Kamukta kahani अनौखा जाल
06-13-2021, 09:40 PM,
#51
RE: Kamukta kahani अनौखा जाल
(09-12-2020, 12:41 PM)desiaks Wrote: भाग १०)

किचेन में कॉफ़ी बनाते हुए कुछेक बार देखा चाची की ओर.. चाची टीवी देखते हुए बीच बीच में साड़ी के ऊपर से अपने चूचियों पर हलके से हाथ फेर रही थी... जैसे ही चूचियों पर हाथ रखती उनका चेहरा ऐसा हो जाता मानो उनको बहुत दर्द हो रहा है | इतना ही नहीं, वो अपने पेट और जाँघों के अंदरूनी हिस्से पर भी हल्के तरीके से सहला रही थी | वक्ष, पेट या जांघ में से किसी पर भी हाथ रखते ही उनके चेहरे पर दर्द वाली एक टीस सी छा जाती | शायद आँखों के किनारों में आँसू थे उनके ..... उनकी ये हालत देख कर वाकई बुरा लगा मुझे पर उनकी इस हालत का ज़िम्मेदार कोई और है या वो खुद.. जब तक ये पता ना चले... मैंने अपने भावनाओं पर नियंत्रण रखने की ठान रखी थी |

कुछ ही देर में मैं स्कूटर लिए तेज़ गति से एक ओर चले जा रहा था | एक लड़के से मिलना था मुझे... मेरा ही स्टूडेंट है ... वो मेरी कुछ मदद कर सकता है ... |

घर पर ही मिल गया वो..

“गुड इवनिंग सर, सर .. आप यहाँ ?? मुझे बुलाया होता..|”

“वो तो मैं कर सकता था जफ़र... पर बात ही अर्जेंट वाली है... |”

“क्या हुआ सर...?” जफ़र का कौतुहल बढ़ा ..

“जफ़र... देखो.. ये कुछ सेंटेंस लिखे हुए हैं ... क्या तुम हेल्प कर सकते हो... आई थिंक ये उर्दू ज़बान में है...|” मैंने सिगरेट वाला पैकेट उसकी ओर बढाते हुए कहा..|

ज़फर ने पैकेट हाथ में लेकर करीब से देखा और देखते ही तपाक से बोल उठा, “सर.. माफ़ कीजियेगा .. ये अरबी भाषा में है..|”

ये सुनते ही चौंका मैं.. बहुत ताज्जुब वाली बात नहीं थी पर मैं इस बात के लिए तैयार नहीं था ; पर अब थोड़ा परेशान सा हो उठा | स्वर में बेचैनी लिए बोला, “तो तुम इसे ट्रांसलेट नहीं कर सकते?”

“कर लूँगा... शायद... पर थोड़ा टाइम लगेगा सर..|” जफ़र ने सिर खुजाते हुए कहा..

“कितना टाइम लगेगा..??”

“यही कोई दस-पंद्रह मिनट |”

“ठीक है... मैं बैठता हूँ... तुम जल्दी ट्रांसलेट करो...|”

जफ़र एक पन्ना और कलम ले कर बैठा और लगा माथा पच्ची कर के उन वाक्यों ट्रांसलेट करने | मैं वहीँ बैठकर एक मैगज़ीन को आगे पीछे पढ़ते हुए बेसब्री से इंतज़ार करने लगा | सामने वाल क्लोक के कांटे के हरेक हरकत के साथ मेरी बेचैनी भी बढती जाती थी | खैर, ऊपर वाले का शुक्र है की जफ़र ने ज़्यादा समय ना लेते हुए सभी वाक्यों के ट्रांसलेशन कर दिए | सभी ट्रांसलेशन कुछ ऐसे थे ...

kayf kan yawmak (आज का दिन कैसा रहा )
kanat jayida (अच्छा था)
hal sataemal (क्या वो काम करेगी?)
biaaltakid (बिल्कुल)
kayf kan hdha albund (वैसे माल कैसी थी)
raiye.... eazim (वाओ... ज़बरदस्त)

अभी और भी पढ़ता .. पर तभी... जफ़र ने टोकते हुए कहा की “सर, कुछ शब्द ऐसे भी हैं जो मैंने टूटे फूटे अंदाज़ में लिखे हैं.. मेरी ज़बान उर्दू है... अरबी नहीं.. पर .. थोड़ा बहुत समझता हूँ.. पर और जितने भी लिखे हैं वो कितने सही और कितने गलत होंगे... ये मैं नहीं जानता... सॉरी सर...|” चेहरे पर विनम्रता और स्वर में विवशता लिए वो बोला था | वो मदद करना चाहता था... पर बेबस था बेचारा.. | मैंने उन शब्दों के ओर नज़र डाले जिन्हें उसने किसी तरह ट्रांसलेट किये थे :-

१)योर होटल

२)दोपहर से शाम

३)ये माल और वो माल

४)चरस और गांजा

५)आटोमेटिक गन

६)गोला बारूद

७)जो बोलूँगा वो करेगी

८)मालिक/बॉस के मज़े

९)शादी शुदा ... नाम दीप्ति ...|

ये सभी शब्द पढ़ते हुए मेरे हैरानी का लेवल बढ़ता जा रहा था और अंतिम शब्द या यूं कहूँ की अंतिम शब्दों ने तो मेरे धड़कन ही बढ़ा दिए थे... ‘शादी शुदा... नाम दीप्ति...!!’

