Adultery सज्जनपुर की कहानी - Page 2 - SexBaba
  • From this section you can read all the hindi sex stories in hindi font. These are collected from the various sources which make your cock rock hard in the night. All are having the collections of like maa beta, devar bhabhi, indian aunty, college girl. All these are the amazing chudai stories for you guys in these forum.

    If You are unable to access the site then try to access the site via VPN Try these are vpn App Click Here

Adultery सज्जनपुर की कहानी

नौवाँ अध्याय


सज्जनपुर की दोपहर धीरे-धीरे अपनी चाल में थी। गाँव की गलियों में धूल उड़ रही थी, और खेतों से हल्की हवा के साथ फसलों की खुशबू आ रही थी। कम्मू के घर का आँगन शांत था, जहाँ सोनू अपने दोस्त को उठाने पहुँचा। कम्मू बिस्तर पर आलस में पड़ा था, आँखें मलते हुए उठा। सोनू को देखते ही उसके चेहरे पर मुस्कान फैल गई। “अरे, कब आया यार?” कम्मू ने उत्साह से पूछा, बिस्तर से उठते हुए।

“अभी बस, अभी आया,” सोनू ने जवाब दिया, और दोनों कमरे की खटिया पर बैठकर बातें करने लगे।

कम्मू ने पूछा, “आज हवेली नहीं गया?

सोनू ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, “नहीं यार, आज काम कम था। जल्दी छुट्टी मिल गई।

कम्मू: अच्छा हुआ यार बहुत दिन से तुझसे मिलना ही नहीं हो पा रहा था।

सोनू: हां यार सुबह जाता हूं और आते आते अंधेरा हो जाता है।

कम्मू: हां यार वैसे, बता, वो कर्मा और अनुज तुझे परेशान तो नहीं करते?

सोनू का मन एक पल के लिए ठिठका। उसकी आँखों के सामने वह दृश्य कौंध गया—उसकी माँ रजनी और नीलेश, नंगे, एक-दूसरे की बाहों में सोए हुए। उसने जल्दी से अपने चेहरे को संभाला और बोला, “नहीं यार, सब ठीक है। हम शायद उन्हें ज़्यादा बुरा समझते हैं। कर्मा तो मुझसे अच्छे से बात करता है।

कम्मू ने भौंहें चढ़ाईं। “यकीन नहीं होता। कर्मा बड़ा कमीना लगता है मुझे। पक्का तुझे या तेरी माँ को हवेली में कोई परेशानी तो नहीं?

सोनू ने फिर से उस दृश्य को मन में दबाया और कहा, “नहीं यार, कोई परेशानी नहीं। सब ठीक है।” उसकी आवाज़ में हल्का सा काँपन था, मगर कम्मू का ध्यान उस पर नहीं गया।

कम्मू: चल अच्छा है फिर भी तू सावधान रहियो और मुझसे कुछ मत छुपाना।

अरे, ऐसा नहीं है,” सोनू ने हँसकर जवाब दिया। “वो तो मुझे आज मोटरसाइकिल पर बाज़ार ले गया था। समोसे खिलाए, ठंडा पिलाया, और फिर घर पर भी छोड़ गया।”

कम्मू ने हैरानी से कहा, “अरे वाह! इतनी मेहरबानी? कुछ तो गड़बड़ है। कर्मा ऐसा बिना मतलब के नहीं करता।

सोनू ने कर्मा और मज़दूर औरत की चुदाई का दृश्य अपने मन में दबा रखा था। वह उस बात को कम्मू से छुपाते हुए बोला, “नहीं यार, शायद वो मेरी उम्र का है, तो मुझे दोस्त मानता है।

“अच्छा, तो तेरा नया दोस्त अब कर्मा है, हवेली का लड़का! हमें तो अब तू भूल ही जाएगा,” कम्मू ने हँसते हुए तंज कसा।

सोनू: अबे तू भी न कुछ भी बोलता है, मेरे दोस्त तो तुम दोनों ही रहोगे हमेशा।

इसी बीच सुमन नहाकर कमरे में आई। उसके गीले बाल हवा में झूल रहे थे, और बदन पर सिर्फ़ पेटीकोट और ब्लाउज़ था। उसका बदन हल्का गीला था, और ब्लाउज़ उसके भरे हुए सीने को उभार रहा था।





गाँव के छोटे घरों में दो कमरे होने की वजह से यह आम बात थी। सुमन को बच्चों के सामने कोई संकोच नहीं था, खासकर सोनू के सामने, जिसे वह बचपन से बेटे की तरह मानती थी।

मगर सोनू की नज़रें छुप-छुपकर सुमन के बदन पर पड़ रही थीं। कर्मा की बातें उसके मन में गूँज रही थीं—सुमन चाची का भरा हुआ बदन, उसकी गहरी नाभि, और मखमली पेट। उसने जल्दी से सिर झटका और सोचा, “नहीं यार, मेरा दोस्त साथ में है, और मैं उसकी माँ को ऐसे देख रहा हूँ। ये गलत है।

सुमन ने साड़ी पहनी और दोनों से पूछा, “चाय पियोगे?”

कम्मू ने दोनों की ओर से तपाक से हाँ बोल दिया। सुमन मुस्कुराते हुए बाहर चली गई।

कम्मू ने फिर सोनू से पूछा, “वैसे, कर्मा ने मेरे या मेरे परिवार के बारे में कुछ बोला? उस दिन मैदान में उससे झड़प हो गई थी न, उसके बाद कुछ तो नहीं कहा?”

सोनू को कर्मा की बात याद आई—कम्मू की माँ और ताई के भरे हुए बदन की तारीफ़, और यह कि उसने उन्हें सोचकर कई बार हिलाया था। मगर सोनू ने यह बात मन में दबाई और बोला, “नहीं यार, सच में कुछ नहीं। तू बेकार में चिंता मत कर।”

कम्मू ने राहत की साँस ली और बोला, “सही है यार। मैं नहीं चाहता कि धीरज भैया के ब्याह के समय कोई शिकायत आए। खासकर हवेली वालों के साथ कोई कांड हो, ये तो बिल्कुल नहीं।”

सोनू ने सिर हिलाया, मगर उसका मन उलझा हुआ था। कर्मा की बातें, उसकी माँ का हवेली में बदला हुआ रूप, और आज का खेत वाला दृश्य—यह सब उसके मासूम मन को भारी कर रहा था। कम्मू ने उसकी उदासी भाँप ली और बोला, “चल, चाय पीते हैं, फिर बाहर मैदान में जाकर क्रिकेट खेलते हैं। कब से तूने बल्ला नहीं पकड़ा!”

सोनू ने हल्की मुस्कान के साथ सिर हिलाया। दोनों बाहर आँगन में आए, जहाँ सुमन चाय चूल्हे से उतार रही थी

सुमन: बैठो तुम लोग अभी देती हूं,

सोनू और कम्मू दोनों ही छप्पर में पड़ी खाट पर बैठ गए, सोनू जैसे ही बैठा तो उसे पीछे से आवाज़ आई: अरे सोनू लला मां कैसी है तेरी?

उसने पीछे मूड कर देखा तो सामने कम्मू की ताई और सुमन की जेठानी कुसुम थी और अब वो भी नल के पास बैठ कपड़े धो रही थी।

सोनू: ठीक है ताई, अभी हवेली में ही हैं।

सोनू ने कुसुम के भरे बदन को देखते हुए कहा, ब्लाउज उसकी बड़ी चूचियों के उभार को छुपा नहीं पा रहा था, नीचे उसका मांसल पेट, गोल गहरी नाभी, कमर में पड़ी सिलवटें, ये सब देख सोनू को सिहरन हुई अंदर ही अंदर और उसे कर्मा की ये बात फिर से याद आ गई।





कुसुम: चलो बढ़िया है, अब कोई परेशानी तो नहीं, और तेरे बाप की कोई खबर?

सोनू: नहीं ताई कोई परेशानी नहीं है, और उनकी खबर लेकर क्या ही करना है।

कुसुम: हां लल्ला आने से मुसीबत बढ़े तो इससे अच्छा है वो अलग ही रहे।

सुमन: सही कह रही हो जीजी, वैसे ही दुख कम थोड़े ही हैं जो उन्हें और झेले।

सुमन ने चाय देते हुए कहा,

कुसुम: हां तुम लोग अपना ध्यान रखो, उसकी फिकर करने की कोई जरूरत नहीं है।

सोनू: हां ताई अभी वैसे भी न इतना समय है और न ही इतनी हिम्मत कि उनके बारे में सोचें।

चाय खत्म होने तक ऐसे ही बातें चलती रहती हैं, सोनू बीच बीच बीच में सुमन और कुसुम को छुप छुप कर देख लेता था, चाय खत्म कर दोनों घर से निकल गए ।

सोनू: मन्नू को तो बुला ले, वो नहीं खेलेगा?

कम्मू: अरे आज बिंदिया दीदी को देखने वाले आ रहे हैं तो वो नहीं आयेगा।

सोनू: चल ये तो अच्छा है, यार लड़का अच्छा हुआ तो उनका भी ब्याह हो जाए जल्दी।

कम्मू: हां बिल्कुल क्यों नहीं होगा।

दोनों बात करते हुए मैदान की ओर निकल जाते हैं।

तेजपाल के घर में आज एक खास माहौल था। बिंदिया को देखने के लिए लड़के वाले आ रहे थे। तेजपाल का घर, जो आम तौर पर सादगी और मेहनत की कहानी कहता था, आज सज-धज कर तैयार था। आँगन को गोबर और मिट्टी से लीपकर चमकाया गया था, और घर की चौखट पर रंगोली बनाई गई थी। झुमरी, तेजपाल की बहू, रसोई में मिठाई और नाश्ते की तैयारियों में व्यस्त थी, जबकि तेजपाल और उनका बेटा रत्नाकर मेहमानों की आवभगत की तैयारियों में जुटे थे। बिंदिया अपने कमरे में तैयार हो रही थी, उसका मन उत्साह और घबराहट के बीच झूल रहा था।

लड़के वाला परिवार पास के गाँव से था। परिवार में चार लोग थे: पप्पू, 42 वर्षीय किसान और परिवार का मुखिया,

उनकी पत्नी रज्जो, 38 वर्ष की, जिनका भरा हुआ बदन, बड़ी-बड़ी चूचियाँ, मखमली पेट, गहरी नाभि, और फैले हुए चूतड़, झुमरी से कम नहीं थे।

उनका बेटा प्यारे, 22 वर्ष का, एक आम गाँव का लड़का, मेहनती और सौम्य स्वभाव का, जिसे आज बिंदिया को देखने आना था।

उनकी बेटी चंदा, 20 वर्ष की, सुंदर और कामुक, अपने भाई के साथ आई थी, ताकि वह भी होने वाली भाभी को देख सके।

दोपहर ढलते ही पप्पू का परिवार तेजपाल के घर की दहलीज़ पर पहुँचा। पप्पू ने अपने कंधे पर गमछा डाला हुआ था, और उनके सादे कुरते-पायजामे में किसान की मेहनत की सादगी झलक रही थी। रज्जो ने लाल रंग की साड़ी पहनी थी, जो उनके भरे हुए बदन को और उभार रही थी। साड़ी का पल्लू बार-बार सरक रहा था, जिसे वह बार-बार संभाल रही थी। प्यारे एक साफ-सुथरे कुरते में था, उसका चेहरा सौम्य और थोड़ा शर्मीला था। चंदा ने हल्के हरे रंग का सलवार सूट पहना था, जो उसकी जवानी को निखार रहा थी।





तेजपाल ने गर्मजोशी से उनका स्वागत किया। “आइए, आइए, पप्पू भाई, घर में पधारिए,” उन्होंने कहा और आँगन में बिछी दरी पर मेहमानों को बिठाया। रत्नाकर ने तुरंत पानी के गिलास लाकर रखे, और झुमरी रसोई से जल्दी-जल्दी नाश्ते की थाली ले आई। थाली में गुझिया, समोसे, और लड्डू सजे हुए थे, साथ में चाय की केतली थी।

“क्या बात है, चाचाजी, इतना इंतज़ाम कर रखा है,” पप्पू ने हँसते हुए कहा, अपनी मूँछों को ताव देते हुए। “हम तो बस अपनी बेटी को देखने आए हैं, इतनी मेहरबानी की क्या ज़रूरत थी?”

“अरे भाई, आप लोग हमारे मेहमान हैं। बेटी का रिश्ता जोड़ने की बात है, थोड़ा-बहुत तो बनता है,” तेजपाल ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया।

रज्जो ने थाली की ओर देखा और बोली, “वाह, झुमरी बहन, ये गुझिया तो देखकर ही मुँह में पानी आ रहा है। अपने हाथों से बनाई हैं?”

“हाँ, बहनजी, सब घर का बनाया है,” झुमरी ने शर्माते हुए कहा। “आप खाकर बताइए, कैसी बनी हैं।”

चंदा, जो अब तक चुप थी, उसने समोसा उठाया और एक छोटा सा टुकड़ा मुँह में डाला। “हम्म, बहुत स्वादिष्ट है, चाची” उसने कहा, और उसकी मुस्कान ने माहौल को और हल्का कर दिया।

बातचीत का सिलसिला शुरू हो गया। पप्पू ने अपने खेतों और फसलों की बात की, जबकि तेजपाल ने गाँव की हाल-चाल और पड़ोस में धीरज की शादी की तैयारियों का ज़िक्र किया। रज्जो और झुमरी औरतों की बातों में मशगूल हो गईं—खाना, साड़ियाँ, और गाँव की चुगलियाँ। प्यारे और रत्नाकर चुपचाप सुन रहे थे, मगर उनकी नज़रें बार-बार एक-दूसरे से मिल रही थीं, जैसे दोनों एक-दूसरे को परख रहे हों।

थोड़ी देर बाद तेजपाल ने कहा, “चलो, अब बिंदिया को बुलाते हैं। आप लोग तो उसी को देखने आए हैं।” उन्होंने झुमरी की ओर इशारा किया, और झुमरी कमरे की ओर गई।

बिंदिया कमरे में तैयार थी। उसने गुलाबी रंग की साड़ी पहनी थी, जो उसके गोरे रंग को और निखार रही थी। उसके बाल खुले थे, और माथे पर छोटी सी बिंदी थी। उसका चेहरा घबराहट और शर्म से लाल हो रहा था।





झुमरी ने उसे प्यार से हाथ पकड़कर बाहर लाया। बिंदिया ने सिर झुकाकर आँगन में कदम रखा और मेहमानों के सामने खड़ी हो गई। उसकी नज़रें ज़मीन पर थीं, और वह धीरे-धीरे अपनी साड़ी का पल्लू संभाल रही थी।

रज्जो ने बिंदिया को ऊपर से नीचे तक देखा और मुस्कुराते हुए पप्पू की ओर देखा। “वाह, बहन जी, आपकी बेटी तो एकदम चाँद का टुकड़ा है,” उसने कहा।

“हाँ, बिल्कुल। सादगी में सुंदरता है इसकी,” पप्पू ने सहमति में सिर हिलाते हुए कहा।

चंदा ने बिंदिया को गौर से देखा और बोली, “भाभी, आपकी साड़ी बहुत सुंदर है। ये रंग आप पर बहुत जँच रहा है।”

बिंदिया ने शर्माते हुए हल्का सा सिर उठाया और धीमी आवाज़ में कहा, “धन्यवाद।” उसकी आवाज़ में मिठास थी, जो सभी को भा गई।

तेजपाल ने बिंदिया से कहा, “बेटी, प्यारे को चाय दे दो।” बिंदिया ने सिर हिलाया और एक चाय का कप धीरे से प्यारे की ओर बढ़ाया। प्यारे ने चाय लेते हुए पहली बार बिंदिया को गौर से देखा। उसकी आँखों में एक सादगी थी, और बिंदिया की शर्मीली मुस्कान ने उसके मन में कुछ हलचल मचा दी। उसने चाय का प्याला थामा और धीरे से “धन्यवाद” कहा।

रत्नाकर ने माहौल को और हल्का करने के लिए कहा, “प्यारे, तुम भी कुछ बताओ। खेतों में काम करते हो न? कैसा चल रहा है सब?”

प्यारे ने थोड़ा हिचकते हुए कहा, “हाँ, चाचाजी, खेतों में काम अच्छा चल रहा है। इस बार धान की फसल अच्छी हुई है। बाकी, बस मेहनत करते हैं।”

बहुत मेहनती है हमारा प्यारे,” रज्जो ने गर्व से कहा। “दिन-रात खेतों में मेहनत करता है। घर में भी सबकी मदद करता है।”

तेजपाल ने मुस्कुराते हुए कहा, “ये तो अच्छी बात है। हमारी बिंदिया भी घर के काम में माहिर है। खाना बनाना, सिलाई-कढ़ाई, सब आता है इसे।”

बातचीत के बीच दोनों परिवार एक-दूसरे को परख रहे थे। पप्पू और रज्जो को बिंदिया की सादगी और सुंदरता पसंद आई, जबकि तेजपाल, रत्नाकर और झुमरी को प्यारे का मेहनती और सौम्य स्वभाव भा गया। चंदा ने बिंदिया से कुछ छोटी-मोटी बातें कीं, जैसे साड़ी का रंग और गाँव की शादियों की रस्में, जिससे बिंदिया थोड़ा सहज हो गई।

थोड़ी देर बाद रज्जो ने पप्पू की ओर देखा और हल्का सा सिर हिलाया। पप्पू ने समझ लिया और तेजपाल से बोला, “चाचाजी, रत्नाकर भाई, हमें आपकी बेटी बहुत पसंद आई। सादगी और संस्कार दोनों हैं इसमें। अगर आपको हमारा प्यारे पसंद हो, तो हम इस रिश्ते को आगे बढ़ाना चाहेंगे।”

तेजपाल ने रत्नाकर और झुमरी की ओर देखा, जो मुस्कुराते हुए सहमति में सिर हिला रहे थे। “पप्पू, हमें भी आपका बेटा बहुत पसंद आया। मेहनती और सज्जन लड़का है। हम भी इस रिश्ते के लिए तैयार हैं,” तेजपाल ने गर्मजोशी से कहा।

आँगन में खुशी की लहर दौड़ गई। झुमरी ने तुरंत मिठाई की थाली लाकर सभी को लड्डू खिलाए। रज्जो ने बिंदिया को गले लगाया और बोली, “बेटी, अब तू हमारे घर की बहू बनेगी। हम तेरा बहुत खयाल रखेंगे।”

बिंदिया ने शर्माते हुए सिर झुका लिया, मगर उसके चेहरे पर हल्की सी मुस्कान थी। प्यारे ने भी चुपके से बिंदिया की ओर देखा, और उसकी आँखों में एक नया सपना जागने लगा। चंदा ने बिंदिया का हाथ पकड़कर कहा, “भाभी, अब तो हमें खूब बातें करनी हैं।”

मेहमानों की आवभगत के बाद पप्पू का परिवार विदा हुआ। तेजपाल और रत्नाकर ने उन्हें गाँव की सीमा तक छोड़ा। झुमरी ने बिंदिया को गले लगाया और बोली, “बेटी, तुझे अच्छा घर मिला है। प्यारे और उसका परिवार बहुत अच्छे लोग हैं।”

बिंदिया ने सिर हिलाया, मगर उसका मन कहीं और था। कर्मा की वह शरारती मुस्कान और उसकी नज़रें बार-बार उसके दिमाग में कौंध रही थीं। हवेली की चमक और कर्मा का रुतबा उसे आकर्षित तो करता था, मगर घरवालों की हिदायतें और प्यारे की सादगी उसे एक अलग राह पर ले जा रही थी।

लड़के वालों के जाते ही बिंदिया को अनामिका, अंजू, नेहा और मनीषा ने घेर लिया और उसे चिढ़ाते हुए उसके साथ मज़ाक करते हुए उससे सब पूछने लगी, बिंदिया भी उनके साथ बात करके खुश हो रही थी और मज़ाक में साथ दे रही थी। वहीं झुमरी को सुमन और कुसुम ने घेर लिया और उससे सब पूछने लगीं। झुमरी भी खूब चाव से सब बता रही थी।

सज्जनपुर में सूरज ढल चुका था, और गाँव पर शाम की सुनहरी धुंध छा रही थी। खेतों से लौटते मज़दूरों की आवाज़ें धीमी पड़ रही थीं, और नदी के किनारे हल्की ठंडक बस रही थी। सुमन और कुसुम, कुसुम के कहने पर और थोड़ा सा बाहर की हवा खाने के लिए नदी की ओर निकल पड़ीं। दोनों देवरानी-जेठानी की जोड़ी गाँव में अपनी सादगी और मेहनत के लिए जानी जाती थी, मगर उनकी हँसी और आपसी मज़ाक गाँव की गलियों में एक अलग रंग भरता था।

नदी का किनारा शांत था, सिर्फ़ पानी की हल्की छलछल और दूर कहीं भटकती चिड़ियों की आवाज़ें गूँज रही थीं। सुमन और कुसुम ने अपने चप्पल किनारे पर उतारे और नदी के ठंडे पानी में पैर डुबोकर किनारे की एक चट्टान पर बैठ गईं। सुमन की साड़ी का पल्लू उसकी कमर पर लिपटा था, और कुसुम की साड़ी का आँचल हल्का सा सरककर उसके मांसल कंधे को उघाड़ रहा था। दोनों के चेहरों पर थकान के साथ-साथ एक हल्की सी मुस्कान थी।

“जीजी, आज का दिन तो बड़ा भारी था,” सुमन ने अपने गीले पैरों को पानी में हिलाते हुए कहा। “धीरज के ब्याह की तैयारियाँ, घर का काम, इतने सारे कपड़े धोए आज तो मैने, ऊपर से ये गर्मी। थक गई मैं तो।”

“हाँ, सुमन, पर अब ये ठंडा पानी सारी थकान निकाल देगा,” कुसुम ने हँसते हुए कहा। उसने एक छोटा सा कंकड़ उठाया और पानी में फेंका, जिससे छोटी-छोटी लहरें उठीं। “वैसे, बिंदिया का रिश्ता पक्का हो गया, ये तो अच्छी बात है। प्यारे लड़का सज्जन और मेहनती लगता है।” जैसे झुमरी ने बताया,

“हाँ, जीजी, सही कह रही हो। बिंदिया को अच्छा घर मिलेगा। सुमन ने सहमति में सिर हिलाते हुए कहा। “पर मुझे तो अभी भी हँसी आ रही है, जब बिंदिया शर्म से लाल हो गई जब सब लड़कियों ने उसे घेरा तो।”

दोनों हँस पड़ीं। उनकी हँसी नदी के किनारे गूँज उठी, मानो पानी भी उनके मज़ाक में शामिल हो गया हो। कुसुम ने शरारत भरे अंदाज़ में सुमन की ओर देखा और बोली, “अच्छा, तू हँस रही है? जैसे तू नहीं शरमाई थी अपनी बारी में” कहते हुए उसने मज़ाक में सुमन को हल्का सा धक्का दे दिया।

“अरे, जीजी!” सुमन का संतुलन बिगड़ा, और वह हँसते हुए नदी के उथले पानी में फिसल गई। पानी में गिरते ही उसकी साड़ी पूरी तरह गीली हो गई, और वह हँसते हुए खड़ी हो गई। “हाय, जीजी, ये क्या किया!” उसने पानी में छलांग लगाते हुए कहा, मगर उसकी हँसी रुकने का नाम नहीं ले रही थी।

कुसुम पेट पकड़कर हँस रही थी। “अरे, तू तो पूरी भैंस की तरह पानी में कूद गई!” उसने मज़ाक उड़ाया, अपने पैरों को पानी से निकालते हुए।

“अच्छा, भैंस कहा मुझे?” सुमन ने नकली गुस्से में कहा और तेज़ी से कुसुम का हाथ पकड़कर उसे भी पानी में खींच लिया। “अब तुम भी भैंस की जेठानी बनो!” दोनों पानी में एक-दूसरे पर छींटे मारने लगीं, हँसी और चीख-पुकार से नदी का किनारा गूँज उठा। उनकी साड़ियाँ अब पूरी तरह गीली हो चुकी थीं, और कपड़े उनके भरे हुए बदनों से चिपक गए थे। सुमन का ब्लाउज़ उसके मोटे-मोटे उरोजों को उभार रहा था, और कुसुम की साड़ी उसकी गहरी नाभि और मांसल कमर को और निखार रही थी।

कुसुम: अच्छा अब नहा ही रहे हैं तो अच्छे से नहा लेते हैं

ये कह कुसुम ने अपने पल्लू को सीने से हटाया और कमर पर लपेट लिया,

सुमन: अरे जीजी ये क्या कर रही हो कोई आ गया तो,

कुसुम: अरे इधर औरतें ही कपड़े वगैरा धोती हैं मर्द इस ओर नहीं आते, चिंता मत कर।

सुमन: चलो तुम कह रही हो तो ठीक है।

ये कह सुमन भी कुसुम की तरह अपने पल्लू को नीचे ही लपेट लेती है और दोनों फिर से पानी को उछाल कर खेलने लगती हैं।





दोनों बेखबर होकर नदी के ठंडे पानी में नहाने और मज़ाक करने में व्यस्त थीं। लेकिन नदी के किनारे की यह मासूम हँसी किसी की नज़रों से छुपी नहीं थी। दूर, एक पुराने बरगद के पेड़ की आड़ में, सोमपाल खड़ा था। वह अपनी शाम की सैर के लिए निकला था, मगर सुमन और कुसुम की हँसी ने उसे ठिठकने पर मजबूर कर दिया। उसकी नज़रें दोनों की गीली साड़ियों में लिपटे कामुक बदनों पर जमी थीं। सुमन की साड़ी उसके भरे हुए चूतड़ों से चिपकी थी, और कुसुम का गीला ब्लाउज़ उसकी चूचियों को इस तरह उभार रहा था मानो कोई मूर्तिकार ने उन्हें तराशा हो, दोनों के मखमली पेट और नाभी तो मानो जैसे मक्खन के ही नजर आ रही थीं। उन्हें देखते हुए सोमपाल की आँखों में वासना की चमक थी, और उसके चेहरे पर एक शरारती मुस्कान खेल रही थी।

“हाय, ये देवरानी-जेठानी तो एक से बढ़कर एक हैं,” उसने मन ही मन सोचा। उसका लंड धोती के नीचे कड़क होने लगा।

इनके रसीले बदन का स्वाद तो बड़ा मस्त होगा। सुमन की वो गहरी नाभि, और कुसुम की वो भारी चूचियाँ—हाय, क्या नज़ारा है!” उसकी नज़रें एक पल के लिए भी नहीं हटीं। वह पेड़ की आड़ में खड़ा, उनकी हर हरकत को गौर से देख रहा था।

सुमन ने कुसुम पर फिर से पानी का छींटा मारा। “जीजी, अब तो मेरा ब्लाउज़ ऐसा चिपक गया है बदन से मानो पहना ही न हो” उसने हँसते हुए कहा।

“अरे, होने दे कोई नहीं देख रहा” कुसुम ने जवाब दिया। “मेंरी साड़ी तो देख अब बदन से चिपककर सब कुछ दिखा रही है!” दोनों फिर से हँस पड़ीं, और पानी में एक-दूसरे को छेड़ने लगीं। उनकी हँसी और मासूम शरारतें नदी के किनारे एक अनजाना रंग बिखेर रही थीं, मगर वे इस बात से बेखबर थीं कि उनकी यह मस्ती किसी की वासना को भड़का रही थी।

सोमपाल की साँसें गहरी हो रही थीं। उसने अपनी धोती को और कस लिया, मगर उसका उभार अब छुपाए नहीं छुप रहा था। “इन दोनों को तो हवेली में होना चाहिए दोनों को रानी बना कर रखूंगा, कुछ तो चक्कर चलाना पड़ेगा” उसने सोचा।

पर ये दोनों सती-सावित्री और संस्कारी हैं, आसानी से नहीं फँसेंगीयू ऊपर से इनका परिवार भी समृद्ध है इतनी जल्दी कुछ नहीं होगा। फिर भी, कोशिश तो बनती है।” उसकी आँखों में एक चालाक चमक थी, मानो वह कोई नया जाल बुनने की सोच रहा हो।

कुसुम ने पानी से बाहर निकलते हुए कहा, “बस, सुमन, अब बहुत हुआ। चल, घर चलते हैं, वरना सर्दी लग जाएगी।” उसने अपनी साड़ी को निचोड़ा, मगर गीले कपड़े अब भी उसके बदन से चिपके थे। सुमन भी हँसते हुए बाहर आई और अपने बालों को निचोड़ने लगी। गाँव की ओर चल पड़ीं, आपस में हँसते-बातें करते हुए


सोमपाल तब तक पेड़ की आड़ में खड़ा रहा, जब तक उनकी आकृतियाँ गाँव की गलियों में ओझल नहीं हो गईं। उसकी मुस्कान अब और गहरी हो गई थी। “चलो, आज तो नज़ारा मिल गया,” उसने मन ही मन कहा। “कब इन दोनों को हवेली की राह दिखाने का वक्त आएगा।” वह धीरे-धीरे अपने रास्ते पर बढ़ गया, मगर उसके मन में सुमन और कुसुम की गीली साड़ियों में लिपटी छवियाँ अब भी नाच रही थीं।

जारी रहेगी।
 
दसवाँ अध्याय

सज्जनपुर की शाम अपनी पूरी रंगत में थी। मैदान में लड़कों की चीख-पुकार और बल्ले-गेंद की आवाज़ें धीमी पड़ चुकी थीं। बिंदिया का रिश्ता पक्का होने की खुशी में तेजपाल का घर हँसी-मज़ाक से गूँज रहा था, और सुमन-कुसुम नदी के किनारे अपनी थकान उतार रही थीं। इस बीच, नेहा के घर में बिंदिया, अनामिका, अंजू, नेहा, और मनीषा का जमावड़ा था। चारों लड़कियाँ बिंदिया को घेरकर उसे छेड़ रही थीं, और हँसी-ठिठोली का दौर चल रहा था।





“देखो तो, प्यारे की प्यारी को!” नेहा ने शरारती लहजे में कहा, अपनी भौंहें ऊपर चढ़ाते हुए।

“हाँ, बिंदिया, अब तो तेरा ब्याह पक्का! जल्दी ही दुल्हन बनकर ससुराल जाएगी,” अंजू ने हँसते हुए जोड़ा।

बिंदिया का चेहरा शर्म से लाल हो गया, मगर वह भी हँसते हुए जवाब दे रही थी। “तुम लोग बड़ी दुष्ट हो! बस, अब बहुत छेड़ लिया,” उसने नकली गुस्से में कहा, और सब फिर से हँस पड़ीं।

“अरे, छेड़ना तो बनता है!” अनामिका ने कहा। “बताओ, प्यारे को देखकर दिल में क्या हुआ? बता ना, बिंदिया!”

“बस-बस, अब चुप हो जाओ,” बिंदिया ने हँसते हुए अपना चेहरा हाथों से ढक लिया। मगर उसकी आँखों में खुशी की चमक साफ़ झलक रही थी।

इसी बीच, बाहर से किसी की आवाज़ आई, “सोनू! अरे, सोनू है क्या?” नेहा ने चौंककर बाहर की ओर देखा और दरवाज़े की ओर बढ़ी। पीछे-पीछे बिंदिया, अनामिका, अंजू, और मनीषा भी उत्सुकता में बाहर आ गईं।


नेहा ने जैसे ही बाहर कदम रखा, उसकी नज़र सामने खड़ी मोटरसाइकिल और उस पर बैठे कर्मा पर पड़ी। वह थोड़ा हैरान रह गई। कर्मा ने उसे देखा और अपनी चिर-परिचित शरारती मुस्कान के साथ बोला, “सोनू है क्या?”

