Adultery ☆ प्यार का सबूत ☆ (Completed) - Page 19 - SexBaba
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Adultery ☆ प्यार का सबूत ☆ (Completed)

अध्याय - 116

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ललिता देवी को अपने कमरे में आया देख रूपा चौंकी। पिछले कुछ समय से ललिता देवी अपनी बेटी से थोड़ा नम्र भाव से बातें करने लगीं थी वरना इसके पहले वो हमेशा ही उसे खरी खोटी सुनाते हुए उस पर लानत भेजती रहीं थी। रूपा अपनी मां द्वारा डांट पड़ने से और लानत भेजने से बहुत दुखी हो जाया करती थी और फिर अकेले में खूब रोती थी। उसने प्रेम के चलते अपना सब कुछ वैभव को क्या सौंप दिया था जैसे बहुत भयंकर गुनाह हो गया था उससे। घर का कोई भी सदस्य उससे ढंग से बात करने की तो दूर कोई उसकी तरफ देखना तक गवारा नहीं करता था।

उसके ताऊ यानि मणि शंकर की बेटियां जो उससे उमर में बड़ी थीं वो उससे कभी बात नहीं करती थीं। इतने बड़े परिवार के इतने सारे लोगों के बीच वो एकदम से अकेली हो गई थी। सिर्फ एक ही शख़्स था जो उससे बातें करता था और उसे समझता था। यानि उसके ताऊ की बहू कुमुद जोकि उसको अपनी सहेली भी मानती थी किंतु उसने भी उस दिन उससे मुंह मोड़ लिया था जिस दिन दादा ठाकुर द्वारा घर के सभी मर्दों और लड़कों को मार दिया गया था। किसी और की करनी की सज़ा उसे मिल गई थी। रूपा को बाकी किसी से इतनी शिकायत नहीं थी जितनी कि उसे जन्म देने वाली अपनी मां से थी। ऐसा नहीं था कि वो खुद को दोष नहीं देती थी लेकिन वो ये भी सोचती थी कि इसके लिए क्या उसे इतना बड़ा दंड मिलना चाहिए था?

ख़ैर वक्त बदला, हालात बदले और अब सब कुछ सामान्य सा हो गया था। ललिता देवी ने जब पहली बार रूपा से थोड़ा नम्रता से बात की तो उसे पहले तो यकीन ही नहीं आया लेकिन फिर उसे ऐसी खुशी महसूस हुई जैसे दुनिया की सबसे बड़ी सौगात मिल गई हो। तड़प कर वो अपनी मां के सीने से लिपट जाना चाहती थी और जी भर के रो लेना चाहती थी। जैसे ही उसने ऐसा करने की कोशिश की तो ललिता देवी ने हाथ दिखा कर उसे रोक दिया था। ये देख रूपा को झटका लगा था। उसका जी चाहा था कि फूट फूट कर रो पड़े लेकिन फिर बड़ी मुश्किल से उसने अपनी भावनाओं को सम्हाला था। ज़हन में बस यही सवाल उभरा था कि क्या कोई मां इतनी कठोर हो सकती है?

"खुश तो बहुत होगी ना तू?" ललिता देवी ने रूपा की तरफ देखते हुए निर्विकार भाव से ब्यंग्य सा किया____"आख़िर सब कुछ तेरे मन का जो हो रहा है।"

अपनी मां की ये बात सुन कर पलक झपकते ही रूपा की आंखें भर आईं। पहले से ही दुखी हृदय और भी ज़्यादा घायल हो गया। ऐसा लगा जैसे पिघलता हुआ कांच कांनों से होते हुए सीधा दिल में पहुंच गया हो। रूपा ने आंखें बंद कर के अपने अंदर बुरी तरह मचल उठे जज़्बातों को काबू करने की कोशिश की।

"ख़ैर।" ललिता देवी ने कहा____"मैं ये कहने आई थी कि कल सुबह तैयार रहना। तेरा जो भी अपना समान हो उसे एक थैले में डाल लेना। रूपचंद्र सुबह तुझे उसके पास छोड़ आएगा जिसको तूने प्रेम में पड़ कर पहले ही सब कुछ सौंप दिया है।"

इस बार लाख कोशिशों के बाद भी रूपा अपनी आंखें छलक पड़ने से रोक न पाई। चेहरे पर अथाह पीड़ा के भाव नुमायां हो उठे। दिल में ही नहीं बल्कि समूचे जिस्म में शूल चुभते महसूस हुए उसे।

"अगर मैं आप सबकी नज़र में इतनी ही बुरी हूं मां।" फिर उसने रुंधे हुए गले से कहा____"तो क्यों मुझे अब तक ज़िंदा रखा हुआ है? मैंने अगर इस परिवार की इज्ज़त और मान मर्यादा को मिट्टी में ही मिला दिया है तो क्यों मुझे जीवित रखा हुआ है आप लोगों ने? अगर मुझे जान से मार नहीं सकते तो बस एक बार अपने मुंह से कह दो मैं खुद अपनी जान दे दूंगी और आप सबको हर दुख से मुक्ति मिल जाएगी।"

"बकवास मत कर।" ललिता देवी ने सख़्त नज़रों से घूरते हुए कहा____"मुझे तेरा ये रोना धोना और तेरी ये बेहूदा बातें नहीं सुननी हैं। तू मेरी कोख का कलंक है। तूने जो किया है उसके लिए मैं तुझे कभी माफ़ नहीं करूंगी।"

"वाह! बहुत खूब।" दरवाज़े से रूपचंद्र की आवाज़ आई तो ललिता देवी चौंकते हुए पीछे पलटीं। उधर रूपचंद्र कमरे के अंदर दाखिल होते हुए बोला____"धन्य हो मेरी माता धन्य हो। ईश्वर करे हर संतान को आपके जैसी मां दे।"

"क्या बक रहा है तू?" ललिता देवी ने गुस्से से कहा____"और ये किस लहजे में बात कर रहा है तू अपनी मां से?"

"मां से???" रूपचंद्र के चेहरे पर एकाएक हिकारत के भाव उभर आए, बोला____"क्या आप अपने बारे में कह रहीं हैं ललिता देवी? न न चौंकिए मत....मैं अब आपको ललिता देवी ही कहूंगा क्योंकि जो औरत अपनी बेटी को न समझे और उससे इस तरीके से बात करे कि बेटी का हृदय हाहाकार कर उठे वो औरत किसी की मां नहीं हो सकती। उस औरत को मां कहना ही नहीं चाहिए।"

"ख़ामोश।" ललिता देवी गुस्से में चीख पड़ी____"तेरी हिम्मत कैसे हुई अपनी मां को ऐसा बोलने की?"

"और आपकी हिम्मत कैसे हुई मेरी बहन को बुरा भला कहने की?" रूपचंद्र उससे भी ज़्यादा ज़ोर से दहाड़ा। गुस्से से तमतमा गया था वो, बोला____"आख़िर ऐसा कौन सा गुनाह कर दिया है इसने जिसके लिए आज इतने समय से आप सब इसे प्रताड़ित करते आ रहे हैं? प्रेम ही तो किया है इसने। किसी एक व्यक्ति को ही तो अपना सब कुछ मान लिया है इसने तो कौन सा पाप कर दिया है? अगर उसका ऐसा करना पाप है तो उससे ज़्यादा पाप मैंने किए हैं। मुझे भी इसके जैसे प्रताड़ित कीजिए लेकिन नहीं, कोई मुझे क्यों प्रताड़ित करेगा? मैं तो लड़का हूं ना, घर का मर्द हूं ना। मर्द एक नहीं दो नहीं बल्कि हज़ारों औरतों से संबंध बनाए रखे तो वो पाप नहीं कहलाता मगर....लड़की....लड़की जात अगर किसी एक व्यक्ति से प्रेम कर ले और उसे अपना सब कुछ मान कर उसे अपना सब कुछ दे दे तो वो पाप हो जाता है। वो लड़की चरित्रहीन हो जाती है और उसकी अपनी मां उसे ऐसे ऐसे शब्दों के बाण चला कर उसका दिल दुखाती है कि लड़की तड़प कर ही मर जाए।"

"भ...भैया चुप हो जाइए।" रूपा बीच में ही बोल पड़ी____"मां को ऐसा कहना शोभा नहीं देता आपको।"

"मुझे बोलने दे रूपा।" रूपचंद्र ने सहसा आहत हो कर कहा____"तेरे खातिर जो आवाज़ मुझे पहले उठानी चाहिए थी वो आज उठाने से मत रोक मुझे। मुझे तो ये सोच सोच कर ग्लानि होती है कि इसके पहले मैं ऐसी मानसिकता का शिकार क्यों था कि तुझे समझ न सका? सबकी तरह मैंने भी तो तेरा बहुत दिल दुखाया है मेरी बहन। भगवान का शुक्र है कि उसने वक्त रहते मुझे सद्बुद्धि दे दी और मुझे तेरी अच्छाईयों का और तेरे प्रेम का एहसास करवा दिया। लेकिन ये लोग अभी भी तुझे ग़लत समझते हैं। ये लोग अभी भी खुद को पाक साफ समझते हैं।"

"भगवान के लिए भैया।" रूपा ने मिन्नत की____"किसी को कुछ मत कहिए।"

"ये लोग तुझे चुप करा सकते हैं रूपा लेकिन मुझे नहीं।" रूपचंद्र जैसे पूरे जलाल पर था____"और ना ही मैं चुप होने वाला इंसान हूं। बहुत दिनों से इन लोगों का तमाशा देख रहा हूं मैं। इन लोगों का ज़ोर सिर्फ तुझ पर चलता है बाकी इनके बस का कुछ नहीं रहा अब। ख़ैर किसी और को क्या कहूं? सबसे ज़्यादा दुख तो इस बात का है कि जिसने तुझे जन्म दिया उसे ही अपनी बेटी के दिल पर नश्तर चलाने में ज़रा भी संकोच नहीं होता। सुना है मां और बेटी के बीच ऐसा गहरा संबंध होता है कि दोनों एक दूसरे को बिना कुछ कहे एक दूसरे के अंदर का मर्म समझ लेती हैं लेकिन यहां तो दूर दूर तक ऐसा कुछ है ही नहीं। इतना कुछ हो जाने के बाद भी इन्हें ये एहसास नहीं हुआ कि जिस बेटी के हृदय में ये नश्तर चला रही हैं उसी बेटी के प्रेम की वजह से आज हम दुबारा लोगों के बीच सिर उठा कर चलने के क़ाबिल बनने वाले हैं। इन्हें ये एहसास नहीं है कि जिस बेटी पर ये अब तक लानत भेजती आईं हैं उसी बेटी के प्रेम की वजह से इस घर की दूसरी बेटियों का भविष्य उज्ज्वल होगा।"

"य...ये सब आप क्या कह रहे हैं भैया?" रूपा कांपते स्वर में बोली। वो बेहद घबराई हुई नज़र आ रही थी। बार बार अपनी मां को भी देख रही थी वो।

"मैं एक ऐसा सच कह रहा हूं मेरी बहन।" रूपचंद्र ने दो टूक भाव से कहा____"जिसे ये लोग जानते तो हैं मगर हजम नहीं कर पा रहे हैं। झूठा मान गुमान अभी भी इनके अंदर घर बनाए बैठा हुआ है। इन्हें आज की वास्तविकता दिखती तो है लेकिन ये उसे मानने से इंकार कर रहे हैं। ख़ैर छोड़ो, सच तो ये है मेरी बहन कि ये परिवार और परिवार के ये सब लोग तेरे लायक हैं ही नहीं। तू तो चमकता हुआ एक नगीना है जिसे इस घर में नहीं बल्कि एक ऐसे घर में होना चाहिए जहां के लोग तेरी सच्चे दिल से क़दर करें। आज ललिता देवी ने जिस तरह अपनी बातों से तेरा दिल दुखाया है उससे मेरा भी मन दुखी हो गया है। मैंने फ़ैसला कर लिया है कि जहां मेरी बहन रहेगी वहीं मैं रहूंगा। सारी उमर तेरे के साथ रहूंगा और तेरा ख़याल रखूंगा। कल सुबह हम दोनों इस घर से हमेशा के लिए चले जाएंगे।"

"न....नहीं।" ललिता देवी भयभीत सी हो कर चीख पड़ीं। भाग कर वो रूपचंद्र के पास आईं और फिर रोते हुए बोलीं____"ये तू कैसी बातें कर रहा है बेटा? तू....तू अपनी मां को छोड़ के कैसे चला जाएगा यहां से? नहीं नहीं, मैं तुझे कहीं नहीं जाने दूंगी। मुझे माफ़ कर दे। पढ़ी लिखी नहीं हूं ना इस लिए मुझमें रत्ती भर का भी दिमाग़ नहीं है। तू मेरी बातों को भुला दे बेटा।"

"नहीं ललिता देवी।" रूपचंद्र ने सपाट लहजे में कहा____"जिस औरत के दिल में मेरी बहन के लिए कोई लगाव, कोई इज्ज़त और कोई क़दर नहीं उस औरत को मुझे बेटा कहने का कोई अधिकार नहीं है।"

"न...नहीं ऐसा मत बोल मेरे लाल।" ललिता देवी आहत भाव से बोलीं____"मैंने कहा न कि मुझसे भूल हो गई है। मेरा यकीन कर, अब से मैं किसी को कुछ नहीं कहूंगी।"

"कैसे यकीन करूं?" मैंने कहा____"अगर आपको अपनी भूल का एहसास हो गया होता तो इस वक्त आप मुझसे नहीं बल्कि मेरी बहन से माफ़ी मांगती और सच्चे दिल से अपनी बेटी को स्नेह और प्यार देते हुए उसे अपने कलेजे से लगा लेती। मगर नहीं, आपको तो सिर्फ अपने बेटे से मतलब है। आप नहीं चाहती कि आपका बेटा आपको और इस घर को छोड़ कर कहीं चला जाए। मतलब साफ है कि अभी भी आपको अपनी बेटी से और उसकी किसी बात से कोई मतलब नहीं है।"

"नहीं नहीं, ऐसी बात नहीं है रूप बेटा।" ललिता देवी हड़बड़ा कर बोलीं____"रूपा मेरी बेटी है और मैं उससे भी उतना ही प्यार करती हूं जितना कि तुझसे।"

"तो फिर साबित कीजिए।" रूपचंद्र ने कहा____"मुझे दिखाइए कि आप अपनी बेटी से कितना प्यार करती हैं और उसकी कितनी क़दर करती हैं।"

ललिता देवी अपने बेटे की बात सुन कर झट से रूपा के पास गई और उससे बोलीं____"मुझे माफ़ कर दे मेरी बच्ची। मैंने सच में तुझे हमेशा ग़लत ही समझा है। अपनी बातों से तेरा बहुत दिल दुखाया है मैंने। ईश्वर किसी बेटी को मेरे जैसी मां न दे।"

"नहीं मां।" रूपा बुरी तरह तड़प कर अपनी मां से लिपट गई, बोली____"ऐसा कभी मत कहना। मैं ईश्वर से यही प्रार्थना करती हूं कि मुझे हर जन्म में आप ही मां के रूप में मिलें।"

रूपा की ये बात सुन कर ललिता देवी की आंखें छलक पड़ीं। उन्होंने कस कर रूपा को अपने कलेजे से लगा लिया। कुछ दूरी पर खड़ा रूपचंद्र नम आंखों से ये अनोखा मंज़र देख रहा था। उसके चेहरे पर एक अलग ही तरह की खुशी की चमक दिखने लगी थी। एक ऐसा सुकून महसूस हो रहा था उसे जिससे उसे परम संतुष्टि सी हो गई थी। ऐसा लग रहा था जैसे उसने कोई बहुत बड़ा काम कर दिया था। इधर मां बेटी काफी देर तक एक दूसरे से लिपटी आंसू बहाती रहीं। फिर दोनों अलग हुईं और एक दूसरे के आंसू पोछने लगीं।

दरवाज़े के बाहर कुछ लोगों की मौजूदगी का रूपचंद्र को एहसास हुआ तो उसने पलट कर उस तरफ देखा। उसकी दोनों भाभियां और बहनें दरवाज़े की ओट में खड़ी थीं। उन सबकी आंखों में आंसू दिखाई दे रहे थे। उन्हें इस तरह खड़े देख एकाएक रूपचंद्र के चेहरे पर गुस्से के भाव उभर आए।

"क्या यहां पर कोई तमाशा हो रहा है जिसे आप सब यहां चुपचाप खड़ी देख रहीं हैं?" फिर उसने लगभग ऊंची आवाज़ में उनके क़रीब जा कर कहा____"दफा हो जाओ यहां से वरना मुझसे बुरा कोई नहीं होगा।"

रूपचंद्र गुस्से से दहाड़ा तो जहां एक तरफ दरवाज़े के बाहर खड़ी वो लोग बहुत ज़्यादा घबरा गईं वहीं दूसरी तरफ ललिता और रूपा ने चौंक कर रूपचंद्र की तरफ देखा।

"क...क्या हुआ बेटा?" फिर ललिता देवी ने फ़ौरन ही चिंतित भाव से उससे पूछा____"किसे दफा हो जाने को बोल रहा है तू और...और इतना गुस्से में क्यों नज़र आ रहा है तू?"

