Adultery तेरे प्यार मे.... (Completed) - Page 20 - SexBaba
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Adultery तेरे प्यार मे.... (Completed)

#141



“क्या थे तुम महावीर ठाकुर, मैं पता करके ही रहूँगा.” मैंने किताब का वो पन्ना जिस पर पेन से राज बुक स्टोर और उसका पता लिखा था उसे फाड़ कर जेब में रख लिया. मैंने खान का खेतो वाला रास्ता बंद किया और उस तरफ चल दिया जो नकली समाधी की तरफ मुझे ले जाता था .लालच इन्सान की फितरत में होता है तो फिर ऐसा क्या था की इस अथाह सोने के भंडार की किसी को भी परवाह नहीं थी.

जंगल के इस बियाबान में बने इन कमरों ने क्या छिपाया हुआ था . अगर सुनैना की समाधी यहाँ नहीं थी तो फिर क्यों बताया गया की सुनैना की समाधी यहाँ है . कमरों की कुण्डी खोल कर मैंने फिर से देखा सब कुछ वैसा ही था जैसा मैं छोड़ कर गया था . आखिर ऐसा क्या था जो मुझसे छुट रहा था . क्या था जिसे मैं चाह कर भी नहीं देख पा रहा था. शहर जाकर मैंने उस बुक स्टोर को तलाशने की कोशिश की और मेरी तलाश पूरी भी हो गयी . वो दूकान अनोखी थी . इतनी किताबे मैंने कभी नहीं देखि थी .

बड़े सलीके से सजी हुई किताबे , देख कर दिल ठहर सा जाये पर मुझे जो चाहिए था वो कही नहीं था .

“मैं कुछ मदद करू ”

मैंने मुड कर देखा एक अधेड़ उम्र का आदमी धोती-कुरता पहने खड़ा था .

मैं- दुकान के मालिक से मिलना है मुझे

वो- मैं ही हूँ मालिक यहाँ का .

मैंने जेब से वो टुकड़ा निकाल कर उसके हाथ में रख दिया. चश्मे के अन्दर फैलती-सिकुड़ती उसकी आँखे अजीब सी हो चली थी .

मैं- इस पन्ने पर यहाँ का पता लिखा है . मैं जानना चाहता हूँ की कौन खरीदता है ये किताबे

उसने मुझे ऐसे देखा ,अगले ही पल मुझे महसूस हो गया की मूर्खतापूर्ण सवाल कर लिया है मैंने. जाहिर है ऐसी किताबो के रसिया बहुत लोग होंगे. मैंने नोटों की गड्डी उसके सामने रखी और बोला- मेरे कुछ सवाल है , ये पैसे तुम्हारे हो सकते है यदि मुझे मेरे जवाब मिलेंगे तो .

मालिक- मेरे पास बहुत से लोग आते है ऐसी किताबे खरीदने के लिए . अब उन हजारो लोगो में से तुम्हारी जरुरत के कौन है ये कैसे मालूम होगा.

मैं- थोडा मुश्किल है जानता हूँ , सवाल ये है की ताजा ग्राहक नहीं करीब सात-आठ या दस साल पहले के ग्राहकों के बारे में जानना है मुझे.

मैंने अपनी जेब से त्रिदेवो की तस्वीर निकाल कर उसके सामने रख दी.

मैं- दिमाग पर थोडा जोर डालो और देखो इनमे से कौन था वो . और वो एक दो बार का नहीं बल्कि नियमित तौर पर आता होगा यहाँ पर.

मैं जानता था की भूसे के ढेर से सुई निकालनी है मुझे . बहुत देर तक वो उस तस्वीर को देखता रहा . उसके चेहरे के भाव स्पस्ट नहीं थे. मेरी धड़कने बेकाबू हो रही थी . सांस फूलने लगी थी. बड़ी शिद्दत से मैं चाहता था की वो इनमे से किसी भी एक पर ऊँगली रख दे.

“एक मिनट रुक “ उसने कहा और अन्दर चला गया कुछ देर बाद वो आया तो उसके पास एक पुराणी डायरी सी थी .

