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अपडेट #05
सर्प नदी की गहराई और एक पिता की कहानी (मोनू की रक्षा)
दिल्ली क स्टेशन पे इस समय बहुत भीड़ थी, ऐसा लग रहा था जैसे पूरी दिल्ली की जनता एक साथ कही जाने क लिए अपने अपने घरों से निकल आयी हो
कुंदन भी धोती और कुर्ते मैं अपने दोनों हाथों से थामे हुए सामान को लेके भीड़ को चीरता हुआ आगे बाद रहा था
"भाई हैट न.. मेरे गाओं क लिए यही ट्रैन है, छूट गयी तोह एक हफ्ते तक फिर इन्तिज़ार करना पड़ेगा"
कुंदन भीड़ को अपनी ताक़त से चीरता हुआ आगे बढ़ता जा रहा है और जल्दी hi वो अपनी सीट पे विराजमान था
कुंदन बहुत खुस था ककी उसने मोनू और जिस जिस ने जो भी कहा था सब कुछ ले लिया था.. अब उसे जल्दी से जल्दी अपने गाओं पहुंचना था
कुंदन- (खिड़की से बहार देखते हुए) पता नहीं ट्रैन कब चलेगी ?
फिर अपने लाये हुए सामान की तरफ देखते हुए खुद से कहता है
"वैसे वो दुकान वाली लड़की भी सही थी.. अछि साड़ी दी है"
पर बेचारे कुंदन को किया पता उन sales-girl ने उसके साथ कोनसा खेल कर दिया है
ट्रैन चलती है पर अपने समय से नहीं और ये देरी आगे क आने वाले हर स्टेशन पे होती रहती है.. जिस कारणवस अब ये ट्रैन रात क करीब 10-11 बजे सुंदरपुर पहुंचेगी
कुंदन खिड़की क बहार च रहे अँधेरे को देख क परेशां होते हुए सोच मैं पद जाता है
'स्टेशन से घर जाने मैं आज हालत ख़राब होने वाली है.. ऊपर से इतना सारा सामान भी है'
कुंदन अभी अपने विचारों मैं व्यस्त hi था की तभी एक स्टेशन पे जब गाड़ी रूकती है तोह एक बुद्धा जिसने सिर्फ लाल वस्त्र धारण किये हुए थे.. वो आके कुंदन क ठीक सामने बैठ जाता है
उसकी उम्र 80-90 साल रही होगी और वो सही से खड़ा भी नहीं हो प् रहा था, कुंदन एक सरसरी नज़र उस बुड्ढे पे डालता है और वापस खिड़की क बहार देखने लगता है
ट्रैन अपनी गति से आगे बढ़ने लगती है और अब ट्रैन का अगला गंतव्य 'सुंदरपुर' गाओं hi था
समय काफी हो चूका था, और खिड़की क बहार अँधेरा पूरी तरह च चूका था
जल्दी hi ट्रैन की रफ़्तार काम होने लगती है, कुंदन अपना सामान सँभालने लगता है.. पर इतने मैं उसके सामने बैठा बुद्धा कहता है
"बीटा जरा मुझ बुड्ढे की भी मदद कर दो.."