नेहा के लिए यह पल अजीब था। वह पहली बार कर्मा से आमने-सामने बात कर रही थी। हवेली वालों के बारे में उसने हमेशा बुरा ही सुना था—उनका घमंड, उनकी ताकत, और गाँव की औरतों के साथ उनकी हरकतें। अब तक वह हवेली वालों से बचकर ही रहती थी, मगर अब उसकी माँ और छोटा भाई सोनू हवेली में काम करते थे। बचना अब मुमकिन नहीं था। वह सकुचाते हुए बोली, “वो… वो घर पर नहीं है।”

इतने में पीछे से बाकी लड़कियाँ भी बाहर आ गईं। कर्मा की नज़रें एक-एक करके उन सब पर पड़ीं, और जब उसकी नज़र बिंदिया पर रुकी, उसके चेहरे पर मुस्कान और गहरी हो गई। बिंदिया ने उसकी नज़रों को महसूस किया, और उसके मन में एक अजीब सी बेचैनी उठी। कर्मा ने फिर पूछा, “तो, कहाँ गया है सोनू?”

मनीषा ने तुरंत जवाब दिया, “वो और कम्मू मैदान की ओर गए हैं।”

कर्मा ने एक बार फिर बिंदिया को गौर से देखा, फिर बाकी लड़कियों पर नज़र डाली। उसकी मुस्कान में कुछ ऐसा था, जो सबको एक पल के लिए चुप कर गया। “अच्छा, ठीक है,” उसने कहा और मोटरसाइकिल स्टार्ट कर गली से बाहर निकल गया। लड़कियाँ उसकी मोटरसाइकिल को गली के मोड़ तक जाते देखती रहीं।

“हाय, जीवन तो हवेली वालों का है!” अनामिका ने आह भरते हुए कहा।

“सच में, किसी चीज़ की कमी नहीं,” अंजू ने सहमति में कहा। “पर सब एक से बढ़कर एक घमंडी हैं।”

नेहा ने हल्के से सिर हिलाया। “हाँ, हो सकता है… पर ये कर्मा थोड़ा अलग लगता है। ऐसा घमंडी नहीं दिखता।”

“अच्छा, तुझे कैसे पता?” अंजू ने भौंहें चढ़ाकर पूछा।

“अरे, सोनू ही बता रहा था,” नेहा ने सफ़ाई दी। “कर्मा उससे बहुत प्यार से पेश आता है। उसे दोस्त की तरह रखता है।”

“हवेली का लड़का और इतना अच्छा?” अनामिका ने अविश्वास में कहा। “बात हज़म नहीं होती।”

मनीषा ने बीच में टोका, “नहीं, जीजी, माँ भी यही कह रही थी। शायद हम लोग ही इन्हें ज़्यादा बुरा मानते हैं। उतने बुरे नहीं हैं।”

“अरे, जैसे भी हो, छोड़ो,” नेहा ने हँसते हुए कहा। “अभी तो अपनी होने वाली दुल्हनिया पर ध्यान दो!” उसने बिंदिया की ओर इशारा किया। बिंदिया अब तक चुप थी, कर्मा की बातें सुन रही थी, और उसके मन में उसके बारे में कुछ अनजाने खयाल कौंध रहे थे। लड़कियों ने फिर से बिंदिया को घेर लिया और उसे छेड़ना शुरू कर दिया।

कर्मा मोटरसाइकिल की रफ्तार बढ़ाकर सीधा मैदान की ओर गया। मैदान पर खेल खत्म हो चुका था, और सोनू-कम्मू के साथ बाकी लड़के इधर-उधर बिखरे थे। कर्मा ने मोटरसाइकिल को मैदान के किनारे एक पेड़ के पास रोका और खड़ा हो गया। कम्मू ने उसे देख लिया और सोनू से फुसफुसाया, “ये यहाँ क्या कर रहा है?”

सोनू ने कर्मा को देखकर थोड़ा हैरानी से कहा, “पता नहीं, यार।”

खेल खत्म होने के बाद सोनू और कम्मू उसके पास आए। सोनू ने पूछा, “क्या हुआ, भैया? कोई काम था?”

कर्मा ने मुस्कान के साथ जवाब दिया, “अरे, बस यूं ही घूमने निकला था। तुम लोग बताओ, जीत गए आज?”

“हाँ, जीत गए,” सोनू ने हँसते हुए कहा, कम्मू की ओर देखकर। कम्मू भी हल्का सा मुस्कुराया, मगर कर्मा की मौजूदगी से वह थोड़ा सकपकाया हुआ था। आखिरी बार जब दोनों आमने-सामने थे, तो मैदान में उनकी झड़प हो गई थी।

“जीत गए तो खुशी मनानी तो बनती है,” कर्मा ने कहा। “आओ, बैठो।”

“अरे, भैया, इसमें क्या खुशी?” सोनू ने हँसते हुए कहा। “रोज़ ही हार जीत लगी रहती है।”

“अरे, बैठ ना, इतना क्या सोच रहा है?” कर्मा ने ज़ोर देकर कहा।

सोनू ने एक पल सोचा। ज्यादा मना करना ठीक नहीं लगा। उसने कम्मू की ओर देखा, जो हल्का सा सिर हिलाकर बैठने का इशारा कर रहा था। सोनू कर्मा के पीछे मोटरसाइकिल पर बैठ गया। कम्मू मुड़कर अपने घर की ओर जाने लगा, तभी कर्मा ने उसे टोका, “अरे, तू कहाँ चल दिया? बैठ ना।”

कम्मू ने हैरानी से कर्मा की ओर देखा। “मैं? अरे, नहीं, कर्मा भैया, तुम और सोनू जाओ।”

“अरे, यार, तुम दोनों ही बहुत शर्माते हो,” कर्मा ने हँसते हुए कहा। “आ, बैठ। मेरे साथ नहीं, तो अपने दोस्त के साथ तो चल सकता है।”

सोनू ने भी कम्मू को पुकारा, “आ, चल ना, बैठ जा।” उसने सीट पर आगे खिसककर कम्मू के लिए जगह बनाई।

कम्मू को समझ नहीं आया कि क्या करे। मगर दोनों के बार-बार कहने पर वह मोटरसाइकिल पर बैठ गया। कर्मा ने मोटरसाइकिल स्टार्ट की, और तीनों गाँव के बाहर के बाज़ार की ओर निकल पड़े। कम्मू पहली बार मोटरसाइकिल पर बैठा था, और अंदर ही अंदर वह उत्साहित था। हवा के झोंके उसके चेहरे से टकरा रहे थे, और उसे यह नया अनुभव रोमांचक लगा।

कुछ ही देर में तीनों बाज़ार में एक हलवाई की दुकान के सामने थे। कर्मा ने मोटरसाइकिल रोकी और तीनों के लिए समोसे और चाय मँगवाई। दुकान के सामने एक चबूतरे पर बैठकर तीनों खाने लगे। कम्मू थोड़ा सकुचाया और समोसे-चाय लेने से मना करने लगा, मगर कर्मा ने ज़बरदस्ती उसके हाथ में समोसा थमा दिया। “खा ना, यार, इतना क्या शरमा रहा है?” कर्मा ने हँसते हुए कहा।

कम्मू कर्मा के इस व्यवहार से हैरान था। वह थोड़ा सोचने के बाद सकुचाते हुए बोला, “कर्मा भैया, उस दिन के लिए माफ़ करना। वो खेल-खेल में लड़ाई हो गई थी।”

“अरे, छोड़ ना, वो तो मैं उसी दिन भूल गया,” कर्मा ने बेफिक्री से कहा। “खेल में तो लड़ाई होती रहती है।”

कम्मू ने यह सुनकर राहत की साँस ली और मुस्कुरा दिया। सोनू भी हँस पड़ा। “अरे, मैंने इसे कहा था, ये बेकार में चिंता कर रहा था,” सोनू ने कहा।

“देखो, हम एक ही उम्र के हैं,” कर्मा ने गंभीर लहजे में कहा। “खेल में टकराव तो होगा ही, मगर खेल की बात मैदान तक रखो, तो अच्छा है।”

कर्मा की यह बात सुनकर सोनू और कम्मू दोनों प्रभावित हुए। गरम समोसे और चाय का स्वाद जैसे कर्मा की अच्छाई को और बढ़ा रहा था। कम्मू को यह भी अच्छा लग रहा था कि वह हवेली के लड़के के साथ है। दुकान के आसपास लोग उसे सम्मान की नज़रों से देख रहे थे, और हलवाई ने भी सबसे पहले उनकी ही थाली सजाई थी।

“बिल्कुल सही कहा, कर्मा भैया,” कम्मू ने समोसा खाते हुए कहा। “मैं ही बेकार में सोच रहा था।”

कर्मा ने चाय की चुस्की लेते हुए कहा, “समझता हूँ, यार। मुझे पता है, गाँव वाले पीठ पीछे मुझे बुरा-भला कहते हैं। मेरी छवि ही कुछ ऐसी बन गई है। शायद इसीलिए मेरा कोई दोस्त नहीं है। जब से सोनू हवेली आने लगा, तब से थोड़ा मन लगता है। इसीलिए इसे साथ ले लेता हूँ।”

कर्मा की यह बात सुनकर सोनू और कम्मू दोनों सोच में पड़ गए। उन्हें लगा कि शायद वे कर्मा को गलत समझते रहे। उसकी बातों में एक अजीब सी सच्चाई थी। सोनू ने तुरंत कहा, “अरे, ऐसा नहीं है, कर्मा भैया। अब से हम दोस्त हैं ना—मैं हूँ, कम्मू है।”

कम्मू ने भी हाँ में हाँ मिलाई। “हाँ, और क्या? अब से हम पक्के वाले दोस्त!”

कर्मा ने हँसते हुए कहा, “यार, ये तो बढ़िया हुआ। वैसे, तुम्हारा एक और जोड़ीदार है—वो कहाँ है? आज मैदान में भी नहीं दिखा।”

“अरे, आज बिंदिया जीजी को लड़के वाले देखने आए हैं न,” कम्मू ने बताया। “इसलिए वो घर पर काम में हाथ बटा रहा है।”

यह सुनते ही कर्मा के कान खड़े हो गए, मगर उसने चेहरे पर साधारण भाव रखा। “अच्छा, ये तो बढ़िया बात है। वैसे, कहाँ का लड़का है?”

“शायद राजेपुर गाँव का,” सोनू ने कहा। “किसान हैं। लड़के के बाप का नाम… अरे, कुछ ऐसा ही है, याद नहीं।”

“हाँ, पप्पू!” कम्मू ने याद करते हुए कहा। “पापा बता रहे थे, अच्छे लोग हैं।”

कर्मा ने चाय की चुस्की ली और कुछ सोचने लगा। उसकी नज़रें एक जगह पर टिक गईं, और चेहरे पर वही शरारती मुस्कान लौट आई। उसने सोनू और कम्मू को इशारा कर सामने देखने को कहा। दोनों ने उसकी ओर देखा, तो हलवाई की दुकान पर नज़र पड़ी। हलवाई अपनी जगह पर नहीं था, और उसकी जगह उसकी पत्नी चूल्हे के पास बैठी थी। उसका पसीने से भीगा बदन चमक रहा था। साड़ी का पल्लू एक ओर सरक गया था, जिससे उसका मांसल पेट, गहरी नाभि, और ब्लाउज़ से झाँकती मोटी-मोटी चूचियाँ साफ़ दिख रही थीं।। ब्लाउज़ के बटन खुले होने के कारण उसकी चूचियों के बीच की गहरी खाई भी नज़र आ रही थी।





कर्मा ने धीरे से फुसफुसाया, “आह, ये तो पूरी पिक्चर है, यार! अब समोसे और भी स्वादिष्ट लगेंगे।”

सोनू और कम्मू ने हलवाई की पत्नी को देखा और कर्मा की बात सुनकर अपनी नज़रें हटा लीं। सोनू तो कर्मा का स्वभाव जानता था, मगर कम्मू थोड़ा हैरान हो गया। “अरे, कर्मा भैया, ये क्या बोल रहे हो?” उसने सकुचाते हुए कहा। “वो तो हमसे कितनी बड़ी है, और हलवाई की पत्नी है।”

“अरे, मैं तो सच ही बोल रहा हूँ, जो मन में आया,” कर्मा ने बेफिक्री से कहा। “तुम्हें सुंदर नहीं लग रही? एकदम कामुक!”

सोनू और कम्मू ने फिर से उसकी ओर देखा। मन ही मन में वे जानते थे कि कर्मा गलत नहीं कह रहा था। सोनू, जो कर्मा के साथ पहले भी ऐसी बातें कर चुका था, ने हँसते हुए कहा, “सुंदर तो है, भैया। और… कामुक भी।”

कम्मू ने चुपके से एक बार फिर उस औरत को देखा, और उसके मन में भी कुछ हलचल हुई। मगर वह अपनी शर्मिंदगी छुपाते हुए चुप रहा। कर्मा ने हँसते हुए चाय का आखिरी घूँट भरा और बोला, “देखो, यार, जिंदगी में मज़ा लेना सीखो। सुंदर चीज़ को देखो, तारीफ़ करो, और बस। इसमें क्या गलत है?”

कर्मा ने अपनी बात को और गहरा करते हुए कहा, “देखो, यार, तुम लोगों ने मुझे दोस्त बनाया है, इसलिए खुलकर बता रहा हूँ। दोस्ती में पर्दा नहीं होना चाहिए। मैं खुद को रोकता नहीं। शायद सोनू ये बात समझ गया होगा।”

सोनू ने हल्का सा सिर हिलाकर सहमति जताई, मगर उसका चेहरा अभी भी थोड़ा संकोच से भरा था।

कर्मा ने अपनी आवाज़ को और धीमा किया, जैसे कोई गहरा राज़ खोल रहा हो। “देखो, यार, अभी हम जवान हो रहे हैं। हमारे अंदर क्या-क्या चलता है, ये हम तीनों ही जानते हैं। जब कोई मस्त, भरे बदन वाली औरत दिखती है, तो बदन में क्या-क्या होता है, ये भी हम जानते हैं। और ये लगभग तीनों में एक जैसा ही होता है। बस एक फर्क है।”

सोनू और कम्मू ने एक साथ, आश्चर्य से पूछा, “क्या?”

कर्मा ने अपनी शरारती मुस्कान के साथ कहा, “यही कि तुम लोग अपनी इच्छाओं को, अपनी भावनाओं को शर्म की वजह से छुपा लेते हो। और मैं? मैं खुलकर बोल देता हूँ।”

दोनों उसकी बात सुनकर एक पल को सोच में पड़ गए। कर्मा की बात कहीं न कहीं सही थी। हलवाई की पत्नी का भरा हुआ बदन, उसकी गहरी नाभि, और ब्लाउज़ से झाँकती चूचियाँ—ये सब उनके मन और बदन में हलचल मचा रहे थे। मगर जहाँ कर्मा खुलकर अपनी बात कह रहा था, वहीं सोनू और कम्मू अपनी शर्म और झिझक में उलझे थे।

कम्मू ने हल्के से कहा, “पर क्या करें, कर्मा भैया? शर्म आ ही जाती है। फिर सोचते हैं कि ये गलत है। और भी न जाने क्या-क्या खयाल आते हैं।”

“हाँ,” सोनू ने सहमति में कहा। “एक अजीब सी ग्लानि सी होती है।”

कर्मा ने हँसते हुए कहा, “अरे, दुनिया वालों के सामने शर्म करो न! पर दोस्तों के बीच क्यों? दोस्त होते ही इसलिए हैं कि अपने मन की बात खुलकर कह सको। मुझे देखो—मुझे पता है, ये बात अगर मैं किसी और के सामने बोलता, तो वो मुझे गलत समझता। पर तुम्हें मैं दोस्त मानता हूँ, इसलिए खुलकर बोल रहा हूँ।”

सोनू और कम्मू ने उसकी बात समझकर सिर हिलाया। कर्मा ने आगे कहा, “और रही बात ग्लानि और सही-गलत की, तो सच बताऊँ, ये सब समाज पर छोड़ दो। तुम वही करो जो तुम्हें सही लगे, जो तुम्हें अच्छा लगे।”

सोनू को कर्मा की ये बात याद आई, जो उसने पहले भी उसे समझाई थी। वह तुरंत बोला, “सही कह रहे हो, कर्मा भैया। समाज को तो बस बातें बनानी आती हैं। सही-गलत का ठेका उसी ने ले रखा है। पर जब तुम मुसीबत में हो, तो वही समाज अंधा हो जाता है। उसे फर्क नहीं पड़ता कि कोई जिए या मरे। मेरे परिवार को ही देख लो—क्या-क्या नहीं हुआ, पर समाज में से कोई आगे नहीं आया।”

सोनू की बात सुनकर कम्मू भी सोच में पड़ गया। कर्मा की बातें उसके मन पर गहरा असर कर रही थीं। कर्मा ने आगे कहा, “और क्या? और सच बताऊँ, अब जब तेरा परिवार थोड़ा ठीक रास्ते पर आया है, तब भी लोग बातें बनाएँगे। न जाने क्या-क्या कहेंगे।”

“कहने दो,” सोनू ने थोड़ा गुस्से में कहा। “अब मुझे फर्क नहीं पड़ता।”

कर्मा ने मुस्कुराते हुए कहा, “और सच कहूँ, अब किसी की हिम्मत नहीं कि तुझे या तेरे परिवार को कुछ कहे। अब तू मेरा दोस्त है, और कर्मा अपनी दोस्ती निभाना जानता है।”

यह सुनकर सोनू का सीना गर्व से चौड़ा हो गया। उसे लगा जैसे वह कोई बड़ा आदमी बन गया हो। कर्मा जैसे हवेली वाले लड़के का दोस्त होना, जिसके नाम से गाँव में लोग डरते थे, उसे अपने लिए एक उपलब्धि जैसा लगा। कम्मू भी कर्मा की बातों से प्रभावित था और मन ही मन खुश हो रहा था।

“सच में, कर्मा भैया, जैसा हम लोग सोचते थे, तुम उससे बहुत अलग हो,” सोनू ने कहा।

“हाँ, बिल्कुल,” कम्मू ने सहमति में कहा। “थोड़ा सा जानने के बाद ही समझ आ गया।”

कर्मा ने हँसते हुए कहा, “अरे, यार, ये गंभीर बातें छोड़ो। जब तक नज़ारा मिल रहा है, उसका मज़ा लो!” उसने हलवाई की पत्नी की ओर इशारा किया, जो अब दुकान पर नहीं थी, मगर उसकी छवि तीनों के मन में बसी थी। सोनू और कम्मू के चेहरों पर मुस्कान आ गई, और वे चुपके-चुपके उसकी बात याद कर हँसने लगे।

कुछ देर बाद कर्मा ने मोटरसाइकिल स्टार्ट की, और तीनों नदी के किनारे पहुँचे। वहाँ उन्होंने मोटरसाइकिल रोकी और फिर से पानी में पैर डुबोकर बैठ गए। ढलता सूरज और ठंडा पानी माहौल को और सुकून भरा बना रहा था।

“समोसे खाकर मज़ा आ गया,” सोनू ने कहा।

“हाँ, और समोसे वाली को देखकर भी,” कर्मा ने अपनी शरारती मुस्कान के साथ जोड़ा।

तीनों हँस पड़े। कम्मू ने हँसते हुए कहा, “अरे, यार, तुम्हारे दिमाग में अभी तक वही चल रहा है?”

“अरे, तुझे वो भुलाने वाली चीज़ लग रही है क्या?” कर्मा ने तुरंत जवाब दिया।

“नहीं, भुलाने वाली तो नहीं थी,” सोनू ने हँसते हुए कहा।

“अरे, सोनू, तुझे तो मेरी पसंद पता है न?” कर्मा ने आँख मारते हुए कहा।

“हाँ, भैया, पता है,” सोनू ने जवाब दिया। “हलवाइन बिल्कुल वैसी ही थी।”

कम्मू ने उत्साह से पूछा, “पसंद? कैसी पसंद? मुझे भी बताओ!”

सोनू ने हँसते हुए कहा, “अरे, कर्मा भैया को न, बड़ी उम्र की भरे बदन वाली औरतें बहुत भाती हैं। जैसी हलवाइन थी, वैसी ही। जवान लड़कियों से भी ज़्यादा।”

“हैं? सही में?” कम्मू ने उत्साहित होकर कहा।

“हाँ, यार, सच में,” कर्मा ने बेफिक्री से कहा। “ऐसी औरतों को देखकर तो लंड खड़ा हो जाता है।”

कर्मा की खुली बात सुनकर सोनू और कम्मू मुस्कुरा दिए। कम्मू थोड़ा सकुचाते हुए बोला, “अरे, वैसे सच कहूँ, मुझे भी ऐसी ही पसंद हैं।”

यह सुनकर कर्मा और सोनू थोड़े हैरान हुए, मगर खुश भी। कर्मा ने हँसते हुए कहा, “ये हुई न बात! तेरा और मेरा स्वाद तो एक जैसा है। मिलकर बहुत मज़े करेंगे!”

“मज़े? वो कैसे?” कम्मू ने उत्सुकता से पूछा।

कर्मा ने सोनू की ओर देखकर मुस्कुराया, और सोनू बोला, “अरे, कर्मा भैया के साथ रहने पर खूब अलग-अलग तरह के मज़े लेने का मौका मिलता है।”

“कैसे अलग-अलग तरह के? बता तो सही!” कम्मू ने ज़ोर देकर कहा।

कर्मा ने शरारत भरे लहजे में कहा, “जवानी के मज़े, यार! सिर्फ़ समोसे का स्वाद नहीं, गरम बदन का भी स्वाद दिलवा सकता हूँ।”

कम्मू यह सुनकर हैरान रह गया। “तो क्या, सोनू, तूने लिए हैं ऐसे मज़े?”

कर्मा ने हँसते हुए कहा, “अरे, ये बहुत शर्माता है। पूरा मौका था, मैंने इसे बोला भी, पर ये सकुचाने में रह गया। अरे, भाई, जवानी में अगर शर्म करते रह गए, तो बाद में पछताओगे कि काश उस वक्त झिझका नहीं होता।”

कम्मू ने सोचते हुए कहा, “बात तो सही कह रहे हो। मौका हो तो छोड़ना नहीं चाहिए।”

सोनू ने हँसते हुए कम्मू की ओर देखा। “अच्छा, तू नहीं शर्माता?”

“अरे, थोड़ी झिझक तो होती है,” कम्मू ने हँसते हुए कहा। “पर मौका नहीं गँवाना चाहिए।”

कर्मा ने सोनू की ओर देखकर कहा, “देखा, सोनू, ये तुझसे ज़्यादा तेज़ है। तू अभी भी इतना शरमा रहा है। हमने तो अपनी-अपनी पसंद बता दी, पर तू अभी तक छुपाए बैठा है।”

“हाँ, सोनू, ऐसा क्यों?” कम्मू ने छेड़ते हुए कहा। “दोस्तों से भी छुपाएगा?”

सोनू शर्माते हुए हँस पड़ा। “अरे, यार, तुम लोग भी न!”

मगर कर्मा और कम्मू ने ज़िद पकड़ ली। “बता ना, सोनू!” कम्मू ने कहा। “खुलकर बता, मज़ेदार तरीके से।”

सोनू ने एक पल रुककर, शांत होकर कहा, “अच्छा, ठीक है, बताता हूँ। मुझे भी वैसी औरतें पसंद हैं, जैसी तुम लोगों को। भरे बदन वाली, बड़ी-बड़ी चूचियाँ, बड़ी सी निकली हुई गाँड, मांसल पेट, गहरी नाभि। अब ठीक है?”

ये सब बोलते हुए उसके बदन में एक झुरझुरी सी दौड़ गई। कर्मा और कम्मू उसकी बात सुनकर मुस्कुरा रहे थे। कर्मा ने हँसते हुए कहा, “अरे, यार, तूने तो बिल्कुल हलवाइन का ही रूप शब्दों में बता दिया! साला, सोचकर तो लौड़ा कड़क हो गया।”

कर्मा ने अपनी पैंट के ऊपर से लंड को सहलाते हुए कहा। उसकी इस हरकत को देखकर सोनू और कम्मू सकपका गए, मगर कहीं न कहीं उनके मन में भी वही आग सुलग रही थी। कर्मा ने जैसे उनकी सोच को भाँप लिया। “अरे, देखो, तुम भी जानते हो कि तुम मेरी तरह खुलकर बात करना और मज़े लेना चाहते हो। बस, खुद की झिझक तुम्हें रोक रही है। सच कहूँ, तुम्हें सिर्फ़ तुम ही रोक रहे हो, और कोई नहीं।”

कम्मू ने सिर हिलाकर कहा, “बात तो सही कह रहे हो।”

“अरे, मैं सही ही कहता हूँ,” कर्मा ने बेफिक्री से कहा। “लगता है, इस हलवाइन का रस जल्दी चखना पड़ेगा, वरना चैन नहीं आएगा।”

कहते हुए कर्मा थोड़ा पीछे खिसका और अपनी पैंट नीचे खींचकर अपना कड़क लंड बाहर निकाल लिया। उसका मोटा, लंबा लंड देखकर सोनू और कम्मू हैरान रह गए। दोनों एक-दूसरे की ओर देखने लगे, फिर कर्मा की ओर।

“अरे, ऐसे क्या हैरान हो रहे हो?” कर्मा ने हँसते हुए कहा। “मुझमें भी वही है जो तुममें है। कोई अलग चीज़ तो नहीं।”

सोनू ने सकुचाते हुए कहा, “हाँ, भैया, पर ऐसे… खुले में?”

“अरे, यहाँ हम तीनों के सिवा कोई है क्या?” कर्मा ने बेपरवाही से कहा। “और सच कहूँ, जब से हलवाइन को देखा, चैन नहीं पड़ रहा। इसे शांत तो करना पड़ेगा न।” कहते हुए उसने अपने लंड पर हाथ फेरना शुरू कर दिया।

कम्मू ने हैरानी से कहा, “पर ऐसे, यहाँ खुले में?”

“यहीं तो मज़ा है!” कर्मा ने आँख मारते हुए कहा। “तुम लोग भी करो, फिर देखो क्या मज़ा आता है।”

“अरे, नहीं,” सोनू ने तुरंत मना किया।

“मैंने कहा न, इतना सोचोगे तो बाद में पछताओगे,” कर्मा ने कहा। “मैं तो आँखें बंद करके हलवाइन को ही देख रहा हूँ। आह वो मेरा रस चखते हुए कितनी मस्त लगेगी ना यही सोच रहा हूं।”






कम्मू ने कर्मा की बात सुनी और थोड़ा सकुचाते हुए अपनी पैंट नीचे खिसकाई। उसने भी अपना कड़क लंड बाहर निकाल लिया, जो झूल रहा था। सोनू यह देखकर हैरान रह गया। दोनों की नज़रें मिलीं, और फिर सोनू ने भी हिम्मत करके अपनी पैंट नीचे खिसकाई और अपने लंड को बाहर निकाला।

तीनों अब नदी के किनारे, ढलते सूरज की रोशनी में, अपनी जवानी के उफान में डूबे थे। कर्मा की बेपरवाही और खुलापन सोनू और कम्मू को एक नई दुनिया की ओर खींच रहा था। हलवाइन की छवि उनके मन में थी, और नदी से बहती ठंडी हवा उनके चेहरे पर लग रही थी।

तीनों अपने अपने लंड अपने हाथ में लिए थे, कर्मा ने तो अपना हाथ चलाना शुरू भी कर दिया था, वहीं सोनू और कम्मू सकुचा रहे थे,

कर्मा: अरे डर क्यों रहे हो दोनों, यूं समझो कि तुम योद्धा हो और हाथ में तुम्हारी तलवार है और लड़ाई से पहले तलवार में धार लगाई जाती है वैसे ही हमें लगानी है।

कर्मा का अटपटा और अलग सा विचार सुनकर दोनों ही हंसने लगे और सहज हो गए, और फिर तीनों अपनी कल्पना में हलवाई की पत्नी को नंगा करते हुए लंड पर हाथ चलाने लगे, कुछ देर में हलवाइन के नाम की मलाई तीनों ने जमीन पर गिरा दी और जमीन को उपजाऊ कर दिया। तीनों शांत हुए और अपनी अपनी पैंट ऊपर चढाई, कर्मा उठते हुए बोला: चलें योद्धाओं?

ये सुनकर दोनों हंसने लगे,

कर्मा मोटरसाइकल पर बैठा और बाकी दोनों उसके पीछे, और स्टार्ट कर चल दिया,

कर्मा: अरे सुनो आज रात के लिए तैयार हो?

सोनू: आज रात ऐसा क्या है?

कर्मा: अरे मस्तीपुर में आज प्रोग्राम है नाच का, चलो देख कर आते हैं मजा आएगा।

कम्मू: रात को कहां घरवाले मानेंगे।

सोनू: हां यार नहीं मानेगा कोई।

कर्मा: अरे कुछ बहाना मार देना, मस्त नचनिया आने वाली है नहीं देखा तो पछताओगे।

दोनों सोच में पड़ गए क्योंकि गांव में टीवी वगैरा तो था नहीं मनोरंजन के नाम पर नाटकों और नाच का ही सहारा था, दोनों का ही मन था पर घरवालों की समस्या थी।

सोनू: पर जाएं कैसे?

कर्मा: सोनू तेरे लिए तो मैं चाची से बोल दूंगा कि हम दोनों आज साथ में रुकेंगे हवेली पर तो वो मान जाएंगी, कम्मू तुझे कुछ सोचना होगा।

कम्मू भी सोच रहा था ऐसा क्या बहाना बनाया जाए, ये सोचते हुए गांव के पास आकर कर्मा ने दोनों को उतार दिया और वो हवेली की ओर निकल गया, सोनू घर पहुंचा तो रजनी तब तक घर आ चुकी थी,

रजनी: कहां था तू? हवेली से जल्दी आ गया था।

सोनू: कर्मा के साथ था मां,

रजनी: बहुत घूमने लगा है उसके साथ।

विक्रम: हां वो वैसे भी बिगड़ा हुआ है तुझे भी बिगाड़ देगा।

सोनू: अब उसे मना तो नहीं कर सकता न? हवेली का लड़का है वहीं काम करते हैं हम।

उसकी बात भी सबको सही लगी और चुप हो गए,

सोनू: और मां आज वो बोल रहा था कि मैं उसके साथ हवेली में रुकूं।

रजनी: अरे क्यों हवेली में क्या काम है? और उसे तुझसे इतना लगाव क्यों हो रहा है।

नेहा: सही में मां, आज वो इसे ढूंढते हुए घर भी आया था,

ये सुन रजनी कुछ सोचने लगती है,

रजनी: उसने कुछ कहा क्या?

नेहा: नहीं बस सोनू का पूछ कर चला गया।

सोनू: अरे वो मुझे अपना दोस्त मानता है साथ खेलते आए हैं इसलिए तुम लोग ज्यादा सोच रहे हो।

रजनी: सोनू जा तू हाथ पैर धो आ तब तक खाना लगाती हूं।

सोनू हाथ पैर धोने चला जाता है तो विक्रम कहता है: हवेली का लड़का हम जैसे गरीब परिवार के लड़के से दोस्ती क्यों करेगा? मुझे तो ये सब सही नहीं लग रहा।

रजनी अपने बारे में भी सोचती है कि वो भी तो क्या क्या कर रही है हवेली जाकर और सोच कर बोलती है,

रजनी: छोड़ अगर सोनू खुश है उसके साथ से तो रहने दे, वैसे भी इतनी सी उमर में बहुत दुख देख लिए उसने।

विक्रम उसकी बात सुन सिर हिलाता है उतने में सोनू भी आ जाता है।

उधर हवेली में पहुंच कर कर्मा सीधा अपने पापा यानि नीलेश के पास जाता है,

कर्मा: पापा मुझे कुछ पूछना है.

नीलेश: हां पूछ क्या बात है?

कर्मा: राजेपुर गांव में हमारे जानने वाले हैं न?

नीलेश: हां बहुत है? क्यों किसी से झगड़ा हुआ क्या तेरा?

कर्मा: नहीं बस कुछ पता करना था।

इतने में बिमला पीछे से आती है और कहती है: मालिक, छोटे मालिक, मालकिन खाने के लिए बुला रही हैं। कुछ देर में सब खाने की मेज पर होते हैं और खाना खा रहे होते हैं,

सोमपाल: बहू, अनुज लल्ला कब आएगा अपने ननिहाल से?

