Adultery शीला की लीला (५५ साल की शीला की जवानी) - Page 40 - SexBaba
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Adultery शीला की लीला (५५ साल की शीला की जवानी)

छू लेने दो नाज़ुक होठों को

कुछ और नहीं हैं जाम हैं ये

क़ुदरत ने जो हमको बख़्शा है


वो सबसे हंसीं ईनाम हैं ये..















 
मालिक़ा, तेरे कदमों की धूल भी ताज है मेरे लिए,

तेरी हँसी में ही छुपा है मेरा सारा आसमां।

गुलामी तेरा नाम लेकर, खुद को पा लिया मैंने,


तेरी हुकूमत में ही है मेरी रूह का कारवां।























 
पिछले अपडेट में आपने पढ़ा की..

पीयूष के मन में फिर से वैशाली के लिए आकर्षण उत्पन्न हुआ.. हालांकि वैशाली अपने आप को अभी भी संभाले हुए है.. कविता पीयूष को फोन कर उसका समय चाहती है लेकिन काम में व्यस्त पीयूष उसे हड़का देता है.. मायूस कविता अपनी प्यास बुझाने के लिए खुद का ही सहारा लेती है..

वैशाली और पिंटू के बीच दाम्पत्य जीवन यूं तो सही चल रहा था पर बेडरूम का समीकरण थोड़ा सा तब गड़बड़ा गया जब बीच संभोग पिंटू के लिंग ने सख्ती गंवा दी.. एक अच्छी पत्नी की तरह वैश्य ने उसे डॉक्टर का परामर्श लेने की सलाह दी जिसे सुनकर पिंटू काफी भड़क गया..

राजेश फाल्गुनी को मदन से मिलने की बात करता है.. यह बात फाल्गुनी के लिए बेहद चौंकानेवाली साबित हुई.. पर फिर राजेश के समझाने पर फाल्गुनी गहरी सोच में डूब गई..

अब आगे..

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सुबह के पाँच बज रहे थे.. पहले से ही जाग चुकी शीला, रसिक के आने का इंतज़ार बड़ी ही बेसब्री से कर रही थी.. वह आज मन बना कर बैठी थी की किसी भी सूरत में रसिक को मना ही लेगी

पिंटू पर जब हमला हुआ तब शीला को सब से पहला शक रसिक पर गया था.. पिंटू के आ जाने से उनकी चुदाई का सिलसिला बंद हो गया था.. शीला ने तब सोचा की शायद पिंटू को रास्ते से हटाने के लिए रसिक ने ही वह हमला करवाया हो.. रसिक बेचारा निर्दोष था.. हमला तो शीला के पूर्व-दामाद संजय ने किया था.. पर रसिक को शीला के इस आक्षेप से बेहद बुरा लगा था.. और तब से वह शीला से दूरी बनाए रख रहा था.. यहाँ तक की जब शीला, कविता को लेकर रसिक के खेत पर गई तब उसने शीला को वहाँ रहने न दिया और यहाँ तक कह डाला की अगर शीला मौजूद होगी तो वो कविता को हाथ भी नहीं लगाएगा

रसिक का गुस्सा जायज था.. और उसकी यह सोच भी वाजिब थी की चूंकि वह एक छोटा गरीब आदमी था.. इसलिए शीला को उस पर सब से पहले शक हुआ अपराध होने पर लोग अक्सर ग़रीब और छोटे लोगों पर शक करते हैं, जो कि गलत है.. अपराध का संबंध व्यक्ति के चरित्र और कार्यों से होता है, न कि उसकी आर्थिक स्थिति या सामाजिक स्तर से.. सभी को समान रूप से न्यायपूर्ण दृष्टि से देखना चाहिए और बिना किसी ठोस प्रमाण के किसी पर आरोप नहीं लगाना चाहिए..

शून्यमनस्क शीला सोफ़े पर बैठे बैठे यह सब सोच रही थी तभी रसिक की साइकिल की घंटी की आवाज सुनाई दी.. शीला तुरंत उठी और दरवाजा खोलकर उसकी प्रतीक्षा करने लगी.. रसिक ने अपनी साइकिल को कंपाउंड की दीवार पर टिकाया.. और लोहे का दरवाजा खोलकर, दूध का कनस्तर लिए शीला की ओर आगे बढ़ा.. शीला की ओर उसने बड़ी ही बेरुखी से एक नजर डाली और फिर आँखें झुका ली

शीला: "रसिक, आज दूध देने में इतनी देर क्यों लग गई? मैं कब से तुम्हारा इंतज़ार कर रही थी.."

रसिक ने जवाब नहीं दिया.. शीला के हाथ में जो पतीला था उसमें दूध डालने के बाद वह बोला..

रसिक: "दूध तो दे दिया, अब जाने दो.. मुझे और भी कई काम है..!!"

शीला: "इतनी जल्दी क्यों भाग रहे हो? ऐसा तो मैंने क्या कर दिया, जो तुम मुझसे इतने नाराज़ हो?"

रसिक: "नाराज़? अरे नहीं, भाभी.. मेरी क्या औकात की मैं आपसे नाराज हो जाऊँ.. मैं ठहरा गरीब दूधवाला.. आपके लिए मैं और कुछ भी नहीं हूँ.."

शीला: "ये क्या बात कर रहे हो, रसिक? तुम जानते हो कि तुम मेरे लिए कितने खास हो.."

रसिक: "अच्छा यह बात है..!! तो फिर पिंटू पर हुए हमले का इल्ज़ाम मुझ पर क्यों लगाया? क्या सिर्फ़ इसलिए कि मैं गरीब हूँ?"

शीला: "रसिक, मुझसे गलती हो गई.. उस वक्त मैं बहोत ही परेशान थी.. पिंटू मेरा दामाद है, और मैंने बिना सोचे-समझे तुम पर शक कर लिया.. मुझे माफ़ कर दो.."

रसिक: "मैं कौन होता हूँ आपको माफ करने वाला, भाभी.. पर आपने मेरे दिल को ठेस पहुँचाई है.. मैंने आपके लिए क्या-क्या नहीं किया, लेकिन आपने मुझे सिर्फ़ एक गुनहगार ही समझा.."

शीला: "रसिक, पुरानी बातों पर मिट्टी डालो.. तुम्हारे बिना मैं अधूरी हूँ.. हमारा तो सालों पुराना रिश्ता है, इसे इस तरह खत्म मत होने दो.."

रसिक: (अपनी नजरें चुराते हुए) "रिश्ता? आपके लिए ये सिर्फ़ एक रिश्ता था, मेरे लिए तो सब कुछ था.. लेकिन अब बस..!!"

शीला: "रसिक, तुम्हें याद है वो पहली बार जब तुमने मुझे छुआ था? कैसे तुम्हारे इस मूसल ने मुझे नया जीवन दिया था.. क्या तुम वो सब भूल गए?"

रसिक: "भाभी, वो सब अब बीती बात हो गई.."

शीला: "नहीं, रसिक.. ये बीती बात नहीं है.. तुम्हारे बिना मैं जी नहीं सकती.. तुम्हारी गर्मी, तुम्हारा प्यार, तुम्हारे दमदार धक्के... इन सब के बिना तो मेरा जीना मुश्किल हो जाएगा.."

रसिक: "भाभी, मैं आपको भूलने की कोशिश कर रहा हूँ.. मुझे कमज़ोर मत कीजिए.."

शीला: "रसिक, तुम कमज़ोर नहीं हो.. असली मर्द हो.. तुम्हारे जैसा मजबूत मर्द मैंने आज तक नहीं देखा.. तुम्हारे बिना मैं टूट जाऊँगी.. क्या तुम मुझे टूटते हुए देख सकते हो?"

रसिक: "भाभी, आप तो जानती हो, की आपका मुझसे बड़ा आशिक कोई नहीं होगा.. लेकिन मेरा भी तो दिल है.. दर्द मुझे भी होता है"

रसिक को अब थोड़ा सा नरम होता देख, शीला ने उसे मनाने के लिए पूरा जोर लगा दिया

शीला: "रसिक, मैं मानती हूँ की मुझसे बहोत बड़ी गलती हुई है.. और इसकी माफी भी मांग चुकी हूँ.. अब क्या तुम मुझे सज़ा देने के लिए खुद को भी सज़ा दोगे? हम दोनों के बीच जो रिश्ता है वो क्या इतना कमज़ोर है..?"

रसिक ने जवाब नहीं दिया.. बस नजरें झुकाए हुए मूर्ति की तरह खड़ा रहा.. शीला अब उसके एकदम करीब आ गई.. इतनी करीब की शीला की गरम सांसें रसिक को अपने जिस्म पर महसूस हो रही थी.. शीला अपने होंठ रसिक के होंठों के एकदम नजदीक ले गई

शीला: "हाँ, रसिक.. तुम मेरे हो, और मैं तुम्हारी."

रसिक: "ठीक है, भाभी.. लेकिन अगर फिर कभी तुमने मुझ पर शक किया, तो मैं वापस नहीं लौटूँगा.."

शीला रसिक को घर के अंदर खींचा और दरवाजा बंद कर दिया.. उसका हाथ पकड़कर शीला उसे सोफ़े के करीब ले गई.. वहाँ पहुंचकर वह मुड़ी और सब से पहले रसिक को अपने आगोश में ले लिया.. उसके मजबूत कंधे, बालों वाली चौड़ी छाती.. शीला उसके पूरे बदन पर हाथ फेरती रही.. अंततः उसका हाथ वहाँ पहुंचा जहां जाने की वह कब से राह देख रही थी..

