Adultery शीला की लीला (५५ साल की शीला की जवानी) - Page 6 - SexBaba
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Adultery शीला की लीला (५५ साल की शीला की जवानी)

पौने आठ बज चुके थे.. और आठ बजे तो सबको डाइनिंग रूम में इकठ्ठा होना था.. सब से पहले मौसम और फाल्गुनी पहुँच गए.. मौसम के चेहरे पर उत्तेजना का नशा अब भी दिख रहा था.. एक के बाद एक.. सब समय पर डाइनिंग हॉल में आने लगे..कविता और पीयूष भी अलग अलग आए थे.. कविता का ड्रेसिंग देखकर सबकी सांस गले में ही अटक गई..

सबसे पहले रेणुका ने कविता की तारीफ की "Wow..!! Kavita, you are looking absolutely gorgeous..!!कितनी जवान और खूबसूरत लग रही है तू इस ड्रेस में.. कौन कहेगा की तू शादी शुदा है !! अठारह से ऊपर एक साल की नही लग रही तू.. " उसकी कमर पर चिमटी काटते हुए उसने कहा .. अपनी तारीफ सुनकर कविता खुश हो गई

मौसम और फाल्गुनी भी कविता का ड्रेसिंग देखकर चकित रह गए "दीदी, गजब लग रही हो आप इस ड्रेस में.. एकदम कयामत!!" फाल्गुनी ने शरमाते हुए कहा "दीदी आप तो नोरा फतेही से भी ज्यादा हॉट लग रही हो!!" फिर नजदीक जाकर फाल्गुनी ने कविता के कान में कहा "अरे दीदी, आपने ब्रा क्यों नही पहनी?? आप जब चलती हो तो सब उछलता है"

फाल्गुनी की बात सुनकर कविता ने हँसकर उसे प्यार से गाल पर हल्की चपत लगाई और कहा "उछलने दे.. उछलने से क्या होता है.. !! बाहर तो नही निकल रहे है ना.. !!" कहते हुए वह बिंदास पीयूष के पास जाकर खड़ी हो गई.. पीयूष वैशाली के साथ बातों में उलझा हुआ था.. कविता को देखकर वैशाली के होश उड़ गए.. पीयूष ने एक नजर कविता की तरफ देखा.. और उसे ऐसा महसूस हुआ जैसे कविता ने ऐसे कपड़े पहनकर खानदान की इज्जत की माँ चोद दी हो..

गुस्से में पीयूष ने कहा "इससे अच्छा तो तू बिना कपड़ों के ही चली आती.. !!! लोगों को दिखाने का शौक हो तो पूरा ही दिखा दे एक बार में .. !! इतना भी छुपाकर क्यों रखा? मेरी इज्जत को डुबोने बैठी है तू.. !!"

"कोई कपड़ों से अपनी इज्जत की धज्जियां उड़ाता है तो कोई अपने बर्ताव से.. !!" कविता ने बेफिक्री से जवाब दिया..

लंबे डाइनिंग टेबल पर सब बैठने लगे.. कविता के साथ बैठने के बजाए पीयूष, पिंटू के साथ जाकर बैठा.. यह बात राजेश ने नोटिस की.. राजेश भी कविता के पिंक टॉप में से बिना ब्रा की दिख रही गोलाइयों को ताड़ रहा था.. सिर्फ राजेश ही नही.. हॉल में बैठे सभी मर्दों की नजर बार बार कविता पर चली जाती थी.. गुलाबी रंग के स्लीवलेस पतले टॉप के अंदर परफेक्ट साइज़ के स्तनों ने हाहाकार मचा दिया था..






खाना परोसा जाने लगा.. एक के बाद एक नई नई डिश आने लगी.. कविता तीरछी नज़रों से पीयूष का निरीक्षण कर रही थी.. की वो कितनी बार वैशाली की तरफ देखता है..

सब के सामने राजेश ने पीयूष से कहा "पीयूष, तेरे जितना मूर्ख आदमी इस पार्टी में और कोई नही है"

"क्यों? क्या हुआ सर?"

राजेश: "अरे भई, इतनी सुंदर.. मोम की पुतली जैसी पत्नी को छोड़कर तू पिंटू के साथ बैठ गया.. !!! ये तो अच्छा हुआ की कविता के बगल में मौसम बैठी है.. वरना उसके पास बैठने वालों की लाइन लग जाती.. "

कविता गर्व से पीयूष की ओर देख रही थी.. पीयूष नीचे देखने लगा.. मन ही मन वो कविता को.. इस स्थिति के लिए कोस रहा था..

राजेश: "जाओ पीयूष.. अपनी पत्नी के पास जाकर बैठो"

पीयूष: "नहीं.. मैं यहीं ठीक हूँ.. " राजेश की राय को ठुकराते हुए उसने कहा

"कोई बात नही सर.. अगर वो मेरे पास आकर नही बैठता.. तो मैं ही उसके पास चली जाती हूँ" कहते हुए कविता खड़ी हुई.. हाई हील के सैन्डल पहनकर अपने स्तनों को मटकाते हुए वो पिंटू और पीयूष के पास आई और बोली "पिंटू सर.. आप प्लीज जरा बगल वाली कुर्सी में शिफ्ट हो जाएंगे.. ??

पिंटू की तो जैसे लॉटरी ही लग गई.. "स्योर मैडम.. " कहते हुए एक कुर्सी छोड़कर बैठ गया.. और कविता, पीयूष और पिंटू के बीच में बैठ गई.. कविता के मन की मुराद भी पूरी हो गई.. एक तरफ पति था और दूसरी तरफ उसका प्रेमी.. बीच में कविता.. बैठते वक्त उसने पीयूष के पैरों पर जान बूझकर लात मारी और सब सुन सके ऐसी आवाज में कहा "हाई पीयूष.. कैसे हो? "जैसे वह किसी अनजान से बात कर रही हो.. हद तो तब हुई जब कविता ने बाउल से सब से पहले पिंटू की थाली में परोसा और फिर बची कूची सब्जी पीयूष के प्लेट में डाली.. पीयूष की इज्जत का कचरा कर दिया कविता ने.. डाइनिंग टेबल पर बैठे सब को यकीन हो गया की कविता और पीयूष के बीच कुछ अनबन थी..

मौसम को कविता का पीयूष के प्रति ये कठोर बर्ताव बिल्कुल अच्छा नही लगा.. पीयूष के लिए उसे बुरा लग रहा था.. पर वो कुछ कर नही सकती थी..इसलिए उसने अपना ध्यान खाना खाने पर केंद्रित किया.. सिल्क की भारी साड़ी में सजी हुई रेणुका खाना खाते हुए बार बार पीयूष की ओर देख रही थी और सोच रही थी की आखिर कविता ऐसा क्यों कर रही है ?? कविता ने खुद ही उसे अपने और पिंटू के प्रेम प्रकरण के बारे में बताया था.. अपने प्रेमी के संग डिनर कर रही कविता को देखकर रेणुका को भी पीयूष के साथ बैठने का दिल करने लगा था..

काफी देर तक डिनर चलता रहा.. उसके बाद राजेश अपने स्थान से उठा और सबको संबोधित करते हुए कहा

राजेश: "सबका डिनर हो चुका है.. हम सब एक घंटे के लिए रीलैक्स होंगे और फिर ग्रांड पार्टी के लिए दस बजे यहीं मिलेंगे.. आप सभी के रेणुका मैडम की बर्थडे मनाने.. !!" सब ने तालियों से इस बात का स्वागत किया.. धीरे धीरे सब खड़े होकर अपने कमरे की ओर जाने लगे.. मौसम और फाल्गुनी कोने में बैठकर बातें कर रही थी.. रेणुका और वैशाली.. पीयूष की दोनों प्रेमिकाएं आपस में कुछ गुफ्तगू कर रही थी.. पीयूष मौसम के खयालों में खोया हुआ था.. कविता और पिंटू बातें कर रहे थे.. राजेश ने जाते जाते कविता के पिंक टॉप से दिख रही गोलाइयों पर एक कामुक नजर डाली..

संबंधों की जटिलता बड़ी ही संकीर्ण होती है.. माउंट आबू की एक वैभवशाली आलीशान होटल के तीसरे माले पर बने विशाल डाइनिंग हॉल में खड़े पच्चीस लोग अपने दिल और दिमाग से सोच रहे थे.. वैशाली को अपने पति संजय की याद नही आ रही थी और पीयूष कविता को भूल चुका था.. सब को दूसरे की थाली में घी ज्यादा नजर आ रहा था.. कविता पिंटू में अपने जीवन का सुख ढूंढ रही थी.. और रेणुका पीयूष में.. ऐसा क्यों होता है की अपने सुख के लिए इंसान हमेशा दूसरों पर ही निर्भर होता है?? क्या हम अकेले ही सुखी नही हो सकते??.. जवाब है.. नही हो सकते.. हकीकत में इंसान अकेले रहने के लिए बना ही नही है.. उसका सुख और दुख.. दूसरे इंसानों की बदौलत ही होता है.. यही सब से बड़ी मुसीबत है..

अपनी तरफ देख रहे राजेश सर की ओर कविता ने पहली बार ध्यान से देखा.. राजेश की आँखों की हवस को उसने परख लिया.. राजेश रेणुका से बात करते हुए बार बार कविता की छातियों की ओर देख रहा था.. लेकिन कविता को इस बात का जरा भी बुरा नही लग रहा था.. उल्टा वो तो इस बात से खुश हो रही थी

पीयूष मौसम को पटाने और चोदने की तरकीबें सोच रहा था.. पर फाल्गुनी हमेशा मौसम के साथ ही होती थी.. ऐसी सूरत में मौसम से अकेले मिल पाना मुमकिन नही था.. अनजाने में ही फाल्गुनी कबाब में हड्डी बनी हुई थी.. शायद इसीलिए यह अंग्रेजी कहावत बनी होगी Two is a company but three is a crowd...

डेढ़ घंटे पहले पीयूष के साथ शॉर्ट इनिंग्स खेलकर फ्रेश हो चुकी वैशाली अकेले बैठी थी फिर भी उसके चेहरे पर अनोखा नूर था.. चुदाई की तृप्तता की चमक थी.. पीयूष की किस्मत बड़ी ही तगड़ी थी.. उसके पीछे वैशाली, रेणुका और मौसम.. तीन तीन चूतें पड़ी हुई थी.. और कविता पिंटू के पीछे पड़ी हुई थी.. कविता ये सोच रही थी की पीयूष के साथ ऐसा कब तक चलेगा? छोटी सी बात का उसने बतंगड बना दिया..?? क्या कभी समझौता होगा? पिंटू की तरफ देखकर उसने एक भारी सांस ली.. वो चलकर पिंटू के पास आई और बोली "क्यों अकेला खड़ा है? क्या सोच रहा है?"

"अकेला हूँ इसलिए अकेला खड़ा हूँ.. सब कपल में हैं और में सिंगल हूँ.. बिना कंपनी के बोर हो रहा हूँ.. और तुझे तो पता है.. मुझे भीड़भाड़ ज्यादा पसंद नही है.. वैसे इस ड्रेस में तू ग़ज़ब लग रही है कविता.. यार.. ऐसे दिखा दिखाकर क्यों तड़पा रही है!! मेरा हाल उस भक्त जैसा है जो भगवान को चढ़ाएं प्रसाद को सिर्फ देख सकता है.. चख नही सकता.. " पीयूष ने कहा

"तो चख ले ना.. रोक कौन रहा है तुझे.. और ये मंदिर का प्रसाद नही है.. तेरी थाली में परोसे जाने के लिए तैयार भोजन है" कविता ने झुककर अपने स्तनों के बीच की खाई दिखाकर पिंटू को उकसाया की इस खाई में कूदकर अपनी जान दे दें.. "पिंटू, तुझे मेरे स्तन बहोत पसंद है ना.. इसीलिए तो मैंने ऐसे कपड़े पहने है.. और खास तेरा पसंदीदा पिंक टॉप भी इसीलिए पहना आज.. आई लव यू पिंटू.. " पिंटू के कान में फुसफुसाई कविता






"आई लव यू टू कवि.. सच कहा तूने तेरे बबले मुझे बहोत पसंद है.. देखकर ही उन्हे मसलने का मन कर रहा है मुझे.. पिछली बार जब हम मिले थे तब याद है तुझे.. कितने दबाए थे मैंने!!!"

"हाँ यार.. मुझे भी अपनी आखिरी मीटिंग बहोत याद आ रही है.. यार पिंटू.. ऐसी जगह पर हम दोनों अकेले आए तो कितना मज़ा आएगा.. हैं ना.. !!" कविता खुली आँखों से सपना देख रही थी..

प्रेमिओ की दुनिया सपने में ही जन्म लेती है और सपनों में ही बिखर जाती है..

"कविता, हम दोनों नदी के दो किनारे है.. जो साथ साथ हजारों किलोमीटर तक सफर करते है.. सदियों तक साथ रहते है.. पर कभी एक नही हो सकते.. तू तेरे ससुराल में पीयूष के साथ खुश हो तो मैं तुझे देखकर ही खुश हो जाऊंगा.. मैं तो बस दूर बैठे तुझे देखता रहूँगा.. और तेरा ध्यान रखूँगा.. मरते दम तक.. !!" पिंटू भावुक हो गया

"उदास मत हो यार.. मैं शीला भाभी को बोलूँगी तो वो हम दोनों का यहाँ अकेले आने का कुछ न कुछ सेटिंग जरूर कर देगी.. शीला भाभी पर मुझे पूरा भरोसा है.. वो कोई तरकीब लगाकर हमारी ये ख्वाहिश पूरी करेगी.. शीला भाभी कुछ भी कर सकती है.. तुझे याद है न पिंटू.. कितनी चालाकी से उन्होंने उस दिन मूवी देखते वक्त हम दोनों का सेटिंग करवाया था??" कविता ने कहा

"हाँ कविता.. वो भी पीयूष की मौजूदगी में.. " उस यादगार लम्हे को याद करते हुए पिंटू खुश हो गया.. उसका उदास चेहरा खिल उठा..

अपने प्रेमी को खुश देखकर कविता धीमे से बोली "देख पिंटू.. आशा अमर है.. निराश मत हो.. अभी हम आबू में ही है.. तू पीयूष से मिलकर बात कर.. वो कहीं बाहर जाने वाला हो.. तो हम मिल सकते है.. मुझसे तो वो बात करता नही है.. पर मैं भी अपनी तरफ से कोशिश करती हूँ.. "

"लेकिन में पीयूष को ऐसा कैसे पूछूँ की वो कहाँ जाने वाला है और क्या करने वाला है?? उसे शक नही होगा?" पिंटू ने कहा

"देख पिंटू.. तुझे अगर मेरे बॉल दबाने है तो जोखिम उठाना पड़ेगा.. " कविता ने पिंटू के अंदर के मर्द को जगाने की कोशिश की

"ठीक है.. मैं कुछ करता हूँ.. " पिंटू वहाँ से चला गया..

कविता भी चलते चलते राजेश सर और रेणुका मैडम के पास गई..

मौसम से बात कर रहे पीयूष ने कहा "मौसम, देख तो.. कविता कैसे अपनी ब्रेस्ट सब को दिखाती फिर रही है??"

मौसम: "सब को दिखाने के लिए नही जीजू.. आपको दिखाने के लिए दीदी ने ऐसा ड्रेस पहना है.. नजदीक जाकर देखिए तो सही!!"

पीयूष: "मुझे उस में कुछ नही देखना.. मुझे जो देखना है वो तो मैं देख ही रहा हूँ.. " मौसम के उन्नत स्तनों की तरफ देखते हुए पीयूष बोला.. मौसम शरमाकर नीचे देखने लगी..

पीयूष: "जब तू शरमाती है तब और भी सेक्सी लगती है "

फाल्गुनी: "मर्दों को तो हर स्त्री या लड़की सेक्सी ही लगती है.. " फाल्गुनी ने पीयूष की पतंग हाथ में ही काट दी..

पीयूष: "ऐसा नही है फाल्गुनी.. सब का देखने का नजरिया अलग अलग लगता है.. पर हाँ.. वैसे तू भी मुझे बड़ी सेक्सी लगती है" पीयूष ने फाल्गुनी को भी दाने डाले

"जीजू, आपको मैं सेक्सी लगती हूँ या मौसम?" फाल्गुनी ने पूछा

"मुझे तो दोनों सेक्सी लगती हो" पीयूष ने कहा

मौसम: "ज्यादा सेक्सी कौन लगता है?" कठिन सवाल था पीयूष के लिए.. पीयूष उलझ गया

"मुझे तो दोनों सेक्सी लगती हो.. ज्यादा कम का मुझे पता नही है.. आप दोनों ऐसे सवाल करके मुझे कन्फ्यूज़ मत करो.. फाल्गुनी, तू मेरे साथ डेट पर चलेगी?" पीयूष ने सीधे सीधे पूछ लिया..






पीयूष के इस अचानक सवाल से एक पल के लिए तो स्तब्ध रह गई फाल्गुनी.. "आप पागल हो गए हो क्या, जीजू? मैं आपके साथ डेट पर गई तो कविता दीदी जान से मार देगी मुझे.. कितना प्यार करती है वो आपसे.. पता है!!"

फाल्गुनी ने अनजाने में कहे इस वाक्य ने मौसम के अंदर से हिला कर रख दिया.. कांप उठी मौसम.. मन ही मन वो सोच रही थी की ऐसा क्या कारण था जो उसे पीयूष की ओर खींचा जा रहा था?? मौसम के चेहरे का नूर उड़ गया.. अकथ्य पीड़ा से उसका मुख मुरझा गया.. कहीं उसके इस आकर्षण का पता कविता दीदी को चल गया तो क्या होगा.. इस बात की कल्पना करने से भी डर रही थी मौसम.. उसने निश्चय किया.. कुछ भी हो जाए.. अब जीजू से ज्यादा क्लोज नही होना है.. अपनी पसंदीदा व्यक्ति से दूर भागने की कोशिश करनी थी उसे.. पर प्रेम और आकर्षण ऐसी चीज है जो कभी किसी को चैन से जीने ही नही देती

पीयूष: "अरे, मैं तो मज़ाक कर रहा था फाल्गुनी.. चलो मैं चलता हूँ अपने दोस्तों के पास.. बाद में पार्टी में मिलेंगे" कहते हुए पीयूष ने मौसम की पीठ को सहलाया और चल दिया

अब मौसम और फाल्गुनी अकेले थे.. फाल्गुनी मौसम को चिढ़ने लगी

"मौसम, देख न.. दीदी ने आज कैसी ड्रेस पहनी है.. कितनी मस्त लग रही है वो!! मैं तो कहती हूँ तू भी ऐसा ड्रेस ट्राय कर एक बार"

मौसम: "क्या तू भी.. मैं ऐसा ड्रेस पहनूँगी तो सब टूट पड़ेंगे मेरे ऊपर.. रेप हो जाएगा मेरा!!"

फाल्गुनी: "बकवास मत कर.. ऐसे कोई कैसे रेप कर देगा.. !! पर हाँ.. कविता दीदी का ड्रेस कुछ ज्यादा ही एक्सपोज कर रहा है.. शायद जीजू को भी ये बात पसंद नही आई"

मौसम: "हाँ थोड़ा बोल्ड तो जरूर है.. पर दीदी बेचारी घर पर ऐसा ड्रेस पहन नही सकती.. ऐसे मौकों पर ही ट्राय कर सकती है.. लेकिन तेरे बात से मैं सहमत हूँ.. ड्रेस में से कुछ ज्यादा ही नजर आ रहा है.. फाल्गुनी, तूने एक बात नोटिस की? राजेश सर बार बार दीदी की छाती को ही देख रहे थे.. उनकी पत्नी बगल में खड़ी थी फिर भी वह देखते ही जा रहे थे.. उनको शर्म नही आती होगी ऐसा देखने में ?? अपनी पत्नी की मौजूदगी में कोई कैसे किसी ओर को गंदी नजर से देख सकता है!!"


फाल्गुनी: "सही बात है तेरी.. इन सारे मर्दों को बस एक ही चीज में इन्टरेस्ट होता है"

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पीयूष अपने कमरे में आया और कपड़े बदलकर वापस ऊपर कान्फ्रन्स रूम में पहुँच गया.. सब लोगों अलग अलग तीन-चार के ग्रुप में खड़े खड़े गप्पे लड़ा रहे थे.. हॉल में शराब, सिगरेट और महंगे परफ्यूम के मिश्रण की गंध फैली हुई थी..

गुलाबी स्लीवलेस टॉप में अपनी तंदूरस्त जवानी को उछालते हुए कविता बातें कीये जा रही थी.. और सब का ध्यान अपनी ओर खींच रही थी.. वो बार बार अलग ग्रुप में जाकर बातें कर रही थी.. अनजाने लोगों से भी हाई-हैलो कर रही थी.. वो जिस ग्रुप की ओर जाती उस ग्रुप के सारे मर्द उसे आते देख चुप हो जाते.. बस उसकी उन्नत छातियों को ताड़ते रहते.. सागर की लहरों की तरह उछल रहे उसके स्तनों की गोलाई, पतले से टॉप में इतनी आसानी से नजर आ रही थी की सब की नजर वहीं चिपकी रहती.. कोन्फ्रन्स हॉल का एसी थोड़ा सा तेज था.. वातावरण में फैली ठंडक के कारण कविता की निप्पल सख्त होकर टॉप के कपड़ों में अपना आकार बना रही थी.. एक दो पुरुष तो कविता को देखते ही अपना लंड ऐडजस्ट करने लगे.. कुछ मर्द टॉइलेट जाने का बहाना बनाकर अपना लंड हिलाकर लौटे..





राजेश सर कोने में किसी के साथ फोन पर बात कर रहे थे.. उन्हें भी जाकर हाई बोलकर आई कविता.. फिर वो चलते चलते रेणुका और वैशाली के पास आकर खड़ी हो गई..

"हाय मैडम, हैप्पी बर्थडे.. ढेर सारी शुभकामनाएं और विशिज.. ईश्वर आपको लंबी उम्र दे"

"ओह शुक्रिया कविता.. वैसे तू आज कमाल लग रही है.. क्या गजब का बोल्ड ड्रेस है तेरा.. राजेश तुझे देखने के बाद आज मेरी हालत खराब कर देगा!!"

सब कुछ जानते हुए भी कविता ने पूछा "अरे ऐसी भी क्या बात है रेणुका?"

रेणुका: "अरे, तेरे इस गरमागरम डिस्प्ले को देखकर राजेश मुझे बोल रहा था की चल रूम में चलते है"

कविता: "हाँ तो दिक्कत क्या है!!! जाकर आइए.. हम सब आपका वेइट करेंगे.. " हँसते हुए उसने कहा

वैशाली: "नही रे नही.. ऐसा थोड़े ही चलता है!! हम यहाँ बाहर खड़े खड़े तड़पे और आप अंदर मजे करो.. मैं नही जाने दूँगी आपको" मज़ाक करते हुए वैशाली ने कहा

रेणुका: "तो तू भी चल मेरे साथ अंदर.. मुझे कोई दिक्कत नही है.. राजेश हम दोनों को एक साथ बिस्तर में संभालने के लिए काफी है.. हा हा हा हा हा.. !!"

वैशाली: "नही रे बाबा.. मैं कबाब में हड्डी बनना नही चाहती.. आप कविता को ले जाइए अगर उसकी इच्छा हो तो.." तभी मौसम ने वैशाली को आवाज दी.. "मैं अभी आती हूँ.. एक्स्क्यूज़ मी" कहते हुए वैशाली मौसम और फाल्गुनी की ओर चल पड़ी

रेणुका ने आँख मारते हुए कविता से कहा "क्यों कविता.. क्या खयाल है? चलना है अंदर मेरे साथ?"

कविता: "ना बाबा ना.. ऑफकोर्स मेरी इच्छा तो है पर वो आपके पति के साथ नही.. मेरी पसंद के पुरुष के साथ"

रेणुका: "तो बोल न.. तेरी पसंद के साथी के साथ मजे करने हो तो मैं अभी कुछ मेनेज कर दूँगी.. कौन पसंद है तुझे बता मुझे.. पर राजेश को छोड़कर"

कविता: "मेरी पसंद तो तुम्हें पता है ही.. दरअसल मैं तुम से वही कहने आई थी.. माउंट आबू के इस रोमेन्टीक माहोल में मैं पिंटू के साथ थोड़ा वक्त बिताने की बहोत इच्छा हो रही है.. पर चांस ही नही मिलता.. !! क्या करू? तुम मेरी कुछ मदद करो ना प्लीज!!"

रेणुका सोचने लगी.. फिर उसने कहा "चिंता मत कर.. मैं कुछ करती हूँ.. मेरे बर्थडे के दिन कोई उदास हो, ऐसा कैसे हो सकता है !!"

कविता: "पर ध्यान रखना.. पीयूष को पता नही लगना चाहिए.. वरना लेने के देने पड़ जाएंगे"

रेणुका: "डॉन्ट वरी.. मैं जब तुझे फोन करू तब तू आ जाना.. " कविता को आश्वासन देते हुए उसने कहा

अपने प्रेमी को अकेले में मिलने को बेकरार कविता के दिल को ठंडक मिली.. "और हाँ.. वैशाली को भी कुछ मत बताना.." वैशाली को अपनी ओर आते देख कविता ने रेणुका से कहा

रेणुका: "ओके बेबी डन.. और कविता.. हमारी ऑफिस में कंप्युटर ऑपरेटर की नौकरी के लिए तेरा नाम तय है.. बोल कब से जॉइन करेगी?" जबरदस्त आत्मविश्वास के साथ रेणुका ने कहा.. उसका कहने का मतलब साफ था.. अगर कविता पिंटू से अकेले मिलना चाहती हो तो उसे रेणुका की बात माननी होगी..

कविता: "मुझे एक बार पीयूष से इस बारे में बात करनी होगी.. बाकी मुझे आप की कंपनी में जॉब करने में कोई आपत्ति नही है"

रेणुका: "वो सब तू मुझ पर छोड़ दे.. पीयूष को मैं मना लूँगी.. " तब तक वैशाली उनके करीब आ चुकी थी और रेणुका का आखिरी वाक्य उसने सुन लिया था.. उस वाक्य का दूसरा अर्थ भी निकलता था जो वैशाली समझ गई.. पर फिलहाल वो कुछ नही बोली.. समय आने पर ही बोलने में विश्वास रखती थी वैशाली..

नौकरी की ऑफर के बारे में गंभीरता से सोच रही थी कविता.. अगर वो हाँ कर दे तो पिंटू के साथ रहने का मौका मिल जाएगा.. वो रोज उसे कम से कम आठ घंटों के लिए देख पाएगी.. मिल पाएगी.. बात कर पाएगी.. और कंपनी का मालिक और उनकी पत्नी के साथ अब घर जैसे संबंध बन चुके थे.. कविता के दिल में.. उसके स्तन के साइज़ के लड्डू फूटने लगे.. समस्या बस एक ही थी.. पीयूष और अपने सास ससुर से नौकरी करने के लिए इजाजत लेनी थी.. अगर वह नही माने तो उसका सपना एक पल में चूर हो जाने वाला था.. कविता सोच रही थी की इस समस्या का समाधान कैसे करे.. !!

जब भी कविता का दिमाग काम करना बंद करे तब उसे शीला भाभी की याद आ जाती थी.. शीला के पास सारी समस्याओं का हल मिल जाता था.. घर जाते ही शीला भाभी को इस के बारे में बताती हूँ.. वो कुछ न कुछ तरीका ढूंढ निकालेगी.. मन में गांठ मार ली कविता ने

सब धीरे धीरे कोन्फ्रन्स रूम में इकठ्ठा होने लगे थे.. मौसम और फाल्गुनी.. दोनों चिड़िया की तरह चहचहा रही थी.. सब का ध्यान बार बार उनकी ओर चला जाता था.. चंचल परवाने जैसी मौसम और शांत गंभीर फाल्गुनी.. दोनों दिखने में बेहद सुंदर और आकर्षक..

"लेडिज एंड जेन्टलमेन.. माउंट आबू की इन हसीन वादियों में मेरी प्रियतमा पत्नी के ३५वे जन्मदिन की पार्टी में.. मैं और रेणुका आप सब का स्वागत करते है.. " माइक पर बोल रहे राजेश की आवाज पूरे हॉल में गूंज उठी.. सब ने तालियों से सराहा.. शराब के नशे में काफी लोग मस्त थे.. मुक्त और मस्त वातावरण था.. और इस वातावरण का असर मौसम और फाल्गुनी पर भी धीरे धीरे होता जा रहा था

रेणुका केक काटने ही वाली थी तब राजेश ने उसे एक मिनट के लिए रोक लिया.. और पीयूष को आवाज लगाई..

"यस सर.. " पीयूष राजेश के करीब आया.. राजेश ने पीयूष के कान में गिफ्ट के बारे में पूछा.. "वो तो मेरे कमरे में है" पीयूष ने कहा

"अरे भई.. तो लेकर आओ जल्दी.. " राजेश ने कहा.. पीयूष अपने कमरे की ओर भागा

तभी रेणुका ने पिंटू को अपने पास बुलाया और उसके कान में कुछ कहा.. पिंटू ने जवाब में "स्योर मैडम" कहा और वो भी हॉल के बाहर चला गया.. अब रेणुका ने कविता को बुलाया.. और सब सुन सके उस तरह कहा "अरे कविता.. मेरा पर्स रूम पर भूल आई हूँ.. जरा लेकर आएगी प्लीज.. टेबल पर ही पड़ा है"

"अभी लेकर आती हूँ" अपने बॉल उछालते हुए कविता रेणुका के कमरे की तरफ दौड़ी

जाते जाते कविता को याद आया की वह कमरे की चाबी लेना तो भूल ही गई थी.. पर तब तक वो कमरे तक पहुँच गई थी.. उसने देखा की कमरा तो पहले से ही खुला हुआ था.. दरवाजा खोलकर उसने प्रवेश किया.. बेग के अंदर कुछ ढूंढ रहे पिंटू की पीठ देखकर वह चोंक उठी.. तभी कविता के मोबाइल की रिंग बजी.. पिंटू ने घबराकर पीछे देखा और आश्चर्य से पूछा "अरे कविता? तुम यहाँ? क्या बात है?"

पिंटू को बोलने से रोकने के लिए कविता ने अपने होंठ पर उंगली रखते हुए इशारा किया और फोन रिसीव किया "हैलो.. !!"

"ओके मैडम" एक ही सेकंड में उसने फोन काट दिया

कविता ने दरवाजा अंदर से लॉक कर दिया और पिंटू को अपनी बाहों में भरकर.. रेणुका-राजेश के बिस्तर पर गिरा दिया

पिंटू घबरा गया "ये क्या कर रही है पगली??" उसने कविता को धक्का देकर अपने आप को उससे दूर किया

"अरे पिंटू मेरी जान.. रेणुका मैडम ने जान बूझकर हम दोनों को यहाँ भेजा है.. अभी उनका ही फोन था.. डरने की कोई बात नही है.. हम एकदम सेफ है यहाँ.. आई लव यू पिंटू" कहते हुए वह पिंटू से लिपट पड़ी..

उसी वक्त.. पूरे माउंट आबू में एक साथ लाइट चली गई.. कहीं किसी ट्रैन्स्फॉर्मर में एक जबरदस्त धमाके की आवाज सब ने सुनी.. अंधेरा होते ही पीयूष का हाथ कविता के पतले टॉप के अंदर घुस गया और वह उसके दसहरी आम का रस निकालने लगा.. कविता के अद्भुत कामुक स्तनों को वो मसलने लगा.. कविता का हाथ सीधा पीयूष के लंड पर पहुँच गया.. पेंट के ऊपर से लंड को मालते हुए उसने अपने लिपस्टिक लगे होंठ पीयूष के होंठों पर रख दिए..






कविता के बिना ब्रा वाले स्तनों को हाथ में पकड़ते ही पिंटू की आह निकल गई.. कविता ने तुरंत अपना टॉप ऊपर कर लिया और पिंटू का चेहरा अपने दोनों स्तनों पर दबा दिया.. दोनों एक दूसरे में ऐसे खो गए.. जैसे धरती पर वो दो आखिरी इंसान हो.. पिंटू से ज्यादा भूख कविता की थी इसलिए वह काफी आक्रामक थी.. पीयूष की अवहेलना से परेशान कविता अपने प्रेमी के आगोश में आते ही उत्तेजित हो गई.. उसका जिस्म किसी मर्द को चाहता था.. क्योंकि पिछले काफी दिनों से पीयूष ने उसे हाथ भी नही लगाया था.. ऊपर से माउंट आबू आने के बाद उसकी इच्छाएं और उछलने लगी थी.. पिछले दो घंटों में.. अनगिनत मर्दों की भूखी नज़रों को अपने स्तन पर पड़ती हुई महसूस कर वह तड़पने लगी थी..

पिंटू भी अपने पहले प्यार को पा कर खुश हो गया था.. कविता के स्तनों की गर्माहट का मज़ा लेते हुए वह उसकी जांघों को सहलाने लगा.. जैसे जैसे पिंटू का हाथ उसकी जांघों पर आगे बढ़ता जा रहा था वैसे वैसे कविता अपनी टांगें चौड़ी करते हुए अपना राजद्वार खोल रही थी..पिंटू के हाथ के स्पर्श से वह सिहरते हुए उसने अपनी आँखें बंद कर ली.. चिकनी जांघों को सहलाते हुए पिंटू को ऐसा महसूस हो रहा था जैसे संगेमरमर पर हाथ फेर रहा हो.. कविता का सहकार भी ऐसा मिल रहा था की कुछ ही सेकंड में पिंटू का हाथ उसकी चूत तक पहुँच गया..

पता नही.. ऐसा कौनसा जादू होता है स्त्री की योनि में..जिसे देखते ही पुरुष बेकाबु होकर जानवर की तरह टूट पड़ता है.. कविता ने अब पेंट की अंदर हाथ डालकर पिंटू का लंड पकड़ लिया था..

"कितना सख्त हो गया है यार" कविता को उसके लंड की गर्मी अपनी हथेली पर महसूस हो रही थी

"तुझे इस तरह देखने के बाद.. किसी का भी सख्त हो जाए.. क्या लग रही है तू कविता.. आह्ह.. " कविता की छाती को चूम चाटकर मदहोश कर दिया उसे पिंटू ने ..