"गुस्से में नज़र ना आऊं तो क्या करूं?" उसने आवेश में आ कर कहा____"ये सब यहां खड़ी चुपचाप तमाशा देख रही हैं। ये वो लोग हैं मां जो कहने को तो इस घर की बहू बेटियां हैं लेकिन बहू बेटियों जैसा कोई काम नहीं किया है इन्होंने।"

"अरे! ये क्या बोले जा रहा है तू?" ललिता देवी के चेहरे पर आश्चर्य के भाव उभर आए____"तेरा दिमाग़ तो ठीक है ना? ये क्या अनाप शनाप बोले जा रहा है तू?"

"मैं अनाप शनाप नहीं बोल रहा मां।" रूपचंद्र ने कहा____"बल्कि इनकी सच्चाई बता रहा हूं। जैसे अब तक आप अपनी बेटी को दुश्मन की नज़र से देखती आ रहीं थी वैसे ही ये सब मेरी बहन को अपना सबसे बड़ा दुश्मन समझती रही हैं। इनमें से किसी ने भी रूपा से बात करना तो दूर उसकी तरफ देखना तक गवारा नहीं किया था। इतना कंजर तो कोई दुश्मन भी नहीं होता जितना कि ये सब हैं।"

रूपचंद्र की बातें सुन कर उन सबने शर्म से सिर झुका लिया। उन सबके चेहरों से साफ नज़र आ रहा था कि वो अपने किए पर शर्मिंदा हैं। इधर कमरे में पलंग पर बैठी रूपा अपने भाई को देखते हुए ये सोच कर खुशी से गदगद हुई जा रही थी कि उसके रूप भैया आज सबसे उसके ऊपर किए गए दुर्ब्यौहार का बदला ले रहे हैं और सबको खरी खोटी सुना रहे हैं। जाने क्यों इस सबसे रूपा को एक असीम सुख और शांति का आभास होने लगा था।

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भाभी मेरे पास आ कर मेरे बगल से ही कच्ची ज़मीन पर बैठ गईं थी। हम दोनों की आंखों के सामने लगभग तीन क़दम की दूरी पर अनुराधा की चिता थी जहां पर अब जली हुई राख तो थी किंतु वो भी चिता के चारो तरफ दूर दूर थोड़ा थोड़ा पड़ी हुई नज़र आती थी। ऐसा इस लिए क्योंकि चिता के बीच में गोबर से लीप दिया गया था। उसमें अब सूखे हुए कुछ फूल ही पड़े दिख रहे थे जो अब लगभग मुरझा गए थे। कुछ दिन पहले तक उसमें कुछ अनाज के दाने भी पड़े हुए दिखते थे किंतु चिड़ियों ने उन्हें चुग लिया था।

मैं हर रोज़ उसी चिता को अपलक देखते हुए बैठा रहता था और अपनी समझ में अपनी अनुराधा से बातें करता रहता था। जबकि सच तो यही था कि मैं खुद ही बड़बड़ाता रहता था। न वहां पर कोई मेरी बातें सुनता था और ना ही मेरी अनुराधा मेरी किसी बात का कभी कोई जवाब देती थी। जवाब तो वो तब दे जब वो वहां पर कहीं हो।

"आप मां के साथ गईं नहीं?" एकाएक जब मेरी नज़र भाभी पर पड़ी तो मैंने उनसे निर्विकार भाव से पूछा____"और...और यहां इस तरह क्यों बैठ गईं हैं? आप जाइए यहां से, मुझे अकेले में अपनी अनुराधा से अभी बहुत सारी बातें करनी है।"

"मुझे भी उससे ढेर सारी बातें करनी है।" भाभी ने एक नज़र मेरी तरफ देखने के बाद कहा____"आख़िर वो मेरी भी तो छोटी बहन थी। क्या तुम मुझे मेरी छोटी बहन से बातें नहीं करने दोगे?"

"ह...हां हां क्यों नहीं।" मैं एकदम से बोल पड़ा____"मुझे माफ़ कर दीजिए। आप सही कह रही हैं। आपको अपनी छोटी बहन से ज़रूर बात करनी चाहिए। आप उससे बात कीजिए भाभी। शायद वो आपको ही कोई जवाब दे, मुझे तो वो कोई जवाब ही नहीं देती है। पता नहीं क्यों इतना नाराज़ हो गई है मुझसे?"

कहने के साथ ही मेरी आवाज़ भर्रा गई और आंखों से आंसू छलक पड़े। भाभी ने मेरी तरफ देखा और फिर अपना एक हाथ मेरे पीछे से बढ़ा कर मेरा बाजू पकड़ते हुए खुद से छुपका लिया।

"वो तुमसे नाराज़ नहीं हुई है वैभव।" भाभी ने बड़े प्यार से समझाते हुए कहा____"बल्कि मैं तो ये कहूंगी कि वो तुमसे नाराज़ हो ही नहीं सकती। तुम उसे इतना प्रेम करते हो कि वो एक पल के लिए भी तुमसे नाराज़ नहीं हो सकती।"

"तो फिर वो मुझसे बात क्यों नहीं करती भाभी?" मैंने दुखी हो कर कहा____"उससे कहिए न कि एक बार मुझे अपनी आवाज़ सुना दे। सिर्फ एक बार, हां भाभी बस एक बार अपने मुख से मेरा नाम ले कर मुझे पुकारे। बदले में मैं भी उसे ठकुराईन कहूंगा। आपको पता है उसे मेरे मुंह से अपने लिए ठकुराईन सुनना बहुत अच्छा लगता था। आप उससे कहिए न कि वो मुझे एक बार अपनी आवाज़ सुना दे।"

मेरा इतना कहना था कि भाभी ने तड़प कर मुझे और भी ज़्यादा खुद से छुपका लिया। उनकी आंखों से आंसू छलक पड़े थे। अपनी रुलाई को बड़ी मुश्किल से रोका हुआ था उन्होंने।

"अगर ये संभव होता तो मैं ज़रूर उससे कहती वैभव।" फिर उन्होंने गंभीरता से कहा____"और वो भी ज़रूर अपनी आवाज़ तुम्हें सुनाती लेकिन ये तो ऐसी बातें हैं जो कभी संभव ही नहीं हो सकतीं। अगर ऐसा होता तो क्या मैं एक बार भी तुम्हारे भैया की आवाज़ न सुन पाती? आज भी अकेले में उन्हें आवाज़ देती हूं और उनसे फ़रियाद करती हूं कि सिर्फ एक बार मेरे ख़वाब में ही आ कर मुझे अपनी सूरत दिखा दें लेकिन वो कभी ऐसा नहीं करते। जानते हो वैभव वो ऐसा क्यों नहीं करते?"

"क..क्यों नहीं करते भाभी?" मैंने उनसे अलग हो कर उनकी तरफ देखा।

"क्योंकि वो बहुत दूर जा चुके हैं।" भाभी ने उसी गंभीरता से कहा____"एक ऐसी जगह जहां से मेरे ख़्वाबों में आने के लिए उन्हें कोई रास्ता ही नहीं दिखता।"

"क्या सच में?" मैंने हैरानी से उन्हें देखा____"पर ऐसा क्यों भाभी? उन्हें रास्ता क्यों नहीं दिखता?"

"ईश्वर ही जाने।" भाभी ने गहरी सांस ली____"या फिर ऐसा हो सकता है कि सच में कोई रास्ता ही न हो। अगर होता तो क्या वो कभी मेरे ख़्वाबों में नहीं आ जाते? आख़िर वो भी तो मुझसे बहुत प्रेम करते थे। तुम्हारी अनुराधा भी शायद ऐसी ही जगह चली गई है जहां से ना तो वो तुम्हें आवाज़ दे सकती है और ना ही शायद वो कभी तुम्हारे ख़्वाबों में आ सकती है लेकिन....।"

"लेकिन??" मैंने उलझन पूर्ण भाव से देखा उन्हें।

"लेकिन इसके बावजूद तुम उसे अपने बहुत पास महसूस कर सकते हो।" भाभी ने कहा____"तुम जिस जगह पर भी रहोगे वहां से भी उसे अपने पास ही महसूस कर सकते हो।"

"वो कैसे?" मैंने हैरानी से उनकी तरफ देखा।

"अपने दिल पर हाथ रख कर और आंखें बंद कर के जब भी उसका नाम लोगे तो वो तुम्हें अपनी मौजूदगी का आभास कराएगी।" भाभी ने रहस्यपूर्ण भाव से कहा____"तुम्हारे दिल की हर धड़कन में तुम्हें उसकी मौजूदगी का आभास होगा।"

भाभी ने इतना कहा ही था कि मैंने फ़ौरन ही अपना हाथ अपने दिल पर रख कर अपनी आंखें बंद कर ली। मन ही मन अनुराधा का नाम लिया और फिर उसे महसूस करने लगा। कुछ ही देर में मेरे होठों पर हल्की मुस्कान उभर आई। मुझे ऐसा प्रतीत हुआ जैसे सच में मेरी अनुराधा मेरे दिल की हर धड़कन में मौजूद है। बंद पलकों में अचानक उसका ऐसा अक्श उभर आया था जिसमें उसके चेहरे पर शर्म भी थी और मुस्कान भी। अपनी बन्द पलकों में अनुराधा को देख कर मेरी खुशी की कोई सीमा ना रही।

जाने कितनी ही देर तक मैं आंखें बंद किए और दिल पर अपना हाथ रखे बैठा रहा। मन कर रहा था कि अब यूं ही उमर भर आंखें बंद किए बैठा रहूं मगर तभी भाभी की आवाज़ से मैं उस खुशी रूपी समंदर से बाहर आ गया। आंखें खोल कर भाभी की तरफ देखा तो वो मुझे ही देख रहीं थी। एकाएक मुझे जाने क्या हुआ कि मैं लपक कर भाभी से लिपट गया।

"आपने बिल्कुल सच कहा था भाभी।" फिर मैं उनसे लिपटे हुए ही खुशी से बोल पड़ा____"मैंने सच में अपनी अनुराधा को महसूस किया और पता है....मैंने अनुराधा को भी देखा। वो मुझे देख के मुस्कुरा रही थी भाभी।"

"फिर तो ये अच्छी बात है ना?" भाभी ने मेरी पीठ पर प्यार से हाथ फेरते हुए कहा____"अब तुम जब चाहोगे तब अपनी अनुराधा को महसूस भी कर सकोगे और उसे देख भी सकोगे।"

"हां भाभी।" मैंने उनसे अलग हो कर बोला____"अब तो मैं हर रोज़ हर पल उसे महसूस करूंगा और देखूंगा भी।"

"ठीक है जैसी तुम्हारी इच्छा।" भाभी ने कहा____"अच्छा अब घर चलो। देखो शाम होने वाली है।"

"हां ठीक है।" मैं फ़ौरन उठ कर खड़ा हो गया।

भाभी ग़ौर से मुझे देख रहीं थी। शायद वो ये समझने की कोशिश कर रहीं थी कि अब मेरी मानसिक हालत कैसी है? मैं पहले की अपेक्षा थोड़ा बेहतर महसूस कर रहा था क्योंकि इतने दिनों बाद मैंने अपनी अनुराधा को महसूस किया था। इस लिए मुझे एक अलग ही खुशी का आभास हो रहा था। ख़ैर जल्दी ही मैं और भाभी मकान के पास आ गए।

मोटर साइकिल को स्टार्ट कर के मैंने भाभी को पीछे बैठाया और फिर चल पड़ा। ठंडी हवा चेहरे से टकराई तो एक अलग ही सुकून महसूस हुआ। रास्ते में भाभी मुझसे कई तरह की बातें करती रहीं। वो महसूस करना चाहती थीं कि मेरी हालत में कितना सुधार हुआ है। ख़ैर कुछ ही समय में हम दोनों हवेली पहुंच गए।

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Prem sambandh ke bare me hamesha se hi logo ki soch nimn rahi hai....kya kar sakte,

Ha ha ha sahi kaha....but koi na der aaye durust aaye :D

Sahi kaha....vaibhav usi situation me hai jisme ek din uski bhabhi thi. Let's see unke marham ka kitna asar hota hai vaibhav par..

Bilkul, aur yahi soch kar apan ne anuradha ko death nirdharit kar diya tha....wow! how smart I am :smarty:

Thanks
 
Anuradha ki maut decide karna aur fir use likhna mere liye bhi asaan nahi tha bhaiya ji...lekin yahi swabhaavik roop se hona is liye likhna pada... :verysad:

Apni taraf se koshish puri thi ki is saare ghatna kram ko natural darshaau...result aapne bata diya to lag raha hai ki koshish safal rahi.... :hug:

Sabko yahi andesha tha, but Rupa aur Ragini me se kisi ki bhi maut sambhav nahi thi aur na hi swabhavik lagni thi. Zahen me chandrakant ki frustration, khundak khaya hua sa, paglaya hua sa aur badla tha. Ab kyoki use bhi pata tha ki vaibhav anuradha ko prem karta hai aur usse byaah bhi karna chahta hai. Apni samajh me usne vaibhav se badla lene ke liye ye jo kiya bilkul sahi kiya....jaisa ki baad me usne vaibhav aur Mahendra Singh ko bhi bataya tha....Anuradha ki maut hone ki yahi sahi vajah thi..

Sahi kaha, rupa ke prem ko samjhna ab se pahle tak uske ghar walo ko shayad mushkil hi tha....lekin sachcha prem kahi na kahi se apne pavitra hone ka pramaad de hi deta hai....wahi yaha par hua hai. Jo baaki rah gaya tha use rupchandr ne pura kar diya....

Ji sahi kaha, uske gun ab ja kar saamne aa rahe hain....Matlab sahi wakt ab aaya hai :D

Bilkul sahmat hu is baat se.....aur sach kahu to aisa hi karna chahta tha main lekin aage fir kuch aisa hua ye maamla fir se pichhe chala gaya.....is bare me aage pata chalega aapko.

Sahi kaha.. :approve:

Thanks
 
अध्याय - 117

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मोटर साइकिल को स्टार्ट कर के मैंने भाभी को पीछे बैठाया और फिर चल पड़ा। ठंडी हवा चेहरे से टकराई तो एक अलग ही सुकून महसूस हुआ। रास्ते में भाभी मुझसे कई तरह की बातें करती रहीं। वो महसूस करना चाहती थीं कि मेरी हालत में कितना सुधार हुआ है। ख़ैर कुछ ही समय में हम दोनों हवेली पहुंच गए।

अब आगे....

रात खा पी कर सुगंधा देवी जब अपने कमरे में पहुंचीं तो दादा ठाकुर को पलंग पर अधलेटी सी अवस्था में कुछ सोचते हुए पाया। सौभाग्य से आज बिजली गुल नहीं थी इस लिए कमरे में बल्ब का मध्यम प्रकाश था और साथ ही कमरे की छत पर लटक रहा पंखा भी मध्यम गति से चल रहा था।

सुगंधा देवी ने दरवाज़े को अंदर से कुंडी लगा कर बंद किया और फिर जा कर पलंग पर बैठ गईं। उनके आने की आहट से दादा ठाकुर सोचो के भंवर से बाहर आ गए थे किंतु चेहरे के भावों से यही प्रतीत हो रहा था जैसे अभी भी मन में कुछ चल रहा हो।

"क्या हुआ? सब ठीक तो है ना?" सुगंधा देवी ने उनके चेहरे को ग़ौर से देखते हुए पूछा____"ऐसा प्रतीत हो रहा है जैसे कुछ चल रहा है आपके मन में।"

"नहीं, ऐसी कोई ख़ास बात नहीं है।" दादा ठाकुर ने जैसे लापरवाही से कहा____"बस ऐसे ही मन में इधर उधर की बातें गूंज रहीं थी।"

सुगंधा देवी ने बड़े ध्यान से अपने पति परमेश्वर को देखा। पिछले तीस सालों से वो उनकी जीवन संगिनी बनी हुईं थी। इतना तो वो समझतीं ही थी कि दादा ठाकुर के चेहरे पर उभरने वाले भाव कौन सी कहानी बयां करते थे? ख़ैर उन्होंने उठ कर अपनी रेशमी साड़ी को अपने बदन से अलग किया और फिर उसे सलीके से तह कर के लकड़ी की आलमारी के पास दीवार में लगी लकड़ी की खूंटी पर टांग दिया। उसके बाद वो वापस पलंग की तरफ बढ़ चलीं। अब उनके बदन पर सिर्फ पेटीकोट और ब्लाउज था।

सुगंधा देवी का जिस्म इस उमर में भी ऐसा कसा हुआ और तंदुरुस्त था कि वो जवान औरतों को भी मात देती थीं। एकदम गोरा सफ्फाक़ बदन जिसमें कहीं कोई दाग़ नहीं था। उमर के चलते बदन में थोड़ा भराव ज़रूर हो गया था लेकिन उसे मोटापा हर्गिज़ नहीं कहा जा सकता था। ब्लाउज में कैद बड़ी बड़ी छातियां अभी भी जवान औरतों की तरह तनी हुईं थी। उसके नीचे हल्का निकला हुआ गोरा सफ्फाक़ पेट जिसके बीच में गहरी किंतु खूबसूरत नाभी थी।

दादा ठाकुर ने एक भरपूर नज़र उनके जिस्म पर डाली और फिर सुगंधा देवी की आंखों की तरफ देखा। सुगंधा देवी तब तक पलंग के पास पहुंच कर पलंग में बैठ चुकीं थी।

"ऐसे क्या देख रहे हैं?" दादा ठाकुर को अपलक अपनी तरफ देखता देख सुगंधा देवी के चेहरे पर सहसा लाज की सुर्खी उभर आई, फिर बोलीं____"इरादे तो नेक हैं ना आपके?"

