Adultery प्रीत +दिल अपना प्रीत पराई 2 - SexBaba
  • From this section you can read all the hindi sex stories in hindi font. These are collected from the various sources which make your cock rock hard in the night. All are having the collections of like maa beta, devar bhabhi, indian aunty, college girl. All these are the amazing chudai stories for you guys in these forum.

    If You are unable to access the site then try to access the site via VPN Try these are vpn App Click Here

Adultery प्रीत +दिल अपना प्रीत पराई 2

hotaks

Administrator
Staff member
Joined
Dec 5, 2013
Messages
140,291
दिल अपना प्रीत पराई 2 Index

12 34567 8 910

11 12 13 1415 16 17 18 19 20
 
#1

मेला ..........

अपने आप में एक संसार को समेटे हुए, तमाम जहाँ के रंग , रंग बिरंगे परिधानों में सजे संवरे लोग . खिलोनो के लिए जिद करते बच्चे, चाट के ठेले पर भीड , खेल तमाशे . मैं हमेशा सोचता था की मैं मेला कब देखूंगा. और मैं क्या मेरी उम्र के तमाम लोग जो मेरे साथ बड़े हो रहे थे कभी न कभी इस बारे में सोचते होंगे जरुर . और सोचे भी क्यों न मेरे गाँव मे कभी मेला लगता ही नहीं था ,

पर आज मेरी मेले जाने की ख्वाहिश पूरी होने वाली थी , कमसेकम मैं तो ऐसा ही सोच रहा था .मैं रतनगढ़ जा रहा था मेला देखने . इस मेले के बारे में बहुत सुना था , और इस बार मैंने सोच लिया था की चाहे कुछ भी हो जाये मैं मेला देख कर जरुर रहूँगा. पर किसे पता था की तक़दीर का ये एक इशारा था मेरे लिए , खैर. साइकिल के तेज पैडल मारते हुए मैंने जंगल को पार कर लिया था जो मेरे गाँव और रतनगढ़ को जोड़ता था ,

धड़कने कुछ बढ़ी सी थी , एक उत्साह था और होता क्यों न. मेला देखने का सपना जैसे पूरा सा ही होने को था . जैसे मेरी आँखे एक नए संसार को देख रही थी . एक औरत सर पर मटके रखे नाच रही थी , कुछ लोग झूले झूल रहे थे कुछ चाट पकोड़ी की दुकानों पर थे तो कुछ औरते सामान खरीद रही थी एक तरफ खूब सारी ऊंट गाड़िया , बैल गाड़िया थी तरह तरफ के लोग रंग बिरंगे कपडे पहने अपने आप में मग्न थे. और मैं हैरान . हवा में शोर था, कभी मैं इधर जाता तो कभी उधर, एक दुकान पर जी भर के जलेबी , बर्फी खायी . थोड़ी नमकीन चखी.

मैं नहीं जानता था की मेरे कदम किस तरफ ले जा रहे थे .अगर घंटियों का वो शोर मेरा ध्यान भंग नहीं कर देता. उस ऊंचे टीले पर कोई मंदिर था मैं भी उस तरफ चल दिया . सीढियों के पास मैंने परसाद लिया और मंदिर की तरफ बढ़ने लगा. सीढियों ने जैसे मेरी सांस फुला दी थी. एक बिशाल मंदिर जिसके बारे में क्या कहूँ, जो देखे बस देखता रह जाये. बरसो पुराने संगमरमर की बनाई ये ईमारत . मैं भी भीड़ में शामिल हो गया . तारा माता का मंदिर था ये. पुजारी ने मेरे हाथो से प्रसाद लिया और मुझे पूजन करने को कहा.

“मुझे यहाँ की रीत नहीं मालूम पुजारी जी ” मैंने इतना कहा

पुजारी ने न जाने किस नजर से देखा मुझे और बोला - किस गाँव के हो बेटे .

मैं- जी यहीं पास का .

पुजारी- मैंने पूछा किस गाँव के हो

मैं- अर्जुन ....... अर्जुनगढ़

पुजारी की आँखों को जैसे जलते देखा मैंने उसने आस पास देखा और प्रसाद की पन्नी मेरे हाथ में रखते हुए बोला- मुर्ख, जिस रस्ते से आया है तुरंत लौट जा , इस से पहले की कुछ अनिष्ट हो जाये जा, भाग जा .

मुझे तिरस्कार सा लगा ये. पर मैं जानता था की मेरी हिमाकत भारी पड़ सकती है तो मंदिर से बाहर की तरफ मुड गया मैं,. मेरी नजर सूरज पर पड़ी जो अस्त होने को मचल रहा था . उफ्फ्फ्फफ्फ्फ़ कितना समय बीत गया मुझे यहाँ ..........................

मैंने क्यों बताया गाँव का नाम , मैं कोई और नाम भी बता सकता था अपने आप से कहाँ मैंने . . अपने आप से बात करते हुए मैंने आधा मेला पार कर लिया था की तभी मेरी नजर शर्बत के ठेले पर पड़ी तो मैं खुद को रोक नहीं पाया .

मैंने ठेले वाले को एक शर्बत के लिए कहा ही था की किसी ने मुझे धक्का दिया और साइड में कर दिया .

“पहले हमारे लिए बना रे ”

मैंने देखा वो पांच लड़के थे , बदतमीज से

“भाई धक्का देने की क्या जरुरत थी ” मैंने कहा

उन लडको ने मुझे घूर के देखा , उनमे से एक बोला - क्या बोला बे.

मैं- यहीं बोला की धक्का क्यों दिया

मेरी बात पूरी होने से पहले ही मेरे कान पर एक थप्पड़ आ पड़ा था और फिर एक और घूंसा

“साले तेरी इतनी औकात हमसे सवाल करेगा, तेरी हिम्मत कैसे हुई आँख मिलाने की, एक मिनट . हमारे गाँव का नहीं है तू. नहीं है तू . पकड़ो रे इसे ” जिसने मुझे मारा था वो चिल्लाया .

मैंने उसे धक्का सा दिया और भागने लगा तभी उनमे से एक लड़के ने मारा मुझे किसी चीज़ से . मैं चीख भी नहीं पाया और भागने लगा . मेरी चाह मुझ पर भारी पड़ने वाली थी . गलिया बकते हुए वो लड़के मेरे पीछे भागने लगे, मेले में लोग हमें ही देखने लगे जैसे. साँस फूलने लगी थी , मेरी साइकिल यहाँ से दूर थी और गाँव उस से भी दूर ........ मैं पूरी ताकत लगा के भाग रहा था की तभी मुझे लगा की कुछ चुभा मुझे , तेज दर्द ने हिला दिया मुझे पर अभी लगने लगा था की जैसे वो मुझे पकड़ लेंगे. मैंने एक मोड़ लिया और तभी किसी हाथ ने मुझे पकड़ कर खींच लिया .मैं संभलता इस से पहले मैंने एक हाथ को अपने मुह पर महसूस किया

स्स्श्हह्ह्ह्हह चुप रहो .

तम्बू के अँधेरे में मैंने देखा वो एक लड़की थी .

“चुप रहो ” वो फुसफुसाई

मैं अपनी उलझी साँस पर काबू पाने की कोशिश करने लगा. बाहर उन लडको के दौड़ने की आवाजे आई ......

कुछ देर बाद उस लड़की ने मेरे मुह से हाथ हटाया और तम्बू के बाहर चली गयी , कुछ देर बाद वो आई और बोली- चले गए वो लोग.

“शुक्रिया ” मैंने कहा.

उसने ऊपर से निचे मुझे देखा और पास रखे मटके से एक गिलास भर के मुझे देते हुए बोली- पियो

बेहद ठंडा पानी जैसे बर्फ घोल रखी हो और शरबत से भी ज्यादा मिठास .

“थोड़ी देर बाद निकलना यहाँ से , अँधेरा सा हो जायेगा तो चले जाना अपनी मंजिल ”

“देर हो जाएगी वैसे ही बहुत देर हुई ” मैंने कहा

लड़की- ये तो पहले सोचना था न.

मैं अनसुना करते हुए चलने को हुआ ही था की मेरे तन में तेज दर्द हुआ “आई ” मैं जैसे सिसक पड़ा

“क्या हुआ ” वो बोली-

मैं- चोट लगी .

मैंने अपनी पीठ पर हाथ लगाया और मेरा हाथ खून से सं गया.

शायद वो लड़की मेरा हाल समझ गयी थी...

“मुझे देखने दो ”उसने कहा पर मैं तम्बू से बहार निकला और जहाँ मैंने साइकिल छुपाई थी उस और चल पड़ा . मेरी आँखों में आंसू थे और बदन में दर्द .......................

आँख जैसे बंद हो जाना चाहती थी .और फिर कुछ याद नहीं रहा

.
 
#2

आँख खुली तो सूरज मेरे सर पर चढ़ा हुआ था , पसीने से लथपथ मैं मिटटी में पड़ा था . थोड़ी देर लगी खुद को सँभालने में और फिर दर्द ने मुझे मेरे होने का अहसास करवाया . जैसे तैसे करके मैं अपने ठिकाने पर पहुंचा . पास के खेत में काम कर रहे एक लड़के के हाथ मैंने बैध को बुलावा भेजा .

