Adultery शीला की लीला (५५ साल की शीला की जवानी) - Page 46 - SexBaba
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Adultery शीला की लीला (५५ साल की शीला की जवानी)

सुना है उसके बदन की तराश कुछ ऐसी है

कि फूल अपनी क़बाएँ कतर के देखते हैं..


















 
लोग कह रहे है की आने वाले समय में ए.आई. और रोबॉट्स मिलकर हमारी बजा देंगे..

पर इस बंदे ने तो खेल ही पलट दिया.. !!






le pont mirabeau
 
सिल्हूट में रेशमी वक्र, जैसे भीगी हुई फुसफुसाहट,

होंठ छुएं तो लंड काँपें, जिस्म बोले धीमी आहट..

कमर पर रोशनी का घेरा, उंगलियां कंगन बन जाएं,

वीर्य की स्याही की लिखावट, हर शेर में तू उतर आए


झिलमिल नूर तेरी जांघों तक, चूत की रेखा खिंचती जाए,

सरकाए उन नरम मांसल होंठों को.. लंड चुपचाप अंदर घुस जाएं























 
पिछले अपडेट में आपने पढ़ा की..

राजेश, मदन और शीला फार्महाउस पर पहुंचते है.. जहां पहले से ही फाल्गुनी उनके इंतज़ार में थी..

आते ही राजेश और शीला अपनी लीला में मस्त हो गई तो दूसरी और मदन की आँखें जवान फाल्गुनी पर गड़ी हुई थी.. शुरुआती झिझक के बाद फाल्गुनी भी धीरे धीरे सहज होने लगी..

फिर शुरू हुआ... हवस का नंगा नाच..!! कभी मदन-फाल्गुनी के बीच.. कभी शीला और फाल्गुनी.. कभी राजेश और शीला.. तो कभी चारों मिलकर एक साथ..

इस घनघोर चुदाई का दौर पूरी रात चलता रहा और आखिर संतुष्ट होकर चारों चैन की नींद सो गए..

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घर से ऑफिस आए हुए पीयूष का मूड आज बिना कारण ही बहोत अच्छा था.. वो किसी फिल्म का गाना गुनगुनाते हुए अंदर आया.. बाहर के फ्लोर पर करीब दस लोग बैठकर अपने वर्कस्टेशन पर काम में व्यस्त थे.. उनमें से एक वैशाली भी थी.. पिंटू भी उसके बगल में बैठकर अपने लेपटॉप पर नजरें जमाएं बैठा हुआ था.. उसकी मौजूदगी के कारण पीयूष ने बिना वैशाली की तरफ देखे अपनी केबिन का रास्ता नापा..

अपनी चैर पर जाकर बैठते ही उसने अखबार उठाया और पढ़ने लगा.. बीच में चपरासी आकर कॉफी का मग रखकर चला गया..आंतरराष्ट्रीय खबरों के पन्ने पढ़ने में पीयूष ऐसा डूब गया की उसे पता ही नहीं चला की कब कोई उसकी केबिन के अंदर आया और उसकी कुर्सी के पीछे जाकर खड़ा हो गया

अचानक दो हथेलियों ने पीयूष की आँखों को ढँक दिया.. एक पल के लिए पीयूष सोच में पड़ गया की क्या हो गया..!! फिर हथेली की कोमलता और जानी-पहचानी परफ्यूम की खुशबू महसूस होते ही उसे अंदाजा लगने में देर नहीं हुई

"अरे वाह.. मेरी शैतान साली..!! तू अंदर कब आई मुझे पता भी नहीं चला" मुस्कुराते हुए पीयूष ने कहा

रूठने का अभिनय करते हुए मौसम ने कहा "क्या जीजू..!! आपको सरप्राइज़ देने आई पर आपने तो झट से पहचान लिया..!!" मौसम पीयूष के सामने आकर कुर्सी पर बैठ गई

"अरे मेरी प्यारी साली साहेबा.. तू धरती पे चाहे जहां भी रहेगी.. तुझे तेरी खुशबू से पहचान लूँगा" चुटकी लेते हुए पीयूष ने हँसकर कहा

"आहाहा बड़े फिल्मी हो रहे हो आज तो जीजू.. लगता है दीदी ने खुश करके भेजा है ऑफिस" मौसम ने कहा

कविता का जिक्र होते ही पीयूष की मुस्कान गायब हो गई.. लेकिन उसने तुरंत ही उन विचारों को दिमाग से झटकते हुए मौसम से कहा "तू कब आई यार..!! बताना तो था, मैं ड्राइवर को एयरपोर्ट लेने भेज देता..!!"

"बता देती तो आपको सरप्राइज़ कैसे मिलता..!!! आज सुबह की फ्लाइट से आई.. सीधे यहीं पर.. अब तक तो दीदी को भी पता नहीं है की मैं यहाँ आई हूँ" मौसम ने अपनी मुस्कान का जादू बिखेरते हुए कहा

मुस्कुराती मौसम की ओर पीयूष देखता ही रह गया..!! शादी के बाद, अमूमन जिस तरह के बदलाव एक लड़की के जिस्म पर दिखते है, वैसे कुछ हसीन बदलाव मौसम के शरीर पर भी नजर आ रहे थे..!! पतले शरीर पर चर्बी की हल्की सी परत चढ़ चुकी थी.. स्तनों का नाप भी बढ़ चुका था.. जाहीर सी बात थी.. ऐसा कडक माल हाथ आने के बाद, विशाल ने अपनी सारी कसर जो उतारी होगी मौसम पर..!! किस्मत वाला है विशाल, पीयूष ने सोचा, जो ऐसी सेक्सी लड़की उसे पत्नी के रूप में मिल गई..!!

"यार, तू तो दिन-ब-दिन और भी खूबसूरत होती जा रही है" पीयूष ने दिल से प्रशंसा की..

मौसम शरमा गई, उसकी मस्कारा लगी आँखें इतनी सुंदर लग रही थी.. और उसकी लंबी लंबी पलकें.. आह्ह..!!! गोरे गुलाबी गालों वाले चेहरे को देखते ही चूमने का मन कर रहा था पीयूष का..

"क्या जीजू आप भी..!! मेरी टांग खींचने की आपकी पुरानी आदत अब तक गई नहीं" मौसम ने हँसते हुए कहा

पीयूष: "अरे मोहतरमा...

तारीफ़ में मेरी कोई चालाकी नहीं,

आपकी ख़ूबसूरती के चर्चे तो ज़माना करता है..

शरमा के कहती हो, मैं मज़ाक करता हूँ,

अरे! आईना भी तो हर रोज़, यही बात करता है.."

"वाह.. आप तो शायर हो गए जीजू" मौसम ने कहा

पीयूष:

"शायर हूँ नहीं, बस आपके हुस्न ने बना दिया,

वरना मैं तो सीधे-सादे जज़्बातों में जीता हूँ..

जबसे देखा है आपको इन आँखों से पहली बार,

शराब भूल गया.. आपके शबाब को ही पीता हूँ!"

यह सुनकर मौसम पानी-पानी हो गई, उसने कहा "क्या बात है जीजू..!! ऐसी तारीफ तो आज तक विशाल ने भी कभी नहीं की मेरी "

पीयूष:

"वो शायद रोज़ देखते-देखते आदत बना बैठे,

हम तो पहली नज़र में ही क़ायल हो बैठे..

तारीफ़ करना हमारा फ़र्ज़ बन गया,

हुस्न तेरा देख, हम लफ्जों को ही ग़ज़ल बना बैठे!"

मौसम शर्म से लाल लाल हो गई और बोली "बस जीजू.. अब और नहीं.. वरना मैं यहीं पिघल जाऊँगी"

पीयूष फिर भी न रुका और बोला:

"अरे पिघल भी गईं तो क्या हुआ, मैं संभाल लूंगा,

मेरी इन बाँहों में तुम्हें फिर से ढाल लूंगा..

एक बार मौका देकर तो देखो इस नाचीज़ को

मैं साँसों से तेरे आँचल की सिलवटें निकाल लूंगा!"

अब मौसम से ओर रहा न गया.. वह उठ खड़ी हुई और पीयूष के पास पहुँच गई.. अपनी हथेलियों में पीयूष का चेहरा भरकर उसने चूम लिया.. लब से लब मिलें.. और पुरानी चिंगारी को जैसे हवा मिल गई..!!! कुर्सी पर बैठे पीयूष ने मौसम को अपने ऊपर खींच लिया.. अपनी दोनों गदराई टांगों को कुर्सी के इर्दगिर्द जमाकर वो पीयूष पर चढ़ गई और बेताहाशा चूमने लगी..!! उसके मस्त मम्मे पीयूष की छाती पर दब रहे थे.. स्लीवलेस टॉप से खुली दिख रही उसकी काँखों से परफ्यूम और पसीने की मिश्रित मादक गंध पीयूष को पागल बना रही थी..मौसम पागलों की तरह पीयूष को चूमे जा रही थी.. विशाल के व्यवहार से त्रस्त होकर वह पीयूष की बाहों में पिघलती जा रही थी..






चूमते हुए पीयूष अपने दोनों हाथों से, मौसम के मस्त बबलों को मींजने लगा.. पतले टॉप और ब्रा के ऊपर से ही उसकी उंगलियों ने निप्पलों को ढूंढ निकाला.. जो इन हरकतों से सख्त हो चली थी..





दोनों उंगलियों से निप्पल से खेलते हुए उसने अपना दूसरा हाथ मौसम की जांघों के बीच डाल दिया.. पर कमबख्त जीन्स के सख्त कपड़े के कारण चूत की परतों का बाहर से मुआयना करना नामुमकिन था.. वह अपना हाथ जीन्स के अंदर डालने ही जा रहा था की मौसम ने उसका हाथ पकड़ लिया





"यहाँ नहीं जीजू.. कोई भी.. कभी भी अंदर आ सकता है" मौसम ने फुसफुसाते हुए उसके कानों में कहा

पीयूष को भी तभी अंदाजा हुआ की वह उसकी केबिन में बैठा था और दरवाजे पर लॉक भी नहीं लगाया था.. कोई अंदर आकर उनको इस अवस्था में देख लेगा तो गजब हो जाएगा..!! उसने तुरंत अपने होश संभाले.. और संभालकर मौसम को कुर्सी से उतारा.. मौसम ने अपना टॉप ठीक कीया और पीयूष के सामने वाली कुर्सी पर बैठ गई..

"यार, मन तो कर रहा है की तुझे लेकर कहीं भाग जाऊँ" अपनी टाई को ठीक करते हुए पीयूष ने धीमे से मौसम को कहा

मौसम शरमाते हुए मुस्कुराई ओर बोली "अभी कुछ दिनों के लिए मैं यहीं हूँ.. मौका मिलेगा जीजू.. चिंता मत कीजिए"

"तेरे चक्कर में कॉफी ठंडी हो गई" कॉफी का मग को छूते हुए पीयूष ने कहा

"पर आप को तो गरम कर दिया ना मैंने..!!" खिलखिलाकर हँसते हुए मौसम ने कहा

पीयूष ने घंटी बजाई और चपरासी को अपने और मौसम के लिए कॉफी लाने को कहा

"वैसे तुम वैशाली और पिंटू से बाहर मिली या नहीं?" पीयूष ने पूछा

"पिंटू भैया तो पिछले हफ्ते बेंगलोर ही थे.. उनसे तो वहीं मिल लिया.. वैशाली को हाई बोलकर सीधे अंदर ही आई आपको सरप्राइज़ देने.. अब बाहर जाकर इत्मीनान से मिलूँगी उसे.. काफी टाइम बाद आई हूँ.. ढेर सारी बातें करनी है मुझे उससे और दीदी से भी..!!" मौसम ने जवाब दिया

ठीक है.. तू कॉफी पीकर घर जा और आराम कर.. फिर रात को मिलते है" पीयूष ने कहा

"सोच रही हूँ जीजू.. ऑफिस का थोड़ा काम देख लूँ.. मैंने स्टाफ मीटिंग के लिए बोल दिया है पिंटू भैया को.. एक घंटे बाद है.. फिर सोच रही हूँ, वैशाली को लेकर कहीं बाहर लंच पर जाऊँ.. लौटते हुए शाम हो गई तो हम साथ ही घर जाएंगे.. थकान महसूस हुई तो घर चली जाऊँगी" मौसम ने कहा

"ठीक है, जैसा तुझे ठीक लगे" पीयूष ने कहा

तभी चपरासी दोनों के लिए कॉफी लेकर आया

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अपनी माँ रमिलाबहन को फोन कर उसने उन्हें उनके नौकर को अपने घर भेजने के लिए कहा था.. यह कहकर की उसे घर की साफ-सफाई करानी है.. जाहीर सी बात थी की कुछ दिनों पहले, उस नौकर के साथ हवस का खेल खेलते हुए जब उसकी माँ के आ जाने से जो रुकावट आई थी, उसके चलते, कविता प्यासी ही रह गई थी.. उस दिन के बाद, उसे मौका ही नहीं मिला क्योंकि रमिलाबहन पूरा दिन घर पर ही रहती थी..

पीयूष की उपेक्षा झेल रही कविता के पास ओर कोई विकल्प नहीं था.. जिस्म की प्यास उसे पागल बना रही थी.. वह एक ऐसे कूकर की तरह महसूस कर रही थी जिसे पानी भरकर तेज आंच पर चढ़ाया दिया गया हो और सीटी काम न कर रही हो.. अंदर बन रही भांप का दबाव बढ़ता जा रहा था और इससे पहले की वो फट जाए.. उस भांप को बाहर निकालना बहोत जरूरी था..

पीयूष के ऑफिस जाते ही, कविता ने अपनी माँ से फोन पर बात कर, उस नौकर लड़के को भेजने के लिए कहा.. और फिर बेसब्री से इंतज़ार करने लगी.. घर की डोरबेल बजी और कविता उछलकर दरवाजा खोलने के लिए भागी..

दरवाजा खुलते ही उसने देखा की वह गोरा चिट्टा नेपाली लड़का, मैली टी-शर्ट और शॉर्ट्स पहने हुए, सहमी नजर से कविता की ओर देख रहा था.. जैसा वह जानता था की उसे क्यों बुलाया गया था..!!

कविता ने उसकी ओर ऊपर से नीचे तक नजर डालकर देखा.. उसके गंदे दीदार देखकर उसने अपनी नाक सिकुड़ी.. इशारे से उसे अंदर आने के लिए कहा और दरवाजा बंद कर दिया

वह लड़का ड्रॉइंगरूम में सोफ़े के पास नजरें झुकाए खड़ा हो गया.. जैसे अगले निर्देश का इंतज़ार कर रहा हो.. कविता कुटिल मुस्कान के साथ उसके पीछे आई और उस लड़के के बिल्कुल सामने खड़ी हो गई

"नहाया नहीं है क्या?" २ फिट दूर से भी कविता को उसके पसीने की बदबू आ रही थी..

उस लड़के ने दायें बाएं सिर हिलाकर इशारे से कहा की वह नहीं नहाया था

"छी.. तू नहाता नहीं क्या?" कविता ने मुंह बिगाड़ते हुए कहा

"जी वो.. घर की साफ-सफाई हो जाने के बाद ही नहाता हूँ मैं" उसने बिना नजरें उठाए जवाब दिया..

"पहले अंदर बाथरूम में जा.. और ठीक से नहाकर बाहर आ" इशारे से बाथरूम का रास्ता दिखाते हुए कविता ने कहा

वह लड़का यंत्रवत बाथरूम की ओर गया और दरवाजा बंद कर दिया

कविता आमतौर पर घर में पंजाबी सूट या टीशर्ट-शॉर्ट्स पहनती थी, लेकिन आज उसने बेडरूम में जाकर.. रात वाली सिल्क की नाइटी पहन ली, जो घुटनों से ऊपर तक आती थी.. नाइटी उसके बदन पर दो पट्टों के सहारे कंधों पर अटकी हुई थी, जिसकी पीठ काफी खुली हुई थी.. उसे पहनकर वह बेड पर लेट गई..

थोड़ी देर बाद वह लड़का, जिसका नाम बाबिल था, वह नहाकर बाहर निकला.. उसने केवल अपनी शॉर्ट्स पहनी थी और उसकी मैली टीशर्ट कंधे पर डाल रखी थी.. बाहर आकर उसने कविता की ओर देखा.. वह बड़े ही मदहोश अंदाज में, पतली नाइटी पहने, बेड पर लेटे हुए थी..

नजरें झुकाएं वह बेडरूम से बाहर जा ही रहा था की कविता की आवाज ने उसे रोक दिया

"कहाँ जा रहा है..!! इधर आ..!!" आदेशात्मक आवाज में कविता ने कहा

वह लड़का मुंडी नीचे किए हुए कविता के सामने खड़ा हो गया.. कविता ने उसे शॉर्ट्स से पकड़कर खींचते हुए बिस्तर पर गिरा दिया और खुद उसके बगल में लेट गई.. अब जो होने वाला था उसकी अपेक्षा से उस लड़के की आँखें बंद हो गई..!!

कुछ देर बाद, वह धीरे से उसकी ओर मुड़ी और उसके चेहरे को देखने की कोशिश की.. उसने पाया कि हालांकि उसकी आँखें बंद थीं, लेकिन उसका लंड उसकी शॉर्ट्स में उछल रहा था.. कविता ने उसका हाथ पकड़कर अपने स्तन पर रख दिया..

उस नौकर ने अपना हाथ कविता की छाती से हटाने की कोशिश की, लेकिन कविता ने उसका हाथ अपने स्तन पर और ज़ोर से दबा लिया और उसे अपनी ओर खींचने की कोशिश की.. अब वह उससे चिपकी हुई थी, और उनके बीच कोई जगह नहीं बची थी..

कविता अपना चेहरा और करीब लाई, जो अब उसके कंधे पर था और उसकी गर्दन तक पहुँच चुका था.. उसका पैर लड़के के पेट के ऊपर डाल दिया, और उसका लंड शॉर्ट्स के ऊपर से ही सहलाने लगी..






वह पीठ के बल लेटी थी, जबकि उस लड़के का हाथ उसके स्तन पर था और उसकी टाँगें लड़के के ऊपर लिपटी हुई थीं..

पिछले कई सप्ताह से कविता सेक्स से दूर थी.. धीरे-धीरे उसकी सांसें गरम होने लगी.. बाबिल के शरीर की गर्मी से उसकी कामुकता भड़क उठी..

