सुप्रिया: एक जवान बीवी की कहानी - Page 15 - SexBaba
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सुप्रिया: एक जवान बीवी की कहानी

अपडेट 104

जुनैद और उसके घरवालों के जाने के बाद पूरे घर में हंगामा सा हो रखा था. हिना foot-foot कर रट हुए रुबीना से लिपटी हुई थी, और अब्बास गुस्से में तेज़ आवाज़ में चिल्ला रहा था. सुप्रिया मुँह लटकाये रुबीना के पास hi कड़ी थी, और इक़बाल छुप चाप चारपाई पर बैठा था. पिछले दो घंटो से चल रही बहस ने सबको बुरी तरह से थका दिया था, पर बात ख़तम होने का नाम नहीं ले रही थी.

हिना अपनी रोटी हुई आवाज़ में, सर हिलाते हुए चीख पड़ी - मैं नहीं करुँगी उससे शादी... मैं नहीं छोडूंगी अपनी पड़े!

पता नहीं ये बात वह अब तक कितनी बार दोहरा चुकी थी. पर इस बार उसकी आवाज़ बदली हुई सी थी, जैसे इतनी देर की बहस के बाद और भी बुलंद हो गयी हो.

अब्बास भी और ज्यादा भड़क उठा - शादी तोह हो कर रहेगी! कल से ये कॉलेज वोल्लेगे जाना सब बंद!! मैं देखता हूँ कैसी जाती है ये कॉलेज... साड़ी किताबे फाड़ दूंगा!

हिना भी पूरी बग़ावत पर उतर आयी - मैं देखती हु कैसे रोकते हो आप मुझे... मैं घर से भाग जयुंगी!

यह सुनते hi अब्बास गुस्से में उसकी तरफ लपका, शायद उसे मारने के लिए. हिना डर के मारे जल्दी से रुबीना और सुप्रिया के पीछे छुप गयी. उसकी सिसकती हुई चीखें पूरे घर में गूँज रही थी.

रुबीना कांपते हुए बोली - अभी गुस्से में है... इसे नहीं पता क्या बोल रही है...

हिना पीछे से बोली - मुझे अच्छे से पता है मैं क्या बोल रही हूँ...

रुबीना बात को और बिगड़ने नहीं देना चाहती थी और वह झुंझलाते हुए बोली - बस कर अब! सुप्रिया... इसे ऊपर लेकर जायो...

सुप्रिया खुद भी काफी दरी हुई थी, फिर भी उसने हिना के कंधे पर हाथ रख कर उसे संभाला और अपनी और खींचते हुए उसे ऊपर की और ले जाने लगी. हिना jaate-jaate भी रोटी और चिल्लाती रही.

अब्बास ने तीखी नज़रो से रुबीना को घूरते हुए देखा - तुमने hi इसे सर पर छडा दिया है... हर बात पर इसकी हिमायत करती हो. अब तोह घर से भागने की भी हिम्मत आ गयी है इसमें.

रुबीना ने धीरे से कहा - अभी बस गुस्से में बोल रही है... आप भी जानते है वह कुछ गलत नहीं करेगी...

अब्बास ने इक़बाल को घूरा - क्यों नहीं करेगी... ये भी तोह भगा के लाया था न किसी को... तोह क्यों नहीं भागेगी ये भी?

रुबीना छुप चाप ज़मीन पर देख रही थी. वह इस बात को आगे नहीं बढ़ाना चाहती थी.

अब्बास ने कड़वाहट के साथ कहा - इससे तोह ाचा होता तू वापिस hi नहीं आता यहाँ...

इक़बाल के होंठ गुस्से में बहार की और निकले हुए थे. वह गुस्से में उठा - आप नहीं चाहते मैं यहाँ राहु... तोह मैं चला जायूँगा यहाँ से...

रुबीना के होंठ से बस एक बोहोत hi धीमी सी आवाज़ निकली - नहीं...

अब्बास ने अपना फैसला सुनते हुए कहा - ये शादी तोह हो कर रहेगी! कोई यहाँ रहे या न रहे.

रुबीना - आप एक बार फिर सोच लो... आप जानते तोह हो उन लोगो को... कोई ाचा न बोले उनके बारे में. कुछ गलत न हो जाये वहां... हिना का सोचिये...

अब्बास - क्या गलत होगा?? खान साब खुद उठ कर यहाँ आये थे न हिना का रिश्ता मांगने... मैं उनको मन न कर सकू. और तुम लोग जो भी कहलो... मैं जहाँ कहूंगा वहीँ शादी होगी हिना की.

रुबीना ने बेचैनी से इक़बाल की तरफ देखा, जैसे चाहती हो वह भी कुछ बोले. लेकिन इक़बाल चुपचाप ज़मीन को घूरता रहा. अचानक से वह तेज़ी से कदम लेता हुआ घर से बहार निकल गया. पीछे रुबीना रह गयी, अब्बास की कड़वी बातें सुनने के लिए.

सुबह कब शाम हो गयी, किसी को पता hi नहीं चला. ऊपर कमरे में हिना सुप्रिया की गोदी में सर रख कर subakte-subakte सो चुकी थी. उसके सारे ख्वाब जैसे dheere-dheere बिखर रहे थे… उड़ते हुए, कहीं बहुत दूर.

नींद में भी हिना के होंठ काँप रहे थे, जैसे कोई बुरा सपना उसका पीछा कर रहा हो. कभी कभी वह सिसक कर रो पड़ती और सुप्रिया हलके से उसे माथे पर हाथ फेर देती.

तभी कमरे का दरवाज़ा हल्का सा खुला, रुबीना कमरे में अंदर आयी थी. उसकी नज़र पहले हिना पर गयी और फिर सुप्रिया की और. सुप्रिया को देखते hi उसके चेहरे पर एक गहरी नाराज़गी साफ़ दिख रही थी, जैसे वह उससे बोल रही हो की - देख लिया नतीजा इस सब का!

हिना दरवाज़ा खुलने की आवाज़ से हड़बड़ा कर नींद से जाग गयी और बेचैनी से रोने लगी. रुबीना और सुप्रिया तुरंत हिना को शांत करने की कोशिश करने लगे.

सुप्रिया - शहहह... सब ठीक हो जायेगा...

शायद उसे भी नहीं पता नहीं की कुछ ठीक होगा या नहीं. कैसे होगा, ऐसा लग नहीं रहा था की यहाँ किसी और की बात सुनी जाएगी. हिना ने फिर से अपनी आँखें बंद कर ली.

रुबीना - मैं इसे नीचे ले जाती हु... वहां सो जाएगी...

सुप्रिया - नहीं... यहीं लेते रहने दीजिये... यहीं सो जाएगी मेरे साथ...

रुबीना - और इक़बाल?

सुप्रिया - वह नीचे सो जायेंगे?

रुबीना - ठीक है... मैं उसे बोल देती हूँ... तुम अंदर से कुण्डी लगा लेना...

रात सुप्रिया और हिना साथ में ऊपर के कमरे में सोये रहे. हिना तोह जैसे बेहोश hi पड़ी थी.

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सुप्रिया के दिमाग में बस आज का पूरा दिन hi चल रहा था और उसे नींद नहीं आ रही थी.

आज उसके पीरियड भी ख़तम हो गए थे, और जाने क्यों उसकी छूट बुरी तरह फड़क रही थी. इस ठण्ड भरी रात में उसका जिस्म इतना अकेला और अधूरा सा क्यों महसूस हो रहा था. इक़बाल जिस बेदर्दी से उसके साथ वह सब करता था, जाने क्यों उस सब के बारे में सोचते hi उसके पूरे जिस्म में एक आग सी लग गयी थी.

उफ्फ्फ... उसे क्या होने लगा था. उस इन सबसे चीज़ो से नफरत की जगह एक अजीब सा एहसास होने लगा था, जैसे वह अभी जाकर उस से लिपट जाये और अपने आप को उसके हवाले कर दे. पिछले कुछ दिनों के पीरियड्स ने उसके नीचे एक अलग hi प्यास जगा दी थी.

सुप्रिया का हाथ अपनी छूट पर गया और वह बहार से धीरे धीरे मसलने लगी. उसे अपने ऊपर गुस्सा सा आ रहा था, और वह गुस्से में धीरे धीरे कुछ गालियां बुदबुदाने लगी - कुत्ता... साला... बहनचोद... हरामज़ादा... एहि सब सुन्ना चाहता है न वह मेरे मुँह से....

________________________

अगले दिन भी जैसे घर में एक मायूसी का माहौल बना रहा. हिना कॉलेज नहीं गयी थी और उसकी चहकती हुई आवाज़ भी अब गायब हो चुकी थी. कल जैसी चीख चिल्लाहट तोह नहीं थी, पर इस ख़ामोशी में भी एक तूफ़ान सा महसूस हो रहा था.

सुबह से रात तक अब्बास और इक़बाल तोह काम पर hi रहे, पर अब्बास घर बहार से ताला लगा गया था. आखिर रात हुई और सब अपने अपने कमरों में पहुंचे.

सुप्रिया अपने आप को इक़बाल के साथ अकेला पा कर शर्म सी महसूस कर रही थी, पर जल्द hi इक़बाल और सुप्रिया बिस्तर पर लेट गए और सार्ड रात के अँधेरे में एक दुसरे से लिपटे हुए एक दुसरे को हलके चूम रहे थे. इक़बाल की बाहों में जो गर्मी मिल रही थी वह कल से हो रही टेंशन को थोड़ा हल्का कर रही.

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जो हो रहा था उसके बारे में सोचते हुए सुप्रिया के आंसू बहते हुए उसके गालों पर आये और इक़बाल को उसकी सिसकी से महसूस हुआ की वह रो रही है.

इक़बाल - क्या हुआ सुप्रिया... तुम रो क्यों रही हो...

सुप्रिया - बस ऐसे hi...

इक़बाल - बताया न...

सुप्रिया - बस... जो कुछ भी हो रहा है... ऐसा लग रहा है... सब मेरी गलती है. न मैं आपको उस दिन कुछ बताती... न hi ये सब होता. मैं जहाँ जाती हूँ... वहीँ कुछ न कुछ गलत हो जाता है.

इक़बाल - ऐसा बिलकुल मत सोचो... इसमें तुम्हारी कोई गलती नहीं है... हिना की शादी तोह होनी hi है न एक दिन...

सुप्रिया ने अपने आंसू पोछते हुए पूछा - पर वह खुश नहीं है इससे. क्या आप कुछ नहीं कर सकते इस सब के बारे में?

इक़बाल धीरे से बोलै - नहीं... ये उनका फैसला है... मैं क्या hi कर सकता हूँ.

सुप्रिया सोचने लगी, शायद इक़बाल गलत तोह नहीं कह रहा था. गाँव की लड़कियों की शादी तोह काम उम्र में hi हो जाती है - हम्म्म्म.... पर एक बार हिना की शादी हो गयी... तोह इस घर में रहना कितना अजीब सा लगेगा...

इक़बाल - हाँ....

सुप्रिया - आप उन दिन कह रहे थे न... हम यहाँ से कहीं दूर चले जाते है. क्या हम यहाँ से सच में कहीं जा सकते है...

इक़बाल थोड़ा हैरान होते हुए बोलै - तुम सच में मेरे साथ यहाँ से चलना चाहोगी?

सुप्रिया की आवाज़ में थोड़ी सी उदासी थी - अब तोह शायद आपके इलावा मेरा और कोई ठिकाना भी नहीं है... मैं कहाँ जयुंगी... मैं शायद अपने घर भी नहीं जा सकती अब.

इक़बाल - तुम्हे लगता है तुम मेरे साथ यहाँ फास गयी हो? मैं तुम्हे मेहफ़ूज़ रखने के लिए यहाँ लाया था... और सोचा है अब तोह ज़िन्दगी भर तुम्हे मेहफ़ूज़ रखूँगा. पर अगर तुम जाना चाहती हो तोह मैं तुम्हे वहां छोड़ ायूँगा.

सुप्रिया - नहीं... ऐसा नहीं है. बस... कभी कभी... मुझे भी अपने घर की याद आती है... अपने परिवार की. पर शायद हिना की तरह... वहां मेरी भी किसी को फिक्र नहीं है...

इक़बाल - तुम ऐसा मत सोचो... मैं हूँ न. मैं ले जायूँगा तुम्हे उनके पास... शायद बोहोत पहले hi ले जाना चाहिए था...

सुप्रिया सोचने लगी, पता नहीं वह अब क्या मुँह लेकर जाएगी अपने घरवालों के पास. क्या बताएगी वह उन्हें... की उसने एक और शादी कर ली है... और वह एक ऐसे इंसान से? वह शायद कभी इस बात को नहीं समझ पाएंगे. कई बार तोह उसे खुद भी समझ नहीं आता था वह यहाँ क्यों थी. पर फिर न जाने क्यों उसका मैं में एहि ख्याल आता, जो भी हो इक़बाल से उसने शादी की थी, वह उसका पति था अब. और अब तोह वह पूरी तरह से उसकी हो चुकी थी.

उसके नीचे फिर एक मीठी सी तीस उठी और उसे महसूस हुआ की इक़बाल ने अपना पेअर उसके पेअर पर रख दिया था.

इक़बाल - हिना की शादी के बाद मैं तुम्हे वहां ले जायूँगा... और उसके बाद हम लोग यहाँ कभी वापिस नहीं आएंगे... कहीं दूर अपनी एक नयी ज़िन्दगी बसा लेंगे... तुम अगर मेरे साथ चलोगी तोह. मैं तुम्हारा हाथ कभी नहीं छोड़ना चाहता.

सुप्रिया ने हलके से मुस्कुरा के इक़बाल का हाथ पकड़ लिया. क्या इतना भरोसा हो गया था उसे इक़बाल पर. इक़बाल की गरम हथेली ने उसका हाथ कास के पकड़ लिया. इक़बाल उसके मुलायम हथेलियों को आराम से मसल रहा था.

इक़बाल धीरे से बोलै - मैं अगर अपने दिल की बात बतायु तोह...

सुप्रिया - हाँ... बोलिये न...

इक़बाल - मैं चाहता हूँ... तुम्हारे साथ... मतलब हमारे... बच्चे हो. तुम्हारी तरह बेहद खूबसूरत होंगे वह. मैं हमेशा से एहि चाहता था... पर शायद किस्मत को मंज़ूर नहीं था...

सुप्रिया ने शरमाते हुए अपनी आँखें झुका ली. इस सब के बारे में उसने कभी ज्यादा सोचा नहीं था, पर आखिर हर औरत चाहती की वह एक दिन माँ बने. इक़बाल के साथ... उफ्फ्फ... पर उसके साथ नहीं तोह किसके साथ... वह hi तोह उसका शौहर था. सोचते hi उसके मैं में एक अजीब सी बेचैनी होने लगी थी.

इक़बाल ने उसका हाथ थोड़ा और कास के पकड़ लिया - मैंने बोहोत दिनों से अपने आप को रोका हुआ है. आज मुझे दिल खोल कर तुम्हे प्यार करने देना. मुझे रोकना मत कुछ करने से.

सुप्रिया ने कांपते हुए धीरे से हाँ में सर हिलाया. इक़बाल ने तुरंत hi सुप्रिया की कमर पर हाथ रखते हुए उसे अपनी और खींचा और उसकी टांगो को अपनी टांगो के नीचे दबा लिया. वह उसकी पीठ पर अपने हाथ फेरने लगा. उसके स्पर्श से hi सुप्रिया का पूरा शरीर अकड़ने सा लगा था. इक़बाल हलके हलके सुप्रिया के माथे को चूम रहा था.

इक़बाल का हाथ सरकता हुआ था थोड़ा नीचे उसकी पयजामि तक पंहुचा. और उसकी उंगलियां उसकी गांड की दरार को हलके हलके कुरेदने लगी.

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सुप्रिया की सांसें तेज़ होनी शुरू हो गयी और उसकी हलकी सी सिसकी निकल गयी.

सुप्रिया - सससससस.... अह्ह्ह....

इक़बाल धीरे से सुप्रिया के कान में बोलै - अगर मैं आज वह करू.... जो काफी दिनों से मेरा मैं था करने का... तोह करने डौगी न...

सुप्रिया समझ गयी की उसका इशारा किस तरफ था. इक़बाल की उंगलियां उसकी गांड को पयजामि के ऊपर से hi उसकी दरार में घुसते हुए वह हिस्सा अच्छे से महसूस कर रही थी.

सुप्रिया ने घबराते हुए पुछा - वहां... वहां करना ज़रूरी है क्या?

इक़बाल - हाँ... हम दोनों को बोहोत मज़ा आएगा. हर मर्द की ख्वाइश होती है... की वह अपनी औरत को वहां चोदे. लाभ किसी मर्द ने तुम्हारे साथ भी ये सब करना चाहा होगा. कभी किसी की गोदी में बैठी हो और ये महसूस किया हो की वह नीचे से तुम्हारे कपडे फाड़ कर तुम्हारी गोल मटोल गांड में अपना लुंड घुसेड़ना चाहता हो...

इक़बाल की बातें सुप्रिया को बुरी तरह गरम कर रही थी. सुप्रिया ने हलकी सी सिसकी ली. उसे याद आया, विक्रम भी तोह कई बार वहां करने को कहता था, पर वह हर बार मन कर देती थी.

उसे अभी से अपनी गांड का छेड़ ज़ोर से बंद होता हुआ महसूस हुआ - नहीं... कभी नहीं...

इक़बाल हलके से मुस्कुराया और सुप्रिया की गांड को कास के दबाया - तब तोह शायद तुम्हे कोई असली मर्द मिला hi नहीं तुम्हारी ज़िन्दगी में. मैं बेहद खुशनसीब हूँ जिसे पहली बार तुम्हारी गांड मारने का मौका मिलेगा... शायद इसे मेरा hi इंतज़ार था...

सुप्रिया हलके से कसमसाई - पर वहां करने से... बच्चे नहीं होते... आप जानते है न...

इक़बाल एकदम से खुश होते हुए बोलै - यानी तुम भी मेरे साथ बच्चे करना चाहती हो! वह तोह हम करेंगे hi... बिफिकर रहो. बस आज की यात ये करने दो... एक बार कर लोगी न... तोह बार बार मैं करेगा की मैं तुम्हारी छूट की जगह तुम्हारी गांड में दालु...

इक़बाल ने आगे हाथ करते हुए सुप्रिया की पयजामि का नाडा ढीला किया और फिर उसकी पयजामि और पंतय को नीचे सरकाया. रजाई उन दोनों के पैरो पर आ गयी थी और सुप्रिया को अपनी गांड पर ठंडी हवा का एक झोका सा महसूस हो रहा था.

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इक़बाल अपने बड़े हाथ से उसकी नरम ठंडी गांड सेहला रहा था. सुप्रिया को ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने जलते हुए अंगारे उसकी गांड पर लगा दिए हो. सुप्रिया ने हलके से हिलते हुए अपनी आँखें बंद कर ली, और एक गहरी सिसकी ली.

सुप्रिया - Ssssssssss.........

इक़बाल ने हलके से सुप्रिया की गांड को अपनी मुट्ठी में भरते हुए दबाया. सुप्रिया की पतली कमर पर उसकी गोल गांड बोहोत hi मजेदार लगती थी. बोहोत मोती तोह नहीं थी, पर काफी अच्छी गोल मटोल सी थी. उसे यकीन नहीं हो रहा था की वह पहला इंसान होने वाला था जो इस गांड में घुसने वाला था. आज के बाद सुप्रिया के जिस्म का हर हिस्से पर उसका hi नाम और निशाँ होगा.

इक़बाल - अह्ह्ह्ह.... सुप्रिया... कितनी मुलायम गांड है तुम्हारी... उफ्फ्फ.. बिलकुल किसी नरम गद्दे की तरह...

सुप्रिया सिसकते हुए हल्का सा हिल रही थी, पर नीचे से उन दोनों हाथों ने उसकी गांड को कास के पकडे हुआ था - उम्म्म्म... अह्ह्ह्हह.... इक़बाल जी.... मुझे बोहोत डर लग रहा है...

इक़बाल ने हलके से गांड पर हाथ फेरा, उसका लुंड गांड पर हाथ रखते hi अचे से खड़ा हो चूका था - तुम फिक्र मत करो. मैं धीरे से करूँगा. पर पूरा अंदर डालूंगा... तुम बस गहरी सांसें लेती रहना मेरी जान.

सुप्रिया ने बेचैनी में अपने पैरो की उँगलियों को बिस्तर पर रगड़ा. उस दिन कितनी मुश्किल से तोह वह उसके लुंड को झेल पायी थी, पता नहीं अब वह इस लुंड को कैसे ले पाएगी अपनी गांड में.

इक़बाल ने अपना हाथ टेढ़ा करके सुप्रिया की गांड में हलके से घिसा. हाथ ने दरार में घुसते हुए दोनों गोलों को थोड़ा अलग कर दिया. सुप्रिया तुरंत थोड़ा पीछे की और खिसक गयी.

सुप्रिया - ुह्ह्ह्ह... नहीं नहीं नहीं.... नहीं हो पायेगा वहां... मुझे बोहोत दर्द होगा...

इक़बाल - एक बार सब हो जाने दो... फिर पूछूंगा की दर्द ज्यादा बड़ा था या मज़ा...

इक़बाल ने सुप्रिया की कुर्ती को थोड़ा ऊपर सरकाया और सुप्रिया की गांड की गोलियां को आराम से मसलने लगा. किसी भी लड़की का इस हालत में डरना लाज़मी था, वह भी अच्छे से समझता था.

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इक़बाल ने अपना पायजामा और अंडरवियर नीचे सरकाया और उसका मोटा लम्बा लुंड तन्न से खड़ा हो कर बहार निकला और सुप्रिया की तरफ लहराने लगा.

सुप्रिया ने नीचे उस पर एक नज़र डाली और उसके पसीने छूट गए - Uhhhh....sssss.... अंदर डालने से पहले तेल लगा लो उस पर... अंदर नहीं जायेगा ऐसे ये...