"अभी तक तो नेक ही थे।" दादा ठाकुर पहले तो हड़बड़ाए फिर हल्के से मुस्कुरा कर बोले____"मगर लगता है आज आप हमें गुस्ताख़ी करने पर मजबूर कर देंगी।"

"तो इतनी देर से अकेले में यही सोचते बैठे रहे थे आप?" सुगंधा देवी आंखों में थोड़ा हैरत के भाव ला कर बोलीं____"हमें लगा था कोई गंभीर बात थी।"

"अरे! ऐसी बात नहीं है।" दादा ठाकुर ने जैसे ख़ुद को सम्हाला____"असल में अभी जब हमने आपको इस अवस्था में देखा तो बस यूं ही मज़ाक में कह दिया आपसे।"

"अच्छा जी मज़ाक में कहा है आपने?" सुगंधा देवी ने बनावटी हैरानी दिखाई____"हमें तो लगा था कि एक मुद्दत बाद आज किसी अन्य दिशा से सूर्य निकल आया है।"

"ऐसा क्यों कहती हैं आप?" दादा ठाकुर के माथे पर सहसा शिकन उभर आई।

"ख़ैर जाने दीजिए।" सुगंधा देवी ने बेचैनी से पहलू बदला____"वैसे सच सच बताइए इतनी देर से किन ख़यालों में खोए हुए थे आप?"

दादा ठाकुर फ़ौरन कुछ ना बोले। कुछ देर तक वो ध्यान से सुगंधा देवी के चेहरे पर मौजूद भावों को समझने की कोशिश करते रहे, फिर एक दीर्घ सांस लेने के बाद बोले____"हम असल में रागिनी बहू और वैभव के बारे में सोच रहे थे।"

"उन दोनों के बारे में??" सुगंधा देवी अनायास ही चौंकीं____"ये क्या कह रहे हैं आप?"

"आज शाम जब हम और किशोरी लाल जी बैठक में बैठे हुए थे।" दादा ठाकुर ने कहा____"उसी समय बाहर से रागिनी बहू और वैभव को आते देखा था। हम ये सोच कर थोड़ा चौंके थे कि जाते समय तो आप उसके साथ थीं तो वापसी में वो वैभव के साथ क्यों आई थी?"

"वो दरअसल बात ये है कि वापसी में हम अपने बेटे के पास गए थे।" सुगंधा देवी ने बताया____"सोचा था उसे भी अपने साथ ही हवेली ले आएंगे लेकिन उसने आने से इंकार कर दिया था। हमारे बहुत ज़ोर देने कर वो माना लेकिन कहने लगा वो बाद में आएगा। अब आपको तो पता ही है कि इस समय वो जिस तरह की हालत में है उसमें हम उस पर ज़्यादा ज़ोर ज़बरदस्ती अथवा दबाव नहीं डाल सकते। इस लिए हमने रागिनी से कहा कि चलो हम लोग चलते हैं तब रागिनी ने ही कहा कि वो भी वैभव के पास कुछ देर वहीं बैठेगी और फिर उसे ले कर ही हवेली आएगी। वैसे, उसको वैभव के साथ आया देख आप इतना सोच में क्यों पड़ गए थे? कहीं आपके मन में उसके चरित्र के प्रति कोई संदेह तो नहीं पैदा हो गया?"

"नहीं नहीं, ऐसा तो हम सोच भी नहीं सकते सुगंधा।" दादा ठाकुर ने झट से कहा____"उसके चरित्र पर संदेह करना पाप करने के समान है। हम तो उस वक्त उन दोनों को साथ देख कर कुछ और ही सोचने लगे थे।"

"क्या मतलब है आपका?" सुगंधा देवी जैसे उलझ सी गईं____"आप क्या सोचने लगे थे?"

"उन दोनों को देख कर हम गुरु जी द्वारा कही गई बातें सोचने लगे थे।" दादा ठाकुर ने कहा____"उनके अनुसार हमारे बेटे के जीवन में ऐसी दो औरतों का योग था जो उसकी पत्नी बनेंगी। अनुराधा की हत्या हो जाने से पहले तक हम यही सोच रहे थे कि उसके जीवन में उसकी पत्नी के रूप में जो दो औरतें आएंगी वो रूपा और अनुराधा ही होंगी। ये अलग बात है कि हम अपनी बहू रागिनी को हमेशा खुश देखने और उसके जैसी बहू की चाहत में उसका ब्याह भी वैभव से कर देने की सोच रहे थे। अब जबकि उस मासूम लड़की अनुराधा की मौत हो चुकी है तो अनायास ही हम ये सोचने लगे थे कि कहीं वो दूसरी औरत हमारी बहू रागिनी तो नहीं थी?"

सुगंधा देवी के मनो मस्तिष्क में एकाएक जैसे धमाका सा हुआ। पलक झपकते ही उनके ज़हन में भी ये बात बैठती चली गई। चेहरे पर हैरत के भाव लिए वो दादा ठाकुर को देखने लगीं।

"अरे! हां ये तो सही कह रहे हैं आप।" फिर उन्होंने उसी हैरत के साथ कहा____"अभी तक ये बात हमारे मन में आई ही नहीं थी। आती भी कैसे? हालात ही ऐसे बने हुए हैं कि इस तरफ हमारा ध्यान ही नहीं गया।"

"यानि अब आप भी इस बात को मानती हैं कि जिन दो औरतों की बात गुरु जी ने कही थी उनमें से एक रूपा है तो दूसरी हमारी बहू रागिनी है।" दादा ठाकुर के चेहरे पर अजीब से भाव थे।

"निःसंदेह।" सुगंधा देवी ने सिर हिलाया____"अब तो यही लग रहा है ठाकुर साहब और शायद इसी लिए उन्होंने ये भी कहा था कि अगर हम चाहते हैं कि रागिनी बहू हमेशा के लिए हमारे पास ही बहू के रूप में रहे तो हम उसकी शादी वैभव से कर दें।"

"बिल्कुल ठीक कहा आपने।" दादा ठाकुर ने उत्साहित भाव से कहा____"हालाकि ज़ाहिर तौर पर उन्होंने दो औरतों में रागिनी की बात नहीं कही थी। यानि कहीं न कहीं उन्हें भी इस बात का अंदेशा था कि इस तरह की कोई घटना घटेगी और फिर अंततः रागिनी उन दो औरतों की गिनती में आ जाएगी।"

"इसका मतलब तो ये भी हुआ कि उन्हें अनुराधा की हत्या वाली घटना होने का पहले से ही अंदेशा था।" सुगंधा देवी ने सोच पूर्ण भाव से कहा____"और बताया इस लिए नहीं क्योंकि उनके अनुसार वो विधि के विधान में कोई हस्ताक्षेप नहीं करना चाहते थे?"

"हां शायद यही बात हो सकती है।" दादा ठाकुर ने सिर हिलाया____"सिद्ध पुरुष लोग कभी भी दैवी विधान पर कोई बाधा उत्पन्न नहीं करते।"

"तो अब क्या सोचा है आपने?" सुगंधा देवी ने सहसा गहरी सांस ले कर पूछा।

"उन दोनों को साथ में आया देख हम यही सब सोचने लगे थे।" दादा ठाकुर ने कहा____"ख़ैर हमने फ़ैसला कर लिया है कि अब हम जल्द से जल्द इस बारे में समधी जी से बात करेंगे।"

"वो तो ठीक है ठाकुर साहब।" सुगंधा देवी ने कहा____"लेकिन हमें लगता है कि इस मामले में अभी हमें ज़ल्दबाज़ी नहीं करनी चाहिए। हमारा मतलब है कि अभी तो हमारा बेटा भी ऐसी मानसिक हालत में नहीं है कि वो ये सब ठंडे दिमाग़ से सुन सके या इस पर विचार कर सके।"

"उसका दिमाग़ ठंडा करने का भी इंतज़ाम हो गया है ठकुराईन।" दादा ठाकुर के होठों पर सहसा रहस्यपूर्ण मुस्कान उभर आई____"और वो इंतज़ाम ऐसा है कि अब हमें वैभव की ऐसी मानसिक हालत की कोई चिंता ही नहीं रही।"

"बड़ी हैरतअंगेज बातें कर रहे हैं आप?" सुगंधा देवी एकाएक चकित भाव से बोलीं____"आख़िर ऐसा क्या हो गया है जिसके चलते आप हमारे बेटे के लिए एकदम से निश्चिंत हो गए हैं?"

"असल में साहूकार गौरी शंकर हमसे मिलने आया था।" दादा ठाकुर ने कहा____"वो भी अपने होने वाले दामाद की ऐसी मानसिक हालत के लिए चिंतित था। ख़ैर अपने दामाद को इस स्थिति से बाहर निकालने का उसने हमें एक ऐसा अद्भुत उपाय बताया जिसे सुन कर हम चकित रह गए थे।"

"ऐसा कौन सा उपाय बताया था उसने?" सुगंधा देवी और भी ज़्यादा चकित नज़र आईं।

उनके पूछने पर दादा ठाकुर ने उन्हें गौरी शंकर की सारी बातें बता दी। जिसे सुन कर सुगंधा देवी बहुत ज़्यादा हैरान हुईं। कुछ देर तक वो जाने क्या सोचती रहीं।

"बड़ी ही दिलचस्प बात है ये।" फिर उन्होंने गहरी सांस लेते हुए कहा____"हमें तो यकीन ही नहीं हो रहा कि गौरी शंकर इस मामले में इतनी बड़ी बात सोच सकता है और उस पर अमल भी कर सकता है। ख़ैर तो आपने क्या जवाब दिया उसे?"

"अब क्योंकि ये उसका ही सुझाव था और इसमें कोई बुराई भी नहीं थी तो हमने फ़ौरन ही उसे मंजूरी दे दी।" दादा ठाकुर ने कहा____"आख़िर हम भी तो यही चाहते हैं कि हमारा बेटा जल्द से जल्द इस मानसिक अवस्था से बाहर निकल आए और फिर वो उसी तरह अपनी ज़िम्मेदारियां निभाने लगे जैसे इसके पहले वो निभा रहा था।"

"क्या आपको लगता है कि गौरी शंकर की भतीजी हमारे बेटे को उसकी ऐसी मानसिक हालत से निकालने में कामयाब होगी?" सुगंधा देवी ने कहा____"सीधी सी बात है कि जब वो लड़की इसके पहले अपना सब कुछ सौंप कर भी हमारे बेटे के दिल में अपने प्रति प्रेम की भावना नहीं जगा सकी थी तो क्या अब वो ऐसे हालात में ऐसा कुछ कर पाएगी?"

"आपकी बात अपनी जगह सही हैं।" दादा ठाकुर ने कहा____"लेकिन ज़रूरी नहीं कि जो पहले नहीं हो सका वो कभी नहीं हो पाएगा। आप भी जानती हैं कि पहले में और अब में बहुत फ़र्क आ चुका है। पहले आपका बेटा क्या था और अब क्या बन गया है। इसी आधार पर हम ये बात इतने यकीन के साथ कह रहे हैं कि जो पहले नहीं हो सका वो अब ज़रूर होगा। वैसे भी पहले तो उस लड़की में बहुत सी पाबंदियां थी जबकि अब ऐसा नहीं है। वो अपने होने वाले पति की बेहतरी के लिए पूरी आज़ादी से कुछ भी करेगी।"

"शायद आप ठीक कह रहे हैं।" सुगंधा देवी ने सिर हिलाया____"ख़ैर ये सब तो ठीक है लेकिन अब हमारी बहू का क्या? हमारा मतलब है कि उसे इस बात के लिए कैसे राज़ी किया जाए कि वो अपने ही देवर से ब्याह कर ले?"

"हां ये ज़रूर सोचने का विषय है अब।" दादा ठाकुर ने गहरी सांस ली____"ये आसान नहीं होगा लेकिन अगर गुरु जी की बातों को सच मान कर चलें तो संभव है कि उसे राज़ी करने में हमें इतनी मुश्किल भी न आए। ख़ैर, फिलहाल तो इस बारे में हम सबसे पहले समधी साहब से बात करेंगे। उनकी रज़ामंदी के बाद ही सोचेंगे कि उसे कैसे राज़ी किया जाए?"

कुछ देर और इसी संबंध में बातें हुईं फिर दोनों ही चादर ओढ़ कर लेट गए। दोनों का ज़हन जाने कैसे कैसे विचारों में उलझा हुआ था और फिर जाने कब नींद ने उन्हें अपनी आगोश में ले लिया।

✮✮✮✮

सुबह हुई।

साहूकार गौरी शंकर के घर में काफी चहल पहल थी। सब हंसी खुशी जल्दी जल्दी अपने अपने कामों में लगे हुए थे। आज काफी समय बाद इस घर के लोगों के चेहरों पर खुशी की चमक नज़र आ रही थी। आज से पहले जिस लड़की से कोई बात करना तो दूर उसकी तरफ देखना तक गवारा नहीं करता था आज सब उसे अपनी पलकों पर लिए हुए थे।

रूपा के कमरे का आलम ही अलग था। ऐसा लग रहा था जैसे आज उसकी वैसे ही विदाई की तैयारियां हो रहीं थी जैसे ब्याह के बाद होती हैं। रूपा से उमर में जो बड़ी बहनें थी वो उसे खुशी खुशी सजाने के लिए आईं थी। उसकी दोनों भाभियां भी थीं। सब की सब उसे छेड़े जा रहीं थी। ऐसी ऐसी बातें बोल कर हंसने लगतीं थी कि रूपा बेचारी शर्म से पानी पानी हो जाती थी। कमरे के दरवाज़े की ओट में खड़ी उसकी मां ललिता देवी नम आंखों से अपनी बेटी की खुशी और उसका शर्म से पानी पानी होना देख रही थी। सहसा जाने क्या सोच कर उसकी एक आंख से आंसू का एक कतरा छलक पड़ा और गोरे गाल से होते हुए नीचे ज़मीन पर जा गिरा। उसने हड़बड़ा कर अपने आंसू पोछे और फिर पलट कर बाहर चली गई।

कुछ देर में फूलवती कमरे में दाख़िल हुई। उसने जब सबको इस तरह से रूपा को छेड़ते देखा तो झूठा गुस्सा दिखाते हुए सबको डांटना शुरू कर दिया। उसकी डांट सुन कर सब चुप हो गईं। फूलवती इस परिवार की थोड़ी सख़्त महिला थीं जिनके सामने बाकी औरतें और लड़कियां कम ही बोलती थीं। बहरहाल फूलवती ने सबको डांटते हुए कहा कि वो रूपा को सामान्य तरीके से ही तैयार करें। क्योंकि वो अभी सचमुच की दुल्हन बन कर नहीं जा रही है बल्कि एक ज़रूरी काम से जा रही है।

फूलवती की इन बातों से सभी लड़कियों का और दोनों भाभियों का चेहरा उतर गया। उनकी इच्छा यही थी कि वो सब रूपा को किसी दुल्हन की तरह तैयार कर के ही विदा करें। ख़ैर जल्दी ही सबको ये समझ आ गया कि सच में रूपा को दुल्हन की तरह नहीं सजाना चाहिए।

कुछ ही देर में सबने रूपा को सामान्य तरीके से तैयार कर दिया। एक थैले में उसकी ज़रूरत के हिसाब से कपड़े डाल दिए और वो सब सामान भी जो लड़कियां प्रयोग करती हैं।

सुबह के आठ बज रहे थे। ललिता देवी ने अपने हाथों से और बड़े प्यार से अपनी बेटी रूपा को खाना खिलाया। रूपा खाना कम खा रही थी रो ज़्यादा रही थी। आज काफी समय के बाद उसे अपनी मां का इतना स्नेह और प्यार मिल रहा था। अपनी बेटी को यूं आंसू बहाते देख ललिता देवी की भी आंखें बरस रहीं थी। ये सोच कर कि उसने इतने समय तक अपनी बेटी का कितनी कठोरता से दिल दुखाया था। ख़ैर किसी तरह रूपा ने खाना खाया। सब उसको घेरे हुए थीं।

रूपचंद्र बैठक में गौरी शंकर के पास बैठा हुआ था। रेखा ने आ कर उससे कहा कि रूपा अब जाने को तैयार है तो वो उठ कर अंदर की तरफ चल पड़ा। जल्दी ही वो अंदर आंगन में पहुंच गया। उसकी नज़र रूपा पर पड़ी। आज उसे अपनी बहन अलग ही नज़र आ रही थी। जब हर तरफ से इंसान को प्यार और खुशी मिलती है तो चेहरा अलग ही नज़र आने लगता है। रूपा के अलग नज़र आने का यही कारण था। अचानक ही रूपा को कुछ याद आया तो वो एकदम से उस तरफ बढ़ चली जिस तरफ परिवार के सबसे बुजुर्ग व्यक्ति का कमरा था, यानि चंद्रमणि का।

"दादू, देखिए रूपा दीदी आपसे मिलने आई हैं।" शिव शंकर की दूसरी बेटी मोहिनी ने पलंग पर पड़े चंद्रमणि को आवाज़ लगाते हुए कहा।

चंद्रमणि के कमज़ोर जिस्म में हलचल हुई। वो करवट लिए लेटा हुआ था। आवाज़ सुन कर वो धीरे से पलटा तो एकाएक उसकी निगाह उसकी दो नातिनों पर पड़ी।

"मैं जा रही हूं दादू।" रूपा ने सहसा आगे बढ़ कर चंद्रमणि के क़रीब आ कर भारी गले से कहा____"आप अपना ख़याल रखिएगा।"

