Adultery मालती का कामुक संसार (Adultery Upanyas) Part #02 Running - Page 6 - SexBaba
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Adultery मालती का कामुक संसार (Adultery Upanyas) Part #02 Running

अपडेट #16

सन 🖼️ #01

मोनू वापस महेंद्र क घर क आँगन में एक चारपाई पे लेता हुआ था

त्यागी जी- (रहस्य्मय माहौल का निर्माण करते हुए) अब अंतिम क्रिया बाकी है.. ?

हर किसी की नज़रें इस समय चारपाई पे लेते हुए बेहोश मोनू और उसके पास कड़ी सविता की पे hi तिकी हुई थी, तभी घर क पीछे बने नाम मात्र क स्नानघर की तरफ से त्यागी जी आते हुए नज़र आते है और उनके पीछे पीछे सत्तू एक बाल्टी उठाये हुए चला आ रहा था

त्यागी जी जल्दी hi सभी क सामने खड़े थे और उन्ही क पास सत्तू भी बाल्टी लिए हुए खड़ा था मानो त्यागी जी क अगले आदेश का इन्तिज़ार कर रहा हो

त्यागी जी- (अपनी आवाज़ मैं भारीपन और रहस्य उत्पन करते हुए) इस पानी मैं एक खास जल्दी बूटी मिले है और अब ऐसे धीरे धीरे मोनू क ऊपर सरीर पे डाला जायेगा, इसलिए अगर घर की सभी स्त्री चाहे तोह यहाँ से जा सकती है.. ककी मुझे बताने की जरुरत तोह है नहीं की मुझे मोनू क सरीर से सभी कपडे उतरने पड़ेंगे

त्यागी जी की बात सुनकर महेंद्र.. सविता, मालती, शीला और हर्षिता की तरफ देखते हुए

"तुम सभी अंदर चली जाओ"

मालती का मन बिलकुल नहीं था अपने बेटे को फिर से यु चोर क जाने का, पर वो अपने जेठ जी की बात नहीं ताल सकती थी.. इसलिए वो और उसके साथ बाकि औरते भी जल्दी hi अंदर की तरफ चल पड़ती है

जहा मालती, सविता और महेंद्र क कमरे मैं बने एक छोटे से मंदिर क आगे बैठ क प्राथना करने लगती है.. उसके कान तरसने लगे थे 'माँ' सब्द सुनने क लिए

यहाँ बहार त्यागी जी स्नानघर से जो बाल्टी भर पानी लाये थे उसमें उन्होंने कुछ खास जड़ी बूटियों को मिलाया था.. जिसके बारे मैं आगे पता चलेगा

त्यागी जी, मोनू क बेहोश पड़े सरीर क पास खड़े होक उसे देखते हुए

'आज तेरे जरिये में अपनी इस नयी जड़ी बूटी का असर भी देख पाउँगा'

फिर त्यागी जी अपनी सोच से बहार आते हुए सत्तू को इशारा करते है पर उससे पहले hi कुंदन आगे बढ़कर अपने बेटे यानि मोनू क सरीर से कपड़ों को अलग करने लगता है और जल्दी hi एक बार फिर से मोनू पूर्ण निवस्त्र था

पर अपनी बड़ी माँ की योनि मैं घरसँ क साथ चुदाई करने क बाद उसका लुंड अब सुप्त अवस्था में था

त्यागी, सत्तू से बाल्टी अपने पैरों क पास रखवाते है फिर अपने झोले से एक कपडा निकलता है जिससे एक अजीब सी गंध सी आ रही थी.. सायद उसमे भी किसी प्रकार की जड़ी बूटी का लैप लगा हुआ था

त्यागी जी एक बार सबकी नज़रें बचते हुए वही खड़े भानु की तरफ देखते है तोह उसे मन hi मन हसी आ जाती है

त्यागी जी मन hi मन

'मुझे पता है इस समय तेरी हालत उस नाग जैसी है, जिसने नेवले को निगल लिया हो.. और अब वो उसे न उगल सकता है, और न निगल सकता है'

त्यागी की सोच बिलकुल सही थी, ककी भानु भी कुछ ऐसी hi उलझन मैं फसा हुआ था

भानु मन hi मन

'कही ऐसा तोह नहीं की ये त्यागी मुझसे झूट बोल रहा है, और इस सपोले को होश आते hi ये मेरा नाम ले ले.. नहीं नहीं त्यागी का कहना है की उसने ऐसी जड़ी बूटियों का प्रयोग किया है की ऐसे अपने अंतिम समय का कुछ याद नहीं होगा

पर अगर कही इसने मुझे धोका दिया तोह..'

भानु ये सोचता है तोह उसकी मुट्ठियां ग़ुस्से से भक्ति चली जाती है

'अगर ऐसा हुआ तोह आज सबसे पहले मेरे हाथों यही त्यागी मरेगा, इन सबको तोह बाद मैं देखूंगा.. खून की होली खेली जाएगी इस घर मैं आज खून की'

भानु खुद को तैयार कर रहा था पर वो जब कुंदन को देखता है तोह मानो उसका जोश हवा होने लगता है

भानु खुद की सोच मैं खुद से कहते हुए

'त्यागी ने अगर खेल बिगाड़ा तोह आज मैं किसी को नहीं छोड़ूंगा, बस ये कुंदन अकेला भरी पद सकता है मुझपे.. समय आया तोह आज आर पार की लड़ाई होगी'

त्यागी, भानु को देखते हुए मंद मंद मुस्कुरा रहा था, मानो जैसे वो भानु क अंतर्मन मैं चलती बातों को भली भांति सुन प् रहा हो

महेंद्र- (जो कबसे त्यागी जी को खड़े खड़े कुछ सोचते हुए देख रहे थे) किया हुआ.. आगे बढिये

त्यागी जी मानो होश मैं आते हुए

"है.. है.."

त्यागी जी अपने हाथ मैं थामे हुए उस कपडे को उस जड़ी बूटी मिले हुए पानी मैं भिगोते है और फिर धीरे धीरे उसका पानी बेहोश पड़े मोनू क सरीर पे निचोड़ना सुरु कर देते है.. ये काम अगले 5-7 मं तक यही चलता रहता है की अचानक hi सभी को एक हलकी आह सुनाई पड़ती है

"मायआ..."

सभी क चेहरे पे मानो ज़माने भर की ख़ुशी एक साथ उभर आयी हो, हर कोई मोनू क पास आके खड़ा हो जाता है अगर किसी को सक था तोह सिर्फ भानु और सत्यम को

सत्यम अपने अंदर चलती आवाज़ को सुनते हुए

'ये मादरचोद त्यागी किया सच मैं इतना बड़ा वैद है'

भानु क मन का विचार

'कही होश आते hi मोनू मेरा नाम न ले ले'

इन दोनों क अलावा हर किसी को इस समय त्यागी जी सिर्फ एक वैद नहीं बल्कि कोई चमत्कार करने वाले पुरुष लग रहे थे

महेंद्र ख़ुशी से भरते हुए मन hi मन

'मुझे पूर्ण यकीन था, त्यागी भाई hi हमारे मोनू को ठीक कर सकते है'

वीरेंदर की आँखें ख़ुशी और हैरानी से बड़ी होती जा रही थी

'वाह त्यागी भैया ने तोह सच मैं चमत्कार कर दिया'

कुंदन

'आखिर मेरा बचा ठीक हो जायेगा'

हर किसी क मन में ख़ुशी की नयी लहर दौड़ पड़ी थी

तभी त्यागी जी उस बाल्टी का पानी जो अब बस थोड़ा सा hi बचा था उसे एक hi बार मैं मोनू क चेहरे पे उड़ेल देता है और ऐसे मैं जैसा होता है की इन्शान को सांस लेले मैं दिक्कत आने लगती है ठीक वही मोनू क साथ भी होता है अचानक सांस न ले पाने की वजह से उसका पूरा सरीर एक तीव्र हलचल पैदा करता है और अचानक hi इतने समय से बेहोशी की हालत मैं घूम मोनू अपनी जगह उठ क बैठ जाता है

मोनू- मायआ.......

आवाज़ इतनी तेज़ थी की अंदर तक सभी औरतों को सुनाई पद जाता है और सभी की सभी एक hi साथ बहार भाग पड़ती है

महेंद्र को अंदाज़ा हो गया था की अब सभी की सभी औरते यहाँ आने वाली होगी इसलिए वो जल्दी से अपने कंधे पे रखने वाले गमछा को मोनू क गुप्तांग यानि उसके लुंड क स्तन पे रख देता है

इधर अपने बेटे की आवाज़ सुनते hi प्राथना मैं लीं मालती क सरीर मैं मानो ऊर्जा का नया प्रवाह सा बहने लगा हो, वो जल्दी से बहार भगति हुई सभी से आगे मोनू क पास आती है और किसी भी बात की परवा किये बिना उसे गले से लगा लेती है.. इस समय अगर वह कुछ था तोह सिर्फ एक माँ बेटे का प्रेम

सिर्फ एक माँ की ममता, इस प्रेम मैं हवस और कामुकता का कोई भी अंश नहीं था

मालती- मोनू.. मेरे बचे.. मेरा बचा

मालती ये कहते हुए मोनू को कसके गले से लगा लेती है, पूरा hi वातावरण कुछ ऐसा हो चूका था की वह मौजूद सत्तू तक की आँखें भर आयी थी, बाकि मालती की आँखों से उसकी ममता तोह न जाने कबसे आंसुओं क रूप मैं बह hi रही थी

मोनू- (इतने समय बाद पहली बार कुछ कहता है) ाःह मा.. धीरे, लगता है मोती हो गयी हो

मोनू की बात पे वह खड़ा कुंदन तक है पड़ता है

मालती हस्ते और ममता रुपी आंसू बहते हुए उससे अलग होती है और पियर से उसके गालों पे मरते हुए

"नालायक अपनी माँ को मोती बोलता है"

सभी लोग एक बार फिर से है पड़ते है, बस भानु hi एक ऐसा था की उसे दर था की कही मोनू उसका नाम न ले ले

वीरू- बीटा तुम्हारे साथ उस दिन किया हुआ था, कोण था जिसने ये किया ?

वीरू जो अब तक कुछ नहीं बोलता था आखिर वो बोल पड़ता है, वैसे न जाने वो कबसे ये जानना च रहा था की वो कोण है जो उसके परिवार का अहित करना चाहता है इसलिए इतने समय बाद मोनू को होश मैं आते हुए देख क आखिर वो खुद को रोक नहीं पाटा ये सवाल पूछने से

वीरू क ये सवाल करते hi भानु की साँसे मानो रुकनी सुरु हो जाती है, उसे दर लगने लगता है की कही मोनू अब उसका नाम न ले ले

पर जब मोनू अपने छोटे चाचा की बात सुनता है और इस बारे मैं सोचता है तोह अचानक उसके सर मैं तीव्र दर्द सा महसूस होता है

उसे ऐसा लगता है वो जो याद करने की कोशिश कर रहा है वो उसके दिमाग में मौजूद hi न हो.. सिर्फ अँधेरा hi अँधेरा हो वह

मोनू- आआआआह्ह्ह्ह..........

मोनू को यु चीखते हुए देख क सभी लोग बुरी तरह दर जाते है वही मालती का तोह जैसे कजेला hi पहात पड़ता है, वो जल्दी से मोनू का चेहरा अपने हाथों क बीच लेते हुए

"किया हुआ मेरे बचे.. बोल न मोनू.. किया हुआ"

सभी काफी दर गए थे सिवाय त्यागी क ककी वो मुस्कुरा रहा था मानो उसे पता था की यही होगा

"आआह्ह्ह्ह.. पता नहीं माँ किया हुआ, मुझे कुछ याद नहीं आ रहा

ऐसा लग रहा है जैसे सब कुछ बस अंडकार जैसा है.. मुझे किया हुआ है था कुछ याद क्यू नहीं आ रहा है

मैं घर से खेतों क लिए निकला था पर फिर.. aaaaaaaaaahhhhh"

मोनू एक बार फिर से उन पलों को याद करने की कोशिश करता है पर एक बार फिर से उसके सर में वही दर्द सुरु हो जाता है

त्यागी जी- (बीच मैं बोलते हुए) तुम्हे परेशां होने की जरुरत नहीं है बीटा, इतने समय से बेहोश रहने का कारन कभी कभी अंतिम पलों की कुछ यादें मिट जाती है.. पर इस समय कुछ भी हो जाये तुम्हे अपने दिमाग पे बिलकुल भी जोर नहीं देना है

ककी अभी तुम शारीरिक रूप से बहुत कमजोर हो चुके हो.. इसलिए पूरी तरह स्वस्थ होने मैं समय लगेगा"

फिर त्यागी सभी की तरफ देखते हुए

"आप सब से भी मेरी विनती है की मोनू को किसी भी चीज़ क लिए परेशां न करे, और जितना ज्यादा हो सके उसे प्रेम दे.. ककी प्रेम hi वो असली दवा है तोह इस समय हमारे मोनू को चाहिए"

महेंद्र- (त्यागी जी की बात से सहमत होते हुए) आज क बाद कोई भी मोनू से ऐसी कोई बात नहीं पूछेगा जिससे उसे परेशानी हो.. बाकि समय क साथ साथ उसे सब कुछ खुद hi याद आ जायेगा, इसलिए सभी को उसके खान पान का खास धियान रखना है

त्यागी और महेंद्र की बात से सभी लोग बहुत खुस थे.. फिर सभी एक एक करके मोनू को गले लगते हुए उसके जल्दी से ठीक होने की कामना करते है

त्यागी जी सभी की तरफ देखते है फिर कुंदन और महेंद्र की तरफ देखते हुए

"वैसे तोह मोनू अब ठीक है पर पूर्ण स्वस्थ होने मैं उसे थोड़ा और समय लगेगा.. पर मैं चाहता हु की"

पर फिर त्यागी खुद hi रुक जाता है और मुस्कुरा क मोनू को देखते हुए कहता है

"अरे भाई पहले, मोनू को कुछ खिलाओ पिलाओ.. इतने समय से भूका होगा"

और फिर मोनू को देखते हुए है क कहते है

"और तू किया नंगा पुंगा बैठा है शर्म नहीं आती"

त्यागी जी की बात पे मोनू को अपनी इस्तिथि का आभास होता है उसे पता चलता है की वो पूर्ण नंगा है सिर्फ उसके लुंड क स्तन पे एक गमछा पड़ा हुआ है

त्यागी जी की बात पे पूरा घर है पड़ता है, इतने समय बाद जेक कही इस घर मैं हसी गुंजी थी तोह सबसे ज्यादा ख़ुशी महेंद्र को hi थी

महेंद्र- चलो चलो.. सबसे पहले मोनू को अंदर ले जेक कुछ पहना दो और फिर आज से 1 हफ्ते तक सिर्फ मोनू की पसंद का hi खाना बनेगा इस घर मैं

अपने बड़े तय जी की बात सुनकर मोनू खुसी से हाथ उठाते हुए

"ये हुई न बात"

उसी ऐसी बच्चों जैसी बात सुनकर सभी फिर से khil-khila से पड़ते है

जल्दी hi मोनू को सत्तू सहारा देके वापस अंदर वाले रूप मैं ले जाने लगता है, ककी शारीरिक रूप से मोनू अब भी बहुत कमजोर था उससे खुद से खड़ा भी नहीं हुआ जा रहा था.. है वो अलग बात है की आज उसका लुंड कुछ ज्यादा hi खड़ा हो रहा था

सत्तू, हस्ते हुए धीरे से मोनू को अंदर ले जाते हुए उसके कान में कहता है

"खुद तोह खड़ा नहीं हो रहा, फिर ऐसे क्यू खड़ा करके रखा है"

मोनू अपनी कमर में वही गमछा लपेटे हुए था, जहा उसे एक बड़े से आकर का तम्बू बना हुआ नज़र आता है.. उसे पता hi नहीं चलता कब उसका लुंड खड़ा हो गया

मोनू- (धीरे से शरमाते हुए) पता नहीं भैया.. ये कैसे.. मतलब

सत्तू समझ जाता है की उसमें मोनू की कोई गलती नहीं, और वो नहीं चाहता था की मोनू अपने दिमाग पे ज्यादा जोर लगाए इसलिए हस्ते हुए अपनी बात कहता है

"अरे तोह किया हुआ, मेरा छोटा भाई असली मर्द है.. और खड़ा तोह मर्द का hi होता है न"

सत्तू जान क बात को ताल देता है, और फिर वो मोनू को अंदर ले जेक उसे वापस से चारपाई पे लिटा देता है.. जहा बाद मैं सत्तू hi उसके सरीर को कपडे से सूखा क उसे साफ़ कपडे पहना देता है

यहाँ बहार

सविता- (मालती की तरफ देखते हु) चल आज हम दोनों मोनू क लिए कुछ ाचा सा बनाते है कहने मैं

पर सविता की बात को त्यागी जी काट देते है

"नहीं भौजाई.. मोनू क सरीर की अभी मालिश होनी है, इसलिए मैं आपको तरीका बता देता हु ताकि बीच बीच मैं उसके सरीर की मालिश होती रहे

उसका सरीर अभी बहुत कमजोर है"

मालती- आप मुझे बता दीजिये मैं कर दूंगी, भाभी पहले hi इतना परेशां हो चुकी है

सविता- (पियर भरे ग़ुस्से से मालती को देखते हुए) किया कहा परेशां, है है मोनू मेरा तोह बचा है नहीं.. बड़ी आयी

सविता क इस अंदाज़ पे मालती क साथ साथ वह मौजूद सभी लोग है पड़ते है

त्यागी जी- (हस्ते हुए) अभी मैं भौजाई को बता दूंगा, फिर वो आप सभी को समझा देंगी ताकि कोई न कोई मोनू क मालिश करता रहे

फिर त्यागी जी सभी नज़रों से बचते हुए सविता की तरफ देख क

"क्यू.. है न भौजाई"

सविता का जिस्म कामुकता की एक हलकी लहर को महसूस करता है और वो भी 'है' में सर हिला देती है

सच तोह ये था की त्यागी जी क यु कहने की वजह से उसे एक पल क लिए वापस से अपनी योनि और गांड में 2 लुंड अंदर बहार होते हुए महसूस होने लगे थे








शीला- (इतने समय मैं पहली बार बोलते हुए) ठीक है, तब तक मैं और छोटी भाभी रसोई का काम देखते है

वही महेंद्र ने धियान दिया था की त्यागी सुरु मैं मोनू की सेहत को लेके कुछ बोलने वाले थे पर अचानक रुक गए थे, इसलिए वो कुंदन, वीरू और भानु को बहार चलने का इशारा करते हुए त्यागी जी की तरफ देख क कहते है

"त्यागी भाई हम सब बहार है, आप सविता को सब समझा क आइए.. फिर सब बढ़िया सी चाय पीते है"

फिर वो हर्षिता की तरफ देखते हुए

"बहु जरा अपने हाथों से मसाले वाली चाय बना दो"

