Adultery शीला की लीला (५५ साल की शीला की जवानी) - Page 3 - SexBaba
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Adultery शीला की लीला (५५ साल की शीला की जवानी)

पीयूष: "और अगर फिगर दबाने के चक्कर में सर पर जूते पड़ेंगे तो!!"

शीला: "तेरे सर पर जूते नहीं पड़ेंगे.. मेरी गारंटी है.. "

कविता और शीला दोनों हंस पड़े.. तभी शो का टाइम हो गया और हॉल का गेट खुल गया.. ऑडियंस अंदर जाने लगी..

पीयूष: "चलिए भाभी.. चलते है अंदर"

तीनों अंदर जाने के लाइन में खड़े हो गए.. सब से आगे कविता.. पीछे पीयूष.. और उसके पीछे शीला.. भीड़ की धक्कामुक्की की आड़ में शीला ने जान बूझकर अपने बम्पर पीयूष के पीठ पर दबा दिए..

शीला भाभी के इस प्रथम हमले से ही पीयूष पिघल गया..

टिकट का नंबर देखकर अपनी लाइन में घुसते हुए पहले शीला भाभी, फिर उसकी बगल में कविता और अंत में पीयूष.. इस तरह बैठ गए। शीला और कविता के पसीने छूट गए.. अब पिंटू को कैसे कविता के साथ सेट करेंगे!! अब पिंटू के साथ पिक्चर देखने की और मजे करने की इच्छा मन में ही रह जाएगी, ये सोचकर कविता का दिल बैठ गया..

शीला का दिमाग काम पर लग गया.. अब क्या करू?? कविता ने शीला की कमर पर अपनी कुहनी मारकर इशारे से पूछा.. अब क्या करेंगे?

पीयूष तो मस्ती से स्क्रीन पर चल रही ऐड्वर्टाइज़्मन्ट की मॉडलों को ताड़ रहा था

शीला को यकीन था की इतना उत्तेजित करने के बाद पीयूष उसके बगल में ही बैठेगा.. और मौका मिलते ही पिंटू और कविता साथ में अपना कार्यक्रम कर पाएंगे.. पर ये तो सब उलटा हो गया!! कविता बार बार कुहनी मारकर शीला से पूछ रही थी की अब क्या किया जाएँ!!

शीला ने फुसफुसाकर कविता के कान में कहा "अब सिर्फ पिक्चर ही देखेंगे.. और तो कुछ हो नहीं सकता"

"भाभी प्लीज.. कुछ कीजिए ना!!" कविता की शक्ल रोने जैसी हो गई.. उसने देखा की पिंटू कब से उनकी सीटों की लाइन के इर्दगिर्द चक्कर काट रहा था

शीला और कविता दोनों निराश होकर अपनी सीट पर बैठे रहे.. कविता की नजर, कोने में खड़े पिंटू पर थी.. वो भी इशारे के इंतज़ार में था। शीला का दिमाग और भोसड़ा, इस समस्या का निराकरण ढूँढने के काम पर लगे हुए थे.. तभी शीला के दिमाग में चिंगारी हुई और उसकी चुत में ४४० वॉल्ट का झटका लगा.. वो एकदम से खड़ी हो गई..

"बाप रे.. कितनी गर्मी लग रही है.. मैं यहाँ कोने में नहीं बैठूँगी.. पीयूष, तू इस तरफ बैठ जा.. "

पीयूष: "कोई बात नहीं भाभी.. आप यहाँ आ जाइए.. मैं वहाँ चला जाता हूँ" कहते ही पीयूष खड़ा हो गया और शीला की सीट पर बैठ गया..

कविता की जान में जान आई। पीयूष अब शीला और कविता के बीच में बैठ गया.. शीला का इशारा मिलते ही, पिंटू कविता की बगल वाली सीट पर चुपके से बैठ गया

जल बिन मछली की तरह तड़प रही कविता को ऐसा महसूस हुआ जैसे उसे वापिस पानी में डाल दिया गया हो.. उसका चेहरा खिल उठा

स्क्रीन पर पिक्चर शुरू हो गया.. पूरे हॉल में अंधेरा छा गया.. शीला ने धीर से अपने पैर से पीयूष के पैरों का स्पर्श किया.. पर पीयूष ने तुरंत अपना पैर हटा लिया.. पीयूष की इस सज्जनता पर शीला को बड़ा गुस्सा आया..

दोनों सीटों के बीच के हेंडल पर जहां पीयूष ने अपना हाथ रखा था.. वहीं पर शीला ने अपना हाथ रख दिया.. लेकिन पीयूष ने अपना हाथ दूर ले लिया।

पिक्चर शुरू हुए आधा घंटा बीत चुका था.. कविता और पिंटू की छेड़खानियाँ शुरू हो गई थी.. पर शीला और पीयूष के बीच कुछ नहीं हो पा रहा था.. शीला के क्रोध का पारा चढ़ रहा था.. बहेनचोद समझता क्या है ये अपने आप को!! बड़ा आया सीधा साहूकार.. !! लगता है अब मुझे अपने ब्रह्मास्त्र का उपयोग करना ही पड़ेगा.. शीला ने घुटने मोड़कर अपने दोनों पैर सीट के ऊपर ले लिए.. अब पीयूष की जांघ पर शीला का घुटना छु रहा था.. और पीयूष इस स्पर्श से अपने आप को दूर कर पाने की स्थिति में नहीं थी। समस्या ये हुई की शीला के दूसरी तरफ बैठे पुरुष की जांघ पर भी शीला का दूसरा घुटना छुने लगा.. वो आदमी अपनी उँगलियाँ शीला के घुटने पर फेरने लग गया.. हालांकि शीला का सर ध्यान पीयूष पर ही था.. वो देखना चाहती थी की पीयूष के लंड पर उसके स्पर्श का कोई असर हो रहा था या नहीं!! वो तो शीला नहीं जान पाई.. पर शीला के बगल में बैठे आदमी का टावर खड़ा हो गया..

शीला का लक्ष्य था पीयूष का लंड.. और पाँच मिनट बीत गई.. पर पीयूष ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी.. शीला की जांघों पर वो बगल में बैठा हरामी हाथ फेरने लगा.. पर शीला को इस बात की परवाह नहीं थी.. और वो आदमी इस बात का पूरा फायदा उठा रहा था.. करीब ४५-४६ की उम्र के उस आदमी को तिरछी नजर से एक बार देख लिया..

शीला ने देखा की पीयूष तो कविता के बबलों पर हाथ फेर रहा था.. शीला को अपने स्तनों का अपमान होता दिखा.. रत्नागिरी आम मिल रहे है और ये बेवकूफ कच्चे आम के पीछे पड़ा था.. कुछ करना पड़ेगा

शीला ने अपने घाघरे के अंदर हाथ डाला और तीन उँगलियाँ अपनी भोस में डालकर अंदर बाहर करते ही अंदर से पानी का झरना फुट पड़ा.. अपनी गीली उंगलियों को उसने अपने खुले घुटने पर रगड़ दी.. गरम भोसड़े की खुशबू पूरे वातावरण में फैलने लगी..

चुत चाटने के अनुभवी पुरुष.. इस खुशबू को बखूबी पहचानते है.. पानी पी रहे चीते को शिकार की खुशबू आते ही जिस तरह वो गर्दन उठाकर आजू बाजू देखने लगता है वैसे ही.. आगे पीछे की सीट पर बैठे मर्द.. चारों तरफ देखते हुए इस खुशबू के स्त्रोत को ढूँढने लगे.. साथ ही साथ सोचने लगे की कही हॉल के अंदर ही किसी ने चुदाई तो शुरू नहीं कर दी!! थोड़ी देर यहाँ वहाँ देखने के बाद वापिस वो सारे मूवी देखने में व्यस्त हो गए।

दूसरी तरफ शीला की इस हरकत का असर.. तीन सीट छोड़कर बैठे पिंटू के लंड पर तुरंत होने लगी.. चुत की गंध परखने के लिए वो यहाँ वहाँ देखने लगा.. पीयूष कविता के अपने तरफ वाले स्तन को मसल रहा था.. शीला को अपनी चुत की गंध का थोड़ा सा असर होता दिखा.. अब उसने फिर से अपनी चुत में तीन उँगलियाँ डाली और गीली उंगलियों को अपनी काँखों के नीचे रगड़ दिया.. और वहीं हाथ उसने पीयूष के कंधे पर इस तरह रख दिया जैसे दो दोस्त रखते है.. इस तरह शीला की चुत-रस लगी काँख, पीयूष के चेहरे के बिल्कुल करीब आ गई.. और शीला का एक स्तन की गोलाई पीयूष की कोहनी से रगड़ खाने लगी..

इस दोहरे हमले के आगे पीयूष ने घुटने टेक दिए.. अपने पसंदीदा बड़े बड़े स्तनों का स्पर्श मिलते ही वो जैसे स्वर्ग की सैर पर निकल गया.. उसे शीला भाभी के कहे शब्द याद आ गए "जूते नहीं पड़ेंगे.. मेरी गारंटी है".. पीयूष को अपनी मूर्खता का अब एहसास हुआ.. शीला भाभी का इशारा वो तब समझ नहीं पाया था.. अपने स्तन दबाने के लिए वो उसे परोक्ष आमंत्रण दे रही थी..

पीयूष ने अपना हाथ कविता के स्तन से हटा लिया और अपना रुख शीला की ओर किया.. अपने हाथ मोड़कर वो चुपके से शीला के स्तनों को छुने लगा.. और तिरछी नजर से शीला भाभी की प्रतिक्रिया देखने लगा..

शीला से अब रहा नहीं गया.. अपना चेहरा पीयूष कान के पास ले जाकर वो धीरे से बोली "आधा पिक्चर खतम हो गया.. थोड़ी देर में इन्टरवल हो जाएगा.. और तू अभी तक ट्रैलर पर ही अटका पड़ा है!! अगर मन कर रहा है तो दबा ले.. शरमाता क्यों है?? इतना अंधेरा है, किसी को कुछ भी पता नहीं चलेगा"

पीयूष की सांसें तेज हो गई.. आज अगर कविता साथ नहीं होती.. तो दोनों हाथों से भाभी के चुचे रगड़ लेता..

दूसरी तरफ पिंटू के पेंट में हाथ डालकर उसका लंड हिला रही कविता सोच रही थी की आज पीयूष साथ नहीं होता तो झुककर पिंटू का लंड चूस लेती..

शीला ने ब्लाउस के तीन हुक खोल दिए और अपना दायाँ उरोज बाहर निकाल दिया.. जैसे तकिये को कवर से निकाल रही हो बिल्कुल वैसे ही!! और पीयूष के हाथों में ही थमा दिया.. और बोली "कविता को पता नहीं चलेगा.. अंधेरे में तुझे जो करना है कर ले.. जितना मज़ा करना हो मेरी तरफ से पूरी छूट है"

शीला की बात सुनकर पीयूष में हिम्मत आ गई.. इतना मूर्ख तो वो था नहीं की हाथ में नंगा स्तन हो और वो दबाए ना!! शीला के ढाई किलो वज़न वाला चुचा हाथ में पड़ते ही पीयूष के तनबदन में आग लग गई.

"ओहह भाभी.. गजब के है ये तो.. माय गॉड!! इन स्तनों को छुने के लिए मैं कितना बेचैन था.. आज तो किस्मत खुल गई मेरी" अपने नसीब को शाबाशी देने लगा पीयूष.. और उसके बगल में उसकी पत्नी अपने प्रेमी से स्तन दबवा रही थी

"मज़ा आ रहा है ना तुझे? दबा ले जितना मन करे.. "बड़े ही कामुक अंदाज से शीला ने कहा और पीयूष की जांघ पर हाथ फेरते फेरते उसके लंड तक पहुँच गई और पतलून के ऊपर से ही दबाने लगी। शीला का स्पर्श अपने लंड पर होते ही पीयूष अधिक उत्तेजित हो गया.. और उसने जोर से शीला के स्तन को मसल दिया..

"आह्ह.. जरा धीरे से कर पीयूष.. दर्द हो रहा है" शीला कराह उठी

"रहा नहीं जाता भाभी.. क्या करू!!"

"नहीं रहा जाता तो बाहर निकाल.. पत्थर जैसा सख्त हो गया है"

"भाभी मुझे कविता का टेंशन है.. कहीं उसने देख लिया तो मुसीबत आ जाएगी" डरते हुए पीयूष ने कहा

पर उतनी देर में तो शीला के अनुभवी हाथों ने पीयूष के पेंट की चैन उतारकर अपना हाथ अंदर सरका दिया और कच्छे के ऊपर से ही लंड को पकड़ लिया।

"ओहह भाभी.. पर.. पर.. कविता.... " पीयूष के शब्द बाहर ही निकले क्योंकी शीला ने उसका कच्छा सरकाकर उसका लंड बाहर निकाल लिया था। फॉलो-ओन होने के बाद दूसरी इनिंगस में भी जब ज़ीरो पर तीन विकेट गिर जाए.. और बेट्समेन निसहाय अवस्था में देखते ही रह जाए.. बिल्कुल वैसे ही पीयूष भी शीला के बाउन्सर के सामने निसहाय था.. शीला ने झुककर पीयूष के कडक लोड़े के टोपे पर किस किया.. जितना हो सकता था अपने मुंह में ले लिया.. और चूसने लगी..

शीला के मुंह की गर्मी और लार का स्पर्श.. पीयूष को उसका गुलाम बनाने के लिए काफी था... तिरछी नज़रों से अपने पति का लंड चूस रही शीला को कविता देख रही थी.. और ये देखकर ज्यादा उत्तेजित होकर वह पिंटू का लंड मसल रही थी। शीला भाभी की सलाह अनुसार उसने ब्रा-पेन्टी नहीं पहनी थी.. और पिंटू इस सुवर्ण अवसर को गंवाना नहीं चाहता था.. उसने कविता के स्कर्ट में हाथ डाल दिया और अपनी दो उंगली चुत में डालकर दस पंद्रह बार फक-फक की आवाज के साथ फुल स्पीड के साथ अंदर बाहर करते ही कविता की चुत झड़ गई.. और साथ में ही पिंटू की पिचकारी से गरम वीर्य रिसकर कविता के हाथों के सौन्दर्य को ओर बढ़ाने लगा..

शीला की बायीं ओर बैठा वो अनजान आदमी शीला के मादक जिस्म के साथ छेड़खानी कर रहा था और उसके कामुक स्पर्श से शीला के भोसड़े का रस झरना फिर से शुरू हो गया था.. पीयूष शीला के स्तनों को अपने हिसाब से मसलते हुए पूरे मजे ले रहा था तो दूसरी तरफ शीला ने उस आदमी के लंड को सहला सहलाकर उसे पिक्चर से ज्यादा मज़ा देने लगी थी। शीला जैसी अनुभवी स्त्री के हाथों में लंड आने के बाद कोई कसर कैसे रह जाती भला.. !!

पीयूष से ओर रहा नहीं गया.. उसने शीला के कान में कहा.. "भाभी, कविता को भी सीखा दो ना आपकी तरह चूसना??"

शीला ने पीयूष के अहंकारी मुर्गे जैसे लंड के साथ अपनी जांघ रगड़ते हुए कहा "चिंता मत कर पीयूष.. कविता को में लंड चुसाई में एम.बी.ए करवा दूँगी.. मैं भी मदन के बगैर बहोत तकलीफ महसूस कर रही हूँ"

पीयूष: "आप कहें तो मैं कविता को कुछ दिनों के लिए मायके भेज दूँ??"

शीला: "और फिर??"

पीयूष: "फिर.. फिर मैं आपको..........!!"

शीला ने पीयूष के लंड को मुठ्ठी में पकड़कर उत्तेजनावश मसल दिया.. सिसकियाँ भरते हुए वो बोली.. "मुझसे तो अभी ही इसके बगैर रहा नहीं जा रहा.. आज रात का कुछ सेटिंग कर ना तू!!"

पीयूष: "आज रात का सेटिंग कैसे करू!! कविता को पता चल गया तो वो मेरी जान ले लेगी.. "

शीला: "कल तो मुझे तेरी माँ के साथ यात्रा पर जाना है.. आज का ही कुछ प्लान बना.. कुछ भी कर तू.. मुझसे अब बर्दाश्त नहीं हो रहा"

शीला वास्तव में पीयूष के पतले लंड को सहलाते हुए उत्तेजित हो गई थी.. और शीला जब उत्तेजित हो जाती है तब वह सारे नियम और बंधन तोड़कर अपनी हवस बुजाने के काम में लग जाती है.. अच्छे बुरे का भेद भूल जाती है और अनाब-शनाब हरकतें करने लगती है..

शीला ने अपनी दोनों जांघों को भींचकर अपनी चुत की जलती आग को शांत करने की कोशिश की पर मामूली आग हो तो बुझेगी ना.. ये तो जंगल में लगी आग जैसी भीषण आग थी.. कैसे बुझती भला!!!

शीला और पीयूष एक दूसरे के जिस्मों से खेलने में मशरूफ़ थे तभी इंटरवल हुआ और हॉल में अचानक लाइट चालू हो गई.. घबराई हुई शीला ने फटाफट अपने स्तन को ब्लाउस के अंदर डाल और पीयूष ने तुरंत अपने लंड को पेंट में ठूस दिया.. चैन बंद करने का भी समय नहीं मिला.. उसने अपने शर्ट से पेंट के लंड वाले हिस्से को ढँक लिया.. और एकदम सामान्य होकर बैठ गया.. शीला ने देखा तो उसके बगल वाला पुरुष समय रहते अपने लंड को अंदर नहीं डाल पाया था.. उसने अपने लंड को रुमाल से ढँक लिया था.. शीला को ये देखकर हंसी आ गई.. लंड के ठुमके.. ऊपर रखे रुमाल से भी दिखाई दे रहे थे..

लंड ढीला होते ही पीयूष उठकर बाथरूम की तरफ गया.. पिंटू तो इन्टरवल के पहले ही छु-मंतर हो गया था.. कविता और शीला अब अकेली थी.. कविता उठकर शीला की बगल वाली सीट पर आकार बैठ गई.. ताकि उससे बात कर सकें

कविता: "भाभी.. आपने मेरी बरसों की तमन्ना पूरी कर दी.. आपका ये एहसान मैं ज़िंदगी भर नहीं भूलूँगी.. "

शीला: "कौन सी इच्छा??"

कविता: "पिंटू के साथ मूवी देखते हुए मजे करने की.. "

शीला: "हम्म.. तो फिर मजे किए की नहीं!! क्या क्या किया.. बता मुझे.. अच्छा हुआ ना जो तूने ब्रा और पेन्टी नहीं पहनी.. पहनी होती तो कितनी तकलीफ होती तुम दोनों को.. !! "

कविता: "हाँ भाभी.. आपकी सलाह मुझे बड़े काम आई.. पिंटू ने अंदर तक उंगली डाल दी थी.. इतना मज़ा आया की क्या बताऊँ!! और दोनों बॉल मसलते हुए मेरी निप्पलों को ऐसा कुरेद दिया है की अब तक जलन हो रही है!!"

शीला: "घर जाकर पीयूष से अपनी निप्पल चुसवा लेना.. जलन कम हो जाएगी.. तूने पिंटू का पकड़ा था क्या?"

कविता: "पकड़ा तो था.. पर चूस नहीं पाई.. मेरा बहोत दिल कर रहा था उसका चूसने का.. "

शीला: "तुझे पसंद है लंड चूसना?? पीयूष तो कह रहा था की मैं तुझे लंड चूसना सिखाऊँ.. और तू उसका मुंह में ही नहीं लेती..."

कविता: "आप तो जानती हो ना भाभी.. घर की मुर्गी दाल बराबर.. प्रेमी का लंड चूसना मुझे पसंद है.. पति का लंड मुंह में लेने में वो मज़ा कहाँ.. !! और इन पतियों का एक बार चूस लो तो हररोज लंड निकालकर मुंह के सामने रख देंगे.. "

शीला और कविता बातें कर रहे थे उतने में पीयूष पॉपकॉर्न ले कर आ गया.. कविता वापिस अपनी सीट पर जाकर बैठ गई और पीयूष उन दोनों के बीच में बैठ गया

शीला ने धीमे से पीयूष के कान में कहा "पॉपकॉर्न वाली उंगली कविता की चुत में मत घुसाना.. वरना जलने लगेगा उसे"

पीयूष: " कुछ भी कहो भाभी.. आप बड़ा मस्त चूसती हो!!"

शीला: "अरे मेरे राजा.. तू एक रात के लिए मुझे मिल.. दो घंटे तक तेरा लंड मुंह से नहीं निकालूँगी"

पीयूष: "आप तो जबरदस्त हो भाभी.. "

कविता: "ये तुम दोनों कब से क्या गुसपुस कर रहे हो? पीयूष तू मेरे साथ मूवी देखने आया है या भाभी के साथ? कब से उनके साथ चिपका हुआ है!"

पीयूष: "क्या यार कविता!! कुछ भी बोल रही है तू.. भाभी अकेले है तो वो बोर न हो जाएँ इसलिए कंपनी दे रहा था उन्हे"

कविता: "हाँ तो सिर्फ कंपनी ही देना.. कुछ और नहीं.. समझा!!"

हॉल में फिर से अंधेरा छा गया.. और उस अनजान शख्स ने अपने लंड से रुमाल हटा दिया.. जैसे चमकती बिजली में सांप नजर आता है वैसे ही पिक्चर की रोशनी में उसका लंड चमक रहा था.. लाल लाल सुपाड़े की नोक पर वीर्य की एक बूंद उभर आई थी.. शीला भूखी नज़रों से उसे तांक रही थी.. काफी तगड़ा मोटा लंड था.. पर उस अनजान शख्स का साथ उलझने में उसे डर लग रहा था.. इसलिए शीला ने अपने आप को रोक रखा.. पर दो घड़ी के लिए उसका भोसड़ा लालच में तो आ ही गया था.. शीला के चुपचाप बैठने के बावजूद उस आदमी ने अपना लंड उसके दर्शन के लिए खुला ही छोड़ दिया.. उसे आशा थी की लंड को देखकर कहीं शीला का मन कर जाएँ..

दो तीन मिनट के बाद, पिंटू वापिस कविता के पास आकार बैठ गया.. दूसरी तरफ पीयूष अपने हाथों से शीला के गदराए जोबन पर नेट-प्रेक्टिस कर रहा था.. पिंटू ने भी वही हरकत कविता के स्तनों के साथ शुरू कर दी

शीला ने अब अपने ब्लाउस के सारे हुक खोल दिए.. एक स्तन को पीयूष मसल रहा था और दूसरे स्तन पर उसने उस अनजान आदमी का हाथ पकड़कर रख दिया.. उस आदमी को दौड़ना था और स्लोप मिल गया.. वह बेरहमी से शीला के एक स्तन को मरोड़ने मसलने लग गया..

दो स्तन.. दो अलग अलग आदमी से एक साथ मसलवा रही साहसी शीला ने हिम्मत करके उस अनजान आदमी का लंड अपनी मुठ्ठी में पकड़ लिया और हिलाने लग गई.. उसके दूसरे हाथ में पीयूष का लंड था.. दो हाथ में दो लंड.. और फिर भी उसकी भोस खाली.. ये कैसी विडंबना!!! शीला को अपने भोसड़े के लिए सहानुभूति हो रही थी.. उस शख्स के लंड की साइज़ देखकर शीला फिदा हो गई.. और उसे जीवा और रघु के दमदार लंड की याद भी आ गई।

शीला की निप्पल से खेलते हुए पीयूष ने उनके कान में कहा "भाभी ये क्या कर रही हो आप? कौन है ये आदमी?"

शीला: "किसकी बात कर रहा है तू?"

पीयूष: "उस आदमी की.. जिसका आपने पकड़ रखा है और जो आपके दूसरे स्तन को मसल रहा है.. अभी मेरा हाथ उसके हाथ से टकरा गया"

शीला: "पीयूष.. तुझे मेरे साथ छेड़खानी करते देख.. इन्टरवल में वो मुझे ब्लेकमेल करने लगा.. की अगर मैं उसे नहीं दबाने दूँगी तो वो कविता को जाकर सबकुछ बता देगा.. अब तेरे भले के लिए मुझे एक अनजान आदमी को मेरे शरीर के साथ खेलने की छूट देनी पड़ी.. क्या करती!!"

सुनकर पीयूष चुप हो गया..

पिक्चर खतम होने की थी.. और हर कोई आखिरी पड़ाव पर था.. आखिरी ओवर में २० रन बनाने हो और जिस तरह बेट्समेन चारों तरफ अंधाधुन शॉट लगाता है.. बिल्कुल उसी तरह.. उस पूरी लाइन में धड़ल्ले से स्तन मर्दन पूरे जोश के साथ चल रहा था..

दो दो पुरुषों के साथ एक साथ बबले दबवाते हुए शीला ने एक विचित्र हरकत कर दी

पीयूष के कान में उसने कहा "ये आदमी मुझे मुंह में लेने के लिए कह रहा है.. पर मैं नहीं लेने वाली.. कुछ भी हो जाएँ.. मुझे ये सब नहीं पसंद.. ये तो तेरे भले के लिए मैं अपने बॉल दबवाने के लिए राजी हुई.. अब कंधा दिया तो वो कान में मूतने की बात कर रहा है"

पीयूष: "मत लेना मुंह में भाभी.. पिक्चर अब १० मिनट में खतम हो जाएगा.. तब तक कैसे भी कर के उसे टाल दो.. "

एक दो मिनट के लिए शांत रहकर शीला ने अपना घातक यॉर्कर फेंका..

"पीयूष.. वो मुझे धमकी दे रहा है की अभी के अभी वो कविता को सब बताया देगा.. क्या करू मैं? वो बता देगा तो गजब हो जाएगा"

पीयूष की गांड फट कर फ्लावर हो गई..

"अच्छा.. ब्लैकमेल कर रहा है आपको??"

"हाँ.. अब जल्दी बोल.. क्या करू मैं? अगर ये बता देगा तो कविता तेरी माँ चोद देगी" शीला अब रोहित शर्मा की तरह फटके लगा रही थी

"अब चूस लो भाभी.. और क्या कर सकते है" पीयूष अपनी गांड बचाने में लग गया..

पीयूष का लंड हिलाते हिलाते शीला दूसरी तरफ झुक गई और उस शख्स के फुँकारते लंड को एक पल में मुंह में भर लिया.. वो आदमी तो भोंचक्का रह गया.. और शीला के सिर पर हाथ फेरता रहा.. शीला ने अपने मुंह में उसके लंड को इतना टाइट पकड़ रखा था जैसे मदारी के चिमटे में जहरीला सांप फंसा हो..

सात आठ बार शीला ने लंड को पूरा बाहर निकालकर अपने कंठ तक अंदर घुसा दिया.. और ऐसा चूसा.. ऐसा चूसा की उसके लंड का सारा जहर शीला के मुंह में ही निकल गया.. और उसी के साथ हॉल में रोशनी चालू हो गई.. शीला ने तुरंत उसका लंड मुंह से निकाला और खड़ी हो गई.. अपने बाल ठीक करने लगी.. मुंह में भरे हुए वीर्य को थूकने का मौका नहीं मिल इसलिए वो उस अनजान पुरुष का सारा माल निगल गई.. पीयूष स्तब्ध होकर इस कामुक देवी और उसकी हरकतों को देखता ही रह गया.. शीला को अपने ब्लाउस के हुक बंद करने का समय नहीं मिल इसलिए उसने अपने स्तनों को पल्लू से ढँक दिया था.. शीला ने देखा की पीछे की लाइन में बैठी हुई स्त्री अपने ब्लाउस के हुक बंद कर रही थी.. उसकी नजर शीला से मिली और शीला ने मुस्कुरा दिया.. जैसे उसके राज को पकड़ लिया हो.. उस स्त्री ने अपने होंठ पर उंगली रखकर शीला को इशारा किया.. शीला ने तुरंत अपने होंठ पर चिपके वीर्य को पोंछ लिया.. और उस शरमाते हुए उस स्त्री की तरफ आभार प्रकट करते हुए आगे निकल गई..


रात के १२:३० बज चुके थे.. तीनों रिक्शा में बैठकर घर पहुंचे.. रिक्शा में भी पीयूष, शीला और कविता के बीच में बैठा था.. शीला के स्तन दबाते दबाते कब घर आ गया ये पता ही नहीं चला.. कविता सब देख रही थी.. पर वो क्यों कुछ बोलती?





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रात के १२:३० बज चुके थे.. तीनों रिक्शा में बैठकर घर पहुंचे.. रिक्शा में भी पीयूष, शीला और कविता के बीच में बैठा था.. शीला के स्तन दबाते दबाते कब घर आ गया ये पता ही नहीं चला.. कविता सब देख रही थी.. पर वो क्यों कुछ बोलती?

शीला अपने घर के बरामदे में पहुंचकर बोली "पीयूष, मेरे घर की चाबी तेरे घर पर रखी हुई है.. जरा आकर मुझे दे जाना.. "

कविता और पीयूष अपने घर के अंदर दाखिल हुए.. और पीयूष शीला भाभी के घर की चाबी ढूँढने लगा..

कविता मन में सोच रही थी.. आज शीला भाभी पीयूष को पूरा निचोड़ लेगी.. मेरे लिए कुछ भी नहीं बचने वाला..

पीयूष के लंड पर हाथ सहलाते हुए कविता ने पीयूष को कहा "जा.. भाभी को चाबी देकर आ.. ताला भी खोल देना उनका.. लगता है शीला भाभी को तेरी चाबी पसंद आ गई है"

पीयूष: "क्या यार कविता!! कुछ भी.... !!" कहते हुए पीयूष खुशी खुशी कंपाउंड की दीवार फांद कर शीला के बरामदे में पहुँच गया।

कविता घर के अंदर चली गई थी इसलिए पीयूष ने राहत की सांस ली.. और शीला को चाबी देते हुए कहा "भाभी.. खोल दूँ??"

शीला ने अपना पल्लू हटा दिया.. और अपने पपीते जैसे मदमस्त स्तनों के दर्शन करवाती हुई कामुक आवाज में बोली "हाँ खोल दे पीयूष.. "

कविता अंदर थी पर पीयूष को यह डर था की कहीं वो बाहर न आ जाए.. इसलिए वो अपने दरवाजे पर नजर रखे हुए शीला के घर का ताला खोलने लगा.. उसी वक्त शीला घुटनों के बल झुक गई और पीयूष के लंड को उसके पतलून से बाहर निकाल दिया.. और उसके टोप्पे पर चूमकर बोली






"क्या हुआ पीयूष? इतना वक्त क्यों लग रहा है तुझे खोलने में? छेद नहीं मिल रहा क्या तुझे?"

