Adultery छुटकी - होली दीदी की ससुराल में - Page 86 - SexBaba
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Adultery छुटकी - होली दीदी की ससुराल में

बेटीचो

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असली बात ये थी की मैं ज़रा अपने कमरे का एक चक्कर लगा के देखना चाहती थी की मेरी ननद पर चढ़ाई अभी शुरू हुयी की नहीं।

ननद मेरी मेरे बिस्तर पे मेरे मरद के साथ,

खिड़की हलकी सी खुली थी, दिख भी रहा था और सुनाई भी दे रहा था, खेल बस शुरू हो रहा था। मेरे मरद का हाथ अपने पेट पे रख के ननद मेरी बड़े दुलार से अपने पेट में की बिटिया से बोल रही थी,

" देख बेटी तेरा बेटीचोद बाप, केतना इन्तजार करा के आया है, लेकिन तेरे साथ इन्तजार नहीं कराने दूंगी जैसे ही जवानी के फूल खिलेंगे न, "

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और मेरे मरद ने, जिसे मेरी ननद बेटीचोद बाप कह रही थीं, ननद के पेट को चूम लिया, और मेरी ननद को छेड़ते हुए पेट से बोला,

" ये तेरी महतारी न नम्बरी छिनार है "

" हे ये तोहार बिटिया हमरो नंबर डकायेगी, मैं छिनार तो ये महाछिनार, और सबसे पहले अपने बाप के साथ " ननद चुप रहने वाली थोड़ी थी,

" तो का हुआ," पेट सहलाते वो बोले मेरी ननद से,

" बीज मैं लगा रहा हूँ तो फल कौन खायेगा, और फल क्या कच्ची अमिया भी आय गयी तो बिना कुतरे "

" एकदम " इनका सर सहलाते हुए प्यार से मेरी ननद ने वायदा किया, " अपने हाथ से अपने सामने, खुद खोल के, लेकिन सबसे पहले जहाँ से नौ महीने बाद तोहार बिटिया निकली उहाँ चूम चाट के, चुसो न भैया कस के "

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मेरी तरह से मेरी ननद भी जानती थी की मेरा मरद कितना बड़ा चूत चटोरा है , वो अपनी सगी बहन की दोनों चिकनी मख़मली जाँघों को फैला के

और मेरी ननद अपने पेट को सहला के जैसे अपनी होने वाली बेटी से बात कर रही हों,

" देख रही है इस स्साले बेटीचोद को,... कैसे अभी से तेरे लिए ललचा रहा है। अरे जिस बहनचोद ने अपनी सगी बहन नहीं छोड़ा वो बेटी को कैसे छोड़ेगा और छोड़ना चाहिए भी नहीं। अरे जब बाहर निकलेगी न नौ महीने बाद तब देखना अपने इस बेटीचोद बाप की बदमाशी, तेरे सामने चढ़ेगा तेरी माँ पे,... "

और यह सब सुन के मेरे सैंया और ननद के भैया और गरमा रहे थे, जिस मस्ती मेरी ननद की बातें सुन के मेरे मर्द को और जोश आ रहा था और वो कस कस के अपनी बहन की बुर चाट रहे थे।

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मेरी ननद अपने भाई को और उकसाते, आगे में घी डालते, अपने पेट को सहलाते बोली,

' जिस उमर में तेरी सहेलियां गुड्डे से खेलेंगी न तुझे अपने हाथ से असली मोटा मस्त लौंड़ा पकडाउंगी, तेरे बाप का, ऐसा मस्त मिलेगा नहीं "

और ये बात मेरी ननद की सोलहो आने सही थी,

मैंने इनके पहले तो किसी और का, और साल भर, लेकिन इस फागुन में तो मैंने किसी देवर को मना नहीं किया, ऐन होली के दिन ननदोई जी और उनके दोस्त ने, फिर पड़ोस वाले सुनील और उसके दोस्तों ने भी भी और होली के पहले मैंने खुद चंदू को, और मायके से लौटने के बाद एकदम कच्चा केला, चुन्नू, फिर कबड्डी के अगले दिन तो मैंने गिनना ही छोड़ दिया, देवर है तो फागुन में भौजी को तो , और अगर कोई देवर झिझकता तो मैं खुद उसके ऊपर, लेकिन बात असली यही थी की ननद जो इस बेटी चोद मेरे मरद की होने वाली बेटी को समझा रही थीं, मेरा मरद सबसे बीस ।

खाली लम्बाई मोटाई में ही नहीं, उसमें नन्दोई जी का उनसे उन्नीस होगा अट्ठारह नहीं और कड़ा भी जबरदस्त था, और चंदू का तो करीब करीब बराबर ही और सुपाड़ा बहुत ही मोटा, इसलिए तो भोंसडे वालियों की भी फटती थी और कमल का भी वही हाल,

लेकिन मेरे मरद की सबसे बदमाशी वाली बात थी चोदने के साथ साथ जो वो तंग करता था, तड़पाता था, कभी ऊँगली से कभी होंठों से कभी जीभ से, लड़की खुद ही बोलती थी, ' चोद स्साले', मारे गरमी के पागल हो जाती थी। खुद मैं, पहली रात को ही इन्होने कभी चूम के कभी चूस चूस के कभी ऊँगली से कभी होंठों से, मेरी ये हालत कर दी थी की झिल्ली तो बाद में फटी, मेरी शर्म लाज पहले उतर गयी और पांच बार इस बदमाश ने मुझसे कहलवाया, ' पेलो न, अंदर डालो, पूरा डालो, हाँ और " तब जा के,

और अब जो उनकी बहन ने बेटीचोद होने का कह के उन्हें उकसाया तो ऐसे उन्होंने अपनी बहन को गरमाया उससे दस बार कबुलवाया की अपनी पहलौठी बेटी के सामने ही चुदवायेगी, खुल के चुदववायेगी जिससे वो भी, और अपने से अपनी बेटी को उनके लिए और उस के बाद क्या धकापेल चुदाई शुरू हुयी भाई बहन की और मेरी ननद बेटी को उनसे जोड़ के क्या मस्त गालियां दे रही थी, " चल बेटीचोद, मेरी तो तुझे चुदी मिली, तेरी बेटी की तो जब एकदम कच्ची कली रहेगी तभी तुझसे, और सबके सामने मामा बोलेगी लेकिन पिलवाते समय बापू। "

तभी मुझे याद आया की मैं ननदोई जी को अपनी और उनकी सास के पास अकेले छोड़ के आयी हूँ और उनका स्टॉक लेने आयी हूँ

और मैं अपनी ननद के कमरे की ओर,

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मुझे मालूम था ननदोई जी का स्टॉक कहाँ रखा रहता था, व्हिस्की की दो बोतल निकाल के मैं सासू जी के कमरे की ओर चल दी,
 
मेरी सास, मेरे ननदोई

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सासु जी और नन्दोई जी अभी पहुंचे ही थे।

और मेरे नन्दोई मेरी सास्सू के जोबन को ललचायी नजरों से देख रहे थे, लेकिन मेरे सासू के जोबन थे ही ऐसे ललचाने लायक, रस भरी इमरती टप टप रस चूता रहता था, मर्दों का टनटनाता रहता था, और आज तो जो अंगिया पहनी थी उन्होंने किसी का भी खड़ा हो जाता ये तो दामाद थे, सास की बेटी बहू सब चोद चुके थे, रिश्ता ही ऐसा था,

