फ्रेश, कितनी खुश वो दिख रही थी. इतनी खुश मैंने सराह बेटी को पहले कभी नहीं देखा. बाबू मेरे बच्चे मेरे दिल के टुकड़े.. मई अपनी ख़ुशी कैसे बयां करूँ. मुझे समझ नहीं आ रहा.

मई भी अम्मी जान के महकते गुलाबों जैसे गोर गाल चूमता हुआ बोलै

मई - ऐसे.. खूब प्यार बरसायें मेरे चेहरे पर. इससे मेरा दिल और भी पुरसुकून होता जायेगा. फिर मई और भी शिद्दत के साथ आप पर सबपर प्यार बरसाऊँगा.

अम्मी जान - मई तुमसे बहुत खुश हों बाबू. मई तो तुझे खूब प्यार दूंगी. इतना कह पहले कभी नहीं दे सकीय.. आ मेरे सीने पर सर रख.. मेरे दिल में धड़कनो में आज कैसे तुम hi तुम धड़क रहे हो. ऐसी रफ़्तार से इतनी देर से तुम आज तक नहीं धड़के हो बाबू.. आओ अपनी माँ की छाती से लग कर सब सुनो

अम्मी जान ने अपनी छाती पर मेरा सर रख दिया... और क्या hi मस्त खुशबु थी अम्मी जान के मुम्मो की. परफ्यूम की खूसबहबू के साथ मुम्मों पर आये पसीने की महक मिस होकर अलग hi मज़ा देने लगी थी. अब तो मई हक़दार बन गया था अम्मी जान के बदन की खुशबु को अपने हिसाब से स्मेल करने का..

भाभी के साथ किये तजुर्बे ने जैसे मुझे मेरी मंज़िल तक पोहचने के सभी रस्ते सुझा दिए थे. मई सोच भी नहीं सकता था. अचानक से मेरे हाथ अलादीन का चिराग लग जाएगा.. आह्हः कितना मुनफ़रद और कमल का तजुर्बा हाथ लगा था.

अम्मी जान - लेकिन बाबू तुमने ये सब किया कैसे. सराह बहुत अच्छी है. लेकिन वो तुम्हारी भाभी है. और एक भाभी कैसे अपने देवर की बातों में आ कर अपनी परेशानी भुला कर इतनी खुश हो सकती है. क्या कोई सहर फूंका है तुमने सराह पर

मई अम्मी जान के गाल को चूमता हुआ बोलै - हाँ अम्मी जान. मैंने भाभी जी पर सहर फूँका है. वो साडी परेशानी भूल कर बच्ची बन गई.. साडी दुन्या के ग़म भूल कर मिलने वाली ख़ुशी से झूम उठी

अम्मी जान बड़े शौक के साथ बोली - मुझे सब जानना है बाबू.. मुझे बताओ.. तुमने ऐसा क्या कहा अपनी भाभी.. ऐसी क्या बात करि.. जो वो अपनी परेशानी मुझसे शेयर न करती हुई तुमसे शेयर कर गई. तुमसे शेयर करते hi जैसे वो हलकी हो गई. मुझे बताओ बाबू. मई सब जान्ने के लिए बहुत बेचैन हों बाबू.

मई अम्मी जान के दोनों गाल फिरसे चूमता हुआ बोलै

मई - सिंपल सी बात थी अम्मी जान.. मैंने भाभी से कहा.. आप अपनी परेशानी मुझे नहीं भी बताना चाहती.. न बताएं.. बस एक काम करें आप

अम्मी जान - कैसा काम..?? मई कुछ समझी नहीं

मई मुस्कुराता हुआ - पहले आप थोड़ी देर तक अपने प्यारे प्यारे मीठे मीठे होंठ कुछ देर तक मेरे गाल से लगाए रखें

अम्मी जान - मुझे तो ख़ुशी मिलेगी अपने चाँद के गाल पर होंठ देखने से.. तू जल्दी से बता दे

अम्मी जान सब जान्ने का इंतज़ार नहीं कर सकती थी. इसलिए देर न करते हुए अपने शबनमी होंठ मेरे एक गाल पर रख गई.. और वही रख कर जैसे हटाना भूल गई. अम्मी जान कितनी आसानी के साथ मेरी बात मान गई थी.

हम पठानों में कोई भी माँ अम्मी जान के जैसी नहीं थी. देखा जाए तो ऐसा और इतनी चाहत भरा प्यार गलत बात थी. लेकिन मैंने अम्मी जान को इस मुक़ाम पर ला खड़ा कर दिए था.. अम्मी जान कुछ और सोच hi नहीं पायी थी. खुल कर प्यार करने की बात पर वो भी जैसे खुल गई थी. उनकी नज़र में ये सब एक माँ और बेटे का खालिस प्यार था... बेशक खालिस प्यार था.. मेरा प्यार भी अम्मी जान और सबके खालिस था.. लेकिन मेरे खालिस प्यार का रंग कुछ और था.. अब जब से मई अम्मी जान, किन्ज़ा एपीआई माहिरा एपीआई और भाभी जान के इतने करीब आया था. जिस्मो की महक को अपने अंदर उतरा था. मुम्मो के पसीने की स्मेल मेरे अंदर गई थी.. मई इन चरों की फुड़दियों की खुशबु को भी इमेजिन करने लगा था. और क्या hi मस्त फीलिंग्स मुझे आने लगी थी.. मई ख्यालों में अम्मी जान की फुद्दी का एक स्केच भी बना चूका था.. और वो फुद्दी इतनी पायरी इतनी हसीं थी.. दिल चाहता बार बार अपनी अम्मी जान की फुद्दी को अपने दिमाग के परदे पर देखों.. और खूब लुत्फ़ लून...

अम्मी जान मेरे गाल पर होंठ रखे हुए hi बोली - बाबू मई अपने होंठ हटा लून

मई - दिल नहीं भर रहा...

अम्मी जान - बीटा मेरी बेसब्री को भी समझो. मई वडा करती हों. बाद में जितनी देर के लिए कहोगे.. मई अपने होंठ तुम्हारे खूबसूरत गाल पर रख दूंगी.. अब मुझसे और सबर नहीं हो रहा है..

मैं खुद hi अपने गाल पीछे करता अम्मी जान के गालों को फिर बरी बरी आँखों और पुरे चेहरे को चूमने के बाद अम्मी जान की आँखों में देखने लगा

अम्मी जान का चेहरा गुलनार हो रहा था...

अम्मी जान - बाबू अब बता भी दो

मई - मैंने भाभी जान से कहा.. जब से आप इस घर में आई हाँ. तब से आप मुझे मेरे नाम से hi बुलाती आ रही हाँ.. आप ऐसा करें.. मुझे फिरोज से हमेशा के लिए बाबू बना लें.. बाबू बना कर आप को आप को एक मुख्लिस दोस्त एक सागा भाई मिल जाएगा.. भाभी कुछ देर खामोश रही.. फिर जैसे दिल में फैसला करती हुई मेरी बात मान गई... अम्मी जान मेरे गाल पर अपने होंठ रख कर आपको कितना सुकून मिलता है

अम्मी जान - बेहिसाब मेरे बेटे

मई - और ऐसा करने से दिल पर कोई बोझ तो नहीं बढ़ता न

अम्मी जान - नहीं.. दिल पर बोझ क्यों बढ़ेगा

मई - बच्चे जवान हो जाएँ तो ऐसा प्यार माँ और बेटे के बीच देखने को नहीं मिलता न

अम्मी जान मेरा चेहरा चूमती हुई बोली - बीटा तेरे जैसा हो तो माँ कैसी खुद को रोक सकती है.. माँ तो जी उठेगी. माँ अपने बेटे के अनमोल प्यार को प् कर ज़िन्दगी भर के लिए सुखी हो जायेगी

मई - और अगर एक जवान भाई की बहन या भाभी ऐसा प्यार करें.. तो ??

अम्मी जान - मुझसे क्या पूछ रहा है बीटा.. उस बारिश वाले दिन का सब तो मई जानती हों.. और मेरे दिल में ज़रा भी बुरा ख्याल नहीं आया.. न तेरे और तेरी बहनो के लिए और न hi तेरी भाभी के लिए..

मई - बास मैंने भाभी से कहा.. मुझे दिल से बाबू मान कर अपने होंठ मेरे गाल पर रख कर भूल जाएँ.. और ऐसा महसूस करें.. जैसे आप एक ऐसे सायादार पेड़ के नीचे आ गई.. जिसकी ठंडी और घनी छाओं आप को सुरूर की इन्तहा तक ले जा रही हों.. आप के अंदर एक ऐसी ताकत को भर रही हाँ.. वो ताकत आप के अंदर समां कर आप को दुन्या के हर दुःख दर्द और परेशानी से लड़ने में मदद दे रही हाँ.. वह पेड़ एक मुहाफ़िज़ भी है.. एक ऐसा मुहाफ़िज़.. जिस मुहाफ़िज़ के होते हुए आप को कभी गरम हवा का झोंका छू कर गुज़र भी नहीं सकता..

अम्मी जान का मोह हैरत के मारे खुल गया - बाबू! तुम ऐसी बातें कहाँ से सीख कर आये हो.. मैंने या घर में तो किसी ने तुम्हे ऐसी बातें नहीं सिखाई. बाबू तुम मुझे कदम कदम पर हैरान कर रहे हो. एक माँ की खुशियों में दुन्या के सबसे ऊँचे पहाड़ से बढ़कर इज़ाफ़ा कर रहे हो. बाबू.. मुझे बताओ बाबू.. कहाँ से सीखी तुमने इतनी पायरी और मीठी बातें.. कितने समझदार भी हो गए हो तुम.

मई मुस्कुराया - तेरा ये मुस्कुराता चेहरा देख मेरा दिल फिरसे तुझपर प्यार की बौछाड़ करने को मचल उठता है मेरे बेटे.. आ एक बार फिरसे माँ के कलेजे से लग जा..

कुछ देर और हम एक दूसरे को गले से लगा कर प्यार करते रहे

मई - ऐसे hi भाभी के साथ बैठे बैठे मेरे दिल में एक बात आई.. अम्मी जान फिर मैंने उस बात पर अमल भी कर डाला. और आप जो भाभी की चेहरे पर इन्तहा ख़ुशी देख रही हाँ न.. सब उसी का रिजल्ट है

अम्मी जान - फिर तो तुम मुझे बिना देर किये hi बता दो. देखो बाबू.. ये तुम्हारा बहुत बड़ा कारनामा है.. मई पूरी तफ्सील जानना चाहती हों

मई - मई प्रैक्टिकल करके दिखाना चाहता हों.. आप बेहतर समझ पाएंगी

अम्मी जान - मई कुछ समझी नहीं बाबू

मई - अभी समझाता हों

मैंने अम्मी जान का हाथ पकड़ा और खड़ा करता हुआ अम्मी जान को अपने गले से लगा गया.. अम्मी जान की हाइट काम नहीं थी. लेकिन मेरे बराबर की नहीं थी.. भाभी से भी एक इंच काम थी. मैंने अम्मी जान का चेहरा ऐसे थमा.. मेरे हथु की उँगलियाँ अम्मी जान की सर के पीछे थी.. और दोनों अंगूठे अम्मी जान के गालों पर.. फिर मैंने अम्मी जान का सर उठा कर, अपना सर हल्का सा झुका कर अम्मी जान के माथे से अपना माथा जोड़ दिए.. मेरी नक् अम्मी जान की नक् के साथ जुड़ गई..

अम्मी जान खुली आँखों से सब देख रही थी

अम्मी जान - ये तो कुछ फ़िल्मी सा हो गया

मई है पड़ा.. अम्मी जान भी खुल कर है पड़ी

मई - कैसा लग रहा है आप को

अम्मी जान - कैसे बताओ.. बहुत अजीब लग रहा है. ऐसा लग रहा है. जैसे मई कोई लड़की हों और तुम

मई हस्ता हुआ - हाहाहा.. आप एक जवान लड़की और मई एक जवान लड़का

अम्मी जान की आँखों में शर्म उत्तरी.. लेकिन अम्मी जान भी है पड़ी

अम्मी जान - फिर क्या किया तुमने सराह के साथ

मई - अम्मी जान आप ऑंखें बंद कर दीजिये.. और अपनी आवाज़ को जितना मई धीरे और मदहोश होकर बोलूं.. आप भी वैसे hi बोलियेगा

अम्मी जान - उससे क्या होगा

मई - आप ऑंखें बंद तो करिये.. जिस सहर में मैंने भाभी को जकड लिया था.. आप भी उसी सहर की शिकार हो जायेगी

अम्मी जान की हैरानी भरी आवाज़ सुनाई दी - ाचा

फिर अम्मी जान ने अपनी ऑंखें बंद कर लिए..

मई जैसे भाभी से बोलै था.. वैसे hi अम्मी जान से बोलै

मई - अपनी दोनों बाहें मेरे गाल में दाल हार की सूरत दाल दीजिये..

अम्मी जान ने मेरे गले में बाहें दाल दी - दाल दीं.. अब

मई - आप कोण हाँ

अम्मी जान - अपने बाबू की अम्मी

मई - और मई कोण हों

अम्मी जान - अपनी अम्मी जान के दिल का सबसे खास हिस्सा

मई - तो फिर बताइये.. एक बीटा जब माँ के दिल का टुकड़ा है. तो क्या वो माँ से खुल कर प्यार करे. और वो प्यार इललीगल भी न हो.. लेकिन दुन्या वळून की नज़र में सही न हों.. तब क्या आप दुन्या वळून की मानेगी या अपने दिल की

अम्मी जान की आवाज़ में वही चेंज आने लगा था. जैसा चेंज मेरी और भाभी की आवाज़ में आ गया था..

अम्मी जान - अपने दिल की मानूंगी

मई - कोई देख कर कहे.. कैसी बेहया माँ है. तब क्या आप उसकी बात दिल पर लेती हुई अपने दिल के टुकड़े से प्यार करने में झिझक महसूस करेंगी

अम्मी जान मदहोशी भरे लहजे में - नहीं.. मई क्यों दुन्या वळून की बातों में आउंगी. मेरा बीटा इतना प्यारा है. कैसे मई उसे प्यार करने से खुद को रोक सकती हों. वो भी दुन्या वळून की नज़र में. मा और बेटे का प्यार तो ठंडी छाओं होता है. पाक होता है. जो एक माँ के अपने बेटे से प्यार को बुरा समझे.. वो प्यार का फलसफा hi नहीं जनता. माँ प्यार करती है तभी तो वो एक माँ होती है.. माँ अपनी औलाद से प्यार न करे तो वो माँ नहीं बाद नसीब औरत कहलाई जाती है.. और मई तुझ जैसे बेटे के अनमोल प्यार को कभी खोना नहीं चाहूंगी

मई - बीटा जवान हो जाये तो बाप उसे दोस्त बना लेता है. बेटी जवान हो जाए तो माँ.

अम्मी जान - हाँ.. एहि सच्चे और सुलझे हुए माँ बाप को करना भी चाहिए.. जो ऐसा नहीं करते.. वो माँ बाप कहलाने के लायक hi नहीं हाँ. दोस्त बनकर माँ बेटी का दुःख दर्द बाँट सकती है. बाप बेटे का दोस्त बन जाये तो वही बीटा उसका बाज़ो बन जाता है.

मई - और बीटा अगर मेरे जैसा हो तो

अम्मी जान खवाब की सी कैफियत में बोली - बीटा बाबू के जैसा हो तो माँ बाप आखरी सांस तक सुख पते रहते हाँ. कभी ग़म की कोई परछाई उन्हें छू भी नहीं सकती

मई - अगर बीटा माँ के इतने करीब हो जाए.. जितनी कोई बेटी अपनी माँ के करीब न ा पाए.. तो क्या माँ अपने उस बेटे की वैसी दोस्त बन सकती है.. जैसे एक माँ अपनी बेटी की बन जाया करती है

अम्मी जान - बाबू तुम दोस्त बन चुके हो. मेरे दिल में तुम वहां जा बेस हो. जहाँ शायद hi किसी का बीटा पोहंच भी पाया हो. तुम तो मेरे दिल पर जैसे हाकिम बनकर

हुकूमत करने लगे हो

मई - जब आप के दिल में मई hi मई हों.. तब क्या मई आप के जिस्म के उन हिस्सों पर भी हुकूमत कर सकता हों.. जहाँ एक बीटा अपनी माँ का दोस्त बनकर हुकूमत करे, एक आम माँ का बीटा वहां हुकूमत करे तो गलत.. लेकिन मेरे जैसा प्यार करने वाला बीटा एक सच्चा दोस्त बनकर हुकूमत करे तो सही.. क्या आप मेरी बात को गहराई तक समझ प् रही हाँ अम्मी जान

अम्मी जान की मदहोशी भी आवाज़ सुनाई दी - समझने की कोशिश कर रही हों. लेकिन ऐसी कोई बात अब तक मेरी ज़िन्दगी में मेरे सामने नहीं आई है. जब एक बीटा अपनी माँ के साथ इतना खुला हों. मई समझ नहीं पाई. मेरे खुले हिस्सों में कोनसा हिस्सा तुम्हारी हुकूमत के लिए सही होगा... कोनसा गलत.. तुम गाइड कर दो तो मई तुम्हे बता सकती हों

अम्मी जान खुली आँखों के साथ कभी ऐसा नहीं बोलती. मेरे साथ के साथ सर जोड़े बंद ऑंखें मदहोशी में गम वो बिना खुद पर काबू रखे बोलती चली जा रही थी

मई - आज के मोडरें ज़माने में एक बीटा जो मेरे जितना प्यारा नहीं होता. वो भी अपनी माँ के साथ बहुत ज़यादा खुल जाता है. कभी अपनी माँ को पीछे से हुग कर लेता है. कभी आगे से. कभी अपनी माँ के साथ मस्ती करता है. और कभी अपनी माँ की कमर पर हाथ रख कर पार्टी डांस करने लगता है. क्या मई आपकी कमर पर अपने दोनों हाथ रख सकता हों. लिखे एक गुड एंड ट्रस्टी फ्रेंड

अम्मी जान ने एक सनिये को सोचा . फिर बोली - रख सकते हो

मई - मई आप का दिल नहीं दुखाना चाहता. मई नहीं चाहता. बाद में आप को बुरा लगे.

अम्मी जान - बाबू. तुम मेरे दिल में हो. जब से पैदा हुए हो. मेरी नज़रों के सामने हो.. मई जानती हों.. तुम कैसे हो

मई - लेकिन आज कल के लड़के और सोच के हामिल हाँ. वो ज़माने की बढ़ती रफ़्तार से भी तेज़ रफ़्तार हाँ..

अम्मी जान - मुझे मेरे बेटे पर पूरा पूरा भरोसा है

मई - मई जवान हो चूका हों. कभी बहक भी सकता हों. इंसान हों. होश का दमन हाथ से खो सकता हों. आज के ज़माने में बहुत सी उलटी सीढ़ी बातें सुनने को मिलती रहती हाँ. कहीं मई बहक कर आगे बढ़ता हुआ लीगल से इललीगल हिस्सों पर जा पोहंचूं. ऐसे में तो मई भी दूसरे आवारा बेटों की तरह आप की नज़रों में खटक जाऊंगा. आपकी नज़रों में गिर जाऊँगा

अम्मी जान - मेरा बाबू चरक्टेरलेस नहीं है

मई - हालत का क्या पता.. जवान दीवानी होती है.. इसी उम्र में एक इंसान ज़यादा तर होश से काम लेना भूल जाता है. क्या पता मेरी सोचों में मेल उतरने लगे. क्या पता मई किसी और राह पर चल निकलूं

अम्मी जान - नहीं. तुम मेरी कोख से जन्मे हो. ऐसे कभी नहीं बन सकते. और अगर कभी ऐसा हुआ तो मई प्यार से तुम्हे संभल लुंगी.. मुझे अपने प्यार और परवरिश पर नाज़ है

मई - क्यों... आप मेरी किसी गलत हरकत पर मेरी पिटाई भी तो कर सकती हाँ न

अम्मी जान जैसे लरज़ उठी - जिस दिन मेरा हाथ तुझपर उठा.. वो दिन मेरे लिए क़यामत होगा..

मई - मई आपकी कमर पर हाथ रख दूँ

अम्मी जान - पुरे ऐतमाद के साथ

मई - जैसे एक कमर लीगल प्लेस है. ऐसे hi आपका पेट मेरे लिए वो मुक़ाम है. जहाँ मई मैंने पिछली ज़िन्दगी जी. अगरचे 9 hi महीने तक मई आप के पेट में रहा हों. लेकिन मई अब भी आप के पेट पर पूरा पूरा हक़ रखता हों.. क्या मेरी इस बात को आप झुटला सकती हाँ

अम्मी जान - नहीं... लेकिन मई समझ नहीं पाई हों.. भला मेरे पेट पर तुम अपना हक़ कैसे जमा सकते हो

मई - जैसे मैंने आप के चेहरे पर अपना हक़ जमाया है

अम्मी जान को शायद अजीब लगा था. इसी लिए वो खामोश रही

मई - आप ने जवाब नहीं दिया अम्मी जान. क्या मई आप के पेट को, जो कभी मेरी hi मिलकियत रहा था, उसे चुम सकता हों

अम्मी जान लरज़ती हुई आवाज़ में बोली - लेकिन बाबू ये कैसे मुमकिन है.

मई - अम्मी जान.. एक बात कहूं

अम्मी जान - हाँ कहो

मई - डैड से भी ज़यादा आप के जिस्म पर मेरा हक़ है.

अम्मी जान - बाबू ये कितनी गलत बात कही तुमने

मई - आप को बुरी लगी

अम्मी जान - हाँ बुरी भी और अजीब भी

मई - अगर आप कहें तो मई डिटेल के साथ अपनी बात कहूं.. ऐसे आप को मेरी बात न बुरी लगेगी और न hi अजीब

अम्मी जान - हाँ कहो.. मई भी तो सुनों. मेरा बीटा किस अंदाज़ में मुझे क़ायल करता है

मई - अम्मी जान डैड का आप के दिल पर हक़ बहार से hi रहा है. लेलिन मेरा हक़ आप के जिस्म के अंदर की एक एक राग से रहा है.. आप के दिल से आपके दिमाग से आपके उन 9 महीनो के हर सुख और हर सुख से मेरा नाता रहा है. आप के बैरन ने सलाह मश्वरे के बाद डैड को आप के लिए मुन्तख़ब किया.. लेकिन मुझे.. दुन्या बनाने वाले ने आप के पेट में हुकूमत का हक़ रोज़ इ ावल से hi मेरे नाम लिख दिए था. क्या मई गलत कह रहा हों

अम्मी जान की ऑंखें खुली होती.. अगर मेरी बातों पर अम्मी जान को गुसा न आ रहा होता तो ज़रूर मेरी इस बात पर वह उलझ जाती. लेकिन अम्मी जान इस दुन्या से निकल कर तिलस्मी दुन्या में पोहंची हुई थी.

अम्मी जान - बाबू... ये तुमने अपनी अम्मी जान से कैसी बातें शुरू कर दी. कोई बीटा ऐसी बातें अपनी अम्मी जान से नहीं किया करता

मई - अभी मुझे मेरी बात का जवाब दें

अम्मी जान - वही तो दे रही हों

मई - आप दुन्या के हिसाब से जवाब दे रही हाँ. दिल को टटोलिये.. फिर बताइये मुझे.. आप दिल मेरी बात को गलत मंटा है क्या सही मान रहा है

अम्मी जान खामोश हुई

मई - बोलिये न अम्मी जान

अम्मी जान - तुम मेरे दिल में रहते हो.. तुम बताओ.. क्या है मेरे दिल की बात

मई - मई बताओं..

अम्मी जान - हम्म्म्म

मई - तो फिर सुनिए.. आप का दिमाग मेरी बात मान hi नहीं सकता. आप को एहि कहेगा.. मैंने जो कहा वो सब गलत है. मेरे मोह से निकला एक एक लफ्ज़ गुस्ताखी पर मब्नी है. लेकिन आप का दिल मेरी बात से इन्कारी है. क्यूंकि मई आप के दिल में वहां जा समाया हों. जहाँ तक डैड भी नहीं समां सके

अम्मी जान - नहीं... ये बात नहीं है

मई - कोई नहीं.. आप नहीं बताना चाहती हाँ न बताएं. लेकिन मई तो जनता हों. एहि सच है

अम्मी जान - तुम्हारे डैड भी मेरे दिल में बहुत गहराई तक बास्ते हाँ

अम्मी जान - मई नहीं मान सकता

मई - वो इसलिए.. आप की डैड से लव मैरिज नहीं है. अर्रंगे मैरिज है

अम्मी जान - तो क्या हुआ. शादी के बाद हर बीवी अपने शोहर से मोहब्बत करने लगती है. मई भी बहुत मोहब्बत करती हों तुम्हारे डैड से

मई - वो एक बीवी की वफ़ा शुआरी है अम्मी जान. मोहब्बत वो होती है. जिसे देख दिल में मीठा मीठा दर्द होने लगे. ठंडी मीठी हवाएं चलने लगें. फिर जो दिल में उतर में उतर कर दिल की धड़कन बन जाए.. और आप ने कहा.. मई आप के दिल में धड़कन बन कर धड़क रहा हों.. अब बताइये. डैड आप के दिल में धड़कन बन कर कभी धड़के हाँ

अम्मी जान - क्यों नहीं धड़केंगे वो. मेरी आखरी सांस तक उनके नाम लिखी जा चुकी है.

मई - वो अलग बात है अम्मी जान... चलिए छोड़िये.. क्या मई अपना लीगल हक़ खुली आँखों के साथ प् सकता हों.. आप के पेट को चुम सकता हों. वैसे तो आप के पुरे जिस्म पर मेरा भी उतना hi हक़ है. जितना कह डैड का. लेकिन मई ऐसा कोई दवा कभी नहीं करूँगा

अम्मी जान - और कभी करना भी मत

मई - वो बाद में देखते हाँ. पहले ये बताइये.. आप मुझे अपना पेट चूमने देंगी

अम्मी जान - क्या ज़रूरी है

मई - हाँ..

अम्मी जान - ये सही नहीं है बाबू

मई - तो फिर आप के चेहरे पर जितना प्यार मई बरसा रहा हों. वो भी गलत है. फिर उसे भी गलत मानते हुए रोक देना चाहिए

अम्मी जान - नहीं नहीं.. मई अब तुमसे प्यार किये बिना नहीं रह पाऊँगी.. क्या बताओं कितना सुकून है तुम्हारे प्यार में

मई - मई भी तो प्यार hi करूँगा आपके पेट को

अम्मी जान - लेकिन

मई - लेकिन वेकिन छोड़िये अम्मी जान.. ज़यादा मत सोचिये... बस इतना hi सोचिये.. बाबू अपना हक़ लीगल हिस्से पर जाता रहा है.. क्या मेरा हक़ सालों तक पेट से ऊपर तक नहीं रहा है

अम्मी जान - वहां का हक़ बेटे को देने के बाद hi एक औरत सही मानो में माँ कहलाई जाती है

मई - लेकिन एक बीटा बड़े होने पर वहां का हक़ खो बैठता है.. मैंने सही कहा न

अम्मी जान - नहीं.. मई रोज़ hi तो तेरे सर को उसका हक़ ऐडा किया करती हों. वही एक एक ऐसी जगा है. जहाँ एक माँ अपने जिगर के गोधे के सर को रख उसे पुरे दिल से महसूस कर सकती है.

मई - तो फिर मई वहां भी अपने हिसाब से अपना हक़ प् सकता हों

अम्मी जान - हाँ!

मई - अब आप ऑंखें खोल सकती हाँ अम्मी जान

मई अम्मी जान की कमर को छोड़ दो कदम पीछे हैट गया.. अलग होते hi मैंने ऑंखें खोल कर जो अम्मी जान को देखा. शामे भाभी के जैसे hi अम्मी जान के चेहरे की कैफियत थी.. ट्रेस की सी कैफियत.. अम्मी खुद में नहीं रही थी.. अम्मी जान ने मेरे अलग होते hi ऑंखें नहीं खोली.. कुछ पल ऐसे hi कड़ी रही.. फिर धीरे धीरे ऑंखें खोल गई...

अम्मी जान की आँखों में देख कर साफ पता चलता था. अम्मी जान सहर का शिकार हाँ. अम्मी जान ऐसे ऑंखें खोलने लगी. जैसे किसी और दुन्या से अभी अभी ट्रेवल करके आई हों.. अम्मी जान ने पूरी ऑंखें खोल दीं. फिर हैरान होकर कमरे में चरों तरफ घूम घूम कर देखने लगी. जैसे अब तक वो सच में खुद को कमरे में न प् कर कहीं और पा रही थी..

फिर अम्मी जान की नज़र मुझपर पड़ी.. पहले तो अम्मी जान का चेहरा मेरे चेहरे को देख कर खिल उठा.. लेकिन जैसे hi कुछ देर पहले का सारा सन साडी बातें अपने मोह से निकले सरे अल्फ़ाज़ अम्मी जान को याद आये.. अम्मी जान के चेहरे पर मैंने ज़िन्दगी में पहली बार शर्म की इन्तहा देखि.. अम्मी जान मेरी तरफ अपना रुख किये कड़ी नहीं रह सकीय..

घबरा कर बड़ी तेज़ी के साथ अम्मी जान मेरी तरफ पीठ करके कड़ी हो गई..

हाय अम्मी जान अपने बाबू से एक माशूका की तरह शर्मा गयी थी.. मई एक राइट हैंड अपने दिल पर रख कर अपना दिल थम कर रह गया.. अम्मी जान का ये शर्माना मेरे लिए था.. उफ्फ्फ्फफ्फ्फ़ मैं कितना खुश नसीब लड़का बन गया था. डैड ने भी अम्मी जान का जो रूप शायद कभी नहीं देखा था..

आज मैंने देख लिया था.. और क्या hi दिल को मोह लेने वाला रूप था अम्मी जान का..

 




बारहवीं क़िस्त

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अम्मी जान पहली बार मुझसे शर्मा कर चेहरा फेर गई थी. और अम्मी के शर्माने की ऐडा ऐसी जानवेला थी. मई मचल कर रह गया. वहीँ मैंने समझ लिए. मैंने एक और मरहला सर कर लिया है. अम्मी जान जितनी आगे से ख़ूबसूरत थी. पीछे से भी अम्मी जान का फिगर बहुत hi मस्त थी. परफेक्ट कमर और कमर से नीचे अम्मी जान की गांड

जहाँ पर आज तक मेरे हाथ नहीं पोहंच चुके थे. हज़ारों बार डैड के सामने अम्मी जान की ये गांड आ चुकी थी. हम पठान थे और ये पॉसिबल hi नहीं था. डैड ने अम्मी जान की गांड न मारी होगी. ज़रूर मारी होगी. तभी तो अम्मी जान की गांड की शेप कमल की थी. पता नहीं डैड अम्मी जान की फुद्दी और गांड भी छठा करते थे कह नहीं.. पता नहीं अम्मी जान डैड का लुंड मोह में ले कर चूसा करती थी कह नहीं. लेकिन मई ये सब कुछ अम्मी जान के जिस्म को अपने सामने नंगा करने के बाद ज़रूर करने वाला था..

बहुत सी बातें अम्मी जान को पीछे से देख कर मेरे दिल में आ रही थी. लेकिन ज़यादा सोचना अपने लुंड को खड़ा करना था. मई ऐसी कोई गलती नहीं करना चाहता था. अभी मंज़िल दूर थी. अभी जिस्मो का खेल और तरह से शुरू हुआ था. जब जिस्मो में मेरे लिए तब्दीली मुझे देखने को मिलती. तब मई एक स्टेप और आगे बढ़ जाता. तब मई सामने वाली के जिस्म पर मेरे हाथ मेरी मर्ज़ी मुताबिक़ चल पड़ते.