"अरे भाभी.. आप मुझे मरवा दोगी.. वो कविता अभी बाहर निकलेगी तो अभी के अभी मुझे तलाक दे देगी.. "

कविता किचन की खिड़की से और अनुमौसी बेडरूम से.. शीला और पीयूष के इस मिलन को देख रहे थे.. अनुमौसी ने अपने बेटे के लंड को देखने की बहोत कोशिश की.. पर अंधेरे के कारण नहीं दिखा... सख्त कड़े उत्तेजित लंड को देखे अरसा बीत गया था.. मौसी ने एक निराशा भरी नजर अपने पति चिमनलाल पर डाली.. मोटी तोंद और कमजोर लंड वाला चिमनलाल खर्राटे लेकर सो रहा था.. उसके पूपली जैसे लंड को मौसी ने हाथ से हिलाकर देखा.. मरी हुई छिपकली जैसे लंड ने कोई हरकत नहीं की.. अनुमौसी ने एक गहरी सांस छोड़ी.. और कमर हिला रहे अपने बेटे को देखकर उत्तेजित होकर.. चिमनलाल के मोबाइल को अपने भोसड़े में घुसेड़ दिया.. कविता भी खिड़की से अपने पति का लंड चूस रही शीला को देखते हुए.. और पिंटू को याद करते हुए.. अपनी नेलपोलिश लगी उंगलियों से क्लिटोरिस को कुरेदने लगी..






सास और बहु खिड़की से कमर हिला रहे पीयूष को देखते हुए सोच रहे थे.. ये चोद रहा है या मुंह में दिया हुआ है!!??

शीला ने पीयूष का पूरा लंड मुंह में लेकर इतना चूसा की पीयूष के होश उड़ गए.. पीयूष ताला खोल रहा था उतनी देर में तो शीला ने उसके लंड को झड़वा दिया.. कविता पिंटू के याद में अपनी चुत खुजाते हुए सो गई.. उसे मालूम था की शीला भाभी की पकड़ से छूटने के बाद.. पीयूष के पास उसे देने लायक सख्त लंड बचा ही नहीं होगा.. और फिलहाल उसे जरूरत भी नहीं थी। अनुमौसी भी अपने पति के मोबाइल से मूठ लगाकर.. अपनी बूढ़ी चुत को सहलाते हुए.. उल्टा लेटकर सो गई।






शीला ने मस्ती से पीयूष के लंड को चूस चूस कर खाली कर दिया....

अपने लंड को पेंट के अंदर रखकर चैन बंद करते हुए पीयूष ने कहा "मैं अब चलता हूँ भाभी... ऐसे ही मौके देते रहना.. भूल मत जाना"

शीला: "तेरी जब मर्जी करे चले आना.. मना नहीं करूंगी.. "

पीयूष जाते जाते शीला के दोनों स्तनों को मसलकर गया.. शीला के होंठों पर चमक रही वीर्य की बूंद को देखकर वो मुसकुराते हुए निकल गया।

काश मेरी कविता भी इसी तरह लंड मुंह में लेकर मेरा वीर्य चूसती तो कितना अच्छा होता!! शीला भाभी को अब हाथ में रखना पड़ेगा.. एक बार धड़ल्ले से टांगें फैलाकर चोदना है भाभी को.. भोसड़ा भी मस्त होगा साली का.. और छातियाँ उसकी ये बड़ी बड़ी.. चौबीसों घंटे गरमाई हुई रहती है... बस एक मौका मिल जाएँ.. पीयूष ये सब सोचते सोचते घर में घुस गया.. शीला भी बिस्तर पर गिरते ही सो गई.. और तब उठी जब अनुमौसी का फोन आया..

"अरे बाप रे.. देर हो गई.. आज तो महिला मण्डल के साथ यात्रा पर जाना है" बड़बड़ाते हुए वो झटपट बाथरूम में घुसी और फटाफट जैसे तैसे नहाकर तैयार हो गई.. बाहर निकली तो अनुमौसी के घर के पास एक मिनीबस खड़ी थी.. और अंदर करीब २५ औरतों का झुंड था.. अनुमौसी बस के बाहर शीला का इंतज़ार करते हुए खड़ी थी.. शीला तुरंत अंदर चढ़ गई.. और अनुमौसी को हाथ पकड़कर अंदर चढ़ने में मदद की

अनुमौसी: "तेरे अंदर तो बहोत जोर है शीला.. हम तो अब बूढ़े हो गए!!"

तभी आगे की रो में बैठी एक जवान औरत ने कहा "अरे मौसी, वो तो उनका पति घर पर नहीं है इसलिए सारा जोर बचाकर रखा हुआ है.. अगर पति साथ होते तो उनका सारा जोर निचोड़ लिया होता अब तक.. क्यों ठीक कहा ना भाभी??" शीला उस उँजान औरत के सामने देखकर मुस्कुराई पर कुछ बोली नहीं.. सब अनजान थे इसलिए शीला थोड़ा सा शरमा रही थी

थोड़ी देर बाद.. अनुमौसी शीला की बगल वाली सीट पर आकर बैठ गई.. और उस तरह बैठी की उनके स्तन शीला के कंधों से रगड़कर जाए

अब शीला ये सब हथकंडों से कहाँ अनजान थी!! उसने मौसी से कहा "मौसी, आपकी कविता तो बड़ी ही होशियार है..!!"

अनुमौसी: "अच्छा.. !! ऐसा क्यों लगा तुझे शीला? वैसे तो मेरा पीयूष भी कम होशियार नहीं है.. "

अनुमौसी ने पीयूष का नाम लेकर बड़े ही विचित्र ढंग से शीला की आँखों में देखा.. शीला को एक पल के लिए शक हुआ.. कहीं ये बुढ़िया ने रात को मेरे और पीयूष के बीच के खेल को देख तो नहीं लिया.. !! चलो.. जो भी होगा देखा जाएगा.. चिंता करके कोई फायदा नहीं है

अनुमौसी भजन गाने लगी.. और सारी औरतें उनका साथ देने लगी.. थोड़ी ही देर में वो मिनीबस नजदीक के एक छोटे से शहर पहुंची.. वहाँ के मंदिर में दर्शन करने के बाद सारी औरतें बाजार में शॉपिंग करने निकल पड़ी..

शीला और अनुमौसी साथ में घूम रहे थे.. चलते चलते वो एक दुकान पर पहुंचे जहां बेलन और चकला मिलता था

अनुमौसी ने एक पतला बेलन हाथ में लिया.. और चेक कर वापिस रख दिया.. "ये वाला ठीक नहीं लगता.. मुझे तो मोटा बेलन ही पसंद है"

दुकान वाला शीला के उन्नत स्तनों के बीच की दरार को देखते हुए मुस्कुराकर बोला " हाँ मौसी.. मेरी पत्नी को भी मोटा बेलन ही भाता है.. मेरे घर तो पतला बेलन भी है.. पर वो हमेशा मोटे वाले से ही रोटियाँ बेलती है.. "

इन द्विअर्थी संवाद को सुनते ही शीला की चुत का वो हाल हुआ.. जो गरम तेल में पानी डालने पर होता है.. छम्म छम्म छम्म होने लगा.. अपने आप दोनों जांघें एक दूसरे सट गई.. अपनी चुत को खुजाते हुए शीला ने अनु मौसी से कहा "मुझे भी मोटा बेलन ही पसंद है मौसी.. आप ये मोटा वाला खरीद लीजिए.. ये बढ़िया है.. मोटा और चिकना.. "

अनुमौसी ने बेलन लेकर थैली में रख दिया.. और अपने ब्लाउस में हाथ डालकर पर्स निकाला और ५० का नोट दुकानवाले को देते हुए बोली "आप बड़ा महंगा बेचते हो.. बेलन मोटा है तो इतना भाव थोड़ी होता है!!"

दुकानदार: "मौसी.. बेलन पतला हो या मोटा.. तैयार करने में मेहनत तो लगती है ना!! और मैं बिल्कुल वाजिब दाम में बेचता हूँ.. आप एक बार मेरा बेलन इस्तेमाल करके तो देखिए.. मुझे रोज याद करोगी.. जीतने भी ग्राहक बेलन लेकर जाते है वो फिर से मेरी दुकान जरूर आते है.. मेरा बेलन है ही कमाल का!!"

शीला: "भैया हमे तो जो भी बेलन मिल जाता है उसी से काम चला लेते है" शीला ने मोटे बेलन की नोक पर ऐसे उँगलियाँ फेरी जैसे लंड पकड़ कर मूठ मार रही हो.. दुकानवाले के पसीने छूट गए ये देखकर.. शीला के इस कातिल यॉर्कर से दुकानवाले के स्टम्प उखड़ गए.. अनुमौसी शीला की इस हरकत को देखकर शर्मा गई और हँसते हँसते शीला का हाथ पकड़कर खींचते हुए बोली "अब चल भी.. यहीं रोटियाँ बेलने बैठेगी क्या तू? बड़ी नालायक है तू शीला.. !!"

शीला हँसते हुए दुकान से बाहर निकली और दोनों चलते हुए बस तक पहुंचे.. सब अंदर बैठ गए पर ड्राइवर कहीं नजर नहीं आ रहा था.. सब औरतों को शीला बेलन दिखाते हुए उसपर ऐसे हाथ घुमा रही थी जैसे लंड को सहला रही हो.. शीला का पल्लू हटकर नीचे गिर गया और उसकी उत्तुंग पहाड़ियों को सारी महिलायें देखती ही रह गई.. सारी औरतें ही थी इसलिए शर्म की कोई बात नहीं थी.. शीला भी बेफिक्र होकर जीव के मूसल लंड को याद करते हुए बेलन से खेल रही थी..

एक बूढ़ी औरत ने शीला और अनुमौसी से पूछा " अच्छा.. तो तुम दोनों ऐसा मोटा बेलन ढूँढने गई थी बाजार में.. "

अनुमौसी: "क्या चम्पा बहन आप भी!! मोटे बेलन की जरूरत तो सब को पड़ती है.. आप तो ऐसे बोल रही है जैसे आपको मोटा पसंद ही नहीं है"

चम्पा मौसी: "मेरे घर तो कपड़े धोने की बढ़िया सी मोटी थप्पी है इसलिए मुझे तो बेलन की जरूरत ही नहीं पड़ती" शरारती मुस्कान के साथ उस बुढ़िया ने कहा

तभी एक जवान औरत ने कहा "हमारे घर तो हमारे पतिदेव ही काफी है.. इसलिए थप्पी या बेलन की जरूरत ही नहीं पड़ती" शीला ने तुरंत उस औरत का नाम पूछ लिया

उस औरत ने शीला के स्तनों को तांकते हुए बड़े कामुक स्वर में अपना नाम बताया "रेणुका.. "

वापिस आते हुए रास्ते में शीला ने रेणुका के साथ दोस्ती कर ली और उसका मोबाइल नंबर भी ले लिया.. रेणुका करीब ३२ की उम्र की गोरी चीट्टी दो बच्चों की माँ थी.. शीला ने बाकी औरतों पर नजर घुमाई.. पर एक भी उसे अपने लायक नहीं लगी..

शहर से बाहर बस पहुंची.. एक पीपल के पेड़ की छाँव के नीचे ड्राइवर ने बस रोक दी.. सारी महिलायें नीचे उतरी.. और चटाई बिछाकर खाना खाने बैठ गई.. सब ने मिलकर घर से लाए भोजन को बाँट के खाया.. और तृप्त होकर वहीं चटाई पर लेट गई.. औरतों को दोपहर की नींद, रात के सेक्स जितनी ही पसंद होती है.. कुछ औरतें तो दोपहर को इसलिए सो जाती है ताकि रात को देर तक जागकर चुदवा सकें..


एक घंटा सोने के बाद सब जाग गए.. पास ही की एक टपरी पर सबने मसालेदार चाय का लुत्फ उठाया.. तभी रोड के किनारे पर बहते झरने को देखकर.. कुछ जवान औरतों का मन कर गया की पानी में थोड़ी से छब छब की जाएँ.. शीला, रेणुका और उनके साथ कुछ औरतें झरने के किनारे पर जा पहुंची.. नहाने के लिए अलग से कपड़े तो थे नहीं.. और आजूबाजू कोई नजर नहीं आ रहा था.. इसलिए वो औरतें अपनी साड़ी उतारकर.. ब्लाउस और पेटीकोट में ही घुटनों तक गहरे पानी में कूदने के लिए तैयार होने लगी..

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एक घंटा सोने के बाद सब जाग गए.. पास ही की एक टपरी पर सबने मसालेदार चाय का लुत्फ उठाया.. तभी रोड के किनारे पर बहते झरने को देखकर.. कुछ जवान औरतों का मन कर गया की पानी में थोड़ी से छब छब की जाएँ.. शीला, रेणुका और उनके साथ कुछ औरतें झरने के किनारे पर जा पहुंची.. नहाने के लिए अलग से कपड़े तो थे नहीं.. और आजूबाजू कोई नजर नहीं आ रहा था.. इसलिए वो औरतें अपनी साड़ी उतारकर.. ब्लाउस और पेटीकोट में ही घुटनों तक गहरे पानी में कूदने के लिए तैयार होने लगी..

रेणुका ने साड़ी का पल्लू हटाकर सबसे पहले अपनी अद्भुत जवानी की झलक दिखाई.. मध्यम उम्र का जिस्म.. गदराए गोरे स्तन और ब्रा की पट्टी ब्लाउस से नजर आ रहे थे.. उन स्तनों को देखते ही शीला आकर्षित हो गई.. रेणुका की सख्त निप्पल थोड़ी सी लंबी थी.. उसकी गहरी नाभि देखकर शीला की चुत में झटके लगने शुरू हो गए.. हल्की चर्बी वाला गोरा गोरा पेट और कमर.. चेतना से करीब ५ साल छोटी थी रेणुका.. पर बेहद आकर्षक थी.. रेणुका के जिस्म के पूरे भूगोल का मुआयना करने के बाद शीला ने कहा





"दो बच्चों के बावजूद आपने बॉडी को अच्छा मैन्टैन किया हुआ है.. " रेणुका हंसने लगी पर कुछ बोली नहीं

चम्पा मौसी: "उसने मैन्टैन नहीं किया.. पर उसके पति ने करवाया है.. बहोत खयाल रखता हो वो रेणुका का.. क्यों ठीक कहा ना मैंने??"

रेणुका ने चम्पा मौसी के कूल्हों पर हल्की सी चपेट लगाते हुए कहा "अब चुप भी करो मौसी.. नहीं तो मैं आपका भी वस्त्राहरण कर दूँगी.. " कहकर वो दुशासन की तरह चम्पा मौसी की साड़ी खींचने लगी..

सारी औरतें मस्ती करते हुए पानी में उतरने लगी.. पानी को देखते ही हर कोई बच्चा बन जाता है.. रेणुका का घाघरा गीला होकर उसकी गांड की दरार में घुस गया था.. गहरे पानी में कमर तक उतर चुकी शीला ने रेणुका के चूतड़ों का आकार देखकर.. पानी के अंदर ही अपने भोसड़े के बेर को घिसकर ठंडा करने की कोशिश की.. सिसकियाँ भरते हुए वो रसिक, जीवा और रघु के लंड को याद करने लगी ताकि उसके भोसड़े का जल्दी छुटकारा हो.. आखिर उसकी चुत ने झरने के पानी को पवित्र कर ही दिया..






नहाते हुए पानी उछालते रेणुका शीला के करीब आई.. शीला के भीगे हुए पतले कॉटन ब्लाउस में दोनों स्तन एकदम तंग थे.. वो भी बिना ब्रा के.. रेणुका बस देखती ही रह गई.. शीला ने रेणुका के मुँह पर पानी उछालकर उसकी समाधि भंग की "क्या देख रही है यार!!"

रेणुका शर्मा गई.. फिर हिम्मत करते हुए वो शीला के करीब आई और धीमे से उसके कान में फुसफुसाई.. "बड़ी कातिल लग रही हो तुम शीला"

शीला के लिए अपनी तारीफ सुनना कोई नई बात नहीं थी.. पर फिर भी उसे सुनकर अच्छा लगा.. उसने रेणुका के चूतड़ों पर हाथ फेरते हुए कहा

"तू भी कुछ कम नहीं है रेणुका.. " दोनों कमर तक पानी के अंदर थी.. इसलिए उनकी हरकत सबकी आँखों से छुपी हुई थी.. सब अपनी मस्ती में मस्त थी.. शीला अभी भी रेणुका के कूल्हों से खेल रही थी.. और रेणुका भी मजे लेकर शीला के साथ अपनी दोस्ती को गाढ़ा करने में जुट गई।







दिन के उजाले में.. भरी दोपहर में.. शीला रेणुका के चूतड़ों के दरार में उंगली फेरते हुए अपने पासे फेंक रही थी

शीला: "ये बता रेणुका.. मेरे घर कब आओगी?"

रेणुका: "जब तुम बुलाओ.. मेरे वो ऑफिस के लिए निकले उसके बाद मैं फ्री होती हूँ.. तुम आ जाओ मेरे घर पर"

शीला: "जरूर आऊँगी.. पर पहले तुम मेरे घर आओ.. "

रेणुका: "अब बस भी करो शीला.. तुम्हारा हाथ जरूरत से कुछ ज्यादा ही आगे बढ़ गया है"

शीला की उँगलियाँ दरार से आगे निकल कर रेणुका की गांड के छेद तक पहुँच गई थी।

शीला: "क्यों तुम्हें अच्छा नहीं लगा?"

रेणुका: "अच्छा क्यों नहीं लगेगा भला.. !! पर आजू बाजू देखो तो सही.. सब यहाँ मौजूद है.. हम अकेले थोड़ी है"

शीला: "हाँ वो तो मैं भूल ही गई.. एक बात कहूँ.. तुम बहोत सुंदर हो रेणुका"

रेणुका: "जिसे कदर होनी चाहिए वो ही तारीफ ना करे तो ये सुंदरता किस काम की!!"

शीला: "ऐसा क्यों बोल रही है? तेरे पति तुझे प्यार नहीं करते क्या?"

रेणुका: "उन्हे टाइम ही कहाँ मिलता है.।!! बिजनेस से फुरसत मिले तो मुझे प्यार करे ना!! रात को देर से आकर टीवी देखते देखते सो जाते है.. कभी उनका मूड हो तब मैं थकी हुई रहती हूँ, इसलिए कुछ नहीं हो पाता.. अपने ही घर में हमारी जरूरतों को ही नजर अंदाज किया जा रहा है"

पीछे खड़ी अनुमौसी इन दोनों के संवाद को बड़े चाव से सुन रही थी.. उनसे रहा नहीं गया और बोल पड़ी

अनुमौसी: "शुरू शुरू में ये मर्द हमे सब कुछ सीखा सीखा कर बिगाड़ते है.. और फिर वही सब हम करना चाहे तो कहते है "कैसी गंदी गंदी चीजें करने को कह रही हो" अब बोलो.. क्या करें इनका.. "

रेणुका: "बिल्कुल सच कह रही हो मौसी.. मुझसे तो कहा भी नहीं जाता और सहा भी नहीं जाता.. बुरी फंसी हूँ मैं.. "

शीला: "मौसी मेरे पास इन सारी समस्याओं का हल है.. पर आप मेरे बारे में गलत सोचेगी ये सोचकर कुछ बोलती नहीं मैं"

अनुमौसी: "अरे शीला.. मैं क्यों तेरे बारे में गलत सोचूँगी.. !! तू भी मदन के बिना २ सालों से तड़प रही है.. मैं समझ सकती हूँ"

रेणुका: "क्या बात कर रही हो!! २ साल से अकेली है तू शीला?? बाप रे!! मुझे तो एक हफ्ता बीत जाएँ तो ऐसा लगता है जैसे सालों हो गयें..तुम तुम्हारी रातें अकेले कैसे बिताती हो??"

शीला: "ये सब बातें करके मेरा दिमाग खराब मत करो तुम सब.. चलो.. बहोत देर हो गई है.. कब तक नहाते रहेंगे!!"

रेणुका: "घर जाकर भी क्या करना है!! वहीं सब झाड़ू-पोंछा, सफाई, खाना पकाना.. और पति का इंतज़ार करना.. इससे अच्छा यहीं पानी में पड़े रहते है.. कम से कम नीचे ठंडक तो मिल रही है.. घर में तो दिमाग खराब हो जाता है मेरा!!"

रेणुका की आवाज का दर्द शीला महसूस कर सकती थी.. कमर तक डूबी हुई रेणुका का हाथ पकड़ लिया उसने.. पानी के अंदर किसी को ये नजर नहीं आ रहा था.. रेणुका का हाथ खींचकर शीला ने घाघरे के नीचे अपनी भोस पर रख दिया.. चुत का स्पर्श होते ही रेणुका स्तब्ध रह गई

रेणुका: "ये क्या कर रही हो शीला?? कुछ तो शर्म करो.. !!"

शीला: "मैं तुम्हें ये बताना चाहती हूँ की पानी में रहने से ये ठंडी नहीं होती.. देखो.. कैसे तप रही है!!"

अनुमौसी: "अरे नासपीटी शीला.. शर्म बेच खाई है क्या तूने!! कब सुधरेगी तू!!??"

शीला: "इसमें मैंने क्या गलत क्या मौसी? ये रेणुका बोल रही थी की पानी में रहने से नीचे ठंडक मिलती है.. कुछ ठंडक नहीं मिलती.. ठंडक के लिए कुछ जुगाड़ लगाना पड़ता है.. सिर्फ उँगलियाँ अंदर डालने से बच्चे पैदा नहीं होते.. जहां जिस चीज की जरूरत हो वहाँ वो ही चीज काम करती है.. समझे!!" तीनों एक दूसरे के करीब खड़े गुसपुस कर रही थी.. और साथ ही अपने जीवन के सबसे जटिल प्रश्न का हल ढूँढने का प्रयत्न कर रही थी

ड्राइवर के बार बार हॉर्न बजाने पर सारी औरतें बाहर निकली.. पेड़ के तने के पीछे जाकर कपड़े निचोड़कर सुखाए.. और फिर मज़ाक मस्ती करते हुए बस में बैठ गए.. अनुमौसी, रेणुका और शीला एक साथ बैठे थे। अनुमौसी कुछ कहना चाहती थी पर हिचक रही थी.. ऐसा लगा शीला को.. पर वो कुछ बोली नहीं.. रेणुका शीला के साथ अपनी दोस्ती को ओर घनिष्ठ करने लगी.. शीला भी रेणुका से करीब होती चली..

जब बस अनुमौसी के घर के बाहर आकर रुकी तब तक रेणुका और शीला अच्छी सहेलियाँ बन चुकी थी.. घर जाने से पहले रेणुका शीला के गले लगी और बोली "कल फोन करना मुझे.. भूल मत जाना.. " रेणुका के जिस्म की भूख शीला अच्छी तरह से महसूस कर पा रही थी

रात के ९ बज रहे थे..

अनुमौसी: "अब इतनी रात को तू अपने लिए कहाँ खाना बनाने बैठेगी!! आजा मेरे घर.. कविता ने खाना तैयार रखा हुआ है.. मेरे घर ही खा लेना.. "

शीला को थोड़ा सा संकोच जरूर हुआ पर वो अनुमौसी को मना नहीं कर पाई.. शीला को लेकर अनुमौसी अपने घर के अंदर पहुंची

"आइए शीला जी" गोल बिस्तर जैसे शरीर वाले, अनुमौसी के पति, चिमनलाल ने शीला का स्वागत किया.. टीवी देखते हुए वो खैनी चबा रहे थे

शीला के सुंदर शरीर ने जैसे ही घर में प्रवेश किया.. अनुमौसी का पूरा घर जगमगा उठा.. उस गदराए जिस्म को ताड़ते हुए चिमनलाल बाहर खैनी थूकने चले गए..

"ओहहों भाभी.. आप!! आइए आइए " पीयूष ने शीला के जिस्म को अपनी आँखों से ही सहलाते हुए कहा.. उसका बस चलता तो शीला को वहीं दबोचकर ऊपर से नीचे तक चूम लेता.. पीयूष के सामने देखकर शीला ऐसे मुस्कुराई के पीयूष के घुटने कमजोर हो गए.. रात का सीन याद आ गया उसे..

अनुमौसी बाथरूम में गए और कविता किचन में खाना तैयार करने में व्यस्त थी.. शीला ने दरवाजे के बाहर देखा तो चिमनलाल कहीं नजर नहीं आए.. ड्रॉइंगरूम में शीला और पीयूष अकेले ही थी.. एक ही पल में शीला ने पीयूष को अपनी तरफ खींचा और कस के चूम लिया.. शीला के इस अचानक आक्रमण से पीयूष के पसीने छूट गए.. शीला ने पेंट के ऊपर से पीयूष के लंड को मुठ्ठी में लेकर दबा दिया.. और पीयूष के डेटाबेज़ में अपना अकाउंट रीन्यू कर लिया.. पीयूष को तब होश आया जब कविता ने उसे किचन से आवाज दी.. घबराया हुआ पीयूष अपने आप को शीला की पकड़ से छुड़ाते हुए दौड़ कर अंदर चला गया

शीला मुसकुराते हुए अनुमौसी का इंतज़ार करते टीवी देखने लगी.. तभी अनुमौसी बाथरूम से आए..

थोड़ी देर में कविता ने किचन से आवाज लगाई "शीला भाभी.. कैसी हैं आप?"

शीला: "ठीक हूँ कविता.. पर तेरे जैसी ठीक तो नहीं हूँ.. तुम जवान लोगों के मजे है.. तकलीफ तो हम जैसे लोगों को ही है"

अनुमौसी ये सुनकर हंसने लगी..

दो थालियों में खाना परोसकर पीयूष बाहर लेकर आया.. और शीला की आँखों में देखते हुए थाली रखकर बोला "खाना खा लीजिए भाभी"

दोनों की आँखें आपस में नैन-मटक्का कर रही थी.. सब कुछ जानते हुए भी अनजान बनकर अनुमौसी इस द्रश्य का मज़ा ले रही थी

अंदर किचन में रोटियाँ बेलते हुए कविता.. पिंटू के संग मल्टीप्लेक्स में उड़ाएं गुलछर्रे याद कर रही थी.. शीला ने जिस तरह दो दो लंड एक साथ पकड़कर हिलाए थे वो सीन याद करते हुए पीयूष भी उत्तेजित हो रहा था और शीला उस अनजान आदमी के लंड को याद करते हुए अपनी चुत खुजा रही थी..

तभी कविता किचन से थालियाँ और बाकी का खाना ले कर आई.. पीयूष शीला की बगल में बैठ गया.. कविता ने टेबल पर थाली रखने से पहले अपने पल्लू को छाती पर ठीक से दबाकर रखा.. वरना उसके झुकते ही जो द्रश्य दिखता उससे शीला की चुत व्याकुल हो जाती..

यहाँ वहाँ की बातें करते हुए सब खाना खाने लगे.. २० मिनट में सबने खा लिया था.. शीला गप्पे लड़ाते हुए थोड़ी देर बैठी रही.. और फिर उठते हुए बोली "मैं अब चलती हूँ मौसी.. पूरे दिन की थकान है.. नींद आ रही है मुझे"

अनुमौसी: "ठीक है शीला.. आते रहना.. "

पीयूष के सामने अपनी आँखें नचाते हुए शीला निकलने लगी.. किचन से कविता ने भी हाथ हिलाकर उन्हें "बाय" कहा.. घर से बाहर निकलते.. दरवाजे पर, अनुमौसी के पति चिमनलाल अंदर आ रहे थे.. शीला और चिमनलाल दोनों एक साथ टकरा गए.. शीला के बड़े बड़े भोंपू चिमनलाल की रुक्ष छाती से टकरा गए.. शीला शर्मा गए और वहाँ से भाग निकली.. चिमनलाल का लंड, शीला की मादक खुशबू सूंघते ही.. अंगड़ाई लेकर उठने लगा.. जैसे ५ साल के बाद कुंभकर्ण की निंद्रा टूटी हो!!

"साली.. मेरी वाली भी इसके जैसी करारी होती.. तो मज़ा ही आ जाता.. ये अनु तो कुछ करती ही नहीं है.. उसे देखकर तो उठा हुआ लंड भी लटक जाएँ" चिमनलाल सोचते सोचते घर के अंदर पहुंचे

चिमनलाल अपने बेडरूम के अंदर गए और बिस्तर पर लेट गए.. उनके पीछे पीछे अनुमौसी भी अंदर आई और बेडरूम का दरवाजा बंद कर लिया। जैसे ही उन्होंने अपने ब्लाउस के हुक खोले, उनके दोनों ढीले स्तन लटकने लगे.. देखकर चिमनलाल ने गहरी सांस छोड़ी.. एक तरफ वो शीला के बॉल.. और उसके मुकाबले ये अनु के दो पिचके हुए थन.. आह्ह शीला ने तो आज मुझे जवानी की याद दिला दी.. एक बार मिल जाएँ तो आज भी उसे पूरी रात चोदने की ताकत रखता हूँ.. पर इस अनु को तो देखकर ही मेरी सारी इच्छाएं खतम हो जाती है.. ८० के दशक का पुराना बजाज.. जो २५ बार किक मारने पर भी चालू न हो.. वैसा ही हाल है अनु का.. और बजाज को तो झुकाकर भी चालू कर सकते है.. पर इसका क्या करें?? अब जैसी मेरी किस्मत.. चिमनलाल सोचता रहा

शीला अपने घर पहुंचकर बिस्तर पर लेट गई "वो चिमनलाल जानबूझकर मुझसे टकराया था क्या!! रास्ता तो काफी चौड़ा था.. मेरा ध्यान नहीं था पर उन्हे तो नजर आ रहा था.. वो चाहता तो ये भिड़ंत नहीं होती.. लगता है बूढ़ा जानबूझकर ही टकराया था.. और उसके मुंह से खैनी की कितनी गंदी बदबू आ रही थी.. छीईईई.. "

सिनेमा हॉल में पीयूष के साथ बिताया समय याद करने लगी शीला "कितना हेंडसम है पीयूष!! उसके होंठ भी लाल लाल है.. मस्त चिकना है.. उसका लंड थोड़ा सा दमदार होता तो ओर मज़ा आ जाता" आगे एक विचार ये भी आया "तगड़े लंड की कमी पूरी करने के लिए रसिक और जीवा तो है ही.. "

जीवा के लंड की याद आते ही शीला सिहर उठी.. ये पीयूष का लंड तो जीवा के मुकाबले पतली सी पुंगी जैसा ही है.. हाय.. आज का पूरा दिन बिना चुदाई के ही बीत गया.. शीला ने अपनी भोस पर हाथ फेरा.. लंड तो तरह तरह के देखे.. पर जीवा और रघु जैसा लंड आजतक नहीं देखा था.. अपने गाउन की ऊपर की चैन खोलकर अपने एक स्तन बाहर निकाला शीला ने.. निप्पल पर थूक वाली उंगली लगाकर वो कल्पना करने लगी की जैसे पीयूष उसकी निप्पल को चूस रहा हो.. चूचक गीला होते ही शीला के दोनों स्तन कठोर होने लगे.. आज उसे अनुमौसी और रेणुका के नए स्वरूप के दर्शन हो गए यात्रा के दौरान.. अनुमौसी ने जब साड़ी उतारी.. तब उनके पेट की चर्बी क्या मस्त लटक रही थी.. और वो चम्पा मौसी की जांघें.. आहहाहहहहा.. रेणुका के चूतड़.. ईशशशश.. अपनी चुत को सहला रही शीला के चेहरे पर मुस्कान आ गई.. आज रेणुका की गांड के छेद तक हाथ पहुँच ही गया था.. उसने माना न किया होता तो बेशक गांड में उंगली घुसा देती शीला.. एक बार उस रेणुका की मदमस्त गांड पर चुत रगड़नी है.. आहहह.. ४४० वॉल्ट का झटका लगा शीला के भोसड़े में.. कुछ भी नया कामुक विचार दिमाग में आते ही उसकी चुत में आग लग जाती थी..


