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अध्याय - 116
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ललिता देवी को अपने कमरे में आया देख रूपा चौंकी। पिछले कुछ समय से ललिता देवी अपनी बेटी से थोड़ा नम्र भाव से बातें करने लगीं थी वरना इसके पहले वो हमेशा ही उसे खरी खोटी सुनाते हुए उस पर लानत भेजती रहीं थी। रूपा अपनी मां द्वारा डांट पड़ने से और लानत भेजने से बहुत दुखी हो जाया करती थी और फिर अकेले में खूब रोती थी। उसने प्रेम के चलते अपना सब कुछ वैभव को क्या सौंप दिया था जैसे बहुत भयंकर गुनाह हो गया था उससे। घर का कोई भी सदस्य उससे ढंग से बात करने की तो दूर कोई उसकी तरफ देखना तक गवारा नहीं करता था।
उसके ताऊ यानि मणि शंकर की बेटियां जो उससे उमर में बड़ी थीं वो उससे कभी बात नहीं करती थीं। इतने बड़े परिवार के इतने सारे लोगों के बीच वो एकदम से अकेली हो गई थी। सिर्फ एक ही शख़्स था जो उससे बातें करता था और उसे समझता था। यानि उसके ताऊ की बहू कुमुद जोकि उसको अपनी सहेली भी मानती थी किंतु उसने भी उस दिन उससे मुंह मोड़ लिया था जिस दिन दादा ठाकुर द्वारा घर के सभी मर्दों और लड़कों को मार दिया गया था। किसी और की करनी की सज़ा उसे मिल गई थी। रूपा को बाकी किसी से इतनी शिकायत नहीं थी जितनी कि उसे जन्म देने वाली अपनी मां से थी। ऐसा नहीं था कि वो खुद को दोष नहीं देती थी लेकिन वो ये भी सोचती थी कि इसके लिए क्या उसे इतना बड़ा दंड मिलना चाहिए था?
ख़ैर वक्त बदला, हालात बदले और अब सब कुछ सामान्य सा हो गया था। ललिता देवी ने जब पहली बार रूपा से थोड़ा नम्रता से बात की तो उसे पहले तो यकीन ही नहीं आया लेकिन फिर उसे ऐसी खुशी महसूस हुई जैसे दुनिया की सबसे बड़ी सौगात मिल गई हो। तड़प कर वो अपनी मां के सीने से लिपट जाना चाहती थी और जी भर के रो लेना चाहती थी। जैसे ही उसने ऐसा करने की कोशिश की तो ललिता देवी ने हाथ दिखा कर उसे रोक दिया था। ये देख रूपा को झटका लगा था। उसका जी चाहा था कि फूट फूट कर रो पड़े लेकिन फिर बड़ी मुश्किल से उसने अपनी भावनाओं को सम्हाला था। ज़हन में बस यही सवाल उभरा था कि क्या कोई मां इतनी कठोर हो सकती है?
"खुश तो बहुत होगी ना तू?" ललिता देवी ने रूपा की तरफ देखते हुए निर्विकार भाव से ब्यंग्य सा किया____"आख़िर सब कुछ तेरे मन का जो हो रहा है।"
अपनी मां की ये बात सुन कर पलक झपकते ही रूपा की आंखें भर आईं। पहले से ही दुखी हृदय और भी ज़्यादा घायल हो गया। ऐसा लगा जैसे पिघलता हुआ कांच कांनों से होते हुए सीधा दिल में पहुंच गया हो। रूपा ने आंखें बंद कर के अपने अंदर बुरी तरह मचल उठे जज़्बातों को काबू करने की कोशिश की।
"ख़ैर।" ललिता देवी ने कहा____"मैं ये कहने आई थी कि कल सुबह तैयार रहना। तेरा जो भी अपना समान हो उसे एक थैले में डाल लेना। रूपचंद्र सुबह तुझे उसके पास छोड़ आएगा जिसको तूने प्रेम में पड़ कर पहले ही सब कुछ सौंप दिया है।"
इस बार लाख कोशिशों के बाद भी रूपा अपनी आंखें छलक पड़ने से रोक न पाई। चेहरे पर अथाह पीड़ा के भाव नुमायां हो उठे। दिल में ही नहीं बल्कि समूचे जिस्म में शूल चुभते महसूस हुए उसे।
"अगर मैं आप सबकी नज़र में इतनी ही बुरी हूं मां।" फिर उसने रुंधे हुए गले से कहा____"तो क्यों मुझे अब तक ज़िंदा रखा हुआ है? मैंने अगर इस परिवार की इज्ज़त और मान मर्यादा को मिट्टी में ही मिला दिया है तो क्यों मुझे जीवित रखा हुआ है आप लोगों ने? अगर मुझे जान से मार नहीं सकते तो बस एक बार अपने मुंह से कह दो मैं खुद अपनी जान दे दूंगी और आप सबको हर दुख से मुक्ति मिल जाएगी।"
"बकवास मत कर।" ललिता देवी ने सख़्त नज़रों से घूरते हुए कहा____"मुझे तेरा ये रोना धोना और तेरी ये बेहूदा बातें नहीं सुननी हैं। तू मेरी कोख का कलंक है। तूने जो किया है उसके लिए मैं तुझे कभी माफ़ नहीं करूंगी।"
"वाह! बहुत खूब।" दरवाज़े से रूपचंद्र की आवाज़ आई तो ललिता देवी चौंकते हुए पीछे पलटीं। उधर रूपचंद्र कमरे के अंदर दाखिल होते हुए बोला____"धन्य हो मेरी माता धन्य हो। ईश्वर करे हर संतान को आपके जैसी मां दे।"
"क्या बक रहा है तू?" ललिता देवी ने गुस्से से कहा____"और ये किस लहजे में बात कर रहा है तू अपनी मां से?"