उसकी साँसें तेज़ हो गईं, और उसके स्तन ऊपर-नीचे होने लगे.. हर बार जब उसके स्तन उठते, उसे लगता कि बाबिल के हाथ भी उन्हें धीरे से दबा रहे हैं..

कविता ने उसे देखा.. बाबिल का चेहरा उसके कंधे से सिर्फ एक इंच की दूरी पर था.. उसने उसके माथे पर एक नरम चुंबन दे दिया..

बाबिल ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी.. उसने अपना हाथ उसके हाथ पर रख दिया, जो उसके स्तन को दबा रहा था, और धीरे-धीरे उसे अपने शरीर पर घुमाने लगी..

फिर उसने अपने मुँह में बाबिल की एक उंगली ले ली और धीरे से उस पर जीभ फिराने लगी.. उसका दूसरा हाथ उसकी गर्दन से नीचे गया, और उसे अपने शरीर के करीब खींच लिया..

अब उसका हाथ बाबिल के पेट पर था, और धीरे-धीरे उसने अपनी उंगलियों को उसके शॉर्ट्स और अपने शरीर के बीच में डाल दिया.. उसने महसूस किया कि बाबिल का लंड उसकी निकर में सख्त हो चुका था..

कामोत्तेजना से भरकर, उसने अपनी उंगलियों से उसके लंड को सहलाना शुरू कर दिया.. बाबिल ने अपनी कमर को थोड़ा हिलाया, जिससे उसे और जगह मिल गई..






जब कविता ने अपना पूरा हाथ उसके लंड पर रखा और धीरे से दबाया, तो अचानक बाबिल ने उसके कंधे, गले और छाती को चूमना शुरू कर दिया.. उसका खाली हाथ अब उसके स्तनों को मसल रहा था, और उसके निप्पल्स को नाइटी के ऊपर से दबा रहा था..

अब कविता से भी नहीं रहा गया.. उसने भी उसके चुंबनों का जवाब दिया.. उसने बाबिल के माथे को चूमा और फिर उसके होंठों पर अपने होंठ रख दिए..

अब बाबिल का सब्र टूट चुका था.. उसने अपने दूसरे हाथ से उसके पूरे शरीर को रगड़ना शुरू कर दिया, जिससे कविता की उत्तेजना और बढ़ गई..

अब उसे लगने लगा कि वह उसे जंगली तरीके से चोदना चाहती है, ताकि उसकी महीनों की तृष्णा शांत हो जाए.. वह यह भूल चुकी थी कि वह उसका नौकर है और उससे उम्र में भी काफी छोटा है..

उसने बाबिल को अपने ऊपर खींच लिया.. अब वह उसके ऊपर था, और दोनों एक-दूसरे को जुनून से चूम रहे थे..

बाबिल उसके चेहरे, गर्दन और स्तनों को चाट रहा था.. उसका हाथ उसकी नाइटी के ऊपर से ही उसके स्तनों को मसल रहा था.. कविता के हाथ उसकी पीठ पर थे, और वह उसे और पास खींचने की कोशिश कर रही थी..

उसे अपने नंगे स्तनों पर उसका मुँह महसूस करने की तीव्र इच्छा हो रही थी.. लेकिन जब उसने देखा कि बाबिल उसकी नाइटी नहीं उतार रहा, तो उसने खुद ही एक हाथ से अपनी नाइटी नीचे खींची और एक स्तन को पूरी तरह बाहर निकाल लिया..

बाबिल उसके स्तनों पर जंगली की तरह टूट पड़ा.. वह उसके निप्पल्स को चाटने, चूसने और नोंचने लगा.. कविता कराह उठी और अपने पैरों से उसकी पीठ को जकड़ लिया..








उसने बाबिल की टी-शर्ट भी उतार दी, और अब उसके नंगे स्तन उसके नंगे शरीर से रगड़ खा रहे थे.. उसने अपना दूसरा स्तन भी नाइटी से बाहर निकाल लिया..

अब उसके दोनों स्तन खुले हुए थे, और बाबिल उन्हें चाटते हुए उस पर हावी हो चुका था..

और जब कविता ने अपना पूरा हाथ उसके लंड पर रख दिया और धीरे से उसे दबाया तो अचानक पाया कि वह उसके कन्धे के ऊपर पूरी तरह से चूम रहा था, गले पर और छाती के ऊपर सब जगह,और उसका जो हाथ खाली था उससे वह मेरे स्तनों का मर्दन कर रहा था और कविता की निप्पलों को अपनी उँगलियों से नाइटी के ऊपर से मसल रहा था ...

कविता अब अपने पूरे खुमार पर थी.. आतुर हो कर उसने अपने दूसरे हाथ से उस लड़के के पूरे गोरे शरीर को हौले हौले रगडना आरम्भ कर दिया जिससे उसकी उत्तेजना बढ़ती ही जा रही थी ... और अब वह चाहती थी कि वह लड़का उसे वहशियाना तरीके से चोदे जिससे उसकी आग शान्त हो जाए ...

बाबिल अब कविता के पूरे चेहरे को चूम रहा था, उसकी गर्दन और स्तनों के थोड़ा ऊपर. उसका हाथ नाइटी के ऊपर से ही स्तनों का मर्दन कर रहे थे और कविता के हाथ उसकी पीठ पर थे, उसकी पीठ के निचले हिस्से पर और वह उसे अपने ऊपर रखने की कोशिश कर रही थी. कविता की हालत खराब थी.. वह अपने नंगे स्तनों पर उस लड़के के मुंह को महसूस करना चाहती थी लेकिन तब उसने महसूस किया कि वह लड़का किसी तरह से भी मेरी नाइटी खींच कर नीचे नहीं कर रहा था.. तो उसने एक हाथ से उसके सिर को पकड़ा और दूसरे हाथ से अपनी नाइटी नीचे खींच एक स्तन पूरी तरह से बेनकाब किया और अपने नग्न स्तन की ओर उसके मुँह को रास्ता दिखाया. ...






अब वह लड़का कविता के स्तनों पर जंगली की तरह टूट पड़ा... अब वह निपल्स चाट रहा था, चूस रहा था, उसके जीभ चलाने और फिर निपल्स चूसने् से कविता ने कराहना शुरू कर दिया और फिर अपने पैरों के बीच में उसके शरीर को लाने में कामयाब रही.. कविता ने उसकी पीठ पर अपने पैर लपेट लिये और उसकी शॉर्ट्स उतार दी..

अब वह अपने नंगे स्तनों पर उसके नंगे शरीर को महसूस कर रही थी और उसने अपने दूसरे स्तन को भी नाइटी नीचे खींच कर बेनकाब करने में सफ़लता हासिल कर ली ... लड़के का मस्त ताज़ा गोरा लंड, कविता की चूत की परतों पर रगड़ खाते हुए उसे पागल बना रहा था.. चूत पर हल्की रगड़ खाते ही, कविता की चूत ने काम रस का छोटा सा फव्वारा दे मारा










"डींग-डोंग.. डींग डोंग..!!"

घर की डोरबेल बजी...!!! और कविता अपनी मदहोशी के नशे से एकदम से बाहर आई.. वह लड़का भी सहम गया और उसने कविता की निप्पल चूसना बंद कर दिया और सवालिया नज़रों से कविता की ओर देखने लगा.. कविता ने महसूस किया की डोरबेल के अचानक बजने से उस लड़के का लंड अपनी सख्ती खोता चला जा रहा था.. शायद वह डर गया था..!!

जिस मुकाम पर वह पहुँच चुकी थी.. वहाँ से वापिस लौटने की उसकी जरा भी इच्छा नहीं थी.. उसने सोचा "जो भी होगा.. चला जाएगा"

उसने वापिस बाबिल को चेहरे को अपनी निप्पल पर दबा दिया और अपनी कमर को हिलाते हुए उसके लंड को फिर से खड़ा होने के लिए उकसाने लग गई.. लड़का भी समझ गया और अपने काम में फिर से झुट गया..

"डींग-डोंग.. डींग डोंग.. डींग डोंग.. डींग डोंग..!!"

जो भी था, बार बार घंटी बजाए जा रहा था.. जैसे कसी भी तरह दरवाजा खुलवाने पर तुला हो..!!! पर कविता ने अब ध्यान देना छोड़ दिया था..उसने लड़के को अपने ऊपर से उठाया और बगल में लेटा दिया..

उस लड़के का लंड, अब चूत में घुसने लायक खड़ा हो चुका था और कविता अब ज्यादा वक्त बर्बाद करना नहीं चाहती थी.. वो खड़ी हुई और अपनी दोनों टांगें लड़के के शरीर के इर्दगिर्द जमाकर खड़ी हो गई.. धीरे से नाइटी उठाकर अपनी नाजुक सी चूत को उजागर किया.. वह लड़का हक्का-बक्का होकर, कविता की उस आकर्षक लकीर को देखता ही रहा..

अपनी जांघें चौड़ी करते हुए वह झुककर उतनी नीचे आई की लड़के के सुपाड़े की नोक उसकी चूत के होंठों को स्पर्श करें.. कविता की आह्ह निकल गई.. उसे उस लड़के के गोरे गुलाबी लंड से जैसे प्यार हो गया था.. उसने अपनी हथेली से लंड को पकड़ा और चूत की दरार पर सेट करने लगी.. अब बस उसे थोड़ा सा वज़न डालने की ही देर थी.. लंड गप्प से अंदर घुस जाता..!!






"दीदीईईईईई...!!! ओ दीदी...!!! कहाँ हो यार..!!! दरवाजा खोलो..!!!" बाहर से आवाज सुनाई दी..!!

कविता के होश उड़ गए..!!! ये तो मौसम की आवाज थी..!!! वो यहाँ... अभी... इस वक्त..!!! उसका दिमाग काम नहीं कर रहा था.. निवाला बस मुंह में आने ही वाला था की... एक बार और उसकी कश्ती किनारे पर आकर डूब गई..

बाबिल का लंड छोड़कर वह कूदकर बिस्तर से उतरी.. वॉर्डरोब से उसन गाउन निकाला और नाइटी के ऊपर ही पहन लिया.. और इशारे से उस लड़के को कपड़े पहनने के लिए कहा..

बिखरे हुए बाल ठीक करते हुए वह दरवाजे पर आई और लॉक खोला..

"दीदीईईईई...!!" चीखते हुए मौसम अंदर घुसी और कविता को गले लगा लिया

कविता को संभलने में कुछ पल लगें.. थोड़ा सा सहज होने पर उसने भी मौसम को गले लगा लिया

"कब आई तू?? बताया भी नहीं...!!!" कविता ने उसके आलिंगन से छूटकर कहा

आराम से सोफ़े पर पैर पसारकर बैठते हुए मौसम ने कहा "बताकर आती तो आपको ऐसे रंगेहाथों पकड़ने के मौका कैसे मिलता??" शरारती आँखें नचाते हुए मौसम ने कहा

सुनकर कविता का खून सूख गया.. चेहरे से हंसी गायब हो गई.. चेहरे से नूर उड़ गया..!! मौसम को कैसे पता चला..!! कहीं जिस तरह उसने अपनी माँ को बेडरूम की खिड़की से देखा था वैसे मौसम ने तो नहीं देख लिया..!! पर ऐसा ऐसे कैसे मुमकिन था..!!! खिड़की पर तो बड़े वाले परदे लगे हुए थे.. और पीछे के रास्ते खिड़की तक पहुंचना भी बहोत मुश्किल था..!!! फिर भी किसी तरह उसने देख लिया होगा तो..!! कविता को चक्कर सा आने लगा

उसकी ऐसी हालत देखकर मौसम खिलखिलाकर हंसने लगी और बोली "मज़ाक कर रही हूँ दीदी.. वैसे कब से दरवाजा क्यों नहीं खोल रही थी??"

कविता की जान में जान आई.. पर उसे संभलने में कुछ वक्त लगा.. तभी बाबिल बेडरूम से बाहर निकला.. मौसम उसकी और ताज्जुब से देखने लगी.. कभी वो उस लड़के को देखती तो कभी प्रश्नसूचक नज़रों से कविता की ओर..!!

कविता ने अब होश संभाला "अरे यार.. वो तो मैं आज घर की साफ-सफाई कर रही थी..इसलिए मम्मी को फोन कर इसे बुला लिया था.. इस बेडरूम की सफाई सौंपकर मैं ऊपर के फ्लोर पर सफाई कर रही थी... बोर हो रही थी तो ईयरफोन्स लगाकर म्यूज़िक सुन रही थी.. इसलिए सुनाई नहीं दिया"

मौसम अब भी थोड़ी सी उलझी हुई थी.. वह बोली "वो तो ठीक है दीदी.. पर इस पगले को डोरबेल क्यों नहीं सुनाई दी? वो तो नीचे बेडरूम में ही था ना..!!"

कविता के लिए अब मौसम के जासूसीभरे प्रश्नों का जवाब देना मुश्किल हो रहा था.. कुछ सोचकर उसने कहा "अरे यार.. आजकल बहोत हादसे हो रहे है.. कोई भी अनजान घर में घुसकर चोरी, छीना-झपटी, खून.. कुछ भी कर देता है.. इसलिए मैंने इसे कहा था की जब तक मैं नीचे न आऊँ तब तक कितनी भी डोरबेल बजे, दरवाजा नहीं खोलना है"

"पर वो तुम्हें बता तो सकता था ना..!!!" मौसम के सवाल खत्म ही नहीं हो रहे थे


"अब तू यही सब माथापच्ची करती रहेगी या अपने बारे में भी कुछ बताएगी..!!! अकेली आई है या विशाल भी साथ आया है?" कविता ने चालाकी से बात को मोड दिया..

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प्रिय पाठक मित्रों,



सब से पहले तो आप सभी का क्षमाप्रार्थी हूँ की इतने लंबे अंतराल तक कहानी का अपडेट नहीं दे पाया.. परिवार के एक सदस्य के अस्पताल में होने के कारण यहाँ आना और अपडेट देना मुमकिन नहीं हो पा रहा है..



सभी के मेसेज के लिए दिल से शुक्रगुजार हूँ.. आशा है की जल्द ही लौट पाऊँगा..
 
पिछले अपडेट में आपने पढ़ा की..

मौसम के अचानक बेंगलोर से आ जाने से पीयूष चोंक उठा.. केबिन के अंदर जीजा-साली के बीच मीठी सी नोक-झोंक के दौरान, आशिक़ाना शायरियाँ सुनाकर पीयूष ने मौसम को पिघला ही दिया.. दोनों अधिक आगे बढ़ते उससे पहले मौसम ने उसे याद दिलाया की दोनों ऑफिस में थे और कभी भी कोई भी आ सकता था.. मजे करने के लिए आगे भी मौका मिलेगा.. सुनकर पीयूष संभल गया..

दूसरी तरफ अपनी जिस्मानी प्यास से झूंझ रही कविता ने काम के बहाने अपनी माँ के घर पर काम करते नौकर को अपने घर बुला लिया.. उसके साथ हवस का खेल शुरू ही किया था की तभी घर की डोरबेल बजी.. वो मौसम थी.. कविता के रंग में भंग पड़ गया...

अब आगे...


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सुबह का सूरज फार्महाउस के बरामदे को उजाले से भर रहा था.. जब की हाउस के अंदर.. राजेश, शीला, मदन और फाल्गुनी अधनंगी दशा में एक ही कमरे में यहाँ वहाँ लाश की तरह पड़े हुए थे..

अब वे चारों, पिछली रात के अनुभव के बाद और भी बेशर्म और बिनधास्त हो गए थे.. सुबह उठते ही मदन ने फाल्गुनी और शीला को एक के बाद एक करके चोदा था.. तब राजेश नींद में था पर अब वह जाग चुका था

आँखें खोलते ही राजेश ने कहा "लगता है, तुम लोग एक एक राउन्ड करके बैठे हुए हो"

शीला: "अब क्या करते..!!! तुम्हारी तो नींद ही नहीं उड़ रही थी.. सुबह की भूख मिटाने के लिए नाश्ता तो चाहिए ना..!!"

राजेश ने फाल्गुनी और शीला की ओर देखकर कहा "और मेरी भूख का क्या?"

यह सुनते ही ही शीला और फाल्गुनी ने अपने बचे-कूचे कपड़े उतारे और राजेश को दोनों तरफ से आलिंगन किया, बाजू के बेड पर लेटा मदन इनकी हरकतों को देखता रहा.. आधे घंटे पहले ही उसने दमदार चुदाई की थी और उसका लंड अब थोड़ा विश्राम चाहता था..

इसी बीच.. राजेश उठा और उसने कहा "एक मिनट.. पानी पीकर आता हूँ" कहते हुए वह बेडरूम से बाहर निकला और ड्रॉइंगरूम मे पड़े अपने बेग से वायग्रा की गोली निकाली और पानी के साथ गटक गया.. पिछली बार के फाल्गुनी के साथ हुए अनुभव के बाद उसने इस गोली को अपना सहारा बना लिया था.. क्योंकि इन चुदक्कड़ों की भूख मिटती ही नहीं थी औ राजेश खुद को चुदाई के मामले में निःसहाय देखना पसंद नहीं करता था.. वह आधे घंटे तक अपने मोबाइल पर मेसेज चेक करते बैठा रहा ताकि गोली अपना असर दिखा पाएँ

राजेश फिर से कमरे के अंदर दाखिल हुआ जहां शीला और फाल्गुनी उसका इंतज़ार कर रहे थे.. वह बेड पर लेटता उससे पहले ही फाल्गुनी ने बड़े ही आराम से राजेश की अन्डरवेर उतार दी.. अब वह राजेश के खड़े लंड को सहलाने लगी..






तब तक शीला अपने निप्पल्स राजेश के मुँह में देकर उन्हें चुसवाने का आनंद ले रही थी.. अगले आधे घंटे तक शीला, राजेश और फाल्गुनी के बीच फोरप्ले और उसके बाद अलग-अलग पोज में चुदाई का किस्सा चलता रहा.. मदन आँखें फाड़-फाड़ कर वह नज़ारा देखता रहा..













जब शीला राजेश का कड़क लौड़ा चूस रही थी, तब राजेश बड़े प्यार से फाल्गुनी की मीठी चूत को चाट रहा था.. यह सब नज़ारा देखकर स्वाभाविकतः मदन भी उत्तेजित होकर अपना लंड हिलाने में लग गया..