शीला की नजर घर में चारों तरफ घूमने लगी.. क्या करू? बिना लंड के अब रहा नहीं जाता.. उसने अपने कूल्हों के नीचे गोल तकिया रख दिया.. गाउन ऊपर किया.. और अपनी चिकनी खंभे जैसी जांघों पर हाथ फेरने लगी.. अभी कोई मर्द हाथ लगे तो उसे कच्चा चबा जाने का मन कर रहा था शीला का.. क्लिटोरिस पर हाथ थपथपाते वो दूसरे हाथ से अपनी चूचियाँ मसलने लगी..

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शीला की नजर घर में चारों तरफ घूमने लगी.. क्या करू? बिना लंड के अब रहा नहीं जाता.. उसने अपने कूल्हों के नीचे गोल तकिया रख दिया.. गाउन ऊपर किया.. और अपनी चिकनी खंभे जैसी जांघों पर हाथ फेरने लगी.. अभी कोई मर्द हाथ लगे तो उसे कच्चा चबा जाने का मन कर रहा था शीला का.. क्लिटोरिस पर हाथ थपथपाते वो दूसरे हाथ से अपनी चूचियाँ मसलने लगी..

तभी शीला के मोबाइल की रिंगटोन बजी 🎵🎵..भीगे होंठ तेरे.. प्यासा दिल मेरा.. 🎵🎵

शीला के रंग में भंग पड़ा.. उसने फोन का स्पीकर ओन करके बाजू में रख दिया.. और अपनी भोस को रगड़ते हुए बोली






"हैलो.. !!"

"शीला.. मैं रेणुका बोल रही हूँ"

"अरे.. कैसी हो रेणुका!! इतनी रात को कॉल किया?? कुछ काम था क्या?"

रेणुका: "बिस्तर पर अकेली पड़ी थी.. सोचा सब सहेलियाँ तो अपने पति की बाहों में होगी.. एक तुम ही अकेली हो तो सोचा तुम्हें फोन करू.. गलत टाइम पर तो फोन नहीं किया ना मैंने?"

शीला: "नहीं नहीं.. मैं भी बिस्तर पर ही थी.. अकेले रहकर जो काम करना पड़ता है वहीं कर रही थी.. " शीला ने इशारे से बता दिया की वह मूठ मार रही थी

"मैं भी वही कर रही हूँ" सिसकी भरते हुए रेणुका ने कहा






शीला: "क्या बात है.. तुम यहाँ क्यों नहीं आ जाती!! दोनों साथ में करते है.. तू आटा गूँदना और मैं रोटियाँ बनाऊँगी.. तुझे आज पानी में भीगी हुई देखने के बाद मुझे कब से कुछ कुछ हो रहा है.. " शीला ने गुगली बॉल फेंका "आज पानी में बहुत मज़ा आया.. है ना.. !!"

रेणुका: "हाँ यार.. सच में मज़ा आ गया आज तो.. उफ्फ़ शीला.. अभी मैं नजदीक होती तो जरूर तेरे घर पहुँच जाती.. पर क्या करू!! एक काम करती हूँ.. कल आती हूँ तेरे घर.. ऐसे ही निठल्ली बैठी रहती हूँ पूरा दिन घर पर.. मेरे पति काम के सिलसिले में कलकत्ता गए हुए है.. एक हफ्ते बाद लौटेंगे.."

शीला: "अच्छा ये बात है.. !! तो तू एक काम कर.. अपने २-३ जोड़ी कपड़े साथ लेकर ही आना.. हाय रेणुका.. तू जल्दी आ जा.. ऐसे मजे करेंगे की तू अपने पति को भी भूल जाएगी.. "

रेणुका: "क्या सच में शीला?? फिर तो मैं कल पक्का तेरे घर आ जाऊँगी.. वैसे भी मैं इस ज़िंदगी से ऊब चुकी हूँ.. चल रखती हूँ.. कल मिलते है"

रेणुका ने फोन कट कर दिया

शीला को पता चल गया.. रेणुका भी उसकी तरह अकेलेपन से झुँझ रही थी.. रात के ११:३० बजे दो दो भूखे भोसड़े अपने घर में तड़प रहे थे.. पर उनके अलावा दो और चूतें भी थी जो फड़फड़ा रही थी.. रूखी और चम्पा मौसी की

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अनुमौसी कपड़े बदलकर चिमनलाल की बगल में लेट गई.. चिमनलाल ने अनुमौसी को खींचकर अपने ऊपर लेकर दबा दिया.. अनुमौसी चौंक गई.. इनको क्या हो गया आज अचानक!! कहीं आज बिन बादल बरसात तो नहीं होनेवाली??

चिमनलाल ने अनुमौसी को उत्तेजना से मसल दिया.. ऐसा मसला की अनुमौसी का बूढ़ा ढीला भोसड़ा भी पानी पानी हो गया.. मौसी ने चिमनलाल के पाजामे के अंदर हाथ डालकर उनके लंड का मुआयना किया.. कमीना ऐसे ही मिसकॉल तो नहीं मार रहा है ना!! खाते में बेलेन्स है भी या बिना रिचार्ज के लगा हुआ है!! अरे बाप रे.. ये क्या.. आज इनका लंड खड़ा कैसे हो गया.. ?? क्या कारण होगा?

बिना एक भी पल गँवाए.. अनुमौसी ने चिमनलाल के ग्राउन्ड-फ्लोर पर कब्जा कर लिया.. और बहोत सालों के बाद सख्त हुए चिमनलाल के लंड को चूसना शुरू कर दिया.. चिमनलाल भी अनुमौसी के विशाल चूतड़ों पर हाथ फेरते हुए गांड और भोस दोनों के छेदों को कुरेदने लगा.. जैसे पहली बारिश में मोर पंख फैलाकर नाचता है.. वैसे ही अनुमौसी की चुत नाचने लग गई.. और डबल जोर से चिमनलाल की ह्विसल को चूसने लगी..






चिमनलाल: "अरे यार.. खा जाएगी क्या? तू तो ऐसे टूट पड़ी जैसे पहली बार लंड देखा हो.. जरा धीरे धीरे.. !!"

पर अनुमौसी फूलफॉर्म में थी.. और चिमनलाल की बात सुनने के मूड में नहीं थी.. भूखी शेरनी की तरह वो चिमनलाल के लंड पर टूट पड़ी थी.. और लंड के साथ उनके आँड भी चूस रही थी.. चिमनलाल ने भी एक साथ चार चार उँगलियाँ मौसी के भोसडे में दे दी.. और अंदर बाहर करने लगे..

बेचारा चिमनलाल.. मौसी के आक्रमण के आगे और टीक नहीं पाया.. और उनके मुंह में ही झड गया..

चिमनलाल: "बस अब छोड़ भी दे.. दर्द हो रहा है मुझे.. तेरी भूख अब भी शांत नहीं हुई क्या?"

अनुमौसी: "आप हमेशा ऐसा ही करते हो.. जब मुझे ठंडा करने की ताकत नहीं है तो गांड मराने गरम करते हो मुझे!! अब मैं कहाँ जाऊ?? इसे ठंडा कौन करेगा.. तुम्हारा बाप??" अपने भोसड़े की ओर इशारा करते हुए मौसी बोली.. हवस की गर्मी बर्दाश्त ना होने के कारण अनाब शनाब बकने लगी थी वो..

चिमनलाल ने एक शब्द भी नहीं कहा और करवट बदलकर सो गया.. मौसी को इतना गुसा आया.. उनका मन कर रहा था की अभी चिमनलाल का गला घोंट दे.. मौसी गाउन पहनकर खड़ी हुई.. किचन में गई और नया खरीदा हुआ मोटा बेलन वहीं खड़े खड़े अपनी भोस में अंदर बाहर करने लगी..

अंधेरे में खड़ी हुई मौसी की आँखें तब चौंधिया गई जब किसी ने अचानक किचन की लाइट चालू कर दी.. वो कविता थी.. एकदम नंगी.. किचन में पानी पीने आई थी.. उसे अंदाजा नहीं था की इस वक्त किचन में कोई होगा.. अपनी सास को खड़ी देख वो शरमाकर अपने बेडरूम में भागकर चली गई.. फटाफट गाउन पहना और वापिस आई.. वो शर्म से पानी पानी हुई जा रही थी.. ये क्या हो गया मुझसे!! सासुमाँ ने मुझे नंगा देख लिया.. वो क्या सोच रही होगी मेरे बारे में.. ये कमबख्त पीयूष रोज रात को मुझे नंगी ही सुलाने की जिद करता है.. !!

अनुमौसी भी सहम गई.. अच्छा हुआ की उन्होंने गाउन पहना हुआ था और जब कविता अंदर आई तब उनकी पीठ उसकी तरफ थी.. वरना वो क्या सोचती?? कविता गाउन पहनकर वापिस आई तब तक मौसी आँखें झुकाकर अपने कमरे में चली गई..

अपनी सास के जाने के बाद, कविता ने पानी पिया.. तभी उसकी नजर प्लेटफ़ॉर्म पर पड़े बेलन पर गई.. ये बेलन कहाँ से आया?? सारे बर्तन तो धोकर अंदर रखे थे.. बेलन हाथ में लेते ही कविता को पता चल गया की सासुमाँ क्या कर रही थी.. वो पानी पीकर हँसते हँसते बेलन लेकर अपने कमरे में आई.. और सो रहे पीयूष के नाक के आगे उस बेलन को पकड़ रखा.. पीयूष नींद में था.. पर चुत के क्रीम की विशेष गंध अच्छे अच्छों को उत्तेजित कर देती है.. फिर वो सांड हो या हाथी.. इस गंध को परखकर पीयूष जाग गया... और आँखें खोलकर देखने लगा..

"ये क्या कर रही है तू कविता?"

कविता: "ये देख पीयूष.. तेरी माँ के कारनामे!!"

पीयूष: "क्यों.. क्या हुआ??"

कविता: "अभी मैं पानी पीने रसोई में गई तब अंधेरे में मम्मीजी इससे मूठ मार रहे थे.. बूढ़ी घोड़ी लाल लगाम.. इस उम्र में भी उन्हे ये सब सूझता है!!"

पीयूष ने कविता को अपनी बाहों में जकड़ लिया.. और उसके छोटे छोटे उरोजों को दबाते हुए उसे चूमकर.. बेलन हाथ में ले लिया.. और उसे कविता के चूतड़ों को थपथपाने लगा.. जैसे सवार घोड़े को चाबुक लगा रहा हो.. कविता ने टांगें फैलाई.. और अपनी चुत के होंठों पर पीयूष का लाल सुपाड़ा रख दिया.. पीयूष ने बेलन का एक फटका और लगाया.. और कविता घोड़ी की तरह हिनहिना कर लंड पर उछलने लगी.. पहले धीरे धीरे और फिर तेज गति से वो लंड पर कूद रही थी.. सारी दुनिया से बेखबर ये पति-पत्नी का जोड़ा मदमस्त चुदाई में व्यस्त था..






बेलन के जिस छोर पर अपनी माँ की चुत की गंध आ रही थी.. उस छोर को पीयूष ने कविता के मुंह में दे दिया.. अपनी सास के कामरस को चाटते हुए कविता.. पीयूष के लंड से चुदवा रही थी.. कविता के अमरूद जैसे स्तनों को मसलते हुए पीयूष अपनी गांड उछाल उछालकर कविता को चोद रहा था

"ओह्ह.. पूरा अंदर तक चला गया है पीयूष.. बहोत मज़ा आ रहा है.. उफ्फ़.. आहह.. आज तो बहोत गरम हो गया है तू!!"

अपने कामुक शब्दों से वो पीयूष को ओर उत्तेजित करने लगी.. उसने पीयूष के हाथों से बेलन छिन लिया.. बिखरे हुए बाल और लाल आँखों वाली कविता बेहद सेक्सी लग रही थी.. हर उछाल के साथ उसके स्तन लयबद्ध तरीके से ऊपर नीचे हो रहे थे.. पीयूष ने हाथ पीछे ले जाकर उसके कूल्हों को पकड़ लिया.. और दोनों हाथों से चूतड़ों को चौड़ा कर.. कविता के लाल रंग के गांड के छिद्र को दबाया..






"उईई.. माँ.. क्या कर रहा है यार.. मुझे दर्द हो रहा है... ओह्ह!!" कविता पसीने से तरबतर हो गई थी.. उसकी सांसें अनियंत्रित हो गई थी.. १५ मिनट हो गए पर पीयूष झड़ने का नाम ही नहीं ले रहा था.. उसने कविता को अपनी छाती से दबा दिया.. और उसके होंठों को चूमते हुए.. गांड के अंदर उगनली डाल दी.. कविता दर्द से कराहने लगी.. पर पीयूष ने उसके होंठ इतनी मजबूती से पकड़ रखे थे की वह बेचारी बोल नहीं पा रही थी

बरसों से तैयार ओवरब्रिज.. जिसका किसी बड़े नेता के हाथों उद्घाटन होना था.. वो किसी मामूली मजदूर के हाथों खोल दिया जाएँ.. ऐसा हाल हुआ.. कविता अपनी कच्ची कुंवारी गांड का पिंटू के लंड से कौमार्यभंग करवाना चाहती थी.. पर पीयूष की उंगली ज्यादा किस्मत वाली थी.. पीयूष बेहद उत्तेजित हो गया.. और कविता के कामरस का झरना अब तूफ़ानी समंदर का रूप धारण कर चुका था.. दोनों एक दूसरे के अंगों को मसल रहे थे.. मरोड़ रहे थे.. कुरेद रहे थे.. कविता बड़े ही हिंसक तरीके से अपने चूतड़ों को पीयूष के लंड पर पटके जा रही थी..

अपनी कमर को तब तक उठाती जब तक सुपाड़े तक लंड बाहर न आ जाता.. फिर एक झटके में जिस्म का सर वज़न लंड पर दे देती.. थप थप थप थप की आवाज़ें आ रही थी.. दोनों बेकाबू होकर इस काम-युद्ध को लड़ रहे थे.. कविता की चुत से रस की धाराएं.. पीयूष के आँड़ों को भिगोते हुए बिस्तर की चादर को गीली कर रही थी। उसके स्तन पत्थर जैसे कठोर हो गए थे.. गुलाबी निप्पल बंदूक की नली की तरह तनी हुई थी.. पीयूष के लंड से चुद चुद कर कविता की चुत का कचूमर निकल गया था.. पीयूष शीला को याद करते हुए कविता के कामुक जवान बदन को बेरहमी से चोद रहा था.. उसके हरेक धक्के से कविता के मुंह से "आहह आह्ह" की आवाज़ें निकल रही थी..






कविता की आँखें बंद होती देख पीयूष समझ गया.. गति को एकदम तेज करने का वक्त आ गया था.. कविता झड़ने के कगार पर थी.. उसने कविता की कमर को मजबूती से पकड़कर और जोर से धक्के लगाना शुरू कर दिया.. कविता की चुत पीयूष के लंड को निगलते हुए अपनी लार गिरा रही थी..

अपनी पत्नी की पूत्ती की ऐसी मजबूत पकड़ अपने लंड पर महसूस करते हुए पीयूष से ओर रहा नहीं गया.. उसके लंड ने वीर्य से भरपूर पिचकारी छोड़ दी.. कविता भी अपने चुत के होंठों से पीयूष के कठोर लंड को आलिंगन देते हुए झड़ गई.. और पस्त होकर पीयूष की छाती पर ढेर हो गई.. जैसे हजारों किलोमीटर की यात्रा तय करके लौटा विमान.. रनवे पर अकेले पड़े पड़े अपनी थकान उतारता है.. बिल्कुल वैसे ही कविता पीयूष के शरीर पर पड़ी रही.. पीयूष के जिस्म पर जगह जगह कविता के नाखूनों की खरोंचे दिख रही थी.. इस जबरदस्त चुदाई से तृप्त होकर दोनों बातें करने लगे.. कविता अब भी पीयूष की छाती पर पड़ी थी.. और पीयूष का लंड अब भी कविता की चुत में था.. थोड़ा सा मुरझाया हुआ.. कविता की चुत की मांसपेशियाँ अब भी उसे दुह रही थी

कविता के सूडोल स्तनों से खेलते हुए पीयूष को शीला के स्तनों की याद आ गई.. कविता की कोमल निप्पल को छेड़ते हुए वह मल्टीप्लेक्स में शीला के स्तनों के साथ किए खेल को याद करता हुआ उत्तेजित होने लगा.. कविता के चुत के सेंसर को पीयूष की उत्तेजना की भनक लग गई.. अभी अभी झड़ा हुआ लंड फिर से सख्त कैसे हो गया!!!

कविता को अचानक पिंटू की याद आ गई.. आह्ह.. पीयूष के मुकाबले पिंटू का लंड ज्यादा तगड़ा है.. सिनेमा हॉल में पिंटू का लंड चूसने की ख्वाहिश अधूरी रह गई थी.. पर पिंटू ने उसके स्कर्ट में हाथ डालकर जिस तरह दो उँगलियाँ घुसा दी थी.. आह्हहह.. और उसका लंड भी कितना सख्त हो गया था!! मैं तो डर गई थी.. की ये अब कैसे शांत होगा!!

कविता जैसे जैसे पिंटू के खयालों में खोने लगी.. उसकी बुझी हुई चुत में फिर से हरकत होने लगी.. नए सिरे से चुत का गरम गीलापन महसूस होते ही पीयूष सोच में पद गया.. पक्की रंडी हो गई है ये कविता.. चुदाई खतम हुए पाँच मिनट नहीं हुई और इसकी चुत फिरसे रिसने लगी.. शीला भाभी के बबले याद करते हुए पीयूष नीचे से अपनी गांड हिलाने लगा.. और कविता पिंटू को याद करते हुए अपनी कमर हिलाने लगी.. जिस तरह ट्रेन का इंजन धीरे धीरे स्पीड पकड़ता है.. वैसे ही दोनों के बीच ठुकाई शुरू हो गई.. अभी थोड़ी देर पहले ही खतम हुए जबरदस्त चुदाई के बाद.. दोनों में वैसी वाली ऊर्जा या उत्तेजना नहीं थी.. पर फिर भी.. अपने प्रिया पात्रों की याद और कल्पना करते हुए दोनों ने बड़े ही आनंद पूर्वक बाकी की रात गुजार दी..

अचानक कविता को ऐसा प्रतीत हुआ की उनके बेडरूम के दरवाजे की नीचे की दरार से उसने एक परछाई को गुजरते देखा.. कहीं वो सासुमाँ तो नहीं थी?? और कौन हो सकता है.. शायद रात को उनका मूठ लगाना अधूरा रह गया था.. इसलिए बेलन घुसेड़ने वापिस जागी होगी.. अरे बाप रे!! बेलन तो मैं यहाँ ले आई.. अब वो क्या सोचेगी मेरे बारे में!! पास पड़े बेलन को अपनी मुठ्ठी में दबाते हुए कविता सोच रही थी.. काफी तगड़ा मोटा बेलन है.. कैसे घुसाती होगी वो अंदर!! ऐसा डंडा अंदर घुसे तो कितना दर्द होता होगा!! या फिर मज़ा आता होगा.. !! किसे पता.. सुहागरात को पीयूष का लंड लिया था तब कितना दर्द हुआ था.. हालांकि उस रात से पहले ऐसी कोई मोटी चीज उसने चुत में डाली ही नहीं थी

कविता को अपने पुराने दिन याद आने लगे.. पहली बार उसने अपनी चुत में पेन डालकर देखा था.. और हाँ एक बार मोमबत्ती से अपनी चुत को गुदगुदाया था.. शादी के बाद पहली बार जब पीयूष का लंड देखा तब वो डर गई थी.. वैसे पिंटू के साथ हुए अनुभव से भी काफी मदद मिली थी.. सच में.. पिंटू ही मेरा सच्चा प्रेमी है.. मैंने कितनी दफा जबरदस्ती उसका लंड चुत में लेने के लिए रगड़ा था.. पर वो नहीं पिघला कभी भी.. इसी लिए तो वो कमीना इतना पसंद है मुझे.. आई लव यू पिंटू.. आखिरी चार शब्द दिमाग के बदले होंठों से निकाल गए

"क्या बोली तू?" पीयूष ने सुन लिया

"मैंने कहा.. आई लव यू पीयूष.. तुम तो कभी कहते नहीं.. पर मैं हमेशा तुम्हारे नाम की माला जपती रहती हूँ" कविता ने चालाकी से बात को मोड लिया। पिंटू खुश होकर सो गया

जान बच गई.. आज तो भंडाफोड़ हो जाता.. अगर उसने बात को घुमाया न होता..

पीयूष आँख बंद कर सोच रहा था.. कितनी भोली है मेरी कविता.. कहीं शीला भाभी के बारे में सोचकर मैं उसे धोखा तो नहीं दे रहा!! हे भगवान.. घूम फिरकर दिमाग में शीला भाभी आ ही जाते है.. ये औरत मेरा घर बर्बाद करवाकर मानेगी.. मेरे दिल और दिमाग पर कब्जा कर लिया है शीला भाभी ने.. किसी दिन चोदने का चांस मिल जाए तो अच्छा.. कुछ भी करके उसे पटाना तो पड़ेगा ही

कविता और पीयूष के बेडरूम के दरवाजे के उस तरफ.. अपने बेटे और बहु की कामुक आवाज़ें सुनकर निराश अनुमौसी गरम गरम सांसें छोड़ रही थी.. क्या करू? कहाँ जाऊ? किससे कहू? कौन समझेगा मेरे इस दर्द को??

अनुमौसी को कविता का नंगा बदन याद आ गया.. मेरी बहु कितनी नाजुक और कोमल है.. पीयूष के साथ उसका मन-मिलाप भी अच्छा है.. कितनी सुंदर जोड़ी है दोनों की.. और मेरा भी कितना खयाल रखती ही.. छोटी से छोटी बात मुझसे पूछकर ही करती है.. उस रात को शीला के घर जाना था तब भी मुझसे पूछ कर गई थी.. शीला बड़ी चालू चीज है.. कहीं मेरी कविता उसकी संगत में बिगड़ न जाए.. मौसी के मन में डर पैदा हो गया.. शीला हरामी उस रसिक के साथ पक्का गुलछर्रे उड़ाती है.. नहीं तो इतनी सुबह सुबह हररोज क्यों दरवाजे पर खड़ी रह जाती है!! कहीं मदन की गैरहाज़री में.. !! हे भगवान.. नहीं नहीं.. शीला ऐसा गंदा काम नहीं कर सकती.. तो फिर उस रात को उसके घर से आवाज़ें क्यों आ रही थी??? मुझे पक्का यकीन है की उसके घर से मर्दों की आवाज आ रही थी.. और वो एक से ज्यादा थे.. बाहर चप्पल भी दो लोगों के पड़े हुए थे.. तो क्या उन दोनों के साथ शीला.. बाप रे.. ऐसा कैसे कर सकती है वो?? दो दो मर्दों के साथ?? यहाँ एक लंड नसीब नहीं हो रहा और वो दो दो से चुदवा रही है!! कुछ भी हो जाएँ.. उन दोनों में से एक लंड का जुगाड़ मुझे कैसे भी करना ही है.. जाकर शीला को बोल दूँगी.. एक लंड मुझे दे दे.. मैं बहोत तड़प रही हूँ शीला.. मेरे लिए भी कुछ कर.. अनुमौसी मन ही मन गिड़गिड़ाने लगी.. और जैसे उनकी प्रार्थना.. शीला के दिमाग तक पहुँच गई..

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दूसरी सुबह सात बजे.. शीला के घर के बाहर एक रिक्शा आकर खड़ी हुई.. और उसमें से रेणुका बाहर आई.. भोसड़े की भूख कितनी खतरनाक होती है..!! शीला का आमंत्रण मिलते ही रेणुका सुबह सुबह पहुँच गई..

रेणुका शीला के दरवाजे तक पहुँचती उससे पहले ही ब्रश करते हुए अनुमौसी अपने घर से बाहर निकली..

ये रेणुका हरामजादी इतनी सुबह यहाँ क्या कर रही है!! क्यों आई होगी? अभी कल ही तो उसकी शीला से पहचान हुई थी.. और इतनी देर में दोस्ती भी हो गई?? जानना पड़ेगा.. कल भी वो दोनों पानी के अंदर कुछ गुसपुस कर रही थी.. जरूर दाल में कुछ काला था.. शायद उन दोनों मर्दों में से किसी एक को शीला ने रेणुका के लिए जुगाड़ा हो सकता है.. हम्म.. पर यहाँ पुरानी पड़ोसन को छोड़कर नई दोस्त के लिए जुगाड़!! ये कैसा अन्याय है!! ये रेणुका भी पक्की रांड है.. अपने एरिया में भी करवाकर आई होगी और अब मेरे इलाके में हिस्सा झपटने आ गई.. कुछ शर्म भी नहीं आती कमिनी को!!

गुस्से में अनुमौसी बाथरूम में जाकर.. जैसे तैसे नहाकर बाहर निकली.. और पहुच गई शीला के घर.. चुत की भूख अच्छी अच्छी को पागल बना देती है..

"अरे.. तू इतनी सुबह सुबह यहाँ क्या कर रही है? "शीला के घर में घुसते ही अनुमौसी ने रेणुका से पूछा

"आइए मौसी.. चाय पीजिए.. " अपना कप मौसी को थमाते हुए शीला बोली

इधर उधर की बातें करते हुए रेणुका ने बताया की वो दो दिन के लिए रुकने वाली थी.. शीला ने झटपट घर का काम निपटा दिया और थोड़ा सा नाश्ता बना दिया.. रेणुका की पारदर्शी साड़ी से नजर आ रही उसके स्तनों की बीच की जालिम खाई को देखकर शीला को कुछ कुछ होने लगा था.. वो इस इंतज़ार में थी की कब अनुमौसी जाएँ.. और वो रेणुका के साथ अपने खेल का आरंभ करें

अनुमौसी बुजुर्ग थी.. उनकी हाजरी में कुछ भी आड़ा-टेढ़ा करने या बोलने में शीला को शर्म आ रही थी.. उसका शैतानी दिमाग काम पर लग गया.. इस बुढ़िया को किसी भी तरह जल्दी भगाना पड़ेगा यहाँ से.. दूसरी तरफ रेणुका, कल रात के बाद इतनी उत्तेजित हो चुकी थी की उसने द्विअर्थी बातें शुरू कर दी.. अनुमौसी को निशाना बना कर

"मौसी, आपकी आँखें देखकर लगता है कल रात को ठीक से सोई नहीं है.. क्या किया पूरी रात??" रेणुका ने पूछा

वैसे भी कल रात कविता के आ जाने से मुठ लगाना अधूरा छोड़ना पड़ा उस बात का गुस्सा था मौसी को.. रेणुका की बात सुनकर उनका गुस्सा उखड़ पड़ा..

"तुझे क्या जानना है ये जानकर की मैंने रात को क्या क्या किया?? तू कभी मुझे कुछ बताती है क्या??" सारा गुस्सा रेणुका पर उतार दिया मौसी ने

रेणुका: "क्या जानना है आपको? की मैंने रात को क्या किया?? तो सुनिए.. पूरी रात तकिये को रगड़ रगड़ कर काटी है मैंने"

अनुमौसी: "इसलिए सुबह सुबह दौड़कर यहाँ आ गई तू?"

शीला: "क्या अनुमौसी आप भी!! तेल-पानी लेकर चढ़ गई आप तो.. बेचारी अपना दुख हल्का करने आई है यहाँ.. पति की गैरमौजूदगी में वक्त कैसे कटता है.. ये आप हम दोनों अभागनों से पूछिए.. आपको तो चिमनलाल का सहारा है.. पर हमारा क्या!!"

चिमनलाल का नाम सुनते ही अनुमौसी का मुंह कड़वा हो गया.. "उस रंडवे का नाम मत ले मेरे सामने शीला.. उसका होना या न होना सब एक बराबर है.. पूरी रात तड़पाया है उसने मुझे.. "

शीला: "अरे, ऐसा क्या हो गया मौसी?? कहीं चिमनलाल को स्टार्टिंग ट्रबल तो नहीं है ना!!

अनुमौसी: "गाड़ी स्टार्ट तो होती है.. पर माइलेज नहीं देती.. क्या कहूँ अब तुमसे.. !!"

शीला: "समझ गई मौसी.. आप भी हिचकिचाहट छोड़कर निःसंकोच बात करोगी तो मज़ा आएगा.. मैंने और रेणुका ने रात भर ऐसी ऐसी बातें की थी फोन पर.. क्यों ठीक कहा ना मैंने रेणुका??"

रेणुका: "मुझसे तो अब रहा ही नहीं जाता शीला.. आधी रात न हो चुकी होती तो में तब के तब यहाँ तेरे पास आ जाती.. कितना सहती रहूँ? हफ्ते बाद लौटूँगा कहकर वो तो निकल पड़े.. पर पूरा हफ्ता मैं कैसे निकालूँ?? कितनी तकलीफ होती है हम बीवियों को.. मर्दों को इसका अंदाजा तक नहीं है"

रेणुका के शब्दों में अपने दर्द की झलक नजर आई अनुमौसी को.. शीला अब सही मौके के इंतज़ार में थी.. पर वो हर कदम फूँक फूँक कर रखना चाहती थी.. ताकि कोई गड़बड़ न हो.. अपने मन में वो सेक्स की शतरंज बिछा रही थी..

अनुमौसी: "अरे शीला.. आज रसिक नहीं आया दूध देने.. तेरे घर आया था क्या?"

तभी शीला को ये एहसास हुआ की आज रसिक नजर ही नहीं आया..


तभी दरवाजे की घंटी बजी..