"मां से???" रूपचंद्र के चेहरे पर एकाएक हिकारत के भाव उभर आए, बोला____"क्या आप अपने बारे में कह रहीं हैं ललिता देवी? न न चौंकिए मत....मैं अब आपको ललिता देवी ही कहूंगा क्योंकि जो औरत अपनी बेटी को न समझे और उससे इस तरीके से बात करे कि बेटी का हृदय हाहाकार कर उठे वो औरत किसी की मां नहीं हो सकती। उस औरत को मां कहना ही नहीं चाहिए।"
"ख़ामोश।" ललिता देवी गुस्से में चीख पड़ी____"तेरी हिम्मत कैसे हुई अपनी मां को ऐसा बोलने की?"
"और आपकी हिम्मत कैसे हुई मेरी बहन को बुरा भला कहने की?" रूपचंद्र उससे भी ज़्यादा ज़ोर से दहाड़ा। गुस्से से तमतमा गया था वो, बोला____"आख़िर ऐसा कौन सा गुनाह कर दिया है इसने जिसके लिए आज इतने समय से आप सब इसे प्रताड़ित करते आ रहे हैं? प्रेम ही तो किया है इसने। किसी एक व्यक्ति को ही तो अपना सब कुछ मान लिया है इसने तो कौन सा पाप कर दिया है? अगर उसका ऐसा करना पाप है तो उससे ज़्यादा पाप मैंने किए हैं। मुझे भी इसके जैसे प्रताड़ित कीजिए लेकिन नहीं, कोई मुझे क्यों प्रताड़ित करेगा? मैं तो लड़का हूं ना, घर का मर्द हूं ना। मर्द एक नहीं दो नहीं बल्कि हज़ारों औरतों से संबंध बनाए रखे तो वो पाप नहीं कहलाता मगर....लड़की....लड़की जात अगर किसी एक व्यक्ति से प्रेम कर ले और उसे अपना सब कुछ मान कर उसे अपना सब कुछ दे दे तो वो पाप हो जाता है। वो लड़की चरित्रहीन हो जाती है और उसकी अपनी मां उसे ऐसे ऐसे शब्दों के बाण चला कर उसका दिल दुखाती है कि लड़की तड़प कर ही मर जाए।"
"भ...भैया चुप हो जाइए।" रूपा बीच में ही बोल पड़ी____"मां को ऐसा कहना शोभा नहीं देता आपको।"
"मुझे बोलने दे रूपा।" रूपचंद्र ने सहसा आहत हो कर कहा____"तेरे खातिर जो आवाज़ मुझे पहले उठानी चाहिए थी वो आज उठाने से मत रोक मुझे। मुझे तो ये सोच सोच कर ग्लानि होती है कि इसके पहले मैं ऐसी मानसिकता का शिकार क्यों था कि तुझे समझ न सका? सबकी तरह मैंने भी तो तेरा बहुत दिल दुखाया है मेरी बहन। भगवान का शुक्र है कि उसने वक्त रहते मुझे सद्बुद्धि दे दी और मुझे तेरी अच्छाईयों का और तेरे प्रेम का एहसास करवा दिया। लेकिन ये लोग अभी भी तुझे ग़लत समझते हैं। ये लोग अभी भी खुद को पाक साफ समझते हैं।"
"भगवान के लिए भैया।" रूपा ने मिन्नत की____"किसी को कुछ मत कहिए।"
"ये लोग तुझे चुप करा सकते हैं रूपा लेकिन मुझे नहीं।" रूपचंद्र जैसे पूरे जलाल पर था____"और ना ही मैं चुप होने वाला इंसान हूं। बहुत दिनों से इन लोगों का तमाशा देख रहा हूं मैं। इन लोगों का ज़ोर सिर्फ तुझ पर चलता है बाकी इनके बस का कुछ नहीं रहा अब। ख़ैर किसी और को क्या कहूं? सबसे ज़्यादा दुख तो इस बात का है कि जिसने तुझे जन्म दिया उसे ही अपनी बेटी के दिल पर नश्तर चलाने में ज़रा भी संकोच नहीं होता। सुना है मां और बेटी के बीच ऐसा गहरा संबंध होता है कि दोनों एक दूसरे को बिना कुछ कहे एक दूसरे के अंदर का मर्म समझ लेती हैं लेकिन यहां तो दूर दूर तक ऐसा कुछ है ही नहीं। इतना कुछ हो जाने के बाद भी इन्हें ये एहसास नहीं हुआ कि जिस बेटी के हृदय में ये नश्तर चला रही हैं उसी बेटी के प्रेम की वजह से आज हम दुबारा लोगों के बीच सिर उठा कर चलने के क़ाबिल बनने वाले हैं। इन्हें ये एहसास नहीं है कि जिस बेटी पर ये अब तक लानत भेजती आईं हैं उसी बेटी के प्रेम की वजह से इस घर की दूसरी बेटियों का भविष्य उज्ज्वल होगा।"