मैं- क्या है ये

मालिक- कुछ साल पहले मैं किताबो के साथ साथ फोटो स्टूडियो का काम भी करता था . ऐसी किताब ले जाने वाले कुछ खास लडको से एक तरह से यारी-दोस्ती सी हो जाती थी. मैं उनकी तस्वीरे उनके नाम के साथ इस डायरी में लगा लेता था , शौक के तौर पर . अगर इनमे से कोई भी हुआ तो मालूम हो जायेगा.

दुनिया में कैसे कैसे शौक थे. खैर, उसने डायरी की तस्वीरे देखनी शुरू की और करीब दस मिनट बाद मेरे दिमाग में हलचल मच गयी , डायरी में तीन तस्वीरे थी, तीन दोस्तों की तस्वीरे. ऐसा कैसे हो सकता था . ये तीनो इस दूकान के पक्के ग्राहक थे. तीन तस्वीरों के निचे महावीर, प्रकाश और अभिमानु लिखा हुआ था नीली स्याही में. मेरा गुरुर, मेरा भाई भी इन किताबो का शौक रखता था . खंडहर के कमरों का राज सबसे पहले उसने ही जाना था . साला दिमाग में जैसे कुछ बचा ही नहीं था .तीनो साथ ही रहते थे, भैया को किताबो का शौक था ये मैं जानता था हो सकता था की वो बस किताबे ही खरीदते हो यहाँ से.

मैं- एक मिनट, तूने बताया की फोटोग्राफी का काम भी था उस समय ये बता इन तीनो में से कैमरा किसके पास था या फिर इनमे से किसी ने रील धुलवाई हो तुझसे.

मालिक- ये बताना तो मुश्किल है और इन बातो को समय भी बहुत हो गया. पर अगर इनमे से किसी ने भी मुझसे कैमरा ख़रीदा होगा तो उस कैमरा को यदि मैं देख लू तो बता पाउँगा.

मैं- इतना यकीं कैसे तुझे

मालिक- यकीन क्यों नहीं होगा. दस साल पहले शहर में एक मात्र फोटो की दूकान मेरी ही थी , वो तो आग की वजह से नुकसान ज्यादा हो गया वर्ना आज बात ही कुछ और होती.

आग क्या इस की आग और प्रकाश के घर पर लगी आग में कुछ समानता हो सकती थी . मैंने सोचा .

मैं- क्या औरते भी आती है उस तरह की किताबे खरीदने तुझसे

मालिक- धत्त

बस एक सवाल मुझे परेशान किये हुए था की दोस्त भी अगर दोस्तों से कोई बात छुपाये तो इसका क्या मतलब हो सकता है . माना की सबके अपने राज होते है पर इतनी गहरी दोस्ती में कुछ छुपाया जाये तो फिर शक करना बनता था . हो सकता था की ये तीनो ही मिल कर चुदाई करते हो . हो सकता था की महावीर और उसके बाद प्रकाश भी उसी रस्ते पर चल पड़ा हो.

मुझे उस कैमरा को हर हाल में ढूँढना था और साथ ही एक चक्कर और लगाना था शहर का . घर लौटने से पहले मैं वैध के मकान में घुसा और उस शीसी में से कुछ गोलियों को पुडिया बना कर रख लिया जो सरला ने मुझे दिखाई थी जिनका इस्तेमाल प्रकाश करता था अपने शिकार के साथ . घर पहुँचते ही मैंने निशा को अपने सीने से लगा लिया. उसके लबो को चूमा और उसे लेकर छत पर चला गया .

मैं- बस एक बात पूछनी है

निशा- क्या



मैं- क्या तू जानती थी की महावीर ही वो आदमखोर था .?
 
#142



मैं- क्या तू जानती थी की महावीर आदमखोर था .

निशा- क्या बकवास कर रहा है कबीर .

मैं- तू जानती थी या नहीं इस बारे में .

निशा- कैसे हो सकता है महावीर आदमखोर वो तो खुद आदमखोर का शिकार हुआ था .

