Adultery प्रीत +दिल अपना प्रीत पराई 2 - Page 2 - SexBaba
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Adultery प्रीत +दिल अपना प्रीत पराई 2

#10

हम दोनों ने एक ऐसी मंजिल को पा लिया था जिसको हर कोई बार बार पाना चाहेगा , एक बार और ली मैंने और फिर पूरा दिन तबियत से सोया. ताई के जिस्म को तो पा लिया था मैंने पर दिल पर एक बोझ भी था जिसका भार बीते सालो से उठा रहा था मैं , शायद ताई को ऐसे प्यार करना मेरा प्रायश्चित था ,

पर अगले दिन में मेरे जेहन में था माँ तारा का मंदिर , ऐसा नहीं था की मैंने कोशिश नहीं की थी वजह जानने की आखिर क्यों दुश्मनी थी इन दोनों गाँवो की , बुजुर्गो से भी पूछा पर हर किसी ने बस इतना ही कहा की उन्हें नहीं मालूम. आखिर क्यों उस पुजारी ने कहा था की दुश्मन नहीं आएगा इस मंदिर में , और ऐसा था तो क्यों पुजारी की बेटी ने वहीँ बुलाया था एक नहीं बल्कि दूसरी बार.

खैर, उसके लिए भी कहा आसान था ऐसे ही किसी का साथ पकड़ लेना, जिसे वो जानती ही नहीं , मैंने उसे कहाँ असलियत बताई थी उसे, और दुश्मन से कोई भी रिश्ता रखना ,सोचने वाली बात तो थी ही. अगले दिन रतनगढ़ पहुँचते पहुचते दोपहर ही हो गयी थी .

वैसे भी अब तो जैसे ये सब रोज का हो गया था , खैर, मैं एक बार फिर से मंदिर प्रांगन में था , शायद दोपहर को यहाँ कोई नहीं होता था , मैंने अपना शीश झुकाया और मंदिर के पीछे वाले तालाब की तरफ चल पड़ा. ये कुछ सीढिया थी जो निचे को जाती थी .मैंने जेब से दिया और बाती निकाली जिन्हें मैंने कल ही खरीद लिया था .

तीली जलाई पर लौ नहीं जली, हवा भी ऐसी नहीं चल रही थी जो तीली जल न पाए, , मैंने फिर कोशिश की पर लौ नहीं जली. , अब मैं हुआ हैरान . माचिस आधे से ज्यादा खत्म हुई पर नतीजा शून्य , करे तो क्या करे , कोफ़्त सी होने लगी , गुस्सा आये पर जोर किस पर करे.

तभी मुझे एक विचार आया मैंने मंदिर में जलते दियो में से एक दिया वहां रख दू, मैं ऐसा करने जा रहा था की मुझे पुजारी आता दिखा, उसने भी मुझे पहचान लिया

पुजारी- तू तो वही है न

मैं- हाँ

पुजारी- तुझे कहा था न की नादानी मत करना

मैं- मंदिर तो सबका है तुम रोक नहीं सकते मुझे यहाँ आने से

उसने मुझे ऐसे देखा जैसे मैंने निहायत ही मुर्खता भरा सवाल कर लिया हो

पुजारी- नादान है तू अहंकारी , केवल दर्शनों के लिए तू आये ऐसी तेरी मंशा नहीं , कोई भी प्राणों का मोह त्याग कर ऐसा नहीं करेगा, शायद तेरी इच्छा यहाँ चोरी करने की है

मैं- इतना बुरा समय भी नहीं आया है मेरा की ये पाप करना पड़े

पुजारी -तो फिर क्यों आया यहाँ ,

मैं - कहा न दर्शन के लिए

पुजारी- एक बार और मैंने तुझे यहाँ देखा तो मैं राणाजी को बता दूंगा की अर्जुन्गढ़ का एक लड़का बार बार यहाँ आता है फिर तेरा नसीब

इस बकवास से मेरा दिमाग ख़राब हो रहा था , एक तो दिए की वजह से शर्मिंदगी थी और ऊपर से ये खाल खा रहा था

मैं- सुन, तुझे जिसे बुलाना है , बताना है जा अभी जा देर न कर, , किसी के बाप में दम नहीं जो मुझे रोक सके, और क्या ये गीत गा रहा है तू,

पुजारी को ऐसे जवाब की उम्मीद नहीं थी,

मैं- अरे मंदिर तो सबका होता है , देवता के लिए कौन अपना कौन पराया , वो किसी में भेद नहीं करता तो तू कौन है , तू तो इस पद के लायक भी नहीं .

पुजारी- काश मैं तुझे समझा पाता , खैर अब मैं तुझे रोकूंगा नहीं यहाँ आने से

एक तो मेरा काम हुआ नहीं था ऊपर से ये ड्रामा , मेरा भी मन नहीं था रुकने का तो मैं वहां से बाहर सड़क पर आ गया. मैं वही एक पेड़ की छाया में बैठ गया .कुछ देर ऐसे ही बीती , की मुझे गाँव की तरफ से एक गाड़ी आती दिखी , जो कुछ ही देर में मेरे पास आ रुकी

“तुम हमेशा ऐसे ही बैठे रहते हो पेड़ के निचे ” प्रज्ञा ने मुकुराते हुए कहा

मैं- तुम भी तो ऐसे ही मिलती हो .

प्रज्ञा - आओ बैठो

मैं- नही, वापिस जाना है मुझे , जिस काम के लिए आया था वो हुआ ही नहीं

प्रज्ञा- मैं कुछ मदद करूँ , आओ तो सही

उसने दरवाजा खोला और मैं गाड़ी में बैठ गया. उसने गाड़ी चालू की

मैं- किधर जा रही हु

वो तुम कहो उधर ही चलते है

मैं- जंगल की तरफ

उसने गाड़ी उधर ही मोड़ दी.

प्रज्ञा- कल मैं तुम्हारे बारे में ही सोचती रही

मैं- वो भला.

वो- कैसे तुम अचानक से टपक पड़े और ऐसा लगा की जैसे बरसो का साथ है

मैं- चोट ठीक है

वो- हाँ, और कल मैंने नशा भी नहीं किया

मैं- बढ़िया है न , खुबसूरत औरते खुद ही एक नशा होती है फिर उनको भला नशे की क्या जरुरत

प्रज्ञा हंस पड़ी मेरी बात सुनकर, बोली- औरतो के दिल जीतने का हुनर है तुम्हारे अन्दर.

मैं- अपना दिल थाम के रखना फिर,

आधे जंगल में आने के बाद एक टूटे चबूतरे के पास मैंने उसे गाड़ी रोकने को कहा

मैं- यहाँ बैठते है .

वो-यहाँ

मैं- महलो की रानी, आओ तो सही कभी कभी ऐसी जगहों पर भी शांति मिलती है

वो- कबीर, ताना क्यों मारते हो

मैं- चलो फिर.

हम दोनों चबूतरे पर बैठ गए,

प्रज्ञा- कुछ परेशां से लगते हो

मैं- कुछ नहीं बस काम नहीं हुआ इसके लिए

वो- किस तरह का काम

मैं- बस जीने के लिए छोटे मोटे काम कर लेता हूँ

वो- चाहो तो हमारे यहाँ कर लो काम, मैं व्यवस्था कर देती हु,

मैं- तुमने राह चलते को इतना मान दिया, अपने साथ बिठाया यही बहुत है मेरे लिए

वो- ऐसी बात मत कहो कबीर, तुमने हुए उस छोटी सी मुलाकात ने ,वो थोडा सा समय जो हम साथ थे मैं इतना तो जान गयी हूँ की सच्चे इन्सान हो तुम , यदि मैं कुछ कर सकू तुम्हारे लिए तो.

मैं- मेरा एक सवाल है , क्या मैं तुम्हे बता सकता हूँ उसके बारे में

प्रज्ञा - अरे, बिलकुल.

मैं- मैं एक दिया जलाने की कोशिश कर रहा हूँ जो जल नहीं पा रहा ,

प्रज्ञा- क्यों भला,

मैं - दिखाता हूँ

मैंने जेब से दिया निकाला और बाती को तीली दिखाई और कसम से वो जल गया

प्रज्ञा- ये तो जल रहा है

मैं- हाँ पर तारा माता के तालाब की सीढियों पर क्यों नहीं जला ये.

प्रज्ञा- क्या तुम वहां पर गए थे .

मैं- हाँ पर ऐसे क्यों पूछ रही हो.