"य...ये सब आप क्या कह रहे हैं भैया?" रूपा कांपते स्वर में बोली। वो बेहद घबराई हुई नज़र आ रही थी। बार बार अपनी मां को भी देख रही थी वो।
"मैं एक ऐसा सच कह रहा हूं मेरी बहन।" रूपचंद्र ने दो टूक भाव से कहा____"जिसे ये लोग जानते तो हैं मगर हजम नहीं कर पा रहे हैं। झूठा मान गुमान अभी भी इनके अंदर घर बनाए बैठा हुआ है। इन्हें आज की वास्तविकता दिखती तो है लेकिन ये उसे मानने से इंकार कर रहे हैं। ख़ैर छोड़ो, सच तो ये है मेरी बहन कि ये परिवार और परिवार के ये सब लोग तेरे लायक हैं ही नहीं। तू तो चमकता हुआ एक नगीना है जिसे इस घर में नहीं बल्कि एक ऐसे घर में होना चाहिए जहां के लोग तेरी सच्चे दिल से क़दर करें। आज ललिता देवी ने जिस तरह अपनी बातों से तेरा दिल दुखाया है उससे मेरा भी मन दुखी हो गया है। मैंने फ़ैसला कर लिया है कि जहां मेरी बहन रहेगी वहीं मैं रहूंगा। सारी उमर तेरे के साथ रहूंगा और तेरा ख़याल रखूंगा। कल सुबह हम दोनों इस घर से हमेशा के लिए चले जाएंगे।"
"न....नहीं।" ललिता देवी भयभीत सी हो कर चीख पड़ीं। भाग कर वो रूपचंद्र के पास आईं और फिर रोते हुए बोलीं____"ये तू कैसी बातें कर रहा है बेटा? तू....तू अपनी मां को छोड़ के कैसे चला जाएगा यहां से? नहीं नहीं, मैं तुझे कहीं नहीं जाने दूंगी। मुझे माफ़ कर दे। पढ़ी लिखी नहीं हूं ना इस लिए मुझमें रत्ती भर का भी दिमाग़ नहीं है। तू मेरी बातों को भुला दे बेटा।"
"नहीं ललिता देवी।" रूपचंद्र ने सपाट लहजे में कहा____"जिस औरत के दिल में मेरी बहन के लिए कोई लगाव, कोई इज्ज़त और कोई क़दर नहीं उस औरत को मुझे बेटा कहने का कोई अधिकार नहीं है।"
"न...नहीं ऐसा मत बोल मेरे लाल।" ललिता देवी आहत भाव से बोलीं____"मैंने कहा न कि मुझसे भूल हो गई है। मेरा यकीन कर, अब से मैं किसी को कुछ नहीं कहूंगी।"
"कैसे यकीन करूं?" मैंने कहा____"अगर आपको अपनी भूल का एहसास हो गया होता तो इस वक्त आप मुझसे नहीं बल्कि मेरी बहन से माफ़ी मांगती और सच्चे दिल से अपनी बेटी को स्नेह और प्यार देते हुए उसे अपने कलेजे से लगा लेती। मगर नहीं, आपको तो सिर्फ अपने बेटे से मतलब है। आप नहीं चाहती कि आपका बेटा आपको और इस घर को छोड़ कर कहीं चला जाए। मतलब साफ है कि अभी भी आपको अपनी बेटी से और उसकी किसी बात से कोई मतलब नहीं है।"
"नहीं नहीं, ऐसी बात नहीं है रूप बेटा।" ललिता देवी हड़बड़ा कर बोलीं____"रूपा मेरी बेटी है और मैं उससे भी उतना ही प्यार करती हूं जितना कि तुझसे।"
"तो फिर साबित कीजिए।" रूपचंद्र ने कहा____"मुझे दिखाइए कि आप अपनी बेटी से कितना प्यार करती हैं और उसकी कितनी क़दर करती हैं।"
ललिता देवी अपने बेटे की बात सुन कर झट से रूपा के पास गई और उससे बोलीं____"मुझे माफ़ कर दे मेरी बच्ची। मैंने सच में तुझे हमेशा ग़लत ही समझा है। अपनी बातों से तेरा बहुत दिल दुखाया है मैंने। ईश्वर किसी बेटी को मेरे जैसी मां न दे।"
"नहीं मां।" रूपा बुरी तरह तड़प कर अपनी मां से लिपट गई, बोली____"ऐसा कभी मत कहना। मैं ईश्वर से यही प्रार्थना करती हूं कि मुझे हर जन्म में आप ही मां के रूप में मिलें।"
