Adultery छुटकी - होली दीदी की ससुराल में - Page 102 - SexBaba
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Adultery छुटकी - होली दीदी की ससुराल में

सांझ जगाने का यह गीत कैसा लगा, पहले तो आंगन में हफ़्तों मंडप रहता था, लग्न लगने के साथ ही और उसी मंडप में सांझ ढलने के साथ सांन्झ जगाने का गीत होता था और सुबह एक दम मुंह अँधेरे भोर में, भोर जगाने का गीत

इस कहानी में भोर जगाने का भी एक प्रसंग आएगा तो वो गीत उस समय, पहले गाना फिर उस का वीडियो

मैं कभी भी वो गाने नहीं डालती, जिसे मैंने न गाया हो य न सुना हो, हाँ धुन शेयर करने के लिए तो यू ट्यूब का ही सहारा है

एक मैंने गारी किसी की माँ की गाने की डायरी में देखी थी, वो गाती भी थी, बहुत बुजुर्ग और वो गारी गांधी जी से जुडी थी

दूल्हा गांधी जी है और दहेज़ मांग रहे हैं, लड़की वाले अंग्रेज सरकार है और दहेज़ में गांधी जी ने सुराज मांगा, सुद्ध गारी वही धुन, वही टेक
 
भाग १०७

बुच्ची और चुनिया

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२७,१०,२१४

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लेकिन तभी नीचे से बुच्ची की सहेलियों की आवाज आयी और वो छुड़ाकर, हँसते खिलखिलाते कमरे से बाहर।

और इमरतिया भी साथ साथ लेकिन निकलने के पहले सूरजु को हिदायत देना नहीं भूली

" स्साले, का लौंडिया की तरह शर्मा रहे थे, सांझ होते ही मैं आउंगी बुकवा लगाने, आज खाना भी जल्दी हो जाएगा।

यहीं छत पे नौ बजे से गाना बजाना होगा, तोहरी बहिन महतारी गरियाई जाएंगी। तो खाना आठ बजे और दो बात, पहली अब कउनो कपडा वपडा पहनने की जरूरत नहीं है, इसको तनी हवा लगने दो और ये नहीं की हम आये तो शर्मा के तोप ढांक के,

और दूसरे बुच्ची जब खाना खिलाती है तो अपने गोद में बैठाओ, ओकर हाथ तो थाली पकडे में खिलाने रहेगा , बस फ्राक उठा के दोनों कच्चे टिकोरों का स्वाद लो,"

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पर बात काट के सूरजु ने मन की बात कह दी,

" पर भौजी, हमार मन तो तोहार, लेवे का,….. "

" आज सांझ को, आउंगी न बुकवा लगाने, …चला तब तक सोय जा। "

मुस्कराकर जोर जोर से बड़े बड़े चूतड़ मटकाकर, मुड़ कर इमरतिया भौजी ने सूरजु देवर से वादा कर दिया .

इमरतिया का मन हर्षाय गया, कितने दिन से ये बड़का नाग लेने के चक्कर में थी और आज ये खुद,...

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बुच्ची सीढ़ी पर इमरतिया का इन्तजार कर रही थी.

सीढ़ी पर से नीचे उतरते हुए, इमरतिया ने बुच्ची की छोटी छोटी चूँची फ्राक के ऊपर से दबाते हुए बोली, " हमार देवर दबाय दबाय के इसको बड़ा कर देगा " और नीचे से फ्राक को उठा के चिकनी बिल के छेद पे ऊँगली रगड़ते हुए चिढ़ाया “ और इसको चोद चोद के "

अपने को छुड़ा के नीचे आंगन में दौड़ के पहुँचती हुयी सहेलियों के बीच से बुच्ची ने मुंह चिढ़ाते हुए कहा

" अरे भौजी, तोहरे मुंह में घी गुड़, भौजी क बात जल्द सही हो "

लेकिन एक भौजाई के चंगुल से छूटी थी तो यहाँ तो दर्जनों भौजाई मौजूद थीं, कच्ची उमर की ननद का रस लेने, एक बोली,

"आय गयी, हमरे देवर से चुदवा के. फ्राक उठा के देखो, बिल बजबजा रही होगी,… सफ़ेद मलाई से "

" अरे एक देवर से कहाँ काम चलेगा, देखना, देवरन से पेलवायेगी, उहो एक साथ, क्यों बुच्ची, बबुनी ,…एक बुरिया में एक गंडिया में, "

एक गाँव की कहारिन हँसते हुए बोली।

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सब को मालूम था की बुच्ची ऐसे मजाक से बहुत छनछनाती थी इसलिए और रगड़ाई होती थी उसकी।

" अरे खाली अपने भाई को दोगी की,... हमरे भाइयों को भी दोगी, "

चुनिया, रामपुर वाली भाभी की छोटी बहन बोली,

वो लोग अभी थोड़ी देर पहले आये थे, वो भी नौवें में पढ़ती थी और बुच्ची की पक्की सहेली।

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उसका भाई गप्पू बारहवें में था और बहुत दिन से बुच्ची के चक्कर में था।

रामपुर वाली भौजी का नाम रामपुर वाली कैसे पड़ गया?

असल में गाँव में भौजियों की कमी तो होती नहीं, तो कोई बड़की भौजी, कोई नयकी, कोई छोटकी, लेकिन फिर आगे लगाने वाले विशेषण कम पड़ जाते हैं, तो भौजी के मायके का नाम का जोड़ के, और रामपुर कोई ऐसी वैसी जगह भी नहीं थी, क़स्बा था, बड़ा कस्बा, समझिये छोटे मोटे शहर की टक्कर लेता, लड़कियों, लड़को का इंटर तक स्कूल, हॉस्पिटल, और सबसे बढ़कर सिनेमा हाल, और उससे भी बड़ी बात की वहां से बस चलती थी, जो सूरजु के ननिहाल, रामपुर वाली के ससुराल से दो मील पहले एक बजार थी, वहां तक, और गाँव के सब लोग कोई बड़ी खरीददारी करने हो, घूमने जाना हो तो रामपुर ही, तो बस भौजी रामपुर वाली हो गयी।

