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- Dec 5, 2013
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आश्रम का सच और ननद की परेशानी
मेरे कुछ समझ में नहीं आ रहा था, इतनी जबरदस्त पकड़ आश्रम की ननद की सास पर,
क्या खेल है और फिर उनकी सास भी, सब देख कर भी आँख बंद किये हैं,
मैंने बहुत कुछ पता किया था, जबसे ननद ने आश्रम और गुरु जी के बारे में बताया था, कुछ सुना कुछ सोचा और कुछ समझा।
पहला खेल था बड़मनई या बड़े बड़े लोगों का, जिससे पूछो वही कहता था बड़े बड़े लोग आते हैं, ....एक से एक नेता, अफसर, बिजनेसमैन सोझे बाबा क गोड़ पकडत है।
और मैं समझ गयी नेता, तो पहली बात तो राजनीति की अनिश्चितता, टिकट मिलेगा की नहीं, मिला तो इलेक्शन जीतेंगे की नहीं और जीत गए तो मिनिस्टर, क्या पता किसका आसीर्बाद काम कर जाए, लेकिन इससे ही जुडी एक बात थी। बड़मनई इसलिए जाते हैं छोटमनई जाते हैं। ये बात मशहूर थी की कम से कम ४०-५० गावों में तो गुरु जी का पूरा असर था और २००-२५० में भी काफी तो मतलब , दस पंद्रह हजार वोट तो पक्के, एम् एल ए के इलेक्शन में तो इतने में चुनाव जीत जाता हैं। तो गुरु जी की कृपा हो उनके साथ फोटो, उठना बैठना हो तो,...
और नेता की देखादेखी अफसर भी, ट्रांसफर, पोस्टिंग, अब गुरु जी के यहाँ नेता मंत्री सब आते हैं तो गुरु जी की कृपा हो, एक बार मंत्री जी से कह दें, मंत्री जी जो पता भी चल जाए की ये भी गुरु जी के यहाँ आते जाते हैं,...
और अगर नेता और अफसर आएंगे तो बिज़्नेसेवाले भी, उनका काम नेता से भी पड़ता हैं और अफसर से भी।
और जितने बड़े बड़े नेता, अफसर आएंगे, पैसे वाले आयंगे तो गाँव के लोगो के लिए और कोई प्रूफ नहीं चाहिए की गुरु जी में कुछ तो बात हैं ही।
और अनिश्चितता और भय के साथ जो इन सब को जोड़ता हैं वो हैं पैसा।
गुरु जी को अपने लिए नहीं,... आश्रम के लिए तो कही नुजूल की सराकरी जमीन पर एन जी ओ बनाकर लीज ले लिया, पट्टा लिखवा लिया, बंजर ऊसर जमीन, गाँव की चरागाह, तो किसी ने अपने किसी के नाम पे कुछ बनवा दिया, कहीं भक्तो ने अपनी जमीन दे दी।
और जैसे जैसे जमीन प्रापर्टी बढ़ी, वैभव बढ़ा वैसे ही गौरव भी बढ़ा। और गाँव के लोगों में असर भी।
आश्रम ने आस पास कई गाँवों में सिर्फ महिलाओं /लड़कयों के लिए क्लिनिक खोले थे और एक एक महिला अस्पताल का काम चल रहा था। एक हाईस्कूल भी बन रहा था।
क्लिनिक में भी कोई पैसा नहीं लगता था और स्कूल भी फ्री होनेवाला था।
गुरु जी ने महिलाओं को ही अपना फोकस बनाया था इसलिए की ज्यादातर गाँवों में मरद कमाने के लिए दिल्ली बंबई, साल छह महीने में आते, कुछ आस पास के शहरों में और जो बचते भी वो खेती किसानी में। खेती किसानी में जब से मशीनों का काम बढ़ गया था, बुआई जुताई कटाई का काम भी कम हो गया था,