उत्तेजनावश पिंटू के लंड पर कविता के हाथों की पकड़ और सख्त हो गई.. अपने स्तनों को और सख्ती से दबा दिया पिंटू के मुंह पर..

"अब मुझसे रहा नहीं जाता पिंटू.. कुछ कर ना जल्दी.. "

"ओह्ह कविता.. मेरी जान.. " कहते हुए पिंटू ने अपने पेंट की चैन खोलकर लंड बाहर निकाल लिया.. कविता बेचैन होकर पिंटू के लंड के टोपे को चूसने लगी.. कविता की इस हरकत से पिंटू भी अपना आपा खो बैठा.. कभी वो कविता की नंगी पीठ को सहलाता.. कभी उसके बालों में उँगलियाँ फेरता.. तो कभी उसके स्तन को दबाता






"जल्दी करना होगा कविता.. सब हमारा इंतज़ार कर रहे होंगे.. तू जल्दी उलटी लेट जा.. हमारी फेवरिट पोजीशन में करेंगे.. " पिंटू ने कहा

"नही यार.. मेरी बिना चाटे मैं तुझे छोड़ने वाली नही हूँ आज.. कितना वक्त हो गया.. आखिरी बार जब मेरे घर के पीछे की अंधेरी गली में मिले थे तब तूने चाटी थी मेरी.. वो रात मुझे बहोत याद आती है.. तेरी जीभ जब अंदर गई थी तब.. आह्ह इतना मज़ा आया था की क्या बताऊ.. प्लीज यार.. आज अपनी जीभ अंदर तक घुसेड़कर चाट दे एक बार"

"जो भी करवाना है जरा जल्दी कर यार" पिंटू ने कहा..

कविता ने तुरंत अपनी छोटी सी शॉर्ट्स और पेन्टी एक साथ उतार फेंकी.. पिंटू कविता की जांघों को चाटने लगा.. वो भी गरम हो चुका था.. कविता ने उसका सर पकड़ा और उसके मुंह को अपनी चिपचिपी बुर पर लगा दिया.. पिंटू की जीभ का अपनी चूत पर स्पर्श प्राप्त होते ही कविता स्वर्ग में पहुँच गई.. पिंटू के कामुक चुंबनों का असर इतनी तीव्रता से हुआ की एक ही पल में उसकी चूत ने पानी छोड़ दिया.. उसके स्तन सख्त हो गए और निप्पल बंदूक की गोली जैसी टाइट हो गई.. पिंटू जैसे जैसे चाटता गया.. कविता की सिसकियों का वॉल्यूम बढ़ता गया.. अपने पसंदीदा पात्र के साथ संभोग करने से बेहतर मज़ा ओर कोई नही है..






पिंटू की जीभ ने कविता को उसके सारे गम भुला दिए.. कमर को उचक उचक कर वह अपनी चूत को पिंटू के मुंह से घिस रही थी.. कराहते हुए कविता का जिस्म एकदम सख्त और सीधा हो गया.. वह थरथराने लगी.. और एक छोटी सी चीख के साथ पिंटू के मुंह में झड़ गई.. स्खलित होते ही कविता का जिस्म एकदम हल्का हो गया.. दिमाग शांत हो गया.. मन तृप्त हो गया.. अपना काम खतम होते ही उसे वास्तविकता का ज्ञान हुआ..

अब लाइट भी आ चुकी थी

"अब हमे चलना चाहिए पिंटू.. बहोत देर हो गई" कविता ने कहा

"अच्छा?? तो फिर इस सख्त लोडे का क्या करू? ये अब ढीला होने नही वाला.. अब ईसे वापिस पेंट में डालना भी मुमकिन नही है.. क्या करू? तू बता" पिंटू ने थोड़े गुस्से से कहा..

कविता उठकर पिंटू के लंड को तेज गति से हिलाने लग गई.. पिंटू कविता के बॉल को पागलों की तरह दबाने लगा.. पिंटू को बिस्तर पर सुलाते हुए कविता उसके ऊपर चढ़ बैठी.. और अपने हाथ को नीचे ले गई.. पिंटू के कड़े लंड को अपनी चूत के सेंटर पर रखकर उसने दबाया.. पर लंड अंदर गया नही.. कविता ने अपनी हथेली पर थोड़ा सा थूक लेकर नीचे लंड पर लगाया.. और ऊपर वज़न देने लगी..

"उफ्फ़ पिंटू.. तेरा ज्यादा मोटा हो गया है क्या.. !! अंदर जा ही नही रहा.. दर्द हो रहा है मुझे.. ऊईई माँ.. !!" धीरे धीरे कविता की चूत लंड निगलती रही.. अपने प्रेमी को खुश करने के लिए कविता ऊपर नीचे होते हुए धक्के लगाने लगी..






अपना ऑर्गजम हो जाने के बावजूद.. अपने प्रेमी को खुश करने के लिए.. अपनी कामुक अदाओं से वह पिंटू को रिझाने लगी.. कविता की चूत के एकदम टाइट वर्टिकल होंठों की पकड़ इतनी मजबूत थी की पिंटू नीचे लैटे लैटे स्वर्ग का आनंद ले रहा था.. ऊपर नीचे करते हुए लय बनाकर कविता अपने स्तनों को उछाल रही थी.. अपनी चूत की गहराई में अंदर तक उसे लंड की गर्माहट का एहसास हो रहा था.. गति बढ़ाते हुए कविता चाहती थी पिंटू जल्दी से जल्दी झड़ जाए..

अपने स्तनों पर पिंटू की टाइट पकड़ महसूस करते हुए कविता को पता चल गया की पिंटू अब झड़ने के करीब था.. उसने अपनी उछलने की गति दोगुनी कर दी..

"ओह्ह गॉड.. फक मी.. लव यू मेरी जान.. बहोत मज़ा आ रहा है मुझे.. कितनी टाइट है तेरी चूत.. पीयूष डालता भी है या नही अंदर.. ओह्ह ओह!!" कविता की कमर पकड़कर उसे धक्के लगाने में मदद कर रहा था पिंटू

लंड के घर्षण से अभी अभी स्खलित हुई कविता फिर से गरम होने लगी.. अपनी चूत की मांसपेशियों को उसने इतना टाइट कर दिया जैसे पिंटू के लंड का गला घोंट देना चाहती हो.. लंड और चूत की लड़ाई में हम मानते है की आखिर में लंड जीता या चूत जीती.. पर हकीकत में चूत कभी हारती नही.. हार हमेशा लंड की ही होती है.. कभी चूत से बाहर निकले लंड के हाल देखें है!!! कोल्हू से निकले हुए गन्ने जैसी हालत होती है लंड की..






लंड पर दबाव बढ़ते ही पिंटू के लंड ने पिचकारी मार दी.. दोनों प्रेमी एक दूसरे से लिपट गए..

कुछ सेकंडों तक लिपटे रहने के बाद रीलैक्स होकर पिंटू के होंठों को चूमते हुए कविता ने कहा.. "अब मुझे जाना होगा पिंटू.. जाने का मन तो नही है पर क्या करें.. !! काश हम दोनों को साथ में एक रात गुजारने का मौका मिल जाएँ "

"फिलहाल तो ऐसा मौका मिलना मुमकिन नही है.. तू अब कुंवारी नही है.. पीयूष की पत्नी है तू.. चल अब तू जल्दी जा.. मैं थोड़ी देर में आता हूँ वरना किसी को शक हो जाएगा"

"नही.. तू पहले निकल.. मैं यह बेड की चादर और मेरा मेकअप ठीक करके आती हूँ" पिंटू का चेहरा उसने अपने रुमाल से पोंछ कर उसके बाल ठीक कर दिए और उसे एक आखिर किस देकर जाने दिया.. उसके जाने के बाद कविता ने आईने में देखकर अपना मेकअप ठीक किया.. लिपस्टिक फिर से लगाई.. ड्रेसिंग टेबल पर पड़ी रेणुका की डार्क ब्राउन शेड की लिपस्टिक होंठों पर लगाते हुए उसे पिंटू के सुपाड़े की याद आ गई.. कविता हंस पड़ी.. सोचने लगी.. दुनिया की सर्वश्रेष्ठ लिपस्टिक तो लंड ही है.. उससे होंठ गीले करने में जो मज़ा है वो बेजान लिपस्टिक में कहाँ!!! शायद इसी कारण सारी कंपनियां लिपस्टिक को लंड के आकार की ही बनाते है..


कविता ने फटाफट अपने बाल ठीक कीये.. बेड की चादर की सिलवटें दूर की.. और सब कुछ एक आखिरी बार चेक करते हुए रूम से बाहर निकली। हॉल में पहुंचते ही उसने देखा की सब पार्टी इन्जॉय कर रहे थे.. कविता के उछलते स्तनों की गैरमौजूदगी में सारा वातावरण शांत सा था.. पर जैसे आंधी आते ही सब अस्तव्यस्त हो जाता है.. वैसे ही कविता की पायलों की झंकार सुनते ही सब अपने होंठों पर जीभ फेरते हुए उसे देखने लगे.. अपने हाथ के ग्लास में पड़ी दारू को भूलकर कविता के जोबन को पीने लगे.. मर्द तो मर्द.. सारी औरतें भी कविता के स्तन युग्म को देखती ही रह गई.. सब कविता को देख रहे थे.. एक पीयूष को छोड़कर.. पीयूष नाम का भँवरा.. मौसम नाम के ताजे खिले फूल का रस चूसने के लिए यहाँ वहाँ मंडरा रहा था..

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रेणुका ने केक काटकर सेलीब्रेशन की शुरुआत की.. सब ने तालियों की गड़गड़ाहट के साथ रेणुका को विश किया.. रेणुका ने राजेश और बाद में सब को केक का छोटा छोटा पीस अपने हाथों से खिलाया.. जब वो केक का टुकड़ा पीयूष को खिलाने गई तब दोनों की आँखें एक हुई.. उस दिन रेणुका के घर जब पीयूष पैसे लेने गया था तब दोनों के बीच जो हुआ उसकी यादें ताज़ा हो गई..

रेणुका के चेहरे पर हल्की सी मुस्कान खिल उठी.. उसका पल्लू हल्का सा सरक गया और तंग ब्लाउस में कैद उसका रूप.. पीयूष को दिखने लगा.. रेणुका ने तुरंत ही अपना पल्लू ठीक कर लिया.. और पीयूष के मुंह में केक का टुकड़ा डालते हुए.. बिल्कुल धीरे से उसके कानों के पास बोली "हमारा सेलीब्रेशन बाकी रहेगा.. तू मेरे घर आना फिर उसे पूरा करेंगे" कहते हुए वह चली गई.. रेणुका के कूल्हों को देखकर एक पल के लिए पीयूष मौसम को भी भूल गया






दूर कोने में खड़ी वैशाली यह सारा तमाशा देख रही थी.. पीयूष के साथ कुछ घंटों पहले हुए झटपट सेक्स का नशा अब उतर गया था और वैशाली नए सिरे से उत्तेजित हो गई थी.. अब वो पीयूष के साथ.. एकदम आराम से.. पूरा वक्त लेकर भरपूर चुदाई करने का प्रोग्राम मन ही मन बनाने लगी.. वह सोच रही थी की तसल्ली के साथ चुदवाने के लिए कम से कम डेढ़ घंटे का समय चाहिए.. पर उतनी देर तक अगर वो और पीयूष गायब रहें तो कविता को पक्का शक हो जाएगा.. क्या किया जाए !!! पीयूष के आसपास इतनी गोपियाँ मंडरा रही है की डेढ़ घंटा तो क्या.. डेढ़ मिनट के लिए भी उससे अकेले मिल पाना मुश्किल था..

पीयूष के लंड को याद करते ही वैशाली की चूत में सुरसुरी होने लगी.. इतना मज़ा तो उसे हिम्मत या संजय के साथ भी कभी नही आया था.. आखिर ऐसी कौन सी बात थी पीयूष में.. जो उससे चुदवाने में इतना मज़ा आता था? क्या वो चूत चाटता था इसलिए?? पर वो तो संजय भी चाटता था.. संजय तो एक घंटे तक उसकी चूत चाटता ही रहता था.. पर फिर भी उसके साथ वो मज़ा नही आता था जो पीयूष के संग आता था.. ओह पीयूष.. तेरे बिना जीना अब खाली खाली सा लगता है.. संजय के बर्ताव से जो खलिश उसके दिल में उठ खड़ी हुई थी.. उसे सिर्फ पीयूष ही भर सकता है

संजय.. क्या कर रहा होगा संजय अभी?? एक सेकंड के लिए वैशाली को संजय की याद आ गई.. और क्या कर रहा होगा वो? पक्का किसी रांड को गेस्टहाउस में ले जाकर अपना लंड चुसवा रहा होगा.. और क्या !! संजय की याद आते ही वैशाली का मुंह कड़वा हो गया.. जिंदगी की माँ चोद दी थी संजय ने.. ना ही वो मेरे जज़्बातों को समझ पाया और ना ही मुझे.. एक पत्नी की हमेशा यह मनोकामना होती है की उसका पति उसे समझे.. !! संजय तो जब देखो तब चूत, चुदाई और सेक्स.. बस इन्ही विचारों में डूबा रहता था.. ढेले भर की कमाई नही.. बस सारा दिन पड़े रहो और मौका मिलते ही लंड घुसा दो.. पर जो भी कहो.. संजय चुदाई जबरदस्त करता था.. एक ही बार में शरीर के अंजर-पंजर ढीले कर देता था.. वैशाली की सोच का सिलसिला यूं ही चलता रहा

होटल के मेनेजर ने राजेश से आकर ये कहा की पावर तो अभी भी ऑफ था.. इन्वर्टर से होटल में कनेक्शन दिया गया है.. अगर अगले ४५ मिनट तक बिजली नही आई तो इन्वर्टर भी बंद हो जाएगा.. इसलिए जितनी जल्दी हो सके पार्टी को निपटा लिया जाएँ ताकि किसी को अंधेरे के कारण दिक्कत ना हो..

राजेश ने सब के सामने अनाउन्स किया "हमारी पार्टी चालू रहेगी.. अगर इन्वर्टर की बेटरी डाउन हो जाए तो हम अंधेरे में पार्टी जारी रखेंगे.. सब से विनती है की अंधेरे का गलत उपयोग न करें.. "हँसते हुए उसने कहा "और जिन पर सबकी निगाहें चिपकी हुई है.. वह अपना ध्यान जरूर रखें" कविता के स्तन और मौसम के गालों के डिम्पल की ओर देखते हुए राजेश ने कहा..

सब ने हँसते हँसते तालियों से इस घोषणा का स्वागत किया.. कविता और मौसम शरमा गए.. वैशाली और फाल्गुनी साथ खड़े थे.. वैशाली के हातों में ज्यूस का खाली ग्लास था.. वहाँ से गुजर रहे राजेश ने ये देखा और बोला "मैडम, क्या बात है ?? खाली ग्लास पकड़े पार्टी इन्जॉय कर रही हो? सच सच बताना.. आपके पति को मिस कर रही हो ना.. ??"

वैसे वैशाली संजय को ही याद कर रही थी.. पर उसे मिस करना नही कहा जा सकता.. संजय के प्रति उसके मन में कितनी कड़वाहट थी ये राजेश को बताने का कोई मतलब नही था.. ऐसा समझकर वैशाली ने अपने चेहरे पर नकली मुस्कान धारण कर ली.. और कहा "जी सर.. यहाँ ज्यादातर कपल्स है.. उन्हे देखने के बाद.. जाहीर सी बात है"

राजेश: "ऑफ कोर्स.. ये तो जाहीर सी बात है.. अब आप एक काम कीजिए.. उनके हिस्से का ज्यूस आप पी लीजिए.. वेटर.. मैडम को एक ग्लास दो, प्लीज"

वैशाली: "अरे नही नही सर.. मैं दो ग्लास पहले ही पी चुकी हूँ.. "

राजेश: "अरे.. ये शराब थोड़े ही है.. सिर्फ ज्यूस है.. एक ओर ग्लास तो आराम से पी सकती है आप.. वैसे ज्यूस पीकर कोई कैसे इन्जॉय कर सकता है मेरी तो समझ में नही आ रहा"

वैशाली: "मैं शराब नही पीती सर.. "

राजेश: "और बीयर??"

वैशाली: "कभी कभी.. पर आज मन नही है"

राजेश: "इतनी अच्छी पार्टी चल रही है.. तो आपका मन क्यों नही है?"

वैशाली: "बात वो नही है.. पर बिना कंपनी पीने में मज़ा नही आता मुझे "

राजेश: "हम्म.. तो ये बात है.. क्या आप मेरे साथ बियर पीना चाहोगी? वैसे एक बात बता दूँ.. मैंने आज से पहले कभी बियर नही पी है.. पर आज आप के साथ शुरुआत करने का मन कर रहा है"

वैसे भी वैशाली अकेले अकेले बोर हो रही थी.. क्या पता.. राजेश के साथ बातें कर के थोड़ा अच्छा लगे.. !! राजेश भी वैशाली के उभरे हुए स्तनों को देख रहा था.. पूरी तरह से ढंके हुए स्तन थे.. पर उभार और आकार को वस्त्रों की परतें कहाँ छुपा सकती है!! इतर को ढँककर रखो फिर भी उसकी खुशबू तो आ ही जाती है.. स्त्रीओं के अंग ढंके हुए हो या खुले.. पुरुषों को दोनों ही स्थिति में देखने में मज़ा तो आता ही है.. बस सुंदर साथ होना चाहिए और विचारों में तालमेल होना चाहिए.. फिर ढंके हुए वस्त्रों को उतरने में कहाँ देर लगती है.. !! सिर्फ किसी के पहल करने के ही देर होती है..

वैशाली सोच में पड़ गई.. क्या करू? हाँ कहूँ या मना कर दु? वैसे मुझे पीयूष की कंपनी चाहिए पर वो तो अभी मुमकिन नही है.. वैसे भी अकेले अकेले खड़े रहने का क्या मतलब?? वैशाली को गहरी सोच में डूबा देख.. राजेश इंतज़ार करता रहा.. उसे यकीन था की वैशाली मना नही करेगी

वैशाली ने बीच का रास्ता निकाला.. "सर, क्यों न हम रेणुका जी को भी हमारे साथ शामिल कर ले?"

राजेश: "हाँ जरूर कर सकते है.. पर फिर आपको मज़ा नही आएगा"

राजेश का कहने का मतलब समझकर शरमा गई वैशाली.. उनके कहने के दो मतलब निकलते थे.. कौन सा मतलब निकालना वो वैशाली पर निर्भर करता था..

वैशाली: "वैसे आप कभी शराब पीते नही है.. और यहाँ मेरे साथ पीते हुए देखकर कहीं रेणुका जी कुछ उल्टा-सीधा न सोच लें.. "

राजेश: "उसकी चिंता आप छोड़ दीजिए.. उसके पास अभी भी कुछ भी सोचने का समय नही है.. देखो ना.. कितने सारे लोगों से घिरी हुई है वो!! मुझे तो डाउट है की रात को भी मुझ से मिल पाएगी या नही.. हा हा हा हा.. अब दो ग्लास मँगवा लूँ??"

रोमांचित होकर वैशाली ने हाँ कहते हुए सिर हिलाया.. जैसे बिना पिए ही उसे नशा सा हो रहा था.. वैशाली और राजेश बातें करने में मशरूफ़ थे तभी रेणुका खुद चलकर उनके पास आकर खड़ी हो गई.. और बोली.. "वैशाली डिअर.. तू बियर पीती है ये मुझे कविता से जानने को मिला.. चलो बढ़िया है.. "

वैशाली ने शरमाते हुए कहा " आप कंपनी दो तो जरूर पियूँगी.. आप को पता नही है.. बिना कंपनी ईसे पीओ तो दूसरे दिन हेंगओवर होता है"

रेणुका: "अच्छा ऐसा है? तब तो राजेश ही तुम्हें कंपनी देगा.. मेरा जन्मदिन है आज इसलिए होश में रहना जरूरी है.. लेकिन वादा करती हूँ.. नेक्स्ट टाइम जरूर कंपनी दूँगी.. वैसे मुझे आश्चर्य इस बात का हो रहा है की राजेश पीने के लिए मान कैसे गया? तुझे तो इसकी गंध पसंद नही थी.. खैर जो भी हो.. आप दोनों इन्जॉय करो.. " रेणुका ने जाते जाते राजेश का नाक खींचा.. जवाब में राजेश ने रेणुका को अपनी ओर खींच लिया.. राजेश की छाती से रेणुका के स्तन दब गए.. देखकर वैशाली की आह निकल गई..

दोनों को अकेला छोड़कर रेणुका दूसरे लोगों से मिलने चली गई..

वैशाली को राजेश का सीधा स्वभाव पसंद आ गया... घुमा-फिराकर बात करने वालों में से नही था वो.. इतना अमीर होने के बावजूद जरा सा भी घमंड नही था.. उसका पति संजय.. जेब में ५०० का नोट हो तो भी ऐसे घूमता था जैसे कोई सुल्तान हो..

इस तरफ कविता और पीयूष अब भी एक दूसरे की तरफ देख नही रहे थे.. ऐसे बर्ताव कर रहे थे जैसे एक दूसरे का अस्तित्व ही न हो.. कविता भी बेफिक्र हो कर पीयूष को इग्नोर कर रही थी.. बाहर से खुश दिख रही कविता अंदर ही अंदर घूंट रही थी.. सिर्फ पिंटू ही था जो कविता को ठीक से समझता था.. आखिर प्रेमी था वो कविता का.. और एक सच्चा प्रेमी अपने साथी के मन की हालत बिना बताए ही जान जाता है

राजेश से बातें करते हुए वैशाली धीरे धीरे खुलती जा रही थी

राजेश: "आपके पति क्या करते है? जॉब या बिजनेस?"

वैशाली थोड़ी देर सोचती रही की क्या जवाब दे.. फिर उसने असलियत बता ही दी..

वैशाली: "वो कुछ काम नही करते.. बल्कि ऐसा कह सकते है की वो किसी काम के है ही नही.. पूरा दिन भटकते रहते है.. मुझ में या मेरे जीवन में उन्हे कोई इन्टरेस्ट ही नही है.. हमारा वैवाहिक जीवन एक दुखद वास्तविकता बनकर रह गया है.. इन शॉर्ट, मैं अपनी जिंदगी से.. और अपने पति से बिल्कुल खुश नही हूँ.. " एक ही सांस में अपने जीवन का दुखड़ा सुनाते हुए वैशाली ने ग्लास खतम कर दिया और बोली "एक और ग्लास मँगवा लीजिए सर.. "

वैशाली की आँखों से बहते हुए आंसुओं को देखकर राजेश घबरा गया.. वो सोचने लगा की यह सवाल नही पूछा होता तो अच्छा होता.. !!

राजेश: "अरे वैशाली.. आप तो सीरीअस हो गई.. मुझे लगता है की यह पूछकर मैंने आपको दुखी कर दिया.. आई एम सॉरी.. अब यह मेरी जिम्मेदारी है की मैं आपको खुश करूँ.. क्योंकि आपको दुखी भी मैंने किया है.. " राजेश ने दो ओर ग्लास मँगवाए और एक ग्लास वैशाली को दिया.. दोनों अब पास पड़े एक टेबल और कुर्सी पर बैठ गए.. वेटर ने तले हुए काजू का एक बाउल उनके बीच रख दिया.. दोनों पीते गए और बातें करते गए.. खास कर वैशाली ने ही अपनी बातें बताई.. राजेश बिल्कुल चुपचाप सुनते रहे.. वैशाली को आज तक अपनी बातें इतने इत्मीनान से सुनने वाला कोई नही मिला था..

किसी के कहने पर मौसम ने एक सुरीला गाना छेड़ दिया.. पूरे हॉल में गजब का माहोल छा गया.. शराब, सिगरेट, सौन्दर्य, सेक्स और संगीत का अनोखा मिश्रण जम चुका था.. सब मुग्ध होकर मौसम की ओर देख रहे थे.. आँखें बंद कर गाती हुई मौसम संगीतमय हो चुकी थी.. उसका ध्यान गाने के आराह-अवरोह पर था..

"अजीब दास्तान है ये.. कहाँ शुरू कहाँ खतम.. ये मंज़िलें है कौन सी.. न वोह समझ सकें न हम.. "

गाना सुनने की आड़ में पीयूष मौसम की छातियाँ ताड़ रहा था.. गायकी कितनी मुश्किल चीज है.. बिना इस बात को समझे.. पीयूष बस मौसम के उभारों को और अंगों को नापने में मशरूफ़ था.. मौसम के गाने के बोल सुनते सुनते कविता पिंटू की तरफ देख रही थी.. और दोनों एक दूसरे की तरफ देखकर मुस्कुरा रहे थे..

पीयूष चलते चलते वैशाली और राजेश सर के पास आया.. अपना सिगरेट का पैकेट खोलकर दोनों को सामने रखा और बोला "बस इसी की कमी है सर.. लीजिए"

राजेश पीयूष की इस पेशकश से थोड़ा सा गुस्सा हो गया.. पीयूष के आते ही वैशाली चुप हो गई

राजेश: "क्या तुझे ये पता नही की आई डॉन्ट स्मोक??"

पीयूष: "सर, वैसे तो आप पीते भी नही हो.. लेकिन आपके हाथ में आज ग्लास भी है.. तो सोचा ये भी ट्राय कर लिया जाएँ.. जो भी है बस आज ही है.. कल किसने देखा है सर.. !!"

राजेश और पीयूष के आश्चर्य के बीच वैशाली ने पैकेट से दो सिगरेट खींच ली.. और उसमें से एक राजेश को देते हुए बोली.. "पी लीजिए सर.. वरना पीयूष बुरा मान जाएगा.. और पीयूष.. बदले में तुझे हमारे साथ बैठकर बियर पीनी पड़ेगी"

"बियर क्या.. तुम कहो तो मैं जहर पीने के लिए भी राजी हूँ.. " हँसते हँसते पीयूष ने पास पड़ी एक कुर्सी खींच ली और इन दोनों के साथ बैठ गया

तीनों बियर और सिगरेट पीने लगे.. तभी मौसम का गाना पूरा हुआ.. वैशाली खड़ी होकर मौसम के पास गई

वैशाली: "अरे वाह.. सुपर्ब.. मेरी एक फरमाइश है.. प्लीज ईसे गा दो.. !!" मौसम और वैशाली के बीच मीठी नोक-झोंक चल रही थी जो राजेश और पीयूष को सुनाई नही दे रही थी.. थोड़ी ही देर में वैशाली वापस लौटी और बोली "अब मौसम मेरी पसंद का गीत पेश करेगी"

मौसम के सुरीले कंठ ने एक और नगमा छेड़ दिया

"जाने क्यों लोग मोहब्बत.. किया करते है.. !! दिल के बदले दर्द-ए-दिल.. लिया करते है"

इतना सुरीला गा रही थी मौसम की सब उसकी आवाज में खो गए.. गीत के हर अंतरे को सुनते हुए वैशाली सिगरेट के कश पर कश लगा रही थी.. जैसे बाहर निकलते धुएं के साथ साथ अपने गम को भी धुआँ कर रही हो..

कविता की फरमाइश पर मौसम ने तीसरा गीत गया

"छोड़ दे.. सारी दुनिया किसी के लिए.. ये मुनासिब नही आदमी के लिए.. प्यार से भी जरूरी कई काम है.. प्यार सब कुछ नही ज़िंदगी के लिए"

यह नगमा पूरा होने तक वैशाली की आँखों से आँसू टपकने लगे.. रो रही वैशाली को कैसे शांत किया जाए ये सोचते हुए एक दूसरे की ओर देख रहे थे पीयूष और राजेश.. आखिर कविता की उन पर नजर पड़ते वो उनके पास आई.. वैशाली की पीठ को सहलाते हुए उसे कहने लगी "शांत हो जा वैशाली.. प्लीज" वैशाली कविता से लिपटकर फुट-फुटकर रोने लगी.. काफी देर तक ऐसे ही रोते रहने के बाद वह चुप हो गई.. रोने से उसका दिल भी हल्का हो गया.. मौसम के गीत के बोल ने वैशाली को रुला दिया था..

वैशाली: "कविता, तू इन्जॉय कर.. अब मैं ठीक हूँ.. पीयूष.. तू भी कविता को कंपनी दे.. कब से वो अकेले घूम रही है.. " वैशाली के कहने पर पीयूष को न चाहते हुए भी कविता के साथ जाना पड़ा..

वैशाली और राजेश फिर से अकेले पड़ गए.. वैशाली के दुखी दिल को डाईवर्ट करने के लिए राजेश अन्य विषयों पर बात करने लगे.. राजेश ने अपने बिजनेस के बारे में.. रेणुका की बारे में.. कई बातें की.. वैशाली अब धीरे धीरे मूड में आने लगी थी.. जैसे जैसे दोनों बातें करते गए.. वैसे वैसे ही उन दोनों के बीच की शर्म और संकोच कम हो रहे थे.. राजेश की बातों में एक अपनापन था.. जो वैशाली को अपनी ओर आकर्षित कर रहा था.. बियर के सिप लेते और सिगरेट के कश लगाते हुए वह दोनों कई अलग अलग विषयों पर बातें कर रहे थे






तभी मेनेजर ने आकर ये घोषणा की.. पावर आ चुका था.. अब वो लोग जब तक चाहें पार्टी कर सकते थे..

राजेश और वैशाली के ग्लास खतम होते ही.. बिना राजेश से पूछे.. वैशाली ने और दो ग्लास मँगवा लिए.. पहली बार पी रहे राजेश का दिमाग धीरे धीरे नशे की असर में आने लगा था.. राजेश ने वैशाली के करीब आकर पूछा

राजेश: "एक बात पूछूँ वैशाली.. अगर तुम बुरा न मानो तो.. शराब और सिगरेट पीती स्त्री बड़ी ही सुंदर लगती है"

वैशाली: "उसमें कोई बड़ी बात नही है.. आप तो विदेश घूमते रहते है.. वहाँ पर तो ये काफी आम बात है"

राजेश: "ऑफ कोर्स.. पर उन फिरंगी औरतों को ऐसा करता देख कुछ खास महसूस नही होता.. पर पता नही क्यों.. भारतीय स्त्री के हाथों में शराब और सिगरेट देखकर एक अलग ही कीक मिलती है.. "

वैशाली के सर पर भी शराब का सुरूर छा रहा था.. उसकी आवाज भी अब लहराने लगी थी.. बियर का ग्लास आते ही वैशाली ने एक बड़ा घूंट भर लिया.. और नई सिगरेट जलाई.. दोनों पर अब सोमरस का प्रभाव हो रहा था

वैशाली: "सर, आपने तो जीवन में पहली बार शराब पी है.. कैसा रहा ये पहला अनुभव?"

राजेश: "शराब का नशा तो कुछ खास नही है.. हाँ.. तेरी कंपनी का नशा जबरदस्त हो रहा है" नशे में राजेश "आप" से "तू" पर कब आ गया ये पता ही नही चला !!!

वैशाली शरमाते हुए बोली "मैंने कभी सोचा भी नही था की कभी किसी पराए मर्द के साथ बैठकर शराब पीऊँगी.. आज तक मैंने मेरे पति के अलावा किसी के साथ शराब नही पी है.. !!"

राजेश ने हँसते हुए कहा "मैंने तो किसी के भी साथ आज तक नही पी है.. शायद ये हमारे दोनों के बीच एक खास संबंध की शुरुआत हो सकती है"

वैशाली: "मतलब? मैं समझी नही!!!"

राजेश: "वैशाली.. तुम वयस्क हो.. और अभी अभी तुमने बताया की तुम्हारे पति के साथ तुम्हारी ट्यूनिंग कुछ खास नही है.. तुम्हारा पति तुम्हें जो नही दे पा रहा है.. वो देने का मौका मुझे दे सकती हो??"

वैशाली: "सर, मुझे लगता है आपको शराब चढ़ गई है.. " नशे में होने के बावजूद वैशाली सतर्क हो गई..

वैशाली का हाथ पकड़कर राजेश ने कहा "हाँ, मुझे चढ़ गई है वैशाली.. यहाँ सब इन्जॉय कर रहे है.. तो फिर हम भी क्यों इन्जॉय न करें??"

वैशाली: "आप जरूर इन्जॉय कर सकते है.. पर वो रेणुका जी के साथ.. मेरे साथ नही.. ओके??"

राजेश के स्पर्श से वैशाली के पूरे जिस्म में झनझनाहट होने लगी थी.. वैशाली जवान थी.. खूबसूरत थी.. सेक्सी थी.. और माउंट आबू के मदहोश वातावरण में शराब का नशा अपना असर दिखाएं.. फिर कोई कैसे अपने आप को कंट्रोल करेगा!!!

राजेश का हाथ अपने हाथ पर से हटा नही पाई वैशाली.. वैशाली ने सिगरेट जलाने के लिए अपना हाथ खींच लिया तब राजेश ने कहा "वैशाली, जब हम एक ही ब्रांड की सिगरेट पी रहे हो.. तो फिर दो अलग अलग जलाने की क्या जरूरत है? एक सिगरेट से ही पीते है ना.. !!"

वैशाली: "वैसे तो हम बियर भी एक ही ब्रांड की पी रहे है" हँसते हुए उसने कहा

राजेश: "अरे हाँ.. फिर दूसरे ग्लास की जरूरत ही नही है" कहते हुए उसने अपने हाथ का ग्लास छोड़ दिया.. ग्लास जमीन पर जा टकराया और चूर चूर हो गया.. सब की नजर उन दोनों की ओर गई.. उस दौरान रेणुका पीयूष की ओर देखकर मुस्कुरा रही थी.. कविता ये देखकर खुश थी की आखिर वैशाली पीयूष को छोड़ किसी और मर्द से उलझ चुकी थी.. हाँ पीयूष ये देखकर थोड़ा दुखी जरूर था.. पर उसका ज्यादा ध्यान मौसम की ओर था.. एक बार वो हाथ लग जाए फिर वैशाली की क्या जरूरत.. !!!

शराब और राजेश के स्पर्श का ऐसा असर हो रहा था वैशाली पर.. की वो खुद तय नही कर पा रही थी की उसके शरीर के अंदर ये अजीब सी सुरसुरी क्यों हो रही थी.. !! आज तक जीतने मर्दों के संपर्क में वह आई थी वो सामान्य लोग थे.. पहली बार उसे किसी अमीर और सफल बीजनेसमेन से संपर्क करने का मौका मिला था.. वैशाली सोचने लगी "काश संजय भी ऐसा होता" वैसे उसे बड़ी गाड़ी या बंगले की चाह नही थी.. वह तो सिर्फ इतना चाहती थी की संजय सीधी राह पर चलें.. और दोनों खुशी खुशी अपनी ज़िंदगी व्यतीत करें.. पर संजय के लक्षण देखते हुए यह मुमकिन नही लग रहा था..