अब मदन ने राजेश से चिपकी हुई फाल्गुनी को अपनी ओर खींचा और दोनों सिक्सटी नाइन की पोज में सुख देने लग गए जिसे देखकर राजेश भी उत्तेजित हो रहा था.. आखिर फाल्गुनी की दोनों टाँगे खोलकर मदन उसको चोदने लग गया.. यहाँ दूसरे बेड पर शीला टाँगे खोलकर अपनी राजेश से चूत चटवा रही थी और मदन फाल्गुनी को घोड़ी बनाकर उसको चोदे जा रहा था..














पूरा कमरा "ओह्ह फक.. और जोर से आह" ऐसी आवाजों से गूँज रहा था.. अब वे चारों पूरी तरह निढाल होकर लेटे हुए थे.. शीला ने राजेश के लौड़े को चूस कर उसकी सारी मलाई पी डाली थी.. अब चारों के बीच कोई शर्म बाकी नहीं रही थी..





वहाँ दूसरे बिस्तर पर, मदन और फाल्गुनी चूमते और एक दूसरे के अंगों को सहलाते हुए लेटकर मजे ले रहे थे.. फाल्गुनी के करारे जवान जिस्म में मदन जैसे खो चुका था.. वह फाल्गुनी के उन्नत वक्षों को सहलाकर चाटने लगा और फिर बारी-बारी दोनों निप्पल्स मुँह में लेकर चूसने लगा.. फाल्गुनी ने मदन के लौड़े से खेलना शुरू कर दिया.. अब मदन फाल्गुनी की दोनों टाँगे खोलकर उसकी गुलाबी चूत को चूमने और चाटने लगा.. वहाँ की सुगंध लेकर वह पूरा उत्तेजित हुआ और दो उंगलियों से फाल्गुनी की चूत को चोदने लगा.. बीच-बीच में दोनों उँगलियाँ चाटकर फाल्गुनी के योनि रस का आस्वाद लेता रहा.. फिर उससे रहा न गया और उसने फाल्गुनी की दोनों टाँगे पूरी खोलकर उसे चोदने लग गया.. फाल्गुनी भी सिसकते हुए इस चुदाई का आनंद लेती रही

इधर राजेश ने शीला के बड़े बड़े स्तनों को काफी देर तक चूसा और उसकी गदराई जांघों को प्यार से सहलाया.. अब उसने दोनों हाथों से शीला के बड़े-बड़े बबलों को मसलना शुरू किया.. वैसे तो राजेश आधे घंटे पहले ही झड़ चुका था..पर वायग्रा की गोली का असर अब भी कायम था.. उसके लंड ने फिर से हरकत शुरू कर दी थी..

राजेश ने शीला को पीठ के बल लेटाया और उस पर उल्टा लेट गया.. सिक्सटी नाइन की पोज में आकर उसका भोसड़ा चाटने लगा.. जैसे ही राजेश ने शीला की योनि का दाना (क्लाइटोरिस) चाटना शुरू किया, वह भी एकदम मदमस्त हो गयी.. उसने राजेश का कड़क और लम्बा लौड़ा अपने मुँह में लिया और उसे आइसक्रीम की तरह चूसने लगी.. राजेश और शीला का सिक्सटी नाइन कुछ देर तक चला, फिर उसने शीला को घोड़ी बनाया और गीले भोसड़े में अपना लौड़ा घुसेड़ दिया.. राजेश का कड़क लौड़ा उसकी चूत में घुसते ही शीला गांड हिला हिलाकर चुदवाने लगी.. वह जोर-जोर से चिल्लाती रही, "आह्ह राजेश.. और जोर से धक्के लगा.. आह्ह ओह्ह" राजेश उसकी गांड को पकड़ कर उसे जोर-जोर से चोदता गया..






दोनों बेड पर धुँआधार चुदाई चल रही थी..

शीला का भोसड़ा बजाते हुए राजेश फाल्गुनी को टांगें फैलाकर चुदते हुए देख रहा था.. अब उसे शीला के फैले हुए भोसड़े के बजाय अपने लंड पर थोड़े से कसाव की जरूरत महसूस हुई

"क्यों न अब पार्टनर की अदला बदली की जाए?" राजेश ने सुझाव दिया

यह सुनते ही फाल्गुनी मुस्कुराते हुए मदन से अलग हुई और राजेश मदन की जगह आ गया.. शीला वैसे ही घोड़ी बनी रही और उसके दोनों चूतड़ों के बीच अब मदन ने निशाना साधा.. मदन के लंड को उस जाने पहचाने.. सालों पुराने छेद के अंदर घुसने में कोई परेशानी नहीं हुई.. अब वह शीला का भोसड़ा ऐसे मार रहा था जैसे साइकिल के टायर में हवा भरते वक्त कोई पंप चला रहा हो..

"यार मेरे घुटने दर्द करने लगे.. तू रुक.. मैं पलट जाती हूँ.." शीला ने कहा.. मदन ने लंड बाहर निकाल लिया और शीला पलटकर पीठ के बल लेट गई.. शीला के दोनों बबले पसीने से तर थे और उत्तेजना के कारण लाल लाल भी हो गए थे






"यार शीला.. कसम से.. तेरे इन कातिल बबलों का तो जलवा ही अलग है.. कितना भी देखो, दबाओ, चूसो.. मन ही नहीं भरता.." मम्मों को मसलते हुए मदन ने कहा

"साले, बकबक करता रहेगा या फिर से चोदेगा भी..!!" शीला ने उसे हँसते हुए डांट दी.. मदन ने शीला के बड़े-बड़े वक्षों को दोनों हाथों से मसलना शुरू किया.. उसकी गांड पर हाथ फेरते हुए उसके निप्पल्स चूसे और उसकी गीली चूत को प्यार से चाटा.. फिर उसने शीला की दोनों टाँगे अपने कंधों पर रखीं.. ऐसा करने से शीला की टाँगे कुछ ज्यादा ही खुल गयीं और लौड़ा उसकी चूत में घुस गया.. वह आवेश में आकर उसे जमकर चोदने लगा.. मदन ने दोनों हाथों से शीला के वक्षों को पकड़ा था, जिन्हें वह मसले जा रहा था..

आखिर मदन शीला की चूत में झड़ गया.. कुछ पल बाद राजेश ने भी फाल्गुनी की चूत को अपने वीर्य से पवित्र कर दिया..








पिछली पूरी रात और इस सुबह, शीला और फाल्गुनी इस बिस्तर से उस बिस्तर पर जाते रहे और सेक्स का मजा लूटते रहे.. पिछली शाम से अब तक दोनों मर्द लगभग चार बार झड़ चुके थे.. राजेश ने तो खैर वियाग्रा का सहारा लिया हुआ था.. पर मदन की हालत पतली हो गई थी..

चारों अब आराम से बेड पर लेटे हुए बातचीत कर रहे थे

"मज़ा आ गया यार..!! ऐसा मज़ा तो सुहागरात पर शीला को चोदने में भी नहीं आया था..!!" मदन ने कहा.. शीला ने हँसते हुए उसके कूल्हे पर चिमटी काट ली..

"हाँ यार.. पिछली रात और आज की सुबह तो कमाल की रही..!!" राजेश ने भी करवट लेकर उन तीनों की तरफ देखते हुए कहा

तभी फाल्गुनी उठी और नीचे बिखरे पड़े कपड़ों में से अपनी पेन्टी ढूंढकर पहनने लगी..

मदन ने चोंकते हुए कहा "कहाँ जा रही हो फाल्गुनी? थोड़ी देर ओर रुक जाओ ना.."

फाल्गुनी ने पलटकर जवाब दिया.. "अंकल.. अगर एक बार और कर सकते है तो फिर से पेन्टी उतार देती हूँ" कहते हुए वह खिलखिलाने लगी.. मदन चुप हो गया.. अब अगर एक बार और चोदने की कोशिश करता तो उसके लंड को आईसीयू में दाखिल करने की नोबत आ जाती

"पर तू जा कहाँ रही है?" राजेश ने पूछा

"घर जा रही हूँ" फाल्गुनी ने टीशर्ट पहनते हुए कहा

"क्यों??"

"मम्मी पापा को मुंह दिखाने तो जाना पड़ेगा ना..!!" फाल्गुनी ने जवाब दिया

"अरे यार.. मतलब आज का खेल खतम?" मदन ने मायूस होकर कहा

"दो-तीन घंटों में वापिस आ जाऊँगी अंकल.. तब तक शीला आंटी तो है ही" फाल्गुनी ने हँसते हुए कहा

"चिंता मत कर मदन.. वैसे भी फाल्गुनी अब हमारे शहर ही शिफ्ट हो रही है.. मैंने पीयूष से बात कर रखी है.. तेरे पड़ोस में उनका जो घर है वहीं रहेगी ये... वैशाली और पिंटू के जाने के बाद खाली ही पड़ा है" राजेश ने कहा

"अरे वाह.. यह तो बढ़िया रहेगा.. अब फाल्गुनी हमारी पड़ोसन.. वाह..!!" शीला ने खुश होते हुए कहा

"चलिए.. मुझे जाना होगा.. घर जाकर जल्द से जल्द लौटने की कोशिश करती हूँ.. ब्रेकफास्ट में कुछ खास नहीं है.. ब्रेड और बटर ही है.. पर आते हुए मैं कुछ लेकर आऊँगी" कहते हुए फाल्गुनी निकल गई..

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सुबह की पहली किरणों ने जब मौसम के बेडरूम में प्रवेश किया तब वह सिल्क की चादर में अपना खूबसूरत चेहरा छुपाकर नींद को फिर से जोड़ने की कोशिश कर रही थी.. एक मदहोश अंगड़ाई लेकर वह अपने बेड से उठी.. साटीन की नाइटी से उसके गदराए यौवन ने भी एक झलक दिखा दी.. आईने में अपनी बेशकीमती जवानी को नजर भरकर देखते हुए, मौसम ने पास पड़ी प्लास्टिक की बोतल से पानी के दो घूंट लगाए और अपने बिखरे बालों को सँवारने लगी.. नाइटी उतारकर उसने टी-शर्ट और शॉर्ट्स पहन लिए.. वैसे तो वो अपने मायके में पूरा दिन नाइटी में ही घूमती थी पर अब अपनी माँ के अलावा एक नौकर भी था.. इसलिए अपने पहनावे पर उसे ध्यान देना पड़ता था..

उभासी लेते हुए उसने बेडरूम का दरवाजा खोलने की कोशिश की तो उसे आश्चर्य हुआ.. उसके रूम का दरवाजा बाहर से किसी ने बंद कर दिया था..!!! उसका कमरा पहली मंजिल पर था और घर में उसकी माँ, रमिलाबहन और उनके नौकर के अलावा और कोई नहीं था.. ऐसे कैसे किसी ने बाहर से दरवाजा बंद कर दिया..!!!

"मम्मीईईईईईई....!!!" उसने आवाज लगाई.. साथ में दरवाजे को जोर जोर से दस्तक भी दी.. उसने सोचा की मम्मी को आवाज देने से अच्छा है की नौकर को ही बुला ले.. पर उसे उसका नाम ही पता नहीं था..!!

"दरवाजा खोलो यार.. किसने बाहर से बंद कर दिया..!!!" परेशान होकर मौसम फिर से चिल्लाई.. पर न तो किसी ने जवाब दिया और ना ही किसी के ऊपर आने की आहट सुनाई दी..

तंग आकर उसने अपना मोबाइल उठाया और कविता को फोन करने ही जा रही थी की तभी किसी के दौड़े दौड़े ऊपर आने की आवाज सुनाई दी.. और फट से उसका दरवाजा खुला.. मौसम ने पलटकर देखा तो नौकर खड़ा था

मौसम का गुस्सा सातवे आसमान पर था.. उसने क्रोधित होकर उससे कहा "बेवकूफ, बाहर से दरवाजा क्यों बंद कर दिया???"

नौकर की फटकर हाथ में आ गई.. मौसम को इतना गुस्सा देखकर वो कुछ बोल ही नहीं पाया..

"हिन्दी समझता है की नहीं??" उसके नेपाली चेहरे को देखकर एक पल के लिए मौसम को शक हुआ की वह उसकी भाषा समझता भी है या वो बेवजह ही चिल्ला रही है..!!

गर्दन हिलाकर उसने हाँ कहा..

"तो फिर बोलता क्यों नहीं???" मौसम उसके एकदम सामने आकर खड़ी हो गई

"जी मेमसाब.. वो.. मैं बाहर पोंछा लगा रहा था तब अचानक से बाहर आकर आप फिसल न जाओ इसलिए मैंने बंद किया था.." उसने नतमस्तक होकर जवाब दिया

"तो फिर जाते वक्त खोलना याद नहीं आया तुझे..??" मौसम ने लगभग चिल्लाते हुए कहा..

लड़के ने जवाब नहीं दिया और मुंह झुकाए खड़ा रहा..

वह नौकर लड़का मैली सी टी-शर्ट और पुरानी लंबी शॉर्ट्स पहने था.. शॉर्ट्स के आगे, लंड वाले हिस्से पर गीलापन नजर आ रहा था.. शायद काम करते वक्त पानी लग गया होगा... गोरे चेहरे पर बड़ी मासूमियत नजर आ रही थी.. चिल्लाने के बाद मौसम को अफसोस हुआ.. की इतनी छोटी सी बात पर वह उस लड़के पर इतना गुस्सा कर रही थी.. वह खुद असमंजस में थी की पिछले कुछ महीनों से उसका स्वभाव कुछ ज्यादा ही गुस्सैल हो रहा था.. छोटी छोटी बातों पर भड़क जाना.. चिढ़चिढ़ापन.. यह सब स्वाभाविक सा होता जा रहा था जिससे वह खुद भी अवगत थी पर उसे पता नहीं चल पा रहा था की आखिर ऐसा हो क्यूँ रहा था..!! शायद विशाल और उसके तंग संबंधों का इसमें योगदान था या कोई और वजह थी..

"कोई बात नहीं.. नीचे जा.. और सुन..!! मम्मी जाग गई है क्या?" नरम आवाज में उसने नौकर से कहा

नौकर ने बिना कुछ कहें फिर से गर्दन हिलाकर हाँ कहा

"जल्दी से नाश्ता लगा, मैं नीचे आ रही हूँ, मुझे ऑफिस जाना है" एक नजर उसकी ओर देखकर वह बाथरूम में घुस गई...

शर्ट और फॉर्मल ट्राउज़र पहनकर जब वह नीचे उतरी तब नाश्ता टेबल पर तैयार था.. उसने अपनी प्लेट में एक ब्रेड-बटर का टुकड़ा लिया और थोड़े ओट्स के साथ कॉफी पीने लगी.. कुछ ही देर में रमिलाबहन उसके लिए पराठे बानकर ले आई

"मैं ये सब नहीं खाती मम्मी" ओट्स भरी चम्मच मुंह में डालते हुए मौसम ने कहा

आश्चर्य से मौसम की ओर देखते हुए उसकी माँ ने कहा "क्यों? क्या बुराई है इसमें?"

"बहोत केलरी होती है.. मैं डाएट कर रही हूँ" नाश्ता करते हुए मौसम ने जवाब दिया

"अरे मौसम.. अब तेरी शादी हो गई है.. कल को बच्चा होगा तो जिस्म में मांस-चर्बी तो होनी चाहिए ना.. बच्चे को पालने के लिए..!!" मुस्कुराते हुए रमिलाबहन ने कहा

उनकी बात सुनकर मौसम नाश्ता चबाते-चबाते रुक गई.. और बोली "कोई बच्चा-वच्चा नहीं करना है मुझे.. मैं खुद अभी बच्ची हूँ"

मौसम के साथ कुर्सी पर बैठते हुए रमिलाबहन ने बड़े ही प्यार से उसके माथे को सहलाया और कहा "पहले पहले सब यही कहते है.. शादी हो गई है तो बच्चा भी होगा ही.. ऐसे ही तो संसार चलता है बेटा.."

थोड़े से गुस्से के साथ मौसम ने कहा "मैंने कोई संसार चलाने का ठेका थोड़े ही ले रखा है.. जिसे करना हो करें बच्चे.. मुझे नहीं चाहिए" कहते हुए उसने कॉफी का आखिरी घूंट पी लिया और टेबल से उठ गई "मैं ऑफिस जा रही हूँ मम्मी"

"ठीक से नाश्ता तो कर ले.." रमिलाबहन की आवाज मौसम के कानों तक पहुँचती उससे पहले तो वह घर के बाहर निकल चुकी थी

एक लंबी सांस छोड़कर रमिलाबहन मौसम की प्लेट की तरफ देखती रही.. फिर उन्होंने तीखी नज़रों से, अपने नौकर की ओर देखा और बोली "उसे शक तो नहीं हुआ ना??"

"नहीं" नौकर ने जवाब दिया "वो गुस्सा हो गई थी पर उन्हें कुछ पता नहीं चला"

"चलो अच्छा हुआ.. जो मैंने पहले ही तुझे उसका दरवाजा बाहर से बंद करने के लिए बोल दिया.. वरना वो पक्का नीचे आ जाती" कुर्सी से उठकर अपने ब्लाउज के बटन खोलते हुए बेडरूम की तरफ गई.. उनका इशारा समझ चुका वह नौकर.. पीछे पीछे पालतू कुत्ते की तरह चला गया.. सुबह का अधूरा काम जो पूरा करना था..!!

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रात के दस बज रहे थे.. पूरे दिन की थकान के बाद, रसोईघर का काम निपटाकर वैशाली ने अपने बेडरूम में प्रवेश किया..

बड़ा ही व्यस्त दिन रहा था.. दो दिन बाद पीयूष दिल्ली जाने वाला था कस्टम्स के कामों को लेकर.. उसके सारे डॉक्युमेंट्स की तैयारी आज ही पूरी करनी थी.. उसी चक्कर में वैशाली ने लंच भी नहीं किया था और शाम को सात बजे तक ऑफिस में काम करती रही.. थककर घर पहुंची तो पता चला की उसकी सास की तबीयत नासाज थी इसलिए उन्होंने खाना बनाने की कोई तैयारी ही नहीं की थी.. बाहर का खाना उसके सास-ससुर को राज नहीं आता था इसलिए बिना वक्त गँवाए वह किचन में पहुँच गई..