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रेणुका: "मुझसे तो अब रहा ही नहीं जाता शीला.. आधी रात न हो चुकी होती तो में तब के तब यहाँ तेरे पास आ जाती.. कितना सहती रहूँ? हफ्ते बाद लौटूँगा कहकर वो तो निकल पड़े.. पर पूरा हफ्ता मैं कैसे निकालूँ?? कितनी तकलीफ होती है हम बीवियों को.. मर्दों को इसका अंदाजा तक नहीं है"

रेणुका के शब्दों में अपने दर्द की झलक नजर आई अनुमौसी को.. शीला अब सही मौके के इंतज़ार में थी.. पर वो हर कदम फूँक फूँक कर रखना चाहती थी.. ताकि कोई गड़बड़ न हो.. अपने मन में वो सेक्स की शतरंज बिछा रही थी..

अनुमौसी: "अरे शीला.. आज रसिक नहीं आया दूध देने.. तेरे घर आया था क्या?"

तभी शीला को ये एहसास हुआ की आज रसिक नजर ही नहीं आया..

तभी दरवाजे की घंटी बजी..

"कौन होगा?? मैं देखती हूँ.. " कहते हुए शीला ने उठकर दरवाजा खोला.. इस आशा में की रसिक होगा.. पर रसिक के बदले उसकी पत्नी रूखी थी..

शीला: "रूखी तू यहाँ? तेरा मरद कहाँ मर गया है आज?? आठ बज गए पर दूध का कोई ठिकाना ही नहीं.. " रूखी के मदमस्त चुचे देखते हुए शीला ने कहा






रूखी बिंदास दूध लेकर बरामदे में बैठ गई.. उसे ये पता नहीं था की अंदर दो औरतें बैठी हुई थी..

रूखी: "सुनिए तो सही भाभी.. मैं सब जगह दूध देकर आखिर में आपके घर आई हूँ.. ताकि दो घंटे बैठ सकूँ.. और हाँ भाभी.. जीवा अभी आता ही होगा थोड़ी देर में.. "

शीला: "क्यों रसिक.. मतलब की तेरा पति.. घर पर नहीं है क्या??"

रूखी: "वो मेरे सास ससुर को लेकर दूसरे शहर गया है दो दिन के लिए.. इसलिए कल रात को मैंने जीवा को अपने घर बुला लिया था.. पूरी रात सोने नहीं दिया कमीने ने मुझे.. "

रेणुका और अनुमौसी ये सारी बातें सुन रही थी.. पर शीला को इसकी कोई परवाह न थी.. उसने अपनी बातें जारी रखी..

शीला: "रात को तूने निपट लिया है ना.. फिर उसे यहाँ क्यों बुलाया??" रूखी के स्तनों पर हाथ फेरते हुए उसने कहा

रूखी: "भाभी.. मैं मिल बांटकर खाने में मानती हूँ.. मुझे सबसे पहले आपकी याद आई.. आपका दुख मुझसे देखा नहीं जाता.. मैंने जीवा को यहाँ आने के लिए कहा.. तो उसने मुझे ही यहाँ भेज दिया और कहा की वो नौ बजे आएगा"

जीवा का नाम सुनते ही शीला के भोसड़े में.. ऐसी सुरसुरी होने लगा.. जैसे मिर्ची-बम जलाने पर उसकी मुछ जलकर आवाज करती है.. रूखी ने शीला को अपनी बाहों में लेकर दबा दिया.. दोनों के माउंट एवरेस्ट जैसे उत्तुंग स्तनों आपस में भीड़ गए.. शीला ने रूखी की विशाल मांसल पीठ पर हाथ फेरते हुए उसके होंठों को चूम लिया.. और रूखी के मुंह में अपनी जीभ डालकर जीवहा-चोदन करने लगी.. रूखी शीला के उत्तेजक स्पर्श से मदमस्त होने लगी..

दो मिनट के इस सॉफ्ट रोमांस के बाद शीला ने रूखी को मुक्त कर दिया.. और फिर घर में हाजिर दोनों औरतों के बारे में रूखी को सबकुछ बता दिया.. पहले तो रूखी थोड़ी सी हिचकिचा रही थी.. पर शीला ने उसे मना ही लिया

शीला रूखी को अंदर ड्रॉइंगरूम में ले आई.. अनुमौसी को देखकर रूखी थोड़ी डर गई पर शीला ने रूखी की पहचान रेणुका से करवाते हुए.. रूखी के पल्लू को खींचकर हटा दिया.. और उसके बड़े बड़े दूध भरे स्तनों को उजागर कर दिया..






"मौसी, इसका ढाई महीने का बच्चा है.. डिलीवरी के बाद देखो इसका रूप कैसे खिल गया है!!" शीला ने कहा

ब्लाउस के अंदर मुश्किल से दबाए हुए उन दूध भरे स्तनों को अनुमौसी और रेणुका स्तब्ध होकर देखते ही रहे.. और ब्लाउस की दोनों नोक पर सूखे हुए दूध के निशान देखकर.. दोनों की सिसकियाँ निकल गई..

सबसे पहले अनुमौसी खड़ी हुई.. रूखी के एक स्तन को अपने हाथ में पकड़कर बोली "रूखी, कैसा है बच्चा तेरा? ठीक तो है ना?? तू दूध तो ठीक से पिलाती है ना उसे? कितना दूध आता है तेरा? ज्यादा ही आता होगा.. इसलिए इतने भारी भारी है तेरे.. मेरी कविता को तकलीफ होगी जब उसे बच्चा होगा तब.. इतने छोटे छोटे है उसके"

रूखी के दूध भरे स्तन को पकड़कर अनुमौसी ने अपनी इच्छा जाहीर कर दी थी.. पर अभी भी वो खुलकर कुछ बोल नहीं रही थी इसलिए शीला और रेणुका द्विधा में थे.. शीला से अब और रहा न गया..

शीला: "मौसी, रूखी के बबले आपके जीतने ही बड़े है.. है ना!!" शीला ने बेझिझक अनुमौसी के अनुभवी स्तनों को पकड़ लिया..

अनुमौसी: "अरे मरी बेशरम.. क्या कर रही है तू??"

शीला: "सीधी बात है मौसी.. या तो आप हम सब के साथ जुड़ जाइए.. या फिर यहाँ से चले जाइए.. हम सब यहाँ एक ही मंजिल के लिए इकठठे हुए है.. मैं और रेणुका तो बिना पति के तड़प रहे है इसलिए ये सब करना पड़ रहा है.. अभी ये रूखी का दोस्त जीवा यहाँ आएगा.. और हम सब बारी बारी से उसके साथ करेंगे.. आपको भी करवाना हो तो हमें कोई दिक्कत नहीं है.. पर अगर ये सब आपको नहीं पसंद तो प्लीज आप जा सकते हैं.. हमें हमारी ज़िंदगी जीने के लिए छोड़ दीजिए.." बड़े ही सख्त शब्दों में शीला ने अनुमौसी की क्लास ले ली.. इस दौरान शीला का हाथ अनुमौसी के ब्लाउस के अंदर उनकी गेंदों को मसल रहा था..








अनुमौसी स्तब्ध होकर शीला को सुनती रही.. शीला का इशारा मिलते ही रेणुका ने आकर अनुमौसी के दूसरे स्तन को पकड़ लिया और मौसी का हाथ पकड़कर बड़े ही कामुक अंदाज में बोली "मौसी, मेरे भी दबाइए ना!!"

इस दोहरे आक्रमण ने अनुमौसी को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया.. उन्होंने भी रेणुका के स्तन दबाने शुरू कर दिए.. और साथ ही साथ एक हाथ शीला के मस्त खरबूजों पर रख दिया.. इसी के साथ अनुमौसी भी हवस बुझाओ अभियान में आधिकारिक तौर पर जुड़ गई..

शीला ने खुश होकर अनुमौसी को अपनी बाहों में भर लिया.. रेणुका मौसी की साड़ी खींचकर उतारने लगी.. मौसी की आँखें शर्म से बंद हो गई.. रूखी अब हौले से मौसी के करीब आई और अपना ब्लाउस उतार कर फेंक दिया.. इन चारों औरतों में केवल रूखी ही कमर के ऊपर से नंगी खड़ी थी.. उसके दो मटकियों जैसे बड़े स्तन देखकर तीनों की आँखें फटी की फटी रह गई..

रूखी ने मौसी के घाघरे के नाड़ा खींच निकाला.. और मौसी को नीचे से नंगा कर दिया.. शर्म से पानी पानी हो रही अनुमौसी अब कुछ विरोध नहीं कर सकी क्योंकी उन्होंने खुद ही सहमति दी थी। शीला और रेणुका ने रूखी का एक एक स्तन आपस में बाँट लिया और निप्पल चूसने लगी.. चूसते हुए उन्होंने रूखी का घाघरा उतारकर उसे पूरा नंगा कर दिया.. पूरा कमरा सिसकियों से गूंज रहा था..

तभी डोरबेल बजने की आवाज आई.. शीला ने तीनों को चुपके से बेडरूम में घुस जाने को कहा.. अपने कपड़े ठीक किए और दरवाजे के की-होल में से बाहर देखने लगी.. एक हाथ से ब्लाउस के हुक बंद करते हुए उसने देखा तो बाहर जीवा और रघु खड़े थे.. शीला ने तुरंत दरवाजा खोल दिया और दोनों को अंदर खींचकर तुरंत बंद कर दिया। जीवा और रघु दोनों को बारी बारी बाहों में लेकर शीला ने उन्हे चूमते हुए उनके लंड दबा लिए..

"कहाँ मर गए थे तुम दोनों?? कितना याद करती थी मैं तुम्हें?" जीवा और रघु शीला के स्तनों को ऊपर से मसल रहे थे

जीवा: "अरे भाभी.. आपको तो रोज याद करते हुए मैं लंड हिलाता हूँ.. हम इंतज़ार में थी की आप कब बुलाती हो.. पर आपने तो कभी कॉल ही नहीं किया.. इसलिए फिर मैंने रूखी से बोलकर यहाँ आपके घर मिलने का तय किया"

"चलो कोई बात नही.. आज पूरा दिन आराम से यहीं रहना है तुम दोनों को.. और मेरी सहेलियों को भी चोदना है.. बहुत गरम हो रही है सब की सब.. मेरी तरह.. तुम दोनों आज बेझिझक मजे करो यहाँ.. और हाँ.. उन सहेलियों में.. एक अनुमौसी नाम की बूढ़ी रांड भी है.. उसे बहुत खुजली है लोडा लेने की.. आज उसके बूढ़े भोसड़े की धज्जियां उड़ा देनी है.. समझे.. !!!"

रघु: "अरे भाभी.. बुढ़िया को क्यों बुलाया.. कोई कडक जवान माल हो तो बताओ.. बुढ़िया के ढीले भोसड़े में भला क्या मज़ा आएगा??"

शीला: "अबे भोसडी के.. जितना कहा गया है उतना कर.. ज्यादा ज्ञान मत चोद.. समझा.. वरना गांड पर लात मारकर घर के बाहर फेंक दूँगी.. और सुन.. आज के दिन अगर तेरा लंड मुरझाया.. तो समझ लेना.. तेरी मर्दानगी की नीलामी करवा दूँगी.. " कहते हुए शीला ने दोनों की चैन खोलकर उनके लंड बाहर निकाले.. बाम्बू की तरह सख्त डंडे शीला को सलामी देने लगे..

दो दो तगड़े लंड देखते ही शीला के तो मजे हो गई.. वह घुटनों के बाल बैठी गई और एक के बाद एक दोनों लंड को प्यार से चूसने लगी.. अपनी लार से लसलसित कर दोनों लंड को ऐसे लाचार कर दिया जैसे महीने के आखिरी दिनों में तनख्वाह की प्रतीक्षा करता कर्मचारी लाचार होता है। उन दोनों ने शीला को मादरजात नंगा कर दिया और उसके बबले दबाने लगे.. कामातुर शीला खड़ी हो गई.. जीवा और रघु के लंड को हाथों से पकड़कर खींचते हुए बेडरूम तक ले गई.. दो अनजान नंगे मर्दों को देखकर.. अनुमौसी को फिरसे शर्म का अटैक आ गया..

रेणुका जीवा के मजबूत और विशाल लंड को ललचाई नज़रों से देख रही थी.. वाह.. क्या लंड है यार!! मेरे पति के लंड से तीन गुना लंबा और मोटा है.. इतना बड़ा मेरी चुत के अंदर कैसे जाएगा भला.. !!

रूखी के स्तनों को सहलाते हुए मौसी ने अपनी चुत पर भी हाथ फेरना शुरू कर दिया था.. शीला जब बाहर के कमरे में जीवा और रघु के लंड की चुसाई करते हुए तैयार कर रही थी.. उस दौरान बेडरूम में रेणुका और रूखी ने अनुमौसी को चूम चाटकर बेहद गरम कर दिया था। रेणुका ने मौसी की झांटों भरी भोस पर जीभ फेरते हुए मौसी की वासना को तीव्रता से भड़का दिया था..

जीवा अनुमौसी के पास गया और उनको कंधों से पकड़कर नीचे बिठाया.. अपना मुसलदार लंड मौसी के मुंह के आगे झुलाने लगा.. इतना विकराल लंड देखकर अनुमौसी को एक पल के लिए चक्कर सा आ गया.. रूखी ने रघु का लंड मुठ्ठी में भर लिया.. और उसका लाल सुपाड़ा रेणुका ने मुंह में ले लिया.. रूखी के स्तनों से दूध टपकने लगा था.. जीवा ने जबरदस्ती अनुमौसी का मुंह खुलवाया और अपना लंड अंदर घुसाने लगा.. मौसी भी पूर्ण तरीके से उत्तेजित हो चुकी थी.. और समझ भी गई थी की अगर वो शरमाती रही तो उनका ही भोसड़ा भूखा रह जाएगा.. भाड़ में जाएँ सारी शर्म.. इधर भोस में आग लगी हो तब काहे की शर्म!!

अनुमौसी ने जीवा के लंड का अपने मुंह में स्वागत किया और लगातार २० मिनट तक चूसती ही रही.. इतना रसीला लंड उन्होंने पूरी ज़िंदगी में नहीं देखा था.. बहोत भूखी थी बेचारी.. जीवा को तो मज़ा ही आ गया.. तभी रघु भी वहाँ आ गया और अनुमौसी के गाल पर अपना लंड थपथपाने लगा.. उफ्फ़.. एक साथ दो दो लंड सामने आ जाने से मौसी ने अपनी गांड उचक कर जांघों को भींच दिया.. जीवा का लंड मुंह से बाहर निकाला.. और बोली "उफ्फ़ शीला.. अब कुछ कर मेरा.. नीचे आग लग गई है.. रहा नहीं जाता.. उईई माँ.. ऐसे लंड मैंने जीवन में पहली बार देखे है.. हाय... आह्ह!! ऊपर वाला भला करे तेरा शीला.. के तूने मुझे आज.. " आगे के शब्द निकले ही नहीं मौसी के मुंह से

शीला ने पास पड़ा प्लास्टिक का झाड़ू उठाया और उसका हेंडल पीछे से अनुमौसी की भोस में घुसेड़ दिया..

"ऊहह माँ.. क्या डाल दिया तूने अंदर.. घोड़े के लंड जितना मोटा है ये तो.. पर अच्छा लग रहा है.. कुछ तो गया अंदर.. उस कमीने चिमनलाल के तीली जैसे लंड के मुकाबले लाख गुना अच्छा है.. आहह.. डाल जोर से शीला.. और जोर से आहह.. आह्ह.. आहह.. " रेणुका की चुत में तीन उँगलियाँ डालकर अंदर बाहर करते हुए, अनुमौसी अपने भोसड़े में घुसे झाड़ू का पूरा आनंद लेने लगी.. रेणुका भी इस अंगुली-चोदन से मस्त हो गई.. और जीवा के आँड मुठ्ठी में पकड़कर दबाते हुए झुकी.. और अनुमौसी के दाने को चूम लिया.. "आह्ह रेणुका.. मज़ा आ गया.. ऐसा मज़ा तो ५० वर्ष के जीवन में पहली बार आया.. ओहहह!!"

जीवा ने अनुमौसी को बिस्तर पर सुला दिया.. उनके भोसड़े से झाड़ू निकाला.. उनके दोनों पैर अपने कंधों पर ले लिए.. और उनके ढीले भोसड़े के सुराख पर अपना तगड़ा लंड का सुपाड़ा रखकर एक जबरदस्त धक्का दिया.. मौसी का पूरा भोसड़ा एक ही पल में जीवा के लंड से भर गया.. जैसे बोतल के छेद में ढक्कन घुसेड़कर बंद कर दिया हो.. मौसी की बूढ़ी चुत ने पहली बार इतना बड़ा आकार अपने अंदर महसूस किया था..






"ओ माँ.. शीला.. इसे बोल की बाहर निकाल दे.. बाप रे.. मुझे नहीं करवाना है.. छोड़ दो मुझे.. हाय मर गई मैं तो.. मेरा दिमाग खराब हो गया था जो मैं इधर आई.. छोड़ दे मुझे हरामी.. " पर जीवा कहाँ सुनने वाला था.. !! अनुमौसी की उसने एक ना सुनी.. और तेज गति से लंड के धक्के लगाने लगा..

दूसरी तरफ रघु रेणुका को घोड़ी बनाकर पीछे से शॉट लगा रहा था.. रेणुका ऐसे ही मजबूत लंड को तरस रही थी.. रघु के लंड से चौड़ी हो चुकी उसकी चुत के खुशी का कोई ठिकाना न था.. उसके मस्त बोबले, लंड के धक्कों के साथ, लयबद्ध तरीके से हवा में झूल रहे थे.. इस दौरान शीला और रूखी 69 पोज़िशन में एक दूसरे की चुत चाट रहे थे.. दूसरी तरफ जीवा अनुमौसी की घमासान चुदाई करते हुए उनके लटके हुए स्तनों को आटे की तरह गूँद रहा था.. अद्भुत काम महोत्सव चल रहा था शीला के बेडरूम में.. रूखी के विशाल स्तनों से दूध की धराएं शीला के पेट पर टपक रही थी.. वही दूध शीला की चुत की फांक से गुजरकर बिस्तर पर पड रही थी

अपने यार जीवा द्वारा की जा रही जबरदस्त चुदाई को देखकर रूखी खुश हो गई.. जीवा के देसी विकराल लंड की ताकत पर ये शहरी औरतें आफ़रीन हो गई थी.. कुतिया बनकर रघु से चुदवा रही रेणुका को देखकर.. जीवा से चुद रही मौसी और गरम हो रही थी.. रेणुका की गीली पुच्ची में रघु का लंड ऐसे अंदर बाहर हो रहा था जैसे ऑइल लगे इंजन में पिस्टन आसानी से अंदर बाहर होता है.. इतना अवर्णनीय आनंद रेणुका ने पहली बार महसूस किया था.. उसका भोसड़ा तृप्त होता जा रहा था.. जीवा मौसी के भोसड़े में इतनी तेजी से अंदर बाहर कर रहा था की लगता था कभी चिंगारियाँ निकालने लगेगी..






शीला के मुंह से अपनी चुत झड़वाकर रूखी खड़ी हो गई.. और रघु से घोड़ी बनकर चुद रही रेणुका के मुंह में बारी बारी से दोनों निप्पल देकर.. अपना दूध मुफ़्त में पिलाने लगी.. और अपने स्तनों का भार हल्का करने लगी.. शीला अपनी क्लीनशेव चुत को रूखी के पुरातत्व खाते के किसी अपेक्षित अवशेष जैसी.. काले झांटों से भरपूर भोसड़े पर रगड़ने लगी.. दोनों की क्लिटोरिस एक दूसरे से रगड़ खाते हुए जबरदस्त आनंद दे रही थी.. साथ ही साथ शीला अपने अंगूठे से रूखी की क्लिटोरिस को घिस रही थी..

शीला की गुलाबी निप्पल को मुंह में लेकर काटते हुए रूखी ने अपनी असह्य उत्तेजना की घोषणा कर दी.. पूर्ण उत्तेजित स्त्री को देखना.. अपने आप में एक बड़ा अवसर है.. अनुमौसी ने पहली बार दो स्त्रियों को इस तरह संभोगरत देखा था.. अब तक वो यही सोचती थी की चुत की आग या तो लंड से बुझती है या फिर मूठ लगाने से.. !! दो स्त्री आपस में भी अपनी आग बुझा सकती है इसका उन्हे पता ही नहीं था.. सालों से एक ही भजन आलाप रही अनुमौसी को आज एक नया राग मिल गया..

मौसी दो बार झड़ चुकी थी.. उनकी विनती पर जीवा ने अपना लंड बाहर निकाला.. वो अबतक झड़ा नहीं था.. चुदकर तृप्त हो चुकी मौसी ने शर्म त्याग कर रूखी के नंगे स्तन को पकड़कर दबाया.. रूखी ने मौसी के हाथ को और जोर से अपने स्तन के साथ रगड़कर उनका दूसरा हाथ अपनी चुत पर रखवा दिया.. रूखी का "अत्यंत ज्वलनशील" भोसड़ा.. चुत की गंध वाला प्रवाही छोड़ने लगा था.. अनुमौसी की चुत ठंडी हो चुकी थी.. वो गरम सांसें छोड़ते हुए अपना भूतकाल याद कर रही थी.. इतने लंबे वैवाहिक जीवन में, चिमनलाल ने कभी उन्हे ऐसे तृप्त नहीं किया था.. चिमनलाल से वो इस कदर परेशान थी की मन ही मन नफरत करने लगी थी.. तंग आ गई थी..

जीवा और रघु ने अब रेणुका को रिमांड पर ले रखा था.. नए बॉलर को जिस तरह निशाने पे रखकर बल्लेबाज छक्के लगाता है.. उसी तरह जीवा और रघु ने रेणुका को इतनी बेरहमी से चोदा की रेणुका पस्त हो गई.. मदमस्त हो गई.. जीवा के प्रत्येक धक्के से रेणुका सातवे आसमान पर उड़ने लगती थी.. उसके गोरे गोरे बोब्बे को अपने खुरदरे मर्दाना हाथों से रघु मसल रहा था.. उस दौरान जीवा अपने गन्ने जैसे लंड से रेणुका की चुत का भोसड़ा बना रहा था.. शीला और रूखी, जीव और रघु के दमदार लंड को बड़े ही अहोभाव से देख रही थी.. वह दोनों एक दूसरे के आलिंगन में लिपटकर अपनी चुत खुजा रही थी..






जीवा के दमदार धक्कों से रेणुका अनगिनत बार स्खलित हो गई थी.. जितनी बार वो स्खलित होती तब वह अपनी कमर को बिस्तर से एक फुट ऊपर उठा लेती.. और तभी जीवा रेणुका की कमर को मजबूती से पकड़कर बिस्तर पर फिर से पटक देता और चोदना जारी रखता.. अपनी मर्दानगी का पूर्ण प्रदर्शन करते हुए.. जीवा अपने अजगर जैसे लंड को रेणुका की चुत में अंदर बाहर करते ही जा रहा था.. रेणुका की चुत और जीवा का लंड ऐसे उलझ गए थे जैसे प्रकृति ने उनका निर्माण एक दूसरे के लिए ही किया हो.. रेणुका की कराहें और सिसकियाँ पूरे कमरे में गूंज रही थी.. मदमस्त होकर रेणुका जीवन के सबसे बेहतरीन आनंद को महसूस कर रही थी.. उसकी हरेक सिसक कामुकता से भरपूर थी..

रेणुका: "ओह्ह जीवा.. मर गई मैं तो.. मज़ा आ गया.. लगा धक्के.. आह्ह उहहह.. ऊई माँ.. ओह्ह शीला.. आज तो मैं धन्य हो गई.. यार.. कितने सालों से मैं ऐसा ही कुछ ढूंढ रही थी.. जबरदस्त है तेरा लंड जीवा.. अंदर तक ठोकर मार रहा है.. उहह उहह.. "

रघु के लंड को लोलिपोप की तरह चूस रही थी मौसी.. शीला और रूखी अपने बलबूते पर ही दो-तीन बार झड़ चुकी थी.. चुद रही रेणुका खुद ही अपने स्तनों को ऐसे मरोड़ रही थी जैसे उन्हे जिस्म से अलग कर देना चाहती हो.. जीवा "पच्च पच्च" की आवाज के साथ कातिल धक्के लगाता जा रहा था.. रेणुका फिर से किनारे पर पहुँचने वाली थी.. अब तो उससे स्खलन भी बर्दाश्त नहीं हो रहा था.. अपने हाथ फैलाकर उसने जीवा के कंधों को पकड़कर अपनी ओर खींच लिया और उसे चूमने लगी.. रेणुका के होंठ चूसते हुए जीवा ने अपनी मजबूत बाहों में भरकर रेणुका को बिस्तर से उठा लिया.. चुत को लंड में घुसाये रखा

जीवा का ये बाहुबली प्रदर्शन देखकर.. रूखी, अनुमौसी और शीला की आह्ह निकल गई..

अनुमौसी: "बाप रे.. देख तो शीला.. इसने तो रेणुका को उठा लिया.. और खड़े खड़े नीचे से पेल रहा है.. इसका लंड तो जिसे मिल जाए उसका जीवन सार्थक बन जाएँ.. सांड जैसी ताकत है इसमें.. देखकर मुझे फिरसे नीचे खुली होने लगी है"






रेणुका ने अपने दोनों पैरों को जीवा की कमर के इर्दगिर्द लपेट लिया.. चौड़ी चुत में जीवा का लंड अंदर बाहर हो रहा था.. जीवा का आधा लंड अंदर और आधा बाहर था.. जीवा ने रेणुका के कूल्हों को मजबूती से पकड़कर संतुलन बनाए रखा था.. रेणुका की चुत इतनी फैल चुकी थी की हाथ की मुठ्ठी भी आसानी से अंदर चली जाएँ.. जीवा के हर धक्के के साथ रेणुका की चुत का रस जमीन पर टपक रहा था... रेणुका ने अपने दोनों हाथ जीवा की गर्दन पर लपेट लिए थे.. और जीवा के होंठ कामुक अंदाज में चूसते हुए नीचे लग रहे धक्कों का आनंद ले रही थी.. जीवा की छाती से दबकर उसके दोनों स्तनों बगल से झाँकने लगे थे.. जीवा के इस रौद्र स्वरूप को देखकर उत्तेजित हो चुकी शीला और रूखी ने अनुमौसी के भोसड़े पर हमला कर दिया..

रेणुका को उठाकर चोदते हुए जीवा पूरे कमरे में यहाँ वहाँ घूम रहा था.. इतना ही नहीं.. वो चलते चलते किचन में आया.. और मटके से लोटा भरकर पानी निकालकर पीने लगा.. ये सबकुछ वो रेणुका को चोदते हुए ही कर रहा था.. किचन के प्लेटफ़ॉर्म पर पड़ी सब्जियों की टोकरी से जीवा ने एक खीरा उठाया.. और उसे रेणुका की गांड के छेद पर रगड़ने लगा.. रेणुका के दोनों चूतड़ पूरे फैल चुके थे.. खीरा गांड के छेद पर रगड़ते हुए जीवा रेणुका को लेकर वापस बेडरूम में आ गया.. शीला, रूखी और मौसी.. इस रोमांचक फाइनल मेच को देख रहे थे.. जीवा जिस तरह से रेणुका को उठाकर चोद रहा था.. ये अनुमौसी को बेहद पसंद आ गया.. एक बार जीवा से इसी तरह चुदवाने का मन बना बैठी वो..

अनुमौसी खड़े खड़े एकटक जीवा-रेणुका की चुदाई देख रही थी.. तभी रघु चुपके से उनके पीछे गया..उनके चूतड़ फैलाये और अपनी जीभ उनके छेद पर फेर दी..

"उईई माँ.. " मौसी और कुछ नहीं बोली.. रघु ने उनकी गांड से लेकर चुत तक चाटना शुरू कर दिया.. अनुमौसी का शरीर इस चटाई से कांपने लगा था.. रघु आसानी से चाट सके इसलिए वो थोड़ा सा झुक गई.. इसी के साथ रघु की जीभ ने मौसी की गांड में एंट्री मार दी.. जीभ के कुरेदने से मौसी को खुजली होने लगी.. और उन्होंने अपनी तीन उँगलियाँ अपनी चुत में रगड़ना शुरू कर दिया..






"आह्ह.. ओह्ह.. हाँ रघु.. वही पर.. जरा दाईं तरफ.. हाँ वही.. उईई.. चाट मेरी.. आह्ह रघु.. " रघु उनके चूतड़ों को और फैलाकर जितना हो सकता था उतने अंदर अपनी जीभ घुसाता गया.. उत्तेजीत मौसी ने अपने शरीर को थोड़ा सा और झुकाया.. आज का दिन मौसी के लिए सबसे यादगार दिन बन रहा था..

रेणुका को अपने अलग अंदाज में उछाल उछालकर चोद रहे जीवा ने लंड की साइज़ का खीरा रेणुका की गांड के अंदर घुसाने की कोशिश की.. और बेरहमी से आधा खीरा अंदर घुसा दिया.. रेणुका को इतना दर्द हुआ की वो चिल्लाने लगी.. उसकी चीख को रोकने के लिए जीवा ने उसके होंठों पर अपने होंठ दबाकर उसे चुप करा दिया.. और इशारे से अपनी प्रेमीका रूखी को करीब बुलाया.. अपने स्तन और कूल्हें मटकाती हुई बड़ी ही मादक चाल से चलती रूखी जीवा के करीब आई और रेणुका तथा जीवा दोनों के कूल्हों को सहलाने लगी..

जीवा: "यार रूखी..तू इसकी गांड में उंगली करते हुए मेरे आँड चूस दे.. तेरी मदद के बगैर मेरा लंड झड़ने नहीं वाला.. " वो फिरसे रेणुका के होंठ चूसने लगा

अचानक अनुमौसी चीखने लगी "नहीं नहीं.. मर गई दर्द से मैं तो.. आहह शीला.. तू बोल ना इसे की मेरी गांड से निकाल ले.. मुझे पीछे नहीं करवाना.. बहोत दर्द होता है मुझे.. " सबकी नजर अनुमौसी की ओर गई.. रघु ने झुककर खड़ी मौसी की गांड में एक ही धक्के में अपना लंड घुसा दिया था.. मौसी को दिन में तारे नजर आने लगे.. रघु ने मौसी का जुड़ा खोल दिया और उनके लंबे बालों को खींचकर उन्हे पकड़ रखा था.. मौसी हिल भी नहीं पा रही थी.. रघु ने जोर से बालों के ऐसे खींचा की अनुमौसी की गर्दन ऊपर हो गई और उनकी चीख गले में ही अटक गई.. मौसी अब पूरी तरह से रघु की गिरफ्त में थी.. घोड़ी कितनी भी शक्तिशाली क्यों न हो.. लगाम खींचते ही काबू में आ ही जाती है.. अनुमौसी को पता चल गया था की रघु अपनी मनमानी करके ही रहेगा..

