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भाग ११२ -अगला दिन, बुच्ची और इमरतिया
२८,९९,७५२
रात अपनी सितारों जड़ी काली मखमली चादर समेट कर लौटने का जतन कर रही थी।
भोर अभी आँखे मिचमिचा रही थी, धीरे धीरे आसमान का काला रंग सलेटी हो रहा था, बाहर के हिस्से में मरद सब अभी भी गहरी नींद में सो रहे थे,
मंडप में हलकी लालटेन जल रही थी, वो भी किसी ने बुझा दी।
धीरे धीरे एक कमरे से दो छायाएं निकल के चौखट पे बैठ गयीं।
चेहरा मोहरा कुछ नहीं दिख रहा था, हल्का जाड़ा, मोटी चादर में लिपटी, और चारो ओर देख कर उन दोनों लोगों ने कुछ सोचा की एक कमरे से दो और, ...
साफ़ दिख रहा था, एक औरत और एक लड़की, वो भी बिन बोले बगल में आ के बैठ गयीं। लेकिन वो लड़की बार बार सीढ़ी की ओर देख रही थी,
सीढ़ी का दरवाजा खुला, और हंसती खिलखिलाती, पहले दो औरतें, फिर दो लड़कियां और फिर एक औरत,
और वो लड़की आ के पहले से बैठी लड़की के बगल में बैठ गयी, सीधे उसके गले में हाथ डाल के एकदम चिपक के, जैसे न जाने कब की बिछुड़ी हों,
भोर उठ गयी थी, अलसाते हुए, अंगाई लेते, झुक के अपने पैरो में अरुणिम महावर लगा रही थी,
और जो सबसे पहले आके बैठी थीं, उनका चेहरा अब थोड़ा थोड़ा दिख रहा था,
कांती बूआ, बुच्ची की बड़ी मौसी. उन्होंने पराती शुरू की और उनके बगल में बैठी, उनके साथ ही आयी, सूरजु की छोटी मामी, वो भी साथ साथ,...
भयी भिनसार, अरे चिरैया लगी बोलेन, अरे मुरग लगे बोले
अरे स्वामी, अहिरा चरावें धेनु गैया,
और रामपुर वाली भौजी ने वही लाइन दुहराना शुरू की, और अपनी छोटी बहन चुनिया की ओर देखा, जो अपनी सहेली बुच्ची से कुछ फुसफुसा रही थी,
और अब सब लोग शामिल हो गए, और सबसे तेज आवाज इमरतिया और मुन्ना बहु की
भयी भिनसार, अरे चिरैया लगी बोलेन, अरे मुरग लगे बोले
अरे स्वामी, अहिरा चरावें धेनु गैया,
भोर महावर लगे पैरों से, चिड़ियों की चहचहाहट की पायल झनकाती,.... धीरे धीरे धरती के आंगन में उतर रही,
अब मांडव में सबकी शक्ल हलकी हलकी दिखने लगी थी,
सब जाड़े में चिपकी, दुबकी, सबसे पहले कांती बुआ और छोटी मामी, रातभर वो दोनों बड़की ठकुराइन के साथ ही, एक की भौजाई एक की ननद , एक ही रजाई में तीनो घुसिरि मुसुरी थीं, और भोर जगाने भोर होने के साथ मांडव में,
फिर रामपुर वाली भौजी अपनी छोटी बहन चुनिया के साथ और ऊपर से कोहबर की रखवार पांचो जने, सबसे आगे मंजू भाभी, पीछे इमरतिया, उसके बाद खिलखिलाती बुच्ची और शीला, और सबसे पीछे मुन्ना बहू। शीलवा तो अपने घरे चल गयी, बाकी सब वहीं मांडव में
और अबकी मंजू भाभी ने अगला भोर जगाने का गाना शुरू किया,
जाई जगावो राजा दसरथ
हाथ मुंह धोवैं, भैंसी दुहावें
जायी जगावव रानी कौशल्या
हाथ मुंह धोवें, कलश भरी लावें हों
दहिया बिलोरे हों,
और सब लोग अगली लाइन दुहरा रहे थे,
सुबह धीरे धीरे अलसाते, पूरब की ओर से पेड़ो की फुनगियों पर, घर की छत पर उतर रही थी.
