अपडेट- 06
अभिषेक के घर छोड़कर जाने के बाद सभी का रो रो कर बुरा हाल हो गया था. रानी जी रट हुवे आनंद जी से बोली.
रानी जी- आपने उसे जाने के लिए क्यों बोलै. देखिये आप के कहने के बाद वो घर छोड़कर चला गया. मेरा बीटा. आपने ऐसा क्यों किया.
आनंद जी- जाने दो उसे. जब ज़माने की ठोकर खायेगा तो ज़िन्दगी की हकीकत से रूबरू होगा. उसे भी तो पता चलना चाहिए की ज़िन्दगी इतनी आसान भी नहीं है जितनी वो समझ रहा है. जब आते दाल का भाव पता चलेगा तो वो खुद hi लौटकर घर आ जायेगा.
सरिता- नहीं पापा. भैया अब नहीं आएंगे. उन्हें मेरी बात बुरी लग गयी है. मैंने तो बस यही कहा था की उन्होंने जो किया वो गलत था. मुझे नहीं पता था की मेरी ये बात उनको इतनी बुरी लग जाएगी की वो घर छोड़ कर चले जाएंगे.
रानी जी- तुझे बोलना hi नहीं चाहिए था कुछ. अगर तू चुप रहती तो वो शायद नहीं जाता.
आनंद जी- इसमें सरिता की कोई गलती नहीं है. उसने कुछ भी गलत नहीं कहा. अच्छा अब तुम दोनों शांत हो जाओ. वो कही नहीं जायेगा. लौट के घर hi आएगा.
आज सरिता ने डिस्ट्रिक्ट में 6तह पोजीशन के साथ 95% नंबर लेकर अपने पापा का नाम रोशन कर दिया था, सभी बहुत खुश थे. उसके इतने नंबर से पास होने की खबर जंगल में आग की तरह फ़ैल गयी थी. लेकिन कुछ hi पल में साडी खुशिया मातम में बदल गयी. उनकी साडी खुशिया अभिषेक अपने साथ ले गया था.
इसी तरह रात हो गयी. किसी ने ठीक से खाना नहीं खया और अपने अपने बिस्टेर पर चले गए. किसी की आँखों में नींद नहीं आ रही थी. जब भी कोई खटका होता. रानी जी या सरिता तुरंत जाकर दरवाज़ा इस उम्मीद में खोलती की शायद अभिषेक घर आ गया होगा, लेकिन वो घर नहीं आया.
जब इस बात की खबर सरिता के मां को हुई तो वो भी अपनी पत्नी के साथ आनंद जी के यहाँ आये और उन्हें दिलासा देने लगे. वो दिल आशा देने के आलावा और कर भी क्या सकते थे.
इसी तरह दिन गुजरते रहे दिन महीनो में बदले और महीने वर्ष में तब्दील हो गए, लेकिन अभिषेक जो घर छोड़कर एक बार गया तो वो वापस नहीं लौटा. उसने सरिता की बात का बहुत बुरा मान लिया था. एक बार भी उसकी बात का मतलब समझने की कोशिश भी नहीं की थी अभिषेक ने.
सरिता ने कुछ भी गलत नहीं कहा था. एक लड़की जब जवान होती है तो उसके ऊपर जिस्म के भूखे गिद्धों की नजर हमेशा रहती है. लेकिन सबसे लड़ा नहीं जा सकता, कुछ को अवॉयड कर दिया जाता है कुछ को समझाया जाता है. तब जाकर लड़की सेफ होती है.
बहरहाल अभिषेक भले hi एक बिगड़ा हुवा लड़का था. लेकिन उसने कभी भी किसी की बहन बेटी को बुरी नजर से नहीं देखा था. उसकी जो भी शिकायत घर पर आती थी वो केवल लड़ाई झगड़ा या मारपीट की hi आती थी.
आनंद जी को बाद में पता चल गया था की उन दोनों लड़को ने सच में सरिता और मनीषा के बारे में बुरी बात की थी इसलिए अभिषेक ने उन्हें मारा. आनंद को बहुत अफ़सोस हो रहा था की उन्होंने गुस्से में आकर अभिषेक को घर से जाने के लिए बोल दिया. और अभिषेक घर छोड़कर चला भी गया. वो सबके सामने भले hi अपने आपको मज़बूत बनाना की कोशिश करते थे, लेकिन जब अकेले होते थे तो उन्हें अपनी ये बात सोचकर आंसू बहते थे.
घर के सभी षडाश्यो का भी यही हाल था. अभिषेक घर छोड़कर क्या गया उनकी साडी खुशिया और हंसी अपने साथ ले गया. उसको गए पूरे दो साल हो चुके थे. आज फिर से सरिता का अन्तर मेडिएट का रिजल्ट आया. जिसमे उसने फिर से 93% मार्क लाये. लेकिन अब उसके लिए इनका कोई महत्व नहीं रह गया था.