"अ..अरे! कहां जा रही है मेरी बच्ची?" चंद्रमणि ने अपनी कमज़ोर आवाज़ में पूछा।

रूपा को समझ न आया कि वो क्या जवाब दे? उसे एकाएक शर्म महसूस होने लगी। मोहिनी उसे चुप देख हल्के से मुस्कुराई फिर आगे बढ़ कर उसने चंद्रमणि को संक्षेप में सब कुछ बता दिया। सच जान कर चंद्रमणि के चेहरे पर हैरानी के भाव उभर आए। कुछ देर वो जाने क्या सोचता रहा फिर सहसा उसके चेहरे पर खुशी की चमक उभर आई। कमज़ोर आंखों में एकाएक आंसू तैरते नज़र आए।

"ई..ईश्वर मेरी बच्ची को सदा खुश रखे।" फिर उसने कांपते स्वर में कहा____"भगवान तेरा कल्याण करे बेटी। अब तू ही इस परिवार की डूबती नैया को बचा सकती है। तेरे ही हाथों इस परिवार के लोगों का भला निहित है।"

"ये आप क्या कह रहे हैं दादू?" रूपा का गला रुंध गया।

"त...तुझे क्या लगता है मुझ बूढ़े को कुछ पता नहीं है?" चंद्रमणि के सूखे होठों पर सहसा मुस्कान उभरी____"अरे! मैं सब जानता हूं मेरी बच्ची। मैं जानता हूं कि तू दादा ठाकुर के बेटे से प्रेम करती है और....और मैं ये भी जानता हूं कि इसके लिए इन सबने तुझे बहुत बुरा भला कहा होगा। तुझे बहुत कष्ट दिए होंगे इन कंजरों ने। अपनी औलाद को अच्छी तरह जानता हूं मैं। आज अगर तू इस उद्देश्य से जा रही है तो मैं समझ गया हूं कि इन लोगों ने तुझे अपना झूठा प्यार दिखा कर ही जाने की अनुमति दी होगी।"

"द...दादू।" रूपा से सहन न हुआ तो वो झपट कर चंद्रमणि से लिपट गई और फूट फूट कर रो पड़ी।

चंद्रमणि ने उसके सिर पर बड़े स्नेह से हाथ फेरा और फिर अपनी कमज़ोर आवाज़ में कहा____"तेरा इस तरह से बिलख बिलख कर रोना बता रहा है कि मैंने जो कहा वो सच है। पत्थर दिल वाले तुझे समझ नहीं सके मेरी बच्ची लेकिन...लेकिन मैं समझता हूं तुझे। मैं समझता हूं कि ईश्वर क्या खेल खेलना चाहता था। ख़ैर तू रो मत मेरी बहादुर बच्ची। तेरे दादू का आशीर्वाद और दुआएं मेरे मरने के बाद भी हमेशा तेरे साथ रहेंगी। तू जा....खुशी खुशी जा। ऊपर वाला तुझे हर पथ पर कामयाब करे और हमेशा खुशियां दे।"

दरवाज़े के पास घर का हर सदस्य खड़ा बातें सुन रहा था और ये सोच कर खुद को कोस रहा था कि अब से पहले क्यों उन लोगों ने रूपा को इतना दुख दिया और उसे नहीं समझा? बहरहाल, रूपा अपने दादू का आशीर्वाद और उनकी दुआएं ले कर बाहर निकली।

एक एक कर के वो सबसे मिली और फिर रूपचंद्र के पीछे पीछे घर से बाहर की तरफ बढ़ चली। सचमुच ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे वो अपने ससुराल जा रही है। फ़र्क सिर्फ़ इतना ही था कि बेटी जब पहली बार विदा होती है तो वो हद से ज़्यादा रोती है और अपने रुदन से हर व्यक्ति को रुला देती है लेकिन यहां फिलहाल रुदन जैसा माहौल नहीं था। जल्दी ही सब बाहर चौगान में आ गए।

रूपचंद्र अपनी बहन का थैला जीप में रख कर जीप की स्टेयरिंग सम्हाले बैठ गया था। रूपा सबसे मिलने के बाद चुपचाप आ कर जीप में रूपचंद्र के बगल से बैठ गई।

"बेटा, उस मकान को अच्छे से देख लेना।" फूलवती ने रूपचंद्र से कहा____"और जिस किसी भी चीज़ की वहां कमी दिखे तो उसे दूर कर देना।"

"फ़िक्र मत कीजिए बड़ी मां।" रूपचंद्र ने कहा____"मेरे रहते मेरी बहन को किसी भी चीज़ की ना तो कमी होगी और ना ही कोई बाधा आएगी।"

कहने के साथ ही रूपचंद्र ने मन ही मन ईश्वर का नाम लिया और फिर जीप को आगे बढ़ा दिया। पीछे खड़े हर व्यक्ति ने मन ही मन ऊपर वाले को याद कर के सब कुछ अच्छा करने और होने की प्रार्थना की।

सारे रास्ते रूपचंद्र अपने बगल से सोचो में गुम बैठी अपनी बहन को ये समझाता रहा कि वो किसी बात की चिंता न करे। सब कुछ अच्छा ही होगा और ऊपर वाला कभी भी उसके सच्चे प्रेम का निरादर नहीं होने देगा। रूपचंद्र की बातें रूपा के मानस पटल पर टकरा तो ज़रूर रहीं थी लेकिन वो कुछ बोल नहीं रही थी। उसके मन में तो बस यही चल रहा था कि क्या कभी कहीं ऐसा हुआ होगा जो आज उसके साथ होने जा रहा था? क्या किसी के घर वालों ने बिना ब्याहे अपनी बेटी अथवा बहन को इस तरह से विदा किया होगा? क्या किसी लड़की को इस तरह से अपने प्रेम के चलते ऐसा कुछ करना पड़ा होगा?

रूपा ऐसे न जाने कितने ही सवालों के भंवर में उलझी हुई थी। उसे पता ही न चला कि कब रास्ता गुज़र गया और मंज़िल आ गई। जीप के रुकने पर जब रूपचंद्र ने उसे पुकारा तभी वो वर्तमान में आई। उसने चौंक कर इधर उधर देखा तब उसे एहसास हुआ कि वो उस जगह पहुंच गई है जहां पर रह कर उसे अपने होने वाले पति की मानसिक हालत को सुधार कर उसे सामान्य हालत में लाना था। एकाएक उसके ज़हन में कई सवाल चकरा उठे____'क्या वो ऐसा कर पाएगी? क्या उसका यहां पर रहना वैभव को क़बूल होगा? क्या वैभव को ये पसंद आएगा कि वो उसे उसकी मानसिक हालत से बाहर निकालने का प्रयास करे?'

"क्या हुआ?" जीप से उतर कर जब रूपचंद्र ने रूपा को वैसे ही बैठे देखा तो पूछा____"क्या सोच रही है? अरे! अब कुछ मत सोच पागल। चल आ, बेवजह फालतू की बातें सोच कर खुद को हल्कान मत कर।"

रूपा ख़ामोशी से नीचे उतरी। तब तक रूपचंद्र ने जीप से उसका थैला निकाल कर अपने हाथ में ले लिया था। उधर मकान के बाहर किसी जीप के आने की आहट सुन मकान के अंदर मौजूद कुछ ऐसे लोग बाहर निकल आए जो मकान की रखवाली करते थे। बाहर रूपचंद्र और एक लड़की को देख उन सबके चेहरों पर चौंकने वाले भाव उभर आए।

रूपचंद्र जानता था कि उन लोगों को कुछ पता नहीं है इस लिए उसने सीधे सीधे भुवन के बारे में पूछा तो उनमें से एक ने बताया कि भुवन तो छोटे कुंवर के खेतों पर होगा। यूं तो रूपचंद्र को सब पहचानते थे और ये भी जानते थे कि मौजूदा समय में रूपचंद्र से उनके छोटे कुंवर के बेहतर संबंध हैं। बहरहाल रूपचंद्र ने उन सबको बताया कि अब से यहां पर वैभव और उसकी होने वाली पत्नी यानि रूपा इसी मकान में रहेंगे। अतः जल्द से जल्द मकान की साफ सफाई शुरू करवाओ।

पहले तो उन सबको बड़ी हैरानी हुई लेकिन फिर जल्दी ही वो लोग मकान की साफ सफाई में लग गए। इधर रूपा चुपचाप खड़ी इधर उधर देख रही थी। तभी सहसा उसकी घूमती हुई निगाह उस जगह पर जा कर ठहर गई जिस जगह पर अनुराधा का अंतिम संस्कार किया गया था। यहां से भी वो जगह साफ नज़र आ रही थी। रूपा के जिस्म में झुरझुरी सी हुई और फिर वो इस तरह उस तरफ बढ़ चली जैसे कोई अज्ञात ताक़त उसे अपनी तरफ खींचने लगी हो।

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अध्याय - 118

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सुबह का वक्त था।

नाश्ता वगैरह करने के बाद मैं अपना एक थैला ले कर हवेली से बाहर जाने के लिए निकला तो बैठक से पिता जी ने आवाज़ दे कर बुला लिया मुझे। मजबूरन मुझे बैठक कक्ष में जाना ही पड़ा। मेरे दिलो दिमाग़ में अभी भी अनुराधा का ही ख़याल था।

"बैठो, तुमसे कुछ ज़रूरी बात करनी है।" पिता जी ने सामान्य भाव से कहा तो मैं एक नज़र किशोरी लाल पर डालने के बाद वहीं रखी एक कुर्सी पर चुपचाप बैठ गया।

"देखो बेटे।" पिता जी ने थोड़ा गंभीर हो कर बहुत ही प्रेम भाव से कहा____"हम जानते हैं कि इस समय तुम्हारी मानसिक स्थिति ठीक नहीं है। सच कहें तो उस लड़की की इस तरह हुई मौत से हमें भी बहुत धक्का लगा है और मन दुखी है। हम अच्छी तरह जानते हैं कि वो लड़की तुम्हारे लिए बहुत मायने रखती थी और वो तुम्हारे जीवन का एक अभिन्न अंग बनने वाली थी लेकिन नियति में शायद तुम दोनों का साथ बस इतना ही लिखा था। हम तुमसे ये नहीं कहेंगे कि तुम उसे भूल जाओ क्योंकि हम अच्छी तरह समझते हैं कि ऐसा तुम्हारे लिए संभव नहीं है। हमने अपने बांह के भाई और अपने बेटे को खोया तो उन दोनों को भुला देना हमारे लिए भी संभव नहीं रहा है। लेकिन बेटे, ये भी सच है कि हमें होनी और अनहोनी को क़बूल करना पड़ता है। हालातों से समझौता करना पड़ता है। ऐसा इस लिए क्योंकि हमें जीवन में आगे बढ़ना होता है। खुद से ज़्यादा अपनों की खुशी के लिए, अपनों की बेहतरी के लिए। ये आसान तो नहीं होता लेकिन फिर भी मन मार कर ऐसा करना ही पड़ता है। शायद इसी लिए जीवन जीना आसान नहीं होता।"

मैं ख़ामोशी से पिता जी की बातें सुन रहा था। उधर वो इतना सब बोल कर चुप हुए और मेरी तरफ ध्यान से देखने लगे। किशोरी लाल की नज़रें भी मुझ पर ही जमी हुईं थी।

"ख़ैर, हम तुम्हें किसी भी बात के लिए मजबूर नहीं करेंगे।" सहसा पिता जी ने गहरी सांस ले कर पुनः कहा____"लेकिन हां, हम ये उम्मीद ज़रूर करते हैं कि तुम हमारी इन बातों को समझोगे और हालातों को भी समझने का प्रयास करोगे। इतना तो तुम भी जानते हो कि इस परिवार में अब तुम ही हो जिसे सब कुछ सम्हालना है। तुम्हें एक अच्छा इंसान बनना है। सबके बारे में अच्छा सोचना है और सबका भला करना है। जब कोई अच्छा इंसान बनने की राह पर चल पड़ता है तो उसे सबसे ज़्यादा दूसरों के हितों की चिंता रहती है। उसे अपने सुखों का और अपने हितों का त्याग भी करना पड़ता है। जब तुम सच्चे दिल से ऐसा करोगे तभी लोग तुम्हें देवता की तरह पूजेंगे। ख़ैर ये तो बाद की बातें है लेकिन मौजूदा समय में फिलहाल तुम्हें अपनी इस मानसिक स्थिति से बाहर निकलने की कोशिश करनी है।"

"जी मैं कोशिश करूंगा।" मैं धीमी आवाज़ में बस इतना ही कह सका।

"बहुत बढ़िया।" पिता जी ने कहा____"जैसा कि हमने कहा हम तुम्हें किसी भी बात के लिए मजबूर नहीं करेंगे इस लिए अगर तुम अपने उस नए मकान में ही कुछ समय तक रहना चाहते तो वहीं रहो, हमें कोई एतराज़ नहीं है।"

"हां मैं फिलहाल वहीं रहना चाहता हूं।" मैं पिता जी की बात से अंदर ही अंदर ये सोच कर खुश हो गया था कि अब मैं बिना किसी विघ्न बाधा के अपनी अनुराधा के पास ही रहूंगा।

"ठीक है।" पिता जी ने ध्यान से मेरी तरफ देखते हुए कहा____"तो अब जब तक तुम्हारा मन करे वहीं रहो। हम तुम्हारे लिए ज़रूरत का कुछ सामान शेरा के द्वारा भिजवा देंगे। एक बात और, वहां पर अगर तुम्हारे साथ कोई और भी रहना चाहे तो तुम उसे मना मत करना।"

"क...क्या मतलब??" मैं एकदम से चौंका।

"जब तुम वहां पहुंचोगे तो खुद ही समझ जाओगे।" पिता जी ने अजीब भाव से कहा____"ख़ैर अब तुम जाओ। हमें भी एक ज़रूरी काम से कहीं जाना है।"

मन में कई तरह की बातें सोचते हुए मैं बैठक कक्ष से बाहर आ गया। जल्दी ही मोटर साईकिल में बैठा मैं खुशी मन से अपनी अनुराधा के पास पहुंचने के लिए उड़ा चला जा रहा था। इस बात से बेख़बर कि वहां पर मुझे कोई और भी मिलने वाला है।

✮✮✮✮

"आपको क्या लगता है किशोरी लाल जी?" दादा ठाकुर ने वैभव के जाते ही किशोरी लाल की तरफ देखते हुए पूछा____"इससे कोई बेहतर नतीजा निकलेगा?"

"उम्मीद पर ही दुनिया क़ायम है ठाकुर साहब।" किशोरी लाल ने कहा____"यकीन तो है कि छोटे कुंवर पर जल्दी ही बेहतर असर दिखेगा। वैसे गौरी शंकर जी ने बहुत ही दुस्साहस भरा और हैरतअंगेज काम किया है। मेरा मतलब है कि छोटे कुंवर को इस हालत से बाहर निकालने के लिए उन्होंने अपनी भतीजी को इस तरह से काम पर लगा दिया।"

"इसे काम पर लगाना नहीं कहते किशोरी लाल जी।" दादा ठाकुर ने गहरी सांस ली____"बल्कि किसी अपने के प्रति सच्चे दिल से चिंता करना कहते हैं। हम मानते हैं कि उसने बड़ा ही अविश्वसनीय क़दम उठाया है और लोगों के कुछ भी कहने की कोई परवाह नहीं की है लेकिन ये भी सच है कि ऐसा उसने प्रेमवश ही किया है। हमें आश्चर्य ज़रूर हो रहा है लेकिन साथ ही हमें उनकी सोच और नेक नीयती पर गर्व का भी आभास हो रहा है। ख़ास कर उस लड़की के प्रति जिसने अपने हर कार्य से ये साबित किया है कि वो वास्तव में हमारे बेटे से किस हद तक प्रेम करती है।"

"सही कह रहे हैं आप।" किशोरी लाल ने कहा____"वो लड़की सच में बड़ी अद्भुत है। मुझे तो ये सोच के हैरानी होती है कि जिस परिवार के लोगों की मानसिकता कुछ समय पहले तक इतने निम्न स्तर की थी उस परिवार में ऐसी नेक दिल लड़की कैसे पैदा गई?"

"कमल का फूल हमेशा कीचड़ में ही जन्म लेता है किशोरी लाल जी।" दादा ठाकुर ने कहा____"और अपने ऐसे वजूद से समस्त सृष्टि को एक उदाहरण प्रस्तुत करता है। ख़ैर, अब तो ये देखना है कि वैभव अपने साथ उस लड़की को उस मकान में रहने देगा अथवा नहीं? और अगर रहने देगा तो वो लड़की किस तरीके से तथा कितना जल्दी हमारे बेटे की हालत में सुधार लाती है?"