अम्मी जान मेरी तरफ अपनी गांड किये मोह छुपाये शर्मा कर कड़ी थी. मई अम्मी जान के सामने आया. अम्मी जान का शरमाया चेहरा कुछ और शर्म से सुर्ख होने लगा. अम्मी जान मेरा सामना नहीं कर प् रही थी. वो फिर से चेहरा फेर गई

मई है पड़ा और अम्मी जान को पीछे से हुग कर लिया. बहुत पहले अम्मी जान को पीछे से हुग किया करता था. बहुत वक़्त के बाद मैंने अम्मी जान को पीछे से हुग किया. तो अम्मी जान कसमसा कर रह गई

मई अपना चेहरा झुका कर अम्मी जान के गाल के करीब मोह करता हुआ बोलै

मई - अम्मी जान. आप मुझसे शर्मा रही हाँ या अपने आप से

अम्मी जान की कनपटी शर्म से लरज़ती आवाज़ सुनाई दी - खुद से भी और तुम से भी

मई - मुझसे शर्माना कैसा! अम्मी जान. आप का ऐसा शर्माना तो डैड के लिए है. एक औरत ऐसे पता है कब शर्माती है

अम्मी जान खामोश रही

मई - जब वो अपने शोहर के सामने हो या फिर अपने आशिक़ के सामने.

अम्मी जान झट से मुझसे अलग होकर मेरी तरफ चेहरा फेर कर मुझे देखने लगी. शर्म से अम्मी जान के गाल ऊपर को खिंच गए थे.

अम्मी जान मेरी आँखों में कुछ पल देखती रही. फिर एकदम से मेरी कमर के गिर्द अपनी दोनों बाहें लपेट कर मेरे सीने पर अपना सर रख गयी. आज तक मई hi अम्मी जान के सीने पर सर रखा करता था. आज अम्मी जान मेरे सीने पर सर रख गई थी. कमल हो गया था. अम्मी जान की ये ऐडा भी माशूका जैसी थी.

अम्मी जान की हैरानी भरी आवाज़ सुनाई दी - बाबू!. बाबू ये सब क्या था. इतना सहर.. मई जाने किस दुन्या में जा पोहंची थी. मई क्या से क्या बोलती चली गई. माँ होकर अपने बेटे के साथ वो साडी बातें करती चली गई. जो एक माँ कभी भी अपने बेटे के साथ नहीं कर सकती. वो तो अपने शोहर के शिव किसी से भी नहीं कर सकती. मुझे खुद पर गुसा भी आ रहा है बाबू. और बहुत ज़यादा शर्म भी

मई - क्या मुझपर गुसा नहीं आ रहा है आप को

अम्मी जान - आना तो चाहिए.. लेकिन तुम पर कभी घुसे नहीं हुई मई. इसलिए भी आज तुम पर गुसा न कर मुझे खुद पर गुसा आने लगा है. तुमने पूछा और मई बेशर्मो की तरह फार फार बोलती चली गई. कई बार कोशिश भी की. कोई भी ऐसा वैसा लफ्ज़ मोह से न निकलूं. लेकिन जाने कैसा ट्रांस था. मई बोलती hi चली गई. अब ऑंखें खुली है तो हिम्मत जवाब देने लगी है. बहुत अजीब लग रहा है.

मई - क्या जो आप के मोह से निकला. ऊपर आप को बहुत ज़यादा दुःख है

मेरी आवाज़ को अम्मी जान ने जांचा. फिर मेरे सीने से सर उठा कर मेरी आँखों में देखने लगी.

मई - बोलिये न अम्मी जान.. क्याआ आप ने जो भी कहा. एक माँ अपने बेटे की सच्ची दोस्त बनकर कभी नहीं किया करती. दुन्या में, हमारे मुल्क में क्या एक भी माँ ऐसी नहीं होगी. जिससे उसका बीटा थोड़ा सा फ्री होकर ऐसी बातें न करता होगा. और उसकी माँ अपने बेटे के प्यार में बावली हुई उसे उसकी बातों का जवाब दे गई हो. क्याआ मेरे जैसे बेटे की बातों के जवाब देकर आप को अफ़सोस हो रहा है. शर्म तो आप को न अपने आप पर आणि चाहिए. न hi आप का यौन मुझसे शर्माना बनता है. आप को तो फखर करना चाहिए.. आप ने अपने बेटे से वो बातें की. जो कोई माँ अपने बेटे से नहीं करती. लेकिन बेटे से बातें कर के भी आप के दिल में कोई गिल्ट पैदा नहीं हुआ. अगर हमारी साडी बातें आप के जैसी बेइंतेहा प्यार करने वाली माँ और बाबू जैसे बेटे के बीच की बातें हाँ तब तो सब अच्छा है. लेकिन एहि बातें आवारा लोफर और चरक्टेरलेस बेटे, ऐसे बेटे, जिस बेटे के दिल में, दिमाग में अपनी माँ का जिस्म hi जिस्म हो. तब तो ये बातें गलत मणि जा सकती हाँ.

अम्मी जान की आँखों में थोड़ा सा गुसा हलकी सी नाराज़गी नज़र आई. अम्मी जान सांस लेकर खुद को नार्मल करने लगी

अम्मी जान - आज कह दिया.. फिरसे कभी ऐसा मत कहना बाबू. मुझे दुःख हुआ. आगे इससे भी बढ़कर होगा. अगर तुमने फिरसे ऐसे अल्फ़ाज़ अपने मोह से निकले तो.. मई माँ हों तुम्हारी. 9 महीने अपने खून से सींचा है मैंने तुझे. तुम मेरे लिए क्या हो. ये मई जानती हो.. तुम और सब जानते हाँ. तुम अगर ज़रा से भी आम बेटों जैसे होते. मई कभी तुम्हारे इतने करीब नहीं आते. चरक्टेरलेस कहा न तुमने खुद को.. तुम्हारी आंख में हल्का सा भी रंग बदलता तो मई..... तो मई.....

अम्मी जान का गाला भीग गया. ऑंखें नाम हो गई. मैंने अम्मी जान को अपने गले से लगा लिया. अम्मी जान मेरे गले से लगी सिसकने लगी. मई अम्मी जान की पीठ थपथपाने लगा.

अम्मी जान - मेरे दिल की धड़कन सुनो. तुम्हारी बात पर जैसे रुक रुक कर धड़कने लगा है. फिरसे ऐसी बात कही न तुमने. ये धड़कन हमेशा के लिए थम जायेगी.

मई अम्मी जान का चेहरा पकड़ कर चूमता हुआ बोलै अम्मी जान को बीएड पर लिटा गया.

मई पास बैठता हुआ नॉटी मूड में बोलै

मई - अगर मई वैसा नहीं हुआ. जैसे लफ्ज़ मेरे मोह से सुनकर आपको दुःख हुआ है तो फिर आप को यकीनन मेरी बातें भी बुरी नहीं लगी होंगी.

अम्मी जान - बुरी लगी होती तो तुम मेरे सामने न होते. मई कबका तुझे कमरे से निकल चुकी होती

मई अम्मी जान के पेट पर देखने लगा. फिर अम्मी जान को देखा.. अम्मी जान के चेहरे पर पहले तो हैरानी उभरी. फिर शर्म बढ़ी तो अम्मी जान ने अपना चेहरा फेर लिया

मई अम्मी जान का चेहरा पकड़ कर अपनी तरफ करता हुआ बोलै

मई - फिर तो मई आप का पेट चुम सकता हों न

अम्मी जान लेती लेती लरज़ कर रह गई - शर्म से गहरी आवाज़ में बोली - बाबू.. तुम मुझे कुछ वक़्त नहीं दे सकते. मुझे थोड़ा सा वक़्त चाहिए.. खुद को सम्भाने के लिए. ये सब मेरे लिए नया है न

मई है पड़ा. अम्मी जान बोली - तुम है क्यों रहे हो

मई - मैं तो आप के साथ कुछ मस्ती कर रहा था. और अआप ने सीरियसली ले लिया. जो बातें भी मैंने करि थी. वो सारा का सारा तजुर्बा था अम्मी जान. मई देखना चाहता था.. क्या आप सच में मेरी ऐसी वैसी बातों के जवाब दे सकती हाँ.. मई हैरान हों अम्मी जान.. ये सब कितना अलग सा तजुर्बा सबत हुआ न

अम्मी जान शॉकेड हुई उठ बैठी..

अम्मी जान - क्याआआ ?? क्याआआ.. बाबू क्या तुम सीरियस नहीं थे. मतलब.. तुमने जो कहा वो सब मेरे साथ करने का तुम्हारा इरादा नहीं था.

अम्मी जान बहुत हैरान थी.

मई - पहले इरादा नहीं था. लेकिन अब आप ने वक़्त माँगा है तो सोच रहा हों. मैं बना लून

अम्मी जान - तब तो तुम रहने hi दो. मई तो सोच सोच कर परेशां हो रही थी. कैसे अपने hi पेट के बच्चे के आगे मई अपने पेट खोलूंगी. तुमने ये कह कर मेरी एक बड़ी परेशानी दूर कर दी

मई नाराज़ होता हुआ बोलै - परेशानी... क्याआ मेरा मेरी के लीगल हिस्से को चूमना जुर्म है. ठीक है अम्मी जान.. मई कभी नहीं कहूंगा आप से. कभी दिल में आया भी तो खुद को एक चांटा मार दूंगा. लेकिन अपने दिमाग से ऐसी सोच निकाल दूंगा

अम्मी जान ने प्यार से एक चपत मेरे गाल पर मार दी.

अम्मी जान - मुझसे नाराज़ होता है. अपनी अम्मी जान से नाराज़ होता है. मेरे लिए तेरे दिल में कुछ आएगा तो तू खुद को चांटा मरेगा. मैंने आज तक जिस गाल पर चांटा नहीं मारा. जिस गाल पर मई सालों से प्यार निछावर कर रही हों. तू उस गाल पर चांटा मारेगा. हिम्मत है तो अभी मार के दिखा

अम्मी जान के एक एक लफ्ज़ में मेरे लिए दुन्या भर का प्यार बोल रहा था.

मई - अम्मी जान... मैंने ऐसे hi बोलै था. वर्ण एक माँ के जिस्म का जो हिस्से बेटे से छुपा होता है. वो सब इललीगल होता है अम्मी जान.. नहीं.. आप मेरी बातों में आ कर कोई भी इललीगल काम न करें... फिर आप को खुद से भी और अपने बाबू से भी शर्म आने लगेगी. फिर हम कैसे खुल कर दूसरों के सामने एक दूसरे का प्यार प् सकेंगे. हम तो शर्म के बीमार बन चुके होंगे. ऐसे में किसी को खटक पद गई तो.. बहुत बुरा होगा.

अम्मी जान मुझे घूरती हुई तेज़ नज़रों से देख रही थी

अम्मी जान - बाबू... एक बात सच सच बताएगा मुझे

मैंने अम्मी जान की आँखों में कुछ देखा.. कुछ अलग सा.. फिर भी बोलै - अम्मी जान. आप कुछ भी पूछ सकती हाँ. इजाज़त क्यों ले रही हाँ

अम्मी जान - तुम्हारे किसी लड़की के साथ कोई चक्कर तो नहीं है.

मई चौंका - आप को ऐसा क्यों लगा

अम्मी जान - तेरी आँखों में अनदेखे तजुर्बे बोल रहे हाँ बाबू.

मई - हाहाहा.. अम्मी जान.. आप तो ऑंखें भी पढ़ना जानती हाँ

अम्मी जान - मई माँ भी हों और एक औरत भी. न एक माँ बी अकाल हो सकती है. और न hi एक औरत.. अब बता.. दे मेरी बात का जवाब.

मई - आप को क्या लगता है

अम्मी जान - मुझे कुछ नहीं लगता. तू अपने मोह से बता

मई - आप ने पहले कभी नहीं पूछी ऐसी कोई बात मुझसे. हमारे दरमियान ऐसी दोस्ती भी पहले कभी नहीं थी.. होती और पूछती तो मई आप को बता देता. अब हमारे बीच बहुत से चंगेस आ चुके हाँ. तो मई कुछ भी आप से नहीं छुपाऊंगा.

अम्मी जान धड़कते दिल के साथ बोली - तो इसका मतलब है. कोई लड़की है ?

मई - हाँ है

अम्मी जान ने अपने दिल पर हाथ रख लिया - खंडन में कोई है या ??

मई - आप के चेहरे पर ये खौफ कैसा

अम्मी जान - माँ हों तेरी. खौफ तो आएगा hi. इतनी देर से तू मेरे साथ है. पहले कभी कुछ ऐसा मेरे दिल में नहीं आया. तेरे इतने दिनों से बदले रूप को देख कर जो बात मेरे दिल में नहीं थी. वो अब आई है. आई है तो दिल में जैसे दर्द सा होने लगा है. बता बाबू. मुझे बता कोण वो लड़की. और तेरा इसके साथ रिश्ता कैसा है

मई हार मानने वाला नहीं था. झूट बोलता तो बात नहीं बनती. मुझे तो सच बोल कर अम्मी जान को और सब को अपने साथ मिलाना था. अपना बनाना था. और अपना बनाने के लिए झूट का सच का और प्यार का सहारा लेना पड़ता है.

मई - एक नहीं दो हाँ अम्मी जान

अम्मी जान - kyaaaaaaaaaa ??

अम्मी जान का दिल धक् से रह गया

मई बिना शर्म, गिलटी और झिझक महसूस करते हुए बोलै - जी अम्मी जान

अम्मी जान डर्टी डर्टी बोली - और तेरे उन दोनों के साथ रिश्ता भी पाक साफ़ नहीं होगा.

मई अम्मी जान की आँखों में देखता हुआ सीरियस होकर बोलै - जी अम्मी जान ऐसा hi है. मेरे उन दोनों लड़कियों के साथ रिश्ता पाक साफ़ नहीं है

तभी अम्मी जान के चेहरे का नक़्शा hi बदल गया. अम्मी जान का हाथ उठा और घूम गया. अम्मी जान का इरादा था मेरा गाल hi उधेड़ कर मेरे मोह से अलग कर दें. लेकिन चेहरे के पास आ कर अम्मी जान का हाथ रुक गया..

अम्मी जान की आँखों से आंसू बहने लगे. वो अपना हाथ अपनी फुद्दी के ऊपर रखती हुई आंसू बहाने लगी.

अम्मी जान - गुलशन की कोख से पैदा होकर तुम ऐसे बन सकते हो. मई सोच भी नहीं सकती थी. मई इतनी शर्म वाली. शादी से पहले किसी गैर मर्द को अपने जिस्म को हाथ भी नहीं लगाने दिया. और उसी के हिस्से होकर तुमने दो दो लड़कियों के साथ खुद को गन्दा कर दिए. जवानी संभाली नहीं गई तुझसे तो मुझसे कहा होता. मई तेरी शादी करवा देती. लेकिन तुझे ऐसा रिश्ता कभी किसी के साथ रखने न देती

मैंने अम्मी जान को आंसू बहाने दिए

अम्मी जान - तुमने एक बार भी नहीं सोचा. जिन हथु से तुम उन गैर लड़कियों को छू लोगे. उन हथु से तुम फिर मुझे अपनी दादी और अपनी बहनो को छुओगे. कितना गलत किया तुमने बाबू. मेरी तरबियत ऐसी तो नहीं थी.

मई - तरबियत की तो किसी भी माँ की ऐसी नहीं होती अम्मी जान. क्याआआ दुन्या में कोई और बीटा ऐसा काम नहीं करता. बेटे को छोड़ें आप. मैंने जिन दो लड़कियों के साथ गुनाह किआ. वो तो किसी की बेटियां थी. फिर वो क्यों मेरे साथ इतनी आगे बढ़ गई.

अम्मी जान - मई कुछ नहीं जानती. मई बास इतना जानती हों. तुम मेरे बेटे हो. और मेरा ऐसा करे. मई बर्दाश्त नहीं कर सकती.

मई - कितनी मायें ऐसा कुछ भी बर्दाश्त नहीं कर सकती. लेकिन वो अपने बेटों के साथ हसी ख़ुशी जी रही हाँ. कई मैं तो अपने बेटे के करतूत जान कर भी हसी ख़ुशी उसके गुनाह को गले से लगा कर जी लेती हाँ

अम्मी जान - मैंने कहा न. मुझमे और दूसरों में फर्क है

मई - एक्साक्ट्ली... मई भी एहि कहना चाहता हों अम्मी जान. आप में और दुन्या भर की माओं में फर्क है. आप ने मेरे मोह से सच जान कर रोना शुरू कर दिए.. लेकिन आप ने ये नहीं पूछा मुझसे. बाबू ये सब कितनी पुराणी बात है. क्या अब भी तुम उन दोनों लड़कियों के साथ इन्वॉल्व हो.

अम्मी जान - अब क्या रह गया है पूछने को

मई - सब कुछ.. इतना कुछ. जितना हमारी ज़िन्दगी में पहले जान्ने लायक नहीं था

अम्मी जान रोना छोड़ भीगी आँखों से मुझे देखने लगी.

मई - जिस दिन किन्ज़ा एपीआई को देखने लड़के वाले आये थे न अम्मी जान. आप और सब मुझे उसी दिन से बदला हुआ देख रही हाँ.. हाँ मैं अलग तो आप के बदन से बरसों पहले hi हो गया था. लेकिन मई समझा जाए तो मेरा असली जनम उस दिन हुआ था. हर बात के पीछे कोई न कोई वजा होती है.. मेरे बदलने के पीछे भी एक बड़ी वजा है.. और वो वजा है प्यार.. हाँ अम्मी जान... प्याआर.. आप सब के लिए प्यार.. हर जवान होते जिस्म के अंदर जब चेंज आता है तो अक्सर उस चेंज को संभल नहीं पते. और बदलते रंगों के साथ बदलने लगते हाँ.. आज कल तो इललीगल फिजिकल रिलेशन आम बात बन चुकी है अम्मी जान. मई भी मोडरें ज़माने के सबसे दिलकश माहौल का एक हिस्सा बन गया. लेकिन फिर मुझे आप सब के प्यार ने अपनी तरफ मतवज्जु कर लिया. याद है, उस दिन हमारे बीच सच्चे और अनमोल प्यार की एक नयी शुरुआत हुई थी. हर गुज़रते पल के साथ मेरे अंदर प्यार बढ़ने लगा. और बढ़ते बढ़ते इस हद तक जा पोहंचा.. अब मेरे अंदर से ग़लाज़त ख़तम होती चली गई. मेरे अंदर सच्चा प्यार न होता. मेरे अंदर वही ग़लाज़त बाकि रहती तो क्याआ ईंटे दिनों में आप का जिस्म, दादी जान का, किन्ज़ा एपीआई, माहिरा या भाभी जान का जिस्म की खुशबु प् कर मेरे अंदर की ग़लाज़त मुझे बहका कर मेरी आँखों का रंग बदल कर आप सब को चौंका न देती. लेकिन किसी ने भी कोई आँखों में ग़लाज़त जैसा कुछ नहीं देखा. मई भी हैरान हुआ अम्मी जान. आप सब के अनमोल प्यार की ताक़त को जान कर.

मेरे तेज़ दिमाग ने अम्मी जान को बातों के घुमाओ फिराओ में ऐसा उलझाया. अम्मी जान की आँखों की असली चमक वापिस आती चली गई. मेरी बात ख़तम हुई तो वो फिरसे पहले जैसी बन चुकी थी.

मई - क्या मेरी बात एक माँ के दिल को छू नहीं पाई

अम्मी जान ने झट से मुझे अपने सीने से लगा लिया- नहीं बाबू.. ऐसी बात नहीं है. मुझे बिना पूरी बात तुझसे जाने ऐसा रियेक्ट नहीं करना चाहिए था. मुझे सोचना चाहिए था. मेरा बाबू इतना प्यार है. इतना ाचा है. मेरा दूध उसकी रगों में दौड़ रहा है. वो भला कैसे गलत हो सकता है. मई ये क्यों भूल गई. सच में आज के ज़माने में शादी से पहले ताल्लुक़ आम बात बन चुकी है. मई भूल गई थी. इतना सब होने के बाद भी मेरे बाबू की आँखों में अपनी बहनो के लिए मेरे लिए या किसी के लिए भी मेल नहीं आई. सच में बाबू तेरा प्यार बड़ा hi अनमोल है.. आज मुझे तेरे अनमोल

की वजा से ये भी जान्ने को मिला प्यार सच्चा हो तो दिल से ग़लाज़त निकल जाती है. बाबू तूने ये सबत कर दिखाया. मई जितना भी फखर करूँ काम है. लेकिन तू आज के बाद से उन दोनों लड़कियों के साथ कोई रिश्ता नहीं रखेगा. तेरा उन दोनों के साथ तेरे प्यार के अनमोल बनने से पहले था. अब तू कभी उनके साथ कुछ गलत नहीं करेगा. करेगा तो मुझे दुःख होगा

मैं अम्मी जान की बात सुनकर अम्मी जान से अलग होकर अम्मी जान के फूलों से भी तारो ताज़ा चेहरे को थाम कर चूमने लगा. खूब चूमा.

मई - उनके साथ ताल्लुक़ जिस्म का था अम्मी जान. वो आप सब का अनमोल प्यार मिलते hi ख़तम हो गया. लेकिन मई एक बात का आप से वडा नहीं कर सकता

अम्मी जान - किस बात का वडा बाबू

मई - अगर कभी मुझे किसी लड़की के दिल में अपने लिए प्यार hi प्यार दिखा. फिर मई खुद को रोक नहीं पाऊंगा. अगर उसने मन किआ तो रुक जाऊँगा. अगर उसने न रोका तो मई नहीं रुकूंगा. अम्मी जान.. आज के ज़माने में इतना तो चलता hi है न. और फिर ये भी तो देखिये न.. अब से मेरी ज़िन्दगी में कोई भी लड़की आई. मई उसके बारे में सब कुछ आप को बता दूंगा

अम्मी जान का मोह हैरत से खुल गया - तू मुझे क्यों बताये बाबू.. मई तेरी माँ हों. और बीटा माँ से किसी लड़की से ताल्लुक़ की बात क्यों करेगा

मई - हम दोस्त भी तो बन गए हाँ अम्मी. मई चाहता हों. आप ऐसी अम्मी बन जाएँ. जो बेटे के किसी राज़ से अनजान न रहें. अक्सर ऐसे भाई बहन सुनने में आते हाँ. लेकिन हम माँ बीटा होकर ऐसे दोस्त बनेंगे.. इससे हमारा एक दूसरे से प्यार भी बढ़ेगा और भरोसा भी.

फिर मई शरारती अंदाज़ में बोलै - वैसे भी मेरी दोस्त बहुत तजुर्बेकार हाँ. मुझे उनसे बहुत कुछ सीखने को मिलेगा.. हर लड़की इतनी आसानी से थोड़ी न पैट टी है.

अम्मी जान मोह सारा hi खुल गया. फिर अम्मी जान सर झुका कर शर्म भरे लहजे में बोली

अम्मी जान - बेशरम... अब तू ऐसी बातें भी करेगा अपनी अम्मी जान से

मई - हाँ मई करूँगा..

अम्मी जान - क्यों करेगा.. भला एक बीटा अपनी अम्मी जान से ऐसी कोई सलाह ले सकता है

मई - लेकिन मई अनमोल हों. मेरी अम्मी जान अनमोल हाँ. उनकी दोस्ती उनका प्यार अनमोल है. और मई ज़िन्दगी के एक एक पल अनमोल प् कर जीना चाहता हों अम्मी जान.

अम्मी जान के चेहरे पर मुझे शबनम के कतरे चमकते दिखाई दिए

मई मुस्कुरा कर अम्मी जान के चेहरे पर आये पसीने को चाट गया.. अम्मी जान को समझ आई तो वो मुझे नक़ली घुसे से देखने लगी.

अम्मी जान - ये सब क्या है. पसीना क्यों चाट लिया तुमने मेरे चेहरे का

मई - जब आप के गाल को चूमता हों. तब क्या वहां पसीना नहीं होता. तब क्या मेरे होंटो पर आप का पसीना नहीं लगता.

अम्मी जान - तू हर बात में लाजवाब कर देता है बाबू

मई - ाचा अब ये बताएं. मई आप के दिल में कितनी गहराई तक उतर गया हों

अम्मी जान अपने दिल पर हाथ रखती ऑंखें बंद करती हुई बोली - तेरे तजुर्बे ने मेरे दिल को हिला कर रख दिए है बाबू. पता नहीं कैसे वो अलग तरह का धड़कना सीख गया है. जो नयी धड़कनें हाँ न बाबू. वो मेरे दिल की गहराई को और भी बढ़ा गई है. और तू मेरे दिल की सबसे ज़यादा गहराई में जा समाया है

मई - क्या वहां डैड भी कभी नहीं पोहंच पाए अम्मी जान

अम्मी जान - आज की मेरे दिल की गहराई नयी है बाबू. तेरे डैड तो मेरे दिल की पहले वाली गहराई में उतने नहीं थे. जितने तुम थे.

मई खुश हो गया - सब अम्मी जान

अम्मी जान मेरा चेहरा चूमती हुई - हाँ बाबू.. मई बड़ा अजीब महसूस कर रही हों. लेकिन सब इतना ाचा और प्यारा है. मई बता नहीं सकती

मई - पता है अम्मी जान.. जब तक हमारे जिस्म दूर दूर रहे. जब तक हम ने खुल कर प्यार करना शुरू नहीं किआ था. हम इतने करीब नहीं आ सके थे. लेकिन अब. अब देखिये न. हम कितने करीब आ गए हाँ. मेरे दिल से जिस्मो को देख मचल जाने वाली ग़लाज़त भी धूल गई. एक नए बाबू का जनम हुआ. हम सब को एक दूसरे का अनमोल प्यार मिलने लगा.

अम्मी जान - हाँ बाबू... मैं तेरे इतने करीब पहले कभी नहीं आई. जितनी इन दिनों आई हों. और तू मेरे दिल में तो था. लेकिन इतनी गहराई तक पहले कभी नहीं समाया था.

मई - इसका मतलब है. हमारा इतना करीब आना जिस्मो के करीब आने की बदौलत है.

अम्मी जान - सही कहा बाबू. जबसे हम इतने करीब आये हाँ. हमारे दिल बड़ी तेज़ रफ्तारी से करीब आये हाँ

मई - तो फिर ज़रूरी हो गया है. हमारे जिस्म और करीब आ जाएँ

अम्मी जान - हाँ बाबू.. अब मई हर दम तुझे खुद से लिपटाये रखूंगी. तुझे खुद से लगा कर तुझे इतना महसूस करुँगी. तो मेरे पुरे दिल पर कब्ज़ा जमा ले

मई है पड़ा - फिर डैड का क्या होगा

अम्मी जान भी है पड़ी - वो भी रहेंगे. जैसे मई तेरे दिल में हों. लेकिन बाकि सब भी हाँ. क्या तू मुझे अपने दिल में गहराई में बसा कर बाकि सब को निकाल दूंगा

मई - नहीं.. एहि तो मई आप को समझाना छह रहा था अम्मी जान.. फिरसे वही बात करूँगा. कोई लड़की अगर मेरे दिल में बस गई तो मई उसके साथ आगे बढ़ जाऊँगा. मई आप से मश्वरा भी करूँगा. अगर आप इंकार कर देंगे तो मई आप की मान कर उससे दूर हो जाऊँगा

अम्मी जान - क्यों दूर हो जाएगा. दिल वाले मामले में संगदिल नहीं बना जाता बाबू.

मई थोड़ा बेशर्मो वाला चेहरा बना कर - इसका मतलब ये हुआ. आप मुझे लड़कियों के साथ जिस्मानी ताल्लुक़ रखने की इजाज़त दे रही हाँ

अम्मी जान घबरा कर साइड देखने लगी. मई हस्ता हुआ अम्मी जान को चुम कर गले से लगा गया

मई - अम्मी जान आप की ये अदाएं कसम से मेरी जा---

अम्मी जान - फिरसे गलत बात.. ऐसी बात न किआ कर. तुझसे कितनी बार कहा है बाबू

मई - तो फिर हम पुराणी बात को पूरा कर सकते हाँ. या अभी भी वक़्त चाहिए आप को

अम्मी जान भूल गई थी - पुराणी बात ?? कैसा वक़्त ??

मई मुस्कुरा कर - वही पेट चूमने वाली बात

अम्मी जान का चेहरा गुलनार हो गया.. श्रम की लाली एक बार फिरसे आ गई

अम्मी जान - क्या ज़रूरी है बाबू

मई अम्मी जान के दिल वाली जगा पर सर रख कर बोलै - हाँ ज़रूरी है. और फिर आप का दिल भी तो धड़कता हुआ एहि कह रहा है.. बाबू के जितना करीब आ सकती हो. आ जाओ. बाबू जब मेरे साथ धड़कन बनकर धड़क रहा है. तो ज़यादा क्या सोचना. क्या एक माँ और बीटा का रिश्ता दुन्या में आने से पहले और आने के बाद जिस्म से जुड़ा नहीं रहता.. अम्मी जान... आप के जिस्म का ऊपर का हिस्सा hi नहीं नीचे का हिस्सा भी मेरे इस्तेमाल में रहा है... क्या मई खुल कर कहूं... मेरा नाता कैसे है आप के जिस्म के ऊपर वाले हिस्से से और नीचे-----

अम्मी जान ने मेरे मोह पर हाथ रख दिए.. फिर अम्मी जान मेरे सीने पर सर रख कर भरी सांस लेने लगी.

अम्मी जान - मई कैसी पागल माँ हों.. तेरे जैसे बेटे के साथ कितनी आगे बढ़ती जा रही हों.. एक माँ का बीटा ऐसा कुछ बोले तो वो बेटे को पीट कर उसका जोड़ जोड़ अलग कर दे. लेकिन मई तेरे मोह से वो बात सुनकर भी तुझे कुछ नहीं कहती. जो तेरे डैड के शिव किसी और को करने का हक़ नहीं है

मई - क्या डैड का आप के जिस्म से मुझ जैसा रिश्ता है. सच कहिये गए

अम्मी जान - तू बात को घुमा क्यों देता है बाबू.. देख मई कैसे शर्म से तेरे सीने से लग गई हों. ऐसी बातें होने पर मई तुझे चेहरा दिखा पाने की हिम्मत खोने लगती हों. तेरे चेहरे को देख कर तेरी आँखों को देख कर मुझे कुछ कुछ होने लगता है. एक दम से इतनी शर्म आने लगती है. जैसे

मई - जैसे ??

अम्मी जान ने एक गहरी सांस ली - जैसे तू बाबू न होकर मेरा शोहर है

मई - एक और सच बताइये.. क्या कभी डैड से इतनी शर्म आई कभी आप को

अम्मी जान ने एक पल सोचा - नहीं.. लेकिन शुरू शुरू में बहुत आया करती थी

मई - कितना ाचा लग रहा है अम्मी जान. हम दोस्त बनकर बात कर रहे हाँ. आप कितना खुल कर मुझसे बात कर रही हाँ

अम्मी जान - तूने मुझे इस स्टेज पर ला खड़ा कर दिए है बाबू... सोचों तो बड़ी हैरत होती है. लेकिन तू इतना करीब ा गया है. तुझसे कहे बिना रह नहीं पति. शर्म भी आ जाती है तुझसे. और तुझसे बहुत प्यार भी है. भरोसा भी है तुझपर.

मई - मुझे बहुत ाचा लगा अम्मी जान. आप का यौन शर्माना देख कर. वर्ण आप का ये शर्म वाला रूप मई भला कहाँ देख सकता था.