प्रज्ञा- वहां पर वो दिया नहीं जलेगा कबीर, तुमसे ही या मुझसे भी नहीं , किसी से भी नहीं .

मैं- पर क्यों,
 
#11

मैं- पर क्यों,

प्रज्ञा- प्रीत का वचन कबीर,

मैं- किसका वचन

प्रज्ञा- कहानी है, किस्सा है, अफसाना तुम इसे जो भी कहो , कुछ लोग मानते है कुछ इत्तेफाक कहते है , , कहते है की किसी ने प्रीत की डोर तोड़ी थी , किसने ये कोई नहीं जानता ,ये जो मंदिर है हमारे गाँव वाला इसमें कुछ ऐसा हुआ था की तभी से इस मंदिर में कोई दीप नहीं जलता .

मैं- पर मैंने ज्योत जलते देखि,

प्रज्ञा- पुजारी वो ज्योत अपने घर से लाता है , कितने बरस तो मुझे देखते हो गए ,

मैं- पूरी बात बताओ न

प्रज्ञा- कुछ कहानिया अधूरी ही होती है कबीर,किसी को भी नहीं पता की वो कौन थे क्या हुआ था कब की बात है ,

मैं- तुमने मुझे उलझन में डाल दिया

प्रज्ञा,- कैसी उलझन

मैं- किसी ने मुझसे कहा था वो दिया जलाने को

प्रज्ञा- तो उसमे क्या हैं इस कहानी पर बहुत लोग विश्वास करते है , कोशिश करते है इसकी डोर ढूंढने को , खैर , जाने दो इस बात को तुम ऐसे जंगल में मत घुमा करो ये सुरक्षित नहीं है , कहीं कोई जानवर न मिल जाए, अभी परसों की बात है तीन लोगो की लाशें मिली है नोची हुई

मैं- क्या करू, मेरे पैर अपने आप मुझे इस तरफ खींच लाते है और अब तो मेरे पास कारण भी है

मेरी बात सुनकर प्रज्ञा के चेहरे पर लाली छा गयी .

प्रज्ञा- अच्छा जी, बाते बहुत मीठी करते हो

मैं- बताया तुमने ,पर प्रज्ञा इन दोनों गाँवो की दुश्मनी का कोई सम्बन्ध है क्या इस मंदिर से

प्रज्ञा- मुझे नहीं मालूम , और हमें इस बारे में बाते नहीं करनी चाहिए, हमारे पास और विषय है न, हैं न कबीर.

मैंने हाँ में सर हिला दिया.

प्रज्ञा से ये मेरी दूसरी मुलाकात थी पर ऐसा लगता था की जैसे वो हमेशा से मेरे साथ है , अहंकार बेशक उसके खून में था पर फिर भी कुछ तो मासूमियत थी उसमे,

“क्या सोचने लगे ” उसने पूछा

मैं- तुम्हारे बारे में ही सोच रहा था

वो- पर क्या

मैं- अपनी सी लगती हो तुम

वो- हम्म, सच कहू तो मैंने भी ऐसा ही महसूस किया कबीर

तभी उसने घडी देखि और बोली- अभी मुझे जाना होगा कबीर, मैं फिर मिलूंगी

मैं- कब

वो- शायद कल

मैं- ठीक है

हमने अपने अपने रस्ते बदले और दो दिशाए हमें जुदा करने लग गयी. मेरे दिमाग में बहुत सवाल थे , जिनके जवाब अब तलाश करने ही थे, मेरे दादा मेरे नाम करते है एक दिया. और तभी मेरे दिमाग की घंटी बजी , उस दिए का कोई न कोई सम्बन्ध रतनगढ़ से था , तो क्या मेरे दादा का कोई रोल था उस खंडित वचन में, पर दादा का जमाना ज्यादा पुराना नहीं था , फिर उनके साथ के लोग क्यों नहीं जानते थे इस कहानी का सार.

मेरे सवालो का जवाब वो लड़की दे सकती थी , पर वो मिले कहाँ , पुजारी का घर नहीं जानता था मैं , पर क्या वो मंदिर में होगी , शायद हाँ वही होगी, मैं उलटे पाँव मुड गया. बिना कुछ सोचे . पर भाग देखो मेरे और मंदिर के बीच का रास्ता ऐसा लम्बा हो गया की पहुँच नहीं पाया.

पुलिया के किनारे मैंने जीप देखि, ये मेरे पिता की जीप थी , दो गाड़िया और थी, पिताजी खड़े थे और कुछ लोग गड्ढा खोद रहे थे , मैं छुप के देखने लगा, उन दूसरी गाडियों में तीन चार बोरी थी , उन्होंने गड्डे में डाली और आपस में कुछ खुसुर पुसुर करने लगे.

मैं जानता था की अपने काले कर्मो को एक बार फिर ठिकाने लगा दिया उन्होंने. ये जंगल ऐसे न जाने कितने राज़ दबाये बैठा था , यहाँ जानवर कम खाते थे लोगो को, इन्सान ज्यादा खाते थे, मुझे बहुत नफरत थी की मैं एक ऐसे घर में पैदा हुआ.

तीन साल पहले मैंने घर छोड़ा था , और इन तीन सालो को कैसे जिया था ये बस मैं जानता था, तन्हाई, अकेलेपन को कैसे महसूस किया था मैंने , बस मैं जानता था . सब कुछ जैसे शून्य हो गया था मेरे लिए. सांझ ढलने लगी थी , मैंने वापिस आके चारपाई बाहर निकाली और लेट गया. अगले दिन का इंतज़ार जैसे लम्बा हो गया था .

अगले एक हफ्ते तक मैं लगातार मंदिर गया, पुजारी ने जैसे मेरे होने को ना होना समझ लिया था, मैं मंदिर घंटो बैठे रहता , जंगल में तलाश करता उसे, पर वो न मिली, जैसे सब भूल गया था मैं , जिन्दगी जैसे इंतज़ार हो गयी थी , मैं उसे पुकारना चाहता था पर उसका नाम भी तो नहीं जानता था .

दुनिया कहती थी की यहाँ सबकी दुआ कबूल होती थी और एक मैं था की मुझे मिल रहा था इंतज़ार. न जाने वो कौन सी रात थी , मैं वही मंदिर में पड़ा था , की मेरी अधूरी नींद जैसे गायब हो गयी, उस पायल की आवाज को मैंने उनींदी अवस्था में भी पहचान लिया. बेहद थके होने के बाद भी मैं जैसे दौड़ पड़ा .

और फिर मैंने उसे देखा पानी की टंकी के पास से वो मेरी तरफ आ रही थी , मेरी नजरे उस से मिली और मैं जैसे दौड़ पड़ा उसकी तरफ और तभी मेरा पाँव गीले फर्श पर फिसला और मैं एक शिला से जा टकराया. दो पल में ही सब जसी घूम सा गया.आसमान के सारे तारे जैसे आँखों में उतर आये थे . बड़ी मुश्किल से खुद को सँभालने की कोशिश हुई मुझसे

“ठीक हैं , उठ जरा ” उसने मुझे सहारा देते हुए कहा

वो मुझे अन्दर ले आई और एक दिवार के साहारे बैठा दिया.

“कहाँ थी तू ” मैं बोला

वो- यही थी ,

मैं- कहाँ थी तू

वो - काम था मुझे

मैं- कितने दिनों से तेरी राह देख रहा हूँ और तू है की ..................

वो- चुप रह जरा, ले थोडा पानी पि शांत हो जा.

पानी पीकर थोडा चैन आया .

वो- मैंने तुझे कहा था की यहाँ मत आना,

मैं- किसी और ठिकाने का पता भी तो नहीं बताया तूने.

वो- पागल है तू पूरा. और ये क्या हाल बनाया हुआ है कोई तुझे देखेगा तो क्या कहेगा

मैं- फर्क नहीं पड़ता, मुझे मेरे सवाल का जवाब दे.

वो- शांत तो हो जा, और चिल्ला मत बाबा न आ जाये इधर.

वो मेरे पास आयी और मेरे चेहरे को अपने हाथो में लिया. बोली- देख मेरी तरफ, अब आ गयी हु न , अब मेरी सुन तू सुबह सुबह ही यहाँ से अपने घर जाना, मैं वादा करती हूँ कल दोपहर को तुमसे मिलूंगी. पर तू भी मुझे कह की तू ऐसे नहीं भटकेगा. कल जब हम मिलेंगे हम खूब बात करेंगे. अभी मैं रुक नहीं सकती , जाना होगा ...
 