एकदम कसी कसी छोटी सी चोली, उभार को दबाये दबोचे और उभार, सिर्फ गहराई ही नहीं दोनों निपल के भी दर्शन करा रही थीं, खूब बड़े ४० तो नहीं लेकिन ३८ से ज्यादा ही, जो एम् आई एल ऍफ़ बोलते हैं न एकदम वैसे ही, पर एकदम गोल गोल और कड़ी कड़ी,

सास मेरी सिर्फ उस छोटी सी चोली और साया में

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और मैं भी, नन्दोई जी भी सिर्फ पाजामे में और खूंटा खड़ा,

पीछे से आके मैंने सासू जी के जोबन दबोच लिए और नन्दोई जी को ललचाते बोला,

" नन्दोई जी,.... देखना है कौन सा दूध पीके आपकी सजनिया ऐसी गद्दर जवान हुयी है. अरे आज आप भी पी लीजिये, "

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" अरे पिला दूंगी, मेरा एकलौता दामाद है, लेकिन बहू पहली इसकी आँखे बंद करो बहुत नजर लगा रहा है । "

मैं आज्ञाकारी बहू, तुर्रंत बोली ,

" एकदम मां जी "

और उनके कान में फुसफुसाया आपके ब्लाउज से बढ़िया क्या होगा, दामाद जी अपनी सास की अंगिया आँख पे महसूस भी करते रहेंगे, और जब तक सास कुछ बोलतीं ननदोई जी कुछ समझते मैंने पीछे से सास की चोली के बंध खोल दिए और चोली धीरे धीरे सास के बदन से दूर मेरे हाथ और

लेकिन मैंने ननदोई जी की आँखे तुरंत नहीं बंद की उन्हें अपनी सास के मुक्त जोबन दर्शन ठीक से कर लेने दिए,

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और सास को चिढ़ाया भी

" देखिये आपके जुबना ने मेरे नन्दोई की का हालत कर दी, " और उसी चोली से पाजामे के ऊपर से खड़े खूंटे को कस कस के रगड़ दिया

वो और जोर से फनफना गया,

" इसलिए तो कह रही हूँ की इसकी आँख बंद कर दो जल्दी, वरना कही देख देख के ही कुछ, " और मेरी सास खिलखिलायीं

" अरे नहीं मेरे ननदोई को समझा का है आपने. अब बेटी नहीं है आपकी यहाँ तो तो इनकी सलहज तो है, तीन पानी झाड़ के झड़ने वाला औजार है ये, "

मैंने नन्दोई जी की तारीफ़ की और सच में चुदाई तो जबरदस्त करते थे, होली के दिन ही तीन बार चोदा था उन्होएँ मुझे खूब रगड़ रगड़ के,

" अरे तेरी ननद की सास की तरह, तेरी और इसकी सास का ताल पोखर नहीं है , जल्दी आँख बंद कर इसकी "

सास बिना अपने जोबन छुपाने की कोई कोशिश किये बोलीं,

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और मैंने सासू जी की चोली से नन्दोई जी की आँखे बंद कर दी , तगड़ा ब्लाइंड फोल्ड, लेकिन सासू जी तो हरदम एकदम झलकौवा

ब्लाउज पहनती थी, जबतक गोरा गोरा उभार न झलके, तो नन्दोई जी की हल्का फुल्का कुछ कुछ और मेरी सास बोली, तुम दोनों नन्दोई सलहज की जोड़ी बहुत जबरदस्त है, जबतक सलहज का ब्लाउज न उतरे, तबतक नन्दोई को मजा नहीं आता"

और सास ने मेरे ब्लाउज से भी उनकी आँखे बाँध दी, सास और सलहज दोनों की चोली नन्दोई के आँखों पर मतलब दोनों टॉपलेस

और हम दोनों सास बहू ने धक्का देकर नन्दोई जी को सास जी की खूब चौड़ी सी पलंग पर जहाँ सासू माँ सोती थी अपने बेटे बेटी के साथ

लेकिन ननदोई जी फड़फड़ा रहे थे, हम दोनों को छूने की पकड़ने की कोशिश कर रहे थे और अबकी मैंने उन्हें हड़काया, उनकी सास तो उनके ऊपर चढ़ी लेटी उन्हें अपने जोबना से दबाये

" हे हमारे ननद के ननद के भतार, चुपचाप लेटे रहो, कोहबर में लगता है आपकी अच्छी तरह से ली नहीं गयी थी , मैं नहीं आयी थीं न तब ता , अभी हाथ बाँध देती हूँ तो ये उछल कूद बंद हो जायेगी, आपकी सास के साये के नाड़े से तगड़ा कुछ नहीं होगा, आप भी क्या याद करोगे ससुराल में सास के साये के नाड़े से हाथ बाँधा गया "

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और मैंने सास के साये को नाड़े को पहले खोला फिर खिंच कर साये से बाहर, अब वो चाह के भी साया नहीं बंद कर सकती थी , और दामाद पास में हो तो सास का साया बंद होना भी नहीं चाहिए

और उसी नाड़े से मैंने नन्दोई जी का एक हाथ पलंग के सिरहाने बाँध दिया लेकिन तब तक सास ने मेरे साये का भी नाडा खिंच लिया

और नन्दोई जी का दायां हाथ सास के साये के नाड़े से और बांया हाथ सलहज के नाड़े से हम दोनों का साया सरक के फर्श पे तो नन्दोई जी का पजामा कैसे बचता वो भी हम दोनों के साये के ऊपर और खड़ा मस्ताया खूंटा बाहर, मैंने उसे छूने की कोशिश की तो सास ने आँख से बरज दिया

अभी ननदोई जी को तड़पाने का काम होना था और सास ने मेरी, कमान अपने हाथ में ले ली।
 
मान गयी मैं अपनी सास को

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आखिर पुराना चावल पुराना ही होता है, वो अपने दामाद के ऊपर, लेकिन इस तरह की सिर्फ उनके जोबन, बल्कि जोबन की नोक, दोनों बड़े बड़े निपल ही दामाद की देह छू रहे थे, रगड़ रहे थे घिस रहे थे, दोनों कंधो के पास से शुरू हो के थोड़ा और नीचे, फिर क्या रगड़ा है उन्होंने अपने दामाद के दोनों मेल टिट्स को अपनी बड़ी बड़ी चूँचियों से,

वो तड़प रहे थे, उछल रहे थे, सिसक रहे थे वो तो मैंने और मेरी सास ने कस कस के चार चार गाँठ न लगाई होती तो वो कबका हाथ छुड़ा लेते,

उफ़ उफ्फ्फ कर रहे थे सिसक रहे थे , लेकिन मेरी सास चाहती भी यही थीं खूब तड़पाना, जिस जोबन को देखने के लिए छूने के लिए मेरे नन्दोई ललचाते रहते थे आज वो खुले खुद ही उनके सीने को रगड़ रहे थे, लेकिन न वो देख सकते थे न छू सकते थे न पकड़ सकते थे सिर्फ मजे से पागल हो सकते थे,

और मेरी सास भले ही ४० पार कर रही हों लेकिन जोबन एकदम टनाटन, खूब कड़े एकदम ठोस, चार चार बच्चों को दूध पिलाया लेकिन आज भी एकदम कड़े, बिना ब्रा के भी चोली फाड़ते थे,

थोड़ा नीचे सरक के कभी वो मेरे नन्दोई के पेट पे कभी जाँघों पे सहला देतीं और एक दो बार जैसे गलती से अनजाने में खड़े खूंटे पे छू गया