वैशाली: "आप से एक बात पूछूँ सर?"

राजेश: "अरे वैशाली.. इतनी देर तक साथ बैठने के बाद तू अभी भी मुझे पराया मान रही है?? मैंने तो तुझे अपना समझकर अभी ओफर भी कर दी.. लेकिन तूने ध्यान नही दिया.. हा हा हा हा.. कोई बात नही.. पूछ जो भी पूछना हो"

वैशाली: "मेरा पति संजय जीतने भी बिजनेस करता है उन सब में निष्फल ही रहता है.. बिजनेस की बात छोडो.. किसी नौकरी में भी वो दो महीनों से ज्यादा नही टिकता.. और जब देखों तब वह अपनी निष्फलताओं के लिए दूसरों की ही जिम्मेदार ठहराता है.. ऐसा क्यों? क्या आप मेरी इसमें कोई मदद कर सकते है?"

राजेश के अंदर का बिजनेसमेन सोचने लगा " ऐसा है वैशाली.. तेरी बातों से मुझे ये लगता है की तेरा पति गलत संगत में पड़ गया है.. उसे लाइन पर लाने के लिए सब से पहले उसे उसके नालायक दोस्तों से अलग करना जरूरी है.. उसके बाद ही कुछ सोच सकते है.. अगर तुम चाहो तो मैं उसे अपनी कंपनी में ले सकता हूँ.. पर फिर उसे मेरे स्ट्रिक्ट स्वभाव को झेलना होगा.. मैं काम में कोताही जरा भी बर्दाश्त नही करता हूँ.. और हाँ.. उसके लिए तुम दोनों को कलकता छोड़कर यहाँ शिफ्ट भी होना पड़ेगा.. अगर तुम कलकत्ता रहोगी और वो यहाँ अकेला नौकरी करेगा तो फिर से अपने उलटे धंधे शुरू कर देगा "

राजेश सर की बातें बड़ी ही ध्यान से सुन रही थी वैशाली.. अपनी ज़िंदगी की गाड़ी को फिर से पटरी पर लाने के लिए कुछ करना जरूरी था.. राजेश सर जैसे अच्छे व्यक्ति की संगत में अगर संजय सुधार जाएँ तो पूरा जीवन सुखमय हो जाएगा.. ऐसा सोच रही वैशाली के स्तनों को देखते हुए राजेश मन ही मन उन्हे दबाने की सोच रहा था.. वैसे राजेश हर औरत को ऐसी नजर से देखने वालों में से नही था.. पर वो काफी खुले विचारों वाला था.. बार बार विदेश जाते हुए लोगों को कुछ कुछ बातों के लिए खुली सोच रखना बेहद जरूरी हो जाता है..

राजेश की भूखी नजराओं को अपनी छाती पर महसूस किया वैशाली ने.. अब कुदरत ने भरभरकर सौन्दर्य दिया है तो लोग देखेंगे ही ना!!! और उसने कौन सा अपने स्तनों को खुला रखा था!! कपड़ों से ढंके हुए तो थे उसके स्तन.. अब इससे ज्यादा उन्हे कैसे छुपाती.. !! जवान लड़कियों को शुरू शुरू में अपनी छातियों पर गंदी नजर डालने वालों से सख्त नफरत होती है.. गुस्सा भी बहोत आता है.. शर्म भी!! फिर धीरे धीरे आदत पड़ जाती है.. और काफी को तो वो नजरें अच्छी भी लगने लगती है..

अपने स्तनों को तांक रहे राजेश सर की नज़रों को इग्नोर कर उनकी वाणी और वर्तन पर फोकस कर रही थी वैशाली

"देखो वैशाली.. मेरी बात पर गौर करके देखना.. आपके सास और ससुर से भी डिस्कस कर लेना.. मोम-डेड से भी.. अगर सबको ठीक लगे तो तुम मेरी कंपनी जॉइन कर लो.. इसी बहाने तुम्हारे साथ रहने का मौका भी मिलेगा मुझे.. फ्रेंकली कहूँ तो आई लाइक यॉर कंपनी.. "

वैशाली: "आई लाइक यॉर कंपनी टू.. मैं जरूर इस बारे में सोचूँगी"

राजेश: "वैशाली.. माउंट आबू में हमारी इस मुलाकात को यादगार बनाने के लिए.. हमारी दोस्ती के पहले कदम की ओर जाते हुए.. क्या तुम मुझे एक किस दे सकती हो?"


वैसे तो वैशाली को ऐसा कोई परहेज नही था पर राजेश के साथ वह हर कदम फूँक फूँक कर रखना चाहती थी.. बहोत सी बातें जुड़ी थी राजेश के साथ..

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राजेश: "वैशाली.. माउंट आबू में हमारी इस मुलाकात को यादगार बनाने के लिए.. हमारी दोस्ती के पहले कदम की ओर जाते हुए.. क्या तुम मुझे एक किस दे सकती हो?"

वैसे तो वैशाली को ऐसा कोई परहेज नही था पर राजेश के साथ वह हर कदम फूँक फूँक कर रखना चाहती थी.. बहोत सी बातें जुड़ी थी राजेश के साथ..

वैशाली: "नो सर.. माफ कीजिए पर आप जो चाहते है वो मैं आपको नहीं दे पाऊँगी.. सॉरी"

राजेश: "कोई बात नहीं.. अगर तुम्हारा मन हो तो ही.. जबरदस्ती तो मैंने आज तक रेणुका से नही की.. डॉन्ट वरी.. कब से अकेले पी रही हो.. क्या तुम भूल गई की हम दोनों एक ही ग्लास से पी रहे है?"

वैशाली: "ओह.. सॉरी सर.. बातों बातों में भूल ही गई.. ये लीजिए ग्लास.. " वैशाली ने जब ग्लास देने के लिए अपना हाथ आगे किया.. तब राजेश ने उसकी हथेली को दबाते हुए कहा "बुरा मत मानना वैशाली.. पर अगर शराब का इतना भी असर न हो तो फिर पीना ही बेकार है.. तुम बहोत सेक्सी हो यार.. मैं अपने आप पर कंट्रोल नही रख पा रहा हूँ.. "

वैशाली को जिस बात का डर था वहीं हो रहा था.. राजेश सर उसकी ओर फिसलते जा रहे थे.. क्या करूँ?? खड़ी होकर चली जाऊँ?? तो उन्हे बुरा लगेगा.. उनकी कंपनी की पार्टी में.. उनके खर्चे पर यहाँ आई हूँ.. सिर्फ हाथ ही तो पकड़ा है.. चलता है.. !!

वैशाली: ओह्ह सर.. मेरे खयालात उतने पुराने भी नही है की आप मेरा हाथ न पकड़ सको.. मुझे भी अच्छा लगा"

दोनों के बीच अब तक ४ ग्लास बियर खतम हो चुकी थी.. और सिगरेट का पूरा एक पैकेट खतम हो चुका था.. और उस दरमियान राजेश वैशाली के हाथ तक पहुँच गया था.. वैशाली के गोरे कोमल हाथ को सहलाते हुए राजेश उसकी आँखों में आँखें डालकर देख रहा था.. वैशाली और ज्यादा देर तक उसका सामना नही कर पाई.. बार बार वह अपनी नजरें झुका लेती थी.. एक अजीब प्रकार का आकर्षण दिख रहा था उसे राजेश की आँखों में..

राजेश: "वाकई वैशाली.. तू बहोत सुंदर है.. तेरा फिगर भी जबरदस्त है.. जो भी देखें वो पागल हो जाएँ.. मैं भी आखिर एक मर्द हूँ.. ऊपर से माउंट आबू का ये मदहोश आलम.. साथ में शराब का नशा.. आज अगर रात को तेरा साथ मिल जाएँ तो हम दोनों की रात रंगीन हो जाएगी"

बियर के नशे में धुत होकर राजेश वैशाली को मना रहा था.. कविता पार्टी में अब भी अपने स्तनों की नुमाइश करते हुए यहाँ वहाँ घूम रही थी.. पीयूष और मौसम के नैन लड़ रहे थे.. फाल्गुनी और रेणुका किसी विषय पर गंभीर चर्चा कर रहे थे..

अपने फिगर की तारीफ सुनकर वैशाली फुली न समाई.. और वो भी किसी ऐरे गैरे इंसान से नही.. राजेश जैसे सफल और अमीर व्यक्ति के मुंह से..

पार्टी अपने पूरे रंग में थी.. हर कोई अपने अपने ढंगे से मजे कर रहा था..

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होटल से निकलकर इनोवा में बैठे ही संजय ने शीला को अपनी बाहों में भर लिया.. और उसके अंगों को अपने हाथों से रौंदने लगा.. शीला के मदमस्त स्तनों पर.. उसकी जांघों पर.. वो जगह जगह अपने हाथ फेर रहा था.. जैसे एक ही बार में वो शीला का पूरा जिस्म भोग लेना चाहता हो..

संजय: "मम्मी जी, यू आर सो हॉट.. आई लव योर सेक्सी बूब्स.. बस गोवा पहुँचने की देरी है.. मैं पूरी दुनिया को अपनी सास के उभार दिखाना चाहता हूँ.. "

शीला ने अपने दामाद के लंड को अपनी मुठ्ठी में पकड़ लिया.. और उत्तेजना पूर्वक मसल दिया.. एक ही झटके में उसने पेंट के अंदर से लंड बाहर निकाला और नीचे झुककर चूसने लगी.. संजय के बड़े अंडकोशों को अपनी मुठ्ठी में दबाकर वह उससे खेलती रही और कराहती रही.. ड्राइवर को गाड़ी के करीब आता हुआ देख दोनों ने अपने अंग छुपा लिए और चुपचाप बैठ गए.. और गाड़ी तेजी से गोवा की तरफ जाने लगी

गोवा की सरहद पर पहुंचते ही शीला रोमांचित हो गई.. एक आलीशान होटल में रहने का इंतेजाम किया था संजय ने.. उनके कमरे की बालकनी समंदर के किनारे पर थी.. होटल का अपना प्राइवेट बीच था.. देखती ही शीला का दिल खुश हो गया

संजय: "मम्मी जी, यहाँ हम दोनों अकेले है.. और यहाँ हमे कोई जानता भी नही है.. मैं आपको जबरदस्त आनंद और भरपूर रोमांच का अनुभव करवाना चाहता हूँ.. बस यह सब इन्जॉय करने के लिए आपको थोड़ा सा बिंदास होने की जरूरत है.. तभी आप यहाँ का पूरा आनंद ले पाएगी.. देखिए.. वो सामने खड़ी स्त्री कितनी बिंदास खड़ी है?"

शीला ने उस स्त्री की ओर देखा.. करीब ४० के उम्र की वह स्त्री.. लगभग नंगी सी थी.. उसकी बिकीनी इतनी छोटी थी.. जो केवल उसकी दोनों निप्पल और चूत की लकीर को ही छुपा रही थी.. बाकी सब देखने वालों के लाभ के लिए खुला छोड़ दिया गया था.. उसके हाथ में बियर की बोतल थी.. उसके स्तन की सम्पूर्ण गोलाई खुली नजर आ रही थी.. जैसे पूरी दुनिया को अपने नग्न अंग दिखाने के इरादे से ही उसने वैसी बिकीनी पहनी थी..

शीला बालकनी से जब उस स्त्री को एकटक देख रही थी तभी संजय ने उसे अपने आगोश में खींच लिया और पास की एक कुर्सी पर बैठ गया.. शीला को अपनी गोद में बैठा लिया.. शीला के स्तनों के उभारों पर हाथ फेरते हुए संजय उत्तेजित हो गया.. उसका लंड शीला की गांड पर चुभने लगा.. शीला की काँखों के अंदर से हाथ डालकर संजय ने दोनों स्तनों को मसल दिया.. और शीला का चेहरा मोड कर उसे किस करते हुए कान में कहने लगा "मम्मी जी.. अब तक आपने आपकी रसीली चूत के दर्शन नही करवाए.. खैर अब यहाँ आ ही गए है तो वो भी हो जाएंगे.. मुझे कोई जल्दी नही है.. अभी आप जल्दी से कपड़े चेंज कर लीजिए ताकि हम बीच पर जाकर मजे कर सके.. "

शीला: "पर बेटा.. मैं समंदर पर पहनने लायक कोई कपड़े लेकर ही नही आई हूँ.. मेरे पास तो सारी साड़ियाँ ही है.. मुझे कहाँ पता था की तुम मुझे गोवा ले जा रहे हो.. !! "

संजय: "अगर मैं आपको पहले बता देता की गोवा ले जा रहा हूँ.. तो क्या आप चलते मेरे साथ?" संजय ने अपने पेंट की चैन खोलकर लंड बाहर निकाला.. गोरे सख्त लंड को देखकर शीला के अंदर वासना का बवंडर उठ गया.. शीला संजय की गोद से खड़ी हो गई और बोली

शीला: "अब मैं क्या पहनु? साड़ी ही पहन लेती हूँ.. "

संजय: "साड़ी पहन कर भी कोई कभी बीच पर जाता है क्या!!! चलिए.. पास किसी स्टोर से आपको मस्त कपड़े दिलवाता हूँ"

दोनों बालकनी से चलते चलते समंदर किनारे बने एक छोटे से मार्केट पहुंचे.. चलते हुए शीला संजय से ऐसे चिपकी हुई थी जैसे हनीमून पर आई हो.. ऐसा करने में उसे कोई झिझक भी नही हुई.. आसपास का वातावरण ही कुछ ऐसा था.. अद्भुत और उन्मादक.. कई कपल्स ऐसी ऐसी हरकतें खुले में कर रहे थे.. की शीला काफी खुला खुला महसूस करने लगी.. कोई किस कर रहा था.. तो कोई खुलेआम स्तन दबा रहा था.. एक पेड़ के तने के पीछे खुलेआम लंड चुसाई चल रही थी.. !!!

एक स्टोर से संजय ने शीला के लिए एक मस्त पतला सा लो-कट टॉप और जीन्स की शॉर्ट्स खरीदी.. शॉर्ट्स तो इतनी छोटी थी की शीला की पूरी जांघ ही खुली नजर आयें.. और उसके आधे से ज्यादा चूतड़ बाहर ही लटकते रहे.. इतनी छोटी.. !!

शीला ने कृत्रिम क्रोध के साथ कहा "कैसे कपड़े लिए है बेटा.. ?? मैं क्या ऐसे कपड़े पहनूँगी? शर्म भी नही आती?"

संजय ने हँसते हुए कहा.. "मेरी जान.. तुझे तो मैं पूरे गोवा में नंगा घुमाना चाहता हूँ.. अब तय कर लो.. वैसे घूमना है या ये कपड़े पहनने है??"

शीला के बदन में कामुकता और हवस का बुखार सा चढ़ने लगा.. संजय भी जिस तरह "आप" से "तू" पर आ गया था.. शीला की चूत में अजीब सी चुनचुनी होने लगी थी.. उसके स्तन सख्त होकर तन गए थे.. कान लाल हो गए थे..

संजय: "तू अभी ट्रायलरूम में जाकर ये कपड़े पहन कर आ" उसने शीला को आदेश दिया

थोड़ी सी हिचकिचाहट के बाद शीला को आखिर मानना ही पड़ा.. वह जब ट्रायलरूम के बाहर आई तब देखने लायक द्रश्य था.. गोरा गदराया मांसल चरबीदार जिस्म.. पतला सा टॉप.. जिस में बिना ब्रा के खरबूजे जैसे स्तन साफ साफ दिख रहे थे.. टॉप इतना टाइट था की शीला डर रही थी की उसके स्तन कहीं टॉप को फाड़ न दे.. निप्पल भी उभरकर अपना आकार दिखा रही थी.. स्टोर में और जीतने भी लोग थे सब की नजर शीला पर चुंबक की तरह चिपक गई..






संजय ने काउन्टर पर बिल के पैसे चुकाये और शीला का हाथ पकड़कर बाहर निकला.. इतने उत्तेजक कपड़े पहनकर शीला आज पहली बार बाहर निकली थी.. उसके मदमस्त बड़े बबले बार बार साथ चल रहे संजय की कुहनी से टकराते हुए उसे उत्तेजित कर रहे थे..

किसी भी प्रकार के मेकअप के बगाई शीला अपने दामाद के साथ चलती जा रही थी.. दोनों की उम्र में करीब २५ वर्ष का फरक था.. देखने वाले सब आश्चर्य से इस जोड़ी को देख रहे थे.. सब सोच रहे थे की यह आखिर किस तरह की जोड़ी है?? अब तक शीला ने भी मन में यह तय कर लिया था की वह अपने दामाद के साथ खुल कर जिएगी.. और गोवा में मिली इस स्वतंत्रता का पूरा आनंद लेगी

शीला: "संजय बेटा.. एक सिगरेट जला कर दो मुझे" एक बंद दुकान के बाहर बैठते हुए उसने संजय से कहा.. शीला के उठते या बैठते उसके स्तन उछल-कूद कर रहे थे.. यह देखकर सामने खड़े एक अंग्रेज ने कहा "ओह वाऊ.. अमैज़िंग.. !!" हाथ में सिगार लिए वह शॉर्ट्स और लूज टीशर्ट पहने अपनी गर्लफ्रेंड के साथ खड़ा था.. दोनों के जिस्म काफी कसे हुए थे.. और ६ फिट से ज्यादा की लंबाई थी.. २८ के आसपास की उम्र.. शीला और संजय दोनों उनके तरफ देखने लगे.. उसकी फिरंगी गर्लफ्रेंड भी जबरदस्त सेक्सी थी..

"कितना गोरा है वो फिरंगी.. !!" शीला ने कहा..

"हाँ मम्मी जी.. तुम्हारे उछलते बॉल देखकर पागल हो गया.. साथ में जो लड़की है वो कितनी हॉट है.. देखो तो सही.. एकदम कच्चे कुँवारे स्तन है उसके.. कमर भी कितनी पतली है.. साली की चूत में एक धक्के में लंड डाल दु तो जान निकल जाए उसकी.. "

शीला: "बेटा.. उसके हाथ में जो सिगरेट है वो कितनी अलग है.. !!! मोटी सी"

संजय: "वो सिगरेट नही.. सिगार है.. विदेश में लोग ज्यादातर यही पीते है.. "

शीला: "यहाँ कहीं मिलेगी ऐसी सिगार? मुझे ट्राय करनी है"

संजय: "आपको सिगार ट्राय करनी है.. तो मुझे उस लड़की की चूत ट्राय करनी है.. किसी गोरी को एक बार दबाकर चोदने का बहोत मन है मुझे.. " संजय अपने लंड को दबाने लगा.. वह दोनों भी शीला की ओर देख रहे थे.. संजय का लंड उस गोरी के स्तन देखकर सख्त हो चुका था..

शीला: "लगता है की तुम्हारा खड़ा हो गया है.. इतनी पसंद आ गई तुम्हें? जो ओर किसी को ही देखना था तो मुझे साथ क्यों लाया?" शीला को स्त्री सहज ईर्षा होने लगी..

संजय: "आपको तो मैं होटल में ले जाकर अपने अनोखे अंदाज में चोदूँगा.. वो गोरा तुम्हारी चूचियों को देखकर कैसा पागल हो रहा है"

शीला: "यही तो मेरा मुख्य शस्त्र है बेटा.. मर्दों को इन स्तनों से कैसे पागल बनाना मुझे अच्छी तरह आता है.. तुम्हें उस रांड को देखकर जैसी उत्तेजना हो रही है वैसी ही कुछ उस गोरे को मेरे स्तन देखकर हो रही होगी.. अरे देखो.. वो दोनों हमारी तरफ ही आ रहे है.. कितना हेंडसम है ये लड़का.. इसका लंड कितना गोरा होगा.. हाय.. !!! मुझे तो उससे चुदवाने का मन कर रहा है संजु" शीला ने संजय के कंधे पर अपना सर रख दिया..

शीला और संजय दोनों बातें कर रहे थे तब वह जोड़ा उनके पास आ गया..

उस गोरे ने कहा "Hi.. I am John and this is my baby, Charlie.. We are from France.. You both are a nice looking couple.. and madam you are looking gorgeous" जॉन ने शीला के बॉल को नजदीक से देखते हुए अपने होंठ पर जीभ फेरते हुए कहा..

संजय तो चार्ली की कमर को देखकर बावरा हो गया.. पेड़ की पतली शाख जैसी कमर.. छोटे छोटे कूल्हें.. और पतले शरीर के मुकाबले बड़े स्तन.. बनियान जैसा कुछ पहन रखा था चार्ली ने.. साइड से उसके आधे स्तन तो बिना किसी प्रयत्न के ही दिख रहे थे..

संजय ने चार्ली से हाथ मिलाते हुए कहा "Nice to meet you Charlie.. I am Sanjay and this is Shila..She is neither my wife nor my girlfriend..so please don't ask about our relationship.. We are here to enjoy..Would you like to join us?"

चार्ली अपने दोस्त जॉन के सामने देखने लगी.. जॉन की आँखें तो शीला के स्तनों को देखते ही चकाचौंध हो चुकी थी

चार्ली ने जॉन से कहा "John, you remember? I told you about my fantasy!! I think this is a golden chance for me.. I don't want to miss this..Please help me to fulfill it darling..do something!!"

शीला और संजय स्तब्ध होकर उनकी बातें सुनते रहे.. शीला की चूत तो पानी छोड़ने लगी थी जॉन को देखकर.. वह दोनों किस बारे में बात कर रहे थे यह समझने में देर नही लगी संजय को.. पर उनकी अजीब अंग्रेजी को समझने में दिक्कत आ रही थी..

तभी दुकान के पास खड़ा एक आदमी चलते हुए उनके पास आया "साहब.. इनकी अंग्रेजी समझने में हेल्प करूँ आपकी? १०० रुपये लूँगा"

संजय ने तुरंत अपने वॉलेट से १०० का नोट निकालकर उसके हाथ में थमा दिया..

उस आदमी ने उन दोनों के साथ कुछ बात की और फिर कहा "सर, ये कपल आप लोगों के साथ वक्त गुजारना चाहता है.. और चार्ली मैडम का कहना ही की वह एक बार किसी इंडियन आदमी के साथ डेट पर जाना चाहती है.. अगर आप दोनों को एतराज न हो तो ये दोनों आप के साथ एक रात गुजारना चाहते है!!"

संजय को ऐसा लग रहा था जैसे स्वर्ग उतरकर धरती पर आ गया हो

संजय" मम्मी जी.. आप इस गोरे को लपेटना चाहती हो.. और मैं चार्ली को.. मेरा भी जबरदस्त मन कर रहा है विदेशी चूत को चोदने का.. "

शीला सोचने लगी.. ऐसे किसी अनजान आदमी के साथ कैसे चली जाऊँ?? कुछ ऊपर नीचे हो गया तो? मदन को क्या मुंह दिखाऊँगी? एक साथ कई विचार उसके दिमाग में एक साथ चल रहे थे..

तब जॉन उस आदमी से और कुछ बात करने लगा.. उसकी बात सुनकर वह आदमी संजय और शीला के पास आया और बोल

आदमी: "ये जॉन साहब ने मुझे जो कहा वोही मैं आपको बता रहा हूँ.. आप गुस्सा मत करना.. प्लीज.. ये तो मेरा काम है.. "

संजय: "हम बुरा नही मानेंगे.. "

आदमी ने शीला की ओर देखते हुए कहा "ये साहब कह रहे है की अगर आप उसके साथ एक रात गुजारेगी तो वो आपको १००० डॉलर देने के लिए तैयार है"

स्तब्ध हो गई शीला.. उसने संजय से कहा "बेटा.. तू इस लड़की के साथ जा.. मैं इसके साथ जाती हूँ.. ऐसा मौका दोबारा हमें कभी नही मिलेगा"

खुश होकर संजय ने जॉन के सामने ही चार्ली के गालों को सहलाया.. और उसका हाथ पकड़कर कहा "Let's go baby..!!

जॉन शीला के करीब आया.. अपनी सिगार शीला को देते हुए कहा : "Do you smoke?"

शीला ने मुस्कुराकर सिगार अपने हाथ में ली और एक बड़ा सा कश लगाया.. सिगार के धुएं के साथ दोनों ओजल हो गए.. जाते जाते शीला ने मुड़कर देखा.. उसका दामाद बीच बाजार में उस चिड़िया को चूमते हुए उसके स्तन दबा रहा था.. शीला को थोड़ी बहोत अंग्रेजी आती थी.. जॉन ने शीला का हाथ पकड़कर अपनी बगल में खींच लिया.. और चलने लगा.. शीला की गदराई कमर पर हाथ रखकर वह चल रहा था..

शीला और जॉन बारी बारी सिगार फूँक रहे थे.. जॉन शीला की कमर की चर्बी हाथ में पकड़कर उसे उकसा रहा था.. शीला के जिस्म एक अजीब प्रकार का रोमांच और उत्तेजना दौड़ने लगी.. दोनों केवल संभोग करने के इरादे से ही मिले थे.. इसलिए शीला ने सीधा बोल दिया..

शीला: "I don't want to waste time on the road.. so let's go to your room..I want you to take me there"

जॉन: "Oh really!!! You are so fucking hot bitch..!! Let's go honey.. I want to suck your pussy.. I want to taste Indian cunt too"

शीला: "I also want to taste white lund"

जॉन: "What did you say? Lund? What does it mean?"

शीला: "Lund means this...!!" कहते हुए शीला ने जॉन के लंड पर धीरे से चपत लगाई और हंसने लगी

जॉन: "Ohh you mean my dick..that is great.. Your smile is also fucking killer baby.." सिगार शीला के हाथ में थमाते हुए जॉन ने उसे अपने आगोश में खींचा.. चलते चलते वह दोनों एक खाली सड़क पर पहुँच गए.. आसपास कोई था नही.. जो एकाध थे वो कपल में थे और अपनी दुनिया में मस्त थे..

जॉन ने शीला के कंधों पर हाथ रखकर उसके टॉप के अंडर डाल दिया.. पहली बार उसने शीला की नंगी चूचियों का स्पर्श किया.. अंदर ब्रा तो थी नही.. जॉन के हाथ में शीला का अनमोल स्तन आ गया.. जॉन की आह्ह निकल गई.. स्तनों को दबाते हुए उसने कहा






जॉन: "My god..!! You Indians have such sexy boobies..I like your fucking huge titties..Shila.." अपने टिपिकल अंग्रेजी में वह बोला

शीला खुश हो गई.. सिगार का दम खींचते हुए वह बोली "John.. press my boobs hard..I like your hard touch on my boobs" कहते हुए शीला ने जॉन के अंदर घुसे हाथ को ऊपर से ही दबा दिया.. और बोली "John.. I want to see your cock right now..right here!!"

जॉन: "You mean my lund?"

शीला: "Yes..yes john.. I want to see your lund right here..so please show me now" एक सुमसान गली के कोने में वह जॉन को खींचकर ले गई.. जाते जाते उसने शॉर्ट्स के ऊपर से ही जॉन का लंड पकड़ लिया.. उसने महसूस किया की शॉर्ट्स के अंदर उसने कुछ नही पहना था.. उसका लंड खुला ही लटक रहा था.. शीला के हाथ में सीधा जॉन का डंडा आ गया.. शीला पकड़कर हिलाने लगी






जॉन: "Ohhh Shila.. you fucking bitch.. You are so hot..aahhhh!!"

उसके सख्त फिरंगी लंड को चड्डी के ऊपर से ही हिलाते हुए शीला इतनी उत्तेजित हो गई की वह ये भी भूल गई की वो लोग बाहर खड़े थे.. उसने चड्डी के अंदर हाथ डालकर जॉन के लंड की नोक पकड़ ली.. और उस फुले हुए सुपाड़े को उंगली से दबा दिया..

जॉन ने शीला को अपनी बाहों में दबोच कर एक जबरदस्त फ्रेंच किस कर दी.. उसकी चूमने की स्टाइल पर शीला फ़ीदा हो गई.. उस अंग्रेज ने बड़े ही आराम से शीला के निचले होंठ को चूसना जारी रखा.. शीला का जोबन अब सिहरने लगा था.. ब्लू फिल्मों को देखकर शीला हमेशा यह सपना देखती थी की कभी कोई गोरा उसे दबोच कर नंगी करके धमाधम चोद दे..आज उसका वो सपना साकार हो रहा था.. जॉन का लंड जबरदस्त सख्त हो गया था.. शीला उत्तेजित होकर उसकी चड्डी में हाथ डालकर उससे खेल रही थी.. शीला ने अब उसके अंडकोशों को भी मुठ्ठी में पकड़कर देखा.. मस्त गोलगप्पे जैसे थे उसके आँड..

"प्लीज जॉन.. बाहर निकालकर मुझे दिखा न.. !!" हिन्दी में बोली शीला.. जॉन को कुछ समझ में नही आया

किस तोड़कर जॉन ने पूछा "What??"

शीला को तब एहसास हुआ की उसे अंग्रेजी में बोलना था "Please, show me your big cock!!"

जॉन: "hey..not here..let's go to my room dear..let's go" हाथ पकड़कर उसने शीला को खींचा

"No John, I can wait anymore..Show me here and now" कहते हुए शीला घुटनों के बल बैठ गई और जॉन की चड्डी की मोरी से लंड को बाहर खींचने लगी.. जैसे बिल से चूहा बाहर निकलता है बिल्कुल वैसे ही जॉन के लंड का सुपाड़ा बाहर निकला.. जॉन की जांघों के बालों को चूमते हुए शीला ने उस सुपाड़े पर अपनी जीभ का स्पर्श किया..

"Ohh.. Shila, please don't do it here.. I can't control anymore" चड्डी के नीचे से हाथ डालकर उसके गोटों को मसल रही शीला से जॉन ने कहा.. पर शीला की हवस की आग इतनी तेज थी की वह अब बेकाबू हो चली थी.. उसने जॉन की बातों को इग्नोर करते हुए चड्डी को थोड़ा सा ओर ऊपर किया.. लगभग साढ़े तीन इंच जितना लंड बाहर निकल आया और बिना एक सेकंड गँवाए शीला ने लंड मुंह में ले लिया.. पीछे से हाथ डालकर उसने जॉन के कूल्हों को भी सहलाना शुरू कर दिया.. कूल्हों पर दबाव बनते ही जॉन शीला की ओर करीब आ गया.. और लंड थोड़ा सा और बाहर निकला.. वह हिस्सा भी शीला ने अपने मुंह के आगोश में भर लिया..






"Ohh..you fucking bitch..please stop!! Let's go to my room" पर शीला कहाँ सुनने वाली थी!!! जॉन के गोरे कूल्हों और जांघों पर हाथ फेरते हुए वह बदहवास होकर लंड चूस रही थी.. वह उत्तेजना से इतनी बेकाबू हो गई थी की चूसते चूसते एक बार तो उसने लंड पर आपने दांत गाड़ दिए.. जॉन ने अपने जीवन में आज तक इतनी कामुक स्त्री को नहीं देखा था.. वो बावरा होकर इस हिंसक शेरनी जैसी शीला का शिकार बनता रहा.. दंग रह गया वोह.. भारतीय स्त्री इतनी कामुक और उत्तेजित हो सकती है वो उसने सपने में भी नही सोचा था..

जॉन ने शीला को कंधे से पकड़कर खड़ा किया और अपने लंड को उसके मुंह के चूँगाल से छुड़ाया..शीला ने तुरंत अपना टॉप ऊपर करते हुए अपने अद्भुत स्तनों को जॉन की आँखों के सामने उजागर कर दिया.. और जॉन का चेहरा अपने स्तनों पर दबा दिया..






जॉन शीला के स्तनों की गोलाइयों में ऐसा खो गया की फ्रांस भी भूल गया.. दोनों स्तनों के बीच शीला ने ताकत से जॉन को दबोचे रखा था.. सांस लेने के लिए भी तड़पने लगा जॉन.. उसका लंड शीला के जिस्म की गर्मी के कारण अप-डाउन हो रहा था.. जैसे पानी से बाहर निकाली मछली फुदक रही हो.. शीला ने उसके फुदकते लंड को अपनी मुठ्ठी में पकड़ लिया और लंड की त्वचा को पीछे सरकाया.. उसका लाल गुलाबी सुपाड़ा बाहर दिखाई देने लगा.. शीला उस सुपाड़े को अपनी जांघों पर रगड़ने लगी.. जॉन लगातार शीला की निप्पलों को चूस रहा था.. इतनी मस्ती से चूस रहा था जैसे उनमें से दूध निकल रहा हो.. उसके लंड की सख्ती ये बता रही थी की उसे शीला की हर हरकत बेहद अच्छी लग रही थी.. शीला जो कुछ भी कर रही थी वह उसके अंदाजे और कल्पना के बाहर था..

अब शीला की चूत में जबरदस्त खुजली होने लगी.. उसकी सहनशक्ति जवाब देने लगी.. दोनों इतने उत्तेजित होकर एक दूसरे पर टूट पड़े थे जैसे खा जाना चाहते हो.. जॉन से कई ज्यादा आक्रामक शीला थी.. एक दीवार की आड़ में खड़े दोनों पूरे खुमार पर थे.. दीवार का सहारा लेकर शीला खड़ी हो गई और जॉन का चेहरा अपने जिस्म पर दबाते हुए बोली

शीला: "Ohh John dear..please suck my choot..I can't bear yaar" "चूत" शब्द का अर्थ तो जॉन नही समझ पाया पर उसे इतना पता चल गया की वह क्या कहना चाहती थी.. वह फिरंगी तुरंत अपने घुटनों के बल बैठ गया और शीला की छोटी सी चड्डी जैसी शॉर्ट्स को नीचे उतारकर उसकी चूत पर अपनी जीभ फेरने लगा.. चूत के दोनों होंठों को अपने होंठों के बीच दबाकर चूसने लगा..






शीला ने अपना दायाँ पैर ऊपर किया और जॉन के कंधे पर रख दिया.. जॉन के बालों को पकड़कर उसके चेहरे को अपनी चूत पर रौंद दिया.. दोनों एक दूसरे को आनंद देने में व्यस्त थे.. तभी संजय और चार्ली वहाँ से गुजरे.. शीला और जॉन को देखकर वह दोनों तुरंत उनके पास आ खड़े हुए..