रूपा की ये बात सुन कर ललिता देवी की आंखें छलक पड़ीं। उन्होंने कस कर रूपा को अपने कलेजे से लगा लिया। कुछ दूरी पर खड़ा रूपचंद्र नम आंखों से ये अनोखा मंज़र देख रहा था। उसके चेहरे पर एक अलग ही तरह की खुशी की चमक दिखने लगी थी। एक ऐसा सुकून महसूस हो रहा था उसे जिससे उसे परम संतुष्टि सी हो गई थी। ऐसा लग रहा था जैसे उसने कोई बहुत बड़ा काम कर दिया था। इधर मां बेटी काफी देर तक एक दूसरे से लिपटी आंसू बहाती रहीं। फिर दोनों अलग हुईं और एक दूसरे के आंसू पोछने लगीं।
दरवाज़े के बाहर कुछ लोगों की मौजूदगी का रूपचंद्र को एहसास हुआ तो उसने पलट कर उस तरफ देखा। उसकी दोनों भाभियां और बहनें दरवाज़े की ओट में खड़ी थीं। उन सबकी आंखों में आंसू दिखाई दे रहे थे। उन्हें इस तरह खड़े देख एकाएक रूपचंद्र के चेहरे पर गुस्से के भाव उभर आए।
"क्या यहां पर कोई तमाशा हो रहा है जिसे आप सब यहां चुपचाप खड़ी देख रहीं हैं?" फिर उसने लगभग ऊंची आवाज़ में उनके क़रीब जा कर कहा____"दफा हो जाओ यहां से वरना मुझसे बुरा कोई नहीं होगा।"
रूपचंद्र गुस्से से दहाड़ा तो जहां एक तरफ दरवाज़े के बाहर खड़ी वो लोग बहुत ज़्यादा घबरा गईं वहीं दूसरी तरफ ललिता और रूपा ने चौंक कर रूपचंद्र की तरफ देखा।
"क...क्या हुआ बेटा?" फिर ललिता देवी ने फ़ौरन ही चिंतित भाव से उससे पूछा____"किसे दफा हो जाने को बोल रहा है तू और...और इतना गुस्से में क्यों नज़र आ रहा है तू?"
"गुस्से में नज़र ना आऊं तो क्या करूं?" उसने आवेश में आ कर कहा____"ये सब यहां खड़ी चुपचाप तमाशा देख रही हैं। ये वो लोग हैं मां जो कहने को तो इस घर की बहू बेटियां हैं लेकिन बहू बेटियों जैसा कोई काम नहीं किया है इन्होंने।"
"अरे! ये क्या बोले जा रहा है तू?" ललिता देवी के चेहरे पर आश्चर्य के भाव उभर आए____"तेरा दिमाग़ तो ठीक है ना? ये क्या अनाप शनाप बोले जा रहा है तू?"
"मैं अनाप शनाप नहीं बोल रहा मां।" रूपचंद्र ने कहा____"बल्कि इनकी सच्चाई बता रहा हूं। जैसे अब तक आप अपनी बेटी को दुश्मन की नज़र से देखती आ रहीं थी वैसे ही ये सब मेरी बहन को अपना सबसे बड़ा दुश्मन समझती रही हैं। इनमें से किसी ने भी रूपा से बात करना तो दूर उसकी तरफ देखना तक गवारा नहीं किया था। इतना कंजर तो कोई दुश्मन भी नहीं होता जितना कि ये सब हैं।"
रूपचंद्र की बातें सुन कर उन सबने शर्म से सिर झुका लिया। उन सबके चेहरों से साफ नज़र आ रहा था कि वो अपने किए पर शर्मिंदा हैं। इधर कमरे में पलंग पर बैठी रूपा अपने भाई को देखते हुए ये सोच कर खुशी से गदगद हुई जा रही थी कि उसके रूप भैया आज सबसे उसके ऊपर किए गए दुर्ब्यौहार का बदला ले रहे हैं और सबको खरी खोटी सुना रहे हैं। जाने क्यों इस सबसे रूपा को एक असीम सुख और शांति का आभास होने लगा था।
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भाभी मेरे पास आ कर मेरे बगल से ही कच्ची ज़मीन पर बैठ गईं थी। हम दोनों की आंखों के सामने लगभग तीन क़दम की दूरी पर अनुराधा की चिता थी जहां पर अब जली हुई राख तो थी किंतु वो भी चिता के चारो तरफ दूर दूर थोड़ा थोड़ा पड़ी हुई नज़र आती थी। ऐसा इस लिए क्योंकि चिता के बीच में गोबर से लीप दिया गया था। उसमें अब सूखे हुए कुछ फूल ही पड़े दिख रहे थे जो अब लगभग मुरझा गए थे। कुछ दिन पहले तक उसमें कुछ अनाज के दाने भी पड़े हुए दिखते थे किंतु चिड़ियों ने उन्हें चुग लिया था।