“सब मेरी गलती है ” मैंने अपने आप से कहा . दो पल के लिए मेरी आँखे बंद हुई और मैंने देखा कैसे उस लड़की ने मुझे थाम लिया था , मेरे होंठो पर उसके हाथ रखते हुए मैंने उसकी आँखों की गहराई देखि थी . चेहरे का तो मुझे ख़ास ध्यान नहीं था , सब इतना जल्दी जो हुआ था पर उन आँखों की कशिश जो शायद भुलाना आसान नहीं था .

“कुंवर , बुलाया आपने ” बैध की आवाज ने मेरी तन्द्रा तोड़ी .

मैं- पीठ में चोट लगी है देखो जरा काका

बैध ने बिना देर किये अपना काम शुरू किया .

“लम्बा चीरा है, एक जगह घाव गहरा है .. ” उसने कहा

मैं- ठीक करो काका

बैध ने मलहम लगा के पट्टी बांध दी और तीसरे दिन दिखाने को कह कर चला गया .मुझे दुःख इस जख्म का नहीं था दुख था इस खानाबदोश जिन्दगी का , ऐसा नहीं था की मेरे पास कुछ नहीं था ,

“कुंवर सा , खाना लाया हूँ ”

मैंने दरवाजे पर देखा, और इशारा करते हुए बोला- कितनी बार कहा है यार, तुम मत आया करो , जाओ यहाँ से .

“बड़ी मालकिन बाहर है ” लड़के ने कहा

मैं बाहर आया और देखा की बड़ी मालकिन यानि मेरी ताईजी सामने थी

“ये ठीक नहीं है कबीर, रोज रोज तुम खाने का डिब्बा वापिस कर देते हो , खाने से कैसी नाराजगी ” ताई ने कहा

मैं- मुझे नहीं चाहिए किसी के टुकड़े

ताई- सब तुम्हारा ही है कबीर,अपने हठ को त्याग दो और घर चलो , तीन साल हो गए है कब तक ये चलेगा ,और ऐसी कोई बात नहीं जिसका समाधान नहीं हो .

मैं- मेरा कोई घर नहीं , आप बड़े लोगो को अपना नाम, रुतबा , दौलत मुबारक हो मुझे मेरे हाल पर छोड़ दो.

ताई- तुम्हारी इस जिद की बजह से आने वाला जीवन बर्बाद हो रहा है तुम्हारा, पढाई तुमने छोड़ दी, हमारा दिल दुखता है तुम्हे ये छोटे मोटे काम करते हुए, गाँव भर की जमीं का मालिक यूँ मजदूरी करता है , मेरे बेटे लौट आओ

मैं- ताईजी हम इस बारे में बात कर चुके है ,

ताई - मेरी तरफ देखो बेटे, मैं किसका पक्ष लू उस घर का या तुम्हारा , काश तुम समझ सकते, खैर, खाना खा लेना तुम्हारी माँ ने तुम्हारे मनपसन्द परांठे बनाये है, कम से कम उसका तो मान रख लो .

ताई चली गयी रह गया वो खाने का डिब्बा और मैं, वो मेरी तरफ देखे मैं उसकी तरफ. न जाने क्यों कुछ आंसू आ गये आँख में. ऐसा नहीं था की घर की याद नहीं आती थी , हर लम्हा मैं तडपता था घर जाने को , दिन तो जैसे तैसे करके कट जाता था पर हर रात क़यामत थी, मेरी तन्हाई ,मेरा अकेलापन , और इन बीते तीन साल में क्या कुछ नहीं हो गया था , पर कोई नहीं आया सिवाय ताईजी के .

पर फ़िलहाल ये जिन्दगी थी, जो मुझे किसी और तरफ ले जाने वाली थी .

तीन रोज बाद की बाद की बात है मेरी नींद , झटके से खुल गयी . एक शोर था जानवरों के रोने का मैं ठीक ठीक तो नहीं बता सकता पर बहुत से जानवर रो रहे थे. मेरे लिए ये पहली बार था , अक्सर खेतो में नील गाय तो घुमती रहती थी पर ऐसे जंगली जानवरों का रोना . मैंने पास पड़ा लट्ठ उठाया और आवाजो की दिशा में चल पड़ा. वैसे तो पूरी चाँद रात थी पर फिर भी जानवर दिखाई नहीं दे रहे थे . आवाजे कभी पास होती तो कभी दूर लगती ,

कशमकश जैसे पूरी हुई, अचानक ही सब कुछ शांत हो गया , सन्नाटा ऐसा की कौन कहे थोड़ी देर पहले कोतुहल था शौर था. मैं हैरान था की ये क्या हुआ तभी गाड़ी की आवाज आती पड़ी और फिर तेज रौशनी ने मेरी आँखों को चुंधिया दिया .

मैं सड़क के बीचो बीच था , सड़क जो मेरे गाँव और शहर को जोडती थी . गाड़ी के ब्रेक लगे एक तेज आवाज के साथ . .........

“अबे, मरना है क्या , ” ड्राईवर चीखा

मैं- जा भाई .....

तभी पीछे बैठी औरत पर मेरी नजर पड़ी , ये सविता थी , हमारे गाँव के स्कूल की हिंदी अध्यापिका .

मैं- अरे मैडम जी आप, इतनी रात.

मैडम- कबीर तुम, इतनी रात को ऐसे क्यों घूम रहे हो सुनसान में देखो अभी गाड़ी से लग जाती तुम्हे . खैर, आओ अन्दर बैठो.

मैं- मैं चला जाऊंगा .

मैडम- कबीर, बेशक तुमने पढाई छोड़ दी है पर मैं टीचर तो हूँ न.

मैं गाड़ी में बैठ गया.

मैं- आप इतनी रात कहाँ से आ रही थी .

मैडम-शहर में मास्टर जी के किसी मित्र के समारोह था तो वहीँ गयी थी .

मैं- और मास्टर जी .

मैडम- उन्हें रुकना पड़ा , पर मुझे आना था तो गाड़ी की .

मैं- गाँव के बाहर ही उतार देना मुझे.

मैडम- मेरे साथ आओ, मेरा सामान है थोडा घर रखवा देना

अब मैं सविता मैडम को क्या कहता

सविता मैडम हमारे गाँव में करीब १६-१७ साल से रह रही थी , उनके पति भी यहीं मास्टर थे, 38-39 साल की मैडम , थोड़े से भरे बदन का संन्चा लिए, कद पञ्च फुट कोई ज्यादा खूबसूरत नहीं थी पर देखने में आकर्षक थी, ऊपर से अध्यापिका और सरल व्यवहार , गाँव में मान था . मैडम का सामान मैंने घर में रखवाया .

मैडम- बैठो,

मैं बैठ गया. थोड़ी देर बाद मैडम कुछ खाने का सामान ले आई,

मैडम- कबीर, वैसे मुझे बुरा लगता है तुम्हारे जैसा होशियार लड़का पढाई छोड़ दे.

मैं- मेरे हालात ऐसे नहीं है , पिछला कुछ समय ठीक नहीं हैं .

मैडम- सुना मैंने. वैसे कबीर, तुम मेरे पसंदिद्दा छात्र रहे हो , कभी कोई परेशानी हो तो मुझे बता सकते हो. मैं तुम्हारे निजी फैसलों के बारे में तो नहीं कहूँगी पर तुम चाहो तो पढाई फिर शुरू कर लो

मैं- सोचूंगा

मैडम- आ जाया करो कभी कभी .

मैंने मिठाई की प्लेट रखी और सर हिला दिया .

वहां से आने के बाद , मेरे दिमाग में बस एक ही बात घूम रही थी की जानवरों का रोना कैसे अपने आप थम गया और मुझे जानवर दिखे क्यों नहीं , ये सवाल जैसे घर कर गया था मेरे मन में . इसी बारे में सोचते हुए मैं उस दोपहर सड़क के उस पार जंगल की तरफ पहुच गया, शायद वो आवाजे इधर से आई थी या उधर से . सोचते हुए मैं बढे जा रहा था तभी मैंने कुछ ऐसा देखा जो उस समय अचंभित करने वाला था .

भरी दोपहर ये कैसे, और कौन करेगा ऐसा. .........................
 
#3

ये देखना अपने आप में बेहद अजीब था , मेरे सामने एक जलता दिया था , बस एक दिया जो शांत था , कोई और वक्त होता तो मैं ध्यान नहीं देता पर भरी दोपहर में कोई क्यों दिया जलायेगा , जबकि ये कोई मंदिर, मजार जैसा कुछ नहीं था , और सबसे बड़ी बात एक गहरी शांति , हवा जैसे थम सी गयी थी मेरे और उस दिए के दरमियाँ . मैं बस वहां से चलने को ही हुआ था की मेरी नजर उस कागज के छोटे से टुकड़े पर पड़ी .

इस पर मेरा ध्यान ही नहीं गया था , मैंने वो कागज उठाया जिस पर कोई शब्द नहीं लिखा था , कोरा कागज , न जाने क्यों मैंने वो कागज जेब में रख लिया . और वापिस अपने खेतो की तरफ चल पड़ा. दूर से ही मैंने ताई को देख लिया था , जो एक पेड़ के निचे कुर्सी डाले बैठी थी. जैसे ही मैं उनके पास पहुंचा वो बोली- कबीर , कहाँ थे तुम , कब से इंतजार कर रही हूँ मैं तुम्हारा .