हर्षिता मुस्कुराते हुए, है में सर हिला देती है








जल्दी hi सभी मर्द घर क बहार छप्पर क नीचे बैठे हुए थे, जिसमें से सबसे ज्यादा संतुष्ट भानु hi लग रहा था, ककी त्यागी ने जैसा कहा था आखिर वही हुआ

मोनू को बेहोश होने से पहले का कुछ याद नहीं, यानि वो उसका नाम भूल चूका है

भानु सबके साथ बैठे हुए सोचने लगता है

'अगर जब्बार ने मालती पे हमला करने की गलती न की होती, तोह आज उसे भी किसी बहाने वापस बुला सकता था.. पर उस मादरचोद ने पूरा खेल बिगड़ डाला'

तभी जैसे भानु क दिमाग में एक बात आती है और उसका चेहरा खिल सा जाता है, वो अपनी जगह से उठते हुए

"मैं जरा एक मं में आता हु"

भानु सबकी नज़रों से काफी दूर निकल आता है और फिर अपनी धोती में छुपाया हुआ एक फ़ोन निकल क किसी को फ़ोन मिलाने लगता है

भानु कान पे फ़ोन लगाए, दूसरी तरफ से फ़ोन उठने का इन्तिज़ार करने लगता है, और जल्दी hi उसकी ये ीचा पूरी भी होती है

दूसरी तरफ से

"कैसे याद किया भानु भाई, और आखिर कब तक हम दोनों को यहाँ पड़े रहना होगा"

भानु- (चारो तरफ देखते हुए) फ़िक्र मत करो, इसीलिए फ़ोन किया है.. अब समय आ गया है जब तुम्हे अपना खेल सुरु करना है

इसके आगे भानु फ़ोन पे उन्हें किया समझाता है, और वो किस्से बात कर रहा था ये आगे जानने को मिलेगा.. अभी हम करीब 2 जानते आगे चलते है यानि सूरज का ताप धीरे धीरे काम होना सुरु हो चूका था

🌟 सन 🖼️ #02 🌟

मोनू ने इस समय सिर्फ एक धोती पहनी हुई थी और ये धोती भी उसे सविता ने hi पहनाई थी

असल मैं त्यागी जी ने जाने से पहले सविता क हाथों उसके क पुरे सरीर पे एक खास जड़ी बूटी की मालिश सी करवाई थी.. जिस कारणवस मोनू को कुछ ज्यादा hi गर्मी महसूस हो रही थी

साथ hi साथ सविता क हाथों को इस बार मोनू ने पुरे होश में अपने सरीर पे महसूस किया था जिससे उसका लुंड कुछ ज्यादा hi बड़ा आकर लेके खड़ा हो चूका था

पर उस समय किया किया हुआ ये मैं थोड़ा आगे बताऊंगा.. अभी इस पल की बात करते है

मोनू का लुंड अब भी पहाड़ की ुचि छोटी सामान खड़ा हुआ था जिसे उसने धोती क कपडे से ऐसे एडजस्ट करने की कोशिश की थी की वो पता न चले

मोनू को सच मैं गर्मी महसूस हो रही थी, वर्ण जनुअरी क अंतिम दिनों और ऐसे ठन्डे मौसम मैं कोई लगभग पूर्ण निवस्त्र हो और उसे गर्मी लगे ये कोई आम बात तोह है नहीं

तभी कमरे में मुस्कुराती हुई मालती अंदर प्रवेश करती है.. जिसकी खूबसूरती और बालों से बहते हुए पानी को देख क मोनू को समझने में देरी नहीं लगती की उसकी खूबसूरत कामुक माँ नाहा क आयी है

मालती, मोनू क पास चारपाई पे बैठे हुए पियर से उसके सर पे हाथ फिरते हुए

"किया हुआ कुछ परेशां सा लग रहा है"

मोनू धीरे से मुस्कुराते हुए

"अब जिसकी माँ इतनी खूबसूरत हो और उन्होंने अभी तक अपने बेटे को पियर न किया हो वो परेशां नहीं होगा किया"

मालती को समझ नहीं आता वो मुस्कुराये या शर्माए, पर मोनू जो अपने अंदर बढ़ती गर्मी से परेशां था वो अपनी खूबसूरत माँ क सरीर से आती भीनी भीनी खुशबु क कारन अपना आप खो रहा था

मोनू धीरे से अपना एक हाथ उठा क मालती की साड़ी से नज़र आती उसकी गहरी नाभि पे रख क अपनी एक ऊँगली को उसकी गहरी नाभि में अंदर घुसा देता है








मालती जो इतने समय से, अपने बेटे क कारन कामुकता की जकड से दूर थी यु होश मैं आते hi अपने बेटे क द्वारा ऐसी हरकत पे मचल सी पड़ती है

"आआआआहहह... किया कर रहा है... ेस्शह्ह्ह्हह्ह्ह्ह"

मालती को मचलते देख मोनू अपनी ऊँगली को उसकी नाभि मैं और अंदर घुसा क घूमने से लगता है जिससे मालती और ज्यादा तरप दी पड़ती है

"ेस्स्स्सह्ह्ह... मत्तत्त कर बीटा.... Aaaaaaaaaahhhhh"

पर मोनू कहा रुकता है वो उसी प्रकार चारपाई पे लेते हुए, नाभि से अपनी ऊँगली निकल क अपनी माँ की अब भी गीले गोर और कामुक पेट पे अपने हाथ का पूरा पंजा रख क बुरी तरह मसल देता है

मालती अपने बेटे क हाथों अपने गोर और नंगे पेट क मसले जाने से और ज्यादा तरप उठी है

"ेस्स्स्सस्स्शह्ह्ह... माआट्त करररर.... मोनू"








मोनू मुस्कुराते हुए उसी प्रकार लेते लेते अपनी माँ क पेट को धीरे धीरे मसलना सुरु कर देता है और कहता है

"माँ आप मुझे पियर नहीं करती"

मालती अपनी आँखों को धीरे से खोलते हुए

"किया कहा, एक माँ अपने बेटे से पियर नहीं करती.. ऐसा कभी हो सकता है किया ?"

मोनू- (मुस्कुराते हुए) तोह सबूत दो माँ

मोनू ये कहते हुए अपनी माँ क नंगे पेट को मसलना चोर क वह से अपना हाथ हटा लेता है.. और अपनी धोती को एक hi झटके से खोल देता है जिससे उसका परेशां करता लुंड जो पूरी अकड़ क साथ आसमान की तरफ सर उठा क खड़ा था मालती को अपने दर्शन देने लगता है








मालती इतने समय बाद लुंड को इतनी पास से देखते हुए अपने अंदर एक बार फिर से गर्मी का प्रवाह महसूस करने लगती है

पर वो अपनी हिम्मत क साथ खुद पे काबू रखते हुए अपने मन मैं चल रही एक बात कहने से खुद को रोक नहीं पाती

मालती- (थोड़ा मायुश होक) नहीं बीटा.. ये सही नहीं है, मुझे कभी कभी लगता है ये सब तुम्हारे साथ जो हुआ कही उसकी वजह बरसात की वो रात तोह नहीं जिस दिन हमने वो पाप किया था.. या सायद वो पाप सिर्फ मैंने किया था

मालती ये कहते हुए अपना सर नीचे कर लेती है, उसकी आँखों मैं आंसू भर आये है.. और जो कामुकता उसपे हावी होने लगी थी वो वापस से हवा की तरह गायब होने लगती है

मोनू अपनी माँ की बात सुनकर परेशां नहीं होता उल्टा बस मुस्कुराता है और उठ क बैठे की कोशिश करता है पर इतने समय से लगातार बिस्तर पे पड़े रहने और सही से न खाने क कारन उसका सरीर बहुत कमजोर हो चूका था

मालती, मोनू को उठता हुआ देख क जल्दी से उसे सहारा देती है और मोनू उठ क बैठ जाता है और अपनी खूबसूरत माँ की आँखों मैं देखते हुए अपना एक हाथ आगे बड़ा क अपनी पियरी माँ क गालों पे चलता है और फिर कहता है

"मैंने ज्यादा दुनिया नहीं देखि, पर इतना जनता हु की कभी भी एक माँ की वजह से उसके बेटे का अहित नहीं हो सकता

बल्कि आज मैं अगर ज़िंदा हु तोह सिर्फ आपकी प्राथना और प्रेम क कारन, वर्ण वैसे तोह मुझे याद नहीं आ रहा उस दिन हुआ किया था पर किया पता आपका आशीर्वाद न होता तोह स्याद मैं मर..."

मोनू इतना hi बोल पता है की, मालती जल्दी से मोनू क मुंह पे हाथ रख देती है और ग़ुस्से से कहती है

"जोर से मरूंगी, अगर दुबारा मरने की बात की.. मरे तेरे दुश्मन"

मोनू पियर से अपने माँ का हाथ जो उसके मुंह पे था उसे चुम लेता है.. मालती शर्मा और मुस्कुरा पड़ती है और जल्दी से अपना हाथ हटा लेती है

"बदमाश"

मोनू वापस से हस्ते हुए

"वैसे मैंने सुना था की त्यागी चाचा कह रहे थे की.. मोनू को किसी बात क लिए परेशां न करना और उसे खूब प्रेम देना.. है न ऐसा hi कुछ कहा था न"

मालती जानती थी की उसका बीटा बात को कहा ले जाना चाहता है पर फिर भी वो है में सर हिला देती है

मोनू- (मुस्कुराते हुए) अब इतने बड़े वैद ने कहा है तोह आपको उनकी बात माननी चाहिए

मालती- ाचा जी.. तोह मैं अपने बेटे को प्रेम नहीं करती, किसने कहा ये

मोनू- करती होंगी, पर बिना साबुत क कैसे कोई माने

मालती- ाचा जी.. तोह तुम hi बताओ तुम्हारी ये माँ कैसे ये साबित करे को वो अपने बेटे से पियर करती है

मोनू जिसका लुंड अब भी अपना आकर लिए तन क खड़ा था उसकी तरफ इशारा करते हुए

"तरीका तोह सामने है"

मालती शर्मा सी जाती है

"बदमाश"

मोनू- प्लीज माँ.. पता नहीं क्यू ये बैठ नहीं रहा.. प्लीज.. प्लीज

मालती, मोनू की ऐसी हरकत देख क है hi पड़ती है

"देखो अभी तुम बहुत कमजोर है और ये सब तुम्हारे स्वस्थ क लिए सही है है"

मोनू- (हस्ते हुए आँख मार क कहता है) अरे मैं कोनसा कह रहा हु लुंड पे छूट रख क बैठ जाओ

मालती शर्म से लाल पद जाती है पर फिर मुस्कुराते हुए अपने बेटे क सीने पे पियर से मरते हुए

"बदमाश कही का.. कुछ भी बोलता है"

मोनू हस्ते हुए वापस से लुंड की तरफ इशारा करते हुए

"बस एक बार.. इतने समय बाद आपका बीटा होश मैं आया है और आप उसकी इत्ती छोटी सी ीचा नहीं पूरी कर सकती

ये किया बात होती है"

मालती एक पल क लिए कुछ सोचती है और फिर अपनी जगह से उठ क दरवाजे की तरफ जाने लगती है, वही अपनी माँ को यु जाते हुए देख क मोनू का मुंह लटक जाता है

पर ख़ुशी वापस तब लौट आती है जब वो देखता है की उसकी माँ दरवाजा अंदर से बंद कर रही है.. और फिर मालती दरवाजा बंद करने क बाद मुस्कुराते हुए मोनू को देखती है और अपने बालों का जुड़ा सा बनाते हुए उसकी तरफ आगे बढ़ने लगती है








मालती- (जिसकी नज़रें अब उसके बेटे क लुंड से हैट hi नहीं रही है) चल तुझे सबूत दे hi देती hi.. की तेरी ये माँ तुझसे कितना प्रेम करती है

कंटिन्यू..

सवाल कई है..

1- भानु फ़ोन पे किस्से बात कर रहा था ?


2- सविता ने फिर से मोनू की मालिश की.. तोह किया फिर से वही कामुकता का खेल हुआ ?

3- त्यागी, मोनू को लेके कोनसी बात कहना च रहा था.. जिसके लिए महेंद्र ने सभी को घर क बहार बुलाया ?



और न जाने ऐसे कितनी hi सवाल अभी भी बाकी है.. ??
 
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6 लाख व्यूज क लिए सभी का बहुत बहुत धन्यवाद् 🙏

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अपडेट #16



सन 🖼️ #02




मोनू अपनी माँ को दरवाजे क पास जाते हुए देख क मायुश होने लगता है पर उसकी ख़ुशी वापस तब लौट आती है जब वो देखता है की उसकी माँ दरवाजा अंदर से बंद कर रही है.. और फिर मालती दरवाजा बंद करने क बाद मुस्कुराते हुए मोनू को देखती है और अपने बालों का जुड़ा सा बनाते हुए उसकी तरफ आगे बढ़ने लगती है

मालती- (जिसकी नज़रें अब उसके बेटे क लुंड से हैट hi नहीं रही है) चल तुझे सबूत दे hi देती hi.. की तेरी ये माँ तुझसे कितना प्रेम करती है

मोनू यु अपनी खूबसूरत कामुकता से भरी हुई हसीं माँ को देख ख़ुशी से उछाल hi पड़ता है, वैसे उछलता वो नहीं बल्कि उसका लुंड है जो इस समय उस नाम मात्र की धोती से बहार था और अपनी माँ को अपनी तरफ बढ़ते हुए देख क उसका लुंड ऐसे हिलोरे मरने लगा था मानो उसकी कामना अब पूरी होने क है

मोनू जल्दी जल्दी अपने पैरों को हिलाते हुए अपनी धोती को पूरी तरह अपने जिस्म से अलग कर लेता है.. जिससे वो अब पूर्ण निवस्त्र था अपनी कामुकता से भरी और आगे बढ़ती हुई माँ क सामने

मालती मुस्कुराते हुए अपने बेटे क पास आके बैठे हुए उसे मुस्कुरा क कहती है जिसमे कामुकता क अंश भी नज़र आ रहे थे

"बड़ी जल्दी है तुझे अपनी माँ क मुंह में अपना...."

मालती इतना hi कहती है की वो खुद hi शर्म से लाल हो जाती है

वही मोनू जैसा जवान लड़का जिसके जिस्म की हुई आज मालिश क कारन उसका लुंड ज्यादा hi उछाल मार रहा था और मालती भी उसके लुंड पे लगा हुआ टेल देख प् रही थी जिससे एक पल क लिए उसके दिमाग में एक hi बात आती है

'किया सविता भाभी ने लुंड की मालिश भी की थी.. ?'

पर अब मालती को कोण बताये की मोनू की मालिश कैसे कैसे हुई है आज


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मातलि अपने सर को झटक क अपने विचारो से आज़ादी पाती है और मुस्कुराते हुए मोनू क सीने पे हाथ रखते हुए उसे वापस से बिस्तर पे लिटाने लगती है, वही मोनू भी एक ाग्यकारी बेटे की तरह अपनी माँ क इशारे को समझ क वापस चारपाई पे लेत जाता है पर अब भी उसकी नज़रें कभी उसकी खूबसूरत माँ क हसीं और सलोने चेहरे पे जाती तोह कभी उसके ब्लाउज की गहराई से नज़र आते और उछाल क बहार आने को आतुर बड़े बड़े रसीले आम पे अटक जाती है

मालती एक हाथ अपने बेटे क सीने पे चलना सुरु कर देती है, जिससे उसे मालूम पड़ने लगता है की उसका बीटा कितना जवान और मजबूत हो सकता है अगर उसे सही चीज़े दिए जाये

वही मालती अब भी उसी प्रकार मौन अवस्था में बिना कुछ बोले धीरे से अपने दूसरे हाथ से मोनू का एक हाथ उठा क उसे धीरे से अपने उछाल मरते और दूध से भरी हुई बड़ी चुकी पे रख देती है

मोनू का हाथ जब अपनी माँ की चुकी को छूटा है, भले hi वो कपडे क ऊपर से क्यू न हो.. उसका लुंड पुरे अहंकार से अपना सर उठा क ख़ुशी से हुंकार भरने लगता है जिसे देख क मालती क चेहरे पे कामुक से भरी हुई ख़ुशी दौड़ जाती है

"बदमाश..."

मोनू भी ख़ुशी से अपने हाथ की ताक़त दिखते हुए अपनी माँ क दूध को मसल देता है

मालती- (अपने जवान बेटे क द्वारा अपनी चुकी क मसले जाने से उसके पुरे जिस्म में कामुकता की अनोखी लहर सी दौड़ पड़ती है, ऐसा लगता है मानो उसका बीटा उसकी नंगी चुकी को मसल रहा हो) ेस्स्स्सह्ह्ह्हह्ह... धीरे... आआह्ह्ह्हह्ह.. बेइततटायआ....


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पर मोनू अपनी माँ की ऐसी कामुक सिसकारी सुनकर है पड़ता है और हस्ते हुए hi और जोर से दबा देता है और कहता है

"किया हुआ माँ, अभी तोह कह रही थी की मैं अभी कमजोर हु, अब बताओ.."

मोनू हस्ते हुए अपनी माँ की एक चुकी को अपने पंजो में भरते हुए जोर जोर से दबाये जा रहा था मानो अपनी माँ की दुधारू चुकी का मुलायक एहसास अपने अंदर भर रहा हो

मालती- (अपने बेटे क द्वारा अपनी चूचियों क मर्दन पे, अपने होंठों को काटे हुए) एसससससष्ठ.. कमीने रुक अभी तुझे बताती हु

और इतना कहते हुए है क अपने जवान बेटे का तना हुआ जोरदार लुंड अपनी मुठी में दबोच लेती है, वैसे आज उसे लगा मानो जैसे मोनू का लुंड ज्यादा hi शाक्त और मोटा हो गया हो.. पर फिर इतने समय बाद अपने अंदर बढ़ती हुई कामुकता क ज्वार क चलते उसने इस बात को पूरी तरह नज़रअंदाज कर दिया

मालती अपने जवान बेटे क मोठे तने हुए लुंड को अपनी मुठी में भरते हुए धीरे से उसे नीचे की तरफ खींचती है जिससे उसका लुंड अपनी चमड़ी को चोरते हुए अपने मोठे गुलाबी सुपडे क दर्शन देने लगता है.. जिसे देख क एक माँ अपने होंठों पे अपनी जीभ फिरने से खुद को रोक नहीं पाती

मालती- (अपने जोरो से धड़क रहे दिल जी गति को सामान्य करने की कोशिश करते हुए) उफ्फ्फ्फ़... अपनी माँ को दम रखा था न अब दिखती हु तुझे

मालती ये कहते हुए मुस्कुरा पड़ती है और मोनू क लुंड क चारो और अपनी उँगलियों का चला सा बनाते हुए उसके चमड़ी को ऊपर की तरफ लाती है जिससे मोनू को असीम आनंद की प्राप्ति होती है, पर एक माँ इतने पे hi कहा रुक सकती थी.. इसलिए मालती वापस से अपने बेटे क मोठे लुंड को मुठी में दबोचे हुए अपने हाथ को नीचे की तरफ सरकती हिअ जिससे उसके बेटे क लुंड की चमड़ी भी नीचे को होती है और जो लुंड अभी अभी चमड़ी क खोल से ढाका था वो वापस से खुल जाता है

मोनू- (अपनी कामुक माँ की ऐसी कामुक हरकत से विचलित सा हो उठता है) आआअह्ह्ह्हह.. मायआ... क्यू तारपा रही हो... अचे से मसलो न

मालती मुस्कुरा पड़ती है, पर साथ hi साथ उसकी आँखों में लज्जा क निशान भी उपस्थित थे

मालती मुस्कुराते हुए अपने अपने बेटे क लुंड पे अपने हाथ को अचे से चलना सुरु कर देती है, वो कभी लुंड को मुठी में दबोच क उसकी चमड़ी को ऊपर की तरफ खींचती तोह वही अगले hi पल चमड़ी को नीचे करते हुए पुरे सुपडे को फिर से खोल देती.. मालती क हाटों की इस थिरकन क कारन मोनू क लुंड में खूबसूरत घरसँ सी होने लगती थी जिससे उसे असीम आनंद मिलने लगा था


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मोनू- आआआहहहहहहह... ऐसे hi माआ....