जैसे कोई सुहागन मांग में सिन्दूर भर रही हो,... खूब चटक और और आँखों में पिया समाये हों. बस उसी तरह की सिंदूरी लाली छिटक रही थी,
घर से थोड़ी दूर किसी मुर्गे ने बांग दी, बाहर गाय ने रंभाना शुरू कर दिया था , और आँगन में भी अँधेरा कम हो गया था,
मंझली मामी भी आ के बैठ गयी मांडव में और अबकी रामपुर वाली ने शुरू किया, और उनका हर गाना चुनिया अच्छी तरह जानती थी, सगी बहने और बहनों से बढ़ के सहेली, ...
और चुनिया बुच्ची तो एक जान, तो बस रामपुर वाली भौजी के साथ चुनिया और बच्ची ने पहली बाकी लोगों ने दुहराना शुरू किया
अरे भोर भये भिनसरवा, धरमवा की जुनिया
चिरइया बन बोलई, मिरिग बन चुन्गई।
अरे जाई के जगाओ, सूरजु सिंह के बाबा, सूरजु सिंह के चाचा
चलयी क दुहनिया
मचियहिं बैठी भवानी मैया, दहिया बिलोरे
अरे केथुआ क है तोहरे खईलरी , केथुआ क मथानी।
अरे कौन चरित तोरे अंचरा, त दहिया बिलोरउ।
नाही मोरे धेनु बकेन , तो नाही मोरे ओसर,
अरे दहिया तो आवे कमोरियन, दुधवा तो नारी बहे
अरे सोनवा क मोरे खईलारी,रुपवा क मथानी।
अरे रतनचरित मोर अंचरा, त दहिया बिलोरनि।
अरे बाढई दही के दहेड़िया, धिया के गागरी।
अरे बाढ़इ बिटियन क नैहर , पतोहियन क सासुरु
( सबेरा हो गया है, धरम की बेला है। चिड़िया बोलने लगी और मृग वन में चारा खोजने निकल पड़े। अरे जा के सूरजु सिंह के बाबा, चाचा को जगाओ, गाय दुहने का समय हो गया है। माँ भवानी मचिया पर बैठकर दही बिलो रही हैं। माँ आपकी कमोरी और मथानी किस की बनी है ? आपके आँचल का क्या प्रताप है ?
माँ कहती हैं की, मेरी गायें दूध देने वाली हैं बाँझ या ऊसर नहीं। सोने की कमोरी और चांदी की मथानी है। रतनजड़ित मेरा आँचल पुण्य से भरा है।
दूध तो इतना भर कर आता है की नालियां बह उठती हैं, और कमोरी हरदम दही से भरी रहती है।
माँ आशीष देती हैं की दही रखने वाला बर्तन हरदम भरा रहे, बेटी की गागर छलकती रहे। बहुओं की ससुराल और बेटियों का मायका बढे। )
सब लोग तारीफ़ से रामपुर वाली को और चुनिया को देखने लगे, इतना पुराना गाना, और इतना लम्बा गाना, लेकिन कांती बूआ ने अगला गाना टेर दिया, रसम का तो पांच गाना होता है, हाँ उसके बाद भले मजाक मस्ती हो, लेकिन रस्म के गाने में पांच से कम नहीं और बुआ तो सात कम से कम
ग्वालिन भौजी अंदर आयी , दूध की बाल्टी लेने, दो बाल्टी बड़ी वाली, दो गाय, चार भैंस, अकेले उनसे तो होता नहीं हाँ अहिरौटी का नया लौंडा है अभी, पिछले साल बियाह हुआ है, इस साल गौना अभी अगहन में, तो वो भी रहता है,