और नन्दोई जी चिल्ला उठे,

" अरे सासू माँ, कुछ करिये बहुत मन कर रहा है, " और सास मेरी अपने दामाद के सर के पास बैठ गयीं, झुक के साफ़ साफ़ पूछा उन्होंने

" अरे दामाद जी, का मन कर रहा है साफ साफ़ बोलिये न ससुराल में थोड़े कोई लजाता है "

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" वो वो " अभी भी वो हिचक रहे थे तो मैंने हड़का लिया, " इतना तो तोहार बहिनियो नहीं लजाती, गर्माती है तो खुदे लंड ढूंढ़ती है बोलो साफ़ नहीं तो रात इसी में निकल जायेगी "

" वो आपकी, आपकी,आपका जोबन, चूँची, देख क बहुत मन करता है " वो हकलाते हिचकते बोले,

" अरे का मन करता है जमाई राजा,"

प्यार से गाल सहलाते हुए मेरी सास ने अपने एकलौते दामाद को दुलराया ।

" वो आपकी चूँची चूसने का चूमने का, पहले दिन से ही " उनके दामाद ने कबूला।

और एक हलकी सी चपत उनके गाल पे पड़ी और गालियों की झड़ी भी उनकी सास की,

" अबे चूतिये, स्साले, खानदानी रंडी के जने, तेरी महतारी की गांड मारुं, तीन साल हो गयी बियाह हुए, अभी तक एक बार बोल नहीं फूटे. ....अरे कोहबर में बोल दिए होते तो वही चूसा देती, तेरी बियाहता चूसती थी तो तुझे चूसने में का,.... मैंने पहले दिन ही बोल दिया था बेटे दामाद में फर्क नहीं करती मैं, ले चूस, चूस मनभर के और अब दुबारा पूछा न तो बहोत मारूंगी, न मेरी बेटी से पूछते हो,..."

" न अपनी सलहज से और सलहज से पूछेंगे जिस दिन न उलट के उनकी गांड मार लूंगी, सलहज पे साले से पहले साले के जीजा का हक है" मैंने भी जोड़ा

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और अब सास जी ने अपनी बड़ी बड़ी चूँची नन्दोई जी के मुंह में डाल दी, और नन्दोई जी चुसूर चुसूर चूसने लगे। सास ने मुझे इशारा क्र दिया अब मेरी बारी नन्दोई जी को गरमाने की , मैं मान गयी सास की चालाकी। मैं उन्हें अब कितना भी गरम करूँ तड़पाऊं, बेचारे सिक्स भी नहीं सकते थे उनके मुंह में तो उनकी पत्नी की माँ की बड़ी बड़ी चूँची भरी थी।

मेरी सास ने अपनी बड़ी बड़ी चूँची का इस्तेमाल किया था अपने दामाद की ऐसी की तैसी करने में तो मैंने अपने रसीले लाल लाल भरे भरे होंठों का इस्तेमाल किया, अरे उनकी बीबी मेरे मरद से चुद रही थी, गाभिन हो रही थी तो कुछ मेरी भी तो जिम्मेदारी थी।

मेरे होंठ बस छोटी छोटी चुम्मी, मेरे नन्दोई की जाँघों के पास कभी होंठ रगड़ भी देती, धीरे धीरे चुम्बन के पग धरते मेरे होंठ उसी बदमाश मोटू की ओर बढ़ रहे थे। दो चुम्मी के बीच कभी कभी मैं जीभ से लिक भी कर लेती थी, और जैसे कुतुबमीनार के नीचे पहुंची, बस खूब लम्बी सी जीभ निकाल के, नहीं नहीं 'उस मोटू ' को नहीं चूमा, उसे छुया भी नहीं, बस उसके बेस पे, चारो ओर जीभ की टिप से, फिर बेस पे ढेर सारी चुम्मियाँ,

बेचारे कसमस हो रहे थे, हाथ छुड़ाने की कोशिश कर रहे थे, अपने चूतड़ पटक रहे थे लेकिन सिसक भी नहीं सकते थे, उनके मुंह में तो उनकी सास ने अपनी खूब मोटी सी चूँची पेल रखी थी और दोनों हाथों से दामाद का सर भी पकड़ रखा था,

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कोशिश कर के भी वो नहीं नकाल सकते थे और वैसे भी कौन दामाद अपने मुंह से सास की बड़ी बड़ी रसीली चूँची निकालना चाहता है।

" मोटू' तड़प रहा था, फड़क रहा था, सास भी, सलहज भी लेकिन बेचारे को घुसने को छेद नहीं मिल रहा था।

जैसे गलती से खूंटे के बेस पे चाटते हुए एक बार मेरी जीभ नन्दोई के पगलाए बौराये लंड पे छू गयी जैसे बेचारे को ४४० वोल्ट का झटका लगा हो लेकिन अभी उसे इंतजार करना था, मेरी सास बड़ी थीं पहला नंबर तो इस पर उन्ही का लगना था और वैसे मैं तो न जाने कितने बार हर छेद में नन्दोई का घोंट चुकी थी , इसलिए उसे अभी इन्तजार ही करना था,

और अब मेरे होंठ, कमर के ऊपर और उनका साथ देने के लिए मेरे नाख़ून, जब मेरी जीभ नन्दोई जी की जीभ की गहराई नाप रही थी और साथ में मेरे नाख़ून उनके मेल टिट्स खरोंच रहे थे, ननदोई जी की हालत बहुत खराब हो रही थी तो मेरे होठों ने नाखूनों की जगह ले ली , कुछ देर तक तो मैं चूसती रही और मेरे नाख़ून अब बहुत हलके हलके सिर्फ कभी ऊँगली की टिप कभी नाख़ून उनके खड़े खूंटे के निचले दो तीन इंच पर हलके हलके, कभी जोर से,

और मैंने कस के दांत लगा के उनके मेल टिट्स को काट लिया,

उसी समय मेरी सास ने उनके मुंह से अपनी चूँची निकाल ली और मेरे नन्दोई जोर से चीखे, खूब जोर से। एक पल के लिए तो में भी शाम गयी की कहीं मैंने बहुत जोर से तो नहीं काट लिया और कहीं मेरी सास तो नहीं गुस्सा हो जाएंगी।
 
सास बहू की जुगलबंदी

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वो तो सिसक रहे थे तड़प रहे थे लेकिन जवाब उनकी सास ने दिया, मुझे घूरते हुए

" ऐसे काटते हैं ? "

एक पल के लिए मैं घबड़ा गयी लेकिन सास ने दुबारा बोला तो मैं समझ गयी हम दोनों पैदा ही सास बहू होने के लिए हैं, वो भी एक जनम नहीं सात जनम।

" इतनी हलकी चीख,.... मुश्किल से भरौटी, पठानटोला तक पहुंची होगी, अरे जब तक नन्दोई की चीख उनके मायके तक न पहुंचे और महतारी समझ जाय की उनके लाल की, दुलरुआ की ससुराल में गाँड़ मारी जा रही है हचक हचक के, ....अरे गनीमत मानो ये तुम्हारी ये सलहज नहीं थी तोहरे बियाहे में नहीं तो कोहबर में बिना गाँड़ मारे छोड़ती नहीं "

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" और क्या सलहज का काम ही है कोहबर में नन्दोई की गाँड़ मारना और उसका नेग भी जबरदस्त होता है, ननदोई की कुँवारी बहन। "

मैंने सास जी की बात में हामी भरी लेकिन एक प्रस्ताव भी अपनी ओर से दे दिया, हम तीनों में सबसे बड़ी सास थी, मेरी भी उनकी भी इसलिए उन्ही से पूछा