इक़बाल मुस्कुराया, काम से काम वह लुंड को अंदर लेने के बारे में सोचने तोह लगी थी - कहाँ नहीं जायेगा अंदर?

सुप्रिया का छाती ऊपर नीचे हो रही थी, इक़बाल का सर उसके सर के ठीक ऊपर था और वह उसकी आँखों में देख रहा था - वहीँ... जहाँ आप...

इक़बाल - क्या नाम है उस जगह का...

सुप्रिया के मुँह से वह शब्द नहीं निकल रहा था - मममम.....

इक़बाल ने उसके चेहरे को आराम से अपनी हाथ में पकड़ा. उसके बड़े से हाथ में सुप्रिया को पूरा चेहरा समां गया - बोलो... क्या नाम है उस जगह है... और क्या जायेगा उसके अंदर... बोल पाओगी तुम...

इक़बाल ने उसका चेहरा पकडे रखा ताकि वह उसकी आँखों में देखती रहे. चेहरे पर उसकी पकड़ और मज़बूत हो रही थी, जैसे वह उस पर पूरी तरह से हावी हो रहा हो. इक़बाल का दूसरा हाथ अभी भी सुप्रिया की गांड से खेल रहा था.

सुप्रिया धीरे से बुदबुदायी - मेरी... मेरी... गांड... आपका लुंड...

इक़बाल ने तुरंत सुप्रिया के चेहरे पर अपनी पकड़ ढीली करि और सुप्रिया ने अपना चेहरा नीचे कर लिया.

इक़बाल - आज रात के बाद तुम्हे कोई दिक्कत नहीं होगी इस शब्द को बोलने में... अब ज़रा मेरे लुंड को गीला कर दो, ताकि वह आराम से अंदर जा पाए.

इक़बाल ने सुप्रिया की कुर्ती को खींचते हुए ऊपर किया और उसकी ब्रा का हुक खोल कर उसे ऊपर से पूरा नंगा कर दिया. वह अपने पेअर छोड़े करके सुप्रिया के ऊपर आया और धीरे से अपना लुंड उसके मुँह में घुसाने लगा.

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दोनों हाथ से पकड़ा हुआ इक़बाल के मोठे लुंड का सिर्फ ऊपर का हिस्सा सुप्रिया के मुँह में जा रहा था. अब तोह जैसे सुप्रिया को उसके लुंड को चूसने की आदत सी पद गयी थी, और इक़बाल को रोज़ रात को चुसवाने के.

इक़बाल थोड़ा आगे खिसका - पूरा गीला कर दो... अपने थूक से...

सुप्रिया ने लुंड पर हलके से थूका और और अपने हाथ से उसके लुंड पर मसलने लगी.

सुप्रिया ने रूठते हुए कहा - मुँह में नहीं लुंगी अब... मैं थक जयुंगी...

इक़बाल - ठीक है मेरी जान... जैसे तुम कहो... मुझे तोह बस वहां नीचे करना है.

इक़बाल सुप्रिया के ऊपर से हटा और एक हाथ में hi उसे पूरा घुमा दिया. सुप्रिया बिस्तर पर उलटी लेती हुई थी और सुप्रिया की गोरी गद्देदार गांड को देखते hi उसका लुंड अपने आप हिलने लगा. गांड और जांघें जहाँ मिल रही थी वहां एक हलकी सी रेखा बन रही थी जो गांड को बेहद आकर्षक बना रही थी.

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इक़बाल - अपनी ज़िन्दगी में बोहोत साड़ी गांड देखि है... पर तुम्ह जैसी कभी नहीं... और तुमने कभी मेरे जैसा लुंड नहीं महसूस किया होगा... और न कभी करोगी...

सुप्रिया ने अपनी आँखें बंद कर ली, जो होने वाला था वह उसे रोक नहीं सकती थी. उसने अपने आप को पूरी तरह इक़बाल को सौंप दिया था.

इक़बाल ने सुप्रिया की कमर पर हाथ रखते हुए उसकी गांड को थोड़ा ऊपर किया. और फिर अपने दोनों हाथ उसकी गांड पर रखते हुए अचे से जकड लिया. वह उसके गांड के गोलों को कास के पकडे हुए हिलने लगा और फिर उन्हें एक दुसरे से थोड़ा अलग किया.

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उसे सुप्रिया का छोटा सा गांड का छेड़ दिखा. बिलकुल साफ़.. न उस पर कोई बाल थे... न कालिख. इस छोटे से छेड़ को आज बड़ा करने में बोहोत मज़ा आने वाला था उसे.
 
अपडेट 105

इक़बाल कुछ देर सुप्रिया की गांड की गोलियां को अपने हाथों से घूमता रहा, हर बार उन्हें थोड़ा और अलग करता हुआ एक दुसरे से. सुप्रिया के हाथ पीछे अपनी गांड पर पहुंच गए थे और वह ज़ोर ज़ोर से सिकियाँ ले रही थी.

सुप्रिया - मममम.... अह्ह्ह्ह.... उफ्फ्फ.....

इक़बाल अपना मुँह उसकी गांड के छेड़ के पास लाया और वहां हल्का सा छोमा. सुप्रिया बुरी तरह सिहर उठी और थोड़ा सा आगे की और सरक गयी. इक़बाल वहां धीरे धीरे से चाटने लगा, सुप्रिया का गुप्त खज़ाना आखिर उसका था.

सुप्रिया ने करवट लेने की कोशिश करि पर इक़बाल ने अपना हाथ उसकी गांड पर रखते हुए उसे कास के पकड़ लिया और अपनी जीब से उसकी गांड के छेड़ को चाटने लगा.

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सुप्रिया इक़बाल की और देखते हुए आवाज़ें निकाल रही थी - उफ्फ्फ्फ़... मममममम..... आह्हः...

बोहोत hi अजीब सा मज़ा आ रहा था उसे इक़बाल की जीब वहां लगने से. आज तक इक़बाल ने उसकी छूट भी नहीं छाती थी, और अब सीधे उसकी गांड!

इक़बाल ने सुप्रिया से नज़रे मिलायी - क्या चाट रहा हूँ मैं तुम्हारी...

इस बार सुप्रिया के मुँह से थोड़ा जल्दी निकला - ुह्ह्हफ़्फ़्फ़.... गांड... मेरी गांड चाट रहे हो...

इक़बाल ने एकदम से अपना हाथ गांड के छेड़ के पास रखा और अपना अंगूठा उसके छेड़ में घुसा दिया.

सुप्रिया दर्द में ज़ोर से करहा उठी - उउउउउइइइइ माआ.... ममममममअअअअ.... नही...

सुप्रिया जो झटपटाते देख इक़बाल को हसी सी आ रही थी - अभी तोह सिर्फ अंगूठा डाला है... लोढ़ा कैसे झेलोगी मेरा...

सुप्रिया - नहीं झेलना!! उउउउउफफ्फ.... निकालो वहां से... बोहोत अजीब सा लग रहा है...

इक़बाल ने अंगूठे को थोड़ा और अंदर घुसाया और सुप्रिया दर्द में आगे की और होते हुए सरकने की कोशिश करने लगी. उसने बिस्तर की चद्दर को कास के पकड़ लिया.

इक़बाल ने उसकी गांड के ऊपर पोजीशन बनाते हुए अपना लुंड उसकी गांड के छेड़ पर लगाने की कोशिश करि. लुंड बुरी तरह थिरक रहा था और इधर उधर जा रहा था. इक़बाल के हाथों ने अभी भी सुप्रिया की गांड को पकडे हुए फैलाया हुआ था.

उसके लुंड को वह छेड़ चुम्बक की तरह अपनी और खींच रहा था. इक़बाल ने अपना एक हाथ लुंड पर लगाया और उसे बिलकुल छेड़ के बहार टिका दिया. लुंड भी गीला था और गांड का छेड़ भी गीला हो चूका था.

इक़बाल ने धीरे से लुंड को अंदर घुसना शुरू किया. सुप्रिया की ज़ोर की चीख निकल गयी और उसने तकिये को अपनी और खींचते अपने मुँह में घुसा लिया. उसके हाथ खुद hi पीछे अपनी गांड पर पहुंच गए थे, जैसे इक़बाल को रोकने की कोशिश कर रहे हो.

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सुप्रिया को इतना दर्द हो रहा था की उसकी आँखें भर निकल आयी थी, लेकिन साथ hi एक पूरा भरा हुआ महसूस होने लगा. इक़बाल आधा लुंड गांड में घुसाए रुक गया, उसने सुप्रिया की पीठ पर चूमा, अपनी दादी उस पर रगड़ते हुए - शांत हो जा, मेरी जान. अब मैं हिलूंगा धीरे से. तू महसूस कर, यह कितना मज़ेदार है.

सुप्रिया के पेअर कांपते हुए बिस्तर पर नीचे गिर गए और इक़बाल का लुंड उसके साथ साथ नीचे आते हुए थोड़ा सा और अंदर चला गया. सुप्रिया बुरी तरह हिल रही थी और उसके पूरे शरीर पर पसीने छूटने लगे थे.

कुछ देर वहीँ रुकने के बाद, इक़बाल ने धीरे से हिलना शुरू किया, पहले बहुत आराम से लुंड को बहार निकला और गांड के छेड़ को देखा. वह अभी से बड़ा दिख रहा था, पर अगर उसने अपना लुंड वापिस अंदर नहीं डाला तोह उसे पता था वह फिर से सिकुड़ जायेगा.

उसने एक बार फिर लुंड को अंदर घुसेड़ा और लुंड को धीरे धीरे अंदर बहार करने लगा, बस थोड़ा अंदर. सुप्रिया दर्द में कराहती हुई कुछ हल्का हल्का बुदबुदा रही थी. उसके हाथ अभी भी पीछे अपनी गांड को बचने के लिए ठीके हुए थे. थूक से लुंड थोड़ा अंदर फिसल पा रहा था पर साथ hi एक chap-chap की आवाज़ कमरे में गूंजने लगी.

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हर झटके से लुंड अंदर जाकर कहीं अटक रहा था और साथ hi सुप्रिया की सांसें भी. इक़बाल ने एक झोर का झटका मारा ताकि लुंड पूरा अंदर पहुंच जाये.

सुप्रिया के मुँह से एक ज़ोर की गाली निकली - ुहफ्फ्फ्फ़.... बेहेन के लोडडीएएए.... मार दियाए...

सुप्रिया के मुँह से गाली सुनते hi इक़बाल का लुंड जैसे अंदर और भी फूल सा गया और उसने थोड़ी स्पीड बढ़ाते हुए लुंड को अंदर बहार करना शुरू किया.

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इक़बाल सुप्रिया का जवाब देते हुए बोलै - आज तुझे बिलकुल कुटिया की तरह छोडूंगा साली... तेरी गांड... उफ्फ्फ... फाड़ दूंगा अचे से...

इक़बाल ने आगे झुकते हुए सुप्रिया की गर्दन पर हाथ रखा और उसका सहारा लेते हुए अंदर की और धक्के मारने लगा.

इक़बाल दांत भीचते हुए ज़ोर ज़ोर से आवाज़ निकलने लगा - ुह्ह्ह्ह... उह्ह्ह... ममममम..... रंडी.... ुह्ह्ह्ह....

सुप्रिया की अब आवाज़ भी नहीं निकल पा रही थी, पर उसकी गांड खुद आगे पीछे हिलने लगी थी. बोहोत बुरी तरह जल रहा था उसका नीचे का हिस्सा.

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दर्द अब और नहीं बड़ा बल्कि उसकी जगह एक सरसराहट सी महसूस होने लगी, जैसे अंदर से कुछ जग रहा हो. सुप्रिया की सांसें भरी हो गयी, वह धीरे से मोअन करने लगी.

सुप्रिया - मममम..... ुह्ह्हह्ह... उह्ह्ह... ुह्ह्ह्ह.... थोड़ा धीरे... अह्ह्ह... अहह...

इक़बाल ने सुप्रिया की गर्दन पर अपनी पकड़ थोड़ी ढीली की और सुप्रिया ने पलट कर उसकी और देखा. इक़बाल का मुँह सुप्रिया के बालों में खोया हुआ था और कुछ देर के लिए अपनी गति धीरे कर दी.

सुप्रिया की हलकी ाँहें कमरे में आवाज़ कर रही थी. इक़बाल भी तेज़ सांसें लेते हुए कभी उसकी पीठ को चूम रहा था और कभी उसके मम्मो को पकड़ रहा था.

सुप्रिया की सांसें और भारी होती जा रही थी - अह्ह्ह... उह्ह्ह... ुहंण... ुह्ह्ह्णण....

वह चाहती थी की अब इक़बाल अपनी गति फिर से बड़ा दे और उसकी गहराईयों तक पहुंच जाये. दर्द अब एक मीठे से मज़े में तब्दील हो चूका था. इक़बाल भी उसके कंधो पर चूमता हुआ उसे और उत्तेजित कर रहा था.

सुप्रिया - उफ्फ्फ... इक़बाल जी... अह्ह्ह... ुह्ह्ह्ह... आप कर सकते है... जो करना है आपको...

इक़बाल - खुल के बोलो.... क्या करना है मुझे....

सुप्रिया शरमाते हुए धीरे से बोली - मेरी गांड... अचे से मार लीजिये इसे...

इक़बाल ये सुनते hi एकदम से थोड़ा ऊपर होते हुए सुप्रिया के बालों को कास के पकड़ा और ज़ोर से अपना लुंड उसकी गांड में डालने लगा.

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सुप्रिया की तेज़ चीखें फिर से कमरे में गूंजने लगी. इक़बाल उसके बाल पकडे हुए उन्हें कास के खींच रहा था और लुंड तेज़ी से गांड में जाते हुए अंदर कहीं टकरा रहा था. दोनों के जिसमे के टकराने की आवाज़ और सुप्रिया की चीखों की आवाज़ इक़बाल को और भी उत्तेजित करती जा रही थी.

इक़बाल - बेहेन की लोदी.... मज़ाआ आ रहा है न तुझे... उफ्फ्फ्फ़... ुह्ह्ह्ह... तेरी गांड....

सुप्रिया - ममम... उह्ह्ह. उठ्न... नहीं... उह्ह्ह.. हाँ... उठ्णन...

इक़बाल - न की हाँ!? कितनी टाइट और गरम है तेरी गांड.... उफ्फ्फ्फ़... जैसे मेरे लिए hi बानी हो.... अब तोह तुझे रोज़ रंडी की तरह छोडूंगा साली... ुह्ह्ह्ह... उफ्फ्फ....

सुप्रिया - ुह्हह्ण... उन्मणममम.... अह्ह्ह... अहहह्ण...

इक़बाल और सुप्रिया सरकते सरकते थोड़ा नीचे हो गए थे. इक़बाल तोह बिस्तर से उतर hi चूका था और सुप्रिया के पेअर हवा में झूल रहे थे. वह झात्पटती हुई अपने पेअर हवा में हिला रही थी. उसकी गांड बुरी तरह जल रही थी.

सुप्रिया थकते हुए नीचे बिस्तर पर गिर गयी पर इक़बाल ने उसके बालों में हाथ घुसते हुए उसे फिर से थोड़ा ऊपर उठा लिया.

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इक़बाल - क्या हुआ... थक गयी... रुक साली...

इक़बाल ने उसकी कमर को पकड़ते हुए उसे गोल घुमाया और खुद बिस्तर पर नीचे let-te हुए उसे अपने ऊपर ले आया. वह सुप्रिया की कमर को पकडे उसके जिस्म को ऊपर नीचे कर रहा था. इस नयी पोजीशन से तोह सुप्रिया को और भी दर्द हो रहा था.

सुप्रिया समझ गयी थी की ये आज नहीं रुकने वाला था. उसे याद आया की उस दिन उसने कैसे इक़बाल एकदम से झाड़ गया था.

सुप्रिया - ुह्हह्ण... ुह्ह्ह्णण... इक़बाल जी.... उह्ह्ह.... रंडी की तरह छोड़ो न मुझे...

इक़बाल ने उसके मुँह से ये सुनते hi उसके बाल फिर से पकड़ लिए और ज़ोर से उछाल कर झाकते मारने लगा.

सुप्रिया - ैय्यियी... ुह्ह्ह्ह.... इक़बायल जी... ुह्ह्ह्ह.... और ज़ोर से... उह्ह्ह.... निकाल दो अपना सारा छुम मेरे अंदर.... ुह्ह्ह्णण... भर दो मेरी गांड....

सुप्रिया की गन्दी बातें इक़बाल के लुंड की नसे और बुरी तरह तन्न रही थी और उसके लुंड में दर्द करने लगी थी. उसका माल बस अब निकलने hi वाला था. सुप्रिया ने दर्द में अपनी गांड को कास के पकड़ लिया. इक़बाल अपना पूरा दम लगाए उसे ऊपर नीचे हिला रहा था.

एक तेज़ धार से साथ उसका सारा छुम सुप्रिया की गांड में निकाल दिया और वह रिस्ता और बहार उसके लुंड पर निकलते हुए हर जगह छिटकने लगा.

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इक़बाल - बेहेन की लोदिई.... मेरा सारा माल निकलवा दिया...

सुप्रिया - ुह्ह्ह्णण... ुह्हह्ण.... ुह्हह्ण...

इक़बाल की स्पीड थोड़ी धीरे हुई और उसने सुप्रिया पर अपने पकड़ ढीली करि. सुप्रिया भी अपने हाथ बिस्तर पर रखते हुए गहरी सांसें लेने लगी. ऐसा लग रहा था जैसा उसकी गांड में अभी किसी ने गरम पानी उड़ेल दिया हो.

इक़बाल थकते हुए पीछे बिस्तर पर लेट गया और सुप्रिया उसके ऊपर से हट कर साइड हो गयी. उसकी गांड बुरी तरह दुःख रही थी और वह अपनी लाल हो चुकी गांड को हलके से सेहला रही थी. उसने इक़बाल के नीचे से अपनी ब्रा खींची और उन्हें पेहेन्ने लगी.

आज तक उसने ऐसा कभी महसूस नहीं किया था. सब हो जाने के बाद गांड में एक खालीपन सा लग रहा था, जैसे इक़बाल के लुंड ने वहां जगह बड़ा दी हो.

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इक़बाल ने सुप्रिया के पीछे बैठते हुए उसके पीठ पर हाथ फेरा और उसे पीछे से अपनी बाहों में भर लिया. उसका लुंड अभी भी सुप्रिया की गांड से टकरा रहा था.

इक़बाल ने सुप्रिया का चेहरा अपनी और करते हुए पुछा - कैसा लगा तुम्हे... मज़ा आया?

सुप्रिया ने शरमाते हुए अपना चेहरा उसकी छाती में छुपा लिया - आप बोहोत गंदे हो... बोहोत दर्द कर दिया वहां... पता नहीं कल कैसे चल पयूंगी... भाभी फिर से बोलेंगी...

इक़बाल - कहने दो उन्हें...

सुप्रिया - मेरे कपड़ो दो न वहां से... पिछली बार तोह कपडे भी नहीं उठाये जा रहे थे.

इक़बाल - अभी कपडे मत पहनो... अभी तोह तुम्हारी छूट भी मारनी है...

सुप्रिया ने न में सर हिलाया - मैं बुरी तरह थक गयी हूँ... अब पता नहीं और कितना झेल पयूंगी आज रात... बस सो जाते है न...

इक़बाल ने उसके गालों को हलके से चूमा - ठीक है मेरी जान... तुमने मुझे अपनी गांड में डालने दिया... तोह मैं तुम्हारी इतनी बात तोह मान hi सकता हूँ. पर अगली बार... छूट और गांड दोनों मारूंगा...

दोनों कम्बल से अपने आप को ढकते हुए लेट गए और इक़बाल एक बार फिर से सुप्रिया के होंठों को प्यार से चूमने लगा. आज जो ख़ुशी और मज़ा उसे मिला था, शायद जिंदगी में पहले कभी नहीं मिला था.

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अपडेट 106

अगली सुबह सुप्रिया की हालत काफी ख़राब थी. शायद पिछली बार से भी ज्यादा पर दुसरे करने से. सुप्रिया से न तोह उठा जा रहा था और न hi उसकी आँखें खुल रही थी. बस शुक्र इस बार का था की आज उसने अपने कपडे तोह पहने हुए थे. इक़बाल उसके ठीक पीछे बैठा हुआ था, जैसे आज उसे कहीं जाना hi नहीं हो.

आखिर सुबह से सुप्रिया की हालत जो ख़राब लग रही थी.

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सुप्रिया ने आखें मूंदे हुए धीरे से कहा - आप क्यों बैठते हो आज यहाँ... आप जायो न... मैं उठ जाती हूँ अभी...

इक़बाल - नहीं... तुम्हारा माथा काफी गरम लग रहा है... मैं कहीं नहीं जाने वाला. चलो तुम्हे यहाँ पास के डॉक्टर के पास ले जाता हूँ.

सुप्रिया की आवाज़ में दर्द साफ़ था - मममम.... नहीं मुझसे नहीं उठा जायेगा... पूरा बदन टूटा हुआ सा हो रहा है...

उनके कमरे का दरवाज़ा खुला था तोह कोई भी अंदर आ सकता था, और कुछ देर बाद रुबीना ने अंदर झाका.

रुबीना ने देखा की वह दोनों वहीँ थे और सुप्रिया ने कपडे पहने हुए थे तोह वह थोड़ा अंदर आ गयी - तुम लोगो को ज़रा भी शर्म नहीं है क्या? 8 बजने को आये और अभी भी कमरे में बैठे हो... घर में जो माहौल चल रहा है उसका नहीं तोह अपने भैया की शर्म तोह कर लेते. अभी अभी गुस्सा करते हुए गए हैं.

इक़बाल - भाभी वह... इसकी तबियत काफी ख़राब लग रही है...

रुबीना ने गुस्से में अपना सर हिलाया - ऐसे रात भर जल्लादो की तरह इसे छोड़ोगे तोह और क्या होगा. ये भी नहीं सोचते की एक जवान लड़की है घर में. कल रात तोह इसकी चीखने की बोहोत आवाज़ आ रही थी... ऐसा लग रहा था जैसे ये भी गालियां दे रही हो.