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रामपुर वाली से सूरजु की माई की बहुत दोस्ती थी, और भौजी के गौने उतरने से ही, असल में,

बताया तो था, सूरजु के बाबू को नवासा मिला था, सूरजु के माई के न कोई भाई न बहन, तो सूरजु के नाना ने सब कुछ, सूरज बली सिंह, अपने नाती के नाम लिख दिया था, १०० एकड़ जमीन पे तो खाली गन्ना होता था, ओहि गाँव में, बाकी धान, गेंहू, आम क दो बाग़ और अगल बगल के गाँव में भी कई जगह जमीन, सब सूरजु के नाम। तो सूरजु की माई और सूरजु दोनों, बोवाई, जुताई, कटाई और बीच बीच में जाते रहते, और रामपुर वाली भाभी का घर एकदम बगल में, तो कभी उन्ही के यहाँ टिक जाते,

मिजाज भी सूरजु की माई का और रामपुर वाली का बहुत मिलता था, खूब खुल के हंसी मजाक, छेड़छाड़ वाला, और सूरजु कभी अकेले जाते तो पक्का रामपुर वाली भौजी के यहाँ, अब एक आदमी के लिए क्या घर खोले।

एक बार पहुंचे वो तो भौजी उदास, असल में उनके पति शहर में कारोबार करते थे तो हफ्ते में पांच दिन तो शहर में, कभी कभी भौजी भी, लेकिन जुताई, बुआई, खेती के काम के टाइम वही रामपुर वाली मोर्चा सम्हालती, और जब सूरजु ने बहुत पूछा तो मुस्करा के चिढ़ा के बोलीं

" जब मरद घर नहीं होता तो उसकी सब जिम्मेदारी देवर की होती है, सब काम करना होता है मरद का, "

" एकदम मंजूर आप परेशानी बताइये न भौजी " बिना कुछ सोचे सूरजु बोले। आज तक उन्होंने भौजी को उदास नहीं देखा था

" अरे जुताई हुयी नहीं है, बड़का खेत में भी और पोखरा के बगल वाले में भी, और हफ्ता दस दिन में बुवाई का टाइम हो जाएगा हरवाह बीमार हैं दोनों और तोहार भैया कउनो कारोबार के चक्कर में बम्बई गए हैं,... दस दिन बाद आएंगे, "

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अपनी परेशानी भौजी ने देवर को बतायी,

" अरे देवर के रहते जुताई क कौन परेशानी, बात आपकी सही है, मरद न होने पे देवर क जिम्मेदारी, भैय्या नहीं है, आपका देवर तो है न "

बस अगले दो दिन में रामपुर वाली का सब खेत जुत गया, लेकिन रात में रामपुर वाली ने खुल के छेड़ा, सूरजु को,

" हे देवर, खाली बाहर के खेत क जुताई करते हो की घर के अंदर भी, "

सूरजु शर्मा गए, चेहरा लाल, " धत्त भौजी," धीमे से बोले, और भौजी ने सीधे देवर के लोवर की ओर हाथ बढ़ाया, बेचारा घबड़ा के पीछे हटा तो रामपुर वाली खिलखिला उठी,

"अरे तू तो इतना लजा रहे हो, इतना तो लौंडिया नहीं लजातीं, हम तो बस ये देख रहे हैं की कही देवर की जगह ननद तो नहीं है"

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और उस दिन से देवर भाभी की जोड़ी जम गयी,

लजाधुर, झिझक शर्म में कमी नहीं आयी लेकिन अपने मन की बात जो माई से नहीं कह पाते थे वो रामपुर वाली से, और रामपुर वाली की एक रट, हमें देवरानी चाहिए, उन्होंने समझाया भी कुश्ती छोड़ना पड़ेगा तो वो चिढ़ा के बोलतीं,

"अरे नहीं, हमरे देवरानी से लड़ना न कुश्ती, तोहें पटक देगी हमार गारंटी, और फिर साली, सलहज, कुश्ती लड़ने वालों की कमी नहीं होगी, कब तक बेचारे नीचे वाले पहलवान को बाँध छान के रखोगे "

और सूरजु रामपुर वाली से ही क़बूले,

"भौजी बस यह नागपंचमी को आखिरी कुश्ती, एक पहलवान पंजाब से आया है, हर जगह चैलेंज दिया है एक बार उसे पटक दें तो फिर जउन भौजी कहें वो कबूल "

और ये ख़ुशख़बरी जब रामपुर वाली ने सूरजु की माई को दी तो बस उन्होंने गले लगा लिया और बोलीं,

खाली बरात बिदा करे, देवरानी उतराने मत आना,जिस दिन से लग्न लगेगी, उस दिन से, तोहार देवर तोहार देवरानी तू जाना, मैं तो खाली चौके चढ़ के बैठी रहूंगी। और हाँ कुल जनी.

तो उन्ही रामपुर वाली भौजी क छोट बहिन चुनिया, बुच्ची क ख़ास सहेली और उन का छोटा भाई गप्पू, अभी बारहवें में गया, रेख क्या हल्की हलकी मूंछ भी आ रही थी, और सूरजु सिंह जैसा लजाधुर नहीं, लेकिन बहिन क ससुराल तो थोड़ा बहुत झिझक

लेकिन जितना रामपुर वाली भौजी सूरजु की माई के करीब उतना ही ये दोनों, और गरमी की छुटियों में, जाड़े में, कई बार सावन में राखी में वो आता चुनिया के साथ तो हफ़्तों,

और कई बार बुच्ची भी उसी समय सूरजु की माई के साथ पहुँच जाती तो बस, कभी आम के बाग़ में तीनो छुपा छिपाई खेलते तो कभी पेड़ पर चढ़कर कच्चे टिकोरे तोड़ते, और दोनों लड़किया मिल के अकेले लड़के को, गप्पू को छेड़ती भीं,

एक दिन चुनिया और बुच्ची दोनों एक आम के पेड़ की मोटी डाल पर बैठीं थी और नीचे गप्पू, वो दोनों टिकोरे तोड़ के फेंक रही थी, गप्पू बटोर रहा था, साल डेढ़ साल पहले की बात है।