मैं- मैं इतना भी महत्वपूर्ण नहीं की मेरा इंतजार करे कोई .

ताई- फिर भी मन कर रही थी, सुनो, कल मेरे साथ तुम्हे शहर चलना है .

मैं- किसी और को ले जाओ , मेरे पास समय नहीं है

ताई- कबीर, मैंने कहा न कल तुम मेरे साथ शहर चल रहे हो क्योंकि तुम्हारा वहां होना जरुरी है , कल तुम्हे कुछ मालूम होगा

मैंने ताई की बात अनसूनी करना चाहा पर मैं कर रही पाया.

ताई- एक खुशखबरी और बतानी है तुम्हे कर्ण का रिश्ता पक्का हो गया है ,

मैं- मुझे क्या लेना देना

ताई- तुम्हारा बड़ा भाई है वो .

मैंने जैसे ताई का उपहास उड़ाया

कहने को कर्ण मेरा बड़ा भाई था , पर क्या वो मेरा भाई था नहीं, वो एक बिगडैल जिद्दी लड़का था जिसके तन में खून की जगह अहंकार दौड़ रहा था . गाँव भर में कोई ही शायद होगा जिस पर उसने अत्याचार नहीं किया होगा. अपने ख्यालो में खोये हुए जैसे ही मेरी नजर ताई पर पड़ी, मुझे एक अनचाही याद आ गयी, एक कडवा सच .

अचानक ही मेरे मुह से निकल गया - मैं कल चलूँगा आपके साथ ताईजी

पर मैं ये बिलकुल नहीं जानता था की कल मेरे जीवन के एक नए अध्याय की शरूआत होगी , मेरे पतन की शरूआत होगी. अगले दिन मैं पूरी तरह से तैयार था शहर जाने को . ताईजी की गाड़ी में बैठा और हम शहर की तरफ चल दिए.

मैं- पर हम क्यों जा रहे है.

ताई- तुम समझ जाओगे

मैंने अपना सर हल्का सा खिड़की से बाहर निकाल लिया और हवा को महसूस करने लगा . बहुत दिनों बाद मैं कोई सफ़र कर रहा था. पर ये सकून ज्यादा देर नहीं रहा, लगभग आधी दुरी जाने के बाद गाड़ी झटके खाने लगी और फिर बंद हो गयी.

ताई- इसको भी अभी बिगड़ना था .

मैं- बस से चलते है .

ताइ ने मेरी तरफ देखा . मैं- और नही तो क्या .

थोड़ी देर बाद बस आई पर वो बहुत भरी थी भीड़ थी . जैसे तैसे करके हम दोनों चढ़ गए. गर्मी के मौसम में बस का भीड़ वाला सफ़र, और तभी किसी ने ताई के पैर पर पैर रख दिया,

“आई, ईईईई ” ताई जैसे चीख पड़ी . किसी औरत चप्पल या जूते में कील थी या कुछ नुकीला ताई को बड़ी जोर से चुभा था , पैर से खून निकल आया और उन्होंने उसी वक्त बस से उतरने का फैसला किया, मज़बूरी में मैं भी उतर गया.

वो सडक के पास बैठ कर अपने पैर को देखने लगी, ख़राब गाड़ी को कोसने लगी. लगभग बीस मिनट बाद एक टेम्पो आते हुए दिखा . मैंने उसे हाथ दिया तो वो रुका .

मैं- शहर तक बिठा लो , दुगना किराया दूंगा.

टेम्पो वाला- बिठा तो लूँ, पर भाई मैं सामान लेके जा रहा हूँ , जगह थोड़ी कम है पीछे तुम दो लोग हो .

मैं- हम देख लेंगे वो .

टेम्पो वाला- तो फिर बैठ जाओ.

टेम्पो में पीछे की तरफ गत्ते भरे हुए थे. मैं चढ़ा और फिर ताई का हाथ पकड कर खींच लिया. टेम्पो चल पड़ा.

ताई- कबीर, बहुत कम जगह है शहर तक परेशान हो जायेंगे.

मैं- बस की भीड़ से तो सही हैं न .

तभी टेम्पो ने झटका खाया और मैंने ताई की कमर पकड़ ली, पहली बार था जब मैंने किसी औरत को छुआ था . , इतनी कोमल कमर थी ताई की.

ताई- थोड़ी जगह बनाओ , कहीं मैं गिर न जाऊ.

टेम्पो में गत्ते, भरे थे मैंने थोडा सा खिसका कर जगह बनाने की कोशिश की पर बात नहीं बन पा रही थी .

मैं- एक तरीका है ,

ताई- क्या

मैं- मैं बैठ जाता हूँ आप फिर मेरे पैरो पर बैठ जाना

ताई- मैं कैसे ,

मैं- शहर दूर है वैसे भी आपके पर पर लगी है .

ताई को भी और कुछ नहीं सुझा . तो वो बोली- ठीक है .

मैंने अपनी पीठ पीछे गत्ते के बॉक्स पर टिकाई और बैठ गया ताई भी झिझकते हुए मेरे पैरो पर बैठ गयी. ताई का शरीर वजनी था , मेरे पैर दुखने लगे और तभी टेम्पो शायद किसी ब्रेकर पर उछला तो ताई एकदम से मेरी गोद में आ गयी. वो उठने लगी ही थी की तभी फिर से टेम्पो ने झटका लिया और मैंने उनकी कमर को थाम लिया दोनों हाथो से.

मैंने अपनी उंगलियों से ताई की नाभि को सहलाया और वो हल्के से कसमसाई . सब कुछ जैसे थम सा गया था .

ताई के चूतडो की गर्मी को मैंने अपनी जांघो के जोड़ पर महसूस किया. मैं धीरे धीरे उनके पेट को सहलाने लगा था . मैंने महसूस किया की ताई की आँखे बंद थी, मेरे सिशन में मैंने उत्तेजना महसूस की और शायद ताई ने भी .टेम्पो के साथ साथ हमारे बदन भी हिलने लगे थे . मैं उत्तेजित होने लगा था. और फिर मैंने न जाने क्या सोच कर अपने दोनों हाथ ताई की छातियो पर रख दिए. aaahhhhh ताई के होंठो से एक आह सी निकली और मैं उनकी चुचियो को दबाने लगा. .

मेरे लिए ये सब अलग सा अह्सास था मैं अपनी ताई को गोदी में बिठाये उनकी चूची दबा रहा था और वो बिलकुल भी मेरा विरोध नहीं कर रही थी. मेरा लिंग अब पूरी तरह उत्तेजित हो चूका था . उत्तेजना से कांपते हुए मेरे हाथो ने ताई के ब्लाउज के बटन खोल दिए और ब्रा के ऊपर से ही मैं उन उभारो को दबाने लगा. ताई मेरी गोद में मचलने लगी. मैंने हौले से ताई की पीठ को चूमा, कंधो को चूमा और छातियो से खेलने लगा.

तभी जैसे ये सब खत्म हो गया. शहर की हद में पहुच गए थे हम ताई ने मेरे हाथ को हटाया और अपने कपडे सही कर लिए. कुछ देर बाद हम टेम्पो से उतरे , मैंने किराया दिया और चलने को हुआ ही था की वो बोला- भाई मैं लगभग तीन घंटे बाद यही से वापिस जाऊंगा चलो तो मिल लेना. शायद उसे भी दुगने किराये का लालच था .

उसके बाद हम शहर में एक ऑफिस में गए. ये किसी वकील का ऑफिस था.

वकील बड़ी गर्मजोशी से हमसे मिला और फिर बोला- कबीर, देखो तुम्हारे लिए ये थोडा सा अजीब होगा पर मुझे लगता है की अब तुम्हे ये मालूम होना चाहिए.

मैं- क्या

वकील-लोग, अपनी पीढियों को दौलत देते है , जमीन देते है या जो कुछ भी पर तुम्हारे लिए विरासत में ऐसी चीज़ छोड़ी गयी है जिसे कोई क्यों छोड़ेगा, मतलब ये अजीब है .

मैं- पर बताओ तो सही

वकील ने अपनी मेज की दराज से एक पैकेट निकाला और मेरे हाथ पर रख दिया . एक ये छोटा सा पैकेट था. छोटा सा. मैंने उसे खोला और मैं हैरान रह गया. ये कैसे ........................

मतलब ये चीज़ ,,,,,,,,,,,, कैसे ....
 
#4

मेरे हाथ में एक दिया था , मिटटी का दिया , ठीक वैसा ही दिया जिसे मैंने कल जंगल में जलते हुए देखा था, एक दिया था मेरी विरासत. बस एक दिया .

वकील- मुझे समझ नहीं आ रहा की तुम्हारे दादा ने ये दिया क्यों छोड़ा है , एक लाइन की ये अजीब वसीयत क्यों बनाई उन्होंने.

मैं- मुझे नहीं मालूम .