ये मेरे लिए एक और चौंकाने वाली बात थी

मैं- तेरे जज्बातों को समझता हूँ . अतीत की याद दिला कर तुझे दुख्ही नहीं करना चाहता पर मेरे लिए अतीत को जानना बहुत जरुरी है तूने उसकी लाश तो देखि होगी न

निशा- नहीं देखि . किसी ने देखने ही नहीं दी.

मैं- खंडहर के बारे में तुझे कब बताया उसने.

निशा-ब्याह के कुछ दिनों बाद ही वो मुझे वहां पर ले गया था. कहता था की दुनिया में उस खंडहर से ज्यादा कुछ भी खूबसूरत नहीं , न जाने क्यों उस भुला दी गयी ईमारत से उसे हद से जायदा प्यार था . मैंने महावीर को तो भुला दिया था पर उसकी उस निशानी को नहीं भुला पाई. उस घर में मैं पागल होने लगी थी , जब कुछ और नहीं सूझा तो मैं यहाँ आने लगी. घंटो अकेले बैठी रहती. आठ साल बीत गए कबीर, कोई नहीं आया परिंदे तक ने पैर नहीं मारा यहाँ और फिर एक रात तू आया , और जिन्दगी पलट दी तूने मेरी.

मैं- तूने उसके कातिल को ढूंढने की कोशिश नहीं की .

निशा- उसके बाप भाई ने दिन रात एक कर दिया पर कोई नहीं मिला. उसके घाव कहते है की आदमखोर ने मार दिया उसे. अगर वो खुद आदमखोर होता तो कैसे शिकार होता वो.

मैं- और उसके दोस्त उन्होंने कोशिश नहीं की उसके कातिल को तलाशने की .

निशा- अभिमानु भैया उसके दोस्त थे. जिस दिन से महावीर गया अभिमानु कभी हमारी हवेली नहीं आये.

मैंने निशा के सर पर हाथ फेरा . उसने सर हमेशा की तरफ मेरे काँधे पर टिका दिया.

मैं- एक वादा करेगी मुझसे

निशा- कैसा वादा

मैं- अगर मैं पूर्ण आदमखोर बन कर बेकाबू हो गया तो तू मुझे मार देना

निशा-वो दिन कभी नहीं आयेगा. तू नहीं बनेगा वैसा.

मैं- इतना यकीं कैसे तुझे

निशा- दुबारा डाकन नहीं बनूँगी मैं .

सुबह मैं मंगू के घर गया. एक खालीपन जिसका बोझ सारी उम्र मुझे उठाना था . चंपा मेरे लिए चाय ले आई.

मैं- कैसी है तू

चंपा- ठीक हूँ

मैं- चल कुवे पर चलते है , कब तक इधर बैठी रहेगी थोडा बहार निकलेगी तो मन हल्का होगा.

चंपा- क्या फर्क पड़ता है.

मैं- मुझे फर्क पड़ता है. घर टूट रहा है , सब बिखर रहा है . जो हुआ वो कभी नहीं होना चाहिए था .काश मैं तुझे बता सकता की कितना दिल टुटा है . तू कभी भी खुद को अकेला नहीं समझना कबीर हर पल तेरे साथ खड़ा है . चल कुवे पर चलते है .

मैंने साइकिल उठाई और हम लोग कुवे पर आ गये. चंपा मुंडेर पर बैठ गयी मैंने चारपाई निकाली और उस पर बैठ गया .

मैं- वक्त कितना बीत गया कुछ महीनो पहले हम सब कितने खुश थे, मौज थी मस्ती थी अब देखो हालात

चंपा- समय के साथ साथ सब बदल जाते है.

मैं- मुझे समय को बदलना है चंपा इसके लिए तेरी मदद चाहिए मुझे

चंपा- मैं खुद हालात की मारी हूँ मैं क्या मदद करू तेरी .

मैं- कुछ सवाल है जिनके जवाब तेरे पास है.

चंपा- पूछ ले फिर किसने रोका है तुझे .

मैं- रोका तो किसी ने नहीं . मैं अपनी दोस्त को वापिस पाना चाहता हूँ .

चंपा - कल भी तेरी थी आज भी तेरी हु

मैं- तो फिर वो वजह बता क्यों तुझे पिताजी के साथ सोना पड़ा .