अम्मी जान - ये रूप तेरे लिए नहीं था बाबू..

मई - लेकिन मैंने अपने प्यार की बदौलत आप का ये रूप प् लिया है.. क्यों सही कहा न मैंने

अम्मी जान - सही कहा

मई - तो बताइये.. मैंने जो अपना रिश्ता आप के जिस्म के साथ सबत किया है. क्या आप का दिल नहीं मानता मेरी इस बात को.

अम्मी जान - क्यों नहीं मानेगा. तूने सच hi कहा है. लेकिन कोई भी माँ कभी इसका इज़हार नहीं करेगी. मर कर भी नहीं

मई - फिर आप ने क्यों किया

अम्मी जान - मई पागल हो गई हों शायद

मई हँसा - मेरे प्यार में

अम्मी जान भी धीरे से हसी - हाँ तेरे प्यार में

मई - दुन्या की दूसरी मायें अपने बेटे के अपने जिस्म पर हक़ को तस्लीम नहीं करती. लेकिन आप ने कर लिया है

अम्मी जान - कहा न मई पागल हो गई हों.. तूने भी अपना प्यार सबत करते हुए इतने दलायल दिए हाँ. मई इंकार कर hi नहीं सकती.

मई - तो फिर अगर मई अपने कुछ बचपन वाले हक़ फिरसे पाना चहुँ तो

अम्मी जान - न बाबू ऐसी बात न कर

मई - क्यों न करूँ

अम्मी जान - शर्म से मेरा दिल बंद हो जाएगा

मई - लेकिन मेरे दिल कह रहा है. आप का दिल पहले से ज़यादा खुश हो जायेगा. पहले से ज़यादा मज़बूत क्या हो जाएगा

अम्मी जान - मज़बूत कैसे होगा

मई - हमारे अनमोल प्यार के बढ़ जाने से

अम्मी जान खामोश रही

मई - अगर आप अपने दिल की नहीं सुनता चाहती हाँ. तो मई कोई ज़बरदस्ती नहीं करूँगा. मई आप के जिस्म वो हिस्सा हों. जिसे आप को सबसे ज़यादा प्यार है. कैसे आप को दुःख दे सकता हों

अम्मी जान - मुझे दुःख नहीं होगा बाबू

मई - तो ?

अम्मी जान - बात शर्म की है.. बायत उन सालों की है. जो मेरी ज़िन्दगी में आये. आज तक कभी ऐसा सोचा नहीं था. एक दम से तेरे साथ इतना खुलना आसान बात नहीं है. कैसे मई अपनी कमीज़ का पल्लू उठा कर तुझे अपने पेट दिखा सकती हों. अभी hi तो इतनी साडी बातें होने लगी है. अभी से कभी खुद को त्यार कर लूँ

मई - मतलब आप का दिल मंटा है.

अम्मी जान - दिल.....

अम्मी ने एक गहरी सांस ली - पता नहीं क्या हो गया है मेरे दिल को.. जब से तूने अपना सर मेरे सर के साथ जोड़ कर मुझसे वो साडी बातें करि हाँ न. जब तूने मुझे अपना लड़कियों वाला सीक्रेट बताया है न. जब तूने कहा. तू वह सब हमारे अनमोल प्यार की वजा से छोड़ चूका है तो मैं भी अपनी ज़िन्दगी के कई रूल्स छोड़ने पर मजबूर होती जा रही हों. दिल का कहा तुमने ने न.. मेरा दिल अब सोचता है बास.. बाकि वो साडी बातें तेरी मानने पर टूल गया है. मई छह कर तेरी किसी बात से इंकार नहीं कर सकती. छह कर भी अपने दिमाग की बात नहीं मान सकती. मेरी सोचों पर मेरे दिल की धड़कनो में तुम्हारे नाम की गूँज भरी पद चुकी है. अब तो वही सब होगा.. जो तू चाहेगा.. लेकिन मुझे वक़्त चाहिए बाबू..

मई - आप जितना भी वक़्त चाहेंगी.. मई दूंगा. आप की सोचें आप के दिल पर भरी पड़ें तो भी मुझे बता दीजियेगा.. हम जितना प्यार पहले प् चुके हाँ. इससे आगे नहीं बढ़ेंगे. आप कहें तो मई आप के सर की कसम खा सकता हों

अम्मी जान - न बाबू... कसम मत खा.. मुझे तेरी हर एक बात पर खुद से भी बढ़कर यकीन है.... चल अब तू जा

मई अम्मी जान को खूब प्यार करने के बाद कमरे से निकलने लगा.. अब अम्मी का चेहरा नार्मल था. लेकिन सोचों में धड़कनो में मई hi मई था

मई कमरे से निकलता.. अम्मी जान को जैसे कुछ याद आया

अम्मी जान - अरे.. मुझे अब याद आया. तूने सराह के साथ भी क्या ऐसा सब बोलै था

मेरे होंटो पर मुस्कान आ गई - नहीं अम्मी जान इतना तो नहीं बोलै.. लेकिन भाभी जी की कोई बात मई आपसे नहीं कहूंगा.. मई अपने दिल को समंदर से भी ज़यादा गहरा बना लेना चाहता हों अम्मी जान. इतना गहरा कह मेरे दिल में आप के राज़ सबके राज़ छुप जाए.. मई एक की बात दूसरे को नहीं बता सकता. हाँ बतानी ज़रूरी हुई तो ज़रूर बताऊंगा.. अपनी पर्सनल लाइफ का एक एक पल मई आप से शेयर करूँगा.. वो भी जो हमारी दोस्ती को सामने रख कर बताऊंगा.. जितनी दोस्ती आगे बढ़ेगी.. उतना मई आप को बताता रहूँगा

अम्मी जान - तू भी तेरी एक बड़ी खूबी सामने आई है बाबू.. सच में सीने में राज़ दफ़न hi रहने चाहिए. मुझे भी कोई बेचैनी नहीं है.. तेरा और तेरी भाभी का मटर तू hi देख..

मई कमरे से निकल गया.. आह्हः कितनी स्पीड के साथ मेरी मंज़िल करीब आती जा रही थी. मुझे उम्मीद तो नहीं थी. अम्मी जान इतनी खुली बातें मेरी सुन सकेंगी.. लेकिन वही बात. भाभी के साथ हुए तजुर्बे ने भाभी को पागल कर डाला.. अम्मी जान के साथ हुए तजुर्बे ने अम्मी जान को...

क्या कमल का नुस्खा हाथ लगा था. ऐसे तो मई हर एक के दिमाग में, दिल में अथाह गहराइयों में घुस जाया करुगा.. अब किसी की अनमोल फुद्दी मुझसे दूर नहीं रही थी

मई चाहता तो अम्मी जान को पागल बना कर सब कर जाता. लेकिन इतनी स्पीड से सब करना. अम्मी जान को चौंका देने वाली बात थी.. अम्मी समझ जाती.. मैंने ये सब उनकी फुद्दी में घुसने के लिए किया है.. मई अम्मी जान को इस हद तक पागल कर देना चाहता था. अम्मी जान का दिल अम्मी जान का जिस्म अम्मी जान की फुद्दी मेरे लुंड के लिए मेरे प्यार के लिए मचल जाएँ.

और वो दिन दूर नहीं था..... बहुत करीब दिखाई दे रहा था.. मई खुश खुश अपने कमरे में गया.. दूर को अंदर से लॉक करता नंगा होकर बीएड पर लेट गया.. बहुत देर से मेरा लुंड खड़ा होने के लिए मचल रहा है. उफ्फ्फ्फफ्फ्फ़ कितना कण्ट्रोल करना पड़ा था मुझे खुद को. कितना लड़ना पड़ा था खुद से.. आज पता चला. लुंड पर कण्ट्रोल दुन्या में पाई जाने वाली हर एक चीज़ पर कण्ट्रोल से मुश्किल था..

हाथ के लगते hi लुंड शरीफ खड़ा होकर नाचने लगा. मई अम्मी जान की फुद्दी को इमेजिन करता हुआ अपने लुंड को हिलने लगा.. आह्हः आज लुंड हिलने में अलग hi मज़ा मिल रहा था....

 




तेरहवीं क़िस्त

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आज लुंड को मसलने में बहुत मज़ा आ रहा था. इतना कह दिल किया. अपने लुंड की मणि अम्मी जान के नाम की निकल डालूं.. फिर किन्ज़ा एपीआई का नंगा जिस्म याद आया. मई लैपटॉप उठा कर उसे ोंन करने के बाद वीडियो निकल कर देखने लगा.. ऐसे hi अपने लुंड को हिलने लगा..

लुंड से मणि निकलने में अभी देर थी. और मई किन्ज़ा एपीआई के नंगे नहाते जिस्म को देख कर मुठ मारने लगा.. फिर एक दम से जैसे दिल में एक बात ै. मैंने कुछ पल सोचा.. फिर अपने लुंड को हिलना छोड़ कर किन्ज़ा एपीआई की वीडियो डिलीट कर गया.. मुझे ये सही नहीं लग रहा था.. अब से पहले मई सिर्फ जिस्म की तलाश में hi रहा था. अब जब जिस्म मिलने hi वाले थे. मेरे दिल में सब के लिए प्यार की नयी लहार जनम ले चुकी थी. सब मुझपर कितना ट्रस्ट करने लगी थी. और मई किन्ज़ा एपीआई की वीडियो लैपटॉप में सेव किये हुए थे.. कुछ भी गलत हो सकता है. घर में कोई चोर घुस सकता है. कहीं लैपटॉप ले जाऊं. और वो मेरे हाथ से निकल जाए. लैपटॉप के साथ किन्ज़ा एपीआई का नंगा जिस्म भी मेरे हाथ से दूसरे हाथ में चला जाएगा..

ऐसी सोच पहली बार मेरे दिल में ै.. और मुझे खुद पर बड़ा गुसा आया. कैसे मई इतनी बड़ी गलती कर गया. ठीक है किन्ज़ा एपीआई का जिस्म देखने की तमन्नाह थी मुझे.. और मुझे मौका भी मिल गया था. एक बार देखने के बाद डिलीट कर देता.. लेकिन मई तो जैसे उम्र भर के लिए उसे अपने पास रखने की सोच गया था.. कितना गलत सोचा था मैंने.. मुझे अपनी गलती का अहसास हुआ.. मैंने रीसायकल बिन भी खली कर दिए..

अब मई सुकून से था.. वैसे भी मैंने हाथ से लुंड की मणि निकलना छोड़ दिए था. अब मई पहले जैसा नहीं रहा है. मई बदल गया था. सब मेरे लिए बदलते जा रहे थे. फिर ऐसा सब देखना क्या ज़रूरी है.. अब तो मई लाइव सब का सब कुछ देखने वाला था..

लैपटॉप में अचे से देखा. कहीं मैंने किसी और फोल्डर में वीडियो की कोई कॉपी तो नहीं बना कर राखी.. अपनी बड़ी बहन के जिस्म का शौक से नज़ारा करने वाला कैसे अपनी बहन की नंगी वीडियो की फ़िक्र में पद गया था. मेरे अंदर का ये बाबू अलग hi था

अछि तरह तसली करने के बाद मैंने लैपटॉप को बंद किया.. फिर बाथरूम में घुस कर शावर चला कर खड़ा हो गया. मई सर पर पीठ पर कमर पर लुंड पर शावर का पानी गिराने लगा.. मई एक जगा नहीं खड़ा रहा. मूव करता रहा. साथ hi सांस को नार्मल करने में लग गया. ऐसे मई जल्दी सुकून में हो रहा था. लुंड भी बैठता जा रहा था..

मई आधे घंटे तक शावर के निचे रहा. जब बाथरूम से बहार निकला तो मई ऐसे रिलैक्स था. जैसे मैंने लुंड को हाथ भी न लगाया हो..

दोपहर को किन्ज़ा एपीआई और माहिरा एपीआई घर आई. भाभी को फ्रेश देख हैरान हुई. सबसे पूछा दोनों ने.. भाभी कैसे रिलैक्स हुई

सब ने स्माइल देते हुए कंधे उचका दिए

भाभी से पुछा गया.

भाभी - अम्मी जी पूछ लीजिये

किन्ज़ा - मैंने पुछा था अम्मी जान से.. लेकिन अम्मी जान ने कुछ नहीं बताया

भाभी - दादी जान से पूछ लें

भाभी हस्ती हुई वहां से चली गई... माहिरा और किन्ज़ा एपीआई दोनों एक दूसरे को हैरानी से देखने लगी

लंच के बाद किन्ज़ा और माहिरा एपीआई अपने कमरे में कुछ देर रेस्ट करने के लिए चली गई. मई इलाके में हवा खोरी के लिए निकल गया... सुबह से घर पर था.. अब ज़रा टहलने के लिए निकलने को दिल चाहा तो दिल की सुनता हुआ निकल पड़ा. घंटे भर बाद लौट आया

4 बजे के करीब किन्ज़ा एपीआई किचन में गई और कुछ फ्रूट्स लेकर टीवी लाउन्ज में माहिरा एपीआई के साथ सोफे पर बेथ गई.

मई एक दूसरे सोफे पर बैठा था. माहिरा एपीआई ने प्लेट मेरे आगे सरकै.. और मैंने फल का एक पीेछे उठा लिया..

हम बातें करते हुए टीवी देखने लगे.. तभी भाभी वहां आई.. सीढ़ी मेरे पास कर सोफे की साइड हाथ रखने वाली जगा बैठती हुई मुझसे बोली

भाभी - बाबू.. मोह खोल.. आज मैंने तुम्हारे लिए खास ये हलवा बनाया है.

मिंजा एपीआई और माहिरा एपीआई दोनों के हाथ फल समेत मोह के करीब थे. भाभी का मेरे लिए इतना प्यार और फिर भाभी के मोह से मेरे लिए बाबू सुनकर वो फल खाना भूल गई.. हैरत के मारे दोनों के मोह खुल गए थे.. मैं दोनों को hi देख रहा था

भाभी - बाबू मोह खोलो.. उधर मत देखो. रोज़ hi दोनों को देखते हो. आज मुझपर धयान दो.

मैं दोनों बहनो को मुस्कुरा कर देखता हुआ मोह खोल गया. और भाभी ने हलवा भरा चमच मेरे मोह में दाल दिए.. और हलवा बहुत hi मज़े का है.. ऐसा मोह बना कर खाने लगा.. हलवा सच में कमल का था. मई डबल मज़े का इज़हार करता हुआ भाभी का हाथ पकड़ कर चूमता हुआ बोलै

मई - वाह्ह्ह्ह भाभी.. आप के हाथ में जादू है.. क्या हलवा बनाया है. क्या टास्ते है.. अपनी इन दोनों नंदों को भी हलवा बनाना सीखा दीजियेगा.. आखिर कल को ये दोनों भी अपने अपने घर जाएंगी.. वहां इतना ाचा हलवा पका कर जब ये अपने अपने शहरों को खिलाएंगी.. तो दोनों की खूब वह वह होगी.. लेकिन असली वह वह की हक़दार आप होंगी भाभी जी... मई वहां हुआ तो दोनों की पोल खोल दूंगा. और सच सच बता दूंगा.. हलवा बनाया तो इन दोनों ने है.. लेकिन कमल मेरी भाभी जी का है

किन्ज़ा एपीआई और माहिरा एपीआई दोनों बनावटी गुसा करने लगी. माहिरा एपीआई फलों वाली प्लेट घुसे से टेबल पर पटखती हुई उठ कड़ी हुई.. और कमर पर हाथ रख कर बोली

माहिरा - क्या कहा तुमने.. ज़रा फिरसे कहना

किन्ज़ा - माहिरा.. हम तो इसे प्यार प्यार दे दे कर सर पर hi चढ़ा गई हाँ.. ज़रा इसकी ज़ुबान तो देखो.

माहिरा - गलती हो गई बजी हमसे..

किन्ज़ा - चलो हम अपनी गलती सुधरती हाँ.. इस बाबू के बच्चे की आज वो धुलाई करती हाँ. फिर कभी ज़िन्दगी भर हमारा ऐसा मज़ाक नहीं बनाएगा

मैं मुस्करा कर भाभी को देखा. फिर दोनों को देख कर बोलै

मई - आप दो.. हम दो..

दोनों एक साथ - क्याआआआ.. तुम दो.. तुम दो हो कहाँ. हम दो.. तुम अकेले

भाभी - किसने कहा.. तुम दो और बाबू एक है.. मई हों मुन्ना के साथ

अब दोनों और भी हैरान हुई.. दरवाज़े पर अम्मी जान और दादी कड़ी मुस्कुरा कर अंदर देख रही थी. दोनों हमारी आवाज़ सुन कर आई थी.

दादी जान - सराह बेटी तुमने भी गलत कहा

हम सब दरवाज़े पर देखने लगे

दादी जान - किन्ज़ा बेटी माहिरा बेटी तुम दो... लेकिन हम चार.. मतलब और मई गुलशन भी बाबू की टीम में हाँ

मैंने भाभी के हाथ पर हाथ मारते हुए नैरा मार दिए.. भाभी जी अम्मी जान और दादी जान हसने लगी

अब तो माहिरा एपीआई और किन्ज़ा एपीआई का बवंती गुसा उरूज पर आ पोहंचा था..

किन्ज़ा एपीआई अम्मी जान और दादी जान को देखती हुई बोली - आप सब पठान हाँ तो मई और माहिरा भी पठान की बच्चियां हाँ.. बाबू एक से दो या दो से चार भी हो जाये. तो भी हमें फर्क नहीं पड़ता.. हम दो बहने हाँ.. और......

किन्ज़ा एपीआई के होंटो पर मैदान में जीत चुके खिलाडियों जैसे मुस्कराहट आ गई. मुस्कराहट देख कर माहिरा एपीआई भी जाने क्यों मुस्कृराने लगी.. हम सब किन्ज़ा एपीआई की बात के पूरा होने का इंतज़ार करने लगे..

किन्ज़ा एपीआई बड़े hi डरमै अंदाज़ में बोली - दादी जान आप ने कहा.. हम दो और आप चार हुए

दादी जान - हाँ मैंने एहि कहा

किन्ज़ा एपीआई अपने साथ कड़ी माहिरा को देख कर बोली - और आप सब क्या ये नहीं जानते है... एक एक होता है और दो गयरा.. जाओ आप सब को माफ़ किया.. आप 4 और हम गयरा.. जोड़ बराबर का नहीं है.. या तो पुरे ग्यारा होकर हमारे मुकाबले पर आओ.. या फिर

माहिरा एपीआई ने जोश में आते हुए झुक कर किन्ज़ा एपीआई को गांड के नीचे से अपनी बाँहों में भर कर उठा दिए. और घूमने लगी

माहिरा - बजी बजी. आप ने तो कमल कर दिए. बिना मुकाबले के hi मैच जीत लिया

इधर हम सब हैरान थे.. उधर माहिरा एपीआई जोश में आई किन्ज़ा एपीआई को उठाये घूम रही थी.

और किन्ज़ा एपीआई माहिरा एपीआई के उसे उठा लेने से - छोड़ मुझे छोड़. तू मुझे गिरा देगी.. माहिरा की बच्ची.. मई कहती हों मुझे छोड़

और जैसे hi किन्ज़ा एपीआई के मोह से ये सरे अलफ़ाज़ निकले.. मैंने भाभी को देखा.. और फिर हम दोनों खूब ज़ोर ज़ोर से हसने लगे.. वही अम्मी जान और दादी जान भी ज़ोर ज़ोर से हसने लगी.

माहिरा एपीआई हैरान होकर किन्ज़ा एपीआई को नीचे खड़ा करती हम सब को हस्ते हुए देखने लगी...

किन्ज़ा एपीआई खुद को सँभालने लगी. जैसे उन्हें चक्कर आ गए थे. माहिरा एपीआई स्टुपिड लड़कियों जैसा चेहरा बना कर हम सब को घूम घूम कर देख रही थी

फिर बोली - ये अआप सब ऐसे क्यों हसने लगे..

भाभी हस्ती हुई - बेचारी किन्ज़ा ने कितना दिमाग लगाया.. बिना मुकाबले के hi वो जीत गई थी. लेकिन एक स्तूपिडिटी की वजा से तुम और वो दोनों हार गई

माहिरा एपीआई की समझ में कुछ नहीं आया - ऐसे कैसे.. मई तो जीत का यकीन होने के बाद hi ख़ुशी से झूमने लगी थी

अम्मी जान - माहिरा तुम जोश में आती हुई ये भूल गई.. किन्ज़ा की बात का अभी हममे से किसी ने जवाब नहीं दिए था. और जीत के नशे में किन्ज़ा को उठा गई. और देखा नहीं तुमने.. किन्ज़ा कैसे डर के मारे चीखने लगी थी

माहिरा एपीआई की समझ में अब भी सारा माजरा नहीं आया.

किन्ज़ा एपीआई अब रिलैक्स थी. वो उठ कर कड़ी हुई और माहिरा एपीआई के सर पर चापाप लगाती हुई बोली

किन्ज़ा - तुमने सारा खेल बिगड़ दिया. हमारी पक्की जीत थी. लेकिन तुमने जोश में ा कर मुझे क्यों उठाया.. समझ में नहीं आ रहा तो सुनो.. मई डर कर चीखने लगी..

एक घबराया हुआ खिलाडी कभी जीत हुआ नहीं मन जा सकता

माहिरा एपीआई की समझ में अब साडी बात आई.. फिरसे नौटंकी शुरू हो गई.. माहिरा एपीआई हारे हुए जवारी की तरह धप्प से सोफे पर गिर पड़ी. और दोनों हथु से अपने सर को थाम गई

हम सब है रहे थे.. खूब एन्जॉय कर रहे थे.. हर दिन कुछ नया मज़ा आटोमेटिक मिलने लगा था. मैंने अम्मी जान को देखा.. और अम्मी जान मुझे कुर्बान होती नज़रों से देख रही थी. आज अम्मी जान की आँखों में जो चमक थी. वो हमेशा से बढ़कर थी.. और हर गुज़रते पल पहले से ज़यादा बढ़ती रहने वाली थी.

मई भी मुस्कुरा कर अम्मी जान को देखने लगा.

टाइम बहुत मज़े का बीत रहा था. एक बार अम्मी मौका देख कर मेरे पास आई. मेरे गले से लग कर मुझे चूमती हुई बोली

अम्मी जान - बाबू.. हर दिन एक नयी ख़ुशी देखने को मिल रहा है.. हर सेकंड ख़ुशी की इन्तहा देखने को मिल रही है.. बाबू ये सब तेरे दम से है

मई - ये तो कुछ भी नहीं अम्मी जान. देखने हर आने वाला पहले से कहीं बढ़कर खुशियां हमारे लिए ले कर आएगा

अम्मी जान - मुझे मेरे बाबू की बात पर यकीन है

मई अम्मी जान के होंटो को देखता हुआ बोलै - अम्मी जान.. आप होंठ कितने प्यारे हाँ

अम्मी जान शर्म से मुस्कुरा पड़ी - तुम झूट बोल रहे हो बाबू

मई - सच कह रहा हों

अम्मी जान - प्यारे होते तो तुम्हारे डैड कभी तो मेरे होंटो की तारीफ करते

मई अम्मी जान का मोह देखता रह गया.. अम्मी जान भी ऐसा खुल कर बोली. तो जैसे एक दम से बोखला गई. फिर नज़रें नीचे कर गई. मई खिल उठा था. मई जितना अम्मी जान को खोल रहा था. अम्मी जान उससे बधार खुल रही थी

मई अम्मी जान की चीन उठा गया.. लेकिन अम्मी जान की पलकें भरी होकर और भी नीचे झुक गई

मई - अम्मी जान. पता है.. इस वक़्त आप के चेहरे के एक्सप्रेशन किस बात की तरफ इशारा कर रहे हाँ

अम्मी जान बिना मेरी आँखों में देखे बोली - कैसा इशारा

मई - ऐसा इशारा. जैसे आप डैड के साथ साथ मेरी भी कुछ है

अम्मी जान - वो तो मई हों. तुम्हारी अम्मी जान हों. तुम मेरे बदन का एक हिस्सा है

मई - नहीं.. आप का ये शर्मा इस बात का इशारा है. जैसे आप मुझे अपने दिल में एक आशिक़ की तरह भी बिठा गई हाँ

अम्मी जान हैरान होकर मेरी आँखों में देखने लगी

मई - हाँ अम्मी जान.. आप का ये शर्माना एक बेटे से शर्माना नहीं है. एक लवर से शर्माना है

अम्मी जान फिरसे शर्मा गई - बाबू.. ये सब कितना अजीब है.. कितनी स्पीड से मई बदलती जा रही हों.. बाबू कहीं तुम मुझे बेहया तो नहीं--

मई अम्मी जान के मोह पर हाथ रख गया

मई - ऐसी कोई बात फिरसे कभी अपने इन होंटो से मत निकालिएगा अम्मी जान

अम्मी जान बुझे दिल से बोली - एक माँ के मोह से ऐसी बात भी तो नहीं निकालनी चाहिए न.. पता नहीं मुझे तुम्हारे सामने क्या होना लगता है

मई - जो होता है होने दें अम्मी जान. बास दिल पर बोझ न आने दें.

अम्मी जान - बाबू अब मई डरने सी लगी हों

मई - मेरे होते हुए भी

अम्मी जान - हाँ बाबू. जो हो रहा है. वो अगर किसी आंख ने देख लिए तो

मई - कैसे कोई देख सकता है

अम्मी जान - फिर भी बीटा. एक माँ एक बीटा इतने करीब नहीं आ सकते. आ भी जाएँ तो ऐसे अलफ़ाज़ मोह से नहीं निकला करते

मई - अम्मी जान.. मई आप का डर भी बाँट सकता हों

अम्मी जान - वो कैसे.

मई - आप के होंठ आप को ताक़त दे सकते हाँ

अम्मी जान - वो कैसे

मई - आप मान चुकी हों न. मई आप के hi बदन का हिस्सा हों

अम्मी जान - हाँ

मई - तो फिर अपनी ऑंखें बंद कर दीजिये

अम्मी जान - तुम क्या करने वाले हो बाबू

मई - जो आप समझ रही हाँ

अम्मी जान के मुम्मे मेरे सीने में दबे हुए थे. अम्मी जान के बाहें मेरे गले में थी.. मेरे हाथ अम्मी जान की कमर पर थे

अम्मी जान लरज़ उठी

मई - अपना चेहरा उठाइये

अम्मी जान ने नाह में सर हिला दिए - बाबू ये ज़यादा हो जाएगा

मई - एक आशिक़ होंठ चुस्त है. और मई चूमूंगा. चूमने और चूसने में फर्क है. आप को पता चल जायेगा

एमी जान - बाबू मेरा दिल बहुत घबराने लगा है

मई - मई हों न

अम्मी जान - ये सही नहीं है बाबू

मई - आप अपना चेहरा ऊपर उठाएंगी या मई खुद से उठा दूँ

अम्मी जान खुद को बेबस समझती हुई अपने चेहरा उठा गई. मैंने अपना चेहरा झुका दिए.. जैसे hi मेरे होंठ अम्मी जान के होंटो के करीब आये.. अम्मी जान घबराती हुई अपनी ऑंखें बंद कर गई

मैंने अपने होंठ ज़यादा न सोचते हुए अम्मी जान के होंटो के साथ जोड़ दिए... फिर अम्मी जान के नीचे वाले होंठ को अपने होंठ में भर कर ऐसे hi खड़ा रहा.. अम्मी जान कैंप रही थी. जैसे मुझसे अलग होकर भाग जाता चाहती हों. जब से अम्मी जान की शायद हुई थी.. तब से लेकर अब तब अम्मी जान के जिन होंटो पर डैड आया करते थे. आज मेरे होंटो ने अम्मी जान के होंटो पर अपने होंठ रख दिए थे.. अम्मी जान का वो होंठ जो मेरे चेहरे को चूमा करता था. आज मेरे होंठ में कैद होकर रह गया था. मई अब न होंठ चुम रहा था. न चूस रहा था. बस होंठ को अपने दोनों होंटो में लिए खड़ा रहा.

अम्मी जान का जिस्म कुछ पल तक hi कंपा.. फिर अम्मी जान मेरी गर्दन पर रखे हाथ मेरे सर पर लाइ और मेरे बालों पर चलने लगी. अम्मी जान भी अपने होंटो को हरकत नहीं दे रही थी. वो अब समझ गई थी मेरा इरादा क्या है.. और जो मेरा इरादा था. अम्मी जान को भा गया था.

ऐसे hi खड़े रहे हम दोनों... जाने कितना टाइम गुज़र गया.. सुकून की इन्तहा थी. मई नशे से चूर होता जा रहा था.. अजीब नशा था. सुकून भी बहुत मिल रहा था. और नशा.. खड़े खड़े कहीं मई लड़खड़ा कर गिर न पडूँ.. ऐसा लगने लगा.

फिर अम्मी जान ने अपने सर को पीछे हटा लिया.. मई बंद ऑंखें खोल कर अम्मी जान को देखने लगा. और अम्मी जान के होंटो पर बहुत hi पायरी स्माइल थी

अम्मी जान - मई तो ऐसे hi डर रही थी. मेरा बाबू मुझे प्यार देने वाला था. और मई घबरा गई थी.. फिर मेरे एक होंठ को चूमती हुई अम्मी जान बोली

अम्मी जान - देख अब मैंने खुद से तेरे होंठ को चूमा है. बाबू ये नए नए तरीके तो काया नेट से ढूंढ कर मुझपर अप्लाई करता है

मई है पड़ा - नहीं अम्मी जान.. मेरा दिल कुछ hi दिनों से मेरा उस्ताद बना हुआ है. पता नहीं कहा कहा से अजीब अजीब आइडियाज आने लगे हाँ.. और कमल की बात है. हर आईडिया एक से बढ़कर एक है.. अब आप बताएं.. क्या कभी होंटो पर ऐसा प्यार कभी आप ने पाया

अम्मी जान - कभी नहीं पाया

मई - बुरा तो नहीं लगा न

अम्मी जान- नहीं बुरा नहीं लगा. बालकः मुझे तो ऐसा मज़ा और सुकून मिला.. आज तक नहीं मिला. वर्ण मई पहले डर रही थी. सोच रही थी ये ज़यादा हो जायेगा.. होंटो पर प्यार अलग बन जाती है न

मई - हमारा प्यार भी तो अलग hi है

अम्मी जान - सही कहा बाबू तुमने

मई - तो अब अगर मई कहूं.. मेरा दिल कर रहा है. एक बार. सिर्फ एक बार आप के होंठ को चूस लून.. तो

अम्मी जान - अभी सारा डर गया नहीं है बाबू

मई - वो भी भगा दूंगा

अम्मी जान - तू क्या एक hi दिन में सब कर लेना चाहता है

मई अम्मी के कण के करीब मोह करता हुआ राज़दारी से बोलै - सब से मुराद आप की कहीं वो सब तो नहीं है न.. शोहर वाली आशिक़ों वाली

अम्मी जान मेरे सीने पर हाथ रख मुझे पीछे धक्का देती हुई धीरे से है पड़ी

अम्मी जान - बाबू तू मुझसे ऐसे बात करने लगा है. जैसे एक नयी नवेली दुल्हन से उसकी सहेली बात करती है

मई - तो क्या मई आप की सहेली नहीं हों

अम्मी जान भी मस्ती में आती बोली - लेकिन कोई नयी नवेली नहीं हों. हैट अब मुझे जाने दे

अम्मी जान जाने लगी. मैंने अम्मी जान की कलाई पकड़ी और अम्मी जान को फ़िल्मी स्टाइल में घुमा कर अपने सीने से लगा लिया

अम्मी जान का मोह हैरत के मरे सारा hi खुल गया. और मुझे देखती चली गई.. मैंने अम्मी जान के चेहरे पर फूँक मार दी..