"मैं तो ऊपर वाले से यही प्राथना करता हूं ठाकुर साहब कि जल्द से जल्द सब कुछ ठीक हो जाए।" किशोरी लाल ने कहा____"छोटे कुंवर का जल्द से जल्द बेहतर होना बहुत ज़रूरी है।"

"सही कहा।" दादा ठाकुर ने कहा____"ख़ैर चलिए हमें देर हो रही है।"

दादा ठाकुर कहने के साथ ही अपने सिंहासन से उठ गए तो किशोरी लाल भी अपनी कुर्सी से उठ कर खड़ा हो गया। कुछ ही देर में वो दोनों जीप में बैठ गए। दादा ठाकुर के हुकुम पर स्टेयरिंग सम्हाले बैठे हीरा लाल नाम के ड्राइवर ने जीप को आगे बढ़ा दिया।

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कुछ ही समय में मकान की बहुत अच्छे से साफ सफाई हो गई। रूपचंद्र ने जा कर मकान के अंदर का अच्छे से मुआयना किया और फिर संतुष्ट हो कर अपनी बहन का थैला एक कमरे में रख दिया। कमरा पूरी तरह खाली था। मकान ज़रूर बन गया था लेकिन उसमें चारपाई अथवा पलंग वगैरह नहीं रखा गया था। मकान के बाहर वाले हाल में लकड़ी की एक दो कुर्सियां और टेबल ज़रूर थीं जो चौकीदारी करने वाले लोग उपयोग कर रहे थे। रूपचंद्र के मन में इसी से संबंधित कुछ विचार उभर रहे थे जिसके लिए वो कोई विचार कर रहा था।

बाहर आ कर रूपचंद्र आस पास का मुआयना करने लगा। मकान के बाहर चारो तरफ की ज़मीन काफी अच्छे से साफ कर दी गई थी। कुछ ही दूरी पर एक कुआं था जिसके चारो तरफ पत्थरों की पक्की जगत बनाई गई थी और साथ ही उसमें लोहे के दो सरिए दोनों तरफ लगे हुए थे जिनके ऊपरी सिरों पर छड़ लगा कर उसमें लकड़ी की एक गोल गड़ारी फंसी हुई दिख रही थी। उसी गड़ारी में रस्सी फंसा कर नीचे कुएं से बाल्टी द्वारा पानी ऊपर खींचा जाता था।

कुएं के चारो तरफ गोलाकार आकृति में पत्थर की बड़ी बड़ी पट्टियां लगा कर उसे पक्के मशाले से जोड़ कर ज़मीन से करीब घुटने तक ऊंची पट्टी बनाई गई थी। उस पट्टी में बैठ कर बड़े आराम से नहाया जा सकता था या फिर कपड़े वगैरा धोए जा सकते थे। ख़ास बात यह थी कि इस तरह का कुआं रुद्रपुर गांव में भी नहीं था जो आधुनिकता का जीवंत प्रमाण लग रहा था। वैभव ने कुएं की इस तरह की बनावट कहीं देखी थी इस लिए उसने मिस्त्री से वैसा ही पक्का कुआं बनाने का निर्देश दिया था। रूपचंद्र उस कुएं को बड़े ध्यान से देख रहा था। ज़ाहिर है ऐसा कुआं उसने पहली बार ही देखा था। मन ही मन उसने वैभव की सोच और उसके कार्य की प्रसंसा की और फिर वापस मकान के पास आ गया। सहसा उसकी नज़र कुछ ही दूरी पर चुपचाप खड़ी अपनी बहन रूपा पर पड़ी।

रूपा, अनुराधा की चिता के पास खड़ी थी। ये देख रूपचंद्र की धड़कनें एकाएक तेज़ हो गईं और साथ ही वो फिक्रमंद हो उठा। वो तेज़ी से अपनी बहन की तरफ बढ़ता चला गया।

"तू यहां क्या कर रही है रूपा?" रूपचंद्र जैसे ही उसके पास पहुंचा तो उसने अधीरता से पूछा। अपने भाई की आवाज़ सुन रूपा एकदम से चौंक पड़ी। उसने झटके से गर्दन घुमा कर रूपचंद्र की तरफ थोड़ा हैरानी से देखा।

"क्या हुआ?" रूपचंद्र ने फिर पूछा____"तू यहां क्या कर रही है और....और तू यहां आई कैसे?"

"व...वो भैया।" रूपा ने धड़कते दिल से कहा____"मैं बस ऐसे ही चली आई थी यहां। अचानक ही इस तरफ मेरी नज़र पड़ गई थी। फिर जाने कैसे मैं इस तरफ खिंचती चली आई?"

"ख..खिंचती चली आई???" रूपचंद्र चौंका____"ये क्या कह रही है तू?"

"ये कितनी अभागन थी ना भैया?" रूपा ने सहसा संजीदा हो कर अनुराधा की चिता की तरफ देखते हुए कहा____"ना इस संसार के लोगों को इसकी खुशी अच्छी लगी और ना ही उस ऊपर वाले को। आख़िर उस कंजर का क्या बिगाड़ा था इस मासूम ने?"

कहने के साथ ही रूपा की आंखें छलक पड़ीं। दिलो दिमाग़ में एकाएक जाने कैसे कैसे ख़याल उभरने लगे थे उसके। रूपचंद्र को समझ न आया कि क्या कहे? उसे भी अपने अंदर एक अपराध बोझ सा महसूस हो रहा था। उसे याद आया कि उसने भी तो उस मासूम के साथ एक ऐसा काम किया था जो हद दर्जे का अपराध था। अपने अपराध का एहसास होते ही रूपचंद्र को बड़े जोरों से ग्लानि हुई। उसने आंखें बंद कर के अनुराधा से अपने किए गुनाह की माफ़ी मांगी।

"काश! इस मासूम की जगह मुझे मौत आ गई होती।" रूपा के जज़्बात जैसे उसके बस में नहीं थे, दुखी भाव से बोली____"काश! इस गुड़िया को मेरी उमर लग गई होती। हे ईश्वर! हे देवी मां! तुम इतनी निर्दई कैसे हो गई? क्यों एक निर्दोष का जीवन उससे छीन लिया तुमने? क्यों उसके प्रेम को पूर्ण नहीं होने दिया?"

"बस कर रूपा।" रूपचंद्र का हृदय कांप उठा, बोला____"ऐसी रूह को हिला देने वाली बातें मत कर।"

"आपको पता है भैया।" रूपा ने रुंधे गले से कहा____"जब ये जीवित थी तो मैंने इसके बारे में जाने क्या क्या सोच लिया था। मैंने सोच लिया था कि जब हम दोनों हवेली में बहू बन कर जाएंगी तो वहां मैं इसे अपनी सौतन नहीं मानूंगी बल्कि अपनी छोटी बहन मानूंगी। अपनी गुड़िया मान कर इसे हमेशा प्यार और स्नेह दिया करूंगी लेकिन.....लेकिन देखिए ना...देखिए ना ऐसा कुछ भी तो नहीं होने दिया भगवान ने। उसने मेरी छोटी बहन, मेरी गुड़िया को पहले ही मुझसे दूर कर दिया।"

रूपा एकाएक घुटनों के बल बैठ गई और फिर फूट फूट कर रो पड़ी। रूपचंद्र ने बहुत कोशिश की खुद को सम्हालने की मगर अपनी भावनाओं के ज्वार को सम्हाल न सका। आंखें अनायास ही छलक पड़ीं। उसने आगे बढ़ कर रूपा के कंधे पर हाथ रखा और उसे सांत्वना देने लगा। अभी वो उससे कुछ कहने ही वाला था कि तभी उसके कानों में मोटर साइकिल की आवाज़ पड़ी तो उसने पलट कर देखा।

वैभव अपनी मोटर साईकिल से इस तरफ ही चला आ रहा था। मोटर साइकिल की आवाज़ से रूपा का ध्यान भी उस तरफ गया। उसने फ़ौरन ही खुद को सम्हाल कर अपने आंसू पोछे और फिर उठ कर खड़ी हो गई। वैभव पर नज़र पड़ते ही उसकी धड़कनें एकाएक तेज़ तेज़ चलने लगीं थी। रूपचंद्र के इशारे पर वो मकान की तरफ चल पड़ी।

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मैं जैसे ही मकान के सामने आया तो सहसा मेरी नज़र रूपचंद्र और रूपा पर पड़ गई। उन दोनों को यहां देख मैं बड़ा हैरान हुआ। दोनों के यहां होने की मैंने बिल्कुल भी कल्पना नहीं की थी। मुझे समझ न आया कि वो दोनों सुबह के इस वक्त यहां क्या कर रहे हैं? बहरहाल, मैंने मोटर साईकिल को रोका और फिर उसका इंजन बंद कर के उससे नीचे उतर आया। रूपा अपने भाई के पीछे आ कर खड़ी हो गई थी। उसके चेहरे पर थोड़ा घबराहट के भाव थे।

"हम तुम्हारा ही इंतज़ार कर रहे थे वैभव।" मैं जैसे ही मोटर साईकिल से उतरा तो रूपचंद्र ने थोड़ा बेचैन भाव से कहा।

"किस लिए?" मैंने एक नज़र रूपा की तरफ देखने के बाद रूपचंद्र से पूछा____"क्या मुझसे कोई काम था तुम्हें?"

"नहीं, ऐसी तो कोई बात नहीं है।" रूपचंद्र ने जैसे खुद को सम्हालते हुए कहा____"वैसे दादा ठाकुर ने क्या तुम्हें कुछ नहीं बताया?"

"क्या मतलब?" मैं एकदम से चौंका____"मैं कुछ समझा नहीं। क्या उन्हें कुछ बताना चाहिए था मुझे?"

"हां वो दरअसल बात ये है कि गौरी शंकर काका ने उनसे तुम्हारे बारे में चर्चा की थी।" रूपचंद्र ने सहसा नज़रें चुराते हुए कहा। उसके चेहरे पर बेचैनी उभर आई थी और साथ ही पसीना भी। कुछ अटकते हुए से बोला____"देखो तुम ग़लत मत समझना। वो बात ये है कि....।"

"खुल कर बताओ बात क्या है?" मैंने सहसा सख़्त भाव से पूछा____"और तुम दोनों यहां क्या कर रहे हो?"

"देखो वैभव बात जो भी है तुम्हारी भलाई के लिए ही है।" रूपचंद्र को मानो सही शब्द ही नहीं मिल रहे थे जिससे कि वो अपनी बात मेरे सामने बेहतर तरीके से बोल सके, झिझकते हुए बोला____"दादा ठाकुर भी यही चाहते हैं, इसी लिए हम दोनों यहां हैं लेकिन...।"

"लेकिन???"

"लेकिन ये कि मैं तो चला जाऊंगा यहां से।" उसने बड़ी हिम्मत जुटा कर कहा____"मगर मेरी बहन यहीं रहेगी....तुम्हारे साथ।"

"क...क्या???" मैं एकदम से उछल ही पड़ा____"ये तुम क्या कह रहे हो? तुम्हें होश भी है कि तुम क्या बोल रहे हो?"

"मैं पूरी तरह होश में ही हूं वैभव।" रूपचंद्र ने इस बार पूरी दृढ़ता से कहा____"रूपा का यहां तुम्हारे साथ ही रहना दादा ठाकुर की मर्ज़ी और अनुमति से ही हुआ है। हालाकि उन्होंने ये भी कहा है कि तुम पर किसी तरह की कोई ज़ोर ज़बरदस्ती नहीं है कि तुम उनकी अथवा हमारी ये बात मानो लेकिन....तुम्हें भी समझना होगा कि सबका तुम्हारे लिए चिंतित होना जायज़ है। हम सब जानते हैं कि इस हादसे के चलते तुम बहुत ज़्यादा व्यथित हो...हम लोग भी व्यथित हैं, लेकिन ये भी सच है वैभव कि हमें बड़े से बड़े दुख को भी भूलने की कोशिश करनी ही पड़ती है और फिर जीवन में आगे बढ़ना पड़ता है। अगर तुमने अपने चाहने वालों को खोया है तो हमने भी तो एक झटके में अपने इतने सारे अपनों को खोया है। हमें भी तो उनका दुख है लेकिन इसके बावजूद हम किसी तरह जीवन में आगे बढ़ने की कोशिश कर रहे हैं।"

"ये सब तो ठीक है।" मैंने संजीदा हो कर कहा____"लेकिन मेरी समझ में ये नहीं आ रहा कि इसके लिए यहां मेरे पास तुम्हारी बहन क्यों रहेगी?"

"मौजूदा समय में तुम प्रेम के चलते दुखी हो वैभव।" रूपचंद्र ने कहा____"और तुम्हारे इस दुख को प्रेम से ही दूर करने की कोशिश की जा सकती है। तुम भी जानते हो कि मेरी बहन तुमसे कितना प्रेम करती है। तुम्हारी ऐसी हालत देख कर वो भी बहुत दुखी है। वो तुम्हें इस हालत में नहीं देख सकती इस लिए वो तुम्हारे साथ यहां रह कर तुम्हारा दुख साझा करेगी और अपने प्रेम से तुम्हारा मन बहलाने की कोशिश करेगी।"

रूपचंद्र की ये बातें सुन कर मेरे ज़हन में विस्फोट सा हुआ। मैंने हैरत से आंखें फाड़ कर रूपा की तरफ देखा। अपने भाई के पीछे खड़ी थी वो इस लिए जैसे ही मैंने उसकी तरफ देखा तो उसने मुझसे नज़रें मिलाई। उसकी आंखों में याचना थी, दर्द था, समर्पण भाव था और अथाह प्रेम था।

"देखो रूपचंद्र।" फिर मैं उसके भाई से मुखातिब हुआ____"मुझे इस हालत से निकालने के लिए तुम्हें या किसी को भी कुछ करने की ज़रूरत नहीं है और ना ही यहां मेरे साथ तुम्हारी बहन को रहने की ज़रूरत है। इस समय मुझे सिर्फ अकेलापन चाहिए इससे ज़्यादा कुछ नहीं।"

"ठीक है जैसी तुम्हारी इच्छा।" रूपचंद्र ने मायूस सा हो कर कहा____"मैं अभी एक ज़रूरी काम से शहर जा रहा हूं। वापस आऊंगा तो रूपा को ले जाऊंगा यहां से। तब तक तो रूपा यहां रह सकती हैं न?"

मैंने अनमने भाव से हां में सिर हिलाया और फिर अपना थैला ले कर मकान के अंदर की तरफ चला गया। मेरे जाने के बाद रूपचंद्र ने पलट कर अपनी बहन की तरफ देखा। वो भी उतरा हुआ चेहरा लिए चुपचाप खड़ी थी।

"तू फ़िक्र मत कर।" फिर रूपचंद्र ने उससे कहा____"मैंने वैभव से जान बूझ कर शहर जाने की बात कही है और तुझे तब तक यहां रहने को बोला है। जब तक मैं यहां वापस नहीं आता तब तक तो तू यहीं रहेगी। अब ये तुझ पर है कि तू कैसे वैभव को इस बात के लिए राज़ी करती है कि वो तुझे यहां रहने दे। ख़ैर अब मैं जा रहा हूं। दोपहर के समय तुम दोनों के लिए घर से खाना ले कर आऊंगा। अगर उस समय तक तूने वैभव को राज़ी कर लिया तो ठीक वरना फिर तुझे मेरे साथ वापस घर चलना ही पड़ेगा।"

रूपा की मूक सहमति के बाद रूपचंद्र ने बड़े स्नेह से उसके सिर पर हाथ फेरा और फिर अपनी जीप में बैठ कर चला गया। उसके जाने के बाद रूपा ने एक गहरी सांस ली और फिर पलट कर मकान के अंदर की तरफ देखने लगी। उसके मन में अब बस यही सवाल था कि आख़िर वो किस तरह से वैभव को राज़ी करे?

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SANJU ( V. R. ) Riky007 avsji Suraj13796 Ajju Landwalia Death Kiñg Thakur bhai

Ye story main aap logo ki vajah se yahan par complete karna chahta hu...kyoki main jaanta hu ki aap log dil se chahte hain ki ye story complete ho. Mera aap logo se yahi kahna hai ki chaahe do line ka hi review dijiye lekin dijiye zarur......baaki mujhe kisi se koi fark nahi padta. Is forum par meri ye last story hai uske baad shayad hi main yaha kabhi aaunga. Is liye nahi chaahta ki is story ko aise hi chhod kar chala jaau. Bas itna hi kahunga...
 
अध्याय - 119

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रूपा की मूक सहमति के बाद रूपचंद्र ने बड़े स्नेह से उसके सिर पर हाथ फेरा और फिर अपनी जीप में बैठ कर चला गया। उसके जाने के बाद रूपा ने एक गहरी सांस ली और फिर पलट कर मकान के अंदर की तरफ देखने लगी। उसके मन में अब बस यही सवाल था कि आख़िर वो किस तरह से वैभव को राज़ी करे?

अब आगे....