चंपा- नहीं पता की ऐसा क्यों हुआ , बस हो गया एक बार हुआ फिर बार बार होने लगा. फिर ना वो रुके ना मैंने मना किया.

मैं- कभी सोचा नहीं की क्या परिणाम होंगे इसके.

चंपा- कुछ चीजे बस हो जाती है कबीर .

मैं- और परकाश , अब ये मत कहना की उसके साथ भी हो गया .

चंपा- मैंने उसके साथ एक सौदा किया था .

मैं- कैसा सौदा.

चंपा- उसके पास कुछ ऐसा था जो मुझे चाहिए था , उसे चूत चाहिए थी मैंने उसे चूत दी.

मैं- क्या था उसके पास ऐसा.

चंपा- वो चाचा के कातिल को जानता था

मैं ये सुन कर हैरान रह गया . मेरा दिमाग साला भन्ना गया .

मैं- कौन ,,, कौन था चाचा का कातिल

चंपा- तुझे यकीन नहीं आएगा कबीर

मैं- कौन था वो

चम्पा- राय साहब ,

चंपा ने जैसे ही पिताजी का नाम लिया . समझ नहीं आया की साला क्या चक्कर है ये , चाची ने कहा था की उसने अपने पति को मारा है और चंपा कुछ और ही कह रही थी .

मैं - उसने कहा और तूने मान लिया

चंपा- उसके पास सबूत था .

मैं- कैसा सबूत

चम्पा- उसने एक फोटो खिंची थी जिसमे चाचा के पेट में छुरा घोप रहे है राय साहब.

मैं- कहाँ है वो फोटो अब

चंपा- उसने मुझे दिखाई थी पर दी नहीं . कहता था जब सही समय आएगा तब देगा मुझे .

एक आदमी के दो कातिल , बहनचोद दिमाग की नसे फटने को ही बेताब हो चली थी. साला क्या चुतियापा चल रहा था घर में कैसे समझे हम .

मैं- तूने कभी परकाश के पास कोई कैमरा देखा था क्या

चंपा- नहीं उसने बस तस्वीर दिखाई थी .

मैं- और मंगू , उसके साथ क्यों सोना पड़ा तुझे

चंपा- हम दोनों एक ही कमरे में सोते थे , एक रात नशे में वो चढ़ गया मुझ पर . मैं खुद को रोक नहीं पाई .

मैं- बुरा नहीं लगा

चंपा- बुरा लगने से क्या होता है , कहा न कुछ चीजे बस हो जाती है .

मैं- कहाँ मिलता था परकाश तुझसे

चंपा-यही कुवे पर

बहनचोद क्या था इस कुवे पर जिसे देखो यही पर चुदाई करने आता था .कुवा न हुआ साला कोठा हो गया .

मैं- इसी कमरे में

चंपा- हाँ इसी कमरे में

“मैं उसे वहां छिपाती जहाँ वो सबके सामने तो होता पर उसे कोई देख नहीं पाता ” . मेरे मन में अंजू के शब्द गूंजने लगे. और क्या उस रात अंजू मुझे यही पर नहीं मिली थी . तो तुम छिपे हो यहाँ पर तुम.....................
 
अधीरता सकून को खत्म कर देती है मित्रों, ये कोई नए सवाल नहीं है कहानी मे शुरू से ही तो था ये सब. कबीर ने जिस जिस से पूछा कि कहां चुदी सबने कहाँ कुंए पर. बताओ कहा के नहीं. मेरे पास हमेशा से ऑप्शन था यदि मैं चाहता तो निशा और कबीर के प्रेम को लास्ट एपिसोड मे खत्म कर सकता था परंतु मैंने उसे पहले लिखा क्यों, कोई तो कारण होगा ना. आपके अपने लेखक पर क्या आपको भरोसा नहीं. ये कहानी अपनी नियति को चुन रही है. ना जाने किस मोड़ पर खत्म हो जाए ये. निशा का इस घर मे आना जरूरी था क्यों ये जान जाएंगे आप. भ्रम अपने आप मे अनोखा होता है जादूगर जो हमे दिखाता है हम हर पल जानते है फिर भी हम देखते है ताली बजाते है.