इसलिए हर गाँव में टोला वाइज वालंटियर, जो अक्सर जाति के आधार पर ही होते थे, चमरौटी, भरौटी, बबुआन, सब में एक एक वालंटियर कम से कम, ...और वही किसी को दवा दारु कराना हो, किसी की बहू को बच्चा न हो रहा हैं, कोई थाना कचहरी हो, सब में और उस वालंटियर की जिम्मेदारी थी. गुरु जी का नाम, आश्रम का असर, थाना, तहसील, हर जगह झटपट काम होता था। जो गांव की वालंटियर थीं, उनकी साडी का रंग अलग, भगवा , केसरिया और सफ़ेद ब्लाउज, दूर से लगता था आश्रम वाली हैं।
उनकी जिम्मेदारी थी की कम से कम अपनी टोली के पांच मेंबर बनाये जो महीने में पांच दिन कम से कम सेवा के लिए आश्रम में आएं। जो जो मेंबर आते थे उन के खाने पीने का इंतजाम आश्रम में, तो गाँव क्या, कोई टोला ऐसा नहीं था, जहाँ पांच दस आश्रम वालियां न हों और जब वो आश्रम नहीं जाती थीं तो हफ्ते में एक दिन सतसंग, घण्टे दो घंटे का
तो इस तरह का नेट वर्क बीसो गावों में फ़ैल चुका था और साल के अंत में सौ गाँवों का टारगेट था।
मेरी ननद की सास भी बड़मनई में आती थीं, बड़के वाले नहीं तो बीच वाले में कम से कम, और गाँव के हिसाब से तो बड़मनई में ही। थाना दरोगा, बी डी ओ, तहसील दार आते गाँव में तो उन्ही के घर पे गाडी खड़ी होती, वहीँ चाय नाश्ता। एक ज़माने में जमींदारी थी और वो ख़तम होने पे भी सौ बीघा से ऊपर की खेती थी, एक राइस मिल चल रही थी और सबसे बढ़ के के इज्जत,...
और गुरु जी की कृपा होने से तो और, एक बार तो डिप्टी साहेब भी आये तो खाना उन्ही के यहाँ, प्रधानी से लेकर ब्लाक प्रमुखी तक के इलेक्शन में उनकी राय ली जाती।
गुरु जी ने उनको पांच गाँव के वालंटियर का हेड बनाया था और नए दस गाँवों में संदेश पहुंचाने का काम भी दिया था।
जो नया हाईस्कूल बन रहा था बगल के गाँव में , उस में भी वो सोचती थीं की गुरु जी उन्हें मैनेजर बनाएंगे। यहाँ तक की गुरु पूर्णिमा को उन्हें तीसरी लाइन में बैठने को मिला था जबकि पहली पांच लाइन तो एकदम वी आई पी लाइन थी, और जब वो गोड़ छूने झुकी थी तो गुरु जी ने खुद उनकोउठाया और हाल चाल पूछा।
पूरे आश्रम में उनकी इज्जत हैं। प्रमुख सेविका जितनी भी हैं सब उन्हें पहचानती हैं।
दो तीन चीजे होती हैं जो सब से ज्यादा किसी पे असर डालती हैं और ननद की सास पे भी वही बात थी, लालच, जलन और डर।
लालच जरूरी नहीं हो की पैसे का हो, वो प्रतिष्ठा का भी होता हैं,... यही ननद की सास पे था।
गुरु जी के आश्रम में और आगे बढ़ने का, आश्रम के अंदर तो नहीं बाहर के जो काम धाम हों उनमे वो सबसे आगे बढ़ना चाहती थीं
और जलन थी बगल के गाँव में एक और उन्ही की तरह थीं वो भी स्कूल के काम में, लेकिन वो खुद उनकी एक बहू थी और दो कुँवारी लड़कियां सब पांच से दस दिन आश्रम में सेवा देती थीं और ख़ुशी ख़ुशी। बेटा उनका दुबई में रहता था, दो साल से बहू गाभिन नहीं हुयी थी, लेकिन गुरु जी की कृपा से जिस दिन हफ्ते भर के लिए उनका बेटा आया उसी महीने बहू गाभिन हो गयीं। गुरु जी के आगे डाकटर हकीम फेल।