रसिक के पाजामे के ऊपर बने उभार पर हाथ फेरते ही शीला के कंठ से आह निकल गई






शीला: "तुम नहीं जानते रसिक.. तुम्हारे इस उस्ताद के लिए मैं कितना तड़पी हूँ.. कभी कभी तो रात भर मुझे नींद न आती.. एक अरसा हो गया तुम्हारे इस हथियार के दर्शन किए हुए"

रसिक: "लो भाभी.. अभी कराए देता हूँ"

शीला के आगोश से मुक्त होकर, रसिक अपने पाजामे का नाड़ा खोलने लगा.. उत्तेजनावश शीला काँपने लगी.. उसका लंड इतना टाईट था पाजामे उतारने से पहले ही, नाड़ा खुलने पर आधा नीचे तक आ गया.. शीला ने रसिक के घुटनों तक उतरा पाजामा पूरा उतार दिया और फटाक से उसका तन्नाया हुआ काला लंड उसके सामने साँप की तरह फुफ्कारने लगा.. आह्ह.. रसिक का वो काले अजगर जैसा लंड.. कितनी औरतों के सपनों में आता होगा..!! शीला, रेणुका, कविता, वैशाली, अनुमौसी.. और भी न जाने कितनी होगी..!!!

उसका लंड वाकई में काफ़ी बड़ा था... तकरीबन नौ-साढ़े नौ इन्च का.. किसी औरत की कलाई से भी मोटा... परिघ शायद तीन इन्च होगा, और एकदम काला जैसे कि ग्रैफाइट से बना हुआ हो.. पूरे लंड के ऊपर उभरी हुई नसें नजर आ रही थी.. जैसे किसी बेल की शाखाएं हो..!!






"आह्ह रसिक.. तेरी नाराजगी के चलते मैं इससे दूर हो गई.. कितने दिन हो गए यार..!!" शीला रसिक के उस हाथीनुमा लंड से पुचकारते हुए खेलने लगी.. जैसे बच्चे को मनपसंद खिलौना मिल गया हो.. उसके सुपाड़े से लेकर जड़ तक बड़े प्यार से हथेली से सहलाते हुए.. शीला ने उसकी गेंदों जैसे अंडकोशों को भी हल्के से दबाया..

रसिक के लंड के जादू ने शीला का जैसे वशीकरण ही कर दिया था..!! उसका लंड एक मजबूत खंबे की तरह तना हुआ था.. शीला को एसा लग रहा था जैसे वक्त मानो ठहर गया हो और पूरा विश्व जैसे स्लो-मोशन में चल रहा हो.. उसके लंड का मोटा सुपाड़ा शीला के चेहरे से सिर्फ़ तीन इंच की दूरी पर था..






उसके लंड को अपने आप झटके खाते देखने की वजह से शीला तो जैसे बेखुद सी हो गयी थी.. शीला की जीभ अचानक ही उसके मुँह से बाहर आ गयी और उसके नीचले होंठ पर फिरने लगी.. बेकाबू हवस ने उसे इतना पागल कर दिया था की उसे समझ ही नहीं आ रहा था की पहले क्या करें..!! उसका दिल कह रहा था कि वो उसके मोटे लंड को चूसे पर दिमाग कह रहा था कि टांगें फैलाएं और अपनी गुफा में उसे घुसेड़ दे..

अपने लंड को हाथ में हिलाते हुए रसिक बोला “क्या कर रही हो भाभी? आज सिर्फ देखने का ही इरादा है क्या? माहवारी तो नहीं चल रही आपकी? अगर ऐसा है फिर भी चूस तो सकती ही हो?"

रसिक के कूल्हें पर हल्की सी चपत लगाते हुए शीला बोली "इस उम्र में कभी माहवारी होती है क्या?? और अगर होती भी तो भी मैं आज तुझसे बिना चुदवाएँ जाने नहीं देती.. बस..!! दिमाग चकरा गया तेरा यह लंड देखकर.. पता नहीं क्यों.. पर पिछली बार से भी बड़ा लगता है मुझे"

रसिक ने हँसते हुए कहा "वो तो आपने बहुत महीनों बाद इसे देखा इसलिए ऐसा लग रहा है आपको..!!"

रसिक का लंड आज बेहद बड़ा और खतरनाक नज़र आ रहा था.. जैसे हर बार के मुकाबले अंदर दोगुना रक्त भर गया हो.. उसके लंड को देखते हुए शीला सोचने लगी कि क्या करूँ या ना करूँ.. शीला अब भी अभिभूत होकर रसिक के लंड को प्यार से सहला ही रही थी..

“भाभी.. मुझे और घरों में भी दूध देने जाना है.. आप ऐसा करोगी तो दिन ढल जाएगा पर आपका मन नहीं भरेगा” रसिक ने कहा

शीला अब जबरदस्त उत्तेजित हो गयी थी.. शीला ने जल्दी से उसके लंड को निचले सीरे से पकड़ा.. चट्टान की तरह तना हुआ और फौलाद की तरह गरम लंड को धीरे-धीरे अपनी जीभ बाहर निकाल के उसके लंड के सुपाड़े के ऊपर फ़िराना शुरू किया..






“मम्म्म्म्म... वाह वाह शीला भाभी वाह... डाल दो इसे अपने मुँह में... ओह्ह” रसिक कराह उठा

शीला जितना हो सके अपना मुँह उतना फ़ैला के उसके लंड के सुपाड़े को अपने मुँह में डाल दिया और धीरे-धीरे चूसना शुरू कर दिया..साथ ही साथ वह हथेली से रसिक के लंड की त्वचा आगे पीछे कर रही थी.. उसके लंड के सुपाड़े से शीला का पूरा मुँह भर गया.. रसिक ने अपना सर थोड़ा पीछे की तरफ़ झुकाया और शीला के बालों में अपनी उँगलियाँ फिराने लगा..






कसम से शीला भाभी.. आप से ज्यादा तो मैं तड़प रहा था” वो गुर्राया..

उसकी हवस अब शीला के जिस्म में उतर कर दौड़ने लगी थी.. उसका लंड चूसने की चाहत ने शीला की हवस को दोगुना कर दिया था.. शीला के जिस्म में उसकी ताक़त सैलाब बन कर दौड़ने लगी.. इस मोड़ पे शीला बड़े ही चाव से उसका लंड चूस रही थी.. इतनी शिद्दत से.. जैसे बोर्ड की परीक्षा में विद्यार्थी अपना पर्चा लिख रहा हो..

शीला के ढीले-ढाले नाइट-गाउन के अंदर हाथ डालकर रसिक ने उसके स्तनों तक पहुंचना चाहा.. पर शीला की चुसाई के कारण वो वहाँ तक पहुँच न पाया.. फिर उसने सोचा की एक बार यह चुसाई का दौर खतम हो जाए.. फिर वह इत्मीनान से उसे नंगा कर देगा..!!

लगातार चूसते हुए शीला ने उसके लंड को अपने मुँह में और अंदर घुसेड़ लिया और उसके कुल्हों को अपनी तरफ़ खींचा.. अभी भी एक मुठ्ठी जितना लंड उसके हाथों में था और तब उसे महसूस हुआ कि उसके लंड का सुपाड़ा गले तक आ गया था.. थोड़ा सहारा लेने के लिए वह सोफ़े की तरफ तक पीछे हटी.. रसिक ने अब शीला के सर को दोनों हाथों से पकड़ लिया.. अब वो अपना बड़ा सा लंड उसके मुँह के अंदर-बाहर करके मेरे मुँह को चोदने लगा.. अपने हर एक धक्के के साथ अपना पूरा लंड शीला के हलक के नीचे तक पहुँचाने की कोशिश कर रहा था.. उसके दोनों हाथों ने शीला के चेहरे को कस कर पकड़ रखा था..






“आहहह... आहहहह भाभी... लो और लो... और लो... पूरा ले लो लंड मुँह में... खोलो थोड़ा और खोलो अपना मुँह.. ओह्ह!”

वो अब जोर-जोर से शीला के मुँह को चोद रहा था.. उसके झटकों में तूफ़ानी तेजी थी.. हर एक दफा वो अपना लंड शीला के हलक तक ले जाता था और रूक जाता था और शीला बौखला जाती थी.. कईं बार साँस लेना भी मुश्किल हो जाता था.. फिर वो धीरे से अपना लंड वापस खींचता और घुसेड़ देता.. शीला ने उसके लंड को, जो कि मानो ऑक्सीज़न कि नली हो, उस तरह से पकड़ के रखा था ताकि उससे उसे ज्यादा घुटन ना हो.. और गले के अंदर घुसकर उसका दम न घोंट दे.. शीला ने उसके लंड को अपनी ज़ुबान और होठों से उक्सा दिया था.. अचानक रसिक ने शीला के दोनों हाथ कस के पकड़ के उन्हें हवा में उठा लिया और एक जोर का झटका अपने लंड को दिया.. शीला का सर सोफ़े पर जाकर टकराया और उसका लंड सड़ाक से उसके हलक में जा टकराया..

“आआआघघहहहह. आआहहह इतने दिनों की सारी कसर आज पूरी कर दूंगा भाभी!” रसिक गुर्राते हुए बोला.. शीला को कुछ बोल पाने की स्थिति में ही नहीं थी..!!






उत्तेजना के मारे शीला का पूरा जिस्म एकदम टाईट हो गया था.. शीला की नाक रसिक की झाँटों में घुस चुकी थी जिसकी खुशबू से वो मदहोश होती चली जा रही थी और उसके टट्टे शीला की ठुड्डी के साथ टकरा रहे थे.. उसका पूरा लंड मानो उसके मुँह के अंदर था और उसका दो-तिहाई लंड हलक में आ अटका था.. शीला ने कभी ख्वाब में भी नहीं सोचा थी कि कोई इन्सान इतनी बड़ी चीज़ अपने हलक में उतार सकता है.. अब रसिक एक भूखे शेर की तरह अपना लंड शीला के मुँह के अंदर-बाहर कर रहा था और जितना हो सके उतना ज्यादा अपना लंड अंदर तक डालने की कोशिश कर रहा था.. जब-जब वो अपना लंड उसके गले में घुसेड़ता था तब-तब शीला का सर सोफ़े से टकराता था..