मैं हर रोज़ उसी चिता को अपलक देखते हुए बैठा रहता था और अपनी समझ में अपनी अनुराधा से बातें करता रहता था। जबकि सच तो यही था कि मैं खुद ही बड़बड़ाता रहता था। न वहां पर कोई मेरी बातें सुनता था और ना ही मेरी अनुराधा मेरी किसी बात का कभी कोई जवाब देती थी। जवाब तो वो तब दे जब वो वहां पर कहीं हो।
"आप मां के साथ गईं नहीं?" एकाएक जब मेरी नज़र भाभी पर पड़ी तो मैंने उनसे निर्विकार भाव से पूछा____"और...और यहां इस तरह क्यों बैठ गईं हैं? आप जाइए यहां से, मुझे अकेले में अपनी अनुराधा से अभी बहुत सारी बातें करनी है।"
"मुझे भी उससे ढेर सारी बातें करनी है।" भाभी ने एक नज़र मेरी तरफ देखने के बाद कहा____"आख़िर वो मेरी भी तो छोटी बहन थी। क्या तुम मुझे मेरी छोटी बहन से बातें नहीं करने दोगे?"
"ह...हां हां क्यों नहीं।" मैं एकदम से बोल पड़ा____"मुझे माफ़ कर दीजिए। आप सही कह रही हैं। आपको अपनी छोटी बहन से ज़रूर बात करनी चाहिए। आप उससे बात कीजिए भाभी। शायद वो आपको ही कोई जवाब दे, मुझे तो वो कोई जवाब ही नहीं देती है। पता नहीं क्यों इतना नाराज़ हो गई है मुझसे?"
कहने के साथ ही मेरी आवाज़ भर्रा गई और आंखों से आंसू छलक पड़े। भाभी ने मेरी तरफ देखा और फिर अपना एक हाथ मेरे पीछे से बढ़ा कर मेरा बाजू पकड़ते हुए खुद से छुपका लिया।
"वो तुमसे नाराज़ नहीं हुई है वैभव।" भाभी ने बड़े प्यार से समझाते हुए कहा____"बल्कि मैं तो ये कहूंगी कि वो तुमसे नाराज़ हो ही नहीं सकती। तुम उसे इतना प्रेम करते हो कि वो एक पल के लिए भी तुमसे नाराज़ नहीं हो सकती।"
"तो फिर वो मुझसे बात क्यों नहीं करती भाभी?" मैंने दुखी हो कर कहा____"उससे कहिए न कि एक बार मुझे अपनी आवाज़ सुना दे। सिर्फ एक बार, हां भाभी बस एक बार अपने मुख से मेरा नाम ले कर मुझे पुकारे। बदले में मैं भी उसे ठकुराईन कहूंगा। आपको पता है उसे मेरे मुंह से अपने लिए ठकुराईन सुनना बहुत अच्छा लगता था। आप उससे कहिए न कि वो मुझे एक बार अपनी आवाज़ सुना दे।"
मेरा इतना कहना था कि भाभी ने तड़प कर मुझे और भी ज़्यादा खुद से छुपका लिया। उनकी आंखों से आंसू छलक पड़े थे। अपनी रुलाई को बड़ी मुश्किल से रोका हुआ था उन्होंने।
"अगर ये संभव होता तो मैं ज़रूर उससे कहती वैभव।" फिर उन्होंने गंभीरता से कहा____"और वो भी ज़रूर अपनी आवाज़ तुम्हें सुनाती लेकिन ये तो ऐसी बातें हैं जो कभी संभव ही नहीं हो सकतीं। अगर ऐसा होता तो क्या मैं एक बार भी तुम्हारे भैया की आवाज़ न सुन पाती? आज भी अकेले में उन्हें आवाज़ देती हूं और उनसे फ़रियाद करती हूं कि सिर्फ एक बार मेरे ख़वाब में ही आ कर मुझे अपनी सूरत दिखा दें लेकिन वो कभी ऐसा नहीं करते। जानते हो वैभव वो ऐसा क्यों नहीं करते?"
"क..क्यों नहीं करते भाभी?" मैंने उनसे अलग हो कर उनकी तरफ देखा।
"क्योंकि वो बहुत दूर जा चुके हैं।" भाभी ने उसी गंभीरता से कहा____"एक ऐसी जगह जहां से मेरे ख़्वाबों में आने के लिए उन्हें कोई रास्ता ही नहीं दिखता।"
"क्या सच में?" मैंने हैरानी से उन्हें देखा____"पर ऐसा क्यों भाभी? उन्हें रास्ता क्यों नहीं दिखता?"
