Adultery सज्जनपुर की कहानी - Page 3 - SexBaba
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Adultery सज्जनपुर की कहानी

वो चल रहा होता है अपने आस पास की चीज़ों से बेफिक्र होकर तभी अचानक सामने गाड़ी के हॉर्न से उसे होश आता है और वो सामने देखता है, गाड़ी में शीशे के पार दिखता है उसे कर्मा और सोनू का चेहरा, जो उसे देख मुस्कुरा रहे थे।





अध्याय 16


सोनू: कहां बावरों की तरह घूम रहा है, आजा,

कम्मू वैसे ही खयालों से निकला और बोला: भीग गया हूं बाद में मिलता हूं।

कर्मा: अरे आजा कोई बात नहीं।

कम्मू को भी समझ नहीं आ रहा था क्या करे कहां जाए इसलिए वो जीप में बैठ जाता है, और कर्मा जीप को आगे बढ़ा देता है,

सोनू: कहां से आ रहा था तू भीगते हुए?

कम्मू: वो वो कुछ नहीं खेत से आ रहा था, उसी में भीग गया।

कर्मा: थका थका सा लग रहा है, ऐसा क्या करके आया है?

कर्मा ने मुस्कुराते हुए कहा तो कम्मू के मन में अपने आप घबराहट आ गई,

कम्मू: कुछ कुछ भी तो नहीं, मैं कहां थका हूं।

कर्मा: सही सही बता सोनू ये थका हुआ नहीं लग रहा?

सोनू ऊपर से नीचे कम्मू को देखता है और कहता है: लग तो रहा है, पर लड़ाई हमारी हुई और तू कैसे थक गया?

कम्मू: लड़ाई कैसी लड़ाई? और किस्से?

कम्मू चौंकते हुए पूछता है तो सोनू उसे पूरी बात बताता है, सोनू पूरे जोश और ताव से लड़ाई के बारे में बताता है उसे बताने में इसलिए मज़ा और आ रहा था कि अब तक सबकी नजरों में दब्बू था डरपोक था और लड़ाई से बचने वाला था, जो उसके हिसाब से उसके परिवार की जरूरत भी थी वो किसी से लड़ कर एक और मुसीबत परिवार पर नहीं डालता था, पर आज जिस तरह से कर्मा के साथ मिलकर उसने भूरेलाल और अपने बाप का सामना किया, उसे सोच कर ही उसकी छाती गर्व से चौड़ी हो गई थी, हालांकि ये सब कर्मा के कारण हुआ था पर उसे भी अपनी छाती चौड़ी करने का मौका मिल रहा था तो क्यों न करता।

कम्मू उसकी बात ध्यान से सुन रहा था इस समय वो बाकी सब भूल गया, और सोनू की बात खत्म होने तक वो भी गुस्से से भर गया, वो कुछ भी सोचता हो पर अपने दोस्तों के लिए वो बहुत फ़िक्रमंद रहता था और सच में सोनू और उसके परिवार की चिंता करता था,

कम्मू: अरे सोनू मुझे क्यों नहीं बताया नहीं तो आज भूरेलाल को लाल करके छोड़ता मादरचोद को, भेंचो हमारी बहनों पर नजर डालता है,

सोनू: अरे भूरेलाल को तो भूलजा तू अब, कर्मा भैया ने उसके दांत गायब कर दिए कई।

कम्मू: ये गलत है यार तू और चाची होते नहीं हो ऐसे में मुझे आस पास होना चाहिए था,

कर्मा: अरे कम्मू छोड़ न सब सही हो गया फिर क्यों चिंता करता है और उस भूरेलाल की तो ऐसी मार लगाई है कि साले को अपनी शकल पहचान नहीं आ रही होगी।

कम्मू: सच में कर्मा भैया, तुमने बहुत सही काम किया! नहीं तो नेहा जीजी की जिंदगी बर्बाद हो जाती।

कर्मा: अरे यार तुम लोग यार हो अपने ऐसे मत बोल। खैर छोड़ अब सही सही बता खेत से हिला कर आ रहा था न?

कर्मा की बात से कम्मू थोड़ा विचलित हुआ, वो तो ये बात भूल भी चुका था,

कम्मू ने सोचा कि मना करेगा तो दोनों उसके पीछे पड़े रहेंगे तो उसने मुस्कुरा के हां में सिर हिला दिया।

कर्मा: देखा सोनू मैने कहा था न।

सोनू: क्यों रे किसके लिए हिला रहा था हमें भी बता तो हम भी हिलाएंगे।

कम्मू इस बात से तो और हिल गया अब कैसे बता दे कि अपनी मां के बारे में सोच रहा था,

कम्मू: अरे वो तो बस ऐसे ही हलवाइन का खयाल आ गया था तो फिर खुद को रोक नहीं पाया।

कर्मा: अरे भेंचो दिन पर दिन हरामी होता जा रहा है सोनू ये तो।

कर्मा ने ये कहा तो सोनू हंसने लगा और कम्मू भी मुस्कुराने लगा,

सोनू: बिगड़ रहा है लड़का।

कर्मा: अरे वही होना चाहिए सुधर के कुछ नहीं मिलता असली मज़ा बिगड़ने में ही है।

सोनू: हां ये तो सही बात है,

कम्मू: बोल तो ऐसे रहा है जैसे खुद कितना बिगड़ गया हो।

कर्मा: बिगड़ा नहीं तो बिगाड़ देंगे क्यों कम्मू?

कम्मू: हां अपना यार है बिगाड़ना तो बनता है,

कर्मा: ले आ गए तेरे सपनों की रानी के पास, ले ये पैसे और तू ही लेकर आ चाय समोसा,

कर्मा हलवाई की दुकान के सामने गाड़ी रोक कर कहता है,

कम्मू: अरे क्या कर्मा भाई, तुम लोग तो उस बात के पीछे ही पड़ गए।

सोनू: अच्छा अब शरीफ बन रहा है जब सोच कर हिला रहा था तो?

कर्मा: अरे भेंचो क्या नज़ारा है ये तो इधर ही आ रही है,

कर्मा फुसफुसाते हुए कहता है तो दोनों भी उसकी नजरों का पीछा करते हैं और दोनों की ही आंखें और खुल जाती हैं,

सामने से हलवाई की पत्नी पूरी भीगी हुई खुद उनकी ओर बढ़ती चली आ रही थी





पूरे भीगे होने से साड़ी उसके बदन से चिपक गई थी, उसकी मांसल कमर, फैली हुई नाभि तीनों की आंखों के सामने थी, ब्लाउज़ में मोती मोटी चूचियां हर कदम पर थिरक रही थी, भीगने की वजह ठंड होने से उसके निप्पल भी कड़क हो गए थे जो ब्लाउज़ में से मालूम पड़ रहे थे, कुल मिलाकर आज हलवाई की पत्नी का बदन इतना कामुक लग रहा था कि तीनों की ही आंखें उसके बदन पर टिकी की टिकी रह गईं, वो पास आई और तीनों को अपनी ओर इस तरह देखते पाकर थोड़ी असहज हुई फिर बोली: लल्ला छप्पर चू गया तो पानी आ गया दुकान में अभी कुछ नहीं मिल पाएगा।

उसकी आवाज से तीनों होश में आए और कर्मा बोला: अरे चाची ये तो बहुत बुरा हुआ, तुम भी पूरी भीग गई हो।

हलवाईन: हां लल्ला छप्पर सही करने में लगे रहे तो पूरा भीग गए।

कर्मा: चाचा नहीं है क्या?

हलवाईन: अरे कहां वो तो शहर गए हैं राशन लेने।

कर्मा: अरे अरे कोई बात नहीं चाची हम मदद कर देते हैं तुम्हारी।

हलवाईन: कोई बात नहीं है बाबू, अब तो हम घर ही जा रहे थे अब जब कल सुख जाएगा तभी देखेंगे।

कर्मा: अरे तो आओ घर छोड़ देते हैं।

हलवाईन: अरे नहीं बाबू तुम क्यों परेशानी लेते हो।

कर्मा: अरे चाची इसमें परेशानी क्या? ए कम्मू जा चाची के साथ दुकान बंद करवा आ,

कम्मू: हां हां चलो चाची,

कम्मू भी सहमति में दूसरी ओर से उतर जाता है और हलवाइन भी थोड़ा झिझकते हुए दुकान की ओर चल देती है,

सोनू और कर्मा पीछे से उसके चूतड़ों को देखते हैं जो हर कदम पर थिरक रहे थे वहीं कम्मू भी उसके पीछे चलते हुए उसके चूतड़ों को ही देख रहा था,





कर्मा: लग रहा है साली ने पेटीकोट पहना ही नहीं है,

सोनू: हां भैया, पहना भी है तो बहुत पतला है,

कर्मा: इसके दोनों चूतड़ों को फैलाकर इसकी गांड के छेद पर लंड का टोपा घिसने में कितना मज़ा आयेगा।

कर्मा ने अपने लंड की पैंट के ऊपर से ही सहलाते हुए कहा जो कड़क हो चुका था, सोनू का भी उत्तेजना से बुरा हाल था और उसका लंड भी कड़क हो गया था, और वो भी आहें भरते हुए बोला,

सोनू: आह क्या कह रहे हो भैया सही में मज़ा आ जाएगा,

वहीं कम्मू की नज़र भी उसके चूतड़ों पर थी पर फिर उसकी आंखों के सामने उसकी मां के चूतड़ लहर रहे थे, वो बीच में तुलना करने लगा कि उसकी मां के चूतड़ बड़े हैं या हलवाईन के, फिर ध्यान आते ही उसने अपने दिमाग को झटका और जाकर हलवाइन के साथ उसकी दुकान को बंद करवाया, फिर दोनों आकर जीप में पीछे बैठ गए, और कर्मा ने गाड़ी आगे बढ़ा दी।

कर्मा: चाची ठंड लग रही होगी पूरी भीग गई हो न?