" तो अब से मार लूँ, अब उस समय नहीं थी, तो नहीं थी,... "

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लेकिन मेरी बात मेरी सास ने काट दी थोड़ा दुलराते थोड़ा हड़काते

" कितनी सोझ बहू है हमारी, अरे ये कोई पूछे की बात है. नन्दोई पूछते हैं का, सलहज की गाँड़ मारने से पहले, ,,,"

ये बात एकदम सही थी की नन्दोई अगर साली सलहज की मारने के पहले पूछें तो रिश्ते की बेइज्जती,

और उन्होंने तो मेरी दर्जा नौ वाली फूल सी कोमल बहन की एकदम कोरी गाँड़ बिना कडुवा तेल लगाए फाड़ दी थी, थूक भी ठीक से नहीं लगाया था, उसकी चीख तो मैंने भी सुनी थी तो मैं क्यों मौका छोडूं , फिर सास का हुकुम,

" दाएं वाले को खूब चूसे हो ज़रा अब बाएं वाले को चूस" और जब तक नन्दोई कुछ समझे उनके मुंहे में मेरी सास की बड़ी बड़ी चूँची,

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और मैं एक बार फिर बिस्तर पर नीचे की ओर

मेरी सास और मेरी जुगलबंदी गजब की थी, बिन बोले हम दोनों समझ जाते थे किसको क्या करना है। अब ननदोई जी का मुंह सास ने अपनी मोटी चूँची से बंद कर दिया था मतलब मुझे लाइसेंस मिल गया था उनकी रगड़ाई करने का, उन्हें गरियाने का।

जैसे गांड मारने की तैयारी की जाती है, एकदम उसी तरह, दो चार मोटी मोटी तकिया मैंने नन्दोई जी के चूतड़ के नीचे लगा के उठा दिया, और प्यार से दोनों नितम्ब सहलाते हुए छेड़ा,

" चलिए कोहबर में तो आपकी गांड बच गयी, आपकी छोटी सलहज अभी आयी नहीं थी, लेकिन अब नहीं बचेगी, और ये मत सोचिये की मैं मारूंगी कैसे, अरे मारने वाली चीज है, चिकनी मक्खन जैसी तो मारी ही जायेगी, और बहुत प्यार से मारी जायेगी, "

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मैंने दो ऊँगली में खूब ढेर सारा थूक लगाया और उनके पिछवाड़े के गोल दरवाजे पे दस्तक दी, बेचारे कुण्डी खटकाते ही छेद दुबक दुबक करने लगा, लेकिन मैंने ऊँगली हटा ली, इरादा मेरा तो अभी उन्हें तड़पाना था, मेरे होंठ मैदान में आ गए, और दोनों नितम्बो पर सैकड़ो चुम्मियों की बरसात होने लगी और धीमे बारिश सीधे सेंटर की ओर, दोनों चूतड़ फैला के एक खूब गीला सा चुम्मा मैंने सीधे गोल दरवाजे पर ले लिया ।

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बेचारे नन्दोई जी, आँखे बंद, हाथ बंधे और मुंह उनके सास के जोबन के नीचे दबा, कुछ कर भी नहीं सकते और जवान सलहज उनके पिछवाड़े के पीछे,

चुम्मा तो शुरआत थी,

मैंने लम्बी सी जीभ निकाली और सीधे पिछवाड़े की दरार पे, आगे पीछे, ऊपर नीचे, जैसे इनके उस स्साले के साथ करती थी जो अभी ननदोई जी की बीबी चोद रहा था।

नन्दोई जी बोल तो नहीं सकते थे लेकिन तड़पते हुए चूतड़ उछाल रहे थे,

थोड़ी देर तक रिम्मिंग करने के बाद मेरे जोबन मैदान में आ गए, और अब वो दोनों कभी नन्दोई जी की चूतड़ पे रगड़ते कभी उस दरार और मैंने जब अपने खड़े निपल उनकी दरार में रगड़ना शरू कर दिया तो अब लगा की मारे जोश के वो दोनों हाथों में बंधे सास और सलहज के पेटीकोट के नाड़े को तोड़ देंगे,

सास ने मुझे इशारा किया, बहुत हो गया अब मजा देने का टाइम आ गया और मैंने बदमाशी बंद कर दी, और जैसे ही सासू जी ने निपल उनके मुंह से बाहर निकाला वो बोले,

" सासु माँ कुछ करिये, न "

सासु ने उनके मुंह पे एक जबरदस्त चुम्मा लिया और बोलीं

मादरचोद,

और उन्होंने मेरी जगह ले ली नीचे खूंटे के पास, मैं नन्दोई जी के सर के पास, और क्या जबरदस्त चुदाई की सास ने मेरी अपनी चूँचियों से नन्दोई जी की।

इसका मतलब ये नहीं मैंने कभी चूँची से चोदा नहीं था या देखा नहीं था, इनके मोबाइल में कितनी फ़िल्में थी, और मैं भी हफ्ते में एक दो दिन तो इन्हे ललचाने तड़पाने के लिए,

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लेकिन जिस तरह से मेरी सास मेरे नन्दोई की रगड़ाई अपनी बड़ी बड़ी चूँचियों से कर रही थीं, वैसा मैंने कभी
 
छुटकी के अपडेट के साथ अब तीनो कहानियों पर जैसा मैंने वायदा किया था की दिवाली के बाद अपडेट दे दूंगी, अपडेट आ गया है।

और अब इन्तजार रहेगा मित्रों के कमेंट्स और टिप्पणियों का।

अभी भी फोरम पर मेरा आना जाना कुछ ऐसा ही रहेगा लेकिन प्लीज कमेंट और लाइक्स में कोताही मत कीजियेगा।
 
फागुन के दिन चार भाग २३

गुड्डी, बनारस की गलियां और शॉपिंग पृष्ठ २९९

अपडेट पोस्ट हो गया है, अब बारी आप सब की

पढ़िए, मजे लीजिये और लाइक्स और कमेंट्स करिये
 
भाग ९४

मस्ती सास और सलहज के साथ - मजा जुबना का

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बेचारे नन्दोई जी, आँखे बंद, हाथ बंधे और मुंह उनके सास के जोबन के नीचे दबा, कुछ कर भी नहीं सकते और जवान सलहज उनके पिछवाड़े के पीछे,

चुम्मा तो शुरआत थी, मैंने लम्बी सी जीभ निकाली और सीधे पिछवाड़े की दरार पे, आगे पीछे, ऊपर नीचे, जैसे इनके उस स्साले के साथ करती थी जो अभी ननदोई जी की बीबी चोद रहा था।

नन्दोई जी बोल तो नहीं सकते थे लेकिन तड़पते हुए चूतड़ उछाल रहे थे,

थोड़ी देर तक रिम्मिंग करने के बाद मेरे जोबन मैदान में आ गए,

और अब वो दोनों कभी नन्दोई जी की चूतड़ पे रगड़ते कभी उस दरार और मैंने जब अपने खड़े निपल उनकी दरार में रगड़ना शरू कर दिया तो अब लगा की मारे जोश के वो दोनों हाथों में बंधे सास और सलहज के पेटीकोट के नाड़े को तोड़ देंगे,

सास ने मुझे इशारा किया, बहुत हो गया अब मजा देने का टाइम आ गया और मैंने बदमाशी बंद कर दी,

और जैसे ही सासू जी ने निपल उनके मुंह से बाहर निकाला

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वो बोले,

" सासु माँ कुछ करिये, न "