जबकि मेरे अन्दर एक उथल पुथल मची हुई थी, मैं कबीर सिंह, जिसके परिवार के पास न जाने कितनी जमीन थी, कितने काम धंधे थे, आस पास के गाँवो में इतना रुतबा किसी का नहीं था उस कबीर के लिए कोई एक दिया छोड़ गया था जिसकी कीमत शायद रूपये दो रूपये से जयादा नहीं थी. मैं ताई को देखू ताई मुझे देखे . खैर वकील से विदा ली हमने और ताई मुझे एक होटल में ले आई. कुछ खाने की आर्डर दिया .

ताई- कबीर, मुझे कुछ दिन पहले फ़ोन आया था वकील का , पर मुझे ये नहीं मालूम था की पिताजी ऐसा करेंगे

मैं- पर किसलिए,

ताई- कोई तो बात रही होगी.

इस बात से हम वो बात भूल गए थे जो उस टेम्पो में हुई थी , पास वाली खिड़की से आती धुप ताई के चेहरे पर पड़ रही थी , मैंने पहली बार ताई की खूबसूरती को महसूस किया ३७ साल की ताई , पांच सवा पांच फुट के संचे में ढली , भरवां बदन की मालकिन थी , टेम्पो में जो घटना हुई थी , बस ये हो गया था ,मेरी नजर ताई की नजर से मिली और मैंने सर झुका लिया.

ताई- घर पर सब तुम्हे यद् करते है

मैं- पर कोई आया नहीं

ताई- मैं तो आती हूँ न

मैं चुप रहा

ताई- कबीर,

मैं- मेरा दम घुटता है उस नर्क में, सबके चेहरे पर लालच पुता है, एक सड़ांध है उस घर में झूठी शान की, झूठे नियम कायदों की

ताई- वो तुम्हारे पिता है , जिस दिन से तुमने घर छोड़ा है ख़ुशी चली गयी है वहां से

मैं- मैं कभी कर्ण, नहीं बन सकता मैं कभी ठाकुर अभिमन्यु नहीं बन सकता , मुझे नफरत है इस सब से

ताई- कबीर, मैं नहीं जानती की आखिर क्या वो वजह रही थी जिस बात ने हस्ते खेलते घर को बिखेर दिया , बाप बेटे में आखिर ऐसी नफरत की दिवार क्यों खड़ी हो गयी, पर कबीर अपनी माँ के बारे में सोचो, उसके दिल पर क्या गुजरती है वो कहती नहीं पर मैं जानती हु, मेरे बारे में सोचो,

मैं- मेरे नसीब में खानाबदोशी लिखी है ये ही सही , कबीर उस घर में कभी नहीं लौटेगा ,

ताई ने फिर कुछ नहीं कहा.

खाने के बाद हम कुछ कपड़ो की दुकान पर गए ताई ने मेरे लिए कुछ कपडे ख़रीदे. और फिर वापसी के लिए हम उसी जगह आ गए जहाँ टेम्पो वाला था. टेम्पो देखते ही ताई के चेहरे पर आई मुस्कान मेरे से छुप नहीं पाई. अबकी बार टेम्पो में गत्तो की जगह गद्दे भरे थे , माध्यम आकार के गद्दे , टेम्पो में चढ़ने से पहले मैंने ताई को देखा जिनकी आँखों में मुझे एक गहराई महसूस हुई.

जैसे ही टेम्पो चला ताई मेरी गोद में आ गयी , और जो शुरू हुआ था फिर स शुरू हो गया . इस इस बार मैंने ताई की चुचिया पूरी तरह से बाहर निकाल ली और जोर जोर से भींचने लगा ताई ने फिर से अपनी आँखे मूँद ली . कुछ देर बाद ताई थोड़ी सी उठी और अपनी साडी को जांघो पर उठा लिया अब ताई बहुत आराम से अपनी गांड पर मेरे लंड को महसूस कर सकती थी ,

और जो भी हो रहा था उसमे उनकी भी स्वीक्रति थी, एक हाथ से उभारो को मसलते हुए मैं दुसरे हाथ से ताई की चिकनी जांघो को सहलाने लगा था और फिर मैंने ताई के पैरो को अपने हाथो से खोला और ताई की सबसे अनमोल चीज पर अपना हाथ रख दिया ताई के बदन में जैसे हजारो वाल्ट का करंट दौड़ गया , वो आहे भरने लगी थी, सिल्क की कच्छी के ऊपर से मैं ताई की चूत को मसल रहा था.

न जाने कैसे मेरे हाथ अपने आप ये सब करते जा रहे थे जैसे मुझे बरसो से इन सब चीजो का अनुभव रहा हो, मैंने कच्छी को थोडा सा साइड में किया और ताई की चूत को छू लिया मैंने, उफ्फ्फ्फ़ कितनी गर्म जगह थी वो मेरी ऊँगली किसी चिपचिपे रस में सन गयी, तभी टेम्पो मुड़ा और मेरी बीच वाली ऊँगली, ताई की चूत में घुस गयी,

“uffffffffffff कबीर ” ताई अपनी आह नहीं रोक पाई.

मैं समझ गया था ताई को मजा आ रहा है, मैं जोर जोर से ताई की चूत में ऊँगली करने लगा ताई अब ने एक पल के लिए मेरे हाथ को पकड़ा और फिर खुद ही छोड़ दिया. ताई के बदन की थिरकन बढती जा रही थी. तभी ताई मेरी तरफ घूमी और ताई ने अपने होंठ मेरे होंठो पर रख दिए. मेरे मुह में जैसे किसी ने पिघली मिश्री घोल दी हो, ताई ने अपना पूरा बोझ मेरे ऊपर डाल दिया और मेरे होंठ चूसते हुए झड़ने लगी, मेरी हथेली पूरी भीग गयी थी, बहुत देर तक ताई मेरे होंठ चुस्ती रही , मेरी सांसे जैसे अटक गयी थी ,

और जब उन्होंने मुझे छोड़ा तो अहसास हुआ की ये लम्हा तो गुजर गया था पर आगे ये अपने साथ तूफान लाने वाला था , अपनी मंजिल पर उतरने के बाद न ताई ने कुछ कहा न मैंने , वो घर गयी मैं अपने खेत पर.

मेरे हाथ में दिया था , बहुत देर तक मैं सोचता रहा की आखिर क्या खास बात है इसमें , मैंने उसमे तेल डाला और उसे जलाना चाहा पर हैरत देखिये , दिया जला ही नहीं, मैं हर बार प्रयास करता और हर बार बाती रोशन नहीं होती............
 
#५

अजीब सा चुतियापा लग रहा था ये सब , मेरा दादा वसीयत में एक दिया दे गया मुझे किसी को बताये तो भी अपनी ही हंसी उड़े, और चुतिया दिया था के जल ही नहीं रहा था , हार कर मैंने उसे कोने में रख दिया और बिस्तर पर आके लेट गया. ताई के साथ हुई घटना ने मुझे अन्दर तक हिला दिया था , मेरे मन में सवाल था की उन्होंने मुझे रोका क्यों नहीं क्या वो भी मुझसे जिस्मानी रिश्ते बनाना चाहती थी , पहली नजर में मैं कह नहीं सकता था पर टेम्पो में जो हुआ और उनकी सहमती क्या इशारा दे रही थी,

खैर, उस रात एक बार फिर मेरी नींद उन जानवरों के रोने की आवाजो ने तोड़ दी,

“क्या मुसीबत है ” मैंने अपने आप से कहा

एक तो गर्मियों की ये राते इतनी छोटी होती थी की कभी कभी लगता था की ये रत शुरू होने से पहले ही खत्म हो गयी . पर आज मैंने सोच लिया था की मालूम करके ही रहूँगा ये हो क्या रहा है, मैंने अपनी लाठी ली और आवाजो की दिशा में चल दिया. हवा तेज चल रही थी चाँद खामोश था. कोई कवी होता तो ख़ामोशी पर कविता लिख देता और एक मैं था जो इस तनहा रात में भटक रहा था बिना किसी कारन

मुझे ये तो नहीं मालूम था की समय क्या रहा होगा , पर अंदाजा रात के तीसरे पहर का था , मैं नदी के पुल पर पहुँच गया था ये पुल था जो जंगल को अर्जुन्गढ़ और रतनगढ़ से जोड़ता था , और तभी सरसराते हुए जानवरों का एक झुण्ड मेरे पास से गुजरा, इतनी तेजी से गुजरा की एक बार तो मेरी रूह कांप गयी, करीब पंद्रह बीस जानवर थे जो हूकते हुए भाग रहे थे मैं दौड़ा उनके पीछे ,

कभी इधर ,कभी उधर , मैं समझ नहीं पा रहा था की ये सियार ऐसे क्यों दौड़ रहे है और फिर वो गायब हो गए, यूँ कहो की मैं पिछड़ गया था उस झुण्ड से , मैंने खुद को ऐसी जगह पाया जहाँ मुझे होना नहीं था मेरी दाई तरफ एक लौ जल रही थी , न जाने किस कशिश ने मुझे उस लौ की तरफ खीच लिया , और जल्दी ही मैं सीढियों के पास खड़ा था , ये सीढिया माँ तारा के मंदिर की नींव थी , जिस चीज़ ने मुझे यहाँ लाया था वो मंदिर की जलती ज्योति थी , मैं एक बार फिर से रतनगढ़ में था.