#12

“जा फिर, ” मैंने कहा

उसने मेरी आँखों में देखा , उसकी यही तो खास बात थी उसे शब्दों की जरुरत नहीं पड़ती थी, और उस कमजोर लम्हे में मैं कोई नहीं था उसे रोकने वाला. मेरा दिल चाहता था की उसे इस तरह बाँहों में भर लू, पर जो हो नहीं सकता ,

आखिर ये क्या बेचैनी थी क्यों मैं बस उसे ही देखना चाहता था . क्यों दुनिया लगने लगा था उसका चेहरा, ऐसा नहीं था की वो कोई हूर थी , पर जैसी भी थी अपनी लगी थी, खैर, अभी के लिए तो इस पराई धरती ने मुझे ठुकरा दिया था , उसके जाने के बाद भी मैं राह को देखता रहा .

पहली दफा ऐसे लगा जैसे कदम बहुत भारी से हो गए थे .

खैर, मुझे वापिस तो आना ही था. भूख से बहाली थी पर हालत ऐसी थी की जैसे किसी ने अन्दर से कुछ तोड़ सा लिया हो .नहाने के बाद मैं गाँव की तरफ निकल गया . स्कूल के रस्ते में मुझे सविता मैडम मिल गयी.

मैडम- कबीर, कैसे हो.

मैं- जी ठीक हूँ आप कैसी है

मैडम- देख कर बताओ कैसी लग रही हूँ, वैसे आज इस तरफ कैसे.

मैं- बस गाँव की याद आई, थोड़ी भूख सी लगी थी तो सोचा हलवाई की दूकान होता चलू.

मैडम- चलो मेरे साथ आओ

मैं- किधर.

मैडम- मेरे घर.

मैं-किसलिए

मैडम- खाना खाने और किसलिए

मैं- फिर कभी, आप क्यों परेशां होती है

मैडम- मैंने कहा न आओ मेरे साथ . स्कूल थोड़ी देर बाद चली जाउंगी

मैं मैडम के साथ उनके घर आया, मैडम नाश्ता ले आई.

मैडम- मैंने कहा था न इसे अपना ही घर समझो, तुम कभी भी आ सकते हो यहाँ खाने .मुझे अच्छा लगेगा.

घर का बना कुछ भी उसकी होड़ कभी नहीं हो सकती थी, मैं कभी कच्चा पक्का खुद बनाता था कभी बाहर खाता था, इस स्वाद के लिए तड़पता ही तो था मैं . मैडम के चेहरे पर म्मैने ख़ुशी की एक झलक देखि मैंने

मैडम- तुम्हारी माँ, मिली थी कुछ रोज पहले, तुम्हारे भाई की शादी होने वाली है कुछ दिनों में, सारे गाँव का न्योता है जलसे का.

मैं- बड़े लोगो के चोंचले. बस मौका चाहिए झूठी शान दिखाने का .

मैडम- तुम्हारे लिए चिंतित है ठकुराईन , बहुत याद करती है वो .

मैं- फिर भी एक बार भी नहीं आई.

मैडम- कबीर, जिन्दगी कभी कभी हमें बहुत कठिन समय दिखाती है पर परिवार ही होता है जो हमें उस कठिन समय को सहने की शक्ति देता है

मैं- आपको मानता हु अपना परिवार. इसीलिए आपको ना नहीं कहता पर मेरी भी कुछ मजबुरिया है

मैडम ने फिर कुछ नहीं कहा , उसके बाद मैं बस भटकता रहा इधर उधर, गाँव के कुछ लोग मिले, दुआ सलाम हुई , मालूम हुआ की भाई के ब्याह की खूब जोर शोर से तैयारिया कर रहे थे ठाकुर साहिब , एक दिल तो किया की चक्कर लगा ही लूँ घर के आजू बाजु पर इन्सान का अहंकार, वापिस आया खेत पर , कपडे बदले और टूटे चबूतरे वाला रास्ता पकड लिया .

इंतज़ार भी एक बहुत अजीब वाकया होता है , वक्त जैसे थम जाता है , उसने कहा थ वो आएगी , पर कब , घंटा बीता, या दो घंटे बीते मुझे करार न आये , कभी इधर देखू कभी उधर पर उसकी झलक न मिले. गुस्सा सा आने लगा पर कहू किस से इस खामोश जंगल में उस वक्त कोई भी तो नहीं था सुनने वाला. दोपहर सांझ की तरफ बढ़ने लगी थी और सांझ भी रात में बदल गयी.

“नहीं आना था तो सीधा ही कह देती, शायद मैं ही था जो उम्मीद लगा बैठा उस से ” मैंने अपने आप को गुस्से से कहा अब मेरा रुकने का मन नहीं था और मैं क्यों करू उसका इंतज़ार , गलती तो मेरी ही थी न एक दो मुलाकातों को हद से जायदा आगे समझ लिया था मैंने

वो तमाम रात अँधेरे में कटी , और मैंने फैसला कर लिया की भूल हुई सो हुई अब रतनगढ़ की तरफ मुह नहीं करूँगा. उधेड़बुन और निराशा ने जैसे मेरे अस्तित्व को हिला कर रख दिया था . न जाने मुझे क्यों ये रात भी उसी तरह से भारी लग रही थी जैसी कुछ साल पहले एक रात आई थी . बस उस रात मैं मजबूर था आज रात बेबस , मैं सोचता था क काश वो रात आई ही नहीं होती .

खैर, समय था बीतने लगा. किसी अधूरे ख्वाब के जैसे भुला दिया गया . करीब पंद्रह- बीस दिन बीत गए थे . मैं अपनी जमीं पर कुछ गड्ढे खोद रहा था की मैंने एक कार को मेरी तरफ आते देखा .
 
#१३

ये कार प्रज्ञा की थी . जल्दी गाड़ी मेरे पास आ गयी ,मैंने कुदाली साइड में रखी और शर्ट पहनते हुए उस तरफ गया. वो तब तक उतर चुकी थी

प्रज्ञा- कबीर, बड़ी मुश्किल से ढूंढा तुम्हारा ठिकाना , और तुम इतने दिन से कहाँ गायब थे .

मैं- आओ, बताता हूँ

बिजली नहीं आ रही थी तो ,मैं अन्दर से दो कुर्सिया ले आया और हम पेड़ के निचे बैठ गए.

मैं- कुछ कामो में उलझा था

वो- कम से कम मुझे तो बता सकते थे न .

मैं- बताना चाहता था पर तुम भी मंदिर की तरफ नहीं आई , फिर मैं नहीं जा पाया.

वो- बहुत दिनों से याद कर रही थी तुम्हे आज फिर मैं आ ही गयी.

मैं- अच्छा किया. चाय पियोगी

वो- नहीं , कोई जरुरत नहीं . तुम बस बैठो मेरे पास

मैं- पहले से और खूबसूरत लग रही हो.

वो- क्या तुम भी ऐसे झूठ बोलने की जरुँत नहीं तुम्हे.

मैं- नहीं सच में ,

वो- शायद शराब छोड़ने का असर है

मैं- अच्छी बात है जो तुमने छोड़ दी.

वो-तुमने कहा था तो बस छोड़ दी. , और बताओ क्या चल रहा है

मैं- कुछ खास नहीं, बस छोटे मोटे काम ही

वो- मैंने कहा न, तुम हमारे लिए काम कर सकते हो , मैं तुम्हारे रहने की व्यवस्था भी अपने उधर ही करवा दूंगी.

मैं- नहीं, प्रज्ञा ,मेरी अपनी कुछ मजबुरिया है .

वो- चले जाने को , एक ख़ुशी की बात बताती हूँ हमने शहर में एक होटल ख़रीदा है , जिसकी ख़ुशी में एक पार्टी है तुम आओगे न , देखो मना मत करना .

मैं- पर वहां और लोग भी तो होंगे, ऐसे में मैं कैसे, और किसी ने पूछा तो क्या कहोगी,

वो- तुम ये मत सोचो तुम मेहमान होंगे हमारे. मुझे अच्छा लगेगा

मैं- प्रज्ञा, तुम बड़े लोग मैं एक मामूली, ये तो तुम्हारा बड़प्पन है जो तुमने मुझे इस काबिल समझा है पर ये दुनिया , .................. कही मेरे कारण तुम्हे परेशानी ना हो .

प्रज्ञा- कैसी बाते करते हो तुम कबीर, हम दोस्त हैं न , और अपनी दोस्त की ख़ुशी में शरीक होना तो अच्छी बात होती है न .