सासु ने उनके मुंह पे एक जबरदस्त चुम्मा लिया और बोलीं मादरचोद,

और उन्होंने मेरी जगह ले ली नीचे खूंटे के पास, मैं नन्दोई जी के सर के पास, और क्या जबरदस्त चुदाई की सास ने मेरी अपनी चूँचियों से नन्दोई जी की।

इसका मतलब ये नहीं मैंने कभी चूँची से चोदा नहीं था या देखा नहीं था, इनके मोबाइल में कितनी फ़िल्में थी, और मैं भी हफ्ते में एक दो दिन तो इन्हे ललचाने तड़पाने के लिए,

लेकिन जिस तरह से मेरी सास मेरे नन्दोई की रगड़ाई अपनी बड़ी बड़ी चूँचियों से कर रही थीं, वैसा मैंने कभी सोचा भी नहीं था,

बेचारे नन्दोई तड़प रहे थे, हाथ बंधे आँख बंद और सासु माँ, सिर्फ अपनी भारी भारी ३८ + साइज के जोबन से उनके ऊपर से नन्दोई जी के सीने से सहलाते हुए, फिर पेट और पूरा जोबन भी नहीं बस खड़े गरमाये निपल,

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और जब मामला खूंटे का आया, वो एकदम खड़ा फनफनाया, उनकी बड़ी बड़ी चूँचियों से दबा कुचला रहा जा, और जब वो उठीं तो दोनों हाथों से अपनी चूँची पकड़ के मेरे नन्दोई का मोटा बांस अपनी चूँची के बीच कस कस के रगड़ने लगी।

" उफ़, ओह्ह्ह, सासू माँ, क्या कर रही हैं, " नन्दोई मेरे तड़प रहे थे, चूतड़ उठा रहे थे लेकिन मैंने और मेरी सास ने हाथ दोनों उनके कस के बांधे थे,

" जो बहुत पहले करना चाहिए, बोल अपनी माँ के भंडुए, मेरे जोबन देख के ललचाता था की नहीं, "

सास ने दोनों उभारों के बीच में कस के नन्दोई जी के मोटे बांस को रगड़ते बोला,'

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" हाँ हाँ, कोहबर से ही "

नन्दोई जी ने सच उगल ही दिया, और मेरी सास के जोबन सच में ऐसे ही थी की कोई मचल जाए, फिर एकदम टाइट लो कट चोली और आँचल उनका गिरता ज्यादा था सम्भलता कम था।

" तो आज से पहले बोले क्यों नहीं, तीन साल से बेचारा मेरा दामाद तड़प रहा था "

सास ने प्यार से उनके उभारों से झांकते हुए सुपाड़े को कस के चूमते हुए प्यार से पूछा,

उनकी सहलहज थी न जवाब देने के लिए उनकी ओर से, मैं अब नन्दोई की के सर की ओर बैठी थी, प्यार से उनके गाल को सहलाते मैं बोली

" अरे तब उनकी ये वाली छोटी सलहज नहीं आयी थीं न "

और नन्दोई जी के मेल टिट्स को कस के नाख़ून से नोंचते नन्दोई जी से बोली

" अरे ननद रानी से तो कबड्डी अपने मायके में रोज बिना नगा खेलते हैं, आगे से सुसराल आइयेगा न तो बस सास और सलहज, हाँ की ना "

" हाँ, हाँ दस बार हाँ "

मस्ती में नन्दोई जी बोले, यही तो मैं चाहती थी की जब मेरी ननद मायके आये तो उनके मैदान में मेरे मरद का झंडा गड़े जैसे अभी वो गाड़ रहे होंगे और वो बिना नन्दोई जी को पटाये हो नहीं सकता था।

और सास ने भी अपनी दोनों चूँचियों से कस कस के नन्दोई को चोदना शुरू कर दिया,

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सास की कड़ी कड़ी चूँचियों की रगड़, नन्दोई जी की हालत खराब हो रही थी, बीच बीच में सास कभी कभी उनका खुला मोटा सुपाड़ा चूसना शुरू कर देती थीं तो कभी अपनी समधन को गरियाना शुरू कर देतीं,

"अब कभी सास, सलहज से लजाये न तो तोहार गांड तो बाद में मारूंगी तोहरे महतारी क गांड पहले मारूंगी,"

मैं क्यों पीछे रहती मैं नन्द की ननद के पीछे,

" एकदम सासू माँ आप इनकी महतारी क मारिएगा, मैं इनकी बहन की मारूंगी, क्यों ननदोई जी कैसा है माल, है न लेने के लायक "

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बेचारे क्या बोलते लेकिन बिना उनकी मुंह से उनके बहन के बारे में अच्छी अच्छी बात सुने जो छोड़ दे वैसी सलहज मैं नहीं थी,

" इसका मतलब, आपको सास, सलहज की नहीं चाहिए " मुंह फुलाकर मैं बोली,

" नहीं नहीं एकदम नहीं, " जल्दी से वो बोले, तो मैंने तुरंत रगड़ा

"तो फिर बोलिये न की बहन आपकी पेलने लायक है की न हाँ की ना"

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" हाँ "

किसी तरह कबूला उन्होंने और सास ने विजयी भाव से मेरी ओर देखा यही तो वो भी सुनना चाहती थी और अब ननदोई जी ने सास की चिरौरी शुरू कर दी,

" सासू जी करिये न बहुत मन कर रहा है "

" का मन कर रहा है, अपनी माई के भतार, बोलने में तो गांड फट रही है करोगे का "

सास ने और उकसाया और मैंने नन्दोई के कान में बोल दिया,

" अरे साफ़ साफ़ बोलिये, सास को ऐसे ही सुनना अच्छा लगता है "

" चोदने का मन कर रहा है , "

नन्दोई जी ने बोल दिया, और अब मैं एकदम सलहज, मैंने सास की ओर से शर्त रख दिया,

" नन्दोई जी तुंही कह रहे हो की बहन तोहार पेलने लायक हो गयी है, ....तो अब तोहरी ससुराल में पेली जायेगी, ....हां की ना "

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सास चढ़ी दामाद पे,

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" इसका मतलब, आपको सास, सलहज की नहीं चाहिए " मुंह फुलाकर मैं बोली,

" नहीं नहीं एकदम नहीं, " जल्दी से वो बोले, तो मैंने तुरंत रगड़ा

"तो फिर बोलिये न की बहन आपकी पेलने लायक है की न हाँ की ना"

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" हाँ "

किसी तरह कबूला उन्होंने और सास ने विजयी भाव से मेरी ओर देखा यही तो वो भी सुनना चाहती थी और अब ननदोई जी ने सास की चिरौरी शुरू कर दी,

" सासू जी करिये न बहुत मन कर रहा है "

" का मन कर रहा है, अपनी माई के भतार, बोलने में तो गांड फट रही है करोगे का " सास ने और उकसाया और मैंने नन्दोई के कान में बोल दिया,

" अरे साफ़ साफ़ बोलिये, सास को ऐसे ही सुनना अच्छा लगता है "

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" चोदने का मन कर रहा है , " नन्दोई जी ने बोल दिया, और अब मैं एकदम सलहज,

मैंने सास की ओर से शर्त रख दिया,

" नन्दोई जी तुंही कह रहे हो की बहन तोहार पेलने लायक हो गयी है, तो अब तोहरी ससुराल में पेली जायेगी, हां की,... ना "

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" हाँ, हाँ दस बार हाँ,... लेकिन, "

वो बेचारे बोले और सास जी से दामाद का दुःख देखा नहीं गया और वो दामाद के ऊपर चढ़ गयीं और उन्होंने तड़पाया नहीं सीधे एक बार में ही