सरोज: अरे बाउजी, अभी दो दिन तो हुए गए उसे अभी से याद करने लगे।

सोमपाल: अरे हमारे पोतों में ही तो हमारी जान बसती है, इन्हें तो याद करेंगे ही।

सरोज: कहो तो भैया को बोल दूं छोड़ जाएंगे कल ही?

सोमपाल: अरे नहीं रह लेने दे थोड़े दिन।

कर्मा: पापा, मुझे थोड़ी देर के लिए जीप चाहिए, मस्तीपुर तक जाना है,

नीलेश: मस्तीपुर क्यों वो भी इस समय?

कर्मा: अरे पापा वहां न आज नाच का प्रोग्राम है, वो देखने।

सरोज: अच्छा नाच देखने तू इतनी रात को दूसरे गांव जाएगा?

कर्मा: हां मां अच्छा प्रोग्राम है।

नीलेश: अरे रहने दे सही कह रही है तेरी मां।

सोमपाल: अरे जाने दो न इस उम्र में ये नाच नाटक नहीं देखेगा तो कब देखेगा।

सरोज: बस बाउजी आपकी सह में रहकर ही इनकी सारी इच्छाएं पूरी हो जाती हैं,

सरोज हंसते हुए कहती है।

सोमपाल: अरे बहू, अगर अपने पोतों की इच्छा न पूरी कर पाऊं तो मेरा क्या फायदा?

कर्मा: अरे बाबा तुम दुनिया के सबसे अच्छे बाबा हो।

नीलेश: चल चुपचाप खाना खा, मेरे बाप को मक्खन लगा रहा है।

सब हंसने लगते हैं। खाने के बाद कर्मा जीप लेकर निकल जाता है,

कुछ देर बाद सोमपाल उठे और बोले, “अरे, बिमला, तेरा काम निपट जाए तो थोड़ी मालिश कर देना पैरों की।” यह कहकर वह अपने कमरे की ओर बढ़ गए।

“जी, मालिक,” बिमला ने जवाब दिया। उसकी नज़र सरोज से मिली, और उसके चेहरे पर शर्मीली मुस्कान तैर गई। हवेली में सब जानते थे कि सोमपाल की ‘मालिश’ का मतलब क्या है। बिमला ऐसी नौकरानी थी, जिसने हवेली के हर मर्द का स्वाद चखा था।

सोमपाल के जाते ही सरोज ने नीलेश को इशारे से कहा, “बाउजी को आजकल मालिश की ज़्यादा ज़रूरत पड़ रही है।” वह हँसने लगी।

“अरे, बाउजी किसके हैं?” नीलेश ने हँसते हुए कहा। “ऐसी मालिश तो वो हमेशा से करते आए हैं। वैसे, तेरा क्या खयाल है? तेरी मालिश कर दूँ मैं आज?” यह कहकर नीलेश ने सरोज को अपनी ओर खींच लिया।

“अरे, क्या कर रहे हो?” सरोज ने नकली गुस्से में कहा। “कम से कम कमरे में तो चलो!”

“अरे, शरमाती क्यों है?” नीलेश ने हँसते हुए कहा। “बाउजी अपने कमरे में हैं, बच्चे हैं नहीं, नौकर जा चुके हैं।” यह कहकर वह सरोज के होंठों को चूसने लगा। सरोज भी उसका साथ देने लगी। नीलेश ने सरोज का ब्लाउज़ खोल दिया, और वह ज़मीन पर गिर गया। फिर उसने ब्रा को खींचकर उतार दिया, जो कंधे से लटक गई। सरोज की मोटी-मोटी चूचियाँ अब नीलेश के सामने थीं।

दोनों के होंठ अलग हुए तो सरोज ने झूठमूठ के गुस्से में कहा, “देखो तो, तुम्हें भी बिल्कुल सब्र नहीं है!” उसने पल्लू अपने सीने पर डाल लिया।

“अरे, तुम सामने हो तो सब्र कैसा?” नीलेश ने हँसते हुए कहा। “पल्लू मत डालो, जो देखने वाली चीज़ है, उसे तो देखने दो।”

सरोज हँस पड़ी और पल्लू हटाकर अपनी चूचियों को दिखाने लगी।






“आह, ये तो दिन-प्रतिदिन और सुंदर होती जा रही हैं,” नीलेश ने कहा और उन्हें मुँह में भर लिया।

ऊपर वाले कमरे में सोमपाल बिस्तर पर बैठा बिमला का इंतज़ार कर रहा था। दरवाज़ा खुला, और बिमला अंदर आई। उसने पहले ही अपना ब्लाउज़ उतार दिया था और सिर्फ़ साड़ी में थी, जो उसके भरे हुए बदन को और उभार रही थी।






सोमपाल की आँखों में हवस की चमक थी। वह बिस्तर से उठा और अपनी धोती खोल दी।

फूल सिंह का घर

उधर, फूल सिंह के घर में खाना बन रहा था। कम्मू घर पहुँचा तो उसका दिमाग सिर्फ़ नाच के प्रोग्राम में अटका था। वह सोच रहा था कि कैसे इजाज़त माँगी जाए। उसने भैंसों और गायों को चारा-पानी देकर सारे काम निपटा लिए थे।

सुमन खाना परोसने की तैयारी कर रही थी, और कुसुम रसोई में खाना बना रही थी। गर्मी के कारण कुसुम ने अपना पल्लू कमर में लपेट रखा था। उसका पसीने से भीगा मांसल पेट, गहरी नाभि, और ब्लाउज़ में कसी बड़ी-बड़ी चूचियाँ साफ़ नज़र आ रही थीं। कुसुम घर की बड़ी बहू थी और थोड़ी बेबाक थी, इसलिए उसे घरवालों के सामने संकोच नहीं था।

कम्मू की नज़र एक-दो बार अपनी ताई के बदन पर गई, मगर उसने ध्यान नहीं दिया। यह उसके लिए आम था। अजीत, उसका पिता, चुपके-चुपके अपनी भाभी के बदन को देख रहा था। कुसुम का पसीने से चमकता मखमली पेट, गहरी नाभि, और ब्लाउज़ को तानती चूचियाँ उसके मन में कामुक खयाल जगा रही थीं।






जल्द ही खाना तैयार हो गया। अनामिका और अंजू ने खाना परोसना शुरू किया। खाने के बाद कम्मू ने हिम्मत जुटाई और अपने ताऊ फूल सिंह के पास जा बैठा। वह जानता था कि ताऊ ही उसकी मदद कर सकते हैं।

फूल सिंह का कम्मू से खास लगाव था, क्योंकि वह सबसे छोटा था और उनके छोटे भाई का बेटा था।

“ताऊजी, एक बात पूछनी है,” कम्मू ने हल्के से कहा।

“हाँ, पूछ, लल्ला,” फूल सिंह ने प्यार से कहा।

“वो, दूसरे गाँव में आज नाटक और नाच का प्रोग्राम है। मैं देखने जाऊँ क्या? सोनू और दोस्त भी जा रहे हैं।”

“रात में दूसरे गाँव जाना सही होगा?” फूल सिंह ने चिंता से पूछा।

“अकेला नहीं जा रहा, दोस्त भी जा रहे हैं,” कम्मू ने जवाब दिया।

पीछे से अजीत बोला, “अच्छा, बताऊँ? अभी कहीं जाने की ज़रूरत नहीं। काम-धंधा कुछ नहीं, बस मस्ती करवा लो इस नालायक से!”

कम्मू का मुँह लटक गया। कुसुम ने तुरंत टोका, “अरे, क्यों चिल्ला रहे हो बेचारे पर? ऐसा क्या माँग लिया?”

“दूसरे गाँव में नाच-नाटक का प्रोग्राम है, वो देखने जाना चाहता है,” फूल सिंह ने बताया।

सुमन चुपचाप सुन रही थी। वह जानती थी कि कम्मू का भला-बुरा सोचने के लिए उसके ताऊ-ताई हैं। धीरज ने कहा, “हाँ, मैंने भी सुना। कुछ लोग गाँव में बात कर रहे थे।”

“ठीक है, चला जा, कम्मू,” फूल सिंह ने कहा। “पर समय से आ जाना।”

“अरे, दादा, तुम्हारे लाड़ ने ही इसे बिगाड़ा है,” अजीत ने तंज कसा।

“चुप कर,” फूल सिंह ने हँसते हुए कहा। “अपने दिन भूल गया? तू तो चुपके-चुपके नौटंकी देखने जाता था। कम से कम ये पूछकर जा रहा है।”

यह सुनकर अजीत मुस्कुरा दिया, और बाकी सब हँस पड़े। कम्मू खुश था कि उसे इजाज़त मिल गई।

मस्तीपुर

थोड़ी देर बाद चारों—कर्मा, सोनू, कम्मू, और मन्नू—जीप में सवार होकर मस्तीपुर की ओर निकल पड़े। सोनू और कम्मू ने मन्नू को भी साथ ले लिया था, क्योंकि उन्होंने पहले ही कह दिया था कि सारे दोस्त जा रहे हैं। मन्नू के घरवालों ने भी यही सोचकर इजाज़त दे दी।

मन्नू को कर्मा के साथ अपने दोस्तों की अचानक दोस्ती समझ नहीं आ रही थी, मगर उसे नाच देखने और जीप में बैठने का मौका मिल रहा था, तो वह चुपचाप खुश था।

कर्मा ने जीप मस्तीपुर के मैदान में रोकी, जहाँ प्रोग्राम हो रहा था। मैदान में अच्छी-खासी भीड़ थी। आसपास के कई गाँवों से लोग नाच देखने आए थे। जीप रुकते ही लोग खुसुर-फुसुर करने लगे। इन गाँवों में जीप कोई आम चीज़ नहीं थी। लोग प्रभावित हुए बिना न रह सके।

सोनू, कम्मू, और मन्नू जीप से उतरे, और कर्मा उनके पीछे। कई लोग स्टेज की बजाय उनकी ओर देख रहे थे। कोई बोला, “ये सज्जनपुर के जमींदार का बेटा है।” कोई और कुछ कह रहा था। चारों स्टेज के पास पहुँचे, और बिना कुछ कहे उनके लिए चार आसन लगा दिए गए। चारों बैठ गए। सोनू, कम्मू, और मन्नू को पहली बार इतना सम्मान मिल रहा था। लोग उनकी आवभगत कर रहे थे, और उन्हें यह सब बहुत अच्छा लग रहा था। वे जानते थे कि यह सब कर्मा की वजह से है।

कुछ देर बाद नाच शुरू हुआ। एक भरे बदन वाली, सजी-धजी नचनिया स्टेज पर आई। उसने लाल रंग का घाघरा-चोली पहना था, जिसमें उसका गोरा, मांसल पेट और गहरी नाभि साफ़ दिख रही थी। चोली में उसकी बड़ी-बड़ी चूचियाँ सबका ध्यान खींच रही थीं। जैसे ही उसने ठुमके लगाना शुरू किया, उसकी कमर की थिरकन और सिलवटों ने माहौल में आग लगा दी। लोग आहें भरने लगे, और कर्मा, सोनू, कम्मू, और मन्नू की नज़रें भी उस पर टिक गईं।






मस्तीपुर के मैदान में नाच का प्रोग्राम अपने चरम पर था। नचनिया के ठुमकों ने भीड़ को झुमा रखा था। उसकी हिलती कमर, भरे हुए चूतड़, और चोली में कसी मोटी-मोटी चूचियाँ हर किसी की नज़रों को बाँधे हुए थीं।

कर्मा बार-बार खड़ा होता और स्टेज के पास जाकर लाली पर नोट उड़ा देता। उसकी हरकतों से भीड़ में खुसुर-फुसुर होने लगती, मगर कर्मा को इसकी परवाह कहाँ थी? उसने कई बार सोनू, कम्मू, और मन्नू को भी पैसे थमाकर स्टेज की ओर भेजा। लाली की हिलती कमर और चूतड़ों को देखकर कर्मा कभी सोनू, कभी कम्मू के कान में फुसफुसाता, “इसे देखकर तो लौड़ा खड़ा हो गया, यार!” दोनों उसकी हाँ में हाँ मिलाकर हँस पड़ते, हालाँकि उनकी आँखों में भी वही उत्तेजना चमक रही थी।

खैर, कुछ देर बाद नाच खत्म हुआ। लाली ने आखिरी ठुमका लगाया और स्टेज के पीछे चली गई। कर्मा तुरंत उठा और उसी ओर बढ़ गया। सोनू, कम्मू, और मन्नू उसे जाते देख एक-दूसरे से पूछने लगे, “अरे, ये कहाँ चला गया?”

स्टेज के पीछे पर्दे के पास एक आदमी खड़ा था, जिसने कर्मा को रोकने की कोशिश की। मगर जैसे ही उसे अंदाज़ा हुआ कि यह सज्जनपुर का जमींदार का बेटा है, वह तुरंत रास्ते से हट गया। कर्मा बेधड़क टेंट में बने एक छोटे से कमरेनुमा जगह में घुस गया, जहाँ लाली कपड़े बदल रही थी।

लाली की नंगी पीठ और कमर की सिलवटें कर्मा की आँखों में समा गईं। उसने बेपरवाही से कहा, “बहुत अच्छा नाचती हो तुम!”

लाली ने आवाज़ सुनकर पलटकर देखा और एक पल के लिए हैरान रह गई। “तुम… तुम अंदर कैसे?” वह कुछ बोलने जा रही थी, मगर रुक गई। उसने कर्मा को पहचान लिया—वही लड़का जो उस पर नोट उड़ा रहा था। लाली समझ गई कि यह कोई आम गाँव वाला नहीं है। इतनी हिम्मत वही कर सकता है, जो बड़ा रसूख वाला हो। मगर लाली घबराई नहीं। वह सालों से नाच का प्रोग्राम कर रही थी। अनगिनत मर्द उसकी अदाओं के दीवाने थे, और उसने ऐसे लोगों को संभालना सीख लिया था।

“धन्यवाद,” लाली ने मुस्कुराते हुए कहा। “वैसे, आपने जो नोट उड़ाए, उसी से अंदाज़ा हो गया था कि आपको मेरा नाच पसंद आ रहा है।”

कर्मा ने अपनी शरारती मुस्कान के साथ जवाब दिया, “पर तुम्हारी जैसी कलाकार को तो सामने से उत्साहित करना चाहिए। इसलिए खुद को रोक ही नहीं पाया।”

लाली कर्मा की बातों से प्रभावित हो रही थी। वह सोच रही थी कि यह लड़का उससे आधी उम्र का होगा, मगर बातें ऐसी करता है जैसे कोई बड़ा आदमी। जरूर किसी रईस घर का है। उसका लहजा, उसका आत्मविश्वास—सब कुछ यही बता रहा था। “धन्यवाद इतनी तारीफ के लिए,” लाली ने पल्लू सीने पर डालते हुए कहा।

“वैसे, बुरा न मानो तो नाम जान सकता हूँ?” कर्मा ने पूछा। “मेरा नाम कर्मा है। मैं सज्जनपुर के जमींदार सोमपाल जी का पोता और नीलेश जी का बेटा हूँ।”

कर्मा ने अपना परिचय देकर साफ़ कर दिया कि वह कितना प्रभावशाली है। अगर लाली के मन में उसे मना करने का कोई खयाल था, तो वह अब खत्म हो चुका था। लाली पहले ही अंदाज़ा लगा चुकी थी, और अब परिचय सुनकर बोली, “कर्मा? बहुत अच्छा नाम है। मुझे लाली कहते हैं।”

“लाली, बहुत ही रोचक नाम है,” कर्मा ने तारीफ करते हुए कहा। “वैसे, तुम कहाँ से हो?”

“शहर के भी आगे, मेरा गाँव है—पीत नगर,” लाली ने जवाब दिया।

“अरे, काफी दूर है,” कर्मा ने कहा। “कब जाओगी तुम?”

“जाना तो अभी था, पर साथ के लोग जब तक सामान नहीं समेटेंगे, तब तक रुकना पड़ेगा। उनके साथ ही जाऊँगी।”

कर्मा ने तुरंत मौके का फायदा उठाया। “अगर तुम चाहो, तो मैं तुम्हें अपनी जीप से छोड़ देता हूँ।”

“अरे, आप क्यों तकलीफ लेंगे?” लाली ने नकली संकोच दिखाते हुए कहा।

“अरे, इसमें तकलीफ कैसी?” कर्मा ने अपनी चिर-परिचित शरारत भरी मुस्कान के साथ कहा। “हमें तो तकलीफ तब होगी, जब तुम जैसी सुंदरी को तकलीफ में देखेंगे।”

लाली उसकी बात सुनकर मुस्कुरा दी। “बातें अपनी उम्र से ज़्यादा बड़ी नहीं करते आप?”

“काफी कुछ उम्र से बड़ा और अच्छा कर लेता हूँ,” कर्मा ने आँख मारते हुए कहा। “बस तुम सेवा का मौका दो।”

लाली को कर्मा की बातें भा रही थीं। वह बाकी मर्दों की तरह सीधे अश्लील बातें नहीं करता था। उसकी बातें मीठी चाशनी में डूबी थीं, जो सुनने वाले को लुभा लेती थीं। “अच्छा, किराया तो नहीं लोगे मुझे छोड़ने का?” लाली ने मज़ाक में पूछा।

“माँगूँगा नहीं,” कर्मा ने हँसते हुए कहा। “पर तुम दोगी, तो मना भी नहीं करूँगा।”

लाली हँस पड़ी। “अच्छा, सुनो। तुम जीप के पास इंतज़ार करो। मैं अपने साथियों को बता कर आती हूँ।”

“ठीक है, इंतज़ार रहेगा,” कर्मा ने कहा और बाहर निकल गया।

जीप के पास

सोनू, कम्मू, और मन्नू जीप के पास खड़े कर्मा का इंतज़ार कर रहे थे। सोनू ने पूछा, “अरे, भैया, कहाँ चले गए थे? वैसे ही देर हो गई है।”

कर्मा ने शरारत भरे लहजे में कहा, “अरे, उसी नाचने वाली से बात कर रहा था। एक अच्छी खबर है—वो हमारे साथ चल रही है।”

“क्या? हमारे साथ? कहाँ?” कम्मू ने हैरानी से पूछा।

“अरे, उसे शहर जाना है। मैंने बोला कि चलो, मैं छोड़ दूँगा,” कर्मा ने बेपरवाही से कहा।

मन्नू ने चिंता जताई, “पर इसमें हमें देर नहीं हो जाएगी?”

“अरे, बोल देंगे कि प्रोग्राम देर से खत्म हुआ,” कर्मा ने जवाब दिया। “इसी बहाने उसके साथ समय बिताएँगे, तो पटाने का मौका मिलेगा।”

मन्नू कुछ कहने वाला था, मगर कम्मू और सोनू ने उसे इशारे से चुप करा दिया। कुछ ही पल बाद लाली जीप के पास आई। उसने अब साड़ी पहन रखी थी, मगर उसका भरा हुआ बदन और कामुकता पहले जैसी ही थी। उसकी गहरी नाभि और साड़ी में लिपटी चूचियाँ तीनों की नज़रों को खींच रही थीं। सोनू, कम्मू, और मन्नू चुपके-चुपके उसे देख रहे थे।

कर्मा ने परिचय कराया, “लाली जी, ये मेरे दोस्त हैं—कम्मू, सोनू, और मन्नू।”

लाली ने तीनों को देखकर सिर हिलाया और मुस्कुराई। तीनों ने सकुचाते हुए उसे नमस्ते किया। फिर सब जीप में बैठ गए। कर्मा जीप चला रहा था, लाली उसके बगल में बैठी थी, और बाकी तीनों पीछे की सीट पर। कर्मा और लाली बातें कर रहे थे। सोनू, कम्मू, और मन्नू बीच-बीच में कुछ पूछे जाने पर जवाब देते, मगर उनकी झिझक साफ़ दिख रही थी। लाली की हँसी और मज़ाक से धीरे-धीरे उनकी शर्म कम हो रही थी।

कर्मा जीप चलाते हुए चुपके से लाली के हाथ पर हाथ रख लेता, कभी उसकी जाँघ को हल्के से छू लेता। लाली को समझ थी कि कर्मा क्या चाहता है, मगर वह अभी कोई सीधी प्रतिक्रिया नहीं दे रही थी। कर्मा का स्पर्श उसे अच्छा लग रहा था। अगर कोई और होता, तो वह अब तक बहाना बनाकर या साफ़ मना कर चुकी होती। खैर, रास्ता कटता गया, और वे लाली के गाँव पीत नगर पहुँच गए।

लाली के उतरने से पहले कर्मा ने कहा, “फिर कब दर्शन होंगे?”

लाली ने शरारत भरे लहजे में जवाब दिया, “देखेंगे। मेरा समय मुफ्त में नहीं मिलता, कीमत चुकानी पड़ती है।”

“तुम्हारे लिए तो हर कीमत चुकाने को तैयार हूँ,” कर्मा ने तुरंत कहा। “बस तुम हाँ तो करो।”

“हाँ तो कर दूँ,” लाली ने हँसते हुए कहा। “पर तुमने ज़्यादा माँग लिया तो?”

“हाँ, ये भी सही है,” कर्मा ने आँख मारते हुए कहा। “माँगूँगा तो ज़्यादा ही, क्योंकि तुम्हें देखकर खुद को रोक नहीं पाऊँगा।”

“अच्छा, अब जाओ,” लाली ने हँसते हुए कहा। “बहुत बातें बन गई।”

कर्मा ने उससे विदा ली, और चारों जीप में बैठकर वापस निकल पड़े। रास्ते में लाली की बातें करते हुए कर्मा ने बेपरवाही से कहा, “जल्दी ही लाली मेरे नीचे होगी।”

सोनू, कम्मू, और मन्नू ने हैरानी से उसकी ओर देखा। कम्मू ने पूछा, “ऐसा कैसे होगा, भैया?”

कर्मा ने हँसते हुए कहा, “अरे, यार, तुम लोग अभी बच्चे हो। देखना, कर्मा जब ठान ले, तो कोई नहीं बचता। लाली को भी मैं अपने नीचे की सैर जरूर करवाऊँगा।”

मन्नू ने संदेह भरे लहजे में कहा, “पर वो इतनी आसानी से कैसे मानेगी?”

“आसानी से नहीं मानेगी, तो थोड़ा ज़ोर लगाएँगे,” कर्मा ने शरारती मुस्कान के साथ कहा। “तुम लोग बस मेरे साथ रहो, सब मज़े मिलेंगे।”

सोनू और कम्मू कर्मा की बातों से प्रभावित थे, मगर मन्नू के मन में एक अजीब सी बेचैनी थी। वह चुप रहा। जीप गाँव की ओर बढ़ रही थी, और चारों अपनी-अपनी सोच में डूबे थे।


जारी रहेगी।
 
मित्रों एक हफ्ते थोड़ा व्यस्त हूं तो अगला अध्याय दोनों ही कहानियों पर थोड़ा देर से आयेगा बीच में समय मिला तो अवश्य कोशिश करूंगा।

बहुत बहुत धन्यवाद
 
“आसानी से नहीं मानेगी, तो थोड़ा ज़ोर लगाएँगे,” कर्मा ने शरारती मुस्कान के साथ कहा। “तुम लोग बस मेरे साथ रहो, सब मज़े मिलेंगे।”

सोनू और कम्मू कर्मा की बातों से प्रभावित थे, मगर मन्नू के मन में एक अजीब सी बेचैनी थी। वह चुप रहा। जीप गाँव की ओर बढ़ रही थी, और चारों अपनी-अपनी सोच में डूबे थे।

ग्यारहवाँ अध्याय


जीप धूल भरी सड़कों पर उड़ती हुई आखिरकार सज्जनपुर पहुँची। कर्मा ने सोनू, कम्मू, और मन्नू को उनके घरों के बाहर छोड़ दिया। रात गहरी हो चुकी थी, और गाँव की गलियाँ सन्नाटे में डूबी थीं। मन्नू बिना कुछ बोले अपने घर की ओर चला गया, मगर कम्मू के चेहरे पर चिंता साफ़ दिख रही थी। वह ठिठका हुआ खड़ा था, और सोनू ने उसकी बेचैनी भाँप ली।

“क्या हुआ, तू क्या सोच रहा है?” सोनू ने पूछा।

“यार, देर हो गई है,” कम्मू ने उदास लहजे में कहा। “पापा डाँटेंगे।”

“अरे, वो तो अब तक सो गए होंगे,” सोनू ने हल्के से हँसते हुए कहा।

“अबे, किवाड़ खुलवाऊँगा, तो जाग जाएँगे न?” कम्मू ने चिंता से कहा।

सोनू ने एक पल सोचा और बोला, “तो मत खुलवा न। मेरे घर से दीवार फाँदकर चला जा।”

कम्मू को यह उपाय ठीक लगा। दोनों सोनू के घर की ओर बढ़े। सोनू ने किवाड़ खटखटाया, तो नींद भरी आँखों के साथ नेहा ने दरवाज़ा खोला। दोनों अंदर दाखिल हुए। आँगन में एक छोटी सी दीवार थी, जो सोनू के घर को कम्मू के घर से अलग करती थी। कम्मू ने चुपके से दीवार फाँदी और अपने आँगन में पहुँच गया। उसने नज़र घुमाई—सब सो रहे थे। उसके भाई-बहन खटिया पर गहरी नींद में थे, मगर पापा की खाट खाली थी। कम्मू का दिल धक् से रह गया। “पापा जाग रहे हैं?” उसने सोचा।

तभी उसकी नज़र अंदर के कमरे की ओर गई। किवाड़ के नीचे से हल्की सी रौशनी टिमटिमा रही थी। “माँ अभी तक जाग रही है?” कम्मू के मन में जिज्ञासा जागी। वह धीरे-धीरे कमरे की ओर बढ़ा। किवाड़ के पास पहुँचते ही उसे अंदर से कुछ अस्पष्ट सी आवाज़ें सुनाई दीं—हल्की सिसकियाँ, जैसे कोई दबी हुई साँसें। कम्मू रुक गया। उसका मन उत्सुकता और संकोच के बीच झूल रहा था। उसने धीरे से किवाड़ की झिरी पर आँख लगाई और अंदर झाँका। जो उसने देखा, उससे उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं।

बिस्तर पर उसके पापा अजीत थे, पूरी तरह नंगे। उनके नीचे उसकी माँ सुमन थी, जो भी नंगी थी। अजीत अपनी पत्नी की मोटी-मोटी चूचियों को मसल रहे थे, कभी उन्हें चूस रहे थे, तो कभी चाट रहे थे।





सुमन की हल्की सिसकियाँ कमरे में गूँज रही थीं। उसका चेहरा आनंद और उत्तेजना से भरा था। कम्मू का मुँह सूखने लगा। उसका किशोर मन इस दृश्य को देखकर हिल गया। उसे तुरंत एहसास हुआ कि यह गलत है। वह अपने माँ-बाप को इस तरह नहीं देख सकता। उसने जल्दी से आँखें हटाईं और पीछे हट गया।

आँगन में एक नज़र डाली—सब सो रहे थे। कम्मू का मन द्वंद्व में फँस गया। एक तरफ वह जानता था कि यह गलत है, मगर दूसरी तरफ उसकी जिज्ञासा उसे और देखने के लिए उकसा रही थी। पहली बार वह दो लोगों को काम रस में डूबे हुए देख रहा था। उसका किशोर मन उत्तेजना और उत्सुकता से भर उठा। कुछ देर सोचने के बाद उसकी जिज्ञासा जीत गई। उसने सोचा, “सब सो रहे हैं। थोड़ा देख लूँगा, तो किसी को पता नहीं चलेगा।”

वह फिर से किवाड़ की झिरी पर आँख लगाकर अंदर देखने लगा। मगर अब नज़ारा बदल चुका था, और यह पहले से भी ज़्यादा उत्तेजक था। अब उसकी माँ सुमन उसकी ओर मुँह करके थी, पूरी तरह नंगी। उसके पापा अजीत पीछे से अपनी कमर हिला रहे थे। उनका एक हाथ सुमन की एक चूची पर था, जो उसे मसल रहा था, और दूसरा हाथ उसके मखमली पेट को सहला रहा था। कम्मू को अपनी माँ का पूरा नंगा बदन सामने से दिख रहा था—उसकी मोटी-मोटी चूचियाँ, जो हर धक्के के साथ हिल रही थीं, गहरी नाभि, मांसल पेट, और नीचे हल्की-हल्की झाँटों के बीच उसकी रसीली चूत, जिसमें उसके पापा का लंड अंदर-बाहर हो रहा था।





कम्मू ने इससे पहले ऐसा उत्तेजक दृश्य कभी नहीं देखा था। उसकी माँ का चेहरा आनंद में डूबा था। उसकी आँखें बंद थीं, और वह अपने होंठों को काट रही थी। कम्मू का लंड पैंट में खड़ा हो गया, और उसे इसका एहसास भी नहीं हुआ। वह बस आँखें फाड़े अंदर देख रहा था। उसका हाथ अनायास ही पैंट के ऊपर से अपने लंड को सहलाने लगा। अचानक उसे होश आया, और उसने जल्दी से हाथ हटा लिया। वह खुद को धिक्कारने लगा, “ये क्या कर रहा हूँ? अपने माँ-बाप को देखकर ये सब करना गलत है!”

तभी आँगन में किसी के खाँसने की आवाज़ आई। कम्मू तुरंत हरकत में आया और दबे पाँव अपनी खाट पर जाकर लेट गया। उसका लंड अभी भी पैंट में तंबू बनाए हुए था। उसके मन में एक साथ ढेर सारे विचार उमड़ रहे थे। उसकी आँखों के सामने वही दृश्य बार-बार घूम रहा था—उसकी माँ का नंगा बदन, उसकी चूचियाँ, उसकी चूत, और पापा का लंड। उसने खुद को शांत करने की कोशिश की, मगर उसका लंड जस का तस खड़ा था।

वह सोचने लगा, “ऐसे नहीं चलेगा। इसे शांत करना पड़ेगा।” उसने चादर अपने ऊपर डाल ली और चुपके से पैंट खोलकर लंड बाहर निकाल लिया। उसने हल्के-हल्के मुठियाना शुरू किया। वह जोर लगाकर हलवाइन और लाली के बदन के बारे में सोचने की कोशिश करने लगा, मगर कुछ ही पल बाद उसकी माँ का नंगा बदन फिर से उसकी आँखों के सामने आ गया। उसका लंड उसके हाथ में और सख्त हो गया। इस बार वह खुद को रोक नहीं पाया। अपनी माँ के बदन को याद करते हुए वह मुठियाने लगा। जल्द ही उसके लंड ने उसकी मुट्ठी और पेट पर अपना रस उगल दिया। झड़ने के बाद उसे थोड़ी शांति मिली, मगर तुरंत ही ग्लानि ने उसे घेर लिया। वह सोचते-सोचते कब नींद में चला गया, उसे पता ही नहीं चला।

---

सुबह की पहली किरण के साथ सज्जनपुर जाग उठा। गायों की रँभाहट और खेतों से मज़दूरों की आवाज़ों ने गाँव को जीवंत कर दिया। सोनू और रजनी समय पर हवेली पहुँच चुके थे। रजनी रसोई में बिमला के साथ मिलकर नाश्ता तैयार कर रही थी, और सोनू हवेली के बाहरी हिस्से में झाड़ू लगा रहा था। मगर उसका मन कहीं और था। रात का नाच, लाली की थिरकन, और कर्मा की बेपरवाह बातें उसके दिमाग में घूम रही थीं।

हवेली की रसोई में रजनी आटा गूँध रही थी, तभी सरोज तैयार होकर आई। “रजनी, सुन,” सरोज ने कहा। “मैं और कर्मा के पापा शहर जा रहे हैं। बाबूजी की चाय तो मैंने बिमला के हाथों भेज दी है। तू कर्मा को जगा दे और उसे चाय दे देना। अभी तक सो रहा है वो।”

“ठीक है, जीजी,” रजनी ने जवाब दिया।

सरोज नीलेश के साथ चली गई। रजनी ने चाय बनाई, मगर मन ही मन वह सोच रही थी। वह कर्मा की नज़रों और उसकी आदतों से वाकिफ थी। वह हमेशा उससे बचकर रहती थी, मगर हवेली में काम करते हुए कब तक वह उससे नज़रें चुरा सकती थी? खैर, काम तो करना ही था। चाय तैयार हो गई। उसने एक कप में चाय भरी, ट्रे में रखी, और कर्मा के कमरे की ओर बढ़ गई।

कर्मा अभी भी गहरी नींद में था। वह सिर्फ़ बनियान और निक्कर पहने बिस्तर पर पड़ा था। रजनी ने उसे आवाज़ दी, “लल्ला, उठो! चाय ले लो।” मगर कर्मा पर कोई असर नहीं हुआ। रजनी ने मन में सोचा, “ये लड़का तो घोड़े बेचकर सोता है।” उसने चाय ट्रे में बगल की टेबल पर रख दी और कर्मा के कंधे को हल्के से सहलाकर उसे जगाने की कोशिश की।

कर्मा ने धीरे-धीरे आँखें खोलीं और सामने रजनी को देखा। वह तुरंत सीधा होकर बैठ गया। “उठ गए, लल्ला,” रजनी ने कहा। “लो, चाय पी लो।”

“अभी पी लूँगा, चाची,” कर्मा ने आँखें मसलते हुए कहा।

“ठीक है,” रजनी ने कहा। “जीजी और साहब शहर गए हैं। तुझे जो कुछ खाना हो, बता दे। मैं बना दूँगी।”

“शहर? क्यों?” कर्मा ने पूछा।

“ये तो मुझे भी नहीं पता, लल्ला,” रजनी ने जवाब दिया। “चल, तू चाय पी ले। मैं बाकी काम निपटा लेती हूँ।”

रजनी जैसे ही जाने को मुड़ी, कर्मा ने उसे रोक लिया। “अरे, रुको न, चाची! काम तो होते रहेंगे। थोड़ी देर मेरे पास तो बैठो।”

“अरे, नहीं, लल्ला,” रजनी ने हल्के से कहा। “पहले काम निपटा लूँ, फिर आराम से बातें करेंगे।”

मगर कर्मा कहाँ मानने वाला था? उसने रजनी का हाथ पकड़कर खींच लिया। “अरे, नहीं, चाची! मुझे अकेले अच्छा नहीं लगता।” खींचने की वजह से रजनी का संतुलन बिगड़ा, और वह पीछे की ओर गिरने लगी। कर्मा ने उसे पकड़ लिया और अपनी गोद में बिठा लिया। रजनी का पल्लू सरक गया, और उसका भरा हुआ बदन कर्मा के सामने था। कर्मा ने मौके का फायदा उठाया और तुरंत रजनी के पेट और चूचियों को मसलने लगा।





रजनी हैरान रह गई। “अरे, लल्ला, नहीं! छोड़ो मुझे!” उसने छूटने की कोशिश करते हुए कहा। “लल्ला, ऐसे नहीं करते!”