सुप्रिया ने शर्म से अपनी आखें मूँद ली. उसने शायद अपनी जिंदगी में इतनी गालियां नहीं दी थी, जितनी कल रात दी थी.

इक़बाल - नहीं भाभी... इसका माथा छू कर तोह देखो... बुरी तरह तप रहा है...

रुबीना ने हलके से उसका माथा छुआ, वह वकाईये में बुरी तरह तप रहा था - उईईईईई... इतनी गरम... रात भर ठण्ड में नंगा रखा क्या तुमने इसे?

इक़बाल ने अपनी आँखें दूसरी और कर ली, और सुप्रिया ये सब सुनते हुए शर्म से पलंग में गाड़ी जा रही थी.

रुबीना गुस्सा होते हुए बोली - हद्द करते हो तुम भी... पिछली बार चल नहीं पायी थी और आज इतना बुखार कर दिया इस. इतनी नाज़ुक सी तोह है ये... और तुम्हारा भैसा जैसा लुंड. चलो अब जायो नीचे से बुखार नापने वाला ले आयो...

इक़बाल तुरंत भागा हुआ नीचे की और गया और रुबीना सुप्रिया के सर पर हाथ फेरती हुई उसके साथ बैठ गयी.

रुबीना धीरे से बोली - ऐसे गंदे से क्यों करने देती हो इसे अपने साथ... मन कर दिया करो... उफ्फ्फ.. हालत देखि है अपनी... आँखें अंदर धसी जा रही है...

इक़बाल जल्दी से नीचे से थर्मामीटर ले आया. रुबीना ने उसे झिडकते हुए सुप्रिया के मुँह में रखा. सुप्रिया से अपना सर भी नहीं हिलाया जा रहा था. एक मिनट बाद जब रुबीना ने टेम्परेचर चेक किया तोह वह भी हिल गयी.

रुबीना - हैई रे.... 105.... मेरे पास दवाई है... मैं लेकर आती हूँ...

इक़बाल और रुबीना दोनों भागे भागे सुप्रिया के लिए दवाई लेकर आये. इक़बाल ने सहारा देते हुए सुप्रिया को बिठाया और उसे बुखार की दवाई दी. दवाई लेने के कुछ घंटो तक भी सुप्रिया का बुखार काम होने का नाम hi नहीं ले रहा था.

रुबीना ने उसके माथे तो फिर से छूटे हुए कहा - इसकी हालत ठीक नहीं लग रही है... तुम ऐसा करो... इसे डिस्पेंसरी ले जायो... वहां वह कम्पाउण्डर होगा न... उसे दिखा देना...

सुप्रिया की हलकी सी आवाज़ निकली - नहीं... मैं... कहीं नहीं जा पयूंगी... मुझे लेते रहने दो न...

रुबीना - सुप्रिया... बात को समझ... तेरी तबियत ज्यादा ख़राब है... इक़बाल, ाचा तू जा ज़रा कम्पाउण्डर को यहीं बुला ला...

इक़बाल फिर से बहार की और भागा और रुबीना सुप्रिया के सर पर हाथ फेरती हुई बैठी रही. जब इक़बाल वापस आया तोह कमरे में हिना, अम्मा जी और पड़ोस की और एक बूढ़ी औरत भी मौजूद थी.

रुबीना ने उसे देखते hi कहा - कम्पाउण्डर कहाँ है?

इक़बाल - वह आज नहीं है... क्या हुआ?

रुबीना - इसकी तबियत ज्यादा खराब है... उलटी हो रही है... नीचे बुरी तरह जल रहा है...

औरत - पेट में बोहोत दर्द हो रहा है इसके... सूजा हुआ इसके नीचे बुरी तरह... क्या किया तूने ऐसा?

रुबीना - दवाई से भी बुखार काम होने का नाम नहीं ले रहा...

सुप्रिया दर्द में करहा रही थी.

औरत - ऐसा कर इसे तोह पास के शहर के अस्पताल ले जा... वही सही रहेगा...

इक़बाल की आवाज़ में भी घबराहट साफ़ सुनाई दे रही थी - पर वहां जाने में तोह 40-50 मिनट लगेंगे, ये पीछे कैसे पकड़ कर बैठेगी... रास्ते में गिर जाएगी...

औरत - रुबीना या हिना को ले जा साथ साथ में... वह पीछे बैठ जाएगी इसे पकड़ कर...

हिना तुरंत बोली - मैं चली जयुंगी...

रुबीना - पर तेरे अब्बू...

औरत - ारी... जा तोह रही है अपने... खैर तुम लोगो का मामला... मैं क्यों बोलू...

हिना गुस्से में बोली - अब्बू जो मर्ज़ी कर ले... मैं जा रही हूँ...

रुबीना - ठीक है... इसे स्वेटर पहनाया ज़रा...

रुबीना और हिना ने सुप्रिया का स्वेटर उसके हाथों में किसी तरह पहनाया और फिर उसके बटन बंद करने लगा.

रुबीना - हिना... तू तैयार है न... इक़बाल ले आया इसे नीचे...

इक़बाल फुसफुसाते हुए बोलै - सुप्रियाआ... तुम ठीक हो जायेगी... परेशान मत हो...

वह हलके से सुप्रिया के माथे पर हाथ फेर रहा था. सुप्रिया दर्द में हलके हलके करहा रही थी. इक़बाल ने सुप्रिया को अपनी हाथों में लेते हुए उठाया और नीचे की और आने लगा.

रुबीना हिना से बोली - तुम अचे से पकड़ने अपनी चची को... ठीक है... और कुछ भी हो मुझे फ़ोन कर देना...

इक़बाल ने सहारा देते हुए सुप्रिया को किसी तरह मोटरसाइकिल पर बिठाया. हिना उसके बिलकुल पीछे बैठ गयी, दोनों हाथों से सुप्रिया को थामे हुए. इक़बाल ने धीरे धीरे बाइक आगे बधाई, हर गद्दे और झटके से बचने की पूरी कोशिश करता हुआ. सुप्रिया थकान और दर्द से झूल रही थी, उसका सर इक़बाल के कंधे पर टिका हुआ था, जबकि हिना पीछे से उसे संभाले हुए थी.

सुप्रिया के लिए यह सफर ख़तम होने का नाम hi नहीं ले रहा था. हर मिनट उसे घंटों जैसा लग रहा था. फिर भी वह इक़बाल को कास कर पकडे रही, जैसे उसका सहारा सिर्फ वही हो. आखिर कार, पास के शहर के गवर्नमेंट हॉस्पिटल के गेट पर वह पहुँच hi गए.

बाइक रोक कर इक़बाल तुरंत उतरा. उसने बिना एक पल गवाए सुप्रिया को बाहों में उठाया और तेज़ी से हॉस्पिटल के अंदर ले गया. इमरजेंसी वार्ड के बहार पेशेंट्स की लम्बी लाइन लगी हुई थी. इक़बाल ने सुप्रिया को एक बेंच पर बैठाया, उसका चेहरा पसीने से भीगा हुआ था. इक़बाल की आँखों में घबराहट साफ़ दिख रही थी.

इक़बाल - हिना... तू संभल इसे... मैं बात करता हूँ...

इक़बाल ने सुप्रिया को हिना के हवाले किया और सीधा काउंटर की तरफ बढ़ गया. पहले तोह नर्स ने बिना नज़र उठाये रजिस्टर की तरफ इशारा किया, लेकिन जैसे जैसे इक़बाल की आवाज़ में बेचैनी बढ़ती गयी, बात बहस तक पहुँच गयी.

इक़बाल - आप समझिये... उसकी तबियत बोहोत खराब है...

नर्स - यहाँ जो भी आया है सबकी तबियत खराब hi है... जब नंबर आएगा तब बुला लेंगे...

इक़बाल - उसे एक बार देख तोह लीजिये... उससे बैठा भी नहीं जा रहा...

नर्स - 100 केस आते हैं ऐसे रोज़ के...

इक़बाल उस पर चीख रहा था - अगर उसे कुछ हो गया तोह तुम लोग ज़िम्मेदार होंगे!!

दोनों के बीच बहस और चीख चिल्लाहट बाद गयी थी, और काउंटर पर लोगो की भीड़ इखट्टा होने लगी थी.

तभी कॉरिडोर में किसी औरत की ज़ोर की आवाज़ गूंजी - ये सब क्या हो रहा है यहाँ!

सफ़ेद कोट पहने शायद वो ों ड्यूटी डॉक्टर थी. नर्स और इक़बाल दोनों hi डॉक्टर को अपनी बात समझाने के लिए आगे बढे hi थे की पीछे से हिना की घबराई हुई आवाज़ गुंजी - चाचू... इनकी सांस... धीमी हो रही है... देखिए न...

इक़बाल जल्दी से सुप्रिया के पास भागा और डॉक्टर भी उसके पीछे पीछे आयी. डॉक्टर ने उसकी नाक के पास ऊँगली करके देखि और उसका हाथ उठा कर उसकी नब्ज चेक की.

डॉक्टर ने नर्स को इशारा किया - इसको वार्ड में ले जायो... मैं देखती हूँ...

बाकी लोग शायद इससे खुश नहीं थे और फुसफुसाने लगे थे.

डॉक्टर ने इक़बाल को देखते हुए कहा - तुम... इसके...

इक़बाल - जी... मैं इसका शौहर...

डॉक्टर ने इक़बाल को घूरा - यहीं रुकना तुम. वह अकेली जायेगी अंदर. औरतों का वार्ड है.

डॉक्टर अंदर चली गयी और कुछ पल बाद नर्स भी एक व्हीलचेयर लेकर सुप्रिया को अंदर की और ले गयी थी. इक़बाल वही खड़ा रह गया, उसकी आँखों के सामने सुप्रिया का झूलता हुआ बदन hi घूम रहा था.

इक़बाल परेशान होते हुए कॉरिडोर में इधर उधर चलने लगा, हर गुज़रता सेकंड उसे और ज़्यादा बेचैन कर रहा था. हिना चुप चाप बेंच पर बैठी हुई थी. Ek-do घंटे बीत गए थे.

अंदर वार्ड में, डॉक्टर ने सुप्रिया को सेलाइन चढ़वाना शुरू करवा दिया था, और उसे ek-do इंजेक्शन भी लगवा दिए गए थे. सुप्रिया की आँखें अब आधी खुली आधी बंद थी, बस ये पता था की वह किसी हॉस्पिटल में है, पर और किसी भी चीज़ का ध्यान नहीं.

बहार कॉरिडोर में, इक़बाल रुक कर वार्ड के दरवाज़े को घूर रहा था. तभी उसने महसूस किया के बेंच पर बैठी हिना वहां नहीं है. उसने सोचा की शायद वह यहीं कहीं गयी होगी, अभी आ जाएगी. पर कुछ देर के बाद भी वह नहीं लौटी तोह इक़बाल की बेचैनी बढ़ने सी लगी.

इक़बाल ने अपना फ़ोन निकाल कर उसका नंबर लगाया, कुछ घंटी बाद फ़ोन उठा, पर दूसरी तरफ रुबीना थी - हाँ इक़बाल... कैसी है सुप्रिया...

इक़बाल - पता नहीं अभी... अंदर ले गए हैं... हिना अपना फ़ोन वहीँ छोड़ आयी थी क्या?

रुबीना - हाँ... शायद जल्दी में भूल गयी होगी... क्यों? क्या हुआ?

इक़बाल - कुछ नहीं... मैं अभी करता हूँ थोड़ी देर में...

इक़बाल हॉस्पिटल में इधर उधर हिना को ढूंढ़ने लगा, टॉयलेट के बहार, नीचे दरवाज़े पर, हर जगह... वह कहीं नहीं दिख रही थी. उसने वॉचमन से पुछा तोह उसे पता चला की एक लड़की कुछ देर पहले रट हुए हॉस्पिटल से बहार निकली थी.

इक़बाल के दिल में घबराहट बढ़ती जा रही थी.

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अंदर सुप्रिया को थोड़ा सा होश आना शुरू हुआ. उसके ठीक सामने डॉक्टर कड़ी थी. उसने ज़रा सा हिलने की कोशिश की तोह पता चला की उसके पूरे शरीर में बोहोत ज्यादा दर्द हो रहा था.

डॉक्टर एक क्लिपबोर्ड पर एक कागज़ और पेन लेकर कड़ी थी. सुप्रिया को होश में आते देख उसने बिना किसी इमोशन के पूछा - सुन रही हो. अपना नाम बताया...

सुप्रिया ने धीरे से कहा - सु... सुप्रिया...

डॉक्टर ने उसका नाम लिखा - क्या हुआ था? कहीं गिर गयी थी?

सुप्रिया - पता... नहीं... बस बोहोत दर्द हो रहा है पूरे शरीर में... उल्टियां... और नीचे काफी जलन...

डॉक्टर - बहार वह आदमी तुम्हारा पति है?

सुप्रिया - जी...

डॉक्टर उसकी बात सुनकर थोड़ी हैरान हुई - घर से भागी हुई हो क्या?

सुप्रिया - नहीं... ऐसा कुछ नहीं...

डॉक्टर - मार पीट करता है वह तुम्हारे साथ?

सुप्रिया - नहीं...

डॉक्टर - सेक्सुअली एक्टिव हो उसके साथ... मेरा मतलब योन सम्भन्ध बनती हो उसके साथ...

सुप्रिया - जी...

डॉक्टर ने दो बीएड के बीच जो पर्दा था वह हल्का सा ढाका - मैं ज़रा तुम्हारी पयजामि नीचे करके देखूंगी... ठीक है...

सुप्रिया को बोहोत शर्म आ रही थी पर उसने हाँ में सर हिलाया.

डॉक्टर ने उसकी पयजामि और अंडरवियर नीचे खींचे और उसके पैरो को थोड़ा अलग करके वहां हाथ से छूने लगी.

डॉक्टर - हम्म्म... मैं अभी कुछ ब्लड टेस्ट लिख रही हूँ... बाद में आकर देखती हूँ...

डॉक्टर सुप्रिया को वहीँ छोड़ कर दुसरे पेशेंट के पास चली गयी थी. और कुछ देर बाद नर्स आकर सुप्रिया का ब्लड सैंपल लेने लगी.

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बहार इक़बाल हॉस्पिटल से निकल कर सड़क पर आ गया था और हिना को इधर उधर ढून्ढ रहा था. उसे हिना कहीं नहीं दिख रही थी. पर साथ hi उसे सुप्रिया के लिए भी बेचैनी हो रही थी. समझ नहीं आ रहा था वह क्या करे.

वह एक बार फिर जल्दी से हॉस्पिटल में वापिस आया और काउंटर पर नर्स से सुप्रिया के बारे में पूछने लगा. उसे बस इतना पता चला की वह अब होश में आ गयी थी, पर अभी भी उसकी तबियत काफी खराब hi थी.

इतने में फिर से रुबीना का फ़ोन आने लगा - इक़बाल... सब ठीक है न वहां...

इक़बाल - हाँ... ठीक hi है...

रुबीना - झूठ मत बोलो मुझसे... तुम हिना के बारे में क्यों पूछ रहे थे... मुझे बोहोत बेचैनी हो रही है... तुम्हे पता है न कितनी भड़की हुई थी वह.

इक़बाल - हाँ... वह बस... पता नहीं कहाँ चली गयी यहाँ से...

रुबीना - हैं??!! मतलब!?? कहाँ गयी वह...

इक़बाल - पता नहीं... मैं यहीं था... और वह... एकदम से गायब हो गयी...

रुबीना फ़ोन पर चिल्लाई - गायब हो गयी! कहाँ गयी.

इक़बाल - शायद अस्पताल से बहार कहीं.

रुबीना - अकेले? वह कैसे अकेले चली गयी? जाकर उसे ढूंढो न जल्दी से! वहां खड़े क्या कर रहे हो.

इक़बाल - मैं ढूंढ़ता हूँ...

रुबीना - कुछ भी गलत हो गया न... तोह बस तुम... पागल लड़की... बिलकुल अपनी माँ की तरह...

इक़बाल - कुछ नहीं होगा... मैं ढून्ढ लूंगा उसे... बस सुप्रिया को अकेले यहाँ...

रुबीना - हिना तुम्हारी कुछ नहीं है क्या?!! जो तुम उसे भूल कर सुप्रिया में लगे हुए हो!

इक़बाल की आवाज़ धीमी हो गयी - नहीं... ऐसा नहीं है...

रुबीना - या तुम अब सब कुछ भूल चुके हो इक़बाल!

इक़बाल - मैं... मैं ढूंढ़ता हूँ उसे...

इक़बाल ने फ़ोन काट दिया और तेज़ कदमो से हॉस्पिटल से बहार निकला. उसने मोटरसाइकिल स्टार्ट की और शहर की गलियों में हिना को ढूंढ़ने लगा. उसे समझ नहीं आ रहा था वह उसे कहाँ ढूंढे. हर लड़की का झुका हुआ चेहरा हिना जैसा hi लग रहा था.

काफी देर हो गयी थी ढूँढ़ते ढूँढ़ते, ऐसा लग रहा था वह एक hi जगह के कई बार चक्कर काट चूका था. शायद कुछ पालो के लिए वह सुप्रिया को भूल गया था और उसके मैं में उन्नीस साल पहले जो हुआ वह चल रहा था. उसने घबराहट में इधर उधर देखा.

उसने एक डैम से होश में आते हुए अपनी मोटरसाइकिल बस अड्डे की तरफ ली. वहां वह अपनी मोटरसाइकिल लगा कर, हिना को ढूंढ़ने लगा. शाम होने लगी थी, और उसकी घबराहट बढ़ती जा रही थी. भीड़ में हिना कहीं नहीं दिखाई दे रही थी.

वह हताश हो कर बस अड्डे से बहार hi निकला था की उसे सड़क के किना, एक पेड़ से सहारा लिए हिना बैठी दिखी. उसकी आँखों से आंसू उसके गालो से होते हुए बह रहे थे.

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इक़बाल दौड़ते हुए उसके पास गया और ज़ोर से बोलै - हिना!!! कहाँ चली गयी थी तुम!

हिना ने उसका कोई जवाब नहीं दिया, वह वहीँ बैठी रही.

इक़बाल उसके पास जाकर बैठ गया और उससे फिर से पुछा - हिना... तुम्हे पता है मैं तुम्हे कब से ढून्ढ रहा हूँ... तुम्हारी चची अस्पताल में बीमार पड़ी है और तुम वहां से भाग आयी.

हिना - तोह आप जायो वापस वहां... मेरी किसको फिक्र है वैसे भी...

इक़बाल - क्यों नहीं है फिक्र... तुम्हारी अम्मी इतनी परेशान थी तुम्हारे लिए... कुछ हो जाता तुम्हे तोह!

हिना - मैं उनके लिए हूँ hi क्या. ज्यादा से ज्यादा क्या होता... मर hi जाती न... किसको फरक पद जाता...

इक़बाल - ये कैसी बात कर रही है तू... चल कड़ी हो... मैं तुझे घर छोड़ कर आता हूँ...

इक़बाल ने उसका हाथ पकड़ कर उसे उठाना चाहा, लेकिन हिना ने हाथ झटक दिया.

हिना - कौनसा घर? जहाँ मैं बोझ बानी हुई हूँ सब पर.

इक़बाल - ऐसी बातें नहीं करती... बच्ची है तू अभी...

हिना ने उसे घूरा - बच्ची! किसकी बच्ची हूँ? जो वहां मेरे अब्बा है... उन्होंने तोह कभी मुझे अपनी बच्ची समझा नहीं... और दुसरे वाले... छोड़ कर भाग गए मुझे...

इक़बाल के चेहरा सफ़ेद हो गया - ये कैसी बहकी हुई बातें कर रही है...

हिना चीक पड़ी - बच्ची नहीं हूँ मैं! सब पता है मुझे!

इक़बाल ने न चाहते हुए भी पुछा - क्या पता है?

हिना के आंसू तेज़ हो गए थे - वही जो सच है... शायद बचपन से hi पता था... जब लोग बोलते थे... पर उस वक़्त इतनी समझ नहीं थी.

हिना रट हुए बोलती रही - और अब जब आप इतने सालों बाद आये, और हमेशा मेरी तरफ ऐसे देखते रहते हो जैसे कुछ कहना चाहते हो. पर आपने एक बार भी मेरे साथ बैठ कर बात की... पूछा की इतने साल मैं कैसे रही...

इक़बाल का सर झुक गया. कुछ बोल नहीं पाया.

हिना की आवाज़ काँप रही थी - पता है मुझे क्या लगा? लगा की शायद मैं इतनी बुरी हूँ की मेरा बाप भी मुझसे दूर भागना चाहता है... बस उन्हें फ़िर्क़ थी तोह अपनी नयी बीवी की... और अब सब मिलकर मुझे एक अंधे कुए में धकेल रहे हैं...

इक़बाल ने उसे फिर से पकड़ने की कोशिश की - ऐसा नहीं है...

हिना ने फिर से उसका हाथ झटक दिया - मत छुओ मुझे... आपका कोई हक़ नहीं है...

इक़बाल ने इधर उधर देखा लोग उनकी और देख रहे थे - शायद कोई हक़ नहीं... पर मेरी बात तोह सुन सकती है न...

हिना रट हुए कुछ नहीं बोली.

इक़बाल - तू छोटी सी थी, जब तेरी अम्मी गुज़र गयी... और मैं टूट सा गया था... मुझे नहीं लगा था मैं तुझे संभल पायूँगा. मैंने बोहोत बड़ी गलती की... तुझे अकेले छोड़ कर भाग गया.

हिना - और फिर इतने साल नहीं आये... कभी मेरी याद भी नहीं आयी?

इक़बाल - याद तोह आती थी... पर मुझे डर लगता था. सोचा की तू मुझे भूल गयी होगी... या फिर नफरत करती होगी मुझसे. दोनों hi बातें सोच कर बोहोत डर लगता था.