क्या कोई मर्द बेरहमी से कुचल कुचल कर गौने की रात चोदेगा अपनी दुल्हन को जिस तरह से सासू जी नन्दोई के ऊपर चढ़ी थी।

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मैं चकित होकर सास जी को देख रही थी और सीख रही थी।

असल में जिस दिन मैं गौने उतरी थी,

उसी दिन से, मेरी सास, मेरी सास होने के साथ साथ, मेरी गुरु और सहेली भी थी।

गौने के एक दो दिन बाद, मैं इनके पास से आयी थी, और सास, उनकी कुछ सहेलियां, मेरी गाँव की जेठानियाँ बैठी थी, मैं पाँव छूने के लिए झुकी तो इनकी मलाई का एक कतरा, मेरी जाँघों से सरक के मेरे महावर लगे पैर, गौने की नयी नयी दुल्हिन का गाँव की सासो और जेठानियों से कुछ बचता तो है नहीं, एक दो वो देख के मुस्कराने लगी, मेरी सास ने ही बात सम्हाली, मैं एकदम लजा गयी, घबड़ा भी गयी,

" अरे नयी नयी दुल्हिन के तो मांग में सिन्दूर दमकता रहे, और बिल से मलाई छलकती रहे तभी तो पता चलेगा की गौने क दुल्हिन है "

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और एक दो दिन बाद, मजाक में उन्होंने मेरे साये में हाथ डाला, बिल बजबजा रही थी,

उनके लड़के की मलाई से, एक पोर ऊँगली उन्होंने अंदर की और एक सीख दी जो जिंदगी भर की थी,

" मरद का तो काम ही है चढ़ना और औरत क काम है चढ़वाना, आखिर तोहार महतारी भेजी है और हम लाये हैं इसलिए, लेकिन एक काम करो, जैसे कभी मूतवास लगती है और जगह नहीं है मौक़ा नहीं है तो का करोगी, "

" कस के भींच लूंगी" मैंने सास को बता दिया।

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" बस उसी तरह से दिन में पांच दस बार कर के खूब धीरे धीरे, ...अच्छा तुम मेरे तो अंदर, ...तो मैं सिखाती हूँ "

मैंने सास की बिल में ऊँगली डाली,

मैं सोच रही थी एकदम चौड़ी होगी, असली भोंसड़ा, उम्र में मुझसे दूनी तो थी ही, मेरे मरद के आलावा भी तीन बच्चे निकल चुके थे वहां से, मेरे जेठ, दो ननदें, लेकिन मैं चौंक गयी, एकदम टाइट। मेरी जैसी तो नहीं लेकिन कोई भी नहीं कह सकता था की यहाँ से चार चार बच्चे निकल चुके हैं एकदम लड़कोर नहीं लग रही थीं,

बड़ी मुश्किल से दो पोर घुसी और सास ने बुर अपनी भींच ली और मुझसे हंस के बोली,

"चल बहु निकाल, देखीं तोहार महतारी का सीखा के हमरे बहू को भेजी है "

इतना कस के उन्होंने सिकोड़ी थी की मेरी ऊँगली बाहर निकलने के कौन कहे, हिल नहीं सकती थी। ऊपर से बोलीं अभी तो आधा जोर लगाई हूँ,

मैं तुरंत चिरौरी करने लगी मुझे भी सीखना है, पहले तो उन्होंने चिढ़ाया,

" तोहार मंहतारी गिरवी रखवाउंगी, " फिर दुलार से बोली

" अरे पगली तोहें नहीं सिखाऊंगी तो किसको सिखाऊंगी, अरे आधा दर्जन हमरे पोती पोता होंगे तो उसके बाद भी तेरी वैसे टाइट रहेगी, जैसी आज है "

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और सास ने सब ट्रिक सिखायी, अब मैं भी करीब करीब उतना ही कस के, और बिल के टाइट रहने की गारंटी,

लेकिन जो आज मैं देख रही थी, सीख रही थी वो तो एकदम ही अलग, सास के बेटे के ऊपर चढ़ कर कितनी बार,

लेकिन आज सास जी मेरे नन्दोई की जैसे ली,

उफ्फ्फ,

पहले तो बहुत प्यार से दुलार से, धीरे धीरे, झुक के कभी नन्दोई जी के गाल चूम लेती कभी होंठ, (ननदोई जी की आँख तो हम सास बहू ने बाँध दी थी उनके सास और सलहज की चोली से, तो वो देख तो सकते नहीं थे, )

और कभी झूमते हुए वो होंठ, नन्दोई जी की छाती पर चुंबन की बारिश कर देतीं, सास के बड़े बड़े जोबन भी बस हलके से नन्दोई जी के सीने पे, धक्के भी बस हलके हलके और साथ में नन्दोई जी भी नीचे से अपने चूतड़ उठा उठा के, कभी सास जी रुक भी जाती बस नन्दोई जी नीचे से,

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और दो चार मिनट में ननदोई मेरे जब एकदम गरमा जाते तो सास फिर ऐसी रगड़ाई करतीं उनकी, क्या कोई खेला खाया प्रौढ़ मरद एकदम कच्ची कली की करेगा, सास जी के होंठ अब नन्दोई जी के होंठ चूमते नहीं, कस के चूसते, कभी कभी वो होंठों को मुंह में ले के काट लेती, उनके नाख़ून कभी कंधे पर, कभी पीठ पर सिर्फ धंसते, चुभते ही नहीं थे, लकीर भी खिंच दे रहे थे और सबसे बुरी हालत ननदोई जी के मेल टिट्स की थी, कभी जीभ से हलके हलके फ्लिक कर के उसे खड़ा कर देती और फिर दांतों से कचकचा के काट लेतीं, और नन्दोई जी को चीखने की इज्जाजत नहीं थी, सिसकी भी निकली तो गालियों की बारिश,

" चुदवा चुप चाप, जरा भी आवाज निकली न तो तेरी माँ चोद दूंगी, दोनों हाथों की मुट्ठी से उसकी गांड मारूंगी, माँ चुदवाने का मन हो तो स आवाज निकाल, जरा भी हिला न तो, "

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और सास के धक्के भी एकदम तूफानी और उस समय ननदोई जी को हिलने की भी इजाजत नहीं थी। खुद उछल उछल कर और मैं पक्का श्योर थी की बीच बीच में नन्दोई जी का मोटा मूसल वो कस के निचोड़ भी रही थीं, लेकिन नन्दोई मेरे लम्बी रेस के घोड़े थे और पक्के चुदक्कड़

जब पूरा खूंटा अंदर घोंट लेतीं तो बस कई बार धक्के बंद और रगड़ रगड़ के घिस्से लगाती अपनी बुर के बेस से अपने दामाद के लंड के बेस पे और गरियाती साथ में

" बहुत चोदा है न मेरी बेटी को, आज उसकी माँ चोद रही है तुझे, क्यों पता चल रहा है चुदवाने का मजा, "

" हाँ सासु माँ , हाँ " सिसकते वो नीचे से अपने चूतड़ उठाते धक्के मारते बोलते, " बहुत मजा आ रहा है "

और मैं भी अपने नन्दोई को छेड़ती,

" बहुत कम लोग होते होंगे जिन्हे माँ बेटी दोनों को चोदने का मजा मिला हो, ये तो मेरी सास ननद हैं "