खाना बनाकर, खाकर.. उसने पिंटू के लिए थाली परोसी और बेडरूम की तरफ चल दी.. पूरे दिन के पसीने से तर कपड़े उतारकर वह बाथरूम में घुसी और ठंडे पानी से शावर लेने लगी.. पानी की फुहारों ने जिस्म की ऊपरी परत की गर्मी को तो मिटा दिया लेकिन अंदर जल रही शरीर की आग तो भड़कती ही रही..

पिछले एक महीने में, पिंटू के साथ, सेक्स के दो प्रयत्न असफल रहे थे.. इतने लंबे अवकाश के लिए.. बिना सेक्स के सहारे रहने की वैशाली को आदत नहीं थी.. अपनी माँ शीला के प्रतिबिंब जैसी वैशाली, चुदने की बेहद शौकीन थी.. पिंटू का हथियार सख्ती धारण नहीं कर पा रहा था और इसके चलते वैशाली की चूत की प्यास अनबुझी ही रह जाती थी.. हालांकि उसने पिंटू को चिकित्सीय परामर्श करने की पेशकश भी की थी लेकिन मेडिकल मदद लेने के नाम मात्र से ही पिंटू भड़क गया था..

वैशाली को पता नहीं चल पा रहा था की वह इस सूरत में क्या करें..!!

शावर लेने के बाद, तौलिए से अपना गदराया जिस्म पोंछते हुए, उसने अपने विराट स्तनों को आईने में देखा और सिहर कर रह गई.. "आह्ह.. अभी अगर पीयूष या राजेश, मुझे इस अवस्था में देखते.. तो तब तक चोदते जब तक मैं दो-तीन बार झड़ न जाती.. और रसिक.. उफ्फ़.. वो होता तो खटिया पर पटक पटक कर ऐसा चोदता.. की मेरी आँखों में आँसू ला देता.." मन ही मन ऐसा सोचते हुए.. वह सहम गई.. अपने आप को रोक लिया.. "ये मैं क्या अनाब-शनाब सोच रही हूँ.. पिंटू के अलावा किसी और के बारे में सोचना भी पाप है..!! याद है ना.. शादी से पहले, राजेश सर के साथ हुआ वाकया.. और उसके बाद पिंटू का रिएक्शन..!! नहीं बाबा नहीं..!!"

कॉर्डसेट नाइट ड्रेस पहन कर वह बिस्तर पर लेट गई.. और पाँच मिनट बाद पिंटू भी खाना खाकर बेडरूम में आया और दरवाजा अंदर से बंद कर लिया.. पिंटू ने करवट लेकर लेटी वैशाली पर एक नजर देखा.. आहहह..!! क्या नजारा था.. कंधे से लेकर स्तनों की गोलाई तक.. और कमर से लेकर चूतड़ों का वक्र आकार देखते ही किसी भी पुरुष के अंदर की हवस जाग उठे..!!!






वैशाली बिस्तर पर पलंग के एक कोने में बैठ गई, उसका गुस्सा और निराशा साफ झलक रहा था.. उसकी भरी हुई छाती तेजी से उठ-गिर रही थी, गहरी सांसों के साथ.. उसकी कर्वी बॉडी, जो आमतौर पर पिंटू को बावला बना देती थी, आज उसके लिए एक चुनौती बन गई थी.. उसकी तंग नाइटी, जो उसके भरे हुए स्तनों और गोल हिप्स को और भी सेक्सी बना रही थी, आज पिंटू की नजरों से बचने की कोशिश कर रही थी..

पिंटू दरवाज़े के पास खड़ा था, उसके माथे पर पसीना था.. दो बार की नाकामयाबी ने उसका आत्मविश्वास तोड़ दिया था.. वैशाली ने उसे डॉक्टर के पास जाने को कहा था, लेकिन उसने गुस्से में ऐसा रिएक्ट किया था जैसे उसकी मर्दानगी पर सवाल उठाया गया हो.. अब वह फिर से उसी मोड़ पर खड़ा था.. डरा हुआ, असहज, परेशान..!!

"क्या तुम सोने नहीं आ रहे?" वैशाली ने ठंडे स्वर में पूछा, बिना उसकी तरफ देखे..

पिंटू ने गला साफ किया.. "हाँ... आ रहा हूँ.." वह धीरे से बिस्तर पर आया और वैशाली से दूर लेट गया..

कमरे में तनावपूर्ण माहोल था.. वैशाली चाहती थी कि पिंटू पहल करे, लेकिन वह डरा हुआ था.. उसका दिमाग बार-बार पिछली दो नाकामयाब कोशिशों को याद कर रहा था.. "क्या आज फिर वही होगा?"

थोड़ी देर की चुप्पी के बाद, पिंटू ने हिम्मत जुटाई.. वह वैशाली के पास सरक आया और उसके कंधे को हल्का छुआ.. "वैशाली..."

वैशाली ने उसकी तरफ देखा, उसकी आँखों में गुस्सा और इच्छा का मिलाजुला भाव था.. "क्या?"

पिंटू ने उसके होठों की तरफ देखा, फिर नीचे उसके भरे हुए स्तनों की तरफ, जो नाइटी के अंदर से बाहर निकलने को बेताब लग रहे थे.. उसका गला सूख गया.. "मैं... मैं तुम्हें छू सकता हूँ?"

वैशाली ने कोई जवाब नहीं दिया, लेकिन उसने अपनी बॉडी थोड़ी और पिंटू की तरफ घुमा दी.. यह एक इशारा था..

पिंटू ने धीरे से अपना हाथ उसके कमर पर रखा, फिर ऊपर उसकी पीठ पर.. वैशाली की स्किन गर्म और मुलायम थी.. उसने अपने होंठों से उसकी गर्दन को छुआ, और वैशाली ने आँखें बंद कर लीं..

"तुम कितनी हॉट हो यार..." पिंटू फुसफुसाया..

वैशाली ने एक हल्की सी आह भरी.. "हमेशा से हूँ, तुम्हें तो पता ही है.."

पिंटू का दिल तेजी से धड़कने लगा.. उसने अपना हाथ आगे बढ़ाया और वैशाली के भरे हुए स्तनों को छुआ.. वैशाली ने अपनी आँखें बंद रखीं, लेकिन उसके होठों पर एक हल्की सी मुस्कान आ गई..

"तुम्हारा... तुम्हारा ये हिस्सा मुझे हमेशा से पागल कर देता है," पिंटू बड़बड़ाया..






वैशाली ने अब खुलकर जवाब दिया.. उसने पिंटू का हाथ पकड़ा और उसे अपने स्तनों पर दबाया.. "तो फिर इंतज़ार क्यों कर रहे हो?"

पिंटू ने उसके निप्पल्स को अंगुलियों के बीच लेकर हल्का सा दबाया.. वैशाली ने एक गहरी सांस ली और अपने सिर को पीछे झुका लिया.. उसकी छाती उठी-गिरी, और पिंटू ने अपने होठों से उसके दूसरे स्तन को ढक लिया..

वैशाली ने अपनी उंगलियों से पिंटू के बालों में घुमोड़ लिया.. "और... और जोर से.."

पिंटू ने उसकी डिमांड को फॉलो किया.. वह अब पूरी तरह से उत्तेजित हो चुका था.. उसने वैशाली को पीछे धकेलते हुए उसकी नाइटी को ऊपर खींचा.. वैशाली की गोल हिप्स और टाइट पेट सामने आ गए.. पिंटू ने अपना हाथ उसकी जांघों पर फेरा, फिर अंदर की तरफ बढ़ा..

वैशाली ने अपनी आँखें बंद कर लीं, उसकी सांसें तेज हो गईं.. "हाँ... वहाँ..."

पिंटू ने महसूस किया कि वैशाली पहले से ही गीली थी.. उसने एक उंगली अंदर डाली, और वैशाली ने एक तीखी आह भरी.. "अरे बाप रे... तुम तो पहले से ही..."






वैशाली ने उसकी तरफ देखा, उसकी आँखों में आग थी.. "दो हफ्ते से इंतज़ार कर रही हूँ, पिंटू.. दो हफ्ते!"

पिंटू ने अपनी उंगलियों की गति तेज कर दी.. वैशाली ने अपने होंठ दबा लिए, लेकिन फिर भी उसके मुँह से छोटी-छोटी आवाज़ें निकल रही थीं..

"आज तो मैं तुम्हारी सारी हसरतें पूरी कर दूंगा" पिंटू फुसफुसाया

वैशाली ने सिर हिलाया.. "तो करो ना.. रोका किसने है?"

पिंटू ने अपनी पैंट उतारी.. उसका दिल धड़क रहा था.. मन ही मन वह सोच रहा था "प्लीज, आज हिम्मत मत हारना.." उसने खुद को वैशाली के बीच में पोजिशन किया.. वैशाली ने अपनी जांघें फैला दीं, उसकी आँखों में इंतज़ार झलक रहा था..

पिंटू ने धीरे से अपना लंड वैशाली की गीली चूत में प्रवेश करने की कोशिश की.. वैशाली ने एक झटका महसूस किया और उसने अपनी आँखें बंद कर लीं.. "हाँ... ऐसे ही..."

लेकिन तभी..!!

पिंटू ने महसूस किया कि उसका खड़ा हुआ लंड धीरे-धीरे ढीला पड़ रहा था.. उसने जल्दी से और जोर लगाया, लेकिन कुछ नहीं हुआ.. वह पूरी तरह नर्म हो चुका था..उसने आनन-फानन में धक्के लगाने की निरर्थक कोशिश की.. पर ढीला पड़ चुका उसका हथियार, अंदर घुसने की बजाए, बाहर ही पिचक गया..!!

वैशाली ने आँखें खोलीं.. "क्या हुआ?"

पिंटू का चेहरा लाल हो गया.. "मैं...मुझे... पता नहीं यार..!!!"

वैशाली ने नीचे देखा और फिर पिंटू की तरफ घूरा.. "फिर से? यार, प्लीज ओर थोड़ा ट्राय तो कर"

पिंटू ने खुद को पीछे खींच लिया.. "माफ करना, वैशाली... मैं.. मैं कोशिश कर रहा हूँ"

"बस बंद करो!" वैशाली ने गुस्से में चिल्लाते हुए बिस्तर से उठकर खड़ी हो गई.. "मैं अब तंग आ गई हूँ पिंटू..!!"

पिंटू ने अपना सिर पकड़ लिया.. "मैं ट्राई तो कर रहा हूँ ना यार.."

"कोशिश? कोशिश वो होती है जब तुम डॉक्टर के पास जाते! लेकिन नहीं, तुम्हें तो अपनी मर्दानगी का घमंड है!" वैशाली ने अपनी पेन्टी और नाइटी पहन कर.. गुस्से में कमरे में चहलकदमी शुरू कर दी..

पिंटू ने गुस्से में अपनी मुट्ठी बिस्तर पर मारी.. "तुम्हें क्या लगता है.. मैं जानबूझकर ऐसा कर रहा हूँ? मैं भी तो तड़प रहा हूँ!"

"हाँ, जरूर!" वैशाली ने व्यंग्य किया.. "मेरी हालत देख रहे हो? मैं क्या करूँ अब? हर रात सपने देखती हूँ, और तुम..!!! अंदर डाला नहीं की फुस्स..!!"

"बस!" पिंटू ने जोर से चिल्ला दिया.. "बंद करो ये सब! मैं जानता हूँ मैं फेल हो रहा हूँ, बार बार मुझे कहकर जताने की कोई जरूरत नहीं है!"

वैशाली ने एक पल के लिए चुप्पी साधी, फिर आँसू भरी आँखों से बोली, "तो फिर कुछ करो.. नहीं तो..." उसने वाक्य पूरा नहीं किया, लेकिन पिंटू को समझ आ गया..

वह दरवाज़े की तरफ बढ़ी और कमरे से बाहर निकल गई..


पिंटू अकेला रह गया, अपनी हार और नपुंसकता के साथ.. उसने अपना सिर हाथों में ले लिया.. "क्या करूँ मैं अब..!!"

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एक जबरदस्त संभोग-सभर रात्री के बाद की सुबह, राजेश, मदन, शीला और फाल्गुनी के बीच चुदाई का दौर एक बार फिर से शुरू हो गया.. इस सत्र में विराम तब हुआ जब फाल्गुनी घर जाने के लिए निकली..

इस तरफ, अपनी माँ के घर आई हुई मौसम जब सुबह उठी तब अपने बेडरूम का दरवाजा बंद पाकर ताज्जुब में पड़ गई.. काफी खटखटाने के बाद जब नौकर ने दरवाजा खोला तब वह उसपर भड़क गई.. पोंछा लगाने का बहाना देकर नौकर वहाँ से निकल लिया.. मौसम के ऑफिस निकलने के बाद मौसम की माँ रमिलाबहन ने नौकर से पूछकर तसल्ली की.. कहीं मौसम को कुछ भनक तो नहीं लगी.. उनके अंतरंग संबंधों के बारे में..

इस तरफ, पूरे दिन के काम से निपटकर, वैशाली अपने घर के बाथरूम में शावर लेते हुए कामुक विचारधारा में लिप्त थी.. उसका बदन वासना से तप रहा था.. बिस्तर पर पिंटू के आते ही, दोनों एक दूसरे से लिपट कर संभोग की शुरुआत कर ही रहे थे की तभी.. पिंटू के लंड ने पिछली बार की तरह जवाब दे दिया और अपना कडापन छोड़ दिया.. वैशाली फिर प्यासी रह गई.. वह पिंटू पर भड़क गई.. और पिंटू निराश बैठा रहा

अब आगे...

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फाल्गुनी अब शीला-मदन के पड़ोस में शिफ्ट हो चुकी थी.. और अब उसने राजेश की कंपनी भी जॉइन कर ली थी.. पर जैसा मदन और शीला का अनुमान था.. वैसा समूह चुदाई का मौका अब तक नसीब नहीं हुआ था.. चूंकि पिंटू अब राजेश की ऑफिस छोड़ चुका था.. और वह राजेश का आधे से ज्यादा कार्यभार संभाले हुए था.. राजेश काम के बोझ के तले ऐसा दबा हुआ था की फाल्गुनी का इस्तेमाल चुदाई के बजाय.. काम सिखाने के लिए करने में ही गनीमत समझी..

पूरे दिन काम के बाद.. राजेश फाल्गुनी के साथ देर तक ऑफिस बैठा रहता रहता था.. पर उसकी प्राथमिकता काम सिखाने की ही रहती थी.. हाँ, उस दौरान थोड़ी बहोत चुम्मा-चाटी और हल्का सा फॉरप्ले जरूर कर लेते थे.. पर उससे अधिक कुछ भी नहीं..!! राजेश एक मँझा हुआ बिजनेसमेन था.. चुदाई के चक्कर में अपने बिजनेस की बलि चढ़ाने वालों में से नहीं..!! यहाँ तक की रविवार के दिन भी फाल्गुनी राजेश के साथ रात तक ऑफिस में रहती थी

शीला और मदन इंतज़ार करते रहते पर फाल्गुनी बहोत देर से आती.. कुछ दिनों शीला ने उसे नाश्ते के लिए घर पर भी बुलाया.. तब फाल्गुनी ने उन्हें बताया की काम की चक्कर में कैसी लगी पड़ी थी.. और राजेश के साथ भी उसका खास कुछ हो नहीं पा रहा था.. पर फाल्गुनी भी नया काम सीखने के लिए उत्साहित थी और उसने आश्वासन दिया की जल्द ही वो चारों साथ मजे कर पाएंगे

कुछ दिनों बाद... मदन ने राजेश को फोन किया

मदन: "भाई.. तूने तो मुझे कुएं में उतारकर रस्सी ही काट ली"

राजेश ने हँसकर बोला "क्यों.. क्या हुआ भाई?"

मदन ने परेशान स्वर में कहा "शाणा मत बन यार.. फाल्गुनी को यहाँ लेकर तो आया.. पर पूरा दिन तू उसे ऑफिस में ही दबोचे रखता है..!! हमारे बीच वो जो तय हुआ था, उसका क्या हुआ??"

एक लंबी सांस लेकर राजेश ने कहा "यार मदन.. तू तो जानता है... पिंटू को जाने के बाद मेरी ऑफिस का हाल खराब है.. पूरा काम वही देखता था तभी तो मैं वहाँ आराम से फाल्गुनी के साथ पड़ा रहता था..!! पिंटू के भले के लिए मैंने उसे जाने दिया.. पर यहाँ मेरा हाल बेहाल हो गया.. अब फाल्गुनी यहाँ आई है तो उसे काम तो सिखाना पड़ेगा ना..!!"

मदन: "वो बात तो ठीक है यार पर... कुछ तो जुगाड़ कर..!! तू वहाँ फाल्गुनी को देर तक ऑफिस में रोके रखता है.. तो तेरा तो बंदोबस्त हो जाता होगा.. पर मेरा क्या..!!"

राजेश: "मेरा यकीन कर मदन.. यहाँ ऑफिस में भी हम कुछ नहीं कर पाते..!! इतने समय से मैं तेरे घर भी कहाँ आ पाया हूँ..!!"

मदन: "यार पता नहीं.. कुछ मज़ा नहीं आ रहा"

राजेश: "धीरज धर.. कुछ ही दिनों की बात है.. फाल्गुनी अब लगभग सारा काम सीख चुकी है.. हम लोग जल्द ही मिलेंगे"

मदन: "ठीक है"

कहकर उसने फोन काट दिया.. मदन ने एक गहरी सांस ली और सोच में पड़ गया..

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कुछ दिनों बाद जब मदन और शीला मॉर्निंग वॉक के लिए नजदीक के बगीचे में गए तब वहाँ उन्हें जॉगिंग करते हुए फाल्गुनी दिख गई.. आज उसकी जवानी कसे हुए टॉप और शॉर्ट्स में गजब ढा रही थी.. उसके टॉप का गला कुछ ज्यादा ही खुला था, जिससे उसके भरपूर वक्ष लुभा रहे थे.. शायद वो अपनी टांगों की वैक्सिंग भी करके आयी थी, इसलिए उसकी त्वचा भी चमक रही थी.. पसीने से तर होकर उसकी टीशर्ट छाती से चिपक गई और अंदर स्पोर्ट्स ब्रा पहनी होने के बावजूद उसकी निप्पल का आकार स्पष्ट नजर आ रहा था.. परिश्रम के कारण वह हांफ रही थी और उसकी ऊपर नीचे हो रही छाती को मदन लालच भरी नज़रों से देख रहा था..