हिना उसकी और देख कर उसकी बात सुन रही थी. आज पहली बार शायद उसने उससे अपने मैं की कोई बात कही थी.

इक़बाल - तू बिलकुल अपनी अम्मी की तरह लगती है... अब जब वापिस आया था तोह तुझे देख कर मुझे वही याद आती थी... यहाँ आकर देखा तोह ऐसा लगा जैसे तू सब कुछ भूल गयी है... जैसे तू कभी मेरी थी hi नहीं.

हिना धीरे से बोली - मैं कुछ नहीं भूली थी... बस नयी चची को देख... मेरी हिम्मत hi नहीं हुई कुछ कहने की... और फिर अम्मी... मेरी अम्मी... जिन्होंने मुझे पाला... वह भी तोह कितना प्यार करती है मुझसे.

इक़बाल - मेरे लिए न सही... उनके लिए hi सही... वापस चल मेरे साथ...

हिना - और जहाँ वह लोग कहे वहां शादी कर लू?!

इक़बाल - नहीं... अब मैं वापिस आ गया हूँ... और तेरे साथ कुछ गलत नहीं होने दूंगा... ये मेरा वादा है... अगर तू मुझ पर भरोसा कर सके तोह.

हिना कुछ देर इक़बाल को देखती रही और फिर उसके गले लग गयी, उसके आंसू अभी भी बहते हुए.

कुछ देर बाद इक़बाल ने उसका चेहरा पकड़ते हुए उसकी और देखा - तू अपनी चची से भी प्यार करती है न...

हिना ने हलके से हाँ में सर हिलाया.

इक़बाल - चल फिर... अभी अस्पताल चलते है उनके पास... उन्हें अपने साथ लेकर घर चलेंगे... और फिर घर जाकर मैं सब ठीक कर दूंगा.

___________________

कुछ देर बाद हिना और इक़बाल वापस अस्पताल पहुंच गए थे. नर्स ने हिना को अंदर वार्ड में जाने दिया.

हिना घबराई हुई सी अंदर की और गयी और सुप्रिया को वहां एक बिस्तर पर बैठे देखा. वह अब पहले से थोड़ी बेहतर लग रही थी.

हिना ने जैसे hi सुप्रिया को देखा उसकी आँखों से फिर से आंसू बहने लगे और वह जाकर सुप्रिया के गले लग गयी.

सुप्रिया ने हलके से मुस्कुराते हुए उसके बालों में हाथ फेरा - ारी... ठीक हु मैं... कुछ नहीं हुआ... इतना क्यों रो रही है...

हिना उसे कैसे समझाती की क्या हुआ था, बस वह धीरे से बोली - अब्बू आपके लिए काफी परेशान थे... बस इसलिए...

सुप्रिया ने चौंकते हुए पुछा - अब्बू!?

हिना - मेरा मतलब... इक़बाल चाचू...

सुप्रिया उसकी और देख कर समझने की कोशिश कर रही थी की वह अभी क्या बोल गयी थी. लेकिन हिना की हालत देख कर उसने कुछ पूछा नहीं.

कुछ देर बाद डॉक्टर ने उसे घर जाने की इज़ाज़त दे दी थी. जाने से पहले डॉक्टर ने इक़बाल और सुप्रिया को अपने कमरे में बुलाया.

डॉक्टर - देखो... तुम इसे घर ले जायो... पर अभी काफी कमज़ोरी है... और इन्फेक्शन भी... कुछ दिन लगेंगे ठीक होने में.

इक़बाल - कैसा इन्फेक्शन?

डॉक्टर भड़कते हुए बोली - तुम्हारा दिया हुआ इन्फेक्शन! एक हफ्ते से पनप रहा है... आइंदा थोड़ी सफाई रखो नीचे... और हो सके तोह निरोध वैगेरा का इस्तेमाल करो. समझे?

इक़बाल ने शर्म से सर झुका लिया और धीरे से हाँ में हिलाया.

डॉक्टर ने सुप्रिया और देखते हुए पुछा - कितनी फ्रीक्वेंसी है तुम दोनों की?

सुप्रिया शर्म से नीचे की और देख रही थी - फिलहाल तोह मैं पीरियड्स से थी… तोह इतनी ज्यादा नहीं….

डॉक्टर - पहले भी हुआ है कोई इन्फेक्शन?

सुप्रिया ने धीरे से न में सर हिला दिया.

दोस्तो - तुम्हे भी खुद अपना ध्यान रखना चाहिए... समझी... क्या उम्र है तुम्हारी?

सुप्रिया ने धीरे से कहा - छब्बीस....

डॉक्टर ने इक़बाल की और घूरा, उसे देख कर पता चल रहा था की वह उस लड़की से उम्र में काफी बड़ा है - घर से भाग कर शादी की है?

सुप्रिया कुछ नहीं बोली बस इक़बाल की और देखने लगी.

डॉक्टर - देखो... तुम लोगो का आपस का मामला है... मैं इस सब चक्करो में नहीं पड़ती... पर तुम्हारी उम्र में प्रेगनेंसी रिस्क है... अपने शरीर पर ध्यान नहीं डौगी तोह आगे जाकर मुश्किल हो सकती है...

सुप्रिया - कैसी दिक्कत?

डॉक्टर - तुम्हे बच्चे चाहिए या नहीं?!

इक़बाल बीच में बोलै - हाँ… हमें बच्चे करने है… इस इन्फेक्शन से कोई दिक्कत…

डॉक्टर ने उसकी बीच में उसकी बात काटी - नहीं… इन्फेक्शन अपने आपसे कोई दिक्कत नहीं करेगा… पर ये लड़की जवान है तोह प्रेग्नेंट तोह हो सकती है न! और खासकर जब तुम इसके साथ बिना निरोध के सेक्स करोगे…

डॉक्टर के अच्छी आवाज़ से कमरे में थोड़ी छुपी हो गयी - देखो... मैं बस मेडिकल एडवाइस दे रही हूँ. मुझे तुम लोगो के बारे में जानने में और कोई दिलचस्पी नहीं है. ये कुछ मेडिकल टेस्ट लिख रही हूँ... इन्हे करवा लेना. अगर पैसो की कोई दिक्कत है हो तोह यहाँ काम पैसो में हो जायेंगे...

सुप्रिया ने उसके हाथ से कांपते हुए वह परचा लिया - जी...

डॉक्टर - ये लो दवाई का परचा भी... तीन टाइम अच्छे से लेते रहना... और सुनो... घर में कोई दिक्कत है तोह यहाँ किसी से बात कर सकती हो...

डॉक्टर की तीखी नज़रे इक़बाल की और देख रही थी.

सुप्रिया धीरे से बोली - नहीं... कोई दिक्कत नहीं है...

बहार आते हुए इक़बाल और सुप्रिया दोनों खामोश थे. हिना कॉरिडोर में बैठी उनका इंतज़ार कर रही थी. जैसे hi उसने उन्हें देखा, कड़ी हो गयी. सुप्रिया ने उसकी और देख कर एक थकी हुई मुस्कराहट दी. इक़बाल के चेहरे पर हल्का सा गुस्सा और शर्म थी.

वह तीनो कुछ hi देर में वापिस घर की और चल दिए, पर इक़बाल के मैं में एहि ख्याल चल रहा था की एक hi दिन में सब कुछ बदल सा गया था. बोहोत कुछ था घर पर जाकर कहने के लिए, और करने के लिए.

पर कैसे, वह खुद भी शायद नहीं जानता था.
 
थैंक यू आल फॉर योर कमैंट्स. ी वांटेड तो लेट एवरीवन क्नोव तहत ी विल बे रैपिंग उप थिस स्टोरी वीथिन थे नेक्स्ट 3-4 उपदटेस. ी विल लीव थे स्टोरी ओपन एंडेड विथ मल्टीप्ल पॉसिबिलिटीज एंड सम ओपन प्लाट थ्रेड्स. िफ़ आईटी बेकस पॉसिबल इन थे फ्यूचर, ी विल लुक तो गेट बैक तो आईटी लेटर.

िफ़ समवन इस क्यूरियस ी ऍम हैप्पी तो शेयर इन प्राइवेट थे ओपन प्लाट आइडियाज तहत ी हद इन माय मंद फॉर थे फ्यूचर.

एंड मय्बे सम डे ी विल लुक तो रेफिने थे फुल स्टोरी अगेन एंड फिक्स थे मिस्टेक्स ी मेड.

थैंक यू तो एवरीवन तहत सपोर्टेड में थ्रू थे लास्ट ईयर एंड केपट में गोइंग. ी विल लुक तो थैंक थम अगेन इन डिटेल आफ्टर थे लास्ट अपडेट.
 
अपडेट 107

लखनऊ के एक होटल के कैफ़े में अकेले बैठी हुई एक लड़की कहीं खोयी हुई सी थी. उसके सामने एक कॉफ़ी का कप रखा था जिसकी उसने एक भी सिप नहीं ली थी. उसके दिमाग में पिछले कई महीनो की बातें चल रही थी. कितना कुछ बदल गया था, बल्कि सब कुछ hi तोह बदल गया था.

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तभी एक आवाज़ ने उसका ध्यान अपनी और खींचा - क्रीटीई... वेलकम बैक तो इंडिया... मेरे नृ दोस्त...

कृति ने अपने चेहरे पर एक मुस्कराहट लाते हुए सामने की तरफ देखा जहाँ आकाश खड़ा था.

कृति ने उसको कासुअल हो कर बोलै - आ गया तू... इतना टाइम लगा दिया...

आकाश ने बैठते हुए अपना बैग साइड में रखा - तेरे hi काम से बिजी था. और बता कितने दिनों के लिए आयी है घूमने? दो हफ्ते हो गए न आये हुए?

कृति - हम्म्म... हाँ. ये बता... हुआ क्या काम?

आकाश - न तोह हाल चाल पूछा... न कुछ और... बस सीधे मुद्दे पर... सेल्फिश!

कृति हलके से हसी - ाचा बता दे... कैसा है?

आकाश - ठीक hi हूँ... अब जाकर दूसरी जॉब लगी है कहीं...

कृति - हम्म्म... तोह... बंद कर थी वह कंपनी...

आकाश - हाँ... बताया तोह था... तेरे जाने के 1-2 हफ्ते बाद hi बंद हो गयी थी.

कृति - सबको जॉब मिल गयी...

आकाश ने अपने कंधे ुचा दिए - मोस्टली ी थिंक... जिनसे मेरी बात होती थी... ी थिंक साहिल सर कहीं जॉब नहीं कर रहे...

कृति - हम्म्म...

आकाश - वैसे जो मुझसे काम बोलै... वह तोह तू खुद भी कर सकती थी... तुझे बस जाकर अपने भैया से बात कर्ली होती.

कृति - हम्म्म...

आकाश - अब ये हम्म्म वाले रेस्पॉन्सेस hi करती रहेगी क्या. Don't तेल्ल में तूने उनसे अभी तक बात नहीं की.

कृति ने कहीं और देखते हुए कहा - It's कॉम्प्लिकेटेड यार... ी can't एक्सप्लेन. खैर... दिखा न तुझे क्या मिला.

आकाश ने अपना बैग खोलते हुए कहा - लगता है मैं गलत लाइन में घुस गया. मुझे तोह प्राइवेट इन्वेस्टिगेटर बन जाना चाहिए! पता है कितना मुश्किल था ऑफिस के स्टोरेज से ये पेपर्स लाना... मुझे साहिल सर बनने की एक्टिंग करनी पड़ी थी. एक नकली ईद कार्ड भी बनवाया उसके लिए.

कृति ने उसकी बातें अनसुनी कर जल्दी से उसके हाथ से वह कागज़ ले लिए. कृति की नज़रे उन कागज़ो पर तेज़ी से ऊपर से नीचे और वापिस ऊपर दौड़ रही थी.

कृति ने असमंजस में आकाश की तरफ देखते हुए कहा - ये कैसे पॉसिबल है... मुझे लगा... मममम....

आकाश - लग तोह ऐसा hi रहा है की काफी सारा मनी मूव हुआ था उस दिन... कंपनी के बैंक अकाउंट से...

कृति - पर उसके पास तोह एक्सेस भी नहीं था! और बोलै गया था की ट्रांसफर एक रात पहले हुआ है... फिर....

आकाश - मुझे ये समझ नहीं आ रहा की व्हाई अरे यू सो बोथेरेद अबाउट आल थिस. वह भाग गयी तोह भाग गयी न... तुम क्यों उसे ढूंढ़ना चाहती हो.

कृति के चेहरे पर परेशानी साफ़ झलक रही थी पर उसने आकाश का जवाब नहीं दिया.

आकाश - बी थे वे... दो यू क्नोव... राहुल...

कृति ने एकदम से उसकी बात काट दी - मुझे उसके बारे में नहीं सुन्ना कुछ.

आकाश - ारी सुनो तोह... मय्बे आईटी विल चीयर यू उप... िफ़ यू अरे सैडिस्टिक. उसका काफी बड़ा एक्सीडेंट हो गया था... उसकी कार में एक ट्रक जाकर लगा.

कृति ने धीरे से कहा - सो... वह....

पर वह अपना सेंटेंस पूरा नहीं कर पायी.

आकाश - नहीं नहीं... बच गया... थैंक गॉड. बस... अच्छे से चल नहीं पाटा अब.

कृति के माथे की त्योरियां चड्ढी हुई थी - हम्म्म... और वह सुप्रिया का हस्बैंड... उसका कुछ पता चला?

आकाश - वह वहां अब नहीं रहता.

कृति भड़कते हुए बोली - वह तोह मुझे भी पता है इडियट! पर अब कहाँ रहता है...

आकाश - नहीं पता...

कृति - पता क्या है फिर!

आकाश - इतना कुछ तोह पता किया... तुझे क्या पता चला?

कृति - हम्म्म... दो हफ्तों से हर दुसरे दिन थाने का चक्कर काट रही हूँ... ऐसा लग रहा है जैसे उन लोगो ने फाइल बंद कर दी है... कोई उसे ढून्ढ नहीं रहा. मैं जाती हूँ तोह वह लोग अब अन्नोय हो कर फुसफुसाते है - फिर आयी बेहेन की लोदी...

आकाश एक डैम शॉकेड होते हुए पर हस्ते हुए बोलै - तू सच में अमेरिका hi गयी थी न??! कभी तेरे मुँह से हिंदी गालियां नहीं सुनी.

कृति कहीं और फोकस्ड थी - कुछ तोह गलत है इस सब में... मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा.

आकाश - यू क्नोव वेयर यू कैन फंड थे अंसवेरस... विक्रम सर...

कृति - और भी किसी को तोह कुछ पता होगा.... साहिल सर! उनके अप्रूवल के बिना बैंक से मनी नहीं हो सकता था... मुझे उनसे जाकर मिलना होगा.

आकाश के चेहरे से हसी गायब हो गयी - उम्म्म... अगर उनसे मिलने जाएगी... तोह मैं भी चलता हूँ तेरे साथ...

कृति - क्यों? तू क्या करेगा जाकर? वह मुझे अकेले में शायद कुछ बता दे... पर तेरे साथ... ी डाउट आईटी.

आकाश हिचकिचाते हुए बोलै - यार... ी don't थिंक... यू शुड जो तेरे अलोन...

कृति ने हैरान होते हुए उसकी और देखा - क्यों?

आकाश - उम्म्म...

कृति - बोल न!

आकाश - यार... जब मैं ये पेपर्स वहां ढून्ढ रहा था तोह साहिल सर के सामान में कुछ और डाक्यूमेंट्स मिले.

कृति - कैसे डाक्यूमेंट्स? दिखा!

आकाश ने रेलुक्टेंटली कागज़ निकालते हुए कृति की और किया - तुझे पता था की सम इयर्स बैक... उन्हें जेल हुई थी - फॉर ोुटरगिंग थे मॉडेस्टी ऑफ़ ा वीमेन... एटेम्पट तो... यू क्नोव व्हाट...

कृति उन पराने कागज़ो को देख तोह रही थी, पर उसे अपनी आँखों पर यकीन hi नहीं आ रहा था. वह धीरे से अपना सर न में हिलाते हुए बोली - NO! No... थिस इस नॉट पॉसिबल... साहिल सर इस लिखे थे निकसत पर्सन एवर...

आकाश ने कागज़ पर एक जगह इशारा किया - बैल वाले डॉक्यूमेंट पर गारंटर का नाम देख.

कृति ने वहां लिखे नाम को पड़ा - विक्रम सिंह...

आकाश - काफी वीयर्ड है न... विक्रम सर ने hi उनकी बैल करवाई थी... ी didn't इवन क्नोव थे वेरे तहत क्लोज.

कृति सोचते हुए बोली - हाँ... शायद वह लोग कॉलेज के टाइम से एक दुसरे को जानते थे. पर फिर भी... मैं ये नहीं मान सकती. मैंने उनके साथ 3 साल काफी क्लोसेली वर्क किया है. वह कभी ऐसा कर hi नहीं सकते.

आकाश - हम्म्म... यू नेवर क्नोव... पर ी थिंक तुझे वहां अकेले नहीं जाना चाहिए.

कृति ने उसकी और घूर कर देखा - यू don't वोर्री अबाउट में! ी कैन हैंडल माइसेल्फ... इवन िफ़ समथिंग गोज रॉंग.

पिछले कुछ महीनो ने शायद उसे इतना स्ट्रांग बना दिया था की उसे अब किसी चीज़ से डर नहीं लगता था.

______________________

कृति आकाश से मिलने के बाद एक बार फिर थाने की और बढ़ चली. उसे पता था उसे कुछ नहीं मिलने वाला पर पता नहीं क्यों ये अब उसका रूटीन सा बन गया था.

स्टेशन में घुसते हुए कृति ने अपने आखों से सनग्लासेस उतारते और अपने हाथ में पकड़ लिए.

उसको आते देख अफसर भी धीरे से बुदबुदाया, वह बिलकुल खुश नहीं लग रहा था.

कृति अपने चेहरे पर एक नकली मुस्कान लायी - सर... मैं फिर से आ गयी...

अफसर - मैडम आप क्यों मेरे पीछे पड़ी हैं?

कृति - सर आप इतने बिजी रहते हो... तोह किसी को तोह आपको याद दिलाना होगा न की आपके पास कौनसे केस ओपन है.

अफसर ने हाथ जोड़ते हुए कहा - मैडम आप अच्छे घर की लगती हो... आप प्लीज मत आया करो यहाँ.

कृति - पर फिर इन्वेस्टीगेशन कैसे बढ़ेगी...

अफसर ने गहरी सास भरी - मैडम... सुनिए...

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वह कृति के थोड़ा पास आ गया, कुछ ज्यादा hi पास, और धीरे से बोलै - मुझे नहीं पता की जो लड़की गायब हुई आपकी कौन थी... शायद आपकी बेहेन या दोस्त...

कृति ने धीरे से हाँ में सर हिलाया और कहा - दोस्ट्त.....

अफसर - ऊपर से काफी प्रेशर है इस केस में कुछ न करने के लिए. आप समझिये... न कुछ हुआ है और न कुछ होने वाला है.

कृति को लगा अब कुछ निकल कर बहार आ रहा था - किसका प्रेशर है?

अफसर - आपकी दोस्त... कुछ बड़े लोगो के चक्कर में फास गयी थी... कुछ तोह लफड़ा हुआ था. जब उसके घरवाले नहीं पूछ रहे तोह आप क्यों दोस्ती के चक्करो में पड़ी हैं.

कृति - कौन बड़े लोग? विक्रम सिंह...

अफसर ने उसको धीरे बोलने का इशारा किया - शह्ह्ह्ह.... धीरे बोलिये न... आप जानती है उसे? बोहोत डेंजर आदमी है वह. उसको पता चला की कोई इस केस के बारे में पूछ रहा है, तोह कहीं आपको भी न उठवा ले.

विक्रम के बारे में ऐसा सुनकर कृति को अंदर से अच्छा नहीं लगा, पर शायद सच्चाई एहि थी - हम्म्म... ठीक है... और कुछ इस केस के बारे में जो आप बता सकते हो?

अफसर - नहीं मैडम... बस एक आप hi आये हो इतने महीनो में इस केस के बारे में पूछने के लिए. और हाँ... एक वह... उसका हस्बैंड. उसको हर महीने हाज़री देने आना होता है यहाँ...

कृति की आँखों में एक चमक सी आ गयी - सुप्रिया का हस्बैंड आता है यहाँ? आपके पास उसका एड्रेस है क्या?

अफसर - हाँ... रजिस्टर में लिखा होगा...

कृति - आप मुझे वह एड्रेस दे सकते हो क्या?

ऑफिस - मैडम... ऐसे कैसे... रूल्स होते है न...

कृति - रूल्स तोह वैसे भी फॉलो नहीं हो रहे न? आप मुझे एड्रेस दे दो... प्लीज... मेरी काफी हेल्प हो जाएगी. मैं आपको और परेशान नहीं करुँगी...

अफसर ने थोड़ी देर सोचा, फिर रजिस्टर की तरफ देखा - ठीक है... एक बार... पर फिर आप प्लीज यहाँ आना बंद करना...

कृति - प्रॉमिस. मैं नहीं आयूंगी जल्दी से.

अफसर ने भारी सांस भरते हुए रजिस्टर के पैन पालते और अतुल का एड्रेस निकाला. कृति की आँखों में जैसे फिर से एक चमक सी आ गयी.

कृति गाडी में बैठी, अतुल का एड्रेस उसके हाथ में था. पर अभी नहीं. पहले उसे एक और जगह जाना था. एक और सवाल पूछना था. वहां जहाँ आकाश ने उसे अकेले जाने से मन किया था.

कृति साहिल सर के घर के बहार तक एक दो बार पहले गयी थी, उन्हें ड्राप करने. कृति को बोहोत अच्छे से तोह याद नहीं थी वह जगह, पर वह फिर भी किसी तरह से वहां पहुंच hi गयी.