इतना कहते हुए वो बुद्धा जैसे hi उठने की कोशिश करता है वो लड़खड़ा जाता है, अगर कुंदन ने उसे सही समय पे पकड़ न लिया होता तोह वो कब का नीचे गिर चूका होता
"अरे बाबा आप ठीक हो.. इतनी उम्र मैं अकेले सफर नहीं करना चाहिए.. किसी को साथ ले लेना चाहिए था न"
बुद्धा- अब कहे का साथ बीटा.. तुम जरा मेरी भी मदद करो दो मुझे भी यही उतरना है
कुंदन ने आज से पहले सायद hi उस बुड्ढे को कभी देखा होगा
"आप भी सुंदरपुर मैं उतरेंगे.. मैंने कभी देखा नहीं गाओं में"
बुद्धा- (खड़ा होने की कोशिश करता है पर वापस लड़खड़ा जाता है, अब उसका पूरा वजन कुंदन क ऊपर था) मैं तोह तुम्हारे पैदा होने से पहले का निवासी हु बीटा
कुंदन अब परेशां होने लगता है.. ककी ट्रैन बस रुकने वाली थी और परेशानी ये थी ये उसके गाओं मैं ट्रैन ज्यादा दिएर क लिए रूकती भी नहीं है
कुंदन- (थोड़ा गुस्से से) सीधा खड़े हो बाबा.. आपके चक्कर मैं मेरा स्टेशन चला जायेगा
पर बुद्धा तोह जैसे अपना पूरा वजन कुंदन क ऊपर दाल चूका था और हैरानी की बात ये भी थी कुंदन जैसा भीमकाय सरीर का मालिक भी उस बुड्ढे को अपने आप से अलग नहीं कर प् रहा था
कुंदन- (ट्रैन धीमी होने लगी थी और कुंदन अचे से जनता था की यहाँ ट्रैन ज्यादा समय क लिए रुकेंगी भी नहीं) अपने बल खड़े हो बाबा.. स्टेशन निकल जायेगा
कुंदन एक बार फिर से बुड्ढे को सहारे देके खड़ा करने की कोशिश करता है और बुद्धा कुछ कदम आगे भी बढ़ता है की फिर से रुक क हाफने लगता है
"अरे रुको.. रुको बीटा, सांस तोह लेने दो"
कुंदन को बहुत ग़ुस्सा आ रहा था पर वो अपना काबू नहीं चोरता और कहता है
"अरे एक कदम भी नहीं चले हो और कह रहे हो सांस लेने दो.. पता है यहाँ ट्रैन जरा समय क लिए hi रूकती है"
बुद्धा वापस खुद को संभालता है और इस बार दोनों ट्रैन क गेट तक आ जाते है पर बुद्धा इतना धीरे आगे बाद रहा था की ट्रैन स्टेशन पे पहुंच क रुक चुकी है, कुंदन का मन तोह कर रहा था की बुड्ढे को यही चोर दे और आगे बड़े
पर इस समय वो अनजान बुद्धा खुद क बल खड़ा भी नहीं हो प् रहा था और कुंदन को उसे ऐसी हालत मैं चूर्ण सही नहीं लग रहा था
बुद्धा बुरी तरह हाफने लगता है मानो उसकी साँसें उखड जाएगी
कुंदन अपनी किस्मत पे झुंझलाते हुए
"बहनचोद मेरी hi किस्मत ख़राब है"
कुंदन उस बुड्ढे को एक बार फिर से उठाने की कोशिश करता है और हैरानी की बात थी कुंदन उसे हिला तक नहीं प् रहा था और अंततः ऐसी उठा पटक मैं ट्रैन सुंदरपुर गाओं क स्टेशन को चोर क आगे बाद चलती है
अब तोह कुंदन का ग़ुस्सा फुट hi पड़ता है
"देखो किया हो गया.. जब खुद से खड़ा तक नहीं हुआ जा रहा तोह घर पे बैठो न, दूसरों को क्यू परेशां करते हो"
बुद्धा- (मंद मंद मुस्कुराते हुए) ऐसा ग़ुस्सा न करो बीटा.. एक दिन तोह तुम भी बुड्ढे होंगे न, हमेशा जवान थोड़ी रहोगे
कुंदन सोचता है की अब और किया दिमाग खपाऊ.. स्टेशन तोह निकल hi चूका है इसलिए वो बाबा क जैसे तैसे सँभालते हुए ट्रैन क गेट तक ले आता है, ताकि अगले स्टेशन पे फिर से वही सब न हो
बुद्धा- (कुंदन को देखते हुए) बड़े ग़ुस्से मैं लग रहे हो.. लगता है बीवी बच्चों से मिलनी की जल्दी है
कुंदन- (ग़ुस्से से बुड्ढे को देखते हुए) कहा से खुस दिख रहा हु, पहले hi इतनी रात हो चुकी और अब तुम्हारे चक्कर मैं..
