Adultery छुटकी - होली दीदी की ससुराल में - Page 109 - SexBaba
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Adultery छुटकी - होली दीदी की ससुराल में

छुटकी - होली दीदी की ससुराल में

२९ लाख व्यूज के लिए सभी मित्रों को बहुत धन्यवाद दिया जो प्यार दुलार आपने इस कहानी को दिया और अब मुझे विश्वास है की ३० लाख की सीमा रेखा यह कहानी जरूर छू लेगी।

और कहानी के भीतर कहानी जो इस कहानी की खासियत है तो कहानी के इस सुगना और ससुर वाले प्रंसग में जो एक अलग कहानी से कम नहीं है के भी दस भाग पूरे हो गए और अभी भी यह कहानी अपनी गति से आगे बढ़ेगी, रीत रिवाज, लोकगीत, गाँव की शादी की मस्ती और भी ' बहुत कुछ'

और इस प्रसंग की शुरआत हुयी थी भगा १०२ से

भाग १०२ - सुगना और उसके ससुर -सूरजबली सिंह

और इसके भी व्यूज करीब चार लाख के आसपास हो गए

एक बार फिर से आप सब को धन्यवाद, बस साथ और आशीष बनाये रखे इस कहानी पर भी और बाकी कहानियों पर भी
 
इस पार्ट ( भाग ११२ ) के पहले भाग में तीन बातें एक साथ हो रही हैं, एक तो भोर होने का दृश्य खींचने का प्रयास

रात अपनी सितारों जड़ी काली मखमली चादर समेट कर लौटने का जतन कर रही थी।

भोर अभी आँखे मिचमिचा रही थी, धीरे धीरे आसमान का काला रंग सलेटी हो रहा था, बाहर के हिस्से में मरद सब अभी भी गहरी नींद में सो रहे थे,

भोर उठ गयी थी, अलसाते हुए, अंगाई लेते, झुक के अपने पैरो में अरुणिम महावर लगा रही थी,

सुबह धीरे धीरे अलसाते, पूरब की ओर से पेड़ो की फुनगियों पर, घर की छत पर उतर रही थी.

जैसे कोई सुहागन मांग में सिन्दूर भर रही हो,... खूब चटक और और आँखों में पिया समाये हों. बस उसी तरह की सिंदूरी लाली छिटक रही थी,

घर से थोड़ी दूर किसी मुर्गे ने बांग दी, बाहर गाय ने रंभाना शुरू कर दिया था , और आँगन में भी अँधेरा कम हो गया था,

कैसे धीरे धीरे पग धरती सुबह आंगन में, एक शादी बियाह के घर में आंगन में उतर रही थी और उसी के साथ एकदम भोर मुंह अंधेरे रीत रिवाज लोगगीतों से दिन शुरू हो रहा था, और दूल्हे के दोनों पक्ष, ददिहाल और ननिहाल, बूआ और मामी मिल के वो रीत निभा रही थीं , फिर भाभियाँ, बहने, घर में काम करने वाली, लोग अलग रिश्ते अलग और सुर एक

और तीसरी बात जो सबसे ख़ास है भोर जगाने के गीत

अक्सर अब शादियों में ये गीत सुनने को नहीं मिलते, कई इवेंट मैंसेजर्स को शायद मालूम भी न हो , लेकिन प्रकृति का जो आवाहन इन गानों में मिलता है जो तादाम्य दिखता है वो दुर्लभ है

और इसी सूरजबली सिंह की शादी के प्रसंग में मैंने सांझ जगाने का गीत भी प्रस्तुत किया था

भाग १०७, बुच्ची और चुनिया पृष्ठ ११००० और उस भाग के उस प्रसंग का नाम भी था अरे अरे संझा गोसाई,

और साँझ जगाने का गीत भी था

सांझ होते ही, आंगन में इमरतिया, बुआ और मंजू भाभी सांझ जगाने का गीत गा रही थीं,

के मोरे संझा मनईहे रे मोरी माई

बोलेली सूरजु क माई हमरा घरे आयी

बोलेली सूरजु क भौजी हमरा घरे आयी

हम रउरे संझा मनैयिबे मोरी माई

साँझा बोलेली माई केकरा घरे जाईं

के मोरे संझा मनईहे रे मोरी माई

काथी के रे दियना, काथी के रे बाती


कथुवा क तेल जलेला सारे राती

सोनवा के दियना, कपूरन क बाती

सरसों क तेल जले सारी राती।


बुच्ची और चुनिया की जबरदस्त दोस्ती, दोनों हाथ पकडे पकडे, और वो दोनों भी आके बैठ गयीं और साथ साथ गाने लगीं, कांति बुआ ने दूसरा गाना शुरू किया,