दुश्मनों का गाँव, ऐसा सब लोग कहते थे पर क्या दुश्मनी थी ये कोई नहीं जानता था , दोनों गाँवो के लोग कभी भी तीज त्यौहार, ब्याह शादी में शामिल नहीं होते थे, खैर, मैं सीढिया चढ़ते हुए मंदिर में दाखिल हुआ, सब कुछ स्याह स्याह लग रहा था , और एक गहरा सन्नाटा, शायद रात को यहाँ कोई नहीं रहता होगा. मुझे पानी की आवाज सुनाई दी मैं बढ़ा उस तरफ मंदिर की दूसरी तरफ एक छोटा तालाब था , सीढिया उतरते हुए मैं वहां पहुंचा .प्यास का अहसास हुआ मैंने अंजुल भर पानी पिया ही था की

“चन्नन चन ” पायल की आवाज ने मुझे डरा सा दिया . आवाज ऊपर की तरफ से आई थी मैं गया उस तरफ “कौन है बे ” मैं जैसे चिल्लाया

“क्या करेगा तू जानकार” आवाज आई

मैं- सामने आ कौन है तू

कुछ देर ख़ामोशी सी रही और फिर मैंने दिवार की ओट से निकलते साये को देखा, वो साया मेरे पास आया मैंने उन आँखों में देखा, ये आँखे ,, ये आँखे मैंने देखि थी

“तू यहाँ क्या कर रहा है इस वक़्त ” वो बोली

मैं- रास्ता भटक गया था

वो- अक्सर लोग रस्ते भटक जाते है

मैं- तुम यहाँ कैसे ,

वो- मेरा मंदिर है जब चाहे आऊँ जाऊं

मैं- मंदिर तो माता का है

वो- मुर्ख , मेरे बाबा पुजारी है मंदिर के, पास ही घर है मेरा ज्योत देखने आई थी , इसमें तेल डालना पड़ता है कई बार, पर तू यहाँ क्यों, एक मिनट तू चोरी करने आया है न चोर है तू .... अभी मैं बाबा को बुलाती हु.

अब ये क्या है ...........

मैंने उसे पकड़ा और मुह दबा लिया , ये दूसरी बार था जब किसी नारी को छुआ हो मैंने,

“चोर नहीं हूँ, मेरा विश्वास करे तो छोडू ” मैंने कहा

उसने मेरी आँखों में देखा और सर हिलाया तो मैंने उसे छोड़ा.

वो- जान निकालेगा क्या

मैं- और जो तूने चोर समझा उसका क्या

वो- कोई भी समझेगा, बे टेम क्यों घूमता है

मैं- आगे से नहीं घुमुंगा, वैसे तेरा शुक्रिया उस दिन के लिए

वो- किस दिन के लिए, ओह अच्छा उस दिन के लिए , वैसे तू भाग क्यों रहा था उस दिन

मैं- झगडा हुआ था उन लडको से

वो- आवारा लड़के है सबसे उलझते रहते है , अच्छा हुआ जो तू उनके हाथ नहीं लगा वर्ना मारते तुझे,

मैं- सही कहा

वो मंदिर के अन्दर गयी और एक थाली लायी, जिसमे कुछ फल थे

वो- खायेगा

मैं- न,

वो- तेरी मर्जी , वैसे तू किस गाँव का है , यहाँ का तो नहीं है

मैं- बताऊंगा तो तू भी दुसरो जैसा ही व्यवहार करेगी

वो- अरे बता न

मैं अर्जुन्गढ़ का

वो- सच में , सुना है काफी अच्छा गाँव है

मैं- तू गयी है वहां कभी

वो- ना रे, चल बहुत बात हुई मैं चलती हु, कही बाबा न आ जाये मुझे तलाशते हुए.

मैं- हाँ , ठीक है , मैं भी चलता हूँ

वो- मंदिरों में लोग दिन में आते है रातो को नहीं , राते सोने के लिए होती है .

मैं- दिन में आ जाऊँगा ,

वो- आ जाना सब आते है ,

मैं- दिन में दुश्मनों को लोग रोकते भी तो है ,

वो- इस चार दिवारी में कोई दुश्मन नहीं , लोग सब कुछ छोड़कर आते है , कभी दिन में आके मन्नत मांगना सब की पूरी होती है तेरी भी होगी .

मैं- तू मिले तो आ जाऊंगा .

वो- परसों ..................... दोपहर ....

मैं मुस्कुरा दिया . न जाने कैसे उस अजनबी लड़की से इतनी बात कर गया मैं , चलते समय मैंने थाली से दो सेब उठाये और रस्ते भर उसके बारे में ही सोचते हुए आ गया, कब जंगल पार हुआ , कब खेत कुछ ध्यान नहीं, ध्यान था तो बस एक बात वो गहरी आँखे
 
#6

दो- तीन दिन गुजर गए , मैं न जाने किस दुनिया में था , कोई होश नहीं कोई खबर नहीं , मुझे इतना जरुर मालूम हुआ था की मेरे भाई की सगाई कर दी है , पर क्या उस से मुझे फर्क पड़ता था , बार बार आँखों के सामने वो लड़की आती थी , जैसे कोई डोर मुझे उसकी तरफ खींच रही थी . आखिरकार मैंने एक बार फिर से रतनगढ़ जाने का निर्णय लिया.

पर इस बार रात में नहीं , क्योंकि हर रात महफूज हो ऐसा भी नसीब नहीं था मेरा, खैर उस शाम मैं रतनगढ़ से थोड़ी ही दूर था , मेरी मंजिल तारा माँ का वो ही मंदिर था , जहाँ मैं उस गहरी आँखों वाली लड़की से मिल सकता था, और हाँ उसका नाम भी पूछना था इस बार, न जाने क्यों मैं उसे अपने से जुड़ा मानता था , जबकि हमारी सिर्फ दो मुलाकाते ही हुई थी और दोनों अलग अलग परिस्तिथियों में.

शाम और रात के बीच जो समय था मैं दूर था थोडा सा मंदिर से और तभी मैंने सामने से एक गाड़ी रफ़्तार से अपनी और आते हुए दिखी, मैं सड़क से उतर गया पर वो गाड़ी दाई तरफ मुड़ी और एक छोटे पेड़ से टकरा गयी. मैं गाड़ी की तरफ भागा पर पहुँचता उस से पहले ही गाड़ी से एक औरत निकली,.

माथे से खून टपक रहा था , हाथ में शराब की बोतल , समझ नहीं आया की नशे से झूम रही थी या दर्द से. वो वहीँ पास में धरती पर बैठ गयी , चोट से बेपरवाह बोतल गले से लगाये कुछ और बूंदे गटक गयी.

मैं उसके पास पंहुचा.

“ठीक तो है आप ” मैंने पूछा

“किसे परवाह है , ” उसने सर्द लहजे में कहा

मैं- आपको चोट लगी है , यहाँ के बैध का पता बताइए मैं ले चलता हु उसके पास आपको

बिखरी जुल्फों को हटा कर उसने मुझे देखा और फिर से पीने लगी. माथे से खून रिस रहा था .मैं समझ गया था की नशे की वजह से उसे स्तिथि का भान नहीं है .

पर तभी वो बोली- मेरी गाड़ी देखो , क्या वो चल पायेगी.

मुझे उसका व्यव्हार अजीब सा लग रहा था जब उसे मरहम-पट्टी की जरुरत थी , गाड़ी की चिंता कर रही थी वो. मैंने देखा गाड़ी को आगे से नुकसान हुआ था पर वो स्टार्ट हो रही थी.मैंने बताया उसे.

वो- मेरे साथ चलो.

उसने मेरा हाथ पकड़ा और गाड़ी में धकेल दिया.

“मैं जिस तरफ कहूँ उधर चलते रहना ” वो बोली

“पर मुझे तो कहीं और जाना है ” मैं बोला

उसने एक गद्दी नोटों की मेरी तरफ फेंकी और बोली- रख ले, और चल

मैं- इन कागज के टुकडो को किसी और के सामने फेकना , तुम्हारी दशा ठीक नहीं है इसलिए साथ चल रहा हूँ , रखलो अपने पैसे.

उसके होंठो पर हसी आ गयी, बोली- बरसो बाद किसी ने मुझे न कहा है .अच्छा लगा

मैं- एक मिनट रुको, मैंने उसके सर को देखा , जहाँ चोट लगी थी, और कुछ नहीं था तो उसकी चुन्नी को कस के बाँध दिया सर पर, तभी मेरी नजर सूट के अन्दर उसकी गोलाइयों पर पड़ी. बेहद नर्म होंगे, मैं इतना ही सोच पाया.

“कुछ देर के लिए खून बंद हो जायेगा ”

पर उसे कहाँ ध्यान था , उसे तो और नशा करना था , बीच बीच में वो बस बोलती रही इधर लो- उधर लो और शायद दस बारह कोस दूर जाने के बाद हम उजाड़ सी जगह पहुँच गए , उसने एक चाबी थी मैंने बड़ा सा दरवाजा खोला और गाड़ी अन्दर ले ली, इस चारदीवारी में पांच छह कमरे थे, एक छोटा बगीचा था .

वो गाड़ी से उतरते हुए लडखडा गयी, मैंने उसे सहारा दिया और इस तरह मेरा उस से स्पर्श हुआ, किसी महंगे इत्र की खुशबु उसके जिस्म से मैंने अपने जिस्म में महसूस की. एक कमरे में बिस्तर था मैंने उसे वहां पर बिठा दिया. उसने फिर से बोतल मुह को लगा ली.