हलवाइन: हां बाबू थोड़ी देर से भीग रहे हैं ऊपर से हवा भी है इसलिए।

सोनू: अच्छा हुआ हमारे साथ आ गई चाची नहीं तो भीगते हुए ही जाती घर।

कर्मा: और हम चाची को भीगने कैसे दे सकते थे,

हलवाइन: सही कह रहे हो लल्ला, तुम्हारा बहुत बहुत उपकार रहा बाबू।

हलवाइन ने कर्मा की ओर देखते हुए कहा,

कर्मा: अरे चाची कैसी बात करती हो, हमारे होते हुए तुम्हें ठंड लग जाए ये कैसे हो सकता है।

हलवाइन उसकी बात सुन कर हल्का सा मुस्कुरा दी।

कम्मू और सोनू भी थोड़ी थोड़ी बातें करते हुए तिर्ची निगाहों से हलवाईन के बदन को ही देख रहे थे, कुछ देर में ही जीप हलवाइन के घर के बाहर रुक गई, और हलवाइन उतर गई और मुड़ कर बोली: धन्यवाद लल्ला, कल आना तो करारे गरमा गर्म समोसे खिलाऊंगी।

कर्मा: हां बिल्कुल चाची, ज़रूर आयेंगे तुम्हारे समोसे खाने।

ये कह कर कर्मा ने जीप आगे बढ़ा दी और तीनों ही एक दूसरे की ओर देख मुस्कुरा रहे थे,

कम्मू: चाची के समोसे खाने में मजा आएगा, गर्मा गर्म, आय हाय।

कम्मू हंसते हुए बोला, तो दोनों भी उसके साथ हंसने लगे,

कर्मा: साली लौड़ा खड़ा कर गई अब क्या करें।

कम्मू: सही में यार मेरी नजर तो उसकी चूचियों से नहीं हट रही थी लग रहा था अब ब्लाउज फटा, अब ब्लाउज़ फटा।

सोनू: चूतड़ भी तो मस्त है यार जब चलती है तो कैसे ऊपर नीचे होते हैं।

कर्मा: अरे यार मेरा तो अब सिर घूम गया है चोदने का मन है अब पूरा, कोई जुगाड़ लगाना पड़ेगा।

सोनू: पर यहां तो कोई नहीं मिलने वाली।

कर्मा: सही में आज जुगाड़ के लिए जाने भी वाले थे पर जा भी नहीं पाए।

कम्मू: कहां जाने वाले थे?

कर्मा: लाली से मिलने,

कर्मा मुस्कुराते हुए कहता है,

कम्मू: अरे वो तो बिल्कुल कसा हुआ माल है भैया, उसे पटा लिया तो समझो जन्नत की सैर।

कर्मा: पटाने ही तो जा रहे थे पर खैर छोड़ो आज नहीं तो और कभी।

ये तीनों लोग जहां मस्ती में व्यस्त थे वहीं मन्नू जो अपने दोस्तों से अलग थलग महसूस कर रहा था घर में बैठ कर बारिश की बूंदों को आंगन में पड़ते हुए देख रहा था, और सोच रहा था उसने सच में सोनू के सामने कुछ ज्यादा ही बोल दिया, वो लोग बचपन के दोस्त हैं एक दूसरे के मां बाप को अपना समझते हैं, मुझे चाची के बारे में ये नहीं बोलना चाहिए था, पर जबसे ये कर्मा हमारे बीच आया है तबसे ही ये हो रहा है, सोनू तो कर्मा के खिलाफ कुछ सुन ना ही नहीं चाहता, मुझे तो लगता है कर्मा ही जान कर हमारे बीच कलह पैदा कर रहा है, हमें आपस में लड़वाना चाहता है, क्योंकि साथ रहकर हम लोग उससे भी लड़ जाते थे। मुझे उसे रोकने के लिए कुछ न कुछ तो करना ही होगा।

जहां मन्नू अपनी ही दुनिया में खोया हुआ था वहीं छप्पर के नीचे, खाट पर तेजपाल, रत्नाकर बैठ के चाय के घूंट भर रहे थे झुमरी भी नीचे बैठी हुई साग काट रही थी, बिंदिया सहेलियों के साथ कमरे में थी, तेजपाल और रत्नाकर बिंदिया की शादी के विषय में बात कर रहे थे, आगे क्या करना है, सब कैसे होगा, उन लोगों की क्या क्या मांगें हो सकती हैं अपनी स्थिति क्या है,

इसी बीच तेजपाल चाय का गिलास नीचे रखने के लिए झुके तो उनकी नज़र एक पल के लिए झुमरी पर पड़ी और ठहर गई, झुमरी जो साग काट रही थी उसका ध्यान ही नहीं था कि उसका पल्लू सामने से उसके सीने से हल्का सा एक ओर सरक गया था जिसके कारण उसके ब्लाउज़ से आधी से ज्यादा चूची उजागर हो गई थी।





और उसी पर तेजपाल की नज़र ठहर गई थी, बहुत ही अजीब सा एहसास था तेजपाल के लिए, इसलिए तेजपाल ने तुरंत अपनी नजर हटाई और सीधे हो गए, और झुमरी की ओर न देखने की कोशिश करने लगे, कुछ पल की ही इस घटना से उनके मन में थोड़ी अजीब सी और अलग सी भावना उत्पन्न हो गई। हालांकि उसे तेजपाल ने तुरंत नकार दिया और बापिस बातों में लग गए।

कमरे के अंदर अंजू और अनामिका दोनों बहनें मिलकर बिंदिया से हंसी मज़ाक कर रही थी और उसे उसकी शादी को लेकर छेड़ रही थी,

अंजू: वैसे बिंदिया रानी प्यारे का प्यार कैसा होगा, नाम की तरह प्यारा या कुछ और।

बिंदिया: तुम भी चलना साथ में पहले तुम ही देख लेना।

अंजू: हम क्यों जायेंगे, खसम तुम्हारा तुम ही देखो।

बिंदिया: क्यों तुम्हारा जीजा नहीं होगा? साली बनोगी तो इतना हक़ तो मिलेगा ही।

अनामिका: अरे नहीं मेरी लाडो, ये हक़ तो सिर्फ तुम ही रखो, क्या पता प्यारे लालची हो तो।

इस पर तीनों हंसने लगे।

बिंदिया: लालची हुए तो क्या हुआ दोनों एक साथ चढ़ जाएंगी।

अंजू: अरे मेरी भोली घोड़ी, चढ़ने वाली चीज़ एक ही होती है और एक ही औरत चढ़ सकती है एक बार में।

अनामिका: वैसे फिर भी कोई बात नहीं प्यारे पर बिंदिया चढ़ेगी और हम बिंदिया पर।

बिंदिया: धत्त कमीनी हो बिल्कुल ही तुम भी।

अंजू: ओह हो अभी से शर्माना शुरू हो गया इनका।

अनामिका: लाड़ो इतना शरमाओगी तो सवारी कैसे कर पाओगी।

बिंदिया: तुम दोनों भी न बस भी करो।

अंजू: मुझे तो लगता है ऐसा होना चाहिए कि ब्याह से पहले ही एक बार कर के देख लेना चाहिए अभ्यास के लिए।

इस पर तीनों हंसने लगी,

बिंदिया: कितनी कुतिया है तू, कुछ भी बोलती है।

अंजू: अरे सही कह रही हूं पहले अभ्यास कर लो जिससे सुहागरात पर कोई गड़बड़ न हो जाए।

बिंदिया: तू ही करीयो अपने पति के साथ ब्याह से पहले।

अंजू: अरे ब्याह से पहले पति कैसे हुआ, ब्याह से पहले तो अपनी मर्ज़ी के घोड़े पर बैठेंगे। उसके बाद पति के।

उसकी ये बात सुन अनामिका और बिंदिया दोनों की आँखें चौड़ी हो गई। उनकी ये बातें और देर तक चलतीं कि बीच में ही झुमरी ने आवाज़ देकर बुला लिया और तीनों बाहर चली गईं।

बारिश रुक चुकी थी वहीं हवेली में रजनी सोमपाल के कमरे में उसके सामने से उठी और उठकर अपने कपड़े पहनने लगी, सोमपाल तो सुस्ता रहा था उसे जी भर के चोदने के बाद, कपड़े पहनकर रजनी कमरे से बाहर निकल गई।

वो रसोई में आई तो देखा वहां सरोज पहले से मौजूद थी, और चाय बना रही थी।

रजनी: अरे जीजी तुम क्यों बना रही हो मुझे बुला लिया होता।

सरोज: अरे तू बापूजी की सेवा में व्यस्त थी तो क्या बुलाना और कभी कभी मुझे भी बनाने दे नहीं तो मैं भूल ही जाऊंगी।

सरोज की बात सुन कर रजनी शर्मा गई और उसके चेहरे पर मुस्कान आ गई।

रजनी: ऐसा नहीं है जीजी।

सरोज: अच्छा तो बापूजी तेरी सेवा कर रहे थे?

रजनी: अरे जीजी तुम भी,

रजनी ने शर्माते हुए बोला,

सरोज: अब शर्माना छोड़ और चाय उठा चल कमरे में बैठ कर बातें करते हैं,

रजनी: साहब को दे आती हूं न।

सरोज: अरे अभी कोई घर पर नहीं है बस मैं और तू हैं बापूजी को देनी हो तो दे आ।

रजनी: वो तो सो रहे हैं।

सरोज: तो छोड़ वैसे इस उम्र में लगता है तूने ज़्यादा ही मेहनत करवा ली।

सरोज ने आगे चलते हुए कहा,

रजनी: अरे जीजी तुम भी न मेरे पीछे ही पड़ गई,

रजनी ने भी उसके पीछे चलते हुए कहा, हालांकि रजनी को भी ऐसी बातों में मज़ा आता था, पर वो थोड़ा शर्माती थी इसलिए ज्यादा बोल नहीं पाती थी,

सरोज: तेरा पिछवाड़ा है ही ऐसा कि हर कोई पीछे पड़ जाता है।

रजनी: वैसे तुम्हारा तो मेरे से भी बड़ा है,

रजनी ने पलटवार करते हुए कहा,

सरोज: अरे अब बोली तू नहीं तो बस शर्माती रहती है।

रजनी: शर्माने से कुछ होने वाला तो है नहीं।

सरोज: बिल्कुल सही, वैसे सही सही बता मजा आया बापूजी के साथ।

रजनी: तुम भी जीजी पूरी जानकारी निकलवा कर ही मानोगी,

सरोज: सहेलियां और होती किस लिए हैं।

सरोज के मुंह से अपने लिए सहेली सुनकर रजनी मन ही मन खुश हो गई वो सोचने लगी एक वो हैं कुसुम, झुमरी और सुमन जिन्हें मैं अपनी सहेलियां मानती थी वो मेरा मज़ाक उड़ाती है वहीं एक ये हैं जो हर पल पर मेरा साथ दे रही हैं मुझे अपनी सहेली मानती है ये सोचते हुए रजनी गदगद हो गई।

सरोज: कहां खो गई बता ना?