सुबह के शांत वातावरण में सिर्फ़ दो ही आवाज़ें सुनाई दे रही थीं - एक तो शीला के सर के सोफ़े से टकराने की और दूसरी उसके हलक से आने वाली गॉन्गियाने वाली आवाज़ की... जब उसका लंड गले तक पूरा चला जाता था तब की.. फिर रसिक ने उसके हाथ छोड़ दिये और शीला ने मौका गँवाएं बगैर उसके लंड को हाथ में पकड़ लिया.. अब नियंत्रण फिर से शीला के पास आ गया था.. और वह लंड को हथेली में पकड़कर बाकी के आधे लंड को ही मुंह में ले रही थी.. गले तक लंड लेने में जो घुटन पहले हो रही थी वह अब नहीं रही..

शीला का बर्ताव बिल्कुल एक राँड के जैसा था.. शीला अपनी चूत को सहलाये बगैर और अपनी उँगलियाँ उसके अंदर बाहर करने से नहीं रोक पा रही थी.. पर फिलहाल उसके दोनों हाथ रसिक के लंड की सेवा करने में व्यस्त थे.. घुटने मोड़कर उकड़ू बैठी शीला की फैली हुई चूत द्रवित होकर अपना रस टपकाने लगी थी.. गाउन के अंदर उसके बड़े बड़े स्तनों की निप्पल तनकर गाउन फाड़ देने की धमकी दे रही थी..

शीला ने लंड चूसने की गति तेज कर दी

“आहह आहहहघघहह भाभी.. मैं झड़ जाऊंगा..” रसिक चिल्लाया

रसिक ने शीला के मुँह से उसके काले लंड को निकालने की बेहद कोशिश की लेकिन ऐसा हुआ नहीं बल्कि वो और जोश में आ गई.. भूखी शेरनी से कभी कोई उसका शिकार छीन सकता है क्या..!! रसिक से रहा नहीं गया.. उसने अपने कुल्हों को झटका और शीला को सोफ़े से सटा दिया और पूरे जोर से अपना काला मोटा और लंबा लंड शीला के मुंह में घुसेड़ते हुए झड़ गया..

“ओह्ह.. ओह्ह.. आह्ह... ” और उसका सुबह का ताज़ा गाढ़ा माल सीधा शीला के गले के नीचे उतर गया.. करीब ६-७ लंबी पिचकारियों से रसिक का पुष्ट वीर्य शीला के गले को सराबोर करता हुआ अंदर उतर गया..








गले में इतने सारे प्रवाही का एहसास होते ही शीला गॉन्गियाने लगी.. वह लंड को मुंह से बाहर निकालना चाहती थी.. उसने काफी कोशिश की कि उसका लंड मुँह से बाहर निकल जाये लेकिन रसिक की बे-इंतहा ताकत के सामने वह नाकामयाब रही और वो झटके देता गया और उसका रस शीला के मुंह में उँड़ेलता गया.. उसने अपना पूरा वीर्य झड़ने तक अपना लंड उसके हलक में घुसेड़े रखा ताकि उसका जरा भी रस बाहर ना गिरे.. पूरी तरह फारिग होके उसने थोड़ी ढील छोड़ी और अपना लंड शीला के मुंह से बाहर निकाला.. उसके बाद जाके वह कुछ साँस ले पायी..

उसका रस अभी भी उसके लंड से बाहर निकल रहा था.. उसका ढीला हुआ लंड शीला के मुँह के सामने लटक रहा था.. उसका मुरझाया लंड भी मदन के तने हुए लंड से बड़ा था.. शीला थक के सिकुड़ कर जमीन पे बैठ गयी..और रसिक सोफ़े पर जा बैठा..

“भाभी, शीला ने आपको रोकने की कोशिश की पर आपने चूसना छोड़ा ही नहीं..? कोई बात नहीं.. आज चुसाई हो गई.. चुदाई कल कर लेंगे”

पास पड़े नेपकीन से मुंह पर लगा वीर्य साफ करते हुए शीला तुरंत उठ खड़ी हुई और रसिक के बगल में बैठ गई.. उसके कुर्ते में हाथ डालकर छाती को सहलाते हुए बोली "कल नहीं.. आज ही करो रसिक.. मेरी चूत कब से कुलबुला रही है"

रसिक के कपाल पर पसीना आ गया "पर भाभी.. अभी तो यह खाली हुआ है.. इतनी जल्दी कैसे?"

शीला ने आँखें नचाते हुए कहा "हो जाएगा खड़ा.. नहीं तो मैं फिर से इसे मुंह में लेकर खड़ा कर दूँगी"

सोफ़े से खड़े होकर शीला रसिक के आगे घूमकर खड़ी हो गई.. उस तरह की उसकी पीठ रसिक के चेहरे के सामने हो.. उसने गाउन अभी भी उतारा नहीं था.. रसिक के सामने वह किसी बैलै डांसर की तरह, धीरे धीरे अपने कूल्हे मटकाने लगी.. थिरकते हुए उन मांसल घड़ों को रसिक मंत्रमुग्ध होकर देखता रहा.. शीला दायें बाएं ऊपर नीचे ऐसे कूल्हों को हिला रही थी.. जैसे मादा पक्षी नृत्य कर नर पक्षी को संवनन के लिए आकर्षित करती है..






रसिक ने दोनों हाथों से उन मचल रहे चूतड़ों को पकड़ा.. और बीच की दरार में अपना चेहरा दबा दिया.. उसने एक गहरी सांस ली.. एक मस्की सी गंध उसके नथुनों में भर गई और वह नए सिरे से गरमाने लगा..

शीला अब घूम कर रसिक के चेहरे के सामने आ गई.. जिस तरह उसने कूल्हों को मटकाया था.. बिल्कुल उसी तरह वह अपने स्तनों को हिला हिलाकर रसिक को और उकसाने लगी.. बिना ब्रा के स्तन, गाउन के अंदर शरारती खरगोशों की तरह उछलने लगे.. शीला की कमर बल खाते हुए लहराने लगी.. और साथ ही उसके स्तन भी यहाँ से वहाँ झूलने लगे..

इस दौरान शीला झुकी और अपने गाउन को नीचे से पकड़कर धीरे धीरे उठाने लगी.. सब से पहले उसकी गोरी पिंडिलीयाँ उजागर हुई.. फिर उसकी गोरी मांसल जांघें.. अब उसकी लाल रंग की पेन्टी भी द्रश्यमान होने लगी.. कमर से उठाकर कंधों तक जब गाउन ऊपर हो गया.. तब उसके दोनों स्तन मुक्त होकर विहार करने लगे.. जैसे उम्र-कैद की सजा पाए कैदी, जमानत पर रिहा हुए हो..!!

शीला के बड़े बड़े स्तन.. पुराने जमाने के कोई ख्यातनाम लेखक देख लेते.. तो पूरा उपन्यास लिख देते..!! ऐसा उसका जादू था.. देखने वाला एक पल के लिए भी नजर हटा नहीं पाता.. इतने बड़े की किसी वयस्क मर्द की दोनों हथेलियाँ कम पड़ जाती एक स्तन को पकड़ने मे.. उस स्तन के बीचोंबीच भूरे रंग के चक्राकार ऐरोला.. और उसके ऊपर तने हुए स्तनाग्र..!!






शीला अपने स्तनों को यहाँ से वहाँ लहराते हुए रसिक के करीब आई.. और दोनों स्तनों के बीच रसिक का चेहरा दबा दिया.. आह्ह.. रसिक को मानो धरती पर ही स्वर्ग नजर आने लगा था..!!! उन मांसल गोलों की गर्माहट अपने गालों पर महसूस करते हुए रसिक का रक्त उसकी नसों में तेजी से दौड़ने लगा था..

रसिक ने अपना चेहरा स्तनों के बीच से निकाला.. और शीला के एक स्तन की इंच लंबी निप्पल को मुंह में भर लिया और चूसने लगा.. शीला सिहरने लगी.. मदहोश होकर वह रसिक के बालों में अपनी उँगलियाँ फेर रही थी.. रसिक का हाथ शीला के गदराए पेट पर घूमते हुए उसकी नाभि पर स्थिर हो गया.. उस गहरी कुएं जैसी नाभि में वह अपनी उंगली डालकर टटोल रहा था..

शीला अब रसिक की एक जांघ पर बैठ गई.. और आगे पीछे होते हुए अपनी चूत रगड़ने लगी.. उसकी अंगीठी जैसी चूत की गर्मी, रसिक की जांघ को झुलसा रही थी.. फुली हुई क्लिटोरिस का घर्षण होते ही शीला पागल सी होने लगी.. उसने अपना हाथ रसिक के लंड पर रख दिया.. उस मूसल में अब धीरे धीरे जान आ रही थी..!!

शीला ने रसिक के लंड को अपनी मुठ्ठी में पकड़ लिया और हिलाने लगी.. उसने अपने होंठ रसिक के काले होंठों पर रख दिए.. रसिक पागलों की तरह शीला के होंठ चूस रहा था..

कुछ मिनटों तक हिलाने पर रसिक का लंड गुब्बारे की तरह तन कर फूलने लगा और एक दो सेकंड के अंदर तो लोहे के बड़े डँडे की तरह टाईट हो गया..