मैं- पहले से ही काफी नशा है और मत करो.

वो- ये जिन्दगी ही नशा है बोतल तो बस बहाना है .... खुद को सकूं देने का .

मुझे समझ नहीं आ रहा था की किस झमेले में पड़ गया हूँ मैं

मैं- तो मैं चलू , मुझे देर हो रही है , दूर जाना है

वो- चंपा को बुलाओ, कहाँ मर गयी वो .

मैं- कौन चंपा

वो- यहाँ की नौकरानी ,

मैं- यहाँ तो कोई नहीं , ताला तो हमने ही खोला है,

वो- कहाँ मर गयी हरामजादी, उसमे मालूम था मैं आउंगी आज .

तभी कमरे में एक औरत आई-

“माफ़ करना मालकिन मुझे आने में देर हुई, ”

तो ये चंपा थी, कोई चालीस- पैंतालिस साल की औरत , शायद यही कहीं आस पास रहती होगी, नौकरानी थी इस औरत की,

“कहाँ थी तू कुतिया , जल्दी से एक बोतल ला मेरे लिए ” वो चिल्लाते हुए बोली.

“जी ”चंपा बस इतना ही बोली और बाहर की तरफ मुड गयी

मैं-बस बहुत हुआ, अब और नहीं पीनी तुम्हे, एक तो चोट लगी है और ऊपर से ये तमाशा

वो- किसकी मजाल जो मुझे रोके

तभी चंपा एक बोतल ले आई , उस औरत ने ढक्कन खोला और मुह से लगा ली , मुझे भी थोडा गुस्स्सा आया मैंने वो बोतल छीनी और फेक दी,

वो- गुस्ताख, तेरी ये जुर्रत

उसने अपना हाथ मुझे मरने को किया पर मैंने उसे थाम लिया और बोला- बस , बस बहुत हुआ, अभी मेरे सामने नहीं चलेगा ये सब तू होगी किसी महल की रानी , पर ये ड्रामा कही और करना .

मैं- काकी इसको चोट लगी है कुछ मरहम वगैरा है तो ला दो लगाते है इसके .

चंपा बाहर गयी और थोड़ी से रुई और एक टियूब ले आई.

मैं- अभी दो मिनट चुप रहना मुझे दवाई लगाने दे.

न जाने मेरी बात का उस पर कैसा असर हुआ, उसने विरोध नहीं किया , मैंने उसके सर पर लगे कट पर दवाई लगाई और वापिस चुन्नी बाँध दी.

मैं- काकी कुछ खाने को है तो खिलाओ इसे और मुझे भी.

चंपा ने सर हिलाया और बाहर चली गयी.

“तुम जानते नहीं हो मुझे, इस गुस्ताखी की सजा तेरी जान भी हो सकती है ”

मैं- हाँ ले लेना मेरी जान , पहले अपनी हालत ठीक कर , अच्छा भला जा रहा था न जाने किस घडी में तू मिल गयी.
 
#7

“इतनी हिमाकत आज तक किसी ने नहीं की ”वो बोली

मैं-सच कडवा होता है, शायद नहीं बताया होगा किसी ने पर मैं सच बोलता हु,

वो- उफ्फ्फ्फ़ ये, अदा तेरी लड़के, चल तेरी बात मान ली, वैसे नाम क्या है तेरा.

मैं- कबीर, वैसे इस हालत में तुम्हे घर जाना चाहिए था और तुम यहाँ हो , क्या कोई फ़िक्र नहीं तुम्हे अपने आप की , शराब के नशे में देखो क्या हालत हुई है , अपने बारे में नहीं तो घर वालो का सोचा करो, क्या उन लोगो को मालूम है तुम पीती हो,

औरत- किसे परवाह है किसी की, सब मोह है कबीर कोई किसी का नहीं इस जहाँ में

तभी चंपा आई बोली- खाना तैयार है

मैं- ले आओ

वो औरत उठी, और लडखडाते कदमो से बाहर को चलने लगी,

मैं- चंपा ये कहा जा रही है तुम ले जाओ इसे

औरत- नहीं, मुझ किसी की मदद नहीं चाहिए, मैं खुद जाउंगी.

वो बहार चली गयी , थोड़ी देर बाद एक आवाज सी हुई तो मैं बाहर गया, चंपा भी बाहर आई, उसने मुझे कोने की तरफ इशारा किया . वो बाथरूम था मैंने देखा चंपा की मालकिन फर्श पर गिरी हुई थी , सलवार पैरो में फंसी थी फर्श पर मूत की धार बह रही थी , बस यही देखना बाकि था .

“चंपा, इसकी दशा सुधारो, साफ करो सब ” मैंने कहा

चंपा ने अगले कुछ मिनट बाथरूम में बिताये और फिर वो बाहर आई , बोली- साहब, मालकिन के बदन को साफ़ कर दिया है वो बेहोश है और अब कपडे नहीं है इनके पास, ये वाले तो गीले है ,

मैं- यहाँ कपडे नहीं रखती, दारू रखती है

चंपा कुछ नहीं बोली.

मैं अन्दर से एक चादर लाया और उस औरत के बदन पर लपेटा, उसके नंगे बदन को देखा मैंने पर चंपा पास थी तो बस ..... अन्दर बिस्तर पर लाके पटका उसे. पहली बार उसके चेहरे पर एक मासूमियत देखि मैंने , खैर मुझे तो भूख लगी थी मैंने खाना खाया. चंपा ने कहा की वो पास वाले कमरे में है कुछ चाहिए तो मैं उसे बुला लू.

न जाने कब कुर्सी पर बैठे बैठे मेरी आँख लग गयी, मालूम नहीं कितनी देर सोया होऊंगा , रात की कौन सी घडी थी जग गिलास निचे गिरने की आवाज से नींद खुल गयी , मैंने देखा वो पानी पीने की कोशिश कर रही थी, चादर बदन से हटी हुई थी, मैंने अब पूरी तरह से उसके नंगे बदन को देखा.

दूध सा गोरा रंग , जैसे सफेदी की चमकार , मध्यम आकार की छातिया , पतली कमर और थोड़े से बाहर निकले कुल्हे, पतली सुराही सी गर्दन , लरजते लाल होंठ . हालाँकि कायदे से ऐसा नहीं होना था पर उस समय हालात ही ऐसे थे,. मैं उठा और जग उसके होंठो पर लगाया. हाँफते हुए वो पानी ऐसे पीने लगी जैसे बरसो बाद आज मिला हो उसे.

कुछ पीया कुछ उसके बदन पर गिर गया. मैं उसे संभाल ही रहा था की वो मेरी बाँहों में झूल गयी, ताई के साथ हुई टेम्पो वाली घटना के बाद ये दूसरा अवसर था जब कोई औरत मेरे इतने करीब थी, मेरे हाथ ने उसकी पीठ सहलाई, मुझे मेरे तन की तरंगे अहसास करवाने लगी थी,और कोई भी मर्द का ईमान डोल जाये जब इतनी सुंदर औरत उसकी बाँहों में नंगी हो.

उसने अपना सर मेरे आगोश में छुपा लिया , uffffffffff कितनी मासूम लग रही थी वो, उस लम्हे में, कुछ देर उसे ऐसे ही लिए बैठा रहा फिर उसे सुला दिया. .पिछले कुछ दिनों में मेरी जिन्दगी इस तरह से खेल खेल रही थी की मैं हैरान था, , खैर सुबह जब आंख खुली तो सूरज सर पर था, पर वो देवीजी अभी तक सो रही थी.

चंपा ने मुझे चाय पिलाई, फिर मैंने उस से कहा की कपडे सुख गए हों तो उसे पहना दे, और कुछ खिला पिला दे , जब वो उठे तो. मैं थोडा बाहर चला गया , मैंने आस पास देखा इलाके को, इस तरफ मैं जिन्दगी में पहली बार आया था . थोडा आगे जाने पर मुझे बस्ती दिखाई दी पर मैं गया नहीं उस तरफ.

करीब घंटे भर बाद मैं वापिस आया तो एक नए आश्चर्य ने मेरा स्वागत किया . वो उठ गयी थी और उसका व्यव्हार ऐसा था की जैसे कल कुछ हुआ ही नहीं हो. एकदम सभ्य , शालीन, और हाँ उसे मेरा नाम याद था , कल की हर घटना याद थी उसे .पर मुझे चलना था तो मैंने उसे कहा - अभी जाना होगा वापिस,

वो- हाँ,चलते है .

थोडा लडखडा रही थी वो पर ठीक थी. उसने गाड़ी स्टार्ट की और हम रतनगढ़ की तरफ चल पड़े, थोड़ी दूर गए थे की गाड़ी झटके लेने लगी और बंद हो गयी.मैंने अपना माथा पीट लिया.

“ये भी धोखा दे गयी. ” बोली वो

मैंगाड़ी से उतरा और एक पेड़ के निचे बैठ गया

वो- करो कुछ

मैं - क्या करू, कोई मिस्त्री नहीं हूँ मैं. और ये तो पहले सोचना था कल दे मारी जब तो गाड़ी

वो कुछ नहीं बोली.