रजनी: अरे वो हां मजा तो बहुत आया। बहुत मोटा और लंबा है उनका पूरा जड़ तक घुसा के चोदते हैं ऊपर से अनुभव अलग ही नजर आता है।

रजनी के मुंह से इतना खुले शब्दों में सुनकर सरोज भी हैरान हो गई,

सरोज: अरे वाह अब खुली है तू अच्छी तरह से,

रजनी: सब तुम्हारी ही संगत का असर है,

सरोज: मेरी संगत का है या बापूजी की मेहनत का?

रजनी: जो समझ लो जीजी,

दोनों मज़ाक भरी बातें करते हुए चाय खत्म करती है उसके बाद रजनी सरोज को बोल कर अपने घर की ओर निकल जाती है, बारिश थमने के बाद मौसम सुहाना हो चुका था, वहीं कर्मा भी अपनी जीप को सोनू के घर के सामने रोकता है कम्मू और सोनू दोनों उतरते हैं वहीं कम्मू के चबूतरे पर बिंदिया, अंजू, अनामिका, नेहा और मनीषा साथ में बैठ कर बात कर रही होती हैं, कर्मा गाड़ी में बैठे हुए बिंदिया से आंखें मिलाता है, बिंदिया की नज़रें भी उससे मिल जाती हैं और कर्मा उसकी ओर देख मुस्कुरा देता है तो बिंदिया अपनी नज़र झुका लेती है, कर्मा गाड़ी आगे बढ़ा देता है और गली से बाहर निकल जाता है।

अंजू: घमंडी कहीं का।

अंजू मुंह बना कर कहती है,

नेहा: ऐसा क्यों बोल रही है तू? उसने क्या घमंड दिखाया?

अनामिका: अरे तुझे क्या हुआ तू क्यों उसके लिए गुस्सा हो रही है?

मनीषा: जीजी तुम लोगों को नहीं पता आज क्या हुआ, अगर कर्मा नहीं होता तो आज नेहा जीजी हमारे साथ नहीं होती.

अंजू: हैं ऐसा क्या हुआ।

फिर नेहा और मनीषा सबको पूरी बात बताती हैं और सब पूरी हैरानी से सुनती हैं।

अंजू: सच में बहन आज तो उसने बहुत अच्छा काम किया, मैं बेकार में उसे गरियाती रहती थी।

अनामिका: हां, हवेली वाले इतने भी बुरे नहीं हैं जितना हम सोचते हैं अब सोनू और कम्मू को ही देख लो कितने खुश रहते हैं कर्मा के साथ।

मनीषा: यही बात है मुझे तो अभी तक ऐसा कुछ नहीं लगा कि वो किसी का बुरा चाहता हो।

अंजू: जो भी हो मैं खुश हूं कि तुझे कुछ नहीं हुआ,

अंजू नेहा को गले लगाते हुए कहती है, वहीं बिंदिया इन सब की बातें सुनते हुए कर्मा के बारे में सोच रही होती है, और उसके होंठों पर एक प्यारी सी मुस्कान फैल जाती है।

नेहा: चलो अब अपने अपने घर पहुंचो सूरज ढल गया है काम पड़े हैं करने को।

अंजू: हां चलो भाई चलो नहीं तो मां चिल्लाने लगेगी।

कुछ देर बाद ही रजनी घर पहुंचती है, नेहा और मनीषा रसोई का काम कर रही होती हैं सोनू भी पास में बैठा होता है, रजनी को देख नेहा भाग कर उसकी ओर दौड़ती है और रोते हुए उसके गले लग जाती है, रजनी उसे यूं देख कुछ समझ नहीं पाती बेटी को रोया देख वो घबराने लगती है उसका सीना तेजी से धड़कने लगता है।

रजनी: क्या हुआ बिटिया, सब ठीक तो है न? कोई बात हुई है बता मुझे डर लग रहा है।

फिर रजनी को वो लोग सब बताते हैं और सुनते हुए रजनी की आंखें भी झलक पड़ती हैं, और वो तीनों बच्चों को गले से लगाकर कहती है: हे ऊपरवाले ये मुसीबतें कब हमारा पीछा छोड़ेंगी, ये कैसा बाप है जो अपने ही बच्चों की खुशी का दुश्मन बन चुका है।

नेहा: तुमने बहुत सही किया मां हवेली जाकर और सोनू ने कर्मा से दोस्ती कर के, नहीं तो न जाने हमारा क्या होता।

नेहा सुबकते हुए कहती है,

रजनी: कुछ नहीं होगा मेरी बिटिया, मेरी गुड़िया तेरी मां कुछ गलत नहीं होने देगी।

रजनी उन्हें सीने से लगाते हुए कहती है, उसके मन में हवेली वालों का सम्मान और बढ़ गया था, वो सोचती है सच में अगर हवेली वाले नहीं होते तो उसका परिवार टूट चुका होता,

नेहा: चलो मां तुम मुंह हाथ धो लो मैं खाना बनाती हूं।

रजनी: ठीक है बिटिया पर सब सुनो विक्रम को ये बात कोई नहीं बताएगा, वो बेचारा बेकार में परेशान होगा।

सोनू: ठीक है मां,

सब अपने अपने काम में लग जाते हैं और खाने पीने की तैयारी होने लगती है, वैसे खाने पीने की तैयारी तो कम्मू के घर में भी हो रही थी, सब लोग आंगन में थे, सुमन और कुसुम मिल कर खाना बना रही थी, सुमन के पैर में अभी भी थोड़ा दर्द था इसलिए वो बैठ रोटियां सेंक रही थी,





कुसुम और लड़कियां खाना परोस रही थी और सबको खिला रही थी, वहीं कम्मू की नज़र अपनी मां से नहीं हट रही थी, बीच बीच में वो धीरज पर ध्यान दे रहा था। सुमन का पसीने से नम बदन उसके बदन में एक अजीब सा एहसास करा रहा था जिस एहसास से वो अब तक अवगत नहीं था,

थोड़ी दी बाद सब खा चुके थे और अपने अपने बिस्तर पर थे, वहीं कम्मू ने सोचा कि धीरज उसकी मां की ओर देख रहा है, और कम्मू के मन में विचार घूमने लगे, कहीं धीरज भइया मां के साथ कुछ करने वाले तो नहीं हैं, कहीं मां के सोने के बाद कुछ गलत इरादा तो नहीं है, कम्मू ये सब सोचने लगा। वैसे भी भय का भूत बनते समय नहीं लगता और कुछ देर में ही कम्मू सोच रहा था कि धीरज से अपनी मां को कैसे बचाना है,

औरतें और लड़कियां छप्पर के नीचे खाट पर सोती थी वहीं मर्द आंगन में, फूल सिंह बाहर चबूतरे पर सोते थे,

कम्मू बार बार अपनी मां की खाट के पास मंडरा रहा था हालांकि सुमन अभी बर्तन धो रही थी और सोने आई नहीं थी वहीं कम्मू खयालों से लड़ रहा था, उसका दिमाग तेजी से चल रहा था तभी सुमन सारे काम निपटा कर खाट पर आकर बैठी तो उसने कुछ सोचा और अपनी मां के पास जाकर बोला: मां तुम्हारे पैर में दर्द है न, लाओ मालिश कर देता हूं,

सुमन: अरे रहने दे, सो जा इतना भी दर्द नहीं है लल्ला।

कुसुम: अरे करवा ले सुमन कभी कभी तो इन लोगों को थोड़ी अकल आती है।

सुमन लेट जाती है और कहती है: ले करदे मालिश।

कम्मू सुन कर खुश हो जाता है, और भाग कर गरम तेल की कटोरी ले आता है।

और खाट पर सुमन के पैरों की ओर बैठ जाता है और उसके पैरों को दबाने लगता है,

सुमन अपने बेटे को अपनी सेवा करते देखती है और प्यार से कहती है: अगर मुझे पता होता मेरे पैर मुड़ने से तू सुधर जायेगा तो कब का मुड़वा लेती।

कम्मू: अरे तुम भी न मां, मैं कब बिगड़ा।

कम्मू उसके पैर दबाते हुए कहता है,





सुमन: ओह हो देखो कहां बिगड़ा हूं, कितना शरीफ बन रहा है

कम्मू: मैं शरीफ ही हूं मां,

ऐसे ही बातें करते हुए कम्मू सुमन के पैर दबाता रहता है दोनों को ही इस तरह साथ में समय बिताना अच्छा लग रहा था,

थोड़ी देर बाद सुमन बोली: चल अब बहुत देर हो गई है मुझे भी नींद आ रही है जा तू भी सो जा।

कम्मू: बस थोड़ी देर और मां और तुम सो जाओ न,

सुमन: तू कब सोएगा?