जफ़र से जितना हो सका उसने किया... मेरा काम अभी के लिए पूरा हो गया था.. | जफ़र को धन्यवाद बोल कर मैं स्कूटी से अपने घर रवाना हुआ | रास्ते भर यही सोचता जा रहा था की आखिर इन सभी बातों का चक्कर क्या हो सकता है.. होटल योर... दोपहर से शाम... चरस और गांजा.. गोला बारूद.. जो बोलूँगा वो करेगी... शादी शुदा... नाम दीप्ति... ओफ्फ्फ़ ... लगता है शुरू से सोचना पड़ेगा...| इन्ही बातों को सोचते सोचते घर के पास पहुँच गया.. | देखा गली के पास एक स्कूटर पार्क किया हुआ है ... शक के पंखों ने फिर अंगड़ाई ली..| मैंने अपना स्कूटर अँधेरे में एक तरफ़ लगाया और गली के मुहाने के पास इंतज़ार करने लगा | अँधेरे में जाने का रिस्क नहीं लेना चाहता था मैं --- और इतनी सारी बातों के उजागर होने के बाद से तो बिल्कुल भी कोई रिस्क नहीं लेना चाहता था |

गली से कोई आवाज़ नहीं आ रही थी..

खड़े खड़े पंद्रह मिनट से ऊपर हो गए...

मैंने सिगरेट सुलगाया और बगल के दीवार से सट कर धुंआ छोड़ने लगा.. तीन सिगरेट के ख़त्म होने और लगभग बीस से पच्चीस मिनट गुजरने के बाद अचानक गली से एक हल्की सी आवाज़ आई | शायद दरवाज़ा खुलने की आवाज़ थी वो .. मैं चौकन्ना हुआ.. ध्यान दिया.. दो जोड़ी जूतों की आवाज़ इधर ही बढती आ रही थी | मैं तैयार हुआ.. पता नहीं क्या करने वाला था.. बस उनका गली के मुहाने पर आने का इंतज़ार करने लगा... और जैसे ही वो दोनों मुहाने पर पहुँच कर आगे बढ़े ... मैं अनजान और जल्दबाजी में होने का नाटक करता हुआ उन दोनों से टकरा गया |

“अरे अरे... सॉरी भैया... आपको लगी तो नहीं ...” मैंने हमदर्दी जताते हुए पूछा.. पर जिससे पूछा.. वो ना बोल कर उसका साथी बोल पड़ा, “जी कोई बात नहीं... अँधेरे में होता है ऐसा...|”

मैंने फिर पहले वाले से पूछा, “आप ठीक हैं?” इस बार फिर दूसरे शख्स ने कहा, “जी... आप फ़िक्र न करे... हम ठीक है...|” ऐसा कह कर उसने पहले वाले की ओर देखा और बोला, “चलिए जनाब..” दोनों अपने स्कूटर की ओर बढ़ गए थे और जल्द ही स्टार्ट कर वहाँ से चले गए...| मैं उन्हें तब तक देखता रहा जब तक की दोनों आँखों से ओझल नहीं हो गए | उनके ओझल होते ही मैं नीचे ज़मीन पर देखने लगा .....

दरअसल, जब मैं उनसे टकराया था तब उनमें से किसी एक के पॉकेट या कमर या कहीं और से कोई चीज़ नीचे गिरी थी जिसे या तो उन्होंने जान बुझ कर नहीं उठाई या फिर अचानक मेरे सामने आ जाने से उनको इस बात का ध्यान ही नहीं रहा या वाकई पता नहीं चला होगा | ढूँढ़ते ढूँढ़ते मेरे पैर से कुछ टकराया | तुरंत उठा कर देखा | समझ में नहीं आया... तो मैंने स्कूटर के लाइट को ऑन कर के उस चीज़ को हाथ में लेकर देखा और देखने के साथ ही मारे डर के छोड़ दिया | कंपकंपी छूट गई मेरी... वो दरअसल एक पिस्तौल थी !! मैंने जल्दी से लाइट ऑफ किया और पैर से मार कर पिस्तौल को उसी जगह पर ठोकर मार कर रख दिया जहाँ वो था | इतने ही देर में दूर से रोशनी के आने का आभास हुआ और साथ में स्कूटर की भी | मैं दौड़ कर गली में घुसा और एकदम आखिरी छोड़ तक चला गया |

वे दोनों आ कर स्कूटर खड़ी कर इधर उधर ज़मीन पर देखने लगे | उनके हाथ में टॉर्च था ... जला कर तुरंत ढून्ढ लेने में कोई दिक्कत नहीं हुई उन्हें.. उठा कर स्कूटर में बैठे और चलते बने | जैसे वो चाहते ही नहीं थे की कोई उन्हें देखे..| कुछ देर वहाँ रुकने के बाद मैंने गली से निकलने का फैसला किया ... आगे बढ़ते हुए गली के दरवाज़े तक पहुँच ही था की उस पार से किसी की आवाज़ आई | दरवाज़े के दरारों से देखने का कोई फायदा नहीं था क्यूंकि उस तरफ़ पूरा अँधेरा था ----

पॉवर कट के कारण .. मैंने किसी तरह कोशिश करके दीवारों में जहां तहां बने दरारों पे पैर रख कर थोड़ा ऊपर चढ़ा और सिर ऊँचा कर के उस पार देखा... और जो देखा उसे देख कर अपनी आँखों पर यकीं करना शत प्रतिशत मुश्किल था... पूर्णिमा वाले रात के दो-तीन बाद वाले रात के चांदनी रोशनी में देखा की सामने ज़मीन पर मेरी चाची नंग धरंग हालत में पड़ी है !! उनके सारे कपड़े साड़ी, ब्लाउज, पेटीकोट, ब्रा और पैंटी ज़मीन के चारों ओर बिखरे पड़े हैं और चाची पेट के बल लेटी खुद को ज़मीन से रगड़ते हुए उठाने की कोशिश कर रही थी ..................

क्रमशः

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