मैं- पैदल चलते है , मुझे तो दूर जाना है .

न जाने क्यों उसने हाँ कह दी.

“तो कबीर, क्या करते हो तुम ” उसने पूछा

मैं- खेती बाड़ी , छोटी मोटी मजदूरी

वो- हम्म

मैं- अपने बारे में बताओ

वो- कुछ नहीं है बताने को , वैसे मेरा नाम प्रज्ञा है

मैं- खूबसूरत नाम है बिलकुल तुम्हारे जैसा

वो हंस पड़ी, बोली- होगा ही मेरा नाम जो है

मैं- किसी रसूखदार परिवार की लगती हो , पर ऐसे नशा करके खुद का तमाशा करना ठीक नहीं लगता

वो- ये जिन्दगी खुद एक तमाशा है कबीर, और तुम जानते ही क्या हो इन रसूखदार परिवारों के बारे में, तुम्हारा सही है दिन भर काम किया और रात को चैन की नींद सो गए.

न जाने मुझे उसकी बात चुभ सी गयी, खैर उसने सच ही कहा था .

बातो बातो में हम काफी आगे आ गये थे की वो बोली- प्यास लगी है पानी पीना है .

मैंने इधर उधर देखा एक खेत में धोरा था ,

मैं- उधर पी लो

उसने कहा- कहाँ

मैं- धोरे में

वो- पागल हुए हो क्या मैं पियूंगी ये पानी

मैं- मर्जी है,

मैंने धोरे पर अपना मुह लगाया और पानी पी लिया वो मुझे देखती रही .

“मेरे पास आओ ” मैंने कहा

वो आई मैंने उसे बैठे को कहा और अपनी अंजुल भर के उसकी तरफ की , उसने अपने होंठ मेरी हथेली पर रखे, अपने आप में ये एक मुकम्मल अहसास था , मुझे महसूस हुआ की पानी वो पी रही थी प्यास मेरी बुझ रही हो .
 
#8

“पहली बार इतनी दूर तक पैदल चली हूँ ”प्रज्ञा बोली

मैं- हाँ तो ठीक है न कभी कभी आम इन्सान होने को भी महसूस करना चाहिए.

प्रज्ञा- तुम्हरी बाते न जाने क्यों अच्छी लग रही है

मैं- आदमी भी अच्छा हूँ , बस समय ख़राब है ,

वो- सब वक्त का ही तो खेल है ,

न जाने क्यों मुझे लग रहा था की प्रज्ञा के मन में कोई बोझ है पर अपना क्या लेना देना था , ऐसे ही बाते करते हुए हम दोनों उस मोड़ तक आ गए थे जहाँ से हमें जुदा होना था ,

मैं- अपने ज़ख्म को वैध जी को दिखा लेना, और कोशिश करना की ऐसे नशा न करो, मैं ये तो नहीं जानता की तुम्हारी परेशानिया क्या है पर इतना तो जान लिया है की एक नेकी , एक मासूमियत है तुम्हारे दिल में , उसे मत खोना

प्रज्ञा- तुम कहाँ रहते हो.

मैं-इस जंगल के परली तरफ

प्रज्ञा- पर वहां तो अर्जुन्गढ़ है ,

मैं- उस से थोडा पहले ही कुछ खेत आते है वहीँ पर,

प्रज्ञा- तुमसे मिलकर अच्छा लगा कबीर

मैं- मुझे भी

एक दुसरे को कुछ देर देखने के बाद मैं मुड गया , एक बार भी मैंने पीछे मुड कर नहीं देखा, बेशक मैं मंदिर जाना चाहता था पर अ जाने को मैंने वापसी का रस्ता ही अख्तियार किया , कभी कभी दिल को समझा लेना ही ठीक होता है पर ये दिल जो होता हैं न ये अपने रस्ते खुद ढूंढ लेता है , और जिसे हम शिद्दत से याद करते है वो कभी कभी ऐसे मोड़ पर टकरा जाता है जब कोई उम्मीद न हो.

जंगल में थोड़ी दूर ही चला था की मुझे बकरियों की आवाज सुनाई दी , कुछ दूर आगे बढ़ने पर मुझे वो दिखाई दी , वो गहरी आँखों वाली लड़की, जिस के लिए मैं कल आया था , उसने भी मुझे देखा और चिल्लाते हुए बोली- दुश्मनों के इलाके में यूँ नहीं घूमना चाहिए, किस्मत हर बार साथ नहीं देती.

मैं उसकी तरफ बढ़ते हुए, - पर तुम तो हो न मेरे साथ , फिर किस्मत का साथ किसे चाहिए

वो- मैंने सुना है जंगल इंसानों को अक्सर खा जाते है

मैं- मैंने कहा न तुम साथ हो तो कोई डर नहीं

उसने पानी की बोतल दी मुझे, मीठा पानी पीकर सकूं मिला .

वो- और कैसे इस तरफ

मैं- आजकल न जाने क्यों मेरा हर रास्ता तुम्हारी तरफ ही जाता है, मंदिर की तरफ गया था

वो- कर लिए दर्शन

मैं- हाँ अब कर लिए

वो मुस्कुरा पड़ी.

“बाते बहुत मीठी करते हो, ” उसने आँखे ततेरते हुए कहा

मैं- ये झोले में क्या है .

वो- परांठे है ,खायेगा

मैं- खिलाओगी

उसने झोले से खाना निकाला और मुझे दिया , मैंने खाना शुरू किया वो मेरे पास बैठ गयी .

मैं- बढ़िया है , बहुत दिनों बाद मैंने ऐसा भोजन खाया ,आभार तेरा

वो- तेरे घर में कौन कौन है

मैं- कोई नहीं मैं अकेला हूँ

वो- हम्म

मैं- तू रोज आती है इधर बकरिया चराने ,

वो- नहीं रे, मनमौजी हूँ मैं जिधर दिल करे उधर चल पड़ती हूँ , अब सबके भाग में सुख थोड़ी न हैं , मेहनत मजूरी करके जी रहे है बस

अब मैं क्या कहता उसें

मैं- बुरा न माने तो एक बात कहू

वो- बोल

मैं- जबसे तू मिली है , अच्छा सा लगने लगा है .

वो- मैं तो हु ही खुशगवार

मैं- सो तो है , मतलब मुझे लगता है की जैसे कुछ नया हो रहा है

वो- ऐसा कुछ नहीं है , तू भटकता रहता है मैं भटकती रहती हु, बस आपस में टकरा जाते है और तू एक बात कभी न भूलना , तू और मैं दुश्मन है .

मैं- हाँ, तो मार दे मुझे, निभा ले दुश्मनी,

वो- बातो से हकीकत नहीं झुठला पायेगा तू

मैं- अब कहाँ दुश्मन रहे अब तो मैंने दुश्मन का नमक भी खा लिया

वो- बाते न घुमा.

मैं- अपने मन की बता, क्या तू मुझे दुश्मन मानती है .

वो- मित्र भी तो नहीं तू

मैं- जानती है मैं रतनगढ़ सिर्फ इसलिए आया की तुझे देख, सकू, उस पहली मुलाकात को भुलाये नहीं भूल पाता मैं , मेरे कदम अपने आप तेरे रस्ते पर चल पड़ते है

वो- देख, हकीकत से न तू दूर है न मैं , तेरी जगह कोई और होता तो मैं उसकी मदद भी करती उस दिन, और ये बार बार मिलना इत्तेफाक है , तेरा मेरा सच जो है वही रहेगा.

मैं- एक सच और है जो इन सब से बहुत परे है वो है मित्रता का सच. मैं तेरी तरफ मित्रता का हाथ बढाता हूँ, तुझे मैं सच्चा लगु तो हाँ कह दे.

उसने अपना झोला उठाया और बोली- मुझे चलना चाहिए.

मैं- हाँ जाना तो है , फिर कब मिलेगी

वो- तू छोड़ दे इन रास्तो को

मैं- छोड़ दूंगा,

वो- बढ़िया है , चल चलती हूँ फिर

मैं बस उसे चलते हुए देखता रहा , थोड़ी दूर जाने के बाद वो मेरी तरफ पलटी और बोली- परसों दोपहर मंदिर के पीछे तालाब की सीढियों पर दिया जला देना,

ये क्या कह गयी वो, पूरे रस्ते मैं सोचता रहा, रह जैसे ख़ुशी से महक गयी थी ,खुमारी में मैं न जाने कब अपने खेत में पहुच गया

दूसरी तरफ प्रज्ञा हवेली पहुची, उसकी अस्त व्यस्त हालत देख कर सारे नौकर चाकर घबरा गए.

“कोई जाके वैध जी को बुला लाओ और बाग़ के रस्ते में हमारी गाड़ी ख़राब पड़ी है , कोई देख लेना उसे, ”प्रज्ञा ने हुक्म दिया और अपने कमरे में घुस गयी . सबसे पहले उसने अपने कपड़े उतारे और बाथरूम में घुस गयी ,आदमकद शीशे में उसने खुद को नंगी देखा तो नजर शीशे पर ही रुक गयी. लगा की जैसे बरसो बाद उसने अपने रूप को ऐसे निहारा था

न जाने क्यों उसे अपनी देह दहकती सी महसूस हो रही थी उसने शावर चलाया और ठन्डे पानी से भीगने लगी.