जॉन की चुटकी लेते हुए चार्ली ने कहा "Hey John..what are you doing?" वह हंसने लगी

अपने स्तनों को खुद ही मसल रही शीला के पास जाकर संजय ने उसके एक स्तन को अपने कब्जे में ले लिया..

"मम्मी जी, आप तो सड़क पे ही शुरू हो गई!! क्या बात है.. अंग्रेज पसंद आ गया आपको.. " शीला संजय को बालों से खींचकर अपने करीब लाई और चूमने लगी.. शीला के खरबूजों जैसे स्तनों के बड़े आकार को देखकर चार्ली की आँखें फटी की फटी रह गई.. "Madam, you have got huge melons" शीला के दूसरे स्तनों पर हाथ फेरते हुए उसने कहा.. शीला की हवस गजब की थी.. उसकी दो जांघों के बीच जॉन चुसकियाँ लेते हुए चूत चाट रहा था.. शीला के भोसड़े से कामरस का अविरत प्रवाह बह रहा था.. चाट चाट कर थक गया था जॉन.. लेकिन शीला की चूत सूखने का नाम ही नही ले रही थी..

आखिर थककर जॉन ने "प्रोजेक्ट चूत सकिंग" अधूरा छोड़ दिया और खड़ा हो गया..


चार्ली को एक प्यारी किस देते हुए वह बोला "Honey, she is a real bitch..very hot lady..Let's go to room.. I can't bear anymore.. Sanjay, do you want to join us? Let's enjoy four-some! Charlie, I am damn sure you will have a great time with Shila too.. just try her once baby.. she is amazing!!"

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आखिर थककर जॉन ने "प्रोजेक्ट चूत सकिंग" अधूरा छोड़ दिया और खड़ा हो गया..

चार्ली को एक प्यारी किस देते हुए वह बोला "Honey, she is a real bitch..very hot lady..Let's go to room..I can't bear anymore..Sanjay, do you want to join us? Let's enjoy four-some! Charlie, I am damn sure you will have a great time with Shila too..just try her once baby.. she is amazing!!"

चार्ली जबरदस्त उत्तेजित हो गई "Ohh really..!! Hey Sanjay, lets go and join them.."

कार्यक्रम में मध्यांतर की घोषणा होते ही शीला ने अपनी चड्डी ऊपर की उसकी क्लिप बंद कर दी.. फिर वह जॉन का हाथ पकड़कर चलने लगी.. शीला इतनी उतावली होकर चल रही थी जैसे जॉन के लंड को जल्दी से जल्दी अपनी चूत में गटक लेना चाहती हो.. उसका दामाद संजय और चार्ली पीछे पीछे आ रहे थे..

संजय: "Charlie..just look at her huge hips..It is my wish to bang her with John"

"Ohhh...you mean in both the holes? चार्ली ने हँसते हुए कहा

"Yesss...!!" संजय ने जवाब दिया

"I will fuck her ass the whole night, Charlie!!" शीला के कूल्हों पर थप्पड़ लगाते हुए जॉन ने संजय से कहा

शीला को उनकी बातें ज्यादा समझ नही आ रही थी.. और उससे समझने में दिलचस्पी भी नही थी.. बातें करते हुए.. सिगार फूंकते हुए.. चारों लोग, जॉन और चार्ली की होटल पर पहुंचे.. संजय और शीला की होटल से थोड़ी दूरी पर थी इनकी होटल.. चारों कमरे में गए और दरवाजा अंदर से लोक कर लिया.. दरवाजा बंद होते ही सब की वासना के दरवाजे खुल गए.. चार्ली संजय से लिपट गई और संजय ने बिना वक्त गँवाए उसे तुरंत ही नंगा कर दिया.. शीला चार्ली के स्लिम और दाग रहित गोरे जिस्म को देखती ही रही.. बी.पी. में गोरी लड़कियों की जिस तरह की हरकतें उसने देखी थी वह सब उसकी आँखों के आगे तैरने लगी.. ब्लू फिल्मों में लेस्बियन सीन में चूत चटाई के द्रश्य देखकर अक्सर शीला का मन करता था की वह भी किसी गोरी रांड की चूत को चटकारे लेकर चाटे और अपनी भी उससे चटवाएं.. आज आखिर उस सपने को साकार करने का मौका मिलने वाला था.. शीला ने संजय के कान में कुछ कहा..

"अभी नही मम्मी जी, पहले मुझे ईसे मन भर कर चोद लेने दीजिए.. निवाला मुंह तक आ चुका है अब मैं और इंतज़ार करना नही चाहता.. एक बार तसल्ली से चोद लूँ फिर आप जो चाहो कर लेना इसके साथ" संजय ने कहा

हिन्दी में हो रही बातचीत में जॉन और चार्ली को क्या पता चलता ??? लेकिन तब तक चार्ली ने जॉन की चड्डी उतार दी थी.. जॉन की दोनों जांघों के बीच लटक रहे खूबसूरत फिरंगी गोरे लंड को देखकर शीला जैसे होश ही खो बैठी.. उसके लंड को पहली नजर में देखते ही उसे प्यार हो गया.. !! संजय को छोड़कर वह जॉन की तरफ मुड़ी.. वो जॉन के अर्ध-जागृत लंड को पकड़े इससे पहले चार्ली ने उसे पकड़ लिया.. और मुठ्ठी में पकड़कर हिलाने लगी..

जॉन: "Suck it baby...suck it hard like its your dad's cock.." यह सुनते ही चार्ली नीचे झुक गई और जॉन की आँखों में देखते हुए उसका लंड चूसने लगी.. शीला और संजय आश्चर्यचकित होकर इन दोनों को देखते रहे.. चार्ली ने जॉन के हाथ से सिगार लेकर एक लंबा कश लिया.. फिर बिना धुआँ बाहर निकाले वह लंड चूसने लगी.. थोड़ी ही देर में चार्ली के मुंह से अंदर बाहर निकल रहे लंड के साथ साथ धुआँ भी निकलने लगा.. बड़ा ही अनोखा द्रश्य था.. !!






चार्ली और जॉन की इन कामुक हरकतों को देखकर शीला अपने आपे से बाहर हो रही थी.. वह चार्ली की बगल में बैठ गई और जॉन के अंडकोशों को सहलाने लगी.. गोरे गोरे सुंदर अंडों से खेलते हुए शीला ने चार्ली की ओर देखा.. दोनों की नजरें एक हुई.. चार्ली को शीला की आँखों में एक अजीब सा आमंत्रण नजर आया.. और चुपचाप उस आमंत्रण का स्वीकार करे हुए वह शीला के सुंदर गालों को सहलाने लगी.. उसके बालों में उँगलियाँ फेरते हुए वह जॉन के लंड को चूसती रही.. चार्ली के एक हाथ में सिगार थी और दूसरे हाथ से वह शीला के अंगों को सहला रही थी.. शीला का बहोत मन कर रहा था जॉन का लंड चूसने को.. पर ये चार्ली छोड़े तब न!!





शीला की इस तकलीफ को संजय समझ गया.. वह धीरे से चलकर चार्ली के पास आया और अपने लंड से चार्ली का गाल सहलाने लगा.. वैसे संजय का लंड काला तो बिल्कुल नही था.. पर जॉन के लंड के गोरेपन के आगे गेहुआँ नजर आ रहा था.. चार्ली ने तुरंत जॉन का गीला लंड छोड़ दिया और संजय का लंड चूसने लगी.. जॉन के तंदूरस्त गोरे लंड को शीला ने हाथ में लेकर बड़े ध्यान से देखा.. उसके सख्ती की जांच की और फिर उस लोड़े को मुंह में लेकर चूसने लगी.. जब चार्ली चूस रही थी तब जॉन चुपचाप खड़ा था पर शीला ने जैसे ही मुंह में लिया उसकी सिसकारी निकल गई..

"Ohhhh yess..Ahhh..nice..Suck it baby.." जॉन सिसकने लगा.. शीला ने पहले तो आधा ही लंड चूसकर उसे थोड़ा तड़पाया.. फिर धीरे से उसने बाकी आधा लंड मुंह में लेते हुए उसके आँड दबा दिए.. शीला ने अभी अपने कपड़े उतारे नही थे.. लेकिन टाइट कपड़ों से उसके जिस्म का शानदार भूगोल आसानी से नजर आ रहा था.. टॉप से आधे बाहर लटक रहे उसके अद्भुत स्तन.. जॉन और चार्ली को पागल कर रहे थे.. चार्ली संजय के लंड को मस्ती से चूस रही थी..

शीला ने जॉन के लंड को पूरा चूसकर लाल कर दिया था.. आखिर उसने अपने मुंह की कैद से उस लंड को मुक्त किया.. नोक से लेकर मूल तक पूरा लंड शीला की लार से भीग चुका था.. शीला अब खड़ी होकर खुद ही अपने कपड़े उतारने लगी.. और मादरजात नंगी होकर फर्श पर लेट गई अपनी जांघों को चौड़ी करते हुए.. कमर को उठाकर वह अपने भोसड़े को जॉन के सामने प्रस्तुत कर रही थी..

शीला: "संजय बेटा.. मम्मी जी की चूत कौन पहले चाटेगा? मेरा दामाद या जॉन?" अपनी चिपचिपी चूत के दोनों होंठों को उंगलियों से अलग करते हुए अंदर के गुलाबी हिस्से को दिखाते हुए वह दोनों मर्दों को ललचाने लगी.. अपनी जिस्म की नुमाइश कैसे करनी वह शीला से बेहतर कोई नही जानता था.. जॉन यह देखते ही चीते की तरह शीला के भोसड़े पर झपट पड़ा.. बरसों से किसी अंग्रेज से अपनी चूत चटवाने की ख्वाहिश आज पूरी हो रही थी.. जॉन को कानों से पकड़कर शीला ने खींचा और उसके मुंह को अपनी चुत के एकदम करीब ले आई..






जॉन भी कारीगर था.. शीला को खुश करने में उसने कोई कसर नही छोड़ी.. जितनी अंदर घुस सकती थी उतनी अंदर जीभ डालकर उसने शीला की चूत को कुरेद दिया.. कभी वह अपनी हथेली में शीला के सम्पूर्ण भोसड़े को पकड़कर दबाता तो कभी वह उसकी क्लिटोरिस को जीभ और होंठों के बीच दबाकर चूसता.. तरह तरह की आवाज़ें निकालते हुए वह शीला की चिकनी चूत के मजे ले रहा था.. शीला अपनी कमर उठा उठा कर जॉन के मुंह से अपनी चूत रगड़ते जा रही थी.. इतने भारी शरीर वाली शीला की चपलता देखने लायक थी.. बेहद उत्तेजित होकर शीला ने जॉन का हाथ खींचकर उसे अपनी ओर ले लिया.. असंतुलित होकर जॉन शीला के नरम तकिये जैसे स्तनों के ऊपर गिर पड़ा.. शीला ने जॉन को अपनी बाहों में भरकर चूम लिया.. जॉन भी भूखे भेड़िये की तरह शीला पर टूट पड़ा..

शीला ने अपना हाथ नीचे डाला और जॉन का लंड पकड़कर अपनी फड़क रही चुत के सेंटर पर लगा दिया.. जॉन धक्का दे उससे पहले शीला ने ही नीचे से कमर उचक कर जॉन के लंड को अपनी चुत की गहरी गुफा में लापता कर दिया.. और फिर जॉन को अपनी बाहों में भरते हुए उसने पलटी मारी.. अब जॉन नीचे फर्श पर लेट गया और शीला उसपर सवार हो गई.. जॉन पर सवार होकर शीला ऐसे चोदने लगी.. जैसे अंग्रेजों की गुलामी का बदला ले रही हो..






"Ohh..ohhh..stop it you bitch!!" जॉन चिल्लाने लगा.. पर शीला ने शताब्दी एक्स्प्रेस जैसी स्पीड पकड़ ली थी.. चोदते वक्त शीला खूंखार शेरनी का रूप धारण कर लेती थी.. अपना ऑर्गजम पाने के लिए वह किसी भी हद तक जा सकती थी.. जॉन के चिल्लाने पर ध्यान न देते हुए.. शीला लगातार २० से २५ मिनट तक फूल स्पीड में कूदती ही गई.. जॉन के लंड ने तो कब से इस्तीफा दे दिया था.. क्योंकि जब शीला ठंडी होकर जॉन पर से उतरी तब उसकी गहरी गुफा से जॉन का लंड मरी हुई छिपकली की तरह बाहर निकला.. नीचे उतरते ही शीला जॉन के बगल में लेटकर गहरी सांसें भरते हुए अपनी थकान उतार रही थी.. उसके हांफने से ऊपर नीचे होती हुई उसकी छातियों को देखकर स्तब्ध रह गया जॉन.. उसका दिल तो कर रहा था की वह उसकी चूचियों को मसलें.. पर थोड़ी देर पहले ही शीला ने उसे जिस तरह रीमाँड़ पर लिया था वह देखकर उसे फिर से उत्तेजित करने की हिम्मत नही हो रही थी उसकी..

यह द्रश्य देखकर मन ही मन मुस्कुरा रहा था संजय.. उसे अपनी सेक्सी सास पर गर्व महसूस हो रहा था.. चार्ली को काँखों के नीचे से उठाते हुए संजय ने उसे उठा लिया.. और पूरे कमरे में घूमते हुए उसे किस करने लगा.. जॉन के शॉर्ट्स की जेब से शीला ने किंग एडवर्ड सिगार निकाली और उसे जलाकर एक के ऊपर एक दम लगाने लगी.. नशा सा होने लगा उसे.. अलग ही दुनिया में खो गई वो.. उसकी आँखें बंद हो गई.. उसके हाथ से जब जॉन ने सिगार खींच ली तब उसकी आँखें खुली.. संजय की कमर के इर्दगिर्द अपने पैरों की कुंडली लगाए हुए चार्ली छोटे बच्चे की तरह लटकी हुई थी.. उसकी जांघों के ठीक नीचे.. संजय का आठ इंच लंबा विकराल लंड.. चूत की गंध सूंघते हुए छेद ढूंढ रहा था.. चार्ली के स्तन, संजय की मर्दाना छाती से दबकर समोसे से कचौड़ी बन गए थे..






संजय के गले में बाहें डालकर चार्ली ऐसे झूल रही थी जैसे डाली पर आम लटक रहा हो.. एक दुसरें को कामुक चुम्बन करते हुए वह अलग अलग अंगों को मसल रहे थे.. चार्ली के सुन्दर गोरे कूल्हें संजय के लंड पर ठोकर मार मारकर यह कह रहे थे की जल्दी करो.. अब और सहा नही जाता!!

संजय ने चार्ली को बिस्तर पर पटक दिया.. डनलॉप के नरम गद्दे पर पटकते ही चार्ली एक फिट जितना ऊपर उछली और साथ में उसके स्तन भी!! नजदीक से देख रही शीला ने जॉन को इशारा किया "Let us join them"

"Not now Shila..I will have to take some rest!!"
जॉन ने अपनी असमर्थता जाहीर की

शीला अंगड़ाई लेते हुए खड़ी हुई.. फर्श पर लेते हुए जॉन ने शीला के भरे भरे कटहल जैसे स्तनों को देखा और देखता ही रह गया.. शीला के अद्भुत संगेमरमरी कूल्हें.. स्तम्भ जैसी जांघें.. चरबीदार लचकती कमर और चिड़िया घोंसला बना सके वैसी गहरी नाभि.. शीला खतरनाक मूड में लग रही थी.. दोनों जंघाए चौड़ी कर वो जॉन की चेहरे पर बैठ गई..अपनी चूत के होंठों को अलग करते हुए उसने जॉन के होंठों पर उसे लगा दिया.. चाटने के अलावा जॉन के पास कोई चारा नही था.. दो तीन मिनट तक चूत चटवाने के बाद शीला ने एक नजर जॉन के लंड पर डाली.. पोस्टमॉर्टम रूम में पड़ी लावारिस लाश की तरह जॉन का लंड पड़ा हुआ था..








शीला का मुंह बिगड़ गया.. वह उठकर बेड पर चली गई.. जहां चार्ली और संजय दोनों एक दूसरे के संग खेल रहे थे.. चार्ली संजय के लंड को हिला रही थी और संजय चार्ली की संकरी चूत में उंगली डालते हुए उसके मम्मे चूस रहा था.. चूत में उंगली डालकर उसे चौड़ी कर रहा था संजय.. ताकि उसके तगड़े लंड को वो झेल सके.. संकरी चुत में दो उंगली जाते ही चार्ली दर्द से सिसक उठी..

शीला ने पहले दोनों का दूर से ही निरीक्षण किया.. वह जॉइन होना चाहती थी पर मौका देखकर.. धीरे से वह चार्ली की बगल में लेट गई.. और चार्ली के मुंह को अपनी ओर खींचकर और गोरे फिरंगी होंठों पर अपने देसी होंठ लगा दिए.. कामुक चुंबन करते हुए शीला चार्ली के जीभ से अपनी जीभ लड़ा रही थी.. कभी चार्ली की जीभ को लंड की तरह चूस लेती.. तो कभी उसके मुंह के भीतर तक अपनी जीभ घुसा देती.. दोनों अब बेहद गरम हो गई थी.. चार्ली ने अपनी हथेली में शीला के एक स्तन को पकड़ने की नाकाम कोशिश करके देखा.. पर पहाड़ जैसी चुची, हथेली में भला कैसे समाती.. !!! शीला के नरम गुदगुदे मांस के गोलों चार्ली बड़ी ही मस्ती से दबाते हुए दूसरे हाथ से संजय के लंड के साथ खेल रही थी..

"Ohh Shila...suck my cunt, please!!" चार्ली ने शीला से कहा

शीला ने संजय का हाथ चार्ली की चिकनी बालरहित बुर से हटा दिया.. और संजय की उंगली पर लगे चार्ली के चुत के गाढ़े अमृतरस को चाटकर अपने दामाद की उंगलियों को संपूर्णतः सेनीटाइज़ कर दिया.. थोड़ा सा ऊपर उठकर उसने अपने दामाद को होंठों को चूम लिया.. एक गजब की कशिश थी शीला के अंदाज में.. शीला के चुंबन से संजय जबरदस्त गरम हो गया.. और आक्रामकता से चार्ली के स्तनों को आटे की तरह गूँदने लगा..

शीला ने चार्ली की दोनों जांघों को जरूरत के हिसाब से चौड़ा किया.. और इसकी गोरी जांघों को चाटने लगी.. संजय का सख्त लंड देखकर उस खूँटे को अपनी चुत में महसूस करने की अदम्य इच्छा हो रही थी शीला के मन में.. पर संजय के लंड के मजे तो वो जब चाहे ले सकती थी.. उसने चार्ली की चुत का अब करीब से निरीक्षण किया.. उसकी गुलाबी क्लिटोरिस को अपनी उंगली से कुरेदा.. होंठों को अलग किया.. और फिर चार्ली की गांड के नीचे तकिया सटा दिया.. चार्ली की चूत वडापाँव की तरह उभर कर बाहर आ गई..

शीला ने पहले तो चार्ली की पूरी चूत को अपने मुंह में भरकर देखा.. चार्ली की आँखें बंद हो गई और उसकी कमर ऊपर उठ गई..

"Ohhh my...you are sucking so good..suck my cunt very hard, Shila..Ohh yes..ohh no..yeah..right there..yes yess..aaahhh!!" चार्ली की इन आवाजों से पूरा कमरा गूंज उठा.. कमर को उठाकर शीला डोगी स्टाइल में सेट होकर चार्ली की चूत चाटने लगी..






जब वह चाटने में व्यस्त थी तब संजय उठकर शीला के पीछे से आया और उसके गोलमटोल चूतड़ों को चौड़ा कर शीला की गांड और चूत के छेद का निरीक्षण करने लगा.. अपने चूतड़ों पर मर्दाना हाथ का स्पर्श पाते ही शीला की गांड थिरकने लगी.. गोल गोल क्लॉकवाइज़ घुमाने लगी.. अपनी सास के बादामी रंग के गांड के छेद को देखकर संजय को वैशाली के छेद की याद आ गई.. माँ बेटी दोनों के गांड के छेद बिल्कुल एक जैसे ही थे..

वैशाली के विचारों को अपने दिमाग से निकालकर संजय ने शीला की गांड के उस टाइट छेद में.. अपनी गीली उंगली डालने का प्रयास किया.. बेहद टाइट था वो होल.. !! और क्यों न हो!! मदन के जाने के बाद किसी ने शीला के इस छेद को छेड़ा नही था.. !! अपनी गांड में घुसी दामदजी की उंगली आनंद दे रही थी शीला को.. चार्ली से किस कर रही शीला ने उसे मुक्त किया और बोली

"संजय बेटा.. उंगली छोड़.. अंगूठा डाल.. बड़ी तेज खुजली हो रही है अंदर" शीला की इस बात से उत्साहित होकर संजय ने अंगूठा अंदर डाल दिया.. अंगूठा अंदर घुसते ही शीला बेकाबू हो गई और उसने चार्ली की चूत में एक साथ तीन उँगलियाँ डाल दी..

"Ohh my god...it is paining..please remove the fingers, Shila!!" चार्ली की फट गई.. शीला ने उसकी चूत से एक उंगली निकाली और उसकी गांड में डाल दी.. चार्ली की चुत चाटते हुए शीला उसकी नाभि तक पहुँच गई.. और उसके सपाट पेट के गोरे हिस्सों को चाटने लगी.. वह और ऊपर की तरफ आई.. अब दोनों के स्तन एक के ऊपर एक हो गए थे.. निप्पलों के बीच छेड़खानियाँ हो रही थी.. शीला की वासना ज्वार की लहरों की तरह उछलने लगी.. शीला की भरावदार छाती के तले चार्ली के छोटे स्तन दबकर रह गए.. इतना अद्भुत सीन था की देखते ही किसी का भी पानी छूट जाए..

शीला के तंदूरस्त स्तनों का सौन्दर्य.. और चार्ली के जवान सख्त उरोज जब एक हो जाएँ.. तो कितना अनोखा द्रश्य होगा!! संजय ने अब दूसरे हाथ का अंगूठा भी शीला की गांड में डाल दिया था.. दर्द और आनंद के मिश्रण से शीला की गांड गोल गोल घूम रही थी.. शीला फिर से नीचे की ओर आई और अपनी जीभ से चार्ली की नाजुक चुत को टटोलने लगी.. चार्ली की चुत काफी तंग थी.. ज्यादा इस्तेमाल नही हुई थी शायद.. हाथ ऊपर ले जाकर शीला उसके सख्त उरोजों को मसल रही थी.. चार्ली ने भी उत्तेजना से शीला के हाथों को पकड़कर अपने स्तनों आर दबाए रखा था.. संजय अपनी सासुमा के पीछे के छेद को कुरेदने में व्यस्त था.. अपनी सास के इस खास अंग को बड़ी उत्सुकता और उत्तेजना से देखते हुए संजय का लंड झटके कहा रहा था.. इतना सख्त हो चुका था की संजय से रहा नही जा रहा था..

दोनों अंगूठे बाहर निकालकर संजय ने अपने सुपाड़े पर थोड़ा सा थूक लगाया और टोपे को शीला की गांड के छेद पर टीका दिया.. थोड़ी देर तक सुपाड़े से छेद को रगड़ने के बाद उसने बिल्कुल मध्य में रखकर दबाया..

शीला: "आह्ह बेटा.. नही जाएगा अंदर.. !!" संजय ने फिर से थोड़ा सा दबाव दिया.. बड़ी मुसीबत से केवल उसका आधा सुपाड़ा छेद के अंदर जा पाया.. शीला का पूरा बदन कांपने लगा "ओह बेटा.. निकाल दे बाहर.. और आगे डाल दे.. ज्यादा मज़ा आएगा" शीला कराहने लगी

संजय ने एक न सुनी और थोड़ा सा और दबाया.. इस बार उसका टमाटर जैसा सुपाड़ा टाइट छेद के अंदर चला गया






शीला: "संजु.. आह्ह.. मर गई बेटा.. बहोत दर्द हो रहा है मुझे.. प्लीज बाहर निकाल ले"

संजय: "ओहह मम्मी जी.. कितनी टाइट और मस्त है आपकी गांड.. मेरे लंड पर जबरदस्त दबाव बना रहा है आपका छेद.. बहोत मज़ा आ रहा है.. प्लीज एक बार मुझे आपकी गांड मार लेने दीजिए.. जब जब आपके गदराए जिस्म की याद आती थी तब तब मैं वैशाली की गांड मारकर अपनी इच्छा को शांत कर लेता था.. प्लीज आज मना मत करना.. आपकी चूत से ज्यादा तो गांड में गर्मी है मम्मी जी.. ओहहह आह्ह.. " काफी दबाने के बाद मुश्किल से आधा ही लंड घुसा पाया अंदर

शीला को अब जबरदस्त दर्द हो रहा था.. ए.सी. कमरे में भी उसके पसीने छूट रहे थे..उसके दोनों लटकते हुए स्तन चार्ली के घुटनों से टकरा रहे थे.. शीला ने चार्ली की चुत चाटना छोड़कर अपनी गांद के दर्द पर ही ध्यान केंद्रित किया.. चार्ली शीला के नीचे से निकल कर बाहर आई और सीधे जॉन के पास पहुँच गई.. जॉन तो केवल दर्शक बनकर यह सारा खेल देख रहा था.. संजय और शीला की इस असाधारण मुहिम को बड़ी ही दिलचस्पी से देख रहा था.. धीरे धीरे उसका लंड हरकत करने लगा.. आधे-सख्त हुए उस लंड को चार्ली ने पकड़कर कहा "John, fuck me now.. Shila sucked my cunt really good..I enjoyed like never before..Now I need a cock deep in my pussy..please fuck me hard" कहते हुए वह जॉन के लंड को चूसकर पूरा सख्त करने में जुट गई.. दो ही मिनट में जॉन का लंड कडा हो गया..

चार्ली अब नीचे लेट गई और बोली "Don't waste time..now climb on me..and fuck the shit out of my pussy"

जॉन ने चार्ली के पास से हटकर खड़ा हो गया और बिस्तर पर आ गया.. संजय अपना आधा लंड शीला की गांड में डालकर दर्द कम होने का इंतज़ार कर रहा था.. घोड़ी बनी शीला के नीचे जॉन संभलकर घुस गया और शीला के नीचे अपने आपको सेट कर लिया.. धीरे से उसने अपने लंड को नीचे से ही शीला की चूत के छेद पर सेट किया.. और अपनी कमर उठाकर एक धक्का लगाया.. शीला की चूत तो कब से बेकरार थी.. लंड को एक पल में ही निगल गई.. !!!






दो दो लंडों के एक साथ हुए हमले से शीला उत्तेजित हो गई.. सिर्फ ब्लू-फिल्मों में ही देखे इस द्रश्य को आज वह वाकई अनुभावित कर रही थी.. संजय अभी भी स्थिर था.. लेकिन जॉन ने नीचे से हुचक हुचक कर शॉट लगाने शुरू कर दिए थे.. चिपचिपे भोसड़े में लंड का स्पर्श इतना सुहाना लग रहा था की शीला सिहरने लगी.. चार्ली भी अब बेड पर आ गई.. और शीला की पीठ पर सवारी करते हुए वह संजय के बिलकूल सामने आ गई.. और संजय को चूमने लगी.. लिप किस करते हुए संजय चार्ली के स्तनों को भी दबाने लगा था.. दबाते हुए वह इतना गरम हो गया की उसने एक जोरदार धक्का लगाते हुए अपना पूरा लंड शीला की गांड में घुसेड़ दिया !!!

शीला: "ओहह माँ.. मर गई.. फट गई मेरी तो.. बाहर निकाल संजय.. ऊईई माँ.. !!" शीला को एक पल के लिए ऐसा लगा की उसकी जान ही निकल गई थी.. इतना दर्द हो रहा था.. लेकिन संजय और जॉन.. शीला की चीखो को नजर अंदाज करते हुए ऐसे शॉट लगा रहे थे जैसे शीला की इस ट्रिप को यादगार बना देना चाहते हो.. एक साथ दो दो जानदार लंडों से युद्ध खेल रही शीला को शुरुआत में भयंकर दर्द हुआ.. पर धीरे धीरे गांड की मांसपेशियाँ ढीली पड़ने लगी और दर्द काम होते ही उसे मज़ा आने लगा.. नीचे चूत में हो रही अंधाधुन चुदाई से मिल रहे आनंद के कारण भी उसका दर्द कम हो रहा था

दोनों लंड एक साथ अंदर डालना कठिन था.. जब संजय गांड में डालता तब जॉन चूत से बाहर निकालता और जब उसके अंदर डालते ही संजय खींच लेता.. एक अनोखी लय बना ली थी दोनों ने शीला को चोदते हुए.. एक उस्ताद तबलची जैसे दोनों तबलों को लय और सुर में एक साथ बजाता है वैसे ही अनुभवी शीला इन दोनों मर्दों के दमदार हथियारों को अपने दोनों छेदों में लेते हुए मस्त होकर चुद रही थी..






शीला की गांड मारते हुए संजय.. शीला पर घोड़ी बनकर बैठी हुई चार्ली की निप्पलों को चूस रहा था.. चूसचूसकर उन गुलाबी निप्पलों का रंग लाल हो गया था.. चार्ली के स्तनों पर कई जगह संजय के काटने से निशान भी पड़ गए थे.. शीला के नीचे लेटा हुआ जॉन.. आगे पीछे हो रही शीला के हिल रहे मदमस्त चूचों को बस देखता ही जा रहा था.. दोनों हाथों से उन स्तनों को पकड़ना मुमकिन नही था.. इतने गदराए मांसल बड़े बड़े स्तनों को अपने ऊपर झूलता हुआ देख वह वासना की आग में अपने आप को समर्पित कर रहा था

सासुमाँ की चूत चोदने का ख्वाब देख रहे संजय को चुत से पहले उनकी गांड मिल गई.. अपने आप को खुशकिस्मत समझ रहा था वोह.. वैशाली की जब गांड मारने की वह कोशिश करता तब उसे मनाने में ही एक घंटा निकल जाता.. तकिये पर उसका मुंह दबाकर फिर गांड में डालना पड़ता वरना उसकी चीखें सुनकर पूरा मोहल्ला इकठ्ठा हो जाने का डर रहता.. अंदर डालने के बाद एक मिनट से ज्यादा मारने नही देती थी वैशाली.. और एक बार गांड मारने के बाद तीन से चार दिन तक अपने नजदीक भी नही आने देती थी.. और उसकी माँ को देखो.. खुशी खुशी एक साथ गांड और चूत मरवा रही है.. !!

शीला: "अब दर्द एकदम कम हो गया.. जरा जोर से धक्के मार.. आज तो फाड़ ही दे मेरी.. बहोत मज़ा आ रहा है मुझे.. छील रही है मेरी गांड फिर भी मज़ा आ रहा है.. आह्ह ओहह देख क्या रहा है भड़वे.. चोद मेरी गांड.. लगा ताकत!! इतना जल्दी थक गया क्या साले!!" ऑर्गजम करीब आते ही शीला हिंसक होने लगी.. वह ढीले धक्कों को बर्दाश्त नही कर पा रही थी.. नाव को किनारे पर पहुंचना हो तो पतवार तेज लगानी पड़ती है.. थका हुआ माँजी की नाव को किनारे नही लगा सकता..

"ओहह मम्मी जी.. मेरा निकलने को है.. " संजय ने अपना इस्तीफा तैयार कर लिया.. शीला के कूल्हों से संजय की जांघें टकराकर पक्क पक्क की मस्त आवाज़े आ रही थी.. इतना ही नही.. नीचे से धक्के लगा रहे जॉन और संजय के गीले आँड टकराने से भी आवाज आ रही थी.. शीला की गांड में अचानक गरम गरम लावारस छूटा.. संजय ने धक्के लगाना बंद कर दिया.. और एक आखिरी बार जोर लगाते हुए अपने लंड को शीला की गांड की खाई में गाड़ दिया.. संजय ठंडा हो गया.. लेकिन शीला अभी भी पाँवभाजी के तवे की तरह गरम थी..

एक साथ दो तंदूरस्त जानदार लंड के धक्के खाते हुए शीला की हवस उफान पर चढ़ी हुई थी.. उसने कभी नही सोचा था की बी.पी. में देखी हुई हरकतें उसे वाकई अपने जिस्म के साथ करने का मौका मिलेगा.. शीला के भोसड़े की गर्मी से जॉन का लंड ढीला पड़ने लगा था.. उसके धक्कों में अब जान नही बची थी.. गांड में वीर्यस्त्राव हो जाने के बाद वह छेद एकदम लसलसित हो गया था.. संजय अपने आधे मुरझाए लंड से भी आसानी से धक्के लगाए जा रहा था.. शीला भी अपने दामाद के संग गोवा की इस ट्रिप का पूरा लाभ उठा रही थी..






एक घंटे के भीषण एनकाउंटर के बाद.. कमरे में सन्नाटा छा गया था.. जॉन और संजय लाश की तरह बिस्तर की एक तरफ पड़े हुए थे.. चार्ली नाम की चिड़िया.. शीला की पुख्त भुजाओं में सिमटकर छोटे बच्चे की तरह आराम से सो रही थी.. शीला की गांड में जलन हो रही थी.. नजदीक पड़े सिगार का पैकेट खोला तो वह खाली था.. शीला ने.. अकेले ही.. अपने बलबूते पर.. जॉन, संजय, चार्ली और सिगार.. सब को खाली कर दिया था.. आराम करते हुए एकाध घंटा और बीत गया..

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एक घंटे के भीषण एनकाउंटर के बाद.. कमरे में सन्नाटा छा गया था.. जॉन और संजय लाश की तरह बिस्तर की एक तरफ पड़े हुए थे.. चार्ली नाम की चिड़िया.. शीला की पुख्त भुजाओं में सिमटकर छोटे बच्चे की तरह आराम से सो रही थी.. शीला की गांड में जलन हो रही थी.. नजदीक पड़े सिगार का पैकेट खोला तो वह खाली था.. शीला ने.. अकेले ही.. अपने बलबूते पर.. जॉन, संजय, चार्ली और सिगार.. सब को खाली कर दिया था.. आराम करते हुए एकाध घंटा और बीत गया..