अब उसने शीला की चूचियों को दोनों हाथों से मसलना शुरू कर दिया.. उन स्तनों को महसूस करते ही वो तो पागल-सा हो गया और ऐसे मसलने लगा कि जैसे ज़िंदगी में ऐसी चूचियाँ देखी ही न हों.. मसलते हुए वह बीच-बीच में शीला की निप्पलों को ज़ोर-ज़ोर से पिंच करता था और उसके गले के इर्द-गिर्द दाँतों से काट रहा था..






शीला अब रसिक की गिरफ्त से छूटकर.. नीचे फर्श पर बैठ गई.. और रसिक का लंड हाथ में लेकर अपना मुंह करीब लाई.. उसकी इच्छा समझ चुके रसिक ने शीला को रोक दिया..

"नहीं भाभी.. फिर से मुंह में मत लेना.. वरना फिर से झड़वा दोगे आप मुझे..!!" रसिक ने विनती की

शीला मुस्कुरा कर खड़ी हो गई.. उसके नंगे बदन पर केवल लाल रंग की पेन्टी ही बची थी.. जिसके आगे का हिस्सा, उसके भोसड़े के चिपचिपे रस से भीग चुका था..






सिक शीला की दोनों जांघों के करीब आया.. और अपना नाक शीला की पेन्टी के हिस्से पर रगड़ने लगा.. शीला को बेहद मज़ा आ रहा था.. रसिक शीला के कामरस को सूंघकर, संभोग के लिए तैयार सांड की तरह गुर्राने लगा..!!!

उसने शीला की उस लाल पेन्टी को दोनों तरफ से पकड़ा.. और एक ही झटके में शीला के घुटनों तक उतार दिया.. शीला का भव्य भोसड़ा अब उसकी आँखों के सामने था.. कई महीने हो गए थे शीला के इस छेद को देखे हुए.. हल्के झांटों के बीच, फुले हुए होंठ.. ऊपर जामुन जैसी बड़ी क्लिटोरिस.. भोसड़े के दोनों होंठ योनि-रस से लिप्त होकर चमक रहे थे..





रसिक की जीभ अनायास ही बाहर आ गई.. और उन दोनों होंठों के बीच उसने अपनी खुरदरी जीभ फेर दी..!! शीला ऐसे थरथराई जैसे वह स्खलित हो रही हो..!!! वाकई उसका पानी निकल गया रसिक की जीभ के स्पर्श से..!!! झड़ते ही उसके घुटनों में थोड़ी थकावट सी महसूस हुई और वह सोफ़े पर फैल कर बैठ गई..

अब रसिक उठा और शीला की तरफ घुमा.. उसने झुककर शीला की दोनों टांगों को चौड़ा किया और उंगलियों से शीला की चूत को फैलाकर बीच के गुलाबी हिस्से को चाटने लगा.. शीला ने अपना सिर पकड़ लिया.. रसिक के चाटने से वह इतनी उत्तेजित हो गई की उसे पूरी दुनिया गोल गोल घूमती दिखाई पड़ रही थी






जैसे मधुमक्खी के छत्ते को भालू चाटता है.. वैसे ही रसिक शीला के भोसड़े को बड़े ही चाव से चाट रहा था.. छेद के काफी अंदर तक अपनी जीभ डालकर वह शीला के अनूठे रस का स्वाद ले रहा था.. भोसड़े का पानी गांड के छेद से होता हुआ सोफ़े पर गिर रहा था..

काफी देर तक इस चटाई का दौर चलते रहने के बाद, शीला ने अब आँखें खोली.. और रसिक को अपने भोसड़े से दूर किया.. यह इस बात का इशारा था की अब लंड अंदर डालने का समय आ चुका था..

रसिक खड़ा हुआ.. उसका तना हुआ लंड हवा में लहरा रहा था.. उसने अपने लंड को मुठ्ठी में पकड़ा और मुंह से लार निकालकर लगाते हुए अत्याधिक गीला कर दिया.. सुपाड़े को शीला के भोसड़े पर रखकर उसने अपनी कमर को ठेला.. शीला के नीचे के होंठ फैले और रसिक का लंड बिना किसी अवरोध के अंदर घुस गया..!! रसिक के संपर्क में ऐसी यह एक ही महिला थी जो उसके लंड को पूरा अंदर ले पाती थी..!!






रसिक ने अब धनाधन पेलना शुरू कर दिया.. शॉट लगाते हुए वह शीला के बबलों को क्रूरतापूर्वक रौंद रहा था.. उसके प्रहारों से शीला के स्तन लाल लाल हो गए थे.. शीला अपनी दोनों जांघों को.. जितना हो सके उतना फैलाकर रसिक के लंड को ज्यादा से ज्यादा अंदर लेने की कोशिश कर रही थी.. रसिक का लंड हर दूसरे धक्के पर उसकी बच्चेदानी पर दस्तक दे रहा था..





तभी बेडरूम से बाहर निकलकर मदन ड्रॉइंगरूम में प्रवेश कर ही रहा था की यहाँ का द्रश्य देखकर वो वहीं रुक गया.. रसिक और शीला के इस भव्य संभोग को वो कुछ पलों तक देखता ही रहा..!! तभी शीला की नजर मदन की तरफ गए.. दोनों की आँखें मिली..!! मदन ने मुस्कुराकर शीला को आँख मारी.. शीला भी मुस्कुराई..!! मदन ने हाथ से इशारा करते हुए शीला को अपना काम जारी रखने के लिए कहा.. और उलटे पाँव वापिस बेडरूम में लौट गया..

रसिक का लंड शीला के भोसड़े में चोट पर चोट लगा रहा था.. रसिक कभी शीला को चूमता.. कभी उसकी निप्पल को दांतों के बीच दबाता तो कभी अंगूठे से शीला की क्लिटोरिस को रगड़कर छेड रहा था.. शीला की कराहों से उसका पूरा कमरा गूंज रहा था.. इस परिश्रम से रसिक और शीला दोनों के जिस्म पसीने से तर हो चुके थे..!!






सहसा रसिक ने शीला की चूत से अपना लंड बाहर निकाल लिया.. और शीला को पलटने का इशारा किया.. शीला समझ गई.. और उल्टा घूमकर घोड़ी बन गई.. रसिक ने उसके मम्मों को दबाते हुए अपनी और खींचा.. इस बार शीला को महसूस हुआ कि उसका लंड अब उसकी कमर पे रेंग रहा था और उसके आँड शीला की गाँड को छू रहे थे..उसकी गरम साँसों ने जो कि शीला के गले को छू रही थीं, एक सीधा पैगाम शीला की चूत को दे रही थी कि “पिक्चर अभी बाकी है"

रसिक अपना लंड शीला की गाँड से चूत के छेद तक नीचे-ऊपर ऊपर-नीचे कर रहा था.. उसने अपने लंड के सुपाड़े को शीला की गाँड के छेद से दबाया.. पर शीला ने उसे रोक लिया






"पहले आगे की आग तो बुझ जाने दे, रसिक" शीला ने मुड़कर कहा

रसिक मुस्कुराया.. और अपने सुपाड़े को गांड से हटाकर, फैली हुई चूत पर रखकर दबाने लगा.. मक्खन में गरम छुरी की तरह उसका लंड अंदर घुस गया.. शीला के मदमस्त विराट चूतड़ों को दोनों हाथों से पकड़कर वह दबाकर चोदने लग गया.. आगे-पीछे.. आगे-पीछे..आगे-पीछे..आगे-पीछे.. करते हुए उसने शीला को एक बार और स्खलित कर दिया..!!






इस दौरान वह शीला की चूचियों को पकड़कर लगातर दबाये जा रहा था.. उसने धीरे से अपना लंड चूत से निकाला और फिर झटके से डाल दिया.. अपने हाथ शीला के कुल्हों पर टीका कर .. अब वो एक पागल हैवान की तरह शीला की चूत के अंदर बाहर अपना लंड पेल रहा था और शीला उसके हाथों में एक खिलौने की तरह खेली जा रही थी.. रसिक की आवाज़ें भी अब सुनाई दे रही थी.. वो एक जंगली जानवर की तरह कराह रहा था.. वो ऐसे शीला की चूत का पूरा लुत्फ़ उठाये जा रहा था जैसे कि ज़िंदगी में पहले चूत चोदी ही ना हो..!!!

शीला की चूत ने उसका तमाम लंड खा लिया था और फिर उसके लंड के आसपास एक दम सिकुड़ गयी है जैसे कि वो उसे पूरा चूस लेना चाहती हो.. चुदाई की मस्ती का पूरा समँदर उसके अंदर उमड़ पड़ा था.. अब रसिक ने शीला को सोफ़े पर पूरा झुका के लिटा दिया और उसकी रसभरी कचौड़ी जैसी चूत को तेजी से चोदने लगा.. जब भी उसका लंड अंदर घुसता था तब शीला की चूत उसके लंड को गिरफ़्त में लेने की कोशिश करती थी और उसके आसपास टाईट हो जाती थी.. दोनों के जिस्म, आपस में से टकराने से थप-थप की आवाज़ें आ रही थी.. रसिक की आवाज़ अब एक घायल हुए भेड़िये जैसी हो गयी थी, जैसे उसे दर्द हो रहा हो..






“मममम..... आआआहहह..... बहुत मज़ा आ रहा है चोदने में...आहहह आहहह बहुत चुदाई की है पर आपके जैसी कोई नहींईंईंईं !!!” रसिक बोला

वो बड़ी तेज़ रफ़्तार से अपना मोटा काला लंड शीला की चूत की गहराईयों में पेल रहा था.. जब-जब वो अंदर पेलता था शीला का जिस्म सोफ़े के ऊपर खिसक जाता था.. उसके लंड का भार शीला की क्लिट को मसल रहा था.. शीला की सूजी हुई क्लिट में अजीब सी चुभन और सनसनी हो रही थी..