मैं- ठीक है , पर आना कब है

वो- परसों

प्रज्ञा के आने से बहुत अच्छा लगा था , कुछ ही मुलाकातों में अपनों से भी अपनी लगने लगी थी , तमाम बातो को दरकिनार करते हुए जिस तरह से हमारा ये दोस्ती का रिश्ता बन गया था ,सुख था इसमें . दो ढाई घंटे वो मेरे साथ रही फिर लौट गयी.

पिछले कुछ समय में जीवन में परिवर्तन सा आ गया था, मैं ताई से दुबारा सम्भोग करने की उम्मीद कर रहा था , पर शायद विवाह की तैयारियों में लगी थी, कई दिन बल्कि चुदाई वाले दिन के बाद सही वो इस तरफ नहीं आई थी. पीठ का \जख्म भर गया था पर दिल घायल था .

शाम को मैं गाँव में गया था कुछ काम से और चौपाल पर मेरी मुलाकात मेरे पिता से हुई. कायदे से हम दोनों को एक दुसरे को नजरअंदाज कर देना चाहिए था पर उस दिन ऐसा हुआ नहीं .मुझे देखते ही उनके कदम पाने आप मेरी तरफ बढ़ गए.

“कर्ण की शादी है, तुम्हे मालूम तो होगा ही ” पिताजी ने कहा

मैं- सुना मैंने

पिताजी- सारे गाँव का न्योता है आ जाना तुम भी

मैं- छोटे लोग अमीरों की दावतो का हिस्सा नहीं होते

पिताजी- बड़े लोग अक्सर ऐसे आयोजनों पर गरीबो को बक्शीश देते है , रूपये पैसे उपहार देते है तुम्हे भी मिलेगा.

मैं- ये हाथ देखो मेरे, मजदूरी के लोहे में तप चुके है , पूरा दिन पसीना बहाते है तो शाम को जो रोटी मिलती है न , कोई राजा महाराजा भी उस स्वाद को नहीं दे सकता बक्शीश में ,

पिताजी- चलो मजदूरी के बहाने ही आ जाना, वैसे भी आजकल बड़ी मुफलिसी में दिन गुजर रहे है तुम्हारे.

मैं- गरीबी ही सही, किसी का हक़ तो नहीं मारा , किसी के घर में अँधेरा करके अपनी खुशिया रोशन नहीं की

पिताजी- ये तुम कह रहे हो. मेरे घर के एक हिस्से में तुम्हारी वजह से अँधेरा है ,हर पल मैं एक कमी महसूस करता हु,

मैं- पर मैं ऐसा नहीं समझता, मैंने जो किया सही किया और मुझे एक पल भी शर्मिंदगी नहीं है , हाँ दुःख है , बहुत दुःख है , पर फिर भी सकूं है की जिन्दगी में एक अच्छा काम किया

पिताजी की आँखों में मैंने अपने लिए अपार नफरत महसूस की , आस पास के लोगो की वजह से उन्होंने और फिर कुछ नहीं कहा, वापिस मुड गए वो . मैं सविता मैडम के घर की तरफ बढ़ गया .पर वहां ताला लगा था , मालूम हुआ शहर गयी है .

अगला दिन भी बस यूँ ही बीत गया , पर उस से अगला दिन खास था , मुझे शहर जाना था , प्रज्ञा ने होटल का पता दे दिया था. बेशक मेरा मन नहीं था पर दोस्ती थी, निभानी थी, ताई ने पैसो की गड्डी दी थी , उनमे से कुछ नोट खर्च करके मैंने अपने लिए नए कपडे खरीद लिए थे, तैयार होकर एक नयी शाम के लिए होटल पहुच गया .

एक दम शानदार होटल था, पांच मंजिल का, बनाने वाले ने पूरा मन लगाकर ऐसी शानदार इमारत बनाई होगी. सामने ही दोनों तरफ अप्सराओ की संगमरमर वाली मुर्तिया थी , एक बीचोबीच एक शानदार पानी का फव्वारा था और जब मैं अन्दर गया तो मैं हैरान रह गया. मैंने कल्पना की की, पुराने ज़माने में राजा महाराजो का क्या रुतबा रहा होगा.

न जाने कितने मेहमान थे वहा पर, कोई गिनती नहीं , एक कोने पर कुछ गायक फ़िल्मी गाने गा रहे थे, कितने ही बैरे घूम रहे थे खाने पीने का सामान लिए.

मैं जानता था की प्रज्ञा अमीर है पर इतनी अमीर ये मुझे आज मालूम हुआ . मेरी नजरे उस चेहरे को तलाश कर रही थी जिसके न्योते पर मैं यहाँ आया था . मैं वही एक कोने में बैठ गया . और जूस पीते हुए तमाशे को देखने लगा. करीब आधे घंटे बाद मैंने उसे देखा . और देखता ही रह गया.

खूबसूरत तो वो थी , पर कातिलाना खूबसूरती क्या होती है मैंने उस खास लम्हे में जाना था .
 
14

अगर मैं कहूँ की महफ़िल की हर नजर जैसे बस एक चेहरे पर थी तो गलत नहीं होगा. काली साड़ी में लिपटा गुलाब जिसे किसी गुलदस्ते किसी बाग़ की जरुरत नहीं थी, उसके साथ जो आदमी था शायद उसका पति रहा होगा. ऊँचा लम्बा कद, रौबीला चेहरा और दोनों की जोड़ी बहुत शानदार थी.

वो जोड़ा बड़ी शालीनता से सब मेहमानों की बधाई स्वीकार कर रहा था .उस ईमारत में जैसे तमाम जहाँ की खुशिया उतर आई थी, मैं बड़ी शिद्दत से चाहता था की प्रज्ञा मेरी तरफ देखे पर वो व्यस्त थी, घिरी थी मेहमानों से. बेशक यहाँ मैं भी था पर उसका अपने लोगो के साथ होना मुझसे ज्यादा जरुरी था.

जैसे सारा सहर ही मेहमान था , पर मुझे प्रज्ञा के अलावा और कोई नहीं जानता था . इस बीच कुछ घंटे ऐसे ही गुजर गए. दिल बहलाने को मैं होटल में घुमने लगा. हर मंजिल पर अलग सजावट थी , हल्का फुल्का खाना भी खाया , बेशक चारो तरफ लोग थे पर फिर भी दिल अकेला था, पिताजी के साथ हुई छोटी सी बहस का इस वक्त याद आना जी खट्टा कर गया .जलते दिल को और जलाने के लिए मैंने भी हाथ में जाम उठा लिया.

एक दो तीन चार, ........................... कलेजे को नहीं मै अपनी रूह को जैसे जलाना चाहता था . पता नहीं ये चौथी थी या पांचवी मंजिल थी . इस खुली बालकनी में ठंडी हवा जलते दिल को जैसे सकून सा दे रही थी ,

“यु अकेले अकेले जाम लेना हम जैसे साथियों पर गुनाह है कबीर ” जैसे ही मेरे कानो में ये आवाज पड़ी मैंने तुरंत घूम कर देखा, प्रज्ञा मेरे पीछे खड़ी थी .

“एक जाम मेरे हाथ में है एक बोतल मेरे सामने है ” मेरे मुह से अपने आप निकल गया .

प्रज्ञा- तो जनाब शायरी भी करते है .

मैं- बस अभी ये ख्याल आया.

प्रज्ञा- माफ़ करना मैं थोडा देर से मिली तुमसे, तुम तो जानते ही हो इतने मेहमानों के बीच थोडा समय लग ही जाता है

मैं- तुम इस लम्हे में साथ हो , और क्या चाहिए.

प्रज्ञा- लाओ एक पेग दो मुझे.

मैं- पर तुमने तो नशा छोड़ दिया न

प्रज्ञा- दोस्त के साथ ऐसे लम्हे बहुत कम मिलेंगे जिन्दगी में जब तुम होंगे मैं होउंगी और ये हसीं रात होगी, कल हम रहे न रहे ये याद तो होगी जो मेरे होंठो पर मुस्कान लाएगी.

मैंने इक जाम उसकी तरफ बढाया , उसने एक ही सांस में खींच दिया.

“हम्म, कड़क है ” उसने कहा

मैं- बस ठीक है .

प्रज्ञा ने एक पेग और लिया बोली- जानते हो दोस्त,हमारे रिश्ते में क्या खास है ,

मैं- बताओ.

वो- मैं तुम्हारे अन्दर खुद को देखती हूँ, तुम तमाम वो काम कर सकते हो जो मैं नहीं,इस खास होने के अहसास ने मुझे अपने आप से कब का दूर कर दिया .

मैं- पर तुम खास हो .