कुंदन आगे नहीं कहता बस डाट पेश क रह जाता है, पर बुद्धा वैसे hi कुंदन की एक ब्याह पड़के उसके सहारे खड़े खड़े मुस्कुराता रहता है
"जीवन मैं जो भी होता है.. उसका एक कारन होता है, किया पता आज तुम्हारा अपने गाओं में न उतर पाना भी जरुरी हो"
कुंदन ग़ुस्से से बुड्ढे को ऐसे देखता है मानो उसे कच्चा hi खा जायेगा
बुद्धा- वैसे हो बड़े भले मनुष्य.. इस लचर बुड्ढे को अकेले नहीं छोरा, ाचा ग़ुस्सा क्यू होते है नाम तोह बता दो ?
"कुंदन"
ग़ुस्से से बहार अगले स्टेशन का इन्तिज़ार करते हुए कुंदन अपना नाम बता देता है
कुंदन की परेशानी अब बाद चुकी थी, ककी वो अचे से जनता था की ये ट्रैन यहाँ सिर्फ 2 स्टेशन पे hi रूकती है, पहला उसका गाओं 'सुंदरपुर' और दूसरा 'फुलवा गाओं' में बने स्टेशन पे
यानि अब उसे अपने गाओं क लिए उल्टा वापस आना पड़ेगा
जिसके लिए उसे पहले एक छोटे से गाओं 'सूरजमुखी' क बीच से बहने वाली नदी 'सर्प' पार करनी पड़ेगी और उसके लिए नौका का सहारा लेना पड़ता है
पर अब ये सब सोचने का कोई फायदा नहीं था.. ककी जो होना था वो हो hi चूका था
बुद्धा- (वापस अपनी चिरपरिचित मुस्कान क साथ) वैसे तुमने मेरा नाम नहीं पूछा ?
कुंदन- (चिढ़ते हुए, उसके आगे दोनों हाथ जोड़ लेता है) कोण हो बाबा.. ?
बुद्धा जोरो से है पड़ता है, फिर हस्ते हस्ते अचानक जैसे वो सुण्या मैं खो सा जाता है
"मैं कोण हु.. किया बताऊ.. अब तोह मुझे खुद भी याद नहीं, न मेरा अतीत.. न वर्तमान"
कुंदन मन hi मन कहता है
'पगला गया है बुद्धा'
फुलवा गाओं का स्टेशन भी जल्दी से आ जाता है पर हैरानी की बात थी की जो बुद्धा खुद से अब तक खड़ा भी नहीं हो प् रहा था वो खुद hi ट्रैन से उतरने लगता है
कुंदन तोह एक पल क लिए बस उसे देखता hi रह जाता है
बुद्धा- (ट्रैन से उतर से कुंदन को देखता है और मुस्कुराते हुए कहता है) चलना नहीं है.. देखो रात कितनी काली है
कुंदन अपने सर को झटक क अपनी सोच से बहार अत है और अपना पूरा सामान सँभालते हुए उस बुड्ढे क साथ स्टेशन क बहार निकल आता है.. पर हैरानी थी की वो 80-90 साल का बूढ़ा अब खुद से चल रहा था उसे किसी सहारे की जरुरत नहीं थी
कुंदन- (दूर तक फैले सन्नाटे को देखते हुए) इतनी रात गए कोनसा नाव वाला मिलेगा.. कैसे जाऊंगा अपने गाओं
फिर बुड्ढे की तरफ देखते हुए
"ऊपर से बुद्धा भी अजीब गले पद गया है"
बुद्धा जो कुंदन से कुछ कदम आगे hi चल रहा वो पीछे मुद क कुंदन को देखता है और अपने hi अंदाज़ में मुस्कुराते हुए कहता है
"अरे जल्दी जल्दी चलो.. बीटा"
कुंदन- (ग़ुस्से क मरे जैसे पहात hi पड़ता है) कहा चालू.. कोनसा चुटिया इस समय हमारे लिए नाम लेके नदी पे खड़ा होगा ?
बुद्धा- (मुस्कुराते हुए) क्यू तुम्हे नाव चलनी नहीं आती ?
कुंदन- सठिया गए हो किया बाबा.. मेरे पास कहा से नाव आएगी ?