"ईश्वर ही जाने।" भाभी ने गहरी सांस ली____"या फिर ऐसा हो सकता है कि सच में कोई रास्ता ही न हो। अगर होता तो क्या वो कभी मेरे ख़्वाबों में नहीं आ जाते? आख़िर वो भी तो मुझसे बहुत प्रेम करते थे। तुम्हारी अनुराधा भी शायद ऐसी ही जगह चली गई है जहां से ना तो वो तुम्हें आवाज़ दे सकती है और ना ही शायद वो कभी तुम्हारे ख़्वाबों में आ सकती है लेकिन....।"
"लेकिन??" मैंने उलझन पूर्ण भाव से देखा उन्हें।
"लेकिन इसके बावजूद तुम उसे अपने बहुत पास महसूस कर सकते हो।" भाभी ने कहा____"तुम जिस जगह पर भी रहोगे वहां से भी उसे अपने पास ही महसूस कर सकते हो।"
"वो कैसे?" मैंने हैरानी से उनकी तरफ देखा।
"अपने दिल पर हाथ रख कर और आंखें बंद कर के जब भी उसका नाम लोगे तो वो तुम्हें अपनी मौजूदगी का आभास कराएगी।" भाभी ने रहस्यपूर्ण भाव से कहा____"तुम्हारे दिल की हर धड़कन में तुम्हें उसकी मौजूदगी का आभास होगा।"
भाभी ने इतना कहा ही था कि मैंने फ़ौरन ही अपना हाथ अपने दिल पर रख कर अपनी आंखें बंद कर ली। मन ही मन अनुराधा का नाम लिया और फिर उसे महसूस करने लगा। कुछ ही देर में मेरे होठों पर हल्की मुस्कान उभर आई। मुझे ऐसा प्रतीत हुआ जैसे सच में मेरी अनुराधा मेरे दिल की हर धड़कन में मौजूद है। बंद पलकों में अचानक उसका ऐसा अक्श उभर आया था जिसमें उसके चेहरे पर शर्म भी थी और मुस्कान भी। अपनी बन्द पलकों में अनुराधा को देख कर मेरी खुशी की कोई सीमा ना रही।
जाने कितनी ही देर तक मैं आंखें बंद किए और दिल पर अपना हाथ रखे बैठा रहा। मन कर रहा था कि अब यूं ही उमर भर आंखें बंद किए बैठा रहूं मगर तभी भाभी की आवाज़ से मैं उस खुशी रूपी समंदर से बाहर आ गया। आंखें खोल कर भाभी की तरफ देखा तो वो मुझे ही देख रहीं थी। एकाएक मुझे जाने क्या हुआ कि मैं लपक कर भाभी से लिपट गया।
"आपने बिल्कुल सच कहा था भाभी।" फिर मैं उनसे लिपटे हुए ही खुशी से बोल पड़ा____"मैंने सच में अपनी अनुराधा को महसूस किया और पता है....मैंने अनुराधा को भी देखा। वो मुझे देख के मुस्कुरा रही थी भाभी।"
"फिर तो ये अच्छी बात है ना?" भाभी ने मेरी पीठ पर प्यार से हाथ फेरते हुए कहा____"अब तुम जब चाहोगे तब अपनी अनुराधा को महसूस भी कर सकोगे और उसे देख भी सकोगे।"
"हां भाभी।" मैंने उनसे अलग हो कर बोला____"अब तो मैं हर रोज़ हर पल उसे महसूस करूंगा और देखूंगा भी।"
"ठीक है जैसी तुम्हारी इच्छा।" भाभी ने कहा____"अच्छा अब घर चलो। देखो शाम होने वाली है।"
"हां ठीक है।" मैं फ़ौरन उठ कर खड़ा हो गया।
भाभी ग़ौर से मुझे देख रहीं थी। शायद वो ये समझने की कोशिश कर रहीं थी कि अब मेरी मानसिक हालत कैसी है? मैं पहले की अपेक्षा थोड़ा बेहतर महसूस कर रहा था क्योंकि इतने दिनों बाद मैंने अपनी अनुराधा को महसूस किया था। इस लिए मुझे एक अलग ही खुशी का आभास हो रहा था। ख़ैर जल्दी ही मैं और भाभी मकान के पास आ गए।
मोटर साइकिल को स्टार्ट कर के मैंने भाभी को पीछे बैठाया और फिर चल पड़ा। ठंडी हवा चेहरे से टकराई तो एक अलग ही सुकून महसूस हुआ। रास्ते में भाभी मुझसे कई तरह की बातें करती रहीं। वो महसूस करना चाहती थीं कि मेरी हालत में कितना सुधार हुआ है। ख़ैर कुछ ही समय में हम दोनों हवेली पहुंच गए।
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ललिता देवी को अपने कमरे में आया देख रूपा चौंकी। पिछले कुछ समय से ललिता देवी अपनी बेटी से थोड़ा नम्र भाव से बातें करने लगीं थी वरना इसके पहले वो हमेशा ही उसे खरी खोटी सुनाते हुए उस पर लानत भेजती रहीं थी। रूपा अपनी मां द्वारा डांट पड़ने से और लानत भेजने से बहुत दुखी हो जाया करती थी और फिर अकेले में खूब रोती थी। उसने प्रेम के चलते अपना सब कुछ वैभव को क्या सौंप दिया था जैसे बहुत भयंकर गुनाह हो गया था उससे। घर का कोई भी सदस्य उससे ढंग से बात करने की तो दूर कोई उसकी तरफ देखना तक गवारा नहीं करता था।