कम्मू: मुझे नींद नहीं आ रही अभी जब आएगी तो यहीं सो जाऊंगा।

सुमन: पागल हो गया है तू, देर तक मत जागना।

ये कह सुमन आंखें मूंद लेती है और सोने लगती है, वहीं कम्मू अपनी मां के सुन्दर चेहरे को देखते हुए कुछ देर उसके पैर दबाता है और जब देखता है आस पास सब सो गए हैं तो वो भी अपनी मां के बगल में लेट जाता है, उसकी ओर करवट करके, उसे अपनी मां के पास लेटने में एक बहुत अलग एहसास हो रहा था जैसा उसने पहले महसूस नहीं किया था उसके सीने में धक धक हो रही थी, उसका रोम रोम खड़ा था, पर खुद को थोड़ा शांत रखते हुए उसने अपनी आंखें बंद की और अपना हाथ अपनी मां के हाथ पर रख लिया को उसकी जांघ पर था, कुछ देर कम्मू यूं ही लेटा रहा और अपने विचारों को शांत करने की कोशिश करता रहा, कुछ देर बाद उसने आंखें बंद किए हुए ही हिम्मत जुटाते हुए अपना हाथ उठाया और धीरे से ऊपर सरका कर सुमन के पेट पर रख दिया।





उसकी आंखें बंद थी पर मन तेजी से दौड़ रहा था जैसे ही उसका हाथ उसकी मां के पेट से स्पर्श हुआ तो उसकी उंगलियां उसके नंगे पेट से छू गईं और कम्मू के बदन में बिजली दौड़ गई उसका लंड कड़क होने लगा उसके बदन में गर्मी फैलने लगी, ऐसी उत्तेजना उसने कभी महसूस नहीं की थी जो उसे अपनी मां के पास लेट कर महसूस हो रही थी, उसे लग रहा था कि ये सब उसकी मां के कामुक बदन की वजह से है पर वो जिस बात को नहीं समझ पा रहा था वो थी उनके बीच का रिश्ता, और इस मां बेटे के रिश्ते में उन वर्जित विचारों का आना, उसे और अधिक उत्तेजित कर रहा था, अपनी ही मां को एक औरत की तरह देखना उसके बदन के इतना करीब होना उस एहसास को उस उत्तेजना को दोगुना कर रहा था।

उसके मन में अनेकों खयाल आ रहे थे, कभी उसका मन कहता मां के बदन का मज़ा ले पर अगले ही पल डर भी लगता, उसे समझ नहीं आ रहा था क्या करे, कुछ देर तक वो यूं ही लेटा रहा बिना हिले डुले, काफी देर बाद जब उसका मन नहीं माना तो हिम्मत करके उसने योजना बनाई और फिर आंखें बंद किए हुए ही अपना हाथ हटाया और बहुत हल्की सी आंखें खोल कर उसने पल्लू को देखा और पकड़ लिया, आंखें फिर से बंद कर लीं और पल्लू को पकड़ कर नीचे की ओर सरकाने लगा।





और सरकाते हुए उसने पल्लू को सुमन की छाती और पेट से हटा दिया, सुमन का ब्लाउज़ और उसमें क़ैद उसकी मोटी चूचियां जो उसकी हर सांस के साथ ऊपर नीचे हो रही थी बाहर थी, उसके पेट का हिस्सा भी नंगा हो कर सामने था, हालांकि सुमन साड़ी ऊपर बांधती थी इसलिए उसकी नाभि अभी भी ढकी हुई थी, पर जितना भी दिख रहा था किसी के भी लंड को कड़क करने के लिए काफी था, कम्मू ने भी बहुत धीरे से आँखें खोल कर अपनी मां की ओर देखा और सामने का दृश्य देख कम्मू का मन मचल उठा, उसे अपने लंड से रस की बूंद निकलती हुई महसूस हुई जो उसकी उत्तेजना को दर्शा रही थी,

कम्मू मन ही मन सोचने लगा: आह मां का बदन कितना मस्त है, मखमली स्पर्श है बिलकुल और भरा हुआ, ब्लाउज कितना उठा हुआ है, काश मैं उनकी चूचियों को देख पाता, तभी उसका मन उसे डांटता की जो तू कर रहा है गलत है यहीं रुक जा नहीं तो बहुत बुरा फंसेगा। पर उत्तेजना भी हर पल बढ़ती जा रही थी, और कम्मू को खुद पर काबू रखना मुश्किल होता जा रहा था, उसने अपना हाथ वापिस सुमन के पेट पर रख दिया, और फिर धीरे धीरे से उसके पेट को सहलाने लगा,





अपनी मां के कोमल पेट के स्पर्श अपने हाथों पर पाकर कम्मू का बदन मचलने लगा उसका लंड पेंट में कड़क होकर ठुमके मार रहा था उसकी उत्तेजना हर पल के साथ बढ़ रही थी एक मन उसे आगे बढ़ने को कह रहा था और दूसरा उसे डरा रहा था, उसकी आँखें बंद थी पर उसका हाथ लगातार सुमन के पेट पर चल रहा था, और फिर उसकी आंखों के सामने उसकी मां और पापा की चुदाई के दृश्य घूमने लगे जब उसकी मां पूरी नंगी हो कर उसके पापा से चुदवा रही थी, और फिर अगले ही पल उसके पापा की जगह वो खुद को देखने लगा जो मां को चोद रहा था और बस ये काफी था उसका बदन अकड़ गया और उसका लंड पानी छोड़ने लगा और कच्छे को भिगाने लगा, कम्मू हांफने लगा, झड़ने के बाद उसकी सांसे तेज तेज चल रही थी उसे लग रहा था वो कितना थक गया है कुछ देर तक यूं ही लेट कर वो सांसे सामान्य करना लगा और उसी बीच उसकी आंख लग गई।



जारी रहेगी।
 
और फिर अगले ही पल उसके पापा की जगह वो खुद को देखने लगा जो मां को चोद रहा था और बस ये काफी था उसका बदन अकड़ गया और उसका लंड पानी छोड़ने लगा और कच्छे को भिगाने लगा, कम्मू हांफने लगा, झड़ने के बाद उसकी सांसे तेज तेज चल रही थी उसे लग रहा था वो कितना थक गया है कुछ देर तक यूं ही लेट कर वो सांसे सामान्य करना लगा और उसी बीच उसकी आंख लग गई।

अध्याय 17


अगली सुबह हो चुकी थी सज्जनपुर में सूरज निकल रहा था और रजनी और सोनू समय से पहले ही हवेली की ओर निकल गए थे, रजनी जहां सीधी हवेली के अंदर पहुंच गई वहीं सोनू हवेली के बाहर झाड़ू लगा कर बिखरे हुए पत्तों को साफ करने लगा, रजनी हवेली में पहुंची तो उसे कोई बाहर नहीं दिखा मतलब सब लोग अभी तक सो रहे थे, उसने चाय नाश्ता तैयार किया और दो कप चाय को ट्रे में रखा और लेकर चल दी नीलेश और सरोज के कमरे की ओर दरवाज़े को खोलकर देखा तो वो लोग सो रहे थे, रजनी उन्हें देख आगे बढ़ी और बिस्तर के पास जाकर उन्हें जगाने लगी: जीजी उठो, साहब उठिए सुबह हो गई है चाय पी लो।

सरोज और नीलेश की आंखें धीरे से खुली और रजनी को देख बोले: अरे तू कब आई,

रजनी: देर हो गई नाश्ता भी बन गया है आप लोग आज ज़्यादा ही सो लिए, लगता है देर तक जाग रहे होंगे रात में।

रजनी ने शर्माते हुए और हल्की मुस्कान के साथ कहा,

सरोज भी शरारती मुस्कान के साथ बोली: हां जगे तो थे,

सरोज उठते हुए बोली तो उसके सीने से चादर फिसल गई और उसकी मोटी बड़ी चूचियां बाहर झलक पड़ी जिनपर रजनी की नज़र तुरंत पहुंच गई, रजनी उन्हें देख शर्माते हुए कहा,

रजनी: चाय पी लो अब दोनों लोग।

सरोज: अपने लिए नहीं लाई तू?

रजनी: मैं तो पीलूंगी बाद में, अभी आप दोनों के लिए लाई हूं।

नीलेश: अरे चाय पी लेंगे रजनी रानी तुम भी क्या चाय के पीछे पड़ी हो, नीलेश ने चाय की ट्रे रजनी के हाथ से लेकर एक ओर रख दी और उसका हाथ पकड़ कर उसे अपनी ओर बिस्तर पर खींच लिया,

रजनी: अरे दय्या साहब उई।

रजनी गिरते हुए बोली, तो नीलेश ने उसे अपने ऊपर थाम लिया और बोले अभी तो हमारा मन कुछ और पीने का है, और ये कहकर नीलेश ने रजनी के होंठों से अपने होंठ मिला दिए और चूसने लगे, रजनी भी उनका साथ देने लगी





सरोज अपने पति को रजनी के होंठों को चूसते हुए मुस्कुरा कर देख रही थी और अपनी चूचियों से खेल रही थी,

नीलेश के हाथ रजनी की कमर और चूचियों पर घूम रहे थे और कुछ देर बाद जब दोनों के होंठ अलग हुए तो रजनी हाँफ रही थी और शर्मा रही थी,

सरोज: देखो तो कैसे नई नवेली दुल्हन की तरह लजा रही है,

रजनी: क्या जीजी तुम भी?

सरोज: इनसे ही प्यार जताएगी हम से नहीं?

ये कह सरोज ने रजनी को अपनी ओर खींच लिया और उसके होंठों को चूसने लगी, रजनी भी पूरी तरह उसका साथ देने लगी, नीलेश का लंड ये देख कर पहले से ही खड़ा हो चुका था जिसे उन्होंने धोती से बाहर निकाल लिया और सहलाते हुए दूसरे हाथ से रजनी के चूतड़ों को मसलने लगे, रजनी भी इस सब से उत्तेजित महसूस कर रही थी, नीलेश को इसी दौरान पेशाब भी लग रही थी तो वो उठ कर पेशाब करने चले गए वहीं दोनों औरतें एक दूसरे के होंठों को लगातार चूस रही थी,

पेशाब करके जब नीलेश लौटे तो बिस्तर पर दृश्य थोड़ा बदल चुका था अब रजनी जो इन सब से उत्तेजित हो चुकी थी वो सरोज की एक मोटी चूची को मुंह में भर कर चूस रही थी और उसके हाथ सरोज के नंगे बदन पर चल रहे थे वहीं सरोज आहें भरते हुए रजनी को उकसा रही थी नीलेश आगे बढ़े और रजनी के पीछे जाकर उसकी कमर और चूतड़ों को साड़ी के ऊपर से ही सहलाने लगे,





सरोज: आह्ह्ह्ह आह्ह्ह्ह रजनी अह्ह्ह्ह ऐसे चूस रही है जैसे आज पूरा दूध निचोड़ लेगी मेरा आह्ह्ह्ह।

रजनी तो बिना कुछ सुने पूरी लगन से उसकी चूची चूसने पर लगी थी वहीं नीलेश ने धीरे धीरे रजनी के ब्लाउज को खोलना शुरू कर दिया था और उसकी साड़ी को भी ऊपर सरका रहे थे, कुछ पल बाद रजनी ने सरोज की चूचियों को छोड़ा तो सरोज मुस्कुरा के उससे बोली: अह्ह्ह आज तो लगता है बहुत भूखी थी तू, पीछे ही पड़ गई मेरी चूचियों के।