बुद्धा- पर मेरे पास तोह है न
इतना hi कहता है और वो बुद्धा मुस्कुराते हुए आगे चल पड़ता है.. ये सुनते hi कुंदन का चेहरा खिल उठा है
वो अपना सारा ग़ुस्सा भूल जाता है और जल्दी से दोनों सर्प नदी क किनारे एक पुराने पेड क पास खड़े थे जहा एक पुराणी सी नाव लगी हुई थी.. जो इस समय उसी पेड से बंधी हुई थी
उस नाव को देखते hi कुंदन की जान मैं जान आती है, वो लपक क नाव का मुआयना करता है जो पूरी तरह से चलने की इस्तिथि मैं थी
कुंदन ख़ुशी ख़ुशी पीछे मुद क कहता है
"बाबा.. ये तोह बढ़िया.. बाबा.. बाबा.."
पर वह कोई था hi नहीं.. तभी कुंदन को ऐसा लगता है की जिस पेड से वो नाव बंधी थी उस पेड क ऊपर एक पल क लिए कोई लाल कपडा लहराया हो, ठीक वैसा hi जैसे उस बुड्ढे ने धारण किया हुआ था
कुंदन को कुछ भी समझ नहीं आता और वो चारो तरफ देखने लगता है.. काफी समय तक वो इधर उधर जेक 'बाबा.. बाबा' चिल्लाता रहता है
पर कोई उत्तर नहीं मिलता.. ऐसा लगता है जैसे वह कभी कोई था hi नहीं
कुंदन को कुछ भी समझ नहीं आ रहा था इसलिए अंत मैं वो नाव को अलग करता है उसमें अपना सारा सामान रखता है और पानी मैं उतर देता है
नाव पे चढ़के वो चप्पू संभालता है और एक बार फिर से 'बाबा' कहकर चिल्लाता है पर इस बार भी वही हाल.. कोई जवाब नहीं
कुंदन तय करता है की अभी वो इस नाव से अपने गाओं जायेगा.. फिर कल दिन मैं आके ये नाव वापस कर देगा
और जल्दी hi कुंदन उस नाव पे सवार होक अपने गाओं की तरफ चल पड़ता है.. कुंदन को ऐसा लगता है जैसे उसे नाव चलने मैं कोई म्हणत hi नहीं करनी पद रही
मानो वो नाव खुद hi उसके गाओं की दिशा मैं चली जा रही हो
कुंदन अपने गाओं क बहुत करीब आ गया था, अब वो 2 पहाड़ियों क बीच से गुजर रहा था की तभी उसे नदी क किनारे एक पेड क सहारे कुछ अटका हुआ दीखता है
अँधेरे की वजह से उसे साफ़ साफ़ समझ नहीं आता पर उसकी नाव खुद hi उस तरफ चल पड़ती है.. ऐसा लगता है जैसे वो अपनी दिशा खुद तय कर रही हो
जैसे जैसे नाव उसक चीज़ क करीब पहुंच रही थी कुंदन की साँसें जोर पकड़ने लगी थी.. पर जैसे hi पानी क बहार अटकी हुई उस चीज़ को कुंदन सही से देखता है उसकी आँखों क आगे मानो अँधेरा hi च जाता है
ककी वो चीज़ उसका बीटा मोनू था जो नदी क किनारे बेहोश हालत में उस पेड की टहनी से अटका हुआ था.. इस समय सिर्फ उसका चेहरा hi बहार था बाकि का पूरा सरीर पानी की लेहरो क साथ हिलोरे खा रहा था
मोनू का पूरा चेहरा खून से लाल हुआ पड़ा था
कुंदन एक पल की भी देरी नहीं करता और पानी मैं कूद पड़ता है
"मोनू.. मेरा बचा"
इतने लम्बे सफर की वजह से कुंदन बुरी तरह से थका हुआ था पर इस समय उसे न अपनी थकन की परवा थी न अपनी जान की
वो जल्दी जल्दी तरिता हुआ मोनू क करीब पहुँचता है
"मोनू.. उठ.. मोनू.. किया हुआ मेरे बचे को... उठ न"
कुंदन उसे पेड की टहनी से अलग करता है और वापस नाव की तरफ लेके चल पड़ता है.. पर उसे ऐसा लगता है जैसे मोनू का सरीर बहुत भरी हो, मानो कोई नीचे की तरफ उसे खींच रहा हो..