इमरतिया और मुन्ना बहु पहले ही उठ के चली गयी थीं लेकिन अब चुनिया और बुच्ची भी उठ के नहाने, तैयार होने, शादी बियाह का घर नहाने के लिए लम्बी लाइन लगती है, दूसरे रसोई में जो चूल्हा के पास रहता है वो बिना नहाये नहीं, रात में पता नहीं का का छुआ हो, किया हो, तो पहले नहाना, वैसे तो तीन नहाने का कमरा था, एक में नल भी लगा था, ऊपर एक टंकी थी उसी से , और बाकी दो में कहारिन आंगन के नल से या बहार कुंवे से भर कर रख देती थी, और कई बड़ी उम्र की औरतें तो आंगन में ही पर्दा करके नहाती थी , कहाईन कुएं से पानी भर के ले आती थी और नहलाती थी, कांती बुआ, मझली मामी सब, बस पेटीकोट पहने पहने, हाँ पेटीकोट ऊपर कर के सीने तक,
मरद सब कुंए पे या पोखर पे नहाते थे कुछ नए लौंडे ज्यादा जोश में नदी नहाने भी चले जाते थे,
सात गाने पूरा करके बूआ और मामी भी तैयार होने चली गयीं,
हंसती मुस्कराती गुनगुनाती सुनहली धूप सीढ़ियों से उतरती, नीम के पेड़ की फुनगियों से फुदक कर सीधे आंगन में पसर गयी थी
दिन शुरू हो गया था और शादी बियाह का घर बहुत काम था,
लेकिन इतनी बहू बिटिया, हँसते गाते, खिलखिलाते, चिढ़ाते,... हाथों हाथ काम सम्हाल लेती थीं.
वैसे कहने को तो सूरजु माँ बाप के अकेले न सगा भाई न बहन, सूरजु की माई भी भी घर की अकेली, और सूरजु के बाबू भी अपने माई बाप के अकेले , तो न सगे चाचा, न मामा, न बुआ न मौसी, लेकिन घर भरा था, एकदम घचमच, सूरजु क माई क , ससुरे के मायके के हर जगह से लोग दस दिन पहले से,
रसोई की जिम्मेदारी छोटी मामी ने ले ली थी और उनके साथ रामपुर वाली, भौजी, मंजू भाभी और मुन्ना बहू, लड़कियां सब तो थी ही, खाने का काम तो महराजिन सम्हलाती थी और आजकल उनके साथ दो तीन और, लेकिन चाय नाश्ता बाकी सब काम तो छोटी मामी के जिम्मे
भंडारे की चाभी कांती बुआ को बड़की ठकुराइन ने पकड़ा दी, लड़के की बुआ है और सब रस्म रिवाज की, गाँव की लड़की सब पुरानी परम्परा,
पुरखों पितरों के नाम जानती हैं हाँ रस्म रिवाज में कांती बुआ के साथ इमरतिया भी
इमरतिया सुबह से, .....आज बहुत काम है अभी नौ बहे ठीक हल्दी की रस्म होनी है, पंडित से एक बार फिर बात करनी थी, चौक पुराना है कम से कम चार बड़का कटोरा भर के हल्दी पीसी जायेगी, दस गाँठ हल्दी पूजा वाली भी, और मुन्ना बहू को अभी एक बार फिर बुलउवा ले कर जाना है
उसके टोले से दो चार और नाउन भी आयी हैं तो हल्दी पीसने का काम उनके जिम्मे उसने लगा दिया, दूल्हे को तैयार भी करना है
और फिर लावा भी आज भूजा जाएगा, बूआ भूजेंगी
सिलपोहना भी होना है,
सब जिम्मेदारी इमरतिया के सर,
और सबसे बढ़के सूरजु की,
रसोई में रामपुर वाली, और छोटी मामी ने चाय चढ़ा दिया था, साथ में बुच्ची और चुनिया, बाकी लड़कियां भी नहा के आ गयी थीं, बाहर से हल्ला मच रहा था चाय के लिए और छोटी मामी ने चुनिया और सुनीता को काम पे लगाया,