मगर कर्मा नहीं रुका। वह रजनी के बदन को मसलते हुए उत्तेजित हो रहा था। रजनी ने फिर से जोर लगाया और इस बार धक्का देकर उसकी पकड़ से छूट गई। वह खड़ी हो गई और जल्दी से अपना पल्लू ठीक किया। उसका चेहरा गुस्से और परेशानी से भरा था, मगर वह यह भी जानती थी कि कर्मा के साथ गुस्सा करना उसके लिए ठीक नहीं होगा। हवेली में काम करने की मजबूरी थी।

कर्मा ने बेपरवाही से कहा, “क्या हुआ, चाची? इतना क्या घबरा रही हो? मैं काटूँगा नहीं। आओ, बैठो न।”

रजनी ने खुद को शांत किया। वह कुछ सोचकर कर्मा के बगल में बिस्तर पर बैठ गई। कर्मा ने मुस्कुराते हुए कहा, “ये हुई न बात, चाची। वैसे, एक बात कहूँ?”

“हाँ, बोलो,” रजनी ने थोड़ा संभलते हुए कहा।

“तुम बहुत सुंदर हो, सच में,” कर्मा ने तारीफ भरे लहजे में कहा।

रजनी को उसकी बात सुनकर हँसी आ गई। “हट, लल्ला! मैं और सुंदर?” उसने हँसते हुए कहा। “सुंदर तो तेरी उम्र की लड़कियाँ होती हैं। तेरी दुल्हन होगी सुंदर।”

“मेरा वश चले, तो मैं तुम्हें ही अपनी दुल्हन बना लूँ,” कर्मा ने शरारत भरे लहजे में कहा।

रजनी फिर से मुस्कुरा दी। अपनी तारीफ सुनना हर औरत को अच्छा लगता है, और रजनी भी अपवाद नहीं थी। भले ही वह कर्मा के स्वभाव को जानती थी, मगर अपने बेटे की उम्र के लड़के से तारीफ सुनकर उसे अच्छा लग रहा था। “लल्ला, बातें बहुत बनाते हो तुम,” उसने हँसते हुए कहा।

“अच्छा, तो न करूँ बातें? कुछ और करूँ?” कर्मा ने शरारत से कहा।

“कुछ और क्या?” रजनी ने पूछा।

कर्मा उसकी ओर झुका और अचानक उसके कंधे और गर्दन पर हाथ रखकर अपने होंठ रजनी के होंठों पर रख दिए। रजनी इस बार हैरान नहीं हुई, न ही पीछे हटी। कर्मा को यह देखकर खुशी हुई। वह रजनी के होंठों को चूसने लगा।





रजनी जानती थी कि जो हो रहा है, वह गलत है, मगर वह कर्मा को रोक नहीं रही थी। कर्मा के होंठों का रस पीते हुए वह उसका साथ देने लगी। उसका बदन कर्मा के चुंबन का जवाब देने लगा। अपने से आधी उम्र के लड़के का साथ पाकर उसका बदन उत्तेजित हो रहा था।

कर्मा का चूमने का तरीका रजनी को हैरान कर रहा था। वह उसके होंठों को हल्के से दबाकर, बड़े आराम से चूस रहा था, बिना किसी आक्रामकता के। यह रजनी को बहुत भा रहा था। वह खुद को रोक नहीं पाई और कर्मा का साथ देने लगी। कर्मा का जोश और बढ़ गया। उसने अपनी जीभ रजनी के मुँह में डाल दी। रजनी भी अब पीछे हटने वाली नहीं थी। वह कर्मा की जीभ का जवाब अपनी जीभ से देने लगी। दोनों के बदन एक-दूसरे से सटे थे, और कमरे में एक अजीब सी गर्मी फैल रही थी।

कर्मा के होंठ रजनी के होंठों को चूस रहे थे, और उसकी उंगलियाँ रजनी की साड़ी के पल्लू को धीरे-धीरे नीचे सरका रही थीं। रजनी उत्तेजना के समंदर में डूब चुकी थी। उसका मन, उसका शरीर, सब कर्मा की हरकतों में खो चुके थे।

कर्मा की चालाक उंगलियों ने रजनी के ब्लाउज़ के बटन खोलने शुरू किए। उसकी हर हरकत में एक कुशल कारीगर की तरह निपुणता थी। कुछ ही पलों में ब्लाउज़ रजनी के बदन से अलग होकर बिस्तर पर गिर गया। कर्मा ने होंठों को छोड़ा और रजनी की ओर देखा। रजनी ने जब अपनी स्थिति का अंदाज़ा लगाया, तो उसकी आँखें शर्म और हैरानी से फैल गईं। वह ऊपर से पूरी तरह नंगी थी। उसकी मोटी-मोटी चूचियाँ कर्मा की आँखों के सामने थीं, जो पके हुए आमों की तरह भारी और रसीली थीं। रजनी ने तुरंत अपने हाथों से उन्हें ढक लिया।

कर्मा को रजनी की यह हरकत देखकर हँसी आ गई। उसकी शरारती मुस्कान और गहरी नज़रों ने रजनी को और बेचैन कर दिया। रजनी के हाथ व्यस्त होने का फायदा उठाते हुए कर्मा ने उसकी साड़ी को भी खींच लिया। साड़ी फर्श पर गिर पड़ी, और अब रजनी के बदन पर सिर्फ़ एक पेटीकोट बचा था। उसने अपनी चूचियों को अब भी हाथों से ढके रखा था, मगर कर्मा का इरादा रुकने का नहीं था। उसने एक बार फिर अपने होंठ रजनी के होंठों पर रख दिए और उसे धीरे से बिस्तर पर पीछे की ओर लिटा दिया। वह खुद रजनी के ऊपर आ गया और उसके होंठों को चूसने लगा। कर्मा के हाथ रजनी के नंगे बदन पर फिसल रहे थे, जैसे कोई भूखा शिकारी अपने शिकार का आनंद ले रहा हो।





रजनी की साँसें तेज़ हो रही थीं। कर्मा ने होंठों को चूसते हुए उसके हाथ उसकी चूचियों से हटा दिए और उन्हें अपने मज़बूत हाथों में भर लिया। उसने धीरे-धीरे, मगर ज़ोर से, रजनी की चूचियों को दबाना शुरू किया। रजनी मचल उठी। उसका बदन उत्तेजना की लहरों में डूब रहा था। हर दबाव के साथ उसकी साँसें और भारी हो रही थीं। कर्मा की उंगलियाँ उसकी चूचियों को मसल रही थीं, और रजनी का शरीर जवाब दे रहा था। उसकी सारी मर्यादा, संस्कार, और सही-गलत का बोध इस आनंद के सामने फीका पड़ गया था। कर्मा, जो उसकी बेटे की उम्र का था, उसके बदन को मसल रहा था, चूस रहा था, और रजनी को यह सब अच्छा लग रहा था। उसका मन ग्लानि और उत्तेजना के बीच झूल रहा था, मगर उत्तेजना भारी पड़ रही थी।

कर्मा ने रजनी के होंठों को छोड़ा और उसकी आँखों में देखते हुए बोला, “आह, चाची, बहुत रसीली हो तुम! मज़ा आ गया।” उसकी आवाज़ में वासना और शरारत दोनों थी। वह नीचे सरका और रजनी की गर्दन को चूमने लगा। उसकी जीभ रजनी की नरम त्वचा पर फिसल रही थी, और फिर वह और नीचे गया। उसने रजनी की छाती को चाटा और आखिरकार उसकी एक चूची को अपने मुँह में भर लिया। दूसरी चूची को वह अपने हाथ से दबा रहा था। रजनी के लिए अब खुद को संभालना असंभव हो गया। वह कर्मा के नीचे मचल रही थी, उसका बदन झटके खा रहा था। उसके मुँह से लगातार आहें निकल रही थीं। “आह… लल्ला… आराम से… ओह… ह्म्म… आह… चूसो…” उसकी आवाज़ में आनंद और बेचैनी दोनों थी। उसके हाथ कर्मा के सिर पर चल रहे थे, जैसे वह उसे और करीब खींचना चाहती हो।

कर्मा ने एक चूची को जी भरकर चूसा, फिर दूसरी को मुँह में लिया। वह हर पल रजनी की उत्तेजना को और बढ़ा रहा था। रजनी का बदन अब पूरी तरह कर्मा के हवाले था। चूचियों को चूसने के बाद कर्मा ने उन्हें छोड़ा। रजनी ने शर्म से फिर से अपनी चूचियों को हाथों से ढक लिया, मगर कर्मा ने उस पर ध्यान नहीं दिया। वह और नीचे सरका और रजनी के मखमली पेट को चूमने और चाटने लगा।





उसकी जीभ रजनी की गहरी नाभि के आसपास घूम रही थी। रजनी तड़प उठी। “आह… आह…” उसकी आहें कमरे में गूँज रही थीं। कर्मा का एक हाथ उसके पेट को मसल रहा था, और दूसरा उसके नंगे कंधों और छाती पर फिसल रहा था। रजनी को ऐसा आनंद पहले कभी नहीं मिला था। उसके पति दिलीप ने कभी उसके बदन का इस तरह स्वाद नहीं लिया था। कर्मा जैसे उसके हर अंग को पूज रहा था।

कर्मा ने रजनी की आँखों में देखा। उसकी नज़रों में वासना की चमक थी। “आह, चाची, क्या बदन है तुम्हारा!” उसने वासना भरी आवाज़ में कहा। “इतना स्वादिष्ट! पूरी मलाई हो तुम।” रजनी यह सुनकर अंदर ही अंदर मुस्कुरा दी। उसकी साँसें और तेज़ हो गईं। कर्मा ने अपना हाथ नीचे बढ़ाया और रजनी के पेटीकोट को ऊपर खींचने लगा। रजनी की साँसें और चढ़ गईं। कर्मा ने धीरे-धीरे पेटीकोट को उसकी जाँघों तक चढ़ा दिया और फिर अपने हाथ को उसकी टाँगों के बीच ले गया। उसने रजनी की गरम, बहती हुई चूत को सहलाना शुरू किया। रजनी कर्मा का हाथ अपनी चूत पर महसूस करते ही पागल सी हो गई। “ओह… लल्ला… आह… उम्म… नहीं… आह… कर्मा…” उसकी आहें अब और तेज़ हो रही थीं।

कर्मा ने उसकी आहों को शांत करने के लिए एक बार फिर उसके होंठों को चूसना शुरू किया। वह रजनी की जीभ को अपनी जीभ से लपेट रहा था, उसकी गर्दन को पागलों की तरह चूस रहा था।





रजनी का अनैतिक रिश्ता उसे और उत्तेजित कर रहा था। यह गलत था, मगर यही गलतपन उसे और आनंद दे रहा था। हवेली शांत पड़ी थी। बाहर सोनू अपने काम में व्यस्त था, अनजान कि उसकी माँ और उसका नया दोस्त कर्मा अंदर वासना के खेल में डूबे हुए थे।

कर्मा अब रजनी की टाँगों के बीच जगह ले चुका था। वह उसकी जाँघों को चूमते हुए धीरे-धीरे ऊपर बढ़ रहा था। रजनी का पेटीकोट अब उसकी कमर पर इकट्ठा हो चुका था। कर्मा ने उसकी चूत के आसपास के हिस्से को चाटना और चूमना शुरू किया। रजनी उत्तेजना से पागल हो रही थी। वह अपनी चूचियों को खुद मसल रही थी और आहें भर रही थी। “ओह… कर्मा… आह… लल्ला… ओह… ऐसे ही… आह… खा जा… आह…” उसकी आवाज़ में तड़प थी। कर्मा जानबूझकर उसकी चूत को छेड़ रहा था, उसके आसपास चाट रहा था, ताकि उसकी तड़प और बढ़े। उसका एक हाथ रजनी के नंगे पेट और छाती पर फिसल रहा था, और दूसरा उसकी जाँघों को सहला रहा था।





रजनी ने कभी नहीं सोचा था कि उसके बेटे की उम्र का लड़का उसे ऐसा सुख दे सकता है। उसके पति दिलीप का तरीका हमेशा जल्दबाज़ी भरा था। वह चढ़ता, धक्के लगाता, और अपने आनंद में खोकर हट जाता। रजनी के सुख की उसने कभी परवाह नहीं की। नीलेश ने उसे पहली बार संभोग के सुख से परिचित कराया था, मगर कर्मा उसे उस सुख के समंदर में डुबकी लगवा रहा था। उसका पूरा बदन वासना के पानी में तर हो चुका था।

जैसे ही कर्मा ने अपनी जीभ रजनी की चूत पर फिराई, रजनी का बदन पूरा ऐंठ गया। उसकी साँसें रुक सी गईं, और अगले ही पल वह स्खलित हो गई। उसका शरीर काँप रहा था, और वह बिस्तर पर बुरी तरह हाँफने लगी। कर्मा ने उसकी टाँगों के बीच से सिर निकाला और सीधा होकर अपने कपड़े उतारने लगा। कुछ ही पलों में वह पूरी तरह नंगा हो गया। उसका मोटा, लंबा लंड फनफनाता हुआ रजनी की चूत की ओर देख रहा था। कर्मा से अब रुका नहीं जा रहा था। उसने रजनी की टाँगों के बीच फिर से जगह ली। रजनी अभी भी आँखें बंद करके अपनी साँसों को नियंत्रित करने की कोशिश कर रही थी।

कर्मा ने अपने लंड को रजनी की चूत के द्वार पर रखा और एक धक्के के साथ उसे अंदर सरका दिया। रजनी की आँखें झटके से खुल गईं, और उसका मुँह आनंद और हैरानी से खुला रह गया। “आह… लल्ला… ओह… ये क्या… आह…” उसकी आवाज़ काँप रही थी।

“बहुत गरम चूत है तुम्हारी, चाची,” कर्मा ने वासना भरी आवाज़ में कहा। “आह, अब रुका नहीं जाता।” उसने एक-दो धक्के और लगाए और अपना लंड जड़ तक रजनी की चूत में घुसा दिया। रजनी की चूत कर्मा के मोटे लंड से पूरी तरह भर गई थी। उसका बदन जैसे बिजली के झटके खा रहा था। कर्मा ने रजनी की चूचियों को थाम लिया और धक्के लगाना शुरू कर दिया। वह उसकी चूचियों को मसलते हुए उसे चोदने लगा।

रजनी कर्मा के हर धक्के को अपनी चूत में महसूस कर रही थी। उसका शरीर आनंद की लहरों में डूब रहा था। “आह… लल्ला… आह… ऐसे ही…” वह आहें भर रही थी। कर्मा की गति बढ़ रही थी, और उसकी उंगलियाँ रजनी की चूचियों को मसल रही थीं।





“ओह… आह… चाची, कितना मज़ा आ रहा है तुम्हारी चूत में,” कर्मा ने उत्तेजित होकर कहा। “आह, कितनी कसी हुई है।”

“आह… लल्ला… ऐसे ही… मुझे भी… आह…” रजनी ने जवाब दिया। वह अब सारी शर्म और झिझक भूल चुकी थी। वह बस उस आनंद में डूब रही थी।

कर्मा ने और जोश में कहा, “आह, चाची, तुम्हें भी मज़ा आ रहा है, आह… बोलो?”

“ओह… आह… हाँ, लल्ला… ओह… कर्मा, मुझे भी मज़ा आ रहा है,” रजनी ने काँपती आवाज़ में कहा।

“तो खुलकर बोलो न, चाची,” कर्मा ने उसे उकसाया। “आह, बोलो तुम्हें चुदाई में मज़ा आ रहा है। अपनी चूत में मेरा लंड लेकर मज़ा आ रहा है।”

रजनी ने बिना रुके कहा, “हाँ… आह… लल्ला, मज़ा आ रहा है… इसमें…”

कर्मा ने अचानक खुद को रोका और अपना लंड रजनी की चूत से बाहर निकाल लिया। रजनी को अपनी चूत का खाली होना बिल्कुल अच्छा नहीं लगा। “आह… लल्ला, नहीं… डालो अंदर…” उसने तड़पते हुए कहा।

कर्मा सोफे पर टिककर बैठ गया और शरारती मुस्कान के साथ बोला, “चाची, लंड चाहिए, तो खुलकर बोलो और आओ, ले लो।”

रजनी जानती थी कि कर्मा उसे अपनी ताकत दिखा रहा है, मगर उसकी चूत में उठ रही आग उसे बेचैन कर रही थी। वह एक पल के लिए सकुचाई, फिर बोली, “हाँ, लल्ला… मुझे दे दो… अपना… वो… लंड…” वह कर्मा के पास आई।

“अपनी किसमें लोगी, चाची?” कर्मा ने छेड़ते हुए पूछा।

रजनी थोड़ा शरमाई, मगर बोली, “अपनी… वो… अपनी चूत में…”

कर्मा ने उसे अपने ऊपर आने का इशारा किया। रजनी तुरंत उसके ऊपर आ गई और उसकी ओर पीठ करके नीचे बैठी। कर्मा का लंड एक बार फिर उसकी चूत में समा गया। दोनों के मुँह से एक साथ आह निकली। रजनी ने धीरे-धीरे खुद को कर्मा के लंड पर उछालना शुरू किया। कर्मा ने उसकी चूचियों को पकड़ लिया और उसे अपने लंड पर उछालने में मदद करने लगा।





“ओह… चाची… आह… ऐसे ही… आह… ऐसे ही…” कर्मा ने उत्तेजित होकर कहा।

“आह… आह… लल्ला… कितना मोटा है…” रजनी ने तड़पते हुए जवाब दिया।

“तुम्हारी चूत भी बड़ी कसी हुई है, आह… चाची,” कर्मा ने कहा। “लगता है, चुदाई नहीं हुई तुम्हारी ठीक से।”

“हाँ… आह… लल्ला, तेरा चाचा तो शराबी है,” रजनी ने हाँफते हुए कहा। “वो बस दो-चार धक्के लगाकर हट जाता था।”

“हाँ, चाची, पर तुम्हारे जैसे बदन वाली को तो अच्छे से, मज़े से, मसल-मसलकर चोदना चाहिए,” कर्मा ने जोश में कहा।

“हाँ… लल्ला… जैसे तू चोद रहा है… आह… ऐसे ही…” रजनी ने जवाब दिया।

“आह, चाची, और गंदी बातें करो न,” कर्मा ने उकसाया। “अपने अंदर की गर्मी और गंदगी को बाहर निकालो।”

रजनी, जिसे कर्मा के साथ इतना मज़ा आ रहा था, अब किसी बात से मना नहीं कर सकती थी। “आह… लल्ला… ओह… चोद… अपनी चाची की प्यासी चूत को… आह… कबसे प्यासी थी ये मोटे लंड के लिए… आह… ऐसे ही भर दे…” उसकी आवाज़ में तड़प और वासना दोनों थी।

कर्मा ने और जोश में कहा, “आह, चाची, तुमने पापा से भी चुदवाया है न? आह, कैसा लग रहा है बाप के बाद बेटे से चुदवाने में?”

रजनी यह सुनकर और उत्तेजित हो गई। यह अनैतिक रिश्ता, यह गलतपन, उसे और आनंद दे रहा था। उसने बाप और बेटे, दोनों के लंड अपनी चूत में लिए थे। “हाँ… लल्ला… आह… पहले बाप और अब बेटा मुझे चोद रहा है… आह… और मैं दोनों के ही लंड को अपनी प्यासी चूत में समा रही हूँ…” उसने तड़पते हुए कहा।

“मज़ा आ रहा है तुम्हें, चाची?” कर्मा ने पूछा। “अब रोज़ चुदोगी न?”

“हाँ… लल्ला… बहुत मज़ा… अब तो जब तू बोलेगा, तब चोदूँगी…” रजनी ने हाँफते हुए जवाब दिया।

कर्मा उसकी बातें सुनकर और उत्तेजित हो गया। उसने रजनी को सीधा किया और खुद सोफे से पैर लटकाकर बैठ गया। रजनी को उसने अपनी कमर से थाम लिया और उसे अपने लंड पर उछालना शुरू किया। रजनी को इस आसन में खुलकर उछलने की आज़ादी मिली। उसकी चूचियाँ हर झटके के साथ नाच रही थीं। उसका पूरा बदन लहर मार रहा था। कर्मा उसे अपनी कमर से थामकर ज़ोर-ज़ोर से उछाल रहा था, और उसका लंड रजनी की चूत में जड़ तक जा रहा था।





दोनों की उत्तेजना अपने चरम पर थी। रजनी का शरीर काँपने लगा। वह फिर से स्खलित होने वाली थी। कर्मा भी अब खुद को रोक नहीं पा रहा था। उसका लंड रजनी की चूत में पिचकारी मारने लगा, और उसने रजनी की चूत को अपने रस से भर दिया। दोनों पीछे की ओर लेट गए, बुरी तरह हाँफते हुए। उनकी साँसें कमरे में गूँज रही थीं। रजनी का बदन पसीने और आनंद में तर था, और कर्मा की आँखों में संतुष्टि की चमक थी। दोनों अपनी साँसों को नियंत्रित करने की कोशिश कर रहे थे।

रजनी का मन अभी भी उत्तेजना और ग्लानि के बीच झूल रहा था। उसने जो किया, वह गलत था, मगर उस आनंद ने उसे पूरी तरह जकड़ लिया था। कर्मा ने उसे एक ऐसी दुनिया दिखाई थी, जहाँ सिर्फ़ शारीरिक सुख ही मायने रखता था। दूसरी ओर, कर्मा के लिए यह एक और जीत थी। उसकी वासना और चालाकी ने रजनी को पूरी तरह अपने कब्जे में कर लिया था।



जारी रहेगी
 
रजनी का मन अभी भी उत्तेजना और ग्लानि के बीच झूल रहा था। उसने जो किया, वह गलत था, मगर उस आनंद ने उसे पूरी तरह जकड़ लिया था। कर्मा ने उसे एक ऐसी दुनिया दिखाई थी, जहाँ सिर्फ़ शारीरिक सुख ही मायने रखता था। दूसरी ओर, कर्मा के लिए यह एक और जीत थी। उसकी वासना और चालाकी ने रजनी को पूरी तरह अपने कब्जे में कर लिया था।

बारहवाँ अध्याय


रजनी कर्मा की बाहों में लेटी थी, दोनों अभी भी नंगे थे। कर्मा के हाथ में एक किताब थी, जिसमें चुदाई के अलग-अलग आसनों और कामुक क्रियाओं की तस्वीरें थीं। रजनी की आँखें आश्चर्य से फैली हुई थीं। “हाय दईया, ये सब भी होता है?” उसने हैरानी भरे लहजे में कहा।

“और क्या, चाची? और बहुत मज़ा भी आता है, करके देखो,” कर्मा ने शरारती मुस्कान के साथ जवाब दिया, किताब की तस्वीरों को और करीब से दिखाते हुए।

“अच्छा, बोल तो ऐसे रहे हो जैसे सब किया हो तुमने,” रजनी ने हँसते हुए तंज कसा।

“किया नहीं है, पर कर तो सकता हूँ—तुम्हारे साथ,” कर्मा ने आँख मारते हुए कहा।

“धत्त, बदमाश!” रजनी ने हँसते हुए कहा, मगर उसकी आँखों में शरारत और उत्तेजना की चमक थी।

कर्मा ने रजनी को अपने लंड की ओर धकेलते हुए कहा, “चाची, करो ना, लो ना अपने मुँह में।”

रजनी ने कर्मा की आँखों में देखा, थोड़ा शरमाते हुए बोली, “छी, ये मुँह में लेने वाली चीज़ थोड़े ही है!”

“अच्छा, एक बार लेकर देखो,” कर्मा ने उकसाया। “अगर अच्छा न लगे, तो मत करना।”

“बस एक बार?” रजनी ने संकोच भरे लहजे में पूछा।

“हाँ, पक्का,” कर्मा ने मुस्कुराते हुए कहा। “पर अगर अच्छा लगे, तो रुकना भी मत।”

रजनी ने हल्की सी मुस्कान के साथ कर्मा की ओर देखा। वह कर्मा की बेपरवाह और खिलंदड़ी बातों में खो चुकी थी। कर्मा का व्यवहार उसे किसी तरह का दबाव नहीं देता था; वह उसके साथ खेलता था, बराबरी का व्यवहार करता था। रजनी को लगता था जैसे वह फिर से एक जवान, कुंवारी लड़की बन गई हो। शायद यही वजह थी कि वह कर्मा को कुछ भी मना नहीं कर पाती थी। दूसरी बात, उसकी उत्तेजना अब अपने चरम पर थी। नीलेश और फिर सरोज-बिमला के साथ के अनुभवों ने उसे अपने बदन के सुख से परिचित करा दिया था। अब वह उस सुख का पूरा आनंद लेना चाहती थी। सही-गलत, समाज, मर्यादा—ये सब अब उसके लिए फीके पड़ चुके थे। जब तक उसने इनकी परवाह की थी, उसे सिर्फ़ दुख और दुत्कार मिली थी। मगर जब से उसने अपने बदन की सुनना शुरू किया, उसे सुख ही सुख मिल रहा था। उसकी परेशानियाँ जैसे गायब हो गई थीं।

रजनी ने अपना सिर झुकाया और कर्मा के लंड पर अपने होंठ टिका दिए। कर्मा उस गर्म, मुलायम स्पर्श से मचल उठा। “आह… चाची… ओह… अहम्म…” उसकी आहें कमरे में गूँज उठीं। रजनी को यह ताकत अच्छी लग रही थी—वह अपने होंठों से एक मर्द को, या यों कहें, अपने बेटे की उम्र के लड़के को तड़पा सकती थी। वह उसके साथ खेल सकती थी। उसने थोड़ा और मुँह खोला और कर्मा के लंड के टोपे को अपने मुँह में भर लिया। उसका कड़क, गर्म अहसास और हल्का सा नमकीन स्वाद पहले तो रजनी को अजीब लगा। मगर कुछ पल बाद उसे यह उतना बुरा भी नहीं लगा। उसने लंड को मुँह से निकाला और कर्मा की ओर देखा।

“क्या हुआ, चाची? अच्छा नहीं लगा?” कर्मा ने पूछा, उसकी आँखों में शरारत थी।

“थोड़ा अलग सा है,” रजनी ने कहा। “पर इतना बुरा भी नहीं।”

“तो वापस लो न,” कर्मा ने उकसाया।

“कितना बेसब्र है तू, लल्ला,” रजनी ने हँसते हुए कहा। उसने फिर से लंड को मुँह में लिया और चूसना शुरू किया। धीरे-धीरे वह अभ्यस्त हो गई। पहले वह हल्के से चूसती, फिर निकाल लेती।





हर बार वह थोड़ा और गहराई तक लेने लगी। कर्मा आहें भर रहा था। “आह… चाची… ओह…” उसकी सिसकियाँ रजनी को और उत्तेजित कर रही थीं। वह अब पूरी लगन से कर्मा का लंड चूस रही थी, उसका आधे से ज़्यादा लंड उसके मुँह में समा रहा था। कर्मा का बदन मचल रहा था। उसने रजनी का सिर पकड़ लिया और उसे अपने लंड पर दबा दिया। अगले ही पल वह गुर्राते हुए झड़ने लगा। एक के बाद एक पिचकारी रजनी के मुँह में भरने लगी। रजनी, जिसका मुँह दबा हुआ था, के पास कोई चारा नहीं था। उसने कर्मा का रस गटक लिया। उसे उसकी गंध और स्वाद बुरा नहीं लगा, बल्कि यह उसे और उत्तेजित कर गया।

झड़ने के बाद कर्मा ने रजनी का सिर छोड़ा। रजनी ने लंड निकाला और हाँफते हुए पीछे हट गई। दोनों बिस्तर पर लेटे, हाँफते हुए एक-दूसरे के बगल में। कुछ देर बाद रजनी उठी और अपने कपड़े पहनने लगी।

“अभी से जा रही हो?” कर्मा ने पूछा, उसकी आवाज़ में शरारत अब भी बाकी थी।

“हाँ, और अब तू भी उठ। नहा ले, बदन पसीने से महक रहा है,” रजनी ने हल्के से डाँटते हुए कहा। उसने कपड़े पहने और कमरे से बाहर निकल गई। कर्मा लेटा रहा, चेहरे पर संतुष्टि की मुस्कान लिए। फिर वह उठा और नहाने चला गया।

---

**कम्मू का घर**

सुबह की पहली किरण के साथ कम्मू की आँखें खुलीं। उसे रात का दृश्य सता रहा था—उसके माँ-पापा की चुदाई, और फिर उसकी माँ के नंगे बदन को याद करके उसने जो किया। ग्लानि उसके मन को खाए जा रही थी। “हाय, मैंने अपनी माँ को सोचकर हिलाया। ये कितना बड़ा पाप है!” वह खुद को कोस रहा था। मगर उसकी आँखों के सामने अब भी वही दृश्य था—सुमन का भरा हुआ बदन, उसकी मोटी-मोटी चूचियाँ, गहरी नाभि, और रसीली चूत। वह खुद को समझाने की कोशिश करता हुआ उठा और सुबह के काम निपटाने लगा।