अम्मी जान हस्ती हुई मुझसे अलग हो गई - बड़ा आया आशिक़.. चल हैट.. कुछ ज़यादा hi बदमाशी पर उतर आया है तू..

अम्मी जान हस्ती हुई मेरे कमरे से निकल गई

शाम से कुछ पहले भाभी जान मेरे कमरे में ै. आते hi घबराई हुई बोली

भाभी - बाबू.. मई तो एक बात भूल hi गई थी..

मई - कोनसी बायत

भाभी श्रम से कनपटी हुई सर झुका कर बोली - वो.. वो

मई भाभी के करीब हुआ. और भाभी को गले से लगा कर भाभी के गाल पर रख कर गाल को अंगूठे से मसलने लगा. कुछ देर में hi भाभी को एनर्जी मिली.. ऐसे hi भाभी बोली

भाभी - बाबू.. वो आज रात

मई भाभी के गालों से होंठ लगा कर बोलै - क्या है आज रात

भाभी - नदीम का दिए गया टाइम आज रात ख़तम हो जायेगा

मई - होने दें

भाभी रोहणसी हुई बोली - मई मर जाउंगी बाबू.. प्ल्ज़ मुझे बचा लो. वो नदीम मुझे कहीं का नहीं छोड़ेगा. नहीं मई आज अपने कमरे में नहीं जाउंगी

भाभी अपनी गैंग फटने के खौफ में फिरसे मुब्तला हो गई थी. वो मेरे प्यार में इतनी आगे बढ़ गई थी. कुछ hi घंटों में कितना खुल कर बोलने लगी थी. मेरे प्यार ने और गैंग की सील टूटने पर मिलने वाले दर्द ने भाभी को मेरे और भी करीब कर दिए था.

मई - भाई से कहना. प्यार से करे. आप को डरना नहीं चाहिए. और फिर मेरी दी हुई हिम्मत आप के साथ है न

भाभी मेरी आँखों में नहीं देख रही थी - बहुत हिम्मत आ गई है मेरे अंदर बाबू. लेकिन साडी नहीं आई है. बाबू तुम मुझे कोई और सलूशन दो. मई कैसे इस सिचुएशन से बच्चों

मैंने दोनों हाथ भाभी के कण के नीचे डेल. दोनों अंगूठे भाभी के गलों पर थे. ऐसे hi भाभी का सर उठा कर अपने होंठ उनके होंटो के करीब कर दिए

मई - एक और तजुर्बा करू. इससे आप को इतनी एनर्जी मिल जायेगी. आप नदीम भाई से कुछ दिनों का और टाइम मांगेंगी तो नदीम भाई इंकार नहीं कर पाएंगे

भाभी खुश होकर - क्या ऐसा हो सकता है.. नदीम मुझे और टाइम दे सकता है

मई - हाँ हो सकता है. अगर आप चाहें तो

भाभी - मई कैसे चहुँ ??

मई - नया तजुर्बा करना होगा मुझे ??

भाभी - तो फिर करो.. देर न करो.. वर्ण मेरी हालत फिरसे ख़राब होने लगी है. दिल डूबने लगा है. जैसे जैसे रात करीब आती जा रही हाँ

मैंने भाभी के नीचे वाला होंठ अपने दोनों होंटो में भर लिया. भाभी सोच भी नहीं सकती थी. मई ऐसा भी कुछ कर सकता था. होंटो पर टूट पडूंगा मई. वो भी बिना बताये. होंठ, जिनपर बिन मांगे कोई भी अपना हक़ नहीं जाता सकता. लेकिन मैंने जाता दिए था.

भाभी फड़फड़ा कर मुझसे अलग होने लगी. लेकिन मैंने कास के भाभी जी को थाम रखा था. भाभी ने कुछ सेकण्ड्स ज़ोर लगाया खुद को छुड़ाने के लिए. लेकिन वही हुआ. जो अम्मी जान के साथ हुआ था. भाभी जान ने भी धयान दे डाला. जान लिया मई तो उनके होंठ चूस नहीं रहा. बास महसूस कर रहा हों होंटो के ज़रिये

अब अब भाभी जान महसूस करने लगी. अजब मदहोशी थी. अजब सुरूर था. अजब रंगों भरी दुन्या में मई पोहंच गया था. वहां मुझे अम्मी जान भाभी, दोनों बहने दादी जान और खंडन की साडी फुद्दी वालियां दिखाई दे रही थी. मेरे हिसाब से जो जो मेरे लुंड से छोड़ने वाली थी. या मई जिसकी फुद्दी में घुसने वाला था. वो साडी की साडी मुझे कलर वर्ल्ड में दिखाई देने लगी थी..

भाभी के साथ भी ऐसा hi होना चाहिए था. और हुआ भी. भाभी भी मेरे लिया पहले मदहोश फिर सुरूर की लपेट में आती चली गई. उनके अंदर की बेकरारी ख़तम होती चली गई. उनकी सांस मोहतदिल होती चली गई..

कई मिनट तक ऐसे hi खड़े रहे के बाद मैंने भाभी के होंठ को हल्का सा चूस कर छोड़ दिए.. भाभी और मेरी ऑंखें बंद थी. मैंने ऑंखें खोल कर देखा. भाभी सर झटकती हुई ऑंखें खोल रही थी.. वो दिन वाला सुकून भाभी के चेहरे पर था. इतना सुकून. सुकून hi सुकून. कुछ देर पहली की सरे परेशानी उनके चेहरे से धूल गई थी...

मैंने भाभी को मुस्कुरा कर देखा. और भाभी हैरानी से मुझे देखने लगी

मई क्लब डांसर की तरह लेफ्ट हैंड से भाभी एक राइट हैंड पकड़ क्र उठा गया. दूसरा हाथ भाभी की कमर पर रखता हुआ पाऊँ से इधर उधर होने लगा. अब जितना आता था मुझे और भाभी को उतना हम करने लगे. भाभी मुस्कुराती हुई मेरे साथ देने लगी. अब वो खूब मुस्कुरा रही थी

मई भाभी को घूमता हुआ बोलै - क्यों भाभी जी.. कैसा लगा मेरे नया तेजुअरबा

भाभी - था तो बहुत अजीब. पहले मुझे लगा कितना गलत कर गए तुम अचानक से..

लेकिन

मई - लेकिन क्या ??

भाभी - लेकिन तुमने तो अलग hi कर डाला. न चूमा न चूसा.. बास महसूस करने लगे. पहले मई घबराई.. हिली.. तुमसे अलग होने के लिए मचलने लगी. फर मई भी वही करने लगी. तुम्हारी तरह ऑंखें बंद करती हुई लम्हों को महसूस करने लगी..

मई - तो फिर कैसा पाया आप ने लम्हों को

भाभी - बहुत पायरा.. बहुत सुकून बख्श.. बहुत रंगों भरा.. बहुत hi कमल का.. मई कैसे बताओं बाबू तुम्हे.. अब ऑंखें खोली हाँ तो सब पहले से भी ाचा ाचा लग रहा है

मई मुस्कुराता हुआ अपने होंठ भाभी के होंटो के करीब कर गया - तो फिरसे हो जाये एक बार

भाभी मुस्कुरा कर मेरे होंठ को हलके से चुम गई - लो हो गया. मैंने खुद से hi कर दिए.. अब खुश

मई है पड़ा - भाभी भी है पड़ी

मई - ाचा सुनिए.. हिम्मत तो आप को मिल hi चुकी है. अब आप की परेशानी का कोई बढ़िया सा सलूशन भी तलाश करना है. लेकिन उससे पहले आप को कुछ दिनों की मोहलत और चाहिए होगी

भाभी - हाँ बाबू. अभी भी मई खुद को तैयार नहीं कर सकीय हों

भाभी फिरसे नज़रें नीचे किये हुए बोली

मई - मेरी आँखों में देख कर यही बात कीजिये

भाभी कैंप गई - नहीं बाबू.. मई ये बात तेरी आँखों में देख कर नहीं बोल सकती

मई - नदीम भाई से और मोहलत पाने का राज़ भी इसी बात में छुपा है.

भाभी हैरान होकर मेरी आँखों में देखने लगी

मई - मई सही कह रहा हों. आप को मुझपर ट्रस्ट भी है और बेशुमार प्यार भी. मेरे प्यार ने आप को हिम्मत दी है. अब आप इतना खुल hi गई है तो अपनी साडी झिझक को मेरे लिए ख़तम कर दीजिये. बोलिये मेरी आँखों में देख कर बोलिये

भाभी - नहीं बोल पाउंगी

मैंने इस बार भाभी को दीवार के साथ लगा कर खड़ा कर दिए... भाभी अब मेरी आँखों में देख रही थी.. फिर मैंने भाभी के होंटो को देखा और भाभी का चेहरा पकड़ कर भाभी के ऊपर के नीचे के दोनों होंटो को बरी बरी थोड़ा थोड़ा कर चूसने लगा.. ये पुरे किश थी.. और किश करने के लिए मैंने भाभी की परमिशन नहीं मांगी थी..

भाभी मचल रही थी. छह रही थी मुझसे अलग हो जाये. अपने होंठ मेरे होंटो से दूर कर दे.. लेकिन नहीं कर पाई.. ज़ोर लगा कर अलग होना चाहती तो हो सकती थी. लेकिन ऐसा करती तो जैसे उसका मुझपर ट्रस्ट ख़तम हो जाता..

ज़यादा होंठ नहीं चूसे मैंने.. फिरसे भाभी को देखने लगा.. देवर से किश पर भाभी शर्म से लाल होने लगी थी

मई - भाभी आप ऐसे शर्मा क्यों रही हाँ. और ये आप के चेहरे का रंग लाल क्यों पद गया

भाभी लरज़ती हुई सर झुका कर बोली - बाबू.. एक तो मुझे ज़बरदस्ती किश करि तुमने.. ऊपर से पूछ रहे हो.. मेरी ऐसी हालत क्यों है

भाभी की सांस तेज़ चलने लगी थी. भाभी के मुम्मे फूल रहे थे. पाचक रहे थे.. नीचे हो रहे थे, ऊपर को उठ रहे थे.

मई - आप को गुसा नहीं आया. आप मुझे देवर समझ कर नहीं बाबू समझ कर बात कर रही हाँ.. अगर मई बाबू हों तो हमारा प्यार खालिस है. और होंटो को चूमना और चूसना किश तब होता. जब मई कुछ और सोच कर ऐसा करता तो.. लेकिन मई तो बाबू बनकर आप को हिम्मत देना छह रहा था. आप की आज की परेशानी को ख़तम करना छह रहा था. आप बाबू से ऐसे नहीं शर्मा सकती हाँ भाभी. किश अगर देवर का होता तो होंटो से होंठ मिलते हुए देवर का मोह भी लाल पद जाता.. क्या मैंने सही कहा

भाभी मेरी आँखों में मेरी बात के शुरू होते hi देखने लगी थी..

भाभी साँस ले कर रिलैक्स होती हुई बोली - सही कहा बाबू तुमने.. मई hi पागल हो गई थी. तुम्हे बाबू समझ कर देवर समझने लगी. क्या करूँ. इतनी जल्दी कुछ अलग हो जाता है. समझ भी नहीं आती. और दिमाग भी काम छोड़ने लगता है. ऊपर से शर्म भी मुझे तो आएगी hi न. मई कोई बेशरम लड़की थोड़ी न हों

मई - इस सब के होने पर दिल क्या कहता है

दिल की बात पर भाभी पहले जैसे चौंकी. फिर घोर करने लगी.. फिर बोली - बाबू.. ये बड़े मज़े में है

मई - मतलब इसे कुछ भी बुरा नहीं लगा

भाभी - नहीं लगा

मई - तो अब आप पहले मुझे किश कीजिये.. फिर मई आप को बताऊंगा. आप ने क्या करना है

भाभी - नहीं तुम कर लो.. लेकिन छोटी सी करना. नहीं तो मुझे फिर से श्रम आने लगेगी

मई - सॉरी. मैंने अपने हिस्से की किश कर दी.. अब आप की बरी है. परेशानी भी आप की hi है.. आप को अपनी परेशानी दूर करनी है तो मुझे किश करनी होगी. वर्ण मई वो बेथ रहा हों बीएड पर..

मैंने भाभी को छोड़ दिए.. मई बीएड पर जा बैठा.. और भाभी जी कमरे के फर्श पर कड़ी मुझे घूर कर देखने लगी..

सोच रही होंगी.. ये मुंडा भी कितना वखरा है.

 




चौदहवीं क़िस्त

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मई बड़ी बेपरवाही से बीएड पर जा बैठा. और भाभी की तेज़ नज़रें मुझे अपने चेहरे पर महसूस हो रही थी. फिर भाभी मेरे पास ा कर बेथ गई

भाभी - बाबू तुम मुझे पागल कर डोज. पता नहीं एक hi दिन में मेरी ज़िन्दगी में कैसा इन्किलाब आ गया है. मई एक शर्म वाली समझदार लड़की से बेशरम और बेवक़ूफ़ लड़की बन कर रह गई हों

मई - नहीं भाभी. न आप की शर्म मरी है और न hi आप की समझदारी की कोई कमी आई है. हाँ आप ये कह सकती हाँ. आप को दिल का रोग लग गया है. ऐसा रोग जो हर दिल को लग्न चाहिए. आप के दिल को रोग लग गया है तो ये बुरी बात तो नहीं हुई. बहुत अछि बात हुई है. अब ज़िन्दगी में कभी आप को कोई ग़म मेरे रहते छू भी नहीं सकेगा

भाभी - सही कहा तुमने बाबू. मेरे दिल को रोग लगता जा रहा है. लेकिन मई कोई अनछुई या कुंवारी लड़की नहीं हों. शादी शुदा हों. एक शोहर है मेरा. मई उससे प्यार करती हों. लेकिन तुमसे भी से---

मैंने भाभी को देखा. भाभी गॉड में दोनों हथु रखे उन्हें घूर रही थी. भाभी के चेहरे पर खिंचाव और माथे पर लकीरें उभर आई थी

मई - क्या मुझसे प्यार दिल में जनम ले लेने से आप दुःख में आ गई हाँ

भाभी - नहीं. मैं ऐसा नहीं कहूँगी. लेकिन ये भी सच है. एक मैरिड लेडी अपने शोहर के शिव किसी और से प्यार नहीं कर सकती. कर सकती है तो सिर्फ और सिर्फ अपने शोहर से. शोहर के शिव किसी और से नहीं

मई - शोहर से प्यार कर सकती हाँ आप.. लेकिन दिल को रोग लगाने वाला प्यार तो हो जाता है. क्या मैंने कहा था आप के दिल को मेरे लिए रोगी बन जाये.

भाभी - इसमें तुम्हारा कोई कसूर नहीं है बाबू. मेरा hi दिल मेरे काबू में नहीं रहा

मई - तो फिर सुन लें न दिल की बात

भाभी - कैसे सुन लून..

भाभी आँखों में नमी ला कर बोली - क्या ये इतना hi आसान है. ये नदीम से बेवफाई नहीं तो और क्या है

मई - क्या नदीम भाई और मेरी रगों में अलग अलग खून दौड़ रहा है

भाभी - फिर तो dad(mere पापा) मेरे भाइयों और मेरे डैड की रगों में भी वही खून दौड़ रहा है. जो मेरी रगों में दौड़ रहा है. क्या मई

भाभी और भी ज़यादा दुःख की लपेट में आ गई थी

मई भाभी के चेहरे को थाम कर अपनी साइड करता हुआ बोलै - क्या कोई मेरे जितना आप के दिल के करीब आ सका है. क्या मैंने कभी कहा. मई नदीम भाई का हक़ पाना चाहता हों.

भाभी - नहीं. तुम ने नहीं कहा. तुम कहते भी तो मई तुम्हारी नहीं सुनती. मई ऐसा सोच भी नहीं सकती. लेकिन ये दिल

भाभी अपने दिल पर हाथ रख गई

भाभी - ये दिल अजब ढंग से धड़कने लगा है बाबू. जब तुम्हे बाबू बनाया था तब तो मेरे दिल की किसी धड़कन में ऐसा साज़ नहीं बजा था. फिर पता नहीं क्यों हर गुज़रते पल के साथ साडी धड़कनें तुम्हारी hi पुकार करने लगी हाँ

मई - मैंने ऐसा तो नहीं चाहा था भाभी. हाँ लेकिन मई उम्र भर के लिए आप का एक मुहाफ़िज़ बनकर रहना चाहता था. वर्ण मेरे दिल में आप के लिए जितनी रेस्पेक्ट है. उतनी hi आप से प्यार करने की छह भी है

भाभी - क्या नदीम जैसा प्यार ??

भाभी कनपटी हुई आवाज़ में बोली - जब देवर था तो ऐसा कुछ नहीं था. लेकिन अब

भाभी मेरे मोह पर हाथ रख गई - नहीं बाबू ऐसा न कहु

मई भाभी का हाथ अपने मोह से हटा कर बोलै - मेरी बात पूरी नहीं हुई है भाभी जी. भाभी जी क्या नदीम भाई आप के दिल पर हुकूमत करने में कामयाब हो चुके हाँ

भाभी खामोश रही

मई - फिर कैसे अचानक से मई आप के दिल पर हुकूमत करने लगा. वो भी कुछ hi घंटों में.. नहीं भाभी.. बात घंटों की नहीं है. अक्सर हमारे अंदर किसी की शख्सियत गहराई तक उतर जाती है. जिसे हम समझ नहीं पते हाँ. फिर अचानक से वो शख्सियत आप की नस नस उतरती हुई पुरे दिल पर ग़ालिब आती हुई महसूस होने लगती है.. तब हम समझते हाँ. ऐसा अचानक से हुआ है. नहीं.. ऐसा धीरे धीरे होता है. मई आप के दिल में न होता तो आप कभी भी मुझे बाबू तस्लीम न करती. जितना फैसला पहले से था. उतना hi बाद में भी रहता. भाभी आप बहुत ख़ूबसूरत हाँ. इतनी कह मुक़ाबला हुसैन में आप को खड़ा कर दिए जाए तो बिला शुबा आप hi विनर होंगी

भाभी की आँखों में चमक आई

मई - आप को देख कर मई बहुत खुश हुआ था. लेकिन कभी नहीं सोचा था. आप कुछ और तरह से मेरे दिल में उतर जाएंगी. लेकिन भाभी दिल में जो हो. वही ज़ुबान पर हो. एक्ट में हो. ज़रूरी नहीं है. अआप खुद धयान दें तो आप को पता चलेगा. अब तक मई आप के उतना hi करीब आया हों. जितना आप आना चाहती हाँ. मई आप के दिल की हालत को समझ कर आप के करीब आ रहा हों. अपना प्यार बढ़ा रहा हों. एक दिन नहीं एक महीना नहीं एक साल नहीं मई पूरी एक उम्र आप के लिए सर्फ़ कर दूंगा. मई तो बास आप से ऐसा प्यार करता हों. आप को खुश रखने के लिए शिव मेरा कोई और मतलब है hi नहीं.. फिर से पुराणी बात दोहराऊंगा भाभी जी.. दिल में ऐसी फीलिंग्स जनम लेने के बाद कोई भी लड़के जिस लड़की को दिल से इतना ज़यादा चाहता हो. वो लड़की आप के जितनी करीब आ जाये तो फिर जिस्म बगावत कर दिए करता है..... क्या मेरे जिस्म ने आप के जिस्म को छूओ कर बगावत की है

भाभी मेरी बात धयान से सुनती हुई बोली - नहीं.. एहि एक बात hi बहुत बढ़कर है बाबू... इसी बात के चलते भी मई तुम्हे अपने दिल में अंदर hi अंदर घुसने से रोक नहीं प् रही हों

मई - वही तो.. भाभी हमारा ताल्लुक़ दिल से है. जिस्म से होता तो आप भी बेहया बन जाती और मई आज के ज़माने का आवारा लड़का बनकर मोके का फायदा उठा कर बिना देर किये आप के मेरे लिए प्यार का फायदा कबका उठा चूका होता.. क्या आप के होंटो पर मैंने जब होंठ रखे थे. तब क्या आप होश में थी. तब क्या आप के दिल की हर एक धड़कन में मई नहीं था. खून की गर्दिश के साथ साथ क्या मई आप के पुरे जिस्म में ट्रेवल नहीं कर रहा था

भाभी ने एक लम्बी सांस लेकर छोड़ी. फिर बोली - तुम हर वो बात समझ लेते हो जो मेरे दिल में होती है बाबू.. बाबू आअज से पहले एक भी लम्हा मेरी ज़िन्दगी में ऐसा नहीं आया. जब मुझे किसी ने इतना समझा हो.. मेरे दिल की पुकार को तुम हर्फ़ बा हर्फ़ दोहरा कर सबत कर रहे हो.. तुम सच्चे हो. तुम्हारा मेरे लिए प्यार सच्चा है. लेकिन बात फिर वही आ जाती है. तुम बाबू हो गए हो मेरे लिए. लेकिन तुम मेरे देवर भी हो. मेरे शोहर के भाई भी हो.

मई - और हमेशा रहूँगा. आप का भाई बनकर रहूँगा हमेशा आप के साथ. आप का बाबू आप का सच्चा दोस्त और मुहाफ़िज़ बनकर रहूँगा. ऐसा कह कभी कोई न बन सका हो.

भाभी - मुझे यकीन है तुमपर बाबू

मई - फिर परेशानी क्या है आप को ??

भाभी अपने माथे को सहलाती हुई बोली - परेशानी तुमसे नहीं.. मुझे खुद से होगी.

मई - वो कैसे

भाभी खफ़गी भरी नज़रों से मुझे देखती हुई बोली - क्या अब तुम मेरे दिल की बात नहीं समझ रहे हो.

मई है पड़ा - फिर भाभी को बड़ी गरम जोशी के साथ अपने साथ लिप्त लिया. भाभी मेरी ने गहरी नज़र से मेरी आँखों में देखा. फिर अपना सर मेरे कंधे पर रखती हुई सुकून में आने लगी. भाभी ने मेरे प्यार को पूरी तरह से न सही लेकिन क़ुबूल तो कर लिया था. मेरी आशिक़ों वाली दिल से करि गई बातें भाभी के दिल पर बार बार दस्तक दे रही थी. और भाभी के दिल का दरवाज़ा जो मेरे लिए खुल था, भाभी अपने दिल का दरवाज़ा खोल कर मेरे बार बार वेलकम कर रही थी.

मई - तो अब करेंगी मुझे किश

भाभी शर्म से कैंप उठी

मई - बोलिये न

भाभी ने ऑंखें और मेरी आँखों से जोड़ दी. फिर ऑंखें बंद करती मेरे होंटो के साथ अपने होंठ मिलाने लगी. भाभी लरज़ रही थी. शर्म से पानी पानी हो रही थी. लेकिन अपने होंटो को मेरे होंटो के पास आने से नहीं रोक रही थी. उनके भी दिल की छह थी. दिल पर उनका अब कोई काबू नहीं रहा था. दिल के हथु मजबूर होकर भाभी अपने होंठ मेरे होंटो के साथ मिला कर थम गई.

भाभी ने मेरे होंटो को नहीं चूमा, न hi चूसा तो मैंने भाभी का एक होंठ चूस डाला. भाभी अपने होंठ हटा कर शर्म से रंग बदल चुकी आँखों के साथ मुझे देखा. फिर शर्मा कर खफ़गी से बोली

भाभी - मुझे पहले तेरे होंटो को महसूस करने दे बाबू

मैंने ऑंखें बंद कर ली. भाभी ने फिरसे मेरे होंटो के साथ अपने होंठ जोड़ दिए. देर तक मेरे होंटो पर अपने होंठ रखे वो दिल की गहराइयों में मुझे और भी उतारने लगी. अपने खून के साथ मेरी सांसों की खुशबु मिक्स करने लगी. अब भाभी छह कर भी कभी मेरी किसी बात से इंकार नहीं कर सकती थी. क्यूंकि भाभी ने खुद से अपने होंठ मेरे होंटो पर धरे थे. और एहि बात मेरी जीत सबत हुई थी.

भाभी मदहोश हुई पुरसुकून हुई तो मेरे ऊपर वाले होंठ को धीरे धीरे चूसने लगी. मैंने भाभी को उसके दिल की करने दी. बात एक hi थी. मई चूसूं या भाभी. रास तो दोनों के मोह में घुल रहा था. और भाभी ऐसी मदहोश हुई. मेरे सर पर हाथ रखती धीरे धीरे जोश में आने लगी. भाभी के हाथ मेरे सर पर मेरी गर्दन पर मेरी पीठ पर चलने लगे.

फिर सांस उखाड़ने को हुई तो भाभी ने अपने होंठ अलग कर दिए. मेरी आँखों में नशीली निगाह से देखा.. फिर शर्मा कर मेरे कंधे पर सर रख तेज़ तेज़ सांस लेने लगी

भाभी - अब खुश हो अपनी मनवा कर

मई - आप ने अपने दिल की करि है. मुझे ख़ुशी कहाँ हुई होगी भला

भाभी ने झटके में सर उठा कर मुझे देखा. मेरी आँखों में शरारत देख कर मेरे सीने पर मुक्का मार गई

भाभी - बाबू तुम बड़े वो हो ?? मई मर जाती लेकिन कभी तुम्हारे साथ ऐसा कुछ न करती. लेकिन तुम ने मुझे मजबूर कर दिए

मई - मैंने मजबूर किया या आप के दिल ने

भाभी - मेरे दिल को वरग़लाया भी तो तुम्ही ने hi है

मई - ाचा अब सब छोड़ें. हम अपनी बातें बाद में करें. अब आप की परेशानी पर थोड़ी सी बहस कर लें

भाभी को परेशानी याद आई तो माहौल hi बदल गया. भाभी के चेहरे पर फ़िक्र की लकीरें उभर आई

मई - भाभी आप उम्र भर के लिए नदीम भाई के नाम लिखी जा चुकी हाँ. हमारा जो भी रिलेशन है. वो अकेले में रहेगा

भाभी - एहि तो मई भी तुमसे कहना चाहती हों. मई जितनी भी तुम्हारे साथ खुल गई हो. लेकिन मेरी शर्म वही है बाबू. मई अब भी अपनी तरफ उठी ऊँगली बर्दाश्त नहीं क्र सकती. जान से हर जाउंगी अगर कभी कुछ ऐसा वैसा हुआ तो

मई - मई हों ना आपके साथ. कुछ गलत नहीं होने दूंगा. मई हमेशा आप को वही रेस्पेक्ट देता रहूँगा. जो रोज़ इ ावल से मेरे दिल में आप के लिए है.

भाभी - मुझे भी तुमसे एहि उम्मीद है बाबू. अब बताओ मई नदीम से टाइम कैसे बढ़वाऊं.

मई - भाभी हम सब अनमोल प्यार के रिश्ते में बंधे हुए हाँ. नदीम भाई आप के शोहर हाँ. और उम्र भर रहेंगे. कभी भी आप उनसे अलग होने की सोच भी नहीं सकती

भाभी - मर कर भी नहीं. एक लड़की एक बार जिसके नाम लिख दी गई हो. आखरी सांस भी फिर वो उसी के साये में गुज़र देती है. और फिर हमारा खंडन. नहीं मई नदीम से अलग होनी की सोच भी नहीं सकती. मेरे दिल में उसके लिए तुम्हारे जितना प्यार नहीं है. लेकिन है तो सही. वो मेरे शोहर हाँ और मई उन्हें उनके सरे हक़ आखरी सांड तक देती रहूंगी.. लेकिन बाबू तुम्हारे इतने करीब आ कर मैंने नदीम को धोका भी तो दे दिए है न

मई - आप दिल की बात करें.. आप का दिल क्या कहता है

भाभी - दिल तो कहता है. नदीम शोहर है तो शोहर को शोहर का दर्जा दो. दिल में जो बास गया है. उसे अब तुम निकल नहीं सकती हो. इसलिए शोहर की भी सुनो और दिल की भी

मई - तो फिर बात साफ़ हो गई. आप के दिल में नदीम भाई के लिए पहले जितना सब कुछ है.. लेकिन मई चाहता हों. आप नदीम भाई के लिए अपने दिल में और जगा पैदा करें

भाभी - समझाओ

मई - एक बीवी का सब कुछ उसके शोहर का होता है. वो जैसे चाहता है. अपनी बीवी का सब कुछ प् सकता है. फिर बीवी को ज़यादा शर्म में रह कर शोहर वो सब नहीं देती. जो उसके शोहर को चाहिए होता है

भाभी - सब कुछ तो दे चुकी हों मई. जो नहीं दे सकीय. नदीम उसके पीछे भी पड़ा हुआ है

भाभी को फिरसे शर्म आई.

मई - तो आप एक काम करिये

भाभी - कैसा काम

मई - आप भाई के साथ मेरे तरह खुल जाएँ. हम पठानों की लड़कियां शोहर को प्यार करते देख खामोश रहती हाँ. लेकिन आप खुल जाइये. साडी कमान अपने हाथ में ले लीजिये.. रात नदीम भाई अपनी मन मणि करें तो आप

फिर खामोश हो गया.

भाभी - रुक क्यों गए.. आगे बोलो

मई - भाभी.. मेरी एक बात का जवाब देंगी आप

भाभी - हाँ दूंगी... तुम पूछो

मई - एक औरत के कितने रूप होते हाँ

भाभी - ये कैसा सवाल है

मई - आप जवाब तो दें

भाभी - मर्द के भी तो कई रूप होते हाँ. जैसे तुम्हारे..

मई मुस्कुरा पड़ा.. भाभी भी मुस्कुरा पड़ी

मई - एक औरत के हज़ारों रूप होते हाँ... आप भी कई रूप अख्तियार कर सकती है.. हम बच्चे होते हाँ तो हमारा रूप मासूमाना होता है. फिर ज़माने की उंच नीच देखते हुए हमारे रूप में चेंज आने लगता है. हमारी ज़िन्दगी में कोई इंसिडेंट अचानक से और या क़ाबिल इ यकीन ा जाता है. फिर हमारा के नया रूप सामना आता है. ाचा भी और बुरा भी. जैसे हम लड़ने पर ए तो हम बहादुर बन जाते हाँ. प्यार करने पर आये तो मई बाबू बन जाते हाँ. खंडन में किसी की इज़्ज़त पर खतरा बने तो हम आग बन जाते हाँ.. ऐसे hi आप भी बहुत कुछ बन सकती हाँ. आप मेरे लिए प्यार की देवी बन गई हाँ. नदीम भाई के लिए भी बन जाइये.. उससे ये होगा. कभी आप के दिल में गिल्ट जैसा कुछ नहीं आएगा. आप सोचेंगी. आप ने जितना प्यार नदीम भाई का हक़ बनता था.. उससे भी बढ़कर उसे दे दिए है. यौन नदीम भाई भी खुश हो जायेंगे. भाभी जी आज का ज़माना थोड़ा सा नहीं बहुत ज़यादा फ़ास्ट चल रहा है. हम पठानों में लड़के तो ज़यादा फ़ास्ट चल रहे हाँ. लेकिन लड़कियां नहीं. वो शादी के बाद भी शर्म की ारः बना कर शोहर का प्यार पाते हुए ख़ामोशी रहती हाँ.. आप खुल जाइये भाभी जी. मई जनता हों आप के खुलने पर नदीम भाई बहुत खुश होंगे. वो आप के पीछे हाथ धो कर पड़े हाँ.. इसका मतलब है वो ज़माने के हिसाब से आप के साथ प्यार करना चाहते हाँ.. आप भी नदीम के जितना खुल जाइये.. उन्हें प्यार दीजिये. अपनी मोहब्बत की गर्मी एक शोहर परास्त बीवी बनकर उनकी राग राग में उतार दीजिये.. मुझे यकीन है.. आप एक बार क्या हज़ार बार भी नदीम भाई को अपनी अदाएं दिखा कर तरखा देंगी तो भी नदीम भाई आप का दिल दुखने की सोच भी नहीं सकेंगे. आप की मर्ज़ी के बिना आप से प्यार नहीं कर सकेंगे.. ऐसे आप नदीम भाई के दिल में उतर जाइये..