उसकी खुशियों में शामिल होने वाला भाई नहीं था अब. सरिता के मार्क्स के बारे में सुनकर आस पास के लोग खुश थे, लेकिन सरिता के चेहरे पर कोई ख़ुशी नहीं थी. जिसे देखकर मनीषा समझ गई की सरिता किसलिए दुखी है. इसलिए उसने सरिता को समझते हुवे माहौल को हल्का बनाते हुवे कहा.
मनीषा- ये क्या दिदिया. कब तक ऐसे गुमसुम रहोगी तुम. जो हो गया उसे भूल जाओ. भैया को अगर हमसे प्यार होता तो वो कभी भी हम सबको छोड़कर नहीं जाते. और अगर गुस्से में चले भी गए थे तो आज दो साल हो गए हैं. वो वापस जरूर लौटकर आते. वो अब हमसे प्यार नहीं करते दिदिया. अच्छा छोडो ये सब. तुम इतने अच्छे नम्बरो से पास हुई हो. चलो दुकान पर चलते हैं मिठाई खाने.
सरिता- मेरा मन नहीं है कहीं जाने का. आज भैया की बहुत याद आ रही है. मेरे hi कारन भैया को घर छोड़कर जाना पड़ा. मैं अछि बहन नहीं हूँ मनीषा. मैं अच्छी बहन नहीं हूँ. अगर उस समय मैं चुप रहती हो भैया हमें छोड़कर कभी नहीं जाते. ये सब मेरे hi कारन हुवा है.
मनीषा- नहीं दिदिया. आप बहुत अच्छी हो. मैं तो आपसे बहुत प्यार करती हूँ. आप सबसे अच्छी हो. देखना एकदिन भैया को अपनी गलती का एहसास होगा और वो वापस जरूर लौट कर आएंगे.
सरिता- काश ऐसा हो जाये मनीषा. वो दिन मेरी ज़िन्दगी का सबसे बड़ा दिन होगा. उस दिन मुझे ज़िन्दगी की सबसे बड़ी ख़ुशी मिलेगी.
आनंद जी और रानी जी उनकी बाते सुन रहे थे. उन्हें भी जितना दुःख अभिषेक के जाने का था. उससे ज्यादा ख़ुशी इस बात की भी थी की उसकी दोनों बेतिया अपने भाई से अब भी बहुत प्यार करती हैं. वो दोनों उनके पास आये और उन्हें समझते हुवे बोले.
आनंद जी- देखो बेटी सरिता. जो भी हो गया उसे न तुम बदल सकती हो और न hi मैं. जो नियति ने लिखा था. वो तो होना hi था. उसके लिए तुम अपने आपको दोष मत दो. उसके लिए अगर कोई दोषी है तो वो मैं दोषी हूँ, क्योंकि मैंने hi उसे घर से जाने के लिए कहा था. अब अभिषेक तो चला गया है बेटी. अब तुम्ही दोनों हमारी ज़िन्दगी हो, तुम दोनों के सहारे hi हम आगे की ज़िन्दगी जियेंगे. इसलिए अपने मन को उदास मत करो. और जो हो गया उसे भूलकर जीवन के हर क्षेत्र में आगे बढ़ो.
रानी जी- हाँ बेटी तुम्हारे पापा ठीक कह रहे हैं. जो हो गया उसे वापस नहीं लाया जा सकता, लेकिन जो सामने है उसे तो हंसी खुसी जिया जा सकता है न. तो तुम अपने आपको दोषी man-na बंद कर दो बेटी. जो करम किस्मत में होता है उससे अधिक नहीं मिलता.
अपने मम्मी पापा की बात सुनकर दोनों उनके गले गाल गयी. वो कहते हैं न की समय हर ज़ख़्म को भर देता है. लेकिन यहाँ पर सरिता को अभिषेक के जाने पर जो जख्म लगा था उसकी भरपाई होना बहुत मुश्किल थी.
गुजरते समय के साथ सरिता ने अभिषेक को ढूंढने की बहुत कोशिश की, लेकिन वो अपने घर से ज्यादा दूर जा नहीं सकती थी, फिर भी जितना संभव हो सका उसने अपने हाथ पांव चलाये अभिषेक को ढूंढने के लिए.
5 वर्ष बाद.
आज सरिता 23 साल की भरपूर जवान लड़की बन गयी थी. आनंद जी ने जी तोड़ म्हणत करके सरिता को M.Sc की पढाई करवाई थी. वो भी मैथ सब्जेक्ट से. सरिता ने M.Sc. भी बहुत अच्छे मार्क्स में उत्तीर्ण की थी. मनीषा भी 20 वर्ष पार करके 21वे में प्रवेश कर चुकी थी और B.Sc. फाइनल में थी.
आज आनंद जी का घर फूलो से सजाया गया था. तरह तरह के पकवान बनाये जा रहे थे. सबके चेहरे पर ख़ुशी झलक रही थी. आनंद जी और रानी जी दौड़ दौड़ कर हर काम कर रहे थे. हलवाई को समझा रहे थे की कैसे कौन सा पकवान बनाना है. कितने बजे खाना बन जाना है. आनंद जी की बहाने और सेल सभी समय पर आ गए थे.