पर कुंदन हार नहीं मंटा और जल्दी hi वो मोनू को नाव पे लाने मैं कामयाब रहता है
कुंदन, मोनू क पेट पे हाथ रख क उसपे दबाव बनता है ताकि पानी को बहार निकल सके
पर इसके बाद भी कोई प्रभाव नहीं पद रहा था.. वो भायखला सा रहा था, वो मोनू को अपनी साँसे देता है
पर अभी भी फर्क नहीं पद रहा था.. कुंदन को कुछ भी समझ नहीं आ रहा वो अपने बेटे क दिल की धड़कन सुनने की कोशिश है जो धीरे धीरे काम होती जा रही थी
कुंदन मोनू को सही से लिटाता है और पूरी ताक़त से नाव को संभल लेता है.. ककी उसका गंतव्य सीधा उसका गाओं था
"मुझे उस पल ऐसा लग रहा था जैसे मैं अपने बेटे को हमेशा हमेशा क लिए खो दूंगा"
कुंदन अपनी बात कहते हुए भावुक हो गया था.. पर मर्दो को रोने की इजाजत कहा है इसलिए कुंदन भी अपना दर्द हसी मैं ताल देता है और आगे कहता है
"फिर तोह Bhabhi-Jाँ आप सब जानती hi है"
कुंदन अपनी बात पूरी करता है और सभी को ऐसा लगता है जैसे वो भी कुंदन क साथ साथ उस रात मैं पहुँच गए हो.. कुंदन का कहा एक एक सब्द वह उसे सुनने वाले हर किसी क आँखों क सामने किसी सजीव चित्र की तरफ चल गया था
"वैसे उस दिन हुआ किया था.. मोनू तुम्हे मिला कैसे था"
खालिद की अम्मी 'नसरीन' क पूछे गए सवाल का जवाब कुंदन ने किसी सजीव चित्रण की तरह दे दिया था
सविता- (अपने आंसुओं को पूछते हुए) इतना सब तूने आज तक हम सब से पूछा क रखा.. मन करता है एक जोर की लागू तुझे
सविता की बात सुनकर वह बैठा हर इन्शान है पड़ता है
महेंद्र अपने बचे जैसा भतीजे और उस रात वो कुंदन को कैसे नीला ये सब जान क उसे भी दर्द का एहसास होता है पर वो माहौल को थोड़ा हल्का करने की नियत से कहता है
"अरे ऐसे कैसे लगा डोंगी मेरे छोटे भाई को.. अभी उसका बड़ा भाई ज़िंदा है"
सविता कुछ कहने hi वाली होती है की कुंदन बोल पड़ता है
"देखो भैया.. मेरे और भाभी क बीच न आना, मेरी भाभी को डाटने और मरने का पूरा हक़ है"
कुंदन की बात पे वह बैठे सभी फिर से है पड़ते है
मालती भी एक तरफ बैठी अपने आंसुओ को पूछते हुए है पड़ती है.. पर साथ hi साथ वो कुछ उलझन मैं भी लग रही थी
सविता अपने पति महेंद्र को देख क महारानी जैसा मुंह बनाते हुए कहती है
"बड़े आये.. मेरे छोटे भाई वाले, अब बोलो.. बोलो"
जिसपे महेंद्र और वह सभी लोग khil-khila क हसने लगते है
खालिद की अम्मी नसरीन
"चलो भाई.. बड़ी रात हो गयी निकलते है हम सभी"
वीरू- (मज़ाक करते हुए) अरे नसरीन भाभी आज हमारे यहाँ hi रुक जाओ न
नसरीन- (वीरू को उसी अंदाज मैं जवाब देती हुई) सोच लो वीरू.. झेल पाओगे
वीरू बेचारा खिसियाहट क मरे इधर उधर देखने लगता है.. उसे समझ hi नहीं आता की जवाब किया दे
जल्दी hi सभी अपने अपने घरों की तरफ चल दिए, रात क खाने क बाद सोने का प्रभंद होने लगता है
कुंदन- (महेंद्र क पास जाते हुए) भैया.. अगर आपको और भाभी को परेशानी न हो तोह पीछे वाला कमरा हम
जब पूरा परिवार एक साथ हुआ करता था तब घर मैं पीछे वाला एक कमरा कुंदन का hi हुआ करता था