फाल्गुनी उन दोनों को देखकर मुस्कुराई और उनके करीब आई..

शीला: "क्या बात है फाल्गुनी.. फिट्नेस का बड़ा ही ध्यान रखा जा रहा है..!!" उसने एक नजर इस अप्सरा सी सुंदर फाल्गुनी के कमसिन बदन को देखा..

रुमाल से अपना पसीना पोंछते हुए फाल्गुनी ने जवाब दिया "हाँ शीला भाभी.. खयाल तो रखना ही पड़ता है.. वरना पेट के इर्दगिर्द चर्बी जमने में कहाँ देर लगती है..!!" शीला की गदराई कमर की ओर देखते हुए उसने कहा.. फाल्गुनी मदन को अंकल कहती थी और शीला को भाभी.. यह शीला को भी पसंद था






शीला मुस्कुराई और बोली "एक बार तेरी शादी और दो-तीन बच्चे हो जाने दे.. फिर हम बात करेंगे"

फाल्गुनी ने हँसकर कहा "इसीलिए तो मुझे वो सब जमेले में पड़ना नहीं है.. मैं जैसी हूँ वैसी ही खुश हूँ"

कब से फाल्गुन के सुंदर स्तनों को टकटकी लगाकर देख रहे मदन को ऐसा महसूस होने लगा जैसे वह इस संवाद का हिस्सा था ही नहीं..!! फार्महाउस पर जिस कदर उसने फाल्गुनी के साथ भरपूर संभोग किया था.. उस रात से लेकर आज तक वह हर रात उसके जिस्म को फिर से भोगने के सपने देखता रहा था.. अब राजेश की ऑफिस के चक्कर में फाल्गुनी पड़ोस में होने के बावजूद मिल नहीं पा रही थी और इस बात से काफी परेशान था वो.. फाल्गुनी के यहाँ शिफ्ट होने के बाद उसने आज फाल्गुनी को पहली ही बार देखा था

मदन: "काफी दिनों बाद दिखी फाल्गुनी..!!"

फाल्गुनी ने कहा "हाँ अंकल.. इतने दिन तो बस काम सीखने में ही चले गए.. काम नया है और यह मेरी पहली जॉब है इसलिए.. थोड़ा ज्यादा ही टाइम हो गया.. अब देखिए ना.. पिछले एक महीने में यह पहला संडे है जो मुझे छुट्टी मिली है.. तो आज जॉगिंग करने आ गई" खुले हुए टॉप के बीच से नजर आ रही दो स्तनों के बीच की दरार पर मदन की टिकी हुई नजर से थोड़ी अस्वस्थ हो गई फाल्गुनी.. वैसे तो वह बिना कपड़ों के पूरी रात चुद चुकी थी मदन से.. पर शायद तब वह शराब के नशे में थी इसलिए ज्यादा हिचक नहीं हुई थी..

मदन ने फाल्गुनी की कमर पर हाथ रखते हुए कहा "आज क्या कर रही हो फिर?? फ्री हो तो आ जाओ घर पर" शैतानी मुस्कान के साथ मदन ने आँख मारते हुए कहा.. फाल्गुनी ने शरमाकर नजरें झुका ली

शीला: "हाँ फाल्गुनी.. अच्छा आइडिया है.. यार तू घर जाकर फ्रेश होकर आजा.. आज पूरा दिन साथ रहेंगे.. मज़ा आएगा.. राजेश को भी बुला लेते है.. क्या खयाल है..!!"

फाल्गुनी: "उनके घर मेहमान आए हुए है.. वो तो आज बीजी होंगे"

मदन: "कोई बात नहीं.. हम दोनों तो है ही.. मज़ा आएगा"

फाल्गुनी ने कुछ देर सोचा.. शायद वो अब भी हिचक रही थी "दरअसल आज बहोत दिनों के बाद जॉगिंग की तो पूरा शरीर दर्द कर रहा है.. तो सोचा है की थोड़ा आराम कर लेती हूँ आज के दिन"

मदन: "मैं तुझे ऐसा मसाज दूंगा की सारा दर्द गायब हो जाएगा..!!"

शीला: "हाँ फाल्गुनी.. और वैसे भी एकाद मस्त राउंड हो जाएँ तो सारी थकान उतर ही जाती है.. और उससे पहले मदन तुझे मसाज भी कर देगा.. एक-दो ड्रिंक्स भी लेंगे.. फिर मूड होगा तो घर पर कुछ बनाएंगे या बाहर से ऑर्डर कर लेंगे"

अब फाल्गुनी के पास बचने के और कोई रास्ता नहीं था

फाल्गुनी: "ठीक है.. मैं घर जाकर थोड़ा फ्रेश होकर आती हूँ.. पूरे कपड़े पसीने से भीग चुके है"

शीला: "ओके.. हम भी लौट ही रहे थे.. चलो साथ चलते है"

साथ चलते वक्त एक दो बार मदन का हाथ फाल्गुनी की गदराई हुई गांड पर और तंग वक्षों को लग गया था.. इन सब बातों के कारण मदन की शॉर्ट्स में उसका कड़क हथियार तम्बू बनकर खड़ा हो गया था..

घर पहुंचते ही मदन ने अपनी अन्डरवेर को छोड़कर बाकी सारे कपड़े उतार दिए.. शीला ने भी अपने सारे कपड़े उतारकर गाउन पहन लिया..

कुछ ही देर में दरवाजे पर दस्तक हुई और मदन ने फट से दरवाजा खोला.. सामने फाल्गुनी खड़ी थी.. उसे अंदर लेकर मदन ने दरवाजा बंद किया और उससे लिपट पड़ा.. थोड़ी देर एक असहजता के बाद फाल्गुनी ने भी रिस्पॉन्स देना शुरू कर दिया..

किचन से बाहर आई शीला ने कहा "तुम दोनों तो अभी से शुरू हो गए.. तुम्हें मसाज नहीं करवाना क्या फाल्गुनी"

यह सुनते ही मदन ने फाल्गुनी को आलिंगन से मुक्त किया..

मदन: "मैंने कब मना किया..!! यह तो मसाज से पहले उसको थोड़ा वॉर्म-अप कर रहा था"

शीला ने शरारती अंदाज में कहा "सब समझती हूँ तेरा वॉर्म-अप.. अभी मैं नहीं आई होती तो तू शुरू हो जाता... चल फाल्गुनी अंदर बेडरूम मे..!!"

फाल्गुनी मुस्कुराते हुए शीला के पीछे बेडरूम में गई और उनके साथ साथ मदन भी अंदर गया..

शीला ने डबल बेड पर पहले ही चद्दर बिछा रखी थी ताकि मसाज के कारण बेड गंदा न हो.. फाल्गुनी को पता नहीं चल रहा था की आगे क्या करे इसलिए वह बिना कुछ बोलें शीला की ओर देखने लगी

शीला: "क्या सोच रही है..!!! मसाज नहीं करवाना क्या..!! चल.. कपड़े उतार दे..!!"

जाँघिया पहने खड़ा मदन अपने लंड को मसलते हुए फाल्गुनी की निर्वस्त्र काया को देखने के लिए उतावला हो रहा था.. फाल्गुनी एक पल के लिए रुकी और फिर उसने अपनी टी-शर्ट उतारना शुरू किया.. दुकान का शटर खुलते ही जैसे अंदर रखा माल नजर आता है वैसे ही टी-शर्ट उठते ही फाल्गुनी के ब्रा में कैद सूडोल स्तन नजर आने लगे.. एक ही पल में उसने शॉर्ट्स भी उतार दी..






इसके बाद फाल्गुनी अपने संगमरमर से बदन पर सिर्फ गुलाबी रंग की ब्रा और पेन्टी पहन कर बेड पर पेट के बल लेट गई.. उसका गदराया हुआ मस्त बदन देखकर शीला भी झूम उठी.. इतनी हॉट और सेक्सी लड़की के साथ फिर से मस्ती के ख्याल से शीला भी उत्तेजित हो गई.. उसकी चूत मे भी गीलापन महसूस होने लगा..





शीला ने फाल्गुनी की ब्रा का हुक खोल दिया और दोनों पट्टे बाजू में हटा दिए.. अब उसके पूरे बदन पर केवल छोटी सी पेन्टी ही थी.. शीला ने मदन के हाथो में तेल लगाकर उसके हाथ फाल्गुनी की नंगी पीठ पर रख दिए.. वो अब फाल्गुनी की पीठ को मालिश करने लग गया.. जैसे ही मदन के हाथों ने उसके तन को छुआ, फाल्गुनी कसमसाने लगी.. उसकी मुलायम काया को मसलने से उसका औजार और भी सख्त हो गया.. अब किसी भी बात की परवाह किये बगैर मदन ने अपनी अन्डरवेर उतार दी और अपने तने हुए लौड़े को आज़ाद किया.. पूर्ण रूप से नंगे मदन को सिर्फ पेन्टी पहनकर लेटी हुई कामसुन्दरी फाल्गुनी की मालिश करते हुए देखना किसी पोर्न फिल्म से कम नहीं था..





दूसरी और से शीला भी उसकी मुलायम पीठ को सहलाने लगी.. मालिश करते करते मदन का हाथ अक्सर नीचे फाल्गुनी की गांड पर चला जाता था.. मालिश करते करते कई बार उसके हाथ फाल्गुनी की पेन्टी में घुस गए.. शीला को पता था की मदन को फाल्गुनी की गांड भी मसलना था.. जब जब मदन का हाथ फाल्गुनी की पेन्टी में घुसता, वो एक मादक सिसकारी भर लेती थी.. एक बार भी उसने मदन को रोकने के लिए भी नहीं कहा.. कई बार जब मदन मालिश के लिए खड़े रहने की जगह बदलता, तब उसके कड़क लंड का स्पर्श फाल्गुनी के शरीर को हो जाता.. हर बार वो रोमांच से काँप उठती थी..

"क्या फाल्गुनी मालिश अच्छी लग रही हैं न?" शीला ने मुस्कुराते हुए पूंछा..

"हाँ भाभी, बदन एकदम हल्का सा लग रहा हैं, और बहुत मजा आ रहा हैं.."

"हाँ, मज़ा तो मालिश करने वाले को भी बड़ा आ रहा हैं," शीला ने व्यंग कसते हुए कहा..

मदन ने अपने हाथ फाल्गुनी की भरी हुई, मांसल और पुष्ट जाँघों पर रखा और वो शीला के साथ मिलकर जाँघों की मालिश करने लगे.. मदन का हाथ पेन्टी के नीचे के हिस्से से अंदर घुसने लगा.. फिर वही सिसकारियां और फिर वही मदन का फाल्गुनी के सेक्सी शरीर को सलामी देता हुआ लंड.. इस सारे माहौल से उत्तेजित होने से शीला की चूत भी पूरी तरह गीली हो गई..

मदन को फाल्गुनी की पिण्डलियों की मालिश में लगाकर शीला ने अपने दोनों हाथ फाल्गुनी की पेन्टी में घुसा दिए.. शीला उसके गोल मटोल चूतडों को मसलने लगी.. फाल्गुनी की उत्तेजना अपनी चरम सीमा पर थी..






अब बिना संकोच किये वह बोल उठी, "आह, भाभी कितना मज़ा आ रहा हैं.. आप कितनी प्यारी हो और कितना अच्छा मसाज कर रही हो.. आह, आह, फक.."

शीला ने उसकी पेन्टी निकाल कर उसके घुट्नों तक नीचे कर दी और पूरी ताकत से उसकी गांड को मसलने लगी.. जैसे ही शीला उस पर झुकती, उसके बड़े बड़े बबले उस पर दब जाते.. फिर शीला को भी मस्ती चढ़ने लगी और शीला ने मदन के दोनों हाथ फाल्गुनी की गांड पर रख दिए और शीला खुद थोड़ा पीछे हट गई.. मदन पूरी लगन से उन भरे हुए नितम्बोँ को मसलता गया.. बीच बीच में मदन की उंगलिया फाल्गुनी के योनि को भी स्पर्श कर रही थी.. फाल्गुनी को भी समझ में आ गया की ये मर्द के मजबूत हाथ उसकी गांड को मसल रहे थे और वह शीला के हाथों का स्पर्श नहीं था..

"फाल्गुनी, अब मदन के बलिष्ठ हाथ की सुपर हॉट मालिश का मज़ा लो.. हाय , कितना सेक्सी हैं यह नज़ारा," शीला ने कहा और फाल्गुनी के सर को प्यार से सहलाने लगी..

"ओह अंकल, कितना अच्छा मसल रहे हो आप, ओह माय गॉड, यस, ओह फक, आह, आह," फाल्गुनी को खुद को पता नहीं चल रहा था की वो क्या बोल रही थी..

शीला को यकीन था की उसकी चुत भी योनिरस से पूरी तरह गीली हो गई होगी.. आखिर मदन ने उन मस्त चूतड़ों पर से अपने हाथ हटा दिए.. मालिश पूरी हो गई थी..या यूं कहिए के मदन से अब रहा नहीं जा रहा था..

फाल्गुनी ने उठ कर अपनी पेन्टी पहन ली और ब्रा को अच्छे से बाँध लिया फिर शीला के गले लग गई.. दोनों पसीने से और गीली चूत से लबालब थी.. बिना संकोच शीला ने उसके होठों पर अपने होठ रख दिए.. उसने भी शीला के चुम्बन का स्वीकार किया और दो मिनट तक दोनों एक दूजे के होठों को चूसती रही.. अब वह शीला की बाहों से निकल कर मदन की तरफ मुड़ गई..






शीला को कुछ समझ में आये इसके पहले उसने मदन को बाहों में भर लिया.. उसकी कठोर अमरूद जैसी चूचिया मदन की छाती पर दबने लगी.. मदन ने फाल्गुनी को जबरदस्त किस किया और वो भी अपनी जीभ से उसका मुँह-तोड़ जवाब देने लगी.. मदन के हाथ फाल्गुनी की पीठ और गांड को सहलाते हुए उसकी चूचियों पर चले गए.. शीला ने मदन को पीछे से आलिंगन दिया.. अब उसकी छाती को फाल्गुनी के स्तनों का और पीठ को शीला के विशाल पुष्ट स्तनों का स्पर्श मिल रहा था..

फाल्गुनी के इस अंदाज से मदन और भी पागल हो गया.. उसने झट से उसकी ब्रा का हुक खोला और ब्रा को उसके शरीर निकल कर जमीन पर फेंका.. फाल्गुनी के नीचे लिटाकर मदन उसकी चूचिया बारी बारी चूसने लगा.. शीला ने भी अपने कपडे उतारे और मदन का तगड़ा लौड़ा मुँह में लेकर चूसने लगी.. मदन ने फाल्गुनी की पेन्टी निकाल दी और उसकी गीली चूत चाटने लगा.. शीला ने फाल्गुनी के भरे हुए स्तनों को चाटना और उसके निप्पल्स को चूसना शुरू किया..








"ओह भाभी, आप दोनों कितने सेक्सी हो.. ऐसी मालिश कर दी की मैं एकदम हॉट हो गई हूँ.... अब तो हम तीनो एक साथ सेक्स करेंगे.. अंकल, ऐसे ही चाटते रहिए.. आह आह, फक, आय ऍम सो फकिंग हॉर्नी.."

"फाल्गुनी डार्लिंग, क्या मीठी मीठी चूत हैं तेरी, और कितना ज्यूस निकलते जा रहा हैं," फाल्गुनी की चूत चाटते हुए और दो उंगलियों से चोदते हुए मदन ने कहा..






मदन ने फाल्गुनी की जाँघे और फैलाकर अब तीन उंगलिया घुसेड़ने लगा.. योनि रस से भरी उंगलिया चाट कर और भी जोर लगाकर चाटने और चोदने लगा..

"क्या मस्त माल हैं तू फाल्गुनी, चल अब तू मेरी चूत चाट," कहकर शीला उसके मुँह पर अपनी गीली चूत लगाकर बैठ गई.. मालिश के बाद वह तीनो इतने गर्म हो गए थे की हर कोई कुछ भी करने को तैयार था.. फाल्गुनी शीला की चूत को चाटते हुए योनि से निकलता पानी निगलती गई.. फिर उसने शीला का क्लिटोरिस का दाना मुँह में लिया और उसे चूसती गई.. शीला को जल्द ही एक ज़बरदस्त ऑर्गजम आया.. शीला की चूत के रस से फाल्गुनी का पूरा मुंह भर गया..






मदन से अब सब्र नहीं हो रहा था, उसने फाल्गुनी की टाँगे खोली.. अपने लंड का सुपाड़ा उसकी कसी हुई बुर के छेद पर रखा और एक मस्त धक्का लगाते हुए उसे चोदने लगा.. शीला फाल्गुनी के स्तनों को चूसती और उसके निप्पल्स को हलके से काटते गई..

मदन फाल्गुनी को मिशनरी स्टाइल में पूरी ताकत लगाकर चोद रहा था.. फाल्गुनी के मुँह से सिसकारियां और आंखों से ख़ुशी के आंसू छलक रहे थे.. मदन का एक नयी लड़की के साथ भरपूर सम्भोग का सपना साकार हो रहा था..






"चल फाल्गुनी, अब कुतिया बन जा, तुझे डॉगी स्टाइल में पीछे से चोदता हूँ," कहकर मदन उसके बदन पर से उठा.. शीला ने मदन को बाहों में लेकर किस किया और पूंछा, "अब तो खुश हो न तुम मदन?"

"हां शीला, इसको चोदने के बाद तुम को चोदना है.. मज़ा आ रहा है आज तो.. जब मैं तुम्हे चोदना शुरू करूंगा तब ये सेक्सी फाल्गुनी तुम्हारी चूचियों को चूसेगी.."

फाल्गुनी अब डॉगी पोज में आ गई और एक ही झटके में मदन का लम्बा चौड़ा लंड उसकी चूत में धक्के मारने लगा.. शीला फाल्गुनी की गांड, स्तनों और जांघों को सहलाती रही.. फिर शीला ने मदन और फाल्गुनी दोनों को बिस्तर के नीचले हिस्से में जाने को कहा.. शीला ऊपर के हिस्से में पीठ के बल लेट गई और फाल्गुनी का मुँह अपने भोसड़े से सटा दिया..