उसके ताऊ यानि मणि शंकर की बेटियां जो उससे उमर में बड़ी थीं वो उससे कभी बात नहीं करती थीं। इतने बड़े परिवार के इतने सारे लोगों के बीच वो एकदम से अकेली हो गई थी। सिर्फ एक ही शख़्स था जो उससे बातें करता था और उसे समझता था। यानि उसके ताऊ की बहू कुमुद जोकि उसको अपनी सहेली भी मानती थी किंतु उसने भी उस दिन उससे मुंह मोड़ लिया था जिस दिन दादा ठाकुर द्वारा घर के सभी मर्दों और लड़कों को मार दिया गया था। किसी और की करनी की सज़ा उसे मिल गई थी। रूपा को बाकी किसी से इतनी शिकायत नहीं थी जितनी कि उसे जन्म देने वाली अपनी मां से थी। ऐसा नहीं था कि वो खुद को दोष नहीं देती थी लेकिन वो ये भी सोचती थी कि इसके लिए क्या उसे इतना बड़ा दंड मिलना चाहिए था?
ख़ैर वक्त बदला, हालात बदले और अब सब कुछ सामान्य सा हो गया था। ललिता देवी ने जब पहली बार रूपा से थोड़ा नम्रता से बात की तो उसे पहले तो यकीन ही नहीं आया लेकिन फिर उसे ऐसी खुशी महसूस हुई जैसे दुनिया की सबसे बड़ी सौगात मिल गई हो। तड़प कर वो अपनी मां के सीने से लिपट जाना चाहती थी और जी भर के रो लेना चाहती थी। जैसे ही उसने ऐसा करने की कोशिश की तो ललिता देवी ने हाथ दिखा कर उसे रोक दिया था। ये देख रूपा को झटका लगा था। उसका जी चाहा था कि फूट फूट कर रो पड़े लेकिन फिर बड़ी मुश्किल से उसने अपनी भावनाओं को सम्हाला था। ज़हन में बस यही सवाल उभरा था कि क्या कोई मां इतनी कठोर हो सकती है?
"खुश तो बहुत होगी ना तू?" ललिता देवी ने रूपा की तरफ देखते हुए निर्विकार भाव से ब्यंग्य सा किया____"आख़िर सब कुछ तेरे मन का जो हो रहा है।"
अपनी मां की ये बात सुन कर पलक झपकते ही रूपा की आंखें भर आईं। पहले से ही दुखी हृदय और भी ज़्यादा घायल हो गया। ऐसा लगा जैसे पिघलता हुआ कांच कांनों से होते हुए सीधा दिल में पहुंच गया हो। रूपा ने आंखें बंद कर के अपने अंदर बुरी तरह मचल उठे जज़्बातों को काबू करने की कोशिश की।
"ख़ैर।" ललिता देवी ने कहा____"मैं ये कहने आई थी कि कल सुबह तैयार रहना। तेरा जो भी अपना समान हो उसे एक थैले में डाल लेना। रूपचंद्र सुबह तुझे उसके पास छोड़ आएगा जिसको तूने प्रेम में पड़ कर पहले ही सब कुछ सौंप दिया है।"
इस बार लाख कोशिशों के बाद भी रूपा अपनी आंखें छलक पड़ने से रोक न पाई। चेहरे पर अथाह पीड़ा के भाव नुमायां हो उठे। दिल में ही नहीं बल्कि समूचे जिस्म में शूल चुभते महसूस हुए उसे।
"अगर मैं आप सबकी नज़र में इतनी ही बुरी हूं मां।" फिर उसने रुंधे हुए गले से कहा____"तो क्यों मुझे अब तक ज़िंदा रखा हुआ है? मैंने अगर इस परिवार की इज्ज़त और मान मर्यादा को मिट्टी में ही मिला दिया है तो क्यों मुझे जीवित रखा हुआ है आप लोगों ने? अगर मुझे जान से मार नहीं सकते तो बस एक बार अपने मुंह से कह दो मैं खुद अपनी जान दे दूंगी और आप सबको हर दुख से मुक्ति मिल जाएगी।"
"बकवास मत कर।" ललिता देवी ने सख़्त नज़रों से घूरते हुए कहा____"मुझे तेरा ये रोना धोना और तेरी ये बेहूदा बातें नहीं सुननी हैं। तू मेरी कोख का कलंक है। तूने जो किया है उसके लिए मैं तुझे कभी माफ़ नहीं करूंगी।"
"वाह! बहुत खूब।" दरवाज़े से रूपचंद्र की आवाज़ आई तो ललिता देवी चौंकते हुए पीछे पलटीं। उधर रूपचंद्र कमरे के अंदर दाखिल होते हुए बोला____"धन्य हो मेरी माता धन्य हो। ईश्वर करे हर संतान को आपके जैसी मां दे।"
"क्या बक रहा है तू?" ललिता देवी ने गुस्से से कहा____"और ये किस लहजे में बात कर रहा है तू अपनी मां से?"