और एक औरत जो आप के जैसी पायरी और समझदार हो.. उसके लिए तो नदीम भाई को अपने कण्ट्रोल में करना चुटकी बजने जितना मुश्किल हो जाएगा.. बास आज hi की hi रात से सब अपने कण्ट्रोल में ले लीजिये. नदीम भाई को अपने प्यार की गर्मी और शिद्दत से मुतारफ करवा दीजिये.. फिर सब माहौल कुछ ठंडा पड़ने लगे.. उनसे 2 4 दिनों का और टाइम मांग लीजिये.. बास इतना सा hi काम है

भाभी पूरी तवज्जु से मेरी बात सुन रही थी. मई भाभी नदीम भाई के साथ सेक्स की कमान अपने हाथ में लेने को बोल रहा था. पहले अगर नदीम भाई भाभी के ऊपर चढ़ कर भाभी को छोड़ा करते थे.. मेरे ढके छुपे लफ़्ज़ों में भाभी ने जान लिए था. मई उनसे क्या कह रहा हो.. एहि कह. नदीम भाई आप पर चढ़ें उससे पहले hi आप उसपर चढ़ जाएँ.. और खुल कर प्यार करें..

ये ऐसी बात थी.. भाभी के चेहरे पर एक रंग आ रहा था. एक जा रहा था.. शर्म की कसरत मुझे भाभी के चेहरे पर आँखों में देखने को मिल रही थी..

फिर मुझे कुछ याद आया - हाँ एक बात और दिल में आयी है

भाभी बोली नहीं. लेकिन शर्मीली निगाह उठा कर मेरी आँखों में देख कर फिरसे झुका गई

मई - आप नदीम भाई से कह दीजियेगा.. जिस्म को सुन्न करने वाली क्रीम मंगवा दीजियेगा

भाभी शर्म से कैंप उठी - मई...

भाभी के चेहरे पर शबनम के कतरे चमकने लगे - मई.. मई कैसे कह सकती हों ऐसी कोई बात.. वो पूछें तो मई क्या कहूँगी.. मुझे कैसे पता है. कोई सुन्न करने वाली क्रीम भी होती है

वैसे भाभी सब समझ गई थी

मई - कोण नहीं जनता.. किसी को चोट लग जाए तो टंकी लगाने से पहले इंजेक्शन लगा कर सुन्न करते हाँ.. आप भी ऐसी hi बात बोल दीजियेगा..

भाभी - मुझे शर्म आएगी

मई - इसका मतलब है.. आप हार जाना चाहती हाँ.. मेरा आप को इतना प्यार देने का नतीजा क्या निकला. अरे आप को तो फूलन देवी बन जाना चाहिए..

भाभी है पड़ी

मई - बस्स्स ऐसे hi हस्ते हस्ते सब अपने कण्ट्रोल में ले लीजिये.. अब एक किश करते हाँ.. आप को बहुत देर हो गई है.. कोई भी ा सकता है

भाभी को टाइम का अंदाज़ा हुआ तो घबरा कर उठ कड़ी हुई

मई भी उठा और भाभी को अपने गले से लगा कर भाभी के नक् को चुम लिया

मई - वैसे आप के जिस्म की खुशबु मेरी नस नस में भी उतर चुकी है

इतना बोल कर भाभी को और शर्माने का मौका न देते हुए मैंने भाभी को किश करनी शुरू कर दी..

कुछ सेकण्ड्स के बाद भाभी भी मुझे किश करने लगी. और इस बार हमारे दिल सही मनो में मिल रहे थे.

हमने ज़यादा देर किश नहीं की. अलग हो गए.. भाभी कमरे से जाने लगी

मई - तो मेरी प्यारी भाभी जान. आज रात का विनर कोण होगा

भाभी जी स्माइल करती हुई बोली - बाबू की भाभी.. और हस्ती हुई कमरे से निकल गई..

मई बीएड पर धप्प से गिर पड़ा..

मई बड़ा हैरान था.. कितनी जल्दी सरे मरहले सर हो रहे थे. मई तो समझता था. मुझे बड़े पापड़ बेलने पड़ेंगे.. अम्मी जान, दादी जान और भाभी जी सबसे हार्ड टारगेट थी मेरे लिए.. लेकिन अम्मी जान और भाभी जी तो सबसे आसान टारगेट सबत हुई थी

क्या मेरे लिए हर टारगेट बहुत hi आसान सबत होगा.. मई इस अंदाज़ में सोचने लगा..

 




पन्दरहवीं क़िस्त

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भाभी ने कमल कर दिखाया था. भाभी का फ्रेश चेहरा देख नदीम भाई बड़े हैरान हुए. वही वो खुश भी हो गए. आज वो भाभी की गांड की सील खोलने वाले थे. महीनो से वो भाभी के पीछे पड़े हुए थे. लेकिन भाभी थी कह मान के hi नहीं दे रही थी. अपनी गांड पर नदीम भाई के लुंड को रखने hi नहीं दे रही थी.

आखिर नदीम भाई ने तंग ा कर भाभी को अल्टीमेटम दे दिए था. दिए गए 7 दिनों तक भाभी डिप्रेस्ड रही. नदीम भाई को लगा उन्हें ज़बरदस्ती hi अपनी बीवी सराह की गांड मारनी पड़ेगी. जब गांड खुल जायेगी. सराह का डर भी चला जाएगा. लेकिन आज वो फ्रेश दिखाई दी तो नदीम भाई की ख़ुशी का कोई ठिकाना नहीं था. जो चीज़ पार्टनर की रज़ामंदी से मिले. उसका मज़ा hi अलग होता है.

सोने के लिए जब दोनों कमरे में पोहंचे. तो दूर को बड़ी बेसब्री से लॉक करने के बाद नदीम भाई ने सराह भाभी को दबोच लिया. अपनी बेपनाह ख़ुशी का इज़हार करने लगे. भाभी को किश करने लगे. तब वो हैरान होकर भाभी को छोड़ कर अलग खड़े हो गए. जब सराह भाभी का जोश देखने को मिला

नदीम - सराह.... ये तुम

सराह भाभी मुस्कुरा कर नदीम के चेहरे को थाम कर किश करने लगी. किश करने के बाद बोली

भाभी - नदीम मई आज के मोडरें ज़माने में साँसें ले रही हों. उसके बावजूद भी मई आज तक तुम्हारे साथ प्यार तुम्हारे हिसाब से नहीं कर सकीय.

हैरत के मरे नदीम खाई का मोह खुल गया.

सराह भाभी के होंटो पर ऐसी मुस्कान उभरी हुई थी. जो नदीम भाई ने आज से पहले कभी नहीं देखि थी. भाभी नदीम भाई को हैरान छोड़ आगे बढ़ी और नदीम भाई से कमान अपने हाथ में ले ली. वो बीवी थी. शोहर प्यार दे सकता है तो बीवी तो फिरसे भी वफ़ा की प्यार की देवी होती है. प्यार करने में जिसका कोई सनी नहीं है. अब तो सराह भाभी के दिल में प्यार की रुत जग चुकी थी. उनका दिल झूम उठा था. मई नामहरम था. देवर था. मेरे साथ वो इतना खुल कर प्यार करने लगी थी. नदीम से प्यार करने का तो उसे परमिट मिला हुआ था. कैसे पीछे रहती.

नदीम भाई के साथ वो बीएड पर पोहंची. और ऐसी शिद्दत का मुज़ाहिरा करने लगी. ऐसे जोश के साथ नदीम भाई से लिपट कर किश करने लगी. नदीम भाई पागल हो गए थे. आज तक वही खुल कर प्यार किआ करते थे. और सराह भाभी मशरकी औरत की शर्म के साथ उनका साथ दिए करती थी. आज भी भाभी की शर्म उनकी आँखों से झलक रही थी. लेकिन प्यार करने में मामले में भाभी ने ज़रा भी कंजूसी नहीं दिखाई.. दोनों जल्द hi बेलिबास हुए और फिर नदीम भाई से पहले hi भाभी नदीम भाई के ऊपर आई और नदीम भाई का नाग जो आज कुछ ज़यादा hi फुँफना रहा था. उसे अपनी फुद्दी में लिए छोड़ने लगी.

यहाँ भाभी हर मामले में नदीम भाई से आगे रही. औरत तो वो होती है. जो अगर अपनी अदाएं दिखने पर आ जाये तो मर्द बेचारे दिल थम कर रह जाते हाँ. यहाँ तो मियां बीवी के प्यार का खेल चल रहा था. निकाह जैसे पाक रिश्ते में बंधे हुए थे दोनों. उम्र भर के साथी थी. आखरी सांस तक साथ रहने वाले थे. नदीम भाई को अपनी निस्फ़ बेहतर से वलियाना प्यार मिला तो दम बखुद रह गए.. वो होश खोते चले गए..

होश तक आया. जब उनके लुंड से मणि निकल कर भाभी की फ़ुदद्दी में पिछकारियाँ छोड़ने लगा. भाभी भी झड़ती हुई उनके ऊपर ढेर हो गई..

उसके बाद नदीम भाई के पूछने पर - ऐसा कमल का चेंज कैसे आया सराह तुममे

वहां भाभी ने नदीम भाई को बारिश वाले दिन का किस्सा सुनाया.. कैसे किन्ज़ा और माहिरा एपीआई के कहने पर पहले मुझे चांटा और फिर गाल चूमने पर मजबूर किआ गया था. नदीम भाई ये सुनकर हैरान हुए. फिर जब भाभी ने मेरे प्यार की शिद्दत और अंदाज़ का बताया तो वो खुश भी हुए और हैरान भी हुए.. फिर मेरा उनकी परेशानी को जान्ने के लिए हाथ धो कर उनके पीछे पद जाना.. आज का कैसे मई उसे बहार ले गया. वापिस ले कर आया.. छत पर जो मैंने कहा... "मुझे दिल से बाबू मान लें" ये बताया.. नहीं बातें बताने वाली नहीं थी. वो भाभी गोल कर गई..

एक तो मेरा प्यार प् कर, दूसरे एक राउंड सेक्स वो भी अपनी मर्ज़ी से इतना खुलकर कर लेने से भाभी का कॉन्फिडेंस लेवल आसमान की बुलंदियों को छूने लगा था. उनका दिमाग पहले hi काम नहीं था. आज खूब चलने लगा. वो नदीम भाई को मेरा उनके सर के साथ सर को जोड़ने वाला तजुर्बा बताया.. वहां भाभी ने अलग hi बातें बताई नदीम भाई को.

नदीम भाई के लिए वो रत हैरान कर देने वाली थी. एक तो उनकी बीवी उनके साथ इतनी खुल गई थी. दूसरी उनकी बीवी उनके भाई यानि के मेरे गन गए रही थी. मई आवारा टाइप होता तो नदीम भाई ज़रूर मंद कर जाते. अपनी बीवी के मोह से मेरे लिए इतनी तारीफ वो हज़म नहीं कर पते. एक तो नदीम भाई मुझसे बहुत प्यार करते थे. दूसरे मेरा इन दिनों खुल कर सामने आना एक नए रूप को जनम दे गया था. और सब की तरह नदीम भाई को भी मेरा ये रूप पसंद आया था

नदीम भाई के पूछने पर भाभी ने बता - मैंने बाबू को अपनी परेशानी तो नहीं बताई.. लेकिन जब बाबू ने कहा. मुझे बाबू कह आपको मिलेगा ऐसा यकीन और इतनी ताक़त. आप हर परेशानी से लड़ना सीख लेंगी. प्यार.. अपणु के लिए दिल में प्यार हर परेशानी से लड़ने में ताक़त देता है नदीम.... मैंने बाबू को अपनी परेशानी तो नहीं बताई. लेकिन बाबू के सर के साथ सर जोड़ कर मैंने ये जान लिया.. मई ऐसे hi तुमसे भाग रही थी. तुमसे डर रही थी.. भला जिसके साथ पूरी ज़िन्दगी जीनी हो.. उससे काहे का डर... फिर तुम्हारा प्यार मुझे भी तो पूरा का पूरा पाना है. जैसे तुम कहते हो. मई इंकार कैसे कर सकती हों. प्यार जिस रस्ते से भी किया जाए. प्यार hi होता है. हाँ बस्स्स मई एक नफ़्सियति उलझन में फास्सी हुई थी.. उससे निकलने के लिए मैंने अपने दिल को मज़बूत क्र लिए.. वर्ण तुम तो मुझे ऐसे भंवर में पिछले 7 दिनों से फंसाये हुए थे. मई छह कर भी उससे निकल नहीं पाई थी

नदीम भाई ने सराह भाभी की गांड को ऊँगली से कुरेद दिए.. शरारत करते हुए अपने लुंड को मसल कर खड़ा करते हुए बोले - तो फिर.. ाचा हुआ तुमने खुद को त्यार कर लिए.. अब दूसरा राउंड पीछे के रस्ते हो जाए

भाभी बिदकी नहीं... बड़ी ऐडा के साथ नदीम भाई के सीने पर हाथ फेरती हुई बोली

भाभी - मई त्यार तो हों नदीम. लेकिन मुझे अभी कुछ रोज़ और चाहिए

वही किया भाभी ने.. एक तो खुल कर प्यार दिए नदीम भाई को.. अब एक ऐडा और भरोसे के साथ बोली तो नदीम भाई भाभी का हाथ चूमते हुए बोले

नदीम - कसम से तुम रोज़ hi ऐसी बनकर मुझे मिलो.. ऐसी अदाओं तुम रोज़ hi दिखाओ तो 5 दिन क्याआ.... मई तुम्हे पांच महीने भी दे सकता हों. कसम से यार आज की रात मेरी ज़िन्दगी की सबसे हसीं रात बन गई है. मई सोच भी नहीं सकता था सराह.. तुम इतनी भी कमाल की हो सकती हो. तुम्हारी कुर्बत में मैंने आज जो गर्म जोशी, प्यार की जो शिद्दत देखि.. आज से पहले कभी नहीं देखि

भाभी - नदीम... ये तो कुछ भी नहीं है.. मैं तो तुम्हारे प्यार में इतनी आगे निकल जाना चाहती हों.. जितना आगे निकल जाना तुम्हारे दिल की आरज़ू है

नदीम भाई मदहोश होते हुए बोले - क्या तुम मेरा वो चूस सकती हो

भाभी शर्म से नदीम भाई के सीने पर सर रख गई.

नदीम भाई है पड़े.. फिर बोले - देखो सारा.. मई गलत नहीं हों यार.. लेकिन आज तक ये आजम बात बन गई है. अब तुमने कहा खुल कर मेरे प्यार में आगे बढ़ना चाहती हो.. तो यार.. जैसे मई तुमसे खुल कर प्यार करता हों. तुम भी करो.. तुम्हे अजीब ज़रूर लगेगा.. लेकिन ट्रस्ट में.. तुम्हे बहुत मज़ा आएगा.. अजीब तो मुझे लग्न चाहिए चाटने हुए.. लेकिन मुझे देखो. मई कितने मज़े से चाटता हों.. तुम्हे तो अजीब hi लगेगा. कोई टास्ते नहीं आएगा.. लेकिन मज़ा ज़रूर आएगा

भाभी शर्म से लरज़ती हुई आवाज़ में बोली - इसी लिए तो कह रही हों नदीम.. मुझे और टाइम चाहिए.. ज़यादा नहीं लुंगी.. बास कुछ दिन.. 2 4 दिन या ज़यादा से ज़यादा भी एक वीक... फिर तुम्हारी हर आरज़ू पूरी होगी....

नदीम भाई जोश में आ गए.. उनका लुंड फिरसे खड़ा हो चूका था. इस बार वो भाभी को लिटा कर उनकी फुद्दी चाटने लगे. जहाँ कुछ देर पहले उनका लुंड घुसा हुआ था. अब उनकी ज़ुबान घुसी हुई थी. भाभी मोह से आठ ोूहः की आवाज़ निकलती नदीम भाई के सर पर दोनों हाथ रख गई

नदीम भाई का जोश और बढ़ा.. नदीम भाई ने भाभी के कहत्तैदों के नीचे हाथ डाले और ऊपर उठा कर भाभी की गांड चाटने लगे. भाभी मस्त होती चली गई..

फिरसे चुदाई शुरू हो गई.. फिर भाभी ने नदीम भाई से सुन्न करने वाली क्रीम का कह दिए. साथ hi ये भी कह दिए.. वो पहले खुद से ऊँगली दाल कर गांड को खुला करेगी.. तभी उनका डर पूरी तरह से जा पायेगा

नदीम भाई हसरत के साथ बोले - क्या मुझे दूसरी सील भी खोलने को नहीं मिलेगी

भाभी शर्म से लाल पड़ती हुई बोली - तुम hi तो खोलोगे नदीम.. मई तो बस अपना डर ख़तम करना चाहती हों. और ऊँगली से डर जायेगा. तुम्हारा हक़ सलामत रहेगा

नदीम - क्रीम मई कारखाने जाते हुए तुम्हे ला के देता जाऊँगा..

भाभी को मैंने क्रीम का बताया था तो भाभी खुद से hi बाकि की बात समझ गई थी.. वर्ण मैंने भाभी को उँगलियों वाली बात नहीं कही थी.. अब इतनी भी वो उल्लू नहीं थी..

अगली सुबह सराह भाभी का दमकता चेहरा देख मई खुश हो गया. मुझसे नज़र मिली तो शर्मा कर चेहरा फेर गई. सब थे तो मैंने भी भाभी को परेशान करना सही नहीं समझा. कॉलेज जाना था तो तयारी में लग गया..

नदीम मुझसे मिले.. तो ऐसे मिले.. जैसे पहली बार मिल रहे हों.. देर तक मेरे गले से लगे रहे

नदीम - चलो मेरे साथ लॉन में.. मुझे तुमसे कुछ बात करनी है. अभी नाश्ते में टाइम है

मई नदीम भाई के साथ लॉन वाले झूले के पास जा पोहंचा. वहां एक बार फिरसे नदीम भाई ने मुझे गले से लगा लिया..

नदीम - बाबू यार.. ये तुमने कुछ hi दिनों में घर में प्यार का जो नया माहौल बना दिए है न.. यार इसे हमेशा ऐसे hi रखना.. यार.. मई तेरा बड़ा भाई तो हों hi.. लेकिन हम दोस्त भी हाँ. दोस्त बनकर कभी ज़िन्दगी में कुछ भी मांग लेना मुझसे.. कभी इंकार नहीं करूँगा.. बास मेरी एक hi रिक्वेस्ट है.. प्यार को बढ़ाते hi जाना. कभी काम मत होने देना.. जब से तुम बदले हो. घर की फ़िज़ा बदल गई है. खुशहाल ज़िन्दगी तो हम सब पहले से hi जी रहे थे. लेकिन ये वाली ज़िन्दगी, इसका तो मई कभी तसव्वुर भी नहीं कर सकता था..

मई और नदीम भाई वहां खड़े कुछ देर बात करते रहे. मैंने भी कई बातें की.. फिर मस्ती करता हुआ बोलै..

मई - वो सब तो ठीक है भैया.. लेकिन अगर किसी दिन आप ने मुझे अचानक hi भाभी के गाल को चूमता हुआ देख लिया तो

नदीम भाई मेरे कंधे पर हाथ मारते हुए ज़ोर से है पड़े.. सरे के सरे दांत दिखाई देने लगे थे

नदीम - हाहाहा... मेरे hi मोह पर मेरी बीवी को चूमने की बात करते हो बेशरम... चल तू भी क्या याद करेगा... जा तुझे खुली छूट दी.. जा जब दिल करे चुम लेना अपनी भाभी के गालों को... मई कभी नहीं रोकूंगा

फिर वो भी फुल मस्ती में आते हुए एक दोस्त के जैसे राज़दारी के साथ धीरे से बोले

नदीम - लेकिन देखना.. उसके चेहरे के शिव कहीं और अपना हक़ न बना लेना.. यार तू जवान है और मई बुद्धा.. मुझे सराह जैसी कोई दूसरी नहीं मिलेगी.. तू पता नहीं क्या बनता जा रहा है. मई यकीन से कहता हों.. तेरे पीछे लड़कियों की लाइन लगी होगी.. देख यार.. मई तेरा बड़ा भाई हों.. मेरे लिए सराह को मेरा hi रहने देना.. तू अपने लिए कोई और ढूंढ लेना

ये नदीम भाई का नया रूप था.. कितने खुश थे नदीम भाई

मई भी हस्ता हुआ बोलै - भैया... मई अपनी तरफ से तो पूरी गारंटी देता हों.

लेकिन भाभी का मई कुछ कह नहीं सकता

नदीम भाई फिरसे हसे - फिर कोई टेंशन नहीं है.. तू तरय न करे तो सराह हमेशा मेरी hi रहेगी

मैंने नदीम भाई को गले से लगा लिया - सच में भाई.. हमारा प्यार अनमोल है

नदीम भाई इमोशनल हो गए.. और मेरी पीठ थपथपाने के बाद मेरे माथे को चूमते हुए बोले - ये सब तेरे दम से है.. वर्ण मेरे अंदर ऐसी कोई क्वालिटी नहीं है. बास इन खुशियों को कभी काम मत होने देना..

फिर नाश्ते के बाद हम घर से निकल पड़े.. नदीम भाई और डैड कारखाने के लिए बाकि हम तीनो भाई बहन कॉलेज और ऊनि के लिए....

कॉलेज से वापसी के बाद मई किन्ज़ा एपीआई और माहिरा एपीआई एक लौटे. घर पोहचते hi किन्ज़ा एपीआई ने माहिरा एपीआई को मेरा और अपना बैग थमा दिए.. फिर मुझे साथ लिए लॉन वाले झूले के पास जा पोहंची.


किन्ज़ा.....

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वहां मेरे साथ बेथ कर बोली - सुबह नदीम भाई और तुम इतनी ज़ोर ज़ोर से क्यों है रहे थे

मई किन्ज़ा एपीआई को देख कर - वो हमें आप के लिए एक लड़का पसंद ा गया था. उसी बायत पर हम है रहे थे

किन्ज़ा एपीआई कुछ और तवक़्क़ो कर रही थी.. मेरे भोंडे जवाब पर मेरे सर के बाल पकड़ कर खेंचने लगी

किन्ज़ा - बाबू के बच्चे सीढ़ी तरह बता

मई - अहहह क्या करती हो एपीआई आप.. एक लड़के के बाल लड़कियों के बालों से भी ज़यादा अहम होते हाँ. एहि तो एक ऐसी चीज़ है. जो उसे लड़कियों की नज़र में हीरो बनाते हाँ. आप लड़कियां तो सर पर दुपट्टे ओढ़ कर अपने गंजे सर को ढांप सकती हाँ.. हम बेचारे लड़के क्या करें

किन्ज़ा - तुम लड़कों के लिए बाजार के कई तरह की कैप्स अवेलेबल हाँ न.. सीढ़ी तरह बताते हो या.. मई लगाऊं तेरे एक

मैंने अपना गाल आगे कर दिए - होंटो से लगा दो ... एक नहीं हज़ार

किन्ज़ा - इतना शाखा न बन. मेरे होंठ इतने भी सस्ते नहीं हाँ समझा.. चल अब लाइन पे आ जा.. और तू कल से मुझसे दूर दूर क्यों है.. ये भी बता.. सराह भाभी में इतना बड़ा इन्किलाब कैसे आ गया

मई फिरसे शाखा बनता हुआ बोलै - मैंने भाभी से कह दिए.. नदीम भैया आप के लिए प्रीफेक्ट नहीं है.. आप ऐसा करें.. मेरे साथ एक सीक्रेट अफेयर चला लें. आप की ज़िन्दगी की साडी परेशानियां दूर हो जाएंगी.. भाभी ने कुछ देर सोचा.. फिर हाँ बोल दी.. बास इतनी सी बात है..

फिर मई चौंकता हुआ अपने मोह पर हाथ रख गया -- ओह्ह सहित... मई इतना बड़ा सीक्रेट आप के सामने कैसे खोल गया.

किन्ज़ा एपीआई मुझे घूर कर देखने लगी.. फिर खिलखिला कर हसने लगी.. हंसी से लूट पूत होती हुई मेरे ऊपर गिरने लगी.. माहिरा को भी भाभी और मेरा इतना क्लोज होना हज़म नहीं हो पाया था.. वो भी वही आ गई


माहिरा......

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करीब ा कर बोली - ये किस बात पर इतना हँसा जा रहा है भाई

मेरी दूसरी साइड आ कर वो बेथ गई.. मैंने दोनों के गिर्द अपनी दोनों बाहें लपेट कर दोनों को खुद में कास लिया.. फिर बरी बरी दोनों के गाल चुम लिए..

किन्ज़ा एपीआई हस्ती हुई माहिरा एपीआई से बोली - ये बाबू... हेहेहे.. माहिरा पता है ये बाबू क्या कह रहा है.. हेहेहे.. कह रहा है.. भाभी के साथ सीक्रेट अफेयर चलाएगा.. हेहेहे.. ये बन्दर के नसीब में इतनी हसीं लड़की बास भाभी hi हो सकती है. जैसी इसकी शकल है.. इसे तो कोई लूली लंगड़ी hi मिल जाए.. हम तो शुक्र पर शुक्र ऐडा करेंगी

माहिरा एपीआई भी हसने लगी.. फिर मेरे दोनों गालों पर हाथ फेरती हुई कुछ सीरियस होकर बोली

माहिरा - किन्ज़ा एपीआई. वैसे आप की बात पहले आप के मोह से निकलती तो सही मणि जाती. लेकिन अब तो इस बन्दर जैसी शकल वाले बाबू के दोनों गालों पर हमारा प्यार की कई मोहरें लग चुकी हाँ. अब इसे हम बन्दर तो कह सकती हाँ.. लेकिन ये ऐसा बन्दर बन गया है.. जिसकी खूबसूरती भले hi न बढ़ पाई हो.. लेकिन इसके नसीब ज़रूर जाग गए है.. भाभी तो भैया की हो गई.. कोई और ज़रूर इस बन्दर के नसीब में लिखी गई होगी.... आठ बेचारी के नसीब.. जो उसे बाबू के जैसा बन्दर मिलेगा

माहिरा एपीआई दुखी होती हुई बोली

इधर किन्ज़ा एपीआई अफ़सोस करती हुई बोली - माहिरा कितनी बड़ी गलती हो गई हमसे.. एक तो हमने इस बन्दर को प्यार दे कर सर पर चढ़ा लिए.. दूसरा अगर इसे हमसे हसीं लड़की मिल गई तो ये हमें उसकी खूबसूरती के किस्से सुना सुना कर hi हमारी नक् में दुम्म करता रहेगा

माहिरा - किन्ज़ा एपीआई ये भी तो हो सकता है न. ये जोरू का घुलम बन जाए. और---

मैं नक़ली घुसे से माहिरा एपीआई को देखने लगा.. वो उठ कर हस्ती हुई बोली - और--

मई उठ कर उसके पीछे भगा. वो भी मस्ती में आए भागने लगी - और तब हमारे सर शर्म से झुक जायेंगे

इधर किन्ज़ा एपीआई - ोये बाबू बन्दर.. भूल जा.. हम तुम्हारी शादी hi नहीं करेंगी.. न आएँगी हसीना.. और hi तू बनेगा जोरू का घुलम.. और न hi हमारी नक् कटेगी.

मई रुक कर किन्ज़ा एपीआई को देखने लगा.. वो मुझे ज़ुबान बहार निकल कर दिखने लगी. साथ hi दोनों हाथ कान के पीछे ले जा कर दोनों कानो को सीधा करके बड़ा करती हुई मुझे बन्दर बोलने लगी

मई वापिस पलटा और किन्ज़ा एपीआई की तरफ भगा. वो भी भाभी.. अब वो दोनों थी और मई अकेला.. एक के पीछे भागता तो दूसरी कुछ ऐसी hi बात बोल देती. दूसरी के पीछे भागता तो पहले वाली..

असल में उन दोनों का भी मेरे साथ मस्ती करने का मैं बन गया था. और ये मस्ती मेरी hi बख्शी हुई थी. वर्ण वो मेरे साथ इतनी कहाँ खुली हुई थी. मेरे कई दिनों के गालों पर पुरे चेहरे पर प्यार ने उनके अंदर रंग hi रंग भर दिए थे. वो बदलती जा रही थी. और मई एहि तो चाहता था. भाभी के बाद अम्मी जान, दादी जान, किन्ज़ा और माहिरा एपीआई सिर्फ और सिर्फ मुझसे प्यार करें.. हर तरह का प्यार.. वो जो अपने अपने शहरों के लिए दिल में था इनके.. वो भी मुझसे hi करें. अपने अपने शहरों से बास आम सी ज़िन्दगी जियें.. दिल वाली ज़िन्दगी सब की सब मेरे नाम लिख दें..

माहिरा एपीआई आज कुछ ज़यादा hi मूड में थी. वो किन्ज़ा एपीआई को छोड़ उनके पीछे पद गया. वो घबराई.. चीखती हुई घर के अंदर घुसी और भगति हुई ऊपर जाने लगी. फिर अपने कमरे में जा घुसी. कमरे का दूर बंद karti..usse पहले hi मई उसके पास पोहंच गया. बास आ गई थी चिडया मेरे हाथ में.. मैंने माहिरा एपीआई को पीछे से अपनी बहन में भर लिया.. और पहली बार था ये.. पहली बार माहिरा एपीआई की गांड पर मेरा अंडरवियर में कैद लुंड खूब अछि तरह से टच हो रहा था.

मई कुछ हैरान हुआ.. माहिरा एपीआई का जिस्म आम रूटीन से ज़यादा गरम था. इतना गर्म.. जितना या तो बुखार आने पर होता है या फिर..... जिस्म के अंदर का खास पानी निकलने के मूड में हो..

जितनी फ्रेश थी माहिरा एपीआई.. बुखार तो उसे हो नहीं सकता था. और मेरे जैसा हर फुद्दी की तोह में रहने वाला फिरोज.. कैसे अनजान रह जाता.. फ़ौरन hi मई सोच गया.. हर जवानी गरम होती है.. बार बार गरम होती है.. हर हफ्ते उसके अंदर तंदूर जितनी आग दाहक उठती है... कोई बुझाने वाला न हो तो जैसे मई लुंड हिला कर बुझा लिए करता था. ऐसे hi लड़कियां ऊँगली से अपनी फुद्दी मसल मसल कर अपनी आग बुझा लेती हाँ.. और मुझे तो आग बढ़ा कर खुद hi बुझानी थी. बुझाने का वक़्त अब मिले के न मिले.. लेकिन आग को और बढ़ा तो सकता था..

बस मेरा इरादा बदल गया.. फुल मस्ती के मूड में तो हम दोनों थे hi.. इसी मस्ती का फायदा hi क्यों न उठाओं मई... मई माहिरा एपीआई को ऐसे hi पीछे से हुग किये हुए अपने लुंड को उसकी गांड के साथ दबाउए हुए थोड़ा सा झुका गया..