" चाय बाहर ले जा लेकिन लड़को में उलझ मत जाना, और बूआ से कह के हलवाई वाले भंडारे से सकोरे में मीठी बुनिया और दालमोठ भी ले लेना "
लेकिन तबतक इमरतिया को कुछ याद आया और वो रसोई में जाके बुच्ची से बोली,
" अरे बुच्ची बाई , यहाँ तुम गप्प मार रही हो, वहां तोहार भतार चाय के लिए हुड़क रहा होगा, जल्दी से ऊपर अपने भैया के लिए चाय ले के जाओ, हमको अबही हल्दी का इंतजाम करना है और फिर पंडित से पता करना है सब साइत, ओहि हिसाब से बुलउवा जायेगा,"
रामपुर वाली ने बुच्ची के चूतड़ में कस के चिकोटी काटी और चिढ़ाया, " सिर्फ चाय मत देना, बाकी सब भी दे देना, हाँ पहले गप्पू से फड़वाने का मन है तो बात अलग है "
" क्या भाभी, आप ने सुबह सुबह " बुच्ची बनावटी गुस्से से बोली,
" अरे सुबह सुबह तो और मजा आता है बबुनी, सब मर्दों का खड़ा रहता है, अभी जाओगी तो खोल के देख लेना, पक्का मेरे देवर का टनाटन होगा " मंजू भाभी क्यों मजा छोड़ती, ननद तो उनकी भी थी,
" अरे का सब रसोई में सबेरे इतना भीड़ लगाई हो, दूल्हा क चाय नाश्ता गया की नहीं " बाहर से बूआ गरजीं।
और बुच्ची चाय लेके सीढ़ी से अपने भैया के कमरे में
हाँ छत पे पहुंच के नीचे से आने वाले दरवाजे को बंद करना नहीं भूली फिर उसने कुण्डी खड़काई, लेकिन दरवाजा खुला था।
२८,९९,७५२
रात अपनी सितारों जड़ी काली मखमली चादर समेट कर लौटने का जतन कर रही थी।
भोर अभी आँखे मिचमिचा रही थी, धीरे धीरे आसमान का काला रंग सलेटी हो रहा था, बाहर के हिस्से में मरद सब अभी भी गहरी नींद में सो रहे थे,
मंडप में हलकी लालटेन जल रही थी, वो भी किसी ने बुझा दी।
धीरे धीरे एक कमरे से दो छायाएं निकल के चौखट पे बैठ गयीं।
चेहरा मोहरा कुछ नहीं दिख रहा था, हल्का जाड़ा, मोटी चादर में लिपटी, और चारो ओर देख कर उन दोनों लोगों ने कुछ सोचा की एक कमरे से दो और, ...
साफ़ दिख रहा था, एक औरत और एक लड़की, वो भी बिन बोले बगल में आ के बैठ गयीं। लेकिन वो लड़की बार बार सीढ़ी की ओर देख रही थी,
सीढ़ी का दरवाजा खुला, और हंसती खिलखिलाती, पहले दो औरतें, फिर दो लड़कियां और फिर एक औरत,
और वो लड़की आ के पहले से बैठी लड़की के बगल में बैठ गयी, सीधे उसके गले में हाथ डाल के एकदम चिपक के, जैसे न जाने कब की बिछुड़ी हों,
भोर उठ गयी थी, अलसाते हुए, अंगाई लेते, झुक के अपने पैरो में अरुणिम महावर लगा रही थी,
और जो सबसे पहले आके बैठी थीं, उनका चेहरा अब थोड़ा थोड़ा दिख रहा था,
कांती बूआ, बुच्ची की बड़ी मौसी. उन्होंने पराती शुरू की और उनके बगल में बैठी, उनके साथ ही आयी, सूरजु की छोटी मामी, वो भी साथ साथ,...