रजनी: जब इतना स्वाद खाना सामने हो तो भूख अपने आप बढ़ जाती है,

सरोज: अरे वाह अब तो शायरी भी करने लगी मेरी चुदक्कड़ रानी। चल अब हट मुझे भी मूतने जाना है।

सरोज उठते हुए बोली और स्नानघर में घुस गई वहीं रजनी ने पलक कर अपना ध्यान नीलेश पर लगाया।

सरोज नित क्रिया करने के बाद नंगी ही स्नानघर से बाहर निकली तो बिस्तर पर काफी कुछ बदल चुका था, रजनी के बदन पर सिर्फ उसकी साड़ी थी वो भी कमर पर इकट्ठी हो रखी थी और रजनी नीलेश का लंड अपनी चूत में लेकर उछल रही थी





रजनी के मुंह से लगातार आहें निकल रही थी, वहीं नीलेश उसकी कमर को थामकर उसे अपने लंड पर उछल रहे थे।

सरोज: देखो तो दो पल के लिए अपने पति को क्या छोड़ा तेरे साथ उनके लौड़े पर चढ़ कर बैठ गई चुदक्कड़ कहीं की।

सरोज ने आगे बढ़ते हुए रजनी से मजाक करते हुए बोला,

रजनी: अह्ह्ह्ह सीईईईईई ओह्ह्ह्ह जीजी अह्ह्ह्ह ऐसे छोड़ोगी तो कोई न कोई अह्ह्ह्ह बैठ ही जाएगा।

रजनी भी उसके मज़ाक में साथ देते हुए बोली,

नीलेश: अह्ह्ह्ह कोई बैठे या उठे हमें पूरा मजा आ रहा है,

सरोज भी आगे बढ़ कर बिस्तर पर चढ़ गई और दोनों की चुदाई देख अपनी चूत सहलाने लगी,

सरोज: आह्ह्ह्ह जी ऐसे ही उछालो रजनी रांड को आह्ह्ह्ह अपने मोटे लंबे लंड पर अह्ह्ह्ह इसकी प्यासी बुर को भर दो अपने लंड से।

सरोज उत्तेजित होते हुए बोली,

रजनी: अह्ह्ह्ह अह्ह्ह्ह हां जीजी अह्ह्ह साहब चोदो अह्ह्ह्हः मैं रंडी हूं तुम्हारी अह्ह्ह्ह सीईईईईई,

रजनी भी पूरी तरह उत्तेजित हो चुकी थी और तेजी से उछलते हुए चुद रही थी,

सरोज: इधर घूम कर बैठ मेरी चुद्दो सहेली,

सरोज ने कहा तो रजनी तुरंत घूम कर बैठ गई अब उसकी पीठ नीलेश की ओर थी, लंड अभी भी उसकी चूत में था, वहीं सरोज रजनी की चूचियों को पकड़ कर चूसने की कोशिश कर रही थी,





रजनी तो इस दोहरे मजे से पागल होती जा रही थी, सरोज भी उतनी ही लगन और भूख से उसकी चूची चूस रही थी जैसे कुछ देर पहले वो उसकी चूस रही थी,

रजनी: अह्ह्ह्ह सीईईईईई ओह्ह्ह्ह अह्ह्ह्ह जीजी अह्ह्ह्ह मज़ाआ आ रहा है ओह्ह्ह्ह साहब ऐसे ही धक्के लगाओ आह्ह्ह्ह

नीलेश भी बीच बीच में उसकी एक चूची को पकड़ कर मसल रहे थे,

नीलेश: अह्ह्ह क्या गरम बुर है तेरी रजनी रानी ओह्ह्ह्ह मन करता है चोदते ही रहें।

सरोज: तो चोदो न जी, यहम्मम ये रंडी चुदवाने के लिए ही तो बनी ही जितना मर्जी है उतना चोदो, बोल रजनी किस लिए बनी है तू?

सरोज ने उसकी चूची से मुंह हटाते हुए बोला,

रजनी: अह्ह्ह्ह अह्ह्ह्ह हां जीजी अह्ह्ह साहब मैं चुदने के लिए बनी हूं, आह तुम्हारी रंडी हूं मैं आह जी भर के चुदूंगी जितना चाहे चोद लो।

रजनी भी पूरी तरह उत्तेजित होकर जवाब दे रही थी, और हर बढ़ते पल के साथ उसकी उत्तेजना बढ़ती जा रही थी, और फिर वो उत्तेजना बढ़ कर इतनी बढ़ गई कि रजनी को उसके स्खलन तक पहुंचा दिया, रजनी कांपते हुए झड़ने लगी उसका बदन थरथराने लगा, वो नीलेश के ऊपर पीछे लेट गई हांफते हुए,

कुछ पल बाद शांत हुई तो सरोज उसकी ओर देख मुस्कुरा रही थी, रजनी उसके देखने से शर्मा गई और तुरंत उठ कर स्नानगृह की ओर भागी उसे भी मूत आ रहा था। जब पेशाब करके बाहर निकली तो देखा कि बिस्तर पर नीलेश और सरोज आपस में ही लग चुके थे,





सरोज बिस्तर आधी झुकी हुई थी और नीलेश पीछे से अपनी पत्नी की गांड में लंड चला रहे थे,

सरोज: अह्ह्ह्ह अह्ह्ह्ह रजनी अह्ह्ह्ह देख न आह्ह्ह्ह तेरी जीजी की गांड में अपना बड़ा सा मूसल घुसा दिया तेरे साहब ने,

रजनी ये सुन आगे बढ़ी और बिस्तर पर चढ़ गई और सरोज की चूचियों को मसलते हुए बोली: अह्ह्ह्ह जीजी तुम्हारी कसी हुई गांड आह्ह्ह्ह है भी तो मरवाने के लिए अह्ह्ह्ह साहब और तेज मारो का कस के धक्के लगाओ।

नीलेश भी जो अपनी उत्तेजना की ओर बढ़ रहे थे दोनों की बातें सुन कर और उत्तेजित हो गए और कुछ देर बाद उन्हें लगा कि उनका रस उनकी गोलियों से निकल कर उनके लंड में भर रहा है, बस इतना काफी था और फिर गुर्राते हुए तेज तेज धक्के उन्होंने सरोज की गांड में लगाए और फिर कराहते हुए झड़ने लगे, एक के बाद एक पिचकारी सरोज की गांड में भरने लगी, और जब झड़ना बंद हुआ तो नीलेश ने रजनी को अपने पास बुलाया और वो तुरंत सरक कर सरोज के पीछे और नीलेश के पास गई, नीलेश ने अपने लंड को सरोज की गांड से धीरे से निकाला और सरोज आगे पेट के बल बिस्तर पर लेट गई, वहीं नीलेश ने अपना लंड जो उसके रस और सरोज की गांड के रस से सना हुआ था रजनी के मुंह के सामने कर दिया, रजनी ने नीलेश की आंखों में देखते हुए अपना मुंह खोला और और लंड को अपने मुंह में भर लिया और चाटकर साफ करने लगी, रजनी के लिए ये एक नये एहसास वाला पल था, गांड से निकला हुआ लंड जिस पर रस लगा हुआ था, वो उसके मुंह में था उसे इस घिनौने काम में बुरा लगना चाहिए था, घिन आनी चाहिए थी, बेइज्जती लगनी चाहिए थी, पर उसे ऐसा कुछ नहीं लग रहा था बल्कि इसका उल्टा महसूस हो रहा था, उसे वो स्वाद घिनौना नहीं बल्कि अच्छा लग रहा था, वहीं नीलेश की तरफ से शायद ये बताने का तरीका था कि वो रजनी को कहां देखते थे उसका क्या महत्व था,

लंड साफ करने के बाद रजनी ने निकाला, तो वो उसके थूक से चमक रहा था, नीलेश ने रजनी का चेहरा पकड़ा और उसे अपनी पत्नी के चूतड़ों के बीच घुसा दिया, जहां सरोज की गांड का छेद हल्का खुला हुआ था रस उसमें से बह कर बाहर आ रहा था, मुंह चूतड़ों में पड़ते ही रजनी समझ गई कि उससे क्या अपेक्षा है और वो तुरंत सरोज की गांड चाटने में लग गई, अपनी जीभ निकाल कर उसकी गांड के छेद को कुरेदने लगी और उसके रस को चाटने लगी, सरोज नीचे लेट कर आहें भर रही थी नीलेश पीछे होकर अपनी सांसें सामान्य कर रहे थे।

कम्मू के घर भी सब उठ चुके थे, और नित्य क्रिया से भी निपट कर सब चाय परांठे का नाश्ता कर रहे थे, कम्मू भी अपनी मां को देखते हुए परांठे खा रहा था उसे मन में डर भी था कि जो रात को उसने अपनी मां के बदन को छुआ था कहीं मां उस समय जग तो नहीं रही थी, कहीं मां को पता हो तो उसका क्या होगा, पर उसे सुमन का व्यवहार सामान्य लग रहा था, वहीं उसकी नज़रें बीच बीच में धीरज पर भी थी और उसकी हरकतों पर नज़र बनाए रखी थी,

उसे एक डर सा सता रहा था कि उसका भाई धीरज कहीं कुछ करे न मां के साथ, हालांकि ये धीरज के लिए भी उतना ही मुश्किल था जितना उसके लिए फिर भी भय का भूत बनते हुए देर नहीं लगती,

इधर धीरज की शादी के दिन करीब आते जा रहे थे और घर में तैयारियां हो रही थी, आज घर घर में लिपाई और पुताई का काम होना था, जिसकी जिम्मेदारी बच्चों और औरतों पर थी, आदमी तो बाहर निकल गए थे, और घर पर काम शुरू हो गया था, पहले कमरों का सारा सामान बाहर आंगन में ला कर रख दिया गया था, कम्मू एक बाल्टी और जूट से बने एक ब्रश को लेकर अपने कमरे को पोतने लगा तो वहीं सुमन कमरे को लीप रही थी, इसी तरह सबने काम बांट लिया था, कम्मू एक लकड़ी की सीढ़ी पर चढ़कर पुताई करते हुए भी अपनी मां को देख रहा था, जो नीचे बैठ कर कमरे को लीप रही थी,





कुसुम की पसीने से चमकती कमर देख उसके बदन में गर्मी बढ़ रही थी, कम्मू ने कुछ पल अपनी मां को देखा और बोला: मां तुम्हारी साड़ी सन रही है गोबर में,

सुमन ने नीचे देखा तो उसका पल्लू नीचे लग रहा था,

सुमन: अरे धत्त तेरे की अब साड़ी सम्भाल के पकड़ूं या लिपाई करूं,

कम्मू: दोनों ही करने पड़ेंगे मां।

कम्मू हिही करते हुए बोला,

सुमन: तुझे बड़ी हंसी सूझ रही है इधर आ उतर कर और पल्लू सही कर मेरा।

कम्मू ये सुन कर थोड़ा हैरान हुआ और उसके मुंह से निकला: मैं?