और सोचती की मेरे मरद को भी मिलेगा ये मजा, माँ बेटी दोनों को चोदने का मजा, ननदोई जी ने तो पहले बेटी का मजा लिया और अब उनकी माँ चोद रहे हैं लेकिन मेरा मरद, मेरी ननद को चोद चोद कर माँ बना रहा है, फिर उन की बेटी को भी, एडवांस बुकिंग,

" ये मजा स्साले अपनी माँ के भंडुए तुझे तीन साल पहले ही मिल जाता, ये तो तेरी सलहज, मेरी बहू है जिसने तुझे ये मजा दिलवाया " ऊपर से धक्के मारते मेरी सास बोलतीं,

लेकिन अब वो थोड़ी तक रही थीं और उनके दामाद भी मेरी बार बार फुसफुसा के मिन्नत कर रहे थे, " सलहज जी बस एक बार हाथ खोल दीजिये "
 
मां-बेटी दोनों का मजा

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" बहुत चोदा है न मेरी बेटी को, आज उसकी माँ चोद रही है तुझे, क्यों पता चल रहा है चुदवाने का मजा, "

" हाँ सासु माँ , हाँ " सिसकते वो नीचे से अपने चूतड़ उठाते धक्के मारते बोलते, " बहुत मजा आ रहा है "

और मैं भी अपने नन्दोई को छेड़ती,

" बहुत कम लोग होते होंगे जिन्हे माँ बेटी दोनों को चोदने का मजा मिला हो, ये तो मेरी सास, ननद हैं,.... "

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और सोचती की मेरे मरद को भी मिलेगा ये मजा, माँ बेटी दोनों को चोदने का मजा,

ननदोई जी ने तो पहले बेटी का मजा लिया और अब उनकी माँ चोद रहे हैं

लेकिन मेरा मरद, मेरी ननद को चोद चोद कर माँ बना रहा है, फिर उन की बेटी को भी, एडवांस बुकिंग,...गाँव देहात में तो वैसे ही लौंडिया जल्दी जवान हो जाती हैं और वो तो मेरी ननद ऐसी महा छिनार के कोख से जनी, बचपन से ही देख देख के, जयादा इन्तजार नहीं करना पड़ेगा मेरे मर्द को,

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टिकोरे कुतरने का, और मेरी ननद ने तो बोला है वो खुद ही अपने हाथ से और फिर माँ बेटी दोनों एक साथ मेरे मरद के आगे

" ये मजा स्साले अपनी माँ के भंडुए तुझे तीन साल पहले ही मिल जाता, ये तो तेरी सलहज, मेरी बहू है जिसने तुझे ये मजा दिलवाया "

ऊपर से धक्के मारते मेरी सास बोलतीं,

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लेकिन अब वो थोड़ी थक रही थीं और उनके दामाद भी मेरी बार बार फुसफुसा के मिन्नत कर रहे थे, "

"सलहज जी बस एक बार हाथ खोल दीजिये "

अब मैं उनकी बीबी को अपने मरद से चुदवा रही थी, गाभिन करवा रही थी तो मेरा भी तो कुछ फर्ज बनता है और मैंने दोनों हाथ खोल दिए बस क्या था

गाडी नाव पर और मैं अपने नन्दोई के साथ खुलकर

सास नीचे लेटी,

उनकी दोनों टाँगे मेरे ननदोई के कंधे पर, जाँघे एकदम खुली,

और सास को नन्दोई और सलहज ने आपस में बाँट लिया।

नीचे का हिस्सा नन्दोई का ऊपर का सलहज का।

जोबन दोनों मेरे हिस्से में आये और मैंने कस के मसलना चूसना रगड़ना शुरू कर दिया,

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सासू की प्रेम गली नन्दोई के हिस्से में आयी थी और उनका हर धक्का हथौड़ा छाप था।

बहुत दिनों बाद मेरी सास चुद रही थीं, और वो भी अपने दामाद से बहू के सामने। और मजे से चीख रही थीं, सिसक रही थीं

" बेटी को बहुत चोदा मेरी आज माँ को भी चोद लो, हाँ ऐसे धक्के मारो, और जोर से, ओह्ह उफ्फ्फ "

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और मैं एक अच्छी बहू की तरह सास की तकलीफ और बढ़ा रही थी, उस चुदती बुर के क्लिट को उनकी बहू की उँगलियाँ पहले सहलाती रही फिर कस के दबा दिया,

सास वैसे भी खूब गरमाई थीं, अब दामाद के इन तूफानी धक्कों ने और बहू की बदमाशी ने उन्हें झड़ने के करीब ला दिया,

" हाँ ऐसे ही करो, रुको नहीं , बहू तो भी न, ओह्ह क्या करती है छिनार, .....तेरी माँ की, "

सास चूतड़ पटक रही थीं, चीख रही थी

और जब मेरे नन्दोई ने पूरा बांस निकाल के एक जोर के धक्के से सीधे बच्चेदानी पे चोट मारी तो सास ऐसे काँप रही थी जैसे बिजली के झटके लग रहे हो, आँखे उलट सी गयी, मारे मस्ती के दोनों हाथो से उन्होंने बिस्तर की चादर पकड़ ली

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वो झड़ रही थीं लेकिन न उनका दामाद रुका न उनकी बहू,

मैं यही सोच रही थी की सास के मन में क्या चल रहा होगा, यही की ऐसी बहू और दामाद हर सास को मिले,

मेरे ननदोई के धक्के जारी थे,

मैंने उनके आँख पर बंधा ब्लाइंडफोल्ड भी खोल दिया था, मैं भी क्लिट को रुक रुक के रगड़ मसल रही थी,

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सास मेरी बार बार झड़ रही थीं, सास की प्रेम गली बार बार सिकुड़ रही थी, फ़ैल रही थी लेकिन उन्होंने ऐसा ट्रेन कर रखा था अपनी मसल्स को उस सिकुड़ने, फैलने से मेरे ननदोई का मूसल वो इतने जोर से निचोड़ रही थी की थोड़ी देर में ननदोई भी उनके साथ और कस के उन्हें भींच के अपनी सास के अंदर झड़ते रहे, आठ दस मिनट दोनों जोड़े से पड़े रहे

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बस मेरे दिमाग में एक ही बात आ रही थी बार, बार जैसे आज मेरी सास खुल के मेरे सामने अपने दामाद से चुद रही थीं,

वैसे जल्द, बल्कि बहुत जल्द अपने बेटे से चुदे, मेरे सामने

और जब नन्दोई जी हटे, तो बूँद बूँद कर उनकी मलाई उनकी सास की बिल से, जहाँ से उनकी पत्नी निकली थीं, वहीँ से रिस रिस कर उनकी जाँघों पर,

बहुत कम लोग हैं जिन्हे माँ बेटी दोनों को लेने का सुख मिलता है

दोनों लोग एकदम थक कर चूर थे और मैं भी साथ में लेटी रही,

अभी नन्दोईजी को कम से कम आधा घंटा तो लगेगा ही फिर से चार्ज में लेकिन तभी मुझे याद आयी दारु की वो बोतल जो मैं नन्दोई जी के कमरे से ले आयी थी, उसकी एक एक चुस्की और थकान थोड़ी कम हुयी

सास मेरी, सच में,

मुझे चिढ़ाते छेड़ते उकसाते बोलीं ,

" तोहरे नन्दोई की मलाई है "

और ननदोई जी को दिखाते हुए, सास की कटोरी पे मैं टूट पड़ी पहले दोनों हाथों से जाँघों को खूब फैलाया और जाँघों पर गिरी हुयी फैली हुई मलाई को नन्दोई जी को दिखाते हुए जीभ निकाल के उसकी टिप से चाट लिया,