" हे भैया एकदम खट्टी मीठी कच्ची अमिया चाहिए " मुस्कराते हुए बुच्ची के कंधे पर हाथ रख के चुनिया ने गप्पू को छेड़ा,

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गप्पू को पेड़ पर चढ़ने में डर लगता था पर ये दोनों, बुच्ची और चुनिया, दोनों सहेलियां, बंदरिया की तरह, एक डाल से दूसरी डाल पर चढ़ कर पूरा बाग़ नाप देतीं।

गप्पू कुछ बोलता उसके पहले बुच्ची के कंधे पर रखा चुनिया का हाथ नीचे सरका और अपनी सहेली की कच्ची अमिया दबाते बोली

" अरे पेड़ के टिकोरे नहीं, ....मेरी सहेली के बुच्ची के "

अब वो बेचारा झेंप गया और जो लड़के लजाते हैं लड़कियां और उनकी खिंचाई करती है और सहेली के भाई पर तो लड़कियां अपना पहला हक समझती हैं तो बुच्ची बोली,

" टिकोरे के लिए तो ऊपर चढ़ना पड़ता है,.... नीचे से तो खाली ललचाते रहो "

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लेकिन उस दिन से गप्पू और बुच्ची में जबरदस्त नैन मटक्का चालू हो गया, वो लाइन मारता था और ये न ना न हाँ, लेकिन कभी मुस्करा के कभी अदा से गाल पे आयी लट झटक के,
 
गप्पू

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"अरे तुम सब लड़कियां खाली खी खी करती रहोगी की,.... बेचारे लड़के भूखे हैं उन्हें खाना भी परसोगी " बूआ जोर से गरजीं ,

सिस्टम यही था की घर के सब लड़के पंगत में सब काम ख़त्म होने के बाद पंगत में बैठते थे और घर की लड़कियां ही उन्हें खाना परोसती थीं और उसके बाद लड़कियां खाने बैठती थी तो लड़के पत्तल लगाने से लेकर खाना परसने तक, और इसी बीच हंसी मजाक, नैन मटक्का, इशारेबाजी सब चलता था।

बुच्ची पानी दे रही थी, एक बड़े से जग में सब लड़को के कुल्हड़ में, और चुनिया चिढ़ा रही थी,

' प्यास बुझाने का काम आज से बुच्ची के जिम्मे है, …यार मेरा भाई बहुत प्यासा है उसका जरा ख्याल रखना "

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" तू ही काहें नहीं पिला देती, इतना भाई भाई कर रही है "

बुच्ची ने हंस के चुनिया के पीछे चूतड़ में चिकोटी काटते कहा।

तब तक गप्पू चिल्लाया, " पानी , पानी, कोई प्यासे को पानी दे "

असली खेल ये थे की जब बुच्ची झुक के पानी देती थी तो उसके दोनों कड़े कड़े उभार उस छोटी सी टाइट फ्राक से साफ़ दिखते थे, बस लड़को का मन करता पकड़ के दबोच लें , और बाकी लड़कियां भी लड़को की शरारत समझ रही थीं।

समझ तो बुच्ची भी रही थी, लेकिन उसे भी मजा आ रहा था, जुबना दिखाने में,… ललचाने में।

जब दो चार बार ये बदमाशी हो गयी गप्पू की,…. तो दूर से बुकवा पिसती इमरतिया ने बुच्ची को आँख मार के इशारा किया।

और अबकी पानी देती बुच्ची ने थोड़ा सा पानी का जग तिरछा किया और सीधे गप्पू के पैंटपे, ठीक वहीँ सेंटर पे

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और अब लड़कियां हो हो हो, एक बुच्ची की सहेली बोली,

"हे चुनिया तेरे भाई को इतनी जोर से आ रही थी कर के आजाता, खाना भागा थोड़ा ही जा रहा था।“

चुनिया ने उसी का दुप्पटा खींच के अपने भाई को पकड़ा दिया, " लो भैया सुखवा लो, वैसे प्यास बुझी की नहीं "

पर चारो ओर नाइन कहाईन, शादी का घर, घचमच मची थी, काम बहुत था और नाउन, कहाईन, काम करने वाली हों तो मजाक का लेवल भी बढ़ जाता है, उसी में से किसी ने चुनिया का साथ देते बुच्ची को छेड़ा,

" अरे ये वो वाला पानी नहीं, असली वाला पानी है, बुच्ची अंदर ले लेबू तो गाभिन हो जाबू " और फिर तो चुनिया की सहेलियों की हंसी

लेकिन एक कहाईन थी वो गप्पू के पीछे पड़ गयी

" अरे इतना जल्दी पानी निकल गया, खाली हमरे बुच्ची बबुनी का जुबना देख के, जब बिलिया देखबा तो कौन हाल होई "

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उसके बाद लड़कियों की पंगत बैठी, साथ में भौजाइयां भी, पर बुआ एकदम काम की लिस्ट लिए पड़ी थी,

" जल्दी जल्दी खाय के उठो, खाली तुम सब खी खी खी करती रहती हो , सांझ होने के पहले सब काम ख़तम होना है "
 
अरे अरे संझा गोसाई,

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सांझ हो रही थी,

इमरतिया भी अपनी टोली वालों के साथ,

सच में शादी बियाह के घर में बहुत काम होता है। एक तो बुलावा देने का ही बाईसपुरवा में कउनो टोला छूटना नहीं चाहिए और हर रसम का अलग अलग, आज रात को नौ बजे से गाना है तो बड़की ठकुराइन ने बोला है की नौ बजे के पहले ही सब हाजिर हों।

इमरतिया ने अपनी एक देवरानी और एक लड़की को ये काम सौंपा, और मुन्ना बहु को,… उसकी टोली की सबसे जबरदस्त जो गाने वालियां सबको बोल देगी।