भयी भिनसार, अरे चिरैया लगी बोलेन, अरे मुरग लगे बोले
अरे स्वामी, अहिरा चरावें धेनु गैया,
और रामपुर वाली भौजी ने वही लाइन दुहराना शुरू की, और अपनी छोटी बहन चुनिया की ओर देखा, जो अपनी सहेली बुच्ची से कुछ फुसफुसा रही थी,
और अब सब लोग शामिल हो गए, और सबसे तेज आवाज इमरतिया और मुन्ना बहु की
भयी भिनसार, अरे चिरैया लगी बोलेन, अरे मुरग लगे बोले
अरे स्वामी, अहिरा चरावें धेनु गैया,
भोर महावर लगे पैरों से, चिड़ियों की चहचहाहट की पायल झनकाती,.... धीरे धीरे धरती के आंगन में उतर रही,
अब मांडव में सबकी शक्ल हलकी हलकी दिखने लगी थी,
सब जाड़े में चिपकी, दुबकी, सबसे पहले कांती बुआ और छोटी मामी, रातभर वो दोनों बड़की ठकुराइन के साथ ही, एक की भौजाई एक की ननद , एक ही रजाई में तीनो घुसिरि मुसुरी थीं, और भोर जगाने भोर होने के साथ मांडव में,
फिर रामपुर वाली भौजी अपनी छोटी बहन चुनिया के साथ और ऊपर से कोहबर की रखवार पांचो जने, सबसे आगे मंजू भाभी, पीछे इमरतिया, उसके बाद खिलखिलाती बुच्ची और शीला, और सबसे पीछे मुन्ना बहू। शीलवा तो अपने घरे चल गयी, बाकी सब वहीं मांडव में
और अबकी मंजू भाभी ने अगला भोर जगाने का गाना शुरू किया,
जाई जगावो राजा दसरथ
हाथ मुंह धोवैं, भैंसी दुहावें
जायी जगावव रानी कौशल्या
हाथ मुंह धोवें, कलश भरी लावें हों
दहिया बिलोरे हों,
और सब लोग अगली लाइन दुहरा रहे थे,
सुबह धीरे धीरे अलसाते, पूरब की ओर से पेड़ो की फुनगियों पर, घर की छत पर उतर रही थी.
जैसे कोई सुहागन मांग में सिन्दूर भर रही हो,... खूब चटक और और आँखों में पिया समाये हों. बस उसी तरह की सिंदूरी लाली छिटक रही थी,
घर से थोड़ी दूर किसी मुर्गे ने बांग दी, बाहर गाय ने रंभाना शुरू कर दिया था , और आँगन में भी अँधेरा कम हो गया था,
मंझली मामी भी आ के बैठ गयी मांडव में और अबकी रामपुर वाली ने शुरू किया, और उनका हर गाना चुनिया अच्छी तरह जानती थी, सगी बहने और बहनों से बढ़ के सहेली, ...
और चुनिया बुच्ची तो एक जान, तो बस रामपुर वाली भौजी के साथ चुनिया और बच्ची ने पहली बाकी लोगों ने दुहराना शुरू किया
अरे भोर भये भिनसरवा, धरमवा की जुनिया
चिरइया बन बोलई, मिरिग बन चुन्गई।
अरे जाई के जगाओ, सूरजु सिंह के बाबा, सूरजु सिंह के चाचा
चलयी क दुहनिया
मचियहिं बैठी भवानी मैया, दहिया बिलोरे
अरे केथुआ क है तोहरे खईलरी , केथुआ क मथानी।
अरे कौन चरित तोरे अंचरा, त दहिया बिलोरउ।
नाही मोरे धेनु बकेन , तो नाही मोरे ओसर,
अरे दहिया तो आवे कमोरियन, दुधवा तो नारी बहे
अरे सोनवा क मोरे खईलारी,रुपवा क मथानी।
अरे रतनचरित मोर अंचरा, त दहिया बिलोरनि।
अरे बाढई दही के दहेड़िया, धिया के गागरी।
अरे बाढ़इ बिटियन क नैहर , पतोहियन क सासुरु
( सबेरा हो गया है, धरम की बेला है। चिड़िया बोलने लगी और मृग वन में चारा खोजने निकल पड़े। अरे जा के सूरजु सिंह के बाबा, चाचा को जगाओ, गाय दुहने का समय हो गया है। माँ भवानी मचिया पर बैठकर दही बिलो रही हैं। माँ आपकी कमोरी और मथानी किस की बनी है ? आपके आँचल का क्या प्रताप है ?