अब फाल्गुनी शीला की चूत चाटकर बहता हुआ पानी पी रही थी और शीला आँखें मूंदकर आनंद लेने लगी.. करीब पंद्रह मिनट तक मदन डॉगी स्टाइल में चोद कर फाल्गुनी को स्वर्ग का सुख धरती पर ही दे रहा था.. जैसे ही मदन झड़ने को हुआ, उसने चूत से लौड़ा निकाल दिया.. फिर सारा वीर्य फाल्गुनी के मुँह में गिरा दिया.. इतना सारा और इतना गाढ़ा वीर्य निकला की काफी सारा उसके होठों से बाहर उसके गालों, बूब्स पर और जाँघों पर गिरा.. शीला ने फाल्गुनी को नीचे लिटाया और उसके शरीर पे से सारा वीर्य चाट चाट कर पी गई..

दस मिनट के विश्राम के बाद मदन ने शीला की पलंगतोड़ चुदाइ की.. उस दौरान फाल्गुनी अपनी चूत शीला से चटवाती रही..

करीब दो घंटों तक मदन ने उन दोनों को एक और बार भरपूर सुख का अहसास दिया..

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पीयूष मुंबई गया हुआ था इसलिए आज ऑफिस में आरामदेह और मस्ती भरा माहोल था.. जब बॉस बाहर हो तब अमूमन ऐसा ही होता है.. हालांकि मौसम जरूर मौजूद थी पर वह ज्यादातर बेंगलोर वाली ऑफिस का काम संभालती थी इसलिए यहाँ के कर्मचारियों पर उसका उतना प्रभाव नहीं था.. और मौसम आज ज्यादा काम करने के मूड में थी भी नहीं..

पीयूष की केबिन के बगल में बने ऑफिस में वो आराम से कुर्सी से पीठ सटाकर झूल रही थी.. ढीला सा टॉप और टाइट ब्लू जीन्स पहने हुए गोरी चीट्टी मौसम, अब पहले के मुकाबले अधिक तंदूरस्त नजर आ रही थी.. उसके दिमाग में कुछ विचार आया और तुरंत इंटरकॉम फोन उठाकर उसने वैशाली का एक्सटेंशन डायल किया..

वैशाली ने फोन उठाते ही बड़ी ही अदब के साथ जवाब दिया "यस मेडम..!!"

सुनकर ही मौसम की हंसी छूट गई "क्या यार..!! मैडम मैडम लगा रखा है..!! क्या कर रही है?"

मुस्कुराकर वैशाली ने जवाब दिया "बस वही.. पिछले कंसाइनमेंट का क्वालिटी चेक हुआ की नहीं, वही फेक्टरी वालों से बात कर रही थी.. सर के वापिस आने से पहले मुझे वह काम खत्म करना है.."

मौसम: "वो सब छोड़.. काम तो होता रहेगा.. तू अंदर आजा, बैठकर गप्पे लड़ाते है.. आज कुछ काम करने का मन नहीं है.."

वैशाली: "बस एक दो फोन कर लू फिर आती हूँ"

मौसम: "ओके.." कहकर उसने फोन का रिसीवर रख दिया

करीब पाँच मिनट बाद.. वैशाली ने ऑफिस के दरवाजे पर दस्तक दी और अंदर चली आई.. आरामदायक कुर्सी पर झूल रही मौसम की सामने वाली कुर्सी पर जा बैठी

मौसम ने दोस्ताना अंदाज में पूछा "क्या चल रहा है यार..!!"

वैशाली: "सब ठीक.. तू बता.. बेंगलोर कैसा है? और क्या चल रहा है विशाल के साथ? मजे कर रही होगी तू तो..!!"

विशाल का नाम सुनकर एक पल के लिए मौसम का चेहरा मुरझा गया पर उसने तुरंत अपने आप को संभाल लिया..

मौसम: "बस यार.. चल रही है ज़िंदगी.. बेंगलोर वैसे सीटी तो अच्छा है.. पर वहाँ का ट्राफिक, बाप रे बाप!! इंसान पैदल जल्दी पहुँच जाए.. मैं तो ऑफिस के अलावा कहीं जाना हो तो मेट्रो ही इस्तेमाल करती हूँ.. हाँ क्लाइमेट काफी अच्छा है.. यहाँ के मुकाबले गर्मी भी कम है..!!"

वैशाली ने मस्ती भरी मुस्कान के साथ कहा "बाहर गर्मी कम होगी पर बेडरूम में तो गर्मी जबरदस्त हो जाती होगी.. हैं ना..!!"

मौसम की नजरें एक पल के लिए झुक गई.. बात बदलने के इरादे से उसने पूछा "तेरा कैसा चल रहा है पिंटू के साथ?"

वैशाली एक पल के लिए रुकी और फिर बोली "सब ठीक ही चल रहा है.. अभी तो महीने के आधे दिन वो यहाँ और बेंगलोर के बीच अप-डाउन करता रहता है"

मौसम: "यार.. तेरी साइज़ तो पहले के मुकाबले बड़ी हो गई.. पिंटू दोनों हाथों से भी नहीं रौंद पाता होगा इन्हें" वैशाली के बड़े बड़े स्तनों की ओर इशारा करते हुए उसने कहा

वैशाली: "बड़े तो तेरे भी हो गए है.. आटे की तरह गूँदता है क्या विशाल तेरे?? ही ही ही" ठहाका मारते हुए उसने कहा

मौसम ने नजरें फेर ली.. और कुर्सी पर सिर टीकाकर छत की ओर देखती रही.. करीब एक दो मिनट तक उसने कुछ जवाब नहीं दिया.. वैशाली भी चुपचाप उसे तांकती रही..!! एक अजीब सा तनाव था दोनों के मन में.. अपनी अपनी ज़िंदगियों को लेकर.. पर दोनों बताने से कतरा रही थी.. पता तो दोनों ही को था पर जाहीर नहीं कर पा रही थी

केबिन का माहोल थोड़ा गमगीन और भारी भारी सा महसूस होने लगा था..

एक लंबी सांस लेकर मौसम ने कहा "चल वैशाली.. कहीं बाहर चलकर बात करते है.. यहाँ मुझे घुटन सी हो रही है..!!"

"अभी?? ऑफिस के टाइम कहाँ बाहर जाएंगे?" वैशाली ने चोंककर कहा..

"तू ऑफिस की चिंता छोड़.. और कोई अच्छी सी जगह बता.. कोई रेस्टोरेंट या कैफै.. जहां इत्मीनान से बातें कर सकें" मौसम ने कुर्सी से उठते हुए कहा

"एक नया कैफै खुला तो है.. मैंने अभी अभी इंस्टाग्राम की रील्स में देखा था.. देखने मे तो जगह बहुत ही जबरदस्त है.. मैं कब से कह रही थी पिंटू को.. की एक बार चलते है.. पर उसे टाइम ही कहाँ मिलता है..!!" वैशाली ने जवाब दिया

वैशाली का हाथ पकड़कर उसे खड़ा करते हुए मौसम ने कहा "बस तो तय रहा.. वहीं चलते है.. मैं कार निकालती हूँ.. तू अपना सामान समेट कर आजा.. फिर वहाँ से मैं तुझे सीधे तेरे घर ही ड्रॉप कर दूँगी"

अगली पाँच मिनट में मौसम अपनी मर्सिडीज गाड़ी ड्राइव कर रही थी और साथ में वैशाली थी

करीब १० मिनट की ड्राइव के बाद दोनों एक पॉश एरिया में बने आलीशान कैफै में जा पहुंचे.. दिन का समय था और व्यस्त दिन था इसलिए कैफै में उन दोनों के अलावा और कोई ग्राहक नहीं था

कोने के एक टेबल पर दोनों जा बैठे.. मौसम ने दो कॉफी और एक मँगो चीज़केक का ऑर्डर दिया..

मौसम: "हम्म.. अब खुलकर बातें हो सकती है.. बता, क्या प्रॉब्लेम है??" उसने बेझिझक पूछ लिया

इस सवाल से एकदम ही चोंक गई वैशाली.. जैसे मौसम ने उसे अनजाने में पकड़ लिया हो..!!

वैशाली: "क.. कौनसा प्रॉब्लेम? कैसा प्रॉब्लेम? तू क्या कह रही है मौसम??"

मौसम: "देखो वैशाली.. हम काफी समय से दोस्त है.. तेरे चेहरे को में अच्छे से पढ़ पाती हूँ.. शादी के बाद इतना तो मैं सीख ही गई हूँ.. जब से आई हूँ तब से देख रही हूँ.. तू अब वो पुरानी वाली वैशाली नहीं रही"

वैशाली ने झूठमुट हँसते हुए कहा "अभी तूने ही कहा ना.. शादी के बाद बदलाव आते ही है..!! वैसे मुझ में भी थोड़ा ठहराव नजर आ रहा होगा"

मौसम: "पिंटू से शादी होने से पहले भी तू शादी-शुदा ही थी.. मैं तो तब से जानती हूँ तुझे...!! और पिंटू से शादी के बाद भी मैंने तुझे कई दफा देखा है.. तू खुश ही थी.. बस इन दो-तीन महीनों में ही कुछ हुआ है.. बता न यार.. क्या गड़बड़ चल रही है?"

नजरें चुराते हुए वैशाली ने कहा "कुछ नहीं यार.. ऐसे ही थोड़ी तबीयत उन्नीस-बीस रहती है आजकल"

मौसम: "बहाने मत बना यार.. इतना करीब से जानते है हम एक दूसरे को.. ऐसा समय साथ बिताया है साथ जो कभी कभी करीबी सहेलियों के बीच भी नहीं होता.. मैंने हमेशा तुझे अपनी बड़ी बहन की तरह ही माना है.. कुछ भी छुपाया नहीं है.. फिर वो मेरे और फाल्गुनी के बीच की बात हो या जीजू के साथ.. मैंने तुझे सब बताया है.. यहाँ तक की मैंने अपनी नज़रों के सामने मेरे पापा के साथ तुझे सब कुछ करते हुए भी देखा है.. इतना सब होने के बावजूद अगर तू मुझे अपना प्रॉब्लेम बताने लायक नहीं समझती तो कोई बात नहीं" कहते हुए मौसम का चेहरा मुरझा गया

वैशाली: "यार, तू कहाँ की बात कहाँ ले जा रही है..!! तुम लोगों से जितना प्यार मिला है मुझे, उसे मैं कभी नहीं भूल सकती.. संजय के साथ जो हुआ उसके बाद से तुम सब ने मेरी बहोत मदद की थी..!!"

मौसम: "तो फिर बता.. क्या बात है?? पिंटू के साथ कोई प्रॉब्लेम.. या फिर सास तंग कर रही है?"

वैशाली: "नहीं यार.. सास-ससुर तो ठीक ही है.. ज्यादा कोई परेशानी नहीं है"

मौसम: "हम्म.. मतलब पिंटू के साथ कुछ हुआ है.. तुम दोनों वापिस झगड़ पड़े क्या?"

वैशाली ने मुंह फेरते हुए कहा "ऐसा भी नहीं है.. कुछ खास नहीं है.. थोड़ा बहोत तो चलता रहता है"

मौसम: "पर बता तो सही.. क्या चल रहा है??"

वैशाली एक पल के लिए रुकी.. लंबी सांस ली और फिर बोलना शुरू किया

"यार, शुरू में तो सब ठीक ही था.. पर पिछले एकाद महीने से पिंटू को..." कहते हुए वह रुक गई

मौसम: "क्या हुआ है पिंटू को?"

वैशाली: "यार.. कैसे बताऊँ..!! कुछ नहीं.. पर वो.. स्टार्टिंग प्रॉब्लेम हो गई है"

मौसम: "मतलब? मैं समझी नहीं..!!"

वैशाली: "यार.. इतना भी नहीं समझती.. मर्दों में स्टार्टिंग प्रॉब्लेम कौन सी होती है??"

अब मौसम के समझ में आया..!!

मौसम: "ओह्ह.. अब समझी..!! कब से हो रहा है ये??"

वैशाली: "काफी टाइम से.. एक महीने के ऊपर हो गया.."

मौसम: "तो किसी डॉक्टर को दिखा दो.. आजकल तो ये बहोत आम सी बात है"

वैशाली: "पिंटू नहीं मान रहा.. उसे कुछ कहूँ तो उसे ऐसा लगता है जैसे मैं उसकी मर्दानगी पर सवाल उठा रही हूँ"

मौसम: "कैसी बचकानी बात है..!! इस जमाने में स्ट्रेस के चलते कई मर्दों को ऐसा होता है.. मैंने इसके बारे में पढ़ा भी है.. इरेक्टाइल डिसफ़ंक्शन कहते है इसे.. दवाइयों से और कसरत से आसानी से इलाज भी हो जाता है इसका"

वैशाली: "यार, मैंने बहोत समझाने की कोशिश की पर वो मान ही नहीं रहा.. अब तो बिस्तर पर मुझसे करीब आने से भी कतराता है.. मुझे तो लगता है की इसीलिए वो ज्यादातर बेंगलोर ही चला जाता है.. पहले एक दो बार तो मुझे लगा की काम के बोझ के कारण हो रहा होगा.. पर फिर ये सिलसिला चलता ही गया.. अब तू ही बता, मैं क्या करूँ!!" निराश वैशाली की आँखें नम हो गई

मौसम ने एक गहरी सांस ली और कहा "यार, मैं तेरा प्रॉब्लेम समझ सकती हूँ.. पर ये कोई ऐसी बात नहीं है की कोई पिंटू को इस बारे में समझा सकें.. कोई उससे बात भी करेगा तो वो तुझ पर ही भड़केगा..!! कुछ नहीं यार.. थोड़ा वक्त बीतने दे, सब ठीक हो जाएगा"

वैशाली: "यार, बिना कुछ किए कैसे ठीक होगा..!! और तुझे तो पता है मेरी फितरत.!! बिना कुछ किए इतने लंबे समय तक रहना मेरे लिए बहोत मुश्किल है..पूरा दिन गंदे गंदे खयाल आते रहते है मन में..!!" वैशाली की आँखों से आँसू की एक बूंद सरककर उसके गालों पर बिखर गई

मौसम ने उसका हाथ थामते हुए कहा "चिंता मत कर यार.. सब ठीक हो जाएगा"

अपना हाथ झटकते हुए वैशाली ने थोड़े गुस्से से कहा "कैसे ठीक हो जाएगा..!! डॉक्टर के पास जाने से वो मना कर रहा है.. मेरे साथ ठीक से बात भी नहीं करता.. बेडरूम में तो ऐसे पेश आता है जैसे हम दोनों अनजान हो.. मैं ही जानती हूँ कैसे काट रही हूँ एक एक पल..!! पूरा दिन बदन तपता रहता है.. बिना सेक्स के छटपटाती रहती हूँ यार" वैशाली अब फूटफूटकर रोने लगी

मौसम उसके सिर को सहलाते हुए दिलासा देती रही.. पर उसने वैशाली को रोने दिया.. आंसुओं का बहना कोई कमजोरी नहीं, बल्कि एक मानवीय आवश्यकता है.. इससे मन हल्का हो जाता है और हमें फिर से आगे बढ़ने की शक्ति मिलती है.. अक्सर लोग किसी को रोते हुए देखकर उन्हें चुप कराने की कोशिश करते हैं, लेकिन कभी-कभी किसी को रो लेने देना ही सबसे बड़ा सहारा होता है.. इससे व्यक्ति अपने मन की बात कह पाता है और उसका बोझ कम हो जाता है..

थोड़ी देर बाद जब वैशाली शांत हुई तब मौसम ने उसे पानी का गिलास दिया जिसे पी लेने के बाद वह थोड़ी सामान्य हो गई

वैशाली: "मेरी छोड़.. अपनी सुना.. तेरी तो लाइफ सेट है यार..!! विशाल तुझे मिल गया.. बेंगलोर पहुँच गई.. खुद का बिजनेस.. और अकेले रहते हो तो मजे ही मजे..!! जिम्मेदारियों का कोई बोझ भी नहीं..!!"

मौसम वैशाली की आँखों में एकटक देखती रही.. उन शून्यमनस्क आँखों में वैशाली को छिपा हुआ दर्द महसूस हुआ.. जैसे वह भी कुछ कहना चाहती हो पर कह नहीं पा रही..

वैशाली: "तुम्हारे बीच तो सब सही चल रहा है ना..!! बेडरूम में कोई दिक्कत तो नहीं??"

मौसम मुस्कुराई "अरे नहीं नहीं.. विशाल को तो बस इशारा मिलने की देर होती है.. झपट ही पड़ता है"

वैशाली ने हँसते हुए कहा "चलो बढ़िया है.. कम से कम तेरी सेक्स लाइफ तो ठीक चल रही है"

मौसम ने जवाब नहीं दिया.. और अपने मोबाइल से खेलती रही.. जैसे कुछ बोलने से झिझक रही हो

वैशाली ने उसके हाथों से मोबाइल छीन लिया.. और बोली "अभी कुछ मिनटों पहले तो बड़ा ज्ञान दे रही थी.. दोस्ती का और करीबी होने का.. अब तेरा मुंह क्यों बंद है?? बता, क्या चल रहा है तेरी लाइफ में? भले ही तू बता नहीं रही पर पक्का कुछ बेडरूम प्रॉब्लेम ही लग रहा है मुझे"

मौसम: "ऐसा कुछ नहीं है यार.. विशाल को तो जब देखो झपटने के लिए तैयार ही रहता है.. बस मैं ही उसे करीब आने नहीं देती"

आश्चर्यचकित होकर वैशाली ने कहा "क्या?? तू ऐसा कर क्यों रही है आखिर? तू तो पहले से ही विशाल को चाहती थी.. और तेरी पसंद से ही तो शादी हुई थी.. फिर क्या हो गया? सेक्स करने का मन नहीं करता क्या अब या विशाल से मन भर गया?"

मौसम: "बात वो नहीं है यार..!! वो अब भी उस कमीनी फोरम के कॉन्टेक्ट में है"

वैशाली ने चोंककर पूछा "कौन फोरम? तेरी ऑफिस में काम करती थी वो लड़की?"