सुमन: और कौन करेगा देख नहीं रहा मेरे हाथ सने हुए हैं,

ये सुन कम्मू मन ही मन खुश हुआ न जाने क्यों अपनी मां के पास जाने के खयाल से ही वो खुश हो रहा था,

तुरंत सीढ़ी से उतरा और बोला मां खड़ी हो तभी तो कर पाऊंगा, सुमन अपने हाथों को आगे कर खड़ी हो गई और कम्मू ने धीरे से हाथ बढ़ाया और उसके पल्लू को पीछे कर दिया,

कम्मू: अब ठीक है मां?

सुमन: तू भी बावरा है पूरा ऐसे तो बैठूंगी फिर लटक जाएगा, इसे कमर में ठूंस दे।

कम्मू ने ये सुना तो उसके मन में थोड़ी धड़कन तेज हुई फिर भी उसने स्वयं को सामान्य रखते हुए अपनी मां के कहे अनुसार पल्लू का सिरा उसकी कमर में ठूंसा और इसी बीच उसकी उंगलियां उसकी मां की कमर से छू गईं तो उसके बदन में बिजली दौड़ गई, हालांकि रात को भी सोते हुए उसने सुमन की कमर को छुआ था पर ये अनुभव ही ऐसा था कि हर पल नया लगता था,

पल्लू ठूंसने के बाद कम्मू दोबारा सीढ़ी पर चढ़ गया पुताई करने लगा, वहीं सुमन भी लिपाई करने लगी। कम्मू के अंदर की गर्मी थोड़ी बढ़ चुकी थी, कुछ देर बाद सुमन फिर से बोली: अरे लल्ला ये तो फिर से खुल गया,

कम्मू ने पलट कर देखा तो उसका पल्लू फिर से ढीला होकर लटक रहा था,

कम्मू: अरे मां ये खुलता ही रहेगा या तो साड़ी उतार के ही कर लो।

सुमन ने कुछ सोचा और बोली: हां तो नीचे तो आ।

कम्मू: क्यों क्या हुआ?

सुमन: उतरेगा कौन मेरे हाथ तो सने हुए हैं न।

कम्मू तो ये सुन ही झूम उठा, की अपनी मां की साड़ी वो खुद उतारेगा, और तुरंत नीचे उतर गया, और उसकी ओर बढ़ा,

सुमन: रुक पहले दरवाजे के बाहर खाट लगा दे और उस पर कोई कपड़ा टांग दे कि कोई आए तो अंदर का न दिखे। क्या पता तेरे ताऊजी है कोई और आ जाए,

सुमन ने सावधानी बरतते हुए कहा, कम्मू को तो मानो खुशी पर खुशी मिल रही थी, उसने तुरंत दरवाज़े के बाहर खाट खड़ी करके लगा दी और उस पर एक चद्दर डाल दी जिससे अब कमरा के अंदर कोई नहीं देख सकता, कम्मू फिर तुरंत आकर अपनी मां के बगल में खड़ा हो गया और उसे देखने लगा,

सुमन: अब खड़ा ही रहेगा क्या जल्दी उतार बहुत काम पड़ा है,

जहां सुमन के लिए ये सब सामान्य था और वो चाहती थी जल्दी करना वहीं कम्मू तो चाहता था ये पल जितना धीरे जाए उतना अच्छा, उसने फिर भी अपनी मां के कहे अनुसार अपना हाथ उसके कंधे पर लेजाकर उसका पल्लू पकड़ा और नीचे सरका दिया, पल्लू धीरे धीरे सुमन के बदन पर फिसलते हुए नीचे आने लगा





पल्लू जैसे जैसे नीचे आया सुमन का पसीने से चमकता कामुक बदन सामने आने लगा, ब्लाउज़ में बंद बड़ी बड़ी चूचियां उनके बीच की कामुक दरार, मादक कमर और पर बीच में सुन्दर नाभि ये सब कम्मू की आंखों के सामने आ गया, वैसे तो ये सब सिर्फ दो पलों में हुआ पर कम्मू के लिए ये सब ऐसे हुआ जैसे समय कई गुना धीमे चल रहा हो,

कम्मू की आँखें उसकी मां की कमर और पेट पर फिसल रही थी,

सुमन: जल्दी कर लल्ला,

सुमन ने फिर से झल्ला कर कहा तो कम्मू होश में आया और धीरे धीरे सुमन की पूरी साड़ी उतार दी, कम्मू की मां अब उसके सामने पेटीकोट और ब्लाउज में थी वैसे तो कम्मू के लिए ये कोई नया दृश्य नहीं था बहुत बार उसने अपनी मां को पेटीकोट और ब्लाउज में देखा था पर जो भावनाएं अब उसके मन में अपनी मां के लिए आ चुकी थीं वो पहले नहीं थी, उसे खबर भी नहीं हो रही थी कि वो धीरे धीरे अपनी मां के बदन के लिए पागल होता जा रहा था ये भावनाएं उसे पाप की ओर धकेल रही थीं। सुमन साड़ी उतरते ही बापिस लिपाई पर लग गई तो कम्मू को भी बापिस सीडी पर जाना पड़ा, पुताई करते हुए बार बार वो अपनी मां की ओर देख रहा था जो अब उसकी ओर पीठ किए हुए थी और कम्मू को अपनी मां के फैले हुए चूतड़ पेटीकोट में पीछे से दिख रहे थे,





ये दृश्य देख कम्मू का लंड तन चुका था और उसका काम में मन लगाना मुश्किल हो रहा था पर वो जानता था कि मां के साथ रहने का यही एक तरीका है, बार बार वो सुमन के चूतड़ों की ओर देखता और सोचता मां नंगी होती तो उनके चूतड़ कितने मस्त लगते। कितने बड़े बड़े और फैले हुए हैं अह्ह्ह्ह मज़ा ही आ जाता।

कम्मू अपनी ही कल्पनाओं की भावनाओं में खोया हुआ था अब उसके अंदर का द्वंद्व खत्म हो चुका था कि जो वो सोच रहा था वो गलत था, अब तो बस उसके मन में उसकी मां का बदन था और वो ही सही था।

मन्नू पिछले कुछ दिनों से उखड़ा उखड़ा रह रहा था उसकी उसके दोनों दोस्तों से बातचीत बंद थी, सोनू से तो कर्मा की वजह से झगड़ा हुआ था और कम्मू भी सोनू का साथ दे रहा था इसीलिए उससे भी अब बात चीत नहीं हो रही थी, उसका एक मन चाहता था कि सोनू से माफी मांग कर सब सही करले वहीं उसका अहम उसे रोकता भी था, पर इसी अहम के कारण आज वो अकेला महसूस कर रहा था, और घर में अकेला बैठा हुआ था, इस बात पर बिंदिया ने भी ध्यान दिया कि उसका हमेशा हांडने वाला भाई आज एक दो दिन से घर पर ही ज़्यादा समय बिता रहा था, बिंदिया ने उसे बैठे देखा तो बोली: क्यों रे क्या हुआ तुझे आज कल घर में ही पड़ा रहता है?

मन्नू: पड़ा रहता है मतलब और कहां रहूं?

बिंदिया: पहले तो पूरे पूरे दिन अपने दोस्तों के साथ चक्कर लगाता रहता था,

मन्नू: तो क्या हुआ अब मेरा मन नहीं होता, तुम्हें क्या?

बिंदिया: हां मुझे क्या, और कैसे बात कर रहा है तू मुंह सिकोड़ कर, ज़रूर झगड़ा हुआ है तेरा,

मन्नू: किसका झगड़ा मेरा कोई झगड़ा नहीं हुआ।

बिंदिया: तो फिर मुंह बना कर क्यों बैठा है?

मन्नू: अरे यार कहां मुंह बना है तुम भी न जीजी परेशान मत करो।

मन्नू ने चिढ़ते हुए कहा,

बिंदिया: अरे तो ऐसे चिढ़ के क्यों बोल रहा है जा मैं नहीं करती तुझसे बात, एक तो बात करो ऊपर से इनके नखरे देखो।

बिंदिया तुनक के उठ कर घर से बाहर चली गई वहीं मन्नू को भी बुरा लगा कि उसने अपनी जीजी से ऐसे बात की आखिर वो तो सिर्फ पूछ ही रही थी, मुझे अपने इस चिढ़चिढ़ेपन को सुधारना पड़ेगा...

हवेली में कर्मा के कमरे में सोनू और कर्मा आपस में बातें कर रहे थे, और उनकी बातों का विषय हलवाइन था जिसके बारे में सोनू भी अब खुल कर बातें कर रहा था,

सोनू: सही कहूं भैया तो जबसे उसके कल भीगे चूतड़ देखे हैं मेरा तो बैठ ही नहीं रहा,

कर्मा: सही कह रहा है यार, साली की गांड मारने में बड़ा मज़ा आयेगा।

सोनू: कहां मारने को मिलेगी भैया बस सोच कर ही मजे ले सकते हैं हम तो!

सोनू ने निराश होते हुए कहा,

कर्मा: तुझे सच में मारनी है? उसी की या किसी की भी चलेगी?