कउनो टोला में लड़की क बिदाई हो, चाहे दुल्हिन उतराने का काम, बड़की ठकुराइन, सूरजु क माई सबसे आगे, चाहे कोइराना, भरौटी हो चाहे पठानटोला, उनके बिना कोई काम नहीं होता था। फिर कल की बहुरिया, जिसकी अपने सास जेठानी के आगे बोल नहीं फूटता था, वो भी बड़की ठकुराइन के आगे, सब दुःख सुख की पोटली खोल देती थीं, लगता नहीं था मायके में नहीं हैं,

तो ऐसी बड़की ठकुराइन के यहाँ काज पड़ा है , उहो एकलौते लड़के का बियाह, तो पूरा गाँव तो जुटना ही था।

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और फिर सबका इंतजाम, और ऊपर से सूरजु का, इमरतिया से सूरजु क माई बोल दी थीं,

"देह से बड़ा है लेकिन मन से बच्चा है, असली भौजाई का काम तोहार ही है अपने देवर को तैयार करने का, नहीं तो तोहार देवरानी कुछ शिकायत करेंगी तो हम तोहिं को आगे कर देंगे "

और खाली सुरुजू का नहीं, उनकी माई का खुद कोई काम इमरतिया के बिना नहीं होता था और सबसे बढ़ के गोड़ दबाना, उसके बिना उन्हें नींद नहीं आती थी , और गोड़ दबाना तो बहाना था, क्या कोई सहेली होगी, और उन्होंने इमरतिया को हाँक लगाई,

" अरे इमरतिया, तनी हमार गोड़ दबाय दो, सबेरे से एक टांग पे, "

" बस बुकवा पीस के आ रही हूँ " इमरतिया ने वहीँ से जवाब दिया।

आज बुकवा भी इमरतिया दो तरह का वो पीस रही थी।

बैदानी से कुछ जड़ी बूटी लायी थी तो खास जगह के लिए एक छोटी कटोरी में वो मिला के अलग से, वैसे तो खुदे सांड ऐसा था लेकिन जब शेर का सवा शेर हो सकता तो सांड का डेढ़ सांड क्यों नहीं, और जो आ रही हो उसको भी मालूम हो की कौन गाँव महतारी बाप भेजे हैं टांग उठवाने, …

जब तक पहली रात में रगड़ के पिसान न बना दे, ….बड़ा पढ़ाई पढाई कर रहे हैं सब लोग,… असली काम तो चुदाई है, ….वो, ओकर महतारी ओकरे गाँव क नाउन ,भौजाई सिखाई हैं की नहीं, अगर पहले दिन दुलहिनिया कस के नहीं रगड़ी गयी, बिना ननदों के सहारा दिए बिस्तर से उठ गयी, चादर पे खून खच्चर नहीं हुआ, तो उसके देवर और उसकी दोनों की नाक कटेगी।

" अरे इमरतिया, तनी हमार गोड़ दबाय दो, सबेरे से एक टांग पे, "

सूरजु क माई फिर बोलीं,

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लेकिन आज सूरजु की माई का जवाब देने के लिए सूरजु की बुआ भी आ गयी थी और गाँव की और ननदें भी , बुआ वहीँ से टेरती बोलीं

" अरे दूल्हा क माई, दूल्हा क मामा नहीं आये का. उन्ही से टांग उठवा लाय, कुल दर्द दूर हो जायेगा और मामा न आये हो तो दूल्हे से ही गपागप करवा ला। जैसे हमार भैया भुरकुस छुड़ा दिए थे पहली रात,... वैसे ही भतीजा भी है :"

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और सब रीत रिवाज, रस्म की जिम्मेदारी भी नाउन के ऊपर, चूल्हा पूजना यही , सील पुजायी बची है , ये तो अच्छी बात है बुआ आ गयी है और सब रस्म का गाना भी उनको मालूम है।

सांझ होते ही, आंगन में इमरतिया, बुआ और मंजू भाभी सांझ जगाने का गीत गा रही थीं,

के मोरे संझा मनईहे रे मोरी माई



बोलेली सूरजु क माई हमरा घरे आयी

बोलेली सूरजु क भौजी हमरा घरे आयी

हम रउरे संझा मनैयिबे मोरी माई

साँझा बोलेली माई केकरा घरे जाईं

के मोरे संझा मनईहे रे मोरी माई

काथी के रे दियना, काथी के रे बाती



कथुवा क तेल जलेला सारे राती



सोनवा के दियना, कपूरन क बाती



सरसों क तेल जले सारी राती।

बुच्ची और चुनिया की जबरदस्त दोस्ती, दोनों हाथ पकडे पकडे, और वो दोनों भी आके बैठ गयीं और साथ साथ गाने लगीं, कांति बुआ ने दूसरा गाना शुरू किया,

झहर फहर संझा आवेली डगर पूछत आवेली

किसी ने पुछा कितने गाने तो बूआ ने हड़का लिया, आज कल क लड़की कउनो गुन शहुर नहीं। पांच गाना से कम नहीं।

तबतक रामपुर वाली भौजी आ गयी थीं और साथ में छोटी मामी और रामपुर वाली की आवाज बड़ी सुरीली, चुनिया एकदम उन्ही पे गयी थी

तो भौजी ने अगला संझा जगाने का गीत टेरा,

अरे अरे संझा गोसाई,

सांझ धीरे धीरे आंगन में उतर रही थी और मंडप में ये गाने चल रहे थे, अँधेरा गहरा रहा था।

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उसके पहले इमरतिया महाजिन को बोल के आयी थी, कोहबर का खाना साढ़े सात बजे के पहले, पांचो को और दूल्हे के लिए अलग से खीर

और अंचरा में से एक पुड़िया निकाल के दी और कान में समझायी, " इसमें शिलाजीत, अश्वगंधा, शतावर और पांच जड़ी बूटी पड़ी है ये दूल्हा के खाने में खाली। दूल्हा क थाली निकाल के बुच्ची आएगी उनको साढ़े सात बजे दे दीजियेगा, दूल्हा खा लेगा उसके बाद कोहबर वालियों का
 
इमरतिया की पाठशाला

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इमरतिया, अच्छा खासा कद, भरा भरा बदन, जो देखे देखता रह जाये, गोरा चम्पई रंग, बड़ी बड़ी आँखे, पान के रंग से रंगे लाल लाल भरे भरे होंठ,