मालती अपने बेटे को आनंद में डूबता हुए देख मन hi मन है पड़ती है और इसका असर उसके हाथ की गति में नज़र भी आने लगा था ककी वो जल्दी जल्दी मोनू का लुंड ऊपर से नीचे.. और नीचे से ऊपर की तरफ करते हुए अचे से उसे हस्तमैथुन का आनंद दे रही थी

मालती- अब बता.. बड़ा बोल रहा था न..

मोनू जिसकी आँखें लगभग बंद होने सी लगी थी, और ऐसा होता भी कैसे नहीं माँ क हाटों में बेटे का लुंड हो और उसे आनंद न आये एशिया कभी हो सकता है किया

मोनू- आआअह्ह्ह्ह.. आपके हाथों में जादू है माआ... आअह्हह्ह्ह्हह... ेस्स्स्सह्ह्ह्हह्ह्ह्ह.. मायआ आप न...

मालती है पड़ती है ककी उसने अपने हाथ पूरा नीचे ले जेक मोनू क लुंड को उसकी जड़ से पकड़ क धीरे से दबोच दिया था जिस्सेव मोनू की कामुक आअह्ह्ह फुट पड़ी थी

मोनू- (अपनी माँ का हाथ अपने गरम लुंड पे महसूस करते हुए उस अनोखे पल का आनंद लेते हे) आअह्ह्ह.. कर लो मा.. जो करना है.. ेस्शह्ह्ह.. एक दिन मैं भी हर चीज़ का बदला जरूर लूंगा

मालती मुस्कुराते हुए अपनी एक ऊँगली अपने जवान बेटे क मोठे सुपडे पे लाती है और उसके पेशाब करने वाले छेद पे अपने नाख़ून से खुरदेते हुए

"ाचा.. तोह अपनी मा से बदला लेगा.. बदमाश.. अब बता"


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अपने पेशाब वाले नन्हे छेद पे अपनी माँ की ऊँगली और उसके नाख़ून की हरकत की वजह से मोनू मानो तरप सा पड़ता है ऐसा लगता है जैसे उसके सरीर में खून की रफ़्तार कई गुना बाद गयी हो

मोनू- आआह्ह्ह्ह... माआआ.... ेस्स्स्सह्ह्हह्ह्ह्ह... आपका जवाब नहीं.. आआअह्ह्ह कहा से सीखा ये सब.. आआह्ह्ह्ह

अपने जवान बेटे को यु मस्ती में तड़पते हुए देख क और उसके सवाल क कारन एक पल क लिए मालती क सामने एक चेहरा नाच जाता है.. पर वो जल्दी hi वास्तविकता में पुनः लौट आती है

मालती देखती है की उसके हाथों की छुवन और उसकी कामुक हरकतों की वजह से कैसे उसका बीटा अपनी आँखों को बंद करके मज़े से ले रहा था.. जिसे देख एक माँ का चेहरा खिल सा उठता है

वैसे अपने जवान बेटे क लुंड से इस तरफ से खेलने की वजह से मालती की छूट भी पूरी तरह गीली हो चुकी थी और उसकी योनि से लिसलिसा द्रव्य निकलने लगा था

मालती ने इस समय पेंटी नहीं पहनी हुई थी जिस वजह से उसकी योनि से निकलने वाला गाड़ा चिपचिपा पानी उसकी योनि को भिगोते हुए धीरे धीरे उसकी जाँघों से होते हुए आगे बाद रहा था

इसके साथ hi उसके निप्पल्स भी ब्लाउज क अंदर पूरी तरह अकड़ चुके थे.. जिसमें से उसकी एक चुकी को उसका जवान बीटा अब भी अपने हाथ क पंजे में देओबुचे हुए उससे खेले जा रहा था

एक माँ का पूरा सरीर इस समय कामुकता क चलते धीरे धीरे कम्पन सा करना सुरु हो चूका था पर वो बिना रुके अपने बेटे को आनंद दिए जा रही थी.. यही तोह होता है एक माँ बेटे का असली प्रेम

मालती, मोनू की आनंद से बंद आँखों को देखती है तोह उसका चेहरा भी खिल जाता है.. वो मुस्कुराते हुए अपने एक हाथ से मोनू का हाथ अपनी एक चुकी से हटा क उसे दूसरी चुकी पे रख देती है और फिर अपने जवान बेटे क लुंड क ऊपर झुकती चली जाती है

मालती का चेहरा जैसे जैसे मोनू क लुंड क नज़दीक आ रहा था उसे अपने जिस्म में एक कामुक सुगंद सी भर्ती हुई महसूस हो रही थी, जिसके कारन उसके अंदर हवस का उबाल जैसा बनने लगा था

मालती, मोनू क लुंड क ऊपर झुक क एक पल क लिए उसे अचे से निहारती है और फिर अपनी जीभ निकल क उसके सुपडे क छेद पे अपने जीभ की नोक लगा देती है.. मालती को ऐसा लगता है मानो उसके जिस्म से कामुकता का कोई सैलाब सा फुट पड़ने वाला हो

वही जब मोनू को अपने सुपडे क छेद पे कुछ गरम और गीला लगता हुआ महसूस होता वो अपनी आँखों को खोले बिना नहीं रह पाटा और जब देखता है तोह उसकी साँसों की रफ़्तार अचानक से बाद जाती है


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ककी अब मालती अपनी जीभ से मोनू क लुंड क सुपडे को चाटने लगती थी

"उम्म्म्म... सससललल्लूऊऊऊप्प्प्प.......... सस्सररररऊऊऊऊऊप्प्प...."


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मालती अपनी जीभ और ज्यादा बहार निकल क मोनू क पुरे गुलाबी सुपडे पे चलने लगती है जिससे मोनू का जिस्म कामुकता की अधिकता क कारन बुरी तरह काँप उठता है

"Aaaahhhhhhhhhhhhhhhhhh.. Maaaaaaaaaaaaaaaaa..."

मोनू का जिस्म थरथरा सा जाता है, जिसकी कम्पन मालती भी महसूस कर प् रही थी, वो बिना कुछ कहे अपने अगले पड़ाव की तरफ बढ़ती है.. और अपना पूरा मुंह खोलते हुए अपने जवान बीटा क लुंड को अपने मुंह में समां लेती है

"Grrrrrruuuuuuuuuuupppp...rrr...uuuppppp.. "

मोनू को यकीन hi नहीं होता की उसकी कामुक माँ ने कितनी आसानी से उसके पुरे लुंड को एक hi बार में यु निगल लिया, उसे तोह बस अपने लुंड पे गरम साँसे महसूस होती है और फिर ऐसा लगता है जैसे गीले और गरम गुफा क द्वार में उसका लुंड कही खो सा गया हो.. कामुकता की अधिकता का नाच कुछ यु था की माँ बेटे दोनों क जिस्म एक साथ कंपकपा से उठे थे

मोनू- (एक बार फिर से उसकी आँखें बंद होती चली जाती है, वो चाहता भी तोह ऐसे मोके पे अपनी आँखों को खोले नहीं रख सकता था) आआआआहहहहह... मायआ..............

अब तक मोनू का हाथ उसकी माँ की चुकी से हाथ चूका था और वो अपना वही हाथ अपनी माँ क सर पे रख क मानो उसे और ज्यादा अपनी लुंड पे दबाने सा लगता है

वही उसकी माँ, जिसकी छूट इस समय पूरी तरफ गीली हो चुकी थी और कॉमर्स की बारिश सी कर रही थी वो अपने होंठों का एक चला सा बनती है और अपने जवान बेटे क विकराल लुंड क चारो तरफ करके उसेक लुंड को नीचे से लेके ऊपर तक ऐसे निचोड़ते हुए आती है.. जैसे गन्ने की मशीन किसी गन्ने को निचोड़ लेती है

'सल्ल्ररररऊऊऊप्प्प....... गररररऊऊप्प्प... सर्र्रउउप्प्प......"


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पर मालती अब रखती नहीं, या सायद उसका जिस्म उसे इसकी आज्ञा नहीं देता, ककी वो जैसे hi मोनू क लुंड को नीचे से ऊपर तक निचोड़ते हुए आती है.. ठीक उसी पल वापस से अपने बेटे क लुंड को उसके सुपडे से लेके उसकी जड़ तक जहा काले काले बाल जिन्हे हम झांटें कहते है वह तक वापस से चुस्ती हुई अपना मुंह उसके लुंड पे दबती चली जाती है

मोनू एक बार फिर से मानो पागल सा हो उठता है, उसे अपनी माँ क मुंह मैं अपना लुंड दाल क जो आनंद मिल रहा था उसे वो खुद सब्दो में नहीं बता सकता है

"आआह्ह्हह्ह्ह्ह.... मायआ............."

मालती अपना एक हाथ नीचे ले जेक अपने जवान बेटे की बड़ी बड़ी गैंडो यानि बॉल्स को पकड़ लेती है और वापस से अपना मुंह नीचे दबा क पुरे लुंड को होंठों क बीच दबाते हुए चूस लेती है

"Ssslllluuuuuppppppppppppppp..... उम्मम्मम्मम्मम"

मोनू तोह जैसे इस दोहरे हमले से पूरी तरह पागल hi होने लगता है, वो अपना हाथ जो उसने अपनी माँ क सर पे रख रखा था.. उसपे जोर लगा क उसे अपने लुंड पे दबाना सुरु कर देता है, वैसे वो अगर ऐसा नहीं भी करता तब भी उसकी माँ पीछे थोड़ी रहने वाली थी

ककी मालती ने जो खेल अपने बेटे क कहने पे सुरु किया था अब वो खुद उसमें फसने लगी थी

"सलल्लूऊऊऊप्प्प.... सर्र्रूऊऊप्प्प.... गगलललललूउररररपपपप.... गग्गलल्लूऊऊऊप्प्प...... गरररररररससससपपपपपलल्लूऊऊऊ"

मालती ने अपनी रफ़्तार पकड़ ली थी, अब वो जोर जोर से अपने बेटे क लुंड को चूसना सुरु कर देती है

"सललललललरररूयप्प..... गग्गलल्लूऊऊऊप्प्प...... गरररररररससससपपपपपलल्लूऊऊऊ... उम्मम्मम्मम्म"


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वही मोनू भी ऊपर से उसका सर जोर जोर से अपने लुंड पे दबा रहा था, मानो वो चाहता hi न हो की उसकी माँ कभी भी उसका लुंड अपने मुंह से बहार निकले, पर आज उसकी ये ीचा बहुत अचे से पूरी हो रही थी ककी मालती पूरी तरह उसके लुंड पे चाय हुई थी और जोर जोर से अपने जवान बेटे का लुंड चूसे जा रही थी

"उम्मम्मम..... गरररररूप्प...... गगगगगुणु.... सलल्लूऊऊऊप्प्प.... सर्र्रूऊऊप्प्प.... गगलललललूउररररपपपप.... गग्गलल्लूऊऊऊप्प्प...... गरररररररससससपपपपपलल्लूऊऊऊ"

खेल ने अपनी रफ़्तार को ढूंढ लिया था, मालती जितनी तेज़ी से अपना मुंह चलते हुए अपने बेटे क लुंड को चूस रही थी, उतनी hi गति से मोनू की कमर भी अब हिलोरे मार रही थी.. जिसकारण उसका लुंड बार बार मालती की हलक तक घुस जा रहा था

"गररररऊऊप्प्प्पपरररररकककककक.... गग्गररररऊऊऊऊप्प्प्प..........."

मोनू पूरी तरह पागल होता जा रहा था, वो जोर जोर से अपनी कमर को नीचे से चलते हुए अपनी माँ क मुंह को छोड़ रहा था.. आज एक बीटा पानी माँ से hi मुखछोडन का आनंद ले रहा था

मालती नीचे से आते मोनू क जोरदार दक्कों को सेहती हुई उसके लुंड को पूरी तरह अपने मुंह की गहराई में भरते हुए उसे ऐसे चूसे जा रही थी मानो उसके ऊपर सेहद सा लगा हो

'स्सल्ल्लूऊऊऊप्प्प...... सर्र्रूऊऊऊप्प्प.... सससललल्लूऊऊऊऊप्प्..."


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मालती जितनी निपुड़ता से अपने जवान बेटे का लुंड चूस रही थी, उतनी hi म्हणत से उसके ाँद को दबा दबा क उसे दोहरा आनंद भी दिए जा रही थी.. वही मोनू भी अपनी माँ क सर पे दबाव बनाते हुए जोर जोर से उनके मुंह में दुमदार दकके लगाए जा रहा था

पुरे कमरे में अगर कुछ सुनाई पद रहा था तोह बस वही मधुर आवाज़

"ससससलल्लूऊऊप्प्प.... कक्कछूऊउस्सस्सपपपपपप...... पपपपपपपूउछहहहहहहह... गगगगलललललूऊऊप्प्प.... गररररऊऊप्प्प..... ससससललुप्पप्प"

कामुकता का ये खेल न जाने कितनी दिएर तक यही चलता रहा की अचानक मालती को एहसास होता है की उसका बीटा उसके बालों को पकड़ क खींच रहा है, मानो जैसे उसके मुंह से अपना लुंड बहार निकलना च रहा हो

इतनी तक अपने जवान बेटे का लुंड चूसने क कारन मालती क मुंह भी बुरी तरह दर्द कर रहा था, ऐसा लग रहा था जैसे उसके एक एक दन्त में दर्द होने लगा था और गाला अंदर तक घायल हो गया हो

इसलिए जैसे hi अपने जवान बेटे को ऐसा करते हुए पाती है.. वो जल्दी से अपना चेहरा ऊपर करते हुए उसके लुंड से अपना मुंह अलग कर लेती है

मालती बुरी तरह हफ्ते हुए.. लम्बी लम्बी साँसों को अपने अंदर भरते हुए कुछ बोलने को hi होती है की मोनू बोल पड़ता है

"माँ जल्दी से अपना ब्लाउज खोलो.. ?"

मालती अपने बिखरे हुए बालों को सही करती हुई लम्बी लम्बी साँसे लेते हुए

"ब्लाउज पर...."

मोनू बीच में hi अपनी माँ की बात को काट देता है

"जल्दी करो बस..."

मालती और कोई सवाल नहीं करती और जल्दी से अपने दोनों हाथों को पीछे ले जेक अपने ब्लाउज को खोलना सुरु कर देती है.. इधर इतने समय में मोनू खुद अपने लुंड को जकड लेता है और उसके जोर जोर से हिलने लगता है

मोनू की हरकत और उसका उबलता हुआ खून देख क मालती समझ जाती है की उसका जवान बीटा आखिर चाहता किया है, और जल्दी hi ब्लाउज क आगे से खुलते hi मालती पूरी तरह आगे से नंगी हो चुकी थी, ककी जिस पारकर नहाने क बाद आज उसने पेंटी नहीं पहनी थी ठीक उसी प्रकार उसने आज ब्रा भी नहीं पहनी थी

इधर जैसे hi उसका ब्लाउज खुलता है उसकी रसीली पपीते जैसी बड़ी बड़ी चूचिया उछाल क बहार आ जाती है जिनका सुडोल पैन और मजबूती बता रही थी की ये जवानी इतनी आसानी से ढलने वाली नहीं है

मोनू बिना समय व्यर्त किये अपना हाथ आगे करके अपनी माँ की एक चुकी को मुठी मैं दबोच क उसे अपने लुंड की तरफ खींच लेता है जिससे अगले hi पल मालती अपनी दोनों नंगी चुकी को अपने जवान बेटे क हिलोरे कहते लुंड क आगे किये हुए तैयार थी

मालती- (कामुकता से जलती हुई) ला.. बीटा.. नेहना दे अपनी माँ की चूचियों को

मालती ये कहते हुए मोनू क वीरकाल लुंड को अपनी चूचियों क बीच दबा लेती है, ठीक वैसे hi जैसे एक माँ प्रेम से अपने बचे को अपनी गौड़ में छुपा लेती है


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और अपने दोनों हाथों से अपनी चूचियों क बीच अपने जवान बेटे क लुंड को दबाने क बाद जोर जोर अपने जिस्म को आगे पीछे करते हुए अपने बेटे को एक नया आनंद देने लगती है

वही मोनू क लिए भी ये एक नया एहसास था.. अपना मोटा लुंड अपनी माँ की चूचियों क बीच पाते hi उसका लुंड हार मान लेता है, और ऐसा होता भी कैसे नहीं

फिर कहा दिएर लगने वाली थी, ककी अगले hi पल मोनू का लुंड फुफकारते हुए सफ़ेद गाडी बारिश करना सुरु कर देता है.. जो सीधा उसकी माँ की बड़ी बड़ी दुधारू चूचियों को भिगोता चला जाता है


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मोनू- आआह्ह्ह्हह्ह... माआआआ...........

अपने लुंड से निकलती जोरदार धार क कारन उसकी आँखें बंद होती चली जाती है, वही मालती भी अपनी चूचियों पे अपने बेटे का गरम गरम वीर्य महसूस करती है तोह उसकी योनि भी अपना बहाव जारी कर देती है.. जिससे उसकी आँखें भी खुली नहीं रह पाती है

अगले 2 मं तक दोनों माँ बेटे उसी अवस्था मैं रहते है की तभी बहार से कोई दरवाजे पे दस्तक देता है

"मालती.. ओह मालती तू अंदर है"

दोनों को जैसे अचानक से झटका लगता हिअ ककी ये आवाज़ सविता की थी, मालती जल्दी से कड़ी होक अपना ब्लाउज बंद करने लगती है, वही मोनू भी अपनी धोती को जल्दी जल्दी पहनने लगता है

मालती- (अपना ब्लाउज बंद करते हुए) है.... भाभी.. मैं... मैं अंदर hi हु

सविता- ाचा.. पर ये दरवाजा क्यू बंद है.. ?