मौसी गिड़गिड़ाने लगी.. "रघु.. प्लीज.. निकाल दे बाहर.. दर्द से मरी जा रही हूँ.. हाथ जोड़ती हूँ तुझे.. आगे के छेद में जितना मर्जी डाल ले तू.. पर पीछे मत कर.. जलन हो रही है.. दया कर मुझ पर.. "








मौसी का ये हाल देखकर शीला उनके करीब आकार नीचे बैठ गई.. पहले उसने मौसी के होंठ चूम लिए.. और उनके लटक रहे नारियल जैसे स्तनों को दबाने लगी.. ग्लाइकोड़ींन पीने से जैसे खांसी बंद हो जाती है.. वैसे ही शीला की हरकतों से मौसी शांत हो गई.. शीला ने मौसी की ऐसी खास जगहों पर स्पर्श किया की मौसी सिहरने लगी.. रघु मौसी की गांड में लंड घुसेड़कर ठुमक रहा था.. धक्कों से मौसी की गांड चौड़ी हो गई थी.. अब उनका दर्द काम होने लगा..

मौसी: "शीला.. मेरी चूचियाँ भी चूस दे थोड़ी सी" शीला को मौसी के पिचके हुए स्तन चूसने का बिल्कुल मन नहीं था.. बिना रस के आम कौन चूसेगा भला!! फिर भी शीला ने उनकी निप्पलों को मुंह में लेकर "बच बच" की आवाज के साथ चूसना शुरू कर दिया..

रूखी अपने प्रेमी के खूंखार लंड से चुद रही रेणुका की भोस को बड़े ही गर्व से देख रही थी.. जीवा के आँड को चूसते हुए.. रसिक के लंड से मोटे खीरे को रेणुका की गांड में डालती जा रही थी.. रूखी को रेणुका की गांड मारने में बड़ा ही मज़ा आ रहा था.. उसने खीरे को एक बार अपनी चुत पर भी रगड़कर देख लिया.. बहोत मज़ा आया.. आज घर जाकर ये प्रयोग जरूर करूंगी.. रूखी ने शीला को अपने पास बुलाया.. और रेणुका की गांड से निकली हुई ककड़ी उसकी चुत में दे मारी..

अनुमौसी की गांड फाड़ कर थक चुका रघु.. अपना लंड खींचकर.. रूखी की चुत पर टूट पड़ा.. मौसी बेचारी अपनी गांड बचाकर दूर भाग गई.. बड़ी मुश्किल से लँगड़ाते हुए चल आ रही थी मौसी... वो कपड़े पहनकर दूर बैठी ये चुदाई का भव्य खेल देखने लगी.. उनकी चुत और गांड दोनों ठंडे हो चुके थे.. और इस उत्सव से उन्होंने इस्तीफा देते हुए वी.आर.एस ले लिया था..

दर्शक बनकर बैठी मौसी.. बाकी बचे बल्लेबाजों के फटके देख रही थी.. उनकी सांस अब भी फुली हुई थी.. बेचारी मौसी!!! लेकिन शीला की मदद से उनके चुदाई जीवन को चार चाँद लग गए थे इसमें कोई दो राई नहीं थी..

रेणुका की हालत देखकर मौसी सोच रही थी.. "कितनी गर्मी है साली की चुत में!! इस जालिम जीवा के खूंखार लंड से चुद रही है फिर भी थकने का नाम नहीं ले रही.. वैसे रघु का लंड भी कुछ कम नहीं है" सभी प्रतिभागियों की क्षमता का पृथक्करण कर रही थी मौसी.. जीवा और रघु के लंड पर तो वो अब निबंध लिख सकती थी.. एक पल के लिए उन्हे ऐसा विचार आया की अगर जीवा और रघु को वियाग्रा की गोली खिला दी जाए और उनके लंड पर जापानी तेल की मालिश की जाएँ.. तो क्या होगा? बिना किसी मदद के भी उन्होंने मेरी गांड फाड़ दी.. अगर इन्हे गोली खिलाकर तेल लगाकर चुदवाएं तो ये दोनों माँ चोद देंगे मेरे भोसड़े की.. सीधा एम्बुलेंस से अस्पताल जाने की नोबत आ जाएँ.. गांड और चुत को टाँकें लगाकर सिलवाना पड़ जाएँ.."

रेणुका का काम तमाम हो गया.. आखिरी कुछ धक्कों ने तो उसे लगभग रुला दिया था.. रेणुका की चुत पर ऐसे भयानक प्रहार पहली बार हुए थे.. जीवा को ऐसी टाइट कडक चुत मिलने पर वो भी दोहरे जोर से धक्के लगा रहा था.. जब तक रेणुका उत्तेजित थी तब तक उसे मज़ा आ रहा था.. पर अब ५-६ बार स्खलित हो जाने के बाद उसे दर्द होने लगा था.. चुत भी जल रही थी.. पेट भर जाने के कोई जबरदस्ती खिलाएं और जो हाल होता है वही हाल रेणुका का हो रहा था.. जीवा के लंड के प्राहर अब उसे आनंद के बजाए पीड़ा दे रहे थे






"ओहह ओहह आह्ह मर गई.. बस बहोत हुआ जीवा.. मेरा हो गया.. अब निकाल ले बाहर.. बस अब ओर नहीं.. मेरे पेट में दर्द होने लगा है.. मैं झड़ चुकी हूँ.. धीरे धीरे.. ओ माँ.. स्टॉप ईट जीवा.. शीला.. इससे कहों के बाहर निकाले.. " रेणुका की हालत बद से बदतर होती जा रही थी.. जीवा किसी खूंखार जंगली जानवर की तरह रेणुका की सारी बातें अनसुनी कर बेरहमी से चोदता ही गया.. रेणुका का नंगा बदन चुदते चुदते पसीने से तरबतर हो गया था..

अनगिनत बार झड़ जाने के बाद भी रेणुका को जीवा ने नहीं छोड़ा.. अंत में उसे बिस्तर पर पटक दिया और अपना मूसल लंड बाहर खींच लिया.. खतरनाक धक्के खा खा कर रेणुका की हालत खराब हो गई.. थोड़ी देर आराम करने के बाद उसकी सांसें ठीक हुई.. वासना का तूफान शांत हो गया.. रेणुका अब चुपचाप मौसी के पास आकर बैठ गई.. अब रूखी-शीला और जीवा-रघु के बीच घमासान चल रहा था

शीला और रूखी की हवस तो मौसी और रेणुका के मुकाबले कई ज्यादा थी.. रघु शीला को उलटी लिटाकर उनकी चुत को धमाधम चोदते हुए पावन कर रहा था.. इस दौरान अनुमौसी चुपके से अपने घर चली गई..

शीला और रूखी की हवस को देखकर रेणुका स्तब्ध हो गई.. रूखी का देसी कसरती शरीर का सौन्दर्य उसे प्रभावित कर गया.. तो दूसरी तरफ शीला की गोरे खंबे जैसी जांघें.. पुष्ट पयोधर मदमस्त स्तन.. सपाट गोरी और दागरहित पीठ.. लचकदार कमर.. और मटके जैसे कूल्हें..

रेणुका ने नीचे हाथ फेरकर अपनी चुत के हालचाल चेक किए.. कहीं ज्यादा नुकसान तो नहीं हुआ ना!! जीवा ने तो आज हद ही कर दी.. ऐसे भी भला कोई चोदता है.. !! रूखी अब जीवा का काले सांप जैसा लंड चूस रही थी.. देखकर ही रेणुका के पसीने छूट गए.. बाप रे.. इतना बड़ा लिया था क्या मैंने !!!

शीला रघु के लंड से फूल स्पीड में चुद रही थी.. "आह्ह रघु.. बहोत मज़ा आ रहा है.. और जोर से.. शाबबास.. वाह मेरे राजा.. क्या ताकत है तेरी.. मस्त धक्के लगा रहा है.. ओह.. फाड़ दे मेरी चुत.. आहह आहह.. ओर जोर से ठोक.. उहह उहह.. और तेज.. जल्दी जल्दी.. हाँ हाँ.. वैसे ही.. आहह आह्ह.. मैं झड़नेवाली हूँ.. रुकना मत.. आह्हहह आह्ह आईईईईईई.. !!!!" शीला झड गई

शीला: "मेरा पानी निकल गया और तू अब तक नहीं झड़ा रघु??"

रघु: "भाभी.. आज गांड नहीं मारने दोगी क्या??" कहते हुए रघु ने शीला की गांड में उंगली डालकर हिलाया

शीला: "नहीं रघु.. आज नहीं.. आज तो भोस को ही तृप्त करना है.. गांड मरवाने का मूड नहीं है मेरा"

"रघु.. तुम मेरी गांड मार लो" जीवा का लंड चूसते हुए रूखी ने कहा

रघु शीला के शरीर से उतरकर रूखी के पास गया.. घोड़ी बनकर जीवा का लंड चूस रही रूखी के चूतड़ों को हाथ से चौड़ा किया.. रूखी के सुंदर अंजीर जैसे गांड के छेद पर अपना गरम सुपाड़ा रख दिया.. रूखी ने एक पल के लिए जीवा का लंड मुंह से निकालकर कहा "आहह.. कितना गरम है तेरा लंड रघु.. अंगारे जितना गरम लग रहा है पीछे.. थोड़ा सा थूक लगाकर डालना.. सुख मत पेल देना.. मैं जानती हूँ तेरी आदत.. गांड को देखकर ही गुर्राए सांड की तरह टूट पड़ता है तू.. मरवाने वाली के बारे में सोचता तक नहीं.." रूखी ने फिरसे जीवा का लंड मुंह में ले लिया..


एक ही दिन में शीला और रेणुका एकदम खास सहेलियाँ बन गई.. रात को दोनों ने ब्लू फिल्म की डीवीडी देखते हुए लेसबियन सेक्स का मज़ा लिया.. फिर एक ही बिस्तर पर नंगी होकर दोनों पड़ी रही.. एक दूसरे के अंगों से खेलते हुए देर तक बातें करती रही.. समाज की.. घर की.. पति की.. पड़ोसियों की.. बातें करते करते एक दूसरे की बाहों में कब सो गई दोनों को पता ही नहीं चला..

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एक ही दिन में शीला और रेणुका एकदम खास सहेलियाँ बन गई.. रात को दोनों ने ब्लू फिल्म की डीवीडी देखते हुए लेस्बियन सेक्स का मज़ा लिया.. फिर एक ही बिस्तर पर नंगी होकर दोनों पड़ी रही.. एक दूसरे के अंगों से खेलते हुए देर तक बातें करती रही.. समाज की.. घर की.. पति की.. पड़ोसियों की.. बातें करते करते एक दूसरे की बाहों में कब सो गई दोनों को पता ही नहीं चला..





सुबह पाँच बजे जब रसिक दूध देने आया तब शीला की आँख खुली.. नंगे बदन पर फटाफट गाउन पहनकर शीला दूध लेने बाहर आई.. रसिक शीला को देखकर हमेशा तुरंत उत्तेजित हो जाता.. उसने शीला के स्तनों को छेड़ते हुए दबा दिया और बोला "आज बहोत मन कर रहा है करने का भाभी.. क्या माल लग रही हो आप आज तो!!" शीला के गाउन के अंदर हाथ डालकर उसके स्तन मसलते हुए उसने कहा "अंदर आ जाऊ भाभी?"





शीला: "आज नहीं रसिक.. आज घर में मेहमान आए हुए है.. "

रसिक: "आप भी ना भाभी.. कभी कभी ही आपसे करने के लिए बोलता हूँ और आप मना कर रही हो"

शीला: "धीरे बॉल रसिक.. मेहमान अंदर सो रहे है.. जाग जाएंगे तो मुसीबत आन पड़ेगी.. वरना मैंने तुझे कभी मना किया है कभी.. ?? आज नहीं हो पाएगा.. तू निकल जल्दी से"

रसिक उदास होकर शीला के स्तन दबाता रहा.. उसका लंड खड़ा हो गया था.. वो चुपचाप खड़ा रहा पर उसने शीला के स्तन नहीं छोड़े..

शीला: "ठीक है.. तू रुक यहाँ " शीला बेडरूम में जाकर देख आई.. रेणुका गहरी नींद में सो रही थी। वो दबे पाँव वापिस आई

शीला: "देख रसिक.. अंदर डालने का सेटिंग तो नहीं हो पाएगा.. मैं तेरा हिला देती हूँ"

शीला ने रसिक की धोती में हाथ डालकर उसका लंड बाहर निकाल लिया.. लोहे के सरिये जैसा सख्त लंड हाथ में लेकर शीला हिलाने लगी.. रसिक शीला के गाउन को उठाकर उसकी चुत में उंगली घिसने लगा.. एक ही मिनट तक ये खेल चला और रसिक के लंड ने पिचकारी छोड़ दी.. शीला की चुत रसिक की उंगली के स्पर्श से पानी पानी हो गई थी.. शीला ने झुककर रसिक के झड़े हुए लंड को चूम लिया और उसे धोती के अंदर रख दिया.. रसिक चला गया






शीला दूध की पतीली को गेस पर गरम करने रखकर रेणुका की बगल में लेट गई.. उसने गहरी नींद सो रही रेणुका की नंगी चूचियों को ध्यान से देखा.. उसकी हर सांस के साथ चूचियाँ ऊपर नीचे हो रही थी.. शीला ने उन सुंदर स्तनों को हाथ में लिया.. रसिक के स्पर्श से गीली हो चुकी चुत को सहलाते हुए वो रेणुका के स्तनों को मींजने लगी.. तीन उँगलियाँ अपनी भोस में डालकर रसिक मे मर्दाना लंड को याद करते हुए शीला झड़ गई.. रेणुका अब भी नींद में थी.. ऑर्गैज़म का सुख प्राप्त करते ही शीला की आँख लग गई.. जब वो जागी तब रेणुका बिस्तर पर नहीं थी.. शीला ने सोचा की रेणुका बाथरूम में गई होगी.. तभी उसे याद आया.. अरे बाप रे.. दूध गरम करने रखा था वो तो भूल ही गई.. !!! वो भागकर किचन में आई.. रेणुका वहीं खड़ी थी.. चाय बना रही थी.. चाय को छान रही रेणुका को पीछे से बाहों में भर लिया शीला ने और कहा "गुड मॉर्निंग रेणुका.. !!"

पीछे झुककर शीला के स्तनों को दबाकर रेणुका ने भी गुड मॉर्निंग कहा.. "तुम सो रही थी इसलिए मैंने जगाया नहीं.. किचन में आकर देखा तो दूध उबल रहा था.. थोड़ी ओर देर हो जाती तो सारे दूध का सत्यानाश हो जाता.. "

रेणुका के स्तनों को हाथों से मलते हुए शीला ने कहा "थैंक्स रेणुका.. तुझे नींद तो ठीक से आ गई थी ना ??"

रेणुका: "हाँ हाँ.. एकदम घर जैसी नींद आ गई थी मुझे तो.. " चाय छान कर किटली में भरते हुए कहा

दोनों ने ब्रश किया और चाय पीकर एकदम आराम से बैठ गई.. सिर्फ एक ही दिन में शीला का सारा अकेलापन दूर हो गया.. नहा-धो कर दोनों फ्रेश हो गई और बातें करने लगी.. शीला ने रेणुका को चेतना के बारे में बताया.. रेणुका ने भी दिल खोलकर अपनी सारी बातें शीला को बताई

रेणुका: "शीला.. मेरे पड़ोस में एक आदमी रहता है.. वो मुझे रोज ताड़ता है.. मैं जब तक बाहर कपड़े सुखाती हूँ.. वो घर के बाहर खड़ा मुझे देखतय ही रहता है.. मेरे घर के अंदर जाने के बाद ही वो हटता है.. उसका देखना मुझे अच्छा भी लगता है.. इस उम्र में भी कोई हमें देखता है ये जानकर दिल खुश हो जाता है.. "

शीला: "वो तो है.. वैसे तेरी उम्र इतनी ज्यादा भी नहीं है.. उम्र तो अब मेरी हो चली है.. "

रेणुका: "फिर भी इस उम्र में आप सेक्स में इतनी एक्टिव हो ये ताज्जुब की बात है.. वरना आप के उम्र की औरतें भजन कीर्तन करते हुए मरने के इंतज़ार में बैठी रहती है.. सच में.. आपकी फुर्ती और एनर्जी की दाद देनी पड़ेगी.. "

शीला: "देख रेणुका.. मैं और मेरा पति बड़ी ही स्वस्थ विचारधारा रखते है.. वो कहते है की हमारा शरीर बूढ़ा हो जाएँ वो प्रकृति का नियम है.. पर हम मन से चाहे तब तक जवान रह सकते है.. और जहां तक मन से जवान है तब तक संभोग का पूरा आनंद लेते रहना चाहिए.. "

शीला की बातें बड़े ध्यान से सुन रही थी रेणुका.. उसे ये तो अंदाजा लग ही गया था की शीला कोई साधारण स्त्री नहीं थी.. उसके अंदर कुछ ऐसी विशेषता थी जो अपने संग जुड़े सब को जवान बनाए रखने के लिए काबिल थी..

रेणुका: "तेरी बात बिल्कुल सही है शीला.. हम मन से कितने भी जवान क्यों न हो.. हमारा पार्टनर भी सहयोग देना चाहिए ना!! मेरी जिंदगी तो मेले के चक्कर जैसी है.. मेरा पति और मैं कभी साथ होते ही नहीं है.. !! क्या करू मैं??"

शीला: "रेणुका, मर्द को तैयार करना ये हमारा बाएं हाथ का खेल है.. तुझे पता है.. १००० साल की विश्वामित्र की तपस्या का भंग रंभा ने कैसे किया था?? पति को उत्तेजित करने के लिए जो भी करना पड़े वो सब करना है.. पूरे इन्टरेस्ट के साथ.. पति थका हुआ हो सकता है.. लेकिन उसका लंड तो तैयार कर ही सकते है ना!! और हमें तो उसका ही काम है.."

रेणुका: "अब क्या बताऊँ तुम्हें.. मैं उनका सहलाती हूँ.. तो उनका लंड खड़ा तो हो जाता है.. पर तब तक तो उनके खर्राटें शुरू हो जाते है.. फिर क्या मतलब सारी मेहनत का!!"

शीला हँसते हुए: "बड़ा आसान है.. समस्या तो तब आती है जब पति जाग रहा हो और लंड खर्राटे लेकर सो रहा हो.. वो भले ही सो गए हो.. तू ऊपर चढ़कर चुदवा ले.. हमें तो लंड से मतलब है ना!! वो हमें सामने से मिले या हम खुद ही ले ले.. क्या फरक पड़ता है!! अपनी आग बुझाने से हमें मतलब है.. बाकी दुनिया जाएँ भाड़ में.. !!"

दोनों बातों में उलझी हुई थी तभी शीला के घर कविता आई..

कविता: "कैसे हो भाभी? आप तो जैसे मुझे भूल ही गए.. कहीं मेरी सास ने तो मना नहीं किया है ना आपको?"

शीला: "ओहह कविता.. बैठ ना.. " शीला ने रेणुका से परिचय करवाया कविता का.. "महिला मण्डल से खींचकर लाई हूँ इसे.. अपने मण्डल में शामिल करने को.. अच्छा किया ना मैंने!!"

कविता: "हाई रेणुका.. कैसी हो आप?"

कविता की जवान छाती.. और स्टार्च की हुई चादर जैसी कडक कोरी जवानी को रेणुका अहोभाव से देखती रही.. कविता भी रेणुका के भरे हुए जोबन को ललचाई नजर से देखते हुए सोफ़े पर बैठ गई..

शीला: "कैसे आना हुआ कविता??"

कविता: "कुछ नहीं भाभी.. घर का काम निपटा लिया था.. बैठे बैठे बोर हो रही थी.. सोचा आप से मिल लूँ.. आप तो मुझे भूल गई पर मैं आपको भूलने थोड़े ही दूँगी" वह खिलखिलाकर हंसने लगी..

रेणुका इस प्यारी सी कोमल नाजुक कन्या को देखती रही.. जब कविता झुकती थी तब उसके टॉप में से छोटे छोटे दो स्तनों के बीच की सुंदर लकीर रेणुका के मन को भा गई.. लकीर कोई भी हो.. दो स्तनों के बीच.. कमर की चर्बी के बीच या फिर दो पैरों के बीच.. हमेशा आकर्षित करती है.. स्त्री का सौन्दर्य ढंका हुआ रखकर ज्यादा आनंद देता है.. रेणुका तो कविता के बात करने के लहजे से खुश हो गई..मंदिर की घंटी जैसी सुमधुर आवाज थी कविता की.. रेणुका कविता से अब तक खुलकर बात नहीं कर रही थी.. बस उसका निरीक्षण कर रही थी.. उसे भला ये कहाँ मालूम था की शीला ने इस कविता को भी अपनी जाल में लपेट रखा है!! वैसे कविता और शीला तो खुलकर बातें कर रही थी पर रेणुका की मौजूदगी से कविता भी थोड़ी सी झिझक महसूस कर रही थी.. और वो स्वाभाविक था क्योंकी वह दोनों पहली बार मिल रही थी..






पिछली रात शीला और रेणुका ने मस्त लेस्बियन सेक्स का आनंद लिया हुआ था इसलिए दोनों शांत बैठी थी.. और दो दिन पहले कविता ने भी बड़े मजे किए थे.. कविता और शीला एक डाल के पंछी थे.. और उसी डाल पर अब रेणुका नाम का पंछी बैठने जा रहा था..

कविता ने शीला से कहा: "मैं आपसे एक बात करने आई हूँ"

शीला: "हाँ बोल ना.. क्या बात है?"

कविता: "भाभी.. पीयूष जहां नौकरी करता है वहाँ से उसे निकाल दिया गया है.. वो बहोत उदास है.. सुबह से कुछ खाया भी नहीं है उसने.. आप पीयूष को कुछ समझाइए ना प्लीज.. मम्मीजी ने भी कहलवाया है.. चिंता हो रही है उसे इस तरह देख कर.. " उसके खूबसूरत चेहरे पर चिंता की रेखाएं स्पष्ट नजर आ रही थी

शीला: "टेंशन क्यों ले रही है पगली.. !! एक नौकरी गई तो दूसरी मिल जाएगी.. चिंता मत कर.. सब ठीक हो जाएगा.. तेरा पीयूष लाखों में एक है.. ऐसे होनहार लड़के को दूसरी नौकरी मिलने में देर नहीं लगेगी"

रेणुका इन दोनों की बातों के बीच में टोकना नहीं चाहती थी इसलिए चुप रही.. पर उसके मन में स्त्री सहज सहानुभूति जागृत हुई कविता के लिए

कविता: "मैं भी वहीं बोल रही हूँ पीयूष को पर मानता ही नहीं है.. बिना खाएं पियें कमरे में पड़ा हुआ है"

शीला: "अभी कहाँ है वोह?"

कविता: "कहीं बाहर निकला अभी.. इसीलिए मैं आपके पास आई.. भाभी, आप उसे फोन कीजिए ना!!"

शीला: "तू चिंता म यात कर.. जहां भी गया होगा वापिस आ जाएगा.. रेणुका, जरा मुझे वहाँ पड़ा कॉर्डलेस फोन तो देना!!"

कविता से नंबर पूछकर शीला ने फोन लगाया

कविता: भाभी आप फोन स्पीकर पर रखिए ताकि मैं भी सुन सकूँ" शीला ने स्पीकर ओन कर दिया

दस बारह रिंग के बाद पीयूष ने फोन उठाया

"हैलो कौन?"

"मैं शीला भाभी.. आपकी पड़ोसन बोल रही हूँ पीयूष जी.. आप कहाँ हो?" शीला इस तरह औपचारिकता से इसलिए बात कर रही थी ताकि पीयूष को अंदाजा लगे की उसके साथ कोई ओर भी है जो सुन रहा है

पीयूष: "अरे शीला भाभी आप? कैसी है? मैं यहीं बाजार में आया हूँ"

शीला: "तुम अभी यहाँ आ सकते हो मेरे घर?"

पीयूष: "पर भाभी.. अभी दिन के समय.. कहीं मम्मी या कविता ने देख लिया तो? ऐसा करता हूँ.. रात को जब कविता सो जाएँ उसके बाद चला आऊँगा.. ठीक है?"

कविता और रेणुका पीयूष की बात सुनकर चौंक गई.. शीला के भी पसीने छूटने लगे

शीला: "अरे पर तुम मेरी बात तो सुन लो पूरी"

शीला की बात को आधे में ही काटकर पीयूष ने कहा "कोई बात नहीं भाभी.. आपने कहा तो मैं अभी आ जाता हूँ आपके घर.. आप तैयार रहना.. भाभी मैं एक बार आपके साथ तसल्ली से करना चाहता हूँ.. पर लगता है ऐसा आराम से करने का मौका मिले ना मिले.. क्या करें.. अब पड़ोस में ही रहते है तो ये सारी तकलीफ तो उठानी ही पड़ेगी. मैं आ रहा हूँ.. आप फोन चालू रखिए"

कविता और रेणुका का चेहरा देखने लायक था.. शीला को इतनी शर्म आई की बात ही मत पूछो.. वो पीयूष का मन शांत करने के लिए बात करने बुला रही थी और वो बेवकूफ ये समझा की शीला उसे चोदने के लिए बुला रही है..

शीला: "तुम मेरी बात सुनो ठीक से.. बिना मेरी बात सुने कुछ भी मत बोलो.. कविता यहाँ मेरे बगल में बैठी है.. तुम यहाँ आओ तुम्हारी नौकरी के बारे में बात करनी है"

पीयूष: "कहीं उसने हमारी बात सुन तो नहीं ली भाभी? अरे हाँ.. मैं तो भूल ही गया.. आप ने लेंडलाइन से फोन किया है.. उसमें कहाँ स्पीकर होता है!! और सुन भी लिया होगा तो क्या हर्ज है.. मैंने भी उसे मूवी के दौरान उसके बगल में बैठे अनजान लड़के के साथ मस्ती करते हुए देखा था.. पर मैं जानबूझकर कुछ नहीं बोला था" पीयूष ने सारे भंडे एक साथ फोड़ दिए आज तो.. कविता को ये सुनकर चक्कर सा आने लगा

शीला: "किसी ने भी कुछ नहीं सुना.. तुम यहाँ आ जाओ बस.. मैं फोन काट रहीं हूँ" शीला ने फोन रख दिया.. रेणुका उसके सामने विचित्र ढंग से देख रही थी.. पीयूष की बात सुनकर उसे इतना तो पता चल ही गया की शीला और पीयूष के बीच कोई खिचड़ी जरूर पक रही थी

थोड़ी देर में पीयूष शीला के घर आ पहुंचा.. वहाँ कविता और रेणुका को देखकर वो सकपका सा गया.. उसने मन ही मन माथा पीट लिया.. क्या सोचकर आया था और क्या निकला!! कहीं कविता ने उनकी बातें सुन ली होगी तो? सुनी हो तो भी क्या?? उसे पता ही है की मुझे शीला भाभी कितने पसंद है !!

शीला: "पीयूष, मैंने सुना की तुम्हारी नौकरी छूट गई है.. सुनकर दुख हुआ पर तुम चिंता मत करना.. दूसरी मिल जाएगी.. कहीं और बात की है तुमने नौकरी के लिए?"

पीयूष: "चल तो रही है.. उसी सिलसिले में बाहर था अभी.. "

रेणुका: "पीयूष, तुम किस तरह का कामकाज जानते हो?"

पीयूष: "मैं कंप्यूटर एकाउंटिंग का काम जानता हूँ" पीयूष इस अनजान औरत को देखता रहा

रेणुका: "मेरे पति का बड़ा बिजनेस है और उन्हे इस तरह के आदमी की जरूरत भी है.. फिलहाल अगर तुम्हारे पास को नौकरी न हो तो मैं उनसे तुम्हारी बात कर सकती हूँ.. अगर बात जम जाएँ तो प्रॉब्लेम सॉल्व हो जाएगा.. "

कविता: "पीयूष, ये रेणुकाजी है.. शीला भाभी की सहेली.. रेणुका जी.. ये मेरे पति है पीयूष" कविता ने दोनों का परिचय करवाया

दोनों ने एक दूसरे का नमस्ते से अभिवादन किया

शीला: "रेणुका तू अपने पति से इस बारे में बात ही कर ले अभी"

रेणुका ने अपने ब्लाउस से मोबाइल निकाला.. निकालते वक्त उसके एक स्तन का उभार दिख गया.. पीयूष ने सूचक नजर से शीला को देखा.. शीला ने उसे आँख मारी.. पीयूष मुस्कुराकर नीचे देखने लगा

रेणुका: "हैलो.. कहाँ हो आप?"

सामने रेणुका का पति राजेश था

राजेश: "मैं अभी जरूरी मीटिंग में हूँ.. जल्दी बता क्या काम था?" राजेश ने थोड़े से क्रोध के साथ कहा

रेणुका ने उसे पीयूष के बारे में बताया

राजेश: "ठीक है.. तुम उन्हे कल या परसों अपनी ऑफिस पर दोपहर के समय भेज देना.. और कुछ?"

रेणुका: "और तो कुछ नहीं.. सब ठीक है.. पर तुम जल्दी वापिस आ जाओ.. मैं अकेले बोर हो रही थी तो २ दिन के लिए अपनी सहेली शीला के घर रहने आई हूँ.. तुम आज शाम को तो लौट आओगे ना?"

राजेश: "सोच तो रहा हूँ की लौट आउ.. आज रात को शायद निकलूँगा तो आते आते देर हो जाएगी.. तू आराम से अपनी सहेली के घर रुक.. और मजे कर.. और हाँ.. अपनी सहेली के पति के साथ फ़्लर्ट करना शुरू मत कर देना.. तेरी आदत मैं जानता हूँ.. हा हा हा हा.. !!"

रेणुका ने कृत्रिम क्रोध के साथ कहा "क्या कुछ भी बोल रहे हो!!! मैंने कब किसी के साथ फ़्लर्ट किया है कभी !! तुम जैसा मेरी मम्मी के साथ फ़्लर्ट करते हो वैसा तो मैंने कभी किसी के साथ नहीं किया.. छोड़ो वो सब.. और जल्दी घर आ जाओ.. बात फ्लर्टिंग से आगे बढ़ जाए उसके पहले"

रेणुका ने फोन रख दिया और कविता के पास बैठकर कहा "मेरी बात हो गई है.. पीयूष तुम परसों इस पते पर पहुँच जाना और मेरे पति राजेश से मिल लेना.. सब ठीक हो जाएगा.. चिंता करने की कोई बात नहीं है"

कविता: "सच !! आप कितनी अच्छी हो रेणुका जी... पीयूष चल अब.. खाना कहा ले.. तेरे भूखे रहने से कुछ नहीं होने वाला"

शीला: "कविता, तू और पीयूष आज यहीं हमारे साथ खाना खाने आओ.. मैं बना दूँगी.. मैं तेरी सास को बता देती हूँ.. तब तक तू किचन में जाके सब्जी काट.. फिर हम साथ में बाकी काम निपटाएंगे.. तब तक मैं और रेणुका तेरी सास को बोलकर आते है."