मकान में चौकीदारी करने वाले सभी लोग मुझसे ये कह कर जंगल की तरफ चले गए कि वो मकान के चारो तरफ लकड़ी की बाउंड्री बनाने के लिए बल्लियां लेने जा रहे हैं। मैं मकान के अंदर आया तो देखा अंदर का कायाकल्प हो चुका था। हर जगह बहुत अच्छे से साफ सफाई कर दी गई थी। मैंने सरसरी तौर पर हर जगह निगाहें घुमाई और फिर थैले को अपने कमरे में रख दिया।

जहां एक तरफ मेरे दिलो दिमाग़ में अनुराधा अभी भी छाई हुई थी वहीं ज़हन में रूपा का भी बार बार ख़याल आ रहा था। मेरे लिए ये बड़े ही आश्चर्य की बात थी कि उसका भाई खुद उसे ले कर यहां आया था और बात सिर्फ इतनी ही नहीं थी बल्कि ये भी थी कि वो अपनी बहन को मेरे पास सिर्फ इस लिए छोड़ कर जाने वाला है ताकि उसकी बहन यहां मेरे साथ रहते हुए मुझे इस मानसिक स्थिति से निकाल सके।

मैं सोचने पर मजबूर हो गया कि रूपा का भाई इतना बड़ा क़दम कैसे उठा सकता है? यकीनन ये सिर्फ उसकी मर्ज़ी से नहीं हो सकता था। ज़ाहिर है इसमें उसके समस्त परिवार की भी सहमति थी। तभी तो अपनी बातों में उसने इस बात का भी ज़िक्र किया था कि उसके काका यानि गौरी शंकर ने इस मामले में मेरे पिता जी से बातें कर ली हैं। इस बात का ख़याल आते ही मेरे मस्तिष्क में एकदम से झनाका सा हुआ। मुझे सुबह बैठक में पिता जी की कही हुई बातें याद आ गईं। इसका मतलब वो इसी बारे में मुझसे कह रहे थे कि यहां आने पर अगर कोई मुझे मिले और मेरे साथ रहना चाहे तो मैं इसके लिए मना न करूं।

अभी मैं ये सोच ही रहा था कि तभी मुझे किसी के आने का आभास हुआ। मैं पलटा तो मेरी नज़र रूपा पर पड़ी। वो अजीब सी घबराहट और कसमकस में अपने हाथों की उंगलियों को एक दूसरे में उमेठती कभी मुझे तो कभी नीचे ज़मीन पर देखती नज़र आई।

"म...मैं जानती हूं कि तुम अनुराधा से बेहद प्रेम करते हो और उसके इस तरह चले जाने से तुम्हें बहुत धक्का लगा है।" फिर उसने धीर गंभीर भाव से कहा____"सच कहूं तो मुझे भी उस मासूम के इस तरह गुज़र जाने से बहुत दुख हो रहा है। तुम्हारे आने से पहले मैं उसी की चिता के पास बहुत देर तक बैठी रही थी। मुझे अभी भी यकीन नहीं हो रहा कि ऐसा कुछ हो चुका है। काश! ये सब न हुआ होता। काश! ऊपर वाला उसकी जगह मुझे अपने पास बुला लेता।"

कहते कहते सहसा रूपा की आवाज़ भारी हो गई और उसकी आंखें भर आईं। इधर उसकी बातें सुन कर मेरे अंदर हूक सी उठी। आंखों के सामने अनुराधा का चेहरा उभर आया।

"तुम्हें पता है वैभव।" उधर रूपा ने किसी तरह खुद को सम्हाल कर फिर से कहा____"अनुराधा को ले कर मैंने जाने कितने ही हसीन सपने सजा लिए थे। शुरुआत में भले ही मुझे इस बात से तकलीफ़ हुई थी कि तुम किसी दूसरी लड़की से प्रेम करते हो मगर फिर एहसास हुआ कि प्रेम किसी के करने से नहीं बल्कि वो तो अपने आप ही हो जाया करता है। जैसे मुझे तुमसे हो गया वैसे ही तुम्हें उस लड़की से हो गया। अगर मैं तुम्हें हमेशा के लिए अपना बना लेना चाहती हूं तो उसी तरह तुम भी तो अपने प्रेम को हमेशा के लिए अपना बना लेना चाहते थे। हर प्रेम करने वाले की यही तो हसरत होती है। यानि इसमें न तो तुम्हारा कोई दोष था और ना ही इसमें मुझे कोई आपत्ति होनी चाहिए थी। बस, जब मुझे ये एहसास हो गया तो जैसे सब कुछ सामान्य हो गया। उसके बाद फिर मेरे मन में लेश मात्र भी अनुराधा के प्रति जलन की भावना न रही थी। वैसे भी तुम्हारी खुशी में ही तो मेरी खुशी थी। अगर तुम ही खुश न रहते तो फिर किसी बात का कोई मतलब ही नहीं रह जाना था। मेरे घर वाले उस मासूम को ले कर जाने क्या क्या सोचने लगे थे। ज़ाहिर है वो सिर्फ मेरी खुशी ही चाहते थे तभी तो उन्होंने ऐसा सोचा था लेकिन मैं जानती थी कि उचित क्या है। मेरी नज़र में सबसे ज़्यादा उचित यही था कि जिसे मैं प्रेम करती हूं वो खुश रहे, फिर भले ही उसकी खुशी के लिए मुझे अपने प्रेम का बलिदान ही क्यों न कर देना पड़े। यकीन करो वैभव, अगर तुम मुझसे ब्याह करने के लिए हां ना भी कहते तो मुझे तुमसे कोई शिकायत न होती। मैंने ये भी सोच लिया था कि तुम्हारे सिवा मैं किसी की दुल्हन भी कभी न बनूंगी। सारा जीवन ऐसे ही तुम्हारी खूबसूरत यादों के सहारे गुज़ार देती। मेरे घर वाले अथवा ये समाज क्या कहता मुझे इसकी कोई परवाह न होती।"

रूपा एकदम से चुप हुई तो कमरे में सन्नाटा छा गया। मेरे दिलो दिमाग़ में एक अजीब सी हलचल शुरू हो गई थी। समझ में नहीं आ रहा था कि क्या कहूं? बस ख़ामोशी से अपनी जगह बुत की मानिंद खड़ा था।

"इतने दिनों से बस एक ही बात सोचती आई हूं कि आख़िर ऊपर वाले ने ऐसा क्यों किया?" सहसा रूपा के शब्द एक बार फिर मेरे कानों से टकराए____"हम में से किसी के प्रेम को तो पूर्ण हो जाने दिया होता। आख़िर उस गुड़िया ने किसी के साथ ऐसा कौन सा अपराध किया था जिसके कारण उस निर्दोष को इतनी निर्दयता से मार दिया गया? काश! उसकी जगह मेरे प्राण ले लिए होते उस कंजर ने।"

"उसे मेरी वजह से मार दिया गया।" मैं एकदम हताश भाव से बोल पड़ा____"मेरी अनुराधा को मेरे कुकर्मों की सज़ा दी गई है। उसका हत्यारा चंद्रकांत नहीं बल्कि मैं हूं। हां रूपा मैं....उसका असल हत्यारा मैं ही हूं। अगर मैंने उससे प्रेम न किया होता तो आज मेरी अनुराधा इस दुनिया में ज़िंदा होती।"

"ऐसा मत कहो वैभव।" रूपा तड़प कर मेरे क़रीब आ गई, फिर बोली____"ये सच नहीं है। तुम अनुराधा की मौत के लिए खुद को दोष मत दो। सच तो यही है कि चंद्रकांत पागल हो गया था। अपने पागलपन में पहले उसने अपनी बहू को मार डाला और फिर अनुराधा को।"

"मुझे झूठी दिलासा मत दो।" मैंने खीझते हुए कहा____"सच क्या है ये तुम भी अच्छी तरह समझती हो और सच यही है कि चंद्रकांत ने मुझसे बदला लेने के लिए मेरी निर्दोष अनुराधा को मार डाला। अगर अनुराधा के जीवन में मेरा कोई दखल न होता तो आज वो जीवित होती। उसे मेरे कुकर्मों ने ही नहीं बल्कि मेरे प्रेम ने भी मार डाला रूपा।"

कहने के साथ ही मेरे घुटने मुड़ गए और मैं वहीं पर बिलख बिलख कर रो पड़ा। दिलो दिमाग़ में अचानक से जज़्बातों की ऐसी आंधी चल पड़ी कि मैं चाह कर भी उसे काबू न कर सका। रूपा ने मुझे रोते देखा तो वो बुरी तरह तड़प उठी। झपट कर उसने मुझे अपने सीने से छुपका लिया और फिर खुद भी सिसकने लगी। जाने कितनी ही देर तक मैं उससे छुपका रोता रहा और वो मुझे शांत कराने की कोशिश करती रही।

"त...तुम जाओ यहां से।" अचानक मैं उससे एक झटके से अलग हुआ और फिर बोला____"तुम्हें मेरे क़रीब नहीं रहना चाहिए और ना ही मुझसे प्रेम करना चाहिए। मुझसे प्रेम करने वाला हर व्यक्ति अनुराधा की तरह मार दिया जाएगा। जाओ, चली जाओ यहां से। आज के बाद कभी मेरे क़रीब मत आना और.....और हां...मुझसे ब्याह भी मत करना।"

"य...ये तुम क्या कह रहे हो वैभव?" रूपा बुरी तरह घबरा गई____"शांत हो जाओ मेरे दिलबर।"

"नहीं नहीं।" मैं छिटक कर उससे दूर हट गया____"जाओ यहां से। चली जाओ....मेरे पास रहोगी तो कोई तुम्हें भी मार डालेगा। मेरे कुकर्मों की सज़ा तुम्हें भी मिल जाएगी। जाओ, चली जाओ यहां से।"

"ये कैसी बहकी बहकी बातें कर रहे हो तुम?" रूपा बुरी तरह रोते हुए मेरे चेहरे को अपनी हथेलियों में भर कर बोली____"भगवान के लिए शांत हो जाओ और अपने से दूर मत करो मुझे। किसी को अगर मेरी जान ही लेनी है तो आ कर ले ले मगर मैं कहीं नहीं जाऊंगी। तुम्हारे पास ही रहूंगी, अपने दिलबर के पास। अपने वैभव के पास। मौत आएगी भी तो कम से कम अपने देवता के पास तो मौजूद रहूंगी। अपने महबूब की बाहों में दम निकलेगा तो ये मेरे लिए खुशी की ही बात होगी।"

"बकवास मत करो" मैंने उसे झटक दिया और पूरी शक्ति से चीखा____"मुझ जैसे कुकर्मी के पास तुम हर्गिज़ नहीं रह सकती। मेरी परछाई भी तुम्हारे लिए घातक है।"

"मेरे घर वालों ने विदा कर के मुझे मेरे देवता के पास भेज दिया है।" रूपा ने रुंधे गले से कहा____"मेरा भाई मुझे मेरे होने वाले पति के पास छोड़ गया है। इस वक्त मैं अपने घर में अपने पति के पास हूं। अब इस घर से मेरी अर्थी ही जाएगी।

रूपा की बातें सुन कर जाने क्यों मैं गुस्से से पागल हो उठा। मेरे अंदर अजीब सा झंझावात चालू हो गया था। गुस्से से दांत पीसते हुए मैं अभी कुछ करने ही वाला था कि तभी जाने क्या सोच कर मैं ठिठक गया और फिर पैर पटकते हुए कमरे से बाहर निकल गया। मुझे इस तरह बाहर जाते देख रूपा हड़बड़ा गई और फिर वो भी मेरे पीछे पीछे बाहर की तरफ लपकी।

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रूपचंद्र जब अपने घर पहुंचा तो सबको बैठक में ही बैठा पाया। सभी घर वाले किसी सोच में डूबे हुए नज़र आ रहे थे और उससे भी ज़्यादा चिंतित दिखाई दे रहे थे। रूपचंद्र को आया देख सबके सब चौंके और साथ ही बड़े व्याकुल से नज़र आने लगे।

"अरे! बड़ी जल्दी आ गए तुम?" फूलवती जैसे खुद को रोक न सकी थी, इस लिए मारे उत्सुकता के बोली____"सब ठीक तो है ना बेटा और....और रूपा कैसी है? क्या तुम्हारे होने वाले बहनोई से तुम्हारी मुलाक़ात हुई?"

"एक साथ इतने सारे सवाल मत पूछिए बड़ी मां।" रूपचंद्र ने एक जगह बैठते हुए कहा____"पहले मेरे लिए एक लोटा पानी तो मंगवाइए, प्यास लगी है।"

रूपचंद्र की बात सुनते ही फूलवती ने पास ही खड़ी स्नेहा को पानी लाने के लिए भेज दिया। जल्दी ही स्नेहा पानी ले आई जिसे रूपचंद्र ने पिया और फिर लोटा वापस स्नेहा को पकड़ा दिया।

"अब जल्दी से बताओ बेटा कि वहां सब कैसा है?" फूलवती फिर से मारे व्याकुलता के पूछ बैठी____"कोई गड़बड़ तो नहीं हुई न वहां?"

"फ़िक्र वाली बात नहीं है बड़ी मां।" रूपचंद्र ने गहरी सांस ले कर कहा____"लेकिन जैसा कि आप सबको पहले से ही आशंका थी वैसा ही हुआ।"

"क्या मतलब है तेरा?" ललिता देवी घबराहट के चलते झट से पूछ बैठी____"आख़िर क्या हुआ है वहां?"

रूपचंद्र ने सारी बात बता दी। उसने बताया कि वैभव ने साफ कह दिया है कि रूपा को उसके साथ वहां रहने की कोई ज़रूरत नहीं है। अंत में उसने ये बताया कि वो फिलहाल ये कह कर आया है कि वो किसी ज़रूरी काम से शहर जा रहा है इस लिए तब तक रूपा उसके साथ वहीं पर रहेगी और जब वो शहर से वापस आएगा तो रूपा को अपने साथ ले जाएगा।

"ये क्या कह रहे हो तुम?" गौरी शंकर ने चिंतित भाव से कहा____"इसका मतलब रूपा बिटिया को जिस मकसद से हमने उसके पास रहने भेजा है वो व्यर्थ गया?"

"लगता तो ऐसा ही है काका।" रूपचंद्र ने कहा____"लेकिन मैं भी हार न मानने वाली तर्ज़ पर ही रूपा को शहर जाने का बहाना कर के उसके पास छोड़ कर आया हूं। मैं रूपा से साफ शब्दों में कह आया हूं कि अब ये सिर्फ उसी पर है कि वो कैसे खुद को वैभव के पास रहने का कोई मार्ग निकालती है? आप सब तो जानते ही हैं कि हम किसी भी तरह की ज़ोर ज़बरदस्ती नहीं कर सकते हैं क्योंकि ऐसे में बात बिगड़ सकती है। हमारी किसी भी तरह की बात अथवा तर्क वितर्क की बातों से वैभव आहत अथवा नाराज़ हो सकता है लेकिन अगर रूपा खुद कोई कोशिश करेगी तो बहुत हद तक संभव है कि वो ऐसा न कर सके। आख़िर उसे भी पता है कि रूपा उसे प्रेम करती है और उसने अपने इस प्रेम के चलते क्या कुछ नहीं किया है उसके लिए। वैभव भले ही इस समय ऐसी मानसिक हालत में है लेकिन मुझे यकीन है कि रूपा के प्रति उसका रवैया इस हद तक तो कठोर नहीं हो सकता कि वो उसकी कोई बात ही न सुने।"

"हम्म्म्म सही कह रहे हो तुम।" गौरी शंकर ने सिर हिलाते हुए कहा____"मुझे भी विश्वास है कि वैभव का रवैया हमारी बिटिया के प्रति इतना सख़्त नहीं हो सकता। तुम रूपा को उसके पास छोड़ कर यहां चले आए ये अच्छा किया। तुम्हारी मौजूदगी में वो वैभव से कोई बात भी नहीं कर सकती थी। आख़िर इतना तो क़ायदा है उसमें कि वो अपने बड़े भाई के सामने वैभव से बात न करे। ख़ैर, अब तो ईश्वर से यही प्रार्थना है कि रूपा बिटिया अपनी कोशिश में कामयाब हो जाए और जल्द ही वैभव की मानसिक अवस्था ठीक हो जाए।"

"ज़रूर ठीक हो जाएगी काका।" रूपचंद्र ने दृढ़ता से कहा____"मुझे अपनी बहन पर और उसके प्रेम पर पूर्ण विश्वास है। ख़ैर आप लोग दोपहर के भोजन की तैयारी कीजिए। मैं औपचारिक रूप से उन दोनों के लिए खाना ले कर जाऊंगा। अगर सब ठीक रहा तो रूपा वहीं रहेगी अन्यथा मजबूरन मुझे उसको अपने साथ वापस ले कर आना ही पड़ेगा।"

रूपचंद्र की बात सुन कर फूलवती ने फ़ौरन ही सबको भोजन बनाने का हुकुम दे दिया। वहां मौजूद कुछ औरतें और लड़कियां फ़ौरन ही हरकत में आ गईं। रूपचंद्र, गौरी शंकर, फूलवती और ललिता देवी इसी संबंध में और भी बातें करती रहीं। उधर वक्त धीरे धीरे गुज़रता रहा।

✮✮✮✮

मैं आंधी तूफ़ान बना तेज़ क़दमों से जंगल की तरफ बढ़ा चला जा रहा था। दिलो दिमाग़ में भौकाल सा मचा हुआ था। इस वक्त मेरे अंदर गुस्सा भी था और इस बात का अपराध बोझ भी कि मेरे ही कुकर्मों की वजह से अनुराधा को चंद्रकांत ने मार डाला था। यानि अगर मैं उसके जीवन में इस तरह से न आया होता तो आज वो जीवित होती। अपनी अनुराधा का असल हत्यारा मैं ही था।

दिलो दिमाग़ में दोनों तरह के विचारो का भीषण बवंडर चल रहा था जो मुझे पागल भी किए दे रहा था और बुरी तरह रुला भी रहा था। आंखों के सामने बार बार अनुराधा का चेहरा चमक उठता। ख़ास कर उस दिन का मंज़र जिस दिन वो एक लाश के रूप में पेड़ पर रस्सी के सहारे लटकी हुई थी।

मेरे पीछे रूपा भागती हुई चली आ रही थी और मुझे आवाज़ लगाए जा रही थी लेकिन मुझे जैसे कुछ सुनाई ही नहीं दे रहा था। मैं अपने दिलो दिमाग़ में चल रही आंधी में खोया बदस्तूर बढ़ता ही चला जा रहा था। जल्दी ही मैं जंगल में दाख़िल हो गया। कुछ दिन पहले तेज़ बारिश हुई थी इस लिए जंगल के अंदर की ज़मीन में हल्का गीलापन था। घने पेड़ पौधों की वजह से सूरज की धूप कम ही आ रही थी वहां।

जंगल के अंदर आने पर भी मेरी रफ़्तार में कोई कमी नहीं आई। जैसे मुझे आभास ही नहीं था कि मैं जंगल के अंदर हूं। पीछे से रूपा की आवाज़ें अब भी आ रही थीं लेकिन मैं कहीं खोया हुआ बढ़ता ही चला जा रहा था। तभी अचानक मेरा पैर किसी पत्थर पर टकरा गया तो मैं बुरी तरह लड़खड़ा गया और झोंक में भरभरा कर सीने के बल गिर पड़ा। मेरे गिरते ही वातावरण में रूपा की चीख गूंज उठी। इधर गिरने की वजह से मैं भी विचारों के बवंडर से बाहर आ गया।

अभी मैं उठ ही रहा था कि तभी भागती हुई रूपा मेरे पास आ गई। उसने जल्दी से मुझे सम्हाला और फिर बड़े ही एहतियात से वहीं बैठा दिया। उसका चेहरा आंसुओं से तर था। वो सिसक रही थी लेकिन इसके बावजूद वो चिंतित अवस्था में मेरे जिस्म के हर हिस्से को टटोल टटोल कर देखे जा रही थी। शायद वो ये देखना चाहती थी कि गिरने की वजह से कहीं मुझे चोट तो नहीं लग गई?