माहिरा - हेहेहे.. बाबू छोड़ मुझे

मई - छोड़ने के लिए नहीं पकड़ा है.. क्या कहा था.. मई बन्दर हों

माहिरा - हेहेहे.. नहीं वो तो पहले कहा था.. बाद में तुम्हारे अचे नसीब की बात भी तो करि थी न मैंने

किन्ज़ा एपीआई भी गलत टाइम पर वहां एंट्री मार गई. उसे चाहिए था. वो देर से आती. ता कह मई कुछ आगे बढ़ सकता.. लेकिन खैर.. अब किन्ज़ा एपीआई के सामने hi कुछ करना गलत नहीं थी. जितने आगे हम बढ़ गए थे.. ये गलत होता तो माहिरा एपीआई कहती.. बास बाबू.. अब मुझे छोड़ दो. पकड़ना hi है तो आगे से पकड़ो.. लेकिन वो ऐसा कुछ नहीं बोली. मुझपर भरोसा था माहिरा एपीआई को. या मेरा ऐसे पीछे से पकड़ना उसे भा गया था. आखिर वो लड़की थी. अरमान तो मचलते hi होंगे उनके अंदर भी. कोई मर्द ऐसे पीछे से पकडे..

मैंने साइड से माहिरा एपीआई के गाल पर किश कर दी - आप के गाल पर इतने दिनों से ये बन्दर अपने होंटो से चुम रहा है.. फिर तो आप के लिए भी कोई बन्दर जैसा लड़का होना चाहिए

माहिरा - जाओ.. जाओ.. मई कितनी हसीं हों. तुम क्या जानो..

मई - हाहाहा. हसीन.. वो भी आप.. कभी घोर से आप ने आइना नहीं देखा होगा

फिर मई किन्ज़ा एपीआई को देख बोलै - यहाँ एक और भी है. जिसे---

किन्ज़ा एपीआई ने मेरी तरफ ऊँगली उठ दी - आगे न बोलना. वर्ण

मई - वर्ण

किन्ज़ा एपीआई ने दूर को देखा. फिर एकदम से दूर को अंदर से लॉक करती मेरे पीछे आई और मेरी गांड पर ज़ोर की चुटकी गात ली

मई एक हाथ छोड़ अपनी गांड को मसलने लगा.. माहिरा एपीआई एक हाथ अलग होते hi ज़ोर लगा कर मुझसे जुड़ा हो गई

मई आह्हः आआआआईई ोुह्ह्ह करता अपनी गांड मसलने लगा. दोनों ज़ोर ज़ोर से हसने लगी

किन्ज़ा - माहिरा.. क्या न आज इसकी हम दोनों मिलकर चटनी बना दें.. कसम से मुझे बचपन के दिन खूब याद आ रहे हाँ.. दिल छह रहा है. आज बाबू को एक बार फिरसे रुलाओ

और मई दिल हसने लगा.. करो करो. देर न करू.. इसी बहाने hi तो आज मुझे तुम दोनों के प्राइवेट पार्ट्स को छूने का मौका मिलेगा. एक की फुद्दी में ऊँगली करूँगा तो वो समझेगी.. उसकी बहन का hi हाथ गलती से लगा है..

मई - आप दोनों क्या समझती हो.. मेरे जैसे शेर पर भरी पद जाओगी.. भूल है आप की

किन्ज़ा - बीटा. हम लड़कियों को समझने में तुम लड़के हमेशा hi भूल कर जाते हो.. हम दिखने में कमज़ोर दिखाई देती हाँ.. लेकिन तुम्हारे जैसे को हम उँगलियों पर नचा दें

माहिरा - बिलकुल सही कहा एपीआई आपने. इस बन्दर की आज हम दोनों मिलकर चटनी बना hi दें

बहार से दादी की आवाज़ सुनाई दी - दरवाज़ा खोलो. हमें भी देखना है.. बाबू की चटनी कैसे बनती हो तुम दोनों.. बचपन के दिनों की यादें मई भी ताज़ा करना चाहती हों

बहार तो अम्मी जान और भाभी जान भी कड़ी थी

अम्मी जान - बाबू से मुझे बहुत प्यार है.. लेकिन तुम दोनों अगर सच में आज बाबू की चटनी बना दो.. तो मई तुम्हे कुछ नहीं कहूँगी

भाभी - लेकिन मुझे ऐतराज़ है.. आज मेरा मीठा खाने को दिल है.. चटनी फिर किसी दिन सही रहेगी

दादी - सराह बेटी तुम चुप रहो. तुम एक hi दिन में बाबू की हमायती बन कर हमारी मुखालिफ न बनो.. इस वक़्त बाबू का कोई भी हमायती हमारा मुखालिफ hi समझा जायेगा.. क्यों गुलशन

अम्मी जान हस्ती हुई - हेहेहे.. सही कहा अम्मी जान आप ने

माहिरा - तो फिर आप सब किचन में जाइये.. लंच की तयारी कीजिये.. हम बाबू की चटनी बना कर नीचे hi लाती हाँ

भाभी - बाबू... मुझे किसी की मुखालफत का अब कोई डर नहीं.. मई खुलम खुलम तुम्हारी हमायत का एलान करती हों.. ये दोनों तुम्हारी चटनी बनाने वाली है. लेकिन मेरा आज मीठे का मूड ha..tum दोनों की स्वीट डिश बना कर नीचे ले कर आओ.. मई तुम्हे किचन में hi मिलूंगी

बहार दादी जान और अम्मी जान पहले तो हसी.. फिर भाभी से शर्त लगा गई. देखती हाँ.. चटनी बनती है या स्वीट डिश

अंदर दोनों अब फूलन देवी बनती हुई मुझे घूर रही थी. वैसे दोनों के अंदर से हसी का तूफान उमड़ पड़ने को बेताब था.. लेकिन वो अपनी हसी दबाये खूंखार बिल्लियों की तरह तेज़ तेज़ साँसें लेती हुई मुझे घूर रही थी..

अब मज़ा आने वाला था. बहुत दिनों से गालों पर hi टिका हुआ था. आगे बढ़ना hi होगा.. कब तक अपने hi खंडन की हसीनाओं से दूरी बना कर रखता. अब तो मेरा लुंड भी बगावत पर उतरने लगा था.. आज माहिरा एपीआई की गांड की थोड़ी सी गर्मी प् कर वो मुझसे सख्त नाराज़गी पर उतर आया था.

और एक मर्द लड़का अपनी पूरी ज़िन्दगी में लुंड से बढ़कर परवा किसी की नहीं करता. मैंने भी मेरे लुंड की परवा करते हुए उसे खुश करने का मैं बना लिए..

मई दोनों हाथ पहला कर दोनों को मैदान में कूद पड़ने के लिए बोल गया

मई - आ जाओ मैदान में.. और बना दो मेरी चटनी.....

मई सोचने लगा. इन दोनों की स्वीट डिश कैसे बनाऊं.. फिर याद आया. फुद्दी से निकला रास भी तो स्वीट डिश hi होता है... चलो भाभी की भी मान hi लेते हाँ..
 
सोलहवीं क़िस्त

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दोनों गर्म जवानियाँ मूड में आ चुकी थी. मई और वो दोनों कमरे में बंद एक दूसरे के आगमन सामने थी. बचपन में हम ऐसे खेला करते थे. लेकिन बड़े होने पर ऐसे खेल बंद कर दिए गए थे. जिस्मो में तब्दीलियां आ गई थी. सोचों की धाराएं बदल गई थी. लेकिन मैंने सब की सोचों पर अपना तसल्लुत क़ायम कर लिया था. एक बार फिरसे बचपन के खेल खेले जाने लगे थे. लेकिन अब हम जवान हो गए थे. और मेरे लुंड के साथ साथ, मेरे जिस्म में जवानी की गर्मी के साथ साथ मेरी दोनों बहनों के जिस्म भी जवानी की गर्मी के चलते तंदूर बन गए थे. दोनों गर्म भट्टियों की तरह उबाल रही थी. किन्ज़ा एपीआई के जिस्म की गर्मी काम और माहिरा एपीआई के जिस्म की गर्मी ज़यादा थी. दोनों के बड़े बड़े मुम्मे पूरी तरह ढके हुए थे. लेकिन कब तक ढके रहने वाले थे. जल्द hi मेरे सामने नंगे हो जाने वाले थे

दोनों एक साथ मुझपर पल पड़ी. और मई कहीं न भाग कर उन दोनों के कब्ज़े में आ गया. यहाँ मामला उलट था. मई दोनों के कब्ज़े में जाता या दोनों मेरे कब्ज़े में आती. जिस्म तो तीनो के मिलने थे. दोनों को मेरे जिस्म की गर्मी मिलती क नहीं, पता नहीं. लेकिन मुझे तो मिलने वाली थी. और माहिरा एपीआई का गर्म जिस्म मुझे दावत इ छेड़ छड़ दे रहा था. मई आज पीछे नहीं रहने वाला था.

जैसे hi दोनों बिल्लियों ने मुझे एक साथ अपने साथ कैसा. मैंने बरी बरी दोनों के गालों पर किश कर दी

किन्ज़ा - बच्चो ऐसे गाल को चुम कर तुम अगर ये समझ रहे हो. हम तुम्हारी चटनी नहीं बनाएंगी तो भूल है तुम्हारी. आज तो तुम्हारी चटनी hi नहीं कीमा भी बना देंगी हम दोनों.. क्यों माहिरा

माहिरा एपीआई पहले तो चटनी का ज़ाइक़ा महसूस करती हुई चटखारे लेने लगी. फिर दन्त कचकचा कर बोली - हाँ शांति भी बनेगी आज बाबू की और कीमा भी

माहिरा एपीआई ने मेरे गाल पर हल्ला बोल दिए. और डेंटन में काट लिए.. मई नोट कर रहा था. हर गुज़रते पल के साथ माहिरा एपीआई के जिस्म की गर्मी बढ़ती hi जा रही है. तभी मैंने माहिरा एपीआई की आँखों पर फोकस बढ़ा दिए. उफ्फ्फ्फफ्फ्फ़ मुझे माहिरा एपीआई की आँखों में आग और प्यास दोनों दिखाई दी.

माहिरा एपीआई मस्त हुई मेरे गालों पर दन्त गाढ़ने लगी. आज वो भी मस्त हुई जा रही थी. मैंने माहिरा एपीआई की कमर पर हलके से चुटकी काट दी.. वो मुझसे अलग होकर मुझे घूरने लगी

फिर किन्ज़ा एपीआई से बोली - एपीआई इसे बीएड पर ले जाती हाँ. वही इसका हशर करती हाँ

मई हस्ता हुआ किन्ज़ा एपीआई के गाल को चुम कर दूर हो गया. फिर दोनों बिल्लियां मेरे पीछे पद गई. मई कभी उनके हाथ आता. वो मुझे पकड़ कर बीएड पर धक्का देने लगती. मई ज़ोर लगा कर उनसे दूर हो जाता. फिर उनके हाथ न आता. इस बीचे माहिरा एपीआई पूरी कोशिश कर रही थी. वो नार्मल दिखे. लेकिन नार्मल वो बहार से दिख रही थी. अंदर से नहीं. और आँखों तो अंदर का सारा हाल बयां कर देती हाँ. जिस्म अंदर से गर्म हो तो बहार से महसूस हो जाता है. मैंने भी महसूस कर लिए

माहिरा एपीआई मुझे बीएड पर क्या फेंकती मैंने hi उसे उठा कर बीएड पर फ़ेंक दिए. वो चीख पड़ी. वो उठती मई उसके ऊपर आ गया.. ऐसे के मेरा लुंड उसकी फुद्दी पर था और उसके मुम्मे मेरे सीने के नीचे दबे हुए थे. मेरे होंठ माहिरा एपीआई के गालों पर पुरे चेहरे पर चलने लगे. माहिरा एपीआई जैसे झूम उठी. उनकी आँखों में सुरूर की परछाई दिखी. लेकिन वो खुद पर काबू पाती हुई चीख कर बोली

माहिरा - किन्ज़ा एपीआई मुझे इस जंगली भेड़िये से बचाओ.. हाय एपीआई ये रीछ के जितना भरी है

किन्ज़ा एपीआई भी बीएड पर ै और मेरे सर को पकड़ कर खेंचने लगी. लेकिन नहीं खेंच पाई. नीचे से माहिरा एपीआई की फुद्दी दहकने लगी. मुखालिफ जिस्म की खास गर्मी पर

लुंड कभी कण्ट्रोल में नहीं रह पता. मेरा भी कण्ट्रोल से बहार हो गया. सख्त होकर माहिरा एपीआई की फुद्दी पर दबने लगा. माहिरा एपीआई को बुरा नहीं लगा. बहुत ाचा लगा. वो ऑंखें बंद करने लगी. शायद खुद से होने लगी थी. नशे में जो होने लगी थी. लेकिन किन्ज़ा एपीआई पास थी. वो खुद पर फिरसे काबू बनती हुई चीखी

माहिरा - एपीआई जल्दी करो. मेरा दम घुटने लगा है. हम दो हाँ और ये एक.. फिर भी हम पर भरी पर रहा है

किन्ज़ा एपीआई मेरी कमर पर आ बैठी. अपनी नरम गर्म गांड मेरी कमर से टच करती मेरे सर को पकड़ कर खेंचने लगी. इस बार किन्ज़ा एपीआई का डाब बढ़िया था. मेरा सर उठ गया. नीचे ने माहिरा एपीआई ने भी ज़ोर लगा दिए. फिर दोनों ने मिलकर मुझे साइड बीएड पर चित कर दिए.. माहिरा एपीआई की सांस तेज़ चलने लगी थी. कुछ मेरे बोझ की वजा से. ज़्यादा उनकी फुद्दी में आग बढ़ उठने की वजा से. माहिरा एपीआई मेरे ऊपर आई. और मेरे लुंड पर अपनी फुद्दी रख मेरे चेहरे को थाम कर मेरे गाल पर फिरसे दांत गढ़ गई..

किन्ज़ा - अब आया है काबू

किन्ज़ा एपीआई की भी सांस फूल गई थी. वो साइड बेथ कर हस्ती हुई अपनी साँसें दुरुस्त करती हुई माहिरा को मेरे ऊपर देख रही थी. माहिरा एपीआई मेरे गाल पर धीरे धीरे काट रही थी. कहीं निशान ज़यादा न पद जाए. मैंने भी झूट मूट का ज़ोर लगाना जारी रखा. ऐसे वक़्त किन्ज़ा एपीआई मेरे एक हाथ को पकड़ लेती थी..

वाह्ह्ह्ह क्या शहज़ोरी थी. एक नाज़ुक सी धान पान सी लड़की मेरा हाथ पकड़ कर मुझे बेबस समझ रही थी.. चलो ऐसे hi सही..

फिर माहिरा एपीआई को जाने क्या हुआ. शायद उनकी फुद्दी की गर्मी बर्दाश्त से बहार हो गई... वो नशीली आवाज़ में बोली

माहिरा - किन्ज़ा एपीआई.. आज बाबू को खाना तो है hi. इसके ये होंठ हमारे गालों पर जितनी बार भी आये हाँ. उतनी hi बार ये सर पर चढ़ा है.. क्यों न इसका कीमा बनाने से पहले मई इसके होंटो को काट खाएं

किन्ज़ा एपीआई हस्ती हुई - हेहेहे. सही कहा.. जल्दी से काट खा इस बाबू के बच्चे के होंठ.. सच कहा तूने.. ये बाबू का बच्चा हमारे गालों पर अपने होंठ रख कर कुछ ज़यादा hi चौड़ा हो गया है..

माहिरा एपीआई - नीचे वाला हों पहले काटों या ऊपर वाला

मई हैरान था माहिरा एपीआई की बात सुन कर.. उनकी आवाज़ में चेंज देख कर, उनकी आँखों में सेक्स की आग देख कर.. किन्ज़ा एपीआई ने भी माहिरा एपीआई की बदली आवाज़ सुनी थी. लेकिन इतनी देर से धींगा मुष्टि जारी थी. वो समझी होगी.. ये सब उसी का नतीजा है..

किन्ज़ा - सजा दोनों होंटो को एक साथ मिलनी चाहिए. लेकिन एक वक़्त में एक hi काट कर खाया जा सकता है.

माहिरा एपीआई - फिर मई इसका नीचे वाला होंठ पहले कहती हों..

माहिरा एपीआई ने मेरे नीचे वाले होंठ को अपने डेंटन में भर लिया.. किन्ज़ा एपीआई का धयान हम दोनों के चेहरे की तरफ था. वो नीचे नहीं देख रही थी. वहां जहाँ माहिरा एपीआई की गांड थी. उससे नीचे माहिरा एपीआई की फुद्दी और फुद्दी मेरे लुंड पर धरी थी.

माहिरा एपीआई मेरे होंठ को अपने डेंटन में लिए अपनी फुद्दी को मेरे लुंड पर दबा गई. जैसे वो खुद पर कण्ट्रोल खोटी जा रही हों. या अपनी फुद्दी की बढ़ी आग के चलते वो इतनी नशे में हो रही हाँ. खुद पर काबू नहीं रख सकती. जितना मज़ा मिल रहा है. उससे कहीं बढ़कर और पाना चाहती हों..

मई भी नशे में हो गया. मेरा लुंड भी पुरे जोबन पर आ गया था. सख्त हो कर माहिरा एपीआई की फुद्दी तक तसली के साथ दबता हुआ पूरा पूरा मज़ा ले रहा था.. फिर माहिरा एपीआई ने मेरे होंठ को अपने होंटो में लिया और चूसने लगी.. नीचे से अपनी फुद्दी मेरे लुंड पर रगड़ने लगी..

मई हैरान रह गया. वो किन्ज़ा एपीआई के साथ इतनी ज़यादा खुल जायेगी. मुझे गुमान तक नहीं था. माहिरा एपीआई की ऑंखें अब बंद थी. मेरी ऑंखें मारे हैरत के खुल गई थी. मई शॉकेड थी. इतनी गर्मी वो भी मेरी बहन के अंदर..

इधर किन्ज़ा एपीआई ये देख झटका खा गई. वो अपने मोह पर हाथ रख कर माहिरा एपीआई का मेरे होंठ को चूसना फिर नीचे से उसका रगड़ खता हुआ जिस्म.. किन्ज़ा एपीआई कुछ पल शॉकेड रही.. फिर चीखी

किन्ज़ा - mahiiiiiiraaaaaaaaaaaaaaaaa

बास इतना सा hi खेल होना था. माहिरा एपीआई ज़िन्दगी में पहली बार एक मर्द जिस्म के साथ मज़े कर रही थी. वो अपनी गर्मी ज़यादा देर संभल नहीं सकीय.. और मेरे होंटो से अपने होंठ अलग करती मेरे ऊपर ढेर हुई तेज़ तेज़ सांस लेने लगी.. इधर किन्ज़ा एपीआई ने माहिरा एपीआई को मेरे ऊपर से धक्का दे दिए. माहिरा एपीआई मेरे साइड चित लेट कर वही तेज़ तेज़ साँसें लेती ऑंखें बंद किये पड़ी थी. मैंने माहिरा एपीआई का चेहरा देखा. कितना सुकून था माहिरा एपीआई के चेहरे पर.. लेकिन ये ज़यादा देर रहने वाला नहीं था

किन्ज़ा एपीआई मेरे ऊपर से माहिरा एपीआई के दूसरी साइड जा बैठी.. और माहिरा एपीआई को झंझोड़ती हुई बोली

किन्ज़ा - माहिरा... ये तूने क्या किया.. मई सोच भी नहीं सकती थी.. तू ऐसा कुछ कर जाएगी

इधर मई भी उठ कर बेथ गया. मई किन्ज़ा एपीआई का चेहरा बघोर देख रहा था. जहाँ दुन्या भर का गुसा था. घुसे से उनके चेहरे के रंग गहरा लाल और ऑंखें खुनी हुई दिखाई दे रही थी

माहिरा एपीआई ने ऑंखें नहीं खोली.. लेकिन अब उनकी आँखों में एकदम से आंसू आबशार की तरह बहने लगे थे. फुद्दी की गर्मी मिटी तो अफ़सोस और गिल्ट एक साथ हमला आवाज़ हो गए थे..

किन्ज़ा - तेरे ये आंसू अब किस काम के माहिरा.. तूने बाबू के साथ ऐसी हत्या हरकत क्यों करि. एक बहन होकर भाई के साथ--- छियई छियई मुझे तो सोच कर hi शर्म ा रही है.. कैसे मई अब तुझसे

मेरे मैं में लड्डू फूट रहे थे. अम्मी जान भाभी जी और अब माहिरा.. आठ कितनी स्पीड के साथ एक एक खानदानी जिस्म मेरी दस्तरस में आता जा रहा था. मई मेहनत तो कर hi रहा था. लेकिन ये मेहनत उतनी भी नहीं थी. खानदानी औरतों और लड़कियों के जिस्म मुझे यौन मिल जाते. ये तो सच में चमत्कार होता जा रहा था..

माहिरा एपीआई एक झटके में उठ बैठी.. और किन्ज़ा एपीआई को छोड़ मेरे पेअर पकड़ गई.

माहिरा - मुझे माफ़ कर दे बाबू.. पता नहीं मुझे क्या हुआ.. मई ऐसी तो नहीं थी.. पता नहीं ये हमारे अनमोल प्यार के बीच ये जिस्म की आग कहाँ से आ गई. मई नहीं जानती बाबू.. प्ल्ज़ तू मुझे माफ़ कर दे.. देख तू मुझसे नफरत करेगा तो मई तेरी कसम कहती हों. उस दिन तूने छत की दीवार पर चढ़ कर कूद जाने की धमकी थी. मई बिना बताये बाथरूम में घुस कर अपनी नस काट दूंगी.. बास तेरी इन नज़रों में गिर कर मई ज़िंदा नहीं रह सकुंगी.. तू मुझे माफ़ कर दे बाबू

फुद्दी ने जितना रोना था. रो चुकी थी.. अब आँखों और दिल के रोने की बरी थी

किन्ज़ा एपीआई का गुसा काम नहीं हुआ. वो एक चांटा माहिरा एपीआई की पीठ पर मरती हुई फुंकरति हुई बोली

किन्ज़ा - जो तूने अपने भाई के साथ किया है. वो करने के बाद तू ज़िंदा रह कर करेगी भी क्याआआ ??

माहिरा एपीआई का रोना और भी ज़यादा हो गया. मैंने झट से माहिरा एपीआई को गले से लगा लिया..

मई - किन्ज़ा एपीआई आप प्ल्ज़ खामोश रहेंगी. अब आप ने एक भी लफ्ज़ अपने मोह से निकला तो मई समझूंगा. हमारे बीच कभी प्यार था hi नहीं.. जो था वो बास चार दिन का रौनक मेला था. दिल की ख़ुशी थी.. जो आरज़ी सबत हुई.. अगर हमारा प्यार सच्चा और अनमोल है. तो हम दोनों को पहले माहिरा एपीआई की बात सुन लेनी चाहिए. उसके बाद कोई भी बात करेंगे..

किन्ज़ा एपीआई घुसे भरे नज़रों से माहिरा को अब भी देख रही थी.

किन्ज़ा - तू जो भी बात करना चाहता है. तू कर.. मई अब यहाँ नहीं रह सकती. मई जा रही हों

मैंने एक हाथ से किन्ज़ा एपीआई की एक कलाई पकड़ ली

किन्ज़ा - देख बाबू.. मेरा हाथ छोड़ दे.. इस वक़्त मई जितने घुसे में हों. उतनी hi शर्म भी मुझे आ रही है. मई यहाँ नहीं रुक सकती.. शर्म मेरे अंदर से साडी हिम्मत खोटी जा रही है. घुसे मुझे पागल बनता जा रहा है.

मई - आप कुछ भी कह लें. लेकिन अगर आप यहाँ से गई. तो मेरा मारा हुआ मोह देखेंगी

किन्ज़ा एपीआई ने एक ज़ोरदार चांटा मेरे गाल पर मार दिए.. फिर मेरे सर को गले से लगा कर मेरे गाल को चूमने लगी

किन्ज़ा - तूने फिरसे मरने की बात की.. तू मर जाएगा तो ये दुन्या मेरे लिए जंगल बयाबान जैसी हो जायेगी. तेरे इन थोड़े से दिनों के प्यार ने मुझे ऐसी लत लगा दी है. मई अब तेरे बिना एक भी दिन जी नहीं सकुंगी. तू मारा तो मई भी मर जाउंगी बाबू.

मई - क्या ऐसा hi प्यार मुझसे सब नहीं करते... क्या ऐसा hi प्यार इतने दिनों से मुझसे माहिरा एपीआई नहीं कर रही हाँ.. क्या इतने दिनों तक आप के संग मिलकर माहिरा एपीआई ने जो मुझे दिए और मुझसे लिया वो सारा का सारा हवस पर मब्नी था.. याद है आप को किन्ज़ा एपीआई.. उस रोज़ बारिश में सबसे पहले आप ने hi मुझे खुल कर प्यार दिए था.. मेरा प्यार खुल कर लिए था. वर्ण उससे पहले एक दिन बंद कमरे में एक बार हम दोनों थोड़ा सा खुले थे.. अगर अभी की माहिरा एपीआई की हरकत को गलत निगाह से देखा जाए.. तो शुरुआत अआप से हुई थी..

किन्ज़ा एपीआई दुखी होती हुई बोली - लेकिन बाबू उस दिन का प्यार और बाद के दिनों का सारा प्यार खालिस और अनमोल था.

मई - वही तो कह रहा हों. क्याआ खालिस प्यार पर किसी और पल के लिए दूसरा प्यार ग़ालिब नहीं आ सकता. वो जिस जिस्म को, उस जिस्म के अंदर धड़क रहे दिल को दूसरा जिस्म अपना मान ले.. क्या कभी उसके अंदर अचानक से कुछ अलग सा कुछ उनकंट्रोल सा, कुछ बगावत के जैसा नहीं जनम ले सकता. हमें माहिरा एपीआई की बात सुन्नी होगी.. हम सब एक हाँ.. मई आप का भाई हों बहनो जैसा, दोस्तों जैसा. मई एक राज़दार दोस्त भी हाँ. और ग़मगुसार भी. क्या मेरा कन्धा आप के हर दुःख सुख में आप के लिए एक मुहाफ़िज़ का कन्धा नहीं है

किन्ज़ा एपीआई अब नार्मल थी. माहिरा एपीआई सर झुकाये सिसक हुई आंसू बहा रही थी. कहाँ दोनों मिलकर मेरी चटनी बनाने जा रही थी. और कहाँ माहिरा एपीआई सच मच अपनी फुद्दी मीठा नमकीन रास बहा गई थी.

मैंने किन्ज़ा एपीआई की परवा नहीं की और माहिरा एपीआई के निचले होंठ को अपने होंटो में भर लिया.. वही भाभी वाला फार्मूला.. चूसा नहीं. बास होंटो में होंठ कैद कर गया..

किन्ज़ा एपीआई की हैरत में डूबी शर्म से भीगी आवाज़ सुनाई दी - बाआआअबूउऊउउउउ

वही माहिरा एपीआई की ऑंखें अब हैरत के मारे साडी hi खुल गई थी. अनमोल मोतियों भरी ऑंखें मेरी आँखों में हैरानी से देख रही थी. बड़ी बहन के सामने छोटा भाई अपनी दूसरी बहन के होंटो के साथ अपने होंठ मिला गया था

किन्ज़ा एपीआई और नहीं ठहर सकती थी. शर्म से वो लरज़ने लगी थी. वो उठ कड़ी हुई. मैंने फिरसे उनकी कलाई पकड़ ली

किन्ज़ा एपीआई लरज़ती हुई आवाज़ में बोली - बाबू. मुझे छोड़ दो प्ल्ज़. मई यहाँ नहीं रुक सकती..

मैंने माहिरा एपीआई को किश छोड़ किन्ज़ा एपीआई के होंठ के साथ भी वैसा hi किया.. वो फड़फड़ाने लगी. मुझसे छूटने के लिए ज़ोर लगाने लगी. लेकिन मैंने किन्ज़ा एपीआई के चेहरे को कस के पकड़ लिया था. वो अलग नहीं हो सकीय..

मैंने अपने होंठ अलग किये और बोलै - मैंने छिछोरे लड़कों वाली कोई हरकत नहीं की. बास आप के होंठ को महसूस किया है. आप भी कुछ और न सोच कर मेरे होंटो को नहीं मेरे दिल की पुकार को सुनें

मई हैरान ो परेशान किन्ज़ा एपीआई के होंठ को फिरसे अपने होंटो में भर गया. इस बार कुछ ज़यादा hi देर लगा दी मैंने.. किन्ज़ा एपीआई थोड़ी देर बेचैन रही. फिर पुरसुकून होती चली गई.. मेरा अनमोल प्यार ऐसा hi था...

माहिरा एपीआई अब रिलैक्स थी. मैंने किन्ज़ा एपीआई के साँमे उनके होंठ, और उनके सामने किन्ज़ा एपीआई के होंठ को अपने होंटो में ले लिया था..

मैंने किन्ज़ा एपीआई को छोड़ा तो देखा. उनकी ऑंखें बंद थी. श्रम से सफेद चढ़ा गुलाबी हो चूका था. मैंने किन्ज़ा एपीआई की आँखों को चूमा तो वो ऑंखें खोल मुझे देखने लगी..

फिर मेरे कंधे पर सर गिरती हुई बोली - बाबू ये सब क्या था. तुझे ज़रा सी भी श्रम नहीं आई.. मई तेरी एपीआई हों. और तूने अपनी एपीआई के होंठ को चुम लिए

मई - क्या बुरा किया मैंने

किन्ज़ा - बुरा hi तो किया है. एक भाई अपनी बहन के होंठ नहीं चुम सकता

मई - ये आप का दिल बोल रहा है या आप की सोच

किन्ज़ा - दिल कुछ भी कहे बाबू.. सोच hi इंसान की सब कुछ हुआ करती है

मई - फिर तो माहिरा एपीआई की सोच को hi दोष देना चाहिए. जो कुछ भी किया माहिरा एपीआई ने.. उसमे उनके दिल की कोई आरज़ू शामिल नहीं थी. अगर ऐसी बात है. तो फिर एक hi बात सबत होती है. माहिरा एपीआई के दिल में मेरे लिए प्यार नहीं, उनकी सोचों में आवारगी और अपने hi सेज भाई के लिए हवस है

किन्ज़ा एपीआई मेरे कंधे से सर उठा कर मुझे घुसे से देखने लगी. फिर हल्का चांटा मेरे मोह पर मार दिए

माहिरा एपीआई - नहीं मेरे दिल में तुम्हारे लिए प्यार hi प्यार है बाबू.. हवस होती तो मई कब का बहार किसी के साथ मोह कला कर चुकी होती.. बाबू मुझे तुम्हारा अनमोल प्यार इजाज़त दे रहा है. मई अपना दिल खोल कर रख दूँ. किन्ज़ा एपीआई जितना हम बाबू के साथ आगे बढ़ चुकी है. जितना मई बढ़ चुकी हों. अगर मैंने अपना दिल खोल कर आप के सामने नहीं रखा तो मई फिर कभी आप के सामने नज़रें उठा क्र जी नहीं सकुंगी. मुझे मेरे दिल की बात कह लेने दें एपीआई..

मई - कहो एपीआई.. किन्ज़ा एपीआई कहीं नहीं जाएँगी. वो सब सुनेंगी

किन्ज़ा एपीआई एक बार फिरसे शर्म से कैंप कर बोली - बाबू मुझे जाने दे. मई समझ सकती हों माहिरा क्या बोलेगी.. मई नहीं रुक सकती. मई उसकी कोई बात नहीं सुन सकती.. प्ल्ज़ बाबू मुझे जाने दे..

माहिरा - नहीं एपीआई आप को रुकना होगा.. नहीं तो.. नहीं तो

माहिरा एपीआई जुनूनी होने लगी. मई और किन्ज़ा एपीआई उसे देखते रह गए.. माहिरा एपीआई रोटी हुई बोली

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मैं माहिरा खान हों. कहानी मेरा भाई फिरोज जिसे हम सब प्यार से बाबू कहते हाँ, लिख रहा है. कहानी उसी की है, और वही लिखेगा. लेकिन यहाँ मेरा ज़िक्र ज़रूरी हो गया था. इसलिए मैंने लिखनी शुरू कर दी. आप को मुझे समझने में आसानी होगी.