रेणुका और शीला अनुमौसी से मिलने गए.. पीयूष और कविता अब अकेले थे.. कविता से पीयूष का दुखी चेहरा देखा नहीं जा रहा था.. उसने पीयूष को अपनी बाहों में कसकर पकड़ लिया.. वो किसी भी तरह पीयूष को मूड में लाना चाहती थी.. अपने सुंदर होंठों से पीयूष को चूमते हुए उसने उसका लंड पकड़ लिया

पीयूष: "क्या कर रही है ये तू?? अभी वो रेणुका भाभी और शीला भाभी आती होगी"

कविता ने शरारत करते हुए कहा "ओहो.. रेणुका भाभी.. वो तेरी भाभी कब से बन गई?? अभी वो ब्लाउस से मोबाइल निकाल रही थी तब तू कैसे उनकी छाती को देख रहा था !!"

पीयूष: "वो.. वो.. वो तो मैं वहाँ नहीं देख रहा था" पीयूष की चोरी पकड़ी गई

कविता: "तो और किसकी छातियाँ देख रहे थे ? शीला भाभी की ? अरे हाँ.. मैं तो भूल ही गई.. शीला भाभी के होते हुए तू किसी और की तरफ कभी देखता ही कहाँ है !!"

पीयूष: "तू मेरी बात का गलत मतलब निकाल रही है.. " पीयूष आगे कुछ बोलत उससे पहले कविता ने अपने स्तनों को पीयूष की छाती से रगड़ दिया.. पीयूष का लंड सख्त हो गया..

कविता: "सच सच बता.. तुझे ये रेणुका भाभी कैसी लगी? मेरा तो ठीक है.. मैं तो काम्पिटिशन में ही नहीं हूँ.. पर शीला भाभी और रेणुका भाभी में से तुझे कौन ज्यादा पसंद आया?"

पीयूष: "वो तो बिना देखे कैसे पता लगेगा मुझे !!"

कविता: "साले हलकट.. अपनी बीवी के सामने दूसरी के बबले देखने की बात कर रहा है !! तेरी तो मैं.. " कविता हँसते हुए पीयूष का हाथ मरोड़ने लगी.. पीयूष अपना हाथ छुड़ाकर घर के बाहर निकल गया और दीवार फांदकर अपने घर में घुसा.. कविता शीला के किचन में खाना बनाने पहुंची

पीयूष जब अपने घर पहुंचा तब उसे कुछ विचित्र आवाज़ें सुनाई दी.. अनुमौसी का कमरा बंद था.. पर जिस प्रकार की आवाज़ें आ रही थी वो सुनकर पीयूष चोंक गया

पीयूष घर के बाहर बरामदे से.. अनुमौसी के कमरे की पीछे की तरफ जा पहुंचा.. खिड़की बंद थी पर अंदर की बातें यहाँ से सुनाई पड़ रही थी.. वो चुपके से उनकी बातें सुनने लगा.. जैसे जैसे वो सुनता गया उसका आश्चर्य और बढ़ता गया

अनुमौसी: "शीला हरामी.. उस दिन पिक्चर देख के आने के बाद तू मेरे पीयूष के साथ क्या कर रही थी ? मैंने खिड़की से सबकुछ देखा था..

शीला: "क्या मौसी कुछ भी बोल रही हो !! पीयूष तो मेरे देवर समान है.. आप सोच रही हो ऐसा कुछ भी नहीं था.. "

अनुमौसी: "तू मुझे मत सिख.. समझी ना.. !! ये बाल मैंने धूप में सफेद नहीं किए है.. सब जानती हूँ मैं"

रेणुका: "मौसी अभी पीयूष शीला के घर आया तब.. कैसे कहूँ मैं.. शर्म आती है.. शीला की छातियों को ऐसे घूर रहा था वो !! दाल में कुछ काला तो जरूर है "

अनुमौसी: "शीला, तू मेरे बेटे के संसार में आग मत लगाना.. तेरे रूप का जलवा ही कुछ ऐसा है.. उस दिन जब तू मेरे घर खाना खाकर गई उसके बाद मेरे वो.. उनका ऐसा खड़ा हो गया था की पूछ ही मत.. सच बता.. कहीं मेरे उनके साथ भी तूने कुछ किया तो नहीं था ना !!"

शीला: "मौसी, कब से आप कुछ भी बके जा रही हो.. मैं क्या दोनों बाप बेटे के साथ फ्लर्ट करूंगी?? पीयूष तो जवान है.. पर चिमनलाल तो मेरे बाप के उम्र के है"

अनुमौसी: "शीला, तू हकीकत में क्या चीज है ये मेरे मुंह से मत बुलवा.. मुझे भी भगवान ने आँखें दी है.. सब दिखता है मुझे.. समझी.. रोज सुबह उस रसिक से दूध लेते समय क्या क्या करती है.. वो सब मालूम है मुझे.. साला वो रसिक तेरी जाल में कैसे फंस गया ? मेरे सामने तो कभी देखता तक नहीं है"

शीला: "तो उसे दिखाकर आपको करना क्या है.. मौसी आपकी उमर हो चली है .. शांति से बैठकर भजन कीर्तन कीजिए"

अनुमौसी: "सच कहूँ शीला.. वैसे तो मेरा मन ही उठ गया था इन सब बातों से.. पर तेरे और रसिक के बीच उस सुबह जो कुछ भी देखा उसके बाद मेरे अंदर नए अरमान जाग गए.. वरना मेरे पति का तो १० सालों से खड़ा भी नहीं होता.. तूने ही मेरे अंदर ये सारी हवस जागा दी ही.. आज कल कविता भी बहोत खुश नजर आती है.. सच सच बताना.. कहीं तूने उसे भी रसिक या जीवा के साथ तो नहीं मिलवा दिया ना !! तेरा कोई भरोसा नहीं है.. तू कुछ भी कर सकती है"

सुनकर पीयूष का दिमाग चकराने लगा.. माय गॉड !! मेरी कविता किसी और के साथ !!!! नहीं नहीं.. ऐसा नहीं ओ सकता.. वरना इस बात का मुझे जरूर पता चलता..

अनुमौसी: "देख शीला.. अब तुझसे क्या छुपाना !! तूने मेरे जीवन में नए उमंग जागा दिए है.. मेरे पति ने कभी अपने शरीर का ध्यान नहीं रखा.. पहले उनमें कितना जोश और ताकत थी.. मुझे याद है.. शादी के दूसरे ही साल जब हम महाबलेश्वर गए थे.. !!" मौसी ने दीर्घ सांस छोड़कर बात वहीं पर अटका दी.. रेणुका की मौजूदगी के कारण वह थोड़ी झिझक रही थी.. रेणुका समझदार थी.. उसे महसूस हुआ की उसकी वजह से मौसी अपना दिल हल्का नहीं कर पा रही है.. थोड़ी देर सोचने के बाद उन्होंने तय किया की वो शीला के घर जाकर कविता को खाना बनाने में मदद करेगी..

रेणुका: "आप दोनों बातें कीजिए.. मैं कविता की मदद करने जा रही हूँ.. जब खाना तैयार हो जाएगा तब बुला लूँगी.. " कमरे का दरवाजा खोलकर वो बाहर निकली तब उसे खयाल आया.. शीला के घर तो पीयूष और कविता अकेले होंगे और न जाने क्या कर रहे होंगे.. !! क्यों बेकार में उनके कबाब में हड्डी बनना.. !! ये सोचकर वो शीला के घर नहीं गई.. अब क्या करें?? सोचा यहाँ अनुमौसी के कंपाउंड और बरामदे में चल लिया जाए.. थोड़ी सी वॉक हो जाएगी.. घर का चक्कर लगाते हुए उसने पीछे से पीयूष को खिड़की पर कान लगाकर सुनते हुए देखा.. अरे बाप रे!! ये यहाँ क्या कर रहा है!! रेणुका के पसीने छूट गए.. कहीं वो हम सब की बातें तो छुपकर नहीं सुन रहा !! मर गए.. !! पीयूष ने अब तक रेणुका को नहीं देखा था क्योंकी वो उसकी पीठ के तरफ थी..

अंदर चल रही बातें सुनकर पीयूष गरम हो गया था और उत्तेजना के मारे अपना लंड सहला रहा था.. ये देखकर रेणुका की चुत में झटका लगा.. दोपहर का समय था और रविवार का दिन था.. सब अपने घरों में आराम करते हुए छुट्टी का लुत्फ उठा रहे थे.. इसलिए आजू बाजू कोई भी नहीं था.. कंपाउंड की दीवार भी काफी ऊंची थी इसलिए बाहर गुजर रहे व्यक्ति को अंदर का द्रश्य दिखाई नहीं पड़ता था.. रेणुका को अब ये जानने में दिलचस्पी थी की पीयूष आगे क्या करता है !! इस पर से अंदाजा लग जाएगा की अंदर कैसी बातें हो रही है.. और पता नहीं भी चलेगा तो आखिर शीला तो बाद में बता ही देगी .. !!

पीयूष की हरकतें देखकर रेणुका को इतना पता तो चल ही गया की अंदर कुछ जबरदस्त गरम बातें हो रही थी.. रेणुका वापिस घर के अंदर आ गई.. और जिस कमरे में शीला और अनुमौसी बैठे थे उसके दरवाजे पर कान लगाकर सुनने लगी.. रेणुका को अनुमौसी की सिसकियाँ सुनाई पड़ रही थी

अनुमौसी: "ओहह शीला.. ये तूने क्या कर दिया.. आह्ह.. ऐसा मज़ा तो पहले कभी नहीं आया मुझे.. आहह आहह शीला.. जल्दी कर.. कहीं वो रेणुका वापिस आ गई तो मेरा अधूरा रह जाएगा.. ओह्ह मर गई.. आईईई.. !!"

रेणुका समझ गई की अंदर शीला और मौसी के बीच जबरदस्त लेस्बियन सेक्स चल रहा है.. अब वो वापिस दौड़कर पीयूष जहां था वहाँ चली गई.. वो देखना चाहती थी की पीयूष अब क्या कर रहा है!! पीयूष का लंड अभी अभी वीर्य की पिचकारी मारकर ठुमक रहा था.. नीचे टाइल्स पर उसके वीर्य की बूंदें पड़ी हुई थी.. पीयूष की शर्ट के दो बटन खुले थे.. और उसके जीन्स की चैन भी.. और दीवार का सहारा लेकर.. आँखें बंद कर वो हांफ रहा था.. उसका पतला पर सख्त लंड झटके खाते हुए हिल रहा था.. दोपहर की धूप में उसका लाल सुपाड़ा और वीर्य की बूंदें चमक रही थी..






पीयूष को इस अवस्था में देखकर रेणुका अपने आप को रोक न पाई और पीयूष के सामने आकर खड़ी हो गई.. बंद आँखों के आगे अंधेरा महसूस होते ही पीयूष ने आँखें खोल दी.. सामने खड़ी रेणुका उसे देखकर मुस्कुरा रही थी.. पीयूष पसीने से तरबतर हो गया था.. रेणुका ने पल्लू से उसके चेहरे के पसीने को पोंछ लिया.. पल्लू हटाते ही रेणुका के गुलाबी ब्लाउस के अंदर छुपे टाइट सुंदर स्तनों को देखकर.. अभी अभी झड़ा हुआ पीयूष का लंड फिरसे अंगड़ाई लेकर जाग गया.. रेणुका ने उसका लंड अपनी मुठ्ठी में पकड़ लिया.. और नीचे झुक के जितना हो सकता था उतना अंदर अपने मुंह में ले लिया..

स्तब्ध होकर पीयूष.. ऐसा महसूस कर रहा था जैसे दोपहर में सपना देख रहा हो.. इस अवर्णनीय पल को पूरे आनंद के साथ महसूस कर रहा था.. रेणुका ने पीयूष का हाथ पकड़कर अपने स्तन पर रख दिया.. झुककर लंड चूस रही रेणुका के पल्लू के आरपार वी-नेक ब्लाउस से उभर कर बाहर दिख रही.. सफेद दूध जैसी दो चूचियों के बीच की गहरी लकीर देखकर पीयूष पागल सा हो गया.. उसने अपने हाथों से दोनों स्तन दबाए.. सिर्फ ४५ सेकंड में.. बिना लंड को ज्यादा अंदर बाहर किए.. केवल रेणुका के मुंह की गर्मी और उसकी नटखट कारीगरी के कारण.. पीयूष के लंड ने उलटी कर दी.. मुंह में वीर्य छोड़ते वक्त उसने स्तनों को इतने जोर से दबाया की रेणुका को दर्द होने लगा..

पीयूष का लंड जब रेणुका के मुंह से बाहर निकला तब पतला तीन इंच का ही रह गया था.. एक मिनट पहले फटने को तैयार एटमबॉम्ब को रेणुका ने डिफ्यूज़ कर दिया था.. अपने पल्लू से पीयूष के लंड को पोंछकर साफ करते हुए रेणुका ने उसे वापस पीयूष की पतलून के अंदर रख दिया.. और फिर पेंट की चैन बंद कर दी..

रेणुका की इस अदा पर पीयूष फिदा हो गया.. इतना ही नहीं.. पल्लू के जिस हिस्से से उसने लंड को पोंछा था उस हिस्से को सूंघकर रेणुका ने अपना चेहरा पोंछा.. पीयूष तो कायल हो गया रेणुका पर.. !!

उसने रेणुका को अपनी बाहों में लेकर एक जबरदस्त किस कर दी.. दोनों आपस में काफी देर तक एक दूसरे के होंठों को चूसते रहे.. संतुष्ट होने के बाद पीयूष ने कहा "भाभी.. मुझे आपके स्तनों को चूसना है.. "

"अभी नहीं पीयूष.. पता है ना तेरी मम्मी और शीला अंदर बैठे है? फिर कभी.. " कहते हुए रेणुका जाने लगी.. पर पीयूष ने उसका हाथ पकड़ लिया

"प्लीज भाभी.. मेरा बहुत मन कर रहा है.. पता नहीं फिर कभी मौका मिले ना मिले... सिर्फ एक बार चूसने दो मुझे"

"जिद मत कर पीयूष.. मैं तुझे पक्का चूसने का मौका दूँगी.. पर अभी नहीं"

"नहीं भाभी.. अभी करने दो ना प्लीज.. जल्दी से एक बाजू का बॉल बाहर निकाल लो.. मैं दो मिनट से ज्यादा वक्त नहीं लूँगा.. बहुत मन कर रहा है मेरा.. जब शीला भाभी के घर आपने ब्लाउस से मोबाइल निकाला था तब से मैं आपके बबलों का दीवाना हो गया हूँ "

रेणुका सोचकर बोली "अभी मुमकिन नहीं है पीयूष.. मैं घर जाने से पहले कुछ सेटिंग जरूर करूंगी.. पर अभी नहीं.. बहोत रिस्क है तू समझ.. " कहते हुए रेणुका ने अपना पल्लू ठीक किया और जाने लगी.. जाते जाते रेणुका ने पीयूष को गाल को प्यार से सहलाया और पीयूष ने रेणुका के चूतड़ को थपथपाया..

रेणुका के जाने के बाद पीयूष ने अपने कपड़े ठीक किए और शीला के घर गया जहां कविता किचन में बीजी थी.. पीयूष ने सोफ़े पर बैठकर टीवी ओन किया.. पर किसी भी चेनल पर कुछ देखने लायक नहीं था.. टीवी बंद कर वो किचन में आया और कविता से शीला के बारे में अलग अलग तरीकों से पूछताछ करने लगा.. कविता भी शीला की पक्की शिष्या थी.. उसने पीयूष को कुछ भी खास नहीं बताया.. पर उसे संदेह जरूर हुआ की अचानक पीयूष शीला के बारे में ये सब क्यों पूछ रहा था !! आज से पहले तो उसे कभी ऐसी जिज्ञासा नहीं हुई थी.. कहीं शीला भाभी ने सब कुछ बता तो नहीं दिया पीयूष को !! नहीं नहीं.. शीला भाभी ऐसा कभी नहीं कर सकती.. पर फिर भी कुछ बोल नहीं सकते.. कविता के नार्को टेस्ट में पीयूष को कुछ खास पता नहीं चला

तभी अनुमौसी, शीला और रेणुका.. तीनों घर पहुंचे.. पीयूष अपनी माँ का बहुत सम्मान करता था पर आज उसे उनका एक नया ही रूप देखने को मिला.. या यूं कहिए की सुनने को मिला.. आधे घंटे पहले.. जिस तरह उसकी माँ सिसक रही थी.. वह अब भी उसके कानों में गूंज रही थी.. पीयूष ने इंटरनेट पर लेस्बियन सेक्स के अनगिनत फ़ोटो और विडिओ देखे हुए थे.. पर वो सोचता था की ऐसा सब पश्चिमी देशों में होता होगा.. लेकिन आज उसने जो सुना उसके बाद पीयूष की सोच ही बदल गई..

मेरी मम्मी लेस्बियन कैसे हो सकती है!! क्या पापा के साथ उनकी पटती नहीं होगी ? अगर ऐसा होता तो मम्मी किसी अन्य पुरुष के साथ भी सेक्स कर सकती थी.. अगर मम्मी पापा से संतुष्ट नहीं थी तो शीला भाभी के पास जाने का क्या मतलब? मदन भाई की गैरमौजूदगी में भाभी को चुदाई के लिए साथी की जरूरत हो सकती है.. तो फिर खिड़की से शीला भाभी की सिसकियाँ क्यों नहीं सुनाई दी ? आवाज तो सिर्फ मम्मी की ही आ रही थी.. तो क्या शीला भाभी मम्मी की चुत चाट रही होगी? छी छी.. मैं भी क्यों ऐसा गलत सोच रहा हूँ मम्मी के बारे में !!

पीयूष अनुमौसी से आँख तक नहीं मिला पाया.. वैसे देखा जाएँ तो इस घटना में वो प्रत्यक्ष या परोक्ष किसी भी तरह से जुड़ा नहीं था.. फिर भी उसे अफसोस हो रहा था की उसने अपनी ही माँ की जातीय ज़िंदगी में दाखल दी.. वह अपनी मर्जी की मालिक थी.. और अपनी इच्छा अनुसार कुछ भी कर सकती थी..

पीयूष को एक ही चिंता थी.. अभी तो मामला शीला भाभी तक सीमित था इसलिए कोई समस्या नहीं थी.. कल जब मदन भाई लौट आएंगे और शीला भाभी उनके साथ व्यस्त हो जाएगी तब मम्मी का क्या होगा? कहीं अपनी आग बुझाने के चक्कर में वो किसी लोफ़र लफंगे मर्द के चंगुल में फंस गई तो !! पर मैं इस बारे में और कर भी क्या सकता हूँ !! पीयूष बड़ी ही असमंजस में फंस गया था

पीयूष के मन में अब भी संवाद चल रहा था .. तू क्यों इसमें कुछ नहीं कर सकता..? और तू नहीं करेगा तो और कौन ध्यान रखेगा? किसी को कानों कान खबर हुई तो पूरे खानदान की इज्जत की माँ चुद जाएगी.. नहीं नहीं.. मम्मी का ध्यान तो रखना ही पड़ेगा.. मुझे लगता है की मम्मी पहले ऐसी नहीं थी.. शीला भाभी के संग ज्यादा घुलमिल जाने के बाद ही ज्यादा एक्टिव हो गई थी.. मम्मी तो ठीक पर कविता भी आज कल शीला भाभी के साथ ज्यादा संपर्क में रहती है.. कहीं कविता भी शीला भाभी के साथ लेस्बियन....!!!! माय गॉड.. शीला भाभी इतनी खूबसूरत और एक्टिव है.. मदन भाई के बगैर.. दो सालों से बिना सेक्स के वो कैसे रह पाती होगी... !! जरूर उन्हों ने कोई न कोई लंड का जुगाड़ किया ही होगा अपनी प्यास बुझाने के लिए.. कहीं कविता भी भाभी के संग किसी और मर्द के साथ तो नहीं चुदवा रही होगी.. नहीं नहीं.. मेरी कविता ऐसा नहीं कर सकती.. पर कहीं कविता और मेरी मम्मी ही एक दूसरे के साथ तो...... !!!!!

अनुमौसी: "क्या सोच रहा है पीयूष? नौकरी गई तो गई.. इसमें इतना क्या चिंता करना.. !! और वैसे भी.. रेणुका के पति से तेरी बात हो गई है ना!! तू चिंता मत किया कर बेटा" पीयूष के सर को सहलाते हुए मौसी ने कहा "चल अब खाना खा ले" पीयूष का हाथ पकड़कर उसे डाइनिंग टेबल पर बैठा दिया मौसी ने

पीयूष मशीन की तरह बैठ गया और बिना कुछ बोले खाना खाने लगा.. थाली में सब्जी परोसते वक्त अनुमौसी का पल्लू नीचे गिर गया.. पीयूष ने अपनी नजर फेर ली.. छी छी.. ऐसे गंदे विचार मुझे क्यों आ रहे है आज!! वह खाना खाने लगा और फिर अपने घर चला गया.. कल रेणुका भाभी के पति राजेश से मिलने जाना है.. पीयूष घर पहुंचकर अपने सारे कागज ठीक करने लगा..

पीयूष के जाने के बाद कविता, शीला और मौसी टेबल पर बैठकर खाने लगे। रेणुका ने सबसे पहले खाना खतम कर लिया

शीला: "तूने कुछ खाया क्यों नहीं रेणुका? इतनी हड़बड़ी में खतम किया.. आराम से खाना था.. "

रेणुका: "मुझे जितनी भूख थी उतना खा लिया है मैंने.. तू चिंता मत कर" कहते हुए रेणुका उठकर जाने लगी

अनुमौसी: "कहाँ जा रही है तू रेणुका?"

रेणुका: "आप शांति से खाना खाइए.. मैं अभी आती हूँ" कहते हुए रेणुका भागकर अनुमौसी के घर पहुंची.. और पीयूष के कमरे में गई.. पीयूष कागज बिछाकर फ़ाइल कर रहा था.. रेणुका ने कमरे का दरवाजा बंद किया और ब्लाउस के दो हुक खोलकर अपना बायाँ स्तन बाहर निकालकर बोली


"जल्दी कर पीयूष.. वो तीनों खाना खा रहे है इसलिए बड़ी मुश्किल से बचकर आई हूँ.. मैंने तुझे वादा किया था इसलिए पूरा कर रही हूँ.. जल्दी जल्दी कर.. उनके आने से पहले मुझे भागना पड़ेगा.. "

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रेणुका: "आप शांति से खाना खाइए.. मैं अभी आती हूँ" कहते हुए रेणुका भागकर अनुमौसी के घर पहुंची.. और पीयूष के कमरे में गई.. पीयूष कागज बिछाकर फ़ाइल कर रहा था.. रेणुका ने कमरे का दरवाजा बंद किया और ब्लाउस के दो हुक खोलकर अपना बायाँ स्तन बाहर निकालकर बोली

"जल्दी कर पीयूष.. वो तीनों खाना खा रहे है इसलिए बड़ी मुश्किल से बचकर आई हूँ.. मैंने तुझे वादा किया था इसलिए पूरा कर रही हूँ.. जल्दी जल्दी कर.. उनके आने से पहले मुझे भागना पड़ेगा.. "

पीयूष स्तब्ध होकर रेणुका के पुष्ट पयोधर स्तनों के सौन्दर्य को देखता ही रहा.. क्या अद्भुत रूप था उन चूचियों का.. आहाहाहा.. स्त्री के स्तनों में ऐसा कौनसा जादू होता है.. जो देखता है बस देखता ही रह जाता है.. "






"देख क्या रहा है.. जल्दी कर.. मुझे वापिस जाना है"

"भाभी.. आप क्या मस्त लग रही हो.. पर एक ही क्यों खोला? मुझे दोनों स्तन एक साथ नंगे देखने है"

"क्या मुसीबत है यार.. पीयूष तू समझता क्यों नहीं.. अभी तेरी ममी या कविता आ गए तो आफत आ जाएगी.. जिद मत कर.. पूरा भोजन करने की जिद में प्रसाद भी हाथ से जाएगा.. इसलिए बोल रही हूँ.. जल्दी से चूस ले" कहते हुए रेणुका ने अपने स्तन को पीयूष के मुंह के आगे कर दिया..

पीयूष ने पहले अपने हाथ से स्तन को छुआ.. गोरे गोरे मस्त पपीते जैसे.. नरम नरम स्तन.. उसने हल्के से दबाया..

"क्या कर रहा है पागल? ये कोई सुहागरात है जो धीरे धीरे कर रहा है?? जल्दी खतम कर" रेणुका पीयूष से तंग आ गई। उसने पीयूष का सिर पकड़कर अपने बॉल पर दबा दिया.. पीयूष भी असली खिलाड़ी था.. उसने निप्पल को छोड़कर.. आसपास के गोलाकार पर जीभ फेरने लगा.. रेणुका इंतज़ार में थी की कब वो निप्पल को मुंह में लेकर चूसे.. पर ये तो निप्पल के इर्दगिर्द चाटता ही जा रहा था.. निप्पल को नजरअंदाज करते हुए

रेणुका इंतज़ार करते हुए थक गई और ब्लाउस का हुक बंद करने गई.. तब पीयूष ने उसका हाथ पकड़कर अपने लंड पर रख दिया.. जैसे हाथ में अंगारा पकड़ लिया हो वैसे रेणुका ने अपना हाथ झटके से खींच लिया

"दिमाग खराब हो गया है क्या तेरा !! कबसे समझा रही हूँ पर तू समझता ही नहीं है !!" कहते हुए उसने पीयूष को अपने स्तन से दूर किया.. बड़ी मुश्किल से उस टाइट स्तन को ब्लाउस के अंदर दबोचा और हुक बंद कर दिए। पीयूष उसे देखता ही रह गया रेणुका की इस हरकत को

"भाभी.. आपने चूसने ही नहीं दिया.. मैंने अभी ठीक से देखा तक नहीं है.. पता नहीं फिर कब मौका मिले" कहते हुए नाराज होने की एक्टिंग करने लगा पीयूष

रेणुका ने उसे बाहों में भरकर चूम लिया "कितना क्यूट है रे तू!! ऐसे बातें करेगा तो मुझे प्यार हो जाएगा.. चल अब मुझे जाने दे.. बहोत देर हो गई है.. और हाँ कल टाइम पर राजेश की ऑफिस पहुँच जाना.. मैं राजेश से बात कर लूँगी.. ये मेरा मोबाइल नंबर नोट कर ले.. और जब मर्जी आए तब फोन मत करना.. वरना मेरे पति को शक हो गया तो तेरी नौकरी का एबॉर्शन हो जाएगा.. समझा.. !!"

पीयूष ने अपने नंबर से रेणुका को मिसकॉल किया "मेरा नंबर भी सेव कर लेना भाभी"

"हाँ कर लूँगी.. अब चलती हूँ.. बाय" पीयूष उसे जाते हुए देखता ही रहा

रेणुका जब मौसी के घर से बाहर निकल रही थी तभी मौसी अंदर घुस रहे थे.. दोनों की नजरें मिली.. और रेणुका मुस्कुराकर चली गई। मौसी को कुछ शक तो हुआ पर तब तक रेणुका जा चुकी थी। शीला के घर कुछ देर रुक कर वो अपने घर वापिस लौट गई।

रेणुका के जाते ही शीला फिर से अकेली हो गई.. कितनी चंचल थी रेणुका!! उसकी उपस्थिति से पूरा घर जीवंत लगता था.. उसके जाते ही सब सुना सुना लगने लगा.. शीला को अपनी बेटी वैशाली की याद आ गई.. काफी दिनों से उसके साथ बात नहीं हुई थी.. शीला ने मोबाइल उठाकर तुरंत उसे फोन लगाया

"कैसी हो बेटा ?? तू तो कभी फोन ही नहीं करती मुझे? तेरे पापा भी घर नहीं है.. कम से कम मेरा हाल जानने के लिए तो फोन किया कर !! कितना अकेलापन महसूस कर रही हूँ.. पता है तुझे !!" बेटी के आगे शीला ने अपनी भड़ास निकाली

"मम्मी, मैं काफी दिनों से आपको याद कर रही थी.. पर टाइम ही नहीं मिला.. कैसी हो तुम? पता है.. हम अगले हफ्ते आने वाले है तुमसे मिलने.. !!"

"क्या बात है?" शीला उछल पड़ी

"हाँ मम्मी.. उनको ऑफिस का कुछ काम है तो मुझे भी साथ चलने को कहा.. चार पाँच दिन का काम है.. वो अपना काम निपटाएंगे और हम माँ बेटी साथ में ऐश करेंगे.. "

"बहोत अच्छा.. जल्दी जल्दी आ जा.. मैं अकेले अकेल बोर हो रही हूँ.. तेरे पापा थे तब सब दोस्तों और रिश्तेदारों से मिलना होता था.. अब तो सब फोन पर ही हाल चाल पूछ लेते है.. कोई मिलने भी नहीं आता.. "

"बस मम्मी.. अब मैं आ जाऊँगी तो तेरा दिल लगा रहेगा.. अगले हफ्ते आएंगे.. आने से पहले मैं फोन करूंगी"

"ओके बेटा.. अपना खयाल रखना.. और संजय कुमार को मेरी याद देना"

"ठीक है मम्मी.. रखती हूँ"

शीला भावुक हो गई.. बेटी को विदा करने के बाद उनका घर सुना हो गया था.. उस दिन कितना रोए थे मैं और मदन?? मदन तो रात में नींद से जागकर वैशाली को याद करते हुए रोता था..

शीला ने केलेंडर में देखा.. अभी डेढ़ महीने की देरी थी मदन के लौटने में.. अब की बार तो मैं उसे वापिस जाने ही नहीं दूँगी.. क्या रखा है परदेश में? यहाँ पत्नी बिस्तर पर करवटें ले रही हो और पति परदेश में मजदूरी कर रहा हो.. ये भी भला कोई ज़िंदगी है !! शीला को बड़ी ही तीव्रता से मदन की याद आने लगी.. आज रात उसका फोन आना चाहिए.. जल्दी आजाओ मदन..