आज का दिन बादलों से घिरा हुआ था। फूल सिंह के घर में चहल-पहल थी। अजीत और कुसुम शहर जा रहे थे, धीरज की शादी के लिए कपड़े और दूसरा सामान लेने। फूल सिंह सुबह-सुबह खेतों की ओर निकल चुके थे। उन्हें शहर जाना और खरीदारी करना पसंद नहीं था, इसलिए सारी ज़िम्मेदारी अजीत पर थी। सुमन, अनामिका, और अंजू को घर की दीवारें पोतने का काम था। धीरज, जतन, और कम्मू को बारिश से पहले उपले और भूसा झोपड़ी में रखने का काम मिला था। कुल मिलाकर, सबके पास कोई न कोई काम था।

सज्जनपुर से करीब तीन किलोमीटर पैदल चलने के बाद मुख्य सड़क आती थी, जहाँ से शहर के लिए बस मिलती थी। सज्जनपुर और सड़क के बीच सिर्फ़ खेत और जंगल थे। अजीत और कुसुम सुबह जल्दी निकल पड़े। कुसुम ने लाल साड़ी पहनी थी, जो उसके भरे हुए बदन को और निखार रही थी। अजीत ने नीला कुरता-पायजामा पहना था, और कंधे पर गमछा डाला हुआ था।

“इस लाल साड़ी में तो बिल्कुल लाल परी लग रही हो, भाभी,” अजीत ने गाँव से बाहर निकलते ही मज़ाक में छेड़ा।

“तुम भी इस नीले कुरते में नीले कबूतर लग रहे हो, देवर जी,” कुसुम ने हँसते हुए जवाब दिया।

दोनों मज़ाक करते हुए चल रहे थे। करीब डेढ़ किलोमीटर चले होंगे कि अचानक बादल गरजने लगे, और बारिश शुरू हो गई। “धत्त, तेरी की! लो, हो गई खरीदारी!” कुसुम ने झल्लाते हुए कहा।

“अरे, भाभी, उधर जंगल में चलो,” अजीत ने कहा। “पेड़ों के नीचे थोड़ा बच जाएँगे।”

“हाँ, यहाँ तो तुरंत भीग जाएँगे,” कुसुम ने सहमति जताई।

दोनों रास्ते से हटकर जंगल की ओर बढ़ गए। वे घने पेड़ों की तलाश में थे, मगर बारिश तेज़ थी। जंगल में घुसने के बावजूद वे ज़्यादा देर नहीं बच पाए। दोनों पूरी तरह भीग चुके थे। कुसुम की साड़ी उसके बदन से चिपक गई थी, और उसका भरा हुआ बदन अब और उभर रहा था। उसका ब्लाउज़ उसकी मोटी चूचियों को तान रहा था, और गीली साड़ी उसकी गहरी नाभि और मांसल पेट को उघाड़ रही थी। अजीत का कुरता भी भीगकर चिपक गया था, और वह बार-बार अपनी भाभी की ओर देख रहा था।





वे एक घने पेड़ के नीचे खड़े हो गए, मगर बारिश की बूँदें अब भी उनकी देह को भिगो रही थीं। कुसुम ने अपनी साड़ी निचोड़ी और हँसते हुए कहा, “हाय, अब तो सारा मज़ा खराब हो गया।”

अजीत ने उसकी ओर देखा। उसकी नज़रें कुसुम के गीले बदन पर टिक गईं। “अरे, भाभी, मज़ा तो अब शुरू हुआ है,” उसने शरारत भरे लहजे में कहा।

कुसुम ने उसकी ओर देखा और हँस पड़ी। “तूम भी न, देवर जी, मौके का फायदा उठाने से चूकते नहीं।”

दोनों हँसते हुए पेड़ के नीचे खड़े थे, मगर बारिश की ठंडक और उनके भीगे हुए बदनों ने माहौल को एक नई गर्मी दे दी थी।

कुसुम की लाल साड़ी उसके बदन से चिपककर उसकी मोटी चूचियों, गहरी नाभि, और भरे हुए चूतड़ों को और उभार रही थी। अजीत का नीला कुरता भीगकर उसकी देह से लिपट गया था, और उसकी आँखों में वासना की चमक साफ़ झलक रही थी। दोनों के बीच मज़ाकिया छेड़छाड़ अब एक अलग ही रंग ले रही थी।

“वैसे, भाभी, इस बारिश में तुम्हें कुछ करने का मन नहीं कर रहा?” अजीत ने शरारत भरे लहजे में पूछा, अपनी नज़रें कुसुम के गीले बदन पर टिकाते हुए।

“कर रहा है न, घर जाने का मन कर रहा है,” कुसुम ने हँसते हुए जवाब दिया, अपनी साड़ी निचोड़ते हुए।

“अरे, ऐसी बारिश में घर जाने का क्या मतलब?” अजीत ने पास आते हुए कहा। “ऐसी बारिश तो आग शांत करने के लिए होती है।”

“अच्छा, इतना भीग गए, फिर कौन सी आग है जो बुझी नहीं तुम्हारी?” कुसुम ने भौंहें चढ़ाकर, मज़ाक में तंज कसा।

“अंदर की आग है, भाभी,” अजीत ने अपनी आवाज़ को और गहरा करते हुए कहा।

“अंदर की कौन सी? खुलकर बताओ,” कुसुम ने शरारत से पूछा, उसकी आँखों में भी अब एक चमक थी।

“अरे, भाभी, बनो मत। तुम सब जानती हो,” अजीत ने हँसते हुए कहा।

“नहीं तो, मैं कुछ नहीं जानती। तुम ही बताओ,” कुसुम ने मासूमियत का नाटक करते हुए कहा।

“क्यों, भैया ने कभी आग नहीं बुझाई तुम्हारी, बारिश में भीगते हुए?” अजीत ने और पास आते हुए पूछा।

“अरे, वो और बारिश में भीगेंगे, वो भी मेरे साथ?” कुसुम ने हँसते हुए जवाब दिया। “तुम अपने भैया को नहीं जानते क्या?”

“जानता हूँ, पर बदन की आग कुछ भी करवा सकती है,” अजीत ने अपनी नज़रें कुसुम की चूचियों पर टिकाते हुए कहा।

“लगता है, बहुत जोर की आग है तुम्हारे अंदर, देवर जी,” कुसुम ने छेड़ते हुए कहा। “बुझा क्यों नहीं लेते?”

“बुझा तो लूँ, पर तुम हाँ ही नहीं कहती,” अजीत ने शरारती मुस्कान के साथ जवाब दिया।

“अरे, आग तुम्हारी है, इसमें मैं क्या हाँ-ना कहूँ? बुझा लो,” कुसुम ने हँसते हुए कहा।

“पक्का?” अजीत ने उसकी आँखों में देखते हुए पूछा।

“हाँ, पक्का,” कुसुम ने बेपरवाही से कहा, मगर उसकी आवाज़ में एक हल्की सी काँप थी।

अजीत ने कुसुम की ओर देखा, और फिर उसके चेहरे को दोनों हाथों से पकड़कर अपने होंठ उसके होंठों से मिला दिए। कुसुम एक पल के लिए हैरान रह गई। उसे लगा था कि यह सिर्फ़ मज़ाक था, जैसा वह और अजीत अक्सर करते थे। मगर आज पहली बार उसके देवर ने हद पार कर दी थी। बारिश का मौसम, उनके भीगे हुए बदन, या कुसुम के अंदर की उत्तेजना—कुछ तो था, जिसने उसे अजीत का साथ देने के लिए मजबूर कर दिया। वह धीरे-धीरे अजीत के होंठों का जवाब देने लगी।





दोनों कुछ देर तक एक-दूसरे के होंठों को चूमते रहे। जब उनके होंठ अलग हुए, तो कुसुम को शर्मिंदगी महसूस हुई। उसने नज़रें दूसरी ओर कर लीं।

अजीत अभी भी अपनी भाभी को देख रहा था। बारिश की बूँदें उसके बदन को और उत्तेजित कर रही थीं। उसने अपना हाथ आगे बढ़ाया और कुसुम की साड़ी का पल्लू नीचे सरका दिया। कुसुम का मखमली पेट और गहरी नाभि अब अजीत की आँखों के सामने थी। कुसुम आँखें नीचे किए खड़ी रही, उसका चेहरा शर्म और उत्तेजना से लाल था। अजीत ने अपना हाथ आगे बढ़ाया और कुसुम के पेट पर रख दिया। कुसुम के बदन में जैसे बिजली सी दौड़ गई। उसकी साँसें तेज़ हो गईं। अजीत ने फिर से अपने होंठ कुसुम के होंठों से मिला दिए और उसके पेट को सहलाने लगा।





कुसुम इस आनंद में इतनी खो गई कि उसे होश तब आया, जब वह अजीत की गोद में थी। उसकी साड़ी और ब्लाउज़ बदन से अलग पेड़ के नीचे पड़े थे। वह अब सिर्फ़ पेटीकोट और ब्रा में थी। वह कुछ सोच पाती, इससे पहले अजीत ने फिर से अपने होंठ उसके होंठों पर रख दिए।





कुसुम की शर्म अब धीरे-धीरे उत्तेजना में बदल रही थी। अजीत ने उसकी ब्रा को खींचकर उतार दिया, और कुसुम की मोटी-मोटी चूचियाँ अब पूरी तरह नंगी थीं। बारिश की बूँदें उन पर टपक रही थीं, जिससे वे और चमक रही थीं। अजीत ने कुसुम की चूचियों को अपने हाथों में लिया और उन्हें मसलने लगा। “आह… भाभी… क्या मस्त चूचियाँ हैं तुम्हारी,” उसने वासना भरी आवाज़ में कहा। “इनका रस तो मैं कबसे चखना चाहता था।”

कुसुम ने हल्के से विरोध किया। “अरे… देवर जी… नहीं… ये गलत है…” उसकी आवाज़ में शर्म थी, मगर उसका बदन अजीत के स्पर्श का जवाब दे रहा था।

“गलत क्या, भाभी?” अजीत ने उसकी चूचियों को और ज़ोर से दबाते हुए कहा। “जब बदन मज़ा ले रहा है, तो गलत क्या? बोलो, मज़ा नहीं आ रहा तुम्हें?”

कुसम शरमाते हुए चुप रही, मगर उसकी साँसें तेज़ थीं। अजीत ने उसका पेटीकोट ऊपर खींचा और उसे कमर तक इकट्ठा कर दिया। कुसुम की चूत अब बारिश में भीगकर और रसीली हो गई थी। अजीत ने अपनी उंगलियाँ उसकी चूत पर फेरनी शुरू कीं। “आह… भाभी… कितनी गीली है तुम्हारी चूत… ये तो मुझसे मिलने को तड़प रही है,” उसने कहा।

“अरे… नहीं… अजीत… छोड़ो…” कुसुम ने हल्के से कहा, मगर उसका विरोध अब कमज़ोर पड़ रहा था। उसका बदन अजीत के स्पर्श में पिघल रहा था।

अजीत ने कुसुम को पेड़ के तने से टिका दिया और अपनी धोती खोल दी। उसका मोटा, कड़क लंड बारिश में चमक रहा था। “देखो, भाभी, ये कितना तड़प रहा है तुम्हारी चूत के लिए,” उसने वासना भरे लहजे में कहा। उसने कुसुम की टाँगें फैलाईं और अपने लंड को उसकी चूत के द्वार पर रखा। कुसुम ने एक आखिरी बार शरमाते हुए कहा, “अजीत… नहीं… ये ठीक नहीं…”

मगर अजीत ने उसकी बात अनसुनी कर दी। उसने एक ज़ोरदार धक्का मारा, और उसका लंड कुसुम की चूत में जड़ तक समा गया। कुसुम की चीख निकल गई। “आह… अजीत… ओह…” उसकी साँसें काँप रही थीं। अजीत ने उसकी कमर थाम ली और धक्के लगाना शुरू कर दिया। “आह… भाभी… कितनी कसी हुई चूत है तुम्हारी… आह… मज़ा आ रहा है… बोलो, तुम्हें भी मज़ा आ रहा है न?” उसने गंदी बातें करते हुए कहा।





कुसुम की शुरुआती शर्म अब पूरी तरह टूट चुकी थी। वह अजीत के धक्कों का जवाब अपनी कमर हिलाकर दे रही थी। “आह… हाँ… अजीत… आह… मज़ा आ रहा है…” उसने हाँफते हुए कहा। उसका बदन बारिश और वासना में तर था। अजीत ने उसकी चूचियों को मसलते हुए और ज़ोर से धक्के लगाए। “आह… भाभी… तुम्हारी चूत को तो मैं रोज़ चोदना चाहता हूँ… आह… कितना रस है इसमें…” वह गुर्राते हुए बोला।

“आह… अजीत… चोदो… और ज़ोर से… आह… मेरी चूत को भर दो…” कुसुम ने भी अब खुलकर गंदी बातें शुरू कर दीं। उसकी सारी शर्म, सारी मर्यादा बारिश के पानी के साथ बह चुकी थी। वह अजीत के लंड के हर धक्के का आनंद ले रही थी।

अजीत ने कुसुम को ज़मीन पर लिटा दिया और उसकी टाँगें अपने कंधों पर रख लीं। उसने और तेज़ी से धक्के लगाना शुरू किया। “आह… भाभी… तुम्हारी चूचियाँ देख… कैसे नाच रही हैं… आह… साली, तू तो पूरी मलाई है…” उसने कहा। कुसुम की चूचियाँ हर धक्के के साथ उछल रही थीं, और उसका मखमली पेट बारिश में चमक रहा था।

“आह… अजीत… और ज़ोर से… आह… मेरी चूत को फाड़ दो…” कुसुम ने तड़पते हुए कहा। उसका बदन अब पूरी तरह अजीत के हवाले था। बारिश की बूँदें उनके नंगे बदनों पर टपक रही थीं, और जंगल का सन्नाटा उनकी आहों और सिसकियों से गूँज रहा था।

अजीत ने कुसुम की चूत में अपने लंड को और ज़ोर से ठूँसा। “आह… भाभी… तुम्हारा बदन तो स्वर्ग है… आह… अब रोज़ चोदूँगा…” उसने गुर्राते हुए कहा। कुसुम की साँसें तेज़ हो रही थीं। उसका बदन काँपने लगा, और वह स्खलित होने वाली थी। “आह… अजीत… मैं… आह… मैं जा रही हूँ…” उसने चीखते हुए कहा। उसी पल अजीत भी अपने चरम पर था। उसने एक आखिरी धक्का मारा, और उसका लंड कुसुम की चूत में पिचकारी मारने लगा। दोनों एक साथ स्खलित हो गए।

वे ज़मीन पर लेट गए, बारिश में भीगे हुए, हाँफते हुए। कुसुम की साँसें अभी भी तेज़ थीं। उसका मन ग्लानि और आनंद के बीच झूल रहा था। यह गलत था, मगर इस सुख ने उसे पूरी तरह जकड़ लिया था। अजीत ने कुसुम की ओर देखा और मुस्कुराया। “क्या बात है, भाभी… ये बारिश तो सचमुच आग बुझाने वाली थी।”

कुसुम ने शरमाते हुए उसकी ओर देखा और हल्की सी मुस्कान के साथ अपनी साड़ी उठाकर पहनने लगी। बारिश अब धीमी पड़ रही थी, मगर उनके बदनों की गर्मी अभी बाकी थी। पर गर्मी के साथ साथ अभी जो हुआ उसकी ग्लानि के बादल भी छाने लगे थे।

हवेली के बाहर सोनू का मन काम में नहीं लग रहा था। बारिश की वजह से काम कम था, मगर उसका दिमाग कहीं और था। हलवाइन की मोटी चूचियाँ, लाली की थिरकती कमर, और कभी-कभी कम्मू की माँ सुमन और ताई कुस के भरे हुए बदन उसके मन में कौंध रहे थे। कर्मा ने उसके मन में यह बीज बो दिया था, और अब वह इन खयालों से परेशान था। वह सोच रहा था कि इन विचारों का क्या करे। उसे लगा कि अगर कोई उसकी मदद कर सकता है, तो वह कर्मा ही है। वह बेसब्री से कर्मा के बाहर आने का इंतज़ार कर रहा था।

जल्द ही कर्मा हवेली से बाहर निकला। सोनू उसे देखते ही खुश हो गया। “अरे, कर्मा भैया, आज बड़ी देर लगा दी अंदर!”

कर्मा ने सोनू को मुस्कुराकर देखा और मन ही मन सोचा, “अगर तुझे पता होता कि मैं अंदर क्या कर रहा था, तो ये सवाल नहीं पूछता।” उसने बेपरवाही से कहा, “अरे, हाँ, थोड़ा देर से उठा। तू बता, काम हो गया?”

“बारिश की वजह से काम ही नहीं है कुछ,” सोनू ने जवाब दिया।

“हाँ, ये तो है,” कर्मा ने कहा।

सोनू ने सकुचाते हुए कहा, “मुझे कुछ बात करनी थी।”

“हाँ, बोल न, इतना शरमा क्या रहा है?” कर्मा ने हँसते हुए कहा।

सोनू ने हिम्मत जुटाकर अपने खयालों के बारे में बताया। कर्मा ने हँसते हुए कहा, “लड़का बड़ा हो रहा है। ये तो होगा ही, और होना भी चाहिए।”

“पर, भैया, मुझे लगता है मैं गलत कर रहा हूँ,” सोनू ने उदास लहजे में कहा।

“अरे, इसमें गलत क्या है?” कर्मा ने बेपरवाही से कहा। “जवान है, लंड तो खड़ा होगा ही। तू बता, भूख लगती है तो क्या करता है?”

“खाना खाता हूँ,” सोनू ने जवाब दिया।

“वैसे ही, जैसे वो पेट की भूख है, ये बदन की भूख है,” कर्मा ने समझाया। “जब पेट की भूख गलत नहीं, तो बदन की गलत कैसे हो सकती है?”

“हाँ, ये भी है,” सोनू ने कर्मा की बातों से प्रभावित होकर कहा।

“तभी तो कहता हूँ, खुलकर मज़े ले,” कर्मा ने कहा। “सही-गलत के चक्कर में रहा, तो हाथ मलता रह जाएगा।”

“पर कभी-कभी किसी ऐसे के लिए भी गलत खयाल आ जाते हैं, जिसके लिए नहीं आने चाहिए,” सोनू ने संकोच से कहा। “फिर ग्लानि होती है।”

“अरे, ग्लानि कैसी?” कर्मा ने हँसते हुए कहा। “तुझे भूख लगी है और खाना सामने है, तो खाने का मन करेगा ही। अब ये थोड़े सोचेगा कि खाना किसी और का है, इसके बारे में नहीं सोचना चाहिए।”

“फिर क्या करना चाहिए?” सोनू ने पूछा।

“झिझक खत्म कर,” कर्मा ने कहा। “जिसके बारे में चाहे, सोच। हिला। और मौका मिले, तो चोदने से भी पीछे मत रह।”

“पर अगर उनके और मेरे बीच ऐसा रिश्ता हो, जिसमें ये सब गलत हो या पाप हो?” सोनू ने चिंता से पूछा।

“देख, लंड और चूत का रिश्ता सिर्फ़ एक ही होता है—चुदाई का,” कर्मा ने बेपरवाही से कहा। “बाकी सारे रिश्ते समाज के बनाए हुए हैं। अगर किसी को देखकर लंड खड़ा हो रहा है, तो उसे चोदने में कोई बुराई नहीं।”

कर्मा की बातें सोनू के दिमाग पर गहरा असर कर रही थीं। “वैसे, बता तो, किसके बारे में सोच रहा था?” कर्मा ने पूछा।

“कई सारे लोगों के,” सोनू ने शरमाते हुए कहा।

“कौन-कौन?” कर्मा ने उत्साह से पूछा।

“हलवाइन, लाली… और…” सोनू रुक गया।

“और?” कर्मा ने छेड़ते हुए पूछा।

सोनू थोड़ा सोच में पड़ गया। कर्मा ने हँसकर कहा, “इतना सोच में रहेगा, तो कैसे मज़े ले पाएगा?”

सोनू ने हिम्मत जुटाकर कहा, “सुमन और कुसum चाची के बारे में।”

कर्मा की आँखें खुशी से चमक उठीं। “अरे, वाह! कम्मू की माँ और ताई? वैसे, इसमें गलत क्या है? दोनों तो एक से बढ़कर एक हैं।”

“कुछ गलत नहीं है? दोस्त की माँ के बारे में सोचना?” सोनू ने संकोच से पूछा।

“क्या तुझे यकीन है कि वो तेरी माँ के बारे में ऐसा नहीं सोचते होंगे?” कर्मा ने सवाल दागा।

यह सुनकर सोनू सोच में पड़ गया। तभी बिमला दोनों के लिए चाय लेकर आई। दोनों चाय पीने लगे। सोनू के दिमाग में कई विचार उमड़ रहे थे, और कर्मा के होंठों पर एक चालाक मुस्कान थी।



जारी रहेगी
 
कर्मा की आँखें खुशी से चमक उठीं। “अरे, वाह! कम्मू की माँ और ताई? वैसे, इसमें गलत क्या है? दोनों तो एक से बढ़कर एक हैं।”

“कुछ गलत नहीं है? दोस्त की माँ के बारे में सोचना?” सोनू ने संकोच से पूछा।

“क्या तुझे यकीन है कि वो तेरी माँ के बारे में ऐसा नहीं सोचते होंगे?” कर्मा ने सवाल दागा।

यह सुनकर सोनू सोच में पड़ गया। तभी बिमला दोनों के लिए चाय लेकर आई। दोनों चाय पीने लगे। सोनू के दिमाग में कई विचार उमड़ रहे थे, और कर्मा के होंठों पर एक चालाक मुस्कान थी।



अध्याय 13


सोनू ने चाय के एक दो घूंट पीए उसके मन में सारी बातें घूम रही थी, मन में झिझक भी थी और बहुत से प्रश्न भी थे एक तरफ तो वो कर्मा से पूछना भी चाह रहा था और झिझक भी रहा था, पर कर्मा ने उसे इतना तो भरोसा दिला ही दिया था कि वो मन के प्रश्न पूछ सकता था,

सोनू: कर्मा भैया पर मुझे नहीं लगता कि अपने दोस्तों की मां के बारे में ऐसा सोचना चाहिए वो भी हमारी खुद की मां के समान ही होती हूं पर खुद के मन को ये बात समझ नहीं आती।

“देख, सोनू, मैंने कहा था न—ये स्वाभाविक है। ये जो भी रिश्ते हैं ये सब समाज के बनाए हुए हैं, जो प्राकृतिक रिश्ता है वो आदमी और औरत का है, सोच अगर तू कम्मू का दोस्त नहीं होता या अलग गांव में रहता तो तूझे कोई परेशानी होती ?

सोनू: ना में सिर हिलाता है,

कर्मा: नहीं न, इसीलिए तेरा बदन तो अपनी प्राकृतिक तरीके से काम कर रहा है उसके लिए एक औरत का बदन उसे आकर्षित करता है और वो हो रहा ह अब चाहे वो किसी का भी हो,

सोनू: पर अब जब रिश्ता है तो क्या करूं उसे भी भुला नहीं सकता न।

कर्मा: किसने कहा भुलाने को, और हिलाने से सच में थोड़े ही कुछ हो रहा है कल्पना ही तो कर रहा है किसी की भी कर ले उसमें कुछ गलत नहीं है।

सोनू कुछ नहीं कहता और कर्मा की बातों को ध्यान से सुनता रहता है

कर्मा: तू सुमन चाची या कुसुम ताई को सोचकर हिला, मज़ा आएगा। माना वो तेरे दोस्त की माँ हैं, लेकिन तेरी हवस का क्या कसूर? सोच, उनकी वो गहरी नाभी पर जीभ फिराना कैसा लगेगा? उनकी मोटी चूचियां मसलना...” कर्मा की बातें सोनू के मन में आग लगा रही थीं। सोनू की आंखें चमक उठीं—“भैया, सच में... लेकिन अगर कम्मू को पता चला?”

कर्मा हँसा—“अरे, वो खुद भी किसी के के बारे में सोचता होगा। सब करते हैं, बस बोलते नहीं। तू खुलकर जी, ग्लानि छोड़।”

सोनू ने सिर हिलाया, अंदर से उसकी हवस अब और जाग रही थी—धीरे-धीरे, कर्मा की बातें उसे बदल रही थीं।

कर्मा ने सोनू को थोड़ा राजी देखा तो बोला: अच्छा चल ऊपर चलते हैं मेरे कमरे में?

सोनू: क्यों कोई काम है क्या भैय्या?

कर्मा: अरे तू चल तो सही।

सोनू कर्मा के साथ उसके कमरे में आ गया, कर्मा ने उसे बेड पर बैठाया, सोनू कर्मा के आलीशान कमरे को देख कर हैरान था और मन ही मन सोच रहा था क्या किस्मत है कर्मा की, ऐसा कमरा तो उसने सपने में भी नहीं सोचा था,

कर्मा: अरे आराम से बैठ और अपना ही समझ, जो मेरा है वो तेरा है

कर्मा ने एक अलवारी में कुछ ढूंढते हुए कहा, कर्मा की ये बात सोनू के दिल को छू गई, कुछ पल बाद कर्मा हाथ में एक किताब लेकर उसके बगल में बेड पर बैठ गया,

कर्मा: ये देख,

सोनू ने किताब को खोल कर देखा और पहले पन्ने पर नज़र पड़ती ही सोनू की आंखे फैल गई, उस पर एक बिल्कुल नंगी औरत की तस्वीर थी





सोनू की तो उसे देख आंखें फैल गई, वो ध्यान से तस्वीर को देखने लगा और कर्मा भी पन्ने पलट पलट कर उसे एक के बाद एक तस्वीर दिखाने लगा,

कर्मा: क्यों सोनू कैसी लगी कैसी है।

सोनू: पहली बार ऐसी किताब देख रहा हूं भैया,

कर्मा: देख और चाहे तो देख कर हिला भी ले तबसे परेशान घूम रहा है,

कर्मा ने उसके पैंट की ओर इशारा करके कहा,जिसमें उसका लंड खड़ा हुआ था, सोनू उसकी बात सुन झेंप गया,

कर्मा: तू भी न कितना शर्माता है और मैं ही हूं यहां पर तो दरवाज़ा लगा ही है,

सोनू ने कुछ सोचा और बोला: तुम भी हिलाओगे?

कर्मा: नहीं मैने सुबह ही हिलाया था यार अब बार बार करूंगा तो कमज़ोरी आ जाएगी। पर तू करले नहीं तो परेशान रहेगा।

सोनू ने कुछ सोचा और फिर खड़ा हुआ और अपनी पैंट नीचे खिसका दी, और अपना कड़क लंड बाहर निकाल लिया,

कर्मा में उसकी ओर मुस्करा कर देखा और उसे आगे बढ़ने का इशारा किया साथ ही एक तौलिया उसकी ओर फेंक दिया, सोनू ने भी समझते हुए तौलिया अपने बगल में रख लिया और फिर उसने अपने लंड को अपनी अंगुलियों में जकड़ लिया और धीमी रफ्तार से आगे पीछे करने लगा, दूसरे हाथ से किताब के पन्ने पलटते हुए,

धीरे धीरे उसकी रफ्तार बढ़ी तो उसकी आंखें किताब से हट गई और बंद हो गई, वो बंद आंखें कर अपना लंड हिलाने लगा, कुछ देर बाद उसके मुंह से आहें निकल रही थी, और वो तेजी से अपने लंड को हिला रहा था और फिर उसने अपने लंड को तौलिए से ढंक लिया और आह आह ओह चाची कहते हुए झड़ने लगा, चाची सुनते ही कर्मा के कान खड़े हो गए और उसके चेहरे पर एक शैतानी मुस्कान आ गई।

उधर, सोमपाल अपने कमरे में बिस्तर पर लेटे थे, बिमला उनकी कमर पर बैठी थी और उनका लंड अपनी चूत में लेकर उछल रही थी। बिमला के बदन पर सिर्फ एक साड़ी थी जो अभी उसकी जांघो पर इकट्ठी हो रखी थी, बिमला की मोटी मोटी चूचियां उसके साथ ही ऊपर नीचे झूल रही थी।





सोमपाल भी बिमला की कमर को थामे हुए उसे अपने लंड पर उछल रहे थे, उनका लंड तो बिमला की चूत में अंदर बाहर हो रहा था, लेकिन सोमपाल का मन कहीं और था—नदी किनारे सुमन और कुसुम की वो गीली साड़ियां और उसमें भीगे हुए बदन, थिरकते चूतड़। “हाय, वो देवरानी-जेठानी की जोड़ी... क्या रसीली हैं दोनों,” वह मन ही मन सोच रहा था। सोचते हुए ही सोमपाल के लंड में और तनाव आ गया और वो हाथ आगे ले जाकर बिमला की मोटी चूचियों को मसलते हुए नीचे से धक्के लगाने लगा। मन में कुसुम और सुमन को भोगने का कुछ न कुछ तरीका सोचते हुए बिमला को चोदने लगा।

इधर आज कम्मू का मन कहीं नहीं लग रहा था बाहर चबूतरे पर पड़ी खाट पर लेट कर, वो आँखें खुली रखे, रात के दृश्य को बार-बार जी रहा था। उसकी माँ सुमन का वो नंगा बदन—मोटी-मोटी चूचियाँ हर धक्के के साथ हिलती हुईं, गहरी नाभि पर पसीने की बूँदें, और वो रसीली चूत जिसमें पापा का लंड जड़ तक घुस रहा था। कम्मू का मन ग्लानि से भरा था, मगर उसका बदन अभी भी उस दृश्य की गर्मी से तप रहा था। गर्मी तो बाहर धूप की भी थी पर अभी उसके अंदर की अधिक थी, इतने में धीरज ने पीछे से उसे आवाज़ दी: कम्मू बावरा हो गया क्या?

कम्मू का ध्यान वापस आया और बोला: हैं का क्या हुआ भैया?

धीरज: धूप में क्यों पड़ा है जा अंदर जा कर लेट बुखार हो जाएगा नहीं तो,

धीरज की बात सुन कम्मू उठा और घर के अंदर जा आंगन में छप्पर के नीचे पड़ी खाट पर जा कर बैठ गया,

कुसुम: क्यों रे लल्ला आज कैसे उदास उदास सा बैठा है आज नहीं गया गेंद बल्ला खेलने?

पास बैठी सुमन ने कहा जो नीचे बैठ कर बर्तन माँझ रही थी,

कम्मू: नहीं ताई वो धूप तेज है न आज, शाम को जाऊंगा।

कुसुम: सही किया, ऐसी धूप है कि कपार झुलसा दे,

कम्मू: हां ताई कल भी एक लड़के के चक्कर आ गए थे, बाज़ार में।

कम्मू ने अपनी ताई की ओर देखते हुए कहा,

कुसुम: हैं लल्ला सही में किसके?