मौसम: "हाँ वही.. जिससे विशाल का चक्कर चल रहा था और आखिर विशाल ने मुझे चुना था"

स्तब्ध होकर वैशाली ने पूछा "विशाल से अब उसका क्या लेना देना? हो सकता है दोनों के बीच नॉर्मल बातचीत ही हो रही हो.. आखिर पुरानी दोस्त है उसकी.. तुझे दिल बड़ा रखना चाहिए यार"

यह सुनते ही भड़क उठी मौसम "क्या दिल बड़ा रखूँ?? और पुराने दोस्त के साथ कोई रात के तीन बजे चेट करता है?? और अगर की भी हो तो मेरे सामने विशाल ने कभी उस बात का जिक्र क्यों नहीं किया?? अगर मन में पाप न हो तो फिर बताने में क्या दिक्कत थी उसे?? वो तो मैंने जब उसे रंगेहाथों पकड़ा तब जाकर उसने एकरार किया किया..!! साला.. पूरी रात मेरी टांगों के बीच धक्के लगाता है और मेरे सो जाने के बाद उस फोरम के साथ गुटरगु करता है..!! मैंने तो साफ साफ कह दिया.. अगर वो फोरम से बात करना बंद नहीं करेगा तो मैं उसे छूने भी नहीं दूँगी"

वैशाली: "तो क्या जवाब दिया उसने?"

मौसम: "वहीं मर्दों वाली सफाई.. की दोनों के बीच कुछ नहीं है.. बस पुराने दोस्त है.. नॉर्मल बातें होती है वगैराह.. मुझे अपनी चेट दिखा रहा था.. पर व्हाट्सप्प से चेट डिलीट करना कोई मुश्किल काम नहीं है.. वो मुझे वही दिखाएगा ना जिससे मुझे कोई एतराज न हो. सब समझती हूँ"

वैशाली: "देख यार.. ऐसी छोटी छोटी बातों का पहाड़ मत बना.. यह सब तो चलता रहता है"

मौसम: "नहीं वैशाली.. मेरे लिए यह नॉर्मल नहीं है.. चाहे वो किसी के साथ सो जाए, मुझे कोई दिक्कत नहीं है.. लेकिन दिल से अगर वो किसी और का हुआ तो मुझसे बुरा कोई नहीं होगा.. तू ही बता.. कल को पिंटू ऐसा कुछ करे तो तुझे कैसा लगेगा?"

इस बात का वैशाली के पास कोई जवाब नहीं था.. वैसे उसे पूरा यकीन था की पिंटू ऐसा नहीं है पर अगर ऐसा कुछ होता तो पक्का बड़ी समस्या होती.. धीरे धीरे उसे मौसम का नजरिया समझ में आ रहा था

वैशाली: "बात तो तेरी ठीक है यार.. पर विशाल को ऐसा करने की आखिर क्या जरूरत पड़ गई!! इतनी सुंदर बीवी है उसकी.. तेरे चलते ही उसे इतना बड़ा बिजनेस मिल गया.. खुद का ऑफिस भी.. पागल है वोह अगर अब भी वो फोरम से कॉन्टेक्ट रख रहा है तो"

मौसम: "अब तक तो मैं शांति से सब सह रही हूँ.. पर अगर वो बाज नहीं आया तो उसकी अक्ल ठिकाने लगाना मुझे आता है"

वैशाली: "हाँ वो तो तू कर ही देगी"

मौसम: "छोड़ ये सब बातें.. और बता की सेक्स के मामले में अभी भी नीचे वीराना ही है या कोई जुगाड़ लगाया??"

वैशाली की आँखें झुक गई "नहीं यार.. मैं पिंटू को धोखा देना नहीं चाहती.. ये सही नहीं होगा"

मौसम: "और पिंटू जो कर रहा है वो क्या सही है??"

चोंककर वैशाली ने पूछा "क्या कर रहा है पिंटू? कहीं किसी के साथ कोई चक्कर...!!"

मौसम: "अरे वैसे नहीं यार.. पर डॉक्टर के पास जाने से मना करना भी तो सही नहीं है.. उसे भी तेरी जरूरतें समझनी चाहिए.. वो नहीं समझेगा तो कौन समझेगा?? पीयूष जीजू?"

वैशाली: "क्या कुछ भी बोल रही है.. मेरे और पीयूष के बीच अब ऐसा कुछ भी नहीं है"

मौसम: "नहीं है तो शुरू कर दे" शरारती हंसी के साथ उसने कहा

वैशाली: " ऐसा कुछ भी किया तो पिंटू को पता चलने में कितनी देर लगेगी? मैं ऐसा कोई जोखिम उठाना नहीं चाहती"

मौसम: "देख वैशाली, मैं जानती हूँ तुझे.. जिस्म की भूख तू कब तक बर्दाश्त करती रहेगी..!! कोई न कोई हल तो निकालना ही पड़ेगा.. अगर यहाँ ऑफिस में किसी के साथ करने में तुझे डर लग रहा हो तो बाहर कुछ ढूंढ ले"

वैशाली का दिमाग तेजी से चलने लगा.. शादी के बाद कभी भी उसने किसी और के बारे में सोचा तक नहीं था.. उससे पहले भी अगर किसी के साथ हुआ था वो था राजेश सर के साथ और रसिक के साथ..!! राजेश सर तो अब खुद उससे फाँसला बनाए हुए थे.. और रसिक के पास अकेले इतने दूर जाने की उसकी हिम्मत नहीं थी

वैशाली: "सच कहूँ मौसम..!! मन तो मेरा बहोत कर रहा है.. पर अब कुछ आसान नहीं है.. पहले की बात और थी.. मुझे कोई रोकने टोकने वाला नहीं था और संजय के प्रति मेरे मन में कोई वफादारी भी नहीं थी.. लेकिन अब सब कुछ बदल गया है.. कुछ करना भी चाहूँ तो १०० बार फूँक फूंककर कदम रखना होगा.. और कोई जरिया भी तो होना चाहिए"

मौसम: "देख यार.. ढूँढने पर सब मिल जाता है.. तू कोशिश करेगी तो कोई न कोई सेटिंग जरूर हो ही जाएगा"

एक पल सोचने के बाद, वैशाली ने धीरे से कहा "सच कहूँ.. मन तो बहोत कर रहा है.. पर क्या करूँ? किसके पास जाऊँ??"

कप से कॉफी का आखिरी घूंट खतम करते हुए मौसम अचानक से टेबल से उठी और वैशाली का हाथ पकड़कर उसे भी खड़ा कर दिया

वैशाली ने थोड़ा सा चोंकते हुए कहा "कहाँ जा रही है? एकदम से क्या हुआ तुझे?"

मौसम: "अब यहाँ बैठे रहने से कुछ होने तो नहीं वाला.. दीदी के घर चलते है.. जीजू घर पर है नहीं.. वहीं घर पर बैठकर तीनों बातें करते है"

वैशाली ने थोड़ी सी झिझक के साथ कहा "लेकिन ऑफिस का काम... "

मौसम: "उसकी चिंता छोड़.. और चल मेरे साथ" मौसम ने बिना बिल का इंतज़ार किए, पाँच सौ के दो नोट टेबल पर रखे और वैशाली को लेकर चल दी

दोनों मौसम की गाड़ी में बैठकर कविता के घर पहुंचे

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कविता के विशाल और शानदार बंगले का मुख्य दरवाजा खुला और मौसम और वैशाली अंदर घुसीं कविता ने उनका स्वागत खुश मुस्कान के साथ किया

"अरे वाह! यह कैसा सुरप्राइज है?" कविता बोली, "मौसम तू तो ऑफिस गई थी ना.. सुबह मम्मी से मेरी बाती हुई थी, लेकिन वैशाली तुम..!! कहीं बाहर गई थी क्या तुम दोनों?"

"दीदी, ऑफिस ही गई थी मैं.. ज्यादा कुछ काम था नहीं.. और काम करने का मूड भी नहीं था.. तो मैं वैशाली को लेकर एक कैफै गई थी.. वहीं बैठकर बातें की" मौसम ने कहा, "फिर सोचा वहीं बैठे रहने से अच्छा है, की यहाँ घर पर ही बैठा जाएँ.."

"अच्छा किया जो यहीं आ गए.. मैं भी बैठे बैठे बोर हो रही थी.. अंदर आओ" कविता ने उन्हें अंदर बुलाया

बैठक कक्ष की शानदार सोफे पर बैठकर तीनों ने कुछ देर सामान्य बातचीत की परिवार, बिज़नेस, बैंगलोर की यादें बातें करते करते विशाल का जिक्र हुआ और फिर से मौसम का चेहरा उतर गया..

"अब तू मुंह लटकाना बंद कर" कविता ने कहा, "मैंने विशाल से भी बात की है और फोरम से भी मिलकर आई.. दोनों के बीच ऐसा कुछ भी नहीं है.. बस नॉर्मल दोस्तों वाली बातें ही होती है.. मैंने तो फोरम को हल्का सा धमकाया भी.. चिंता करने जैसा कुछ भी नहीं है, तू भी खामखा टेंशन ले रही है मौसम"

मौसम ने एक गहरी सांस ली "दीदी, आप बात समझ नहीं रही.. हो सकता है की उन दोनों के बीच कुछ न हो, पर विशाल ने यह बात मुझसे छुपाई क्यों? और दोनों आधी रात को ही क्यों बातें करते है?? और मुझसे शादी करने से पहले विशाल उससे प्यार करता था यह बात मैं कैसे भूल सकती हूँ..!!"

कविता: "इतनी छोटी छोटी बातों को मन में लेकर चलेगी तो कैसे चलेगा..!! विशाल ने शायद यह सोचकर तुम्हें न बताया हो की तुम गलत समझोगी..!!"

मौसम: "पता नहीं दीदी.. पर मेरा तो सोचकर ही दिमाग खराब रहता है"

वैशाली ने बीच में कहा "कविता की बात सही है मौसम, तू बेकार में बात का बतंगड़ बना रही है.."

मौसम: "कहना आसान है वैशाली.. कुछ भी कहो, विशाल तेरे पिंटू जितना सीधा नहीं है"

वैशाली: "क्या फायदा सीधा होने का.. जब उसका सीधा खड़ा ही न होता हो" माहोल को थोड़ा सा हल्का बनाने के इरादे से वैशाली ने कहा

सुनकर मौसम मुस्कुराई पर उन दोनों की बातें कविता की समझ में नहीं आई

कविता: "क्या बक रही है वैशाली? मज़ाक की भी हद होती है..!!" आखिर उसका पुराना प्रेमी था पिंटू.. दिल पर पत्थर रखकर उसको वैशाली से ब्याहते देखा था.. उसके बारे में वो कुछ भी उल्टा सीधा सुन नहीं सकती थी

वैशाली गंभीर हो गई "मज़ाक नहीं कर रही कविता, अब तुमसे क्या छुपाना..!! वाकई में पिंटू को पिछले दो महीनों से यह प्रॉब्लेम आ रही है"

कविता को अपने कानों पर विश्वास नहीं हो रहा था.. उसने मौसम की ओर देखा और मौसम ने भी गर्दन हिलाकर हामी भरी

उन दोनों के सामने खड़ी कविता आश्चर्य के मारे सोफ़े पर बैठ गई

कविता को अब भी विश्वास नहीं हो रहा था, उसने पूछा "क्या वाकई में पिंटू को ऐसा प्रॉब्लेम है??"

वैशाली: "यार, अपने पति के बारे में ऐसी बात को लेकर झूठ क्यों बोलूँगी मैं भला..??"

एक पल के लिए सुन्न सी हो गई कविता.. उसका पहला प्यार पिंटू.. उसे भला ऐसा क्यों हुआ होगा..!! फिर अचानक से उसे एहसास हुआ.. जिसके सामने वो बैठी थी.. वो पिंटू की पत्नी थी.. जरूरत से ज्यादा चिंता जताने पर गलतफहमी होने की पूरी संभावना थी.. वह तुरंत पूर्ववत हो गई

कविता ने संभलते हुए कहा "आजकल ऐसा सब होना आम बात है वैशाली.. चिंता करने की कोई जरूरत नहीं.. और अब तो बहोत सारी दवाइयाँ भी मिलती है जो इस समस्या में काम आ सकें" वैशाली को ढाढ़स बँधाने के इरादे से कविता ने कहा.. वैसे उसे अब भी इस बात पर यकीन नहीं आ रहा था

वैशाली: "हल तो कई सारे है कविता.. पर वो तो तब न जब वो मानने को तैयार हो की यह एक मेडिकल समस्या है.. मैंने डॉक्टर के पासे जाने की राय क्या दी वो तो मुझ पर ही भड़क गया"

कविता: "भड़क क्यों गया भला??"

वैशाली: "ये मर्द और उनके अहंकार..!! मैंने सलाह क्या दी उसे लगा मैंने उसके मर्द होने पर ही शक कर दिया..!!"

कविता: "कैसी बेतुकी बात करता है वो.. यार, ऐसा कब से चल रहा है?"

वैशाली: "दो महीनों से ऊपर हो गया"

कविता: "मतलब दो महीनों से तू....!!!" आगे के शब्द कविता बोलती उससे पहले ही "हाँ" कहते हुए वैशाली ने सिर हिला दिया..

कविता की आँखों में एक सहानुभूतिपूर्ण चमक आई "समझ सकती हूँ तुम दोनों की दशा.. पर मेरा भी हाल कुछ खास अलग नहीं है.. पियूष भी तो बिज़नेस के चक्कर में इतना बिजी रहता है कि उसे अपनी बीवी की याद ही नहीं आती.. कभी कभी तो लगता है, वो पुराने दिन ही ठीक थे.. पैसे कम थे पर कितना सुकून था.. और शाम होते ही वो घर आ जाता था.. रात भर बिस्तर में ऐसे कट जाती थी की सुबह होने का पता तब चलता जब मम्मी जी दरवाजे पर दस्तक देती... अब तो ऐसा लगता है जैसे हम सब की ज़िंदगी में से सेक्स गायब ही हो गया हो"

तीनों के बीच एक असहज सी खामोशी छा गई.. हर एक अपनी अपनी अधूरी इच्छाओं और यौन तृप्ति की कमी के बारे में सोच रही थी

"सुनो," कविता ने हवा बदलते हुए कहा, "माहोल कुछ ज्यादा ही गंभीर हो गया.. क्यों न हम तीनों एक दो पेग ड्रिंक कर लें? पियूष के कलेक्शन में ढेर सारी बढ़िया वाली विस्की पड़ी है.. शायद पीने से ही दिल का बोझ हल्का हो जाए"

"बहुत अच्छा आइडिया है," मौसम ने फौरन हामी भर दी

कविता ने तीन गिलास और एक बोतल निकाली.. पहला पेग सबने जल्दी से खत्म कर दिया.. दूसरा पेग आराम से पीते हुए, बातचीत फिर से जीवंत हो उठी, लेकिन इस बार शराब के असर ने बातों को और गहरा, और अंतरंग बना दिया.. कविता धीरे धीरे चौथे पेग तक पहुँच गई.. वो आज कुछ ज्यादा ही जल्दी जल्दी पी रही थी..

वैशाली, जिसकी इच्छाएं महीनों से दबी हुई थीं, मौसम की ओर देख रही थी शराब का नशा उसकी हिचकिचाहट को पिघला रहा था.. मौसम के टॉप से उसके वक्षों की गोलाई नजर आ रही थी.. जिसे वशाली अब लालचभरी निगाहों से ताड़ रही थी

"बेंगलोर जाकर तेरे आम तो बड़े बड़े हो गए है, मौसम," वैशाली ने मौसम के स्तनों की गोलाई पर अपनी उंगली सहलाते हुए कहा

मौसम ने एक झटका सा महसूस किया, लेकिन विरोध नहीं किया उल्टा, उसके होठों पर एक हल्की सी मुस्कान तैर गई "शुक्रिया, वैशाली तुम भी तो... मेरे आम तो अब जाकर पके है.. पर तुम्हारे खरबूजे तो पहले भी बड़े थे और अब भी.. तुम भी काफी सेक्सी लग रही हो.. कसम से यार.. इतना गदराया हुआ जिस्म है.. अगर में मर्द होती तो तुम्हें देखकर मेरा तो पूरा दिन खड़ा ही रहता" ठहाका लगाते हुए मौसम ने कहा

कविता यह सब चुपचाप देख रही थी, एक अजीब सी उत्तेजना उसके भीतर भी जाग रही थी वह बोली, "हम तीनों... हमेशा से एक दूसरे के इतने करीब रहे हैं शायद... शायद इस वक्त हमें एक दूसरे के सहारे की ज़रूरत है.."

वैशाली का हाथ अब मौसम की जांघ पर था, हल्का सा दबाव डालते हुए "कितनी सॉफ्ट है..." वह फुसफुसाई

मौसम ने आँखें बंद कर लीं "वैशाली... यार ऐसे मत करो... मेरा कंट्रोल चला गया तो फिर पता नहीं क्या होगा..."

"क्या होगा?" कविता ने दबी आवाज़ में कहा, "हम तीनों जानती हैं कि हम क्या चाहती हैं कोई दिखावा करने की ज़रूरत नहीं"

यह कहते हुए कविता ने वैशाली के पास बैठकर उसके कंधे पर हाथ रख दिया वैशाली अब मौसम को छोड़ कविता की तरफ मुड़ी.. और फिर अचानक उसके होंठों को अपने होंठों से दबा दिया.. उसके यह चुंबन में.. भूख थी.. जरूरत थी..






अपनी दीदी और वैशाली के बीच इस नज़ारे को देखकर मौसम हांफ उठी.. उसकी सांसें तेज हो गईं.. पास पड़े तीसरे पेग को वो एक ही घूंट में पी गई.. वैशाली ने चुंबन तोड़ा और अपना ध्यान वापस मौसम की ओर किया.. अब उसने मौसम का चेहरा पकड़ा और धीरे से उसके होंठ चूमे.. इस बार मौसम ने जवाब दिया, उसकी जीभ वैशाली के होंठों से टकराई

"हाँ... ऐसे ही... क्या मस्त लग रही हो तुम दोनों किस करते हुए" कविता ने कहा, अपना हाथ मौसम के स्तन पर रखते हुए उसने उसे अंदर से महसूस किया, दबाया मौसम की एक कराह निकल गई

वैशाली अब मौसम की गर्दन और कंधों को चूम रही थी, जबकि कविता ने मौसम के टॉप के बटन खोलने शुरू कर दिए.. टॉप खुलते ही कविता ने उसकी ब्रा ऊपर कर दी और दो गोल.. भरे हुए स्तन बाहर निकल आए

"कितने खूबसूरत हैं..." वैशाली ने कहा और अपना मुंह उनकी ओर बढ़ाया उसने मौसम की एक निप्पल को अपने मुंह में ले लिया, चूसा, काटा






"अह्ह्ह... वैशाली..." मौसम कराह उठी, अपनी उंगलियों से वैशाली के बालों को दबोचते हुए

उन दोनों को एक दूसरे से लिप्त हुए देख, कविता ने अपना पाँचवा पेग बनाया... अमूमन उसे इतनी मात्रा में शराब पीने की आदत नहीं थी.. कभी कभार ही पीती थी और वो भी एक-दो पेग से ज्यादा नहीं.. पर आज की बात अलग थी.. नशा अलग था.. सुरूर अलग था..