सोनू ने सोचा पहले तो मना कर दूं फिर सोचा नहीं वो अब खुल कर बोलेगा,

सोनू: किसी की भी मिल जाए अब तो बड़ा बुरा हाल है लोड़ा बैठ ही नहीं रहा,

कर्मा: ऐसा है तो चल, शर्माना मत लेकिन,

सोनू: नहीं आज बिल्कुल नहीं।

कर्मा: तो तू यही रुक अभी आया,

अब ये सुन सोनू घबराता है कि यहां क्या होगा, हवेली में तो मां और साहब, मालिकन सब हैं किसी न देख लिया तो मारा जाऊंगा।

पर अभी क्या कर सकते हैं जो भी कर्मा ने सोचा होगा वो ही करना होगा,

इधर रसोई में रजनी कर्मा के लिए ही नाश्ता तैयारी कर रही थी, आज सुबह के कार्यक्रम की वजह से उसे काफी देर हो गई थी अभी तक उसने कर्मा को चाय भी नहीं दी थी, इसीलिए वो जल्दी जल्दी कर रही थी चाय वगैरह तैयार करके वो ट्रे में लेकर कर्मा के कमरे की ओर चली, उसके चेहरे पर मुस्कान थी ये सोच कर कि कल कर्मा ने उसकी बेटी को बचा लिया था उसके बदले में अगर कुछ मैं कर सकूं तो कितना अच्छा होगा, जैसे ही वो कमरे के बाहर पहुंची तो उसे अंदर से आवाज़ें आती सुनाई दी, जिन्हें सुन कर वो समझ गई कि वो चुदाई की आवाजें थी, वो मन ही मन सोचने लगी: बिमला ने आज पहले ही घेरा डाल दिया लगता है, ये भी बहुत बड़ी रांड है, रजनी के मन में हल्की जलन भी हुई बिमला के लिए, वो बापिस मुड़ने को हुई पर रुक गई और उसके चेहरे पर कुछ सोच कर मुस्कान आ गई, कुछ देर बाद कर्मा के कमरे का दरवाज़ा खुला और बंद हुआ और दरवाज़े पर रजनी थी





कुछ इस तरह से उसका पूरा बदन नंगा था बदन पर बस एक बहुत छोटी तरह की विलायती कच्छी थी जो उसे सरोज ने दी थी, हाथ में चाय की ट्रे और चेहरे पर मुस्कान थी, उसकी चूचियां उत्तेजना और कुछ नया करने के आभास से कड़क हो चुकी थी, ऐसी हिम्मत और ऐसा कदम स्वयं से उसने कभी नहीं उठाया था, अपने बदन को अपने बेटे की उम्र के लड़के को वो बेशर्मी से सौंपने जा रही थी, उस पर अभी ऐसा करने का कोई दबाब नहीं था पर फिर भी वो ये सब कर रही थी अपनी इच्छा से कर रही थी, क्या वो सच में वही बनती जा रही थी जो वो कुछ देर पहले खुद को बोल रही थी, वो एक छोटा सा शब्द जिसका बहुत बड़ा अर्थ है वो शब्द- रंडी।

पर जो कुछ कर कर्मा ने मेरी बेटी और परिवार के लिए किया उसके लिए मैं जो भी करूं कम हैं, और रंडी तो पैसों के लिए अपना बदन सौंपती हैं, पर जो मैं करती हूं उसमें मेरा सुख है मेरे बदन का सुख है मुझे आनंद मिलता है और उस सुख के लिए अब मुझे कुछ भी करना पड़े मैं करूंगी। मन में ये सब विचार हटाकर रजनी ने बिस्तर की ओर देखा, बिस्तर पर बिमला कर्मा के ऊपर बैठ कर कूद रही थी, बिमला की साड़ी उसके चूतड़ों तक उठी हुई थी ब्लाउज़ बदन से गायब था, रजनी आगे बढ़ी और एक ओर चाय की ट्रे रख कर उसने बिस्तर पर देखा,





बिमला पूरे जोश में कर्मा के ऊपर अपनी गांड घुमा रही थी वहीं कर्मा का मुंह उसकी मोटी चूचियों के बीच घुसा हुआ था ठीक से दिख भी नहीं रहा था,

रजनी को भी ये देख उत्तेजना होने लगी उसकी खुद की चूत में नमी आने लगी, वो खुद से हैरान थी कि अभी सुबह ही जीजी और साहब के साथ चुदाई की थी और अब फिर से उसकी प्यास बढ़ रही थी, हवेली में आकर उसे उसके बदन की उस भूख उस बदन की प्यास और हवस का आभास हुआ था जिसके बारे में उसे पहले पता ही नहीं था,

वहीं कमरे में बिमला की आहें लगातार गूंज रहीं थी, इसी बीच उसे अपनी कमर पर हाथ महसूस हुए उसने चौंक कर पीछे चेहरा घुमा कर देखा तो उसकी आँखें बड़ी हो गईं और मुंह खुल गया क्योंकि वो कर्मा था और इससे पहले वो कुछ बोलती कर्मा के होंठ उसके होंठों पर अधिकार कर चुके थे और चूसने लगे थे उसके हाथ कमर से ऊपर सरक कर उसकी मोटी मोटी चूचियों पर आ गए थे और उन्हें मसलने लगे थे,





पहले तो रजनी हैरान थी पर कर्मा के हाथों में पिघलने लगी उसकी खुद की उत्तेजना काफी थी कि वो भी कर्मा का साथ देने लगी, उसके मन में हालांकि सवाल पैदा हुआ कि अगर कर्मा यहां है तो बिस्तर पर कौन है पर इसका जवाब भी उसने अपने आप ही सोच लिया कि अनुज होगा शायद अपने मामा के यहां से रात को लौट आया होगा, वो ये सोच कर कर्मा की बाहों में मचलने लगी, कर्मा के हाथ उसकी चूचियों को आटे की तरह गूंथ रहे थे उसका बदन पीछे से रजनी के बदन से छू रहा था जिससे रजनी को आभास हो गया कि वो भी बिल्कुल नंगा है क्योंकि उसका कड़क मोटा लंड उसके चूतड़ों के बीच चुभ रहा था, इसी बीच उसे कर्मा का हाथ उसकी चूची से हटके नीचे जाता हुआ दिखा और अगले ही पल उसने रजनी की छोटी सी कच्छी को पकड़ कर एक ओर सरकाया और अगले ही पल रजनी की चूत के द्वार पर कर्मा का लंड दस्तक देने लगा तो रजनी की आँखें बंद हो गईं, कर्मा ने बापिस उसकी कमर को थाम लिया और होंठों को छोड़ कर उसके कान में फुसफुसाते हुए बोला: घुसा दूं चाची?

रजनी जो चूत पर उसके लंड की गर्मी और कड़कपन से तड़प रही थी बिल्कुल बेसब्री से बोली: घुसा दो लल्ला, आह।

कर्मा फिर से उसके कान में फुसफुसा के बोला: क्या घुसा दूं? कहां घुसा दूं खुल कर बोलो क्या करूं?

रजनी ने आंखें बंद किए हुए ही अपने चूतड़ पीछे की ओर दबाते हुए बोला: अह्ह्ह्ह लल्ला अपना मोटा लंड घुसा दे अपनी चाची की चूत में और चोद मुझे।

कर्मा: अच्छा लगता है तुम्हे मेरे लंड से चुदवाना?

रजनी: अह्ह्ह्ह लल्ला बहुत अच्छा अह्ह्ह्ह तभी तो तेरी आह चाची नंगी हो कर आई है तेरे कमरे में आह अब देर मत कर और घुसा दे।

रजनी बिल्कुल मानो गिड़गिड़ा कर बोली, रजनी का इतना कहना था कि एक झटका और कर्मा का लंड उसकी चूत में घुस गया, और रजनी को आह निकल गई उसका चेहरा ऊपर की ओर उठ गया और उसकी बंद आंखें खुल गई, और फिर जब खुली आंखों से सामने का दृश्य देखा तो उसकी आँखें जैसे बाहर आने को हो गईं,





बिस्तर पर बिमला अब भी हल्का हल्का उछल रही थी पर उसकी नज़रें रजनी के चेहरे पर थी, मुंह हैरानी से हल्का सा खुला हुआ था जैसे क्या हो रहा है समझने की कोशिश कर रही हो, वहीं रजनी की आँखें तो उस पर थी जिस पर बिमला उछल रही थी वो था सोनू, और सोनू भी आंखें फाड़े अपनी मां को बिल्कुल नंगा देख रहा था, मां बेटे एक दूसरे के सामने थे नंगे और अलग अलग लोगों से चुदाई कर रहे थे, सोनू को देख कुछ पल तो रजनी मानो जम सी गई पर जैसे ही होश आया तो मन में शर्म और ग्लानि भरने लगी, उसने तुरंत कर्मा से छूटने की और वहां से जाने की सोची और उसने आगे होकर हटने की कोशिश की पर कर्मा ने उसे अच्छे से जकड़ रखा था और उसका लंड रजनी की चूत में जड़ तक समाया हुआ था और कर्मा ने उसी का लाभ उठाते हुए रजनी की कमर को थाम कर दनादन धक्के लगाना शुरू कर दिया,

कड़क और लंबे लंड के कुछ कड़े प्रहार चूत में हुए तो सारा ध्यान मन के द्वंद्व से हटकर चूत की प्यास पर आ गया, रजनी की आँखें फिर से बंद हो गईं मुंह खुल गया और कर्मा लगातार उसकी चूत में धक्के लगाने लगा।





सोनू के लिए ये बहुत अलग एहसास था, उसे समझ नहीं आ रहा था वो कैसा महसूस कर रहा था, वो जीवन की पहली चुदाई का आनंद ले रहा था पर सामने उसकी मां भी लगभग पूरी नंगी हो कर उसके दोस्त से चुदवा रही थी, और वो भी अपनी मर्ज़ी से, अपने लंड पर उछलती बिमला की गर्म चूत का आनंद, अपनी पहली चुदाई का सुख, या अपनी मां को सामने चुदवाते देखने की पीड़ा, या अपमान ये सब क्या था, उसकी नज़र अपनी मां के खुले मुंह से होते हुए नीचे उसकी झूलती चूचियों पर पड़ी जो हर धक्के पर उछल कूद कर रही थी, उसकी मां का नंगा कामुक पेट और कमर नंगी मोटी जांघें, उसके पीछे कर्मा का नंगा बदन जो लगातार उसकी मां की चूत में धक्के लगा रहा था,

उसे हैरानी की बात तो ये लग रही थी कि इसके बाद भी उसका लंड बिल्कुल कड़क था बल्कि अब और फूलता हुआ महसूस हो रहा था, अपनी मां को देखते हुए ही सोनू के हाथ बिमला की कमर पर कस गए और वो भी नीचे से दनादन धक्के लगाकर उसे चोदने लगा, वहीं रजनी की आंखें दोबारा खुल चुकी थी पर कर्मा के धक्के लगातार लग रहे थे, मां बेटे एक दूसरे की आंखों में देख रहे थे, बीच की शर्म, ग्लानि, बेबसी, मजबूरी अभी आंखों में कुछ नहीं था थी तो सिर्फ हवस, उत्तेजना।