और जब से गौने उतरी थी तब से और गदरा गयी थी।

कड़े कड़े ३६ के जोबन, ३४ की टाइट, खूब लो कट चोली में जबरदस्ती बाँध के चलती थी, जवानी छलकती रहती थी, लाल लाल ब्लाउज में गोरी गोरी गदरायी उभरी कड़ी गोलाइयाँ, और उनके बीच में मंगलसूत्र सीधे गहराई में धंसा, ३२ की कटीली पतली कमर पर ३६ के जोबन और ग़दर मचाते थे, और उस से कातिल थे उसके चौड़े कूल्हे, और पैरों में छनछन करती पायल, हरदम महावर लगे पाँव, दूर से आवाज सुन के कोई समझ जाए इमरतिया है।

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जब गौने उतरी थी तो बस जवानी चढ़ ही रही थी, कुछ ही दिन पहले जाँघों के बीच केसर क्यारी उगना शुरू हुयी थी, जोबन बस ऐसे की मुट्ठी में ले लो, लेकिन मरद ने महीने भर में कचर के रख दिया, न दिन देखता था न रात, और ससुरार में न टोकने वाली सास थी न ताने देने वाली ननद। ससुर था वो बाहर, पर जब महीने भर बाद मरद को पंजाब जाना पड़ा, कटनी का टाइम आ गया था फिर कही होजरी में नौकरी मिल गयी,

सास नहीं थीं लेकिन दुल्हिन उतारने पूरा नाऊ टोला और उससे भी आगे बड़की ठकुराइन खुद, उन्ही की जजमानी थी।

और बोलीं भी सास समझो, जेठान समझो, कउनो बात हो तो बिना बुलाये आना,

और इमरतिया को जब अकेलापन काटने लगा तो उन्ही के पास और उन्होंने अच्छी तरह समझाया, फिर तो बेर सबेर कभी भी,

और ये भी बोला की जवानी और जोबन जा के नहीं लौटते तो मरद को तो कमाने जाना ही पड़ता है इसका ये मतलब थोड़े ही है,....

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आगे का मतलब वो समझ गयी, लेकिन और भी बात उन्होंने ही सिखा दिया, मर्जी तेरी पसंद तेरी।

तो जब कुछ दिन बाद ससुर भी नहीं रहे और मरद को फिर पंजाब जाना पड़ा, इधर उधर के बाबू साहेब लोग रात बिरात चक्कर काटने लगे, तो इमरतिया ने साफ़ कह दिया बिन बोले और ऊपर से बड़की ठकुराइन,.... बेर सबेर सूरजु सिंह को भेज देतीं बुलाने

छह हाथ के सूरजु सिंह, आठ हाथ की लाठी, और बीस गाँव में मशहूर उनकी लाठी का जोर, कसरती देह, एक दंगल नहीं हारे, और कब वो पहुँच जाएँ ठिकाना नहीं, बस वो डर भय भी खत्म, किसी की हिम्मत नहीं की कभी जबरदस्ती हाथ भी पकड़ ले, रात बिरात कहीं आये जाए नाउन का काम, अकेले पूरी जजमानी सम्हाल ली।

लेकिन वही सूरज सिंह, इमरतिया के आगे एकदम मक्खन, भौजी के अलावा कुछ मुंह से नहीं निकलता, हाँ ललचाते भी थे।

वैसा रूप और जोबन देख के किसका मन नहीं हिलेगा, फिर भौजी का रिश्ता और भौजी भी इमरतिया जैसे, बिना मजाक के वो भी एकदम खुल के कभी छू भी देती, कभी चिकोटी काट लेती, कभी गिर पड़ती और उठाने के बहाने जोबन का बोझ, और सूरज सिंह की हालत देख के उसे बहुत मजा आता

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ये नहीं था की इमरतिया ने कभी अपने मर्द के अलावा किसी के सामने आपन लहंगा न पसारा हो, नाड़ा न खोला हो, बहुतों के सामने,

लेकिन दो बातें थी पहली बात मन मिले, मर्जी उसकी

और दूसरी बात मर्द देह का तगड़ा हो रगड़ के कुचल के रख दे, और फिर तो इमरतिया खुद,

और एक बात और अपनी जजमानी में एकदम नहीं, गाँव में भी बहुत कम, लेकिन बड़की ठकुराइन साल में तीन चार चक्कर महीने भर के लिए सूरजु सिंह के ननिहाल, इतना बड़ा नवासा, १०० बीघा का तो गन्ने का ही खेत थे, तो बुआई कटाई, तो सूरजु भी अक्सर जाते और इमरतिया तो पक्का बड़की ठकुराइन की छाया, और फिर इमरतिया का मायका भी बड़की ठकुराइन के मायके से बस पांच दस कोस, तो वहां भी कभी आना जाना, और जब तक नवासे में खेत की कटाई, बुआई होती, रोपनी होती, इमरतिया के खेत की भी जुताई होती, बिना नागा।

और इमरतिया को देह सुख की सारी कलाएं मालुम थीं, चाहे एकदम कच्चा नौसिखीया, बस जिसकी रेख आ रही हो ऐसा लौंडा हो या कड़ियल जवान, औरत को तीन बार झाड़ के झड़ने वाला, चाहे लम्बा मोटा हो चाहे एकदम,,… इमरतिया सब मजे लेना भी जानती थी और देना भी।

जैसे चाशनी से निकली ताज़ी ताज़ी छनी, रस से डूबी इमरती हो, वैसे ही टप टप रस टपकता रहता इमरतिया से, और वो तैयार हो रही थी सूरजु बाबू को बुकवा लगाने और सोच रही थी नयकी दुलहिनिया के बारे में।

और मुस्किया रही थी, लड़की से ज्यादा लड़की क महतारी के बारे में सोच के,

दो चीज के बारे में केतना घमंड,लड़की वाले तो हरदम थोड़ा झुक के ही रहते हैं लेकिन वो और खाली दो बात पर,