लेकिन सबसे बड़ी बात थी डर।
ननद की सास ने अपने गाँव की ही तीन चार बहुओं को, गौने के चार पांच महीने के अंदर अगर उलटी नहीं शुरू हुयी तो आश्रम की क्लिनिक में दिखवाया और फिर गुरु जी की कृपा, किसी का डेढ़ साल भी नहीं डांक पाया सब के यहाँ बेटा -बेटी, लेकिन खुद उनके यहाँ अभी तक खट्टा भी बहू ने नहीं माँगा।
बोलता कोई नहीं था लेकिन दबी जबान से और ये बात गुरु जी तक तो पहुंची ही होगी, ...और जो बगल के गाँव वाली वो इस बात को बढ़ा चढ़ा के जरूर प्रमुख सेविकाओं से कहती होगी,.... तो फिर आश्रम में इस बहू के चक्कर में उनकी सास का रुतबा न कहीं कम हो
और दूसरा डर था क्या होगा खेत बाड़ी का,... बंस का। आश्रम की जान पहचान से उनकी सास धीरे धीरे और भी धंधे, लेकिन बाद में कौन देखेगा, अगर बंश ही नहीं चला तो।
लेकिन मम्मला सिर्फ सास का ही नहीं था , नन्दोई जी ने जो बताया था अपनी माँ और आश्रम के बारे में उनके कहे बिना मैं समझ गयी थी की मामला क्या हैं।
मामला था ननद का सोने ऐसा रंग और गदराया जोबन। देख के जिस का न खड़ा होता उस का भी खड़ा हो जाए, गालों में हंसती तो गड्ढे पड़ते, ठुड्डी पे तिल, चम्पई रंग, बड़ी बड़ी आखे और पूरी देह में काम रस छलकता रहता, देख के लगता एकदम चुदने के लिए तैयार हैं।
मेरे कुछ समझ में नहीं आ रहा था, इतनी जबरदस्त पकड़ आश्रम की ननद की सास पर,
क्या खेल है और फिर उनकी सास भी, सब देख कर भी आँख बंद किये हैं,
मैंने बहुत कुछ पता किया था, जबसे ननद ने आश्रम और गुरु जी के बारे में बताया था, कुछ सुना कुछ सोचा और कुछ समझा।
पहला खेल था बड़मनई या बड़े बड़े लोगों का, जिससे पूछो वही कहता था बड़े बड़े लोग आते हैं, ....एक से एक नेता, अफसर, बिजनेसमैन सोझे बाबा क गोड़ पकडत है।
और मैं समझ गयी नेता, तो पहली बात तो राजनीति की अनिश्चितता, टिकट मिलेगा की नहीं, मिला तो इलेक्शन जीतेंगे की नहीं और जीत गए तो मिनिस्टर, क्या पता किसका आसीर्बाद काम कर जाए, लेकिन इससे ही जुडी एक बात थी। बड़मनई इसलिए जाते हैं छोटमनई जाते हैं। ये बात मशहूर थी की कम से कम ४०-५० गावों में तो गुरु जी का पूरा असर था और २००-२५० में भी काफी तो मतलब , दस पंद्रह हजार वोट तो पक्के, एम् एल ए के इलेक्शन में तो इतने में चुनाव जीत जाता हैं। तो गुरु जी की कृपा हो उनके साथ फोटो, उठना बैठना हो तो,...
और नेता की देखादेखी अफसर भी, ट्रांसफर, पोस्टिंग, अब गुरु जी के यहाँ नेता मंत्री सब आते हैं तो गुरु जी की कृपा हो, एक बार मंत्री जी से कह दें, मंत्री जी जो पता भी चल जाए की ये भी गुरु जी के यहाँ आते जाते हैं,...