तो यह कहानी साथ ही साथ करीब भुलाई बिसराई जा रही रस्मो और गानो को समेटने का एक दस्तावेज भी है

हाँ एक बात और एक मित्र ने यह बात उठायी थी की गाना पढ़ने में राग का, धुन का अंदाजा नहीं लगता, वो धुनें जो कहीं न कही अभी भी हमारे कानो में घुली है तो मैं कोशिश करती हूँ उन गानो का ऑडियो भी शेयर कर दूँ, जिससे धुन का पता चल जाए

और जो भोर का गीत है उसकी आखिरी लाइन बड़ी मजेदार है आप सब ने नोटिस किया होगा, कामना है लड़की का मायका और बहु की ससुराल में धन की यश की वृद्धि हो, है तो दोनों एक ही, बेटी का जो मायका वही बहु की ससुराल।

इन गानों को भी पढ़ें, सुने, कुछ यादो में खो जाए और उबरें तो तो इस कहानी को अपने कमेंट से जरूर सजाये और मुझे उपकृत करें।
 
इस भाग के पहले पार्ट में भोर जगाने का गीत मैंने उद्धृत किया है।

यह सब गीत अब बिस्मृत होते जा रहे हैं इसलिए मैं इस कहानी में बिवाह के प्रसंग में इन्हे शेयर कर रही हूँ

अब सवाल होता है राग का इसलिए कुछ मैंने भोर के गीत के वीडियो भी शेयर किये हैं, पाठक पाठिकाओं से अनुरोध है की इन्हे भी कहानी का हिस्सा मान के जरूर सुने और ब्याह का माहौल बनाने में ये भी योग देंगे

एक बार फिर से आभार
 
जोरू का गुलाम भाग २५७ पृष्ठ १६१४

मजा थ्रीसम का - निधि -छोटी साली

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फागुन के दिन चार

भाग ४८ -मंजू और गुड्डी पृष्ठ 477

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Merry X Mas
 
फागुन के दिन चार

भाग ४८ -मंजू और गुड्डी पृष्ठ 477

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फागुन के दिन चार

भाग ४९ -फिर बनारस -रीत और दुष्ट दमन पृष्ठ ४८४

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भाग ११३ हल्दी-चुमावन की रस्म

now
 
भाग ११३

हल्दी-चुमावन की रस्म

३०,०१,३९६

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हथवा में हरदिया लेके अम्मा बांटी खड़ी हो



---



हरी हरी दुबिया पियर हरदी

पंडित अंगना में आयी के चढ़ावे हरदी

हरी हरी दुबिया पियर हरदी

बाबू गयलें बजार, अम्मा बाँट जोहेली,




--



कहवां के हरदी बड़ी ही खुसबूदार हो

सिलिया पे पीसे चलेली दिदिया हमार हो

कहवां के हरदी बड़ी ही खुसबूदार हो

सिलिया पे पीसे चलेली भौजी हमार हो

कोइरन घर हरदी बड़ी ही खुसबूदार हो

सिलिया पे पीसे चलली रामपुर वाली भौजी हमार हो,




सिलिया पे पीसे चलली बुच्ची हमार हो,

हल्दी लगावे अम्मा, बन्ने की देह में

पांव पैजनिया बाजे, हाथे कंगनवा हो

निखरल बदन बन्ने क चढ़ते हरदिया



हो उतारे नजरिया दादी देवे आशीष हो,

आज सबेरे से घर में कचमच मची थी, कुछ और मेहमान आ गए थे, दो बार कांती बूआ, इमरतिया की देवरान को और चार बार बड़की ठकुराइन मुन्ना बहू को टोक चुकी थीं, बूआ बुलव्वा के लिए याद दिला रही थीं और मुन्ना बहू को कल रात को ही बड़की ठकुराइन ने हल्दी की रस्म के लिए कुछ काम बताया था उसके लिए, किस किस को बुलाना था,