माँ कहती हैं की, मेरी गायें दूध देने वाली हैं बाँझ या ऊसर नहीं। सोने की कमोरी और चांदी की मथानी है। रतनजड़ित मेरा आँचल पुण्य से भरा है।
दूध तो इतना भर कर आता है की नालियां बह उठती हैं, और कमोरी हरदम दही से भरी रहती है।
माँ आशीष देती हैं की दही रखने वाला बर्तन हरदम भरा रहे, बेटी की गागर छलकती रहे। बहुओं की ससुराल और बेटियों का मायका बढे। )
सब लोग तारीफ़ से रामपुर वाली को और चुनिया को देखने लगे, इतना पुराना गाना, और इतना लम्बा गाना, लेकिन कांती बूआ ने अगला गाना टेर दिया, रसम का तो पांच गाना होता है, हाँ उसके बाद भले मजाक मस्ती हो, लेकिन रस्म के गाने में पांच से कम नहीं और बुआ तो सात कम से कम
ग्वालिन भौजी अंदर आयी , दूध की बाल्टी लेने, दो बाल्टी बड़ी वाली, दो गाय, चार भैंस, अकेले उनसे तो होता नहीं हाँ अहिरौटी का नया लौंडा है अभी, पिछले साल बियाह हुआ है, इस साल गौना अभी अगहन में, तो वो भी रहता है,
इमरतिया और मुन्ना बहु पहले ही उठ के चली गयी थीं लेकिन अब चुनिया और बुच्ची भी उठ के नहाने, तैयार होने, शादी बियाह का घर नहाने के लिए लम्बी लाइन लगती है, दूसरे रसोई में जो चूल्हा के पास रहता है वो बिना नहाये नहीं, रात में पता नहीं का का छुआ हो, किया हो, तो पहले नहाना, वैसे तो तीन नहाने का कमरा था, एक में नल भी लगा था, ऊपर एक टंकी थी उसी से , और बाकी दो में कहारिन आंगन के नल से या बहार कुंवे से भर कर रख देती थी, और कई बड़ी उम्र की औरतें तो आंगन में ही पर्दा करके नहाती थी , कहाईन कुएं से पानी भर के ले आती थी और नहलाती थी, कांती बुआ, मझली मामी सब, बस पेटीकोट पहने पहने, हाँ पेटीकोट ऊपर कर के सीने तक,
मरद सब कुंए पे या पोखर पे नहाते थे कुछ नए लौंडे ज्यादा जोश में नदी नहाने भी चले जाते थे,
सात गाने पूरा करके बूआ और मामी भी तैयार होने चली गयीं,
हंसती मुस्कराती गुनगुनाती सुनहली धूप सीढ़ियों से उतरती, नीम के पेड़ की फुनगियों से फुदक कर सीधे आंगन में पसर गयी थी
दिन शुरू हो गया था और शादी बियाह का घर बहुत काम था,
लेकिन इतनी बहू बिटिया, हँसते गाते, खिलखिलाते, चिढ़ाते,... हाथों हाथ काम सम्हाल लेती थीं.