कम्मू: अरे वो कल्लू है न उसके भाई के।

बर्तन धोते हुए कुसुम का पल्लू तभी नीचे सरक गया और कम्मू के सामने उसकी ताई की मोटी मोटी चूचियां ब्लाउज़ में उजागर हो गई, पल्लू थोड़ा और नीचे सरका और कुसुम का पेट भी दिखने लगा





कम्मू की तो नज़र ही उसकी ताई की छाती पर टिक गई, उसके बदन में सिहरन सी होने लगी, वहीं कुसुम ने तो जैसे कुछ हुआ ही नहीं ऐसे प्रतिक्रिया देते हुए अपने पल्लू को बापिस सीने पर डाल लिया कम्मू से बात करते हुए,

कुसुम: अरे बताओ जवान लड़कों के साथ ऐसा हो रहा है तो बुद्धों का क्या होगा, तू खयाल रखा कर अपना लल्ला धूप में मत खेलियो बिल्कुल भी।

कम्मू तो अपनी ताई के उस नजारे से ही सुन्न था किसी तरह से अपनी नज़रें जल्दी से हटाते हुए बोला: हां ताई मैं मैं नहीं जाऊंगा खेलने धूप में।

वैसे जो अभी हुआ कुछ ऐसा नहीं था कि बहुत बड़ी बात थी या पहली बार हुआ था, बच्चों के सामने औरतों के पल्लू सरक जाना कोई बड़ी बात नहीं थी, न ही औरतों इतना ध्यान देती थी और न ही बच्चे, खुद कम्मू के सामने उसकी मां और ताई ब्लाउज़ पेटीकोट में या पेटीकोट सीने पर चढ़ा कर नहाती थी और कम्मू का ध्यान तक नहीं जाता था पर रात की उस घटना ने पल्लू का पूरा सोचने का तरीका ही बदल दिया था अब अपनी ताई और मां में पहली बार उसे कामुक भरे बदन की औरतें नज़र आ रही थीं।

तभी कुसुम ने उसे दोबारा पुकारा: लल्ला सुन जा नल से ये बाल्टी भर ला ज़रा।

कम्मू अपने दिमाग को झटकते हुए उठा और बाल्टी लेकर नल की ओर चल दिया आंगन में लगे नल की ओर जब पहुंचा तो नल से कुछ पहले ही उसके कदम धीमे पड़ गए, वो ठिठक गया, क्योंकि नल के पास इस समय उसकी ना मां सुमन बैठ कर कपड़े धो रही थी सुमन ने ब्लाउज़ और पेटिकोट पहना हुआ था, उसकी पीठ कम्मू की ओर थी ब्लाउज से झांकती उसकी कामुक कमर और पीठ दिख रही थी कम्मू की नज़र अपनी मां के बदन पर ठहर गई, उसे फिर से एक सिहरन हुई जो अभी ताई के सामने जो हुई उससे कहीं ज़्यादा तेज थी। उसका लंड उसके पजामे में कसने लगा,





अनायास ही उसके कदम आगे बढ़े और फिर उसकी नजर अपनी मां के नितम्बों पर आ कर रुक गई जो पेटीकोट के अंदर होते हुए भी अपने आकार और मादकता का अहसास करा रहे थे, ज्यों ज्यों सुमन कपड़ों पर हाथ चला रही थी वैसे ही उसके चूतड़ भी ऊपर नीचे हो रहे थे, ये नज़ारा देख तो कम्मू का लंड पूरा तन गया वो एक जगह खड़ा होकर बस अपनी मां के चूतड़ों को देखने लगा,

तभी पीछे से कुसुम की आवाज़ ने उसे होश दिलाया: कम्मू ओह कम्मू पानी ला लल्ला।

सुमन ने भी पीछे घूम कर उसे देखा तो कम्मू तुरंत खुद को संभालते हुए बोला: मां पानी चाहिए ताई मांगा रही हैं

सुमन: अरे तो खड़ा क्यों है चला ले,

कम्मू तुरंत आगे बढ़ा और नल के नीचे बाल्टी रखने के लिए, उसकी नज़र उसकी मां के बदन से चाह कर भी नहीं हट रही थी, वो सुमन के सामने आया और नल के नीचे बाल्टी रख कर नल चलाने लगा, पर उसकी नज़र अब नए दृश्य पर थी जो कि उसके चूतड़ों जितना ही कामुक था,





नल चलाते हुए कम्मू की नज़र अपनी मां की छाती पर जा टिकी, ब्लाउज़ से आधी बाहर झांकती बड़ी बड़ी चूचियां जैसे बाहर आने को बेताब थी, गीले होने की वजह से पानी की बूंदे उन पर से फिसल रही थी, कुछ ब्लाउज़ में समा जाती तो कुछ उनके बीच की गहरी खाई में, ब्लाउज़ और चूचियां जितनी गीली थी कम्मू का गला अपनी मां की चूचियों को देख उतना ही सूख रहा था, कम्मू चाह कर भी नज़र नहीं हटा पा रहा था, हाथ लगातार नल के हत्थे पर चल रहे थे वहीं उसका खुद का हत्था नल के हत्थे जैसा ही कठोर हो गया था, वो खयालों में डूबा ही था कि सुमन की आवाज ने उसे बाहर निकाला!

सुमन: ए कम्मू कहां खोया ह तू? बाल्टी भर गई है पानी गिर रहा है,

कम्मू तुरंत जबरन हंसी हंसता हुआ बोला: हीही अरे ध्यान ही नहीं रहा,

और बाल्टी उठा कर अपनी ताई को दे दी, जब कामुक दृश्यों से नज़र हटी तो फिर से वही ग्लानि भाव मन में आने लगे वो तुरंत घर से निकल गया ये सोच कर कि अगर घर में रहा तो वो पागल हो जाएगा।

हवेली में रजनी अब काम में लग चुकी थी। उसका बदन गर्मी से कम बल्कि सुबह के कर्मा के स्पर्श की गर्मी से तप रहा था। वह रसोई में बर्तन माँज रही थी, मगर उसका मन बार-बार कर्मा के कमरे में लौट रहा था—उसकी जीभ की वो जादूगरी, उसके लंड का वो मोटापन जो उसकी चूत को भर देता था। “हाय, ये लड़का मुझे क्या बना रहा है?” वह खुद को कोस रही थी। “नीलेश साहब के बाद अब उनका बेटा... और मैं रोक नहीं पा रही खुद को, क्या होता जा रहा है मुझे।” मगर साथ ही उसे वो सुख याद आ रहा था—वो आनंद जो दिलीप ने कभी नहीं दिया था। उसकी चूत में अभी भी एक हल्की सी खुजली थी, जैसे वो और माँग रही हो। वह खुद को डाँटते हुए काम में लगी हुई थी उसका कामुक बदन पसीने से चमक रहा था,





इसी दौरान सोमपाल की सेवा करने के बाद बिमला भी उसके कमरे से निकल कर रसोई में आई और बिमला ने उसे देखा और मुस्कुराई—“क्या बात है, रजनी जीजी? चेहरा चमक रहा है आज तो। कोई खास बात?”

रजनी झेंप गई—“अरे, कुछ नहीं, बिमला। बस यूँ ही।” मगर अंदर से वो जानती थी कि ये चमक कर्मा की वजह से है। या फिर नीलेश की वजह से ये क्या होता जा रहा था उसे क्या वो ये सही कर रही है,बिमला की मुस्कान से उसे ऐसा लग रहा था जैसे बिमला की आंखें उसे जांच रही हैं,...” उसका मन थोड़ा डर और थोड़ी उत्तेजना से भर गया। वह जानती थी कि हवेली की ये दुनिया अब उसकी हो चुकी है, और पीछे लौटना नामुमकिन है। लेकिन अब वो इस सुख की आदी हो रही थी—धीरे-धीरे, हर दिन एक नई सिहरन के साथ।

इसी बीच कर्मा और सोनू भी कमरे से निकल कर रसोई में आए, कर्मा के साथ सोनू को देख रजनी थोड़ी झिझक जाती थी, और झिझकने की भी वजह थी जिस लड़के ने सुबह ही उसे इतने दमदार तरीके से चोदा था अब उसका बेटा उसके साथ ही था, उसे डर सताता कि कहीं सोनू को उसके बारे में पता तो नहीं चल गया,पर अगले ही पल वो इस खयाल को निकाल देती।

कर्मा: चाची क्या बना है बहुत भूख लगी है?

रजनी: आलू के परांठे बनाए हैं बेटा तुम बैठो मैं परोसती हूं

कर्मा: आ बैठ सोनू, आलू के परांठे का मज़ा लेते हैं।

सोनू: अरे नहीं भैया तुम खाओ।

कर्मा: अरे आ न दोस्त नहीं है मेरा, और तुझे तो खाने की ज़्यादा जरूरत है थक गया होगा।

इस बात पर सोनू के चेहरे का रंग उड़ गया वहीं रजनी ने भी ये बात सुनी पर सवाल बिमला ने किया: क्यों थक क्यों गया होगा ऐसा क्या कर के आया है ये?

कर्मा: तुम्हे नहीं पता चाची क्या करके आया है, बगीचे में कितना काम करता है बेचारा।

सोनू की जान में जैसे जान आई और वो तुरंत कर्मा के साथ बैठ गया, कर्मा उसकी ओर देख शैतानी मुस्कुराहट से देख रहा था और फिर सोनू के चेहरे पर भी मुस्कान फैल गई।

शाम का समय हो चुका था और धूप की तपन भी थोड़ी कम हो गई थी। कम्मू, मन्नू, सोनू और कर्मा सब समोसे की दुकान पर थे कर्मा सबको समोसा खिला रहा था और वहीं सब समोसे खाते हुए हलवाइन के बदन से आंखें सेंक रहे थे, औरत हाथ में समोसे की थाल लिए अपने पति से बातें कर रही थी वहीं थोड़ी दूरी पर चारों बैठे थे, कर्मा के खुलेपन और उसके अंदर आए नए बदलाव ने सबको ही उसकी तरफ थोड़ा नरम कर दिया था सबसे ज़्यादा असर सोनू की वजह से भी था, और कम्मू और मन्नू को समोसे भी तो मिल रहे थे मुफ्त के, कुल मिला कर अब वो तीनों ही कर्मा को अपने समूह का हिस्सा मान भी चुके थे,

कर्मा: आह देख साली की गहरी नाभि को यार, मन करता है इसकी नाभि में चटनी डाल के चाट लूं।

कर्मा ने समोसे का टुकड़ा मुंह में डालते हुए कहा, वहीं बाकी तीनों भी मुस्कान के साथ हलवाई की औरत को देख रहे थे,





कम्मू: क्या यार कर्मा भाई तुम भी नई बात बताते हो, नाभि में चटनी डाल के चाटूंगा ही ही ही।

इस पर सब हंसने लगे, कर्मा भी,

कर्मा: अरे यार क्या गलत बोल रहा हूं अच्छा तुम लोग बताओ है नहीं इसकी नाभि कटोरी जैसी, सोचो मैं इसकी नाभि चाट रहा हूं, तू इसके होंठों को चूस रहा है, सोनू और मन्नू इसकी एक एक चूची को मुंह में लेकर चूस रहे हैं कितना मज़ा आएगा।

कर्मा की इस बात से तो बाकी तीनों के बदन में सिहरन हो गई और तीनों हलवाई की औरत को कामुक और उत्तेजना भरी निगाहों से देखने लगे,

कम्मू: आह सही में भाई इसकी चटनी से ज़्यादा स्वादिष्ट होंगे इसके होंठ,

कम्मू जो हमेशा से ही बाकी दोनों से ज़्यादा खुला हुआ था वो बोला,

सोनू: हाय मैं तो इसकी मोटी चूची पूरे दिन पी सकता हूं कितनी मोटी मोटी हैं न।

कर्मा: अरे ये हुई न बात आज सोनू ने कही है खुल कर अपने दिल की।

कम्मू: क्या बात है सोनू मज़ा आ गया,

सोनू भी खिल खिलाकर हंस रहा था,

इतने में मन्नू भी कहां पीछे रहने वाला था वो सबका ध्यान उस औरत की ओर बापिस लाते हुए बोला: अरे यार चूतड तो देखो ऐसा लगता है पिछली बार से ज़्यादा बढ़ गए हैं।

सबकी नज़र औरत के ठुमकते चूतड़ों पर टिक गई,





कर्मा: हां यार लगता तो है, लगता है हलवाई खूब गांड मार रहा है इसकी।

कम्मू: अरे वो कहां मार पाता होगा इतना मोटा पेट ही बीच में अड़ जाता होगा।

इस पर सब हंसने लगते हैं

सोनू: मैं तो सोचता हूं इसके चूतड़ नंगे कैसे दिखते होंगे।

अब सोनू भी खुल कर बोल रहा था, जैसे वो समझ गया था कि शर्माने से कुछ नहीं मिलने वाला और उसके दोस्तों को उसका ये रूप भा रहा था,

कर्मा: मैं कल्पना कर रहा हूं, तुम लोग भी करो। सोचो ये इस समय नंगी घूम रही है, चूतड़ हर कदम पर ऊपर नीचे हो रहे हैं।

चारों ध्यान से देखते हुए कल्पना करने लगे वहीं कम्मू की आंखों के सामने उसकी मां के चूतड़ आ गए जब रात को वो नंगी हो कर उसके बाप से चुद रही थी, कम्मू के मन में अलग अलग तरह के खयाल आने लगे वो औरत के बदन को अपनी मां के बदन से तुलना करने लगा, वो सोचने लगा कि हलवाइन का बदन भले ही भरा ज़्यादा है पर कामुक उसकी मां अधिक है, उसका बदन कसा हुआ है, मोटी चूचियां तो इतनी ही बड़ी होंगी और चूतड़ भी इतने फैले न सही पर बिलकुल गोल और निकले हुए हैं,

मन्नू: मेरा तो कड़क हो गया इसके पिछवाड़े के बारे में सोच कर।

कर्मा: मेरा भी यार,

सोनू: खड़ा तो मेरा भी हो गया है,

कम्मू की तरफ से कोई जवाब नहीं आया तो मन्नू ने उसे हिलाया और बोला: साले सपने में चोदने ही लगा था क्या,

कम्मू जैसे होश में आया और बात संभालते हुए बोला: ही ही ही बस डालने ही वाला था कि तूने छेड़ दिया,

इसी तरह हंसी मज़ाक करते हुए चारों घर की ओर चल दिए।



जारी रहेगी
 
DREAMBOY40 , Mass आओ कहानी पर ध्यान दीजिए, सज्जनपुर में भी समय बिताइए
 
उल्टा सीधा कहानी में भी अपडेट दी है उसे भी पढ़ कर अपना प्यार दें, और प्रतिक्रिया अवश्य दें, बहुत बहुत धन्यवाद
 
कम्मू की तरफ से कोई जवाब नहीं आया तो मन्नू ने उसे हिलाया और बोला: साले सपने में चोदने ही लगा था क्या,

कम्मू जैसे होश में आया और बात संभालते हुए बोला: ही ही ही बस डालने ही वाला था कि तूने छेड़ दिया,

इसी तरह हंसी मज़ाक करते हुए चारों घर की ओर चल दिए।



अध्याय 14


शाम हो चुकी थी और कर्मा के साथ तीनों ही अपने अपने घर की ओर चल दिए, कर्मा पहले ही हवेली वाले रास्ते पर मुड़ गया और बाकी तीनों आगे चलने लगे,

मन्नू: सही चूतिया बना रहा है तू इसे सोनू, ये खुद को हमारा दोस्त समझता है और मस्त समोसे भी खिलाता है।

मन्नू ने कर्मा के जाने के बाद हंसते हुए कहा,

सोनू: ऐसा क्यों बोल रहा है तू, मैने क्या चूतिया बनाया उसे?

मन्नू: ये ही दोस्ती वाला झांसा देकर, वैसे अपना फायदा ही है समोसे भी खाने को मिलते हैं मुफ्त के।

सोनू को मन्नू की बात अच्छी नहीं लगी,

सोनू: बातें तू कर रहा है चूतियों वाली, मैं कर्मा को कोई चूतिया नहीं बना रहा जैसे वो मुझे दोस्त मानता है वैसे मैं उसे मानता हूं,

मन्नू: अच्छा मतलब तू उस हवेली वाले का सच्चा दोस्त बन गया है,

सोनू: दोस्ती सच्ची ही होती है।

सोनू ने गर्व से कहा,

मन्नू: देख तो इसे कम्मू, समझा इसे हवेली वालों से दोस्ती सही नहीं हो सकती और ये उसके चक्कर में मुझसे बहस कर रहा है।

सोनू: तू अगर गलत बोलेगा तो बोलूंगा नहीं, और अब तेरे लिए दोस्ती गलत हो गई अभी जब मुफ्त के समोसे ठूंस रहा था तो नहीं याद आया ये सब।

कम्मू: अरे तुम दोनों भी क्या बिना बात की बहस करने लगे,

कम्मू: बिना बात की नहीं है कम्मू, सोनू के नए जिगड़ी के पैसों के समोसे खा लिए मैने अब ये सुनाएगा ही,

सोनू: देख मन्नू उल्टी बातें मत कर, मैने ये नहीं बोला शुरुआत तूने की थी,

मन्नू: अबे जा ले लियो अपने समोसे के पैसे मुझे वैसे भी नहीं खाने थे।

कम्मू: अरे बस करो यार तुम दोनों।

सोनू: कम्मू इसे जलन समोसे की नहीं है इसे जलन है मुझसे, कि कर्मा मेरा दोस्त कैसे बन गया पहले, इसका क्यों नहीं, वो मुझे ज़्यादा मानता है अपने साथ घुमाता है इसलिए ये जल रहा है।

मन्नू: अरे जा तुझसे जले मेरा घंटा, पूरा गांव जानता है कर्मा तुझ पर इतना मेहरबान क्यों है,

सोनू: क्यों है बता ज़रा?

मन्नू: रहने दे मेरा मुंह मत खुलवा।

सोनू: नहीं बोल न साले मतलबी, तू करता होगा मतलब के लिए दोस्ती, मैं नहीं करता।

मन्नू: अच्छा भेंचो मैं मतलबी, अपने मतलब की लिए अपनी मां तू चुदाए और मैं मतलबी?

कम्मू: मन्नू चुप कर,

सोनू: क्या बोल रहा है तू हराम खोर मैं तेरी गांड फाड़ दूंगा।

सोनू ने मन्नू का कॉलर गुस्से में पकड़ते हुए कहा,

मन्नू: पूरा गांव जानता है कि चाची हवेली में क्या करवाती है, मुझे सही गलत का ज्ञान पेल रहा है,

मन्नू उसके हाथ को झटक कर अपना कॉलर छुड़ाता है,

ये सुन सोनू के पैरों से जमीन खिसकने लगती है, उसकी आंखों में आंसू उभर आते हैं, कम्मू आँखें फाड़े ये सब देख रहा होता है, सोनू कम्मू की ओर मुड़ता है और दबी हुई रोटी आवाज़ में कहता है: तू भी ये ही समझता है ना? बहुत अच्छे दोस्त निकले तुम लोग।

सोनू मूड कर अपनी आंखों से आंसू पोंछते हुए चला जाता है, मन्नू को भी अहसास होता है उसने कुछ ज़्यादा ही बोल दिया है,

मन्नू: यार मेरा ये कहने का मतलब नहीं था,

वो कम्मू की ओर देख कर कहता है, कम्मू उसकी बात का कोई जवाब दिए बिना चला जाता है, पीछे पीछे मन्नू भी अपने घर की ओर चल देता है,

हवेली में शाम होते होते नीलेश और सरोज भी शहर से लौट चुके थे, रजनी के भी घर जाने का समय हो गया था सरोज आंगन में खरीददारी कर के जो सामान लाई थी वो निकाल रही थी, नीलेश बगल में बैठे थे, रजनी दोनों के लिए चाय लेकर आई और चाय सामने रख कर बोली: जीजी काम निपट गया है मैं चलती हूं फिर?

सरोज: अरे रुक दो मिनट फिर चली जाना,

और सामने पड़े सामान में से दो तीन थैले निकालती है और उसे पकड़ा देती है,

रजनी: इनमें क्या है जीजी?

सरोज: तेरे और बच्चों के लिए कपड़े हैं,

रजनी: जीजी इन सब की क्या ज़रूरत थी,

सरोज: अरे ज़रूरत क्यों नहीं थी, जा घर लेकर, और सुन द्वार पर बिमला हो तो उसे भेज दियो।

रजनी: अभी भेजती हूं जीजी,

रजनी कुछ और नहीं कह पाती और थैले लेकर चल देती है, हवेली से बाहर निकल कर रास्ते में उसके चेहरे पर मुस्कान होती है ये सोचकर कि कितना समय हो गया बच्चों ने नए कपड़े पहने होंगे, हवेली में आकर उसे जो बलिदान देना पड़ा पर उसके बदले उसके बच्चों की मुस्कान उनकी खुशी के आगे अपना बलिदान कुछ नहीं लगा, या अगर वो खुद के मन से सच में पूछे तो अब उसे अच्छा ही लगता था, आज सुबह ही कर्मा ने उसकी तगड़ी चुदाई की थी जिसका आनंद वो अभी भी भूली नहीं थी, खैर ये ही सब विचारों में वो आगे बढ़ रही थी उसके घर से पहले ही कुसुम, सुमन और झुमरी, कुसुम के चबूतरे पर बैठ कर बातें कर रहे थे। रजनी को आते देख कुसुम ने आवाज़ दे कर उसे भी बुला लिया,

कुसुम: अरे रजनी ओह का थैलों में लिए जा रही हो, बाज़ार ही लूट लाई का?

कुसुम चिर परिचित अंदाज़ में मज़ाक करते हुए कहती है

रजनी उसकी आवाज़ सुनकर उनके पास चली गई और बोली: अरे बाज़ार नहीं लूटा, इनमें जीजी कपड़े हैं बच्चों के।

रजनी मुस्कुराते हुए कहती है,

झुमरी: शहर गईं थी क्या ?

रजनी: नहीं जीजी, वो हवेली वाली जीजी गईं थी वे ही लेकर आई हैं,

झुमरी: अरे वाह बड़े मेहरबान हो रहे हैं हवेली वाले तुम पर, ऐसा क्या जादू कर रही हो?

कुसुम उसे छेड़ते हुए कहती है,

रजनी: अरे जीजी मैं क्या जादू करूंगी? वो लोग सबके लिए ही लाए थे तो हमारे लिए भी ले आए।

झुमरी: चलो बढ़िया है।

सुमन: वैसे रजनी जीजी अब अच्छी लगती हो तुम मुस्कुराती रहती हो, चेहरे पर भी चमक दिखती है,

रजनी ये सुन मुस्कुराती है,

कुसुम: लगता है रजनी हवेली वालों की नहीं बल्कि हवेली वाले रजनी की सेवा कर रहे हैं, अब सेवा करवाने से मतलब है कहीं भी करे कोई भी करे।

कुसुम ये कह हंस पड़ती है और उसके साथ साथ झुमरी और सुमन भी, पर ये बात रजनी को चुभती है उसे लगता है कुसुम और बाकी सब उसका मज़ाक उड़ा रहे हैं, और कहीं न कहीं ये कहना चाह रहे हैं कि मैं इन सब के बदले में अपना बदन सौंपती हूं, रजनी चेहरे पर कुछ नहीं दिखाती और हल्की सी झूठी मुस्कान के साथ कहती है,

रजनी: चलती हूं जीजी घर पर काम पड़े होंगे,

और इतना कह आगे बढ़ जाती है, आगे बढ़ते हुए उसके मन में कुसुम की हंसी और बातें घूमती है, रजनी अपने दरवाजे पर पहुंच खटखटाती है और मनीषा दरवाजा खोल उसे अंदर कर लेती है।

मनीषा: अरे इन थैलों में क्या है मां,

रजनी पल भर के लिए उन बातों को मन से झटकती है क्योंकि उसे अपने बच्चों के चेहरे की मुस्कान देखनी होती है,

रजनी: इन सब में, आओ दिखाती हूं।

ये कह रजनी आगे बढ़ती है और आंगन में पड़ी खटिया पर बैठ कर थैले रख कर सबको बुलाती है,

सोनू और नेहा भी उसकी आवाज सुन तुरंत उसके पास आ कर खड़े हो जाते हैं,

रजनी एक एक करके सबको कपड़े निकाल कर देती है और नए कपड़े पाकर बच्चों की खुशी देख कर रजनी के मन को एक ठंडक पहुंचती है सोनू भी नए कपड़े पाकर मन्नू के साथ हुई घटना को उस पल के लिए भूल जाता है, अपने बच्चों के हंसते खिलखिलाते चेहरे देख रजनी सोचने लगती है, कितने खुश हैं मेरे बच्चे, और ये कुसुम जीजी मेरा मजाक उड़ा रही थी, मैं सेवा करवाऊं या करूं उससे तुम्हें क्या, बड़ा घमंड है इन्हें अपनी शराफत पर, खुद के घर में सब अच्छा है तो बड़े मज़ाक उड़ा रही हैं दूसरों के, कभी खुद पर आई न तब पता चलेगा मज़ाक उड़ाना क्या होता है, अच्छा नहीं किया उन्होंने मेरा मज़ाक उड़ा कर।

नेहा: तुम्हारी साड़ी भी बहुत सुंदर है मां तुम भी पहन कर देखो न,

नेहा थैले से उसकी साड़ी निकाल कर दिखाती है,

रजनी अपने खयालों से बाहर आती है: अरे मैं क्या पहन कर देखूं, किसी दिन पहन लूंगी।

मनीषा: नहीं मां पहनो न, बहुत सुंदर लगेगी तुम पर। चलो सब लोग पहन कर देखते हैं अपने कपड़े।

मनीषा उत्साहित होकर कहती है,

सोनू: हां ये सही रहेगा,

वो भी साथ देता है खुशी से मनीषा की बात में,

रजनी: अच्छा बाबा ठीक है, पहन लो,

नेहा: तुम भी पहनोगी न मां?

रजनी: अच्छा पहले तुम लोग पहन कर दिखाओ फिर मैं दिखाऊंगी,

नेहा और मनीषा सबसे पहले कमरे में जाती हैं और सोनू तो बाहर ही अपने कपड़े उतारने लगता है, सबसे पहले दोनों बहनें ही तैयार होकर निकलती हैं,





मनीषा पीले सूट में और नेहा नीले सूट में, दोनों ही नए सूट सलवार में बहुत सुंदर लग रही थी, साथ ही दोनों की ही खुशी देखने लायक थी,

रजनी: अरे वाह तुम दोनों बहुत ही सुंदर लग रहीं हो, हाय किसी की नज़र न लग जाए।

मनीषा: सच में न मां, ये सूट बहुत अच्छा है और कपड़ा भी बहुत अच्छा वाला है, काफी महंगा लग रहा है,

नेहा: हां मां, मुझे भी सूट बहुत पसंद आया और इसका रंग भी।

रजनी: हां तुम पर बहुत खिल रहे हैं ये रंग, आखिर मेरी बेटियां हैं भी तो इतनी प्यारी और सुंदर।

रजनी खुशी से कहती है,

नेहा: हमारी तारीफ से काम नहीं चलेगा मां तुम भी जाओ साड़ी पहन कर आओ,

तभी सोनू भी सामने आ कर कूदता है,

सोनू: अरे मेरे भी तो कपड़े देखो।

रजनी: अरे मेरा राजा बेटा आज सच का फिल्मों वाला हीरो लग रहा है, शर्ट तो कितनी जंच रही है और ये क्या बोलते हैं इसे जिन भी बहुत अच्छी लग रही है,

सोनू: जिन नहीं मां जीन्स, अच्छी है न, मेरा बहुत मन था कि मेरे पास जींस हो, आज मिल गई।

नेहा: अरे मेरा भाई हीरो है उसे तो जो चाहेगा सब मिलेगा,

मनीषा: सही में, आज बहुत अच्छा लग रहा है, मां अब तुम भी जाओ न साड़ी पहन कर दिखाओ,

रजनी: अच्छा जाती हूं तुम लोग मानोगे नहीं।

कुछ देर बाद रजनी कमरे से साड़ी पहन कर निकलती है और उसे देख कर तीनों बच्चों के चेहरे पर मुस्कान होती है

रजनी: तो बताओ अब कैसी लग रही है साड़ी?

रजनी अपना पल्लू ठीक करते हुए कहती है





नेहा: अरे वाह मां बहुत सुंदर लग रही हो, कितनी प्यारी लग रही है साड़ी।

मनीषा: सही में मां तुम तो पिक्चर की हीरोइन लग रही हो,

रजनी: धत्त कुछ भी बोलती है तू।

सोनू: नहीं मां सही बोल रही है, बिलकुल हीरोइन लग रही हो,

सोनू अपनी मां के भरे बदन को साड़ी में देखते हुए बोला, तभी अचानक उसकी आंखों के सामने उसकी मां का नंगा बदन आ गया जब उसने उसे नीलेश के साथ देखा था, सोनू ने तुरंत ही उस खयाल को अपने मन से निकाल दिया,

रजनी: तुम सब भी न पागल हो गए हो,

विक्रम: सही कह रहे हैं सब मां, बहुत सुंदर लग रही हो,

पीछे से विक्रम ने कहा जो कुछ पल पहले ही घर आया था,

रजनी: अरे तू कब आया लल्ला?

विक्रम: अभी मां, वैसे आज नए कपड़े कहां से आए सबके पास?

रजनी: तेरे लिए भी हैं बेटा उस थैले में।

मनीषा: हां भैया और तुम्हे भी अभी पहन कर दिखाने होंगे हमारी तरह,

रजनी: अरे उसे पानी तो पूछ ले बेटा पहले कपड़े ही लेकर बैठ गई।

मनीषा: अभी लाई भैया।

शाम ढल चुकी थी अंधेरा गांव को अपने आगोश में समेट चुका था, वहीं गांव से बाहर दिलीप ठेके के बाहर खड़ा था,

दिलीप: अरे भाई सुनो न आज उधार दे दे बस एक पौवा, सुबह होते ही तुम्हे पैसे दे दूंगा।

ठेलेवाला: चूतिया समझा है क्या, तुझ जैसे बेवड़े के पास सुबह कहां से पैसा आ जाएगा चल निकल,

ठेलेवाला उसे धक्का मार के ठेके के सामने से हटा देता है,

दिलीप पीछे जा कर गिर जाता है तभी एक आदमी पीछे से उसे उठाता है, और कहता है: अरे दिलीप भाई क्या हालत बना रखी है तुमने अपनी?

दिलीप उस आदमी के चेहरे की ओर देखता है: अरे भूरे, मेरे भाई, समझाओ इसे कल सुबह इसका हिसाब कर दूंगा मैं।

दिलीप लड़खड़ाते हुए उसके गले लग जाता है,

भूरेलाल: आओ दिलीप भाई मेरे साथ चलो, क्या इन लोगों के मुंह लगते हो,

कुछ देर बाद दिलीप और भूरेलाल भूरेलाल के खेत में बने मचान पर बैठे होते हैं सामने दारू के गिलास और नमकीन रखी होती है,

दिलीप: भूरा भाई वो मादरचोद मुझे जानता नहीं कल उससे नाक नहीं रगड़वाई तो मेरा नाम भी दिलीप नहीं है,

दिलीप ने दारू गटकते हुए कहा,

भूरेलाल: बिल्कुल उस गांडू की इतनी ही औकात है,

दिलीप: पर तुम भूरे भाई तुमने आज मुझे सहारा दिया, मुझे ये पिलाई, ये अहसान रहा मुझ पर, और दिलीप अपने अहसान जिंदगी भर नहीं भूलता,

भूरेलाल: अरे एहसान कैसा यार तुम तो हमारे खास हो, मैं तो सोच रहा हूं हमें और खास बन जाना चाहिए क्यों कहते हो?

दिलीप: और खास बिल्कुल बन जाते हैं बताओ कैसे?

भूरेलाल उसकी बात सुन कर मुस्कुराता है और कहता है: क्यों न इस दोस्ती को रिश्तेदारी में बदल दें?

दिलीप: वो कैसे भूरे भाई।

भूरेलाल: अपनी बड़ी बेटी का ब्याह कर दो मेरे साथ, तो बन जाएंगे न रिश्तेदार?

भूरेलाल ने अपने पीले दांत दिखाते हुए हंसते हुए कहा,

दिलीप: बड़की का, अरे क्या बात करते हो भूरा भाई उसकी और आपकी उम्र में कितना अंतर है।

दिलीप की बात सुन भूरेलाल ने भौहें सिकोड़ लीं, और तुरंत दिलीप के आगे से दारू का गिलास खींच लिया और बोला: उम्र से क्या होता है, मर्द हूं मर्द, मर्द और घोड़े कभी बूढ़े नहीं होते समझे, और मेरी घरवाली चल बसी तो इसमें मेरा क्या दोष? क्या मेरा हक नहीं दूसरा ब्याह करने का?

दिलीप: मेरा वो मतलब नहीं था, भूरे भाई पर,

दिलीप ने अपना हाथ आगे बढ़ा कर दारू का गिलास पकड़ने की कोशिश की पर भूरेलाल ने गिलास और पीछे कर लिया और बोला: सोच लो दिलीप भाई, आज नहीं कल तुम्हे उसे ब्याहना है ही, उसमें भी रकम लगेगी, और तुम्हारी हालत तो सब जानते ही हैं, इससे अच्छा रिश्ता तुम्हे नहीं मिलेगा, मेरे पास किसी चीज की कमी नहीं है तुम्हारी लड़की राज करेगी, और साथ में तुम्हारी भी जरूरतों का पूरा ध्यान रखूंगा मैं, ब्याह का खर्चा भी सारा मेरी तरफ से अब बोलो क्या कहते हो?