"नहीं...दूर हट जाओ।" उसके इस तरह मुझे टटोलने से मैं एकदम से उसे धक्का दे कर चीखा____"मेरे पास आने की कोशिश मत करो। चली जाओ यहां से....वरना...वरना तुम्हें भी मेरे कुकर्मों की सज़ा मिल जाएगी।"

"अगर मिलती है तो मिल जाए।" वो तड़प कर रोते हुए बोली_____"मुझे अपने मर जाने की कोई परवाह नहीं है। मुझे सिर्फ तुम्हारी परवाह है वैभव।"

"फिर से वही बकवास?" मैं एक बार फिर गुस्से से चीख पड़ा____"मैंने कहा न चली जाओ यहां से। तुम्हें एक बार में मेरी बात समझ में क्यों नहीं आती?"

"हां नहीं आती मुझे।" रूपा की आंखें छलक पड़ीं____"और मैं ऐसी कोई बात समझना भी नहीं चाहती जिसमें मेरे वैभव और मेरे प्रेम पर कोई आंच आए। अपने आपको सम्हालो वैभव और खुद को किसी बात के लिए इस तरह दोष दे कर दुखी मत करो। भगवान के लिए शांत हो जाओ, अपने लिए या मेरे लिए न सही किंतु अपनी अनुराधा के लिए तो शांत हो जाओ। ज़रा सोचो कि इस वक्त तुम्हारी ऐसी हालत देख कर तुम्हारी अनुराधा कितना दुखी होगी। क्या तुम अपनी अनुराधा को उसके मरने के बाद भी खुश नहीं देखना चाहते? क्या तुम अपनी अनुराधा की आत्मा को तड़पाना चाहते हो?"

"न..नहीं नहीं।" मैं पूरी शक्ति से चीख उठा____"मैं अपनी अनुराधा को तड़पाने के बारे में सोच भी नहीं सकता। उसे ज़रा सा भी दुख नहीं दे सकता। मैं तो....मैं तो उसे हमेशा खुशी से शरमाते हुए ही देखना चाहता हूं। हां हां...मेरी अनुराधा जब खुशी से शर्माती है तो मुझे बहुत सुंदर लगती है...बहुत प्यारी लगती है मुझे। मैं एक पल के लिए भी उसके चेहरे पर दुख के भाव नहीं रहने दे सकता।"

"अगर तुम सच में ऐसा चाहते हो।" रूपा ने सहसा मेरे क़रीब आ कर बड़े प्यार से मेरे चेहरे को सहलाते हुए कहा____"तो खुद को इस तरह दुख में मत डुबाओ। हां वैभव, अगर तुम खुद को इसी तरह दुखी रखोगे और उसकी मौत के लिए खुद को दोष देते रहोगे तो वो कभी खुश नहीं रह सकेगी। तुम्हारी अनुराधा तो मुझसे भी ज़्यादा तुमसे प्रेम करती है ना, फिर भला वो ये कैसे देख सकेगी कि उसका महबूब इसके लिए इस तरह खुद को दुखी रखे और सबसे विरक्त हो जाए? वो तो यही चाहेगी न कि उसका महबूब हर हाल में उसे सिर्फ प्रेम करे और प्रेम से ही उसे याद करे? जब तुम उसे प्रेम से याद करोगे तो उसे बहुत ही अच्छा लगेगा। उसकी आत्मा को बड़ा सुकून मिलेगा। क्या तुम नहीं चाहते कि तुम्हारी अनुराधा की आत्मा को सुकून मिले?"

"नहीं नहीं।" मैं एकदम से हड़बड़ा कर बोल पड़ा____"मैं अपनी अनुराधा को हमेशा सुकून में देखना चाहता हूं। मैं चाहता हूं कि मेरी अनुराधा बहुत ज़्यादा खुश रहे।"

"और ऐसा तभी होगा ना जब तुम अपनी ऐसी हालत से बाहर निकल कर उसके लिए कुछ अच्छा करोगे।" रूपा ने बड़े ही प्यार से समझाते हुए कहा_____"हां वैभव, तुम्हें अपनी अनुराधा के लिए कुछ ऐसा करना चाहिए जिससे कि वो खुश रहने लगे और उसकी आत्मा सुकून और तृप्ति को प्राप्त कर सके।"

"हां सही कह रही हो तुम।" मैं कुछ सोचते हुए झट से बोल पड़ा____"मुझे अपनी अनुराधा के लिए सच में कुछ अच्छा करना चाहिए मगर....।"

"मगर???" रूपा ने उसी प्यार से पूछा।

"मगर मैं ऐसा क्या करूं जिससे मेरी अनुराधा हमेशा खुश रहे और उसकी आत्मा को शांति मिलती रहे?" मैंने सहसा व्याकुल हो कर कहा____"त...तुम मुझे बताओ रूपा...मुझे बताओ कि मुझे अपनी अनुराधा के लिए क्या करना चाहिए?"

"सबसे पहले तो हमें यहां से वापस मकान में चलना चाहिए।" रूपा के चेहरे पर सहसा राहत और खुशी के भाव उभर आए, बोली____"वहीं पर तसल्ली से बैठ कर सोचेंगे कि हम दोनों को अनुराधा के लिए क्या करना चाहिए?"

"ह...हम दोनों को?" मैंने अनायास ही चौंक कर उसकी तरफ सवालिया भाव से देखा।

"हां वैभव हम दोनों को।" रूपा ने खुद को सम्हालते हुए कहा____"माना कि अनुराधा तुम्हारी सब कुछ थी लेकिन वो मेरी भी तो छोटी बहन थी। मैंने तो ये भी सोच लिया था कि मैं अनुराधा को अपनी छोटी गुड़िया बना लूंगी और उसे बहुत सारा प्यार और स्नेह दिया करूंगी लेकिन....ये मेरी बदकिस्मती ही थी कि मेरे नसीब में मेरी छोटी गुड़िया को प्यार और स्नेह देना लिखा ही नहीं था।"

कहने के साथ ही रूपा की आवाज़ भर्रा गई और आंखों से आंसू छलक पड़े। उसकी बातों से मेरे अंदर एक हूक सी उठी। ना चाहते हुए भी मेरे हाथ स्वतः ही ऊपर उठे और फिर उसके गालों पर लुढ़क आए आंसू की दोनों लकीरों को पोंछ दिए। ये देख रूपा की दोनों आंखों से फिर से आंसू के कतरे छलक पड़े और फिर से आंसू की दो लकीर बना गए। उसने बड़ी मुश्किल से खुद को सम्हाला और फिर मुझे ले कर खड़ी हो गई।

कुछ ही देर में वो मुझे मकान में ले आई। मैं महसूस कर रहा था कि अब मेरे अंदर पहले जैसा तूफ़ान नहीं था। थोड़ा हल्का सा महसूस हो रहा था किंतु अब इस बात को जानने की उत्सुकता तीव्र हो उठी थी कि वो ऐसा क्या करने का सुझाव देगी जिससे कि मेरी अनुराधा को खुशी के साथ साथ सुकून भी मिलेगा?

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अध्याय - 120

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दोपहर का वक्त था।

हवेली के बैठक कक्ष में दादा ठाकुर के साथ कई लोग बैठे हुए थे। महेंद्र सिंह, ज्ञानेंद्र सिंह, अर्जुन सिंह, गौरी शंकर तथा किशोरी लाल। सभी के चेहरों पर गहन सोचो के भाव गर्दिश कर रहे थे। अभी कुछ देर पहले ही ये लोग यहां आए थे।

"ऐसी परिस्थिति में यूं तो वैभव का उस सुनसान जगह पर अकेले रहना उचित नहीं है।" महेंद्र सिंह ने कहा____"लेकिन क्योंकि उसकी मानसिक हालत ठीक नहीं है इस लिए उस पर किसी तरह की रोक टोक अथवा ज़ोर ज़बरदस्ती करना भी उचित नहीं है। काश! चंद्रकांत ने ऐसा संगीन क़दम न उठाया होता। काश! उस लड़की को इस तरह निर्दयता से मारने से पहले उसके मन में ये ख़याल आया होता कि वो लड़की हर तरह से निर्दोष है।"

"कहना तो नहीं चाहिए लेकिन एक कड़वा सच ये भी है कि उस लड़की की इस तरह से हुई हत्या का ज़िम्मेदार खुद वैभव भी है।" अर्जुन सिंह ने सबकी तरफ निगाह घुमाते हुए गंभीरता से कहा____"चंद्रकांत असल में वैभव को ही अपना सबसे बड़ा दुश्मन समझता था। ज़ाहिर है उसकी इस दुश्मनी की वजह उसकी घर की औरतों के साथ वैभव के नाजायज़ ताल्लुक़ात ही थे। हालाकि सारा दोष सिर्फ वैभव पर मढ़ना और फिर ये सब कर गुज़रना कहीं से भी उचित नहीं था लेकिन शायद दोनों बाप बेटों की ऐसी ही मानसिक स्थिति बन चुकी थी। जब अपनों पर कोई बस न चला तो दूसरों पर ही अपने गुस्से और नफ़रत का सारा लावा उड़ेल देना उनकी मानसिक स्थिति बन चुकी थी। इतना कुछ करने के बाद भी जब उसने ये देखा कि उसका असल दुश्मन तो अभी भी जीवित अवस्था में बड़े शान से घूम फिर रहा है तो वो वैभव को तोड़ डालने का यही हौलनाक क़दम उठा बैठा। उसे इस बात से कोई मतलब नहीं रह गया था कि जिसकी वो हत्या करने जा रहा है उसका कहीं कोई दोष भी है या नहीं। बल्कि उसे तो सिर्फ इस बात से मतलब था कि उसे किसी भी हालत में अपने सबसे बड़े दुश्मन यानि वैभव का अहित करना है। इसमें कोई शक नहीं कि उसने ऐसा कर के सच में वैभव का बहुत बड़ा अहित कर दिया है। इंसान जिस व्यक्ति को दिल की गहराइयों से प्रेम कर रहा होता है उसके साथ अगर कोई ऐसा कर दे तो यकीनन प्रेम करने वाले व्यक्ति की वैसी ही दशा हो जाती है जैसे कि इस समय वैभव की है।"

"माना कि ये एक कड़वा सच है अर्जुन सिंह।" महेंद्र सिंह ने गहरी सांस ली____"लेकिन अब इन सब बातों का कोई मतलब नहीं रहा। अब तो सिर्फ ये सोचना है कि सफ़ेदपोश कौन है? जो रहस्यमय व्यक्ति इसके पहले वैभव का जानी दुश्मन बना हुआ था वो इतने समय बाद अचानक से चंद्रकांत के मामले में कैसे जुड़ गया? उसने चंद्रकांत को उसके बेटे के हत्यारे के बारे में क्यों झूठी कहानी सुनाई? आख़िर क्यों उसने चंद्रकांत के हाथों उसकी अपनी ही बहू को मरवा दिया?"

"क्या रघुवीर के हत्यारे के बारे में अब तक आपको कुछ पता नहीं चला?" दादा ठाकुर ने पूछा____"हैरत की बात है कि बीस दिन होने वाले हैं और अभी तक वो हमें नज़र नहीं आया। हमारे आदमी आज भी मुस्तैदी से उसके आने की प्रतिक्षा कर रहे हैं किंतु वो उस दिन के बाद से अब तक दुबारा नज़र ही नहीं आया। ऐसा लगता है जैसे वो फिर से कहीं ग़ायब हो गया है और अचानक से फिर वो किसी दिन एक नए मामले में जुड़ा हुआ नज़र आएगा।"

"सफ़ेदपोश की तलाश करना तो आपका ही काम है ठाकुर साहब।" महेंद्र सिंह ने कहा____"हालाकि हम भी अपने तरीके से उसका पता करने की कोशिश करते रहते हैं लेकिन हमें ये भी लगता है कि वो हमारी पहुंच से बाहर की ही चीज़ है। इस बीच हमने इस बात की छानबीन ज़रूर की है कि उसने चंद्रकांत को उसके बहू के संबंध में जो कहानी सुनाई थी वो झूठी थी अथवा सच।"

"तो क्या पता चला?" दादा ठाकुर के साथ साथ बाकी लोगों के चेहरों पर भी उत्सुकता के भाव उभर आए थे।

"ये तो आप भी समझते हैं कि ऐसे संबंध ज़्यादा दिनों तक किसी से छुपे नहीं रहते हैं।" महेंद्र सिंह ने कहा____"एक न एक दिन ऐसे संबंधों की भनक लोगों को लग ही जाती है। सबसे पहले तो आस पड़ोस वालों को ही पता लग जाता है। उसके बाद धीरे धीरे ऐसी बातें चारो तरफ फैल जाती हैं। हमारे आदमियों ने आपके गांव के लोगों से ही नहीं बल्कि आस पास के गांवों के लोगों से भी इस बारे में पूछताछ की लेकिन सभी ने यही कहा कि ऐसे किसी भी व्यक्ति से रजनी के संबंधों का उन्हें पता नहीं है। अलबत्ता वैभव से उसके संबंधों का उन्हें ज़रूर शक था। इतनी पूछताछ के बाद हम इसी नतीजे पर पहुंचे हैं कि सफ़ेदपोश ने रजनी के संबंध में चंद्रकांत को जो कुछ बताया था वो सरासर झूठ था। स्पष्ट है कि वो अपने ही किसी मकसद के तहत चंद्रकांत के द्वारा ऐसा करवाना चाहता था। वरना आप ही सोचिए कि चंद्रकांत को अगली रात मिलने का कह कर भी वो क्यों नहीं आया? चंद्रकांत उसका इंतजार करते करते मर भी गया लेकिन उसका अब तक कहीं कोई अता पता नहीं है।"

"इस बात की आशंका तो हमें पहले ही हो गई थी।" दादा ठाकुर ने कहा____"सफ़ेदपोश ने यकीनन ये सब अपने किसी मकसद के तहत ही करवाया है। उसे रजनी के चरित्र का बखूबी पता था जिसके आधार पर उसने ऐसी कहानी बना कर चंद्रकांत को सुनाई। उसे पूरा यकीन था कि चंद्रकांत उसकी कहानी को बिना सोचे समझे इस लिए सच मान लेगा क्योंकि वो खुद भी अपनी बहू के गंदे चरित्र से वाक़िफ है। चंद्रकांत की मानसिक अवस्था का भी उसे बखूबी एहसास था। वो जानता था कि चंद्रकांत अपने बेटे के हत्यारे के बारे में जानने के लिए एकदम से पगलाया हुआ है। ऐसे में अगर उसे कहीं से भी उसके बेटे के हत्यारे के बारे में पता चलेगा तो उसका बर्ताव कुछ इसी तरह का होगा। यानि वो गुस्से में पागल हो जाएगा और फिर बिना सोचे समझे वो अपने बेटे के हत्यारे का खून कर देगा, जैसा कि उसने किया भी। ये सारी बातें साफ ज़ाहिर करती हैं कि सफ़ेदपोश बड़ा ही शातिर है। अब सवाल ये है कि उसकी चंद्रकांत से क्या दुश्मनी थी जिसके चलते उसने इतने शातिराना ढंग से ऐसा काम करवा लिया? एक बात और, अगर चंद्रकांत से उसकी कोई दुश्मनी थी ही तो अब तक उसने ऐसा कुछ क्यों नहीं किया था?"

"बिल्कुल सही कह रहे हैं आप।" महेंद्र सिंह ने कहा____"ये दो तीन सवाल ऐसे हैं जो उस दिन से हमारे मन में खलल डाले हुए हैं। बहुत सोचते हैं लेकिन कुछ भी समझ में नहीं आता। अगर वजह का पता चल जाए तो यकीनन ये भी समझ आ जाएगा कि सफ़ेदपोश कौन है और उसने ऐसा क्यों किया?"

"सबसे बड़ी विडंबना तो यही रही है कि सफ़ेदपोश की हमसे अथवा चंद्रकांत से दुश्मनी की वजह ही समझ नहीं आई कभी।" दादा ठाकुर ने बेचैन भाव से गहरी सांस ली____"उसके जैसा शातिर और दुस्साहसी व्यक्ति अपने जीवन में हमने कभी नहीं देखा। उसका सबसे बड़ा दुस्साहस तो यही था कि उसने हमारी हवेली के बाहर बने एक कमरे से दरबानों की मौजूदगी में जगन को निकाल ले गया था। क्या आप में से किसी को उससे इतने बड़े दुस्साहस की उम्मीद हो सकती थी?"