वो- तुम्हे भी ऐसा लगता है

मैं- मेरी दोस्त हो तो खास हो न

प्रज्ञा- बंद करो ये झूठी तारीफे

मैं मुस्कुरा दिया

प्रज्ञा- मैं हमेशा से ही तुम्हारे जैसी स्वछंद रहना चाहती थी , बागो में तितली जैसे, पर इस ख़ास होने ने कभी आम नहीं होने दिया .

मैं- मेरे साथ तो आम ही हो तुम

प्रज्ञा- इसीलिए तो तुम खास हो मेरे लिए. खैर खाना खाया तुमने

मैं- खा लूँगा बाद में

प्रज्ञा- आओ मेरे साथ , आज का खाना हम साथ खायेंगे

मैं- ये बेहद खास रात है , तुम्हे अपने परिवार के साथ होना चाहिए इन खास लम्हों में .

प्रज्ञा- काश ऐसा होता , राणाजी व्यस्त है अपने दोस्तों के साथ, बच्चे निकल गये घर के लिए . उनको इस तरह के तमाशे पसंद नहीं . तुम आओ मेरे साथ . और तुम भी मेरा परिवार ही हो, दुबारा ऐसा कहा तो नाराज हो जाउंगी समझे तुम .

मैं- हाँ बाबा समझा.

प्रज्ञा- तो फिर आओ मेरे साथ.

लगभग मुझे खींचते हुए वो एक कमरे में ले आई, कमरा क्या था जैसे एक छोटा महल हो . वो मेरे पास ही सोफे पर बैठ गयी. साडी का पल्लू गिरा हुआ. पर उसे कहाँ परवाह थी .

मैं- होटल बहुत ही शानदार है

वो- छोड़ो इन बातो को , मुझसे सिर्फ तुम्हारी और मेरी बाते करो

मैं- वही तो कर रहे है .

वो- बताओ क्या खाओगे.

मैं- जो तुम अपने हाथो से खिलाओगी.

वो- हाँ मेरे दोस्त, पर फरमाइश तो मेहमान की होगी न

उसने खाना मंगवाया .

मेरी दोस्त मेरे पहलु में बैठी अपने हाथो से मुझे खाना खिला रही थी , खाने के कौर के साथ साथ मेरे होंठ उसकी उंगलियों को भी छू रहे थे, पर उसे कोई परवाह नहीं थी, तब भी नहीं जब मैंने उसकी ऊँगली को चूम लिया. बेशक ये छोटे छोटे अहसास थे पर ये अहसास मुझे और प्रज्ञा को एक अलग डोर में उलझा लाये थे. एक ऐसी डोर जो हमारा आने वाला कल लिखने वाली थी .

ऐसा स्नेह मुझसे किसी ने नहीं किया था , मेरी आँखों में आंसू आ गए , मैं आभारी था उसका.

“क्या हुआ ” उसने पूछा

मैं- कुछ नहीं , बस ऐसे ही .

वो- दिल की बात दोस्त को बतानी चाहिए न

मैं- इतना स्नेह किसी ने नहीं दिया मुझे

प्रज्ञा- अब ये सब बोलकर मुझे पराया मत करो कबीर.

प्रज्ञा ने एक बोतल और खोल ली उसने गिलास में शराब डाली और एक घूँट लेकर गिलास मेरी तरफ बढाया

“दोस्ती के नाम ” मैंने गिलास अपने होंठो से लगा लिया, सांसो में जैसे उसकी सांसो की खुशबु घुल गयी.

खाने के बाद हम बैठे थे.

“आज हम रुकेंगे सुबह मैं तुम्हे घर छोड़ दूंगी. ” उसने कहा

मैं- ठीक है .

तमाम तरीके के हंसी मजाक करते हुए, हम शराब पीते रहे , उसने अपना सर मेरी गोद में रखा और सोफे पर लेट गयी. मेरे आगोश में आ गयी, मेरी निगाहें उसकी छातियो पर थी , उसके खूबसूरत चेहरे पर थी, घुटनों तक आई साड़ी पर थी पर मेरे मन में रत्ती भर भी वासना नहीं थी.

शायद यही भरोसा उसे मेरे इतने करीब ले आया था. न जाने कब मेरी आँख भी लग आई.
 
#१५

सुबह आँख जरा देर से खुली, मैंने देखा रात भर हम दोनों एक दुसरे से लिपटे हुए थे, मेरे सीने में अपना मुह छुपाये वो किसी अधखिली कलि सी लग रही थी. , हौले हौले मैं प्रज्ञा के सर पर हाथ फेरने लगा .उसने और जोर से मुझे अपने आगोश में भर लिया. मैं उसकी पीठ थपथपाने लगा.

“उठ जाओ अब ” मैंने कहा

वो- थोड़ी देर और बस

मैं उसी पीठ सहलाता रहा . कुछ देर बाद वो उठ गयी . आँखे मसलते हुए बोली- जी करता है थोडा और सो लू, बहुत दिनों बाद गहरी नींद आई .

मैं- सो लो, पर मुझे तो जाना होगा.

वो- तैयार हो लो, नाश्ता कर लो फिर चलते है तुम्हे खेत पर छोड़ते हुए मैं भी गाँव के लिए निकल जाउंगी.

मैं- ठीक है.

तक़रीबन दो घंटे बाद हम लोग मेरे खेत पर थे.

प्रज्ञा- कल का दिन तुमने खास कर दिया मेरे लिए

मैं- नहीं, ऐसी बात नहीं है

प्रज्ञा- दिल करता है बस तुम्हारे साथ ही रहू, तुम होते हो तो मुकक्क्ल महसूस होता है मुझे

मैं- पर सच ये दुरिया है हमारे बीच

वो- इन दूरियों का भी एक अपना वजूद है , बाते तो बहुत है तुमसे करने को पर अभी जाना होगा. एक और दुनिया इंतज़ार कर रही है मेरा.

मैं- हाँ

वो- जल्दी ही मिलूंगी

मैंने सर हिला दिया. उसका जाना जैसे दिल भारी कर गया पर इस रिश्ते की हकीकत यही थी, साथ होकर भी दूर थे , दूर रहकर भी पास थे. गर्मियों के ये लास्ट के दिन थे बरसात का महिना ज्यादा दूर नहीं था मैं चाहता था की खेत भीग जाये, ताकि मैं कुछ सब्जिया बो सकू. मैं कुछ ऐसा करना चाहता था जिस से थोड़ी स्थाई कमाई हो , और शहर जाके सब्जिया बेचने का इरादा उनमे से एक था.

शाम से ही हवा के रुख में नमी सी थी, ठंडी हवा ने बड़ी राहत सी दी थी, और थोड़ी राहत और हो गयी जब ताईजी को मैंने खेतो की तरफ आते देखा, मेरे दिल में उमंग सी छा गयी.

“आज इस वक्त यहाँ ” मैंने कहा

ताई- तुम्हे देखने का मन था तो आ गयी.

मैं- मैं भी मिलना चाहता था , पर आप शायद व्यस्त थी.

ताई- कर्ण की शादी जो है , तुम्हारी माँ ने सारे काम मेरे जिम्मे ही रखे हुए है .

मैं- ठीक तो है , और बताओ

ताई- बस तुम्हारी याद आ रही थी

मैं- मुझे भी

हम दोनों ने एक दुसरे की आँखों में देखा, हम दोनों जानते थे की हमारे जिस्म एक दुसरे में समा जाना चाहते थे ,ढलती शाम और ये पुरवाई , वासनाओ के तंदूर को दहका रही थी . मैंने आगे बढ़ कर ताई को अपनी बाँहों में भर लिया और अपने होंठ ताई के होंठो से जोड़ दिए.

प्यासे होंठो का एक दुसरे को छूना बदन को दहका गया, जैसे जलते कोयले पर पानी के कुछ छींटे पड़ गए हो, एक लम्बे चुम्बन के बाद मैंने ताई को गोद में उठाया और अन्दर बिस्तर पर पटक दिया.

वो केवल दरवाजा बंद होने की आवाज नहीं थी , एक तूफान की दस्तक थी जो अब हमारे जिस्मो के बीच आने वाला था . अपनी बाँहों में एक बेहद गदराई औरत को लिए उसके लबो को पी रहा था मैं , ताई के पसीने की गंध मेरी कामुकता की ज्वाला को और भड़का रही थी . जी भर के मैंने उसके होंठो का रसपान किया.