घर से थोड़ा दूर उसने अपनी गाडी रोक दी और फिर चलते हुए घर के बहार पहुंच गयी. उसके मैं में एक अजीब सी घबराहट हो रही थी. आज से पहले उसने कभी साहिल सर के बारे में ऐसा नहीं सोचा था. पर ऐसा लग रहा था की ek-ek करके सारे राज खुलते जा रहे थे. कोई भी वैसा नहीं था जैसा दीखता था. खैर... वह तोह बस यहाँ इनफार्मेशन के लिए आयी थी.

कृति ने घर की बेल्ल बजायी. कुछ देर तक कोई आवाज़ नहीं हुई. कृति को एक पल के लिए लगा शायद कोई घर पर नहीं है... या फिर वह गलत एड्रेस पर पहुंच गयी है.

पर फिर दरवाज़ा हल्का सा खुला, अंदर से साहिल सर ने झांकते हुए कृति की तरफ देखा. उनकी दादी नार्मल से ज्यादा बड़ी हुई थी और बाल बिखरे हुए थे, जैसे वह अभी सो कर उठे हो.

साहिल ने चस्मा लगते हुए कृति की और देखा - कृति... उस से कब आयी?

उनकी आवाज़ में ज़रा भी हैरानी नहीं थी उसे वहां देख कर, इतने कासुअल जैसे कृति को वहां एक्सपेक्ट hi कर रहे हो.

साहिल ने दरवाज़ा पूरा खोला - आयो न... अंदर आयो...

कृति धीरे से अंदर आ गयी और वह इधर उधर देख रही थी. काफी सिंपल सा नार्मल सा घर था.

साहिल - कुछ लोगी... चाय... कॉफ़ी... वैसे मैं इतनी अच्छी बनता नहीं...

कृति दीवारों पर लगी कुछ फोटोज की तरफ देख रही थी, जो शायद सालो पहले की थी. उन में साहिल का चेहरा बिलकुल अलग सा लग रहा था, बेहद खुश, कोई दादी मच नहीं, एक हैंडसम यंग मन. कुछ फोटोज में उनके साथ एक सुन्दर जवान औरत भी थी, शायद उनकी वाइफ होगी, और एक छोटी बच्ची की अलग से फोटोज.

कृति - नहीं... it's फाइन... कुछ नहीं चाहिए.

साहिल - बैठो...

कृति को काफी उनकंफर्टबले सा लग रहा था, जैसा कभी न लगा हो. वह शायद यहाँ ज्यादा देर नहीं रुकना चाहती थी.

साहिल - और बताया... तुम्हारी स्टडीज कैसी चल रही है वहां?

कृति - ुहममम... सर... मैं इस सब के बारे में बात करने नहीं आयी हूँ.

साहिल - ओह... अच्छा. ी ऍम सॉरी... बताया फिर?

कृति हिचकिचाते हुए बोली - सर... मैं बस... ये जानना चाहती हूँ की आखिर हुआ क्या था? मुझे नहीं लगता सुप्रिया ने कोई फ्रॉड किया होगा...

साहिल ने कुछ कहा नहीं, वह बस कृति की और देख रहा था.

कृति - समझ नहीं आ रहा है की सच क्या है... और सुप्रिया गयी कहाँ. मुझे लगता है आपको ज़रूर कुछ पता होगा.

साहिल - तुमने विक्रम से बात की?

हर इंसान उससे शायद एहि सवाल कर रहा था आज, कृति - नहीं...

साहिल - हम्म्म...

कृति ने इंतज़ार किया की शायद वह कुछ और कहेंगे, पर साहिल बस चुप रहा.

कृति थोड़ी फ़्रस्ट्राटे होते हुए बोली - सर... प्लीज. मुझे जानना है की कंपनी से वह पैसे किसने ट्रांसफर किये... सुप्रिया के पास तोह एक्सेस hi नहीं था. आपकी अप्रूवल के बिना तोह...

साहिल ने उसकी बात काट दी - कृति... तुम क्यों ढून्ढ रही हो उसे?

कृति - क्यूंकि... क्यूंकि मैं...

वह रुक गयी. क्या बोलती वह? की मैंने hi सब बर्बाद किया? की मेरी वजह से...

साहिल उसकी फीलिंग्स को पढ़ते हुए बोलै - It's ok... तुम्हे आंसर करने की ज़रुरत नहीं है... हम सबकी लाइफ कॉम्प्लिकेटेड होती है.

साहिल की बात ने कृति का गुस्सा और बढ़ा दिया - सर प्लीज... ी नीड तो क्नोव! आपने हेल्प करि थी न विक्रम की.

कृति की आवाज़ में नरमी नहीं रही थी.

कृति - सर! बताइये न? आप क्यों चुप हैं? क्या किया आप लोगो ने? सुप्रिया ज़िंदा भी है या...

साहिल ने कृति को घूर कर देखा जैसे वह कृति के इस क्वेश्चन से काफी शॉकेड हो गया हो.

कृति की कापति हुई आवाज़ निकली - आप और विक्रम अच्छे दोस्त हो न?! वह केस... विक्रम ने आपकी बैल करवाई थी... आप और वह मिल कर भोली भाली लड़कियों को फसते हो... और फिर उनके साथ.... सुप्रिया के साथ भी आप दोनों ने...

साहिल शांत पर सख्त आवाज़ में बोलै - बस करो... न तुम समझोगी... और न मैं समझा पायूँगा.

कृति अपना बैग उठाते हुए कड़ी हो गयी, उसकी आँखें गीली हो चुकी थी - समझने के लिए कुछ नहीं बचा है... मैं सब समझ गयी हूँ. विक्रम और आप मेरे िडोल्स थे... अब समझ में आया मैं कितनी गलत थी.

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साहिल ने अपना कम्पोसरे रखते हुए कहा - कृति... न मैं उतना अच्छा हूँ जितना तुमने कभी सोचा था, और न उतना बुरा जितना तुम अब सोच रही हो.

कृति फ़्रस्ट्रेटेड हो कर दरवाज़े की तरफ बढ़ी. जाते जाते उसने फिर से उन फोटोज की और देखा, और पीछे मुद कर पूछा - ये आपकी फॅमिली है?

साहिल ने हलके से हाँ में सर हिला दिया, पर उसका ध्यान अब कृति पर नहीं था, वह कुछ सोचते सोचते खो गया था.

कृति कुछ और बोलने को hi हुई थी - “अगर इनके साथ….” की उसे रीलीज़ हुआ की शायद वह फिर से एक लाइन क्रॉस कर देगी. वह गुस्से में दरवाज़ा खोलते हुए बहार निकल गयी.

पीछे से बस दरवाज़ा धीरे से बंद करने की आवाज़ आयी.

कृति बहार कड़ी रही कुछ देर. हैरान, फ़्रस्ट्रेटेड, गुस्से mein.Woh चाहे जितने भी हाथ पेअर मार रही थी, हर रास्ता बंद hi दिखाई दे रहा था. शायद एक hi आखरी रास्ता बचा था, जहाँ वह बिलकुल नहीं जाना चाहती थी.
 
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अपडेट 108

इक़बाल, सुप्रिया और हिना को लेकर हॉस्पिटल से बस निकला hi था. उसे पहले सुप्रिया की दवाइया लेनी थी, और साथ hi उसका मैं कह रहा था की उसे घर जाने से पहले hi सुप्रिया को हिना के बारे में बता देना चाहिए.

इक़बाल ने हॉस्पिटल के पास hi एक केमिस्ट की दूकान देखते हुए मोटरसाइकिल वहां रोक ली.

सुप्रिया ने उसे मोटरसाइकिल रोकते देख पुछा - क्या हुआ? यहाँ क्यों रुके है?

इक़बाल - आपकी दवाई लेनी है न...

उसने मोटरसाइकिल का स्टैंड लगाया और नीचे उतरा. सुप्रिया और हिना मोटरसाइकिल के पास hi खड़े थे. शाम अँधेरे में बदल रही थी, और रात की ठण्ड भी बढ़ रही थी. हिना ने कास कर सुप्रिया का हाथ पकड़ा हुआ था, जैसे वह उसे संभल रही हो, या खुद को.

दवाई लेते हुए भी इक़बाल पीछे सुप्रिया की और देख रहा था, सोचते हुए की वह क्या कहेगी जब वह ये उसे बताएगा. और भी तोह कुछ था, जो छिपा हुआ था.

जैसे hi इक़बाल दवाई लेकर उनके पास लौटा, सुप्रिया ने पुछा - दवाइया काफी महंगी होगी?

इक़बाल - तुम उसकी फिक्र न करो...

सुप्रिया सही से कड़ी भी नहीं हो पा रही थी. वह इंतज़ार कर रही थी इक़बाल कब चलेगा. इक़बाल का हाथ मोटरसाइकिल के हैंडल को कास के पकडे हुआ था. पर वह बैठ नहीं रहा था.

इक़बाल - चलने से पहले... मुझे तुम से कुछ कहना है...

इक़बाल ने हिना की और देखा, जैसे उसकी इज़ाज़त भी मांग रहा हो सब कुछ बताने के लिए. हिना ने हलके से हाँ में सर हिलाया. सुप्रिया उन दोनों की आँखों hi आँखों में हो रही बात को समझ नहीं पा रही थी.

सुप्रिया ने बेसब्री से कहा - घर चलकर भी तोह बात कर सकते हैं?

इक़बाल - नहीं... घर जाने से पहले hi बात करना सही होगा... आज पता नहीं क्या होगा वहां...

सुप्रिया उसकी तरफ देखने लगी, इक़बाल के चेहरे पर उसने ऐसी असमंजस पहले नहीं देखि थी.

इक़बाल आखिर एक झटके में बोल पड़ा - हिना... हिना मेरी बेटी है...

सुप्रिया कुछ पल तक बस उसकी तरफ देखती रही. जैसे शब्द समझ नहीं आ रहे हो - आपकी बेटी... मतलब?

इक़बाल - हिना... सीमा और मेरी बेटी है...

सुप्रिया - आपकी और सीमा की बेटी! पर…

इक़बाल - हाँ... काफी लम्बी कहानी है... मैं तुम्हे सब बता दूंगा... पर फिलहाल मैं चाहता था की घर जाने से पहले तुम्हे भी ये पता हो...

सुप्रिया को ऐसा लग रहा था जैसे वह कुछ जानती hi नहीं थी इक़बाल के बारे में - मैं इतने महीनो से आपके साथ यहाँ हु... और आपने कभी...

इक़बाल - मुझे लगा था... तुम... यहाँ... बस कुछ दिनों के लिए हो...

सुप्रिया - और अब क्या लगता है?

इक़बाल ने आँखें झुका ली.

सुप्रिया ने हिना की और देखा - और तुम... तुम जानती थी इस बारे में?

हिना की आँखों में आंसू थे, उसने हलके से सर हाँ में हिलाया - मुझे हमेशा से लगता था... पर आज hi अब्बू ने बताया. आप नाराज़ हो क्या हम से?

हिना सुप्रिया के गले लग गयी और रोने लगी. सुप्रिया कुछ नहीं बोली. नाराज़? उसको खुद नहीं पता था वह क्या महसूस कर रही थी. हॉस्पिटल में हिना का वह अब्बू कहना और उसे गले लगा कर फुट फुट कर रोना भी अब एकदम से समझ आने लगा था.

हिना - मैं जानती हु आप मेरी अम्मी नहीं हो... पर आप मेरे लिए बोहोत ख़ास हो, क्यूंकि आप hi मेरे अब्बू को वापिस मेरे पास लेकर आयी हो.

सुप्रिया के हाथ अपने आप hi धीरे धीरे हिना के बाल सहलाने लगे. सब कुछ इतना अचानक से हो गया था की सुप्रिया को भी लग रहा था जैसे कोई सपना हो. दिन में हॉस्पिटल में थी, बेहोशी की सी हालत में और अब यहाँ सड़क पर ये... ये सब पता लग्न.

सुप्रिया ने हिना की और देखा. इस सब में इस छोटी सी लड़की की क्या गलती थी? ठीक उसकी तरह शायद वह भी अपने हालत का शिकार हुई थी. उसने अपने अंदर हिम्मत लाते हुए उसके आंसू पोछते हुए कहा - मैं नाराज़ नहीं हूँ. तुमसे तोह बिलकुल नहीं. तुमने कोई गलती नहीं की. समझी?

हिना ने हलके से हाँ में सर हिलाया. सुप्रिया ने इक़बाल की और देखा. बोहोत कुछ पूछना था, पर शब्द नहीं मिल रहे थे. या शायद ये पूछने का सही वक़्त भी नहीं था. उसे समझ नहीं आ रहा था वह इक़बाल पर गुस्सा भी करे तोह क्यों और इस हक़ से.

इक़बाल ने छुपी तोड़ते हुए कहा - घर जाकर मैं... भाई जान से बात करूँगा... हिना की शादी उसकी मर्ज़ी के बगैर नहीं होगी... शायद वह खुश नहीं होंगे इस सब से... पर मैं सब संभाल लूंगा.

सुप्रिया ने हलके से हाँ में सर हिलाया. कुछ देर बाद वह तीनो मोटरसाइकिल पर बैठते हुए वापिस घर की और चल दिए.

रास्ते भर सुप्रिया अपने मैं में यहाँ बिताये सारे पल अपने दिमाग में याद करने लगी. ऐसा लग रहा था की सारे रहस्य एकदम से सुलझ गए हो. हिना की शकल आखिर क्यों रुबीना पर नहीं बल्कि फोटो की उस लड़की, सीमा, से मिलती थी. क्यों रुबीना हिना को इतना बचा कर चलती थी, जैसे वह उसके लिए किसी की अमानत हो. और कैसे इक़बाल हिना से न बात करते हुए भी उसकी और देखता रहता था.

_______________________

घर के बहार मोटरसाइकिल से उतारते हुए इक़बाल ने हिना की और देखा - हिना... तुम अपनी चची को लेकर अंदर चली जाना... और अपने कमरे का दरवाज़ा बंद कर लेना.

हिना ने हलके से हाँ में सर हिलाया और उसने दरवाज़ा खटखटाया. रुबीना ने झट से दरवाज़ा खोला जैसे वह बेसब्री से उनका इंतज़ार कर रही हो. हिना अंदर घुसते hi रुबीना के गले लग गयी और रोने लगी. रुबीना उसे पकडे हुए इक़बाल की और देख रही थी.

इक़बाल उसकी और देखते हुए धीरे से बोलै - उसे सब पता है...

रुबीना का कलेजा जैसे बैठ सा गया, इतने सालों से बंद राज़ बहार आ चूका था.

अब्बास अंदर hi बैठा था, और उन्हें देखते hi बोलै - इतनी देर कैसे लग गयी!

हमेशा की तरह इक़बाल की जबान लड़खड़ा रही थी - बस वह... दवाई लेनी थी... रास्ते में...

अब्बास - रात में दो जवान लड़कियों के साथ कुछ हो जाता तोह... तुझे तोह कोई जिम्मेदारी का एहसास है नहीं. मैंने सुना हिना भी अस्पताल से गायब हो गयी थी.

रुबीना बीच में आते हुए बोली - नहीं... ऐसा कुछ नहीं... वह बस ग़लतफहमी थी...

अब्बास - ग़लतफहमी कैसी? बात को छुपाने की कोशिश मत करो तुम दोनों... मैं अच्छे से जानता हु की तुझसे कुछ नहीं संभालता.

इक़बाल अपने अंदर हिम्मत लाते हुए बोलै - भाई जान... मुझे आपसे कुछ अकेले में बात करनी है...

अब्बास - क्या बात करनी है...

इक़बाल - यहाँ नहीं... ऊपर चलते है?

अब्बास - क्यों? सबके सामने बोलने से डर लगता है... यहीं कर ले जो बात करनी है...

इक़बाल ने रुबीना की और देखा, रुबीना की आँखें कह रही थी की वह आगे कुछ न बोले पर इक़बाल रुका नहीं - भाई जान... मैंने हिना को सब बता दिया है.

अब्बास अभी भी आराम से बैठा हुआ था, जैसे उसे कोई फरक नहीं पड़ता था - क्या बता दिया है?

इक़बाल - एहि... की वह मेरी बेटी है...

अब्बास - तेरी बेटी... तेरी बेटी कहाँ से है वह?

हिना और सुप्रिया अभी हिना के दरवाज़े पर hi खड़े थे, पूरी तरह अंदर भी नहीं गए थे. वह वहीँ रुक गए और उन दोनों की बातें सुनने लगे. अम्मी भी अपने कमरे से चुप चाप सब कुछ सुन रही थी, पर उनकी हिम्मत नहीं थी आज इस लड़ाई के बीच में आने की.

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इक़बाल - मेरी और सीमा की बेटी...

अब्बास - तेरी और उस भागी हुई लड़की की बेटी... जिसे तू यहाँ छोड़ कर भाग गया था? और अब फिर एक और लड़की को भगा लाया अपने साथ. भागने और भागने के इलावा आता क्या है तुझे?

रुबीना - अभी बहार से आया है... इसे आराम करने दो... कल बात कर लेंगे ये सब.

अब्बास ने रुबीना को नज़र अंदाज़ कर दिया - इतने साल बाद घर आया... और फिर से वही सब हरकतें शुरू कर दी है... हिना को भी गलत राह पर ले जा रहा है...

इक़बाल - भाई जान... आप मेरी बात सुने... हिना... उस लड़के से शादी नहीं करना चाहती... और न मैं ये चाहता हूँ...

अब्बास ने रुबीना को घूर कर देखा - देख रही हो इसे... इतने साल इसकी बेटी को अपना बना कर पाला और आज ये हमें अपना फैसला सुना रहा है.

इक़बाल - मैं आपका बोहोत शुक्र गुज़ार हूँ... पर अब मैं उसे संभाल सकता हूँ...

अब्बास ने हस्ते हुए बोलै - पहले खुद को संभालना तोह सीख ले... कहाँ शहरों में चौकीदार की नौकरी करता फिर रहा था. और अब दो दो जवान लड़कियों को संभालेगे.

इक़बाल ने अब्बास को घूर कर देखा - मैं उन्हें अच्छे से संभाल लूंगा... वह मेरी बेटी और बीवी हैं...

अब्बास अचानक गुस्से में खड़ा हो गया और उसकी आवाज़ थोड़ी तेज़ हो गयी थी - तेरी बेटी? बार बार क्यों दोहरा रहा है... इतने सालो से उसे किसने पाला है?

अब्बास फिर से दहाड़ा - तू चाहे कोई न हो... पर ये घर अभी भी मेरा है... और यहाँ वही होगा जो मैं चाहता हूँ... हिना की शादी वहीँ होगी...

रुबीना बीच में बोली - जब हिना और उसके अब्बू नहीं चाहते की उसका निकाह वहां हो... तोह आप क्यों इस ज़िद्द पर अड़े हैं.

अब्बास - क्यूंकि ये मेरा घर है... और यहाँ वह होगा जो मैं चाहूंगा...

रुबीना की आवाज़ तेज़ हो गयी - आप अगर अपनी ज़िद्द पर अड़े रहे तोह ये सब आपको छोड़ कर चले जायेंगे... इतने दिनों बाद जब सब ठीक होने लगा है तोह आप इसे फिर से क्यों जाने देना चाहते हो.

अब्बास - तू तोह एहि चाहेगी न की ये यहाँ रहे... ताकि तुम लोग फिर से वही सब...

रुबीना की आवाज़ कांपते हुए बोली - और मत बोलिये... हिना यहीं कड़ी है...

अब्बास ने गुस्से में अपनी मुट्ठी बीच ली जैसे कोई पुराण ज़ख्म फिर से खुल गया हो. शायद वह भी हिम्मत नहीं कर पा रहा था और आगे कहने की - ये दोनों जाए तोह जाए... पर ये लड़की कहीं नहीं जाएगी... इसकी शादी मैं जहाँ कहूंगा वहीँ होगी...

अचानक से हिना की पलटी सी आवाज़ तेज़ी से बहार निकली - आप कौन है मेरे लिए ये फैसला लेने वाले. आपने मुझे कभी अपनी बेटी माना hi नहीं.

अब्बास ने उसे गुस्से से घूरा - क्या कहा तूने!

हिना की आवाज़ में अब डर नहीं था - जो आपने सुना!

अब्बास एकदम से हिना की तरफ बढ़ा, उस पर हाथ उठाने के लिए. इक़बाल ने बीच में आते हुए उसका हाथ पकड़ा. अब्बास ने झटका दिया. दोनों एक दुसरे को घूर रहे थे. अब्बास अपना हाथ छुड़ाने की कोशिश कर रहा था, तभी इक़बाल ने उसे एक ज़ोर का धक्का दे कर ज़मीन पर गिरा दिया.

अब्बास कुछ देर ज़मीन पर बैठा हुआ इक़बाल को घूरता रहा. फिर धीरे से खड़ा हुआ, और बिना किसी से नज़रे मिलाये वहां से तेज़ी से निकल गया. आज कुछ ऐसा हो गया था जो पहले नहीं हुआ था, उसके घर में hi उसकी बेज़्ज़ती.

रात शायद सबकी hi जागते हुए निकली. सुप्रिया, हिना और रुबीना तीनो नीचे के कमरे में एक दुसरे को गले लगाए हुए लेती थी. कौन कितना रोई, कौन कितनी देर जाएगी, किसी को पता नहीं चला.

उन्हें नहीं पता था की इक़बाल और अब्बास कहाँ थे पूरी रात.

__________________

सुबह के वक़्त घर में ख़ामोशी थी. अब्बास सुबह hi घर से निकल गया था और हिना और सुप्रिया अभी भी नीचे के कमरे में रजाई में लेती हुई थी. रुबीना ऊपर के कमरे से एक छोटा सा बक्सा ले आयी. धुल से ढाका हुआ, शायद सालों से खोला नहीं गया था.

उसे खोलते hi उसमे से कुछ गहने और कागज़ निकले.

रुबीना ने उन्हें हिना को पकड़ते हुए कहा - ये तेरी अम्मी की चीज़े थी...