मालती का तोह गाला hi सुख जाता है पर इतनी दिएर में वो अपना ब्लाउज पेहेन चुकी थी और अपने पल्लू से जल्दी से अपना चेहरे पे आये पसीने को पोछते हुए

"वो.. सायद मैंने गलती से बंद कर दिया होगा.. आती.. आती हु.. भाभी"

मालती, मोनू की तरफ देखती है जिसने भी अपनी हालत सुधर ली थी, इसके बाद जल्दी hi मालती अपनी घबराहट पे काबू पाते हुए दरवाजा खोलती है तोह उसके सामने सविता कड़ी हुई थी

मालती को देखते hi उसने सवाल फिर से दोहराया

"अरे दरवाजा बंद करने की किया जरुरत थी.. ?"

मालती- (अब तक अपने आप पे पूरा काबू प् चुकी थी) वो.. सायद मैंने गलती से बंद कर दिया था.. कुछ कुछ काम था

सविता- अरे है.. वो मैंने मंदिर जा रही थी, तू चलेगी न.. ?

मालती जाना तोह चाहती थी पर अभी अभी उसने अपनी चूचियों पे अपने बेटे का वीर्य गिरवाया था.. इसलिए ऐसी अवस्था में जाना तोह संभव नहीं था

मालती- है.. वो जाना तोह था पर अभी नहीं कल सुबह चलूंगी

सविता- चल ठीक है, पर में तोह जा रही हु.. और ये इतनी ठण्ड में तुझे ये पसीना क्यू आ रहा है ?

मालती को एक पल क लिए कुछ समझ नहीं आता, पर जब वो देखती है की सविता उसके ब्लाउज क ऊपर से उसकी चुकी वाले स्थान को देख रही है तोह उसकी साँसे hi मानो रुकने लगती है, ककी उसने अभी अभी अपने बेटे का वीर्य अपनी चूचियों पे गिरवाया था जिस कारन उसके ब्लाउज में एक बड़ा सा डब्बा सा बन गया था जो साफ़ साफ़ नज़र आने लगा था

मालती- (लगभग हकलाते हुए) वो.. नहीं.. वो.. वो.. अंदर.. यहाँ गर्मी बहुत है न.. तोह इसलिए.. वो

पर इससे पहले की सविता और कुछ बोल पाती दरवाजे पे आके खड़ा हुआ वीरू बोल पड़ता है

"भौजाई चलो.. वर्ण वापस आते आते अँधेरा हो जायेगा, आज तोह मौसम भी अजीब सा हो रहा है लगता हिअ बिना मौसम बारिश हो जाएगी"

मालती देखती है की दरवाजे पे वीरू एक लाठी लिए हुए खड़ा है, सायद उन्हें उसकी क साथ जाना था

सविता अपना सर झटक क

"ाचा चोर.. तू कल चली जाना, मैं सत्यम से बोल दूंगी.. ठीक है"

मालती रहत की सांस लेते हुए, बस है में सर हिला क रह जाती है

वही सविता मुड़ने से पहले एक बार फिर से मालती का चेहरा देखती है जिसका रंग ुधा हुआ था और फिर वापस से उसके ब्लाउज पे जगह जगह गीले उन ढाबों को देहटी है, ककी अब वो डब्बा सिर्फ एक जगह नहीं रह गया था कई और डब्बे नज़र आने लगे थे.. जिससे एक बार फिर से मालती क चेहरा का रंग सफ़ेद होने लगता है

पर इस बार जब दोनों की नज़रें आपस मैं टकराती है तोह सविता कुछ बोलती नहीं पर मुस्कुरा पड़ती है.. और मुस्कुराते हुए वीरू क साथ मंदिर क लिए चल पड़ती है

सन 🖼️ #03

घर क बहार छप्पर क नीचे सभी मर्द जमा हो चुके थे

महेंद्र सभी की तरफ देखते हुए अंत में त्यागी जी को देखते हुए कहता है

"आप उस समय सायद कुछ बोलना च रहे थे"



कंटिन्यू...
 
अपडेट #16



सन 🖼️ #05




नोट 🧨 -

अपडेट #16 का सन 🖼️ #03 & #04, इसके बाद आएंगे

जिस समय जंगल क उत्तरी हिस्से में सविता पूर्ण निवस्त्र होक अपनी योनि और गुदा में एक साथ 2 लुंड उतरवा चुकी थी..


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ठीक उसी समय गाओं की आलीशान और मशहूर हवेली क अंदर

"आआअह्ह्ह खालिद.. आआह्ह्ह खा जाओ.. अपनी इस ठकुराइन की छूट को.. आआआह्ह्ह्ह अपने मुंह में भर लो मेरी छूट को.. आआह्ह्ह्हह निचोड़ निचोड़ क चूस लो मेरी छूट को

आआह्ह्ह्ह खालिद बीटा... आआआह्ह्ह्ह... खा जाओ इस ठकुराइन की छूट को... आआआह्ह्ह्ह... बहुत निगोड़ी छूट है ये.. आआह्ह्ह आज ऐसे अचे से चूस चूस क खा जाओ"

इस समय इस औरत की हालत ऐसी थी की वो अपनी छूट चटवाने से मिलने वाले आनंद क लिए कुछ भी कर सकती है.. वो भी बिना कुछ सोचे समझे

"आआह्ह्ह्ह ेस्शह्ह्ह्हह्ह्ह्ह.. शाब्बाश... खालिद बीटा... आआआहहहहह... हीी... माअररररररररर... गयीईइ.. रईईई... आआअह्ह्ह... हीी... हआ... ऐसे... ऐसे... हा..... ऐसे hi... आआआहहहहह"

ये कामुक और पूरी तरह मादरजात नंगी औरत जो खुद को ठकुराइन कह रही थी वो अभी इस जवान लड़के से अपनी छूट चतवते हुए पूरी तरह पागल हो चुकी थी.. उसकी बातों से hi पता चल रहा था की उसे कितना आनंद मिल रहा है, यु एक जवान लड़के से अपनी छूट की गहराई तक उसकी जीभ की छुवन क कारन

और ऐसा होता भी कैसे नहीं, वो लड़का जिसे वो बार बार 'खालिद' कहकर सम्बोधित कर रही है वो उसकी छूट को चाट भी ऐसे रहा था की चटवाने वाली किया, ऐसा नज़ारा भी कोई देख ले तोह उसकी छूट से कॉमर्स और लुंड से वीर्य रास बहने लगे

इस समय उस औरत की दोनों टंगे पूरी तरह फैली हुई थी और उसके जिस्म पे कपडा तोह दूर.. कपडे का एक धागा तक नहीं नज़र आ रहा था, और ऐसे में वो उस जवान लड़के से अपनी छूट को जैम क चुसवा रही थी

"आआआअह्ह्ह्ह..... पूरी खा लो बीटा.. मेरी छूट को.. आआआह्ह्ह्ह... ये ठकुराइन तुम्हारी गुलाम बन चुकी है, तुम जो कहोगे मैं वही करुँगी

आआआह्ह्ह्ह... मुझे अपनी रखेल बना लो.. आआअह्ह्ह... ेस्स्स्सह्ह्ह्ह... आआआह्ह्ह्हह्ह"

वो जवान लड़का जिसका नाम सायद 'खालिद' था, वो एक पल क उस ठकुराइन की छूट से अपना मुंह अलग करता है सायद उसकी साँसें उखाड़ने लगी थी.. और लगभग हफ्ते हुए कहता है

"आआअह्ह्ह.. ठकुराइन आपकी छूट कितनी रसीली है, मन करता है पूरा दिन बस छत्ता hi राहु.. आआह्ह्ह.. गलल्लूऊऊऊप्प्प.... गरररूपप"

खालिद जो इतना hi बोल पाटा है की उससे पहले hi ठकुराइन जो अपनी छूट से उसके होंठों का बिछड़ना एक पल क लिए भी नहीं सेह पाती है और वापस से उसके बालों में अपना हाथ चलते हुए, जोर से उसके बालों को अपनी मुठी में दबोच लेती है और उसे अपनी छूट पे खींच क अपनी छूट से उसके होंठों का संगम वापस से करवा लेती है


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"आआआह्ह्ह्ह... बीटा... तुम बस मेरी छूट छतो... आआआअह्ह्ह्ह... खा जाओ आअज अपनी इस रखेल की छूट को.. आअह्ह्ह्ह... बहुत परेशां करती है ये मेरी ये कामिनी छूट.. आआअह्ह्ह... उफ्फफ्फ्फ़... आआअह्ह्ह... हाआआ... हआ... आआह्ह्ह... ऐसे.. ऐसे hi... उफ्फ्फफ्फ्फ़... आअह्ह्ह्ह... भर लो मेरी छूट को अपने मुंह में और खा जाओ... आआआह्ह्ह्ह"

कैसे जिस्म वाली और आज भी जिस्म क एक एक हिस्से को सुडोल और मजबूत बनाये रखने में कामयाब रहने वाली ठकुराइन इस समय उस जवान लड़के क आगे अपनी छूट चतवते हुए ऐसी बातें कर रही थी, मानो वो सच में उसकी रखेल हो

वैसे इसमें सिर्फ ठकुराइन की गलती नहीं थी, खालिद छूट की चूसै का कार्य कर भी कुछ ऐसे रहा था की कोई भी औरत पूरी तरह पागल हो सकती है उसके लिए

"सललललूउपपप... Srrrrrrrrrrrrrrrrlllllppppp..... ससससससननननननफफ्फ्फ्फफ्फ्फ्फ़.... गरररूपप.... गरररूपप.... गलल्लूऊऊऊप्प्प.... सललललूउपपप....."

खालिद दोनों हाथों से ठकुराइन की छूट को और अचे से फैला देता है और उसकी गहराई में अपनी खुरदुरी जीभ को और अंदर तक घुसा क और जोरदार तरह से चेतना सुरु कर देता है..

गाओं की सम्मानजनक हवेली में इस समय सिर्फ एक आवाज़ गूंज रही थी, और वो थी

ठकुराइन की छूट चटाई.. और चूसै की

"आआआह्ह्ह्ह..... गरररूपप... गलल्लूऊऊऊप्प्प.... Srrrrrrrrrrrrrrrrlllllppppp.... सललललूउपपप.... सस्सल्लूऊऊऊप्प्प्प.. srrrrrrrrrrrrrrrrlllllppppp..."


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खालिद अपनी खुरदुरी जीभ का पूरा कमल दिखा रहा था, वो ठकुराइन की छूट की फाकों में अपनी जीभ को अंदर तक घुसता तोह कभी फाकों की गुलाबी पंखुड़ियों पे अपनी खुरदुरी जीभ को आगे पीछे करते हुए जोर जोर से चुस्त, तोह कभी ठाकुर की पत्नी की गुलाबी छूट की फाकों को अपने दाँतों क बीच भर क हल्का सा काट भी लेता.. जिससे ठकुराइन क पुरे जिस्म में एक तीव्र दर्द की लहर सी दौड़ जाती है

पर ये दर्द ठकुराइन को और ज्यादा आनंद देने का काम कर रहा था

"आआआह्ह्ह्ह... माहाररररर.... शाब्बाश.... ेस्शह्ह्ह्हह्ह्ह्ह... उफ्फ्फफ्फ्फ़.... आआआहहहहह.... ाआईस्स्सस्सीीीे... Hi....... हैईईई.. Maaaaaaaaaa....... माअररररररर... गयीईइ... रईईए...... खा जाओ आज मेरी छूट को... आआह्ह्ह्हह.. मा......"

ठकुराइन की आँखें जो आनंद से पूरी तरह बंद हुई पड़ी थी, पर जब इस बार खालिद ने उसकी छूट को अपने मुंह में भर क हल्का सा काटा तोह हमारी ठकुराइन का पूरा जिस्म मानो तिलमिला सा गया था.. और जिसकारण से उनकी कामुकता से बंद आँखें भी खुल गयी थी

"आआआआअह्हह्ह्ह्ह.... ख़ालिदददददददद.... Maaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaa"

पर कामुकता का हाल देखो.. ठकुराइन अपनी आँखें तोह खोल लेती है पर अपने दर्द से अकड़ते हुए जिस्म को आज़ाद नहीं करवाती, उल्टा खुद hi अपनी छूट को इतना ज्यादा फैला लेती है की छूट का सुनहरा छेद तोह नज़र आता hi आता है.. साथ hi साथ गांड का कैसा छेद भी हल्का सा खुल hi जाता है


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पर हमारा खालिद तब भी अपने काम में कोई कामचोरी नहीं दिखता और अपनी जीभ को ठकुराइन की छूट क और अंदर तक भर क उसे अंदर तक चाटने का कामुक कार्य करने लगता है

"सललललूउपपप.... गलल्लूऊऊऊप्प्प.... गरररूपप... Srrrrrrrrrrrrrrrrlllllppppp.... सललललूउपपप.... Srrrrrrrrrrrrrrrrlllllppppp... Guuuuuuuuuuulllluuuuppp"

खालिद इस बार कुछ ज्यादा hi जोर से छूट की चूसै कर रहा था जिससे ठकुराइन की आँखें कामुकता की अधिकता से एक बार फिर से बंद होती चली जाती है

"आआआआअह्ह्ह्हह.... खा... जूऊऊ.. मेरिइइइ... छ्हूऊऊटटटट... कोऊ.... आआह्ह्ह्हह... Maaaaaaaaaaa"

"हअआइईईई रीई ठकुराइन किया करती है, चिल्ला चिल्ला क पूरी हवेली को बुलाना है किया"

अचानक ठकुराइन क कानो में पड़ी इस आवाज़ क कारन उसकी आँखें खुद hi खुलती चलती जाती है और तब उन्हें एहसास होता है की वह बस वो अकेली hi थी और खुद hi अपनी छूट को जोर जोर से मसले जा रही थी

ठकुराइन की आँखों में छाए हुए नासा से साफ़ साफ़ पता चल रहा था की उसकी हालत किया थी इस समय

वो पाती है की वो इस समय पूर्ण निवस्त्र होक अपने बिस्तर पे है और अपनी दोनों टैंगो को पूरी तरह फैलाये हुए अपनी छूट में 2 उँगलियाँ एक साथ जोर जोर से अंदर बहार करती जा रही है

"लगता है आज फिर उस लड़के 'खालिद' की यादों ने आपको बैचैन कर रखा है"

दरवाजे क पास कड़ी उस औरत की बातों ने इस बार ठकुराइन का धियान अपनी तरफ खींच hi लिया.. पर ठकुराइन अपने कॉमर्स को निकलने क काफी करीब थी इसलिए वो सामने कड़ी उस औरत को हस्ते हुए देखने क बाद भी अपनी कामुक हरकत को करना बंद नहीं करती

ठकुराइन- (जोर जोर से अपनी छूट में एक साथ अपनी 2 उँगलियाँ अंदर बहार करते हुए) आआआह्ह्ह्ह.. किया करू 'जमीला'.. आआअह्ह्ह्ह.. उस लड़के 'खालिद' का लुंड मेरी आँखों क आगे से हैट hi नहीं रहा है

जमीला नमक वो स्त्री अपनी ठकुराइन की बात पे धीरे से है पड़ती है और उनकी इस्तिथि का भरपूर मज़ा लेते हुए कहती है

"छोटा मुंह, बड़ी बात.. पर अगर खालिद आपको ऐसी हालत में देख ले तोह..."

जमीला क मुंह से सिर्फ खालिद का नाम सुनते hi ठकुराइन की छूट मूत की धार चोर देती है

"आआआह्ह्ह्ह... आआह्ह्ह्ह... देख ले तोह किया... बोल.. जमीला... बोल जल्दी.. बोल... आआह्ह्ह्हह"


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ठकुराइन की छूट से रह रह कर मूत की तीव्र धार निकल निकल रही थी पर ठकुराइन खुद hi बार बार अपनी छूट में अपनी उँगलियों को अंदर घुसा लेती है जिससे उनके मूत की धार अटक सी जाती है

जमीला- (पुरे नज़ारे का भरपूर आनंद लेती हुई) अब मैं नौकरानी कैसे कहु की....

ठकुराइन जो इस समय अपने जिस्म की आग में झुलस रही थी, वो लगभग पहात सी पड़ती है

"साललीई... बोल जल्दी, खालिद मुझे ऐसे देख ले तोह किया

जल्दी बोल, वर्ण मुझसे बुरा कोई नहीं होगा.. आआअह्ह्ह्ह... बोल जमीला"

जमीला- (मंद मंद मुस्कुराते हुए) यही की.. खालिद ने अगर आपको ऐसे देख लिया तोह आपकी छूट मैं अपना मोटा लुंड दाल देगा... और....

ठकुराइन- (जमीला क यु बार बार चैराने से पूरी तरह पागल होती जा रही थी) साललीई.... आआआह्ह्ह्ह... कामिनी... पूरी बायत बोल.. और किया करेगा वो.. आआह्ह्ह्ह

जमीला- (जैसे उसे पता हो की गरम लोहे में हथोड़ा कब मारना होता है) खालिद आपकी इस खूबसूरत छूट में अपना मोटा लुंड दाल क आपको किसी सड़क चाप रंडी क जैसे छोड़ डालेगा

जमीला क मुंह से सिर्फ इतना hi निकलना था की ठकुराइन अपनी छूट में घुसी हुई ऊँगली को बहार खींच लेती है और उनकी छूट से जोरदार धार निकल पड़ती है


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ठकुराइन- Aaaaaaahhhhhhhhhhhhhhh... Maaaaaaaaaaaaa................

आखिर ठकुराइन उस आनंद तक पहुंच hi जाती है, जहा क लिए वो इतनी म्हणत कर रही थी और उनकी छूट से निकालनी वाली जोरदार धार क साथ साथ वो पूरी तरह थक हार क बिस्तर पे पद जाती है और लम्बी लम्बी साँसें लेने लगती है

वही जमीला, ठकुराइन को यु पूरी तरह नंगी लेते हुए देख क उनकी भीगी छूट को hi निहार रही थी और साथ hi साथ उसका एक हाथ उसकी सलवार क उस स्थान पे आ चूका था जहा हमेशा एक गहरी खाई होती है.. पर जमीला में कुछ अलग था

ककी जब वो अपनी सलवार क उस स्थान पे अपनी उँगलियाँ को चला रही थी वो वह गहराई नहीं, बल्कि ऐसा लग रहा था जैसे कोई मोटा सांप अपना फैन फ़ैलाने को तैयार बैठा हो

जमीला मन hi मन

'उफ्फ्फ्फ़... किया छूट है रैंड की....'