धीरे धीरे कपडे तन से उतरते गए, ताई की झांटो से भरी चोट को मुठ्टी में भर कर दबा रहा था मैं और वो गहरी सांसे ले रही थी, एक गर्म छूट और प्यासा लंड एक बार फिर जोर आजमाइश करने को फडफडा रहे थे. ताई को घोड़ी बनाया मैंने और उस खूबसूरत गांड को देखने लगा, उसके हिलते कुल्हे इतने मादक थे की मैं अपने आप को उन्हें चूमने से रोक नहीं पाया .

“सीईईई ” मेरे लबो को कुलहो पर महसूस करते ही ताई सिसक उठी, मैंने हलके से दांत गडा दिए , ताई बुरी तरह से मस्ता गयी. हाथो से कुलहो को फैलाया तो दरबार मेरी आँखों के सामने था, ताई की गांड का हल्का भूरा छेद और आधे इंच भर निचे गहरे कालो से ढकी ताई की चूत ,

मैंने उसकी गांड के छेद पर अपना नाक लगाया और उसने सूंघने लगा. मेरी गर्म सांसो को महसूस करके चूत और पानी छोड़ने लगी. गांड के छेद पर मैं अपनी नाक रगड़ते हुए मैंने एक ऊँगली चूत में सरका दी और आगे पीछे करने लगा. ताई का बदन बुरी तरह कांपने लगा. चूत के गाढे चिपचिपे रस से मेरी उंगलिया , हथेली सरोबार होने लगी.

कुछ देर ऐसा ही चलता रहा फिर इअने ताई को सीधी कर दी और अपना लंड उसके हाथ में दे दिया. ताई उसे हिलाने लगी.

“मुह में लो ” मैंने कहा ताई ने अपना चेहरा मेरी जांघो के बीच झुका दिया और अपने मुह को खोलते हुए मेरे सुपाडे को मुह में दबा लिया.

उफ्फ्फ्फफ्फफ्फ्फ़ , क्या अहसास था , ताई की लिजलिजी जीभ में इतनी कशिश थी की लगा मैं अपना पानी मुह में ही न छोड़ दू कही .

“ओह ताई, कितनी गर्म है तू ” मैं उसे लंड चुसवाते हुए बोला. वो और जोर से चूसने लगी .
 
Let me explain

Raat ki apni ek kahani hai darasal aksar jo kaam din me nahi ho pate rat ko hote hai, rat bhi tanha hoti hai log bhi, log rato ko bhatkte rahte hai kyonki raat sabko apne aagosh me bhar leti hai

Rahi baat diye ki to uska raaz main tab kholunga jab ishq ko is kahani ke har ek reader ke dil me bhar dunga
 
#16

वैसे तो चुदाई का अपना ही आनन्द है पर जब किसी किसी नजदीकी रिश्ते वाले से ये सम्बन्ध बनते है तो चुदाई का मजा ही अलग होता है , दीन दुनिया भूलकर ताई लंड चूस रही थी, कुछ देर बात उसने मुह से निकाला और मेरे अंडकोष चूसने लगी, मेरे लिए एक नया अहसास था, गुदगुदाते हुए ऐसा मजा महसूस कर रहा था मैं की बता नहीं सकता.

कुछ देर बाद ताई उठ गयी मैं भी उठा और उसे अपने सीने से लगाते हुए चूमने लगा , मेरे हाथ उसकी गांड को सहलाने लगे, मसलने लगे, ताई की सांसे मेरी सांसो में घुलने लगी थी . ताई ने अपनी एक टांग उठा कर मेरी कमर पर रखी , और लंड को अपनी चूत पर टिका लिया,

वो कितना बर्दाश्त करती वो भी , घप्प से लंड चूत में घुस गया और खड़े खड़े चुदाई शुरू हो गयी,

दोनों हाथो में मोटे मोटे चुतड थामे मैं ताई की चूत में लंड अन्दर बाहर कर रहा था , उसने अपने दोनों हाथ मेरे कंधो पर रखे हुए थे और चुदाई का मजा ले रही थी .न जाने ऊपर वाले ने इन्सान को ये कैसी भूख दी थी, जिसके लिए वो हर रिश्ते-नाते को शर्मसार कर जाता है , उसे कुछ भी ख्याल नहीं रहता

और इसका उदाहरण हम दोनों थे, पर उस कमजोर लम्हे में ये सब बाते बेमानी थी, कुछ था तो बस कमरे में गूंजती वो चुदाई की आवाज जो तब ता क गूंजती रही जब तक की हमने अपनी पानी गर्मी बाहर नहीं निकाल दी. एक बार फिर हमने अपने अपने चरम सुख को प्राप्त कर लिया था.

चुदाई के बाद ताई ने अपने कपडे पहने , मैंने भी .

मैं- आज रात यही रुक जाओ न

ताई- नहीं रुक सकती, ब्याह का घर है , और मैं बताके भी नहीं आई, हाँ अगली बार जरुर रुक जाउंगी

मैं- ठीक है, चलो तुम्हे घर तक छोड़ आऊ

ताई ने हामी भरी , मैं ताई के साथ घर तक आया, मैंने दरवाजे के अन्दर निगाह डाली, एक नजर माँ को देखना चाहता था , पर मैं वापिस मुड़ गया. कहने को तो ये ईमारत मेरा ही घर थी, पर इस दहलीज और मेरे पैरो के दरमियान एक रेखा खिंची थी, जिसे बरसो पहले लांघ दिया था मैंने .

मेरी नजर ऊपर कोने वाले कमरे पर पड़ी, जो कभी मेरा होता था , पुरे घर में रौशनी थी बस एक उस हिस्से को छोड़कर, शायद गुजरे वक्त की तरह मुझे भी इस घर ने भुला दिया था . बीते सालो में मैंने एक भी इधर मुड के नहीं देखा था पर अब बार बार मेरा इधर आना जाना हो रहा था . क्या चाहती थी नियति मुझसे , आखिर मेरे तमाम सवालों के जवाब किसके पास था.

वापिस खेत पर आकर भी मुझे चैन नहीं था मेरी बेचैनी पागल कर रही थी मुझे, मैंने सोने की कोशिश की पर नींद रूठी थी, माथे पर पसीना था , एक घबराहट सी हो रही थी , ऐसा पहले कभी महसूस नहीं हुआ था , मैं कमरे से बाहर आया , मौसम ने अपना मिजाज बदला हुआ था , हवाए तेज चल रही थी ,

“काश तू आती मिलने, ” मेरे होंठो से जैसे एक आह सी निकली.

दिल ने एक बार फिर से पुजारी की लड़की को याद किया , उसका मासूम चेहरा आँखों के सामने आ गया. एक शोखी सी थी उस लड़की में, उसकी आँखों में झील सी गहराई थी , उसकी वो बेतकल्लुफी मुझे भा गयी थी.

पर मैं उसे क्यों याद कर रहा था ,मिलने का वादा करके भी वो आई नहीं थी , माना रही होंगी उसकी हजार मजबुरिया , समय नहीं मिला होगा पर एक दिन बाद, दो दिन बाद कभी तो आती, और मैं मैने तो सोच लिया था की उसे एक ख्वाब समझ भूल जाना था पर फिर क्यों याद आ रही थी मुझे वो.

“एक बार चलके तो देख , क्या पता मंदिर में मिल जाए वो . उसने कहा था जोत सँभालने आती है वो .”

“नहीं ” दिमाग ने कहा

“ चल तो सही, अपने यारो के लिए लोग न जाने क्या कर गए और तू थोड़े से इंतजार से घबरा गया ” दिल ने कहा

“जिस मंजिल पर जाना नहीं वो रास्ता क्या देखा ” दिमाग बोला.

दिल और दिमाग की कशमकश मुझे पागल करने लगी थी , और कहते है न की दिल से निकली आह न जाने क्या करवा दे, , मैंने एक बार फिर से मंदिर जाने का सोच लिया. सोच क्या लिया मैं चल पड़ा.

अँधेरी रात में, तेज हवा से जूझते हुए मैं रतनगढ़ की तरफ बढे जा रहा था , गाँव हमारा इलाका पीछे छूट गया था , मैं टूटे चबूतरे से कुछ दूर ही था की मेरी आखो ने एक लौ देखि, अँधेरी रात में शान से जलती लौ. मैं दौड़ पड़ा हाँफते हुए मैं पंहुचा , ये दिया था एक दिया जो टूटे चबूतरे पर जल रहा था.