हिना ने कांपते हाथों से वह चीज़ें ली. एक छोटा सा मंगलसूत्र भी था उसमें. कुछ चूड़ियां और एक फोल्ड लिया हुआ कागज़.

जैसे hi हिना ने उस कागज़ को उठाया रुबीना ने कहा - और ये तेरी जनम पटरी है... तेरी अम्मी ने बनवायी थी...

हिना उस कागज़ के टुकड़े को पड़ने लगी, ऊपर एक नाम लिखा था - हिमानी... ये...

रुबीना - ये... तेरी अम्मी ने तेरा नाम रखा था... तू बोल रही पाती थी बचपन में तोह तू अपने आप को हिना बोलती थी, और फिर वही तेरा नाम पद गया.

हिना की आँखों से आंसू बहने लगे. उसने वह मंगलसूत्र अपनी हथेलियों में पकड़ा, उसे ये देख कर अजीब सा लग रहा था - वह ये पहनती थी?

रुबीना - हाँ... कभी कभी...

हिना - और क्या अच्छा लगता था उन्हें... कैसी थी वह...

रुबीना हलके से मुस्कुरायी - बोहोत... बोहोत अछि थी... बस बिलकुल तेरी तरह पागल...

हिना की आँखों में पानी सा आ गया, और उसने फिर से अपना नाम "हिमानी" हलके से बुदबुदाया.

हिना रुबीना से ढेर सारे और सवाल करने लगी, और रुबीना उसका जवाब देती गयी.

____________________

कुछ देर बाद सुप्रिया उन दोनों को अकेला छोड़ कर छत पर, जहाँ इक़बाल अकेला खड़ा था. कितना कुछ बोलै गया था कल रात, उसे तोह सब याद भी नहीं था. समझ hi नहीं आ रहा था की वह कैसे इक़बाल से बात शुरू करे.

इक़बाल ने जैसे hi महसूस किया की सुप्रिया उसके पीछे कड़ी है उसने उसकी और देखा - मैडमजी... आप क्यों ऊपर आ गयी... मुझे बता दिया होता अगर कुछ चाहिए था तोह...

इक़बाल के मुँह से कई दिनों बाद फिर से मैडमजी सुनकर सुप्रिया को अजीब सा लगा.

इक़बाल - आपने दवाई खा ली न?

सुप्रिया ने धीरे से हाँ में सर हिलाया.

इक़बाल - मैं आपसे माफ़ी माँगना चाहता था...

सुप्रिया - किस चीज़ के लिए?

इक़बाल - सब चीज़ो के लिए... आपकी ये बीमारी... कल जो कुछ हुआ... जो कुछ आपने सुना... उस सबके लिए...

सुप्रिया - हाँ... काफी कुछ हो गया कल रात...

उनके बीच कुछ देर की चुप्पी रही.

सुप्रिया ने धीरे से हिम्मत करके पूछा - वह जो अब्बास भाई जान ने कहा... वह सच है क्या? आप... और... रुबीना?

इक़बाल का चेहरा सख्त हो गया, सुप्रिया ने कल रात सब कुछ तोह सुन लिया था - बहुत पुराणी बात है अब...

सुप्रिया - पर हुआ था?

इक़बाल ने कुछ देर लगते हुए कहा - जी... मुझसे गलती हो गयी थी...

शायद सुप्रिया कल रात hi ये सच समझ गयी थी, पर आज इक़बाल के मुँह से ये सुन्ना अलग बात थी. कुछ अजीब सा महसूस हो रहा था अंदर.

सुप्रिया - और सीमा... उसे भी पता चल गया था?

इक़बाल - मुझे नहीं पता... शायद... वह कमज़ोर सी पड़ने लगी थी... कुछ बोलती नहीं थी... बस चुप सी रहती थी... और फिर ऐसी बीमार पड़ी...

इक़बाल को आगे बोलने की ज़रुरत नहीं थी. सुप्रिया - और इसीलिए आप... यहाँ से भाग गए थे... यहाँ वापस नहीं आना चाहते थे...

इक़बाल को सुप्रिया के मुँह से वह 'भाग' शब्द बोहोत गन्दा सा लग रहा था - सोचा तोह था यहाँ कभी नहीं ायूँगा... पर...

सुप्रिया ने उसकी बात पूरी करि - मेरे लिए... आपको यहाँ आना पड़ा...

इक़बाल नज़रें चुराते हुए बोलै - वह जो मैंने किया... सीमा के साथ... उसके बाद जो हुआ... मैं कभी माफ़ नहीं कर पाउँगा खुद को. पर आपको इस सब में घसीटना गलत था. बस आप थोड़ा ठीक हो जायो... फिर मैं आपको और हिना को यहाँ से निकाल कर ले जायूँगा. और आपको आपके घर पंहुचा दूंगा... शायद वही आपके लिए भी अच्छा होगा.

सुप्रिया - और हिना?

इक़बाल - हिना को मैं संभाल लूंगा... कहीं फिर से नौकरी ढून्ढ लूंगा. उसे पड़े करवायुंगा.

सुप्रिया - आप संभाल पाएंगे उसे अकेले? उन्नीस साल की लड़की है वह. आप उसे जानती भी कितना हैं?

इक़बाल ने सुप्रिया की और देखा - मैडमजी मैं...

सुप्रिया को रीलीज़ हुआ उसे शायद ये सवाल नहीं पूछना चाहिए था.

सुप्रिया - मैं... मैं नीचे जाती हूँ... हिना शायद अकेली होगी. हम बाद में बात करते हैं इस बारे में.

इक़बाल ने हलके से सर हिलाया और सुप्रिया नीचे की और चल दी. इक़बाल वहीँ खड़ा रह गया, अकेला.
 
अपडेट 109

उस hi सुबह, कृति उस अफसर के दिए हुए पते पर बस पहुंची hi थी, एक ुचि सी बिल्डिंग में एक फ्लैट था. उसे यहाँ कोई ज्यादा उम्मीद नहीं थी, पर जैसे hi वह दरवाज़े के पास पहुंची उसे किसी लड़की की खनकती हुई आवाज़ आने लगी, ऐसा लगा जैसे अंदर सुप्रिया hi हो. एक पल के लिए कृति के मैं में एक उम्मीद सी जग गयी की शायद सुप्रिया की खोज यहीं ख़तम होने वाली थी.

उसने जल्दी से घर की बेल्ल बजायी, और उसे ऐसा लगा जैसे अंदर से कोई देख रहा हो की कौन आया है. कृति बेहद बेसब्र हो रही थी और उसने फिर से दुर्बल बजायी.

कुछ देर बाद दरवाज़ा खुला और सामने एक लड़की थी, जिसे शायद कृति ने पहले कहीं तोह देखा था, पर उसे याद नहीं आ रहा था कहाँ.

दिशा - यस... आप कौन?

कृति - उम्म्म... मैं यहाँ अतुल से मिलने आयी हूँ... वह यहीं रहते है न?

दिशा - आपको क्या काम है उनसे...

कृति - उम्म्म... आप उन्हें बुला देंगी क्या? उनकी वाइफ - सुप्रिया... उसके रिलेटेड में कुछ.

दिशा ने फिर से उसकी तरफ गौर से देखा, और वह शायद कृति को पहले नहीं पहचान पायी थी, पर अब पहचान गयी थी - तुम कृति हो न... तुम क्यों आयी हो सुप्रिया को पूछते हुए?

कृति अंदर की तरफ झाँक रही थी, और उससे अब और इंतज़ार नहीं हो रहा था. वह दिशा को पार करती हुई घर में घुस गयी. दिशा ने उसका हाथ पकड़ कर रोकने की कोशिश करि पर तब तक कृति अंदर आ चुकी थी.

अंदर लिविंग रूम में जाते hi उसे वहां अतुल सोफे पर बैठे दिखाई दिया और साथ hi एक और यंग कपल, जिन्हे वह जानती नहीं थी. वह लड़का और लड़की काफी नर्वस से लग रहे थे.

अतुल कृति को देखते hi खड़ा हो गया - तुम!?

दिशा भी दरवाज़ा बंद करके पीछे पीछे आ गयी थी, उसने लड़के की तरफ देखते हुए कहा - ध्रुव... तुम दोनों अंदर जायो... हम लोग सॉर्ट आउट कर लेंगे इस मटर को.

उन दोनों के अंदर जाते hi दिशा कृति से बोली - अगर तुम्हे विक्रम ने भेजा है तोह...

कृति - नहीं... मैं यहाँ खुद आयी हूँ...

कृति को समझ नहीं आ रहा था की वह कैसे एक्सप्लेन करे की वह यहाँ क्यों आयी थी.

कृति ने बात को गोल मोल न करते हुए सीधा अतुल से पुछा - सुप्रिया कहाँ है?

अतुल चौंकते हुए बोलै - क्या?

कृति के दिमाग में बोहोत hi अजीब से ख्याल आ रहे थे - तुम दोनों साथ में... ये विक्रम के लिए काम करती है. तुम दोनों के बीच कब से ये सब???

अतुल और दिशा ने एक दुसरे को देखा, दिशा ने उसका जवाब देते हुए कहा - ऐसा कुछ नहीं है जैसा तुम सोच रही हो. मैं अब विक्रम के लिए काम नहीं करती हूँ.

कृति - तोह फिर?

दिशा - हमारा उसके गायब होने से कोई लेना देना नहीं है...

कृति ने अतुल की तरफ देखा - तुम उसके हस्बैंड हो कर उसे ढून्ढ भी नहीं रहे हो...

अतुल - मैं उसे क्यों ढूंडू? उसके बारे में जितना मैं पिछले कुछ महीनो में जाना है... उतनी hi हैरानी होती है...

कृति - मतलब?

अतुल ने कृति को घूरा और उसकी आवाज़ थोड़ी तेज़ हुई - मतलब की... उसने मुझे चीट किया... झूठ बोलै... तुम तोह अच्छे से जानती होगी ये सब! तुम्हारा भाई विक्रम...

कृति ने आखें झुका ली.

अतुल - और फिर... भाग गयी यहाँ से. मुझे यहाँ छोड़ गयी सब कुछ सहने के लिए.

दिशा ने बात को सँभालते हुए कहा - देखो कृति... हम नहीं जानते की तुम उसे क्यों ढून्ढ रही हो... पर हमे उसके बारे में कुछ नहीं पता. हम तो उसके बारे में अब सोचना भी नहीं चाहते.

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कृति ने हताश होते हुए अपना सर पकड़ लिया - ऐसा लग रहा है जैसे किसी को कुछ नहीं पता...

दिशा कुछ पल बाद कड़ी होते हुए बोली - सॉरी हम तुम्हारी और हेल्प नहीं कर सकते. ी थिंक तुम्हे अभी यहाँ से जाना चाहिए... हम फिलहाल किसी और पर्सनल प्रॉब्लम से डील कर रहे हैं...

कृति ने उसकी तरफ देखा जैसे एक्सपेक्ट कर रही हो वह और कोई डिटेल बताएगी.

दिशा ने क्लैरिफी करते हुए कहा - उस चीज़ का सुप्रिया से कोई लेना देना नहीं है... हम लोग कोशिश कर रहे है सुप्रिया को भुलाने की...

कृति ने दरवाज़े की तरफ ek-do कदम लिए hi थे की उसने उन लोगो को मुद देखा - बस एक और बात... रिपोर्ट में शायद किसी आदमी का ज़िक्र था जिसके साथ सुप्रिया भागी थी... आप जानते है उसके बारे में कुछ? क्या वह भी विक्रम का आदमी था?

दिशा के चेहरे पर नाखुशी साफ़ दिख रही थी - हमें नहीं पता... बस इतना पता है जहाँ ये लोग रहते थे, वह उस बिल्डिंग का वॉचमन था. बस अब और सवाल नहीं...

अतुल पीछे से भड़क कर बोलै - इक़बाल... हाँ इक़बाल नाम था उसका... और हाँ मेरी बीवी एक वॉचमन के साथ भाग गयी... और कुछ जानना है तुम्हे?

दिशा कृति को बहार का इशारा करते हुए अतुल को शांत करने उसके पास गयी. कृति एक और जगह से मायूस हो कर बहार निकल आयी थी. अब बस एक आखरी जगह बची थी, जहाँ वह कब से जाने से कटरा रही थी.

_______________________

फाइनली कृति अपनी आखरी मंज़िल पर भी पहुंच hi गयी. उसे हमेशा से यहाँ इस ऑफिस में आना बोहोत hi खराब लगता था. बोहोत hi गंदे से वाइब्स आते थे यहाँ. और आज तोह कुछ ज्यादा hi अजीब लग रहा था यहाँ आना. थाने के चक्करो और अजनबी लोगो से मिलने से कहीं ज्यादा.

कृति विक्रम के केबिन के बहार उसकी सेक्रेटरी तक पहुंची. उसे तोह पता भी नहीं थी विक्रम अंदर था या नहीं.

कृति ने सेक्रेटरी की तरफ देखा, कोई और लड़की थी, दिशा नहीं - विक्रम... अंदर हैं?

सेक्रेटरी उसे नहीं जानती थी - आप? आपके पास अपॉइंटमेंट है उनसे मिलने का?

कृति - नहीं... पर आप उन्हें कहेंगी की कृति आयी है तोह शायद मुझसे मिल ले...

सेक्रेटरी - सर ने मन किया है किसी को भी बिना अपॉइंटमेंट के अंदर भेजने से...

कृति - आप उनको बोलिये तोह सही...

सेक्रेटरी - ी ऍम सॉरी ma'am... सर इस वैरी बिजी... मैं आपकी अपॉइंटमेंट नोट कर लेती हूँ किसी और दिन के लिए.

कृति ने दरवाज़े की तरफ देखा, वह और टाइम वास्ते नहीं कर सकती, शायद दुबारा वह यहाँ आना भी न चाहे. कृति जल्दी से दरवाज़े की तरफ बड़ी और हैंडल को नीचे दबाते हुए दरवाज़ा खोल दिया. अंदर विक्रम एक फ़ोन कॉल पर था.

सेक्रेटरी एकदम भागी भागी आयी - मैडम आपको मन किया है न. सर... ी ऍम सॉरी...

विक्रम ने फ़ोन रखते हुए सेक्रेटरी को जाने का इशारा किया - It's ok... तुम जायो...

कृति ने अंदर आते हुए दरवाज़ा बंद किया. उस रात जब सुप्रिया और उसकी लड़ाई हुई थी, उसके बाद से कृति और विक्रम की बात भी नहीं हुई थी. एक बार भी नहीं. उसे समझ नहीं आ रहा था वह कहाँ से बात शुरू करे.

विक्रम खड़े होते हुए मुस्कुराते हुए बोलै - कृति... मुझे चाचू से पता चला था की तुम विंटर ब्रेक पर आयी हुए हो इंडिया... हाउ इस एवरीथिंग तेरे...

कृति का चेहरा एक्सप्रेशनलेस था, वह ek-do सेकंड रुकते हुए बोली - इस तहत थे बेस्ट ओपनिंग लाइन यू कुड से तो में?

विक्रम - सॉरी... क्या?

कृति इधर उधर चलते हुए बोली - कुछ नहीं... मैं हॉलीडेज पर नहीं आयी हूँ... ी ऍम बैक... फॉरएवर...

विक्रम - ओह... अच्छा... क्या हुआ?

कृति ने कंधे उचका दिए - जस्ट... सम ुनफिनिशद बिज़नेस हेरे...

विक्रम - हम्म्म.... लुक... मैं अभी थोड़ा बिजी हूँ... मैं घर आता हूँ... फिर बैठ कर बात करते है...

कृति हस्ते हुए - यू सी में फॉर थे फर्स्ट टाइम आफ्टर सो लॉन्ग... और आप बिजी हो... नॉट क्यूरियस ात आल तो क्नोव व्हाट हप्पेनेड इन थे उस... हाउ ी हैवे बीन... हाउ मान्य में ी हैवे फुकेद...

विक्रम का चेहरा थोड़ा सख्त हो गया - कृति... ये कैसी लैंग्वेज...

कृति - क्यों? आप और आपके दोस्त दूसरो की बीवियों को फ़क कर सकते हैं... और मैं किसी को फ़क नहीं कर सकती...

विक्रम - ी नीड यू तो लीव कृति...

कृति - ी विल लीव... जस्ट तेल्ल में सुप्रिया कहाँ है... क्या किया उसके साथ?

विक्रम - वे अरे नॉट डिस्कोसिंग तहत... प्लीज लीव...

कृति - थें व्हाट शुड वे डिसकस? दो यू क्नोव... मैंने पिछले दो हफ़्तों में जिससे भी बात की है... वह सब आपके बारे में क्या कहते है?

विक्रम - ी ऍम नॉट इंटरेस्टेड इन कनोइंग तहत.

कृति - यू शुड बे... हर कोई एहि कहता है... यू अरे ा ब्लडी वोमनीज़ेर... ासशोले... गुंडा... गन्दा आदमी...

कृति काँप रही थी और किसी तरह अपने आप को विक्रम के सामने हिंदी में गाली देने से रोक रही थी. विक्रम ने कोई जवाब नहीं दिया.

कृति तेज़ सांसें लेते हुए - यू नेवर इवन बोथेरेद तो कॉल में आफ्टर एवरीथिंग तहत हप्पेनेड... यू क्नोव हाउ ी मस्ट हैवे फेल्ट.

विक्रम - ी थिंक यू मस्ट हैवे फेल्ट ग्रेट... काफी अच्छी डील कर ली थी तुमने. Buyer's रएमोर्से?

विक्रम ने जैसे कृति की दुखती राग पर हाथ रख दिया हो. कृति ने अपने कापते हुए हाथ को उठाते हुए विक्रम की तरफ पॉइंट किया - Don't यू डरे! आप और आपकी वह बीवी... ब्लडी बीच...

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विक्रम - That's बिटवीन यू एंड हेर. व्हाट दो यू वांट फ्रॉम में?

कृति की आँख फिर से फ्लड करने लगी थी - जस्ट तेल्ल में वेयर शी इस...

विक्रम ने एक गहरी सांस ली - अगर मुझे पता भी होता न, तोह तुम्हे नहीं बताता...

कृति गुस्से में केबिन से बहार निकल गयी.

विक्रम वहीँ अकेला खड़ा बहार की तरफ देख रहा था. उसके दिमाग में बस एक hi चीज़ चल रही थी, काश उसे पता होता की सुप्रिया इस वक़्त कहाँ है. वह बस चाहता था की ये सब ख़तम हो जाए, पर कृति के आने से चीज़े और उलझती जा रही थी.

______________________________

कृति गुस्से से ऑफिस से निकल कर अपनी कार तक hi पहुंची थी की उसके फ़ोन पर एक मैसेज आया. कृति ने अपनी आँखें साफ़ करते हुए मैसेज खोला.

एक अननोन नंबर से मैसेज तहत - जय यादव से बात करो. ये शायद तुम्हारी मदद कर पाए.

साथ में एक नंबर था. कृति गहरी सांसें लेते हुए स्क्रीन की तरफ देख रही थी. ये मैसेज किसने भेजा था? और अब ये जय यादव कौन था?
 
अपडेट 110

उस दिन रात को सबके सामने सच आये 2-3 हफ्ते बीत चुके थे. सब लोग अभी भी वहीँ थे, पर सब कुछ बदल सा गया था.

अब्बास अब घर में ज्यादा वक़्त नहीं बीतता था. सुबह निकल जाता और रात को देर से आता. रुबीना चुप चाप घर का काम करती रहती, किसी से ज्यादा बात नहीं करती थी. अम्मी भी खामोश रहती थी, जैसे सब कुछ समझ गयी हो की क्या होने वाला था पर किसी से कुछ कह नहीं सकती थी.

सुप्रिया की तबियत अब काफी हद्द तक ठीक हो गयी थी पर अब वह नीचे हिना के साथ hi सोती थी. न तोह उसे और न हिना को समझ आ रहा था की अब उनका रिश्ता क्या था. न तोह हिना उसकी बेटी की उम्र की थी और न hi अब रिश्ते में वह हिना की चची रह गयी थी. पर शायद अभी भी उसका उसे चची बुलाना hi सबसे ठीक था.

इक़बाल और सुप्रिया की बात भी काफी काम सी हो गयी थी, और अब दोनों की नज़रें मिलती तोह अजीब सा लगता. जैसे वह अजनबी हो या फिर कोई गहरे दोस्त जिनकी लड़ाई हो गयी हो. सुप्रिया का मैं बार बार इक़बाल और रुबीना के रिश्ते के बारे में सोचता रहता, पर न तोह रुबीना ने उससे इस बारे में कोई बात की थी, और न उसने उस बात को छेड़ने की हिम्मत की थी.

इक़बाल और अब्बास की बात तोह बिलकुल बंद थी. पर एक दिन अचानक से घर में पता चला की अब्बास ने खान साब से बात करके बोल दिया था की हिना की शादी जुनैद से नहीं होगी. किसी को समझ नहीं आया की अब्बास का मैं कैसे बदला - न इक़बाल को, न रुबीना को. अब्बास ने खुद भी कुछ नहीं बताया.

ये खबर सुनते hi हिना फिर से थोड़ा चहक उठी थी. उसे उसके अब्बू मिल गए थे और अब उसे ये निकाह भी नहीं करना पद रहा था. उसके लिए तोह सब कुछ ठीक hi हो गया था, बस अब फिर से कॉलेज जाने की बात छेड़नी थी.

घर में भले hi सब चुप चाप थे, पर हिना के चेहरे पर मुस्कान देखकर सब लोगो को थोड़ी तस्सली हुई थी. इसलिए जब उसने एक दोपहर नाज़ से मिलने की ज़िद्द की, तोह रुबीना ने मन नहीं किया.

हिना और नाज़ दोपहर में गाओं के बहार वाले पेड़ के पास पहुंची. सर्दी अब धीरे धीरे काम होने लगी थी, और अच्छी धुप निकली हुई थी. पेड़ पर छोटी छोटी बेरियाँ लग गयी थी. दोनों लड़कियां पत्थर फ़ेंक फ़ेंक कर बेरियाँ तोडा रही थी, हस्ते चिल्लाते.