रात के लगभग साढ़े आठ बज चुके थे.. शीला की सुस्ती अब भी कम नही हो रही थी.. संजय कपड़े पहन कर अपनी पसंद की सिगरेट लेने बाहर गया.. और जॉन बाथरूम में नहाने चला गया था.. चार्ली नंगे बदन सो रही थी.. उसकी साँसों के साथ स्तन ऊपर नीचे हो रहे थे.. देखते ही शीला को अपनी जवानी के दिनों की याद आ गई.. तब उसके स्तन भी ऐसी मध्यम कद के और सख्त थे.. निप्पल तो जैसे थी ही नही.. कुंवारी लड़कियों के स्तन बड़े नाजुक होते है.. मर्द का हाथ पड़ते ही उसका आकार बदलने लगता है..

मदन के साथ जब उसकी सगाई हुई.. उससे पहले शीला के स्तन बिल्कुल अनछुए थे.. जब वह स्कूल में पढ़ती थी तब उसके स्तन सब से बड़े थे.. सारे लड़के टकटकी लगाकर देखते तब उसे बहोत शर्म आती थी.. अपने स्तनों की सुंदरता से आज तक उसने कई मर्दों को अपनी उंगलियों पर नचाया था.. शीला के स्कूल के शिक्षक भी मौका मिलते ही शीला के कुँवारे उरोजों को तांकते रहते.. ये सब बातें याद आते ही मुस्कुराने लगी शीला..

तभी चार्ली ने आँखें खोली.. शीला के नग्न नरम उभारों पर हाथ फेरते हुए उसने शीला की गर्दन पर किस कर दी.. शीला ने भी चार्ली के स्तनों को मसल दिया.. दोनों एक दूसरे के साथ खेलते हुए खड़े हुए.. तभी जॉन बाथरूम से नहाकर नंगा बाहर निकला.. उसके पिचके हुए नरम लंड को तिरस्कार भरी नज़रों से देख रही थी शीला.. शीला को सिर्फ सख्त लंड पसंद थे..

चार्ली ने जॉन से पूछा.. "Honey..did you enjoy it or not? I loved fucking with Sanjay.. I like Indian cocks.. They are quite hard and strong..much harder than your cock..!!"

"Yeah darling.. Indian pussy is also too hot to handle definately.. This has been the most memorable fucking experience, I ever had"

तभी हाथ में सिगरेट का पैकेट लिए हुए संजय कमरे के अंदर आया.. सिगरेट के साथ साथ वह वोड्का की बोतल भी साथ ले आया था.. साथ में बाइटिंग के लिए कुछ सामान भी था.. उसने फोन करके ४ ग्लास मँगवाए.. और सब का लाइट पेग बनाया.. चारों लोग आराम से पीने लगे और उस पेग को खतम किया.. अब अलग होने का समय आ चुका था.. शीला ने अपने कपड़े पहने.. और बड़े प्यार से उसने जॉन और चार्ली को एक किस करते हुए अलविदा कहा..

होटल से बाहर निकलकर चलते चलते वह दोनों अपने होटल के कमरे में पहुंचे.. थककर संजय ने अपना पेंट उतारा और बिस्तर पर बैठ गया और शीला उसकी गोद में..






शीला: "राजा.. आज तो तेरी सुहागरात है.. अपनी सास के संग इस रात को यादगार बना देना.. मुझे इतना चोद.. इतना चोद की मेरी जन्मों की प्यास बुझ जाएँ.. मैं बहोत तरसी हूँ बेटा..!!"

संजय: "मम्मी जी, आपकी प्यास का तो मुझे उसी दिन पता चल गया था जिस दिन मैंने आपको पेड़ के तने से चूत रगड़ते हुए देखा था.. तभी में समझ गया था की पापा जी की गैर मौजूदगी में आप कितना तड़प रही थी"

शीला ने चोंककर कहा "अच्छा.. !! अब समझी!! तो उस रात वो तुम ही थे.. जिस ने मुझे अंधेरे में पीछे से चोद दिया था.. मुझे शक तो था ही.. की ऐसा काम तुम्हारे अलावा और कोई नही कर सकता.. पर इतना बड़ा रिस्क तूने कैसे लिया संजय? तुझे डर नही लगा था क्या?"

संजय: "अरे मम्मी जी, आपकी हालत तब इतनी खराब थी की पीछे से कोई कुत्ता आकर चोद जाता तो भी आप मना नही करती.. बहोत उत्तेजित थी आप.. इसीलिए तो मैंने मौका देखकर अपना लंड घुसा दिया सीधा.. पर सच बताना.. कैसा लगा था आपको उस रात?"

शीला: "मुझे तो बहोत मज़ा आया था.. लंड के लिए तड़प रही थी तभी चूत में लंड घुस गया.. उससे ज्यादा क्या चाहिए!! संजय.. अच्छा हुआ जो तू मुझे गोवा लेकर आया.. हम साथ में मजे तो करेंगे ही.. पर यहाँ आने से उन दो फिरंगियों के साथ मज़ा करने का जबरदस्त मौका मिल गया "

संजय: "मम्मी जी, उस चार्ली की चूत बड़ी ही टाइट थी.. वैशाली को पहली बार चोदा था उससे भी टाइट.. !! मुझे लगता है की जॉन ने उसे ज्यादा रगड़ा नही होगा अब तक"

शीला: "मुझे तो ऐसा नही लगता.. जॉन के साथ चार्ली यहाँ गोवा तक आई है तो चुदाई में तो कोई कसर नही छोड़ी होगी दोनों ने.. मेरे हिसाब से तो चार्ली भी एक नंबर की चुदक्कड़ ही थी.. हाँ.. उसकी चुत बेशक काफी मुलायम और टाइट थी.." साथ लेकर आए बोतल से संजय को घूंट पिलाते हुए शीला ने नीचे हाथ डालकर संजय के लंड से खेलना शुरू कर दिया था.. संजय का लंड एकदम गन्ने जैसा सख्त हो गया था.. गोद में बैठी शीला के स्तन हल्के हल्के मसल रहा था संजय..

संजय के हाथ में सिगरेट थी.. शीला ने सिगरेट उसके हाथ से लेकर एक कश लगाया.. धुआँ छोड़ते हुए उसने संजय के लंड को पकड़कर उससे पूछा "तैयार हो गया क्या, बेटा..?"

संजय-शीला के रूम की बालकनी से समंदर का किनारा नजर आ रहा था.. वोड्का का हल्का नशा दोनों के जिस्मों को गरम कर रहा था..

संजय: "तुम्हारा हाथ पड़े और ये तैयार न हो ऐसा कभी हो सकता है क्या!!" शीला की मांसल जांघों पर हाथ फेरते हुए उसने उसकी गर्दन को काट लीया "अगर तुम मेरी सास न होती तो तो मैं तुम्हें भगाकर ले जाता.. तुम्हारे जैसा गदराया माल मैंने आज तक नही देखा.. एक दो बार चोद कर मन नही भरेगा मेरा.. दिल करता है की एक हफ्ते तक तुम्हें बिस्तर पर लेकर पड़ा रहूँ तब जाकर मेरे लंड को तसल्ली मिलेगी" कहते हुए संजय ने शीला के दोनों बबलों को रगड़ दिया

शीला: "चार्ली के साथ अनुभव कैसा रहा?"

संजय: " अरे गजब का अनुभव था.. साली इतना कडक माल थी.. मेरा तो जी करता है की आज की पूरी रात अगर उन दोनों के साथ बिताने का मौका मिलता तो मज़ा आ जाता.. सच सच बताना..तुम्हें भी जॉन के गोरे लंड की याद आ रही है ना ??"

शीला: "हाँ बेटा.. जॉन के लंड को याद करते हुए अभी भी मेरे दो पैरों के बीच की परी🧚🏻‍♀️ पागल हो जाती है.. एक बात तो है बेटा.. चुदाई के लिए जब कोई नया साथी मिले तब मज़ा और उत्तेजना दोनों दोगुने हो जाते है.. इसका क्या कारण होगा?"

संजय: "तुम्हारी बात बिल्कुल सही है.. नए साथी के संग चुदाई करने का मज़ा ही कुछ अलग होता है.. चार्ली के छेद में घुसाने का बड़ा मज़ा आया मुझे.. साली फिर से मिल जाएँ तो जीवन सार्थक हो जाए मेरा.. "

शीला संजय के लंड को पकड़कर खींचते हुए बोली "संजय, जॉन और चार्ली को बुला कर ला.. होटल तो उनका नजदीक ही है.. वो लोग वहीं होंगे.. फिर से हम चारों मिलकर चुदाई करते है"

संजय: "अभी तो मैं तुम्हें मन भरकर चोदना चाहता हूँ.. घर लौटने के बाद तो वापिस तुम्हें "आप" कहना पड़ेगा.. इतनी आसानी से तुम मिलोगी भी नही मुझे.. प्लीज.. अब और कोई हम दोनों के बीच नही आएगा.. जो भी करना है हम दोनों ही करेंगे.. " संजय ने शीला को बेड पर लैटा दिया.. बगल में पड़ा वोड्का का खाली ग्लास गिर गया.. जो गिने चुने कपड़े उन दोनों ने पहन रखे थे वो उतार दिए..

संजय के फुँकारते नाग जैसे लंड को शीला ने बड़े ही प्यार से हाथ में पकड़कर चूम लिया "घर लौटने के बाद इसकी बहोत याद आएगी मुझे.. मैंने कभी सपने भी नही सोचा था की अपने दामाद के साथ करने का मौका मिलेगा मुझे.. औरतों को पटाने में तू मास्टर है.. सच सच बता.. चेतना को कितनी बार चोदा है तूने? "शीला का दिमाग पुरानी बातें भुला नही था

शीला की बात सुनकर संजय चोंक पड़ा..

"कौन चेतना, मम्मी जी?"

"भोसड़ी के.. ज्यादा शाणा मत बन.. वही चेतना.. जिसने तुझे उस दिन शाम को पाँच बजे अपने घर बुलाने का मेसेज भेजा था.. मेरे साथ चालाकी मत कर संजय, और सब सच बता दे.. वैसे चेतना ने तो मुझे सब बता ही दिया है.. " संजय के पास अपना बचाव करने के लिए कुछ भी नही बचा था.. मन ही मन वो चेतना को गालियां दे रहा था.. हरामखोर ने शीला को सब बता दिया!!! इन औरतों के पेट में एक बात नही टिकती.. कितना भी समझाओ, वक्त आने पर तोते की तरह बोलने लगती है..

अब शीला के शरण में आए बगैर संजय के पास ओर कोई चारा नही था.. सरेंडर होकर उसने सारी बातें कुबूल कर ली.. उसकी सारे बातें सुनते हुए शीला संजय का लंड सहला रही थी

शीला: "संजु बेटा.. तू कहीं भी मुंह मार.. कितने भी मजे कर.. मुझे कोई आपत्ति नही है.. पर तू मेरी बेटी वैशाली को दुख देगा तो वो मैं नही सहूँगी.. मैं क्या कोई भी माँ ये बर्दाश्त नही करेगी.. अब तू मुझे बता.. वैशाली के साथ आगे की ज़िंदगी बिताने का क्या प्लान है तेरा? मैंने सुना है की प्रमिला के साथ साथ किसी रोजी नाम की लड़की के साथ भी तेरा चक्कर है !! तू उसके साथ दिन रात गेस्टहाउस में पड़ा रहेगा तो मेरी वैशाली का क्या होगा??? अगर वो कहीं किसी ओर की तरफ मुड़ गई तो लेने के देने पड़ जाएंगे तुझे"

संजय सुनते सुनते हौले हौले शीला के स्तनों को मसल रहा था.. वोड्का के हल्के नशे में वह बोला: "मम्मी जी, वैशाली काफी टाइम से मुझे चोदने नही देती.. जब पत्नी ही आपकी इच्छाओं को पूरा ना करे तो पति आखिर क्या करेगा!! मेरे इस लंड को लेकर में कहाँ जाऊ?? आप ही बताइए.. मुझे दिन में कम से कम एक बार तो सेक्स चाहिए ही चाहिए.. जब तक एक बार वीर्य छूट न जाएँ मुझे नींद ही नही आती.. मैं थोड़ा ज्यादा ही एक्टिव हूँ इस बारे में.. ये तुम भी जान गई हो.. वैशाली मुझे जरा सा भी सहयोग नही देती.. मैं उसके स्तन दबाने जाता हूँ तो बोलती है - मुझसे तो ज्यादा रोजी के बड़े है.. जा उसके जाकर दबा - अब तुम ही बताओ.. ये सब बोलकर वो क्या साबित करना चाहती है.. अरे तुम नही दबाने देती तभी तो मुझे रोजी के पास जाना पड़ा.. इसलिए फिर मैंने भी उस पर ध्यान देना छोड़ ही दिया.. "

संजय ने अपना दुखड़ा तो सुना दिया पर ये नही बताया की वह कुछ काम धंधा नही करता और पूरे दिन चोदने की फिराक में ही रहता है इसलिए वैशाली उसे सहयोग नही देती.. शीला का मन तो किया की वह उसे ये भी बताएं पर वह हर कदम फूँक फूँक कर रखना चाहती थी..

शीला: "संजु बेटा.. अगर मैं वैशाली को समझाकर मना लूँ.. तो क्या तुम रोजी को छोड़ दोगे?"

संजय: "मम्मी जी, रोजी को तो मैं अब छोड़ नही सकता!!"

शीला: "क्यों? कहीं तुम दोनों ने छुपकर शादी तो नही कर ली!!"

संजय: "नही मम्मी जी.. बात दरअसल यह है की.. मैंने रोजी के पापा से ४ लाख रुपये ब्याज पर लिए है.. जब तक वो पैसे न लौटा दूँ मैं रोजी को नही छोड़ सकता.. !!"

शीला: "अच्छा?? मतलब ४ लाख के ब्याज के बदले वो तुझसे चुदवा रही है.. पर बेटा तू ये भी तो सोच.. तू रोजी को बाहों में भरकर दिन रात चोदता-चाटता रहेगा तो पैसे कैसे लौटाएगा? पैसे कमाने के लिए बिस्तर से उठकर कोई काम धंधा भी करना पड़ेगा ना.. !!"

संजय: "मम्मी जी, मैं बस इसी जुगाड़ में हूँ.. इसीलिए तो पंद्रह दिनों से यहाँ पड़ा हुआ हूँ.. "

शीला: "यहाँ आने के बाद तूने काम कम किया और चुदाई ज्यादा की है.. ये बहानेबाजी बहोत हुई.. कुछ ढंग का काम करना शुरू कर नही तो तेरे वैवाहिक जीवन को बर्बाद होने से कोई नही बचा पाएगा.. और वहाँ कलकत्ता में बैठकर कुछ नही होने वाला तेरा.. वहाँ तेरे लफंगे दोस्तों की संगत में तू कुछ नही कर पाएगा.. इससे अच्छा यही होगा की तुम लोग यहीं शिफ्ट हो जाओ"

संजय: "शिफ्ट तो मैं अभी हो जाऊँ.. पर फिर मेरे माँ-बाप का ध्यान कौन रखेगा!! इस बुढ़ापे में मैं उन्हे अकेला नही छोड़ सकता"

संजय की गोद में ठीक से बैठते हुए उसके लंड को अपनी चूत के सुराख पर सेट कर दिया.. कडक लोड़े को गरम चिपचिपा छेद मिलते ही वो लपक कर अंदर घुस गया.. जैसे सांप अपने बिल में घुस जाता है.. पूरा लंड हजम करने के बाद शीला अपनी गांड हिलाते और रगड़ते हुए बात को आगे बढ़ाने लगी






"ये बात तो तेरी सही है बेटा.. लेकिन अगर उनकी इतनी चिंता है तो उन्हे भी यहाँ साथ ले आ.. हम सब मिलकर तेरे और वैशाली के लीये कुछ सोचेंगे और तुम्हारी ज़िंदगी को वापिस पटरी पर लाने की कोशिश करेंगे.. माँ-बाप की चिंता होना स्वाभाविक है.. पर क्या तूने कभी ये सोचा है की इस उम्र में तेरी इस आवारागर्दी के चलते उन्हे तुम्हारी कितनी फिक्र हो रही होगी?? पंद्रह दिनों से तुम और वैशाली यहाँ हो.. तो उनका ध्यान कौन रख रहा होगा? तू महीनों तक बाहर घूमता रहता है.. घर पर फूटी कौड़ी तक नही देता.. तो तेरी सारी कमाई जाती कहाँ है? और ऐसा तू क्या करता है जो लोगों से ब्याज पर उधार पैसे लेने की जरूरत पड़ती है??"

शीला की सीधी बात सुनकर संजय चुप हो गया.. फिलहाल जिस स्थिति में वह दोनों थे.. वह ऐसी गंभीर चर्चा के लिए अनुकूल नही थी.. लेकिन शीला की बात का न जाने क्या असर हुआ संजय पर.. उसने अपना लंड शीला के भोसड़े के बाहर निकाला और शीला को खड़ी करते हुए खुद भी खड़ा हो गया.. अपने कपड़े पहन कर वह बोला "मैं थोड़ी देर में आता हूँ, मम्मी जी" और निकल गया

रात को नौ बज चुके थे.. शीला को बड़ी जोर की भूख लगी थी.. वोड्का का नशा भी काफी चढ़ चुका था.. शीला ने खड़े होने का प्रयास किया लेकिन उसके कदम नशे के कारण डगमगा रहे थे.. वो सोच में पड़ गई.. कहाँ गया होगा संजय? कहीं उसे मेरी बातों का बुरा तो नही लगा होगा? नाराज होकर अगर वो मुझे यहीं छोड़कर चला गया तो मैं वापिस कैसे लौटूँगी? मदन को लौटने में अब ज्यादा दिन नही बचे थे.. उसके आने के बाद संजय कुछ हंगामा न कर दे.. बाप रे.. मैं क्यों इस संजय के साथ इतने दूर चली आई? शीला मन ही मन कांप उठी..

कुछ भी करके संजय को मनाना पड़ेगा.. एक बार घर पहुँच कर भी तो ये सारी बातें की जा सकती थी.. !!

शीला ने खड़ी होकर.. संजय ने दिलाया था वह छोटा सा टॉप पहन लिया.. बिना पेन्टी के उसने वह छोटी सी शॉर्ट्स भी पहन ली..






वो कमरे से बाहर निकली और सीढ़ियाँ उतरते हुए उसने देखा की संजय ड्राइवर के साथ कुछ बात करके निकल गया..

बहकती चाल से चलते हुए वह गाड़ी तक आई.. बिना ब्रा के उछल रहे उसके स्तनों को लॉबी में खड़े सारे मर्द देख रहे थे.. शीला ड्राइवर के पास आई

शीला: "क्या नाम है तुम्हारा? और कहाँ गए तुम्हारे साहब? "

ड्राइवर: "जी, मेरा नाम हाफ़िज़ है.. और संजय साहब अभी आ रहें है.. जब तक वो न लौटे तब तक आपका खयाल रखने को कहा है मुझे.. मैडम आप अभी नशे में है.. लोग देख रहे है.. चलिए मैं आपको आपके कमरे तक पहुंचा दु.. " शीला को कंधे से सहारा देते हुए हाफ़िज़ उसे कमरे तक जाने में मदद करने लगा.. "आपका कमरा कहाँ है मैडम?"

नशे की हालत में शीला ने कहा "ऊपर के माले पर कोने वाला कमरा है" उसके कदम लड़खड़ा रहे थे.. वह हाफ़िज़ के जिस्म पर लगभग लटक ही रही थी..


कमरा खोलकर हाफ़िज़ ने शीला को सहारा देते हुए बेड पर लैटाया.. शीला को छोटा सा टॉप ऊपर चढ़ गया था.. और स्तनों का निचला हिस्सा टॉप के बाहर झलक रहा था.. शीला की छोटी सी शॉर्ट्स इतनी तंग थी की उसकी दोनों जांघें ऊपर तक खुली हुई थी.. हाफ़िज़ बस उसे देखता ही रहा

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कमरा खोलकर हाफ़िज़ ने शीला को सहारा देते हुए बेड पर लैटाया.. शीला को छोटा सा टॉप ऊपर चढ़ गया था.. और स्तनों का निचला हिस्सा टॉप के बाहर झलक रहा था.. शीला की छोटी सी शॉर्ट्स इतनी तंग थी की उसकी दोनों जांघें ऊपर तक खुली हुई थी.. हाफ़िज़ बस उसे देखता ही रहा







हाफ़िज़ ने अपने होंठों पर जीभ फेरते हुए कहा "क्या गदराया जिस्म है आपका मैडम.. !! आपको ऐसे देखकर मेरा भी मन कर रहा है.. संजय साहब के आने से पहले मुझे भी चांस दीजिए.. " कहते हुए हाफ़िज ने शीला के टॉप के नीचे से हाथ डालकर दोनों स्तनों को दबाकर मसल दिया..

"एयय.. छोड़ मुझे.. रासकल.. छोड़.. साले तेरी औकात ही क्या है मुझे हाथ लगाने की.. !!" शराब का नशा अब शीला के सर चढ़कर बोलने लगा था.. लहराती आवाज में उसने बोलकर हाफ़िज़ के हाथों से खुदको छुड़ाते हुए शीला ने कहा "जा.. जाकर अपनी माँ के दबा.. "

सुनकर हाफ़िज़ गुस्से से तिलमिलाने लगा.. शीला के ऊपर वो सवार हो गया और बोला "भेनचोद.. मेरी औकात की बात करती है.. अभी तुझे दिखाता हूँ मेरी औकात.. तेरी माँ को चोदू, हरामजादी.. अपने दामाद का लोडा गाड़ी में चूसते वक्त तुझे तेरी औकात याद नही आई थी क्या.. साली रांड!!" कहते हुए गुस्से से उसने अपने दोनों हाथों से शीला का टॉप फाड़ दिया.. शीला के गोरे गोरे स्तन खुले हो गए..

हाफ़िज़ शीला के ऊपर अपना सारा वज़न डालकर चढ़ गया और उसके होंठों को चाटने लगा.. शीला छूटने के लिए छटपटाने लगी.. पर हाफ़िज़ की मजबूत पकड़ के आगे वो लाचार थी.. ऊपर से वो नशे में भी थी.. शीला चिल्लाने लगी.. हाफ़िज़ ने उसके गाल पर दो कडक तमाचे रसीद करते हुए उसे चुप करा दिया..

"साली रंडी.. अगर फिर से चिल्लाई तो तेरे घरवालों को सब बता दूंगा..घर तो तेरा मैंने देख ही रखा है.. किसी को मुंह दिखाने के लायक नही छोड़ूँगा तुझे.. याद रखना.. अब चुपचाप मुझे जो करना है वो कर लेने दे.. समझी!!" सुनकर शीला की गांड ही फट गई.. अपने हथियार डालकर उसने आँखें बंद कर ली.. और अपने बदन को ढीला छोड़ दिया..

हाफ़िज़ ने शीला की चड्डी उतारकर उसकी चूत पर हाथ फेरते हुए कहा "साली.. बहोत गरम चीज है तू" कहते हुए हाफ़िज़ ने अपने पेंट की चैन खोल दी.. आँखें बंद कर पड़ी हुई शीला ने चैन खुलने की आवाज सुनी.. अनजाने में ही उससे आँखें खुल गई.. पेंट उतार रहे हाफ़िज़ के लंड को देखने की लालच वह रोक नही पाई.. पेंट उतरते ही उसने देखा की हाफ़िज़ के अंडरवेर में इतना बड़ा उभार था.. डंडे जैसा !!! वह फुला हुआ हिस्सा देखककर शीला मन ही मन हिल गई..

अपने लंड वाला हिस्सा शीला के करीब ले जाकर बोला "ले मादरचोद.. निकाल बाहर अपने बाप का लंड.. और देख.. की यह तेरे भोसड़े के परखच्चे उड़ाने के काबिल है भी या नही.. !!" शीला ने अब विरोध करना छोड़ ही दिया था.. हाफ़िज़ की धमकी सुनने के बाद उस में हिम्मत ही नही बची थी.. कहीं ये कमीना आकर मदन को सब कुछ बता देगा तो क्या हाल होगा!!!

चुपचाप शीला ने हाफ़िज़ के अंडरवेर में बने उभार पर हाथ रख दिया.. "तुरंत बाहर मत निकाल ईसे मेरी जान.. पहले थोड़ा हाथों से सहला.. ताकि ये और भी सख्त हो जाए.. फिर बाहर निकालना.. समझ गई!!" शीला की निप्पलों को खींचते हुए हाफ़िज़ ने कहा "कसम से.. गजब का माल है तू.. " शीला की नाभि के अंदर उंगली करने के बाद उसने झुककर उसके भोसड़े में तीन उँगलियाँ एक साथ डाल दी.. और शीला की काँखों को चाटने लगा..








४४० वॉल्ट का करंट लगा शीला को.. हाफ़िज़ उसकी काँख को ऐसे चाट रहा था जैसे चूत चाट रहा हो.. उत्तेजित होकर भारी सांसें लेते हुए उसने हाफ़िज़ के लंड को अंडरवेर के ऊपर से ही दबाया..

शीला के मन में ही संवाद चलने लगा.. "तू क्या कर रही है उसका पता भी है तुझे?? "लेकिन वोड्का का नशा और चूत की खुजली.. दोनों ने मिलकर शीला के होश छीन लिए थे.. इच्छा न होने के बावजूद वह हाफ़िज़ के लंड को बाहर से ही सहलाते हुए सिसक रही थी.. जांघिये के अंदर लंड ने तंबू बना दिया था.. उसे उतारकर शीला ने लंड बाहर खींचा.. स्प्रिंग की तरह उछल कर बाहर निकला हाफ़िज़ का लोडा.. एकदम काला.. ब्लेक कोब्रा जैसा.. और इतना मोटा.. शीला को जीवा के लंड की याद आ गई.. हाफ़िज़ ने अपना झूलता हुआ लंड शीला के मुंह के आगे रख दिया.. शीला ने एक आखिरी बार शर्माने का नाटक किया.. और अपनी नजरें फेर ली..

हाफ़िज़ ने खींचकर एक तमाचा लगा दिया शीला के गाल पर.. और उसे धमकाते हुए कहा "मादरचोद.. नजर क्यों फेर ली? टाइम खराब मत कर.. पकड़ ईसे और मुंह में ले चल.. जैसे अपना दामाद का लिया था.. " हाफ़िज़ के मुंह से गालियां सुनकर.. पता नही क्यों पर शीला को अच्छा लगा.. उसकी चूत ने रस की एक धारा छोड़ दी.. हाफ़िज़ नीचे झुककर शीला के गुब्बारों को चूसने लगा..

शीला हाफ़िज़ के विकराल लंड को हाथ में लेकर खेलने लगी.. उसके शरीर में वासना का भूत नाचने लगा.. उसके भोसड़े ने कडक लंड की गंध परख ली थी.. और वो बेसब्र हो रहा था.. हाफ़िज़ ने शीला की काँखों के बीच लंड को दो बार अंदर बाहर किया... गदराई काँखों में लंड घुसते ही उत्तेजना से हाफ़िज़ का थोड़ा सा वीर्य छूट गया और शीला के बबलों पर जा गिरा






"साली रंडी.. तेरी बगल भी भोसड़े जैसी गरम है.. क्या बात है.. कहाँ से सीखा ये सब.. जरा मुझे भी बता.. !!" शीला ने जवाब नही दिया.. वह उसके आँड़ों को सहलाती रही.. शीला की काँख से लंड निकालकर वापिस अंदर डाला हाफ़िज़ ने.. और उसकी काँख को ही चोदने लगा.. हाफ़िज़ की इस हरकत ने शीला को पागल कर दिया.. अपनी काँख से लंड निकालकर उसने मुंह में ले लिया.. और अपनी लार से गीला करते हुए चूसने लगी.. मुंह के अंदर उसने लंड पर इतना दबाव बनाया की उसे डर लगने लगा की कहीं हाफ़िज़ उसके मुंह में ही वीर्यस्त्राव न कर बैठे.. !!

हाफ़िज़ जोर से चिल्लाया "अरे मादरचोद.. खा जाएगी क्या मेरा लंड?? छोड़ दे भेनचोद.. तेरे बाप का पानी छूट जाएगा" शीला के मुंह से हाफ़िज़ ने लंड बाहर खींच लिया..






शराब के नशे में शीला ने कहा "साले.. चूसने दे ना.. क्यों मेरा मज़ा खराब कर रहा है? पानी गिरता तो मेरे मुंह में गिरता उसमें तेरे बाप का क्या जा रहा था.. भोसड़ी के चूतिये!!" हाफ़िज़ अब शीला के स्तनों पर अपने लंड से थपकियाँ लगाने लगा.. सख्त लंड की थपकियों से शीला को दर्द हो रहा था.. लंड की मोटाई देखकर शीला मन ही मन रघु और जीवा को याद कर रही थी.. घर जाने के बाद एक बार उन दोनों से चुदवाने का मन बना लिया उसने..





हाफ़िज़: "शीला तेरी जवानी तो बड़ी ही कातिल है मेरी जान.. चल.. मेरा लंड अपनी चूत में लेने के लिए तैयार हो जा.. कुत्तिया बनाकर चोदूँगा.. चार पैर पर हो जा.. " कहते हुए उसने शीला की जांघ पर काट लिया..

शीला: "आह्ह साले.. क्या कर रहा है? भड़वे अपनी माँ को भी कुत्तिया बनाकर चोदता है क्या? और तमीज़ से बात कर.. मैं तेरी मालकिन हूँ.. कोई रंडी नही.. ड्राइवर है तू.. मेरा शोहर नही.. जो करने आया है वो कर और निकल यहाँ से.. ले डाल अपना लोडा.. और देख.. भूल कर भी पीछे के छेद में डालने की कोशिश मत करना.. वरना चिल्ला चिल्लाकर माँ चोद दूँगी तेरी.. समझा.. !!! आगे के छेद में जितना मर्जी डाल ले.. "

शीला घोड़ी बनकर हाफ़िज़ का लंड अपने भोसड़े में लेने के लिए तैयार हो गई.. उत्तेजना इतनी प्रबल थी की उसके दिलोदिमाग पर सुरूर सा छा गया था.. शराब से कई ज्यादा नशा सेक्स में होता है.. और शीला के सर पर फिलहाल दोनों नशे हावी हो चुके थे.. उसका शरीर वासना से तप रहा था..

लंड का सुपाड़ा अंदर जाते ही शीला ने कहा "जरा धीरे से हाफ़िज़.. दर्द हो रहा है.. " हाफ़िज़ का लंड कुछ ज्यादा ही मोटा था.. लेकिन शीला का भोसड़ा भी कुछ कम नही था.. दो दमदार धक्कों में ही हाफ़िज़ का लंड निगल लिया उस भोसड़े ने.. इतना मोटा था की शीला का पूरा भोसड़ा भर गया.. मज़ा आ गया शीला को.. खुजली से तिलमिलाती चूत में एक अजीब सी ठंडक मिली..






हाफ़िज़ आनन-फानन में धक्के लगाने लगा.. शीला गांड उछाल उछाल कर चुदने लगी... इस युद्ध में कौन जीतेगा ये कहना बड़ा ही मुश्किल था..

"ओह्ह भेनचोद.. क्या लोडा है तेरा!! मज़ा आ गया.. चोद दे.. चोद दे अपनी मैया की चूत.. ठोक जोर से.. हाफ़िज़.. हाँ और जोर से.. लगा धक्के साले.. आह्ह आह्ह आह्ह अहह.. ऐसे ही.. यस्स.. क्या ताकत है तुझ में भोसड़ी के.. सच में असली मर्द है तू.. साले.. लगा दम.. दिखा अपना जोर.. कोई कसर मत छोड़ना.. अपने गधे जैसे लंड से फाड़ दे मेरा भोसड़ा..आह्ह.. !!" हाफ़िज़ के पसीने छूट गए.. शीला की कमर और कूल्हों पर तमाचे लगाते हुए वह लगातार धक्के लगा रहा था.. "आह्ह आह्ह ओह्ह ओह्ह" की आवाजों से पूरा कमरा गूंज उठा था.. शीला ने अपनी चूत की मांसपेशियों से कसकर पकड़ रखा था हाफ़िज़ का लंड.. उसके दोनों वर्टिकल होंठों के बीच फंस चुका था हाफ़िज़ का लंड.. धक्के खा खा कर लाल हो गई थी शीला की चूत..






पूरे पंद्रह मिनट की भीषण चुदाई के बाद शीला का जबरदस्त ऑर्गजम हो गया.. हाफ़िज़ के जानदार लोड़े की वो कायल हो गई.. शीला के कूल्हों को थप्पड़ लगाते हुए हाफ़िज़ ने अपने लंड से पावरफूल पिचकारी दे मारी.. गरम गरम वीर्य की बौछार होते ही शीला का भोसड़ा तृप्त हो रहा था..

थककर हाफ़िज़ ने अपना लंड बाहर निकाला और बिस्तर पर लेट गया.. हाफ़िज़ की विशाल छाती पर शीला भी लाश की तरह ढेर हो गई.. उसके मदमस्त बॉल हाफ़िज़ की छाती से दबकर चपटे हो गए थे.. उसकी दाढ़ी पर अपने कोमल गालों को रगड़ते हुए शीला उसे चूमने लगी.. नशा उसका सर पर इस कदर सवार था की उसे यह भी एहसास नही हो रहा था की वो किसी मामूली से ड्राइवर से चुदकर लेटी हुई थी.. हाफ़िज़ के खुरदरे हाथ शीला की चिकनी गोरी पीठ को सहला रहे थे.. पीठ से होते हुए उसके हाथ शीला के कूल्हों तक जा पहुंचे.. और अपनी उंगली से वो शीला की गांड के छेद को कुरेदने लगा.. गांड पर स्पर्श होते ही शीला को संजय की याद आ गई.. कहाँ गया होगा वो चूतिया? मुझे यूं अकेले छोड़कर न गया होता तो मुझे इस कमबख्त हाफ़िज़ से चुदना न पड़ता.. खैर जो भी हुआ अच्छा ही हुआ.. मज़ा तो बहोत आया.. और संजय को कहाँ पता चलने वाला था की मैंने हाफ़िज़ से चुदवाया है!! लेकिन संजय के आने से पहले मुझे इस भड़वे को रवाना करना होगा.. वैसे भी ये मादरचोद गांड का मुआयना कर रहा है.. उसकी नियत बिगड़े उससे पहले ही इससे छुटकारा पाना होगा.. ये मेरी गांड में डालेगा तो यही गोवा में मेरी लाश गिर जाएगी..