आप सब हर पल जानते है कि ये कहानी झूठी है :D

मैं इतना प्रयत्न कर रहा हूं कि खत्म हो जाए ये पर हो ही नहीं रही
 
कहे तो मैं शॉर्ट मे निपटा दु कुछ पॉइंट बना कर जवाब दे दु जैसे बंगलों नंबर 13 का एंड हुआ था
 
उम्मीद है कि अगला भाग ठीक रहे
 
सभी पाठकों से माफी चाहूँगा reply नहीं दे पा रहा थोड़ी समस्या है
 
#143



मेरे बचपन की साथी , जिसके साथ हर दिन मैं जिया हर पल जिया मेरे सामने किस बेशर्मी से झूठ पर झूठ बोले जा रही थी . मैं हैरान नहीं था मुझे खुद पर गुस्सा था. क्या कमी थी दोस्ती में. मैंने तो पूरी इमानदारी से निभाया था न , क्यों बदल गयी थी ये लड़की. अपनी आँखों के समाने मैं घर टूटते हुए देख रहा था . मन इतना व्यथित था की मैं रोना चाहता था . कमजोर नहीं था मैं पर बचपन से इतनी खुशहाली देखि थी की रंग बदलते इन लोगो की नीचता पर यकीन नहीं होता था .

दिल तो करता था की इस लड़की की खाल खिंच लू पर उसके बदन से टपकता लहू भी मेरे ही दिल का होता . मैं चीखना चाहता था उस पर , हाथ उठाना चाहता था उस पर . खुद को रोका , वो जैसी भी हो गयी थी , दिल के किसी कोने में उसके हिस्से की जगह भी थी . मंगू के जाने से मैं और घुटने लगा था .

“कहाँ जा रहा है कबीर ” चंपा ने सवाल किया

मैं- तुझसे दूर

चंपा- वो तो तू पहले ही जा चूका है

मैं- जाना पड़ा मुझे. इस मासूम चेहरे के पीछे जो धूर्तता का नकाब तूने ओढा है न . मुझे शर्म आती है मैंने तुझे अपनी दोस्त माना. मेरे जिगर का टुकड़ा मेरा ही न हो सका. तुझसे गिला ये नहीं है की तुने मेरे बाप का बिस्तर गर्म किया वो तेरी मर्जी की बात है . दुःख ये है की तेरे मन को नहीं जान सका. मुझसे बाते छिपाने लगी तू, तेरी आँखों में स्नेह की जगह अब मुझे धोखा और स्वार्थ दीखता है .

चंपा-स्नेह, स्वार्थ क्या मायने है इन शब्दों के. बरसो पहले खोखले हो चुके है ये सब . घर में मातम पसरा था , राख भी ठंडी नहीं हुई थी और तू दुल्हन ले आया. ब्याह कर लिया तूने . ये स्वार्थ नहीं था कबीर. मैं क्या गिला करू तुझसे, क्या उलाहना दू तुझे .

मैं- काश समझा सकता कितना बोझ था मेरे कदमो को उसके घर की तरफ उठते हुए. मैंने वादा किया था निशा से .

चंपा- वादा तो मुझसे भी किया था की मेरी डोली तू उठाएगा. वादा तो तूने भी किया था मेरे गुनेहगार को मेरे सामने लाकर खड़ा कर देगा. पर तू भूल गया . अपने स्वार्थ के आगे तू मुझे भूल गया .

मैं- कुछ वादे तोड़ देना जरुरी हो जाता है कभी कभी

चंपा- आ गयी न दिल की बात जुबान पर .

मैं- आ गयी . इमानदरी की क्या बात करती है तू , तू खुद एक धोखेबाज़ है .