करीब 2-3 मं बाद ठकुराइन अपने गीले बिस्तर से उठते हुए.. जिसे उसने खुद hi अपने मूत से भिगोया था

"जमीला जरा अचे से साफ़ सफाई कर देना"

ठकुराइन अपने बिस्तर और कमरे में पड़ी अपनी साड़ी, ब्रा पेंटी और बाकि अस्त व्यस्त चीज़ों की तरफ इशारा करते हुए कहती है

फिर वो अपनी तकिया क नीचे हाथ डालती है और जब हाथ बहार आता है तोह उसमें एक छोटा सा लेडीज पर्स जैसा था, जिसमें से वो एक 500 का नोट निकलते हुए जमीला की तरफ बड़ा देती है

जमीला लपक क उनके हाथ से वो नोट ले लेती है.. मानो उसे कबसे ऐसी बात का इन्तिज़ार था

ठकुराइन- (जमीला की तरफ देखते हुए) बताने की जरुरत तोह है नहीं.. की

जमीला- (ठकुराइन की बात को पूरा भी नहीं होने देती) जी.. जी मालकिन आप फ़िक्र न करो, आपका ये राज़ मेरे साथ सी कब्र तक जायेगा

ठकुराइन, अपनी नौकरानी जमीला की बात सुनते हुए मुस्कुरा पड़ती है और कमरे में hi एक तरफ बने बाथरूम की तरफ बाद चलती है

पर जैसे hi बाथरूम क अंदर जाने लगती है वो वापस जमीला की तरफ देखते हुए धीरे से कहती है

"किया सच में कभी ऐसा हो सकता है की वो लड़का 'खालिद' मुझे... "

जमीला, ठकुराइन क मन की बात भली भांति समझ जाती है और मुस्कुरा क कहती है

"आपको मन करने वाला मर्द इस गाओं में किया, पूरी दुनिया मैं नहीं है

आप बस इशारा करो, खालिद किया पूरा गाओं..."

ठकुराइन- (ग़ुस्से से) सिर्फ वो लड़का खालिद.. और कोई नहीं

जमीला- जी.. जी.. मालकिन.. मेरा वो मतलब नहीं था

ठकुराइन- (एक लम्बी सांस लेते हुए) पर दर भी लगता है, कही ठाकुर साहब को पता चला तोह...

जमीला मुस्कुराते हुए

"आप उन्हें बताओगी नहीं, मैं बताने वाली नहीं.. फिर कैसे पता चलेगा

वो तोह आप hi डर्टी हो.. वर्ण कब का वो लड़का सच में आपकी छूट चाट रहा होता, यु उसे सोच सोच क आपको रोज़ रोज़ अपनी उँगलियों से म्हणत नहीं करवानी पड़ती है"

ठकुराइन- जमीला.. तू अचे से जानती है ये सब इतना आसान नहीं, मैं कोई सड़क चाप औरत नहीं

ठकुराइन एक पल को रूकती है और फिर अपनी बात पूरी करती है

"मैं इस गाओं की ठकुराइन हु"

जमीला ठकुराइन की बात पे हामी भरते हुए अपना सर हिला क उनकी बात का समर्थन करती है

ठकुराइन जो अब स्नानघर का दरवाजा खोल क अपने आधे जिस्म को अंदर कर चुकी थी, वो अंदर जाने से पहले एक बार फिर जमीला को देखते हुए कहती है

"वैसे.. 'कनक' कहा है"

जमीला- छोटी मालकिन अपने कमरे में hi है.. थोड़ी दिएर पहले देखा था वो गहरी नींद में सो रही थी

जमीला ये कहते हुए मंद मंद मुस्कुरा पड़ती है

ठकुराइन है में सर हिलाते हुए स्नानघर क अंदर जेक दरवाजा बंद कर लेती है और उसके जाते hi जमीला बिस्तर और कमरे की हालत देखते हुए वापस से अपनी सलवार क ऊपर से उस मोठे फैन फैलाये हुए नाग को मसलते हुए

"देखना ठकुराइन.. एक दिन ऐसी बिस्तर पे तुझे रगड़ रगड़ क को..."

जमीला धीरे से खुद से इतना hi बोलती है की वो खुद hi मुस्कुरा पड़ती है, और फिर वो बिना समय नस्ट किया कमरे की साफ़ सफाई में लग जाती है

वैसे मन्ना पड़ेगा, जमीला बाकि औरतों जैसी तोह नहीं लग रही है.. ये कुछ अलग है

हवेली की बड़ी ठकुराइन यानि ठाकुर साहब की धर्मपत्नी से मिलने क बाद अब चलते है उनकी सुपुत्री यानि छोटी ठकुराइन क पास.. और जैसा की जमीला ने कहा था

"छोटी मालकिन अपने कमरे में hi है.. थोड़ी दिएर पहले देखा था वो गहरी नींद में सो रही थी"

करीब 20 मं पहले..

गाओं की ऐसी मशहूर और आलीशान हवेली का एक और कमरा

"आआआह्ह्ह्ह खाआलल्लीिद्ड़द.. मेरी जाआनंनं... आआआह्ह्ह्ह... धीरीईईए... उफ्फ्फ्फफ्फ्फ़.. ेस्स्स्सह्ह्हह्हह्ह्ह्ह... आआआह्ह्ह्ह... माहाररररर.... गईइइइइइ रईईईई... धीरे धीरे छोड़ो अपनी इस नाजुक मोहब्बत को.. आआअह्ह्ह्ह... हैईईई... रईईईई.... ेस्स्स्सह्ह्ह्ह... हीी मेरे खालिद आज तोह तुमने अपनी इस मेहबूबा की छूट पहाड़ hi डायललीईई.. न जाने कबसे तुम्हारा लुंड अपनी योनि में लेने का सपना लिए हुए जी रही थी.. आआआआहहह... आख़िरकार आज मेरा सपना पूरा हो गया... आआआहहहहह.. लाआल कर दो मेरी छूट.. आआआहहह... इतना छोड़ो, इतना छोड़ो की आज इसकी साडी गर्मी निकल जाये और तुम्हारा प्रेम मेरी योनि से बहे.. आआआहहहहहहह"

गाओं क सबसे ताक़तवर आदमी क घर में उसकी बेटी क कमरे में कामुकता का अलग सी तांडव चल रहा है.. जहा उसकी जवान खूबसूरत बेटी पूरी तरह नंगी अवस्था में अपने दोनों पैरों को उठाते हुए थी, वैसे एक पेअर तोह उस 'खालिद' नमक युवक ने उठा क उसके चेहरे क नजदीक करने का कार्य कर रखा था

पर असल बात ये थोड़ी है.. असल कामुकता का खेल तोह ऐसा है की इस समय छोटी ठकुराइन की नन्ही सी छूट में खालिद नाम क उस जवान युवक का मोटा लुंड पूरी गति से अंदर बहार हो रहा है


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लुंड की मोटाई और जोर जोर से अंदर बहार होने क कारन छोटी ठकुराइन की योनि की पंखुड़ियों सामान बुर की फाकों को रगड़ते हुए अंदर जाता लुंड उसे बुरी तरह से रगड़ रहा था और उस कामुक रगड़ क कारन एक अनोखा आनंद हमारी छोटी ठकुराइन क पुरे सरीर में भरता जा रहा था

"आआआह्ह्ह्ह... मीररररीीी... ख़ालिदददददददद... आआआह्ह्ह्ह... और जोर से.. आआह्ह्ह्ह और जोर से... आआआअह्ह्ह्ह... और... और... और.. जुरररररर... से.... हीी.... रईईईई... Maaaaaaaaaa... माअरररररररर... गईइइइइइइइ रईईए...... ेस्स्स्सह्ह्ह... पहाड़ड... दो.... पहाड़ड़ड़ड़... दो... ेस्स्स्सह्ह्ह्ह... उफ्फ्फ्फफ्फ्फ़... माआ... ऐसे.. hi.. हआ... ऐसे hi... आआआह्ह्ह्ह"

खालिद पूरी ताक़त और रफ़्तार से अपना मोटा लुंड अंदर बहार करते हुए हमारी छोटी ठकुराइन की नन्ही सी छूट को बड़ा करने का कार्य पूरी म्हणत और लगन से कर रहा है.. वो जरा भी कामचोरी नहीं दिखा रहा है इस कामुकता क कार्य में

"आआआअह्ह्ह्ह... पहाड़ड़ड़ड़ डालूंगा.. ाआज तेरी छूट.. आआआहहहहह.. बहुत गीली है तेरी छूट... आआआआह्ह्ह्ह... तू मेरी है.. आआअह्ह्ह... सिर्फ मेरी.... आआआहहहहह"

छोटी ठकुराइन- आआआह्ह्ह्ह... हआ... मेरी जाएं.. मैं सिर्फ तुम्हारी हु... आआआआह्ह्ह्ह... और जोर से और जोर से.. आआअह्ह्ह.. और जोर से.... ऐसे hi... आआआहहहहह

खालिद अपने दोनों हाथों को खूबसूरत छोटी ठकुराइन की कमर से ऊपर सरकते हुए ठीक उसकी मासूम और कासी कासी चूचियों क पास लाके रोक देता है वही अपने हाथों को जमा क और धक्कों में मानो तूफानी तेज़ी ले आता है.. जिससे हमारी नंगी पुंगी छोटी ठकुराइन मानो चुदाई क आनंद से पागल hi हो उठती है और उसका जिस्म अकड़ सा जाता है


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छोटी ठकुराइन- (अपने खुले मुंह से अपनी चुदाई का मिलने वाला आनंद बताते हुए) आआआआअह्हह्ह्ह्ह... उफ्फफ्फ्फ़... ेस्स्स्सह्ह्ह... कितना अंदर तक जाता है तुम्हारा ये मोटा लुंड... आआआह्ह्ह्ह... ऐसा लगता है की जैसे मेरी बच्चेदानी को छू रहा हो... ेस्स्स्सह्ह्ह... माआ.. उफ्फफ्फ्फ़... हैईईई.. तुम्हारा लुंड मुझे पागल कर देता है... आआआआह्ह्ह्हह्ह्ह्हह.. भर डालो मेरी छूट को अपने प्रेम रास से.. आआह्ह्ह्हह... अपने प्रेम की निशानी भर दो मेरे अंदर.. आआअह्हह्ह्ह्ह.. हैईईई.. मेरिइइइ.. जांणण

गाओं की सबसे आलीशान और मशहूर हवेली क एक कमरे में इस समय बस 2 तरह की आवाज़ hi सुनाई पद रही थी

पहली हमारी खूबसूरत नंगी छोटी ठकुराइन की कामुक आवाज़ें जिसने उस आलीशान कमरे को पूरी तरह भर रखा था

"आआआअह्हह्ह्ह्ह.... और जुर्ररर... और जोररर.. से छोड़ो.. आआह्ह्ह्हह... आआह्ह्ह्हह्ह कितना मोटा है... आआआहहहहह पहहहहादददद डायआलल्लूऊओ.. मेरी.. छूट को.. आआआह्ह्ह्ह... लाआल कर दो मेरी छुट्ट्ट्ट... आआआह्ह्ह्हह्ह्ह्ह कितना अंदर तक जाता है तुम्हारा.. आआअह्हह्ह्ह्ह.. मायआ....."

और दूसरी आवाज़ थी खालिद की चलती कमर की वजह से उसके बड़े बड़े लटक रहे ाँद जो बार बार कामुक छोटी ठकुराइन की छूट से टकरा रहे थे और पुरे कमरे में उस मधुर सी आवाज़ को भर रहे थे

'थाआपपप.. चाहैत्ताआँक्क्क्क..... थापाककक.... थाआपप... चत्तत्ताआआककककक... थाआपप.. थाप.. थाप... थापाककक'

कामुकता का ये खेल सायद काफी दिएर से चल रहा था ककी दोनों क जिस्म अकड़ने सुरु हो चुके थे

खालिद- आआआह्ह्ह्ह... मेरी कमसिन काली... आआह्ह्ह्ह बता भर दू तेरी छूट... आआआह्ह्ह्हह्ह

खालिद ये कहते हुए छोटी ठकुराइन का पेअर और ज्यादा उठा क उसके जिस्म से चिपका देता है, जिससे उसके और ज्यादा तीव्र हो चुके दकके योनि की अंतिम गहराई तक जाने लगे थे

छोटी ठकुराइन- (अपनी छूट क हर कोने में खालिद क मोठे लुंड को जाते हुए महसूस करती है जिससे उसकी छूट लबालब पानी से भरनी सुरु हो चुकी थी) आआअह्ह्ह्हह... माआआआ.... हाआआअआइईईई... Aaaaaaaaaaaahhhh... हआ... हाआआआ... भारररर... दो.... मेरी... मेरी छूट... आआआह्ह्ह्हह्ह... ेस्शह्ह्हह्ह्ह्ह... आआआह्ह्ह्ह भर दो आअज मेरी बच्चेदानी को अपने गाड़े पानी से.. आआअह्ह्ह्ह.. माआआआआ

और यही वो पल था जब खालिद अचानक से अपने दकके रोकते हुए अपना लुंड पीछे खींच लेता है, पर बहार नहीं निकलता.. यु समझ सकते है की उसका मोटा टोपा अब भी हवेली की छोटी ठकुराइन की योनि में hi फसा हुआ था

और फिर किया था, खालिद का मोटा लुंड अपना गाड़ा वीर्य बहाना सुरु कर देता है जो छोटी ठकुराइन की योनि को पूरी तरह भरना सुरु कर देता है.. और साथ hi साथ छोटी ठकुराइन की योनि भी अपना कॉमर्स बहाने लगती है


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जिससे दोनों क रास का कामुक समागम होना सुरु हो जाता है.. और अपनी जोरदार चुदाई से पूरी तरह संतुष्ट छोटी ठकुराइन की जैसे hi आँखें बंद होती है उसके कानो में khil-khilati हुई आवाज़ पड़ती है

"लगता है आज फिर सपने में उसी लड़के से चुदाई करवा ली आपने.. किया नाम था.. 'है खालिद' "

अपने कानो में पड़ी इस आवाज़ क कारन छोटी ठकुराइन टपक से अपनी आँखों को खोलती है

और वो खुद को पूर्ण निवस्त्र पाती है अपने बिस्तर पे.. अपनी दोनों टैंगो को फैलाये और उसकी योनि से उसका चिपचिपा कॉमर्स बह रहा था


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और उसके ठीक सामने उसकी गीली रास बहती योनि को लालची नज़रों से देखती हुई जमीला कड़ी थी

छोटी ठकुराइन का दिल जोरो से धड़कने लगता है और वो जल्दी से अपने बगल पड़ी चादर को उठा क अपने निवस्त्र सरीर पे डालते हुए

"वो.. जमीला बजी वो.. मैं..."

अब बताने की जरुरत तोह है नहीं की हमारी छोटी ठकुराइन भी ठीक अपनी माँ 'ठकुराइन' की तरह hi खालिद नमक उस जवान पुरुष को याद करते हुए अपनी योनि रास को निकलने का कार्य कर रही थी

जमीला.. छोटी ठकुराइन क पास आते हुए मुस्कुरा क उसके बिस्तर क पास नीचे बैठते हुए

"अरे मुझे तोह पता है न.. मुझसे किया छुपाना छोटी ठकुराइन"

छोटी ठकुराइन एक लम्बी सी ाःह भरते हुए

"किया करू बजी.. देखो न उस खालिद की याद hi मेरा रास निकल देती है"

जमीला khil-khila क है पड़ती है, जिसपे छोटी ठकुराइन शर्म से लाल हो जाती है

जमीला धीरे से अपना हाथ चादर क ऊपर ठीक योनि स्थल पे रखते हुए चादर क ऊपर से hi छोटी ठकुराइन की योनि को हल्का सा सेहला देती है.. जिससे छोटी ठकुराइन की आँखें बंद होती चली जाती है

"आआआह्ह्ह्हह्ह... जमीला बजी..... ेस्स्स्सह्ह्ह्ह"

जमीला- (मुस्कुराते हुए) हीी री.. इनसे तोह बड़ा सारा रास बहा दिया, पर ऐसे कैसे चलेगा.. ऐसे ऊँगली से मज़ा थोड़ी आता है

छोटी ठकुराइन एक ाःह सी भरते हुए

"तोह आप किया चाहती हो, मैं उस खालिद क सामने जेक नंगी हो जाऊ और कहु की आओ मुझे को...."

जमीला है पड़ती है और कहती है

"ऐसा तोह कभी न करना.. ककी लड़कियों को चाहिए की मर्द उसके पीछे पीछे भागे, न की वो उनके"

छोटी ठकुराइन उत्सुकतावश जमीला को देखते हुए

"पर ऐसा कैसे संभव है, यहाँ तोह पिताजी क दर से मैं आज तक उस खालिद से बात भी नहीं कर पायी हु.. उसे तोह ये भी नहीं पता होगा की कोई उसके नाम का रास बहा रहा है"

जमीला अब भी धीरे धीरे चादर क ऊपर से योनि को मसले जा रही थी, जिससे गीली योनि का चिपचिपा रास अब चादर क ऊपर आके जमीला की उँगलियों को भिगोने लगा था

"देखो छोटी ठकुराइन, अगर कुछ पाना है तोह उसके लिए म्हणत तोह करनी पड़ेगी न"

छोटी ठकुराइन यु अपनी छूट पे जमीला की उँगलियों का कामुक स्पर्श पाते हुए फिर से धीरे धीरे कामुकता से भरने लगी थी

"ेस्स्स्सह्ह्ह.. जमीला बजी.. किया करती हो"

जमीला मुस्कुराते हुए

"मैं भला किया कर रही हु, मैं तोह यही कह रही हु की कब तक खालिद क नाम पे ऊँगली से काम चलोगी.. अब वक़्त आ चूका है की उसका लुंड लो अपनी इस गीली बुर में"

जमीला ये कहते हुए धीरे से चादर क ऊपर से hi छोटी ठकुराइन की योनि को दबा देती है

छोटी ठकुराइन- ेस्स्स्सह्ह्ह्ह... bajjiiiiiiiiiiiiii... आप तोह जानती हो की पिताजी क लोग हर जगह होते है, अगर मैंने ऐसा कुछ करने की कोशिश की और उन्हें पता चला तोह उस लड़के की जान को खतरा भी हो सकता है

जमीला हस्ते हुए अब योनि को और ज्यादा जोर से दबाने लगी थी

"आप ठकुराइन हो.. आपको डरना सोभा नहीं देता, जो चाहिए उसके लिए म्हणत तोह करनी hi पड़ती है"

जमीला ये कहते हुए धीरे से अपनी बीच वाली ऊँगली को चादर क ऊपर से hi छोटी ठकुराइन की योनि में घुसाने लगती है.. जिससे छोटी ठकुराइन पागल सी हो उठती है और जल्दी से उठ क बैठ जाती है

"किया करती हो जमीला बजी, हटो मुझे नहाना है"

और इतना कहते हुए चादर को जल्दी से अपनी जिस्म पे लपेट क कमरे में hi एक तरफ बने स्नानघर की तरफ दौड़ पड़ती है.. असल में वो जमीला की हरकत से एक बार फिर अपना काबू खोने लगी थी

जमीला अपनी जगह पे कड़ी होते हुए, अपनी गीली ऊँगली को अपने मुंह में रखते हुए

"Ummmmmmmmmmm... उफ्फ्फ्फ़ किया जायका है... ससुउउपप"

जमीला मुस्कुराते हुए अपने दूसरे हाथ से अपनी योनि स्थल को चुटी है पर वह ऐसा लगता है मानो उसकी सलवार क अंदर कोई मोटा सांप फैन फ़ैलाने की कोशिश कर रहा हो

जमीला खुद पे काबू पाते हुए वह से हवेली क दूसरे हिस्से में बने बड़ी ठकुराइन क कमरे की तरफ चल पड़ती है.. जहा वो जैसे hi दरवाजे क पास पहुँचती है उसके कानो में कामुक आवाज़ सुनाई पड़ती है

"आआअह्ह्ह खालिद.. आआह्ह्ह खा जाओ.. अपनी इस ठकुराइन की छूट को.. आआआह्ह्ह्ह अपने मुंह में भर लो मेरी छूट को.. आआह्ह्ह्हह निचोड़ निचोड़ क चूस लो मेरी छूट को

आआह्ह्ह्ह खालिद बीटा... आआआह्ह्ह्ह... खा जाओ इस ठकुराइन की छूट को... आआआह्ह्ह्ह... बहुत निगोड़ी छूट है ये.. आआह्ह्ह आज ऐसे अचे से चूस चूस क खा जाओ"

जमीला जैसे hi ये सुनती है मुस्कुरा पड़ती है और खुद से कहती है

"साली माँ बेटी दोनों एक hi लुंड क चक्कर में है"

इसके बाद कैसे जमीला बड़ी ठकुराइन क पास जाती है और किया बातें होती है ये आप ऊपर पहले hi पद चुके है

गाओं क सबसे ताक़तवर इन्शान 'ठाकुर साहब' यानि 'ठाकुर बलवंत प्रताप सिंह' क घर की दोनों मादा किया चाहती है ये आप थोड़ा बहुत यहाँ से जान hi चुके है

अब इन दोनों की ये कामुक ीचा कभी पूर्ण हो सकेगी की नहीं.. इसका उत्तर तोह भविस्य में hi मिल पायेगा

बाकि ये खालिद कोण है ये सायद आप भूल चुके होंगे, ककी अभी तक इस कहानी इसका सिर्फ नाम hi आया है

पर ये एक बहुत hi महत्वपूर्ण किरदार है.. जो आगे जेक हमारे मोनू और मालती क साथ उसके कंधे से कन्धा मिलकर खड़ा होगा

हवेली और इनकी इन दोनों मादा क बारे में हम आगे कही बात करेंगे

अभी ये कैसी दिखती है इसका अंदाजा आप इन दोनों फोटोज से लगा सकते है 👇

ठकुराइन / कामिनी


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छोटी ठकुराइन / कनक


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जाते जाते जमीला से भी मिल लीजिये 👇



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जमीला
 
नई अपडेट 👇 / पेज No. 235



Post in thread 'मालती का कामुक संसार (Adultery Upanyas)'



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अपडेट #16

सन #03

अपडेट 16, सन #01 क समय क कुछ सवाल 🖊️

1- भानु फ़ोन पे किस्से बात कर रहा था ?