पर न जाने क्यों ये पानी भी उसके तन को और तडपा रहा था , प्रज्ञा का हाथ उसकी चूत पर चला गया .ग गुलाबी रंग का वो छोटा सा छेद, जिस पर काफी दिनों से उसने कुछ भी महसूस नहीं किया था . जैसे धधकने लगा था .जैसे ही उसकी उंगलियों ने उस छोटे से दाने को छुआ . प्रज्ञा का पूरा बदन हिल गया .

उसकी आँखे अपने आप बंद होती चली गयी, न जाने कब बीच वाली ऊँगली चूत के छेद में घुस गयी, उसके पैर थोड़े से खुल गये, खुमारी ने प्रज्ञा के सम्पूर्ण अस्तित्व पर कब्ज़ा कर लिया, तेजी से अन्दर बाहर होती ऊँगली उसे दूर कही आसमान में उडाये ले जा रही थी और फिर धम्म से वो फर्श पर गिर गयी.
 
#9

न जाने कितनी देर प्रज्ञा ऐसे ही पानी के निचे पड़ी रही , यौन सुख बहुत बार प्राप्त किया था उसने पर बहुत दिनों बाद त्रप्ति का अहसास हुआ था उसने, नहाने के बाद फिर से उसने खुद को शीशे में निहारा और निचे आ गयी, वैध इंतजार कर रहा था उसका, वैध ने सर की चोट को देखा, पट्टी की और एक दो गोली देकर चला गया. नौकरों से अपने पति और बच्चों के बारे में पूछा और फिर वापिस अपने कमरे में आ गयी .

इधर कबीर को न जाने क्या हो गया था भूख प्यास भूल गया था वो , बस एक बेख्याली थी , उस रात कबीर अपने कपडे रख रहा था की उसे कोने में पड़ा दिया दिखा तो उसने फिर से कोशिश की उसे जलाने की पर एक बार फिर उसे निराश होना पड़ा.

“दादा भी चुतिया था ” बस इतना ही कहा

दरसल इंतजार था उस दिन का जब वापिस रतनगढ़ जाना था . सुबह बस नहा कर तैयार ही हुआ था की ताई आ गयी, हाथो में खाने का डिब्बा लिए. उसे देखते ही मुझे वो सर्द अहसास हुआ जो टेम्पो में हुआ था .

ताई- खाना लायी हु तुम्हारे,

मैंने ताई की तरफ देखा और बोला- मुझे कुछ और खाना है,

ताई मेरे पास आई और बोली- क्या खायेगा मेरा बेटा

मैं- दूध पीना है मुझे .

ताई शर्मा गयी, उसे उम्मीद नहीं रही होगी की मैं ऐसे सीधा कह दूंगा उसे पर, टेम्पो में जो हुआ उसके बाद हम दोनों ही जानते थे की क्या करना है और हम दोनों की मंजूरी थी उसमे.

मैंने ताई को अपनी बाँहों में भर लिया और ताई के होंठो पर पाने होंठ रख दिए, ताई भी मेरा साथ देने लगी, उसने अपना मुह थोडा सा खोला और ताई का निचला होंठ मेरे दोनों होंठो के बीच आ गया. चुमते चुमते मैं ताई के नितम्बो को साड़ी के ऊपर से मसलने लगा. जब मेरे होंठ थकने लगते तो ताई चूसने लगती और जब वो थकती तो मैं चूसता

चूमा चाटी के दौरान मैंने ताई की साडी खोल दी अब बरी ब्लाउज की थी और जल्दी ही ताई के मोटे मोटे खरबूजे काली जाली वाली ब्रा में से बाहर आने को मचल रहे थे, मैंने कमरे को दरवाजा बंद किया और फिर से उसे बाँहों में भर लिया. वासना का तूफ़ान शुरू होने वाला था . ताई की ब्रा और पेटीकोट खोल दिए

काले रंग की कच्छी में ताई की मांसल भरी हुई जांघे, और चूत के ऊपर का फूला हुआ उभार किसी भी मर्द को उस पल पागल कर देता . एक बार फिर से मैं उसके होंठ चूसने लगा. मैंने अपने हाथ ताई की कच्छी में डाले और उसके मदमस्त नितम्बो को मसलने लगा मैंने दोनों कुलहो को फैलाया और ताई की गांड के छेद को अपनी उंगलियों से सहलाया.

ताई बुरी तरह से मुझसे लिपट गयी , उत्तेजना से भरी ताई ने मेरी पेंट खोल दी और उसने निचे सरकाते हुए मेरे लंड को अपनी मुट्ठी में भर लिया. अपना हाथ लंड पर ऊपर निचे करते हुए ताई ने उसके आकार का जायजा लिया और उसे जोर से हिलाने लगी. मुझे अब हद से ज्यादा मजा आने लगा था .

ताई अपने घुटनों पर बैठी और मेरी आँखों में देखते हुए लंड को मुह में भर लिया . थूक से सनी जीभ ने जैसे ही मेरे सूखे सुपाडे को छुआ, तन बदन में जैसे करंट सा लग गया , मेरे घुटने कांप गए मैंने अपने हाथो से ताई का सर थाम लिया. और वो बेरहम उसे चूसते हुए मेरे अन्डकोशो को सहलाने लगी,

“आह ताईजी ” मेरी आहे कमरे में गूंजने लगी और ताई पुरे मजे से मूझे लंड चुसाई का अहसास करवा रही थी, जैसे उसके लिए ये रोज का काम हो. मैंने उसके सर को कस क पकड़ लिया और मेरी कमर जोश से आगे पीछे होने लगी, और मुझे यकीं था की लंड ताई के गले की गहराई तक पहुच रहा है .

कुछ देर बाद उसने मुह से निकाल दिया और बिस्तर पर लेट गयी,मैंने पैरो में फंसी पेंट को साइड में फेका और बिस्तर पर चढ़ गया, ताई ने केअपनी एक चूची मेरे मुह में दे दी, बचपन में चूची से दूध बहुत पिया था पर ये एक नया अहसास था , ताई के निप्पल अकड़ने लगे थे, फिर ताई ने मेरा हाथ अपनी चूत पर रख दिया, कच्छी का अगला हिस्सा बहुत गीला था , मैंने चूत को कस कर दबाया ताई आंहे भरने लगी .

थोड़ी देर और चूची पीने के बाद मैंने कच्छी को उतार फेंका , किसी भी औरत के बदन का सबसे प्यारा हिस्सा उसकी चूत , मेरे सामने थी, ताई की चूत पर ढेर सारे बाल थे, और उन बालो के बीच काले रंग के होंठ मैंने उंगलियों से उन्हें खोला तो अन्दर का लाल हिस्सा दिखा मुझे , मैं बस देखता ही रहा गया,

ताई का बदन उत्तेजना से हिल रहा था मैंने उसके पैरो को और थोडा सा खोला और अपने चेहरे को उस पर झुका लिया , जिस तरह से ताई ने लंड चूसा था मुझे भी इच्छा हुई चूत को चूमने की. मेरी नाक उसकी चूत से टकराई तो एक सुगंध ने जैसे मुझ पर जादू कर दिया . मैंने महसूस किया की वो छेद एक कुवा है और मेरे होंठ जन्मो के प्यासे.

मैंने बिना देर किये उस तपती भट्टी पर अपने होंठ रख दिए.

“ओह kabirrrrrrrrrrrrrrr ” ताई जैसे चहकने लगी थी. चूत से रिश्ता नमकीन पानी मेरे मुह में घुलने लगा, और जब मेरी जीभ ऊपर उस छोटे से दाने से रगड़ खायी तो ताई ने मेरे चेहरे को अपने पैरो से दबा लिया और निचे से चुतड उठा उठा कर चूत चुसवाने लगी

पर जल्दी ही ताई ने मेरा मुह वहां से हटा दिया और लंड को पकड़ कर चूत पर रगड़ते हुए बोली- अब सह नहीं पाऊँगी, बहुत दिनों से प्यासी हु, अपनी ताई की प्यास बुझा बेटा

मैं भी तो प्यासा था मैंने बिना देर किये वैसा ही किया थोडा सा दवाब डालते ही ताई की चूत खुलने लगी और उसने लंड को अपने अन्दर ले लिया . ताई ने मुझे अपनी बाँहों में कस लिया और हमारे होंठ अपने आप जुड़ गए, कुछ देर बस उसके ऊपर लेटा रहा , उसके बाद हमारी चुदाई शुरू हो गयी.

आने वाले कुछ पलो में क्या हुआ कुछ होश नहीं रहा बस ये मालूम था की दो जिस्म एक दुसरे में समाये हुए है , दोनों एक दुसरे के चेहरे को चूम रहे थे , ताई की चूत में तेज तेज धक्के पड़ रहे थे और वो खुल क्र अपना रस बहा रही थी , न जाने कितनी देर तक हम ऐसा करते रहे और फिर ताई ने मुझे बुरी तरह जकड़ लिए, चूत ने जैसेकैद कर लिया लंड को और फिर वो चीखते हुए शांत हो गयी, और ठीक उसी पल मेरे लंड से पिचकारिया गिरने लगी, मैं अपने रस से ताई की चूत को भरने लगा.
 
Back
Top