“ओहहह आहहहहह... ओहह... ओहहहह आहहहह...!” शीला तीसरी बार झड़ने लगी थी और उसकी चूत थरथराने लगी थी.. “आह हा हाह हाह हाहाह...!”

अपने विराट शरीर तले दबी शीला के जिस्म को स्खलन से थरथराता देख रसिक मुस्कुराने लगा

अब उसने अपना लंड शीला की चूत से निकालकर शीला की गाँड पर रख दिया.. चरमोत्कर्ष के नशे से शीला को तब होश आया जब रसिक ने उसकी गांड में पहला धक्का लगाया






“जरा धीरे से रसिक...!” शीला फुसफुसाई..

लंड उसकी गांड में आधा पेलकर रसिक हँसते हुए उसके मम्मों को मसलता रहा.. शीला की चूचियाँ, हिमालय की चोटियों की तरह तन गयी थी.. उसने चूचियाँ गरम कर के ऐसी कठोर बना दी थीं कि अगर ब्लाऊज़ पहना होता तो शायद उसके सारे हुक टूट गये होते..






मम्मे मसलते हुए रसिक के एक ज़ोरदार झटके ने शीला की सारी हवा निकाल दी.. ऐसा लगा कि उसका लंड शीला के चूतड़ों को दो हिस्सों में बाँट देगा..!! वो अब ज़ोर-ज़ोर से शीला की गांड के अंदर-बाहर हो रहा था.. उसके लंड ने शीला की गांड को एकदम चौड़ा कर दिया था और शीला की गांड उसके इर्द-गिर्द म्यान के जैसे चिपक गयी.. उसकी जोरदार चुदाई ने शीला को फलक पर पहुँचा दिया था.. “पुच्च.. पुच.. पुच्च...” जैसी आवाज़ें आ रही थीं जब उसका लंड शीला की गांड में तेजी से अंदर-बाहर हो रहा था..

“आहहहह आहहहह आहहह भाभी.. अब मेरा होने वाला है!” रसिक गुर्राया..

लंड अब कौंधती हुई बिजली कि तरह अंदर-बाहर हो रहा था और जोर-जोर से आवाज़ें निकालता था.. शीला का चूत-रस चू कर सोफ़े पर टपक रहा था.. अब शीला अपने आप ही कुल्हों को अपनी और खींच रही थी और उसे झटके दे रही थी..






“आहहहह... आहहह और तेज... और तेज ... और तेज चोद मुझे... और तेज!” शीला बड़बड़ाने लगी

“मैं अब झड़ने वाला हूँ...!” रसिक की आँखें ऊपर चढ़ गई

उसने कस के अपना एक हाथ शीला की कमर में डाल के एक जोर का झटका दिया और उसका लंड शीला की अंतड़ियों तक पहुँच गया..

“आआआहह... आआआहहह...!” वो चिल्लाया

उसने अपने गाढ़े रस की धार शीला की गांड की गहराई में छोड़ दी “आआआहहहह.... आआआघहह..ओहहह... नहींईंईंईं...!” शीला की गांड ने कसकर उसके लंड को दबोच लिया.. उसके लंड-रस की दूसरी धार भी शीला को अंदर महसूस हुई..

जब उसका लंड अपने रस से शीला की गांड को भर रहा था, तब वो जोर-जोर से दहाड़ रहा था और चिल्ला रहा था.. वो लगातार अपना रस छोड़ रहा था.. शीला की टाँगों में ज़रा भी ताकत नहीं बची थी और वह सोफ़े पर लाश की तरह ढह गई.. रसिक आखिरी बार दहाड़ा और शीला के गदराए बदन के ऊपर हाँफते हुए गिर गया.. वो शीला के ऊपर उसी हालत में कुछ पल पड़ा रहा और उसका लंड धीरे-धीरे शीला की गांड में से अपने आप बाहर आने लगा.. उसका गरम-गरम वीर्य शीला के चूतड़ों से बाहर टपक रहा था..






तीन तीन स्खलनों से थकी हुई शीला.. अपने होश गँवाकर लाश की तरह सोफ़े पर पड़ी हुई थी.. रसिक संभालकर खड़ा हुआ.. अपने कपड़े पहने.. दरवाजा खोला.. और निकल गया

रसिक के जाते ही दरवाजे के बंद होने की आवाज सुनकर, मदन दबे पाँव बेडरूम से निकलकर मुख्य कक्ष में आया.. शीला सोफ़े पर अचेतन होकर पड़ी हुई थी..

मदन धीरे से शीला के करीब आया.. वह पेट के बल, नंगे बदन, सोफ़े पर लाश की तरह पड़ी हुई थी.. शीला की दशा देखकर साफ प्रतीत हो रहा था की बेहद घमासान चुदाई हुई थी..!!

मदन ने शीला के शरीर को पकड़कर पलटाया और सीधा किया.. इस हरकत से भी शीला की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई.. शायद वह संभोग की थकान से या फिर स्खलन के सुरूर से थक कर गहरी नींद सो रही थी या फिर होश में ही नहीं थी.. मदन ने शीला को झकझोर कर जगाने की कोशिश की पर शीला ने अपनी आँख तक नहीं खोली..!!

अब मदन ने बड़े ही इत्मीनान से शीला के शरीर का मुआयना किया.. उसके गले के इर्दगिर्द, रसिक के काटने के वजह से निशान बन गए थे.. चूचियाँ बेहद रगड़े जाने के कारण लाल लाल हो गई थी.. निप्पलें तो अब भी तनकर खड़ी हुई थी..

मदन शीला के पैरों की तरफ बैठ गया.. उसने शीला की टांगें फैलाईं.. शीला की बुर और गांड के छेद से अब भी वीर्य रिस रहा था.. मदन अपना चेहरा शीला के भोसड़े के करीब ले गया.. इतना करीब की वह भोसड़े की गंध सूंघ पा रहा था.. वीर्य से लिप्त चूत से बड़ी ही अनोखी सी.. मस्की और धातुमय गंध आ रही थी..!!!

यह गंध मदन को मदहोश करती जा रही थी.. शीला की चूत को वह असंख्य बार सूंघ और चाट चुका था.. पर आज की उसकी गंध बेशक अनूठी सी थी.. उसके दो कारण थे.. तीन तीन ऑर्गजम से शीला की चूत ने विपुल मात्रा में द्रव्य उत्पन्न किया था.. दूसरा यह की अब तक शीला के दोनों छेद वीर्य से लसलसित थे.. स्वाभाविक था की यह दोनों की मिश्र गंध थी

अपने नथुनों को शीला की चूत पर रगड़ते हुए मदन उत्तेजित होने लगा.. उसे वह गंध इतनी कामुक लग रही थी.. खासकर यह जानने के बाद की यह छेद अभी कुछ ही मिनटों पहले किसी गैर-मर्द के लिंग से विस्तारित हुई थी और उसके अंदर भरपूर मात्रा में वीर्य भी स्खलित किया गया था..

उसने अपनी एक उंगली शीला की चूत के होंठों के इर्दगिर्द फेरी.. रसिक का चिपचिपा वीर्य उसकी उंगली पर लग गया.. वह उंगली अपनी नाक के पास ले जाकर, मदन ने गहरी सांस ली..!!! रसिक के तो वीर्य में भी मर्दाना गंध छलक रही थी.. पता नहीं क्यों, मदन को अजीब लग रहा था की एक परपुरुष ने उसकी पत्नी को चोदकर उसकी चूत में जो वीर्य छोड़ा था उसकी गंध उसे पसंद आ रही थी.. यह वाकई काफी असहज था

जिस बात को जानकर अन्य पुरुष गुस्से से पागल हो जाते है.. वह बात.. न तो मदन के मन में ईर्ष्या जागृत कर रही थी और ना ही उसे शीला के प्रति कोई गुस्सा आ रहा था.. वह तो इस अनोखे अनुभव को बड़े ही आनंद से महसूस कर रहा था..

स्त्री-पुरुष के कामयज्ञ के पश्चात उत्पन्न हुआ वीर्य, उसे आकर्षित कर रहा था.. उससे भी ज्यादा आकर्षक लग रही थी उसे शीला की वीर्य से लिप्त हुई चूत..!! आज से पहले कभी उसे शीला पर इतना प्यार नहीं आया था

मदन ने शीला की टांगें और फेला दी.. अब उसकी गांड का छेद भी उजागर हो गया था.. दोनों चूतड़ों के बीच से भी वीर्य निकल रहा था.. मदन सोच रहा था.. रसिक का लंड है या हॉज़ पाइप..!!! इतनी मात्रा में वीर्य का बहाव उसने पहले कभी नहीं देखा था..






इतनी देर तक शीला के करीब बैठने के बाद भी शीला को होश नहीं आया था.. पर मदन का लंड उसकी शॉर्ट्स में तंनकर खड़ा हो चुका था.. उसने तुरंत ही अपनी शॉर्ट्स और टी-शर्ट उतार दी और मादरजात नंगा हो गया..

वह शीला की दोनों जांघों के बीच सटकर बैठ गया.. अपना लंड मुठ्ठी में पकड़कर उसने शीला की वीर्य लगी चूत पर रगड़ा.. गिलेपन की कोई कमी नहीं थी.. मदन ने चूत को हल्का सा फैलाया और अपनी कमर को ठेलते हुए धक्का लगाया..