इमरतिया थी उस समय, बड़की ठकुराइन के साथ। उनकी भौजाई, सुरजू की मामी, ऐसी हंसमुख ,

सुरजू की माई को तो छोड़िये, इमरतिया से जबकि वो तो बिटिया -बहू की तरह लगी, बिना चिढ़ाए, छेड़े, गरियाये बात नहीं करती, की उनकी ननद के ससुरार की थी, तो वो और एक दो सुरजू की माई के मायके की। ये लोग उनके नवासे में ही थी, सुरजू के ननिहाल में

वैसे तो बियाह शादी की बात, अगुआ, नहीं तो नाऊ या घर के बड़े मरद,

लेकिन एक तो बात सारी तय हो गयी थी दूसरे सुरजू के घर में मरद कहो , मेहरारू कहो, बस सुरजू क माई, बहुत दिन से बाप माई दोनों क जिमेदारी निभा रही थीं। और समधन बोलीं की हम पास के गाँव में आये थे तो मिलना चाहते हैं तो सुरजू क माई हाँ बोल दी।

लेकिन थोड़ी देर में दुल्हिन क माई आपन गठरी खोल दीं, दो ही बात शहर और पढ़ाई।

" हमार बिटिया शहर में रही बढ़ी है तो गाँव क रंग ढंग और फिर पढ़ी है, हाईस्कूल क इम्तिहान दिया है, तो पढ़ी लिखी लड़की तो आप जानती हैं,"

' ये तो बहुत अच्छी बात है, हम लोग ठहरे गाँव वाले कोई शहर क आएगा तो और अच्छा है, फिर हमरे घर क लछमी है पढ़ी लिखी है तो लछमी सरस्वती दोनों, आप बहुत अच्छे से बिटिया को पाली पढ़ाई हैं, अब आप क बिटिया हमार बिटिया, आप कोई चिंता न करिये "

सुरजू की माई ने अपनी समधन को पान थमाते हुए कहा।

लेकिन लड़की की माई अब एकदम खुल के बोलीं,

" नहीं मेरा मतलब है, उसे एक काम धाम ज्यादा पता नहीं है, आप तो जानती हैं पढ़ने वाली लड़की तो हरदम किताब, पढ़ाई, तो घर का काम और गाँव में तो और भी ढेर सारा काम.,...

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अबकी सुरजू की माई के गाँव की पंडिताइन बैठी थीं, उन्होंने बात सम्हाली,

" अरे हमरे बिटिया के घरे में पचासो काम करने वाले है , वो राज करेगी, बस खटिया पे बैठे बैठे, इन लोगो के पास वहां इतनी बड़ी खेती बाड़ी, बाग़ और उतना ही बड़ा नवासा, अकेला बेटा है हमार सुरजू।"

लेकिन करीब पांच छह बातों पे उन्होंने हामी भरवाई की उनकी बेटी ये नहीं करेगी, वो नहीं करेगी,

लेकिन सुरजू की मामी से नहीं रहा गया और वैसे भी सामने समधन हो और मजाक न हो छेड़ा न जाए तो वो हँसते हुए बोली,

" अब ये मत कहियेगा की,... टांग भी नहीं फैलाएगी आपकी बिटिया, "

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और सब हंसने लगे, लेकिन लड़की की माँ को शायद ऐसा मजाक बुरा लगा

थोड़ा चिढ गयीं,

" अब ये शायद बात, ऐसे देखिये वो भी, अब ऐसे मजाक किसी पढ़ी लिखी लड़की के साथ, हमर बिटिया हाईस्कूल तक तो थोड़ा उस का भी ख़याल रखियेगा, "

सुरजू क माई ने बात सम्हाला, " अरे हमार भौजाई हैं, ….आप की भी समधन हैं तो समधन के साथ हंसी मजाक तो चलता है, आप एकदम चिंता न करिये "

लेकिन दुल्हिन क माई के जाने के बाद माहौल एकदम बदल गया, फिर वही एकदम खुले हंसी मजाक और वही

सुरजू क मामी, " हमार बेटवा असली अपने मामा क जना, इनकी बिटिया के टांग फ़ैलाने का इंतजार थोड़े करेगा, अपने असली बाप की तरह, अपने मामा की तरह पकड़ के चीर देगा, "

हँसते हुए अपनी ननद को, सुरजू की माई को छेड़ा।

" अरे हमार बेटवा पहलवान है कचर के रख देगा, " सुरजू क माई बोली और बात इमरतिया के पाले में डाल दी,

" इमरतिया, सुन तुहि असल भौजाई हो सुरजू क तो तोहार जिम्मेदारी। अब ये तो बोल के गयीं है की वो टांग नहीं फैलाएगी, तो ओकर गोड़ अगले दिन जमीन पर न पड़ने पाए और उनकी महतारी को भी मालूम हो जाए की कौन गाँव बिटिया भेजी हैं "

तब से ये मजाक चल पड़ा था की सुरजू की दुल्हन पढ़ी लिखी है, टांग पता नहीं फैलाएंगी की नहीं।
 
सुरजू इमरतिया के हवाले

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और अब सुरजू इमरतिया के हवाले,

जो तेल आज वो कडुवा तेल में डाल के, और जड़ी बूटी जोड़ के ख़ास तेल बनायी थी मालिश के लिए, लोग कहते हैं की पांच दिन में केंचुआ क सांड बना दे,

और जो पहले से सांड़ हो,

कल जब खोल के ' वहां' मालिश की तो इमरतिया की ऊपर की सांस ऊपर नीचे की नीचे, और ऐसा नहीं की वो इससे पहले पकड़ी न हो घोंटी न हो, ...बीसो पच्चीसो,... और अब तो वो गिनती करब छोड़ दी थी, उसके मरद का भी कम जबरदस्त बांस नहीं था, लेकिन सुरजू के आगे कुल झूठ,

जो सबसे लम्बा मोटा देखी थी, उससे भी दो अंगुल आगे, और कड़ा कितना,

लेकिन ये भी बात साफ़ थी की एक तो एकदम नौसिखिया, दूसरे उनसे केहू क दरद नहीं देखा जा सकता और बिना जोर जबरदस्ती के कुँवारी लड़की चुदती नहीं, और चुदवाने का मन भी करे तो छिनरपन में टांग सिकोड़े रहेगी।