अचानक नाज़ की हसी रुक गयी. हिना के पीछे की तरफ देखते हुए उसकी चेहरे की त्योरियां चढ़ गयी थी.

हिना - क्या हुआ?

पर नाज़ के जवाब देने से पहले hi किसी ने पीछे से उसके पेट पर हाथ रखते हुए उसे अपनी तरफ खैंच लिया. हिना ने झटका दिया पर वो हाथ उसके पेट पर और कास गया था.

हिना ने झटपटाते हुए पीछे देखा तोह जुनैद ने उसे पकड़ा हुआ था.

जुनैद - कहाँ भाग रही है तू... सोचती है इतनी आसानी से छूट जाएगी?

हिना ने उसका हाथ हटाने की बेहद कोशिश करि - छोड़ मुझे... तू... ये क्या कर रहा है...

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जुनैद ने उसे और करीब खिंचा, पीछे से बिलकुल chipat-te हुए - तेरे अब्बू ने मन कर दिया तोह क्या... मैंने सोच लिया है... तू तोह मेरी हो कर रहेगी...

हिना ने अपने नाख़ून उसके हाथों पर गड़ाए जिससे जुनैद की पकड़ थोड़ी ढीली हो गयी, पर जुनैद ने उसकी कलाई कास के पकड़ ली.

नाज़ वहीँ थोड़ा दूर कड़ी जैम से गयी थी, और काँप रही थी - जो... जुनैद भाई... हिना को छोड़ दो...

जुनैद ने उसकी तरफ तीखी नज़र से देखा की नाज़ दर गयी - तू यहां से भाग जा... अभी... वार्ना तुझे भी नहीं छोडूंगा. अपनी अम्मी से पूछ लियो की तेरी फुफु के साथ क्या हुआ था...

नाज़ की सांस रुक गयी. वह एक पल हिना को देख कर कड़ी रही, फिर पीछे हटती और भाग गयी.

हिना उसे भागते देख ज़ोर से चिल्लाई - नाज़! नाआज! नाज़!

जुनैद हस्ते हुए बोलै - चिल्ला ले जितना चिल्लाना है... वह वापिस नहीं आने वाली... कोई नहीं आने वाला...

जुनैद ने हिना को अपनी और घुमाया और अपने होंठ उसके होंठ पर रखने की कोशिश करि. हिना अपना मुँह इधर उधर करके उससे बचने की कोशिश कर रही थी. पर जुनैद ने आखिर उसके होंठों को अपने होंठों के बीच कैद कर लिया.

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जुनैद हिना के होंठों पर toot-te हुए उन्हें ज़ोर से खुसने और काटने लगा.

हिना - उह्ह्ह.... ममम... छोड़ मुझे....

हिना अभी भी उसे पीछे धकेलने की कोशिश कर रही थी पर जुनैद उसे कास के पकडे हुए था.

जुनैद ने हिना को अपने कंधे पर उठाते हुए उसे पकड़ लिया और पास hi रखे एक घास और चारे के ढेर पर उसे पटक दिया.

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हिना गहरी सांसें लेते हुए उसे देख रही थी. जुनैद उसके ठीक ऊपर hi खड़ा था.

जुनैद - बोल... मुझसे शादी करेगी न...

हिना चिल्लाई - नहीं! कभी नहीं! तुझसे तोह कभी शादी नहीं करुँगी...

जुनैद - बेहेन की लोदी! मेरे मजाक दिया है तूने पूरे गाँव में... अब तोह शादी हो या न हो... तू तोह मेरी हो कर रहेगी...

जुनैद ने अपनी पंत और अंडरवियर नीचे सरकाये और अपना लुंड बहार निकाल लिया. हिना उसकी ये हिम्मत देख कर हैरान रह गयी थी और वह हिलना भी भूल गयी थी. जुनैद ने तुरंत नीचे झुकते हुए हिना की छाती पर बैठ गया और अपना लुंड उसके मुँह के ठीक आगे कर दिया.

हिना - जुनाइडड्ढ.. क्या कर रहे है... हट मेरे ऊपर से... देख ये गलत है...

जुनैद - चूसा है कभी किसी का लुंड तूने...

हिना की आँखों में आंसू निकलने शुरू हो गए थे - नाहीइ... और न मुझे चूसना... प्लीज... छोड़ दे न...

जुनैद - वहहह भाई... आज तोह तुझे अचे से चुसवायुंगा... तेरे घर में सारे नामर्द बैठे है न... नहीं तोह अब तक अपने अब्बू या चाचा का लुंड चूस hi लेती...

जुनैद ने आगे सरकते हुए अपना लुंड हिना के होंठों पर रगड़ना शुरू कर दिया. हिना बुरी तरह हिलने की कोशिश कर रही थी ताकि वह जुनैद के लुंड से दूर हो जाये, पर नहीं हो पा रही थी. उसने एकदम से अपने हाथ से लुंड को पकड़ते हुए उसे बुरी तरह दबा दिया जिससे जुनैद दर्द में चीक उठा.

जुनैद - ुह्ह्हह्ह..... साली... कुटिया... अब तोह तू गयी... तेरे पूरे खानदान को छोडूंगा... तेरी अम्मी... तेरी वह गोरी गोरी चची... सब साली...

जुनैद ने हिना की टांगों पर बैठे हुए ज़ोर से ek-do चांटे हिना के मम्मो पर लगाए.

हिना - अह्ह्ह्ह..... उफ्फ्फ.... हट जा... मेरे ऊपर से....

जुनैद आगे झुक कर उसके मम्मी अपने हाथों से दबाने लगा - मज़ा तोह बोहोत आ रहा होगा तुझे... बस न न कर रही है... एक बार सब हो गया फिर देखता हूँ तुझसे शादी कौन करता है...

हिना - तुझसे तोह कभी शादी नहीं करुँगी... आह्हः....

जुनैद ने हिना के पयजामे का नाडा ढीला करते हुए उसकी पयजामि को नीचे खींचने लगा - देखे तोह सही नीचे तेरी छूट में बाल भी आये हैं या नहीं.

हिना ने डर के मारे अपनी आँखें बंद कर ली. जुनैद ने हिना की पयजामि और चड्ढी को नीचे खींचा hi था अचानक जुनैद को किसी ने पीछे से उसके बालों से पकड़ा और एक झटके में ऊपर खींच लिया. जुनैद पीछे खींचता हुआ ज़मीन पर गिर गया.

हिना ने आँखें खोली तोह देखा इक़बाल सामने गुस्से में खड़ा था, उसकी सांसें तेज़ चल रही थी और आँखें पूरी तरह लाल थी.

जुनैद उठने की कोशिश कर रहा था - तू... तू कहाँ से आ गया...

पर बोलने से पहले hi इक़बाल ने उसे एक ज़ोर का मुक्का मारा. जुनैद का होठ पहात गया. इक़बाल ने उसका कालर पकड़ कर उसे उठाया और फिर से मारा. और फिर से. और फिर से. जुनैद के मुँह से बुरी तरह खून निकलने लगा था.

इस बीच घबराई हुई हिना ने अपनी चड्डी और पयजामि ऊपर कर ली. थोड़ी दूर से भागी हुई रुबीना और सुप्रिया भी वहां पहुंच गए थे. वह दोनों जल्दी से हिना के पास पहुंची और उसे गले लगा लिया.

इक़बाल उसे मुक्के मारते हुए गालियां दे रहा था - कुत्ते... हरामखोर... गांडू... भोस्डिके...

जुनैद लटखरा कर ज़मीन पर गिर गया था पर इक़बाल उसे मारे जा रहा था. उसकी पंत अभी भी नीचे हो राखी थी और इक़बाल ने एक दो घुसे उसके पेट और उसके थोड़ा नीचे भी लगा दिए. जुनैद की चीखें गूँज रही थी.

थोड़ी दूर से सुप्रिया की आवाज़ आयी - इक़बाल जी... रुक जाइये.. बस हो गया...

इक़बाल ने गुस्से से जवाब दिया - इस हरामज़ादे को मार hi देना चाहिए...

जुनैद काँप रहा था, खून और आंसू चेहरे पर थे और उसने इक़बाल के आगे हाथ जोड़ लिए थे.

सुप्रिया ek-do कदम उठते हुए इक़बाल के पास आयी - इक़बाल जी हमें हिना को घर लेकर जाना है... इसे छोड़िये...

रुबीना ने हिना को पकड़ते हुए उठा लिया था.

हिना सुबकते हुए बोली - पर अम्मी... इसने मेरे साथ... मेरे होंठों पर अपना वह... नीचे वाला...

इक़बाल को ये सुन कर और गुस्सा आ गया और उसने जुनैद के ek-do और घुसे मारे नीचे. सुप्रिया ने परेशान होते हुए रुबीना की तरफ देखा, जैसे कह रही हो की वह इक़बाल को रुकने के लिए बोले. पर रुबीना कड़ी हुई कुछ नहीं कह रही थी.

आखिर में सुप्रिया ने hi जाकर इक़बाल का हाथ रोक लिया - इक़बाल जी... बस... वह मर्डर जायेगा... और मत मारो इसे...

इक़बाल की आँखें अभी भी गुस्से में उबाल रही थी, आखिर उसकी बेटी को छुआ था जुनैद ने. उसने ek-do गहरी सांसी ली.

पीछे से आखिर रुबीना बोली - इक़बाल... बस... चलो अब... पूरा बवाल होने वाला है यहाँ.

इक़बाल ने जुनैद को एक आखरी बार देखा, फिर हिना की तरफ मुदा. उसने उसे पकड़ते हुए सहारा दिया, और फिर अपनी गोदी में उठा लिया. इक़बाल हिना को लेकर, और सुप्रिया और रुबीना के साथ तेज़ी से घर के लिए निकल पड़े.

घर पहुँचते hi हिना सीढ़ी अंदर अपने कमरे में घुस गयी. रुबीना उसके पीछे गयी. सुप्रिया बहार कड़ी थी, हाथ काँप रहे थे.

इक़बाल बहार hi रुक गया था, हाथों पर अभी भी जुनैद का खून लगा हुआ था.

रुबीना बहार आयी - इक़बाल... तुम्हारे भाई जान को बुलाना पड़ेगा... यह बात ज्यादा देर नहीं छिपेगी...

इक़बाल ने नीचे देखते हुए हाँ में सर हिलाया. रुबीना अंदर गयी और कुछ hi देर में अब्बास घर पहुंचा. उसके चेहरे पर सवाल थे पर गुस्सा भी.

अब्बास ने इक़बाल और रुबीना की और बारी बारी देखा - अब क्या हो गया?

रुबीना - जुनैद... उसने हिना के साथ ज़बरदस्ती की कोशिश की...

अब्बास का चेहरा सख्त हो गया और वह ज़ोर से बोलै- क्या!!!?

इक़बाल - मैंने उसे बहुत मारा है... बेहोश पड़ा था बहार गाँव के दूसरी और...

अब्बास ने आँखें बंद कर ली - तू... तू पागल है क्या? खान साब का बीटा है वह... अब यह बात पिछली बार से भी ज्यादा बिगड़ जाएगी... खान साब वैसे hi पंचायत में ये मामला उठा चुके हैं.

रुबीना - अब? ठाणे चले?

अब्बास - तुम्हे लगता है वह तुम्हारी सुनेंगे... इसको hi अंदर कर देंगे और फिर उसके बाद...

अब्बास ने सुप्रिया की और देखा और छुप हो गया.

अब्बास ने इक़बाल का कालर पकड़ा - तू यहाँ से भागना चाहता था न... तोह अब निकल जा... अभी इसी वक़्त...

इक़बाल - भाई जान...

अब्बास - चुप! अगर यहाँ रहा तोह ठाणे वाले पकड़ लेगी... या उससे भी बुरा... खान साब कुछ भी कर सकते हैं... जा... और अपने साथ अपनी बीवी को भी ले जा...

रुबीना धीरे से बोली - और हिना को भी...

अब्बास रुक गया. उसने रुबीना की तरफ देखा.

रुबीना - अगर हिना यहाँ रही... तोह खान साब उसे भी नहीं छोड़ेंगे.... आप जानते तोह हैं?

अब्बास ने इक़बाल की तरफ देखा - हिना को भी ले जा... अभी...

इक़बाल - पर...

अब्बास ज़ोर से चिल्लाया - कोई पर नहीं! जा... तीनो को ले कर... दूर कहीं... हम लोगो की फिक्र मत कर...

इक़बाल बात को समझते हुए जल्दी से ऊपर की और भागा, ताकि वह सामान इखट्टा कर सके. रुबीना अंदर की और हिना के कपडे बाँधने.

सुप्रिया भी रुबीना के साथ अंदर आ गयी. रुबीना की आँखों से आंसू बह रहे थे, आखिर उसकी पाली हुई बच्ची जा रही थी.

रुबीना ने कपडे बांधते हुए सुप्रिया की और देखा - देख... मुझे पता है वह तेरी बच्ची नहीं है... पर इक़बाल उसे अकेले न समझ पायेगा न संभल पायेगा... तू इन दोनों का साथ मत छोडियो.

सुप्रिया ने धीरे से सर हिलाया, उसके मुँह से किसी तरह निकला - मैं... मैं कोशिश करुँगी...

रुबीना ने सुप्रिया का हाथ पकड़ा - कोशिश नहीं... जो करना पक्का करना. जो तू कमज़ोर बानी रहती है न... वह छोड़ दे... खुद भी जवान है... और एक जवान लड़की को संभालेगी... तुझे मज़बूत तोह बनना hi होगा!

सुप्रिया की आँखें भर आयी और उसे हाँ में सर हिला दिया. रुबीना ने जल्दी से डाक्यूमेंट्स और कपडे और उसकी अम्मी का सामान एक थैले में बाँध कर सुप्रिया को दे दिया. कमरे के दुसरे कोने में हिना बस सुबक सुबक कर रो रही थी.

बहार से अब्बास की आवाज़ आयी - जल्दी करो!

रुबीना ने हिना को गले लगा लिया - जा... और वापस मत आना जब तक सब ठीक न हो जाये... समझी?

हिना बुरी तरह रो पड़ी - अम्मी...

रुबीना ने उसके आंसू पोछे - बस... अब जा... तेरा अब्बू इंतज़ार कर रहा है...

इक़बाल नीचे आया, एक थैला कंधे पर. उसने हिना और सुप्रिया को देखा - चलो...

अब्बास - तू... ये ले... मोटरसाइकिल ले जा... अभी इस टाइम बस का अत पता नहीं है... शहर में कहीं छोड़ दियो और मैं आ जायूँगा लेने... पर वहां शहर में भी ज्यादा न रुकियो... वहां से बस पकड़ कर जल्दी से निकल जइयो... और ये ले... ये पैसे भी रख ले...

इक़बाल ने पैसे लेने से मन किया - नहीं भाई जान... आपके पास...

अब्बास ने ज़बरदस्ती इक़बाल की जेब में पैसे दाल दिए - चुप... ले ले... बाद में वापस कर दियो...

इक़बाल की आँखें भर आयी - भाई जान...

अब्बास ने दूर से hi हिना की और देखा - बस... अब जा... ठीक हो जायेगा सब... फ़िक्र मत कर...

इक़बाल ने बाइक स्टार्ट की. सुप्रिया पीछे बैठी, हिना बीच में. बाइक जैसे hi चली, सुप्रिया ने पीछे पलट कर देखा तोह रुबीना दरवाज़े पर आ गयी थी. वह ुकि और देखते हुए हाथ हिला रही थी, रो रही थी.

हिना ने पीछे मुड़कर देखा, उसका घर... उसकी अम्मी... सब पीछे छूट रहा था.

इक़बाल ने जल्दी से बाइक को कच्चे रास्ते से निकालते हुए गाँव से बहार निकाल दी. उसे दूर साईरन की आवाज़ आ रही थी, पर वह आवाज़ शायद उनसे दूर जा रही थी.

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इक़बाल ने बाइक तो पहली बार शहर के ट्रैन स्टेशन पर रोका. तीनो को वहां पहुँच कर थोड़ी रहत मिली थी. पर जल्द hi नए सवाल भी. गाओं से दूर तोह आ गए थे, पर अब क्या करना है यह समझ नहीं आ रहा था.

इक़बाल ने सुप्रिया की और देखा - अब... अब कहाँ जाएं... आप बताइये मैडमजी?

सुप्रिया उसकी और देखने लगी - इक़बाल उससे क्यों पूछ रहा था!!

सुप्रिया का दिमाग तोह बुरी तरह घूम रहा था. उसे ऐसा लग रहा था जैसे वह फिर से किसी पुराने दिन को जी रही हो. ऐसा सा hi तोह दिन तहत वह जब वह इक़बाल के साथ लखनऊ से भागी थी. फिर से किसी मुसीबत से बचने के लिए. उस दिन, इक़बाल उसे सबसे पहले बस स्टेशन hi लाया था. तब उसे पता नहीं था की आगे क्या होने वाला था. पर जो हुआ, उसकी तोह उम्मीद बिलकुल नहीं थी.

और अब? अब भी कुछ समझ था की आगे उन लोगो को कहाँ जाना था.

सुप्रिया - मैं क्या बतायु? आप hi तय कर लो न...

इक़बाल ने फुसफुसा के सुप्रिया को कहा - मैडमजी... मैं सोच रहा था... आपको... आपको आपके घर छोड़ दूँ... आपके माँ बाप के पास...

सुप्रिया ने चौंकते हुए उसकी तरफ देखा - घर?

इक़बाल - हाँ... आप कब तक मेरे साथ भागती रहेंगी... और आपकी तबियत भी... आपके लिए वापस अपने घर जाना hi बेहतर होगा...

सुप्रिया को पता था वह सही कह रहा था. पर उसका मैं नहीं मान रहा था - इतनी जल्दी क्यों तय करना? अभी तोह कहीं भी चलते है न...

इक़बाल - आपने बताया था आपका घर झाँसी में है न... बस न लेते हुए ट्रैन स्टेशन चलते है और वहां से सीधा झाँसी की ट्रैन कर लेते हैं...

सुप्रिया - और वह लोग... जो पीछा कर रहे थे हमारा... वह वहां हुए तोह?

इक़बाल - देख लेंगे... वहां जा कर देख लेंगे सब... मुझे लगता है अब हो सकता है वह लोग आपको न ढून्ढ रहे हो...

सुप्रिया चुप हो गयी.

सुप्रिया ने धीरे से हाँ में सर हिलाया. इक़बाल तुरंत टिकट लेने चला गया और सुप्रिया हिना के साथ बेंच पर बैठ गयी. उसका मुँह उतर सा गया था.

हिना बेंच पर अपना सर घुटनो पर तक लगा कर बैठी थी. वह कुछ नहीं बोल रही थी. उसके लिए तोह ये दिन समझना शायद और भी मुश्किल था. एक ऐसा दिन जहाँ सब कुछ अच्छा चल रहा था, पर अचानक से उस गन्दी आदमी ने उसके साथ क्या करने की कोशिश की थी. उसकी वजह से वह अपने गाँव से निकल गयी थी, जिन लोगो को इतने सालों से अब्बू और अम्मी कहती थी वह पीछे छूट गए थे. और साथ में थे ये दो लोग थे, जिन्हे वह जानती तोह थी पर शायद पहचानती नहीं.

करीब 1-2 घंटो के इंतज़ार के बाद वह सब लोग ट्रैन के जनरल डब्बे में बैठ गए. थोड़ी भीड़ थी पर बोहोत ज्यादा नहीं. हिना खिड़की सी साइड बैठी थी, सुप्रिया उसके ठीक सामने और इक़बाल सुप्रिया के बराबर में. उनकी बर्थ पर 2 और लोग बैठे थे पर वह बहरी सीट की तरफ थे और आपस में बात कर रहे थे.

शाम हो गयी और धीरे धीरे सूरज ढल रहा था. धीरे धीरे ट्रैन चलने लगी, हिना ने खिड़की से बहार देखा. सब कुछ पीछे छूट रहा था - उसका गाओं, उसका घर, उसकी अम्मी.

सुप्रिया ने उसका हाथ पकड़ा - सब ठीक हो जायेगा...

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हिना ने कोई जवाब नहीं दिया, बस बहार की और hi देखती रही. कुछ देर वह तीनो चुप चाप बैठे रहे, काफी थके हुए से, शायद किसी को समझ नहीं आ रहा था की आगे क्या होगा. सुप्रिया के मैं में एक अजीब सी बेचैनी हो रही थी, जैसे वह अपने घर नहीं एक अनजान जगह जा रही हो.

ट्रैन चलने के थोड़ी देर बाद सुप्रिया ने हिम्मत करके इक़बाल से पुछा - आप लोग... मुझे झाँसी छोड़ कर... फिर कहाँ जायेंगे?

इक़बाल - मैडमजी... सोच रहा हूँ की अलाहाबाद निकल जायु... वहां मैं किसी को जानता हूँ... वहीँ काम ढून्ढ लूंगा.

सुप्रिया - आपका मतलब प्रयागराज?

इक़बाल - जी... वही... एक hi बात है...

सुप्रिया को लगा जैसे उसके सीने में कुछ चुबभ सा रहा था. यह लोग उसे झाँसी छोड़ कर एक नयी जिंदगी जीने चले जायेंगे. और वह रह जाएगी झाँसी में! पता नहीं क्यों पर सोच कर hi अजीब सा लग रहा था.

सुप्रिया - पर रुबीना भाभी को मैंने कहा था की...

इक़बाल - आप उसके बारे में मत सोचो. ारी हाँ... मुझे याद आया... सामान रखते हुए आपका वह बैग भी मैंने रख लिया है... जो आप लखनऊ से लेकर चली थी, इतने महीनो मेरे पास hi रखा रहा वह. मुझे आप याद दिला देना की आपको वह बैग देना है.

सुप्रिया को उस बैग के बारे में न तोह याद था और न hi कोई दिलचस्पी थी.