वैसे कहने को तो सूरजु माँ बाप के अकेले न सगा भाई न बहन, सूरजु की माई भी भी घर की अकेली, और सूरजु के बाबू भी अपने माई बाप के अकेले , तो न सगे चाचा, न मामा, न बुआ न मौसी, लेकिन घर भरा था, एकदम घचमच, सूरजु क माई क , ससुरे के मायके के हर जगह से लोग दस दिन पहले से,
रसोई की जिम्मेदारी छोटी मामी ने ले ली थी और उनके साथ रामपुर वाली, भौजी, मंजू भाभी और मुन्ना बहू, लड़कियां सब तो थी ही, खाने का काम तो महराजिन सम्हलाती थी और आजकल उनके साथ दो तीन और, लेकिन चाय नाश्ता बाकी सब काम तो छोटी मामी के जिम्मे
भंडारे की चाभी कांती बुआ को बड़की ठकुराइन ने पकड़ा दी, लड़के की बुआ है और सब रस्म रिवाज की, गाँव की लड़की सब पुरानी परम्परा,
पुरखों पितरों के नाम जानती हैं हाँ रस्म रिवाज में कांती बुआ के साथ इमरतिया भी
इमरतिया सुबह से, .....आज बहुत काम है अभी नौ बहे ठीक हल्दी की रस्म होनी है, पंडित से एक बार फिर बात करनी थी, चौक पुराना है कम से कम चार बड़का कटोरा भर के हल्दी पीसी जायेगी, दस गाँठ हल्दी पूजा वाली भी, और मुन्ना बहू को अभी एक बार फिर बुलउवा ले कर जाना है
उसके टोले से दो चार और नाउन भी आयी हैं तो हल्दी पीसने का काम उनके जिम्मे उसने लगा दिया, दूल्हे को तैयार भी करना है
और फिर लावा भी आज भूजा जाएगा, बूआ भूजेंगी
सिलपोहना भी होना है,
सब जिम्मेदारी इमरतिया के सर,
और सबसे बढ़के सूरजु की,
रसोई में रामपुर वाली, और छोटी मामी ने चाय चढ़ा दिया था, साथ में बुच्ची और चुनिया, बाकी लड़कियां भी नहा के आ गयी थीं, बाहर से हल्ला मच रहा था चाय के लिए और छोटी मामी ने चुनिया और सुनीता को काम पे लगाया,
" चाय बाहर ले जा लेकिन लड़को में उलझ मत जाना, और बूआ से कह के हलवाई वाले भंडारे से सकोरे में मीठी बुनिया और दालमोठ भी ले लेना "
लेकिन तबतक इमरतिया को कुछ याद आया और वो रसोई में जाके बुच्ची से बोली,
" अरे बुच्ची बाई , यहाँ तुम गप्प मार रही हो, वहां तोहार भतार चाय के लिए हुड़क रहा होगा, जल्दी से ऊपर अपने भैया के लिए चाय ले के जाओ, हमको अबही हल्दी का इंतजाम करना है और फिर पंडित से पता करना है सब साइत, ओहि हिसाब से बुलउवा जायेगा,"
रामपुर वाली ने बुच्ची के चूतड़ में कस के चिकोटी काटी और चिढ़ाया, " सिर्फ चाय मत देना, बाकी सब भी दे देना, हाँ पहले गप्पू से फड़वाने का मन है तो बात अलग है "
" क्या भाभी, आप ने सुबह सुबह " बुच्ची बनावटी गुस्से से बोली,
" अरे सुबह सुबह तो और मजा आता है बबुनी, सब मर्दों का खड़ा रहता है, अभी जाओगी तो खोल के देख लेना, पक्का मेरे देवर का टनाटन होगा " मंजू भाभी क्यों मजा छोड़ती, ननद तो उनकी भी थी,
" अरे का सब रसोई में सबेरे इतना भीड़ लगाई हो, दूल्हा क चाय नाश्ता गया की नहीं " बाहर से बूआ गरजीं।
और बुच्ची चाय लेके सीढ़ी से अपने भैया के कमरे में
हाँ छत पे पहुंच के नीचे से आने वाले दरवाजे को बंद करना नहीं भूली फिर उसने कुण्डी खड़काई, लेकिन दरवाजा खुला था।