बाबू की कहानी हम सब के बिना मुकम्मल नहीं हो पति. उसकी ज़िन्दगी का एक hi मक़सद था. हम सब की फुड़दियों में घुस जाना. और वक़्त ने ये सबत भी कर दिखाया. बाबू हम सब की फुड़दियों में घुस गया.

कैसे.. ये मई नहीं बताउंगी. ये आप सब को बाबू hi बताएगा. मई यहाँ अपने बारे में बता दूँ. मई भी जवान लड़कियों की तरह उमंगों भरी लड़की हों. जवान होते hi मेरे अंदर सेक्स का बुखार सर चढ़ कर बोलने लगा. मई कोई कमज़ोर सोच वाली लड़की नहीं हों. बहुत स्ट्रांग सोच है मेरी. कमज़ोर होती तो आज तक नजाने कितनो से चुद चुकी होती. इतनी hi आग है मेरे अंदर..

लेकिन अपनी शर्म और खंडन की इज़्ज़त को सामने रख कर मैंने खुद से लड़ना शुरू कर दिए. लेकिन ये कम्बख्त फुद्दी की आग मुझे दिन रात जलाये रखती थी. ऐसे में न चाहते हुए भी मैंने अपनी एक दोस्त के साथ लेस्बियन सेक्स शुरू कर दिए.. उससे पहले अपनी फुद्दी को अक्सर मसलते हुए नेट पर सेक्स स्टोरीज और पोर्न वीडियो मई अक्सर देखती रहा करती थी. ये भी एक वजा है. मेरे अंदर सेक्स की भूक बढ़ती hi चली गई.. वीक में एक बार मई ज़रूर अपनी दोस्त के साथ लेस्बियन सेक्स करती हों. इस एक हफ्ते में दो बार अपनी फुद्दी से खेल कर फुद्दी का पानी निकलती हों..

उफ्फ्फफ्फ्फ़ मेरी फुद्दी की आग दिन ज़रूर मुझे जला देने वाली थी. आज तक किसी मर्द का लम्स मैंने नहीं पाया था. और बहुत मैं मचलने लगता था. काश कोई दोस्त बना लून. फिर वो मुझे अपनी बाहुन में इतनी ज़ोर से भींचे.. मेरा जोड़ जोड़ अलग हो जाए.. ज़बरदस्ती मुझे नंगा करे और एक hi झटके में मेरी फुद्दी में अपना लुंड घुसा कर मेरी फुद्दी की ऐसी तैसी कर दे.. कभी कभी मई पागल होने लग जाती हों.. कभी मैं करने लगता है. मई अम्मी को बोल दूँ.. मई पढाई छोड़ रही हों. आप मेरी शादी कर दीजिये.. लेकिन भूल कर भी ऐसी कोई बात मई अपने मोह से नहीं निकाल सकीय. निकलती तो मई बेहया समझी जाती. और मई ऐसी कोई भी सोच अपने लिए किसी दिल में दिमाग में पैदा होते हुए नहीं देख सकती थी. कुछ भी था. मई एक पठानज़दी थी. और पठान झाड़ियों वाली साडी शर्म सरे वक़ार मई भी रखती थी

ऐसे में बाबू घर वळून के साथ साथ मेरे भी करीब आ गया. बाबू को मैंने पहले भी कई बार हुग किआ था. लेकिन जवान होने के बाद मैं बाबू से अलग हो गई थी. बाबू का उस दिन बारिश में छत की दीवार पर चढ़ना, फिर बाबू के लिए जज़्बाती होना और बाद में उसे थप्पड़ लगा कर उसे गले से लगाना, उसे प्यार करना.. उफ्फ्फफ्फ्फ़ मई बता नहीं सकती. मेरे दिल को कितना सुकून मिला. बाबू का जिस्म भी एक मर्द का जिस्म था. लेकिन बाबू के प्यार की बात hi निराली थी. बाबू का प्यार अनमोल था. बाबू का प्यार पाया तो मेरे अंदर जैसे सेक्स को सोच कर खुद से लड़ने की सलाहियत बढ़ने लगी. फुद्दी की आग भी काम हो गई.. फिर अगले गुज़रते दिनों में मेरे अंदर की आग और भी काम होती चली गई. मेरी दोस्त ने मुझसे कहा. माहिरा आज चल न.. बहुत दिल कर रहा है. चल कर एक दूसरी से लिपट कर एक दूसरी के जोड़ जोड़ को अलग कर देती हाँ. वो भी टूट रही थी बेचारी. मैंने hi उसे ऐसी लत लगाई थी. लेकिन मैंने उसे मन कर दिए. बाबू का प्यार प् कर मई संभालती जा रही थी. मेरी दोस्त हैरान भी हुई और उदास.. क्यूंकि उसके पास कोई बाबू नहीं था. बाबू तो मेरे पास था. मेरे घर में था. हम सब उसका प्यार प् रहे थे..

बारिश वाले दिनन के चौथे दिन की बात है. मेरी दोस्त की कॉल आई.. कमीनी की फुद्दी में कुछ ज़यादा hi आग लगी हुई थी. वो मुझसे गन्दी गन्दी बातें करने लगी. न चाहते हुए भी मई गरम होने लगी. अपने मुम्मों और अपनी फुद्दी को मसलने लगी. बहुत दिनों बाद अपने जिस्म के साथ खेल रही थी. मज़ा आने लगा. अगर पहले वाली बात होती तो फोन पर hi गन्दी गन्दी बातें करती हुई अपनी फुद्दी का पानी निकल जाती. लेकिन मेरा दिल और मेरा जिस्म ज़यादा गरम नहीं हो पाया.. उधर कमीनी मेरी दोस्त अपनी फुद्दी मसल मसल कर ठंडी हो गई.. साथ hi मुझे सब बताती हुई कॉल एन्ड कर गई.. मई फोन देखने लगी. मेरी फुद्दी से अभी रास नहीं निकला था. उसने पहले hi कॉल एन्ड कर दी...

मई फोन साइड रखती हुई अपनी फुद्दी से खेलने लगी. लेकिन अब मज़ा नहीं आ रहा था. मैंने अपनी फुद्दी से खेलना बंद किआ और बाथरूम में घुस कर नहाने लगी. नहाने से सुकून मिला. लेकिन जिस्म के अंदर छह बाकि थी. एक बार तो फुद्दी से पानी निकाल hi देना चाहिए था.. लेकिन मैंने अपने दिल की नहीं सुनी.. और कपडे बदल कर कमरे से भी निकल गई..

उस दिन का बाबू का मुझे गले से लगा कर प्यार करना, मेरे गालों को चूमना मुझे अलग hi मज़ा दे गई.. ऐसा सुरूर दे गया. जो मुझे मेरी सहेली के नंगे जिस्म के साथ खेल कर भी नहीं कभी मिला था. अपनी सहेली के मुम्मे चूस कर, उसकी फुद्दी और गांड के सुराख़ को चाट कर भी नहीं मिला था

आप ने जान लिए. मई किस हद तक आगे बढ़ चुकी थी. अपनी सहेली की साथ लेस्बियन सेक्स करते हुए मई बहुत आगे निकल गई थी. एक मेरी फुद्दी और गांड की सील्स सलामत थी. वर्ण हम ने कोई कसार नहीं छोड़ी थी. वो मेरे मुम्मे खूब चूसा करती थी. मेरी फुद्दी और गांड के सुराख़ को स्वीट डिश समझ कर छठा चूसा करती थी. ये सब करने पर मैंने hi उसे उकसाया था. अब मई hi उससे दूर हो गई थी.

उस दिन बाबू के जिस्म का सुरूर मेरी राग राग में उतर गया. दिल ने कहा. माहिरा, जो बहार किसी गैर लड़के के साथ तो सेक्स करने से रही. तेरी शादी को अभी बहुत वक़्त बाकि है. पहले किन्ज़ा की होगी फिर तेरी. अभी तो पढाई हो रही थी. अभी तो शादी बहुत दूर थी. मेरे दिल ने चुपके से बाबू को दिल में बसना शुरू कर दिए. मई अक्सर रातों को देर रत तक सोचने लगती. बाबू के साथ सेक्स कर लूँ.. फिर दर जाती. एक तो हम पठान थे. एक बहन अपने भाई के साथ तो सेक्स करने का सोच भी नहीं सकती थी. दूसरे पठान में कोई लड़की ज़रा सी भी बहकी हुई दिख गई. अगले hi लम्हे उसका सर धड़ से अलग.. या फिर गन की साडी की साडी गोलियां उसके सीने में. मई डर गई.. लेकिन फुद्दी की आग और दिल में बाबू नाम की आग, दोनों हर गुज़रते पल बढ़ती hi चली गई..

बाबू का अनमोल प्यार प् कर मेरा जिस्म पुरसकून हो गया था. फुद्दी की आग भी काम पद गई थी. लेकिन जैसे hi बाबू से सेक्स का ख्याल मेरे अंदर पलना शुरू हुआ.. फुद्दी की आग और भी ज़यादा बढ़ने लगी. ये अजीब बात थी. मई परेशां होने लगी. लेकिन फिर बाबू का प्यार hi मुझे सुकून भी देता. मई बाबू के साथ और भी ज़यादा खुलने लगी. ये मेरे दिल की बात थी. शायद इसी बहाने कोई मोजज़ा हो जाए. और बाबू के साथ मई आगे बढ़ जाऊं. बाबू भी मेरे दिल की बात समझ ले. मई बगैरत और बेशरम न कहलाई जाऊं. और मेरा काम भी हो जाए..

आज सुबह से hi मेरी फुद्दी गीली थी. उसका लेसदार पानी रुकने का नाम hi नहीं ले रहा था. मेरे अंदर से सेक्स की भूक और बाबू से मस्ती फूटी पद रही थी. मई कॉलेज से वापिस आने के बाद बाबू और किन्ज़ा एपीआई के बैग्स अंदर रख कर लॉन में ै तो देखा किन्ज़ा एपीआई ज़ोर ज़ोर से हस रही थी. मई भी वहां जा पोहंची. वहां अचानक से hi मेरे अंदर जैसे आवाज़ आई.. माहिरा मस्ती का मौसम फुल उरूज पर है. इसी मस्ती का फायदा उठा कर बाबू को और भी करीब कर ले.. के बार बाबू ने तेरे जिस्म की गर्मी पा ली.. तो हो सकता ह. वो समझ जाए. हो सकता है, तेरे जिस्म की गर्मी प् कर बाबू

का जिस्म नशे में हो जाए. हो सकता है दोनों के जिस्म की गर्मी एक होकर एक हो जाएँ.. ऐसे में तेरा काम भी बन जाए और तेरी फुद्दी का भी.

मई अंदर से तो डर रही थी. लेकिन फुद्दी की आग मुझे हिम्मत भी दे रही थी. या ये कहूं, मेरे सोचने समझने की सलाहियत को जंग लगाने लगी. मैंने फिर बाबू को इतना तंग किया. वो मेरे पीछे भागने लगा. मई भगति हुई अपने कमरे में आई. और ऐसे hi बाबू को दिखने के लिए दूर बंद करने लगी. मैंने जान बूज कर थोड़ी सी देर करि थी. ता कह बाबू दूर को बंद न होने दे. वही हुआ.. बाबू ने दूर को बंद नहीं होने दिए. और अंदर ा कर मुझे पीछे से अपनी बहन में भर लिया. बाबू का अंडरवियर में कैद लुंड मेरी गांड पर लगा तो मई जैसे नशे में होने लगी. ये मेरी ज़िन्दगी का पहला ऐसा मौका था, मेरे जवान होने के बाद पहली बार हुआ था. एक जवान मर्द का लुंड मेरी गांड के साथ टच हो रहा था. भले hi बाबू का लुंड सो रहा था. लेकिन था तो लुंड hi न... मई बड़ी खुश हुई. आज बाबू ने मुझे पहली बार पीछे से हुग किया है. एक भाई होकर पहली बार अपनी बड़ी बहन के पीछे से इतना करीब हुआ है..

नशे से मेरी आँखों बंद होने लगी. मेरे होश गम होने लगे. मई तो नजाने कब से ऐसे hi लम्हों की मुतलाशी थी. सदियों के इंतज़ार के बाद ऐसे लम्हे आये थे. बाबू ने मेरी गांड के साथ अपने लुंड लगाया तो मेरे दिल ने बड़ी शिद्दत के साथ मांग करि. बाबू मुझे ऐसे hi उठा कर बीएड पर उल्टा पटख दे और मुझे एक भी चांस दिए बिना मेरे ऊपर आये और मेरा जोड़ जोड़ अलग कर दे. एक hi झटके में वो मेरे सरे होल खोल दे.. ऐसी दबा दबा कर मेरी चुदाई करे.. सैलून की साडी गर्मी साडी प्यास एक hi राउंड में बुझ जाए.. लेकिन होना अभी पोस्सबीले नहीं था.

दिल तो नहीं छह रहा था. मई आँखों खुली रखों. लेकिन जैसा सब मस्ती में हो रहा था. मई मस्ती छोड़ नहीं सकती थी. लेकिन ये भी क्या काम था. मई बाबू के साथ लगी कड़ी थी.

फिर से मस्ती का दौर चला और हम बीएड पर आ गए.. जैसे जैसे वक़्त निकलता जा रहा था. मेरी फुद्दी से कटरा कटरा रास बहता जा रहा था. मेरे जिस्म में आग और सुरूर इन्तेहाई हद तक बढ़ने लगा.. मई खुद पर बहुत जबर कर रही थी. लेकिन बाबू का मेरे जिस्म की गर्मी को प् कर मूड में आना उसके लुंड का मूड में आना, मेरे अंदर से जैसे तवानाई सल्ब कर गया. मई ऐसी मदहोश हुई. बाबू के होंठ मुझे ऐसे रसभरे फल के जैसे लगने लगे. जैसे अगर मैंने बाबू के होंठ फल न खाये या चूसे तो मई मर जाउंगी.. बास मई अपनी ऐसी प्यार और सोच पर काबू नहीं रख पाई. किन्ज़ा एपीआई के साथ मस्ती के मूड में बात करती मई बाबू के होंटो पर अपने होंठ रख गई.. लेकिन ज़यादा देर नहीं रख पाई.. ऊपर से एक मर्द भाई के होंठों की गर्मी नीचे से मेरी गरमा गर्म फुद्दी पर बाबू जैसे मर्द भाई के सख्त लुंड की गर्मी.. मई पागल होने लगी. इतनी देर से खुद पर काबू पाए हुए थी.. सरे काबू भूल गई. बाबू के होंटो को चुस्ती हुई अपने फुद्दी ज़िन्दगी में पहली बार अपने hi भाई के लुंड पर रगड़ने लगी.. यौन देर नहीं लगी और मेरी फुद्दी के अंदर जाने कबका रुका हुआ पानी सैलाबी रेल के लिए बाह निकला..

होश तब आया मुझे जब किन्ज़ा एपीआई ने मुझे झंझोड़ा. फुद्दी की आग पल भर को बुझी तो अंदाज़ा हुआ मई कितना बड़ा गुनाह कर गुज़री थी. ऐसे में बाबू ने किन्ज़ा एपीआई को शांत किआ और मुझे अपना अनमोल प्यार देकर सबत कर दिए.. उसका प्यार सच में अनमोल है..... उसके बाद की मेरी व्होले लाइफ मज़े में गुज़री...

अब आप बाबू की कहानी बाबू की ज़ुबानी सुनेंगे.

मैंने यहाँ लफ़्ज़ों का इस्तेमाल खुल कर इसलिए किया है. आप को माहिरा एपीआई के जबज़ट सही से समझ में आ जाएँ. वर्ण किन्ज़ा एपीआई के सामने वो खुल कर नहीं बोली थी. लफ़्ज़ों का चुनाव सोच समझ कर किआ था माहिरा एपीआई ने.. सब सुन लेने के बाद किन्ज़ा एपीआई ने माहिरा एपीआई को गले से लगा कर उनका फेस चूमा..

किन्ज़ा - मई समझ सकती हों. हम जैसे मुआशरे में सांस ले रही हाँ. वहां हम जैसी बेटियों में हज़ारों पाबंदियां हाँ. हम अपनी शर्म और खंडन की इज़्ज़त का बहुत ज़यादा पास करती हाँ.. मुझे फखर है तुझपर मेरी बहन. तू कभी बहकी नहीं.. और ख़बरदार जो कभी गलती से भी गलती करि तूने तो.

माहिरा एपीआई किन्ज़ा एपीआई को चुम मेरा मोह चुम कर बोली - आप सब का प्यार और बाबू का अनमोल प्यार hi मुझे बचा सकता है एपीआई. और कसम से कहती हों. बाबू के अनमोल प्यार ने मुझे बचा लिए है. उस दिन के बाद से मैंने अपनी सहेली के साथ कोई रिश्ता नहीं रखा

सहेली से रिश्ते वाली बात पर किन्ज़ा एपीआई शर्मगीं निघून से मुझे देखने लगी. मैंने भी उनकी आँखों में देखा तो वो ऑंखें चुरा गई. मैंने किन्ज़ा एपीआई के चेहरे को थाम उनके गाल और ऑंखें चुम ली

मई - kyaaaaaaaaaa मुझसे उम्र भर आप ऐसे hi शर्माती रहेंगी.. अगर ऐसा hi रहा तो मई सारा प्यार माहिरा एपीआई को दे दूंगा.. फिर आप देखती रह जाएँगी

माहिरा एपीआई है पड़ी.. किन्ज़ा एपीआई ने मुझे ऑंखें दिखा दी

मई हसने लगा.. फिर किन्ज़ा एपीआई ने मेरे सर पर चपत लगा दी - तू मुझसे दूर रह कर तो दिखा

मई एपीआई को पकड़ अपने सीने के साथ थाह करके मारता हुआ बोलै - मई तो कभी भी आप से दूर रहने की सोच भी नहीं सकता..

किन्ज़ा एपीआई ने अपना सर मेरे कंधे पर गिरा दिए - बाबू तेरा प्यार अनमोल है.. लेकिन ये प्यार किस रुख पर बहता जा रहा है. मई अब सोच सोच कर डरने लगी हों. माहिरा का दिल में तुम्हारे लिए ऐसा प्याआआआ..... उफ्फ्फ सोच सोच कर दिमाग की नसें फटने लगी हाँ

मई किन्ज़ा एपीआई को जवाब न दे कर नक् से शुओं शूऊऊणं करके कुछ सूंघने लगा.

दोनों अलग हुई मुझे हैरानी से देखने लगी

दोनों एक साथ - क्याआआ हुआ बाबू.. क्याआ सूंघ रहे हो..

मई कमरे में इधर उधर देखता हुआ फिर से सूंघता हुआ बोलै - मुझे कुछ अजीब सी स्मेल आ रही है.

दोनों - कैसी सेमल

मई - कुछ नमकीन पानी जैसी.. कुछ लेसदार पानी के जैसी... कुछ हीट जैसी स्मेल आ रही है.. कुछ खास मोके पर निकल आने वाले पसीने की स्मेल आ रही है

मई इतना बोल बीएड से उछाल कर खड़ा हो गया है.. माहिरा एपीआई और किन्ज़ा एपीआई सब समझ गई थी. पहले तो वो हड़बड़ाई.... एक भाई कैसी बात करने लगा है... फिर मेरे नॉटी नॉटी फेस को देख दोनों भी बीएड से उछाल कर कड़ी हो गई..

अब वो फिरसे लड़ने के लिए त्यार थी...

माहिरा - बाबू के बच्चे.. तुझे ज़रा सी भी शर्म नहीं आई.. ऐसा बोलते हुए

माहिरा एपीआई का लहजा शर्म से लबरेज़ था. लेकिन वो शर्म के साथ साथ मस्ती और अनमोल प्यार के रंग में भी थी

किन्ज़ा - कमीना बाबू.. माहिरा के सामने तू ऐसा बोलता तो चलता. मेरे सामंने क्यों बोलै तूने

मई - हाहाहा.. मेरी मर्ज़ी

दोनों - अब हम दोनों तुझे अपनी मर्ज़ी दिखाएंगी

हम तीनो फिरसे कमरे में ोधाम मचने लगे. एक मोके पर मैंने किन्ज़ा एपीआई की नज़र बचा कर माहिरा एपीआई की फुद्दी को पकड़ कर मसल दिए

वो ooooooiiiiiiiiiiii करती हुई बाथरूम में भाग गई

किन्ज़ा एपीआई हैरान होकर - इसे क्या हुआ

मई अनजान बनता हुआ बोलै - मुझे क्या पता

किन्ज़ा एपीआई मुझे टटोलती हुई नज़रों से देखने लगी और मई शरीफ बचा बनकर खड़ा हो गया. किन्ज़ा एपीआई मेरे करीब आ कर मेरा एक कान पकड़ कर बोली

किन्ज़ा - बाबू तूने hi कोई शरारत करि है.. सच सच बताओ.. क्या किया तुमने माहिरा के साथ

मई आवारा आशिक़ों वाले अंदाज़ में बोलै - क्याआ दूँ... मैंने माहिरा एपीआई के साथ क्या किया

किन्ज़ा एपीआई घबरा कर दो कदम पीछे को कूद गई.. फिर दरवाज़े की तरफ जाती हुई बोली

किन्ज़ा - कोई ज़रूरत नहीं है.. पता नहीं क्यों तुम इतनी स्पीड के साथ इतने ज़यादा बेशरम बनते जा रहे हो.. मई चलती हों अब.. और सुन.. मेरी एक बात कान खोल कर सुन ले..

मई कान खोलता हुआ बोलै - जी हुज़ूर फरमाइए

किन्ज़ा एपीआई होंठ दबा कर अपनी हसी को रोक गई.. फिर मोह का गेओग्रफिए दुरुस्त करती हुई खुद को सीरियस बनती हुई बोली

किन्ज़ा - मेरे साथ कोई उलटी सीढ़ी हरकत न करना तुम.. समझे

मई - आज रात को hi ाऔँगा आप के कमरे में.. अब मई सोच रहा हों. हमारा अनमोल प्यार नेक्स्ट लेवल पर पोहंच जाना चाहिए.. जैसे माहिरा एपीआई का..

किन्ज़ा एपीआई मुझे ऊँगली दिखा कर वारं करती हुई बोली - जान ले लुंगी मई तुम्हारी. अगर तुमने कोई छिछोरी हरकत करने की सोची भी तो

मई आगे बढ़ता हुआ - अभी करके दिखा देता हों

किन्ज़ा एपीआई चीख मारती हुई कमरे का दरवाज़ा खोल कर बहार को निकल भागी.. और मई हस्ता हुआ बाथरूम के दूर के पास जा काढ़ा हुआ.. अंदर शावर की आवाज़ सुनाई दी

मई धीरे से बोलै - एपीआई दूर तो खोलिये न

अंदर एपीआई शायद लरज़ सी गई थी.

मई फिरसे बोलै - अब तो हमारे बीच प्यार का रंग बदल चूका है. अब कैसी दूरी एपीआई.. दरवाज़ा खोल दीजिये. मुझे देखना है.. आप के संग इ मर्मर के जैसे बदन पर पानी के बहते हुए क़तरे कैसा नज़ारा पेश करते हाँ.. मुझे देखना है. आप के बदन पर बहता हुआ पानी कैसा नग़मा गुनगुनाता हुआ आप के जिस्म को चूमता हुआ नीचे बहता जाता है..

माहिरा एपीआई की शर्म से लरज़ती आवाज़ सुनाई दी - बाबू. प्ल्ज़ तुम चले जाओ.. अभी मुझे परेशां न करो.. शर्म से कहीं मई बाथरूम में hi न गिर पडूँ.. प्ल्ज़ अपनी अपनी की बात मान लो

मई - वही तो मान रहा हों. आप का भी दिल भी तो छह रहा है. अपने बाबू भाई के साथ एक साथ बाथ क्यों न लिया जाये.. अब जब बाबू के साथ एक नयी ज़िन्दगी शुरू होने जा रही है तो फिर इतना सब तो आम बात हुई न

माहिरा एपीआई काँप रही थी शायद शर्म से.. मीठी शर्मीली मुस्कान भी ज़रूर उनके होंटो पर सजी होगी

माहिरा - नहीं.. अभी नहीं.. जितना कर चुकी हों.. उसपर खूब घोर करुँगी.. अभी तुम जाओ प्ल्ज़. मुझे कुछ टाइम दे दो बाबू

मई - फिर क्या आप खुद सज धज कर मेरे पास आएँगी

माहिरा - वो तो मई पिछले कई दिनों से त्यार हों

मई है पड़ा - हाहाहा

माहिरा एपीआई अपनी बात पर ज़रूर अपने दोनों हाथ अपने चेहरे पर रख गई होंगी..

मैंने और कुछ बातें करि.. लेकिन अंदर से कोई आवाज़ नहीं सुनाई दी.. मई कमरे से निकल पड़ा.... आज के लिए बहुत हो गया था.

मई इतना हैरान था. जितना अपनी ज़िन्दगी में कभी हैरान नहीं हुआ था... ये सब क्या था.. कितनी स्पीड के साथ सब की सब मेरी झोली में गिरती आ रही थी.. इतनी स्पीड से भला कोई सागा खुनी रिश्ता करीब आता है. लेकिन मेरी तो जैसे लाटरी निकली पड़ेगी

अब किन्ज़ा एपीआई के दिल में कोई और था.. क्या वो भी मेरे अनमोल में खुद को फरामोश करती हुई मेरे साथ जिस्मानी तौर पर आगे बढ़ सकती थी.. मुझे एहि आज़माना था.. अब मेरा खेल खेलने का तरीका बदल गया था. क्यूंकि मुझे घर में hi सब बदले हुए लग रहे थे. एक किन्ज़ा एपीआई और एक दादी जान...

अब मैं दोनों को अलग एंगल से सोच रहा था. बहुत सी नयी बातें मेरे दिमाग में आने लगी थी..

 
सत्रहवीं क़िस्त

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मैं ऐसा लड्डू बनता जा रहा था. जिसे हर कोई खाना चाहता था. ऐसा चाहने वाला बनता जा रहा था. जिसे हर कोई अपने करीब देखना चाहता था. मेरा अनमोल प्यार सब को मुझसे करीब और करीब करता जा रहा था. ये सब बहुत ाचा था. लेकिन एक बात अछि नहीं थी. मुझे मेरे हिसाब से टाइम नहीं मिल प् रहा था. और अभी ये शुरुआत थी.

माहिरा एपीआई और किन्ज़ा एपीआई के साथ मस्ती में बहुत वक़्त बीत गया. माहिरा एपीआई नहाने के लिए बाथरूम में जा घुसी. किन्ज़ा एपीआई अपने कमरे में चली गई. मई माहिरा एपीआई को कुछ देर तक बाथरूम के दरवाज़े पर खड़ा होकर छेड़ने के बाद कमरे से निकल कर अपने कमरे में घुस गया था. मई भी ऐसे hi नीचे नहीं जा सकता था. मेरा लुंड भी टाइट हो चूका था. नीचे अम्मी जान या दादी ने मुझे गले से लगाया तो मेरा सख्त और गर्म लुंड महसूस कर लेती. मई भी अपने कमरे के बाथरूम में घुस कर नहाने लगा. ठन्डे पानी से लुंड को बिठाने लगा. आज लुंड बैठने के मूड में नहीं था. माहिरा एपीआई की फुद्दी की गर्मी और गिलहत भरी महक उसने सूंघ ली थी. कहाँ वो अब बैठने वाला था. अब तो माहिरा एपीआई ने खुद से hi अपने जिस्म को मेरे नाम नाम और अपनी फुद्दी के साथ साथ गांड और अपने मोह मेरे लुंड के नाम लिख डाला था.. मैं नशे में डूबने लगा था. मेरा लुंड मुझसे भी ज़यादा खुश था. जोश में था..

अपनी विल पावर का इस्तेमाल करते हुए मैंने अपने लुंड को बिठाया.. पूरा तो नहीं बैठा. लेकिन अब वो सुकून से था. मई नीचे सब के बीच जा पोहंचा. वहां माहिरा एपीआई दूसरे कपडे पहन कर, किन्ज़ा एपीआई भी फ्रेश होकर पोहंच चुकी थी.. वहां और भी खूब साडी बातें होती रही. साथ लंच भी होता रहा.. माहिरा एपीआई की आँखों की चमक देख, चेहरे की चमक और बदली रंगत देख सबने पूछा क्या बात ha.itni चमक.. ये ख़ुशी ये चमक पहले कहाँ थी. किन्ज़ा एपीआई के चढ़े पर माहिरा एपीआई से पूछे जाने पर शर्म के साये उमड़ आये. लेकिन वो जल्द hi खुद पर काबू प् गई.. वहीँ माहिरा भी कमज़ोर दिल की नहीं थी. वो पहले से hi खुद पर काबू बनाये बैठी थी.. वो उठ कर मेरे करीब आ कर मेरे कंधे पर सर रख कर बोली ... बाबू hi तो है मेरे और सबके चेहरों की चमक के पीछे. इस का रोज़ बरोज़ बढ़ता प्यार आप सब की तरह मेरे अंदर भी अपनी जड़ें मज़बूत करता जा रहा है..

बड़ी मुश्किल से मुझे भाभी के साथ अकेले में टाइम स्पेंड करने को मिल पाया. मई भाभी के साथ उसके कमरे में जा घुसा.. भाभी भी उतावली हो रही थी

लेकिन कमरे में आते hi - बाबू मुझे ऐसे क्यों कमरे में ले आये तुम. वही सबके साथ बेथ कर खूब साडी बातें कर तो ली हाँ हमने..

भाभी की नज़रें झुकी हुई थी.

मई भाभी की कमर पर एक हाथ डाले भाभी को अपने सीने से लगा कर खड़ा था.

मई - चमक तो आप के चेहरे पर भी बहुत है भाभी. ख़ुशी तो आप की आँखों से भी फूटी पद रही है.. क्याआ है आपकी ख़ुशी का राज़. क्या है आपके चेहरे की चमक का राज़

भाभी शर्मा कर - तुम सब hi तो जानते हो

मई हैरान होकर - मई सब जनता हों.. मई तो कुछ भी नहीं जनता था

भाभी ने नज़र उठा कर जो मेरी आँखों में देखा. मेरी आँखों में शरारत और मस्ती देख भाभी फिरसे नज़रें चुरा गई

मैंने भाभी के होंटो को चुम लिए..... भाभी लजा गई

मई - भाभी पता है. होंटो को चुम लेने से कितने हक़ मिल जाते हाँ सामने वाले को

भाभी - मई क्या जणू.. मुझे क्या पता होगा. तुम कह रहे हो.. तुम्ही जानते होंगे

मई - पता तो आप के दिल को भी सारा है भाभी जी

भाभी - नहीं.. मेरा दिल कुछ नहीं जनता है बाबू

मई - कितना मीठा लगने लगा है आप के मोह से बाबू नाम..

भाभी ने नज़र उठा कर फिरसे मेरी आँखों में देखा.. फिर बोली - बाबू.. तुम्हारा फार्मूला काम दिखा गया

मई - मतलब

भाभी शर्मा कर - नदीम ने मोहलत बढ़ा दी है

मई फिरसे भाभी के होंटो को चुम गया.. भाभी मुझे रोक नहीं रही थी

मई - मई पहले से जनता था

भाभी हैरान होकर मेरे सीने पर रखा हाथ उठा कर मेरे कंधे पर रखती हुई बोली - बाबू... तुम सच में सब जानते होंगे. मई डाउट में थी. मुझे ऐसा लग रहा था. जैसे मई नदीम से खुल कर बात नहीं कर सकुंगी. उससे मोहलत भी मुझे नहीं मिल पायेगी.. लेकिन हिरणकूं तौर पर नदीम मेरी हर बात मानता चला गया..