हिना खिड़की से अपना सर उनकी उनकी और मोड़ती हुई बोली - और चची? आप भी तोह चल रहे हो न हमारे साथ?

शायद धीरे बोलने के बावजूद उसने सब कुछ सुन लिया था.

सुप्रिया कुछ ज्यादा बोल नहीं पायी. उसका मुँह खुला रहा पर शब्द नहीं निकले. - मैं....

इक़बाल ने hi उसकी बात पूरी कर दी - नहीं बीटा... वह नहीं जाएँगी हमारे साथ... हम पहले उन्हें उनके घर छोड़ेंगे...

हिना हैरान होते हुए बोली - पर क्यों?! क्यों नहीं आ सकती चची हमारे साथ?

इक़बाल - बीटा... उनके माँ बाप उनका इंतज़ार कर रहे है न... वह वहीँ रहेंगी...

हिना ने सुप्रिया का हाथ कास के पकड़ लिया - तोह हम भी उनके साथ उनके घर क्यों नहीं रह सकते? मैं चची के साथ hi रहूंगी...

सुप्रिया ने गहरी सांस ली पर कुछ कह नहीं पायी.

इक़बाल धीरे से बोलै - बीटा... वह लोग... वह उनका घर है... वह क्यों रखेंगे हमें...

हिना की आवाज़ कांपने लगी - पर चची... आपने कहा था... आपने कहा था आप हमारे साथ रहोगी... अम्मी को भी वादा किया था...

सुप्रिया की आँखें भर आयी. वह वादा जो उसने रुबीना को सुबह hi था शाम तक उसे तोडना पद रहा था.

हिना - आपने झूठ बोलै था अम्मी से? आप नहीं आना चाहती हमारे साथ?

सुप्रिया - नहीं हिना... ऐसा नहीं है... बस... मैं तुम्हे कैसे समझायु...

हिना ने सर घुमा लिया और वापस खिड़की की तरफ देखा. उसकी आँखों से आंसू बह रहे थे पर उसने आवाज़ नहीं निकली. सुप्रिया ने उसका हाथ पकड़ने की कोशिश की पर हिना ने हाथ पीछे खिंच लिया.

इक़बाल ने उसे आवाज़ दी - ऐसे गुसा मत करो. चलो रात होने को आयी है... अब सो जायो...

इक़बाल खड़ा हो कर बोलै - मैडमजी मैं... मैं थोड़ा घूम कर आता हूँ...

वह वहां से चला गया. उसके जाते hi सुप्रिया धीरे से हिना के बगल में आ कर बैठ गयी. थोड़ी देर तक ख़ामोशी रही. सिर्फ ट्रैन की आवाज़ थी.

सुप्रिया ने हिम्मत करके हिना का हाथ पकड़ा. इस बार हिना ने हाथ नहीं खिंचा.

सुप्रिया का दिल अभी भी काफी परेशान था - हिना... मुझे माफ़ कर दे न...

हिना खिड़की से बहार hi देखती रही - आप क्या सच में नहीं आना चाहती हमारे साथ? आप तो अब्बू की बीवी हो... क्या इसमें मेरी कोई गलती है?

सुप्रिया को अपना दिल toot-ta हुआ सा महसूस हुआ - नहीं बीटा! तुम्हारी कोई गलती नहीं है! बिलकुल नहीं!

वह हिना से सिर्फ कुछ 6-7 साल hi तोह बड़ी थी, पर ऐसा लग रहा था जैसे अचानक उसने हिना को अपनी बेटी मान लिया हो.

सुप्रिया - सब कुछ काफी मुश्किल है समझाना... किसी दिन कोशिश करुँगी...

हिना - पर क्यों? मुझे लगता है आप दोनों तोह एक दुसरे से इतना प्यार करते हैं... आप लोगो की प्यार की आवाज़ें तोह नीचे तक...

सुप्रिया ने जल्दी से अपने होंठ पर ऊँगली रखते हुए उसे चुप होने का इशारा किया. उसका चेहरा शर्म से लाल हो गया. आखिर रात हो गयी थी और हिना की बात कोई सुन लेता तोह.

हिना - ाचा... एक आखरी सवाल... अब्बू आपको मैडमजी क्यों बुलाते हैं?

सुप्रिया सोच रही थी की वह हिना को कैसे समझाए की इक़बाल उसकी बिल्डिंग में वॉचमन था, और वह वहां रहती थी, और इसलिए वह उसे मैडमजी कहता था. पर शायद उसका मासूम दिल ये सब नहीं समझ पायेगा - वह भी काफी मुश्किल है समझाना... आप अपने अब्बू से hi पूछ लेना न किसी दिन...

हिना ने सुप्रिया से लिपट कर धीरे धीरे रोना शुरू कर दिया - मुझे आपको खोना नहीं है... बचपन में hi अम्मी को खो दिया... और आज अपनी दूसरी अम्मी को भी... और फिर अब आप भी...

सुप्रिया की आँखें भी भर आयी - मैं बोहोत दूर नहीं होंगी... जब चाहे आ जाना मुझसे मिलने...

पर उसकी अपनी आवाज़ में विश्वास नहीं था. दोनों देर तक ऐसे hi बैठे रहे. थोड़ी देर बाद हिना थोड़ी शांत हुई. हिना ने अपना सर सुप्रिया की गोदी में रख दिया और वह दिन भर की भाग दौड़ से थकी, ट्रैन की धीमे झोंको से कुछ hi पलों में सो गयी.

कुछ देर बाद इक़बाल वापस आया. उसने दोनों को देखा - हिना सुप्रिया की गोदी में सो रही थी, सुप्रिया की आँखें लाल थी. वह चुप चाप अपनी सीट पर बैठ गया.

रात भर ट्रैन चलती रही. सुप्रिया आधी जाएगी आधी सोई रही. एक बार रात को जब सुप्रिया ने आँखें खोली तोह देखा इक़बाल भी जगा हुआ था, खिड़की से बहार देख रहा था. दोनों की नज़र काफी लम्बे वक़्त के लिए एक दुसरे से मिली. जैसे दोनों को पता हो ये शायद आखरी रात हो उनकी साथ में. पर फिर इक़बाल ने नज़र हटा ली.

सुबह जल्दी ट्रैन झाँसी पहुँच गयी, लगभग 6 बजे थे. इक़बाल ने उतारते hi पहले आगे की ट्रैन की टिकट खरीद ली. उसकी ट्रैन दिन में 11 बजे की थी. वह तीनो स्टेशन से बहार निकले और सुप्रिया के घर के लिए ऑटो कर लिया.

तीनो बैठ गए. हिना सुप्रिया से चिपकी हुई थी और इक़बाल थोड़ा सा फासला किये बैठा था. ऑटो चलते hi सुप्रिया की धड़कन तेज़ होने लगी. उसे लखनऊ से भागे हुए 8-9 महीने हो चुके थे, पता नहीं उसके घर वाले कैसे रियेक्ट करने वाले थे.

कुछ देर बाद पहचानी सी सड़कें दिखाई देने लगी. जैसे जैसे वह घर के पास पहुंच रही थी दिल की धड़कन और तेज़ होती जा रही थी. उसके घर पहुंचते पहुंचते सड़क गली बन चुकी थी, और रास्ता काफी पतला सा हो गया था.

सुप्रिया ने ऑटो वाले को एक घर के आगे रोकने का इशारा किया. अभी भी काफी सुबह थी और न सामने दुकाने खुली थी और न hi ज्यादा लोग बहार थे. इक़बाल ने ऑटो से hi इधर उधर देखा जैसे किसी खतरे को ढून्ढ रहा हो.

सुप्रिया और हिना ऑटो से उतरे और इक़बाल ने ऑटो वाले के पैसे दे दिए. सामने hi सुप्रिया के घर का दरवाज़ा था पर उसकी हिम्मत नहीं हो रही थी उसे खटखटाने की. इक़बाल और हिना उससे ek-do कदम पीछे खड़े थे. सुप्रिया ने पीछे पलट कर उनकी और देखा और इक़बाल ने दरवाज़े की तरफ इशारा किया.

सुप्रिया ने एक गहरी सांस ली एंड आगे बढ़ कर घर दुर्बल बजायी. अभी 7 भी नहीं बजे थे. अंदर से किसी की आवाज़ आयी - कौन आया है इस वक़्त!

एक और औरत की आवाज़ आयी, जो शायद उसकी भाभी थी - दूध वाला होगा... जल्दी आ गया थोड़ा आज. आते हैं!

दरवाज़ा खुला तोह भाभी कड़ी थी, एक डोलची हाथ में लिया. एक पल के लिए वह कुछ समझ hi नहीं पायी. उसकी नज़र सुप्रिया पर गयी... फिर हिना पर... फि इक़बाल पर और फिर वापस सुप्रिया पर.

भाभी के हाथ से डोलची छूट कर ज़मीन पर गिर गयी और उनके मुँह से ज़ोर से निकला - सुप्रिया!!!

सुप्रिया की आँखें भर आयी और वह आगे बाद कर भाभी के गले लग गयी - भाभी... मैं... मैं आ गयी...

भाभी को विश्वास नहीं हो रहा था. वह पीछे मुद कर चिल्लाई - मम्मी जी! मम्मी जी जल्दी आओ! सुप्रिया आयी है!

घर में एकदम हलचल सी मच गयी. तेज़ पैरो की आवाज़ आने लगी.

सुप्रिया की मम्मी भी एक कमरे में से निकलती हुई बोली - अब क्या हुआ! कौन आया है उसे पूछने....

पर सुप्रिया को देखते hi उनके कदम रुक गए और उन्होंने अपने मुँह पर हाथ रख लिया.

सुप्रिया भाभी को छोड़ कर मम्मी की तरफ भागी - मम्मी...

मम्मी ने उसे कास कर गले लगा लिया - बीटा... तू... तू कहाँ थी... इतने महीने... कोई खबर नहीं... हम पागल हो गए थे तेरे लिए...

मम्मी की आवाज़ भी नहीं निकल पा रही थी. वह बस उसे कास के पकडे रही की कहीं वह फिर से न भाग जाये.

इतने में भाभी ने इक़बाल और हिना को घर के अंदर करते हुए दरवाज़ा बंद कर दिया था ताकि बहार कोई ये सब न देख पाए.

तभी पापा और सुधीर भैया भी छत से नीचे आ गए थे. सुप्रिया को देखते hi पापा का चेहरे तोह बुरी तरह सख्त हो गया था. और सुधीर भी कुछ दूर खड़ा रहा.

सुधीर - सुप्रिया! तू... तू कहाँ थी! तुझे कितना नहीं ढूंढा हमने... तुझे पता भी है की हम लोगो पर क्या बीती है...

सुप्रिया रट हुए सुधीर की तरफ बड़ी - भैया... मुझे माफ़ कर दो...

पर सुधीर ने ek-do कदम पीछे ले लिए. सुधीर की नज़र इक़बाल और हिना पर तिकी, जो हिचकिचाते हुए से वहां खड़े थे.

सुधीर ने उनकी और देखते हुए पुछा - ये... ये कौन हैं?

सुप्रिया ने आंसू पोछे - यह... यह मेरे साथ थे... उन्होंने मेरी मदद की...

पापा की सख्त आवाज़ आयी - नाम क्या है आप लोगो का?

सुप्रिया धीरे से बोली - यह... इक़बाल जी हैं... और यह उनकी बेटी हिना...

पापा की आवाज़ तेज़ हो गयी - इक़बाल! मतलब वह तुम्हारी बिल्डिंग का वॉचमन!

हिना को उनकी ये तीखी आवाज़ और नज़र अच्छी नहीं लग रही थी. सुप्रिया ने भी सर झुका लिया. एक अजीब सी ख़ामोशी छः गयी घर में.

मम्मी ने धीरे से कहा - पहले अंदर तोह आने दो उसे... इतने महीनो बाद लौटी है वह वापस घर...

पर मम्मी के बोलने पर भी कोई जल्दी से नहीं हिला. पापा की नज़र अभी भी इक़बाल पर तिकी हुई थी. सुधीर भी चुप खड़ा था, समझ नहीं आ रहा था क्या करे.

आखिर भाभी ने hi आगे बढ़ कर कहा - चलिए... अंदर चलते हैं... ैथ कर बात करते हैं...

मम्मी ने सुप्रिया का हाथ पकड़ा और उसे अंदर ले गयी. हिना और इक़बाल धीरे धीरे उनके पीछे आने लगे. उन्हें बहार खुले बरामदे में hi दो कुर्सी पर बिठा दिया गया था. और मम्मी सुप्रिया को खींचते हुए अंदर कमरे में ले गयी थी, और भाभी और पापा भी उनके पीछे आ गए थे. बस बहार सुधीर खड़ा था उन लोगो के पास.

मम्मी अभी भी सुप्रिया के गले लग रही थी.

पापा ने आखिर कहा - पूछोगी भी इससे कुछ! इसने जो हमारी नाक कतई थी. आखिर हुआ क्या था? किस चीज़ की कमी पद गयी थी?

सुप्रिया से फिर से अपना सर झुका लिया.

पापा की आवाज़ तेज़ हुई - हमने तोह सोच लिया था की तू मर्डर गयी है. अब क्यों वापस आयी है?

मम्मी ने सुप्रिया को पकड़ते हुए कहा - ऐसे क्यों बोल रहे हो आज! इतनी मुश्किल से तोह आज वापस मिली है हमे...

पापा - बहार बैठा वह आदमी... उसी के साथ भाग गयी थी न तू... सोचा कभी की हमारे साथ क्या हुआ... अतुल के साथ क्या किया तूने!

सुप्रिया की आँखों से पानी बेहटा जा रहा था और पापा बस बोलते जा रहे थे. बहार तक आवाज़ आ रही थी, और हिना से रहा नहीं गया और वह अंदर की और आ गयी.

पापा - एक फ़ोन तोह कर सकती थी न हम लोगो को! अब क्या चाहती है हमसे!

हिना ने कमरे में घुसते hi कहा - आप... आप मेरी चची को क्यों डाट रहे हैं!

सब लोग हैरान हो कर हिना की और देखने लगे, और धीरे धीरे "चची" शब्द बुदबुदाने लगे.

मम्मी - किसकी चची!? इसे चची क्यों बुला रही हो?

हिना चुप हो गयी. उसने सुप्रिया की तरफ देखा.

सुप्रिया ने आंसू पोछे - वह... वह बस... गाओं में सब ऐसे hi बुलाने लगे थे...

पापा का गुस्सा और बाद गया - गाओं में? मतलब तू वहां उनके साथ रही? उनके घर में? ए लड़की... अगर ये तेरी चची है तोह तेरे चाचा कौन थे?

हिना ने घबराते हुए बहार बैठे इक़बाल की और इशारा किया - वह... वह मेरे चाचा और अब्बू दोनों हैं... और ये मेरी चची...

पापा ने गुस्से में दीवार पर ज़ोर से हाथ मारा - बस... एहि तोह कमी रह गयी थी... इससे अच्छा होता की ये यहाँ आती hi नहीं... तोह ये पता hi नहीं चलता... तुम्हारी सुप्रिया किसी की बेगम जान बन गयी...

मम्मी ने सुप्रिया का हाथ पकड़ा - बीटा... सच बताओ... क्या तूने... तूने उस आदमी के साथ....

सुप्रिया ने सर झुका लिया. क्या बोलती वह? हाँ? नहीं? कुछ बीच का?

मम्मी - बोल! कुछ हुआ था उस आदमी और तेरे बीच?

सुप्रिया के मुँह से निकला - मम्मी.... उन्होंने... मुझे सहारा दिया था... मैंने जान बूझ कर कुछ नहीं...

मम्मी की पकड़ सुप्रिया पर ढीली हो गयी और भाभी उन्हें पकड़ कर सँभालने लगी. उनका और सुप्रिया का रोना hi बंद नहीं हो रहा था.

पापा गुस्से में बोले - मैं अब यह तमाशा और नहीं देख सकता... इसको बोल दो की यहाँ से चली जाये... कुछ hi देर में बहार इसे ढून्ढ रहे गुंडे भी वापस आ जायेंगे घर के बहार! इसे क्या अंदाज़ा की तुम दोनों को क्या क्या नहीं सुन्ना पड़ा है पिछले एक साल से.

सुधीर भी वहां आ गया था - इसे क्या पता होगा, ये तोह किसी की रंडी बानी हुई थी न...

भाभी ने घूर कर अपने पति सुधीर को देखा, वह भी काफी गुस्से में दिख रहा था.

मम्मी - तू ऐसा क्यों बोल रहा है... जो हुआ सो हुआ... अब तोह आ गयी है न...

इक़बाल भी खड़ा होते हुए वहां आया - मेरे ख्याल से हमें चलना चाहिए, हम बस इन्हे यहाँ छोड़ने आये थे...

सुधीर - हाँ... क्यों नहीं... छोड़ चाँद के छोड़ जाये इसे यहाँ... ज़रूर मैं भर गया तुम्हारा भी इससे...

सुप्रिया अपने भाई के मुँह से ये सब सुनकर काफी हैरान थी, उसके आंसू रुक नहीं रहे थे. पर उसके देखते देखते, इक़बाल ने हिना का हाथ पकड़ा और बहार की और निकलने लगा. हिना रोटी हुई सुप्रिया की और देख रही थी, अपना हाथ उसकी और बड़ा रही थी, जैसे वह सुप्रिया को वहां छोड़ कर जाना न चाहती हो.

पर वह लोग चले गए थे, और सुप्रिया अकेले अपने घर में रह गयी थी. सिवाए भाभी के सब लोग कुछ न कुछ बोले hi जा रहे थे. सुप्रिया के कान भी बंद पड़ने लग गए थे. मैं में बस एक यही ख्याल चल रहा था की शायद उसने यहाँ आकर गलती कर दी थी.

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कुछ घंटो बाद भी सुप्रिया ने कुछ नहीं खाया पीया था. पापा और भाई घर से निकल गए थे. भाभी ने बहार झाँक कर देखा तोह उन्होंने एक तस्सली भरी सांस ली.

सुप्रिया अपने पुराने कमरे में अकेली बैठी सुबक रही थी. उसने घडी की और देखा, 10.00 बजे थे, अभी आये हुए 2 - 3 घंटे hi हुए थे, पर ऐसा लग रहा था की वह कई दिनों से किसी अनजान घर में बैठी हो. उस गाँव वाले घर से बोहोत अनजान.

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बहार मम्मी भाभी से बोल रही थी - चलो भाई अतुल ने तोह अपनी दूसरी ज़िन्दगी बसा hi ली, और वह तोह इसे वापस नहीं लेगा... पर कहीं न कहीं इसकी भी शादी कर hi देंगे दुबारा...

भाभी - मम्मी आप धीरे बोलिये... अभी तोह आयी है और अभी से आप ऐसे...

मम्मी - तोह कौनसा कोई कलेक्टर बन कर आयी है... मुँह काला करके hi तोह आयी है...

भाभी - मम्मी आप...

मम्मी - उसको देखा है! उसके कपडे, उसका पहनावा, उसके बाल... सब कुछ बदल गया है... किसी को पता चलेगा की वह कहाँ थी, तोह कौन अपनाएगा उसे? शरीफ घरो की लडकियां तोह ऐसा नहीं करती... पता नहीं क्या आग लगी थी इस लड़की को.

भाभी ने अंदर की तरफ देखा की कहीं सुप्रिया तोह पीछे नहीं कड़ी थी. अंदर से किसी चीज़ के गिरने की आवाज़ आयी. भाभी जल्दी से अंदर आयी तोह सुप्रिया एक कपडे के बैग में अपना कुछ पुराण सामान ठूस रही थी.

भाभी ने उसका गुस्सा भरा चेहरा देखा - क्या हुआ? क्या कर रही है? आराम कर ले...

सुप्रिया - आराम कौन करने देगा मुझे यहाँ... आप लोग जब तक मुझे इस घर से फिर से निकाल नहीं डोज तब तक आपको चैन नहीं आएगा... इससे अच्छा है मैं खुद hi चली जायु...

भाभी ने उसके गालों को पकड़ते हुए कहा - पागल है क्या! इतनी मुश्किल से तोह वापस हमें मिली है... ऐसा क्यों सोच रही है. बस सब थोड़ा शॉक में हैं... तू नहीं जानती क्या क्या हुआ था इतने महीनो में...

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सुप्रिया की आँखों से आंसू बहने लगे - मुझे जानना भी नहीं है... और न hi आप लोगो को जानना है मेरे बारे में... मैं यहाँ नहीं रह सकती...

सुप्रिया उनके हाथ को झटकते हुए फिर से बैग को भरने लगी.

भाभी - रुक सुप्रिया... मैं तेरे भैया को अभी फ़ोन करती हूँ... वह तुझे समझायेंगे...

सुप्रिया गुस्से में बोली - जैसे सुबह समझाया था! मैं जा रही हूँ... मुझे अब ढूंढ़ने की कोशिश मत करना... और न मैं कभी वापस आयूंगी... बिस्तर के नीचे रखे पांच सौ रूपए लिए है बस मैंने... चोर तोह आप लोगो ने मुझे पहले hi मान लिया है...

सुप्रिया तेज़ी से बैग उठाते हुए कमरे से बहार निकल गयी. भाभी उसके पीछे भागी पर सुप्रिया जल्दी से घर के आँगन को पार करती हुई घर से निकल गयी. मम्मी को इतने में समझ भी नहीं आया हुआ क्या था.

सुप्रिया ने पीछे नहीं देखा, वह तेज़ी से निकल गयी और एक ऑटो में बैठते हुए रेलवे स्टेशन की तरफ चल पड़ी. भाभी घर के दरवाज़े पर hi रुक गयी थी और कुछ नहीं कह पा रही थी. सुप्रिया ने ऑटो में बैठे हुए अपनी घडी में टाइम देखा, पता नहीं वह टाइम पर स्टेशन पहुंच पायेगी या नहीं. ये सोचते hi उसके चेहरे पर परेशानी बाद गयी.
 
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