गरहन ख़तम होते ही, आंगन भरने लगा,

ज्यादातर गाँव की लड़कियां और भौजाइयां, ढोलक टनकने लगी, और जहाँ गाँव की लड़कियां हों, भौजाइयां हों तो छेड़खानी न हो, खुल के मजाक न हो, चिकोटी न काटी जाए चूतड़ में, गाल न नोचा जाए , ये हो नहीं सकता और सबसे बढ़के लड़को की बातचीत, और कल के नाच गाने के बाद बुचिया भी गाँव की लड़कियों से एकदम खुल गयी थी,

शीलवा से तो पहले ही पक्की दोस्ती थी, कल पांच छह और सहेलियां बन गयी थीं, और आज और कुछ नयी, चुनिया भी उसके साथ और गाँव की सब लड़कियां उसे स्साली स्साली कह के चिढ़ा रही थीं, पर वो उलटे उन सब को अकेले गरिया रही थी,

" हमार भैया, गप्पू बुच्ची के ऊपर जब चढ़ेगा न, हुमच हुमच के इसकी चटनी बनाएगा तो तुम सब स्साली, सच में साली हो जाओगी। "

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बीच बीच में बड़ी उम्र की औरतें ख़ास तौर से बूआ ( आखिर वो भी इसी गाँव की लड़की थीं ) आके सब लड़कियों को डांटती थीं,

' खाली खी खी कर रही हो सब इतना काम फैला है, वैसे पंडित ने दो घंटा गरहन के चक्कर में लेट करा दिया,

और बात सही थी, आज आधी दर्जन रसम होनी थी कम से कम, हल्दी के बाद चुमावन, नहछू, लावा भूजना, सिलपोहना,

रसोई का काम महराजिन ने सम्हाला था और उनके साथ छोटी मामी, रामपुर वाली भौजी,

ढोलक रुक नहीं रही थी, और जहाँ रुके तो कभी बड़की ठकुराइन तो कभी दखिन पट्टी वाली आजी चालु हो जाती

'अरे कइसन बहुरिया हैं, मुंहे में कुछ घुसा है का, की महतारी कुछ सीखा के नहीं भेजी "

और गानों में भी नाम ले ले के और जल्दी ननदों का नाम नहीं लेते तो उनके भाइयों का नाम लगा के

गरहन भले ख़तम हो गया था लेकिन पंडित जी बोले थे आधा घंटा और बचा के, तब दुलहा कोहबर से निकले, सूरज का गरहन और नाम भी सूरज, और उनकी राशि पे भी, वो तो भल हुआ पंडित जी का ऐन मौके पे बता दिए

ऊपर कमरे में इमरतिया सूरजु के साथ, आज दो बार उनकी मलाई घोंट चुकी थी और दोनों बार सूरजु ने खुद चढ़ के हचक के पेला था

वैसे तो दो बड़े बड़े कटोरे भर के किलो भर से ऊपर हल्दी मुन्ना बहू ने मुंह अंधियारे, भिनसार में पीस दी थी लेकिन रस्म के लिए पांच गाँठ हल्दी लड़के की बहन सील लोढ़े की पूजा के बाद खुद पीसती है,

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और गाने सब उस के नाम ले के और भाभियाँ जम के चिढ़ाती हैं और कल के नाच गाने में मस्ती के बाद तो सब लोग एकदम से खुल गए थे, और भले ही सगी बहन कोई नहीं थी, लेकिन सगी से भी बढ़कर बुच्ची थी न बूआ की लड़की और बहन की सब रस्म वही कर रही थी,

सब लड़कियां गा रही थीं,

कहवां के हरदी बड़ी ही खुसबूदार हो



सिलिया पे पीसे चलेली दिदिया हमार हो

सिलिया पे पीसे चलली बुच्ची हमार हो,

अरे कोयरीन घर हरदी बड़ी खुसबूदार हो



सिलिया पे पीसे चलली बुच्ची हमार हो,

और मंझली पट्टी की एक भौजाई ने गरियाया

" हे बबुनी, महीन महीन पीसना, नहीं तो उहे लोढ़ा ( सिलबट्टे का बट्टा) तोहरी बुरिया में पेल देबे

" अरे हमारी ननद को तो मजा ही आए जाएगा, अपने भैया का, दूल्हे का लौंड़ा समझ के लील जाएंगी "

रामपुर वाली भौजी क्यों मौका छोड़ती

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बुच्ची पूरी ताकत से लोढ़ा पकडे सील पे रगड़ रही थीं और सच में सूरजु भैय्या के लौंड़े के बारे में, सच में एकदम इस लोढ़े ऐसा ही था ऐसे ही खूब मोटा और कड़ा, मुट्ठी में पकड़ा नहीं जा रहा था, फिर बिलिया में कैसे जाएगा ?