कुंदन की बात सुनते hi.. महेंद्र ख़ुशी से मानो भर उठा है, पर उसके कुछ कहने से पहले से सविता बोल पड़ती है
"उनसे किया पूछ रहा है.. तेरा कमरा है, कल सुबह hi साफ़ करवा देती हु"
महेंद्र ख़ुशी ख़ुशी अपनी पत्नी को देखता है और कुंदन क कंधे पे हाथ रखते हुए
"ये तेरा hi तोह घर है.. इसमें भला पूछना किया है"
सविता अचे से जानती थी की पुरे परिवार का फिर से साथ आना उसके लिए ाचा नहीं है.. ककी अगर ऐसा हुआ तोह वो कभी भी इस गाओं से निकलने का अपना सपना पूरा नहीं कर पायेगी
पर इस समय वो भी इन बातों की परवा नहीं कर रही थी.. वो तोह अपने पति को सालों बाद इतना खुस देख क उसी मैं खुस थी
पर वही खाने क बाद आँगन मैं एक तरफ बैठा सत्यम जरूर ये सब सुनकर कूदता जा रहा था
'बहनचोद ये भी यही रहेंगे.. ऐसे तोह ऐसी गाओं मैं फसा रहूँगा, अब तोह लगता है माँ भी किसी काम की नहीं रही'
वही घर क पिछले हिस्से मैं एक पुराने से kamre(Kothri) मैं जिसमें रज़ाई और बिस्तर रखे जाते है वह इस समय मालती और उसकी छोटी देवरानी 'हर्षिता' मौजूद थी
मालती हाथों मैं बिस्तर पड़के हुए किसी सोच मैं डूबी हुई थी
हर्षिता- किया हुआ भाभी.. कहा खो गयी, चलिए सभी को नींद आ रही है
मालती जैसे होश आती है
"अरे.. वो कुछ नहीं"
हर्षिता पियर से मालती क कंधे पे हाथ रखते हुए
"मैं जानती हु आप मोनू को लेके परेशां है.. पर देखना वो जल्दी hi उठ खड़ा होगा
और आप मुझे रोकना मत.. मैं तोह खूब डाटूंगी उसे, इतना परेशां करता है किया कोई भला"
हर्षिता क स्नेह भरे सब्दो ने मालती को बहुत हिम्मत दी, इसलिए उसके अधरों पे भी हसी आ जाती है
घर तोह वैसे काफी बड़ा है पर जब सभी भाई अलग हो गए तोह घर का पिछले हिस्सा ज्यादातर बंद कर दिया गया.. या कुछ कमरों का इस्तिमाल अनाज भरने क लिए किया जाने लगा
पर अब लगता है ये घर की रौनक वापस आने वाली है
पर अभी क लिए इस्तिथि कुछ ऐसी है की जिसे जहा जगह मिल जाती है वही अपना बिस्तर लगा लेता है
पर महेंद्र क कहे अनुसार 2 लोगो को मोनू क कमरे मैं जरूर सोना होगा
जैसे आज कुंदन और उसका छोटा भाई वीरेंदर (वीरू) सोयेंगे
बाकि.. सत्यम, सत्तू और सोनू आँगन मैं चारपाई दाल क सोने वाले है
बाकि महेंद्र घर क बहार दरवाजे क पास अपनी चारपाई डाले हुए है
सविता, हर्षिता और शीला.. 'सविता' वाले कमरे मैं सोयेंगे
भानु अब भी रात मैं अपने घर चला जाता है सोने क लिए.. पर महेंद्र ने उससे भी कह दिया है की तुम भी यही रहा करो
जिससे सबसे ज्यादा ख़ुशी शीला को हुई थी ककी उसके और भानु क प्रेम विवाह की वजह से उसका पूरा परिवार उससे दूर हो गया था पर अब उसे लग रहा था जैसे ये एक मौका है अपने परिवार से वापस जुड़ने क
बाकि हमारी खूबसूरत मालती आज तीनो बच्चों से थोड़ा hi अलग छप्पर क नीचे अपनी चारपाई बिछा चुकी थी
जल्दी hi सभी लोग अपने अपने बिस्तर पे जा चुके थे.. कुछ तोह पड़ते hi सोने लगे थे तोह कुछ अपनी अपनी परेशानी क बारे मैं सोच रहे थे
हर किसी की ज़िन्दगी मैं उसकी अपनी एक लड़ाई होती है