और अगर नेता और अफसर आएंगे तो बिज़्नेसेवाले भी, उनका काम नेता से भी पड़ता हैं और अफसर से भी।
और जितने बड़े बड़े नेता, अफसर आएंगे, पैसे वाले आयंगे तो गाँव के लोगो के लिए और कोई प्रूफ नहीं चाहिए की गुरु जी में कुछ तो बात हैं ही।
और अनिश्चितता और भय के साथ जो इन सब को जोड़ता हैं वो हैं पैसा।
गुरु जी को अपने लिए नहीं,... आश्रम के लिए तो कही नुजूल की सराकरी जमीन पर एन जी ओ बनाकर लीज ले लिया, पट्टा लिखवा लिया, बंजर ऊसर जमीन, गाँव की चरागाह, तो किसी ने अपने किसी के नाम पे कुछ बनवा दिया, कहीं भक्तो ने अपनी जमीन दे दी।
और जैसे जैसे जमीन प्रापर्टी बढ़ी, वैभव बढ़ा वैसे ही गौरव भी बढ़ा। और गाँव के लोगों में असर भी।
आश्रम ने आस पास कई गाँवों में सिर्फ महिलाओं /लड़कयों के लिए क्लिनिक खोले थे और एक एक महिला अस्पताल का काम चल रहा था। एक हाईस्कूल भी बन रहा था।
क्लिनिक में भी कोई पैसा नहीं लगता था और स्कूल भी फ्री होनेवाला था।
गुरु जी ने महिलाओं को ही अपना फोकस बनाया था इसलिए की ज्यादातर गाँवों में मरद कमाने के लिए दिल्ली बंबई, साल छह महीने में आते, कुछ आस पास के शहरों में और जो बचते भी वो खेती किसानी में। खेती किसानी में जब से मशीनों का काम बढ़ गया था, बुआई जुताई कटाई का काम भी कम हो गया था,
इसलिए हर गाँव में टोला वाइज वालंटियर, जो अक्सर जाति के आधार पर ही होते थे, चमरौटी, भरौटी, बबुआन, सब में एक एक वालंटियर कम से कम, ...और वही किसी को दवा दारु कराना हो, किसी की बहू को बच्चा न हो रहा हैं, कोई थाना कचहरी हो, सब में और उस वालंटियर की जिम्मेदारी थी. गुरु जी का नाम, आश्रम का असर, थाना, तहसील, हर जगह झटपट काम होता था। जो गांव की वालंटियर थीं, उनकी साडी का रंग अलग, भगवा , केसरिया और सफ़ेद ब्लाउज, दूर से लगता था आश्रम वाली हैं।
उनकी जिम्मेदारी थी की कम से कम अपनी टोली के पांच मेंबर बनाये जो महीने में पांच दिन कम से कम सेवा के लिए आश्रम में आएं। जो जो मेंबर आते थे उन के खाने पीने का इंतजाम आश्रम में, तो गाँव क्या, कोई टोला ऐसा नहीं था, जहाँ पांच दस आश्रम वालियां न हों और जब वो आश्रम नहीं जाती थीं तो हफ्ते में एक दिन सतसंग, घण्टे दो घंटे का
तो इस तरह का नेट वर्क बीसो गावों में फ़ैल चुका था और साल के अंत में सौ गाँवों का टारगेट था।
मेरी ननद की सास भी बड़मनई में आती थीं, बड़के वाले नहीं तो बीच वाले में कम से कम, और गाँव के हिसाब से तो बड़मनई में ही। थाना दरोगा, बी डी ओ, तहसील दार आते गाँव में तो उन्ही के घर पे गाडी खड़ी होती, वहीँ चाय नाश्ता। एक ज़माने में जमींदारी थी और वो ख़तम होने पे भी सौ बीघा से ऊपर की खेती थी, एक राइस मिल चल रही थी और सबसे बढ़ के के इज्जत,...