शीला ने तुरंत हाफ़िज़ के गाल को थपथपाकर उसे जगाया "हाफ़िज़.. तू अब निकल.. तेरे साहब आ जाएंगे तो मुसीबत हो जाएगी.. और हाँ.. गलती से भी उन्हे मत बताना.. हमारे बीच जो कुछ भी हुआ उसके बारे में.. "

हाफ़िज़ ने शीला को अपनी बाहों की गिरफ्त से मुक्त किया.. "नही पता चलेगा.. फिकर मत कीजिए.. आप के साथ जो मज़ा आया न मैडम.. वो आज से पहले कभी नही आया.. यहाँ तक की मेरी बीवी के साथ भी इतना मज़ा नही लूटा था मैंने.. वो तो आप से उम्र में भी आधी है.. और उसकी चूत भी आपसे काफी टाइट है.. लेकिन पता नही क्यों आपकी चूत ने जिस तरह मेरा लंड को जकड़ा था.. वो उसकी चूत नही कर पाती.. और आपका सीना भी कितना गजब है.. ये बड़े बड़े है आपके.. मैं तो आज का दिन जिंदगी भर नही भूलूँगा.. दोबारा कभी मौका मिला तो करने दोगी ना.. !!"

"हाँ हाँ.. करने दूँगी.. मगर अब तू यहाँ से निकल मेरे बाप.. " हाफ़िज़ के मुरझाए लंड को प्यार से थपकी लगाते हुए शीला ने कहा

"अरे मैडम.. क्यों फिर से जगाती हो उसे? फिर से करना पड़ेगा !!" हाफ़िज़ ने शीला को अपनी बाहों में दबा लिया.. "ओह्ह आपके ये रसीले होंठ.. ये सेक्सी बदन.. भेनचोद जी करता है की एक बार फिर से पटक कर चोद दूँ"

शीला घबरा गई.. मैंने क्यों इस हरामी के लंड को छेड दिया.. !!! कहीं संजय आ टपका तो गजब हो जाएगा.. कैसे भगाऊ ईसे.. एक बार चोद लिया फिर भी मन नही भरा इस चूतिये का..

शीला: "देख हाफ़िज़.. मुझे भी तेरा तगड़ा लंड बहोत पसंद आया.. मेरे दामाद के लंड से भी बेहतर है तेरा.. मैं भी इससे बार बार चुदवाना चाहती हूँ.. एक बार से तो मेरा मन भी नही भरता.. मगर इस वक्त तू यहाँ से निकल जा.. घर जाने के बाद मैं तुझे बुलाऊँगी.. और तुझे अपनी मनमानी करने दूँगी.. ठीक है.. !!!" कहते हुए शीला ने उसे प्यार से चूमा और रवाना कर दिया

शीला का दिमाग अब कुछ शांत हुआ और विचार चलने लगे.. मैंने एक ड्राइवर के साथ!! शीला तो इतनी गिरी हुई कब से हो गई? कितनी संस्कारी थी तू और अब देखो? तभी उसकी नजर अपने टॉप पर पड़ी.. जो हाफिज ने खींचकर फाड़ दिया था.. बाप रे!! अब क्या करूँ?? साड़ी के अलावा और कोई कपड़े तो है नही.. संजय ये देखकर पूछेगा तो क्या जवाब दूँगी.. ??

तभी डोरबेल बजने की आवाज आई.. शीला ने जल्दी जल्दी बेग से काली नेट वाली ब्रा निकालकर पहन ली.. और नीचे संजय ने दिलाई शॉर्ट्स चढ़ा दी.. फिर दरवाजा खोला.. वो संजय ही था.. उसके हाथ में किंग एडवर्ड सिगार का पैकेट था.. देखते ही शीला खुश हो गई.. जॉन और चार्ली की याद आ गई उसे.. खासकर जॉन का गोरा लंड और गुलाबी सुपाड़ा.. !!

नशे में लहराती आवाज में शीला ने कहा "ये बड़ा अच्छा काम किया तूने बेटा.. ये सिगार मुझे बहोत पसंद आ गई है.. अब खाने का कुछ करें!!! जोरों की भूख लगी है मुझे.. "

"हाँ मम्मी जी.. चलिए बाहर जाकर कुछ खाते है.. यहाँ आने के बाद हम बाहर घूमे ही नही है !! कितने घंटों से हम बस कमरे में ही बंद बैठे है "

"कोई बात नही.. वैसे गोवा हो या गुवाहाटी.. बाजार सब जगह एक जैसा ही होता है.. हमे उन अंग्रेजों से मजे करने का मौका मिल गया वो क्या कम था!!"

"हाँ वो तो है मम्मी जी.. चार्ली की चूत का स्वाद अब भी मेरी जुबान पर है.. क्या चीज थी वो.. !! मम्मी जी उसकी गांड का छेद गुलाब जैसे कोमल और लाल था.. देखकर मन हो रहा था की बस उसे चाटता ही रहूँ.. " शॉर्ट्स के ऊपर से अपने लंड को दबाते हुए संजय ने कहा

शीला समझ गई की उसके दामाद का लंड भी भूखा था.. अगर उसे खिलाने गई तो वह भूखी रह जाएगी..

शीला: "संजय बेटा.. पहले बाहर जाकर खाना खा लेते है.. थोड़ी देर और रुके तो तेरे इसको शांत करने में और एक घंटा निकल जाएगा" हँसकर संजय के लंड की ओर इशारा करते हुए उसने कहा

दोनों आजाद पंछी की तरह हाथ में हाथ डालकर गोवा की गलियों में घूमने लगे.. देखकर किसी को भी अंदाजा न हो की दोनों सास-दामाद थे.. नव-विवाहित कपल की तरह दोनों एक दूसरे से लिपटे हुए चल रहे थे.. चलते चलते एक रेस्टोरेंट पसंद आई.. दोनों अंदर गए और खाना खाते वक्त एक दूसरे को छेड़ते रहे.. शीला अपनी काली ब्रा पहन कर ही बाहर आई थी.. रेस्टोरेंट में बैठे सारे लोग उसे घूर रहे थे.. सब के आकर्षण का केंद्र बनी हुई थी शीला.. और स्वाभाविक भी था.. इतने बड़े बड़े गदराए स्तनों की मालकिन.. सिर्फ नेट वाली ब्रा पहन कर बाहर निकले तो लोगों की नजर पड़ना जायज थी.. शीला की निप्पल की आकृति भी ब्रा से साफ नजर आ रही थी..

दोनों खाना खाने में मगन थे तभी केमेरे की फ्लेश ने उन्हे चोंका दिया.. एक शख्स उनके बगल वाले टेबल पर बैठकर शीला की तस्वीरे ले रहा था

"अबे ओय.. क्या कर रहा है तू??" संजय उठ खड़ा हुआ..

उस आदमी ने अपनी जेब से आई-कार्ड निकालकर दिखाते हुए कहा "मैं जर्नलिस्ट हूँ सर.. गोवा को कवर करने आया हूँ.. आप फिकर मत कीजिए.. मैं तो फ्रंट पेज पर डालने के लिए किसी आकर्षक सुंदरी की तलाश में था.. आप लोग मुझे परफेक्ट कपल लगे इसलिए तस्वीर ले रहा हूँ.. फ्रंट पेज पर छपेगी.. आप फेमस हो जाओगे"

"अरे हमें नही आना तेरे फ्रंट पेज पर.. समझा.. !! चल डिलीट कर अभी के अभी.. " संजय ने उसे धमकाते हुए कहा.. मन ही मन वो और शीला दोनों डर गए थे.. शीला ने उसके हाथ से केमेरा छिन लिया.. उसे आता नही था फिर भी जो मन में आए वो स्विच दबाने लगी.. संजय से ज्यादा चिंता शीला को थी.. संजय को क्यों ज्यादा फिक्र होती.. नंगा नहाएगा क्या और निचोड़ेगा क्या..!!! लेकिन शीला के लिए ये बड़ा खतरा था.. जब चारित्र की बात आती है तब लोग मर्द से ज्यादा औरत पर ही उंगली उठाते है.. इसी कारण से तो औरतें मर्दों जितनी बिंदास होकर मजे नही करती.. !!

संजय ने उस फोटोग्राफर का गिरहबान पकड़ लिया.. और उसे एक घुसा मारते हुए कहा "बिना इजाजत हमारी तस्वीर लेने की तेरी हिम्मत कैसे हुई बे, मादरचोद?? " संजय इतनी जोर से गाली बोला की मेनेजर दौड़ते हुए उनके पास आ गया..

मेनेजर: "ओ मिस्टर.. अपनी जबान पर लगाम दीजिए.. आप लोगों का जो भी झगड़ा है वो बाहर जाकर निपटाइए.. चलिए.. गेट आउट.. !! वरना मैं अभी पुलिस को फोन करके बुलाता हूँ.. !!"

बात को बिगड़ते देख शीला ने मेनेजर से सॉरी कहा.. अपनी पलकें झपकाकर इतने प्यार से उसने माफी मांगी की मेनेजर भी पिघल गया.. यही तो होता है चूत और स्तनों का प्रभाव.. !! शीला की ब्लेक नेट वाली ब्रा.. उभरते हुए स्तन.. नजर आ रही गुलाबी निप्पल.. गोरा पेट.. सुंदर चेहरा और ऊपर से वोड्का का नशा.. देखने वालों की नजर को एक पल में कैद कर देती थी शीला..

शीला: "देखिए मेनेजर साहब.. आदमी गुस्सा तभी करता है जब उसके साथ कुछ गलत होता है.. आप मेरे पार्टनर को क्यों धमका रहे हो? आप को उस आदमी को धमकाना चाहिए जो बिना इजाजत आपके कस्टमरों की तस्वीरें खींच रहा है.. " शीला के प्रभावशाली आवाज और अद्भुत सुंदरता से खींचकर वहाँ बैठे और मर्द भी इकट्ठा हो गए.. इस अबला नारी के बचाव के लिए.. कुछ तो बस शीला के स्तनों को नजदीक से देखने के लिए ही आए थे..

सब ने साथ में कहा "ऐसे कैसे बिना पर्मिशन के कोई तस्वीर ले सकता है?? और वो भी लेडिज की.. ये तो गलत है.. कम से कम पूछ तो लेना चाहिए था.." संजय कुछ बोलने गया पर शीला ने उसे इशारे से चुप रहने को कहा.. साले संजय तू चुप मर अभी.. एक गाली बक दी तो बीस लोग इकट्ठा हो गए.. और कुछ बोला और पुलिस आ गई तो लेने के देने पड़ जाएंगे.. !! संजय ने सिगरेट जलाई और कोने में खड़े होकर फूंकने लगा.. और बीस लोगों के बीच खड़ी शीला.. ब्रा और छोटी सी शॉर्ट्स पहने अपने जिस्म की नुमाइश करते हुए इस समस्या का समाधान लाने की कोशिश कर रही थी.. किसी भी हाल में वो ऐसा कोई सबूत छोड़ना नही चाहती थी.. आसपास खड़े लोगों के सहयोग से शीला ने केमेरे की सारी तस्वीरें डिलीट करवा दी.. तब जाके उसे तसल्ली हुई..

सारा मामला निपटाकर उसने आवाज देकर संजय को बुलाया.. फटाफट बिल देकर वो दोनों बाहर निकल गए.. और तेजी से चलते हुए अपने रूम पर पहुँच गए.. शीला काफी डर गई थी "संजय.. यहाँ रुकने में भी मुझे तो डर लग रहा है.. हमे अब गोवा छोड़ देना चाहिए.. इससे पहले की कोई ओर मुसीबत आ जाए.. तू चेकआउट करने की तैयारी कर.. "



"ठीक है मम्मी जी.. जैसा आप कहें.. हम चले जाएंगे.. लेकिन जाने से पहले एक जबरदस्त चुदाई तो बनती है " अपनी शॉर्ट्स की साइड से लंड बाहर निकालकर दिखाते हुए संजय ने कहा.. "ईसे आपके स्तनों के बीच रगड़ने की ख्वाहिश भी तो पूरी करनी है.. देखिए ये बेचारा कितना उदास है !!"
 
सारा मामला निपटाकर उसने आवाज देकर संजय को बुलाया.. फटाफट बिल देकर वो दोनों बाहर निकल गए.. और तेजी से चलते हुए अपने रूम पर पहुँच गए.. शीला काफी डर गई थी "संजय.. यहाँ रुकने में भी मुझे तो डर लग रहा है.. हमे अब गोवा छोड़ देना चाहिए.. इससे पहले की कोई ओर मुसीबत आ जाए.. तू चेकआउट करने की तैयारी कर.. "



"ठीक है मम्मी जी.. जैसा आप कहें.. हम चले जाएंगे.. लेकिन जाने से पहले एक जबरदस्त चुदाई तो बनती है " अपनी शॉर्ट्स की साइड से लंड बाहर निकालकर दिखाते हुए संजय ने कहा.. "ईसे आपके स्तनों के बीच रगड़ने की ख्वाहिश भी तो पूरी करनी है.. देखिए ये बेचारा कितना उदास है !!"






अपने दामाद का नरम लंड पकड़ते हुए शीला ने कहा "बेटा.. बिना चुदे तो मैं भी जाना नही चाहती.. दिल भरकर तेरे धक्के खाने है.. मेरी चूत को तेरे लंड से पावन करने के बाद ही हम गोवा छोड़ेंगे.. !! अब देर मत कर.. और अपनी मम्मी जी की चूत चाटने की सेवा शुरू कर दे.. "

"आह्ह मम्मी जी.. आपकी तो बातें सुनकर ही मेरा लंड कहीं पिचकारी न छोड़ दे.. " कहते हुए संजय ने शीला को अपनी बाहों में भर लियाया.. छोटे बच्चे की तरह वो शीला के स्तन से चिपक गया.. और नेट वाली ब्रा से एक स्तन को बाहर निकालकर चूसने लगा..

"आह्ह बेटा.. मज़ा आ रहा है.. तेरी जीभ की गर्मी मेरी निप्पल से होते हुए पूरे शरीर में फैल रही है.. देख.. तेरा लंड भी सख्त होकर तैयार हो गया.. इतने सुंदर लंड से चुदने के लिए वैशाली क्यों राजी नही होती ये मुझे समझ में नही आता.. इसे खड़ा हुआ देखकर भी वो कोई रिस्पॉन्स नही देती?"

"रिस्पॉन्स देती है ना.. क्यों नही देती.. मेरे लंड को देखकर ही वो करवट बदल कर सो जाती है"

"पागल है मेरी बेटी.. " कहते हुए शीला घुटनों पर बैठ गई और संजय के गन्ने जैसे सख्त लंड को मुंह में लेकर चूसने लगी.. शॉर्ट्स की साइड से लंड को चूसने में मज़ा नही आ रहा था.. इसलिए उसने खींचकर संजय की शॉर्ट्स जिस्म से अलग कर दी.. और अपनी ब्रा और चड्डी उतारकर फिर से एक बार स्खलित होने के लिए तैयार हो गई.. उसके चेहरे पर उत्तेजना साफ साफ छलक रही थी..






दोनों नंगे होकर एक दूसरे को चूमने और चाटने में व्यस्त हो गए.. संजय ने शीला की चूत पर अपना हाथ जमा दिया और शीला ने संजय के लंड को गिरफ्त में ले लिया..

"मम्मी जी.. अब मुझे अपने दोनों स्तनों के बीच में लंड घुसेड़ने दो.. "

"हाँ हाँ.. घुसा दे.. मैंने कब मना किया तुझे!! आज ये आखिरी चुदाई होगी हमारी.. जो मन करे तेरा.. वो कर ले.. मैं कुछ नही बोलूँगी"

"मम्मी जी.. आपके मन में भी ऐसी कोई विकृत इच्छा हो तो बता दीजिए... गोवा की ट्रिप यादगार बनानी है हमें.. !!"






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वैशाली और राजेश सर माउंट आबू में.. रेणुका की बर्थडे पार्टी में बियर की चुसकियाँ लेते हुए सिगरेट पर सिगरेट फूँक रहे थे.. राजेश के स्वभाव और पर्सनैलिटी से वैशाली बेहद आकर्षित हो गई थी.. उसने शारीरिक संबंधों के लिए पहले ही मना कर दिया था पर फिर भी राजेश ने बुरा नही माना था.. वैशाली को ये बात बहोत अच्छी लगी राजेश की..

लगभग ग्यारह बज रहे थे.. हर कोई नशे में चूर होकर ट्रिप के मजे ले रहा था.. वैशाली की आँखें भी बियर के नशे में सुरूर से भर रही थी.. इतनी बियर पीने के बाद उसे बड़ी जोर से पेशाब लगी थी.. आखिर जब बात बर्दाश्त से पार हो गई तब वह उठी और राजेश से कहा "एक्स्क्यूज़ मी.. मुझे जाना होगा.. फ्रेश होकर आती हूँ.. आप मेरा वैट करना.. "

"जाना तो मुझे भी है.. चलो मैं भी साथ चलता हूँ.. कहीं तुम्हारे कदम लड़खड़ा गए तो कोई तो चाहिए सहारा देने वाला.. " राजेश ने कहा.. वैशाली शरमा गई.. और नीचे देखने लगी..

"अरे घबराइए नही.. मैं तो जेन्ट्स टॉइलेट में ही जाऊंगा.. तुम्हारे साथ थोड़े ही आने वाला हूँ" हँसते हँसते राजेश ने कहा

"वो तो मुझे भी पता है सर की आप मेरे साथ टॉइलेट में नही आओगे.. चलिए चलते है" वैशाली आगे चाय और राजेश उसके पीछे पीछे.. वैशाली की मटकती गांड को देखकर राजेश की नियत में खोट आने लगी थी.. राजेश की नशीली आँखों में वैशाली की गांड का नशा अलग से जुड़ गया..

पेसेज के आखिर में लेडिज और जेन्ट्स के टॉइलेट अगल बगल में ही थे.. चलते चलते वैशाली के कदम डगमगा गए.. और उसे संभालने के चक्कर में राजेश भी लड़खड़ा गया.. एक दूसरे को संभालते हुए दोनों दीवार का सहारा लेकर खड़े हो गए.. वैशाली के स्तन एक पल के लिए राजेश के हाथों से दब गए.. दोनों एक दूसरे को सॉरी कहने लगे.. और हंस पड़े..

टॉइलेट के पेसेज में दोनों अकेले थे.. हल्की सी रोशनी थी..

"वैशाली, यू आर सो हॉट.. प्लीज एलाऊ मी टू टच योर बूब्स.. सिर्फ एक बार.. मेरी रीक्वेस्ट है.. प्लीज"

"नही सर.. आई कांट डू धिस.. सॉरी.. " वैशाली ने नशे की हालत में भी अपना संयम नही छोड़ा था.. वह दरवाजा खोलकर लेडिज टॉइलेट में घुस गई.. राजेश भी जेन्ट्स टॉइलेट में चला गया.. वह पेशाब करके बाहर निकला और लेडिज टॉइलेट के दरवाजे के बाहर वैशाली का इंतज़ार करने लगा.. तभी लेडिज टॉइलेट का दरवाजा खुला.. एक हाथ बाहर आया और उसने राजेश को अंदर खींच लिया.. एक सेकंड में ही ये सब हो गया..

राजेश कुछ समझ या सोच सके उससे पहले ही वैशाली ने उसे चूम लिया.. उसके मदमस्त उरोज राजेश की छाती से रगड़ रहे थे.. वैशाली इतनी उत्तेजित हो गई थी की राजेश कुछ करे उससे पहले ही उसने हाथ नीचे डालकर उसका लंड पकड़ लिया और धीमे से कान में बोली

"कुछ मत बोलीये.. किसी को पता नही चलना चाहिए की इस क्यूबिकल में हम दोनों है.. एकदम शांत रहिए" वैशाली ने अपना टीशर्ट ऊपर कर दिया और अपने दोनों खिलौने राजेश को खेलने के लिए दे दिए.. मर्द का हाथ उसके स्तनों को स्पर्शते ही वैशाली के चेहरे पर खुमार छाने लगा.. बियर का नशा अपना काम कर रहा था और राजेश का हाथ भी..






राजेश का हाथ वैशाली की गीली पुच्ची तक कब पहुँच गया इसका दोनों को पता ही नही चला.. टॉइलेट की संकरी जगह में वैशाली और राजेश सर दोनों को तकलीफ हो रही थी.. पर दोनों इतने उत्तेजित थे.. जैसे एक दूसरे के जिस्मों को नोच खाना चाहते हो.. राजेश को कब से ललचा रहे वैशाली के बड़े बड़े तंदुरुस्त उरोज.. राजेश ने दोनों हाथों से पकड़कर अनगिनत बार चूम, चाट और काट लिए.. वैशाली को दर्द हो रहा था फिर भी वह चुप थी क्यों की जरा सी भी आवाज उनका भांडा फोड़ सकती थी.. दोनों फटाफट अपनी वासना को तृप्त करने की फिराक में एक छोटा पर रसीला प्रोग्राम कर देना चाहते थे.. जल्द से जल्द हॉल में पहुँचना भी जरूरी थी.. वरना लोगों को शक होने की गुंजाइश थी..

वैशाली ने तुरंत ही अपनी पेन्टी को घुटनों तक सरकाते हुए स्कर्ट ऊपर चढ़ा दिया और फिर उलटी होकर बोली "प्लीज सर.. जल्दी कीजिए.. डाल दीजिए फटाफट" हल्की रोशनी में जगमगाते हुए वैशाली के चरबीदार कूल्हों पर थपकी लगाते हुए राजेश ने उन नितंबों को चौड़ा किया..

"सर वक्त बहोत कम है.. वो सब आराम से बाद में देख लेना.. " उत्तेजनावश अपनी गांड को गोल गोल घुमाते हुए राजेश को आमंत्रित कर रही थी.. राजेश ने वैशाली की कमर को पकड़ा और अपने कड़े लंड को दोनों कूल्हों के बीच में लगाया..

"ईशशश.. सर.. वहाँ नही.. थोड़ा सा नीचे" अपने गांड के छेद पर राजेश के लंड के सुपाड़े का स्पर्श होते ही वैशाली ने सहम गई

"अरे यार.. इतना अंधेरा है.. कुछ दिखना भी तो चाहिए.. " राजेश ने परेशान होते हुए कहा

"सर, आप एक बार जीभ से चाटिए ना.. मुझे बिना चटवाए मज़ा ही नही आता" वैशाली की विनती को सन्मान देते हुए राजेश झुककर नीचे बैठ गया और उसके दोनों चूतड़ों को फैलाकर पहेले गांड और फिर चूत को चाटने लगा.. वैशाली उत्तेजित होकर गांड उछालने लगी.. राजेश तुरंत खड़ा हो गया और वैशाली की चूत में एक धक्के में ही अपना पूरा लंड डाल दिया.. वैशाली सिसकने लगी.. राजेश ने धीरे धीरे धक्के लगाना शुरू किया और फिर स्पीड पकड़ ली..








वैशाली के कूल्हों से राजेश की जांघों के टकराने की वजह से आवाज आ रही थी.. जब वो आवाज काफी ऊंची हो गई तब दोनों ने घबराकर गति धीमे कर दी.. और फिर से अपनी लय प्राप्त कर ली.. डरते डरते सेक्स करने का मज़ा ही अलग होता है.. करीब दो मिनट तक ऐसे ही धक्के लगाने के बाद राजेश ने अपने सख्त लंड से आखिर के तीन चार धक्के इतने जोर से लगाए की वैशाली की आँखों में पानी आ गया.. उसेके पेट में दर्द होने लगा.. और साथ ही साथ उसकी चूत भी ठंडी हो गई.. राजेश ने भी चूत को अपने वीर्य से सराबोर कर दिया..

अंधेरे माहोल की इस चुदाई के बाद वैशाली घूम गई और राजेश के लंड के प्रति आभार प्रकट करते हुए उसे झुककर चूमने लगी.. राजेश ने उसे बाहों में भर लिया और उसके होंठों को चूम लिया.. राजेश के लंड से खेलते हुए वैशाली ने एकदम धीमी आवाज में उसके कान में कहा "ये रात मुझे ज़िंदगी भर याद रहेगी.. आशा है की आपको भी मज़ा आया होगा.. अगर किस्मत रही तो फिर मिलेंगे.. मैं आपके साथ शांति से समय बिताना चाहती हूँ.. आपका स्वभाव मुझे बहोत पसंद आया.. आशा है की आप मेरी मित्रता का स्वीकार करेंगे.. हमारा शरीर संबंध तो बड़ा ही अनोखा रहा.. लेकिन लौटने के बाद क्या मैं आप से बिना किसी जिस्मानी संबंधों की मित्रता की अपेक्षा रख सकती हूँ ?"

राजेश वैशाली के सुंदर स्तनों को अपने दोनों हाथों से दबाते हुए बोला "वैशाली, हम बड़े अच्छे मित्र बनेंगे.. शरीर का संबंध बने या न बने.. उससे मुझे फरक नही पड़ता.. पर तेरे ये सुंदर स्तनों ने मुझे आज पागल ही कर दिया.. इन्हे दबाने की आशा तो मैं हमेशा रखूँगा ही.. लेकिन ये वादा है मेरा.. की जो भी होगा वो तुम्हारी इच्छा और स्वीकृति से ही होगा.. एक विनती करना चाहूँगा.. तुम्हें कभी भी फिर से ये दोहराने की इच्छा हो तो बेझिझक मेरे पास चली आना.. तुम्हारे जिस्म को पाने के लिए मैं हमेशा बेताब रहूँगा.. और कुछ पाए या न हो पाएं.. एक हल्की सी किस.. थोड़ा सा स्पर्श.. इतना भी मेरे लिए काफी होगा !!"

"ठीक है सर" हँसते हुए वैशाली ने राजेश के होंठों को चूम लिया.. "सर, पहले मैं बाहर देख लूँ.. पेसेज में कोई है तो नही.. मैं इशारा करूँ उसके बाद ही आप निकलना " राजेश अब भी वैशाली के स्तनों को छोड़ नही रहा था.. दबाए ही जा रहा था

"सर अब आप मुझे छोड़ेंगे तो मैं बाहर निकलूँ" वैशाली ने हसनते हुए कहा

"असल में तेरी ब्रेस्ट इतनी आकर्षक है की मुझसे रहा नही जाता.. अब तुमने बिना जिस्मानी संबंधों वाली मित्रता की बात की है.. तो मैं ये सोच रहा हूँ की इन स्तनों दोबारा न जाने कब देखने को मिले.. " राजेश ने कहा


"हम्म.. ओके सर.. ये लीजिए मेरी तरफ से माउंट आबू की ये आखिरी भेंट" कहते हुए उसने राजेश का चेहरा पकड़कर अपने स्तनों पर दबा दिया और उसके लंड को पकड़कर मसल दिया.. फिर वैशाली ने अपने आप को राजेश की गिरफ्त से मुक्त किया और धीरे से दरवाजा खोला.. पेसेज में कोई नही था.. उसने हाथ पकड़कर राजेश को बाहर खींचा.. "सर आप पहले जाइए.. कोई पूछे तो कहना वैशाली टॉइलेट गई है"



"ओह वैशाली.. " कहते हुए राजेश ने एक बार फिर वैशाली के स्तनों को वस्त्रों के ऊपर से ही पकड़कर दबा दिया और फिर न चाहते हुए भी मुड़कर चलने लगा.. वैशाली फिर से अंदर गई.. और नल से पानी लेकर अपनी चूत को धोने लगी.. राजेश के लंड का सारा वीर्य उसने ठीक से साफ किया.. साफ करते करते उसकी मुनिया फिर से चुनमुनाने लगी.. उंगली से क्लिटोरिस को रगड़कर फिर से उसे शांत किया.. अपने स्तनों को ठीक से ब्रा के अंदर दबा दिए.. और अपने बाल ठीक कर दस मिनट बाद बाहर निकली..

जैसे ही वो अपने क्यूबिकल से बाहर निकली.. थोड़े से दूर बने क्यूबिकल का दरवाजा खुला और उसमें से पीयूष बाहर निकला.. पीयूष की नजर वैशाली पर नही थी.. वो तुरंत दरवाजा खोलकर बाहर की ओर भागा.. लेडिज टॉइलेट में पीयूष???? जरूर कुछ खिचड़ी पक रही थी.. पीयूष अंदर किसी के साथ ही घुसा होगा.. साथ जो भी था.. हो सकता है की वो वैशाली के निकलने से पहले ही चला गया हो.. या फिर अभी भए क्यूबिकल के अंदर ही हो? पता करने का बस एक ही तरीका था.. वैशाली बेज़ीन के पीछे लगे बड़े पत्थर के पीछे छुपकर इंतज़ार करने लगी

थोड़ी ही देर में दरवाजा खुलने की आवाज आई.. वैशाली का दिल जोरों से धड़कने लगा.. कौन होगा? कविता? नही नही.. उन दोनों के बीच तो झगड़ा चल रहा है.. जरूर वो रांड मौसम होगी.. वही कब से मेरे और पीयूष के बीच हड्डी बनकर बैठी हुई है.. पीयूष भी कमीना अपनी साली के पीछे लट्टू होकर घूमता रहता है.. उसकी कच्ची कुंवारी चूत को एकबार चोदकर ही दम लेगा वो.. जैसी जिसकी किस्मत.. नुकसान तो कविता को ही होगा.. कविता भी बेवकूफ है.. उसे इतना भी पता नही चलता की जवान कुंवारी बहन को अपने रोमियो पति के साथ घूमने देना ही नही चाहिए उसे.. और मौसम भी एक नंबर की मादरचोद है.. अपने कच्चे बबले दिखा दिखा कर पीयूष को पागल बना देती है.. जैसे स्तन सिर्फ उसके पास ही है.. मेरे मुकाबले में मौसम के छोटे स्तनों की कोई औकात ही नही है..

वैशाली के दिमाग में ये सारे विचार चल रहे थे तभी पेसेज में किसी के आने की चहलकदमी सुनाई दी.. और वो जो भी थी वह फिर से क्यूबिकल के अंदर चली गई और अंदर से दरवाजा बंद कर दिया.. वैशाली के लिए ज्यादा देर तक छुपे रहना मुमकिन नही था.. क्यों की लेडिज टॉइलेट के दरवाजे से अंदर आते हुए वह साफ दिख रही थी..

वैशाली बाहर निकल गई और चलते हुए हॉल में आ पहुंची.. वह आकर राजेश सर के बाजू में बैठ गई.. पर यहाँ से उसे टॉइलेट वाला पेसेज नजर नही आ रहा था.. उसने राजेश से कहा "सर आपको एतराज न हो तो क्या आप मेरी कुर्सी पर आ सकते है.. यहाँ एसी की ठंडी हवा सीधे मेरे सर पर लग रही है"

"ओ स्योर.. " कहते हुए राजेश खड़ा होकर वैशाली की चैर पर बैठ गया और वैशाली राजेश की चैर पर.. अब यहाँ से पेसेज बिल्कुल साफ नजर आ रहा था.. वैशाली थोड़ी थोड़ी देर पर.. राजेश से बातें करते हुए.. नजरें चुराकर पेसेज की ओर देख लेती..

राजेश ने धीमे से वैशाली के कान में कहा "यार वैशाली.. तेरी तो बहोत टाइट थी.. मज़ा आ गया यार.. "

"थेंक यू सर" वैशाली ने शरमाते हुए नजरे झुका ली

वैशाली बेचैन नज़रों से पेसेज की ओर देख रही थी.. उसके यहाँ बैठने के बाद कोई अंदर गया भी नही था और बाहर आया भी नही था.. उसने पीयूष की ओर देखा.. वो तो आराम से म्यूज़िक के ताल पर झूमते हुए बियर पी रहा था.. वैशाली ने ये भी नोटिस किया की पीयूष भी बार बार पेसेज की ओर देख रहा था.. बहोत खुश लग रहा था पीयूष..

ना चाहते हुए भी राजेश की बातों को सुन रही थी वैशाली.. उसका सारा ध्यान पेसेज पर ही था.. वो कौन थी जो उसके पीयूष को अपनी जाल में फंसा रही थी? तभी पेसेज से एक परछाई आती हुई नजर आई.. धीरे धीरे वह परछाई हॉल की तरफ आते देख वैशाली टकटकी लगाकर पहचानने की कोशिश करने लगी..

चेहरा स्पष्ट दिखते ही वैशाली के पैरों तले से जमीन खिसक गई!!! अपनी आँखों पर विश्वास नही हो रहा था उसे.. !!! नालायक पीयूष.. ये क्या किया तूने? कब से लगा हुआ है इनके साथ? रेणुका और पीयूष?? ओह माय गॉड.. ये मैं क्या देख रही हूँ?? साला ये पीयूष तो खिलाड़ी निकला.. हरामी.. मादरचोद.. एक साथ कितनों को लपेटें रखा है उसने!! कभी मेरे साथ.. कभी मौसम के साथ.. और अब रेणुका के साथ भी.. !!!
 
चेहरा स्पष्ट दिखते ही वैशाली के पैरों तले से जमीन खिसक गई!!! अपनी आँखों पर विश्वास नही हो रहा था उसे.. !!! नालायक पीयूष.. ये क्या किया तूने? कब से लगा हुआ है इनके साथ? रेणुका और पीयूष?? ओह माय गॉड.. ये मैं क्या देख रही हूँ?? साला ये पीयूष तो खिलाड़ी निकला.. हरामी.. मादरचोद.. एक साथ कितनों को लपेटें रखा है उसने!! कभी मेरे साथ.. कभी मौसम के साथ.. और अब रेणुका के साथ भी.. !!!