पर इन सब से अलग बिस्तर पे लेती हुई मालती एक अलग उलझन मैं फांसी हुई थी.. ककी उसके पति कुंदन ने आज जो बताया उसमें एक बुड्ढे क बारे मैं भी था
कुछ कुछ वैसा hi बुद्धा जैसा उसे उस शापित कहे जाने पीपल क वृक्ष क पास मिला था और अचानक कही गायब हो गया था
मालती को ये बात बड़ी अजीब लग रही थी की जैसा बुद्धा उसे मिला ठीक वैसा hi उसके पति को.. और वो भी अचानक कही गायब हुआ जैसा उसके समय हुआ था
मालती न च क भी कड़ियों को आपस मैं जोड़ने की कोशिश कर रही थी.. तभी अचानक से मालती को उस फूल की याद आती है जो उस बुड्ढे ने उसे दिया था
मालती जल्दी से अपनी जगह से उठती है और वापस उसी कोठरी मैं जाती है जहा सरे बिस्तर, रज़ाई और बाकि सब सामान रखा हुआ था
मालती वही एक पुराणी और टूटी सी लड़की की अलमारी को खोलती है जिसमें एक छोटा सा डिब्बा जैसा था.. उसे खोलती है तोह उसे वही फूल नज़र आता है
पर हैरानी की बात तोह ये थी की इतनी दिनों बाद भी वो फूल मुरझाया नहीं था.. बल्कि अब भी उसमें से भीनी भीनी खुशबु निकल रही थी
मालती डिब्बे को वापस बंद कर देती है और खुद से कहती है
"किया इसका रास मोनू को पिलाना चाहिए"
मालती एक लम्बी सी सांस लेती है, ककी वो किसी निष्कर्ष पे नहीं पहुंच प् रही थी
इसलिए थक हार क वापस आपके अपनी चपरि पे लेत जाती है.. जहा कब उसे नींद आती है उसे भी होश नहीं रहता है
सुबह की हलकी लालिमा फैलनी सुरु हो जाती है, गाओं की महिलाएं जो रोज़ सुबह खेतों की सैर पे जाती है वो अपने अपने घर से निकल चुकी थी
सविता को भी खेतों की सैर का सौक था.. इसलिए वो भी रोज़ सुबह ऐसी समय उठती थी
वो सबसे पहले अपने पास लेती हर्षिता और शीला से पूछती है पर दोनों hi मन कर देती है
"लाइटों तुम दोनों.. तुम दोनों सुबह सुबह खेतों का मज़ा किया जानो"
हर्षिता धीरे से आँखें खोलते हुए सविता को देखती है और मुस्कुराते हुए कहती है
"आज आप करके आओ सैर.. हम बाद मैं जायेंगे"
शीला भी आँखें बंद किये हुए बस हल्का सा मुस्कुरा देती है
सविता दोनों को वैसे hi सोता चोर क अपनी साड़ी सही करती हुई आँगन मैं आती है जहा तीनो बचे गहरी नींद मैं सो रहे थे
सविता छप्पर क नीचे सोती हुई मालती क पास आके उसे उठती है
"मालती.. अरे ओह मालती.. खेत चलेगी"
मालती कुनमुनाते हुए अपनी आँखें धीरे से खोलती है
"नहीं भाभी.. आप जाओ कल नींद बड़ी दिएर से आयी"
सविता- चल ठीक है.. पर सोती न रह जाना सबके लिए नास्ता भी बनाना है.. और जरा उन दोनों महारानियो को भी ज्यादा लेना
मालती उसी प्रकार अपनी आँखों को बंद किये हुए धीरे से मुस्कुरा पड़ती है और 'है' मैं सर हिला देती है
सविता पानी का लोटा भरके खेतों की तरफ चल पड़ती है
सविता क जाने क बाद मालती वापस से सो जाती है.. सुबह की नींद कुछ होती hi ऐसी है
थोड़ी दिएर मैं मालती की नींद वापस से खुलती है और वो अंगड़ाई लेती हु जैसे hi बिस्तर से अपने पेअर नीचे रखती है उसे कुछ अजीब लगता है
और जैसे hi वो अपने पैरों की उँगलियों को देखती है उसकी बची खुची नींद एक पल मैं ुध जाती है..