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जांगर की कोई कमी नहीं, लेकिन मन,

और खीर में जो जड़ी बूटी डालने को महराजिन को दी है उसका असर तो यही है, बाल ब्रम्हचारी भी नम्बरी चोदू हो जाए, सामने बहिन महतारी भी हो खाली चूत नजर आये,

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और दो चार दिन में जबरदस्त असर शरू हो जाता है, ऊपर से इमरतिया की ट्रेनिंग, दो कटोरी बुकवा ( उबटन ) एक छोटी शीशी में 'वो वाला तेल' और कडुवा तेल,

रस्ते में मंजू भाभी और मुन्ना बहू कहारिन से मिटटी के कुल्हड़ सकोरा ले के गिनवा के रख रही थीं तो इमरतिया उन से मिटटी के दो सकोरे भी ले ली, देवर का शीरा बच्ची के लिए।

इमरतिया आज देवर की कोठरी में सोलहो सिंगार कर के,

लेकिन उसके मालूम हो था की उसका देवर कौन दूनो हवा मिठाई देख ललचाता है तो आज गौने क रात चो चोली पहनी थी, अब तो एकदम ही टाइट और वो भी बस चुटपुटिया बटन, हाथ लगाओ तो चुटपुट चुटपुट खुल जाए, हलके से सांकल खटखटाया और दरवाजा झटके से खोल दिया।

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अइसन लजाधुर,

इमरतिया जोर से मुस्करायी,। वो जैसे बोल के गयी थी, की थोड़ा देह को हवा पानी देखाओ तो वो एकदम निसुते चद्दर ओढ़े, लेकिन इमरतिया को देखते मारे लाज के और झट से तौलिया लपेट के खड़ा हो गया।

इमरतिया ने आराम से पहले सुरजू को दिखाते हुए अंदर से सांकल बंद किया, अपनी साड़ी उतारी, खूंटी पे टांगी, बुकवा का कटोरा जमीन पे रख के, चटाई बिछाई के चिढ़ा के बोली,

" अरे अब कपड़ा उतारने वाला दिन आ गया है, ....और खाली आपन नहीं दुलहिनिया का भी खोलना पड़ेगा, चलो लेटो "

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और हल्का सा धक्का देके सुरजू को लिटा के दोनों हाथ में तेल लगा के सुरजू के देह पे, कुछ इमरतिया की हाथ का असर, कुछ जिस तरह से चोली फाड़ रहे दोनों जोबन एकदम सुरजू के मुंह के पास, जैसे ही इमरतिया झुकती, और थोड़ी देर में तौलिये का तम्बू खड़ा हो गया, पूरे एक बित्ते,

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लेकिन इमरतिया के ऊपर असर नहीं था। वो दोनों पैरों के बाद हाथ और कंधे पे तेल लगा रही थी और अब उसकी चोली की गहराई, उभार सब दिख रहे थे और वो जान के सुरजू के चेहरे पे रगड़ दे रही थी।

" खोलो, अब बहुत चोर सिपाही हो गया " मुस्करा के वो बोली, और एक झटके में इमरतिया ने तौलिया जो उठा के खींचा और फेंका सीधे उसकी साड़ी के ऊपर, खूंटी पे।
 
चार बूँद कडुवा तेल

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लेकिन इमरतिया, इमरतिया थी। चाशनी में डूबी, रस में पगी।

और देवर को तड़पाना जानती भी थी और चाहती भी थी, स्साला खुद अपने मुंह से मांगे, बुर बुर करे, तो बस अंगूठे और तर्जनी को तेल में चुपड़ के खूंटे के बेस पे, और सोच के मुस्कराने लगी, अभी थोड़ी देर पहले बुच्ची के हाथ में जो पकड़ाया था दोनों कैसे घबड़ा रहे थे,

यही शरम लाज झिझक तो खतम करवा के पक्का चोदू बना देना है इसे बरात जाने के पहले,

मरद की देह के एक एक नस का, एक एक बटन का पता था इमरतिया को।

कहाँ दबाने से झट्ट खड़ा होता है, कहाँ तेल लगाने से लोहे का खम्भा हो जाता है, और बस वहीँ वो तेल लगा रही थी, दबा रही थी और खूंटा एकदम कुतुबमीनार हो रहा था। लेकिन देवर था एकदम आज्ञाकारी, कल उसने सुपाड़ा खोल के जो हुकुम दिया था, 'एकदम खुला रखना उसको' तो एकदम खुला ही था, चोदने के लिए तैयार। बस गप्प से इमरतिया ने मोटे लाल सुपाड़ा को दबाया, उसने मुंह चियार दिया, और

टप्प, टप्प, टप्प, टप्प, चार बूँद कडुवा तेल की सीधे उसी खुले छेद में, और लुढ़कते पुढ़कते अंदर तक।

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लंड फड़फड़ाने लगा।

और फिर दोनों हथेलियों में तेल लगा के जैसे कोई ग्वालिन मथानी चलाये, उसी तरह और सीधे इमरतिया की मुस्कराती उकसाती आँखे सीधे सूरजु की आँखों में, उसे छेड रही थीं, चिढ़ा रही थी।

सूरजु की आँखें इमरतिया के भारी भारी ३६ साइज के जोबन से चिपकी थीं जो आधे से ज्यादा चोली से छलके पड़ रहे थे

" चाही का, अरे तोहरी महतारी का और बड़ा है, बहुते जोरदार, आज ललचा रहे थे न देख देख के, अरे मांग लो, पिलाय देंगी दूध "

इमरतिया ने सूरजु की माई का नाम लगा के चिढ़ाया लेकिन बातें दोनों सही थीं। सूरजु की माई का ३८ था, लेकिन था एकदम टनक कितनी बार इमरतिया और सूरजु की माई के बीच में दंगल होता था लेकिन जोबन की लड़ाई में सूरजु की माई हरदम बीस पड़ती थीं , अपनी बड़ी बड़ी चूँची से इमरतिया को कुचल देती थीं।