दिलीप चुप हो कर कुछ पल सोचने लगा पर उसकी नज़र दारू के गिलास पर ही थी, कुछ पल बाद उसने हाथ बढ़ाया और बेशर्म हंसी हंसता हुआ बोला: तो इस नए रिश्ते की खुशी में एक एक जाम तो हो ही जाए,

भूरेलाल के चेहरे पर भी शैतानी मुस्कान आ गई जैसे उसने जो चाहा था वो हो गया हो, और उसने गिलास बापिस दिलीप की ओर बढ़ा दिया

भूरेलाल: बिल्कुल एक क्यों आज पूरी बोतल खाली होगी,

भूरेलाल दिलीप की बड़ी बेटी नेहा के कमसिन बदन को याद करते हुए दारू गटकने लगा।

अगली सुबह हो चुकी थी, कम्मू अपनी बहन के जगाने से जगा, बेचारा रात में देर तक जाग कर अपनी मां और पापा के बिस्तर पर घात लगाए बैठा रहा की रात को कुछ रंगीला कार्यक्रम देखने का मौका दोबारा से मिले पर कुछ नहीं हुआ और फिर थक कर खुद भी उसकी आंख लग गई,

अनामिका: उठ न कब तक सोता रहेगा, जा खेत वगैरा हो कर आ,

कम्मू: अरे जा रहा हूं जीजी, थोड़ा रुको तो सही।

कम्मू उठ कर बैठ गया और सोचने लगा, कि बेकार में रात में इतनी देर तक जाग कर नींद खराब की, वो भी गलत काम के लिए, आगे से कितना भी मन करे ये सब नहीं करूंगा, ये पाप है, कम्मू खुद को समझाते हुए उठता है जहां उसके मां पापा की वजह से उसकी रात की नींद खराब हुई थी वहीं उसके पापी अपनी सुबह अच्छी कर रहे थे अपने गेहूं के खेत के एक कोने में अजीत ने अपनी भाभी कुसुम को बाहों में जकड़ा हुआ था, कुसुम की साड़ी वहीं बगल में पड़ी थी, और उसके बदन पर उसका पेटीकोट और ब्लाउज था, ब्लाउज़ के भी कई बटन खुले हुए थे और उसकी मोटी चूचियां आधे से ज़्यादा बाहर थी, वहीं पेटीकोट तो जांघों में इकट्ठा था और मोटे केले के तने सी जांघें बदन की गर्मी से पसीने में चमक रही थी।





अजीत के हाथ उसकी भाभी की मांसल कमर और पेट पर फिसल रहे थे ब्लाउज के ऊपर से उसकी चूची को मसल रहे थे वहीं कुसुम अपने देवर की बाहों में दबी हुई आवाज़ में कराह रही थी,

कुसुम: आह ओह देवर जी छोड़ो, देर हो जाएगी, आह खेत जाने में इतना समय नहीं आह लगता कभी।

अजीत: ओह भाभी, ऐसे कैसे छोड़ दूं, आह जबसे तुम्हें चोदा है हर पल अब तुम्हारे बदन का ही ध्यान रहता है।

अजीत कुसुम के पेट को मसलते हुए बोला,

कुसुम: धत्त कितना गंदा बोलते हो, अपनी भाभी से कोई आह ऐसे बोलता है क्या?

अजीत: अब चोदने को चोदना ही तो बोलूंगा मेरी प्यारी भाभी,

अजीत कुसुम की चूचियों को ब्लाउज़ के ऊपर से मसलते हुए कहता है,





कुसुम: आह आराम से तुम्हारी बहनिया की नहीं है जो मींझ रहे हो,

अजीत: भाभी की तो है, भाभी ब्लाउज़ खोलो न, चूचियों के दर्शन तो करने दो न ठीक से,

ये कहते हुए अजीत ने उसके ब्लाउज़ के आखिरी हुक को भी खोल दिया और दोनों पाटों को पकड़ कर फैला दिया, और कुसुम की मोटी चूचियां नंगी होकर बह पड़ीं,

हल्के पसीने से भीग कर चमक रही थी, ये नज़ारा देख तो अजीत के होंठ सूखने लगे वो तुरंत उसकी चूचियों को पकड़ कर मसलने लगा,

कुसुम: आह ओह देवर जी अरे पागल हो गए का? पहले ही इतनी देर हो गई है अब छोड़ो और जाने दो, घर पर ढूंढा पड़ गया होगा आह आह आराम से,

अजीत: ओह भाभी ऐसे कैसे जाने दें हमारी हालत देखो, इसे शांत किए बिना नहीं जाने देंगे,

अजीत धक्का देकर अपना कड़क लंड कुसुम के चूतड़ों में चुभाते हुए कहता है, साथ ही उसकी चूचियों को भी लगातार मसल रहा था,

कुसुम: नहीं देवर जी आह बात समझो अभी समय नहीं है, ओह।

कुसुम ने ज़ोर लगा कर उठते हुए कहा, पर जैसे ही वो उठने को ही अजीत ने उसे अपने ऊपर फिर खींच लिया और पकड़ कर उसके होंठों को चूसने लगा, कुसुम भी न चाहते हुए भी उत्तेजित होकर उसका साथ देने लगी,

अजीत: कुछ नहीं होगा भाभी बस ज़रा सी देर की बात है,

अजीत ने कुसुम को आगे धकेलते हुए कहा, और कुसुम को उसके हाथों और घुटनों के बल कर दिया, कुसुम के छिपे हुए मोटे चूतड़ों पर से अजीत ने पेटीकोट का पर्दा ऊपर सरकाया और उसके नंगे चूतड़ों को देख कर उसका लंड ठुमके मारने लगा, जिसे उसने अपने कच्छे से बाहर निकाला, और बिना देरी के घुसा दिया कुसुम की पनियाती चूत में, कुसुम चाहे मुंह से कितना भी मना कर रही थी पर उसका बदन और खासकर उसकी रसीली चूत यही चाहती थी, अजीत भी अपनी भाभी की कमर को थाम कर अपना लंड उसकी चूत में पेलने लगा, अपनी भाभी को चोदते हुए जो मज़ा उसे आ रहा था वो वही जानता था उसे शब्दों में बयां करना मुश्किल था, अपने भाई की पत्नी को चोदने का वर्जित सुख उसे अलग ही एहसास दे रहा था, वहीं वही वर्जित सुख कुसुम को भी मिल रहा था,

अपने ही देवर से यूं खुले में खेत में चुदवाते हुए उसकी चूत गरम होकर लगातार रस बहा रही थी, अजीत लगातार उसकी चूत में थाप लगा रहा था, और कुछ देर की चुदाई के बाद अजीत ने अपना रस अपनी भाभी की चूत में भर दिया और स्खलित होके पीछे होकर हांफते हुए बैठ गया, कुछ पल बाद कुसुम उठी और अपने कपड़े सही किए और साड़ी पहनी और फिर निकल गई, अजीत भी अपने कपड़े ठीक करके खेत के दूसरी ओर से घूमते हुए घर की ओर चल दिया।

कुछ समय बाद ही सोनू अपनी मां के साथ हवेली की ओर जा रहा था, जाते हुए उसके मन में मन्नू की कही बातें घूम रही थीं जो उसे मन ही मन चिढ़ा रही थी, वो मन्नू और कम्मू को बचपन से अपना दोस्त मानता था और आज वही मन्नू उसकी मां के बारे में ये बोल रहा था तो बाकी गांव वालों से क्या उम्मीद की जा सकती है, ये सब सोचते हुए वो हवेली पहुंच गया, रजनी सीधे अंदर चली गई और वो बाग में झाड़ू लगाने लगा और गिरे हुए पत्तों को समेटने लगा, उसका ध्यान बार बार हवेली के दरवाज़े की ओर जा रहा था, वो चाहता था कर्मा जल्दी बाहर आए, उसके साथ बातें करके उसे अच्छा लगता था और वो कहीं न कहीं उसकी परेशानियों को समझता था, उसका हर चीज को देखने का नज़रिया अलग था, काफी देर बाद उसकी इच्छा पूरी हुई और कर्मा हवेली से बाहर आया, उसे बाहर आता देख ही सोनू भाग कर उसके पास पहुंच गया,

सोनू: आज बड़ी देर लगा दी भैया आने में बाहर।

कर्मा: हां यार सोनू आंख थोड़ी देर से खुली, तू बड़ा खुश लग रहा है आज।

सोनू: मैं नहीं तो हमेशा की तरह ही हूं,

कर्मा: अरे खुश रहना चाहिए हमेशा, अच्छा चल एक काम है आज?

सोनू: मैं चलूं? पर यहां का काम?

कर्मा: अरे काम की क्या चिंता माली चाचा हैं न सब कर लेंगे।

सोनू: ठीक है वैसे क्या काम है,

कर्मा: लाली याद है तुझे?

कर्मा ने आगे जीप की ओर बढ़ते हुए कहा,

सोनू: हां वो नाच गाने का कार्यक्रम जो करती है,

कर्मा: हां वही, उससे मिलने चलना है, मन्नू और कम्मू को भी ले चलते हैं।

कर्मा से उनका नाम सुनकर सोनू अंदर से जल भुन गया,

सोनू: फिर भैया तुम उन्हें ही ले जाओ मैं नहीं जा रहा।

कर्मा: अरे तुझे क्या हुआ, मुझे लगा तेरे दोस्तों के साथ जाने में तुझे और अच्छा लगेगा।

सोनू: नहीं मुझे नहीं जाना उनके साथ।

कर्मा: पर क्यों? झगड़ा हुआ क्या तेरा उनके साथ?

सोनू: हां भैया झगड़ा ही समझो, खैर अगर तुम्हारा उनके साथ जब का मन है तो जाओ मैं नहीं जाऊंगा फिर।

कर्मा: तू भी पागल ही है, तेरे वजह से तो मैं उनसे मिलने लगा अब तू नहीं मिलेगा तो मैं क्यों जाऊंगा उनके साथ, पर हुआ क्या ये तो बता? चल आ बैठ अब जीप में,

सोनू: वो नहीं बता सकता भैया।

सोनू जीप में बैठते हुए कहता है,

कर्मा: अरे ऐसी क्या बात है जो तू मुझसे भी छुपाएगा, बता न। कर्मा उसकी ओर देख कर पूछता है, सोनू कुछ सोचता है और फिर उसे सब बता देता है जो मन्नू उसके जाने के बाद बोल रहा था,

कर्मा: साले छोटी सोच के लोग छोटी सोच ही दिखाएंगे।

कहते हुए कर्मा जीप को आगे बढ़ा देता है,

सोनू: सच में कर्मा भैया मैने कभी पैसे या किसी चीज़ के लालच में तुमसे दोस्ती नहीं की पर वो बोल रहा था कि मैं तुम्हे बना रहा हूं।

कर्मा: जानता हूं, कोई बात नहीं बोलने दे सही समय आने पर इसका भी जवाब देंगे, वैसे कम्मू भी कुछ बोला था क्या?

सोनू: नहीं पर मुझे लगता है सोचता तो वो भी ऐसा ही है?

कर्मा: वैसे सोचते तो हम लोग भी हैं उसकी मां और ताई को चोदने की।

कर्मा हंसते हुए कहता है तो सोनू के चेहरे पर भी हंसी आ जाती है,

सोनू: इस मन्नू की मां के बारे में सोच कर भी हिलाना पड़ेगा तभी बदला पूरा होगा मेरा।

कर्मा: वैसे तू सच में बदला लेना चाहता है?

सोनू कुछ सोचता है फिर अपने चेहरे पर गंभीर भाव लाकर बोलता है: हां चाहता हूं क्योंकि उसने गलत किया।

कर्मा: एक तरीका है उससे बदला लेने का पर इसमें तुझे मेरी मदद करनी होगी,

सोनू: क्या तरीका है और मैं कैसे मदद कर सकता हूं?

कर्मा के चेहरे पर एक मुस्कान आ जाती है और जीप आगे बढ़ जाती है,

वहीं हवेली में रजनी धीरे धीरे सीढ़ियों पर चढ़ रही थी उसके हाथ में तेल की सीसी थी, हर सीढ़ी पर उसकी छाती की धक धक बढ़ती जा रही थी, आज बिमला नहीं आई थी तो सोमपाल की मालिश आज उसे ही करनी थी, पिछली बार की बात उसे याद आ रही थी कैसे पिछली बार सोमपाल न उसे छूने की कोशिश की थी पर उसने किसी तरह उसे रोक दिया था, पर क्या वो आज ऐसा कर पाएगी, लेकिन पिछली बार से लेकर अब तक काफी कुछ बदल चुका था, रजनी के मन में वही सब घूम रहा था कि पिछली बार तो रोक लिया था पर क्या इस बार रोक पाएगी? पर फिर उसके मन में खयाल आया क्या वो सच में रोकना भी चाहेगी? ये सोच कर उसके बदन में सिहरन सी हुई, साथ ही उसे अपनी चूत नम होती हुई महसूस हुई, कुछ देर बाद ही वो सोमपाल के कमरे में थी और वहां के दृश्य कुछ ऐसा था,





सोमपाल दीवान पर पैर लटका कर बैठा था वहीं रजनी उसके पैरों की मालिश कर रही थी।

सोमपाल: बाल बच्चे ठीक हैं रजनी बहू?

रजनी: जी बाबूजी तुम्हारे आशीर्वाद से सब ठीक हैं।

सोमपाल: अरे हमारा आशिर्वाद तो हमेशा बना रहेगा, वैसे दिलीप आया था क्या दोबारा।

रजनी: नहीं बाबूजी उस दिन के बाद नहीं आए,

सोमपाल: इस नालायक के मन में भी भूसा भरा है, बताओ इतनी सुंदर औरत को छोड़ न जाने कहां भटकता रहता है,

रजनी: छोड़ो बाबूजी, वो न आएं तो ही अच्छा है, बिना उनके हम लोग ज़्यादा खुश हैं।

सोमपाल: पर मर्द की कमी तो सताती होगी तुझे हर औरत को मर्द की जरूरत होती ही है।

रजनी: नहीं बाबूजी हमें इतना समय नहीं मिलता कि अपने बारे में कुछ सोचा जाए, वैसे भी घर पर बच्चे हैं और यहां सब लोग तो खयाल ही नहीं रहता और कुछ।

सोमपाल: अरे खयाल रखा कर अपना, अभी बहुत जवानी बची है तुझमें।

इस बात पर रजनी कुछ नहीं बोली और मालिश करती रही,

सोमपाल: वैसे नीलेश ठीक से खयाल तो रख रहा है न तेरा?

सोमपाल की बात का मतलब रजनी समझ गई थी पर बात घुमाते हुए बोली: हां साहब के साथ साथ जीजी और बाकी सब भी अच्छे हैं बहुत मान करते हैं।

ये कहते हुए वो तेल की सीसी उठाने के लिए झुकी तो उसके कंधे से पल्लू नीचे सरक पड़ा, और उसके ब्लाउज़ का ख़ज़ाना और उसका मांसल मादक पेट और कमर सोमपाल की आंखों के सामने आ गया। रजनी ने तुरंत अपने पल्लू को उठाने की कोशिश की तो सोमपाल ने उसका हाथ पकड़ लिया: अरे अब गिर गया है तो रहने दे, मुझे तो तू ऐसे ही अच्छी लग रही है,

रजनी कुछ नहीं बोली और सिर झुका कर रह गई, सोमपाल जैसा अनुभवी आदमी रजनी की चुप्पी को तुरन्त भांप गया और उसकी कमर में हाथ डाल उसे अपनी गोद में खींच लिया,





रजनी भी कपड़े की गुड़िया की तरह उसकी गोद में खिंचती चली गई, सोमपाल के हाथ रजनी के पेट और कामुक कमर पर फिसलने लगे,

सोमपाल: ओह रजनी बहू, तो तो पूरी मलाई है मलाई, बहुत मज़ा आएगा तुझे चखने में।

उसने रजनी के कोमल बदन को मसलते हुए बोला,

रजनी कुछ नहीं बोली सिर झुका कर बैठी रही,

सोमपाल: अरे शर्मा क्यों रही है, खुल कर आनंद ले तेरा बदन शर्माने वाला नहीं है खुल के मज़े लेने वाला है,

सोमपाल ने उसकी कमर को और चूतड़ों को मसलते हुए कहा,

रजनी के मुंह से हल्की सी सिसकियां निकल रही थी,

सोमपाल ने उसका चेहरा ऊपर उठाया, रजनी की आंखें अब भी झुकी हुई थी,

सोमपाल: अरे मत शर्मा बहू मुझे भी अपना ही मान,

ये कहते हुए सोमपाल ने अपने रूखे होंठो को रजनी के रसीले और कोमल होंठों से मिला दिया और उसके होंठों का रस पीने लगा, रजनी की उत्तेजना भी हर पल के साथ बढ़ रही थी, और फिर वो अपने बदन से काबू खोने लगी और अगले ही पल आक्रामक होकर सोमपाल के होठों को चूसने लगी।





रजनी का ये अक्रामक अंदाज और गर्मी देख सोमपाल के तो मज़े ही आ गए वो रजनी के बदन पर हाथ फिराते हुए उसके रसीले होंठों का आनंद लेने लगा, रजनी भी उसका पूरा साथ दे रही थी,

काफी देर बाद दोनों के होंठ अलग हुए तो दोनों हांफ रहे थे,

सोमपाल: आह कितनी स्वादिष्ट है बहू तो मज़ा आ गया तेरे इन होंठो से तेरी जवानी का रस पी कर,

सोमपाल ने उसके बदन को सहलाते हुए कहा, रजनी कुछ नहीं बोली पर उसके चेहरे पर कामुक मुस्कान फैल गई,

सोमपाल के हाथ धीरे धीरे रजनी के ब्लाउज़ पर पहुंच गए और उसके ब्लाउज़ के हुक को एक एक करके खोलने लगे,

सोमपाल: आह सब्र नहीं हो रहा इन्हें देखने का,

सोमपाल ने आख़िरी हुक खोलते हुए कहा और फिर ब्लाउज़ के दोनों पाटों को पकड़ कर फैला दिया, और रजनी की मोटी मोटी चूचियां बाहर आ गई उसकी आंखों के सामने जिन्हें देखते ही सोमपाल उन पर टूट पड़ा। और एक चूची को मुंह में भर कर चूसने लगा तो वहीं दूसरी को हाथों से मसल रहा था,

रजनी: ओह आह आह यहम्मम बाबूजी आह हौले से।

रजनी भी गरम होकर सोमपाल के सिर में हाथ फ़िराते हुए आहें भर रही थी, सोमपाल ने एक चूची को छोड़ा तो दूसरी पर टूट पड़ा और उसकी हरकतों का असर रजनी पर भी बहुत हो रहा था, उसे रोकने का खयाल तो दूर दूर तक उसके मन में नहीं था, उसकी चूचियों को जी भर के चूसने केबाद सोमपाल ने उसे खड़ा किया और उसके पेट और कमर को चूमने लगा, रजनी उसे अपने बदन पर दबा रही थी,





सोमपाल: यहम्मम उम्म सच में पूरी की पूरी मलाई है तू रजनी,

रजनी: आह बाबूजी ओह चाट लो आह मलाई को ओह आह्ह्ह्ह।

रजनी अचानक से सिसकी क्योंकि सोमपाल ने अपनी जीभ उसकी नाभि में घुसा दी थी, रजनी का पूरा बदन उत्तेजना से कांप रहा था,

रजनी: आह ओह बाबूजी आह खा जाओ ओह आह आज चाट लो मेरी नाभि का सारा रस ओह अहम मां।

रजनी गरम होकर बडबडा रही थी, वहीं सोमपाल अपना अनुभव का पूरा फायदा उठा रहा था और रजनी के बदन से इस तरह से खेल रहा था की रजनी की उत्तेजना बढ़ती जा रही थी, सोमपाल ने उसकी नाभि को चाटते हुए उसकी साड़ी को खोलना शुरू कर दिया, और साड़ी के बाद उसके पेटीकोट को भी पकड़ कर नीचे खींच दिया, बिना अपनी जीभ उसकी नाभि से हटाए, रजनी इतनी गरम हो चुकी थी कि अपने खुले हुए ब्लाउज़ को उसने खुद ही उतार फेंका और अब सोमपाल के सामने बिल्कुल नंगी खड़ी थी, सोमपाल ने अपना मुंह उसके पेट से हटाया और उसके नंगे बदन को ऊपर से नीचे तक देखने लगा, उसकी आंखों में रजनी के बदन को देखते हुए भूख बढ़ती जा रही थी, फिर जैसे उसे कुछ याद आया वो झटके से उठा और उठकर तेल की सीसी उठाई और उसे खोल कर रजनी के बदन पर तेल डालने लगा,

रजनी: अरे बाबूजी ये क्या कर रहे हैं आह तेल खराब हो जाएगा,

सोमपाल: अरे तू देखती जा रजनी इस तेल का मज़ा,

सोमपाल ने ये कहते हुए और तेल उसके बदन पर डाल दिया और फिर कुछ अपने ऊपर भी लगा लिया, फिर रजनी को बिठा कर उसके पीछे आकर उसकी चूचियों को मसलने लगे,





रजनी को अपने बदन पर चिकने तेल का एहसास ऊपर से सोमपाल के हाथों का उसकी चूचियों को मसलना अलग सुख दे रहा था उसके खुद के हाथ उसके चिकने बदन पर फिसलने लगे, कभी वो अपनी कमर मसलती तो कभी खुद की चूत के पास से उंगलियां चलाती उसे बहुत अच्छा लग रहा था जो भी हो रहा था,

सोमपाल: क्यों रजनी आह कैसा लग रहा है?

रजनी: ओह बाबूजी तेल के साथ ऐसा खेल कभी नहीं खेला आह,

सोमपाल: अभी तो बस शुरुआत है बहू,

ये कहते हुए सोमपाल ने अपनी धोती खोल दी और अपना काला मोटा लंबा लंड बाहर निकाल लिया जिसे देखते ही रजनी की नज़रें उस पर जम गईं।

सोमपाल: इसकी भी तेल से मालिश कर दे बहू।

रजनी को जैसे होश आया और वो उठ कर हाथ में तेल लेकर उसने अपनी उंगलियां पर मल कर अपने हाथों में सोमपाल के लंड को भर लिया और सोमपाल की आंखें मजे से बंद हो गई। वहीं रजनी भी उसके लंड को लगातार देख रही थी और सहला रही थी,

सोमपाल: कैसा है मेरा हथियार बहू तुझे पसंद आया?

सोमपाल ने उसके बदन को सहलाते हुए बोला,

रजनी: आह बाबूजी बहुत मोटा और सख्त है आह कितना लंबा भी है, मुझे बहुत पसंद आ रहा है।

ये कहते हुए रजनी खुद को रोक नहीं पाई और उसके टोपे को मुंह में भर लिया, सोमपाल के मुंह से आह निकल गई।

रजनी तो पागलों की तरह उसे चूसने लगी, दोनों हाथों से उसे मसलते और सहलाते हुए,





सोमपाल रजनी के मुंह को उसके लंड पर दबाने लगा, और अपनी कमर को धीरे धीरे हिला रहा था,

सोमपाल: आह बहू ओह तू तो जादू कर रही है रजनी आह आह ओह कितना गरम है री तेरा मुंह आह।

रजनी पर तो जैसे वासना का भूत चढ़ चुका था वो बिना रुके लगातार चूसे जा रही थी,

दूसरी ओर उसके घर पर जहां नेहा और मनीषा इस समय अकेली थीं कोई दरवाज़ा पीट रहा था,

नेहा: पता नहीं कौन है जो ऐसे दरवाज़ा पीट रहा है मनीषा देख तो जाके,

मनीषा उठ कर जाती है और गुस्से में दरवाज़ा खोलती है सामने जो था उसे देख वो डर जाती है, सामने दिलीप खड़ा था, और उसके पीछे कोई आदमी था,

मनीषा: पापा तुम अभी?

दिलीप: मनीषा बिटिया मां कहां है तेरी?

मनीषा हिचकते हुए जवाब देती है: वो तो वो हवेली गई हैं।

दिलीप: अच्छा, नेहा तो अंदर ही है न, आओ भूरेलाल भाई।

ये कहते हुए दिलीप भूरेलाल के साथ अंदर घुस जाता है, अंदर नेहा भी अपने बाप को देख थोड़ा डर जाती है,

वहीं हवेली में सोमपाल से रजनी के मुंह की गर्मी ज़्यादा देर बर्दाश्त नहीं हुई तो उसने अपना लंड उसके मुंह से निकाल लिया था और रजनी की गरम और रसीली चूत में घुसा दिया था और धीमे मगर लंबे लंबे धक्के लगा कर उसे चोद रहा था,





रजनी अपनी टांगों को फैलाएं लेटी थी और सोमपाल के लंड को अपनी चूत में महसूस कर आनंद से भर रही थी, उसके मुंह से लगातार आहें निकल रही थी।

उसे यकीन नहीं हो रहा था कि वो एक परिवार की तीनों पीढ़ियों से चुदवा चुकी थी, कल अपनी उम्र से आधे अपने बेटे की उम्र के कर्मा से चुदी थी तो आज अपने ससुर या बाप की उम्र के सोमपाल से चुद रही थी, और उसे ये सब बातें और उत्तेजित कर रही थी,

रजनी: आह आह आह बापूजी आह आह और तेज धक्के आह मारो मेरी चूत में आह बापूजी आह अपनी रंडी बना कर चोदो मुझे आह आज मेरी चूत फाड़ दो।

रजनी अब अपनी सारी शर्म और झिझक सब भूल चुकी थी, तेल में चिकना हुआ सोमपाल का लंड जिस तरह चिकना हो कर उसकी चूत में अंदर बाहर हो रहा था और जिस चिकनाहट से वो अंदर बाहर फिसल रहा था वो रजनी को बहुत मज़ा दे रही थी।

सोमपाल: आह रजनी तू मेरी रंडी ही है साली आह मेरे बेटे से तो बहुत चुदवा लिया तूने आह रंडी अब मुझसे चुद आह।

सोमपाल रजनी को चोदते हुए बोल रहा था और रजनी को उसकी बातें और उत्तेजित कर रही थी,

रजनी: आह हां बापूजी चोदो आह बेटे के बाद अब तुम भी चोद लो आह पोते से भी चुदवा चुकी हूं मैं आह आह।

सोमपाल: अच्छा साली बहुत बड़ी रंडी है तू तो आह मेरे पोते का स्वाद भी चख चुकी है तू? आह साली क्या माल है तू?

रजनी: आह ओह सिर्फ पोते का ही नहीं आह आह आह बापूजी, आह तुम्हारी बहू आह का भी, आह जीजी की आह रसीली चूत भी चाटी है आह मैने,

अपनी बहू का नाम सुनकर तो सोमपाल के लिए खुद को रोकना और काबू में रहना बहुत मुश्किल हो गया वो रजनी के ऊपर आ गया और उसके पैरों को पीछे की ओर मोड़ कर उसे तगड़े और लंबे धक्कों से चोदने लगा, रजनी भी उसके ऐसे खूंखार झटके नहीं सह पाई और झड़ने लगी





सोमपाल भी अधिक देर नहीं रुक पाया और उसने अपने लंड को जड़ तक रजनी की चूत में ठूंस दिया और झड़ने लगा, और उसकी चूत को अपने रस से भर दिया फिर हांफते हुए। हांफते हुए पीछे स्खलित होकर बैठ गया, रजनी तो मानो बेसुध सी पड़ी थी उसके सामने, सोमपाल ने भी पीछे टिक कर आंखें मूंद ली।



जारी रहेगी
 
सोमपाल भी अधिक देर नहीं रुक पाया और उसने अपने लंड को जड़ तक रजनी की चूत में ठूंस दिया और झड़ने लगा, और उसकी चूत को अपने रस से भर दिया फिर हांफते हुए। हांफते हुए पीछे स्खलित होकर बैठ गया, रजनी तो मानो बेसुध सी पड़ी थी उसके सामने, सोमपाल ने भी पीछे टिक कर आंखें मूंद ली।

अध्याय 15


कर्मा और सोनू जीप से हवेली के थोड़ा आगे बढ़ ही रहे थे कि उन्हें सामने से भागती हुई मनीषा दिखती है चिल्लाती हुई, बदन पसीने से तर रोते हुए, उसे देखते ही कर्मा जीप रोक देता है और सोनू झट से उतर कर उसे संभालता है।





सोनू: क्या हुआ जीजी तुम रो क्यों रही हो क्या हुआ,

सोनू घबराते हुए पूछता है, इतने में कर्मा भी उतर कर उनके पास आ जाता है,

मनीषा: सोनू वो वो नेहा जीजी को पापा, पापा जीजी को।

मनीषा हांफते हुए बोलती है पर कुछ ठीक से बोल नहीं पाती।

कर्मा: आराम से बताओ क्या हुआ? सांस लेकर।

मनीषा: पापा किसी आदमी के साथ आए थे और जीजी को जबरदस्ती उठा ले गए बोल रहे थे उस आदमी से उसका ब्याह करवाएंगे।

मनीषा रोते हुए कहती है तो सोनू के पैरों तले ज़मीन खिसक जाती है, उसे समझ नहीं आता अब क्या करे,

कर्मा: तुझे उसका नाम पता है? कौन आदमी था? कहां ले गए हैं?

मनीषा: हां वो कोई भूरेलाल था, सोनू जीजी को बचा ले कैसे भी,

मनीषा रोती है, वहीं कर्मा तुरंत जीप की ओर भागते हुए कहता है: सोनू मनीषा जल्दी जीप में बैठो।

सोनू को तो कुछ समझ नहीं आ रहा था वो कर्मा के कहने से तुरंत जीप में बैठ जाता है मनीषा भी, सोनू को अब कर्मा से ही उम्मीद थी। कर्मा जीप को तुंरत तेजी से आगे दौड़ा देता है।

सोनू: भैया तुम जानते हो भूरेलाल को?