"नहीं, बिल्कुल नहीं।" अर्जुन सिंह ने इंकार में सिर हिला कर कहा____"सचमुच उसने ये बड़ा ही दुस्साहस का परिचय दिया था। ऐसा तो वही कर सकता है जिसे अपनी मौत का ज़रा भी खौफ़ ना हो।"

"वैसे एक सवाल शुरू से ही मेरे मन में है कि जब चंद्रकांत ने रात अपनी बहू की इतनी निर्ममता से हत्या की थी।" गौरी शंकर ने कहा____"तो उसके घर वालों को पता कैसे नहीं चला? घर के अंदर उसकी बीवी और बेटी भी तो थीं? क्या वो नींद में इस तरह अंटा गाफिल थीं कि उन्हें अपने आस पास ही कहीं पर रजनी की ऐसी भयानक हत्या होने का ज़रा भी आभास नहीं हुआ? भला ऐसा कैसे हो सकता है?"

"हमारे मन में भी ये सवाल उभरा था।" महेंद्र सिंह ने कहा____"किंतु उस समय ऐसे हालात थे कि पूछने का मौका ही नहीं मिला अथवा ये कहें कि पूछने का ध्यान ही नहीं रहा था। उसके बाद फिर अचानक उस लड़की की हत्या का मामला हो गया जिसके चलते माहौल ही अलग हो गया था। हालाकि कुछ दिन पहले ही हम चंद्रकांत के घर इस सारे मामले की पूछताछ करने गए थे।"

"तो क्या पता चला आपको?" दादा ठाकुर ने पूछा।

"यही कि ना तो चंद्रकांत की बीवी को इस भयानक हादसे का आभास हुआ और ना ही उसकी बेटी को।" महेंद्र सिंह ने कहा____"उनका कहना था कि अगर उनमें से किसी को ऐसा कुछ आभास हुआ होता और अगर वो रजनी की चीख सुन कर जाग जाते तो शायद ऐसा हो ही नहीं पाता।"

"हमारा खयाल है कि वो दोनों मां बेटी सच बोल रहीं हैं।" दादा ठाकुर ने कुछ सोचते हुए कहा____"यकीनन अगर उन्हें पता चल जाता तो ऐसा हो ही नहीं सकता था लेकिन उन्हें पता ही नहीं चला। इसका मतलब यही हुआ कि चंद्रकांत ने किसी को पता चलने ही नहीं दिया होगा।"

"बिल्कुल ठीक कह रहे हैं आप।" महेंद्र सिंह ने कहा____"उनकी बातों से हम भी इसी नतीजे पर पहुंचे थे। यानि चंद्रकांत ने ज़रा सा भी उन्हें पता नहीं चलने दिया था। ज़ाहिर है इतना ख़तरनाक काम करने से पहले उसने अपनी बहू का मुंह बंद कर दिया रहा होगा ताकि उसके चीखने की आवाज़ उसके हलक से बाहर निकल ही न सके।"

"या फिर सोते में ही उसने एक झटके में अपनी बहू की गर्दन काट दी होगी।" दादा ठाकुर ने जैसे संभावना ब्यक्त की____"इतना तो वो भी समझता था कि अगर उसके द्वारा किए जा रहे कृत्य का पता उसकी बीवी और बेटी को चल गया तो वो उसे इतना भयानक हत्याकांड नहीं करने देंगी। इस लिए उसने सोते में ही एक झटके में अपनी बहू की गर्दन काट दी होगी। वैसे भी अपने बेटे के हत्यारे के बारे में जानने के लिए वो पहले से ही पगलाया हुआ था और जब उसे हत्यारे का पता चला तो उसने अपना सम्पूर्ण आपा खो दिया होगा। वो अंदर अपनी बहू के कमरे में गया होगा। वहां बिस्तर पर उसने अपनी बहू को बड़े आराम से सोता हुआ देखा होगा। बहू के रूप में उसे अपने बेटे का हत्यारा नज़र आया जिससे उसका खून खौल उठा और फिर उसने एक ही झटके में तलवार से रजनी की गर्दन काट दी होगी। उस एक ही वार में रजनी मर गई होगी लेकिन चंद्रकांत को शायद इतने से भी तसल्ली अथवा शांति न मिली होगी। इस लिए उसने रजनी के शरीर को जगह जगह तलवार से चीर दिया। जैसा कि उसकी लाश देखने से ही पता चल रहा था। रजनी को चीखने चिल्लाने का जब कोई मौका ही नहीं मिला होगा तो भला कैसे उस घर में ही मौजूद उसकी बीवी और बेटी को इस सबका पता चल पाता?"

"वाकई, ऐसा ही हुआ होगा।" महेंद्र सिंह ने गंभीरता से सिर हिलाया____"ख़ैर, अगर सच में सफ़ेदपोश ने चंद्रकांत से ये सब अपनी किसी दुश्मनी के चलते ही करवाया है तो यकीनन ये बड़ा ही हैरतअंगेज कारनामा किया है उसने।"

"हमारा ख़याल तो ये है कि उसका सबसे बड़ा कारनामा ये है कि आज तक हम में से किसी को भी उसके बारे में ज़रा सा भी सुराग़ नहीं मिल सका है।" दादा ठाकुर ने कहा____"हर किसी से अपनी असलियत को छुपाए रख कर बड़ी ही सफाई से इतना कुछ कर गुज़रना किसी चमत्कार से कम नहीं है।"

"सही कह रहे हैं आप।" महेंद्र सिंह ने कहा____"वाकई ये चमत्कार ही है। ना आज तक किसी को उसका मकसद समझ आया और ना ही किसी को उसके बारे में ज़रा सा भी कुछ पता चल सका है। इससे बड़ा चमत्कार वास्तव में कुछ और नहीं हो सकता।"

"जो भी हो लेकिन जब तक वो पकड़ा नहीं जाता।" गौरी शंकर ने कहा____"तब तक किसी न किसी अनहोनी अथवा अनिष्ट की आशंका तो बनी ही रहेगी। इस लिए बेहतर यही है कि उसे हर हाल में खोज कर पकड़ लिया जाए।"

"कहते तो तुम ठीक हो गौरी शंकर।" दादा ठाकुर ने कहा____"लेकिन वो पकड़ में तो तब आएगा न जब वो किसी को कहीं नज़र आएगा। पिछले बीस दिनों से हमारे आदमी अपनी आंखें गड़ाए हुए हैं और उसको पकड़ने के लिए पूरी तरह से मुस्तैद हैं लेकिन वो तो ऐसे ग़ायब है जैसे उसका कहीं कोई वजूद ही नहीं है। उसके बारे में सबसे ज़्यादा हम ही चिंतित हैं और जब तक वो हमारी पकड़ में नहीं आ जाता हमें चैन नहीं मिल सकता।"

कुछ देर और इसी सिलसिले में बातें होती रहीं उसके बाद सब इजाज़त ले कर चले गए। सबसे आख़िर में गौरी शंकर गया क्योंकि बाकी लोगों के जाने के बाद उसने ख़ास तौर पर दादा ठाकुर से अपनी भतीजी रूपा और वैभव के बारे में चर्चा की थी।

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मैं और रूपा जब वापस मकान के पास पहुंचे तो देखा मकान के बाहर शेरा खड़ा था। उसके साथ आए कुछ आदमी जीप से सामान निकाल कर मकान के अंदर रख रहे थे। मुझ पर नज़र पड़ते ही शेरा मेरे क़रीब आया और मुझे सलाम किया।

"तुम यहां किस लिए आए हो?" मैंने निर्विकार भाव से उससे पूछा____"और ये लोग मकान के अंदर क्या रख रहे हैं?"

"आपकी ज़रूरत का कुछ सामान है छोटे कुंवर।" शेरा ने कहा____"एक बोरी में चावल दाल और आटा है। एक में फल और सब्जियां हैं। कुछ बिस्तर वाले कपड़े हैं और साथ ही कुछ बर्तन हैं।"

"वो तो ठीक है।" मेरे माथे पर शिकन उभर आई थी____"लेकिन इतना सारा सामान यहां भिजवाने की क्या ज़रूरत थी?"

"अब इस बारे में मैं क्या कहूं छोटे कुंवर?" शेरा ने सिर झुकाते हुए कहा____"मालिक का हुकुम था इस लिए मैं ले आया।"

शेरा की इस बात के बाद मैंने उससे कुछ नहीं कहा। मैं जानता था कि इसमें उसका कोई कसूर नहीं था, बल्कि उसने तो अपने मालिक यानि कि मेरे पिता जी के हुकुम का पालन ही किया था। ख़ैर कुछ ही देर में सारा सामान सलीके से रख दिया गया। उसके बाद शेरा मुझसे इजाज़त ले कर अपने सभी आदमियों के साथ चला गया।

दूसरी तरफ मकान की चौकीदारी करने वाले आदमी मकान के चारो तरफ लकड़ी की बल्लियों द्वारा क़रीब चार फुट ऊंची चारदीवारी बनाने में लगे हुए थे। रूपा मेरे क़रीब ही खड़ी थी और वो भी ये सब देख रही थी। मैंने उस तरफ से ध्यान हटाया और रूपा की तरफ पलटा।

"तुमने कहा था कि हमें अनुराधा के लिए कुछ अच्छा सा करना चाहिए।" फिर मैंने उससे पूछा____"तो अब बताओ कि क्या करना चाहिए?"

"जैसा कि मैंने कहा था कि इसके लिए सबसे पहले तुम्हें खुद को शांत रखना है और खुद को दुखी नहीं रखना है।" रूपा ने संतुलित भाव से कहा____"क्योंकि अगर तुम दुखी रहोगे तो अनुराधा को भी इससे दुख होगा। अब रही बात उसके लिए कुछ करने की तो इस बारे में हम दोनों को ही तसल्ली से सोचने की ज़रूरत है।"

"हां पर क्या सोचूं मैं?" मैं जैसे एकाएक परेशान और हताश हो उठा____"कुछ समझ में नहीं आ रहा मुझे।"

"समझ में तो तब आएगा न जब तुम पूरी तरह से शांत हो जाओगे।" रूपा ने कहा____"तुम अभी भी पूरी तरह से शांत नहीं हो। तुम्हारे अंदर द्वंद सा चल रहा है और जब तक ऐसा रहेगा तब तक तुम ठीक से सोच ही नहीं पाओगे कि तुम्हें अपनी अनुराधा की खुशी के लिए क्या करना चाहिए।"

रूपा की बात सुन कर मैं मूर्खों की तरह उसकी तरफ देखने लगा। मैंने महसूस किया कि सच में मेरे अंदर अभी भी शांति नहीं थी और अजीब सा द्वंद चल रहा था। मैंने अपनी आंखें बंद कर के खुद को शांत करने की कोशिश की मगर कामयाब न हो सका। रूपा बड़े ध्यान से मेरी तरफ देखे जा रही थी। जब उसने मुझे परेशान बेचैन और हताश होता देखा तो उसने बड़े स्नेह से मेरा हाथ पकड़ लिया।

"इतना परेशान मत हो।" फिर उसने बड़े प्यार से कहा____"सब ठीक हो जाएगा। इतना तो तुम भी जानते हो न कि दुनिया में हर चीज़ अपने तय समय पर ही होती है। हम ये सोचते हैं कि सब कुछ हमारे मन के मुताबिक हो और जल्दी हो जाए लेकिन ऐसा नहीं हुआ करता। जैसे बारह घंटे का दिन गुज़र जाने के बाद ही रात होती है उसी तरह इस संसार की बाकी चीज़ों का भी अपना एक समय होता है। इस लिए इतना ज़्यादा हलकान मत हो। हम दोनों मिल कर हमारी अनुराधा के लिए ज़रूर कुछ अच्छा करेंगे और बहुत जल्द करेंगे। तुम्हें मुझ पर भरोसा है ना?"

मैंने हौले से हां में सिर हिलाया। मैं अभी भी थोड़ा परेशान हालत में था किंतु जाने क्यों ये एहसास हो रहा था कि रूपा अनुराधा के लिए यकीनन कुछ अच्छा करने में मेरी मदद करेगी।

"ठीक है फिर।" रूपा ने कहा____"अगर तुम्हें मुझ पर भरोसा है तो अब किसी बात की चिंता मत करो। आओ अंदर चल कर देखें कि तुम्हारे पिता जी ने हमारे लिए क्या क्या भिजवाया है?"

"ह...हमारे लिए मतलब?" मैं अनायास ही चौंका।

"हां हमारे लिए।" रूपा ने धड़कते दिल से मेरी तरफ देखा____"मेरा मतलब है कि मैं भी तो यहां पर तुम्हारे साथ हूं और जब तक तुम यहां रहोगे मैं भी तुम्हारे साथ ही रहूंगी। तभी तो हम दोनों मिल कर ये सोच पाएंगे कि हमें अनुराधा के लिए कुछ अच्छा सा क्या करना चाहिए। क्या तुम्हें मेरे यहां रहने से एतराज़ है?"

उसकी बात सुन कर मैं कुछ बोल ना सका। बस ख़ामोशी से उसके हल्के घबराए चेहरे को देखता रहा। ये सच है कि अब मुझे उसके यहां रहने पर कोई एतराज़ नहीं था। ऐसा शायद इस लिए क्योंकि अब वो मेरी अनुराधा के लिए कुछ अच्छा करने में मेरी मदद करने वाली थी।

"ठीक है।" फिर मैंने धीमें स्वर में कहा____"लेकिन मेरे साथ तुम्हारा यहां रहना क्या उचित होगा? मेरा मतलब है कि क्या तुम्हारे घर वाले इसके लिए मानेंगे?"

"क्यों नहीं मानेंगे?" रूपा ने राहत की सांस लेते हुए कहा____"भला उन्हें इससे क्या आपत्ति हो सकती है? तुम कोई ग़ैर थोड़ी ना हो। उनके होने वाले दामाद हो और सबसे बड़ी बात मेरी जान हो, मेरा सब कुछ हो तुम। अगर उन्हें इस बात से इंकार भी होता तब भी मैं तुम्हारे साथ ही रहती, आख़िरी सांस तक।"

रूपा की आंखों में असीमित प्रेम और अपने प्रति दीवानगी देख मेरे समूचे जिस्म में झुरझुरी सी दौड़ गई। समझ में न आया कि क्या कहूं? वो कुछ देर मेरी तरफ देखती रही उसके बाद हल्के से मुस्कुराते हुए और मेरा हाथ वैसे ही पकड़े मकान के अंदर की तरफ चल पड़ी।

शेरा जो समान ले कर आया था उसे सलीके से ही रख दिया गया था लेकिन फिर भी हर सामान को उसकी उचित जगह पर रखना ज़रूरी था। अब क्योंकि हर सामान आ गया था और मेरे साथ रूपा को भी यहीं रहना था इस लिए हर चीज़ को उचित ढंग से रखना जैसे ज़रूरी हो गया था। मैं अगर अकेला ही यहां रहता तो यकीनन मुझे किसी चीज़ से कोई मतलब नहीं रहना था।

बेमन से ही सही लेकिन रूपा के ज़ोर देने पर मुझे सारे सामान को उसकी बताई हुई जगह पर रखने में लग जाना पड़ा। वो ख़ुद भी मेरे साथ लग गई थी। कुछ ही देर में अंदर का मंज़र अलग सा नज़र आने लगा मुझे। मैंने देखा रूपा एक तरफ रसोई का निर्माण करने में लगी हुई थी जिसमें एक अधेड़ उमर का आदमी उसकी मदद कर रहा था। वो आदमी बाहर से ईंटें ले आया था और उससे चूल्हे का निर्माण कर रहा था। दूसरी तरफ रूपा रसोई का सामान दीवार में बनी छोटी छोटी अलमारियों में सजा रही थी। ये देख मुझे बड़ा अजीब सा महसूस हुआ लेकिन मैंने कहा कुछ नहीं और बाहर निकल गया।

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Main is story jald se jald complete kar Dena chahta hu aur isi liye daily do update deta hu...aur ye kram tab tak chalega jab tak story end nahi ho jati :declare:

Baad ka kisne dekha hai dost...

Jab running story par log chupchap padh ke nikal lete hain to complete hone ke baad kya hi koi review dene aayega. Aisa bhi nahi hai ki maine iske pahle koi story complete nahi ki hai...aur tab se dekh hi raha hu ki complete stories ko read karne ke baad log kitna reviews dete hain...

Isi liye kaha ki baad me kisi se koi ummid nahi hai mujhe. Main sirf ye chahta hu jab tak ye story chal rahi hai tab tak aap meri khushi ke liye apne vichaar byakt karte rahe....Bata hi chuka hu ye meri last story hai aur iske baad shayad hi kabhi aaunga yahan. Isi liye us post ko sticky kar diya hai aur apni baat kah di hai....

Job to main bhi karta hu dost....Iske baavjood is story ke update likhe aur ise complete kiya. Agar job karne ke baad bhi main time nikaal kar story ke update likh kar post kar sakta hu to main ye bhi samajhta hu ki read karne wala bhi itna time nikaal kar apne vichaar byakt kar sakta hai....
 
Forum par bana rahuga to likhne se rok nahi paauga khud ko. Kuch baate aisi hain jinhe main kisi se share nahi kar sakta....bas itna hi kahunga ki ab is abhaasi sansaar se mukt ho kar apne jeewan me khushi khojna chahta hu. Pichhle kuch saalo se zindagi jaise rooth si gai hai, khushiyo ko mahsoos kiye arsha guzar gaya hai. Is liye ab shaanti se ya to kahin baith jana chhata hu ya fir kahi kho jana chahta hu....
 
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