"कब से क्या देख रही हो वैशाली? रेणुका को आज से पहले देखा नही क्या तुमने?" हँसते हुए राजेश ने कहा.. वो कब से वैशाली को रेणुका को देखते हुए देख रहा था.. परदे के पीछे क्या खेल चल रहे थे उसका राजेश को कोई इल्म नही था

वैशाली को एक पल के लिए ऐसा लगा जैसे उसे रंगेहाथों किसी ने पकड़ लिया हो.. बात को घुमाते हुए उसने कहा "अरे सर.. मुझे रेणुका जी की साड़ी बहोत पसंद आ गई.. इसलिए कब से उन्हें देख रही हूँ.. कितनी खूबसूरत लगती है वो.. कोई नही कहेगा की उनकी उम्र ४० के करीब है.. तीस साल से जरा भी ज्यादा की नही लगती.. लगता है आपकी संगत का असर है " आँखें लड़ाते हुए उसने राजेश से कहा

"हाँ वो तो है.. हम दोनों खूब इन्जॉय करते है.. लेकिन बिजनेस के चलते काफी समय से मैं उसे वक्त नही दे पा रहा.. अब यहाँ आकर कुछ वक्त साथ बिताने का मौका मिला है.. उसी की चमक है रेणुका के चेहरे पर.. इसके लिए मुझे पीयूष का भी आभार प्रकट करना चाहिए.. उसके आने के बाद ही मुझे ऑफिस से थोड़ा सा वक्त मिल पा रहा है.. और वही वक्त मैं रेणुका के साथ बीताता हूँ.. वरना पिछले तीन सालों में हम मुश्किल से तीन महीने ही साथ रहे है.. आई एम प्राउड ऑफ माय वाइफ.. मेरे इतने बीजी शिड्यूल के बावजूद उसने मुझे कभी एक लबज़ तक नही कहा.. अगर पीयूष मुझे न मिला होता तो हमारा संसार टूटने की कगार पर ही था.. ये तो अच्छा हुआ की रेणुका की एक सहेली शीला जी की सिफारिस पर मैंने पीयूष को इंटरव्यू के लिए बुलाया और सिलेक्ट कर लिया.. पीयूष उनका पड़ोसी है.. " राजेश ने एक सांस में ही पूरी कथा सुना दी

वैशाली के दिमाग में विचारों की शृंखला सी चल पड़ी ...अच्छा.. मतलब मम्मी ने ही रेणुका जी से बात करके पीयूष को नौकरी पर लगवाया है.. लेकिन पीयूष और रेणुका का सेटिंग हुआ कैसे होगा? इस सवाल का जवाब ढूँढना बेहद जरूरी था..

वैशाली: "शीला जी मेरी मम्मी है.. और पीयूष हमारा पड़ोसी है.. हम बचपन में साथ खेलकर बड़े हुए है.. और मैं उसे बहोत अच्छी तरह जानती हूँ.. बहोत ही होनहार लड़का है पीयूष" यह कहते हुए वैशाली मन में सोच रही थी.. जिस तरह उस दिन रेत के ढेर में मुझे रगड़कर चोदा था.. पीयूष होनहार तो है ही..

वैशाली: "कितना वक्त हुआ पीयूष को आपकी कंपनी जॉइन कीये हुए?"

राजेश: "ज्यादा नही.. बस दो महीने हुए है.. पर इतने समय में ही उसने जिस तरह काम किया है.. काबिल-ए-तारीफ है.. लड़का बहोत आगे जाएगा.. !!"

वैशाली सोचने लगी.. कुछ तो बात थी.. सिर्फ दो महीनों में ही पीयूष और रेणुका इतने करीब कैसे आ गए? कहीं नौकरी लगने से पहले ही दोनों का चक्कर चल रहा होगा क्या? और रेणुका मम्मी को कैसे जानती है? कहीं उन दोनों के बीच तो कहीं.. नही नही.. मुझे मम्मी के बारे में इतना गंदा नही सोचना चाहिए..

वैशाली जब विचारों में खोई हुई थी तब सिगरेट के धुएं के छल्ले उड़ाते हुए वैशाली के स्तनों को तांक रहा था.. अभी कुछ वक्त पहले ही इन्हे दबाए थे.. आहाहा.. कितना मज़ा आया था.. गले में पहने मंगलसूत्र के नीचे दिख रही दो स्तनों के बीच की खाई देखकर ही अंदर हाथ डालने का मन होने लगा राजेश को.. !! कितनी नाजुक और मदमस्त है.. !! एक पुरुष को जो चाहिए वह सब था वैशाली में..

दोनों चुपचाप एक दूसरे को देख रहे थे.. वैशाली सोच रही थी.. मम्मी और रेणुका के बीच कैसे संबंध होंगे? पापा काफी समय से विदेश है और रेणुका का पति भी ज्यादातर बाहर ही रहता है.. ऐसी स्थिति में कहीं दोनों ने मिलकर पीयूष के साथ ही.. ?? बाप रे.. क्या ऐसा हो सकता है?? हो तो सकता है.. पापा के बगैर दो साल मम्मी बिना सेक्स के तो रही नही होगी.. मैं खुद तीन-चार दिन से अधिक बिना सेक्स के पागल सी हो जाती हूँ.. संजय के बिना मुझे भी कितनी तकलीफ होती है!! कितनी रातें मैंने करवटें बदल कर और उँगलियाँ घिस घिसकर काटी है.. लेकिन उंगली में वो मज़ा कहाँ!! पुरुष का वो खास अंग जब अंदर स्पर्श करता है तब जो रियल टच की अनुभूति होती है.. वो उंगली में कभी नही मिल सकती.. अगर थोड़े दिन बिना सेक्स के रहना पड़े तो मेरी यह दशा होती है.. तो मम्मी और रेणुका को तकलीफ होना भी जायज था.. आखिर वह दोनों भी इंसान है और उनकी अपनी जरूरतें होंगी ही.. और यही इच्छा जब बेकाबू बनी होगी तभी रेणुका और पीयूष का संबंध बना होगा.. पर इन सब में मम्मी बीच में कहाँ से आई? क्या वो भी पीयूष के साथ करती होगी? हो सकता है.. शायद कोई ओर मर्द भी हो मम्मी के जीवन में.. जितना सोचती जा रही थी उतना ही उलझ रही थी वैशाली..

राजेश: "एक बात पूछूँ वैशाली?"

वैशाली: "हाँ पूछिए न, सर.. !!" पीयूष, रेणुका और मम्मी को अपने दिमाग से निकालकर सामने बैठे राजेश पर उसने ध्यान केंद्रित किया

"अभी थोड़ी देर पहले मैंने तुझे काफी रीक्वेस्ट की थी.. किस और स्पर्श के लिए.. तब तो तुमने साफ साफ मना कर दिया था.. फिर अचानक ऐसा क्या हुआ जो तुमने मुझे टॉइलेट के अंदर खींच लिया? इस बात का ताज्जुब हो रहा है मुझे"

"आपकी बात और सोच बिल्कुल सही है सर.. मैंने पहले तो आपको मना किया था.. पर जैसे जैसे हम बात करते गए.. मुझे आपकी कंपनी में बहोत मज़ा आने लगा.. और माउंट आबू के इस रंगीन आजाद माहोल में.. बियर के नशे में.. मैंने कंट्रोल खो दिया सर.. !!"

"अच्छा.. मतलब तुम कंट्रोल खोकर मुझसे लिपट जाओ तो कोई प्रॉब्लेम नही.. और अगर मैं कंट्रोल खो कर सिर्फ एक किस मांग लूँ तो मेरी प्रपोज़ल रिजेक्ट?? ऐसा क्यों?"

वैशाली हंस पड़ी "सर, जो आउट ऑफ कंट्रोल होते है वो कभी प्रपोज नही करते.. सीधा पकड़ ही लेते है.. !! आपने प्रपोज किया क्यों की आप कंट्रोल में थे.. अगर आप आउट ऑफ कंट्रोल होते तो सीधा पकड़कर किस कर लेते.. पूछते नही !!"

"वो तो मैं कर ही सकता था.. पर फिर तुम मेरे बारे में क्या सोचती.. !! यहाँ इस वक्त तुम मेरी मेहमान हो.. तुम्हारी मर्जी के खिलाफ मैं कैसे कुछ कर सकता था?"

वैशाली: "बात तो आपकी सोलह आने सच है सर.. देखिए.. अगर हम चार धाम की यात्रा के दौरान ऐसा कुछ करते तो गलत होता.. पर यहाँ माउंट आबू का वातावरण ही अलग है.. रात का माहोल.. हाथ में बियर का ग्लास.. और ऐसे उत्तेजक कपड़ों में लड़कियां आस पास मंडरा रही हो.. तब थोड़ा सा ऊपर नीचे हो जाए तो हर किसी को थोड़ा समझना चाहिए.. अब ईसे देखो.. पीयूष की वाइफ कविता को.. जिस तरह के कपड़े उसने पहने है.. देखकर कितने मर्दों को इरेक्शन हो गया होगा.. !!"

राजेश: "कहीं तुम्हारे कहने का मतलब ये तो नही है न की ऐसा कुछ न करके मैंने गलती कर दी?? अगर ऐसा है तो मैं अपनी उस गलती को अभी सुधार लेने को तैयार हूँ"

"मतलब??" वैशाली रोमांचित हो गई राजेश की बात सुनकर.. "अरे मैं तो बस मज़ाक कर रही हूँ.. " कहते हुए उसने बात को वहीं रोकने की कोशिश की.. पर राजेश इस बात का अंत लाने को तैयार नही था

"वैशाली, तेरी छाती पर ये जो मंगलसूत्र के बीच की लकीर दिख रही है ना.. वहाँ किस करने का बहोत मन कर रहा है.. अब अगर मैं इजाजत माँगता हूँ तो तुम कहोगी की मैं कंट्रोल में हूँ.. और अगर सीधे सीधे किस कर लेता हूँ तो तुम्हें लगेगा की मैंने तुमसे जबरदस्ती की.. अब बोलो.. मैं क्या करूँ?"

वैशाली एकदम ही शरमा गई.. आसपास करीब ४० लोग थे और उसमे से काफी लोग पहचान के भी थे.. अगर बियर के नशे में राजेश ने सब के बीच कोई उलटी सीधी हरकत कर दी तो.. बाप रे!!

"सर, आप भी ना.. बड़े वो हो.. !!"

राजेश: "क्यों?? मैंने पूछकर कुछ गलत किया क्या?"

वैशाली: "अरे नही नही.. मेरे कहने का ये मतलब था की पहले हमने जो कुछ भी किया वो चार दीवारों के बीच सब की नज़रों से दूर किया था.. और अभी आप मुझे सब के सामने छाती पर किस करना चाहते हो.. अगर रेणुका मैडम ने देख लिया तो आपको माउंट के ऊपर से ही धक्का दे देगी.. अगर आसपास कोई नही होता तो बात अलग थी.. "

"अच्छा? ये बात है? तो चलो वापिस टॉइलेट में चलते है" राजेश ने वैशाली को चोंका दिया..

वैशाली सोच में पड़ गई.. अब क्या करें? बार बार टॉइलेट में थोड़े ही जा सकते है? कोई देख लेगा तो शक हो जाएगा..

"सोच क्या रही हो? ये लो.. एक दो दम लगाओ.. तो कुछ दिमाग काम करेगा" सिगरेट देते हुए राजेश ने कहा

वैशाली ने एक दम लगाते हुए कहा "सर, अभी थोड़ी देर पहले ही आपने खोलकर दबाए है.. चूसे भी है.. अभी एक छोटी सी लकीर के लिए इतनी जिद क्यों कर रहे हो? भरपेट खाना खा लेने के बाद.. सौंफ और मिस्री के पीछे पड़े हो.. !!"

"बात तो तुम्हारी सही है.. लेकिन कभी कभी खुली छाती देखकर भी इतनी उत्तेजना नही होती जो छोटी सी लकीर को देखकर होती है"

वैशाली ने आसपास देखा.. सब अपनी मस्ती में खोए हुए थे.. उसने टेबल पर झुककर अपने दोनों स्तनों को टीका दिया.. उसके साथ ही उसके स्तन उभरकर बाहर निकले.. और बीच की खाई काफी गहरी नजर आने लगी.. यौवन के शिखरों जैसे स्तनों को दिखाकर वैशाली ने कहा "फिलहाल तो आप बस देखकर ही काम चला लीजिए.. अगर मौका मिलें तो मैं खुद ही आपसे दबवा लूँगी.. ठीक है!! असल में.. मैं खुद भी दबवाना चाहती हूँ"

वैशाली के उभरते उरोजों को देखकर राजेश बेकाबू हो गया.. और वैशाली की कामुक बातों ने उसे ओर उत्तेजित कर दिया

राजेश: "वैशाली, मुझसे तो अब रहा नही जाता.. कुछ भी कर.. पर मुझे इन्हे चूसने दे प्लीज.. आह्ह.. थोड़ी और पास आ तो मैं इन्हें छु सकूँ.. दूर क्यों भाग रही हो यार?? या तो फिर चल मेरे साथ टॉइलेट में.. " राजेश अपना आपा खो रहा था.. और साथ ही साथ उसकी बातें सुनकर वैशाली की पुच्ची भी फुदक रही थी..

"नही सर.. आप प्लीज समझने की कोशिश कीजिए.. ये तो मैंने आपको शांत करने के लिए दिखाए.. बाकी आप देख ही सकते है.. आसपास कितने सारे लोग है!!"

"मैं तेरी बात समझ रहा हूँ.. पर तू भी जरा टेबल के नीचे जाकर मेरी हालत देख?" राजेश ने कहा

जानबूझ कर हाथ से चम्मच गिराते हुए वैशाली ने टेबल के नीचे देखा "अरे बाप रे!! ये क्या कर रहे है आप सर? अंदर रख दीजिए.. किसी ने देख लिया तो आफत आ जाएगी.. " टेबल के नीचे राजेश ने अपने पेंट की चैन खोलकर अपना फनफनाता हथियार हाथ में पकड़ा हुआ था.. वैशाली का चेहरा शर्म और उत्तेजना से लाल हो गया.. वो भी गरम हो गई.. खुलेआम लंड देखने का यह पहला मौका था वैशाली के लिए..






वैशाली ने आसपास नजर डाली.. कहीं कोई सलामत जगह मिल जाएँ तो चुदाई का दूसरा राउंड कर लेने के लिए.. पर हॉल के अंदर ऐसी कोई जगह नही दिखी जहां वो राजेश के लंड और अपनी चूत को ठंडी कर सकें..

"प्लीज वैशाली.. अगर तुम मुझे अपनी क्लीवेज पर किस नही करने दोगी तो ये बैठेगा ही नही.. और जब तक ये बैठेगा नही तब तक मैं उसे पेंट के अंदर नही डाल पाऊँगा" राजेश ने विनती की

खुले वातावरण में लंड देखकर वैशाली की नियत भी डगमगा गई थी पर यहाँ पर कुछ भी करना मुमकिन नही था.. क्या करूँ? एक तरफ चूत में हो रही खुजली.. तो दूसरी तरफ प्राइवसी की तकलीफ.. खुले में थोड़े ही ये सब हो सकता है?

अचानक वैशाली को एक आइडिया सुझा.. हॉल के इस भाग की दीवार पर.. करीब चार फुट ऊपर एक कांच का कपबोर्ड बना था.. जिसके अंदर किताबें रखी थी

वैशाली: "सर, एक काम करते है.. मैं उस कपबोर्ड से किताब लेने खड़ी हो जाती हूँ.. सब लोगों की तरह मेरी पीठ होगी।। जब तक मैं किताब को निकालूँ उस दौरान आपको जो करना है कर लीजिए.. ठीक है!! पर आस पास देखते रहना.. और कहीं कुछ रिस्क लगे तो मुझे इशारा कर देना.." कहते हुए वैशाली ने खड़े होकर आसपास एक नजर दौड़ाई.. किसी की नजर उन पर नही थी.. पर खड़े होने के कारण उसके उभरे हुए स्तन वापिस ब्रा के अंदर चले गए.. लेकिन राजेश अब पीछे हटने के मूड में नही था.. जैसे ही वैशाली कपबोर्ड का कांच का दरवाजा खोलने के लिए झुकी.. उसके स्तन राजेश के मुंह के बिल्कुल ही करीब आ गए.. राजेश ने वैशाली की गदराई क्लीवेज पर अपनी जीभ फेर दी.. और एक स्तन भी दबा लिया.. वैशाली किताब को ढूँढने में वक्त लगा रही थी.. और काफी देर तक वह ढूंढती रही और राजेश का ज्यादा से ज्यादा मौका देती रही.. दोनों पेट्रोल से आग बुझाने की कोशिश कर रहे थे.. ऐसी हरकतों से कभी आग नही बुझती.. उल्टा और भड़क जाती है.. राजेश ने हिम्मत करके वैशाली के टॉप में हाथ डालकर उसके स्तनों को मसल लिया.. वैशाली को भी राजेश का लंड हाथ में पकड़ने की तीव्र इच्छा हो रही थी






"कोई देख तो नही रहा??" वैशाली ने एकदम धीमी आवाज में पूछा.. "अगर कोई देख रहा हो तो मैं एक किताब बाहर निकालूँ.. वरना ऐसे ही बैठ जाती हूँ"

"नही, कोई नही देख रहा.. तुम बैठ जाओ"

वैशाली ने कपबोर्ड बंद किया और बैठ गई..

"अब मिल गई आपको ठंडक?" वैशाली ने कहा

"हाँ यार.. वैशाली.. तेरे जिस्म में कुछ तो ऐसी खास बात है.. किसी स्त्री को देखकर इतना उत्तेजित मैं कभी नही हुआ पहले" राजेश के हाथ की हलचल देखते हुए वैशाली को साफ पता चल रहा था की वो टेबल की नीचे मूठ लगा रहे थे.. उसके स्तनों को देखकर !!

"यार वैशाली.. वापिस टेबल पर झुक जा.. तेरे बॉल छलक कर बाहर दिखेंगे तो मेरा जल्दी छूट जाएगा.. !!" राजेश बेचैन चेहरे से अपने लंड की ओर देख रहा था

"नही सर.. अभी आप छोड़ मत देना.. मुझे भी खेलना है उसके साथ.. आपका काम तो हो गया.. अब मेरी बारी.. " कहते हुए वो टेबल के नीचे घुस गई और एक ही सेकंड में राजेश का लंड उसके मुंह में था.. !! फटाफट उसने सात आठ बार लंड को मुंह में अंदर बाहर किया और तुरंत वापिस चैर पर बैठ गई.. "बस सर.. अब इससे ज्यादा कुछ नही हो सकता.. आप अपना पानी निकाल लो.. और मैं अपना निकालती हूँ.. " कहते ही वैशाली ने अपने स्कर्ट के अंदर हाथ डालकर चुत को रगड़ना शुरू कर दिया.. अचानक वैशाली को अपनी कलाई पर कुछ गरम एहसास हुआ.. पर अपनी चूत रगड़ते हुए उसे ये देखने का समय नही था.. दो तीन मिनटों तक चूत की भरसक रगड़ाई करने के बाद.. वो भारी सांसें लेते हुए झड़ गई.. अब उसने अपनी कलाई पर नजर डाली.. उस पर राजेश का वीर्य लगा हुआ था.. हँसते हुए वैशाली ने उन बूंदों को अपनी कलाई से चाट लीया.. और फिर अपनी जिन उंगलियों से उसने अपनी चुत को रगड़ा था.. उन गीली उंगलियों को राजेश के बियर भरे ग्लास में डुबोते हुए बोली "अब बियर का असली स्वाद मिलेगा.. ये आज का आखिरी ग्लास मेरा..!!"






"हाँ यार.. मुझे भी कुछ ज्यादा ही चढ़ गई आज.. " वैशाली की बात से सहमत होकर राजेश ने कहा

दोनों ने बियर का ग्लास खतम किया और सिगरेट सुलगा कर पार्टी में जुड़ गए.. सब लोग नशे में धुत थे और मस्ती से झूम रहे थे.. डांस करते हुए सब जान बूझकर कविता के जिस्म और बोब्बों से टकरा रहे थे.. कविता भी शायद बियर के नशे में थी.. वो भी पागलों की तरह झूम रही थी.. पीयूष मौसम के कंधे पर हाथ रखकर कुछ गुफ्तगू कर रहा था.. और पिंटू फाल्गुनी को कंपनी दे रहा था.. पूरी पार्टी में सिर्फ पीयूष, मौसम और फाल्गुनी ही ऐसे थे जिन्हों ने शराब नही पी थी..

रेणुका की बर्थडे पार्टी और आबू की ट्रिप अपने अंत की ओर बढ़ रही थी.. पीयूष अभी अभी रेणुका को चोदकर आया था.. फिर भी मौसम के कंधों पर हाथ रखकर बार बार उसके उभारों को छु रहा था.. वैशाली ये सब देखकर गुस्से से आग बबूला हो रही थी.. पर वो कर भी क्या कर सकती थी!! हाँ.. कविता जरूर कुछ कर सकती थी.. लेकिन उसे फिलहाल पीयूष की पड़ी नही थी.. और अपनी मस्ती में ही मस्त थी.. पीयूष का हाथ बार बार मौसम के उभारों पर होते हुए उसकी निप्पल पर चले जाते तब मौसम उसका हाथ हटा देती..

लेकिन पीयूष के सर पर तो हवस का भूत सवार था.. थोड़ी देर शांत रहकर वह वापिस अपनी हरकतें शुरू कर देता.. आखिर बगल में मौसम जैसी कच्ची कली खड़ी हो.. और अपने आकर्षक उभार दिखा रही हो.. और सब कुछ करने को राजी भी हो.. तब कोई कैसे खुद को कंट्रोल करें!! गलती पीयूष की नही थी.. पर मौसम की जवानी ही कुछ ऐसी कातिल थी.. की उसके चक्कर में पीयूष सब को भूल चुका था.. वैशाली, शीला, रेणुका.. अरे अपनी कविता को भी भूल चुका था.. सौन्दर्य का जादू अक्सर जानलेवा होता है.. मौसम तो अपने जिस्म पर पुरुष का स्पर्श पाकर अपनी ट्रिप को यादगार बना चुकी थी.. जीवन की पहली किस भी उसे यही मिली थी.. वो जितना पीयूष से दूर जाने की कोशिश करती.. उतना ही ज्यादा आकर्षित हो रही थी.. अपने आप से वो बार बार पूछ रही थी.. वो क्या बात थी जो उसे पीयूष की ओर खींचती जा रही थी? इतनी कोशिशों के बावजूद भी? अपनी बहन के पति के साथ ये सब करने का परिणाम कितना भयानक हो सकता है ये जानने के बावजूद भी वह खुद को क्यों नही रोक पा रही थी इस बात का उसे भी आश्चर्य हो रहा था.. मौसम को इन सब में मज़ा भी आ रहा था और डर भी लग रहा था..

मौसम के कंधों पर हाथ रखे हुए पीयूष रेणुका को कुछ इशारे कर रहा था.. ये वैशाली ने देख लिया.. वैशाली पीयूष के पास आकर गाना गुनगुनाने लगी.. "कहीं पे निगाहें.. कहीं पे निशाना" वैशाली के कदम लड़खड़ा रहे थे.. जैसे मौसम और पीयूष के बीच हड्डी बनने के लीये आई हो.. वैसे वैशाली ने पीयूष के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा "क्या यार पीयूष? तू तो कविता को भूल ही गया!! जब से आया है तब से मौसम के साथ ही घूम रहा है!!"

मौसम का मुंह यह सुनकर इतना सा हो गया.. जैसे उसकी चोरी पकड़ी गई हो.. उसने झटके से अपने कंधे से पीयूष का हाथ हटा दिया.. और शरमाकर एक कोने में खड़ी हो गई..

वैशाली ने ये देखकर हँसते हुए कहा "अरे अरे.. टेक इट ईजी.. मैं तो बस मज़ाक कर रही थी.. " वैशाली को जो कहना था वो कह दिया और फिर बात को वापिस घुमा भी दिया.. स्त्रीओं को इस कला में महारथ हासिल होती है.. लेकिन मौसम अब डर गई थी.. झूठ-मूठ हँसते हुए उसने वैशाली से कहा "इट्स ओके.. मुझे बुरा नही लगा.." तभी नशे में झूमती हुई कविता वहाँ आ पहुंची.. उसके कपड़े देखकर पीयूष को शर्म आ रही थी.. पर अभी सब के सामने उसे कुछ भी कह पाना मुमकिन नही था.. नशे की हालत में कविता बात का बतंगड़ बना देती.. पीयूष सब के बीच कोई तमाशा खड़ा करना नही चाहता था.. ऐसी कोई हरकत करके वो रेणुका को भी गंवाना नही चाहता था.. उसने मन में गांठ बांध ली थी.. कविता को जो कुछ भी कहना है वो घर पर जाकर कहेगा..

मौसम और वैशाली के बीच खड़े पीयूष को देखकर कविता ने उसकी उंगली की "अरे वाह पीयूष.. तेरे तो चारों तरफ गोपियाँ मंडरा रही है!! बाकी है तू पक्का रोमियो.. मैं ये सोच रही थी की तेरी जोड़ी किसके साथ ज्यादा जाचेगी? वैशाली के साथ या मौसम के साथ? किससे पूछूँ? एक काम करते है.. रेणुका जी से ही पूछ लेते है.. चल.. !!"

वैशाली और मौसम को सिट्टी पीट्टी गूम हो गई.. बाप रे!! आज कविता जरूर तमाशा खड़ा करेगी.. बात को घुमाते हुए वैशाली ने कहा

वैशाली: "पीयूष की जोड़ी तो सिर्फ कविता के साथ ही अच्छी लगती है.. आखिर दोनों पति पत्नी है.. पीयूष.. तू कविता के साथ खड़ा हो जा.. मैं अपने मोबाइल में तुम दोनों की तस्वीर लेकर दिखाती हूँ.. कितने अच्छे लगते हो साथ में तुम दोनों.. !! अगर तुम्हारी जोड़ी अच्छी नही लगी तो फिर हम रेणुका जी से पूछेंगे.. ठीक है?" नशे के असर में लड़खड़ाती हुई कविता ने कपड़े तो उत्तेजक पहने ही थे.. पर नाच नाचकर वह कपड़े अस्तव्यस्त भी हो गए थे.. टॉप के साइड से उसकी आधे से ज्यादा चूचियाँ नजर आ रही थी.. उसके कपड़ों से सुंदरता का कम और नग्नता का प्रदर्शन ज्यादा हो रहा था.. ऊपर से उसमें मिला शराब का नशा.. नशा चढ़ते ही कविता बेफिक्र होकर किसी की परवाह कीये बिना झूम रही थी.. और आस पास मंडराते भँवरे.. मौका मिलते ही इस फूल का रस चूसने में कसर नही छोड़ते थे..

पीयूष को कविता के बगल में खड़ा रखकर वैशाली ने जबरदस्ती फ़ोटो खींच ली.. और सब को दिखाने लगी.. अब देखने वाले ये तो नही कहेंगे की जोड़ी अच्छी नही लगती.. !! सब ने यही कहा.. की जोड़ी अच्छी है और पीयूष के मुकाबले कविता ज्यादा सुंदर लगती है.. अपने गुणगान और पीयूष का अपमान सुनकर बड़े ही आत्मसंतोष के साथ खुश होकर कविता पहले से भी ज्यादा उन्मुक्त होकर महफ़िल के मजे लेने लगी.. पीयूष ने जो बर्ताव उसके साथ किया था उसका दिल से बदला ले लिया था कविता ने और इसी बात का जश्न मना रही थी वो.. !!!

कविता के जाते ही मौसम और वैशाली ने चैन की सांस ली..

"आज बहोत बातें कर रही थी तू राजेश सर के साथ?" पीयूष ने पूछताछ शुरू कर दी वैशाली से

"हाँ पीयूष.. मैं अकेली थी.. तू तो मौसम के साथ ही चिपका हुआ था.. कविता तो अपनी मस्ती में थी.. और तुझे मौसम के अलावा और कोई दिख ही नही रहा.. मैं अकेली बोर हो रही थी.. अच्छा हुआ की राजेश सर ने अपना समय दिया.. और मेरी उदासी कम हुई.. बाकी जिसके साथ मस्ती करने के इरादे से मैं यहाँ आई थी.. उसे तो मेरी पड़ी ही नही है!!"



"अरे यार वैशाली.. तुझे बुरा लगा हो तो आई एम सॉरी.. मैं सामने से तुझे फोर्स करके यहाँ लाया था. तू बोर ना हो ये देखने की जिम्मेदारी मेरी है.. पर मौसम और फाल्गुनी थे इसलिए मैंने सोचा की तुझे कंपनी मिल जाएगी.. बाकी तू सोच रही है ऐसा कुछ नही है.. मेरा ध्यान हमेशा से तेरे ऊपर था.. "
 
पार्टी खत्म होने की कगार पर थी.. रेणुका ने सब को आखिरी बार संबोधित करते हुए कहा



"प्यारे परिवारजन, मेरे जन्मदिन को आप से सब ने अपनी उपस्थिति से यादगार बना दिया.. आप सब भविष्य में भी हमारे साथ जुड़े रहेंगे ऐसी अपेक्षा और विश्वास है.. अगली बर्थडे मैं बेंगकॉक में मनाना चाहती हूँ.. आप सब के साथ.. थेंक यू राजेश फॉर गीविंग मी सच अ मेमोरेबल पार्टी एंड थेंक यू एवरीबड़ी.. अगर किसी को भी कुछ तकलीफ हुई हो तो क्षमा चाहती हूँ.. इसके साथ ही आज की शानदार रात को यहीं खतम करते है.. आप सब अपने कमरे में जाकर आराम कीजिए.. कल सुबह साइट-सीइंग की लिए चलेंगे.. और दोपहर के बाद हम वापिस लौटने का सफर शुरू करेंगे.. गुड नाइट एंड स्वीट ड्रीम्स!!"

सब ने तालियों से पार्टी का समापन किया.. एक के बाद एक सब अपने कमरे की और जाने लगे.. सब के साथ कोई न कोई था.. सिर्फ वैशाली ही अकेली थी.. अपनी इस स्थिति से काफी व्यथित हो गई वैशाली.. सब के साथ कोई न कोई साथी था.. और वो यहाँ अकेली थी जब की संजय वहाँ किसी रांड की बाहों में पड़ा होगा..

साली कैसी कमबख्त ज़िंदगी है ये!!! आज संजय और मेरे बीच सब सही होता तो हम भी हाथ में हाथ डालकर डांस कर रहे होते.. पार्टी का अलग ही मज़ा आता.. बाकी कपल्स की तरह रूम में जाकर जबरदस्त चुदाई भी करते.. ऐसे खुले वातावरण में कितनी सारी इच्छाएं उठती है मन में!! पीयूष के साथ उतावला सेक्स और राजेश सर के साथ टॉइलेट में चुदाई ना करवानी पड़ती आज.. आराम से ए.सी. रूम में मुलायम बेड पर टांगें फैलाकर चुदवाती..!! सब निकल रहे थे और वैशाली इन खयालों के कारण उदास खड़ी हुई थी

"आप अभी भी यही खड़ी हो?? कमरे में चलना नही है क्या? सब चले गए.. " फाल्गुनी ने वैशाली का हाथ पकड़कर खींचा तब वैशाली अपने विचारों से बाहर आई.. वैशाली की आँखों के कोने में चमक रहें आंसुओं को देखकर वह समझ गई की कुछ तो गड़बड़ थी.. वरना इतनी शानदार पार्टी के बाद भला कोई उदास क्यों होगा!!

"इतनी उदास क्यों हो दीदी?" फाल्गुनी ने पूछा

"कुछ नही.. बस मेरे पति की याद आ गई थी.. "

"ओह्ह इतनी सी बात.. उदास क्यों हो रही हो.. फोन उठाओ और बात कर लो.. " नादान फाल्गुनी ने कहा

"नही फाल्गुनी.. मेरी समस्या गंभीर है.. तू नही समझेगी.. ज़िंदगी ने ऐसे अजीब मोड पर लाकर खड़ा कर दिया है की मुझे खुद ही नही पता आगे क्या होगा!!"

फाल्गुनी: "आपके हसबंड और आपके बीच झगड़ा हुआ है?" बड़ी ही निर्दोषता से उसने पूछा

"झगड़ा नही हुआ है.. जिंदगी ही खतम हो गई है.. पिछले दो सालों से हमारे बीच मनमुटाव है.. काफी समय से हम एक दूसरे से ठीक से बात भी नही करते.. यहाँ सब कपल्स को इन्जॉय करते देख मेरा दिल भर आया... दुख होना स्वाभाविक है!!"

पूरे हॉल में बस फाल्गुनी और वैशाली अकेले बचे थे..

"मैडम जी, अगर आपको यहाँ रुकना हो तो मैं हॉल बंद करने बाद में आऊँ?" मेनेजर ने उनसे पूछा

"अरे नही.. आप बंद कर दीजिए.. हम बस जा ही रहे है.. " वैशाली और फाल्गुनी बाहर निकल गए..

होटल के तीसरे माले पर कमरे की बालकनी में खड़े होकर आसमान में टिमटिमाते तारों को देखने लगी..

"अगर तुझे नींद आ रही हो तो सो जा.. मैं थोड़ी देर यहीं रुकूँगी.. " वैशाली ने फाल्गुनी से कहा.. मौसम, फाल्गुनी और वैशाली एक ही कमरे में रुके थे.. मौसम नाइटी पहनकर बेड पर लेटे हुए इन दोनों की बातें सुन रही थी.. उसे थोड़ी नींद आ रही थी इसलिए वो वहीं लेटी रही..

फाल्गुनी ने मौसम को सोते हुए देखकर कहा "बाहर बालकनी में चल.. दीदी के साथ बैठते है.. वापिस घर जाकर फिर सोना ही तो है.. यहाँ दोबारा कब आना होगा कीसे पता.. !!" फाल्गुनी ने बालकनी में दो कुर्सियाँ लगाते हुए कहा

"क्यों नही आएंगे वापिस?? शादी के बाद पति के साथ हनीमून पर यहीं तो आएंगे " फाल्गुनी को अपनी ओर खींचते हुए मौसम ने कहा

"तू आराम से सो जा.. और सपने में हनीमून मना ले.. हमे शांति से बैठने दे" कहते हुए फाल्गुनी खड़ी हो गई

"कोई बात नही.. तुझे हनीमून पर न जाना हो तो मुझे बता देना.. तेरे पति के साथ मैं चली जाऊँगी... और तू घर पर बैठे बैठे बातें करते रहना" खिलखिलाकर हँसते हुए मौसम ने कहा

इन दोनों की हंसी-ठिठोली सुनकर वैशाली की उदासी के बादल भी छट गए..

वैशाली: "तुम दोनों कब से हनीमून हनीमून लगे हुए है.. पर उसमें क्या होता है ये पता भी है?? हनीमून में क्या करते है ये जानती हो?"