हवाए इतनी तेज चल रही थी की मैंने बदन पर चादर लपेट रखी थी पर मजाल क्या इन गुस्ताख हवाओ की जो इस दिए पर अपना जोर दिखा सके, वो लौ इतनी शांत थी जैसे तालाब का शांत जल, उस दिए एक आभा थी जिसने मुझे अपने पास खींच लिया था, कोतुहल में मैंने उस दिए को उठा लिया और गजब हो गया.

अपने कंधो पीठ पर मैंने किसी को महसूस किया और फिर क्या हुआ मैं समझ पाता उस से पहले ही मैं धरती पर गिरा चीख रहा था , मेरी पीठ का मांस उधेडा जा रहा था

“आआआआआआआइ आआआआआआआआ ” मैं चीख रहा था, वो कोई जानवर था जो बेहद मजबूती से मुझे दबोचे मेरा मांस खा रहा था . मैं छुड़ाने की कोशिश कर रहा था ,क चीख रहा था पर मेरा जोर नहीं चल रहा था . बदन के पिछले हिस्से पर उसके पंजो की खरोचे महसूस हो रही थी, जैसे कोई मेरी पसलियों को खींचे जा रहा था .

और मैं बस रोये जा रहा था, बिलबिला रहा था दर्द से, चीखे जा रहा था .
 
#17

झटके से आँखे खुल गयी, सांसे गहरी थी मेरी, रौशनी ने जैसे कुछ लम्हों के लिए चौंधिया था पर जब मैंने देखा तो पाया की मैं एक नर्म, मुलायम बिस्तर पर पड़ा था, हॉस्पिटल के बिस्तर पर. क्या मालूम दिन था या रात. इधर उधर देखा कमरे में कोई नहीं था, बदन थोडा सा हिला डुला तो दर्द ने जैसे मेरे वजूद पर कब्ज़ा कर लिया.बोलना चाहता था पर आवाज दर्द के तले दब गयी.

तभी दरवाजा खुला और एक नर्स अन्दर आई. मुझे होश में आया देख कर वो मुस्कुराई

मैं- कहाँ हु मैं

नर्स ने मुझे चुप रहने का इशारा करते हुए कहा- नहीं, अभी नहीं,

मैंने अपने आप पर नजर डाली और एक पल के लिए मेरी रूह कांप गयी, हालत देख कर पुरे बदन पर पट्टियों का ढेर लगा था ,

“क्या हुआ मुझे ” मैंने मरी सी आवाज में पूछा

तभी दरवाजा फिर से खुला और मैंने उसे देखा, जिन्दगी किसे कहते है मैंने उस कमजोर, बिखरे हुए लम्हों में जाना था . डबडबाई आँखों से उसने मुझे देखा और बिना किसी की परवाह किये दौड़ कर मेरे सीने से लग गयी वो . ये कैसा पल था दर्द भी था सकून भी . सीने पर सर रखे जैसे मेरी धड़कने सुन रही हो वो.

उसने मेरा हाथ अपने हाथ में लिया , उसके आंसू गिर रहे थे मेरी हथेली पर मैंने बोलना चाहा पर उसने गर्दन हिलाते हुए ना कहा. न जाने कैसे पल थे ये उसकी आँखों से पानी गिरता रहा , अपने तमाम जज्बात जैसे आज बहा देना चाहती थी वो ... मैं खुश था क्योंकि वो साथ थी .

“आँखे तरस गयी थी , बहुत इतंजार करवाया आँखे खोलने में ” उसने संजीदा आवाज में कहा

मैं बस मुस्कुरा दिया.

“कैसी हो ” मैं बस इतना कह पाया

वो- अब ठीक हूँ , बहुत घबरा गयी थी मैं, डर गयी थी

उसकी बात अधूरी रह गयी , नर्स ने बीच में टोक दिया

“अरे तुम लोग बाद में बाते करना, पहले इसे डॉक्टर को दिखा लेने दो ” उसने कहा

थोड़ी देर बाद डॉक्टर आया, उसने जांच की और फिर बाहर चला गया ,डॉक्टर के पीछे पीछे वो भी .

मैं- कितने दिन रुकना होगा यहाँ

नर्स- दिन , कितने महीने पूछो

मैं- पूरी बात बताओ मुझे

नर्स- तुम्हे किसी जानवर ने खाया था , काफी मांस नोच गया . जब तुम्हे यहाँ लाया गया था तो चंद सांसे बची थी, मैं तो हैरान हु की तुम बच गए. हालत बहुत बुरी थी, शायद ये तुम्हारे साथ आई लड़की की दुआओ का असर है जो तुम बच गए.

मैं- कितने गहरे जख्म है

नर्स- जख्म, मांस ही नहीं बचा तुम जख्मो की बात करते हो. पर तुम ज्यादा बाते न करो , शरीर पर जोर पड़ेगा.

मैंने आँखे मूँद ली, कुछ कुछ उस रात की याद आने लगी मुझे , और तभी मेरी आँख फिर खुल गयी , डर ने डरा दिया मुझे .बदन में एक सिरहन सी दौड़ गयी, उस रात के बारे में सोचते ही.

मैं- उसे बुला दो

नर्स- ठीक है

नर्स बहार चली गयी और थोड़ी देर बाद वो आई.

वो- तुम्हारे घर का पता दो, घरवालो को भी तुम्हारी फ़िक्र हो रही होगी, मैं उन्हें खबर करवा दूंगी .

मैं- मेरे पास बैठो जरा

वो- यही हूँ मैं

मैं- थकी हुई लगती हो

वो- हाँ, थकी तो हूँ पर अब नहीं , और तुमसे नाराज भी हूँ, क्या जरुरत थी तुम्हे जंगल में भटकने की , ये तो तुम्हारी किस्मत थी मैंने तुम्हारी चीखो को सुन लिया वर्ना तुम्हारा तो काम तमाम हो गया था

मैं- तुम्हारी याद आ रही थी , तुमसे मिलने आ रहा था

वो- तो दिन में आते, जंगल सुरक्षित नहीं है जानते तो हो न तुम

मैं- दिन में भी आता था, पर तुम मिली नहीं

वो- मैं बाहर थी , जिस रात ये हुआ उसी शाम मैं वापिस गाँव लौटी.

उसने एक नजर घडी पर डाली और बोली- मुझे जाना होगा, पर जल्दी ही आ जाउंगी, तब तक आराम करो. जल्दी से ठीक होना है तुम्हे.

दरवाजे पर जाके उसने फिर देखा मुझे मुड़कर

मैं- सुनो, नाम तो बताती जाओ.

वो मुस्कुराई और बोली- मेघा.

मेघा, मेघा मेघा न जाने कितनी देर मैं उस नाम को दोहराता रहा फिर मुझे नींद आ गयी. सुबह उठा , दवाई ली, नर्स ने थोडा बहुत खिलाया पिलाया. मैं इतना तो समझ गया था की ये हॉस्पिटल बहुत ही बढ़िया है और बढ़िया होने का मतलब था महंगा होना. इस बात ने मुझे थोड़ी फ़िक्र में डाल दिया .

मैंने नर्स से पूछा - मेरे इलाज में काफी पैसे लग गए होंगे.

नर्स- हाँ

मैं- सभी बिल दिखाओ मुझे

नर्स - बाद में

मैं- दिखाओ अभी

कुछ देर बाद वो एक फाइल लेके आई जिसमे सारा हिसाब किताब था .

मैंने फ़ाइल् देखि और मेरे चेहरे पर शिकन छा गयी.

“इसे ये दिखाने की क्या जरुरत थी ” मेघा ने अन्दर आते हुए नर्स को डांट दिया

नर्स- इन्होने ही मंगवाई थी .

मेघा- बाहर जाओ थोड़ी देर के लिए

मेघा- और तुम्हे ये सब की कोई फ़िक्र नहीं होनी चाहिए

मैं- पर मेघा

मेघा- मैंने कहा न ,

मैं- ये रकम बहुत बड़ी है मैं कैसे चूका पाउँगा

मेघा ने मेरे हाथ से फाइल ले ली और बोली- तुम्हारी दोस्त है तुम्हारे साथ , कुछ पैसे भर दिए है कुछ भर दूंगी

मैं- मेघा मेरी बात सुनो.