इसका कारण था आज सरिता की सगाई हो रही थी. लड़का सरकारी विभाग में 2400/- गप पर ता के पद पर जबलपुर में काम करता था. बड़ी मसक्कत के बाद ये रिश्ता जमा था. लड़के के घरवालों ने मोटर साइकिल और 2 लाख रस. नगद देने की बात की थी. तब जाकर रिश्ता फाइनल हुवा था.
इसके बारे में जब सरिता को पता चला तो उसने इस रिश्ते के लिए साफ इंकार कर दिया. उसका कहना था की मैं अपने माँ बाप को क़र्ज़ में डालकर उनके दुःख और दर्द पर अपने खुशियों का महल नहीं खड़ा कर सकती. जिसके बाद आनंद जी और सरिता के बिच तीखी नॉक झोक हुई (झगडे वाली नहीं समझने वाली) बहुत मुश्किल से सरिता इस शादी के लिए तैयार हुई.
ऐसा नहीं था की सरिता आगे नहीं पढ़ना चाहती थी. और आगे की पढाई करना उसका सपना था. वो पढ़ लिख कर अपने पैरों पर खड़ा होना चाहती थी. लेकिन वो अपनी आर्थिक श्तिति को भी भली भांति समझती थी. उसे पता था की उसके भाई के चले जाने के बाद उसके पापा बहुत टूट चुके हैं, क्योंकि सच्चाई पता चलने पर वो खुद को दोषी मान रहे थे.
आनंद जी बहुत म्हणत करके दोनों बेटियों को पढ़ा रहे थे. सरिता को अचे सा आभाष था की उसके पीछे मनीषा भी पढाई कर रही है और उसके बाद मनीषा की शादी भी करनी है. जिसके लिए पैसो की बहुत जरूरत है. दो बेटियों की शादी कुछ समय के अंतराल पर करना उसके पापा के लिए बहुत मुश्किल था.
वैसे भी हमारे समाज की विडंबना यही है की लड़की चाहे जितनी भी सुन्दर क्यों न हो, गुणवान और पढ़ी लिखी क्यों न हो. बिना दहेज़ के उसकी शादी होना बहुत hi मुश्किल है, इन्ही सब परिस्थितियों को देखते हुवे सरिता ने शादी के लिए हाँ कर दिया था. यही नहीं. उसने 2-4 सरकारी नौकरी के लिए भी फॉर्म भरा था.
दो बार वो उत्तीर्ण भी हुई थी. लेकिन उसकी किश्मत में शायद नौकरी नहीं थी. इसलिए उसका सिलेक्शन नहीं हो पाया था. सरिता एक समझदार और संकरी लड़की थी. उसने अपने पापा की कंडीशन को देखते हुवे अपने सपनो का गाला घोट दिया था.
कुछ hi देर बाद सगाई के लिए लड़के वाले आने को थे. लेकिन सरिता को आज अभिषेक की बहुत याद आ रही थी. वैसे तो उसे हर कोई याद करता था, लेकिन सरिता सबसे ज्यादा याद करती थी उसे. वो उसे याद करते हुवे गुमसुम बिकती हुई थी, उसकी आँखों में आँशु आ गए थे. मनीषा ने जब उसकी हालत देखि तो वो समझ गयी की उसकी दिदिया भैया को याद कर रही है. इसलिए वो उसके पास जाकर बैठ गयी और सरिता के बालो में हाँथ फिरते हुवे बोली.
मनीषा- क्या हुवा दिदिया. तुम रो क्यों रही हो. आज तो ख़ुशी का दिन है. तुम्हारी सगाई होने वाली है.
सरिता- तुझे तो पता है की मैं क्यों रो रही हूँ. मुझे भैया की बहुत याद आ रही है. काश वो आज हमारे साथ होते तो बहुत खुश होते वो. लेकिन मेरे कारन वो घर छोड़ कर चले गए.
मनीषा- आप हर बार अपने आपको क्यों दोष देती हो दिदिया. वो आपकी वजह से नहीं गए. वो नियति का फेर था दिदिया जो भैया को हमसे दूर ले गया. भैया भी हम लोगो को बहुत याद करते होंगे.
सरिता- अगर भैया हम लोगो को याद करते तो अब तक लौट कर घर जरूर आते. काम से काम एक बार तो आकर देख लेते की उनकी बहनो का उनके बिना क्या हाल हो गया है. उनकी बहाने उनसे कितना प्यार करती हैं.
मनीषा- आप ऐसा क्यों सोचती हैं दिदिया. भैया को एक दिन अपनी गलती का एहसास होगा और वो जरूर लौट कर आएंगे. चलो अब ये आँशु पॉच डालो. आज तो ख़ुशी का दिन है. आप को आँखों में आँशु अचे नहीं लगते दिदिया.
फिर दोनों बहाने कुछ देर बात करती रही. थोड़ी hi देर में लड़के वाले आ गए. अपनी क्षमता के अनुसार आनंद जी ने पूरी व्यवस्था की थी. कुछ hi देर में सगाई की रश्म शुरू हो गयी.
इसके आगे की कहानी अगले भाग में..