"पूच्च" की आवाज के साथ उसका पूरा लंड शीला के भोसड़े में.. जड़ तक अंदर चला गया.. मदन ने अपने शरीर का सारा बोझ शीला का ऊपर डाला.. और उसके दोनों स्तनों को दबाते हुए एक के बाद एक शॉट लगाने लगा..!!!

शीला का भोसड़ा फेला हुआ था.. योनि-रस और वीर्य से सनी योनि दीवारों के बीच, घर्षण भी पर्याप्त मात्रा में नहीं हो रहा था.. फिर भी, मदन को इतना मज़ा आ रहा था की वह बस आँखें बंद कर धक्के लगाए ही जा रहा था






शीला के खरबूझों जैसे बड़े स्तनों को दबाते, मसलते और चूसते हुए मदन जोश में पेले जा रहा था.. वह खुद भी इस बात से हैरान था की ऐसे संभोग में उसे इतना अधिक आनंद आखिर क्यों आ रहा है..!!! कुछ नया करने का एहसास था.. गजब की उकसाहट थी.. और बेहिसाब उत्तेजना भी..!! मदन ने कभी सपने भी नहीं सोचा था की उसे अपनी पत्नी को चोदने में इतना मज़ा आएगा..!!!

शीला की उभरी हुई निप्पलों को बारी बारी मुंह में लेकर.. वह चटकारे मारते हुए चूस रहा था.. गदराए स्तनों के मांस को मरोड़ने-मसलने में जबरदस्त मज़ा आ रहा था..

फ़च-फ़च की आवाज़े करता हुआ उसका लंड.. शीला की ओखली में दातुन की तरह अंदर बाहर हो रहा था..!!! शीला की लाल क्लिटोरिस को चूसने का मन कर गया मदन को.. पर फिलहाल चुदाई में इतना मज़ा आ रहा था की मदन लंड बाहर निकालना नहीं चाहता था..!!






तभी डोरबेल बजी.. मदन ने ध्यान नहीं दिया.. और धक्के लगाता रहा..!!

डोरबेल तीन-चार बार बजी.. मन ही मन उस आगंतुक को गालियां देते हुए मदन ने शीला के भोसड़े से लंड बाहर निकाला.. और केवल शॉर्ट्स पहनकर दरवाजा आधा ही खोला.. क्योंकि शीला ड्रॉइंग-रूम में ही नंगे बदन लेटी हुई थी..!!

दरवाजे पर कूरियर वाला था.. मदन के हाथ में कवर देकर, उसके दस्तखत लेने के बाद वह चला गया.. मदन ने गुस्से से कवर को टेबल पर पटका और सोफ़े की तरफ आ ही रहा था की शीला आँखें मलते हुए बैठी थी..!!

"तू जाग गई शीला??" मदन ने चोंककर पूछा

आलस से भरी हुई मदहोश आवाज में अंगड़ाई लेते हुए शीला ने उभासी लेते हुए कहा "तुझे क्या लग रहा है?"






मदन: "अरे यार, अभी कुछ मिनटों पहले तुझे जरा भी होश नहीं था.. मैंने तुझे काफी बार हिलाया फिर भी तू जागी नहीं थी.. इसलिए पूछा"

अपने बिखरे हुए बालों को बांधते हुए शीला ने कहा "हाँ यार.. आज कुछ ज्यादा ही थक गई.. कमीने ने उल्टा-सीधा करते हुए बहोत पेला मुझे.. बहोत मज़ा आया.. पर तू वापिस क्यों चला गया? यहाँ बैठकर देखता या हम दोनों के साथ जुड़ जाता तो और मज़ा आता"






मदन: "यार, मैंने यह महसूस किया है की मेरी मौजूदगी में रसिक थोड़ा सा असहज हो जाता है.. ऐसी बातें उसके गंवार मन मे उतरेगी नहीं.. इसलिए तुम दोनों को डिस्टर्ब नहीं किया"

लड़खड़ाते हुए शीला खड़ी हुई तो मदन उसके करीब गया और उसे हल्का सा धक्का देकर वापिस सोफ़े पर गिरा दिया..

शीला ने कहा "क्या कर रहा है यार?"

मदन: "तुम दोनों को देखकर मेरा भी कब से खड़ा हुआ था.. तो सोचा थोड़ा मॉर्निंग सेक्स कर लिया जाए"

शीला फिर से खड़ी होने की कोशिश करने लगी "ठीक है.. पर मैं दो मिनट बाथरूम जाकर आती हूँ.. रसिक का पूरा माल लगा हुआ है.. साफ कर लेने दे मुझे"

"कोई जरूरत नहीं" कहते हुए मदन ने अपनी शॉर्ट्स उतारी और शीला के ऊपर झपट पड़ा.. चकित होकर शीला मदन की ओर देखती रही.. मदन ने उसे सोफ़े पर गिरा दिया था और खुद उसपर चढ़ चुका था.. मदन का सख्त लंड शीला के पेट पर चुभ रहा था..!!

"मदन, ऐसी भी क्या जल्दबाजी? एक मिनट लगेगा.. मुझे यह सब साफ तो कर लेने दे" शीला ने परेशान होते हुए कहा

उसे रसिक के लगे हुए वीर्य से कोई आपत्ति नहीं है ऐसा जताने के लिए मदन अपना चेहरा शीला की जांघों के बीच ले गया.. और अपनी जीभ निकालकर शीला के भोसड़े के अंदर घुसा दी.. जैसे कुत्ता अपनी जीभ लपलपाकर दूध चाटता है.. बिल्कुल वैसे ही वह शीला के भोसड़े के रस और वीर्य के मिश्रण को चाटने लगा..!!






अत्यंत आश्चर्य के भाव से शीला फटी आँखों से मदन की तरफ देख रही थी.. मदन का या रूप उसने पहले कभी देखा नहीं था.. उसकी मौजूदगी में परपुरुष से कई बार चूदी शीला ने यह द्रश्य आज से पहले कभी नहीं देखा था.. उसे समझ में नहीं आ रहा था की मदन की इस हरकत का क्या जवाब दें..!!

पर मदन की जीभ ने ऐसा जादू किया की शीला का दिमाग फिर से बंद हो गया.. वह धीरे धीरे गरम हो गई.. और आँखें बंद कर लेटी रही.. अपने घुटनों को मोड़ते हुए उसने जांघों को और चौड़ा कर दिया ताकि मदन भोसड़े के अंदर तक अपनी जीभ डालकर चाट सकें..

चाटते हुए मदन ने शीला की जामुन जैसी क्लिटोरिस को दोनों होंठों के बीच दबाया और साथ ही अपनी एक उंगली शीला की गांड में डाल दी.. शीला को ऐसा झटका लगा की उसका पूरा बदन कांपने लगा.. आज मदन एक के बाद एक.. नई हरकतें करता जा रहा था.. रसिक के मुकाबले मदन का लंड, एक छोटी सी नुन्नी के बराबर था.. पर हरकतों के मामले मदन को कोई मात नहीं दे सकता था..!!!

शीला पागलों की तरह कराहने लगी.. अपने बालों को नोचने लगी.. बबलों को बेतहाशा मसलने लगी.. उत्तेजना से वह पागल हुई जा रही थी..!!

उसने अब मदन को सिर के बालों से पकड़कर खींचा और अपने शरीर के ऊपर आने को मजबूर कर दिया.. मदन का पूरा चेहरा शीला के चूत-रस और रसिक के वीर्य से लिप्त ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे शिकार खा रहे शेर के मुंह पर खून लगा हुआ हो..!!!

मदन को दोनों कंधों से पकड़कर शीला ने उसका चेहरा अपने होंठों पर दबा दिया.. और उस प्रवाही से सने चेहरे को चाटने लगी.. उसी दौरान मदन ने फिर से अपना सुपाड़ा शीला की चूत पर रखकर अंदर डाला और शीला की चुंबनों की वर्षा के बीच चोदने लगा..






करीब बीस मिनट तक धक्के लगाने के बाद भी जब मदन नहीं झड़ा तब शीला ने अपनी दोनों जांघें आपस में भींचकर अपनी चूत की मांसपेशियों से उसके लंड को ऐसे जकड़ा जैसे कोल्हू में गन्ना फंसा हुआ हो.. अब घर्षण इतना जबरदस्त हो रहा था की मदन की उत्तेजना से सांसें फूलने लगी.. उसने तीन चार अंतिम तेज धक्के लगाए और अपने अंडकोशों का सारा माल शीला के भोसड़े मे उंडेल दिया..!!!

इस अत्याधिक परिश्रम से थका हुआ मदन शीला के बबलों को तकिया बनाकर.. उसपे सिर रखकर सो गया.. शीला उसकी पीठ को सहला रही थी.. काफी लंबे अरसे के बाद वह दोनों इतनी जबरदस्त तृप्ति का एहसास कर रहे थे..!!

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रसिक पर हमले का जूठा आरोप लगाने के बाद से, शीला और उसके बीच संबंध काफी बिगड़ चुके थे.. शीला के लाख माफी मांगने पर भी रसिक का गुस्सा कम नहीं हो रहा था.. पर अब शीला ने रसिक को मनाने का मन बना लिया था.. सुबह रसिक के आने पर शीला ने ढेरों मिन्नते कर रसिक को मना लिया और फिर शुरू हुआ.. वही पुराना शीला-रसिक का रसीला खेल.. खूँटे जैसे तगड़े लंड और गदराई शीला के बीच का जबरदस्त द्वन्द..

शीला के घर के ड्रॉइंगरूम में चल रही इस धुआंधार चुदाई के दौरान, मदन बेडरूम से बाहर निकलकर आया.. रसिक तो नहीं पर शीला ने उसे देख लिया और मदन चुपचाप बेडरूम में चला गया..