मेघा- तुम मेरी बात सुनो , मेरे लिए सबसे पहले तुम हो, ये लम्हे है जो तुम्हारे साथ जीने है मुझे, तुम्हारा ठीक होना जरूरी है समझ रहे होना तुम

उसकी आँखों में जैसे जादू था, जो मुझ पर खूब चलता था ,

“तुम्हारे लिए कुछ लायी हूँ ” उसने झोला खोलते हुए कहा

मैं- क्या

वो- खाना

अपने हाथो से वो खिलाने लगी मुझे, ये जीवन के ऐसे अनमोल पल थे जो हमारे अनजाने रिश्ते को एक मुकाम देने वाले थे एक नाम देने वाले थे. , वो घंटो मेरे साथ बैठती, बाते करती, मुझे कहानिया सुनाती , कभी दिन भर तो कभी रात रात ,कहने को वो हॉस्पिटल का कमरा था पर अब जैसे दुनिया था,

दिन ऐसे ही गुजर रहे थे, हालत थोड़ी ठीक हुई, मैं अब उठने, बैठने लगा था , उसके साथ ने न जाने कैसा असर किया था मुझ पर , पर न जाने क्यों मुझे ऐसा लगता था की मेघा के मन में कुछ तो है जो वो छुपा रही थी
 
#18

कहते है न कभी कभी जिन्दगी में कुछ ऐसा हो जाता है की उम्मीद न हो. मैं मेघा से इतनी शिद्दत से मिलना चाहता था और तक़दीर ने देखो किस हालत में मुझे उसके पास ला पटका. हम दोनों एक दुसरे से इतना घुल मिल गए थे की कोई भी कह सकता था हमारी जोड़ी के बारे में . हॉस्पिटल के उस बंद कमरे में घंटो वो बैठी रहती , मेरा हाथ थामे.

रोज अपने साथ वो खाना लाती मेरे लिए, न जाने कैसे वो मेरी पसंद जान लेती थी, उसके हाथ से खाई हर रोटी का ही असर था जो मैं पहले से और ठीक होता जा रहा था , दवाइया तो बस बहाना था , डॉक्टर हर दो तीन दिन में नयी पट्टिया कर देता , मैं अपने ज़ख्मो को देखना चाहता था, देखना चाहता था की जिस्म को कितना नुक्सान हुआ है पर ऐसा हो नहीं पाता था.

पर एक सवाल अभी भी मेरे मन में था .

मैं- मेघा , पिछले कुछ दिनों से देख रहा हूँ, तुम उदास हो

मेघा- नहीं कबीर, ऐसी कोई बात नहीं,

मैं- दोस्तों से झूठ नहीं बोलते, मुझसे नहीं कहोगी तो किस से कहोगी.

मेघा- कबीर, तुम्हारी इस हालत की जिम्मेदार मैं हूँ , न मैं वो दिया जलाती न तुम उस तरफ आते, न वो जानवर तुमपर हमला करता

मैं- बस इतनी सी बात का बोझ है , अरे पगली, मैं तो आभारी हूँ उस जानवर का जिसकी वजह से तुम फिर मिली मुझे.

मेघा- कबीर, बेशक तुम इसे मजाक में टाल दो, पर मैं नहीं .जानते हो कितना डर गयी थी मैं. उस रात को याद करती हूँ तो रूह कांप जाती हिया, दर्द से तदप रहे थे तूम, खून बिखरा था , मुझे लगा मैं खो दूंगी तुम्हे.

मैं- मेघा, मेरा बस एक सवाल है तुमने वो दिया क्यों जलाया था उस रात को.

मेघा- मैं बस, मैं बस एक कहानी की सत्यता को जाँच रही थी .

मैं- कौन सी कहानी

मेघा- प्रीत की कहानी,

मैं- मुझे बताओ इस कहानी के बारे में

मेघा- ये कहानी क्या है , किसकी है ये कोई नहीं जानता कबीर, बस कुछ बाते है जो इशारा करती है की किसी ज़माने में कोई रहा होगा जिसने कोई वादा तोडा था, उसे माँ तारा के मंदिर में श्राप मिला था , तुमने देखा न मंदिर में कोई दिया नहीं जलता कभी, लौ को भी बाहर से जला कर फिर लाते है

मैं- ये तो मैं भी जानता हु , पर कैसा वादा तोडा था और किसने

मेघा- कहते है की वो जो टुटा चबूतरा है वहां पर कुछ हुआ था ,

मैं- एक बात बताना, अर्जुन्गढ़ की तरफ से जब शहर को जो रास्ता जाता है उसके पास उस मिटटी पर भी तुमने ही दिया जलाया था न

मेघा- हाँ

मैं- वहां क्यों

मेघा- मैं , घूम रही थी उस दिन उस तरफ

मैं- ये जानते हुए भी की वो दुश्मनों का इलाका है

मेघा- तुम भी तो ऐसा ही करते हो. और यही बात तुम्हे मुझसे जोडती है , तू भी भटकते रहते हो मैं भी .

मैं- इस कहानी के बारे में कौन बता सकता है .

मेघा- मालूम नहीं , पर कहते है की एक दिन आएगा जब टुटा वचन पूरा होगा.

मैं- तुम्हे विश्वास है इस पर.

मेघा- झूठ भी तो नहीं है ये. खैर कबीर, तुम आराम करो मुझे जाना होगा, और हाँ, आने वाले कुछ दिन मैं व्यस्त रहूंगी, तो कम आ पाऊँगी

मैं- कोई बात नहीं

जैसे जैसे मेरी हालत ठीक हो रही थी , मेघा का आना कम हो रहा था , कभी कभी वो तीन- चार दिन तक नहीं आती थी , पर उसकी मजबुरिया भी समझता था मैं. हर रोज शहर आने के नए नए बहाने खोजने भी तो आसान नहीं थे, हालाँकि मैं इतना मजबूत नहीं था की पूरी तरह से चल फिर सकूँ पर फिर भी मैंने कही जाने का सोचा.

“नर्स, मेरा एक काम करोगी.” मैंने कहा

नर्स- क्या

मैं- मुझे एक फ़ोन करना है .

नर्स, - करवा दूंगी.

मैं- पर मुझे नुम्बर नहीं मालूम

नर्स- तो फिर ऐसा मजाक क्यों किया

मैं- मजाक नहीं है, सुनो मुझे होटल शालीमार फ़ोन करना है ,

नर्स- फ़ोन नम्बर तो नहीं है , पर मेरे घर का रास्ता उधर से ही पड़ता है , नाम बता दो मैं तुम्हारी बात पहुंचा दूंगी.

मैं- सुनो, होटल की मालकिन है प्रज्ञा , सिर्फ उनसे ही मिलना , यदि तुम्हारी मुलाकात हो तो बस इतना कहना दोस्त, इस हॉस्पिटल में है . मेरी बात ध्यान रखना बस उनसे ही कहना किसी और से नहीं,

नर्स- ठीक है

दरअसल प्रज्ञा ही थी जिस पर मैं खुद से ज्यादा भरोसा करता था , परिवार के नाम पर बस वो ही थी मेरे पास. ये ठीक था की मेघा ने मुझे संभाल लिया था इन मुश्किल हालातो में पर शायद प्रज्ञा ही थी जो मेरे दर्द को समझ पाती . जब जब मेरी पट्टिया बदली जाती मैं अपने शरीर को देखता , मेरी हालत क्या से क्या हो गयी थी, और बिना मेघा ये कमरा हर पल जैसे काट खाता था मुझे

जब भी मैं सोचता मेरे दिमाग में प्रीत की डोर वाली बात आती जिसके सिरे मेघा ढूंढ रही थी, पर कोई तो होगा जो इस कहानी को जानता हो, कोई एक इन्सान जो बता सके की आखिर उस अधूरी कहानी में मैं कैसे जुड़ा था

मुझे ठीक से याद था की जैसे ही मैंने दिया उठाया था , ठीक उसी पर मुझ पर हमला हुआ था , आखिर ये कैसा इत्तेफाक था , बहुत सी बातो पर मैंने गौर किया था जैसे उन रातो में कैसे जानवरों के रुदन का पीछा करते हुए मैं बार बार रतनगढ़ पंहुचा था,

कैसे मुझे वसीयत में एक मिटटी का दिया मिला था , कैसे मंदिर की पहेली थी , हर चीज़ केवल मुझे जोड़ रही थी रतनगढ़ से और मेघा से. पर क्या नियति खेल रही थी ये खेल

क्योंकि ये सब बिलकुल मामूली नहीं था .मैं और मेघा , हाँ , मेघा, क्योंकि वो भी एक किरदार थी, उसका मुझसे मिलना, हमारी बाते, मुलाकाते सब किसी फिल्म सा था , जैसे किसी ने स्क्रिप्ट लिख दी हम रोल निभा रहे थे . बहुत सोचने के बाद मैंने फैसला किया, मैं हरहाल में मालूम करके रहूँगा की प्रीत के वचन का क्या राज है .
 
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