और गुरु जी की कृपा होने से तो और, एक बार तो डिप्टी साहेब भी आये तो खाना उन्ही के यहाँ, प्रधानी से लेकर ब्लाक प्रमुखी तक के इलेक्शन में उनकी राय ली जाती।
गुरु जी ने उनको पांच गाँव के वालंटियर का हेड बनाया था और नए दस गाँवों में संदेश पहुंचाने का काम भी दिया था।
जो नया हाईस्कूल बन रहा था बगल के गाँव में , उस में भी वो सोचती थीं की गुरु जी उन्हें मैनेजर बनाएंगे। यहाँ तक की गुरु पूर्णिमा को उन्हें तीसरी लाइन में बैठने को मिला था जबकि पहली पांच लाइन तो एकदम वी आई पी लाइन थी, और जब वो गोड़ छूने झुकी थी तो गुरु जी ने खुद उनकोउठाया और हाल चाल पूछा।
पूरे आश्रम में उनकी इज्जत हैं। प्रमुख सेविका जितनी भी हैं सब उन्हें पहचानती हैं।
दो तीन चीजे होती हैं जो सब से ज्यादा किसी पे असर डालती हैं और ननद की सास पे भी वही बात थी, लालच, जलन और डर।
लालच जरूरी नहीं हो की पैसे का हो, वो प्रतिष्ठा का भी होता हैं,... यही ननद की सास पे था।
गुरु जी के आश्रम में और आगे बढ़ने का, आश्रम के अंदर तो नहीं बाहर के जो काम धाम हों उनमे वो सबसे आगे बढ़ना चाहती थीं
और जलन थी बगल के गाँव में एक और उन्ही की तरह थीं वो भी स्कूल के काम में, लेकिन वो खुद उनकी एक बहू थी और दो कुँवारी लड़कियां सब पांच से दस दिन आश्रम में सेवा देती थीं और ख़ुशी ख़ुशी। बेटा उनका दुबई में रहता था, दो साल से बहू गाभिन नहीं हुयी थी, लेकिन गुरु जी की कृपा से जिस दिन हफ्ते भर के लिए उनका बेटा आया उसी महीने बहू गाभिन हो गयीं। गुरु जी के आगे डाकटर हकीम फेल।
लेकिन सबसे बड़ी बात थी डर।
ननद की सास ने अपने गाँव की ही तीन चार बहुओं को, गौने के चार पांच महीने के अंदर अगर उलटी नहीं शुरू हुयी तो आश्रम की क्लिनिक में दिखवाया और फिर गुरु जी की कृपा, किसी का डेढ़ साल भी नहीं डांक पाया सब के यहाँ बेटा -बेटी, लेकिन खुद उनके यहाँ अभी तक खट्टा भी बहू ने नहीं माँगा।
बोलता कोई नहीं था लेकिन दबी जबान से और ये बात गुरु जी तक तो पहुंची ही होगी, ...और जो बगल के गाँव वाली वो इस बात को बढ़ा चढ़ा के जरूर प्रमुख सेविकाओं से कहती होगी,.... तो फिर आश्रम में इस बहू के चक्कर में उनकी सास का रुतबा न कहीं कम हो
और दूसरा डर था क्या होगा खेत बाड़ी का,... बंस का। आश्रम की जान पहचान से उनकी सास धीरे धीरे और भी धंधे, लेकिन बाद में कौन देखेगा, अगर बंश ही नहीं चला तो।
लेकिन मम्मला सिर्फ सास का ही नहीं था , नन्दोई जी ने जो बताया था अपनी माँ और आश्रम के बारे में उनके कहे बिना मैं समझ गयी थी की मामला क्या हैं।
मामला था ननद का सोने ऐसा रंग और गदराया जोबन। देख के जिस का न खड़ा होता उस का भी खड़ा हो जाए, गालों में हंसती तो गड्ढे पड़ते, ठुड्डी पे तिल, चम्पई रंग, बड़ी बड़ी आखे और पूरी देह में काम रस छलकता रहता, देख के लगता एकदम चुदने के लिए तैयार हैं।