"वो तो जब मौका मिलेगा तब सीख लेंगे.. आप भी तो जब गई होगी तब नई नई ही होंगी.. जैसे आप ने सीख लिया वैसे हम भी सीख लेंगे"

"नई नई थी या नही वो तुम्हें क्या पता??" वैशाली ने शरारती आंखो से कहा और हंस पड़ी "अपना पाप तो हम खुद ही जानते है.. वो तो हमारे पति को भी पता नही होता की जिस बच्चे को वो गोदी में लेकर खेल रहा है वो असल में उसका है भी या नही.. सिर्फ माँ ही जानती है.. मेरा बेटा, मेरा बेटा कहते हुए उछल रहे पति की आवाज सुनकर किचन में उसकी पत्नी मन ही मन मुस्कुरा रही होती है की जिसे तू अपनी औलाद समझ रहा है वह असल में मेरे पुराने प्रेमी की निशानी है.. " वैशाली ने जीवन के कटु सत्य को फाल्गुनी और मौसम के सामने उजागर किया..

तीनों बातों में मशरूफ़ थे.. वैशाली और फाल्गुनी कुर्सी पर बैठे हुए अपने पैर बालकनी की दीवार पर टिकाए हुए थे.. मौसम बेड पर पड़े पड़े तकिये को अपनी बाहों में लेकर बातें कर रही थी.. वैशाली ने भी कपड़े बदलकर छोटी सी नाइटी पहन ली थी.. पैर दीवार पर रखे होने के कारण उसकी छोटी सी नाइटी उसकी जांघों तक सरक गई थी.. और उसकी गोरी गदराई जांघें साफ नजर आ रही थी.. वैसे कमरे में तीनों लड़कियां ही थी इसलिए वह बेफिक्र थी.. अब मौसम भी उठकर तीसरी कुर्सी पर उन दोनों के साथ बैठ गई

मौसम: "आप दोनों को नींद नही आ रही? बारह बज रहे है.. बातें कर कर के मेरी भी नींद उड़ा दी आप लोगों ने..

वैशाली: "तू आराम से सो जा.. तुझे कौन रोक रहा है.. तेरे पति के साथ हनीमून पर आबू आएगी तब सोने को नसीब ही नही होगा.. याद रखना!!"

मौसम: "तभी तो कह रही हूँ.. उस वक्त जागना पड़ेगा इसलिए सो जाते है"

वैशाली: "तू चिंता मत कर.. उस समय अगर तुझे नींद आ भी गई तो तेरा पति छातियाँ दबाकर तुझे जगा देगा.. "

वैशाली की यह खुल्लमखुल्ला बातचीत से मौसम और फाल्गुनी.. दोनों के जिस्मों में सुरसुरी होने लगी.. वैसे मौसम ने कुछ घंटों पहले ही अपने जीजू से छातियाँ दबवाई थी.. इसलिए उसके शरीर में जो स्पंदन जग रहे थे वह वासना के थे.. फाल्गुनी के मन में वासना का भाव कम और जिज्ञासा का भाव ज्यादा था..

मौसम: "एक बात मुझे समझ नही आती वैशाली.. जब पुरुष का हाथ हमारी छाती को छूता है तब बहोत मज़ा आता है क्या?" जान कर भी अनजान बन रही थी मौसम..

वैशाली: "क्यों? तुझे अब तक ऐसा कोई अनुभव नही हुआ क्या??? सच सच बता.. बगैर दबवाये ही तेरे इतने बड़े हो गए क्या?? मुझे तो पक्का डाउट है.. किसी की मदद लिए बगैर इतने आकर्षक और परफेक्ट शेप में ये रह ही नही सकते.. और मौसम.. तेरे बबलों की ताजगी देखकर यही लगता है की तू जरूर किसी से दबवाती होगी.. !!"

फाल्गुनी: "सही बात है दीदी.. ये साली बड़ी छुपी रुस्तम है.. किसी को पता भी न चले वैसे मजे करने वाली.. मैं अच्छे से जानती हूँ ईसे"

मौसम: "साली.. मुझे क्यों बदनाम करती है.. !! पूरा दिन तो मैं तेरे साथ होती हूँ.. फिर मैं कहाँ किसी से ऐसा करवाने जा सकती हूँ? थोड़ा तो विश्वास रख मुझ पर"

वैशाली: "विश्वास? हा हा हा हा हा.. आज के जमाने में विश्वास सगे भाई पर भी नही रख सकते.. तू अखबारों में पढ़ती होगी.. जवान लड़की पर उसका भाई या बाप ही रेप करता है कई जगह.. "

मौसम: "वैशाली, तुम जो कह रही हो उसे बलात्कार कहते है.. अपनी मर्जी से दबवाने में और बलात्कार में जमीन आसमान का फरक है.. क्या तुम यह कहना चाहती हो की जबरदस्ती होने पर भी लड़की को मज़ा आता होगा?"

फाल्गुनी का चेहरा एकदम पीला पड़ गया "नही ऐसा कभी नही हो सकता.. किसी भी लड़की के लिए जबरदस्ती सहना बेहद यातनामय होता है" बोलकर फाल्गुनी एकदम चुप हो गई.. पर उसे एहसास हुआ की उसने बहोत बड़ी गलती कर दी ये बोलकर.. उसके कहने का मतलब ना समझ सके ऐसे मूर्ख नही थे वैशाली और मौसम

मौसम: "फाल्गुनी? तुझे पता भी है क्या बोल रही है? ये सब तुझे कैसे पता? क्या तेरे साथ कभी ऐसा कुछ??"

फाल्गुनी ने जवाब नही दिया

वैशाली ने बड़े ही प्यार और वात्सल्य से जांघ पर हाथ फेरते हुए कहा "मौसम की बात का जवाब दे फाल्गुनी"

फाल्गुनी: "नही यार ऐसा कुछ खास नही है"

फाल्गुनी की आवाज बदल गई.. उसकी आवाज में एक अजीब प्रकार का डर झलक रहा था.. वह नीचे देखते हुए बैठी रही

वैशाली: "सच सच बता फाल्गुनी.. मैं कल से देख रही हूँ.. इतने खुले और आजाद वातावरण में भी तुम किसी भी पुरुष के साथ ज्यादा बात नही करती.. मैं ये जानना चाहती हूँ की तू इतनी चुप चुप क्यों रहती है? प्लीज हमें बता"

मौसम: "बिल्कुल सही कहा तुमने वैशाली.. इस बात को तो मैंने भी नोटिस किया है.. सेक्स के बारे में जब भी बात होती है तब तू दूर ही भागती है.. कॉलेज में भी तू लड़कों से दूर रहती है.. मैं काफी समय से पूछना चाहती थी.. अच्छा हुआ आज ये बात निकली"

वैशाली: "देख फाल्गुनी, यहाँ पर हमारे अलावा और कोई नही है.. और हम दोनों तुझे वचन देते है की हम किसी को भी नही बताएंगे.. बता.. क्या हुआ था तेरे साथ?"

फाल्गुनी: "ऐसा भी कुछ नही हुआ था.. पर जब भी मैं सेक्स के बारे में सोचती हूँ.. मन में अजीब सा डर लगने लगता है.. पता नही क्यों.. रात को नींद में जब मैं उत्तेजित हो जाती हूँ तब सपने में एक भयानक चेहरा आँखों के सामने आ जाता है ओर वो मेरे साथ.. जबरदस्ती करने लगता है.. !!"

वैशाली और मौसम स्तब्ध होकर सुनते रहे..

वैशाली: "जबरदस्ती करने लगता है.. मतलब क्या करता है?"

फाल्गुनी: "प्लीज दीदी.. आगे मत पूछिए.. मुझे तो बताने में भी शर्म आती है" थरथर कांपती फाल्गुनी ने अपनी खुली हुई जांघें अचानक बंद कर दी..

थोड़ी देर के लिए तीनों चुप बैठे रहे

अब वैशाली कुर्सी से खड़ी होकर बोली "यहाँ आओ फाल्गुनी.. मेरे पास.. मौसम तू भी" मौसम तुरंत उठी और वैशाली के पास जाकर खड़ी हो गई.. लेकिन फाल्गुनी कुर्सी पर अब भी बैठी ही रही..

मौसम का हाथ पकड़कर वैशाली ने उसे अपनी ओर खींचा और उसके होंठों पर एक मस्त लेस्बियन किस कर दी.. मौसम इस हरकत के लिए तैयार नही थी.. उसे बड़ा अचरज हुआ.. पर वैशाली ने इस आश्चर्य को उत्तेजना में बदलते हुए मौसम के स्तनों को.. फाल्गुनी की नज़रों के सामने ही.. दबाना शुरू कर दिया..






ये देखते ही फाल्गुनी ऐसे थरथराने लगी जैसे उसने भूत देख लिया हो.. उसे इस तरह कांपते हुए देख वैशाली ने यह अंदाजा लगाया की जरूर कोई ऐसी घटना घाटी थी फाल्गुनी के साथ जिसके कारण उसके कोमल मन पर गंभीर असर किया था.. या तो फिर उसने कोई ऐसा खतरनाक मंज़र देखा था.. कुछ तो था जिसके कारण फाल्गुनी सेक्स से जुड़ी बातों से इतना डर रही थी..

वैशाली सोच रही थी की ऐसा क्या करूँ जिससे उसका यह डर गायब हो जाएँ.. !!

मौसम के स्तनों पर वैशाली का हाथ, ना उसने हटाने की कोशिश की और ना ही फाल्गुनी की नजर उसके स्तनों से..

वैशाली: "कैसा महसूस हो रहा है तुझे मौसम? सच सच बताना.. "

मौसम: "ओह वैशाली.. मज़ा ही आएगा ना.. जाहीर सी बात है!!"

वैशाली: "देख फाल्गुनी.. मौसम को कितना मज़ा आ रहा है.. देखा तूने!!" मौसम के स्तनों को मसलते हुए वैशाली ने फाल्गुनी की ओर देखकर कहा "तू बेकार ही डर रही है फाल्गुनी.. एक औरत होते हुए अगर मेरा स्पर्श मौसम को इतना मज़ा दे रहा हो.. तो सोच.. जब किसी पुरुष का मर्दाना हाथ पड़ेगा तब कितना जबरदस्त मज़ा आएगा!! सच कह रही हूँ फाल्गुनी.. तू अपने मन से सेक्स के प्रति घृणा और डर निकाल दे.. ये तो जीवन का सब से श्रेष्ठ आनंद है.. " वैशाली मौसम के अद्भुत वक्षों को धीरे धीरे मसलते हुए फाल्गुनी के डर को दूर करने की कोशिश कर रही थी.. मौसम भी वैशाली के इस प्रयास में पूर्ण सहयोग दे रही थी.. और उसे मज़ा भी आ रहा था.. जो की साइड इफेक्ट था..!!

मौसम की कुंवारी छाती पुरुष के मर्दाना स्पर्श को एक बार चख चुकी थी.. जैसे आदमखोर शेर एक बार इंसान का खून चख ले फिर उसे चैन नही पड़ता वैसे ही कुछ हाल मौसम का भी था.. जिन स्तनों को देखकर लड़के मूठ लगाते थे वही स्तनों को अभी दबाने वाले पुरुष की तलाश थी.. काफी सुंदर द्रश्य था.. माउंट आबू की शांत रात्री के माहोल में शराब पीकर सब सो रहे थे.. तब रात के साढ़े बारह बजे.. यह तीन लड़कियां एक दूसरे के अंगों को पुरुष से दबवाने के बारे में सोच रहे थे..

सीनियर शिक्षिका की तरह वैशाली अपना रोल बखूबी निभा रही थी.. आज के ही दिन वैशाली ने पीयूष और राजेश सर दोनों से अपनी मरवाई हुई थी.. अलग अलग लंड से चुदकर काफी बार जानदार ऑर्गजम का आनंद और चमक उसके चेहरे पर साफ छलक रही थी..

वैशाली: "फाल्गुनी.. एक समय था जब मैं भी सेक्स के मामले में तेरी तरह ही गंवार थी.. मुझे तो ये ही पता नही चल रहा था की कुदरत ने लड़कियों की छाती पर ये बबले आखिर बनाए क्यों थे!! इतनी ही समझ थी की आगे जाकर होने वाले बच्चे को दूध पिलाने की लिए ही इस व्यवस्था को बनाया गया होगा.. पर एक बार जब ये स्तन दबे.. तब मुझे एहसास हुआ की दूध पिलाने के लिए तो इसका उपयोग बाद में होगा.. इसका असली काम तो दबवाकर मजे लूटने का था.. तू मानेगी नही मौसम.. मुझे हमेशा ताज्जुब होता था की लड़के आखिर मेरी छातियों को हमेशा क्यों तांकते होंगे? मुझे भी सब कुछ संजय के साथ शादी करने के बाद ही पता चला.. शादी की पहली रात जब संजय ने मेरी छातियों को दबाया और चूसा.. तब मुझे पता चला की जीवन का असली मज़ा छाती को ब्रा के अंदर छुपाने में नही.. पर किसी के हाथों में सौंपने में था.. !!"

वैशाली की इस असखलित प्रवाह वाला लेक्चर फाल्गुनी बड़े ध्यान से सुन रही थी.. वैशाली दोनों के चेहरों की तरफ देख रही थी.. उसे लगा की दोनों को उसकी बातों में गहरी दिलचस्पी थी..

वैशाली: "फाल्गुनी.. एक बात पूछूँ.. तुम दोनों सच सच बताना.. !! मैं प्रोमिस करती हूँ की इस बात को मैं राज ही रखूंगी.. तू यहाँ आ फाल्गुनी मेरे पास.. घबरा मत.. यहाँ आ" फाल्गुनी धीरे से उठकर उन दोनों के पास गई.. तीनों इतने करीब खड़ी थी की अगर थोड़ा सा भी और नजदीक आती तो उनके स्तन आपसे में दब जाते..

फाल्गुनी के गोरे गालों पर वैशाली ने हल्के से हाथ फेर लिया.. और बड़े प्रेम से उसका हाथ अपने हाथों में लेते हुए कहा "फाल्गुनी, तूने कभी लिप किस की ही?" फाल्गुनी की हथेली कांप रही थी "बता न फाल्गुनी?.. मौसम तूने कभी.. ??" फाल्गुनी के साथ मौसम को भी घेरे में लिया वैशाली ने..

मौसम: "मैंने तो नही की.. " पर इतना बोलते ही मौसम को पीयूष के संग बिताएं वो हसीन पल याद आने लगे.. हल्की सी मुस्कान के साथ उसने कहा "वैशाली मुझे लिप किस अच्छी नही लगती यार.. एक दूसरे के मुंह में मुंह डालना मुझे नही पसंद.. घिन आती है.. "

फाल्गुनी ने धीमी आवाज में कहा "मैंने एक इंग्लिश मूवी में देखा तो है.. पर ट्राय नही किया कभी"

वैशाली: "ओके.. अब अगर तुम दोनों को दिक्कत न हो.. तो क्या हम एक दूसरे को किस करें? जब तुम्हारी शादी होगी और पति लिप किस करेगा तब तुम दोनों को यह अनुभव बहोत काम आएगा.. पर तुम्हारी इच्छा हो तो ही.. लिप किस भी एक कला है.. सीखना बहोत जरूरी है"

मौसम: "हाँ मुझे सिखाओ.. मैं सीखना चाहती हूँ" फाल्गुनी कुछ बोलने जा ही रही थी पर उससे पहले मौसम शुरू हो गई इसलिए वह चुप रही.. वैशाली ने फाल्गुनी का हाथ पकड़कर अपने एकदम नजदीक खींचते हुए कहा "मौसम.. पहले मैं फाल्गुनी को किस करूंगी.. फिर हम दोनों करेंगे.. ठीक है!!"

मौसम: "ओके डन.. पहले तुम दोनों करो.. मैं देखूँगी और सीखूँगी"

वैशाली: "फाल्गुनी, आर यू रेडी?"

डरी हुई फाल्गुनी कुछ बोल न पाई.. वैशाली ने फाल्गुनी की हथेली पकड़कर अपने स्तन पर रखते हुए दूसरा सवाल किया "कभी किसी ओर लड़की की ब्रेस्ट को दबाया है?" फाल्गुनी ने सर दायें बाएं हिलाकर "ना" कहा.. दोनों की हरकतें देखकर मौसम का हाथ अनजाने में ही खुद के स्तनों पर चला गया..

वैशाली ने फाल्गुनी की हथेली में अपना स्तन दे दिया.. और कहा "जरा जोर से दबा.. और देख कितना मज़ा आता है!!"






सहमी हुई फाल्गुनी मशीन की तरह वैशाली के स्तन को दबा रही थी.. ना ऊष्मा थी और ना ही वासना

वैशाली: "सहला क्या रही है.. जरा जोर से दबा.. तभी तो मज़ा आएगा" फाल्गुनी के गले में अपना हाथ डालकर अपने होंठों को उसके नाक तक लेकर वैशाली ने धीरे से चाट लिया.. फाल्गुनी ने ना ही विरोध किया और ना ही कुछ बोली.. अब वैशाली ने फाल्गुनी के स्तनों को अपने हाथों से बड़े जोर से मसल दिया

फाल्गुनी: "आह्ह.. दीदी.. धीरे से.. दर्द हो रहा है"

वैशाली: "अरे यार.. मैं तो ये कह रही हूँ की इस तरह दबा मेरे.. समझी.. जरा जोर से.. तेरे बॉल अभी अनछुए और कोरे है.. इसलिए दर्द हो रहा है.. मेरे तो अब अनुभवी हो गए है.. धीरे धीरे दबाने से मेरे स्तनों को कुछ महसूस ही नही होता इसलिए कह रही हूँ की जरा ताकत लगाकर दबा" इतना कहकर वैशाली ने फाल्गुनी के गालों को चूम लिया.. चूमने के बाद उसने अपनी जीभ बाहर निकालकर उसके गाल को चाट लिया.. पूरा गीला कर दिया.. वैशाली को पता था की फाल्गुनी को इसमें मज़ा नही आ रहा था पर शुरुआत में ऐसा होना स्वाभाविक था..

अब वैशाली ने फाल्गुनी की हथेली को अपनी नाइटी के अंदर डालकर अपने नंगे चुचे का स्पर्श करवाया.. "आह्ह.. " यह द्रश्य देखकर ही मौसम की सिसकी निकल गई.. और वो दोनों हथेलियों से अपने स्तन दबाने लगी..

कुदरत के बक्शे हुए इन सुंदर यौवन कलशों को अब तक अनगिनत बार आईने में देखकर मसल चुकी मौसम.. फाल्गुनी के स्तनों को कभी छुआ नही था उसने.. हाँ कभी कभार अनजाने में हल्का सा स्पर्श जरूर हो जाता.. या फिर स्तन दब जाते तब एक दूसरे को हँसकर "सॉरी" बोल देते थे.. उस हंसी का मतलब ये होता था की भले ही गलती से दब गए हो.. पर स्तन का दबना ही उसका भविष्य होता है.. और दबने में ही स्तनों के अस्तित्व की सार्थकता थी..

लेकिन इन दोनों नादान लड़कियों का दिमाग इतना ज्यादा भी कलुषित नही हुआ था.. कभी कभार टीवी पर दिख जाती कोंडोम की एड.. या फिर किसी मूवी का उत्तेजक गाना या सीन.. देखकर उत्तेजित होती दोनों इतनी मासूम भी नही थी.. पर अन्य फॉरवर्ड और मॉडर्न लड़कियों के मुकाबले मौसम और फाल्गुनी सेक्स के मामले में बिल्कुल अनुभवहीन थे.. अब तक सेंकड़ों बार वो दोनों खुद के स्तनों को छु चुके थे पर आज तक कभी ऐसा एहसास नही हुआ था.. फाल्गुनी का पूरा शरीर वैशाली के स्तन का स्पर्श होते ही कांपने लगा.. वो ऐसे पेश आ रही थी जैसे काफी डरी हुई हो.. पर बिना इसकी परवाह कीये.. वैशाली ने फाल्गुनी के कान में कहा "कैसे लगे मेरे स्तन तुझे, फाल्गुनी?"

"ओह्ह प्लीज दीदी.. " फाल्गुनी सिर्फ इतना ही बोल पाई.. बालकनी के अंधेरे में अपना पूरा स्तन ही नाइटी से बाहर निकाल दिया वैशाली ने.. और फाल्गुनी के हाथ में थमाते हुए दबवाने लगी.. "और ये देख मेरी निप्पल.. कैसी लगी तुझे फाल्गुनी?" वैशाली के एक के बाद एक कामुक सवालों से फाल्गुनी के जवान कुँवारे जिस्म में बिजली सी दौड़ रही थी.. उसका कांपना अभी बंद नही हुआ था.. वैशाली अपने स्तनों पर चल रही ठंडी हवा को महसूस करते हुए सिहर रही थी.. उसने मौसम से कहा "अपनी नाइटी ऊपर कर के देख.. स्तनों पर जब ठंडी ठंडी हवा टकराती है तब कितना मज़ा आता है.. !!"

मौसम शरमा गई.. और बोली "मुझे लगता है.. की तुम काफी एक्साइटेड हो गई हो वैशाली"

"तो उसमें गलत भी क्या है मौसम? यहाँ होटल में हर कोई अपने पति या बॉयफ्रेंड को अपने बाहों में भरके उनके मस्त लंड से चुदवा रही होगी.. और यहाँ मैँ.. शादीशुदा होते हुए भी तड़प रही हूँ.. आप दोनों ने तो वो मज़ा लिया नहीं है इसलिए नही समझ पाओगे.. पर एक बार स्त्री पुरुष के स्पर्श को प्राप्त कर ले फिर वो उसकी जरूरत बन जाता है.. जब तक सिर्फ उंगलियों से मास्टरबेट ही किया हो तब तक असली पेनिस से करवाने के मजे के बारे में पता नही चलता.. बस ऐसा ही लगता है की उंगलियों में ही सारा सुख छुपा हुआ है.. पर एक बार जब छेद के अंदर मर्द का अंग घुसता है और अंदर बाहर होता है.. और उसकी सख्ती से रोम रोम जीवंत हो जाता है.. ओह्ह फाल्गुनी.. अब तुझे कैसे समझाऊँ.. अभी मुझे लंड की सख्ती बड़ी याद आ रही है.. मुझे ऐसा एहसास हो रहा है जैसे नीचे हजारों चींटियाँ एक साथ काट रही हो.. ऐसी खुजली हो रही है की मैं बता नही सकती.. मैं तो वो स्वाद काफी बार चख चुकी हूँ.. इसीलिए आधी रात को ऐसे मादक माहोल में मुझे याद आ रही है.. इसमे मेरी कोई गलती नही है"

कहते हुए वैशाली ने फाल्गुनी को अपनी बाहों में भर लिया और उसके कुँवारे होंठों पर अपने होंठ रखकर फाल्गुनी को उसके जीवन की पहली लिप किस भेंट कर दी.. थरथर कांपती फाल्गुनी ने मुंह फेरते हुए इनकार करने की कोशिश की.. पर वह इनकार से ज्यादा इजहार का संकेत था.. वैशाली की उत्तेजना उसके शरीर को फाल्गुनी से भी ज्यादा बल दे रही थी.. एक तरफ फाल्गुनी की नादान उम्र और चढ़ती जवानी की चाह उसे शरण में आने की लिए मजबूर कर रही थी.. "दीदी प्लीज.... " अभी भी वो अशक्त विरोध कर रही थी.. लेकिन दूसरी तरफ वैशाली की चूत लंड मांग रही थी.. और लंड की अनुपस्थिति में वह सारी कसर फाल्गुनी पर निकाल रही थी..

जब वैशाली ने फाल्गुनी को बाहों में भर लिया तब फाल्गुनी के कडक स्तन वैशाली की छातियों पर चुभने लगे थे.. अब फाल्गुनी भी इन हरकतों से मजे लेने लगी थी..

वैशाली: "यार फाल्गुनी.. तेरी ब्रेस्ट कितनी कडक है.. !! मेरे बॉल पर तेरी दोनों निप्पल चुभ रही है मुझे!!"






यह गरमागरम सीन देखकर मौसम की जांघों के बीच में चुनचुनी होने लगी.. पीयूष ने उसके स्तन जिस तरह मसले थे.. उसे वो सीन याद आ गया.. उसने वैशाली के कंधे पर हाथ रखकर उसे दबाया.. अंधेरे में वैशाली को उसके हावभाव तो दिखे नही पर वो समझ गई की मौसम फाल्गुनी से भी अधिक उत्तेजित हो चुकी थी.. पर मौसम ने तो किसी और काम के लिए हाथ रखा था

मौसम: 'वैशाली.. वहाँ देखो.. !!"

मौसम ने वैशाली और फाल्गुनी के रोमांस के रंग में भंग करते हुए दोनों को सामने की तरफ के गेस्टहाउस के चौथे मजले के एक कमरे की आधी खुली खिड़की से दिख रहे द्रश्य की ओर निर्देश किया.. एक कपल की हरकतें खिड़की से साफ नजर आ रही थी.. तीनों की नजर वहीं चिपक गई..

वैशाली: "तुम दोनों देखती रहो.. अब इनका कार्यक्रम शुरू होगा"

खिड़की से दिख रहा था.. एक पुरुष और स्त्री आपस में चुम्मा-चाटी कर रहे थे..

"मैं अभी आई.. " कहते हुए वैशाली भागकर कमरे में गई और अपनी बेग से दूरबीन लेकर वापिस लौटी.. दूरबीन से से देखकर उसने फाल्गुनी को देते हुए कहा.. "तू थोड़ी देर देख फिर मौसम को देना और फिर वापिस मुझे.. सब मिलकर देखते है"

मौसम: "दूरबीन तो मैं भी लाई हूँ.. "

वैशाली: "तो जल्दी लेकर आ.. मुफ़्त में बी.पी. देखने का मौका मिला है.. जा जल्दी"

दूरबीन से देखते हुए फाल्गुनी ने कहा "वैशाली.. वो दोनों किस कर रहे है.. एकदम साफ साफ दिख रहा है यार.. " फाल्गुनी को अब मज़ा आ रहा था

"ला मुझे भी देखने दे.. " वैशाली ने कहा

"नही.. मुझे देखने दे पहले" फाल्गुनी ने दूरबीन नही दिया

दूरबीन से उस बेखबर और बिंदास कपल के हरकतों को देख रही फाल्गुनी के स्तनों पर हाथ रखकर वैशाली दूसरे हाथ से अपनी चूत को रगड़ने लगी.. तभी मौसम भी अपना दूरबीन ले आई.. और वैशाली के पीछे खड़े होकर देखने लगी.. मौसम के स्तन वैशाली की पीठ पर छु रहे थे..

मौसम: "देख देख फाल्गुनी.. वो आदमी बॉल दबा रहा है उस औरत के" रोमांचित होकर उसने फाल्गुनी से कहा

वैशाली फाल्गुनी के स्तनों को हल्के हल्के मसलते हुए अपनी क्लिटोरिस से खेल रही थी.. उसे उस कपल की हरकतें देखने में कोई दिलचस्पी नही थी क्योंकि उसके लिए ये कोई नई बात तो थी नही.. लेकिन फाल्गुनी और मौसम के लिए ये पहली बार था.. सेक्स का लाइव टेलीकास्ट देखने का मौका.. दोनों कुंवारी लड़कियां ये देखने के लिए आतुर थी की आगे ओर क्या होगा.. !! फाल्गुनी को ये सब देखने में पता ही नही चला की कब वैशाली ने उसकी नाइटी के सारे हुक खोल दीये और उसके दोनों उरोजों को बाहर निकालकर दबाने लगी.. मौसम भी उत्तेजित होकर अपने स्तनों को वैशाली की पीठ पर रगड़ने लगी थी

मौसम बालकनी के उस कामुक सीन को दूरबीन से देखते हुए.. कुछ घंटों पहले अपने जीजू के संग हुए संसर्ग को याद करते हुए गीली हो रही थी.. फाल्गुनी अभी नादान थी.. वो तो ये द्रश्य देखकर हतप्रभ से हो गई थी.. सामने दिख रहा सीन कुछ ऐसा था.. वह औरत खिड़की पकड़े खड़ी हुई थी और उसका पार्टनर पीछे से गर्दन और पीठ को चूम रहा था.. बाहर घनघोर अंधेरा था और कमरे की लाइट चालू थी इसलिए इन तीनों को वहाँ का नजर एकदम साफ साफ नजर आ रहा था..

कब से मौसम और फाल्गुनी दूरबीन पर ऐसे चिपकी थी जैसे गुड पर मक्खी.. अब वैशाली को भी इच्छा हो गई उस कपल की हरकतें देखने की.. किसी जोड़े को संभोग करते हुए देखना अपने आप में ही बड़ा अनोखा अनुभव होता है.. किसी कपल की विकृत काम हरकतों को देखकर वैसी ही प्रबल उत्तेजना होती है जो वास्तविक संभोग के दौरान होती है..

मौसम के हाथ से दूरबीन छीनते हुए वैशाली ने कहा "मुझे तो देखने दे.. !! तू तो कब से ऐसे देख रही है जैसे तुझे इस बारे में परीक्षा देनी हो और उसकी तैयारी कर रही हो.. " अब बिना दूरबीन के मौसम को साफ नजर तो नही आ रहा था.. फिर भी आँखें खींचकर वो देखने की कोशिश कर रही थी.. इस बात से बेखबर की उसके स्तन वैशाली की पीठ से दबकर बिल्कुल ही चपटे हो गए थे.. या तो फिर हो सकता है की उसे पता हो और उत्तेजना के मारे जान बूझकर उसने ही अपने स्तन वैशाली की पीठ से दबा दिए हो.. !!

"तुम दोनों में से किसी ने भी मर्द का पेनिस देखा है कभी?" वैशाली के इस बोल्ड और बिंदास प्रश्न से मौसम और फाल्गुनी की हालत खराब हो गई..

फाल्गुनी: "नही दीदी.. कभी नही.. "

मौसम ने कुछ जवाब नही दिया.. वो सोच रही थी की जीजू का लंड आज दिख ही जाने वाला था अगर वो थोड़ी सी और हिम्मत करती तो.. पर खुले बाजार के बीच वो ऐसा कैसे करती?

"कैसा होता है.. वैशाली?" मौसम ने अपने स्तन पीठ पर रगड़ते हुए वैशाली को पूछा

"देख.. देख.. वो औरत उस मर्द का चूस रही है" वैशाली ने मौसम के हाथों में दूरबीन थमाते हुए कहा.. मौसम ने दूरबीन लिया और वैशाली के पीछे से हटकर वो अब फाल्गुनी के पीछे खड़ी हो गई और देखने लगी..








वैशाली ने मौसम की गर्दन के पीछे एक हल्की सी किस कर दी और बोली "बहोत ही मस्त होता है यार.. मर्द का हथियार.. अब तुम दोनों को क्या बताऊँ.. !! हाथ में पकड़े तो छोड़ने का मन ही नही करता.. देखो वो कितने मजे से चूस रही है? देखा.. ??" वैशाली अब काफी उत्तेजित हो गई थी और उसके हाथ की हलचल इस बात का सबूत दे रहा था क्योंकि उसने फाल्गुनी के स्तनों को नाइटी के बाहर निकाल ही दिया था और अब वो मौसम के स्तनों से खेल रही थी..

मौसम की काँख के नीचे से दोनों हाथ अंदर डालकर वैशाली ने मौसम के दूरबीन पकड़े हाथों को पकड़ लिया.. अब उसने मौसम की नाइटी के अंदर हाथ डालकर जोर से उसके उरोजों को दबाया.. मौसम की हल्की चीख निकल गई.. "क्या कर रही हो यार? जरा धीरे धीरे दबा न.. ज्यादा गर्मी चढ़ रही हो तो चली जा सामने वाले उस कमरे में.. वो तैयार ही बैठा है "

वैशाली ने अपने दोनों स्तन बाहर निकालकर मौसम की पीठ से घिसते हुए उसकी चुत पर उंगली फेरी.. सीधा अपने प्राइवेट पार्ट पर वैशाली के हाथ का स्पर्श महसूस होते ही मौसम सहम गई और अपनी जांघें भींच ली.. "छी छी.. वैशाली.. इन दोनों को तो देख.. कैसा गंदा गंदा कर रहे है!! मुझे तो देखकर ही घिन आती है.. देख तो सही !!"

दूरबीन हाथ में लेकर वैशाली ने देखा.. वह पुरुष उस स्त्री की चूत के होंठों को फैलाकर चाट रहा था.. उस स्त्री की एक टांग खिड़की पर टिकी हुई थी और उसका पार्टनर अपनी जीभ अंदर तक फेर रहा था.. वैशाली ने हँसकर मौसम को अपनी ओर मोडाल और गले लगाते हुए कहा "यार यही तो सब से सर्वोत्तम सुख होता है.. जितना मज़ा लंड से चुदवाने में आता है.. उतना ही मज़ा अपनी चटवाने में भी आता है.. एक बार जीभ का स्पर्श नीचे चूत पर हो तब ऐसे झटके लगते है अंदर.. की तुम्हें क्या बताऊँ.. !!"






वैशाली के मुंह से "लंड" और "चूत" जैसे शब्द सुनकर फाल्गुनी और मौसम शर्म से लाल हो गए..

मौसम: "वैशाली.. तुमने अभी बताया ना की मर्द का पेनिस देखने लायक होता है.. !! तो मुझे वो देखना है.. !!"

वैशाली ने अन दोनों हाथ नाइटी के अंदर डालकर मौसम के दोनों जवान चुचे हाथ में पकड़ लिए और दबाने लगी..

वैशाली: "तू पागल है क्या मौसम!! मेरे पास लंड कहाँ है जो मैं तुम्हें दिखाऊँ.. !! मेरे पास तो बस तेरे जैसी चूत ही है.. देखना तो मुझे भी है पर अभी इस वक्त लंड कहाँ से लाऊँ??"

फाल्गुनी चुपचाप मौसम और वैशाली की कामुक बातें सुनते हुए दूरबीन से उस कपल की एक एक हरकत को बड़े ध्यान से देख रही थी..

वैशाली: "मौसम, तू एक हाथ से दूरबीन पकड़ और दूसरे हाथ से फाल्गुनी की चुची दबा.. तो उसे भी मज़ा आए.. "

मौसम ने तुरंत ही फाल्गुनी के मासूम स्तनों को दोनों हाथों से दबाते हुए उसके गाल पर पप्पी कर दी.. और एक बार उसके गाल को चाट भी लिया.. गाल पर मौसम की जीभ का स्पर्श होते ही फाल्गुनी उत्तेजना से कराहने लगी.. तभी अचानक वो सामने दिख रहे कपल ने अपनी खिड़की बंद कर दी



फाल्गुनी निराश हो गई "खेल खतम और पैसा हजम"
 
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