टीशर्ट और शॉर्ट्स पहने हुई कविता सामने वाले सोफ़े पर बैठ गई.. और खुद ही एक हाथ से अपने स्तनों को मसलने लगी जब की उसका दूसरा हाथ चड्डी के अंदर चला गया.. भारी मात्रा में शराब अपना असर दिखा रही थी.. उसकी रगों में खून तेजी से दौड़ रहा था.. नशे की हालत में वह उंगलियों से अपनी क्लिटोरिस को कुरेदने लगी






तभी कविता ने देखा की वैशाली अपनी सलवार कमीज उतार रही थी.. साथ ही उसने अपनी ब्रा भी उतार दी.. दो बड़े बड़े खरबूजों जैसे उसके उन्नत स्तन मुक्त होकर झूलने लगे.. उसने अपनी पेन्टी अब भी पहन रखी थी और चूत वाले हिस्से पर लगा गीलापन स्पष्ट भाव से वैशाली की हवस की इंतहाँ दर्शा रहा था..

कविता की भीतर की आग भड़क उठी.. वह उठकर लड़खड़ाते कदमों से उन दोनों के करीब आई और वैशाली के स्तनों को अपने हाथों में ले लिया, उन्हें दबाया, मसला फिर वह नीचे झुकी और वैशाली की दूसरी भरकम चूची को चूसने लगी






अब तीनों का जुनून अपने चरम पर था वे सोफे से उतरकर फर्श पर बिछे कार्पेट पर आ गईं, एक दूसरे के शरीर से चिपकी हुईं

मौसम ने वैशाली की चूत को छुआ, उसके गीलेपन को महसूस किया "तुम तो बहुत गीली हो गई हो..."

"हाँ... यार, कितने दिनों बाद थोड़ा मज़ा मिला है आज..." वैशाली हांफती हुई बोली

कविता ने मौसम की जीन्स पेन की चैन खोलकर ढीला किया और उसे उसके पैरों से उतार दिया अब मौसम भी पूरी तरह नंगी थी कविता ने अपनी बहन के जिस्म को निहारा, फिर उसकी चूत पर हाथ फेरा

"ओहहह... दीदी..." मौसम की आँखें रोमांच से चौंधिया गईं

वैशाली ने कविता के कपड़े भी उतारने में मदद की और जल्द ही तीनों सुंदर, परिपक्व औरतें एक दूसरे के सामने पूरी तरह नग्न थीं, केवल उनकी हांफती सांसें और कराहने की आवाजें हवा में गूंज रही थीं

वैशाली ने मौसम को नीचे लिटाया और उसकी जांघों के बीच अपना सिर घुसा दिया उसने मौसम की चूत को जीभ से चाटना शुरू कर दिया






"हाँ! अह्ह्ह! वैशाली... ऐसे ही!" मौसम चीख उठी, अपनी उंगलियों से वैशाली के बाल पकड़ते हुए

"तेरी चूत तो बहुत रस निकाल रही है" चाटते हुए वैशाली ने एक उंगली मौसम की चूत के अंदर डाल दी और अपने पूरे हाथ को दाएं-बाएं घुमाते हुए उसकी योनि को धीरे से रगड़ा.. वैशाली का स्पर्श अद्भुत था.. मौसम ने आँखें बंद कर लीं और अपनी योनि में गर्माहट का आनंद लिया.. वह उत्तेजना से काँप उठी.. वैशाली ने उसकी चूत चाट-चाट कर उसे उन्मत्त और पागल कर दिया था.. मौसम तब खिलखिलाई जब वैशाली ने अपनी दोनों हथेलियों से उसके कूल्हों को दबोचा और चुटकी काटी। "मस्त सेक्सी चूतड़ है तेरे," वैशाली ने कहा.. मौसम ने वैशाली के चौड़े कूल्हे पर थप्पड़ मारा। "पर तेरे जीतने बड़े बड़े नहीं है.."

इन दोनों को हवस भरी नज़रों से देख रही कविता के सिर पर नशा इतना चढ़ चुका था की वह चाहकर इन दोनों की हरकतों में शामिल नहीं हो पा रही थी.. बस दीवार पर अपनी पीठ टेककर, उन दोनों को देखते हुए अपनी चूत रगड़ती रही.. उँगलियाँ पेलती रही..!!!!






मौसम कार्पेट वाले फर्श पर पीठ के बल लेट गई और वैशाली उसके ऊपर मंडराने लगी.. वैशाली ने मौसम के मुँह और गर्दन को चूमा और फिर मौसम के स्तनों को चूसना शुरू कर दिया.. मौसम को यह बहोत पसंद आया.. वैशाली को बिल्कुल पता था कि उसके स्तनों को कैसे चूसना और काटना है.. मौसम के निपल्स सख्त होकर सूज गए.. मौसम ने आँखें बंद कर लीं और प्रत्याशा में काँप उठी..

वैशाली का मुँह मौसम के स्तनों से हट गया और मौसम के पेट पर नीचे की ओर चुंबनों की एक लकीर बनाने लगा.. वैशाली ने मौसम की चूत में अपना मुँह फिर से घुसा दिया.. मौसम आनंद से कराह उठी.. उसने उसकी क्लिटोरिस से दूर रहकर उसे छेड़ा.. मौसम की क्लिट सख्त और लाल हो रही थी और चूत की फांक में से एक छोटी उंगली की तरह बाहर निकली हुई थी.. वैशाली को लंड चूसना पसंद था, लेकिन लंड के बाद उसे सबसे ज्यादा जो पसंद था, वह था एक सख्त क्लिट को चूसना और सामने वाली महिला को मचलने, छटपटाने, चिल्लाने और उसकी चूत से गर्म मलाई की बाढ़ बह निकलने पर मजबूर करना..वो तो पहले भी फाल्गुनी और मौसम के साथ यह खेल खेल चुकी थी.. शुरुआत तब हुई थी जब वो सब साथ में माउंट आबू गए थे

मौसम बस इसी के लिए तरस रही थी.. वह चाहती थी कि वैशाली का गर्म मुँह उसकी उसकी चूत को यूं ही चाटता रहे लेकिन जिस तरह से वैशाली उसके आसपास के सारे योनि मांस को छेड़ और चूस रही थी, मौसम उसे रोकना नहीं चाहती थी..

"आह्ह मैं पागल हो जाऊँगी.." मौसम ने कराहते हुए कहा

और अब वैशाली ने अचानक अपना मुँह खींच लिया और एक पल बाद मौसम ने अपनी चूत की फांक में ऊपर-नीचे रगड़ती हुई कुछ नरम और अद्भुत चीज महसूस की.. मौसम ने नीचे देखा और उत्तेजना से तब कराह उठी जब उसने वैशाली को अपने विशाल स्तन को अपने हाथ में लिए.. उसकी लंबी गुलाबी निप्पल को उसकी चूत पर रगड़ते हुए पाया.. वैशाली के निप्पल ने मौसम की सख्त क्लिट को छुआ और मौसम की सांस रुक गई.. मौसम ने अपने शरीर को झटकों से ग्रस्त महसूस किया.. उसने अपनी जांघें चौड़ी कर दीं और वैशाली को अपनी पानी से लसलसित चूत पर सम्पूर्ण अधिकार दे दिया..






फिर वैशाली ने मौसम की जलती हुई जांघों के मलाईदार मांस को चाटा और मौसम के पैरों की ओर बढ़ी और उसके पैर की उँगलियों को चूसना शुरू कर दिया..

कविता वैशाली के पीछे बैठी हुई थी... उसके सामने वैशाली के भारी दो चूतड़ों को गोलाइयाँ थी.. नशे की हालत में वो और कुछ न कर पाई.. बस उसके कूल्हों को सहलाती रही.. सहलाते सहलाते पता नहीं उसे ऐसा क्या हो गया की उसने अपनी एक उंगली वैशाली की गांड के छेद के अंदर हल्के से घुसाई...






अपनी गांड पर उंगली का स्पर्श होते ही, मौसम के पैरों को चाट रही वैशाली एकदम सहम से गई.. उसने मूडकर पीछे देखा.. नशे से भारी हो चुकी आँखों वाली कविता की आँखों में देखा.. दोनों एक दूसरे के सामने देख मुस्कुराई.. और वैशाली ने फिर से अपना ध्यान मौसम के शरीर पर केंद्रित कर दिया

वैशाली अब मौसम के ऊपर चढ़ गई और अपने स्तनों को मौसम के चेहरे पर लहराने लगी.. अपनी आँखों को सामने झूल रहे उन विशाल मांसपिंडों को देखकर मौसम से भी रहा न गया.. उसने अपना मुँह खोला और वैशाली ने तुरंत अपना एक स्तन मौसम के होंठों के बीच गिरा दिया.. मौसम ने वैशाली के लंबे निप्पल को चूसा और काटा.. इतने बड़े स्तन की निप्पल चूसने में मौसम को बड़ा मज़ा आ रहा था






मौसम के हाथ वैशाली की कमर को पकड़े हुए थे, और अब उसने एक हाथ वैशाली के पेट पर और नीचे उसकी योनि तक फेरा.. मौसम ने वैशाली की चिकनी और बिना बालों वाली चूत को अपनी उँगलियों के नीचे महसूस किया.. वैशाली की चूत पूरी तरह से भीगी हुई थी.. मौसम ने उसको दुलारा और तब तक सहलाया जब तक कि वैशाली आनंद से कराह न उठी..

वैशाली ने अपने शरीर को घुमाया और मौसम के ऊपर बैठ गई.. सिक्स्टी-नाइन की पोजीशन में.. जब मौसम ने ऊपर देखा, तो उसने वैशाली की गुलाबी बिना बालों वाली योनि को अपने मुँह के ऊपर लटकते हुए देखा.. वह उसकी गंध महसूस कर सकती थी.. उसने वैशाली का मुँह अपनी योनि पर महसूस किया और वह जानती थी कि वैशाली उससे भी ऐसा ही करने की उम्मीद कर रही है.. वैशाली की बिना बालों वाली चूत रसीली और स्वादिष्ट लग रही थी..

वैशाली के कूल्हों पर अपने हाथ रखते हुए, मौसम ने वैशाली की चूत को अपने मुँह की ओर नीचे खींच लिया.. उसने अपनी जीभ पर टपकते रस को चूसा और सरपट लिया.. वैशाली की योनि स्वादिष्ट थी.. मौसम की उँगलियों ने वैशाली की योनि को चौड़ा खोल दिया और वह फिर से जुनून से आह भरी.. फिर उसने अपनी जीभ बाहर निकाली और वैशाली की गूँदाज बुर के ऊपर तक, उसकी स्पंदनशील योनि से लेकर उसकी धड़कती, उभरी हुई क्लिट तक सरपट लिया..






"ऊऊऊऊऊह!" वैशाली हांफ उठी, सेक्सी बिजली की एक धारा उसके गर्म शरीर में से होकर बह निकली.. "अबी मैं तुझे दिखाती हूँ कि चूत कैसे चाटी जाती है, तुझे दिन में तारे दिखने लगेंगे!" वैशाली ने कहा.. वैशाली ने अपनी बाहें मौसम की कमर के चारों ओर लपेट लीं और अपना सिर नीचे झुकाया.. उसका मुँह चौड़ा खुल गया.. उसने अपनी जीभ लंबी और चपटी कर ली और मौसम की योनि मार्ग के पूरे विस्तार को गीला करते हुए चाटा.. उसकी जीभ ने मौसम के कांपते, स्पंदनशील मांस को सरपट लिया और चाटा और वह मौसम की चूत में एक अजीब सी झनझनाहट शुरू होते हुए महसूस कर रही थी.. मौसम को चरमोत्कर्ष तक पहुँचने में बिल्कुल भी देर नहीं लगने वाली थी..

"म्म्म्म्म्म!" मौसम ने चीखने की कोशिश की.. "म्म्म्म्म्म्म!" वह चीखना चाहती थी पर वैशाली के मांसल भोंसड़े ने उसका मुंह दबा रखा था.. उसने वैशाली की चूत में अपनी जीभ को और तेजी से चलाना शुरू कर दिया.. जो मज़ा वैशाली उसे दे रही थी वह भी उसका माकूल जवाब देने का प्रयत्न कर रही थी.. उसने अपनी जीभ को सख्ती से वैशाली की चूत में घुसाया.. चटखारों और चूसने की आवाजों के साथ उसे अंदर-बाहर किया.. वैशाली की जीभ को मौसम की क्लिट की कली मिल गई जिसे वो अपने दोनों होंठों के बीच दबाने लगी.. जिस तरह के एहसासों से मौसम गुजर रही थी.. उसे यकीन नहीं हो रहा था की ऐसे एहसास भी हो सकते है..!! वैशाली ने मौसम को रोमांच के एक ऐसे चरम बिंदु तक पहुंचा दिया जहां तक वह पहले कभी नहीं पहुँची थी..

"म्म्म्म्म्म्म!" मौसम ने आनंद की एक अधूरी दबी हुई चीख निकाली.. उसने अपना मुँह वैशाली की चूत में घुसा दिया और उसकी हर हरकत की नकल करने लगी.. उसने वह सब कुछ किया जो वैशाली कर रही थी.. उसकी जीभ ने वैशाली की जीभ के साथ एकदम तालमेल बनाए रखा, जब भी वैशाली की जीभ तेज या धीमी होती, वह भी वैसा ही करती.. उसने वैशाली के नेतृत्व का पालन किया और पाया कि उसकी अपनी चूत आनंद से फड़क रही थी, मस्ती में झूम रही थी.. वैशाली उसे पूरी तरह से लीड कर रही थी, उसे उसके जीवन के सबसे अद्भुत ऑर्गेज़्म की ओर ले जा रही थी! मौसम का मुँह चौड़ा खुल गया.. उसके निप्पल वैशाली की जांघों में घिस गए और कामुकता के शिखर पर सख्त भी हो गए.. इतने सख्त होकर चुभ रहे थे जैसे वैशाली के नरम मांस में छेद करने के लिए तैयार हो; वे इतने सख्त और रबड़ जैसे थे.. उसने उन्हें वैशाली के पेट की नरम त्वचा में घुमाया और महसूस किया कि चरमोत्कर्ष उसके पूरे शरीर में से होकर गुजर रहा है..

"म्म्म्म्म्म्म्म!" वह चीखी, उसके जुनून की आवाज़ वैशाली के ऐंठती हुई चूत के मांस से दब गई.. "म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म!" वैशाली ने कामुकता से अपने कूल्हे हिलाए.. उसने मौसम की कमसिन बुर में अपना चेहरा घुसाया ताकि उसके ऑर्गेज़्म को महसूस कर सके.. उसकी चूत मौसम की गर्म जीभ के चारों ओर कसकर सिकुड़ गई, उसे सीधे उसकी जलती हुई योनि मार्ग में खेने लगी..

मौसम ने एक और दबी हुई चीख निकाली जो वैशाली की चीख से मेल खाती थी.. वैशाली ने अपना चेहरा मौसम की चूत में और भी जोर से घुसाया और अपनी जीभ को उसकी कांपती हुई क्लिट के आर-पार फिराया.. उसने इसे अपने नरम होंठों से चूसा और तेजी से अपने दांतों से चबाया.. उसने अपनी जीभ को उसकी सतह पर फेरा और अपनी भोसड़े को जोर से फटते हुए महसूस किया.. वे दोनों एक साथ, बिल्कुल एक साथ चरम पर पहुँच रही थीं!






मौसम को विश्वास नहीं हो रहा था कि वह कितना अद्भुत महसूस कर रही है.. दोनों की अब भी चूसने की आवाज सुनाई दे रही थी.. उन आवाजों ने उसे और भी उत्तेजित कर दिया.. वह लगातार चरमोत्कर्ष का अनुभव करती रही, बार-बार, ठीक वैशाली के साथ.. उसका दिल तो कर रहा था की काश यह शरीर में गुजरते हुए अद्भुत चरमोत्कर्षों को एहसास कभी बंद ही न हो..!!!

एक दूसरे के जिस्मों से जुदा होकर, दोनों फर्श पर अगल-बगल लेटे हुए हांफने लगी... तब जाकर उनका ध्यान कविता पर गया.. जो नशे में धूत होकर, दीवार के सहारे बैठे बैठे ही सो गई थी

लेटे लेटे ही वैशाली ने अपने एक हाथ से मौसम को धीरे से पीछे की ओर धकेला और अपना दूसरा हाथ लापरवाही से मौसम की जांघों के बीच फिसला दिया.. उसकी उंगलियों ने मौसम की चूत को अलग किया और उसकी चूत की नरम, नम त्वचा को धीरे से सहलाने लगी.. "ओह, वैशाली ... ओह ... तुम तो फिर से शुरू हो गई," मौसम ने आह भरी, उस जुनून पर नियंत्रण नहीं कर पा रही थी जो वैशाली की कुशल उंगलियाँ उसकी चूत में जगा रही थीं.. वह अपने रस के बहने और वैशाली के अद्भुत सहलाने से अपनी क्लिट के सूजने का एहसास कर सकती थी..

एकाध घंटे तक यूं ही पड़े रहने के बाद आखिर वैशाली और मौसम जाग गए.. उन्हों ने देखा की कविता तो अब भी दीवार के सहारे बैठी बैठी सो रही थी..

मौसम ने हल्के से कविता के कंधे को झकझोरते हुए उसे जगाने की कोशिश की "दीदी...!!!"

दो तीन बार ऐसे प्रयास करने के बाद कविता की नींद खुली.. उसे ऐसा लग रहा था जैसे उसकी आँखों की पलकों पर किसी ने ढेर सारा वज़न रख दिया हो... मौसम और वैशाली ने उसे कंधों से उठाकर सोफ़े पर बैठाया और उसके चेहरे पर पानी छिड़क तब जाकी कविता की आँखें खुली


तीनों अब भी नंग-धड़ंग ही थी..

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