" बल्कि मांगने की बात भी नहीं, ले लेना चाहिए " इमरतिया ने और आग लगायी और सूरजु के दोनों हाथ पकड़ के अपनी चोली पे

और पहलवान के हाथ के बाद चुटपुटिया बटन कहाँ टिकती, चुटपुट चुटपुट चटक के खुल गयी।

ब्लाउज उसी खूंटी पे जहां सुरुजू का तौलिया और इमरतिया की साडी टंगी थीं, और दोनों बड़े बड़े कड़े जोबना सूरजु के हाथ में

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कुंवारे जवान मरद का हाथ पड़ते ही इमरतिया पिघलने लगी , लेकिन ये चाहती भी थी। अब सूरजु का दोनों हाथ लड्डू में फंसा था इमरतिया कोई बदमाशी करती, वो हाथ लगा के रोक नहीं पाता। लेकिन वो साथ साथ सूरजु को सिखा भी रही थीं की नयकी दुलहिनिया को कैसे कचरे।कैसे उसके चोली के अनार को पहली रात में ही मिस मिस के पिसान (आटा ) कर दे,

" अरे ऐसे हलके हलके नहीं , ये कउनो बुच्ची क टिकोरा नहीं है और उस की भी कस के रगड़ना। मेहरारू के मरद के हाथ में सख्ती पसंद है कैसे पहलवान हो ? कहीं तोहार महतारी तो कुल ताकत नहीं निचोड़ ली ?

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और अब सूरजु ने थोड़ा जोर लगा के चूँची मसलना शुरू किया और इमरतिया ने लंड को मुठियाना शुरू किया, लेकिन थोड़ी देर में ही सूरजु बाबू उचकने लगे,

" नहीं भौजी, मोर भौजी, छोड़ दा, छोड़ दा "

खूंटे पे हथेली का दबाव बढ़ाते इमरतिया ने चिढ़ाया, " क्या छोड़ दूँ ? स्साले मादरचोद, नाम लेने में तो तोहार गाँड़ फट रही है का दुलहिनिया को चोदोगे? बोल, का छोडूं, "

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अब सूरजु भी समझ गए थे और सुबह से तो गाँव की औरतें तो खुल के बोल रही थीं और सबसे बढ़ के उनकी माँ और बुआ और उन्ही का नाम ले के और माँ कभी बूआ की गारी का जवाब नहीं देती तो बूआ छेड़तीं,

" का सूरजु क माई,... मुंह में दुलहा क लंड भरा है का जो बोल नहीं निकल रहा है "

तो झिझकते हुए बोल दिया, " भौजी, लंड, हमार लंड, "

" तोहार न हो, हमार हो, तोहरी भौजी के कब्जे में है जहाँ जहाँ भौजी कहिये, वहां वहां घुसी, जेकरे जेकरे बिलिया में जैसे भौजी कहिये, बोलै मंजूर "

" एकदम भौजी " कस कस के चूँची मसलते सुरुजू बाबू बोले और अब वो भी मूड में आ रहे थे और जोड़ा, " लेकिन पहले, ...."

इमरतिया खुश नहीं महा खुस, सूरजु तैयार हैं लेकिन ऐसा इमरतिया के जोबन का जादू पहले यही मिठाई चाहिए देवर को, तो मिलेगी आज ही मिलेगी, दो इंच की चीज के लिए देवर को मना नहीं करेगी, बल्कि वो नहीं कहते खुद ऊपर चढ़ के पेल देती वो

बिन बोले इमरतिया के चेहरे की ओर देख के अपने मन की बात कह दी उन्होंने, और इमरतिया ने मुस्करा के हामी भर दी और खूंटा छोड़ भी दिया, वो डर समझ रही थीं, जो हर कुंवारे लड़के के मन में होता है, ' कहीं जल्दी न झड़ जाऊं " और वो जानती थीं की ये लम्बी रेस का घोडा है लेकिन उसे अभी खुद अपनी ताकत का अहसास नहीं है, किस स्पीड से दौड़ेगा, कितनी देर तक दौड़ेगा, दो चार पर इसे चढ़ाना जरूरी है ,

फिर भी खूंटा उसने छोड़ दिया लेकिन इमरतिया के तरकश में बहुत तीर थे।

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खूंटा छोड़ के उसने रसगुल्लों में तेल लगाना शुरू किया, मलाई का कारखाना यही तो थे, यही तो दुलहिनिया को पहली रात को गाभिन करेंगे और सबेरे चादर पर खून के साथ इसी की मलाई बहती मिलेगी, जब छोटी कुँवारी ननदें जाएंगी उठाने। और फिर हथेली से सुपाड़ी पे

असली खेल था सुपाड़े को एकदम तगड़ा, पत्थर ऐसा करना, भाला कितना लम्बा हो लेकिन अगर उसका फल भोथरा हो तो शिकार कैसे करेगा। और सूरजु देवर का सुपाड़ा तो एकदम ही मोटा, एकदम मुट्ठी ऐसा, बुच्चीया यही तो सोच के घबड़ा रही थीं, भैया क इतना मोत कैसे घुसी, और एक बार सुपाड़ा घुस जाए तो फिर लंड तो घुस ही जाता है।

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सूरजु सिसक रहे थे और इमरतिया ने बुच्ची की बात चलाई, " हे तोर बहिनिया, बुच्ची पकडे थीं तो कैसा लग रहा था ?

" अरे भौजी, आप जबरे उसकी मुट्ठी में पकड़ा दी थीं " हँसते हुए सूरजु बोले।

और एक बार फिर से हथेली में तेल चुपड़ के कस के खूंटा दबोच लिया, इमरतिया ने।

वास्तव में बहुत मोटा था, जब इमरतिया की मुट्ठी में नहीं समा रहा था तो नयकी दुलहिनिया की कोरी कच्ची बिलिया में कैसे धँसेगा ? इमरतिया मुस्करायी। चाहे जितनी रोई रोहट हो, चिल्ल पों करे, घोंटना तो पड़ेगा ही और वो भी जड़ तक। और ओकरे पहले बुच्ची ननदिया को।
 
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