2- सविता ने फिर से मोनू की मालिश की.. तोह किया फिर से वही कामुकता का खेल हुआ ?

3- त्यागी, मोनू को लेके कोनसी बात कहना च रहा था.. जिसके लिए महेंद्र ने सभी को घर क बहार बुलाया ?

और न जाने ऐसे कितनी hi सवाल अभी भी बाकी है.. ??

---

जैसा की मैंने पिछले सन (सन #05) क अपडेट क समय कहा था की सन #03 & 04 आगे आएगा.. तोह ये रहा सन #03

सन 🖼️ #03

अपडेट #16, सन #01 से... 👇

त्यागी जी सभी की तरफ देखते है फिर कुंदन और महेंद्र की तरफ देखते हुए

"वैसे तोह मोनू अब ठीक है पर पूर्ण स्वस्थ होने मैं उसे थोड़ा और समय लगेगा.. पर मैं चाहता हु की"

पर फिर त्यागी खुद hi रुक जाते है पर महेंद्र ने इस बात पे धियान दिया था की त्यागी सुरु मैं मोनू की सेहत को लेके कुछ बोलने वाले थे पर अचानक रुक गए थे

इसलिए वो कुंदन, वीरू और भानु को बहार चलने का इशारा करते हुए त्यागी जी की तरफ देख क कहते है

"त्यागी भाई हम सब बहार है, आप सविता को सब समझा क आइए.. फिर सब बढ़िया सी चाय पीते है"

कंटिन्यू..

जल्दी hi सभी मर्द घर क बहार छप्पर क नीचे बैठे हुए थे, जहा करीब 30-40 मं बाद त्यागी जी पसीने में भीगे हुए वह आते है.. वैसे वो काफी खुश नज़र आ रहे थे

भानु, त्यागी को ऊपर से नीचे तक देख क हस्ते हुए कहता है

"त्यागी जी तोह ऐसे पसीने में भीगा है, मानो कोई लम्बी दौड़ लगा क आये हो.. ?"

त्यागी, भानु को देख क मन hi मन है पड़ता है और अपनी जीत क बारे में सोचने लगता है

'साले भानु मैं अचे से जनता हु, मोनू की याददाश्त वापस आने क दर क चलते अब तू वही करेगा जो मैं चाहूंगा'

त्यागी जी वही छप्पर क नीचे पड़ी एक पुराणी सी कुर्शी पे बैठते हुए

"भाई पहले तोह चाय पिलवाओ"

त्यागी जी की बात पे महेंद्र कुछ बोलने hi वह था की तभी हर्षिता वह पहुंच चुकी थी और उसके हाथ में चाय पि ट्रे थमी हुई थी

हर्षिता- लीजिये आप सभी की चाय

भानु- (हस्ते हुए) चुटकी भाभी क हाथ की चाय.. वाआहहह

भानु की बात पे सभी क सभी है पड़ते है, और सभी एक एक करके अपनी चाय का कप उठाने लगते है.. और सबसे अंत में बारी आती है भानु की

भानु छप्पर क नीचे थोड़ा पीछे की तरफ चारपाई क दूसरी तरफ बैठा हुआ था.. जहा उसे चाय देने क लिए हर्षिता सभी को पार करके उस तक आती है

हर्षिता- लीजिये दामाद जी.. चाय का मज़ा लीजिये

भानु- (चाय का उठाते हुए धीरे से) वैसे तोह आपके हाथ का ज़हर भी खाने से कोई मन न करे, पर चाय की जगह अगर...

हर्षिता इस चाय की ट्रे लिए कुछ ज्यादा hi नीचे की तरफ झुकी थी जिसकारण उसका पल्लू आगे से पूरी तरह सरक जाता है और उसका सावला यौवन ऐसे खिल क अपनी आभा दिखने लगता है की अगर ये नज़ारा कोई जवान होता लड़का देख ले तोह उसका पानी अभी क अभी निकल पड़ता

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पर भानु एक खाया खेला मर्द है और अपने नाड़े का मजबूत भी.. पर ऐसा खूबसूरत नज़ारा आँखों क सामने होगा तोह वो बेचारे भी आखिर उसके जादू से कब तक बचता

हर्षिता का पल्लू जैसे hi सरकता है और वो उसे सही करने hi वाली होती है की वो पाती है की घर क दामाद जी की नज़रें उसके ब्लाउज क अंदर घुसने लगी है.. इसलिए हर्षिता भी अपने यौवन का दर्शन करने से जरा भी पीछे नहीं हटती है और मुस्कुरा क अपनी आवाज़ पे उतना hi बल देती है जिससे वो सिर्फ भानु क कानो तक जाये

"चाय की जगह अगर किया दामाद जी, आप कहिये तोह जरा.. जो मांगेंगे मिलेगा

आखिर आप इस घर क दामाद है.. आपको कोण मन कर सकता है"

भानु- (हर्षिता क सावले यौवन क गलियारे को देखते हुए) दूध मिल जाता तोह...

हर्षिता- (अपनी हसी छुपाते हुए, ककी उसे पता था की उसके दोनों जेठ जी और उसका पति, साथ hi त्यागी जी वही बैठे हुए है.. और ऐसी इस्तिथि में घर क दामाद से हसी ठिठोली का अपना hi मज़ा होता है) दूध ऐसे थोड़ी मिल जायेगा, उसके लिए म्हणत लगती है

भानु- (एक पल क लिए अपनी नज़रों को ऊपर उठा क हर्षिता की झील जैसी आँखों में देखता है और तुरंत hi उसी कामुक घाटी पे अपनी नज़रों को लगते हुए कहता है) म्हणत.. अरे आप एक बार बोल क तोह देखा भाभी, मैं तोह दोनों हाथों से म्हणत करने को तैयार बैठा हुआ

भानु की हाजिरजवाबी देख क हर्षिता भी अपनी हसी रोक नहीं पाती और हल्का सा ऊपर होते हुए

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"सिर्फ दोनों हाथों से.."

भानु बिना विलम्ब किये तुरंत बोल पड़ता है

"मैं तोह मुंह से भी चूसने को तैयार हु"

हर्षिता को लगा था भानु उसके मज़ाक का जवाब बस मज़ाक में देगा, पर भानु तोह अचानक से कामुकता का द्वार खोलने लगा था.. इसलिए हर्षिता जल्दी से सीढ़ी होती हुई तुरंत अपना पल्लू सही करती है और भानु को देख क बस मुस्कुरा क रह जाती है

हर्षिता अपनी खली ट्रे को वह से ले जाते हुए एक अंतिम बार भानु को देख क मुस्कुरा पड़ती है और फिर घर क अंदर प्रवेश कर जाती है

इधर हर्षिता क वह से जाते है, महेंद्र चाय का एक घुट भरते हुए

"त्यागी भाई, आप अंदर मोनू की सेहत को लेके कुछ बोलने वाले थे.. पर फिर मैंने देखा की आप बोलते बोलते रुक गए"

महेंद्र की बात पे अब सभी का धियान त्यागी जी तरफ आकर्षित हो चूका था

त्यागी जी कुछ पलों तक शांत रहने क बाद अपनी गंभीरता दिखते हुए कहते है

"वैसे तोह मैंने जिन प्राचीन जड़ी बूटियों से मोनू का उपचार किया है मुझे उनपर पूर्ण विश्वास है.. पर.. "

त्यागी जी की इस बात पे कुंदन व्याकुल हो उठता है, और होता भी कैसे नहीं.. आखिर वो एक बाप है

"पर किया त्यागी भैया, बताइए न.. किया अब भी मोनू को कोई खतरा है"

त्यागी- (चाय का एक और घुट भरते हुए) हम्म्म.. वैसे तोह मोनू पूर्ण रूप से स्वस्थ है, और जो थोड़ी बहुत कमजोरी है वो समय क साथ साथ ख़तम हो जाएगी.. बाकि मैं कुछ ऐसी जड़ी बूटियां दूंगा जिनकी निरंतर मालिश से मोनू पहले से ज्यादा बलिस्त और शारीरिक रूप से मजबूत हो जायेगा

महेंद्र- (जिसने त्यागी की बातों से ये तोह भाप hi लिया था की कुछ तोह बात है) पर फिर भी कुछ बात तोह है त्यागी भाई.. जो आप बोलना च रहे है

त्यागी- (एक लम्बी सी सांस चोरते हुए) आपकी बात सही है महेंद्र भाई, पर मैं सोच रहा हु की कहु की नहीं.. ककी उसमें थोड़ा खर्चा है

इस बार किसी और क कुछ बोलने से पहले hi वीरू बोल पड़ता है

"आप करके की न सोचिये, मोनू की सेहत क लिए जो जरुरी है वो बताइए.. अरे मेरा अपना इतना बड़ा खेत है जरुरत पड़ी तोह थोड़ा बैच दूंगा, बस मेरा भतीजा स्वस्थ रहना चाहिए"

वीरू की इस बात पे कुंदन क दिल में अपने छोटे भाई क लिए अपने प्रेम को कई गुना बड़ा दिया था.. उसकी आँखों में आंसू नज़र आने लगे थे, पर मर्द अपने आंसू कहा दिखता है.. इसलिए कुंदन भी अपने प्रेम को छुपा ले जाता है

महेंद्र- (ठीक कुंदन की hi तरह उसे भी वीरू की बात सुनकर बहुत प्रसन्नता हुई थी) आपको जो कहना है खुल क कहिये त्यागी भाई.. पैसो को लेके आप चिंता न करिये

त्यागी- (मुस्कुराते हुए) भाई इतने ज्यादा पैसे भी नहीं चाहिए की जमीन बेचने की नौबत आ जाये, है पर 40,000- 50,000 का खर्चा जरूर है

कुंदन- (बिना एक भी पल गवाए) अरे तोह ये कोनसी बड़ी रकम है.. इन्तिजाम हो जायेगा, आप बोलिये जो बोलना चाहते है

कुंदन की बात सुनकर त्यागी और भानु दोनों hi सोचने लगते है

भानु मन hi मन

'बहनचोद बोल तोह ऐसे रहा है, जैसे 40-50 हज़ार कुछ होते hi नहीं.. सिर्फ एक चक्की hi तोह चलता है'

त्यागी भी ठीक भानु की तरह सोचने लगता है

'ये कुंदन तोह ऐसे बोल रहा है.. जैसे इसके पास कोई खजाना भरा हो'

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त्यागी अनजाने में hi सही दिशा में सोच रहा था, ककी कुंदन भी इस समय उसी खंजर वाली तिजोरी क बारे में सोच रहा था जिसमे उस अनोखे खंजर क साथ साथ हीरे मोती और सोने क सिक्के भी भरे हुए है

कुंदन अपनी सोच में

'एक सोने का सिक्का बैच दूंगा, उसी से इतना पैसा मिल जाएगा की मेरे मोनू का सारा इलाज हो जायेगा.. और जो पैसा बचेगा उससे उसके लिए बाद में एक मोटरसाइकिल दिला दूंगा'

त्यागी- (अपनी सोच से बहार आते हुए.. साथ hi भानु और कुंदन को भी वर्तमान की धरा पे वापस लाते हुए) आप सभी को पता hi है की मोनू को अपने अंतिम समय का कुछ याद नहीं है, वैसे तोह मैंने उस समय कह दिया था की ये कोई बड़ी बात नहीं है.. पर मुझे दर है की कही उस चोट की वजह से उसके दिमाग की किसी नस में सूजन न आ गयी हो.. इसलिए

त्यागी अपनी बातों से वह सभी को डरते हुए, सिवाए भानु क ककी वो समझ चूका था की त्यागी जान क कोई खेल खेल रहा है.. वर्ण मोनू की याददाश्त तोह उसने खुद अपनी जड़ी बूटियों से मिटाई है

कुंदन- इसलिए किया.. त्यागी भैया.. बोलिये न

त्यागी पूरी इस्तिथि पे मन hi मन हस्ते हुए सोचता है

'सालों को देखो तोह कैसे फड़फड़ा रहे है.. तुम सब को ऐसे तड़पते हुए देख क मुझे बहुत सुकून मिल रहा है, तुम सबको ऐसे देख क आज मेरी 'बेला' की आत्मा को चैन मिल रहा होगा'

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(बेला)

त्यागी को यु खोया हुआ देख क वीरू उसे टोकते हुए बोलता है

"किया हुआ त्यागी भैया कहा खो गए.. ?"

त्यागी वास्तविकता में लौटते हुए

"असल में.. मैं चाहता हु की मोनू क कुछ टेस्ट करवाए जाये, दिल्ली में एक बहुत बड़े हॉस्पिटल में मेरा एक दोस्त है.. मैं उसको फ़ोन कर दूंगा तोह वो सारा इन्तिजाम कर देगा, पर वो टेस्ट थोड़े महंगे है और उन्हें करवाए में विलम्ब भी नहीं होना चाहिए"

महेंद्र- आप बताइए कब करवाने है वो सभी किया कहा.. है टेस्ट, पैसों की आप फ़िक्र न करिये

त्यागी- (मन hi मन हस्ते हुए) वैसे तोह ाचा होता की 1-2 दिन क अंदर hi अगर मोनू को लेके दिल्ली चले जाते, ककी सभी टेस्ट करवाने और रिजल्ट आने में काम से काम 15-20 दिनों का समय तोह लग hi जायेगा

कुंदन- (अपने बड़े भाई की तरफ देखते हुए) भैया आप अगर कहे तोह मैं कल hi रात की ट्रैन से मोनू को लेके चला जाता हु

महेंद्र कुछ सोचने क बाद

"नहीं कल रात की नहीं.. अगले उसके दिन सुबह की ट्रैन से जाओ, अभी खतरा पूरी तरह टाला नहीं है.. इसलिए रात का सफर करने की जरुरत नहीं है"

तभी वह अब तक शांत और उन सब की बातें सुनने वाला भानु बोल पड़ता है

"मैं भी कुंदन भैया क साथ दिल्ली चलूँगा"

कुंदन- पर भानु, मेरी वजह से तुम्हे अपना नुक्सान करने की जरुरत नहीं है.. तुम्हारा यहाँ इतना सारा काम है.. कैसे.. ?

पर भानु कुछ और hi सोच रहा था

"कैसी बात करते है भैया, किया मोनू मेरे बचा नहीं है.. मैं उसका कुछ नहीं हु, आपने तोह एक पल में मुझे पराया कर दिया"

भानु अपनी मक्कारी का पूर्ण परिचय देते हुए ऐसा नाटक करता है मानो किसी भी पल उसकी आँखों से आंसू बह पड़ेंगे

कुंदन- कैसी बात करते हुए भानु.. तुम और वीरू दोनों hi मेरे लिए एक सामान मेरे छोटे भाई हो, मैं तोह बस यही कह रहा था की पता नहीं वह कितने दिन लग जाये और मैं नहीं चाहता की मेरी वजह से तुम्हारे खेतों का कोई नुकसान हो

भानु- (अपने खेल क पत्ते खोलते हुए) ऐसा कुछ नहीं है.. बात ये है की मुझे लगता है मोनू क ऊपर से खतरा पूरी तरह अभी टाला नहीं है, इसलिए अगर फिर से ऐसा कुछ होता है तोह उसकी रक्षा क लिए आपके साथ मैं भी रहूँगा.. बाकि फैसला आप सभी को करना है मैं कोनसा इस घर का सागा..

महेंद्र- भानु.. आज क बाद ऐसी बात न करना, तुम भी इस घर क उतने hi हो जितने की कुंदन और वीरू

फिर महेंद्र अपने छोटे भाई कुंदन की तरफ देखते हुए

"मुझे भानु की बात सही लग रही है, खतरा अपनी पूरी तरह टाला नहीं है.. इसलिए मोनू क साथ जितने ज्यादा लोग हर समय रहेंगे उतना hi ाचा है"

कुंदन हामी में सर हिलाते हुए, पर अपने मन में चल रही संख्या भी व्यक्त करते हुए

"पर भैया.. खतरा तोह यहाँ भी रहेगा.. तोह"

महेंद्र हस्ते हुए

"मतलब तुझे लगता है तेरा बड़ा भाई अपने परिवार की रक्षा नहीं कर सकता"

कुंदन- अरे नहीं नहीं भैया मेरा वो मतलब थोड़ी था.. में तोह बस ये कह रहा था आप अकेले

वीरू- (बीच में बोलते हुए) भैया अकेले थोड़ी है, मैं हु.. सत्तू है.. सत्यम है.. सब तोह है, आप इन सभी बातों की फ़िक्र न करो

"ठीक है भैया, मैं कल hi स्टेशन जेक हम तीनो की टिकट करवा लेता हु.. और फिर परसो की ट्रैन से दिल्ली क लिए निकल जायेंगे"

वीरू- (अचानक जैसे उसे कुछ याद आता है) भाभी क बड़े भैया भी तोह वही रहते है, तोह रहने और खाने पीने की कोई परेशानी भी नहीं होगी

कुंदन- हम्म.. सही कहा, मैं सुबह hi मनोहर भैया को फ़ोन करके सब बता दूंगा

त्यागी जी.. जो इस बार काफी दिएर बाद बोलते है

"याद रखना इन सभी टेस्ट और उनके रिजल्ट में कब से काम 15-20 दिन लग जायेंगे या सायद 5-7 दिन और ज्यादा hi"

कुंदन- उसकी परेशानी नहीं है, पर मेरी और भानु की अनुपस्थिति में चक्की और खेत..