चंपा- तू मुझसे प्यार नहीं करता था कबीर , कभी नहीं चाहा तूने मुझे . मैं किसी के साथ भी मुह काला करू तुझे क्या दिलचस्पी है उसमे

मैं- मैंने नहीं चाहा तुझे,प्यार को जाना ही कितना तूने, तुझे अपने निचे कर लेता वो प्यार समझती तू, हाँ मैं नहीं प्यार करता था तुझे, मेरा स्नेह था तुझसे. मेरा गुरुर थी तू . देख क्या थी तू और आज क्या बन कर मेरे सामने खड़ी है . मेरी आँखों के सामने तू मेरे बाप के साथ चली गयी तूने नहीं सोचा की तुझे पुकारने वाला कौन है . तू स्वार्थ की बात करती है . तूने परकाश के सामने सलवार उतार दी. ये जानते हुए भी की वो मेरा दुश्मन है तू सोई उसके साथ . तू स्वार्थ की बात करती है.मेरी माँ के कत्ल का सबूत था तेरे पास तूने मुझसे छिपाया. दोस्ती की बात करती है तू , तुम धोखेबाजो के बिच रह कर मैं भी धोखेबाज़ हो गया .

चंपा ने मेरी बात का कोई जवाब नहीं दिया.वो मुंडेर से उतरी और वहां से चली गयी . मैंने मटके को मुह से लगाया और प्यास बुझाने की कोशिश करने लगा.

“मैं उसे वहां पर छिपाती जहाँ वो सबकी नजर में होती पर उसे कोई देख नहीं पाता ” मैंने अंजू के कहे शब्द फिर से दोहराए . इन शब्दों की क्या वैल्यू थी ये मैं जान गया था , ये शब्द कितने सार्थक थे मैं मान गया था क्योंकि चाची ने चाचा की लाश को वही पर छिपाया जहाँ वो सबकी नजरो में तो थी पर उसे को देख नहीं पाया था . परकाश क्यों आता था कुंवे पर . वो सोने की तलाश में नहीं आता था , उसे तो मालूम ही नहीं था की सोना कहाँ पर है , वो कुवे पर आता था ताकि अपने कुछ राज़ यहाँ पर छिपा सके. पर कहाँ .

मैंने कमरे की कुण्डी खोली और अन्दर दाखिल हो गया . सब कुछ तो जाना पहचाना था . वो ही पलंग उस पर पड़ा बिस्तर. कुछ जगह छोड़ के खेती के औजार, फिर एक कोने में सूखी घास और लकडिया. एक तरफ लकड़ी की कुंडिया जिन पर कपडे टांकते थे. मैंने आले-दिवाले सब देख मारे कहीं पर भी ऐसा कुछ नहीं था . कमरे की हर ईंट को ठोक बजा कर देखा. और फिर मेरे दिमाग में वो घंटी बजी जो इस गुत्थी को काफी हद तक सुलझा सकती थी .



ईंट. मैं दौड़ते हुए कुवे पर आया और उसकी मुंडेर को घूरने लगा. .ईंट , मुंडेर की ईंटे. पागलो की तरफ मैं एक एक ईंट को चेक करने लगा. सामने से घूमते हुए मैं पिछले हिस्से पर पहुँच गया था . इस तरफ जमीं पर घास थोड़ी जायदा थी क्योंकि एक छोटी नाली से पानी बहता रहता था . मैंने उस तरफ से थोडा सा ऊपर देखा तो मेरे होंठो पर न जाने क्यों मुस्कान सी आ गयी . यहाँ पर दो ईंटे खोखली थी , इनको जैसे बाद में लगाया गया हो. बढ़ी हुई धड़कानो को संभालते हुए मैंने कांपते हाथो से वो ईंटे हटाई और पुराना काला कपडा देख कर मेरी आँखे चमक सी गयी. कपडे में एक लकड़ी का छोटा सा बक्सा लपेटा गया था मैंने उस पुराने बक्से को खोला और जो मैंने देखा , यकीं होना आसान तो नहीं था पर मैंने तलाश कर ली थी , काले रंग का पुराना सा कैमरा मेरी हथेली में था.
 
मित्रो, सूचना ये है कि नौकरी छोड़ने का निर्णय कर लिया है. जिंदगी अब पत्नी बेटी के साथ जिएंगे. मुश्किल था ये निर्णय पर कर ही लिया
 
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