ककी उसके पैरों की खूबसूरत उँगलियों पे कुछ गाड़ा चिपचिपा और सफ़ेद सा लगा हुआ था.. मालती की साँसें जोर पकड़ने लगती है उसका दिल डाक डाक का शोर करने लगता है
मालती डरते हुए अपने पेअर को ऊपर उठती है और जब सही से देखती है तोह उसकी साँसें hi अटक जाती है.. ककी वो अचे से जान गयी थी की उसके पेअर और उनकी उँगलियों पे ये किया है
पर पक्का करने क लिए वो एक ऊँगली से उस चिपचिपी चीज़ को चुटी है तोह उसका दर सच साबित होता है.. ककी वो किसी का गाड़ा वीर्य रास था
मालती- ये.. यहाँ.. मतलब किसी ने..
मालती को कुछ समझ नहीं आता उसकी नज़रें सबसे पहले आँगन मैं सोते हुए सत्यम, सत्तू और सोनू पे hi जाती है
जिसमें वो सोते हुए सत्यम को ज्यादा hi ग़ुस्से से देखती है
"ये ऐसी का काम होगा.. मैंने hi ज्यादा मुंह लगा लिया है, हिम्मत तोह देखो इसकी"
मालती ग़ुस्से से अपना पल्लू खींचती है और उससे अपने पेअर की उँगलियों पे लगे उस गाड़े रास को पोछने hi जा रही थी की न जाने उसे किया होता है.. वो एक ऊँगली को उस रास मैं भिगोती है और धीरे से मुंह मैं रख लेती है
एक पल क लिए मालती की आँखें बंद होती चली जाती है.. मानो वो उस स्वाद को अचे से पहचान रही हो.. पर लगता नहीं वो किसी निष्कर्ष पे पहुंच पायी हो
उसका दूसरा हाथ धीरे धीरे उसकी गॉड मैं उसकी योनि की तरफ बढ़ने लगता है.. पर जैसे hi वो अपनी योनि को चुटी है मानो उसका अंतर्मन उसे झिंझोर देता है
'पागल हो गयी.. मोनू की ऐसी हालत है और तू चींईईई'
मालती वापस धरातल पे लौट आती है और जल्दी से अपने मुंह से उस ऊँगली को निकलती है पर अब वो ऊँगली पूरी तरह साफ़ थी ककी उसपे लगी मलाई वो चाट गयी थी
मालती चारो तरफ देखते हुए अपने आप मैं अपराध बोध को महसूस कर रही थी, वो जल्दी से अपने पल्लू से अपने पेअर की उंगलियां साफ़ करती है
और लगभग भागते हुए घर क पीछे वाले नाम मात्र क बाथरूम की तरफ भाग पड़ती है
असल मैं महेंद्र और कुंदन ने मिलकर hi इस बाथरूम को अभी क लिए बना दिया था, ताकि सभी महिलाओं को परेशानी न हो.. बाकि बाद मैं सब सही से व्यवस्था की जाएगी
इधर मालती जैसे hi पीछे वाले बाथरूम की तरफ भगति है.. उन तीनो मैं से एक धीरे से उठता है और डरते हुए धीरे धीरे उसी तरफ चल पड़ता है जहा मालती गयी हुई थी
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