छत पर खड़े खड़े किसी से फोन पर बातें करते हुए पीयूष को बगल के घर में शीला भाभी अपने कमरे के सोफ़े पर बैठी हुई नजर आ रही थी.. उसकी नजर शीला से मिलते ही दोनों की आँखें चमक उठी.. शीला के उभारों को देखते हुए पीयूष को रेणुका के बबलों की याद आ गई.. शीला भाभी के बॉल बड़े थे पर रेणुका के स्तन कसे हुए थे.. पर अगर शीला भाभी को एक बार भोगने के लीये मिल जाएँ तो मैं रेणुका भाभी की तरफ देखूँ भी नहीं.. आह्ह.. पीयूष के लंड में एक झटका लगा.. यार.. ये शीला भाभी की नाभि कितनी सेक्सी है !! बिल्कुल कयामत सी.. एक बार चांस मिल जाएँ तो उनकी नाभि को चोदना है.. इतनी मस्त गहरी नाभि है की आधा लंड समा जाएँ अंदर..

पीयूष के दिमाग से शीला भाभी हट ही नहीं रही थी.. ज्यादातर रूप और कामुकता एक साथ एक व्यक्ति में कम ही नजर आते है.. शीला भाभी के पास उन दोनों का जादुई मिश्रण था.. कातिल हुस्न.. आलीशान व्यक्तित्व.. और चुंबकीय स्वभाव.. पीयूष दीवाना हो चुका था उनका.. दूसरी तरफ कविता ऐसा महसूस कर रही थी की पीयूष का उसके तरफ ध्यान कम होता जा रहा था.. वो सोच रही थी की शायद मैं पिंटू की तरफ ढलती जा रही हूँ उस वजह से तो शायद ऐसा लग रहा हो.. कविता ये जानती थी की शादी के बाद उसे पिंटू से नाता तोड़ लेना चाहिए था.. पर कमबख्त दिल का क्या करें.. कितनी कोशिशों के बाद भी वह अपने पहले प्रेम को दिल से निकाल नहीं पा रही थी

दूसरे दिन पीयूष फोन करके राजेश की ऑफिस पहुँच गया.. राजेश ने इंटरव्यू लेकर उसे एक हफ्ते के लिए अपॉइन्ट किया.. और उसे अपनी ऑफिस के मेनेजर महेंद्र के नीचे नियुक्त कर दिया.. पीयूष ने बाहर निकलकर सब से पहले रेणुका भाभी को फोन कर ये समाचार दिए.. बाद में कविता को और अंत में शीला भाभी को फोन किया और अपनी नौकरी लगने की खुशखबरी दी.. राजेश ने पीयूष को एक हफ्ते के लिए उसका काम देखकर नौकरी पक्की करने और तनख्वाह तय करने का वादा किया.. अपनी योग्यता और मेहनत पर पीयूष को पूरा भरोसा था. उसने तय किया की वह पूरे दिल से मेहनत करेगा और राजेश को शिकायत का एक भी मौका नहीं देगा..

पीयूष की नौकरी शुरू हो गई.. तीसरे ही दिन.. मेनेजर महेंद्र ने पीयूष के हाथों में एक बंद कवर रखा और कहा की ये कवर वो अपनी पत्नी को दें.. ये पीयूष की पत्नी के लिए था.. पीयूष अचंभित होकर सोचता रहा की कवर में ऐसा क्या था !!

शाम को घर आकार उसने कविता के हाथ में कवर रख दिया

कविता: "क्या है ये?"

पीयूष: "कवर तेरे हाथों में ही.. तू ही खोलकर बता.. मेरी ऑफिस से दिया है.. और कहा है की तेरे लिए है"

कविता: "मुझे भला कोई क्यूँ कवर भेजेगा तेरी ऑफिस से? नौकरी मैं कर रही हूँ या तुम?"

पीयूष: "अरे यार.. तू वो सब छोड़.. और कवर खोल.. मुझसे अब और इंतज़ार नहीं हो रहा"

कविता ने कवर खोला.. एक एग्रीमेन्ट था जिसमें पीयूष की नौकरी को स्थायी कर दिया गया था और साथ ही उसकी तनख्वाह २५००० तय की गई थी.. और साथ में एक चिट्ठी थी जिसमें लिखा था

"प्रिय पीयूष,

तुम्हें मेरी कंपनी में पर्मनन्ट नौकरी देते हुए मुझे खुशी हो रही है.. मेरी कंपनी को तुम्हारे जैसे होनहार कर्मचारी की जरूरत थी। एक हफ्ते के काम को तीन ही दिन में खतम कर तुमने अपनी योग्यता सिद्ध कर दी है.. मैं अपने स्टाफ को कभी नौकर नहीं समझता.. अपने परिवार का हिस्सा ही समझता हूँ.. इसलिए शनिवार रात को तुम्हें और तुम्हारी पत्नी को मेरे साथ डिनर पर आने का न्योता दे रहा हूँ.. मेरे परिवार में तुम्हारा स्वागत है.. धन्यवाद और अभिनंदन.. शनिवार शाम को ७:४५ को तुम्हें अपनी पत्नी के साथ होटल मनमन्दिर में आना है.. हमारी ऑफिस का अन्य स्टाफ भी साथ डिनर करेगा.. हर महीने के आखिरी शनिवार को हमारी कंपनी डिनर के लिए मिलते है ताकि पूरा स्टाफ और उनके परिवारजन आपस में मिल सकें.. स्टाफ के साथ पहचान बढ़ाने का तुम्हारे लिए ये अच्छा अवसर रहेगा..

शुभेच्छा सह

राजेश"

ये पढ़कर कविता उछल पड़ी और पीयूष से लिपट गई.. पीयूष और कविता दोनों ही बेहद खुश थे.. पीयूष ने भी कविता के स्तनों को दबाते हुए उसे चूम लिया.. दोनों बेडरूम के अंदर ही थे.. पति और पत्नी एक दूसरे को उत्तेजना प्रदान करने लगे.. और साथ ही साथ एक दूसरे के वस्त्रों को भी उतारने लगे.. दोनों जिस्म नंगे होते ही पीयूष भूखे भेड़िये की तरह कविता पर टूट पड़ा.. कविता भी पीयूष के लंड को मुट्ठी में दबाते हुए अपने संतरों जैसे स्तनों को पीयूष की छाती से रगड़ने लगी.. पीयूष का शरीर उत्तेजना से तप रहा था.. उसका लंड कविता के हाथों में ठुमक रहा था.. पीयूष ने ऊपर उठकर अपना लंड कविता के मुंह में दे दिया.. कविता बड़े प्यार से पीयूष के सुपाड़े को चूसते हुए उसके आँड़ों को सहलाने लगी.. पीछे की तरफ झुककर पीयूष ने कविता की छोटी सी क्लिटोरिस को मसलकर उसे उत्तेजना से पागल कर दिया..






"आह्ह कविता.. और जोर से चूस.. बहोत मज़ा आ रहा है यार.. " पीयूष तेजी से कविता की क्लिटोरिस को रगड़ रहा था। दूसरे हाथ से उसने कविता के एक स्तन को मरोड़ दिया.. पीयूष ने अपना लंड अब कविता के मुंह से बाहर निकाला और वो कविता की प्यारी पुच्ची को चाटने लगा.. सिहर रही कविता आँखें बंद कर ये सोच रही थी की ऑफिस से आए खत में जो लिखाई थी.. वो पिंटू से काफी मिलती झूलती क्यों लग रही थी? स्कूल में वो पिंटू को पास बैठकर ही पढ़ती थी इसलिए उसकी लिखाई से वो परिचित थी..





दिमाग में पिंटू का खयाल आते ही कविता में एक अनोखा जोश आ गया.. अपनी चुत चाट रहे पीयूष को बिस्तर पर पटक कर वो उस पर सवार हो गई.. उंगलियों के बीच उसके लंड को पकड़कर अपनी चुत के छेद को उसपर रख दिया और धीरे धीरे बैठ गई.. लंड अंदर घुसते ही उसने बेतहाशा कूदना शुरू कर दिया.. पीयूष लाचार होकर कविता के प्रहारों को लेटे लेटे झेल रहा था.. उछलते हुए कविता ने अपने बाल खोल दिए.. और मदहोश होकर आँखें बंद कर ऊपर नीचे करती ही रही.. खुले हुए बाल.. जंगली जानवर जैसी उत्तेजना..लाल चेहरा.. बंद आँखें.. पीयूष एक पल के लिए उसे देखकर डर सा गया.. बेरहमी से कविता पीयूष पर कूदती ही रही.. उसके कड़े स्तन.. और उत्तेजना के कारण बंदूक की तरह तनी हुई उसकी निप्पलें.. पीयूष ने मसलना शुरू कर दिया.. पागलों की तरह कूद रही कविता जैसे ही अपनी मंजिल पर पहुंची तब "ओह माय गॉड" कहते हुए लंड से उतार गई और बिस्तर पर लेटकर हांफने लगी..





अब बारी पीयूष की थी.. उसने हांफ रही कविता की जांघें चौड़ी की.. और उसकी गीली मुनिया में एक ही झटके में अपना लंड घुसेड़ दिया.. उसके हर धक्के के साथ कविता कराह रही थी.. कुछ ही धक्कों के बाद पीयूष ने अपना व्हाइट ज्यूस कविता की तंग चुत में दे मारा.. और उसकी छाती पर गिर गया.. लंड को चुत की अंदर ही रखे हुए.. वो दोनों गहरी नींद में.. उसी अवस्था में सो गए..

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रोज की तरह कविता जल्दी जाग गई.. सो रहे पीयूष को अपने शरीर से धकेलते ही "पुचच.. " की आवाज के साथ उसका लंड चुत से बाहर निकला.. पीयूष को सहलाकर वो खड़ी हुई और गाउन पहनकर दूध लेने अपने कंपाउंड में आई..

कविता ने शीला के घर की तरफ नजर डाली.. अंदर लाइट जल रही थी.. ये देख कविता सोचने लगी.. लगता है अभी अभी जागी है शीला भाभी.. पता नहीं खाली बिस्तर के साथ कैसे रात बिताती होंगी बेचारी.. !! दो साल से अकेली रहती है.. रसिक अभी आया नहीं था.. कविता ने सोचा की तब तक नहाने के लिए पानी गरम करने गैस पर रख दूँ


गैस पर गरम पानी का पतीला चढ़ाकर वो अपने मोबाइल पर मेसेज चेक कर रही थी तभी रसिक की साइकल की घंटी सुनाई दी.. अपना मोबाइल प्लेटफ़ॉर्म पर रखकर उसने पतीली उठाई और दूध लेने के लिए बाहर आई..

अंधेरे में बाहर जो द्रश्य उसे दिखा उससे कविता के पैरों तले से जमीन खिसक गई.. रसिक ने शीला भाभी को जकड़कर रखा था.. वो चिल्लाने ही वाली थी की तब उसे ये एहसास हुआ की रसिक जबरदस्ती नहीं कर रहा था.. बल्कि शीला भाभी अपनी मर्जी से उससे लिपटी हुई थी.. कविता को अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हो रहा था.. शीला भाभी जैसी सुशील संस्कारी स्त्री.. दूधवाले के साथ?? छी छी छी.. घिन आ गई कविता को शीला भाभी पर

शीला का ये रोज का खेल था.. रसिक जब भी दूध देने आए तब अंधेरे का फायदा उठाकर मजे कर लेती थी.. शीला के बोझिल जीवन में इससे रस बना रहता था.. और रसिक को भी मज़ा आता था.. शीला और रसिक किसी ने भी कविता को देखा नहीं था.. दोनों अपनी ही मस्ती में मस्त थे.. थोड़ी ही देर के बाद रसिक ने शीला को दूध दिया.. और उसके साथ जो भी दे सकता था वो देकर अनुमौसी के दरवाजे की तरफ आया.. हाथ में पतीली लिए कविता तैयार खड़ी थी..

"कैसी हो भाभी? आज आप दूध लेने आई? मौसी सो रही है क्या?"

कविता ने नफरत भरे सुर के साथ कहा "तुम अपने काम से काम रखो.. मैं दूध लेने आउ या मम्मी आए.. तुम्हें क्या फरक पड़ता है? तुम बस दूध दो और चलते बनो"

"इतना गुस्सा क्यों कर रही हो भाभी.. मैंने तो बस ऐसे ही पूछ लिया.. "

"क्यों? दूध देने के अलावा मौसी का और कुछ भी काम था तुम्हें?"

सुनकर रसिक चोंक गया "अरे भाभी.. मुझे बस दूध का हिसाब लेना था उनसे.. और कोई काम नहीं था.. " दूध देकर रसिक चला गया।

कविता का शक और भी दृढ़ होने लगा.. कहीं मेरी सास भी शीला भाभी के साथ इन गुलछर्रों में शामिल तो नहीं हो गई !! कुछ कहा नहीं जा सकता

दोपहर को काम निपटाकर कविता शीला भाभी के घर आई.. वो जानना चाहती थी की भाभी उससे और क्या क्या छुपा रही थी

बातों ही बातों में उसने पूछ लिया "भाभी.. आपने मदन भाई के अलावा और किसी के साथ सेक्स किया है कभी??"

शीला चोंक गई.. अचानक कविता ने आज ये सवाल क्यों पूछा !!

"देख कविता.. अपना पाप हम खुद ही जानते है.. ये केवल माँ ही जानती है की उसका बेटा किसकी पैदाइश है.. इशारों को अगर समझो.. राज को राज रहने दो.. " शीला गीत गुनगुनाकर कविता को आँख मार दी.. संकेत साफ था.. वो कविता और पिंटू के संबंधों की ओर इशारा कर रही थी

कवित सोच में पड़ गई.. भाभी ने तो मुझे ही शक के दायरे में लाकर खड़ा कर दिया..

"आप ऐसे बात मत बदलिए.. सच सच बताइए ना.. "

शीला: "देख कविता.. गोल गोल मत घुमा.. तेरे दिमाग में क्या चल रहा है मुझे बात दे.. "

शीला और कविता के बीच जिस तरह से लेस्बियन संबंध विकसित हो चुके थे उसके बाद एक दूसरे से शर्माने की कोई आवश्यकता नहीं थी

कविता: "भाभी, मैंने आज सुबह आपको और रसिक को एक साथ देखा.. आप को और कोई नहीं मिला जो एक दूधवाले के साथ.. छी छी.. मुझे तो बोलने में भी शर्म आती है"

अपने चेहरे पर जरा से भी शिकन लाए बगैर शीला ने शांत चित्त से कविता की जांघ पर हाथ रखकर कहा

शीला: "तेरी बात सही है कविता.. पर मेरी तरह अगर तू ८५५ रातें बिना पति के गुजार कर फिर ये बात बोल रही होती तो तेरी बात का वज़न भी पड़ता.. " कविता स्तब्ध हो गई

कविता: "भाभी.. मैं सिर्फ इतना कह रही थी की कहाँ वो रसिक और कहाँ आप?? कोई तुलना ही नहीं है.. "

शीला: "कविता, एक ५५ साल की.. ढलती जवानी से गुजर रही स्त्री.. किस मुंह से किसी अच्छे घर के लड़के को प्रपोज करेगी.. ये सोचा है तूने कभी? तू अगर पिंटू के साथ पकड़ी भी जाए तो लोग ये समझकर माफ कर देंगे की बच्चे है.. गलती हो जाती है.. पर अगर इस उम्र में लोगों को मेरे बारे में कुछ पता चले तो पूरा समाज थू थू करेगा.. मेरी परेशानी को समझ"

कविता ने कुछ जवाब नहीं दिया.. शीला भाभी की मनोदशा उसे धीरे धीरे समज आने लगी

शीला ने अपनी बात आगे चलाई "एक तरफ लोगों की भूखी नज़रों को मैं नजर अंदाज करती रहती हूँ.. दूसरी तरफ खुद अपने जिस्म की आग से झुलस रही हूँ.. कोई कब तक बर्दाश्त करें !! मैं भी आखिर एक इंसान हूँ.. मेरी भी जरूरतें है.. ८५५ रात कम नहीं होती कविता.. मुझे रसिक के पास वो सुख मिला जो मेरे पति के पास कभी नहीं मिला था.. "

कविता: "मतलब? कौन सा सुख?"

शीला: "वो तू अभी समझ नहीं पाएगी.. जब तेरी उम्र होगी.. तू मेनोपोज़ से गुजरेगी.. तब तुझे समझ आएगा"

कविता: "नहीं भाभी.. मुझे समझाइए ना.. प्लीज। आज नहीं तो कल.. मैं भी उस अवस्था से गुजरूँगी.. आपका मार्गदर्शन तब काम आएगा"

शीला ने एक गहरी सांस ली और अपनी बात शुरू की

शीला: "ऐसा है कविता... एक-दो डिलीवरी के बाद.. स्त्री के गुप्तांग में ढीलापन आ जाता है.. और मेनोपोज़ के बाद शरीर के अंदर विशिष्ट तब्दीलियाँ होती है.. सेक्स की इच्छा तीव्र हो जाती है.. दूसरी तरफ बढ़ती उम्र के कारण पति के लंड में पहले जैसी सख्ती नहीं रहती.. उत्तेजित होने में भी समय लगता है.. और उत्तेजित हो भी जाएँ तो तुरंत वीर्य स्खलित हो जाता है.. ऐसी सूरत में स्त्री को एक अजीब सा खालीपन महसूस होता है.. एक तो योनि के शिथिल होने से संभोग में ठीक से मज़ा नहीं आता.. और ऊपर से पति दो तीन धक्कों में ही झड़ जाता है.. इसलिए संतोष ही नहीं मिल पाता.. "

कविता ध्यानपूर्वक शीला भाभी की बातें सुन रही थी..

कविता: "अच्छा.. इसीलिए बड़ी उम्र की स्त्रीओं को जवान लड़के ज्यादा पसंद आते है.. हैं ना!!"

शीला: "कोई कोई पसंद आ जाता है.. पर हर बार ऐसा नहीं होता.. दूसरी बात.. तू आज रात घर पर जाकर.. पीयूष के लंड से ज्यादा मोटी चीज अपनी चुत में डालकर देखना.. और फिर बताना की मज़ा आया की नहीं!!"

कविता: "क्यों? मतलब मैं समझी नहीं"

शीला: "मतलब.. मेरे पति के मुकाबले रसिक का लंड ज्यादा मोटा है.. और मोटे लंड से चुदवाने में हमेशा मज़ा आता है.. ढीले ढाले भोसड़े की अंदरूनी दीवारों के साथ जब मोटे लंड का घर्षण होता है तब इतना मज़ा आता है.. मैं शब्दों में बयान नहीं कर सकती"

कविता: "रसिक का लंड मोटा है मतलब....आपने उसके साथ.. !!!"

शीला: "बड़ा ही मस्त है रसिक का.. तू तो ले भी नहीं पाएगी उसका.. चीखें मारकर मर जाएगी अगर लेने की कोशिश भी करेगी तो.. !!" रसिक का लंड याद आते ही शीला का भोंसड़ा पनियाने लगा.. ये विवरण सुनकर कविता भी सकपकाने लगी

कविता: "माय गॉड.. इतना मोटा है रसिक का?"

शीला: "कुछ ज्यादा ही मोटा.. नॉर्मल लंड से दोगुना मोटा"

कविता: "कितना मोटा होगा? वो मूसल जितना?" किचन में प्लेटफ़ॉर्म पर पड़े मूसल की तरफ इशारा करते हुए कविता ने कहा। उस दौरान उसने मन ही मन पीयूष और पिंटू के लंड की तुलना उस मूसल से कर ली थी.. मूसल काफी मोटा था

शीला: "ये तो कुछ भी नहीं है.. " कहते हुए शीला ने कविता के सामने ही अपना घाघरा ऊपर कर लिया और चुत खुजाते हुए मुठ लगाने लगी.. अपनी चार उंगलियों को एक साथ अंदर बाहर करते हुए उसने कविता से कहा "देख तू.. कितनी ढीली हो गई है.. अब ऐसे में पतला लंड कहाँ से मज़ा देगा मुझे?? तेरी चुत में मुश्किल से दो उँगलियाँ जाती होगी"

कविता भी गरम होने लगी थी "हाँ भाभी.. दो उँगलियाँ डालती हूँ तो भी बहुत दर्द होता है" उसकी तेज सांसें बता रही थी की वह कितनी उत्तेजित हो गई थी.. मोटे लंड के बारे में बातें करते ही उसकी चुत में हलचल होना शुरू हो गया था

कविता: "अब ये सारी बातें सुनकर मुझे मोटा लंड देखने का बड़ा मन कर रहा है भाभी"

शीला: "कैसी बातें कर रही है तू !! लंड को गाजर मुली थोड़ी न है जो फ्रिज से निकाला और तुझे दिखा दिया !!" ठहाका लगाकर हँसते हुए बोली

कविता इस जोक पर जरा भी नहीं हंसी.. वह इतनी उत्तेजित हो चुकी थी की सोफ़े पर ही अपनी चुत रगड़ने लगी.. जब शीला उसके सामने धड़ल्ले से नंगे भोंसड़े में उँगलियाँ पेल रही थी तो वो भी इतनी छूट तो ले ही सकती थी..

शीला: "अंदर इतनी चूल मची है तो फिर ऊपर ऊपर से क्यों कर रही है !! खोल दे और डाल अपनी उँगलियाँ अंदर"

कविता: "ओहह भाभी.. आपने ये सारी नंगी बातें कर मुझे इतना गरम कर दिया.. मुझसे रहा नहीं जा रहा अब.. भाभी.. आप मेरी चुत में आज तीन उँगलियाँ डालिए.. देखते है क्या होता है"

शीला समझ गई की कविता मोटे लंड जैसा असर महसूस करना चाहती थी

शीला: "दर्द तो नहीं होगा ना तुझे ??"

कविता: "होने दो दर्द अगर होता है तो.. प्लीज डालिए" कहते हुए कविता ने अपना स्कर्ट ऊपर कर दिया और पेन्टी को घुटनों से सरकाते हुए उतार दी..

शीला: "एक बार अगर तू रसिक का लंड देखेगी ना.. तो भूल जाएगी की वो एक दूधवाला है.. ओह.. उसे याद करते ही मेरा पानी निकलने लगा.. "अंदर डाली हुई चार गीली उंगलियों को बाहर निकालकर उसने कविता को दिखाया

कविता सिसकने लगी.. "कुछ कीजिए ना भाभी.. मुझे अंदर जोर की खुजली मची है.. वो किचन में मूसल पड़ा है वही डाल दीजिए"

शीला: "अरे पागल.. उस मूसल से मैंने सुबह ही लहसुन कुटा था.. गलती से भी चुत को छु गया तो नीचे आग लग जाएगी.. " शीला ने झुककर कविता की चुत की एक चुम्मी ले ली.. और अपनी जीभ को क्लिटोरिस पर रगड़ दिया.. साथ ही साथ अपनी उँगलियाँ अंदर डालने लगी

कविता: "उईईई माँ.. डाल दी तीनों उँगलियाँ अंदर?"

शीला: "नही.. अभी केवल दो उँगलियाँ ही गई है अंदर.. " शीला ने कविता की नारंगी दबा दी






"तीन तो अंदर नहीं ले पाऊँगी.. जल रहा है अंदर"

"तो फिर रसिक का लंड देखने की जिद ही छोड़ दे.. क्यों की उसका लंड एक बार देख लिया तो उससे बिना चुदे रह नहीं पाएगी.. और अगर चुदवाने की कोशिश भी की.. तो दर्जी से सिलवाने पड़ेगी तेरी.. "

"ओह्ह भाभी.. प्लीज.. मुझे एक बार.. बस एक बार देखना है.. आप बुलाइए ना रसिक को.. प्लीज प्लीज प्लीज भाभी"

शीला के मुंह से रसिक के लंड का विवरण सुनकर पिघल गई थी कविता.. उसने भाभी को पटाने के लिए उनके भोसड़े में अपनी उँगलियाँ घोंप दी..

"आह्ह.. कविता.. !!"

"प्लीज भाभी.. मुझे रसिक का एक बार देखना है.. कुछ करो न प्लीज" कविता गिड़गिड़ाने लगी

शीला के भोसड़े से रस का झरना बहने लगा.. "ओह कविता.. तू अभी मुझे उसकी याद मत दिला यार.. " कविता की उंगलियों पर अपने भोसड़े को ऊपर नीचे करते हुए शीला ने कहा.. कविता शीला के उत्तुंग शिखरों जैसे स्तनों को चूमने लगी.. दोनों के बीच उम्र का काफी अंतर था पर उसके बावजूद एक ऐसा संबंध स्थापित हो चुका था जो बड़ा ही अनोखा था।

कविता को इस बात से ताज्जुब हो रहा था की जो उत्तेजना उसे शीला भाभी के जिस्म से खेलने पर प्राप्त होती है.. वैसा उसे पीयूष के साथ कभी महसूस नहीं हुआ था.. पता नहीं ऐसा कौनसा जादू था शीला भाभी में?

शीला ने अब कविता की टांगें चौड़ी कर दी... उसने अपनी उंगलियों से गुलाब की पंखुड़ियों जैसे होंठों को सहलाया और उसकी गुलाबी क्लिटोरिस को दो उँगलीयों के बीच दबा दिया

"उईई.. आह्ह.. मर गई.. " शीला ने अब चाटना भी शुरू कर दिया "आह्ह भाभी.. इस तरह तो कभी पीयूष भी नहीं चाटता मेरी.. " कविता की कचौड़ी जैसी फुली हुई चुत की दोनों फाँकों को बारी बारी चाट रही थी शीला.. साथ ही साथ वह कविता के अमरूद जैसे स्तनों को मसलती जा रही थी..






एक दूसरे के अंगों से खेलते हुए दोनों दो बार स्खलित हो गए.. थोड़ी देर वैसी ही अवस्था में पड़े रहने के बाद कविता शीला के पास आई और उन्हे बाहों में जकड़कर लिपट पड़ी.. बड़े ही प्रेम से उनके होंठों पर गरमागरम चुंबन करते हुए बोली

"शुक्रिया भाभी.. आपके पास आकर जिंदगी के सारे गम भूल जाती हूँ मैं.. आपसे मिलकर ही मुझे पता चला की असली मज़ा किसे कहते है.. और हाँ भाभी.. हम शनिवार को रेणुका भाभी के साथ डिनर पर जाने वाले है.. कंपनी का गेट-टूगेथर है.. उनके पति राजेश जी की कंपनी में पीयूष की नौकरी जो पक्की हो गई है"

"अरे वाह.. ये तो बहोत बड़ी खुशखबरी है.. कविता.. !! देखा.. पीयूष बेकार ही टेंशन कर रहा था.. काबिल और महेनती लोगों को काम मिल ही जाता है.. "

"अब मैं चलूँ भाभी? रात का खाना बनाना है"

"हाँ ठीक है.. मैं भी सोच रही थी मार्केट हो आऊँ.. काफी दिन हो गए है बाजार गए.. कुछ चीजें लानी है"


कविता के जाने के बाद शीला मार्केट से जरूरी सामान ले आई और अपने अस्त व्यस्त घर को ठीक करने में लग गई

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शनिवार को शाम ७ बजे, कविता और पीयूष तैयार होकर होटल मनमंदिर पर जाने के लिए निकले.. अच्छी नौकरी मिलने से पीयूष खुश था.. कविता किसी अलग कारण से उत्साहित थी.. समय का पाबंद पीयूष ७:४५ को होटल के प्रांगण में पहुँच गया..

"आओ पीयूष.. आइए भाभी जी" राजेश ने उन दोनों का स्वागत किया

पूरा कॉनफरन्स रूम भरा हुआ था.. कविता यहाँ किसी को नहीं जानती थी.. पीयूष को अभी तीन दिन ही हुए थे.. पर वो कुछ कुछ लोगों को जानता था.. इसलिए उनसे बातों में व्यस्त हो गया

कविता अकेले ही पूरे हॉल में घूमने लगी.. उसके दिमाग में एक ही बात चल रही थी "मेरा अंदाजा गलत नहीं हो सकता.. पिंटू की लिखाई को मैं बराबर जानती हूँ.. ऑफिस से आया हुआ वो खत पिंटू ने लिखा था इसका मुझे यकीन है.. " उसकी आँखें यहाँ वहाँ एक ही इंसान को ढूंढ रही थी

"मे आई हेल्प यू?" पीछे से आवाज आई.. सुनकर कविता का रोम रोम पुलकित हो उठा। उसने पीछे मुड़कर देखा

"अरे पिंटू तू?? यहाँ.. ??" उसकी खुशी का कोई ठिकाना नहीं था

"कवि.. तू यहाँ कैसे?" पिंटू आश्चर्यचकित था..

"मेरे पति ने अभी अभी ये कंपनी जॉइन की है.. देख वो सामने खड़ा है.. पीयूष है उसका नाम"

"हाँ नाम तो मुझे पता था.. पर आज देखा पहली बार.. हेंडसम है तेरा पति.. और तू भी आज कितनी सेक्सी लग रही है यार.. आई लव यू जान" पिंटू ने कहा

शर्म से कविता की आँखें झुक गई.. उसके रूप और सौन्दर्य के सामने हॉल की सारी महिलायें फिक्की लग रही थी.. सब अपने अपने ग्रुप में मशरूफ़ थे इसलिए पिंटू की कही बात किसी के कानों पर नहीं पड़ी.. नहीं तो मुसीबत हो जाती

"हेंडसम तो तू भी बहोत लग रहा है आज.. मन तो ऐसा कर रहा है मेरा की अभी तुझे चूम लू.. कितने दिन हो गए.. साले तू कभी फोन या मेसेज क्यों नहीं करता?" कविता में छुपी प्रेमीका ने शिकायत की

"कवि.. ये सारी बातें यहाँ नहीं हो सकती.. मैं राजेश सर का पर्सनल सेक्रेटरी हूँ.. उनसे जुड़ी ऑफिस की सारी बातें मैं ही संभालता हूँ.. सुन कविता.. यहाँ हमे ऐसे ही बर्ताव करना है जैसे हम अनजान है.. नहीं तो किसी को शक हो जाएगा.. मैं अब चलता हूँ.. सर मुझे ढूंढ रहे होंगे"

उतने में पीयूष राजेश के साथ कविता के पास आया

"नमस्ते मैडम.. इस पूरे हॉल में सब से ज्यादा खूबसूरत आप लग रही हो.. इन सारे वेस्टर्न ड्रेस पहनी स्त्रीओं में आपकी साड़ी सब से अलग और आकर्षक लग रही है" राजेश ने कहा

पराए पुरुष से अपनी तारीफ सुनकर कविता शर्माने लगी.. ये सब उसे काफी नया नया लग रहा था। थोड़ी ही देर में सब डिनर टेबल पर बैठ गए और स्टेज पर माइक लिए खड़े पिंटू ने बोलना शुरू किया

"मेरे प्यारे मित्रों..

सारे उपस्थित स्टाफ और उनके परिवार का मैं दिल से स्वागत करता हूँ। मुझे ये बताते हुए अत्यंत प्रसन्नता हो रही है की हमारे परिवार में एक और कपल जुडने जा रहा है.. सब लोग तालियों के साथ स्वागत कीजिए.. मिस्टर पीयूष और मिसिस कविता.. !!"