मई - एहि तो कमल है खालिस प्यार का

भाभी - हाँ खालिस प्यार.. लेकिन बाबू मेरा प्यार नदीम के लिए खालिस रहा hi काया है.. मई थी तो नदीम के साथ.. लेकिन तुम

भाभी खामोश हो गई.. मैंने दूसरा हाथ भी भाभी की कमर पर रखा और कमर को मसलते हुए भाभी के होंटो से अपने होंठ जोड़ किश करने लगा. भाभी कुछ पल अपने होंटो मुझसे चुस्वाति रही.. फिर मेरा साथ देने लगी. मेरा अपना जोश बढ़ता चला गया.. भाभी का जोश भी बढ़ता चला गया.. फिर साँस उखाड़ने को हुई तो हम दोनों अलग हो गए.. भाभी ने शर्म से झुकी निगाह उठा कर मेरी आँखों में देखा.. फिर मेरे कंधे पर सर रखती हुई बोली

भाभी - बाबू.. मई सोच भी नहीं सकती थी. मेरी ज़िन्दगी में इस कुछ चेंज हो जाएगा. मई अपनी मैरिड लाइफ से बहुत खुश थी.. और हों भी. एक शोहर परास्त बीवी होते हुए मई नदीम के शिव किसी और के इतने करीब हो भी नहीं सकती थी. लेकिन तुमने जाने कैसा सहर मुझपर फूँका है. मई अपने आप से बहार होती जा रही हों. तुम्हारा मेरे होंटो पर हल्ला बोलना इतना गलत है. मई बता नहीं सकती. लेकिन मई तुम्हे रोक नहीं पा रही.. चाहती भी नहीं हों.. तुम रुको

मई - भाभी मैंने भी इतना नहीं सोचा था. अब जब हम किश करके एक दूसरे को दिल और रूह की गहराइयों से एक मान चुके हाँ तो क्यों न हम जो दूरियां बीच में है... वो भी मिटा दें.. आप का दिमाग आप को रोकेगा.. लेकिन आप का दिल.. भाभी मुझे सच सच बताइये.. हमारे इतने करीब आ जाने के बाद, होंटो के रस्ते एक दूसरे में साँसें उतार देने के बाद हमें पीछे हैट जाना चाहिए

भाभी मुझे नहीं देख रही थी. खामोश कड़ी शर्म और जज़्बात से काँप रही थी.

मई - भाभी मेरा उठा कर अपने दिल पर रखिये.. मुझे यकीन है. मई खुद से रखूँगा तो भी आप नाराज़ नहीं होंगी. मुझे मन भी नहीं करेंगी. लेकिन मई चाहता हों.. हमारा रिश्ता और भी गहरा हो जाए.. हम दो देवर भाभी से दो प्रेमी बनकर बाकि की ज़िन्दगी जियें.. हम एक दूसरे से अलग तो अब रहने की सोच hi नहीं सकते. तो फिर क्यों न हम हर पल अपने प्यार को और भी गहरा और अनमोल बनाते चले जाएँ

भाभी अब वाज़ेह काँप रही थी.. भाभी के गाल और भी लाल होने लगे थे श्रम से. उसका बदन ठंडा पसीना भी छोड़ने लगा था. एक खास महक भी उसके बदन से उठने लगी थी.

मई - भाभी... देखो मई कोई भी स्टेप अपनी मर्ज़ी से नहीं ले रहा.. भाभी के दिल की पेर्मिसिन जान कोई भी देवर बिना वक़्त जाया किया अपना मतलब निकल लेता है. भाभी हमारे जिस्म एक हो चुके हाँ. लेकिन हमारी जो भूक है. वो जिस्म की नहीं है. हमारे दिल की है.. भाभी आप ने पहले कभी प्यार नहीं किया.. मैंने भी नहीं किया.. लेकिन अचानक से सब हो जाने के बाद हम अब पीछे नहीं हैट सकते.. रख दीजिये मेरा हाथ पकड़ कर अपने दिल पर.. वहां जहाँ मई hi मई हों..

भाभी लरज़ने लगी थी.. मई कुछ देर इंतज़ार करता रहा..

मई - मई खुद से नहीं रखूँगा भाभी.. मई देर भी नहीं करना चाहता. एक स्टेप... भाभी सिर्फ एक स्टेप.. आप का अपने दिल पर मेरा हाथ रखना मुझे बता देगा.. आप भी वही चाहती हाँ.. जो मेरा दिल छह रहा है.. प्यार में धोका नहीं होता भाभी... डर भी नहीं होना चाहिए.. एहि डर आप की सबसे बड़ी कमज़ोरी है. इसे अपने दिल से निकाल दीजिये. फिर आप मई और हम सब एक हैप्पी लाइफ जियेंगे.

भाभी की कनपटी हुई आवाज़ गूंजी - कैसे... कैसे बाबू कैसे.. मई नदीम की अमानत हों.. उसके शिव किसी और के हाथ वहां नहीं पोहचने दे सकती.. जहाँ हाथ बढ़ने की इजाज़त सिर्फ नदीम को है

मई - नदीम भाई रस्म ो रवाज के मुताबिक़ आप के जिस्म के मालिक बने हाँ.. लेकिन मई.. मई तो दिल से, रूह की गहराइयों से, आपकी एक एक सांस का मालिक बन चूका हों.. क्या मैंने गलत कहा

भाभी मेरे नशे में बहती हुई दूर तलाक जाने लगी. उनकी साँसों की गर्मी मेरे कंधे को गर्माने लगी

भाभी - सही कहा तुमने बाबू.. लेकिन ये कितना गलत हो रहा है न.. ऐसा तो कहीं नहीं होता

मई - होगा भी कैसे.. कहीं और न आप के जैसी कोई है. न hi मेरे जैसा अनमोल प्यार देने वाला कोई बाबू है.. मान लीजिये मेरी बात और उठा कर देख दीजिये मेरे हाथ को अपने दिल पर. मई अब तभी रुकूंगा.. जब मई अपना हाथ आप के दिल पर जान लूंगा.. आप ने नहीं रखा तो मई आप के पास से चला जाऊँगा. फिर कभी आप के इतने करीब नहीं आऊंगा. आप को अगर ऐसा लगता है. मई गलत आप के करीब आ रहा हों. तो गलत को सही में बदलने में मई आप की पूरी पूरी मदद करुणा. मई आप के लिए बाबू hi रहूँगा. बाबू आप के दिल में भी रहेगा. लेकिन जितना करीब वो आप के आ चूका है. फिर कभी इतना करीब नहीं आएगा. क्यों की इतना आगे बढ़ जाने के बाद पीछे हटना, आप के लिए होगा.. मई तो अब आप से दूर रहने की सोच hi नहीं सकता. एक सच कह दूँ आप से.. जब से मैंने खुल कर प्यार करना शुरू किआ है. आप सब के अनमोल प्यार को प् कर अपने प्यार को अनमोल बनाया है. मेरे उस दिन से पहले दो लड़कियों के साथ फिसिकल रिलेशन्स थे. लेकिन

मैंने भाभी के सर पर हाथ रख दिया - लेकिन आप की कसम है मुझे भाभी.. मैंने वो फिजिकल रिलेशन ख़तम कर दिए हाँ. जानती हाँ आप भाभी. मैंने ऐसा किस लिए किया. क्यूंकि वो जिस्मानी ताल्लुक़ात थे. दिल से नहीं थे. जिस्म की भूक मिटने के लिए थे. लेकिन अब जब के मेरे दिल में मेरी रूह में प्यार hi प्यार खालिस प्यार है. तो मई जिस्मानी कुर्बत को दिल और रूह के बाद hi आखरी साँस तक रखने का खुद से वडा कर चूका हों.. आप के सर पर हाथ रख कर आप की hi कसम खा कर मई कहता हों. मेरे करीब आज से सिर्फ और सिर्फ वही आएगी. जो मेरे दिल के करीब होगी. जिससे मुझे प्यार होगा. जिसे मुझसे प्यार होगा. मेरे दिल से प्यार hoga..na कह मेरे जिस्म से.. हाँ भाभी.. जिस्मो की आग कभी नहीं बुझती है. लेकिन दिल में प्यार hi प्यार हो तो जिस्म तो एक बहाना बन जाया करता है. वर्ण जिस्म की प्यास बुझा कर हम अपने दिल को वो सुकून पोहंचा जाते हाँ, रूह की गहराइयों में वो अहसासात उतार देते हाँ. जो जिस्म की प्यास बुझाने पर कभी हासिल नहीं हो पते.. आप ज़यादा न सोचिये भाभी जी.. मुझे आप के जिस्म से नहीं आप के दिल और रूह से प्यार है.. और ये प्यार अब हमेशा रहने वाला है. कभी ख़तम नहीं होगा. सांस के ख़तम होने पर hi ख़तम होगा..

मैंने एक गहरी सांस ली.. और भाभी के चेहरे को थम कर भाभी की आँखों में उतरता हुआ बोलै - मेरे मोह से निकला एक एक लफ्ज़ आप के दिल की गहराइयों में उतर रहा है. आप का दिल मेरी बात पर यकीन कर रहा है भाभी. क्यों भाभी..

भाभी एक टिक मेरी आँखों में देखती चली गई.. हम दोनों पलकें झुकना तक भूल गए थे.. और भाभी की आँखों में मुझे अजीब सी चमक और ख़ुशी दिखाई di..fir भाभी की हैरत भरी आवाज़ सुनाई दी

भाभी - बाबू.. तुमने अपना बड़ा सीक्रेट मुझे बता दिए. वर्ण घर में कोण अपनी ऐयाशियों की दास्ताँ नशर करता है.

मई - आप के लिए भाभी.. आप के प्यार के लिए.. आप कहेंगी तो मई आप के करीब भी नहीं आऊंगा.. मई हमेशा बिना जिस्म की भूक के जीता रहूँगा.. आप को अपना मान कर hi तो मैंने आप को अपना सीक्रेट बताया है.. ये भी बता दिए. अब से मई कभी किसी लड़की के जिस्म को देख डांवाडोल नहीं होवेंगा..

भाभी - मुझे यकीन है बाबू..

मई खिल उठा - तो फिर.. रख दीजिये मेरा हाथ पकड़ कर अपने दिल पर

भाभी शर्मा कर अपनी पलकें गिरती हुई नज़रें झुका गई.. मई भाभी का शरमाया चेहरा देखने लगा. फिर भाभी के पुरे चेहरे को प्यार से चुम डाला..

भाभी ने अपना हाथ बढ़ा कर मेरे हाथ को नहीं थमा.. कनपटी हुई आवाज़ में बोली... मई मुश्किल से hi सुन पाया

भाभी - tt---tum...khud hi रख लो

और मई झूम उठा.. मई बाज़ी मार गया था. भाभी ने अपने दिल पर नहीं अपने मुम्मे पर हाथ रखने की परमिशन दे दी थी मुझे.. मई क्यों और देर करता.. मैंने अपना दाहिना हाथ उठाया और भाभी के कमीज़ और ब्रा के कैद बड़े मुम्मे पर रख दिए.. भाभी एक हाथ मेरे कंधे पर रख कर कनपटी हुई खुद को गिरने से बचा गई. वो जज़्बात की शिद्दत से पूरी तरह लरज़ने लगी थी.. उनकी सांस भरी हुई. मेरी तो सांस hi रुक गई थी...

मई भाभी के मुम्मे पर हाथ रखे भाभी के मुम्मे को महसूस करने लगा. भाभी के दिल की धक् धक् बड़े ज़ोर ो शोर से सुनाई देने लगी. भाभी अपना श्रम से भरी सर संभल नहीं प् रही थी.. वो अपना सर मेरे कंधे पर रख तेज़ तेज़ सांस लेने लगी.. मई भाभी के मुम्मे को पकड़ कर दबा गया. कितना सॉफ्ट था.. जल्द hi ये मेरे हथु में आ कर, मेरे होंटो और ज़ुबान के कहते जाने से सख्त हो जाने वाला था. आठ नदीम भाई मैंने आप की सबसे कीमती चीज़ पर अपना कब्ज़ा जमा लिए था. अब जल्द hi भाभी पूरी नंगी होकर मेरे सामने आ जाने वाली थी.. ummmmmmmmmmmm

मैं भाभी के सॉफ्ट मुम्मे को पकड़ कर दबा रहा था. भाभी की सांस और तेज़ होती जा रही थी.....

मई नशे में डूबी आवाज़ के साथ बोलै - भाभी कैसा लग रहा है.. अपने बाबू के हाथ में अपने दिल का रखवाला जान कर...

भाभी तो काँप रही थी.. उनकी ज़ुबान उनका साथ छोड़ चुकी थी.. भाभी अब गर्म होने लगी थी.. ये अहसासात थे. उनके एक मुम्मे पर एक मर्द का हाथ था. वो मर्द, जो उसके दिल में था..

मई - आज से मैंने मेरे दिल में आप को पूरी तरह अपना मान लिया. अब मई जब चाहे आप के जिस्म के किसी भी हिस्से पर अपना हक़ जमा सकता हों. और आप मुझे रोकेंगी नहीं..

भाभी ने इस बार भी कुछ नहीं कहा. मेरी आवाज़ में भी चेंज आ गया था. मई भी जबज़ट की शिद्दत से बहकने लगा था. अब मई अपने लुंड को नहीं संभल सकता था. वो सख्त होने लगा.. उसे तो बास बहाना hi चाहिए था. वो मोअस्सर बहाना मिला तो, अपने लिए टारगेट मिला तो मेरी अनसुनी करते हुए पुरे जोबन पर आ गया. पर अभी भी वो मायूस hi रहने वाला था.

मैंने अपना दूसरा हाथ भाभी के दूसरे मुम्मे पर रख दिए.. भाभी के चेहरे पर मुझे पसीने के कतरे चमकते हुए दिखाई दिए.... मई भाभी के बीएड पर ला कर लिए गया. खुद भाभी के ऊपर आ कर भाभी को किश करता हुआ भाभी के दोनों मुम्मों को दबाने लगा

भाभी सिसक पड़ी.. एक सार्ड आठ के शिव भाभी के मोह से कोई दूसरा लफ्ज़ नहीं निकला.. भाभी ने फिरसे किश में मेरा साथ नहीं दिए. लेकिन उनकी पूरी पूरी मर्ज़ी शामिल थी... इधर नीचे से मेरा सख्त लुंड भाभी की पंतय में कैद फुद्दी पर दबने लगा.. मई चाहता था. एक बार.. बस एक बार भाभी की फुद्दी मेरे नाम का रस बहा ले..

और मई इसी कोशिश में लगा रहा... भाभी का दिल तो पहले से hi मेरा हो चूका था. अब जिस्म भी मेरा हुआ तो भाभी का जिस्म भी भाभी के कण्ट्रोल से बहार होता हुआ गर्म होने लगा. भाभी के जिस्म की आग बढ़ी तो वो मेरे सर पर दोनों हाथ रखती हुई मुझे किश करने लगी.. नीचे से भाभी ने अपनी फुद्दी को उठा कर मेरे लुंड पर नहीं दबाया, न hi रगड़ा.. लेकिन किश में वो पुरे जोश के साथ मेरा साथ देने लगी..

फिर मैं पलट कर भाभी को अपने ऊपर ले आया.. भाभी बंद ऑंखें खोल क्र मुझे देखने लगी. ऐसे hi नशे से चूर आँखों से मुझे देखती हुई किश करने लगी.

थोड़ी देर मेरे होंटो को चूस वो तेज़ सांस लेती हुई बोली

भाभी - मई पहले hi समझ गई थी. तुम इशारा भी गर करोगे तो मेरा बेईमान दिल मान लेगा.. आठ बाबू ये तुमने श्रम ो हाय वाली सराह को बेवफा बना दिए...

मई - बेवफा नहीं.. प्रेम दीवानी बना दिए है..

भाभी ने मेरी आँखों में देखा. फिर ऑंखें बंद करती हुई मेरे होंटो के साथ होंठ मिला गई.. इस बार की किश में जोश की शिद्दत रिकॉर्ड तोड़ थी.. कभी मई भाभी के ऊपर होता और उनके होंठ चूस रहा होता. कभी भाभी मेरे ऊपर.... ऐसे में लुंड और फुद्दी के मेल भी खूब रहा.. फिर भाभी किश छोड़ एकदम से अपनी फुद्दी को मेरे लुंड पर कस के रगड़ती हुई ढीली पद गई..

"ये लगा chakkkaaaaaaaaaa"

मई दिल में नैरा मार गया.. भाभी ने अपने नए नए आशिक़ के जिस्म से मज़े लेते हुए अपनी फुद्दी का रास बहा दिए था.. अब भाभी कभी वापिस नहीं लौट सकती थी. अब तो वो मेरे संग दूर और दूर तक जाने वाली थी......

भाभी रिलैक्स होने के बाद मेरी साइड लेट गई सिसकने लगी.. मैंने देखा तो उनकी आँखों में आंसू थे... मई भाभी के गाल पर उँगलियाँ फेरता हुआ बड़े प्यार से बोलै

मई - क्या दुःख हो रहा है भाभी

भाभी - अब भी मुझे भाभी hi कहोगे बाबू.. अब तो तुम मुझे सराह कहने का हक़ प् चुके हो.. गलत तरीके से hi सही.. लेकिन तुम मेरे वो बन गए हो. जो एक शोहर परास्त औरत कभी किसी को नहीं बनाया करती

मई - मई क्या बन गया हों

भाभी रोटी हुई मेरी आँखों में देख बोली - तीसरा.. हाँ बाबू तुम तीसरे बन गए हो.. और जो तीसरा होता है न.. वो दो के बीच में हमेशा hi एक्स्ट्रा होता है.. भले hi मैं बहार की दुन्या में घुली मिली नहीं हों. लेकिन ीनता ज़रूर जानती हों.. दो के बीच के तीसरे के होते हुए हमेशा hi फसाद और घरेलु नचकियाँ पैदा हुई हाँ.. अक्सर बात को इतना बढ़ते देखा गया है... सोच कर hi रूह काँप उठती है..

मई - मई तीसरा नहीं हों.. एक तो ये बात आप हमेशा के लिए अपने दिल से निकाल दें

भाभी - कैसे निकाल दूँ बाबू.. नदीम मेरा शोहर है और तुम्हारा भाई.... तुम मेरे देवर होकर मेरे साथ इस हिसाब से आगे बढ़ गए हो. जिस हिसाब से किसी और के साथ आगे बढ़ना मेरे जैसी औरत के लिए एक गाली है. भले hi मई दिल से मजबूर हों. लेकिन साडी ज़िन्दगी सिर्फ दिल के हिसाब से hi नहीं गुज़री जा सकती.. दुन्या में बिन दुन्या वळून के नहीं रहा जा सकता.. और दुन्या वळून के साथ रहने के लिए दिल की नहीं दिमाग की ज़रूरत होती है. सुना तुमने बाबू.. दिल रिश्तों को गहरा बनाने में काम अत है तो दिमाग... दिल प्यार के लिए होता है बाबू.. और दिमाग जीने के लिए.. अपणु के साथ जोड़े रखने के लिए... जहाँ दिल की बात पर हम लड़ झगड़ कर अलग हो जाया करते हाँ. वही दिमाग हमें समझदारी सूझता है. वो न हो तो दिल भी बेकार मन जाता है.... मेरा दिल मेरे पास रहा नहीं.. दिमाग में मेरी अपनी कोई सोच रही hi नहीं... जो भी है.. वो साडी की साडी मांफी है... अजीब अजीब डरावने सन आँखों के सामने लहराने लगे हाँ..... ऐसे जैसे मुझे भरे मजमे में---

मैंने भाभी को अपने साथ जोड़ लिए.. भाभी रोने लगी. मई भाभी की पीठ और गाल को सहलाने लगा..

मई - मैंने पहले भी कहा था. और अब भी कहता हों.. मई फिरोज हों.. लेकिन आप सब के लिए मई बाबू हों.. और बाबू जान देकर अपणु की ज़िन्दगी में कोई ग़म नहीं आने देगा.. और आप मेरी बात कान खोल कर सुन लीजिये.. आप नदीम भाई के साथ हों तो मुझे भूल जाय करें.. मुझे कभी तीसरा न बनने दें. मई तीसरा बन गया तो पराया हो जाऊँगा. और मई पराया नहीं बनना चाहता.. घर में कोई एक डिस्टर्ब रहेगा तो पुरे घर वाले टेंशन में आ जायेंगे.. आप या फिर नदीम भाई में से कोई भी किसी उलझन का शिकार हुआ.. समझ लीजियेगा.. सब परेशानियों में मुब्तला हो जाएंगे.. हमने प्यार किआ है भाभी. कोई गुनाह नहीं. और मई आप मेरे लिए कभी सराह नहीं बनेंगी.. मई हमेशा आप को भाभी जी hi कहूंगा.. क्यूंकि जो रेस्पेक्ट भाभी जी कहने में है मेरे दिल में आप के लिए.. वो आप का नाम लेकर नहीं रह पाएगी.. आप मेरे लिए सराह बन गई तो फिर मई आटोमेटिक वो तीसरा बन जाऊँगा.. मई बंद कमरे में या खुले में आप को वही रेस्परेक्ट दूंगा.. जो आप डेसेर्वे करती हाँ.....

भाभी मेरी आंख में देखती हुई बोली - बाबू.. तुम्हारा प्यार hi है.. जो मुझे हर लम्हा मेरी हिम्मत को बढ़ता रहता है.. वर्ण मई पठान लड़की होकर भी अंदर से बड़ी बुज़दिल हों

मई - अपनी शर्म और इज़्ज़त की फ़िक्र में रहते हुए हर लड़की अंदर से बुज़दिल hi होती है. वो भरे मजमे में किसी से भी लड़ सकती है. लेकिन इज़्ज़त के खो जाने का डर उसे हमेशा hi रहता है. और मई आप की ताक़त बनकर हमेशा आपके साथ रहूँगा.. आप हमेशा के लिए डरना छोड़ दें

भाभी को मई ऐसी hi बातें करते हुए रिलैक्स करता चला गया. ऐसे देर लगने वाली थी..

मई - तो फिर क्या किया आपने क्रीम के साथ... काम बना के नहीं

भाभी एकदम से शर्मा कर मेरी तरफ पीठ कर गई.. मई हस्ता हुआ पीछे से भाभी जी के साथ लिपट गया.. फिर भाभी जी की कमीज़ में हाथ दाल कर भाभी जी के पेट को सहलाने लगा. ये इनर बॉडी पर मेरा पहला नंगा टच था.. भाभी फिरसे कैंप उठी..

क्या मुलायम पेट था भाभी जी का

मई भाभी के गाल को चुम कर - बताइये न

भाभी - वो.... वो.. बाबू.... मुझसे नहीं हो पाया

मई समझ सकता था. लेकिन फिर भी बोलै - वो क्यों भला ??

भाभी कनपटी हुई शर्म से लरज़ती हुई बोली - डर... बाबू मेरे अंदर से डर नहीं जा रहा है

मई - अब तो मई आप का हो चूका हों.. आप की हेल्प करूँगा

भाभी झट मुझसे अलग होकर बीएड से भी उतर कर कड़ी हो गई.. शर्म से कनपटी आँखों से मुझे देख बोली - बेशरम... तुमसे मई ऐसी कोई हेल्प नहीं ले सकती

भाभी रुक रुक कर बोली थी..

मई - आप की हर परेशानी का सलूशन भी मैं hi करूँगा.. मई hi आप के दूर को नदीम भाई के लिए---

भाभी झट से झुकी और मेरे मोह पर हाथ रख गई. कांपता हुआ हाथ बड़ा hi गरम था.. झुकने से भाभी के मुम्मे आधे झलक पड़े थे.. मेरी नज़र भाभी के मुम्मों पर पड़ी तो भाभी मेरी नज़रों की गुस्ताखी को जान फिरसे झटका खा गई.. वो सीढ़ी कड़ी हो गई.. मेरी तरफ पीठ करके कड़ी हो गई....

भाभी धीरे से बोली - बेशरम

मई हस्ता हुआ बीएड से उतरा.. और भाभी को पीछे से अपनी बहन में भर लिए

मई - अगर क्रीम या मेरी ऊँगली से काम नहीं लेना चाहती हाँ आप.. तो मेरे पास एक टीका है.. उसके ज़रिये मई आप की साडी परेशानी दूर कर सकता हों

भाभी ज़ोर लगा कर मुझसे छूटने लगी...

भाभी - प्ल्ज़ मुझे छोड़ दो

मैंने छोड़ दिए.. भाभी मुझस अलग होकर सीढ़ी होकर मुझे देखने लगी.. मैंने भाभी की एक कलाई पकड़ी और खेंच कर खभी को अपने गले से लगा लिया.. फिर भाभी के गाल पर उलटे हाथ की उलटी उँगलियाँ रगड़ता हुआ बोलै

मई - हाय भाभी.. आप ज़ाहिरी टावर पर कितनी हसीं हाँ... uffffffffff.. भाभी जी मुझे देखना... ऐसी क्याआ खास बात है पीछे. जो आप नदीम भाई आपके पीछे पीछे हाँ.....

भाभी कैंप रही थी. शर्म उन्हें एंटी आ रही थी.. अगर उन्हें इजाज़त दे दी जाती. तो वो पुरे घर में भगति फिरती.. लेकिन ऐसे वो नहीं भाग सकती थी. उनके चेहरे के जो रंग थे. वो कोई और देख लेता तो भाभी भगति भगति लड़खड़ा कर गिर पड़ती.. और फिर कभी सर न उठती..

भाभी - बाबू... न करो न.. तुम ज़यादा स्पीड से ज़यादा बेशरम बनते जा रहे हो

मई - हमारे दिल भी तो उतनी hi स्पीड से एक हुए हाँ.. बाकि के कनेक्शंस भी स्पीड से जोड़ लिए जाएँ तो क्या हर्ज है

भाभी - मुझे टाइम चाहिए बाबू.. मई समझ सकती हों. न तो तुम मुझसे दूर रह पाओगे अब.. और न hi---

मई - और न hi आप... लेकिन आप की परेशानी ऐसे तो जाने से रही... सुराख़ खुले नहीं तो ज़बरदस्ती खोल दिए जाएगा.. फिर आप को हार्ट अटैक आ जाएगा.. आप डर से नहीं लड़ सकती हाँ न अभी

भाभी ने नाराज़गी भरी निगाह से मुझे देखा.. मई तो अब फुल मस्ती के मूड में आ गया था..

भाभी ने मेरी आँखों में देख झटके में फिरसे नज़रें झुका लें

भाभी - बाबू मुझे ऐसा न देखो प्ल्ज़..

मई- वडा करता हों नहीं देखूंगा. लेकिन आप को पहले मुझे वो पीछे वाला दिखाना होगा

भाभी - नहीं.. मई मर जाउंगी.. लेकिन तुम्हे वो नहीं दिखाउंगी...

मई - मई ज़बरदस्ती भी कर सकता हों

भाभी मेरे सीने पर मुक्का मारती हुई बोली - नदीम क्या काम है.. जो ज़बरदस्ती के लिए बोलता है. तुम भी वही करोगे तो फिर तुममे और नदीम में क्या फर्क रहेगा

मई - हाहाहा.. ठीक है.. ठीक है.. लेकिन उसे खुला भी तो करना है. आप ऐसा करें.. पहले क्रीम लगा कर उसे सुन्न कर लें.. फिर बर्ष तरय करें

भाभी शर्म से बोल नहीं पाई

मई - नहीं तो मई किचन में जाता हों.. और खीरा ले आता hon..kheera न मिला तो गाजर.. वो भी न मिली तो मूली.. वो भी न मिली तो बेलना.. वो भी न मिला तो--

भाभी एक प्यार भरा चांटा मेरे गाल पर मारती हुई बोली - बाबू तुम किटने बड़े बेशरम हो. खाने की चीज़ भला वहां कोई इस्तेमाल करता है

मई - आप की सहूलत के hi लिए hi बोल रहा था मई.. ाचा आप कपडे बदल कर आएं.. मई कुछ करता हों

भाभी शर्म से बोली - नहीं.. बाबू.. नहीं.. मई अभी उस हालत में तुम्हारे सामने नहीं आ सकती.. इतनी हिम्मत नहीं है मुझमे

मई - मई समझ सकता हों. इसका सलूशन भी है मेरे पास.. इस बार मई सेरियऑस हों भाभी.. पहले आप की परेशानी.. फर कोई दूसरी बात

भाभी मेरी आँखों में झांक मेरी संजीदगी को तोलती हुई बोली - कैसा सलूशन ??

मई - आप कोई पुराणी शलवार पहन लें. पीछे से ठीक वहां से शलवार पहाड़ लें. कमरे की लाइट ओफ़्फ़्फ़ कर दें... अगर तो आप खुद से कर सकती हाँ तो ठीक.. नहीं कर सकती तो कमरे में अँधेरा करने के बाद मई आप के क्रीम लगा कर आप का डर ख़तम करने में आप की मदद कर सकता हों.. और अब आप के पास मेरी मदद के शिव कोई दूसरा रास्ता भी नहीं है.. जितने करीब आ चुके हाँ हम.. मेरा इतना करने का हक़ भी बनता है भाभी. और आप मुझसे मेरा हक़ छीन नहीं सकती. जाइये.. बाथरूम में कोई पुराणी शलवार लेकर जाइये.. और वो पहन कर आएये.. तब तक मई कमरे की लाइट ऑफ करता हों..

भाभी ने एक पल को मेरी आँखों में देखा.. फिर वही कड़ी कुछ देर सोचती रही.. सोचने के बाद फिरसे नज़र उठा कर मुझे देखा और बोली - तुम पहले वडा करो.. कोई बदमाशी नहीं करोगे.. जितना काम होगा.. उतना hi करोगे...

मई - मई वडा करता हों. बिना आप की इजाज़त के मई आप के साथ कोई बदमाशी नहीं करूँगा

भाभी - ये क्या बात हुई.. नहीं तुम वडा करो..

मई - हाँ मई वडा करता हों. मेरा कोई भी आप के साथ बदमाशी करने को दिल चाहा तो मई आप से कहूंगा. आप ने इजाज़त दे दी तो ठीक है.. वर्ण

मई ढीला पड़ता हुआ मायूस लहजे में बोलै.. भाभी को हसी आई.. लेकिन शर्म ज़यादा थी. वो अपनी हसी दबा गई...

भाभी - बाबू.. तुम ज़रूर मुझे बहका डोज..

मई - मई इस बात की कोई गारंटी नहीं दे सकता हों आप को भाभी.. आप इतनी हसीं हाँ.. मेरे दिल में हलचल तो मचेगी hi.. ऐसे में आप का दिल भी तो कुछ गड़बड़ hi चाहेगा न. सो मैं पहले आप से पूछूंगा.. फिर आगे बढूंगा..

भाभी फिरसे कुछ बोलना चाहती थी. मैंने भाभी को पलटा दिए - अब जाइये.. देर करेंगी तो कुछ नहीं हो पायेगा

भाभी बेचारी शर्म से कनपटी चाल चलती हुई अलमारी के पास गई.. वहां से एक पुराणी शलवार निकल कर मुझे देखे बिना hi बाथरूम की तरफ जाने लगी.. भाभी को बाथरूम में बंद देख मैं अपने लुंड को मसलने लगा...

आह्हः कितनी देर से खुद भी तंग हो रहा था.. और मुझे भी सूली पर टांग रखा था इसने......

 
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