सोनू के लिए अब और रुकना मुश्किल हो गया उसके लिए वैसे ही पहली बार था उस पर से अपनी मां का सामने होना वो आहें भरते हुए झड़ने लगा, पर उसकी आंखे लगातार रजनी की आंखों से मिली रही और रजनी को भी उसी समय अपनी उत्तेजना चरम पर जाते हुए महसूस हुई मानो आंखों ही आंखों में दोनों के बीच उत्तेजना का आदान प्रदान हो गया हो और फिर दोनों मां बेटे एक साथ झड़ रहे थे, रजनी कर्मा की बाहों में थरथराते हुए मचलते हुए झड़ रही थी वहीं सोनू अपना रस बिमला की चूत में भर रहा था, झड़ने के बाद दोनों शांत हुए कर्मा ने रजनी को छोड़ दिया वो नीचे सरक गई और बैठ कर हांफ रही थी, झड़ने के बाद सब होश आने लगा जो कुछ अभी हुआ वो सब और कुछ पल बाद ही रजनी बाहर की ओर भागते हुए चली गई, बिमला भी सोनू के ऊपर से उठी, तो कर्मा ने उसे बिस्तर के किनारे घोड़ी बना दिया और उसकी गांड में लंड घुसा दिया, और तेजी से चोदने लगा जैसे बस झड़ जाना चाहता हो,





कर्मा और बिमला के लिए भी ये अनुभव खास था ऐसा आखिर कहां होता है कि मां और बेटा एक दूसरे के सामने चुदाई कर रहे हो। सोनू बस टकटकी लगाए छत की ओर देखे जा रहा था, कुछ देर बाद ही कर्मा ने आहें भरते हुए गुर्राते हुए बिमला की गांड को अपने रस से भर दिया, बिमला भी कर्मा के साथ झड़ रही थी, झड़ने के बाद दोनों शांत हुए और कर्मा उसकी गांड से लंड निकाल कर बिस्तर पर बैठ कर हांफने लगा, बिमला भी कुछ देर नीचे बैठी हांफती रही फिर उठी कर्मा के लंड को मुंह से चाट कर साफ किया और अपने कपड़े सही करते हुए बोली: लल्ला कुछ चाहिए तो बता देना,

कर्मा ने सिर्फ सिर हिला कर इशारा किया और वो चली गई, कर्मा ने उठ कर अपने कपड़े पहनना शुरू किया, और सोनू की ओर देखा जो कि बस शून्य में देखे जा रहा था, कर्मा अपने कपड़े पहन कर उसके पास आया और बोला: देख सोनू मैं जानता हूं अभी तू काफी कुछ सोच रहा होगा,

सोनू अचानक से उसकी बात काटते हुए बोला: कब से चोद रहे हो मां को?

कर्मा: आज दूसरी बार था, यार वो इस तरह कमरे में आ गईं तो मैं खुद को रोक ही नहीं पाया, और मैं क्या कोई भी नहीं रोक पाता।

कर्मा ने सफाई देते हुए कहा, सोनू भी बिस्तर से खड़े होकर अपने कपड़े पहनने लगा था, और फिर बिना कर्मा से कुछ बोले कमरे से बाहर निकल गया, कुछ देर बाद कर्मा नाश्ता वगैरह करके हवेली के बाहर निकला तो देखा सोनू बाग में काम कर रहा था, कर्मा सोनू के पास गया और खड़ा हो गया, सोनू कुछ देर तक बिना उसकी ओर देखे हुए काम करता रहा फिर खड़ा हुआ और उसकी ओर देख कर बोला?

कर्मा भैया एक बात सच सच बताओगे?

कर्मा: हां पूछ ना,

सोनू: क्या तुमने मां के साथ कोई जबर्दस्ती की कभी भी?

कर्मा: नहीं यार पागल है क्या, जो हुआ हम दोनों की मर्ज़ी से हुआ, उनकी भी इच्छा थी ज़रूरत थी इसी कारण पहली बार हुआ और आज तो तू जानता ही है।

सोनू ने ये सुना और फिर शांत हो गया और कुछ देर बाद बोला: समोसे खिलाओगे?

ये सुन कर कर्मा के चेहरे पर मुस्कान आ गई।

रजनी अंदर एक कोने में बैठ कर सोच में डूबी थी, उसे समझ नहीं आ रहा था कि हवस में वो इतनी अंधी कैसे हो गई कि अपने बेटे के सामने ही ये सब कर बैठी, क्या बीत रही होगी उस पर मुझे ऐसे देख कर, कैसे रह पाएगा वो ये सब देख कर वो तो शर्म के मारे किसी को मुंह भी नहीं दिखा पाएगा। सब मेरी गलती है मैने अपने बेटे का जीवन बर्बाद कर दिया। वो सोच ही रही थी कि बिमला उसके बगल में आकर बैठ गई, उसकी ओर चाय का एक कप बढ़ाया तो रजनी ने ना में सिर हिला दिया,

बिमला: अरे पी ले बन्नो चाय से क्या बैर दिखा रही है।

बिमला के ज़ोर देने पर रजनी ने चाय पकड़ी और गंभीर होकर बोली: बहुत बड़ी गलती हो गई जीजी, अब बेटे का सामना कैसे कर पाऊंगी।

बिमला: अरे क्यों नहीं कर पाएगी ऐसा क्या कर दिया तूने?

रजनी: तुमने नहीं देखा? अपने ही बेटे के सामने ये सब करना,

रजनी बोलते हुए चुप हो गई,

बिमला: तो क्या हुआ और तू तबसे ये सोच रही है कि तूने बेटे के सामने क्या किया पर एक बात पर ध्यान नहीं दिया कि तेरा लल्ला मेरे साथ क्या कर रहा था,

उसकी बात सुनकर रजनी सोच में पड़ गई और बोली: हां जीजी वो तो तुम्हारे साथ।

बिमला: खुल कर बोल न कि चोद रहा था मुझे।

रजनी: हां वही पर कैसे और मतलब कब से?

बिमला: अरे ज्यादा मत सोच आज पहली बार था उसका तेरे लल्ला को मर्द बना दिया मैने,

रजनी: पर क्यों मतलब उसने कुछ बोला ये सब हुआ कैसे?

बिमला: कर्मा मुझे बुला कर ले गया था उसी के लिए, सोनू भी तैयार था बोल रहा था कि ताई मुझे आज करना ही है मेरा लंड बैठ ही नहीं रहा, बहुत जोश में था। और तुझे तो पता है जवान लंड देख कर मैं मना नहीं कर पाती।

बिमला की बात पर रजनी के चेहरे पर हल्की सी मुस्कान आ गई,

बिमला: बस फिर क्या था उसे भी दिखा दी बिमला ताई की गरमी। और तू ज्यादा मत सोच तूने कोई इतना बड़ा पाप नहीं कर दिया, तूने भी वही किया जो वो कर रहा था, अगर गलत हो तो दोनों हो नहीं हो तो कोई नहीं,

रजनी: पर जीजी मैं उसकी मां हूं,

बिमला: मां है तो क्या हुआ तू अपनी खुशी के लिए अपने सुख के लिए कुछ नहीं कर सकती, हर बार मां ही बलिदान दे, तूने बहुत कुछ सहा है अब सबकी फिक्र छोड़, सोनू समझदार है वो समझ जाएगा।

रजनी: ऐसा ही हो,

रजनी ने चाय का घूंट भरते हुए कहा, फिर मुस्कुरा कर बोली: चाय बहुत अच्छी बनाती हो जीजी।

बिमला: जानती हूं, और तू हंसते हुए अच्छी लगती है।

दोनों बातें करते हुए चाय पीने लगती हैं।

सोनू और कर्मा समोसे खाने के लिए हलवाई की दुकान पर बैठे थे, समोसे और चाय का मज़ा उठा रहे थे, हलवाइन उनके सामने थी,

कर्मा: तुम्हारे हाथों में तो जादू है चाची बहुत अच्छे समोसे बनाती हो।

हलवाइन: अरे लल्ला तुम्हे पसंद आए तो समझो मेहनत वसूल हो गई, हलवाइन हंसते हुए जवाब देती है





दोनों हलवाईन से बातें करते हुए समोसे और चाय का मज़ा ले रहे होते हैं।

कर्मा: वैसे चाची आज कल चाचा बहुत कम रहते हैं दुकान पर।

हलवाइन: वो लल्ला शहर जाने लगे हैं न काम के लिए।

कर्मा: काम के लिए मतलब काम है तो यहां दुकान पर।

इस पर हलवाइन थोड़ा गंभीर हो जाती है और कहती है: अब तुमसे का छुपाएं लल्ला, तुम तो हालत देख ही रहे हो दुकान की, इतनी ग्राहकी है नहीं और ऊपर से खेत गिरवीं रखे हैं उनका ब्याज है तो तुम्हारे चाचा शहर में काम करने लगे हैं, सोचा है दो पैसे और आ जाएंगे तो मदद हो जाएगी।

सोनू: पर चाची खेत गिरवीं क्यों रखे और किसके पास?

हलवाइन: गुड़िया के ब्याह के लिए रखना पड़ा था लल्ला तबसे छूटा ही नहीं पाए हैं और मालिक के पास ही तो रखे हैं।

हलवाइन ने कर्मा की ओर इशारा करके कहा। कर्मा को जैसे कुछ ध्यान आया वो सोचने लगा कि इसके खेत हमारे घर पर हैं, ये सोच कर उसके चेहरे पर मुस्कान आ गई जिसे भुला कर वो बोला: अरे चाची चिंता मत करो बुरा वक्त सदा नहीं रहता, सब सही हो जाएगा।

हलवाइन: हो जाए तो भला लल्ला,

हलवाइन निराशा से बोली, कर्मा और सोनू समोसे खा कर बाहर निकले और कर्मा सोनू को देख कर मुस्कुरा के बोला: हलवाइन को चोदेगा?

सोनू उसकी बात पर हैरान हो गया और बोला: अरे ऐसे कैसे?

कर्मा: बस देखता जा।



जारी रहेगी।।।
 
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