अपने टेबल से खड़े होकर पीयूष और कविता ने सब का इस्तकबाल किया.. और वापिस चैर पर बैठ गए।

कविता का फिगर और खूबसूरती देखकर सब दंग रह गए.. सबके आकर्षण का केंद्र बन गई कविता !! उसके सेक्सी फिगर को लोग बार बार देख रहे थे.. कविता को थोड़ा सा विचित्र महसूस हो रहा था.. स्टेज पर से कंपनी के नए प्रोजेक्ट्स के बारे में जानकारी दी जा रही थी और सारा स्टाफ अब खाने में व्यस्त हो रहा था। कविता को खाने से ज्यादा पिंटू की आवाज सुनने में ज्यादा दिलचस्पी थी.. पिंटू यहाँ कैसे और कबसे नौकरी पर लगा होगा?? कविता तिरछी नज़रों से पिंटू को देख रही थी.. राजेश भी स्टेज पर बैठे बैठे पिंटू को सुन रहा था।

एकाध घंटे में खाना खतम हो गया.. सब एक के बाद एक जाने लगे.. जाने से पहले कविता एक बार और पिंटू से मिलना चाहती थी.. पर पीयूष के साथ होने के कारण ऐसा हो नहीं पाया.. अपनी पत्नी की इतनी तारीफ सुनने के बाद पीयूष थोड़ा सा असुरक्षित महसूस कर रहा था और इसलिए वो कविता का पल्लू छोड़ ही नहीं रहा था। वापिस लौटते वक्त पीयूष ने कंपनी के बारे में बहोत सारी बातें कही.. पर ना ही उसने पिंटू के बारे में जिक्र किया और ना ही कविता ने उसके बारे में कुछ पूछा..

दूसरे ही दिन से पीयूष नौकरी पर लग गया.. रोज रात को कविता पीयूष से कंपनी में हुई पूरे दिन की घटनाओं के बारे में पूछती.. इस आशा में की कहीं पिंटू की बात निकले पर उसे रोज निराश ही होना पड़ता था

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एक सुबह ५ बजे कविता दूध लेने के लिए बाहर निकली तभी एक टैक्सी शीला भाभी के घर के आगे आकर रुकी.. करीब २७-२८ साल की लड़की सूट्कैस निकाल रही थी गाड़ी से.. और तभी रसिक दूधवाला भी आ पहुंचा

शीला ने दरवाजा खोला और वो लड़की अंदर चली गई.. रसिक से दूध लेकर शीला ने दरवाजा बंद कर दिया..

रसिक अब कविता के घर पर दूध देने पहुंचा.. दूध देते हुए उसने कहा

"उनकी बेटी आई है कलकत्ता से.. अच्छा है.. अब उनका अकेलापन दूर हो जाएगा"

कविता अंधेरे में नीचे देखकर रसिक के मोटे लंड का उभार ढूंढ रही थी..

कविता: "हाँ वो तो है रसिक.. अकेले रहना बड़ा मुश्किल होता है.. " कविता को अपने साथ बात करता देख रसिक को आश्चर्य हुआ.. आज तक कभी भी उसने बात करने में दिलचस्पी नहीं दिखाई थी..

रसिक के पजामे से उभार तो नजर आ रहा था जो उस मोटे लंड के होने का सबूत दे रहा था.. देखते ही कविता की पुच्ची में चुनचुनी होने लगी.. पर कहें कैसे रसिक को !! वह सोच में पड़ गई.. रसिक को आज शीला भाभी के साथ भी खेलना नसीब नहीं हुआ था.. वरना हररोज वो शीला के स्तनों को तो दबा ही लेता.. और अगर शीला हरी झंडी दिखाती.. तो उसका घाघरा उठाकर अपना एक किलो का लंड पेलकर धमाधम चोद भी लेता.. या तो फिर शीला उसका लंड हिलाकर उसके आँड़ों का मक्खन बाहर निकलवाने में मदद करती.. और फिर रसिक का पूरा दिन अच्छा जाता.. पर आज उनकी बेटी के आ जाने से कुछ भी नहीं हो पाया. अगर वह थोड़ी देर से आया होता तो शीला की बेटी अंदर चली गई होती और उसे कम से कम शीला के रसदार भारी स्तनों को दबाने का मौका तो मिलता..

रसिक ने कविता की नाजुक कमर और पतले शरीर को देखा.. और लगा की वह उसके किसी काम की नहीं थी.. रसिक के एक धक्के में ही उसका काम तमाम हो जाता.. कितनी संकरी होगी इसकी चुत ? रसिक देखते देखते सोच रहा था.. अगर इसके अंदर मेरा लोडा डालूँ तो ये लहू लुहान हो जाएगी.. अरे इसका तो पेशाब ही बंद हो जाएगा.. और मुझे ही उठाकर अस्पताल ले जाना पड़ेगा !!






"क्या सोच रहे हो रसिक? दूध डालो पतीली में !!" रसिक की कामुक नजर.. सुबह का एकांत और अंधेरा.. शीला भाभी की बातों में सुने वर्णन के आधार पर रसिक के लंड की कल्पना करते हुए कविता पागल हो रही थी.. रसिक की चौड़ी छाती और पहलवान जैसा शरीर देखकर कविता की पेन्टी गीली होने लगी..

वो सोच रही थी "इतना बड़ा पहाड़ सा इंसान मेरे ऊपर चढ़ेगा तो मेरा क्या हश्र होगा !! बाप रे.. कम से कम १०० किलो वजन होगा इसका.. मेरे ऊपर तो पीयूष चढ़ता है तब भी मेरी सांस अटक जाती है.. पीयूष तो है भी पतला सा फिर भी.. ये तो हाथी जैसा है.. नहीं रे नहीं.. " कांप उठी थी कविता

दोनों अपना समय बर्बाद कर रहे थे.. चार पाँच मिनट बीत गई.. अभी भी रसिक ने पतीली में दूध नहीं डाला था.. कविता की छोटी छातियाँ.. सुराहीदार गर्दन.. कान में छोटी छोटी बालियाँ.. रसिक मुग्ध होकर कुदरत की बनाई इस खूबसूरत मास्टरपीस को देख रहा था.. यार, ये लड़की अभी मेरा पानी निकलवा देगी.. मुझे ये दूध का धंधा ही बंद कर देना चाहिए.. रोज सुबह इन खूबसूरत बलाओं के बबले देखकर हालत खराब हो जाती है मेरी..

"तुम दूध दे रहे हो या मैं जाऊ?" कविता ने कहा

"दे रहा हूँ.. दे रहा हूँ.. रुकिए जरा.. " रसिक के हाथों में दूध का केन था.. केन का ढक्कन खोलने के लिए जो चाकू था वो साइकिल के हेंडल में फंसा हुआ था.. "जरा वो चाकू निकाल दीजिए ना भाभी.. फंस गया है.. "

रसिक के मुंह से फंस जाने की बात सुनकर कविता को अपनी संकरी चुत में उसका लंड फँसने की कल्पना मन में दौड़ने लगी.. अपने आप पर ही हंसने लगी कविता.. मन भी अजीब है.. कहाँ कहाँ विचार पहुँच जाते है !!

"हंस क्यों रही हो भाभी?" रसिक ने पूछा

"इतना फिट क्यों घुसा रखा है चाकू?"

"ओर कहीं रखने की जगह ही कहाँ है साइकिल में.. !! यहाँ रखता हूँ तो फिट हो जाता है साला.. रोज तो शीला भाभी खींचकर एक झटके में निकाल देती है.. पर आपको तकलीफ होगी.. शीला भाभी अनुभवी जो ठहरी.. पहली बार करो तब सबको तकलीफ होती ही है.. क्यों सच कहा ना मैंने भाभी?" रसिक द्विअर्थी भाषा में बातें करने लगा

"पहली बार तो शीला भाभी को भी तकलीफ हुई होगी.. कोई ऊपर से सीखकर थोड़े ही आता है.. धीरे धीरे कोशिश करें तो सब आने लगता है"

"ये क्या सुबह सुबह रसिक के साथ माथा फोड़ रही है तू.. चल अंदर.. खाना बनाने की तैयारी कर" पीछे से अनुमौसी की आवाज आई

अपनी सास की आवाज सुनते ही कविता ने तेजी से रसिक के हाथों से दूध का पतीला लिया.. और ऐसा करते वक्त दोनों के हाथों का स्पर्श हो गया..

"मम्मी, मैं तो कब से लेने के लिए तैयार खड़ी हूँ.. ये रसिक ही कमबख्त मुझे दे नहीं रहा" कविता ने भी द्विअर्थी संवादों का दौर जारी रखा.. कविता के मुख से ऐसी सांकेतिक भाषा सुनकर रसिक खुश हो गया


कविता दूध लेकर अंदर चली गई और रसिक आगे निकल गया

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वैशाली को देखकर शीला खुश हो गई.. उसके आने से ही पूरा घर भरा भरा सा लगने लगा.. २७ साल की फेशनेबल, भरे भरे जिस्म वाली, एकदम गोरी और बॉब कट हेयर स्टाइल वाली वैशाली.. एकदम बातुनी लड़की थी.. वो और शीला दोनों बातें करने लगे.. वैशाली ने अपने पापा के बारे में पूछा और शीला ने उसे उसके पति संजय और ससुराल के बारे में बातें की

बातों ही बातों में वैशाली ने शीला को बताया की वो ससुराल में बिल्कुल भी खुश नहीं थी.. उसका पति संजय अपने काम पर ध्यान ही नहीं देता था और बार बार नौकरियों से निकाल दिया जाता था.. पूरा दिन सिगरेट फूंकता रहता था.. शराब पीता था.. दोस्तों से ब्याज पर पैसे उधार लेता था और जब लौटा न पाएं तब शहर छोड़कर भाग जाता था.. पूरा दिन घर पर कोई न कोई वसूली करने आ पहुंचता था.. वैशाली उसे टोकती तो वो अनाब शनाब बोलकर उसे हड़का देता.. उसके सास-ससुर भी संजय की इस स्थिति के लिए वैशाली को जिम्मेदार ठहराते.. ससुर के पेंशन से घर आराम से चल तो रहा था पर उसकी सास बात पर उसे ताने मारती रहती थी। अपनी स्थिति के बारे में बताते हुए वैशाली फुट फुट कर रोने लगी.. शीला ने उसकी पीठ पर हाथ सहलाकर उसे शांत किया.. अपनी माँ के साथ दुख बांटकर वह काफी हल्का महसूस करने लगी।

शीला: "तू चिंता मत कर बेटा.. मेरे होते हुए.. मैं सब कुछ ठीक कर दूँगी"

शीला की बात सुनकर वैशाली के दिल को थोड़ी तसल्ली मिली.. वैशाली का मूड ठीक करने के लिए शीला ने कहा "तू आराम से टीवी देख.. मैं तेरी पसंद का कुछ अच्छा खाने के लिए बना देती हूँ"

शीला किचन में गई और वैशाली पैर पर पैर चढ़ाकर आराम से टीवी देखने लगी.. मायके में आकर बेटियों को एक अनोखी शांति का एहसास होता है.. दोपहर में माँ बेटी ने खाना खाया और फिर से बातें करने लगी.. शाम के साढ़े पाँच कब बज गए पता ही नहीं चला..

शीला ने फोन करके कविता को घर बुलाया और उसकी पहचान वैशाली से करवाई..

शीला: "कविता, तू और वैशाली एक ही हमउम्र हो.. तू इसे कंपनी देना.. वैशाली, ये कविता है.. अपने अनुमौसी के बेटे पीयूष की पत्नी.. बहोत ही अच्छा स्वभाव है इसका.. तुम दोनों की साथ में अच्छी पटेगी.. "

दोनों लड़कियों की दोस्ती होने में समय नहीं लगा.. एक दिन में तो दोनों एकदम खास सहेलियाँ बन चुकी थी.. दोनों देर रात तक साथ बैठती और बातें करती रहती.. रोज रात को खाना खाने के बाद दोनों वॉक पर जाने लगी.. इन दोनों की दोस्ती से अनुमौसी और पीयूष भी बड़े खुश थे।

रात को वॉक पर जाते वक्त, वैशाली टाइट टीशर्ट और छोटी सी शॉर्ट्स पहनकर निकलती.. टीशर्ट के अंदर ब्रा भी नहीं होती थी.. चलते चलते हर कदम के साथ उसके उछलते हुए वक्ष देखकर कविता को अपने मायके की याद आ जाती.. लड़की अपने मायके में बिना किसी बंधन के कितने आराम से रहती है !! ससुराल में तो पूरा दिन "ये करो.. ये मत करो.. ऐसे मत बैठो.. ऐसे कपड़े मत पहनो" ऐसी रोकटोक में ही जीवन निकल जाता है..

वैशाली के ठुमकते जोबन को नुक्कड़ पर खड़े लड़के घूर घूरकर ताड़ते रहते.. वैशाली को उन लड़कों की नजर से कोई फरक पड़ता नहीं दिखा.. वो तो गर्व से अपना सीना तानकर उनके बगल से निकल गई.. उन लड़कों की लफंगी नज़रों से कविता शर्म से लाल हो गई

कविता: "यार वैशाली, लोग कैसी गंदी गंदी नज़रों से देख रहे है.. "

वैशाली: "देखने दे.. मुझे घंटा फरक नहीं पड़ता.. "

कविता: "पता नहीं यार.. ये लोग हमेशा हमारे बूब्स को देखकर क्या सोचते होंगे??"

वैशाली: "यहीं की एक बार टीशर्ट के अंदर हाथ डालकर दबाने मिल जाए तो मज़ा आ जाए.. हा हा हा हा.. "

वैशाली बोलने में एकदम बिंदास लड़की थी.. और स्वभाव से कामुक भी थी.. आखिर थी तो वो शीला की ही बेटी.. कोई हेंडसम लड़का दिख जाएँ तब वो भी उसे ऊपर से नीचे तक स्कैन कर लेती.. वैशाली बार बार कविता को उसकी सेक्स लाइफ के बारे में पूछती रहती.. इतना ही नहीं.. वो पीयूष के बारे में भी अलग अलग प्रश्न पूछती रहती कविता से.. वो सिर्फ पूछती ही नहीं थी.. अपने बारे में बताती भी थी

शुरू शुरू में ऐसी बातें करने में कविता को झिझक होती थी.. जब वैशाली "लंड" "चुत" और "बबलों" जैसे शब्दों का खुलकर उपयोग करती.. धीरे धीरे कविता भी वैशाली के आगे खुलने लगी..

एक बार वैशाली ने कविता से बेधड़क पूछ लिया "तूने कभी शादी से पहले किसी के साथ सेक्स किया था?"

कविता: "नहीं रे नहीं.. मैंने तो सब से पहले पीयूष के साथ ही किया था.. वैशाली तू ने किया था क्या?"

वैशाली: "हाँ किया था.. अब ये मत पूछना की किसके साथ.. क्योंकी वो मैं बता नहीं सकती.. " वैशाली ने कविता को अगला प्रश्न पूछने से रोक लिया

कविता सोचने लगी.. सब कुछ खुलकर बता रही है तो ये बताने में भला क्या हर्ज !!

कविता की ओर देखकर वैशाली ने कहा "तुझ जैसी सुंदर छुईमुई को किसी ने शादी से पहले लाइन न मारी हो ऐसा हो तो नहीं सकता.. पक्का तू मुझसे कुछ छुपा रही है"

कविता: "ऐसा कुछ भी नहीं है.. जब तू मुझे इतना सब खुलकर सब बता रही है तो फिर मुझे बताने में क्या दिक्कत होती !!!" कविता शीला की पक्की शिष्य थी.. अपने राज को कैसे दबाकर रखना वो बखूबी सीख चुकी थी। दूसरे के राज कैसे उगलवाना उसका मंत्र भी उसने शीला से ही सीखा था।

कविता ने धीरे से वैशाली से पूछा "बड़ी होशियार है तू वैशाली.. शादी से पहले ही सेक्स किया तो तुझे तेरे माँ-बाप को पता चल जाने का डर नहीं लगा था? मेरी तो ऊपर ऊपर से करवाने में ही डर के मारे जान निकल गई थी"

वैशाली ने चुटकी बजाते हुए कहा "मतलब तू जब ब्याह कर आई तब थोड़ा बहोत कर ही चुकी थी.. ऊपर ऊपर से मतलब? लंड अंदर नहीं लिया था क्या ??"

कविता: "मेरे मायके में एक लड़का था पिंटू.. मुझे बहोत पसंद था.. अभी भी मैं उसके साथ.. पर शादी से पहले मैंने कुछ नहीं किया था"

वैशाली: "ऐसा कैसे हो सकता है !! कोई भी लड़का तेरे जैसा कोरा माल बिना चोदे कैसे छोड़ देगा भला ??"

कविता: "वही तो.. मैंने काफी बार उसे मुझे चोदने के लिए कहा.. पर उसका कहना था की जब तक शादी न हो जाए तब तक वो कुछ नहीं करेगा"

वैशाली: "बड़ा आया सत्यवादी हरीशचंद्र.. इसका मतलब ये हुआ की पीयूष को सुहागरात पर सील-पेक माल ही मिला था.. पर तुझे सील-पेक माल नहीं मिला.. तुझे क्या पता की पीयूष इससे पहले किसी के साथ कर चुका है या नहीं"

कविता चोंक उठी "सच सच बता वैशाली"

वैशाली ने ठहाका लगाते हुए कहा "अरे यार बीती बातें भूल जा.. पीयूष ने सब से पहली बार मेरे साथ ही किया था.. " कविता के पैरों तले से धरती हिल गई.. चक्कर सा आने लगा उसे.. !!!!

उदास हो गई कविता और उसका चेहरा भी लटक गया.. फिर उसने सोचा की वो भी कहाँ दूध से धुली थी !! प्रत्येक परिणित स्त्री का एक भूतकाल होता ही है.. वैसे वैशाली और पीयूष का भी था.. और पीयूष की बातों ऐसा कभी प्रतीत भी नहीं हुआ की उसे वैशाली की कभी याद भी आई थी

लेकिन स्त्री-सहज ईर्ष्या होना तो स्वाभाविक था.. कविता की असमंजस को वैशाली ने परख लिया

वैशाली: "तू उदास क्यों हो गई?? टेंशन मत ले.. मेरे और पीयूष के बीच जो कुछ भी हुआ था वो पुरानी बात है.. और वह एक भूल ही थी.. जो नादान उम्र के बच्चे अक्सर करते है.. और तेरा भी ऐसा ही भूतकाल पिंटू के साथ भी रहा ही है ना.. !! १७ से २२ की उम्र ही ऐसी होती है.. शरीर विकसित हो जाता है.. अन्तःस्त्राव शुरू हो जाते है.. दिल पंछी की तरह उड़कर अलग अलग डाल पर बैठने लगता है.. विजातीय आकर्षण होने लगता है.. मायके में दिल के अंदर बसे प्रियतम को भूलकर वह अन्य व्यक्ति के साथ अपने जीवन की शुरुआत करते ही सब कुछ भूल जाती है.. "

कविता को वैशाली की बात ठीक लगी.. "सच बॉल रही है तू वैशाली.. मैं भी जवान हुई तभी पिंटू के साथ प्रेम विकसित हुआ था.. मुझे ये बता.. शादी के बाद तुझे किसी के लिए आकर्षण हुआ है कभी??"

वैशाली बोलने में बिंदास थी.. "जिंदगी बिताने के लिए पति और प्रेमी दोनों की आवश्यकता होती है.. वरना जीने में मज़ा ही नहीं आता.. पति जब हमारा दिल दुखाएं तब सहारे के लिए एक कंधा तो चाहिए ना !! अपना दर्द बांटने के लिए कोई होना तो चाहिए.. मेरे तो पर्सनल प्रॉब्लेम इतने है की अगर मेरा प्रेमी नहीं होता तो अब तक पंखे से लटक गई होती"

इंसान जब अपने जीवन के दर्द भरे पन्ने किसी के सामने खोलता है तब दुख और दर्द उसकी इंतहाँ पर होते है.. वैशाली अपनी दास्तां सुनाती गई

"शादी के बाद मम्मी पापा का घर छोड़ा.. उसके साथ ही खुशी और सुख क्या होते है.. मैं तो जैसे भूल ही गई.. पापा के घर मुझे एक भी काम नहीं करना पड़ता था.. पापा अक्सर मुझे टोकते.. कहते की कामकाज सिख ले वरना ससुराल में बड़ी दिक्कत का सामना करना पड़ेगा.. आज उनकी कही सारी बातें याद आ रही है.. संजय से शादी के पहले पाँच साल तो बड़े ही शानदार तरीके से बीते.. पहला झटका तब लगा जब मुझे संजय के अफेर के बारे में पता चला.. मैं आज तक समझ नहीं पाई.. मैंने उसे हर तरह से खुश रखा था.. ऐसी कौन सी कमी थी मुझ में जो संजय को किसी और के पास जाना पड़ा !!! उसे जो चाहिए था मैंने सब कुछ दिया.. किसी बात के लिए कभी जिद नहीं की.. उसकी हर बात मानती थी मैं.. अरे शुरुआत के दिनों में उसे पूरा दिन सेक्स की चूल मची रहती.. एक रात में चार चार बार.. कभी कभी पाँच बार सेक्स करते.. मैंने कभी मना नहीं किया.. बिना सोये पूरी रात चुदवाने के बावजूद में सुबह जल्दी उठ जाती.. तुझे पता है ना.. की चुदाई के बाद कैसी नींद आती है!! संजय तो हल्का होकर देर तक सोते हुए अपनी थकान उतारता.. पर मैं घर के सारे काम में व्यस्त हो जाती.. दोपहर को जब थोड़ा सा आराम करने बिस्तर पर लेटती.. संजय फिर से तैयार हो जाता.. और कम से कम दो बार सेक्स करने के बाद ही दम लेता.. मैं ये सोचकर सब कुछ बर्दाश्त करती की आखिर पति है वो मेरा.. उसे हक है मेरे शरीर को भोगने का.. पर इतना सब करने के बाद भी जब वो किसी और के साथ मुंह मारने लगा.. " वैशाली आगे बोल नहीं पाई

"कौन थी वो? नाम क्या था उसका? तूने उसे सबक सिखाया की नहीं?" कविता ने पूछा

वैशाली ने अपने आँसू पोंछते हुए कहा "यार.. जब अपना सिक्का ही खोटा हो तो गैरों को बोलकर क्या फायदा !! संजय कुछ कमाता तो था नहीं. बस दिन भर बिस्तर पर पड़ा रहता और मौका मिलते ही मेरी टांगें चौड़ी करके मेरे छेद में घुसा देता.. उसे २४ घंटे चुदाई के अलावा और कुछ सूझता ही नहीं थी.. तंग आ गई थी मैं उस ज़िंदगी से.. जब पति ही ऐसा हो तो कैसे कटेगी पूरी ज़िंदगी उसके साथ !! तभी मैंने दूसरा साथी तलाश लिया.. लाखों में एक है वो कविता.. अपने एरिया में ही रहता ही.. अब तक हम सिर्फ बातें ही करते है.. मेरा ससुराल नजदीक होता तो हम मिल भी पाते.. पर कलकत्ता में रहते हुए ये मुमकिन हो न सका.. तुझे पता है कविता.. एक तरफ मेरा पति है जिसके दिमाग में हर वक्त औरतों को भोगने का जुनून सवार रहता है.. स्त्री को हमेशा एक साधन की तरह ही इस्तेमाल करता है.. जब देखो तब मुझे कहता रहता है "अरे वो देख वो लड़की की गांड कितनी मस्त है.. आह्ह वो वाली की चूचियाँ" मुझे तो बोलने में भी शर्म आती है.. कभी कभी तो मेरी मम्मी के बारे में भी गंदी गंदी बातें करता है.. दूसरी तरह मेरा प्रेमी.. जो इतने दूर रहकर भी मुझे शब्दों से सहारा देता है.. मेरी हिम्मत बढ़ाता है.. मेरी बात सुनता है.. मेरे दर्द बांटता है.. और इसके बदले उसने कभी मुझसे कुछ भी नहीं मांगा.. हिम्मत है उसका नाम.. आई लव हिम्मत" वैशाली भावुक हो गई

कविता: "ऐसे हरामजादे मर्दों को तो गोली मार देनी चाहिए.."

वैशाली: "नसीब की बलिहारी तो देख कविता.. हिम्मत की पत्नी का चार महीने पहले ही देहांत हो गया.. सिर्फ ८ साल में ही उसका गृहस्थ जीवन समाप्त हो गया.. फिर भी इस नाजुक वक्त पर में उसे सहारा न दे पाई.. "

कविता: "इतनी छोटी उम्र में ही हिम्मत की पत्नी चल बसी?? क्या हुआ था उसे?"

वैशाली: "हिम्मत की बीवी को गर्भाशय का केन्सर था.. अकेला पड़ गया है बेचारा.. अच्छे लोगों के साथ ही ऐसा क्यों होता है? तू मानेगी नहीं.. हिम्मत अपनी बीवी की मौजूदगी में मुझसे बातें करता.. अब बता.. कोई पत्नी ऐसा बर्दाश्त कर सकती है भला?? पर संध्या ने कभी एतराज नहीं जताया.. बहोत ही अच्छी थी संध्या.. हिम्मत संध्या से कभी कुछ भी छुपाता नहीं था.. कभी कभार संध्या भी मुझसे बात करती और मेरा होसला बढ़ाती.. संजय जब घर पर नहीं होता था तब मैं घंटों हिम्मत से बात करती थी.. सिर्फ उसी की बदौलत मैं अब तक संजय के साथ टीक पाई हूँ.. आज मैं हिम्मत से भी ज्यादा संध्या को मिस कर रही हूँ" वैशाली की आँखों से आँसू टपकने लगे

वैशाली ने बात आगे बढ़ाई "शादी से पहले के इस प्यार को हम दोनों ने मेरी शादी के बाद दफना दिया था.. कभी उसने मुझे आई लव यू तक नहीं कहा.. बस दोस्ती का रिश्ता ही रखा था.. संध्या ने एक बार मुझे कहा था की उनकी शादी से पहले ही हिम्मत ने उसे मेरे बारे में बता दिया था। ऐसा ईमानदार इंसान अब कहाँ मिलेगा!! " वैशाली के शब्दों के दर्द ने कविता को भी हिला दिया

कविता: "तू चार दिन से आई है.. फोन किया की नहीं?"

वैशाली: "नहीं यार.. उसकी पत्नी को मरे कुछ ही महीने हुए है.. मैं अकेली उसके घर जाऊँगी तो लोगों को बातें बनाने का मौका मिल जाएगा.. मम्मी को लेकर तो जा नहीं सकती.. कोई साथ हो तो ठीक है.. पर अकेले जाने में लोग तरह तरह की बातें करेंगे और बेकार में हिम्मत परेशान हो जाएगा"

कविता: "तुझे एतराज न हो तो मैं तेरे साथ चलूँ?"

वैशाली: "मुझे क्यों एतराज होगा भला.. और अगर होता तो मैं ये सब बातें तुझे क्यों बताती !! पर सिर्फ हम दो लड़कियां उस अकेले मर्द के घर जाएगी तो अच्छा नहीं लगेगा.. कोई मर्द साथ होता तो फिर किसी के मन में कोई शक ही पैदा नहीं होगा. पर किसे लेकर जाएँ यही प्रॉब्लेम है.. खैर मेरे प्रॉब्लेम तो चलते ही रहेंगे.. तू अपनी बता.. पिंटू के साथ तेरे संबंध कैसे थे?"

कविता ने अथ से इति तक सब कुछ बताया पिंटू के बारे में.. बात करते करते वो शर्म के मारी लाल लाल हो गई

वैशाली: "बड़ी किस्मत वाली है तू.. कम से कम तेरा प्रेमी नजदीक तो है.. जब चाहे उसे देख सकती है तू.. पर ये बता की शादी के बाद तूने उससे संबंध कैसे बनाए रखे?? तेरे घर पर सास ससुर हमेशा रहते है.. तुम लोग कैसे मिलते हो फिर?"

कविता: "यार हम लोग कभी कभार तेरे घर पर ही मिलते है.. तेरी मम्मी को सब कुछ पता है इसके बारे में... "

वैशाली चकित हो गई "मम्मी ऐसी बातों में तुझे सपोर्ट कर रही है ये ताज्जुब की बात है.. वैसे मम्मी बड़ी स्ट्रिक्ट है.. "

कविता: "बहोत दिन हो गए है यार उसे मिले हुए.. अब रहा नहीं जाता "

वैशाली: "मतलब तुम दोनों जब भी मिलते हो तब सेक्स भी करते हो?"

कविता ने जवाब नहीं दिया बस "हाँ" कहते हुए गर्दन हिलाई फिर धीरे से बोली "अकेले में मिलना होता है तब करते है.. बहोत मज़ा आता है उसके साथ.. वैसा मज़ा तो मुझे पीयूष के साथ भी नहीं आता कभी"

वैशाली: "वैसा ही होता है.. घर की मुर्गी दाल बराबर"

कविता: "मुझे एक आइडिया आया है वैशाली"

वैशाली: "तो बता ना.. "

कविता: "तु हिम्मत को मिलने के लिए अपने घर ही बुला ले.. मैं शीला भाभी को २ घंटों के लिए कहीं बाहर ले जाऊँगी"

वैशाली सोच में पड़ गई.. "वो तो ठीक है यार.. पर मुझे डर लगता है"

कविता: "डरने वाली कौन सी बात है? तेरी मम्मी तो मेरे साथ ही होगी"

सुनते ही वैशाली की आँखें चमकने लगी.. संजय से वो इतनी नफरत करती थी की हिम्मत से अकेले में मिलने के खयाल मात्र से उसकी पेन्टी गीली होने लगी.. "यार ऐसा कुछ सेटिंग हो तो मज़ा आ जाएगा.. हिम्मत को और मुझे एकांत की सख्त जरूरत है.. मैं कुछ करती हूँ"

दोनों बातें करते करते घर पहुंचे और अपने अपने घर चले गए। वैशाली जब दरवाजा खोलकर अंदर आ रही थी तब उसने खिड़की से देखा की मम्मी किसी से फोन पर हंस हँसकर बात कर रही थी.. वैशाली को देखते ही उसने फोन काट दिया.. पर यह बात वैशाली के दिमाग मे नोट हो गई थी

"काफी दोस्ती हो गई है तेरी और कविता की.. हैं ना.. !! मैंने कहा था ना तुझे.. बहुत अच्छी लड़की है.. मेरे साथ भी उसकी अच्छी पटती है.. " अपने मोबाइल पर नजर रखे हुए शीला ने कहा


वैशाली: "हाँ मम्मी.. कविता बहोत ही अच्छी लड़की है"

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