कुंदन की बात पूरी होने से पहले hi महेंद्र निर्णायक आवाज़ में अपनी बात कहते हुए

"उस सब की तुम फ़िक्र न करो, भानु क खेतों की जिम्मेदारी सत्तू की रहेगी, और तुम्हारी चक्की का काम मैं और सोनू मिलकर देख लेंगे"

भानु- पर आपके खेत.. ?

महेंद्र- सत्यम है न..

कुंदन- पर सत्यम अकेला इतने बड़े खेत.. कैसे संभालेगा, सत्तू की बात होती तोह बात अलग थी

महेंद्र- समय और जरुरत इन्शान को सब सीखा देती है, सत्यम भी सब संभल लेगा और जहा जरुरत हुई तोह में हाथ बता दूंगा.. वर्ण घर की कोई न कोई औरत थोड़ा बहुत साथ दे देगी उसका.. आखिर वो सब भी किशन क घर की 'बहु बेटियां' है

महेंद्र अपनी बात पूरी करने क बाद कुंदन की तरफ देखते हुए

"कुंदन तुम पैसो की चिंता मत करो.. मैं इन्तिजाम कर दूंगा"

कुंदन- नहीं उसकी जरुरत नहीं है भैया, पैसे है मेरे पास.. मुझे तोह बस आपका आशीर्वाद चाहिए

महेंद्र अपने छोटे भाई की बात पे मुस्कुराये बिना नहीं रह पाटा

और इस तरह तय हो जाता है की आज से ठीक 2 दिन बाद कुंदन और भानु, मोनू को लेके दिल्ली जायेंगे उसके जरुरी टेस्ट क लिए

पर इन सभी को जरा भी अंदाजा नहीं था की त्यागी ने बड़ी hi सफाई से अपना खेल.. खेल दिया था

इधर जिस समय सभी मर्द ये सब बातें कर रहे थे उस समय घर की औरते भी दरवाजे से चिपकी हुई उनकी बातें सुन रही थी.. और जब सब पक्का हो जाता है तोह सबसे ज्यादा खुस शीला hi थी

सविता- (शीला की आँखों में ख़ुशी क आंसू देखते हुए) अरे तुझे किया हो गया.. ?

शीला- कुछ नहीं भौजाई.. मैं हमेशा सोचती थी की पता नहीं वो दिन कब आएगा जब ये घर मेरे पति को अपनाएगा, पर आज महेंद्र भैया की बात ने मुझे यकीं दिला दिया की अब ये भी इस परिवार का हिस्सा है

शीला ने ये बात महेंद्र की उस बात पे कही थी.. जो ये थी 👇

'भानु.. आज क बाद ऐसी बात न करना, तुम भी इस घर क उतने hi हो जितने की कुंदन और वीरू'

शीला की आँखों में खुसी छलकते हुए देख क मालती स्नेह से उसके बालों पे हाथ फिरते हुए

"पगली कही की, फालतू बातें बहुत सोचती है तू.. अरे भानु इस घर क दामाद है, भला वो इस घर से अलग कैसे hi सकता है

बल्कि सबसे ज्यादा ख़ुशी तोह मुझे है.. जो मेरे मोनू क लिए दामाद जी अपने खेतों का नुकसान तक करने को तैयार है

देखा जाये तोह इसके लिए मुझे तुझसे माफ़ी भी मांगनी चाहिए"

शीला- कैसी बात करती हो भाभी.. अपने मोनू क लिए खेत किया है, हम कुछ भी डाव पे लगा सकते है

शीला ने जैसे hi अपनी बात पूर्ण की मालती उसे कसके अपने आप से चिपका लेती है और गले से लगा लेती है.. जिसे देख क वह उपस्थित सभी औरतों की आँखों में आंसू भर आते है

सविता- (माहौल को हल्का करते हुए) ज्यादा चिपका चिपकी न करो.. वर्ण दोनों गीली हो जाओगी

सविता की बात पे सभी औरते अपनी हसी नहीं रोक पाती.. और ऐसे में मालती और शीला एक दूसरे से अलग हो जाती है

सविता और शीला रसोईघर में रात क खाने का इंतिज़ाम करने क लिए चल पड़ती है वही जैसे hi हर्षिता वह से जाने को होती है मालती उसका हाथ पकड़ लेती है.. और उसके आगे हाथ जोड़ क कहती है

"मैं धन्य हु.. जो मुझे तुम और वीरू भैया मिले"

हर्षिता एक पल क लिए समझ hi नहीं पाती की आखिर मालती किया बात कर रही थी, पर तभी उसे अपने पति वीरू की कही बात याद आती है

'आप करके की न सोचिये, मोनू की सेहत क लिए जो जरुरी है वो बताइए.. अरे मेरा अपना इतना बड़ा खेत है जरुरत पड़ी तोह थोड़ा बैच दूंगा, बस मेरा भतीजा स्वस्थ रहना चाहिए'

हर्षिता मुस्कुराते हुए अपनी भाभी मालती का हाथ पकड़ क कहती है

"उन्होंने कुछ गलत थोड़ी कहा, अरे मोनू हमरा बचा नहीं है किया.. खेत बचे से ज्यादा जरुरी है किया

और ये बताइये, अगर मोनू की जगह मेरा सोनू होता.. तोह किया आप पीछे रहती"

मालती का गाला भर आया था वो बस मुस्कुरा क अपनी आँखों से hi अपना जवाब दे देती है.. जिसे सुनकर हर्षिता मुस्कुराते हुए जोर से अपनी भाभी मालती को गले से लगा लेती है

"आज क बात मेरे सामने हाथ मत जोड़िएगा, अरे आप मेरी बड़ी भाभी hi नहीं मेरी बड़ी बहिन भी है.. समझी"

मालती बस मुस्कुराते हुए जोर से हर्षिता को खुद से चिपका लेती है

कुछ पलों क बाद हर्षिता भी सविता की तरह माहौल को खुशनुमा बनाने की कोशिश करते हुए

"वैसे भाभी.. आपकी चूचिया बड़ी चुभ रही है, लगता है मोती हो गयी हो"

मालती झूठा ग़ुस्सा दिखते हुए, हर्षिता से अलग होक

"किया कहा मैं मोती हो गयी हु.. बड़ी आयी, कहा से मोती हो गयी हु बारे जरा"

हर्षिता- (मुस्कुरा क आँख मरते हुए) कभी कपडे उतर क यही सवाल मुझसे पूछना.. तब अचे से जवाब दूंगी

मालती- (एक पल को तोह हैरान hi रह जाती है और फिर शरमाते हुए मुस्कुरा क कहती है) बदमाश कही की.. सविता भौजाई का रंग चढ़ गया है तुझपे, चल भाग कुछ काम कर

मालती ये कहते हुए है पड़ती है, और हर्षिता भी घर क कामो में लग चुकी थी.. मालती वापस अपने बेटे क कमरे में जाती है जहा इस बार वो पाती है की मोनू चैन से गहरी नींद में सो रहा है

मालती अपने बेटे को देखते हुए

"देखो तोह कैसे सो रहा है.. नालायक ने अभी कुछ दिएर पहले hi अपनी माँ से अपना लुंड चुसवा लिया.. बदमाश"

मालती अपनी बात पूरी करती है तोह खुद hi शर्म से लाल हो जाती है

इधर जिस समय घर की औरते दरवाजे पे कान लगाए बहार मर्दो की बातें सुन रही थी.. ठीक उसी पल सत्यम भी घर क बहार छप्पर क पास hi छुपा हुआ उनकी बातें सुन रहा था

और उनकी पूरी बातों को सुनने क बाद वही घर क पास hi एक पुराने कुवे पे बैठ क बीड़ी सुलगते हुए.. किसी नाग क जैसे फुफकार रहा था

"मादरचोद इस मोनू क चक्कर में एक दिन पूरा घर बिक जायेगा, बहनचोद इससे ाचा तोह मर hi जाता.. अब तोह मुझे पक्का यकीं हो गया है की मेरा हरामी बाप कभी भी गाओं की इस गन्दी मिटटी को चोर क सेहर नहीं जायेगा"

सत्यम किसी ज़हरीले नाग की तरह फुफकारते हुए बीड़ी का एक लम्बा सा काश मरता है और आगे बड़बड़ाने लगता है

"इस मादरचोद क चक्कर में वीरू चाचा.. वो माँ का लोढ़ा अपने खेत बेचने को तैयार है.. उसकी माँ को छोड़ू

और अब मेरे बाप क पास पैसे आ जायेंगे इस मादरचोद मोनू को सेहर भेज क टेस्ट करवाने क लिए, वर्ण मैंने जब मोटरसाइकिल क लिए पैसे मांगे थे तोह मुझे नसीहत दे रहा था

'बीटा उतने पेअर फैलाओ जितनी चादर हो'

इसकी माँ को छोड़ू.. बहनचोद ऐसे तोह मैं पूरी ज़िन्दगी ऐसी गरीबी में मर जाऊंगा, कुछ तोह करना पड़ेगा.. ककी मुझे इस गाओं की गन्दी मिटटी में नहीं मरना है

साला आज क समय कोण किशन बनता है, और मेरा भादवा बाप चाहता है की मैं पुरे खेत अकेले सँभालु.. इससे ाचा तोह चुपचुप खेत और जमीन बैच क बढ़िया सेहर में जेक मौज करो.. पैसे फैको और मस्त जीवन जियो"

सत्यम अपनी बीड़ी का बचा हुआ हिस्सा भी खींच क उसका टुकड़ा उसी सूखे कुवे में फैकते हुए फिर से बड़बड़ाने लगता है

"ऊपर से मेरी रैंड माँ.. साली ने इतने सपने दिखाए थे की गाओं की जमीन बैच क किसी बड़े सेहर में अछि ज़िन्दगी जियेंगे और देखो साली उस मोनू क चक्कर में उसकी ममता भी जाग गयी.. मादरचोद रैंड कही की"

सत्यम को नहीं पता था की उसकी ये नफरत और उसके अंदर भरा ये ज़हर कोई देख रहा है

जो सत्यम क अंदर भरी नफरत और गाओं की सीधी सधी मिटटी से जुडी ज़िंदगी से दूर भागने की उसकी लालच को देख क है पड़ता है

"वाह्ह्ह.. इस घर को बर्बाद करने क लिए एक और हतियार मिल गया.. खेल तोह और मज़ेदार होने वाला है

अब घर का भेदी hi लंका ढायेगा"

👇


सन #04... कंटिन्यू..
 
अपडेट #16

सन #04

अपडेट 16, सन #01 क समय क कुछ सवाल 🖊️

1- भानु फ़ोन पे किस्से बात कर रहा था ?

2- सविता ने फिर से मोनू की मालिश की.. तोह किया फिर से वही कामुकता का खेल हुआ ?

और इसके अलावा एक बड़ा सवाल 👇

हीरा पन्ना.. इतने समय से कहा है

चलिए कुछ सवालों क जवाब पाते है

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जैसा की मैंने पिछले सन (सन #05) क अपडेट क समय कहा था की सन #03 & 04 आगे आएगा.. तोह ये रहा सन #04

और ऐसी क साथ अपडेट #16 पूर्ण भी होगा

अपडेट #16, सन #01 से... 👇

सभी लोग बहार बैठे हुए त्यागी जी का इंतज़ार कर रहे होते है की तभी वह सबके साथ बैठा हुए भानु सोचने लगता है

'अगर जब्बार ने मालती पे हमला करने की गलती न की होती, तोह आज उसे भी किसी बहाने वापस बुला सकता था.. पर उस मादरचोद ने पूरा खेल बिगड़ डाला'

तभी जैसे भानु क दिमाग में एक बात आती है और उसका चेहरा खिल सा जाता है, वो अपनी जगह से उठते हुए

"मैं जरा एक मं में आता हु"

भानु सबकी नज़रों से काफी दूर निकल आता है और फिर अपनी धोती में छुपाया हुआ एक फ़ोन निकल क किसी को फ़ोन मिलाने लगता है

भानु कान पे फ़ोन लगाए, दूसरी तरफ से फ़ोन उठने का इन्तिज़ार करने लगता है और जल्दी hi उसकी ये ीचा पूरी भी होती है

दूसरी तरफ से

"कैसे याद किया भानु भाई, और आखिर कब तक हम दोनों को यहाँ पड़े रहना होगा"

भानु चारो तरफ देखते हुए पक्का करता है की कोई उनकी बात सुन तोह नहीं रहा.. और फिर पूरी तरह अस्वक्त होने क बाद

"बस अब और इंतज़ार नहीं करना पड़ेगा.. उस सपोले हो होश आ चूका है, और अब तुम दोनों का काम सुरु होगा"

दूसरी तरफ से बात करने वाला और कोई नहीं बल्कि हीरा था.. पन्ना का बड़ा भाई जो इस समय सुंदरपुर गाओं से दूर फुलवा गाओं में जंगल क बीच बने एक छोटे से खली रहने वाली घर क बहार घूम रहा था, जब उसे भानु का फ़ोन आता है

हीरा- किया उस सपोले को होश आ गया.. फिर कही वो आपका नाम न ले ले.. ?

भानु- नहीं ऐसा कुछ नहीं होगा, उस सब का इंतिज़ाम हो चूका है.. पर अब तुम दोनों को अपना खेल सुरु करना होगा

हीरा- पर हमने कोई तैयारी नहीं की है.. न hi हमारे पास कोई वेशभूषा है न hi मेकअप का सामान, और हमारे मेकअप करने क लिए वो प्रेमलता भी नहीं है यहाँ

भानु- मैं सब जनता हु.. वेशभूषा का इंतिज़ाम जल्दी hi हो जायेगा, रही make-up की बात तोह कुछ ऐसा जुगाड़ करो की तुम दोनों ऐसी रूप में लोगो को भरोषा दिला सको की तुम सच में कोई बड़े पहुंचे हुए तांत्रिक हो

हीरा- (कुछ सोचते हुए) पर ऐसे तोह काफी समय लग जायेगा, लोगो का भरोषा जितना आसान नहीं है.. और हम कोई पॉलिटिशियन तोह है नहीं जिन्हे झूठ बोलने में महारत हो

भानु- अगर ये काम इतनी hi आसान होता तोह मैं तुम दोनों को क्यू इतनी दूर लाता.. ये काम किसी भी नौटंकी वाले से न करवा लेता

हीरा समझ गया था की अब सब कुछ उसे अपनी तरह से hi करना होगा.. इसलिए वो अपने इरादों को पक्का करते हुए

"ठीक है.. आप फ़िक्र मत करो हम देख लेंगे, वैसे उस मालती को.."

भानु, हीरा की बात को समझ जाता है और धीरे से हस्ते हुए कहता है

"साले तुझे तोह चुदाई देखने का सौक है न.. फिर"

हीरा- (पुरे हरामीपन से हस्ते हुए) अरे बात उस मालती की है.. उसका यौवन चखने क लिए तोह असली का साधु भी अपना सन्याश तोड़ दे, फिर भला मेरी किया औकात उसके हुस्न क आगे

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भानु- (हस्ते हुए) ठीक है.. जो चाहे कर लेना पर आराम से बिना किसी जल्दबाजी क, मैं नहीं चाहता खेल अब और बिगड़े

हीरा- आप फ़िक्र मत करो भाई.. सब कुछ ऐसे होगा की वो मालती खुद अपने कपडे उतारेगी

भानु- बहनचोद तू तोह उसकी छूट क पीछे hi पद गया है

भानु की बात पे दोनों hi है पड़ते है.. और फिर अगले hi पल भानु पूरी संजीदगी क साथ

"ाचा.. अब मुद्दे की बात पे आते है, मैं कुछ दिनों क लिए दिल्ली जाने वाला हु

सायद 15-20 दिन लग जायेंगे, इसलिए तुम दोनों आराम से अपना खेल खेलना.. बिना किसी जल्दबाजी क और जोश में आके"

हीरा- आप फ़िक्र मत करो, खेल ऐसे खेला जायेगा की वो औरत वही करेगी जो हम चाहेंगे

भानु एक पल क लिए कुछ सोचता है और फिर

"वैसे मालती से पहले तुम दोनों हर्षिता और सविता पे कोशिश कर सकते हो.. ये दोनों तुम्हारे झूठ और अन्धविश्वास में जल्दी फसेंगी

मुझे लगता है बल्कि यही सही होगा.. सुरुवात इन्ही दोनों से करो"

हीरा- जैसा आप कहो भानु भाई.. सब कुछ बिना किसी जल्दबाजी क होगा, बहुत आराम आराम से

भानु- यही होना चाहिए.. ककी खेल अब काफी बदल चूका था, इसलिए समय की कोई कमी नहीं है

भानु ये कहते हुए त्यागी क बारे में सोच रहा था, ककी कही न कही वो त्यागी क आगे बेबस तोह था hi

वैसे दिल्ली जाने का पूरा प्लान उसे त्यागी से hi पता चला था की आज वो ये बात महेंद्र क आगे रखेगा.. पर त्यागी को नहीं पता था की उसकी इस सोच या सडयंत्र की वजह से भानु का एक काम भी बनने वाला था

भानु अपनी सोच से बहार आते हुए.. कुछ और जरुरी बातें हीरा को समझाता है और फिर फ़ोन को वापस वही अपनी चोर जेब में रखते हुए छप्पर क नीचे सभी क पास आके सबसे पीछे चारपाई क पास बैठ जाता है

भानु अपनी जगह पे बैठने क बाद कल रात आये उस फ़ोन क बारे में सोचने लगता है

रात क करीब 1 बजे.. भानु अपने घर पे अकेला लेता हुआ था उसकी आँखों से नींद पूरी तरह गायब थी और ऐसा होता भी कैसे नहीं

त्यागी क कहे अनुसार कल वो मोनू को होश में लाने वाला था.. इसलिए भानु को बार बार ऐसा लग रहा था की कही मोनू ने उसका नाम ले लिया तोह

पर तभी उसकी सोच को तोड़ने का काम उसका वही छोटा सा फ़ोन करता है जो अचानक से बजना सुरु हो जाता है

भानु इस समय घर पे अकेला hi था.. उसकी पत्नी शीला अपने बड़े भाई क घर पे थी इसलिए उसे इस बात की परवा नहीं थी की कोई उसकी बातों को सुन सकता है

"कहिये ठाकुर साहब"

भानु ने फ़ोन की स्क्रीन पे नाम देख लिया था

दूसरी तरफ से

"समय आ चूका था.."