सोनू खुद को संभालते हुए कहता है, उसकी आवाज रुआंसी हो गई थी, आंखों में नमी थी पर वो किसी तरह खुद को रोक कर बैठा था क्योंकि वो नहीं चाहता था उसे रोते देख मनीषा भी हिम्मत खोए।

कर्मा: अरे दो गांव आगे गांव है न छुट्टापुर वहीं का है, साला तेरे पापा से भी बड़ा है और ब्याह करने चला है भोसड़ी वाला।

कर्मा गाली देकर मनीषा की ओर देखता है जैसे उसके सामने न देना चाहता हो पर मनीषा को अभी इस सब के बारे में कोई ध्यान ही नहीं था वो अपनी बहन की चिंता में मरी जा रही थी। और रोए जा रही थी,

कर्मा: अरे मनीषा रो मत कुछ नहीं होगा,

कर्मा जीप की गति को और बढ़ा देता है और कुछ ही मिनटों में वो लोग उस गांव में घुस रहे होते हैं, घुसते ही कर्मा एक आदमी से पूछता है ये भूरेलाल का घर कहां है, आदमी उन्हें रास्ता बताता है और वो आगे बढ़ जाते हैं, कर्मा थोड़ी देर बाद भूरेलाल के घर के बाहर जीप रोकता है, सोनू देखता है उसका बाप बाहर खाट पर चबूतरे पर पड़ा हुआ है, दोनों जल्दी से जीप से कूदते हैं, पीछे पीछे मनीषा भी आती है,

दोनों दिलीप के पास पहुंचते हैं, सोनू उसे कॉलर पकड़ कर गुस्से में उठाता है: पापा उठो बताओ जीजी कहां है, बताओ,

पर दिलीप तो बेसुध सा होता है बस कुछ बड़बड़ाता है इतने में कर्मा आगे आकर दिलीप के दो तीन तमाचे रसीद देता है, और दिलीप की आँखें खुल जाती हैं, अपने ही बाप को पिटते देखना किसी भी संतान के लिए दुखी करने वाला होता है पर सोनू और मनीषा को कर्मा के थप्पड़ों की आवाज कानों में संगीत जैसी लगती है,

कर्मा: बता नेहा कहां है, भूरेलाल कहां है,

दिलीप कुछ बोलता इससे पहले ही एक चीख उनके कानो में पड़ती है, और मनीषा चिल्लाती है: जीजी।

आसपास के लोग भी जमा हो गए थे,कर्मा और सोनू दिलीप को छोड़ते हैं और घर के अंदर भागते हैं, जहां आंगन पूरा खाली पड़ा था, कर्मा देखता है एक कमरे का दरवाज़ा भिड़ा है, वो आगे बढ़ता है और दरवाज़े में लात मारता है, किवाड़ खुल जाते हैं ये तीनों अंदर देखते हैं तो देख कर सोनू और मनीषा की आंखें फैल जाती हैं, अंदर एक खाट पर नेहा बैठी थी उसका सूट वहीं नीचे पड़ा था वो कमर से ऊपर बिल्कुल नंगी थी, अपने दुपट्टे और हाथों से अपनी छातियों को ढंक रखा था, रो रही थी, आंसुओं से चेहरा भीगा हुआ था, उसके बगल में भूरेलाल खड़ा था उसे चूमने की कोशिश कर रहा था पर जैसे ही किवाड़ खुले और उसने सामने देखा तो वो चौंक कर पीछे हो गया।





भूरेलाल: अरे कौन कौन हो तुम लोग और अंदर कैसे घुसे आ रहे हो, निकलो बाहर,

वहीं नेहा अपने भाई और बहन को देख कर और तेज रोने लगती है, साथ ही उसकी जान में जान आती है,

कर्मा: तेरा बाप हूं भेंचोद।

कर्मा और सोनू भूरेलाल की ओर लपकते हैं वहीं मनीषा आगे बढ़ कर नेहा का सूट उठा कर उसके ऊपर डालती है जिसे नेहा तुरंत मनीषा की आड़ में पहन लेती है दोनों बहनें एक दूसरे से चिपट कर रोने लगती हैं वहीं कर्मा और सोनू दोनों मिलकर भूरेलाल की कनपटी लाल कर रहे होते हैं और उसे मारते हुए कमरे से बाहर निकालते हैं

भूरेलाल: बहन के लौड़ों तुम जानते नहीं मैं कौन हूं तुम दोनों की मैया चोद दूंगा मैं।

भूरेलाल मार खाते हुए गाली देता है और गाली सुनकर कर्मा का गुस्सा बढ़ जाता है वो भूरेलाल को पागलों की तरह मारना शुरू कर देता है, भूरेलाल बचने के लिए बाहर भागता है, जहां आसपास के लोग उसे देखते हैं कर्मा उसके पीछे होता है, उसके बालों को पकड़ कर नीचे गिरा कर लातों से मारते हुए कहता है: मादरचोद तेरी इतनी हिम्मत तू मुझे गाली देगा, जानता है मैं कौन हूं, जानता है? तेरी हिम्मत कैसे हुई मुझे गाली देने की।

कर्मा का गुस्सा हर बढ़ते पल के साथ बढ़ रहा था और भूरेलाल की हालत खराब हो रही थी, सोनू भी पीछे हो गया था कर्मा का गुस्सा देख कर वहीं भूरेलाल हाथ जोड़कर गिड़गिड़ा रहा था कर्मा से उसे छोड़ देने के लिए, आस पास के किसी की हिम्मत नहीं हो रही थी आगे आने की कुछ तो पहचान गए थे ये सोमपाल का नाती है और फिर आगे आने का सवाल ही पैदा नहीं होता था, मनीषा और नेहा भी बाहर आ गईं थी, और कर्मा को भूरेलाल को मारते देख नेहा बोली: सोनू रोक उसे नहीं तो ये उसे मार ही डालेगा,

कर्मा का ये रूप देख कर तो सोनू को खुद डर लग गया था, सोनू हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था आगे जाने की इतने में अचानक कर्मा के सामने नेहा आ जाती है और कर्मा रुक जाता है, नेहा हाथ जोड़कर उससे कहती है: इसे छोड़ दो, शांत हो जाओ, मर जाएगा ये, छोड़ दो इसे।

कर्मा नेहा को देख रुक जाता है और पीछे हो जाता है, और भूरेलाल से कहता है: अब अगर गांव के आस पास भी दिख गया न तो वहीं मार के गाड़ दूंगा।

कर्मा ये कह के आगे बढ़ जाता है और जीप में जाकर बैठ जाता है, सोनू भी उसके पीछे चलता है, नेहा दो कदम आगे बढ़ती है फिर रुक कर अपनी चप्पल उतारती है और अपने बाप के दो तीन बार कस कस के लगाती है, दिलीप नशे में रोने लगता है, दोनों बहनें जीप में बैठ जाती हैं, और जीप आगे बढ़ जाती है, जीप के आगे बढ़ते ही गांव वाले आगे आ कर भूरेलाल को उठाते हैं, जो मुंह से खून थूकते हुए कहता है: इसका बदला ज़रूर लूंगा, ये मार नहीं भूलूंगा मैं।

जीप सज्जनपुर की ओर बढ़ रही थी, दोनों बहनें खामोश थी सोनू खुश था कि उसके परिवार के सिर से अचानक आई मुश्किल हट गई थी, वो भी कर्मा की वजह से उसकी आंखों में कर्मा के लिए बढ़ता हुआ मान साफ दिख रहा था, वहीं नेहा भी पीछे बैठे हुए कर्मा को देख रही थी और कुछ सोच रही थी।

तभी कर्मा बोला: सुन मनीषा इस बारे में किसे किसे पता है?

मनीषा: किसी को नहीं बताया मैने, मैं तो सीधी भाग कर हवेली ही आ रही थी,

कर्मा: अच्छा है, और किसी को बताना भी मत बेकार में लोग बातें बनाएंगे और बदनामी होगी,

ये सुनकर सब उसकी बात से सहमत होते हैं, नेहा उसे एक टक देखे जा रही थी, जैसे उसे वो कर्मा नज़र नहीं आ रहा था जो आज तक दिखा था कोई नया इंसान नज़र आ रहा था,

तभी मनीषा बोली: और मां को?

सोनू: हां मां को तो बताना पड़ेगा।

कर्मा: बताना, पर अभी नहीं जब शाम को वो घर आ जाएं तब आराम से,

मनीषा: हां ये सही रहेगा, और तुम्हारा बहुत बहुत धन्यवाद कर्मा, आज तुम नहीं होते तो अनर्थ हो जाता,

कर्मा: अरे ये सब छोड़,

नेहा: सच कह रही है मनीषा कर्मा, आज तुम नहीं होते तो मैं,

ये कह नेहा चुप हो जाती है, और उसकी आंखों से आंसू झलक पड़ते हैं,

कर्मा: अरे रोना बंद करो तुम लोग अब, जो होना था हो गया, ये लो तुम्हे रोते देख बादल भी रोने लगे,

कर्मा ने बाहर देखते हुए कहा क्योंकि बूंदे पढ़ने लगी थी, ये सुनकर नेहा और बाकी सब के चेहरों पर मुस्कान आ गई,

सोनू: लगता है जीजी का बादलों से तार जुड़ा है।

सोनू ने हंसते हुए कहा,

कर्मा: वैसे सोनू इस मौसम में समोसे का अलग ही मज़ा है, ये कहते हुए कर्मा जीप को हलवाई की दुकान के पास रोक देता है और उतर जाता है, और कुछ देर बाद ही एक थैली लेकर आता है,

कर्मा: अब करेंगे समोसे की दावत।

नेहा: अरे इन सब की ज़रूरत नहीं थी कर्मा!

कर्मा: क्यों नहीं थी उस भूरेलाल को मार मार के भूख लग गई मुझे क्यों सोनू तुझे नहीं लगी?

सोनू: हां लग तो रही है थोड़ी सी।

कर्मा: वैसे मनीषा तुझे समोसा खाना है तो थोड़ी मेहनत करनी पड़ेगी?

मनीषा: क्या मेहनत?

कर्मा: चाय बनानी पड़ेगी।

कर्मा की बात सुनकर सबके चेहरों पर मुस्कान आ जाती है, कुछ देर बाद सब सोनू के घर में होते हैं चाय और समोसे का लुत्फ उठा रहे होते हैं, नेहा अब भी छिप छिप कर कर्मा को देख रही होती है, बाहर रिमझिम बारिश हो रही होती है।

जहां ये लोग बारिश का लुत्फ उठा रहे होते हैं वहीं सुमन को बारिश की वजह से परेशानी हो रही होती है, बारिश शुरू होते ही सुमन चबूतरे पर भागी गाय को अंदर करने के लिए, जैसे ही खोल कर उसे छप्पर में बांधने को चली गाय ने झटका मारा और सुमन के हाथ से रस्सी छूट गई और गाय भागने लगी,

सुमन: अरे दैय्या, ऐ ले ले ले आ आ आ, अरे जीजी, ओह धीरज गय्या खुल गई,

धीरज जो घर के अंदर था और खाना खा रहा था अपनी चाची की आवाज़ सुनकर वो भी भागा,

सुमन चिल्लाते हुए गाय के पीछे भागी वहीं गाय तो कुलांदे मारते हुए खेत में घुस गई थी और हरी घास चरने लगी, सुमन दबे पांव उसके पास पहुंच गई और उसकी रस्सी को पकड़ लिया इतने में धीरज भी चबूतरे पर आ गया था, सुमन रस्सी पकड़ कर गाय को लेकर घर की ओर चल दी।





धीरज ने देखा उसकी चाची ने गाय पकड़ ली है तो वो उसकी ओर आराम से बढ़ने लगा सुमन भी गाय को लेकर आगे बढ़ने लगी, इसी बीच अचानक से सुमन की चीख फिर सुनाई दी, धीरज ने आगे बढ़ कर देखा तो उसकी चाची नीचे गिरी हुई थी और गाय पीछे की ओर भागी जा रही थी, धीरज आगे की ओर तुरंत भागा और चाची के पीछे जा कर रुक गया, उसकी नज़र सामने के दृश्य पर टिक गई उसके कदम धीमे पड़ गए, उसकी चाची ज़मीन पर गिरी पड़ी थी पीठ उसकी ओर थी पीछे गाय भागी जा रही थी, पर धीरज की नज़र तो उसकी चाची के थिरकते चूतड़ों पर थी जो उसके गिरे होने से उसे और उभर के दिख रहे थे और सुमन जब उठने की कोशिश कर रही थी तो उसके चूतड़ हिल रहे थे, धीरज की सांसें बारिश में भी गरम होने लगी





वो धीरे धीरे आगे बढ़ा सुमन की ओर, उसे वो मन ही मन सोचने लगा, आज फिर से करना पड़ेगा हाय चाची, ऐसे चूतड़ दिखाओगी तो क्या होगा मेरा?

धीरज कई सालों से अपनी चाची सुमन के बारे में सोच सोच कर मुट्ठी मारता था, उसने कितना ही रस अपनी चाची के नाम पर बहा दिया था, इसकी शुरुआत हो तब हुई थी जब उसने सुमन को एक बार चांदनी रात में आंगन के पास मोरी के ऊपर पेशाब के लिए बैठे देखा था, वो खुद पेशाब के लिए उठा था और जैसे ही मोरी के पास पहुंचा तो देखा चांदनी में उसकी चाची बैठी थी साड़ी पीछे से उठी हुई थी उसके गोरे गोल और मोटे चूतड़ चांद की रौशनी में चमक रहे थे, धीरज तो वो दृश्य देख कर जम गया था, उसके बाद उस दृश्य को सोच कर उसने न जाने कितनी बार हिलाया, उसके बाद से उसका सुमन को देखने का नज़रिया ही बदल गया था, वो तलाश में रहता कि सुमन के बदन का कुछ हिस्सा कभी नजर आ जाए, उसका ब्याह तय हो गया था पर उसके दिमाग पर सुमन का बदन छाया हुआ था, सब विचारों को झटक कर वो आगे बढ़ा और सुमन के पास पहुंचा,

धीरज: चाची क्या हुआ लगी तो नहीं?

सुमन: पैर मुड़ गया है लल्ला,

सुमन कराहते हुए बोली।

धीरज: चलो उठो घर चलो,

सुमन: और गय्या?

धीरज: अरे उसे मैं पकड़ लूंगा बाद में यहीं खेतों में चरती रहेगी।

धीरज ने कहा और हाथ दिया और सुमन को सहारा देकर खड़ा कर लिया, सुमन भी एक हाथ धीरज के कंधे पर रख कर खड़ी हो गई उसके पैर में मुड़ने की वजह से दर्द था, धीरज ने भी अपना हाथ अपनी चाची की कमर पर रख लिया, और ऐसा करते ही धीरज के बदन में बिजली दौड़ गई उसका लंड कड़क होने लगा, सुमन ने एक कदम बढ़ाया तो उसे थोड़ा दर्द हुआ और उसका फायदा उठाते हुए धीरज ने अपना दूसरा हाथ भी उसकी कमर पर रख दिया और बोला: चाची आराम से, धीरे पैर पे वजन मत डालो,

सुमन का तो सारा ध्यान अपने पैर के दर्द पर था वहीं धीरज को तो जैसे बिन मांगे ही बहुत कुछ मिल गया था, उसके हाथों में सुमन की कामुक और मांसल कमर का एहसास उसे गर्म कर रहा था सुमन चलते हुए उससे बातों में लगी थी और पैर के दर्द की वजह से कराह रही थी वहीं धीरज के हाथ उसके पेट पर फिसल रहे थे।





सुमन उस पर इतना ध्यान नहीं दे रही थी उसके लिए तो धीरज उसे सहारा ही दे रहा था, कुछ पल बाद ही वो लोग घर पहुंच गए और धीरज ने सुमन को बैठा दिया,

कुसुम: अरे क्या हो गया सुमन?

कुसुम ने अपनी देवरानी से चिंता से पूछा तो सुमन ने सारी बात बताई, धीरज उसे छोड़ कर गाय पकड़ने चला गया,

कुसुम: ये गय्या भी बड़ी ऊधमी हो गई है, एक बखत का चारा नहीं मिले तो सब अक्ल आ जाए। ला मैं बाम मल दूं।

सुमन: धत्त जीजी तुमसे पैर में हाथ लगवाएंगे,

कुसुम: अरे कुछ हो थोड़ी जाएगा, अच्छा छोड़ ए मंजू, अनामिका इधर आओ बाम लगा दो छोटी के पैर में,

सुमन: अरे जीजी अभी नहीं कपड़े बदल लूं, साड़ी भीग गई है न।

कुसुम: अच्छा हां बदल ले कपड़े जाकर, चल लेगी मैं चलूं?

सुमन: अरे नहीं जीजी चल लूंगी इतनी नहीं लगी बस पैर मुड़ गया था,

सुमन धीरे धीरे अपने कमरे में चली जाती है, वहीं कम्मू भी बारिश के मजे लेते हुए खेत से भीगता हुआ आ रहा था जब उसने धीरज को गाय के पीछे भागते देखा तो भाग कर जाकर उसने गाय की रस्सी पकड़ ली,

कम्मू: लो भैया पकड़ ली, आज फिर खुल गई थी।

धीरज: और क्या? और तू बस घूमता ही रहियो पता है इसके पीछे भागने के चक्कर में पता है चाची का पैर मुड़ गया।

कम्मू: हैं लग गई क्या मां को?

धीरज: हां लगी तो है ही।

कम्मू ने ये सुना तो सरपट दौड़ लगा दी घर की ओर और भागता हुआ सीधा घर में घुसा सामने अंजू पड़ी तो उससे पूछा: जीजी मां कहां है?

अंजू: कमरे में हैं।

कम्मू तुरंत किवाड़ खोल कर कमरे में पहुंचता है और सामने देखता है उसकी मां सुमन पेटीकोट और ब्रा में खड़ी थी और अपने बालों को सुखा रही थी,





सुमन: अरे कहां बावरे सांड की तरह भाग रहा है, घर में भी। किवाड़ फेर।

कम्मू तुरंत मूड कर किवाड़ फेरता है और कहता है

कम्मू: मां तुम्हारे लग गई है क्या? तुम क्यों गईं गाय के पीछे कोई और पकड़ लेता,

कम्मू ने चिंता से कहा,

सुमन: तू बाहर हांडता रहेगा तो मुझे ही जाना पड़ेगा न।

कम्मू का ये सुनकर मुंह बन जाता है और वो मुंह लटका कर बोलता है: मां आगे से ऐसा नहीं होगा, अब से मैं घर पर ही रहूंगा तुम्हारा खयाल रखूंगा। बाम लगा दूं?

सुमन: अच्छा अच्छा ठीक है इतनी भी नहीं लगी है बस पैर मुड़ ही तो गया है हो जाएगा ठीक मुंह मत बना।

सुमन ने मुस्कुराते हुए कहा, उसे अपने बेटे को अपनी फ़िक्र करते देख अच्छा लग रहा था, वहीं मां की बात सुनकर कम्मू के मुंह पर भी मुस्कान आ गई, वहीं कम्मू को चिंता के मारे ये ध्यान ही नहीं था कि उसकी मां उसके सामने सिर्फ ब्रा और पेटीकोट में हैं, अब सिर से चिंता हटी तो उसकी नज़र सुमन के बदन पर फिसलने लगी और उसके बदन में सिहरन होने लगी, वहीं सुमन के लिए ये आम था अपने बेटे के सामने पेटीकोट और ब्रा में रहना इतनी बड़ी कोई बात नहीं थी,

कम्मू को अपनी ओर देखता पाया तो सुमन को लगा वो अब भी उसकी चिंता कर रहा है तो वो बोली: अरे कहा तो ठीक हूं मैं और जा तू भी कपड़े बदल ले पूरा गीला हो रखा है, कम्मू का ध्यान लौटा और वो कमरे से निकल गया, उसका लंड लेकिन तब तक पूरी तरह कड़क हो चुका था, कमरे से बाहर आकर उसके बदन में कामुकता छाने लगी उसकी मां का बदन उसकी आंखों के सामने घूमने लगा, उसका लंड तुरंत पूरी तरह कड़क हो गया, उसका मन हुआ कि फिर से मां के बदन को सोच कर हिलाया जाए, और वो इस रोमांच से खुद को रोक नहीं सका, पर कहां? बाहर बारिश हो रही है फिर उसे याद आया गाय वाले छप्पर में एक ओर चारा और भूसा पड़ा रहता हैं उधर आड़ भी रहती है वो जगह सबसे सही रहेगी। कम्मू सबसे नज़रें बचाते हुए जल्दी से उधर लपका, और जैसे ही छप्पर के अंदर पहुंचा तो उस भूसे के ढेर के उस ओर से एक आह सुनाई दी, उस आह को सुनकर उसके कान खड़े हो गए, वो दबे पांव आगे बढ़ा और बड़ी सावधानी से सिर आगे कर झांक कर देखा तो उसकी आँखें चौड़ी हो गईं, उसने देखा कि सामने उसके धीरज भइया थे जो चारे की एक गठरी पर बैठे थे पैंट खुली थी उनके हाथ में उनका कड़क लंड था जिस पर हाथ तेजी से आगे पीछे हो रहा था धीरज का चेहरा ऊपर उठा हुआ था मुंह खुला हुआ था और आंखें बंद थी, मुंह से बहुत हल्की आहें निकल रहीं थीं।

अपने बड़े भाई को इस तरह देख कर पहले तो धीरज को अजीब लगा पर एक जिज्ञासा भी हुई और वो सोचने लगा: भैया को भी न थोड़ा सब्र नहीं है ब्याह होने वाला है और ये हैं कि हिलाने पर लगे हैं, धीरज के हाथ की गति और उसके भाव से पता चल रहा था कि वो अपने चरम के कितनी पास है और फिर कुछ पल बाद ही धीरज का हाथ और तेज हो गया वो उसके चूतड़ जहां बैठा था उससे ऊपर उठ गए आंखें कस के बंद हो गईं और फिर मुंह से आहें निकली, आह आह ओह चाची......।

जैसे ही कम्मू ने धीरज के मुंह से चाची सुना उसका पूरा दिमाग घूम गया उसे लगा कि पूरी धरती हिल रही है, वहीं धीरज के लंड से एक के बाद एक धार निकल कर नीचे गिरने लगी और वो शांत होने लगा, वहीं कम्मू के मन में तो जैसे तूफान उठ गया, वो ज्यों का त्यों खड़ा रह गया, धीरज झड़ने के बाद पैंट पहनने लगा तो कम्मू को थोड़ा ध्यान आया और वो छप्पर से बाहर निकल गया और घर से भी बाहर, भीगते हुए वो सीधा चलने लगा उसे पता नहीं था कहां जा रहा है बस चले जा रहा था, मन में अनेकों विचार घूम रहे थे, धीरज भइया, मां को सोचकर मुट्ठी मार रहे थे पर क्यों ये गलत है, मैं उन्हें छोडूंगा नहीं, शर्म नहीं आती अपनी चाची के बारे में ऐसा सोच कर, कमीने कहीं के, मन ही मन धीरज को गाली देते हुए कम्मू चला जा रहा था, और फिर एक खेत में मेंढ़ पर बैठ गया, सोचने लगा जो उसने देखा था वो उसकी आंखों से हट नहीं रहा था बार बार धीरज का वो चाची कहना, उसके कानों में गूंज रहा था,

कुछ देर कम्मू यूं ही बैठा रहा कभी उसके मन में धीरज से बदला लेने के खयाल आते तो कभी उसके लिए गालियां निकलती, बारिश लगातार उसे भिगाए जा रही थी, कुछ देर तक यूं ही बैठने के बाद वो थोड़ा शांत हुआ, भावनाओं की लहर जब शांत हुई तो दिमाग ने बोलना शुरू किया, कि धीरज के मां को सोच कर हिलाने पर बुरा लग रहा है, पर खुद भी तो तू वही करने गया था, तू तो उससे भी बड़ा पापी है अपनी सगी मां को सोच कर मुट्ठी मारता है।

फिर दूसरे मन में उत्तर दिया: पर क्या करूं जब से मां का बदन नंगा देखा है खुद को रोक नहीं पाता, आह कैसे पेटीकोट और ब्रा में खड़ी थी, आह ब्रा में चूचियां कितनी बड़ी लग रही थी मां की और लग क्या रही थी हैं ही कितनी मोटी और बड़ी बड़ी, और पेटीकोट में चूतड़ कितने उभरे हुए थे कम्मू के विचार बदलते हुए अपनी मां पर आ गए,

ये विचार आते ही कम्मू का लंड अपनी पैंट के अंदर फड़क उठा। पूरी तरह खड़ा, तना हुआ, जैसे पत्थर का हो गया हो। बारिश में भीगते हुए भी उसके बदन में गर्मी फैल रही थी।

उसने चारों तरफ देखा। खेत सुनसान था। दूर कहीं हल्की रोशनी दिख रही थी, लेकिन यहां कोई नहीं था। बारिश की आवाज़ सब कुछ ढक रही थी।

कम्मू ने धीरे से अपनी पैंट का बटन खोला। चैन नीचे सरकाई। उसके हाथ अंदर घुसे और गर्म, कड़े लंड को बाहर निकाल लिया। बारिश की ठंडी बूंदें उसकी लंड की नोक पर गिर रही थीं, लेकिन वो और भी सख्त हो गया।

उसने आंखें बंद कीं।

तुरंत उसकी आंखों के सामने सुमन का वो दृश्य घूम गया — कमरे में खड़ी मां, सिर्फ ब्रा और पेटीकोट में। ब्रा के अंदर से उभरे हुए बड़े-बड़े, भारी स्तन। पेटीकोट उसके मोटे, गोल चूतड़ों पर टाइट पड़ा हुआ, कमर की मांसलता, और गहरी नाभी साफ दिख रही थी। जब वो बाल सुखा रही थीं, तो उनके स्तन हल्के-हल्के हिल रहे थे।

कम्मू का हाथ अपने लंड पर चलने लगा।

धीरे-धीरे... फिर तेजी से।

“मां...” वो मन ही मन बुदबुदाया।

पेटीकोट के नीचे से उनके मोटे जांघ दिख रहे थे। और जब वो मुड़ी थीं, तो चूतड़ों की गोलाई और भी उभरकर सामने आई थी।

कम्मू की सांसें तेज हो गईं। हाथ की रफ्तार बढ़ गई।

“हाय मां... तुम्हारे ये मोटे चूतड़... कितने नरम लगते होंगे... कितने मोटे कितने मुलायम।

उसके दिमाग में अब कल्पना और गंदी हो गई। वो सोचने लगा — अगर मां पेटीकोट उतार दें, तो उनके चूतड़ कितने सफेद, कितने भारी होंगे। बीच में गहरी लकीर। और अगर वो झुक जाएं... तो उनकी चूत... गीली, गुलाबी, बालों से घिरी हुई...

“आह... मां... तुम्हारी चूत...”

कम्मू का हाथ अब तेजी से ऊपर-नीचे हो रहा था। लंड की नोक से पारदर्शी तरल निकल रहा था, जो बारिश की बूंदों के साथ मिलकर चमक रहा था।

उसे याद आया कि मां जब ब्रा में थीं, तो उनके चूचों के बीच की खाई कितनी गहरी थी। अगर वो ब्रा खोल दें, तो दो बड़े-बड़े, भारी खरबूजे लटकेंगे... गहरे रंग के किशमिश जैसे निप्पल आह, “मां... मुझे अपने चूचे चूसने दो... आह मां..”

कल्पना में कम्मू अपनी मां के सामने घुटनों के बल बैठा हुआ था। सुमन मुस्कुराते हुए अपना पेटीकोट ऊपर उठा रही थीं, धीरे-धीरे... उनके मोटे चूतड़ बाहर आ रहे थे।





और जब पूरी तरह से पेटीकोट का पर्दा ऊपर उठ गया तो, कम्मू की सांसें रुक गईं। उसकी नजरें उन चूतड़ों पर जमी गई

“हाय मां... कितने मोटे हैं तुम्हारे चूतड़... कितने भारी...” वो मन ही मन बुदबुदाया।

सुमन ने पेटीकोट को कमर तक समेट लिया। अब उनके पूरे निचले हिस्से खुले थे। चूतड़ों के ठीक नीचे उनकी जांघें भी मोटी और गोरी थीं, लेकिन कम्मू की नजर तो सिर्फ उन दो गोल गद्दों पर थी। जब सुमन ने हल्का सा अपना वजन एक पैर से दूसरे पर डाला, तो दोनों चूतड़ थिरक उठे — ऊपर-नीचे, दाएं-बाएं। उनकी नरमाई देखकर कम्मू को लगा कि अगर वो हाथ लगाए तो उंगलियां पूरी तरह धंस जाएंगी।

सुमन धीरे से घूम गई और उसके सामने हो गई उसकी आंखों में देखते हुए उन्होंने ब्रा भी खोल दी। चूचे झूलकर बाहर आए। सुमन अपनी चुचियों को अपने हाथों से दबाते हुए मसलते हुए कम्मू की आंखों में देखते हुए उसे बुलाती है आह लल्ला ले चूस के मां की मोटी मोटी चूचियों को आजा लल्ला आह।





कम्मू ने कल्पना में ही तुरंत मां के एक चूचे को मुंह में ले लिया। चूसने लगा। दूसरा हाथ मां की चूत पर फिर रहा था। उंगलियां चूत के होंठो को सहला रही थीं

“आह... मां... तुम्हारी चूत कितनी गीली है... कितनी गरम...”

उसका हाथ अब पागलों की तरह चल रहा था। लंड फूल गया था। नसें उभर आई थीं।

“मां... मैं तुम्हें चोदना चाहता हूं... अपनी सगी मां की चूत में अपना लंड डालना चाहता हूं... पूरा जड़ तक...”

कल्पना में सुमन चारों हाथ-पैरों के बल झुकी हुई थीं। उसकी गांड ऊपर उठी हुई थी मोटे चूतड़ फैल कर लहरा रहे थे। कम्मू उनके पीछे खड़ा, लंड पकड़े हुए। लंड की नोक सुमन की चूत के मुंह पर रगड़ रहा था।

“दाल दो लल्ला... अपनी मां की चूत में डाल दो...”

कम्मू ने जोर से आह भरी।

“मां... ले लो... आह...”

उसका पूरा शरीर तन गया। कमर ऊपर उठ गई। लंड से एक के बाद एक मोटी-मोटी धारें फूट पड़ीं। गरम वीर्य बारिश की बूंदों के साथ मेढ़ पर गिर रहा था। एक... दो... तीन... चार लंबी फुहारें।

कम्मू हांफता हुआ वहीं गिर पड़ा। लंड अभी भी हल्का-हल्का फड़क रहा था। हाथ से वीर्य टपक रहा था।

बारिश अभी भी गिर रही थी।

कम्मू की आंखें बंद थीं। कुछ पल बस यूं ही रहा और फिर कम्मू की आंखें धीरे-धीरे खुलीं। वो धीरे से उठ बैठा। सांसें अभी भी भारी थीं। पैंट सही किया, चैन ऊपर चढ़ाई। फिर खड़े होकर उसने एक गहरी सांस ली और घर की तरफ चल पड़ा।

कदम भारी थे। हर कदम के साथ उसका मन अंदर से चीख रहा था।

जैसे ही वो कुछ दूर निकला, झड़ने का वो सुकून एक पल में गायब हो गया। उसकी जगह अब ग्लानि ने घेर लिया।

“क्या कर रहा है तू कम्मू... क्या कर रहा है?”

मन में एक आवाज़ जोर-जोर से चिल्लाई। “तेरी अपनी मां... जिसने तुझे दूध पिलाया, गोद में खिलाया, रात-रात भर जागकर तेरी देखभाल की... उसी को तू अपनी कल्पना में नंगा करके चोद रहा है? उसी की चूत में लंड घुसाने की सोच रहा है? शर्म नहीं आती तुझे? तू तो जानवर से भी बदतर है!”

कम्मू के कदम रुक गए। वो एक पेड़ के नीचे खड़ा हो गया। मुंह से भारी सांस निकली। आंखों में पानी भर आया — बारिश का या आंसू का, खुद को भी नहीं पता।

“मां... माफ कर दो...” वो मन ही मन बुदबुदाया। “मैं कितना गंदा हूं... कितना पापी हूं...”

लेकिन ग्लानि के साथ-साथ अब द्वेष भी उभर आया। द्वेष सबसे पहले धीरज भैया पर।

“साला धीरज... मेरी मां को सोचकर हिलाता है... मेरी मां को... मेरी प्यारी मां को... कितना कमीना है वो। ब्याह होने वाला है फिर भी अपनी चाची की चूत के सपने देखता है।”

फिर द्वेष खुद पर मुड़ गया।

“और तू? तू तो उससे भी बड़ा हरामी है। धीरज तो चाची कहता है, लेकिन तू अपनी सगी मां को ‘चोदना’ चाहता है। आज तो बस देख लिया कि धीरज भी वही कर रहा है, और तू खुद को क्या समझ रहा था? पवित्र बेटा? हाह! तू तो सबसे बड़ा कमीना है!”

कम्मू ने जोर से अपना सिर झटका। लेकिन दिमाग नहीं माना। कल्पनाएं फिर से घुस आईं — सुमन का वो ब्रा-पेटीकोट वाला बदन, मोटे थिरकते चूतड़, भारी चूचे, और बीच में वो गीली, गुलाबी चूत जिससे वो निकला था।

उसका लंड फिर से हल्का-हल्का खड़ा होने लगा।

“नहीं... बस कर...” वो खुद को रोकने की कोशिश करने लगा। “ये गलत है... बहुत गलत है... मां मुझे देखेंगी तो थूकेगी... रोएगी... कहेगी कि ‘मेरा लल्ला इतना गिर गया?’”

वो चल रहा होता है अपने आस पास की चीज़ों से बेफिक्र होकर तभी अचानक सामने गाड़ी के हॉर्न से उसे होश आता है और वो सामने देखता है, गाड़ी में शीशे के पार दिखता है उसे कर्मा और सोनू का चेहरा, जो उसे देख मुस्कुरा रहे थे।



जारी रहेगी।
 
Back
Top