इमरतिया भौजी हैं न करेंगी कुछ जुगाड़ , लेकिन कुछ भी हो आज दोपहर में जरूर घोंट के रहेगी वो। जितना भाभियाँ गरिया रही थीं उतना ही वो खिलखिलाते हुए कस कस के हल्दी पास रही थी

" लोढ़ा तो बहुत कस के पकड़ले हाउ, लगता है दूल्हे का लौंड़ा खूब पकड़े हो "

बड़की ठकुराइन के मायके की किसी भौजाई ने चिढ़ाया

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तो मंजू भाभी बोलीं,

" अरे कल पंडित ने तो बता दिया है, बरात जाने के बाद तुरंत नौ मर्दो की मलाई हमार बिन्नो घोंटेंगी और रात में रतजगा के पहले पहले दस मरद चढ़ेंगे, क्यों मुन्ना बहू. लौंडन क इंतजाम क जिम्मा तोहार बा "

अरे मंजू भाभी ही तो कल ज्योतिषी पंडित बनी थीं और ये काम उन्होंने ही मुन्ना बहू को पकड़ाया था लेकिन मुन्ना बहू बोलीं

" अरे याद है, हम तो आज से ही अपनी बिन्नो के लिए बुलौवा दे आये हैं लेकिन बरात जाने का इन्तजार ये थोड़े करेंगी आज से ही बांटना शरू कर देंगी, घर में ही कित्ते देख के मुठिया रहे हैं और गाँव में भी "

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और बहन के बाद पांच गाँठ हल्दी भाभी को भी पीसना होता है तो रामपुर वाली भाभी और जो कोयरीन ये हल्दी ले के आती हैं, उसका परछन होता है, नेग के लिए ठनगन करती है और फिर खूब गरियाई जाती है

जैसे भाभियाँ बुच्ची के पीछे पड़ी थीं, ननदें रामपुर वाली के पीछे पड़ गयीं

कहवां के हरदी बड़ी ही खुसबूदार हो

सिलिया पे पीसे चलेली भौजी हमार हो

कोइरन घर हरदी बड़ी ही खुसबूदार हो

सिलिया पे पीसे चलली रामपुर वाली भौजी हमार हो,

लेकिन मामला कुछ और गर्म होता तो चुनिया ने ढोलक सम्हाल ली और बड़की ठकुराइन के मायके वाली गोल ने गाना शुरू कर दिया

सोने के सिलवटिया हल्दी पीसो रे मोरी भौजी

हरदी मंगल शुभ होये, प्रेम से हरदी चढ़ावा मोरे भौजी

हरदी मंगल शुभ होये

--हरदी हो तू तो सरब गुन आगर हरदी हो तू तो सरब गुन आगर उपजे ला बड़ी बड़ी गाँठ,

लेकिन तबतक कांती बूआ ने बुच्ची को हड़काया, " अरे जा के दूल्हे को ले आओ, कोहबर से टाइम हो रहा है, और किसी को साथ ले लो "

किसी भौजी ने हलके से चिढ़ाया < " अरे ये सब लड़कियां लड़कों में ही उरझायी हैं सबेरे से और कुछ सुध नहीं है "

और बात सही भी जहाँ गुड़ हो तो चींटे आते ही हैं,

सुबह से लड़के भिनभिना रहे थे, सब ' अपनी अपनी वालियों ' को देख के, नज़रे चार कर के जा रहे थे और सबसे ज्यादा गप्पू आज खुल के बुच्ची के चक्कर में और बुच्ची भी कोई न कोई बहाना बना के कभी अपनी सहेली, गप्पू की बहन चुनिया के साथ तो कभी अकेले, नाश्ता देने के बहाने तो कभी किसी काम से और कोई बड़ी उम्र की औरत देख लेती औरतों के इलाके में तो लड़को को भगाती

बुच्ची ने , लीला को उससे साल भर छोटी लगती होगी, मुन्ना बहू के रिश्ते की ननद, उसको साथ लिया, सीढ़ी से ऊपर और गुहार लगाई

" भौजी, भैय्या को तैयार कर दीजिये "
 
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