एक धमाकेदार संभोग के बाद, शीला सोफ़े पर नंगे बदन ढेर होकर पड़ी थी और रसिक उसे उसी अवस्था में छोड़कर निकल गया.. चरमसीमा के अप्रतिम आनंद से होश खो बैठी शीला के दोनों छेद और शरीर, रसिक के पुष्ट वीर्य से सने हुए थे.. इसी बीच मदन बाहर आकर शीला को इस अवस्था में देखता है.. अपनी पत्नी को किसी और संग चुदाई के बाद देखने में उसे अजीब सी उत्तेजना होने लगी.. शीला के तृप्त चुदे हुए, वीर्य सने भोसड़े को सूंघकर वह उत्तेजित हो उठा और उसने शीला की गीली पिच पर अपनी बेटिंग शुरू कर दी..

अब आगे..

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शाम का समय हो रहा था.. पीयूष के आलीशान बंगले के खिड़की और दरवाजे बंद थे..

उसके बेडरूम से सिसकियों की आवाज़ें आ रही थी.. उसमें से एक आवाज तो कविता की थी यह जाहीर सी बात थी.. पीयूष उस वक्त अपनी ऑफिस में था.. तो कौन था वह दूसरा व्यक्ति???

कमरे में अंधेरा था.. बेडरूम के नरम बिस्तर पर कविता अपनी साड़ी और पेटीकोट कमर तक चढ़ाकर तकिये पर लेटी हुई थी.. उसकी आँखें बंद थी और वह अपने हाथों से तकिये की नरम रुई को.. उत्तेजना के मारे नोच रही थी..

ब्लाउज उसने अभी भी पहन रखा था पर उसकी साड़ी का पल्लू बिखरा पड़ा था.. घुटने से मोड़कर दोनों टांगों को फैलाएं हुए वह लेटी थी.. उसकी दोनों टांगों के बीच एक इंसानी आकृति अपना चेहरा कविता की चूत पर दबाए हुए थी.. और वही था कविता की निरंतर सिसकियों का कारण..!!!

कविता की गीली पुच्ची में अपनी जीभ डालकर.. अंदर के लाल अमरुदी हिस्से को रगड़ रगड़कर चाटने के बाद जब वह चेहरा ऊपर उठा तब कविता ने बड़े ही स्नेह के साथ उसके बालों को सहलाया






"दीदी, अब मेरी बारी" कहते हुए अब फाल्गुनी कविता के बगल में लेट गई.. और कमर उठाकर अपनी जीन्स और पेन्टी उतारने लगी..

पीयूष के संग समस्यात्मक वैवाहिक जीवन से झूझ रही कविता.. अपने जिस्म को आग को बुझाने के लिए फाल्गुनी का सहारा ले रही थी.. जब से उसे फाल्गुनी और अपने पिता सुबोधकांत के बीच के संबंधों के बारे में पता चला था तब से उन दोनों के बीच बचीकूची शर्म का पर्दा हट गया था.. शुरुआत के समय में वह फाल्गुनी से नफरत करती थी जब उसे फाल्गुनी और पापा के नाजायज ताल्लुकात के बारे में पता चला.. पर समय रहते उस नफरत की तीव्रता कम होती चली.. गुस्सा उतारने के बाद, गहराई से सोचने पर उसे प्रतीत हुआ था की फाल्गुनी उसके पापा के हाथों शिकार ही बनी थी.. उसके बाद दोनों के बीच दूरियाँ कम होती गई.. बाद में यह भी पता चला की मौसम और फाल्गुनी के बीच भी सजातीय यौन संबंध थे.. जब तरुण अस्पताल में भर्ती था.. तब कविता, मौसम और फाल्गुनी अपने जिस्मों की गर्मी सांझा भी कर चुकी थी

पीयूष के बेरुखी भरे बर्ताव से कविता काफी दुखी थी.. न उसके पास कभी समय था.. और न ही कविता के प्रति वह पहला वाला झुकाव..!! अन्य जरूरतों को कविता परिवार और दोस्तों के संग पूरा कर लेती थी.. पर जिस्म की अनबुझी प्यास से वह दिन रात तपती रहती थी.. रसिक के साथ हुए धमाकेदार संभोग का सुरूर कुछ दिनों तक तो रहा.. पर फिर उसका शरीर फिर से भोग मांगने लगा..

कविता का न कोई ऐसा पुरुष संपर्क था और न ही उसमे ऐसी हिम्मत थी की वह विवाहेतर संबंध के बारे में सोच सकें.. अब तक उसे जो भी मिल पाया था, वह सब शीला भाभी की बदौलत ही था.. फिर वो पिंटू हो या रसिक..!! लेकिन शीला तो अपने शहर रहती थी.. वो वहाँ बैठे बैठे उसकी कैसे मदद कर पाती..!!!

ऐसे में ही उसे फाल्गुनी याद आई..!! इससे पहले भी वह दोनों तीन बार लेस्बियन संबंधों का आनंद ले चुकी थी..!! वैसे फाल्गुनी के लिए सेक्स की कोई कमी नहीं थी.. राजेश से संपर्क होने के बाद उसका काम-जीवन खुशनुमा सा था.. फिर भी वह कविता दीदी के बुलाने पर उन्हें मना नहीं कर पा रही थी.. वासना के कारण नहीं पर सहानुभूति के चलते वह शायद कविता से यह संबंध जारी रख रही थी

अपनी उत्तेजना से उभरते हुए कविता ने एक स्नेहभरी नजर, बगल में लेटी फाल्गुनी की तरफ डाली.. वह उठी और फाल्गुनी के स्तनों को हल्के से दबाकर उसकी टांगों के बीच अपने सिर को डालकर बेड पर लेट गई.. जैसे ही फाल्गुनी ने अपनी जांघें और खोली, उसकी गुलाब की पंखुड़ियों जैसे चूत के होंठ फैल गए.. चूत की दरार पर हल्की सी नमी दिख रही थी.. जो स्वाभाविक तौर पर उनके संसर्ग के कारण ही उत्पन्न हुई थी..

कविता ने कुछ देर तक उसकी प्यारी मुनिया को देखती रही.. फिर उसने योनि के उस मांसल पिंड को सहलाया.. अपनी उंगलियों से चूत की परतों को फैलाकर अपने अधर करीब ले गई.. चूत की मीठी गंध सूंघते हुए कविता के होंठ खुले और उसकी जीभ बाहर निकलकर फाल्गुनी के गुनगुने छेद में घुस गई.. फाल्गुनी कराह उठी..!! उसके कूल्हें बिस्तर से एक इंच ऊपर उठ गए..






कुछ महिलाएं समलैंगिक संबंधों में अधिक सहज और सुरक्षित महसूस करती हैं.. उन्हें लगता है कि एक स्त्री के साथ रिश्ता बनाने में उन्हें अधिक गर्मजोशी, कोमलता और समझ मिलती है.. महिलाएं अक्सर एक-दूसरे की भावनाओं को बेहतर ढंग से समझती हैं और एक-दूसरे के साथ अधिक संवेदनशीलता से पेश आती हैं.. वे एक-दूसरे के साथ खुलकर बात कर सकती हैं और अपनी समस्याओं को साझा कर सकती हैं, जिससे उन्हें मानसिक रूप से मजबूती मिलती है.. चूंकि ऐसे संबंधों से गर्भधारण होने का कोई खतरा नहीं होता इसलिए यह संबंध सुरक्षित भी होते है औ कोई मानसिक दबाव भी नहीं होता

विषमलैंगिक संबंधों में अक्सर पारंपरिक भूमिकाओं और अपेक्षाओं का दबाव होता है, जैसे कि घर संभालने, बच्चे पैदा करने आदि.. समलैंगिक संबंधों में यह दबाव नहीं होता, जिससे महिलाएं अपने रिश्ते को अपनी शर्तों पर जी सकती हैं.. यही कारण है कि कुछ महिलाएं समलैंगिक संबंधों को अधिक पसंद करती हैं..

हालांकि ऐसे कुछ संबंध तब भी विकसित होते है जब स्त्री को संभोग साथी के रूप में कोई पुरुष उपलब्ध न हो.. जैसा की कविता के मामले में था

जैसे जैसे कविता की जीभ फाल्गुनी के यौनांग में अंदर बाहर होती रही.. वैसे वैसे फाल्गुनी की उत्तेजना का स्तर बढ़ता गया.. उसने अपनी दोनों टांगों को कविता के कंधों पर डाल दिया.. और अपना टॉप ऊपर उठाकर स्तनों को उजागर करते हुए मसलने लगी..

चूत चाटते हुए कविता की आँखें, अपने स्तनों को मसल रही.. निप्पलों को मरोड़ रही फाल्गुनी पर स्थिर थी.. चाटते हुए कविता को एक पल के लिए यह विचार आया.. की यह वही चूत थी जिसे उसके पिता भी कभी चाटते थे.. और इसमें अपना लिंग घुसाकर चोदते भी थे.. अनगिनत बार उन्हों ने अपना वीर्य स्खलन इस सुराख में किया होगा.. एक पल के लिए उसे घिन सी आने लगी.. वह फाल्गुनी की जांघों के मध्य से उठ खड़ी होना चाहती थी.. पर कविता के इन विचारों से अनजान फाल्गुनी, अपनी आँखें बंद कर कविता को ऐसे दबोचे हुए थी की वह चाहकर भी उठ खड़ी नहीं हो सकी..






अपनी क्लीट को रगड़ते हुए जब फाल्गुनी कांपते हुए झड़ी और शांत हुई, तब उसके पैरों के बीच से कविता का छुटकारा हुआ.. कविता उठी और फाल्गुनी के बगल में लेट गई..





काफी देर तक दोनों शांत ही पड़ी रही..