भानु- (जैसे अचानक उसे यु ठाकुर साहब की बात का मतलब समझ न आया हो) किस चीज़ का

दूसरी तरफ से ठाकुर बलवंत प्रताप सिंह.. अपने डाट पेस्स्ट हुए

"तू इतनी बड़ी बात कैसे भूल सकता है.. बताया था न उस डील क बारे में"

भानु को अचानक सब याद आ जाता है और वो तुरंत hi अपने बिस्तर पे उठ क बैठ जाता है

"जी.. जी ठाकुर साहब याद आया, पर अभी तोह मैं.."

ठाकुर- देख मैंने पहले hi उस विदेशी पार्टी को बोल दिया है.. और ये मीटिंग दिल्ली में होगी

भानु- (मानो अपने hi जाल में फसने लगा हो) आपकी बात ठीक है ठाकुर साहब पर अभी जो इस्तिथि है उसमे अगर में यु अचानक से दिल्ली जाऊंगा तोह सबको किया कहूंगा

थैंक हस्ते हुए

"साले मुझे पता था ये बात तू जरूर कहेगा.. इसलिए मैंने पहले hi त्यागी को बोल दिया है, वो कल खुद ऐसी इस्तिथि उत्पन्न कर देगा की तुझे दिल्ली जाने का रास्ता मिल जायेगा

पर याद रहे, वह उस मीटिंग को कैसे संभालना है ये तुझे देखना होगा.. और मुझे ये डील कैसे भी चाहिए"

भानु क पास वैसे भी कोई रास्ता नहीं था.. इसलिए उसे है में सर हिलना hi पड़ता है

भानु अपनी सोच में डूबा hi हुआ था की तभी उसे त्यागी की आवाज़ सुनाई पड़ती है

"भाई पहले तोह चाय पिलवाओ"

भानु अपनी यादों से बहार आते हुए देखता है की त्यागी वह आ चूका था को काफी खुस लग रहा था.. और वो कैसे पूरा पसीने में भीगा हुआ था

इसके बाद कैसे.. त्यागी,

मोनू को दिल्ली ले जाने का सुझाव देता है, जिससे भानु समझ जाता है की यही वो रास्ता है जिसके जरिये वो दिल्ली जा सकता है और इससे वो ठाकुर का काम भी कर लेगा और उस सपोले मोनू पे नज़र भी रख सकता है

फिर कैसे भानु भी दिल्ली जाने क सफर में जुड़ता है और कैसे वो वीरू की सलोनी पत्नी से हसी मज़ाक करता है ये सब तोह आप सभी पद hi चुके है



अब यहाँ से दूसरी तरफ 'फुलवा गाओं' क जंगलों में चलते है..

कंटिन्यू... 👇
 
भानु से बात पूरी होने क बाद हीरा वापस कमरे क अंदर आते हुए वही जमीन पे बिछे हुए गद्दे की तरफ फ़ोन को उछलते हुए अपने छोटे भाई 'पन्ना' की तरफ देखता है जो खिड़की से बहार दूर दूर तक फैला हुआ सन्नाटा देख रहा था

हीरा- किया हुआ.. बड़ा शांत है ?

पन्ना- (एक लम्बी सी सांस भरते हुए) साला जबसे हम आये है तबसे यही जंगल क बीचो बीच इस घर में बंद है.. इससे ाचा तोह हम भानु का काम करने से मन hi कर देते

हीरा भी उसी खिड़की क पास आके दूर दूर तक फैलने हुए हरे भरे जंगल और बड़े बड़े पैदा की तरफ देखते हुए

"अब काम हाथ में लिया है तोह पूरा तोह करना hi होगा न.. वैसे इन्तिज़ार की घड़ियाँ ख़तम हुई"

आपने बड़े भाई की बात सुनते hi पन्ना हैरानी से उसकी तरफ ऐसे देखता है मानो उससे पूछ रहा हो.. 'मतलब'

हीरा- अभी भानु भाई का hi फ़ोन था.. कह रहे है वो परसो दिन की ट्रैन से 15-20 दिनों क लिए दिल्ली जा रहे है, और इस बीच हमे अपना काम सुरु करना होगा

पन्ना- पर.. मेकअप और.. मतलब कैसे.. ऐसे थोड़ी कोई भी हमपर यकीन कर लेगा

पन्ना की बात पूरी तरह सही थी, पर हीरा जनता था की अब जो भी करना है उन दोनों को अपने हिसाब से hi करना होगा

"मेकअप और मालती क घर में हमे घुसाने का काम वो प्रेमलता करने वाली थी.. तभी तोह हम उसके पास वह दिल्ली गए थे"

हीरा कुछ पलों क लिए रुकता है और फिर आगे कहता है

"पर अब जो भी करना है हम दोनों को hi करना होगा, वैसे भी भानु भाई का कहना है.. खेल अब थोड़ा लम्बा चलेगा इसलिए हमे उस परिवार में अन्धविश्वास की जड़ें ज़माने क लिए काफी समय मिल जायेगा"

पन्ना अपने मन की संख्या व्यक्त करते हुए

"पर भैया, आपको क्यू लगता है वो सब हमपे भरोषा कर लेंगे"

हीरा अपने छोटे भाई की तरफ देखता है और मंद मंद मुस्कुरा पड़ता है और हस्ते हुए कहता है

"इस दुनिया में अगर कोई ऐसी चीज़ है जिसपे इन्शान सबसे ज्यादा भरोषा करता है तोह वो है अन्धविश्वास.. और ऐसी चीज़ों को फैलने में हमारी मदद करता है उस इन्शानो क अंदर बसा हुआ दर"

पन्ना- चलिए आपकी बात मंटा हु.. पर फिर भी, make-up कपडे तोह चाहिए होंगे न

हीरा हस्ते हुए

"उन सब का इंतिज़ाम हो जायेगा"

पन्ना सवालिया नज़रों से देखते हुए.. वो कैसे

"भानु भाई कह रहे थे.. वो सब इंतिज़ाम ठाकुर साहब कर देंगे"

पन्ना- (है मैं सर हिलाते हुए) वैसे भूक लगी है न.. और अभी तक वो हरामी खाना लेके नहीं आया

हीरा हस्ते हुए

"आज सायद नागराज नहीं.. वो आएगी"

पन्ना जैसे hi ये सुनता है ख़ुशी से उछाल सा पड़ता है

"वो.. मतलब कोण.. 'सजनी', ठाकुर ने जिसे हमारी देख भाल क लिए रखा है"

हीरा हस्ते हुए

"साले देख भाल तोह तू करवा रहा है उससे अपनी"

हीरा की इस बात पे दोनों hi भाई है पड़ते है.. इसके बाद वो दोनों वही जमीन में बिछे हुए गद्दे पे बैठ क आगे किया करना है इस बारे में बातें करने लगते है

हीरा- वैसे जल्दी hi गाओं में हम "हीरा और पन्ना स्वामी" क नाम से जाने जायेंगे.. भले hi हमने अपना कार्य अभी सुरु भी न किया हो पर हमारे नाम उस घर तक पहुंच चुके है

{ रेफ्रेंस- Part #02- अपडेट 14, सन 01 👇

सविता अपनी खूबसूरत देवरानी मालती से

"मैंने सुना है अभी कुछ दिनों पहले पड़ोस क गाओं मैं 2 बहुत पहुंचे हुए तांत्रिक आये है.. पर तू तोह जानती है हमारे यहाँ क मर्द और खास करके तेरा और मेरा पति ये सब नहीं मंटा, इसलिए मौका देख क मैं खुद जाउंगी उनसे मिलने.. बस ये बात हम दोनों क बीच रेहनी चाहिए"

मालती है मैं सर हिलाते हुए

"वैसे आप जानती हो किया उन तांत्रिक को.. किया नाम है"

सविता- जानती तोह नहीं, पर नसरीन बता रही थी बहुत पहुंचे हुए है.. और उनके नाम.. है.. उनके नाम थे

"हीरा और पन्ना स्वामी" }

अब आगे बढ़ते है..

पन्ना- पर वो कैसे.. ?

पन्ना क इस सवाल का जवाब हीरा क पास भी नहीं था

"वो सब तोह नहीं पता.. पर ठाकुर का दबदबा ऐसे काम आसानी से करवा सकता है, और सायद ऐसा hi कुछ हुआ है"

पन्ना- है वैसे भी.. झूट फैलने में देरी कहा लगती है, मुश्किल तोह सत्य को पचने में आती है

हीरा भी अपने छोटे भाई की बात पे हामी भरते हुए है में सर हिला देता है

चलिए ये बता देता हु की इस समय ये दोनों भाई कहा है और इतने समय से किया कर रहे थे.. पर उसके लिए पहले उस दिन वापस चलना होगा जब ये दोनों पहली बार यहाँ आये थे

जैसे की याद hi होगा की दोनों भाई लगभग सुंदरपुर में कदम रखने hi वाले थे की.. जब्बार क कारन पूरा खेल बिगड़ जाता है.. और मायुश होक भानु जब्बार को गालिया देते हुए हीरा को फ़ोन करता है

{ रिफरेन्स- Part #02- अपडेट 13, सन 03 } 👇

"बस भानु भाई.. थोड़ी दिएर मैं हम सुंदरपुर गाओं क स्टेशन पे पहुंचने वाले है"

दूसरी तरफ से भानु

"खेल पूरी तरह से बदल चूका है.. अभी तुम दोनों को थोड़ा इन्तिज़ार करना होगा

हीरा- पर हम तोह सुंदरपुर स्टेशन पहुंचने hi वाले है ?, अचानक ये सब.. ?

और तब 'भानु' बिना सांस लिए जब्बार का मालती पे हमला करने वाली बात बताता चला जाता है.. वैसे पूरी बात तोह आज तक खुद भानु भी नहीं जनता है

हीरा- (दूसरी तरफ से फ़ोन पे) मैंने पहले hi कहा था, ये जब्बार मुझे भरोषा का आदमी नहीं लगता ?

भानु- हम्म.. पर अब कुछ किया नहीं जा सकता, ककी जब्बार की इस हरकत की वजह से महेंद्र ने अपने पुरे परिवार को और सजग कर दिया है.. इसलिए अभी क लिए तुम दोनों इस गाओं मैं मत आना

हीरा- फिर अब..

तब भानु को अपना खेल बदलना पड़ता है

"जिस ट्रैन पे अभी तुम दोनों हो वो यहाँ सिर्फ 2 गाओं पे रूकती है.. पहले हमारे सुंदरपुर गाओं और दूसरे एक और गाओं 'फुलवा' में

तुम दोनों सुंदरपुर न उतर क फुलवा गाओं मैं उतरना.. वह एक आदमी मिलेगा उसके साथ चले जाना, तुम्हारी खातिरदारी मैं कोई कमी नहीं आएगी

बाकि मैं जल्दी hi बताऊंगा आगे किया करना है ?

और जल्दी hi वही तुम दोनों से मिलने भी आऊंगा"

और तब भानु बिना समय नस्ट किये किसी को फ़ोन लगता है.. और जैसे hi फ़ोन उठता है

"ठाकुर साहब.. मुझे आपकी मदद चाहिए"

चलिए अब आगे जानते है की उस दिन किया बात हुई थी.. जो अभी तक बस एक रहस्य थी

दूसरी तरफ से एक मरदाना और रोबीले आवाज़ भानु क कानो में पड़ती है

"हरामखोर.. कितनी बार कहा है मेरे इस नंबर पे फ़ोन मत किया है, अपनी औकात भूल गया है किया"

भानु ग़ुस्से से अपनी मुट्टीयो को भींच लेता है पर अपनी आवाज़ में सय्यम बनाये रखता है

"माफ़ करना.. मैं इतना परेशां था की मैं इस बात को भूल hi गया"

अब ये बताने की जरुरत तोह है नहीं की.. दूसरी तरफ ये ठाकुर साहब और कोई नहीं बल्कि वही 'ठाकुर बलवंत प्रताप सिंह' है जो उस खंजर क पीच है

"चल बता ऐसे कोनसा तूफान आ गया तेरी ज़िन्दगी में"

भानु अपना पूरा सद्यन्त्र तोह नहीं बताता, पर जब्बार वाली बात तोह उसे बतानी hi पड़ती है और फिर कैसे उसकी इस हरकत की वजह से वो 'हीरा पन्ना' को गाओं में नहीं लाना चाहता है

ठाकुर ग़ुस्से से

"साले तोह अब मुझसे किया चाहता है, तुझे इस गाओं में बसाया.. महेंद्र और उसके पुरे गाओं को यकीन दिलवाया की तू सच में अन्यथा है

और उस खूबसूरत हिरणी जैसी शीला को पाने में तेरी मदद भी करि.. अब और किया चाहता है.. ?"

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(शीला)

भानु- मैंने भी तोह पूरी ज़िन्दगी आपके हर कहे को बिना किसी सवाल जवाब क पूरा किया.. न

ठाकुर एक पल क लिए शांत रहता है और हल्का सा हस्ते हुए आगे कहता है

"चल बता किया बात है.. अब किसने तेरी गांड मार ली"

भानु को यु अपना मज़ाक उड़वाना बिलकुल भी पसंद नहीं आ रहा था पर अभी उसके पास और कोई रास्ता भी नहीं था.. इसलिए वो हीरा पन्ना वाली पूरी बात बताता है की कैसे उसने उन्हें इस गाओं में उतरने से मन किया है और अब वो जल्दी hi 'फुलवा गाओं' में पहुँचने वाले होंगे

ठाकुर कुछ सोचने क बाद

"ठीक है.. मेरा एक आदमी वह का काम संभालता है, वो उनके रुकने का इंतिज़ाम कर देगा.. अब खुश"

भानु- (कुछ पलों तक शांत रहने क बाद.. धीरे से) खाने पीने क साथ.. अगर उनके लिए..

भानु को आगे बोलने की जरुरत नहीं पड़ती

ठाकुर- है साले समझता हु.. उसकी परवा मत करो 'फुलवा गाओं' में मेरा आदमी उसका इंतिज़ाम भी कर करवा देगा

भानु- (अपनी अंतिम बात कहते हुए) पर उनपे नज़र भी रखनी होगी.. मैं नहीं चाहता वो इधर उधर बहार निकले जिससे लोगो की नज़रों में आये

ठाकुर- वो सब मैं देख लूंगा

भानु रहत की सांस लेते हु

"मैं आपका ये एहसान कभी नहीं भूलूंगा.. मैं.."

भानु अपनी बात भी पूरी नहीं कर पता उससे पहले hi ठाकुर बोल पड़ता है

"ठाकुर बलवंत किसी का एहसान नहीं रखता, बदले में तुझे मेरा एक छोटा सा काम करना है"

भानु किसी सगज सिपाही की तरह

"है.. बिलकुल कहिये न"

"कुछ महीने बाद विदेश से कुछ लोग आने वाले है, उन्हें हमारे माल में काफी इंटरेस्ट है.. पर वो डील करने से पहले माल को टेस्ट करना चाहते है"

भानु को समझ नहीं आता की उसमें वो किया कर सकता है.. पर उसके सवाल का जवाब ठाकुर खुद hi दे देता है

"मैं चाहता हु की तुम हमारे आदमी बनकर उनसे मिलो.. और इस डील को पूरा करो"

भानु को अब समझते दिएर नहीं लगती की आखिर ठाकुर किया चाहता है.. वैसे भी इस समय भानु, ठाकुर की किसी भी बात को मन करने की इस्तिथि में बिलकुल नहीं था

भानु- ठीक है ठाकुर साहब.. बताइए कब मिलना है और कहा ?

ठाकुर दूसरी तरफ से मुस्कुराते हुए.. जिसे फ़ोन पे भानु देख नहीं सकता था

"जल्दी hi वो सब तुम्हे पता चल जायेगा.. और ये मीटिंग दिल्ली में होगी"

भानु- ठीक है.. आप जब कहेंगे में उसके लिए तैयार रहूँगा

ठाकुर- (आगे अपनी बात बोलते हुए) पर तुम्हे कुछ माल भी साथ लेके जाना होगा.. ताकि उन्हें दिखा सको की ब्लैक मार्किट में सबसे बेस्ट माल हमारा hi है

भानु- कितना.. ?

ठाकुर- यही कोई 2 कग

भानु- (हैरानी से) किया कहा 2 किलो.. पर ये तोह लाखों का माल हुआ

ठाकुर हस्ते हुए

"तोह तुम्हे किया लगता है, इतनी बड़ी डील हवा में हो जाएगी"

भानु क पास ठाकुर को मन करने का कोई रास्ता नहीं था.. इसलिए अंततः उसे हामी भरनी hi पड़ती है

तोह ये हुआ था उस दिन.. उसके बाद फुलवा गाओं क स्टेशन पे हीरा पन्ना को ठाकुर का खास कुत्ता 'नागराज' मिलता है

और वो 'ठाकुर बलवंत प्रताप सिंह' क आदेश अनुसार उन दोनों को फुलवा गाओं क जंगल में बने एक पुराने से घर में ले जाता है.. जो गाओं की बस्ती से दूर और एकांत में बना हुआ था


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ये जगह ठाकुर अपने गोदाम की तरफ इस्तिमाल करता है.. पर आज कल पूरी तरह खली थी

नागराज- (उन दोनों को पूरा घर दिखने क बाद) तुम दोनों क रहने खाने का पूरा इंतिज़ाम है यहाँ.. किसी भी चीज़ की जरुरत हो तोह बता देना, ठाकुर साहब का हुकुम है की तुम दोनों को किसी चीज़ की कमी नहीं होनी चाहिए

पन्ना- (मुस्कुराते हुए) किसी भी चीज़ की..

नागराज उसकी बात का मतलब भली भांति समझ चूका था.. इसलिए वो भी हस्ते हुए कहता है

"है उस चीज़ का भी इंतिज़ाम कर दिया है"

हीरा अपने छोटे भी की ख़ुशी देख क मन hi मन है पड़ता है.. वही पन्ना

"माल तोह तगड़ा होगा न.. माल अगर घरेलु हो तोह.."

नागराज- (हस्ते हुए) फ़िक्र मत करो, मेरी पत्नी 'सजनी' बिलकुल देसी और घरेलु माल है.. तुम्हारी सोच से ज्यादा तुम्हे मज़ा देगी

नागराज की बात पे दोनों hi भाई कभी उसे देखते तोह कभी एक दूसरे को

हीरा- (हैरानी से) किया कहा.. तुम्हारी..

नागराज- है.. मेरी पत्नी 'सजनी'

नागराज अपनी बात पूरी करते हुए वह और नहीं रुकता और सीधा दरवाजे की और चल पड़ता है.. की तभी वो रुकते हुए पीछे मुद क उन दोनों को देखता है जहा वो दोनों अब भी नागराज की बात पे हैरान थे

"पर याद रहे.. तुम दोनों इस जंगल से बहार नहीं जा सकते हो, और अगर ऐसा किया तोह मुझे सीधा आदेश है की मैं तुम दोनों को मार दू"


हीरा पन्ना को जितनी हैरानी पहले हुई थी उससे ज्यादा अब होने लगी थी.. उन्हें समझ hi नहीं आता की वो किया जवाब दे, वही नागराज अपनी बात पूरी करके वह से जा चूका था

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