नन्दोई जी की हालत खराब, हो तो हो, जिस तरह से मेरी सास को कुचला था उन्होंने मेरी तबियत खुश कर दी थी उन्होंने।

और फिर दोनों होंठ सास जी की कुप्पी पे, हलके से फांक को फैला के चुसूर चुसूर, अपने नन्दोई की मलाई और मन में सोच रही थी बस दो तीन दिन और, एक बार ननद नन्दोई जी चले जाएँ, फिर तो इसी कुप्पी में से अपने मर्द की मलाई भी खाउंगी, मेरी जीभ अंदर घुस के कुप्पी की दीवालों को चाट चूस के मलाई की एक एक बूँद चाट रही थी,

लेकिन इस बुर चटाई और चुसाई का असर ये था की सास एक बार फिर से सिसकी भरने लगी, गरमा गयी

यही तो मैं चाहती थी, और अब ननदोई जी को दिखा दिखा के मैं सास की चंपा कली चूस रही थी, दोनों फांको को फैला के कभी दो ऊँगली अंदर करती और जैसे ननदोई जी का लंड मजे ले रहा अपनी सास की बुर में, मेरी उँगलियाँ मजे ले रही थीं अपनी सास की बुर में। होंठ भी खाली नहीं थे वो क्लिट की चुसम चुसाई कर रहे थे।

और अब यह देख के नन्दोई जी का औजार फुदकने लगा था, दो कन्यायों की प्रेम लीला से बड़ा उत्तेजक कुछ नहीं है मरद के लिए।
 
सास बहू की मस्ती

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सास मेरी, सच में,

मुझे चिढ़ाते छेड़ते उकसाते बोलीं , " तोहरे नन्दोई की मलाई है "

और ननदोई जी को दिखाते हुए, सास की कटोरी पे मैं टूट पड़ी

पहले दोनों हाथों से जाँघों को खूब फैलाया और जाँघों पर गिरी हुयी फैली हुई मलाई को नन्दोई जी को दिखाते हुए जीभ निकाल के उसकी टिप से चाट लिया,

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नन्दोई जी की हालत खराब, हो तो हो, जिस तरह से मेरी सास को कुचला था उन्होंने मेरी तबियत खुश कर दी थी उन्होंने।

और फिर दोनों होंठ सास जी की कुप्पी पे, हलके से फांक को फैला के चुसूर चुसूर, अपने नन्दोई की मलाई और मन में सोच रही थी बस दो तीन दिन और, एक बार ननद नन्दोई जी चले जाएँ,

फिर तो इसी कुप्पी में से अपने मर्द की मलाई भी खाउंगी, मेरी जीभ अंदर घुस के कुप्पी की दीवालों को चाट चूस के मलाई की एक एक बूँद चाट रही थी,

लेकिन इस बुर चटाई और चुसाई का असर ये था की सास एक बार फिर से सिसकी भरने लगी, गरमा गयी

यही तो मैं चाहती थी,

और अब ननदोई जी को दिखा दिखा के मैं सास की चंपा कली चूस रही थी, दोनों फांको को फैला के कभी दो ऊँगली अंदर करती और जैसे ननदोई जी का लंड मजे ले रहा अपनी सास की बुर में, मेरी उँगलियाँ मजे ले रही थीं अपनी सास की बुर में।

होंठ भी खाली नहीं थे वो क्लिट की चुसम चुसाई कर रहे थे।

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और अब यह देख के नन्दोई जी का औजार फुदकने लगा था, दो कन्यायों की प्रेम लीला से बड़ा उत्तेजक कुछ नहीं है मरद के लिए।

" हे अकेले अकेले बुर रानी क मजा लेबी छिनार क जनी"

मेरी सास मुझे चिढ़ाते अपनी समधिन को गरियाते बोलीं,

और थोड़ी देर में सास बहू 69 की पोज में थे,

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इससे पहले कितनी बार हम सास बहू ने ये मजे लिए थे,

लेकिन आज असली खेल तो नन्दोई जी को तड़पाने के लिए हो रहा था, ये रात वो कभी न भूले और जब भी ससुराल आएं सीधे सास, सलहज के साथ, ( मतलब ननद मेरे मरद के साथ )।

मेरी सास भी पक्की चूत चटोरी, कटोरी के अंदर जीभ डाल के करोच करोच के चाटना मैंने उन्ही से सीखा था, हम दोनों साइड में एक दूसरे को पकडे, लेकिन मेरी सास खूब चालाक, वो जानती थी उनके बहू के बड़े बड़े कसे कसे चूतड़, उनके दामाद को कैसे पागल करते हैं तो बस, उन्होंने मुझे इस तरह दबोच रखा था की मेरे चूतड़ उनके दामाद को दिख तो रहे थे एकदम पास में भी, चाहें तो हाथ बढ़ा के छू ले,

जैसे वो नीली पीली फिल्मो में करते हैं न, खूंटा कभी भी अंदर पूरा नहीं धंसता, कैमरे के लिए थोड़ा सा बाहर, और दया तो मुझे उन लड़कियों पे आती हैं, कितनी बुरी तरह से टाँगे फैला के रखना पड़ता है, इसलिए नहीं की मूसल अंदर घुस जाए, इस लिए की कैमरे की निगाह में, क्लोज अप में वो साफ़ साफ़ दिखे, ऊपर चढ़ के भी चोद रही है तो झुकना मुश्किल है, जिससे अंदर बाहर जाता मूसल दिखे,

तो बस एकदम उसी तरह से मेरी सास भी, चाट मेरी चाट रही थीं, लेकिन पत्ता और सब मसाला अपने दामाद को दिखा रही थीं मेरा,

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और वो तो अपने सलहज के दीवाने,

बस थोड़ी देर में ही खूंटा उनका एकदम तैयार खड़ा,

लेकिन आज हम सास बहू की बदमाशियां भी परवान चढ़ी थी, न मेरी सास ने मुझे झड़ने दिया न मैंने सास को, हाँ सास बोलीं,

" देख ये अपनी महतारी क भंडुआ ललचा रह है सास, सलहज को देख के एक बार फिर से इसकी आँख बंद कर "

" अरे नहीं, ललचाने दीजिये न ससुराल में सास सलहज को देख के नहीं ललचाएगा तो किसको देख के, एक छोटी साली थी वो भी अपने बड़े भैया से मरवाने मुम्बई चली गयी। हाँ हाथ पैर बाँध देते हैं , हम लोगो को हाथ नहीं लगाएगा, जब तक हम लोग नहीं चाहेंगे "

मैं नन्दोई जी को देख के चिढ़ाते बोली

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सास और सलहज के पेटीकोट के नाड़े से नन्दोई जी मिनट भर में बंध गए, देखें ललचाये लेकिन और मेरी सास ने एक और पाबंदी लगा दी

" रंडी के जने, अगर एक आवाज निकली न तो तोहरी महतारी को नंगे नचाउंगी इसी अँगने में "

" वो भी इन्ही के सामने, " मैंने सास की बात में बात जोड़ी अच्छी बहू की तरह,

और हम दोनों सास बहू फिर चालु हो गए, लेकिन आपस में नहीं नन्दोई जी के साथ।

खूंटा उनका जबरदस्त खड़ा था, और सास ने मुझे खा देख तेरे नन्दोई का खूंटा, महतारी के नंगे नाचने के नाम से कैसा खड़ा हो गया, "

और साथ में मेरा सर उन्होंने जबरदस्ती नन्दोई के खड़े लंड पर
 
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