कविता करवट बदलकर लेटी हुई थी तभी फाल्गुनी ने उसकी बाहों के नीचे से हाथ डालकर कविता की चूचियों को पकड़कर हौले हौले दबाना शुरू कर दिया.. कविता के चेहरे पर मुस्कान आ गई..!!





फाल्गुनी: "आप से कुछ कहना था दीदी"

कविता: "हाँ बोल न..!!"

फाल्गुनी: "मुझे नौकरी मिल गई है..!!"

कविता ने आँखें खोली और फाल्गुनी की तरफ खुश होकर देखते हुए बोली "अरे वाह..!! क्या बात है,.!! कहाँ मिली यह जॉब?"

फाल्गुनी: "राजेश अंकल की कंपनी में ही.. मौसम की शादी पर जब मिले थे तब मैंने उन्हे अपना रिज्यूम दिया था.. उनके इंडस्ट्री में कई कॉन्टेक्टस है इसलिए..!! तो कुछ दिनों पहले उन्हों ने ही मुझे जॉब ऑफर कर दी अपनी ऑफिस में"

कविता: "यह तो बड़ी अच्छी बात है..!! पर वहाँ तू रहेगी कहाँ?"

फाल्गुनी: "फिलहाल कुछ तय नहीं किया पर राजेश अंकल ने कहा की वह कुछ इंतेजाम करेंगे"

कुछ सोचकर कविता ने कहा "ऐसा कुछ करने की जरूरत नहीं पड़ेगी.. हमारा पुराना घर खाली ही तो पड़ा है.. पहले वैशाली और पिंटू वहाँ रहते थे पर अब तो वो लोग भी यहाँ आ गए.. तू वहीं रहना.. शीला भाभी और मदन भैया भी पड़ोस में है तो तुझे कुछ दिक्कत भी नहीं होगी"

फाल्गुनी ने हिचकते हुए कहा "मगर.. दीदी..!!!"

कविता: "मगर-वगर कुछ नहीं.. मैंने कह दिया ना.. अब तू वहीं पर रहेगी.. जब तक तेरा जी चाहे"

फाल्गुनी: "एक बार पीयूष जीजू को भी पूछ लेते"

पीयूष का नाम सुनते ही मुंह बिगाड़ते हुए कविता ने कहा "कोई जरूरत नहीं है उससे पूछने की.. वह घर मेरा भी तो है..!! और वैसे भी, तेरे वहाँ रहने के लिए पीयूष थोड़े ही मना करेगा..!! ऐसा है तो मैं एक बार बात कर उसे बता दूँगी.. ठीक है..!!"

फाल्गुनी के पास मानने के अलावा और कोई चारा नहीं था, उसने कहा "ठीक है दीदी"

यह संवाद उठकर खत्म होते ही फाल्गुनी खड़ी होकर कपड़े पहनने लगी..

कविता: "अरे, इतनी जल्दी क्या है..!! बैठ थोड़ी देर.. मैं कॉफी बनाकर लाती हूँ"

फाल्गुनी: "नहीं दीदी.. मुझे शॉपिंग करने जाना है.. कज़िन की शादी है.. मुंबई जाना है.. सोचा आज सारी शॉपिंग निपटा लूँ"

कविता: "ठीक है.. जाते वक्त दरवाजा बंद करते हुए जाना.. मैं कुछ देर तक यहीं लेटी हूँ.. थोड़ा आराम करने के बाद उठूँगी"

फाल्गुनी ने अपनी जीन्स की चेईन बंद करते हुए कहा "ओके दीदी"

उसके जाने के बाद, कविता अपने सर पर हाथ रखे लेटी रही.. पीयूष के अलावा भी एक अन्य समस्या उठ खड़ी हुई थी.. जो उसके ध्यान में आई थी.. जो काफी चौंकाने वाली भी थी.. पर बिना कुछ तफतीश के, कविता किसी नतीजे पर पहुंचना नहीं चाहती थी..!!

पर आज उसने तय किया था.. की वह जानकर ही रहेगी की आखिर क्या बात थी..!! यदि जो उसने सुना था और उससे जो भी प्रतीत हो रहा था, अगर सच निकला तो यह कविता के लिए एक बड़ी परेशानी का सबब बन सकता था

कविता ने उठकर कपड़े पहने और बाथरूम में जाकर अपने बाल ठीक किए.. एक कप कॉफी पीने के बाद वह इस बात की तह तक जाने के इरादे से घर के बाहर निकली


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पीयूष को आज ऑफिस पहुँचने में थोड़ी देर हो गई.. घर से निकलकर वह बेंक गया था.. जहां पर कुछ काम निपटाने में उसे अधिक वक्त लग गया.. वह जब ऑफिस पहुंचा तब सारे कर्मचारी अपने अपने काम में व्यस्त थे.. उसके आने की किसी को खबर तक नहीं लगी..

पीयूष अपनी केबिन की ओर जाने लगा.. उसकी केबिन के बिल्कुल सामने ही वैशाली का टेबल था.. वहाँ से गुजरते वक्त पीयूष ने देखा की.. हाथ लगने की वजह से वैशाली के टेबल पर पड़ा पेन-स्टेंड नीचे गिर गया था.. और अंदर रखी तीन-चार पेन.. पेंसिल और मार्कर नीचे गिरकर बिखर गए थे..

वैशाली अपने घुटने मोड़कर उकड़ूँ होकर बैठी हुई थी.. टेबल के नीचे तक चली गई पेन-पेंसिल को अपना हाथ डालकर निकालने की कोशिश कर रही थी.. उसने डीप-नेक टॉप पहना हुआ था जो केवल कमर तक लंबा था.. नीचे टाइट जीन्स पहना था.. झुकने के वजह से उसका टॉप थोड़ा सा ऊपर हो गया था और उसका जीन्स नीचे उतर गया था.. उसकी लाल रंग की पेन्टी की हल्की सी पट्टी द्रश्यमान थी.. और उसकी मांसल गदराई गांड की दरार का ऊपरी हिस्सा भी नजर आ रहा था

वैशाली के स्तन और कूल्हें बेहद मांसल और गोलाईदार थे.. टाइट जीन्स बड़ी मुश्किल से उन चूतड़ों को संभाले हुए था.. पर झुकने की वजह से अब वो भी नहीं हो पा रहा था.. पीयूष वहीं थम गया.. वैशाली की पीठ उसके तरफ थी.. वह अब भी अंदर तक चली गई पेन को हाथ टटोलकर ढूंढ रही थी..

उसकी भरी भरी गांड की सेक्सी दरार को देखकर पीयूष का मन किया की वो वहीं अपना लंड निकालकर उसमें घुसा दे..!!! पीयूष को वह पुराना समय याद आ गया.. जब उसने वैशाली को उस बन रहे मकान में.. रेत के ढेर पर रगड़ रगड़कर चोदा था.. उसके बेडरूम की खिड़की पर चढ़कर, जाली से लंड डालकर चुसवाया था..!! उस वक्त भी वैशाली के नंगे बदन को देखकर वह पागल हो गया था.. अब तो वह और गदरा गई थी.. पीयूष ने तो वैशाली की माँ को भी नंगा देखा था.. और अब वह अनुमान लगा सकता था की आगे जाकर वैशाली के जिस्म का जादू और नशीला होता जाएगा..!! एक बार फिर से मन कर गया पीयूष का.. की उसे अभी केबिन में ले जाएँ और टेबल पर ही नंगी करके चोद दे..!!!






"अरे पीयूष, तुम कब आए??" वैशाली की आवाज सुनते ही पीयूष की विचार शृंखला टूटी.. वह संभल गया..

वैशाली अब खड़ी हो गई थी.. और अपना टॉप ठीक कर रही थी.. झुकने के परिश्रम की वजह से उसके स्तन, ब्रा के अंदर अस्तव्यस्त हो गए थे.. पीयूष के सामने ही वह टॉप के अंदर हाथ डालकर ब्रा को ठीक करने लगी..

पीयूष को ज्ञात हुआ की वह मूर्खों की तरह वैशाली को तांक रहा था और इस बात से वैशाली भी वाकिफ थी

"ओह हाँ.. मैं.. मैं अभी आया..तुम कुछ ढूंढ रही थी?" पीयूष ने बोखलाते हुई कहा

"कुछ नहीं.. वो तो पेन नीचे गिर गई थी वही ढूंढ रही थी" वैशाली ने अपनी कातिल मुस्कान बिखेरते हुए कहा

आगे क्या कहें, यह समझ नहीं आ रहा था पीयूष को..!! वह नजरें झुकाए वैशाली के करीब से गुज़रता हुआ अपनी केबिन में चला गया.. वैशाली के शरीर पर लगे मादक परफ्यूम की गंध ने उसे झकझोर कर रख दिया.. एक शैतानी मुस्कान के साथ वैशाली उसे जाते हुए देखती रही..!!


केबिन के अंदर पहुंचकर उसने राजेश को फोन किया.. अमरीका वाला एक्सपोर्ट ऑर्डर अपने दूसरे चरण में पहुँच रहा था..!! अब उसे मदन और राजेश की बेहद जरूरत थी.. एक अच्छी बात यह थी की पिंटू के आ जाने से पीयूष का काफी कार्यभार कम हुआ था.. पिंटू अपने काम में बहुत काबिल था और पीयूष का पुराना दोस्त भी था.. यहाँ तक की वह पिंटू को अपने बजाए अमरीका भेजने की सोच रहा था और उसकी तैयारी भी कर चुका था

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तुम्हारे मधुस्तनों पे लिखी,

एक कहानी प्यासों की..

नशा है जिसमें बिना पिए,


मस्ती में डूब जाने की...

















 
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