"मां से???" रूपचंद्र के चेहरे पर एकाएक हिकारत के भाव उभर आए, बोला____"क्या आप अपने बारे में कह रहीं हैं ललिता देवी? न न चौंकिए मत....मैं अब आपको ललिता देवी ही कहूंगा क्योंकि जो औरत अपनी बेटी को न समझे और उससे इस तरीके से बात करे कि बेटी का हृदय हाहाकार कर उठे वो औरत किसी की मां नहीं हो सकती। उस औरत को मां कहना ही नहीं चाहिए।"
"ख़ामोश।" ललिता देवी गुस्से में चीख पड़ी____"तेरी हिम्मत कैसे हुई अपनी मां को ऐसा बोलने की?"
"और आपकी हिम्मत कैसे हुई मेरी बहन को बुरा भला कहने की?" रूपचंद्र उससे भी ज़्यादा ज़ोर से दहाड़ा। गुस्से से तमतमा गया था वो, बोला____"आख़िर ऐसा कौन सा गुनाह कर दिया है इसने जिसके लिए आज इतने समय से आप सब इसे प्रताड़ित करते आ रहे हैं? प्रेम ही तो किया है इसने। किसी एक व्यक्ति को ही तो अपना सब कुछ मान लिया है इसने तो कौन सा पाप कर दिया है? अगर उसका ऐसा करना पाप है तो उससे ज़्यादा पाप मैंने किए हैं। मुझे भी इसके जैसे प्रताड़ित कीजिए लेकिन नहीं, कोई मुझे क्यों प्रताड़ित करेगा? मैं तो लड़का हूं ना, घर का मर्द हूं ना। मर्द एक नहीं दो नहीं बल्कि हज़ारों औरतों से संबंध बनाए रखे तो वो पाप नहीं कहलाता मगर....लड़की....लड़की जात अगर किसी एक व्यक्ति से प्रेम कर ले और उसे अपना सब कुछ मान कर उसे अपना सब कुछ दे दे तो वो पाप हो जाता है। वो लड़की चरित्रहीन हो जाती है और उसकी अपनी मां उसे ऐसे ऐसे शब्दों के बाण चला कर उसका दिल दुखाती है कि लड़की तड़प कर ही मर जाए।"
"भ...भैया चुप हो जाइए।" रूपा बीच में ही बोल पड़ी____"मां को ऐसा कहना शोभा नहीं देता आपको।"
"मुझे बोलने दे रूपा।" रूपचंद्र ने सहसा आहत हो कर कहा____"तेरे खातिर जो आवाज़ मुझे पहले उठानी चाहिए थी वो आज उठाने से मत रोक मुझे। मुझे तो ये सोच सोच कर ग्लानि होती है कि इसके पहले मैं ऐसी मानसिकता का शिकार क्यों था कि तुझे समझ न सका? सबकी तरह मैंने भी तो तेरा बहुत दिल दुखाया है मेरी बहन। भगवान का शुक्र है कि उसने वक्त रहते मुझे सद्बुद्धि दे दी और मुझे तेरी अच्छाईयों का और तेरे प्रेम का एहसास करवा दिया। लेकिन ये लोग अभी भी तुझे ग़लत समझते हैं। ये लोग अभी भी खुद को पाक साफ समझते हैं।"
"भगवान के लिए भैया।" रूपा ने मिन्नत की____"किसी को कुछ मत कहिए।"
"ये लोग तुझे चुप करा सकते हैं रूपा लेकिन मुझे नहीं।" रूपचंद्र जैसे पूरे जलाल पर था____"और ना ही मैं चुप होने वाला इंसान हूं। बहुत दिनों से इन लोगों का तमाशा देख रहा हूं मैं। इन लोगों का ज़ोर सिर्फ तुझ पर चलता है बाकी इनके बस का कुछ नहीं रहा अब। ख़ैर किसी और को क्या कहूं? सबसे ज़्यादा दुख तो इस बात का है कि जिसने तुझे जन्म दिया उसे ही अपनी बेटी के दिल पर नश्तर चलाने में ज़रा भी संकोच नहीं होता। सुना है मां और बेटी के बीच ऐसा गहरा संबंध होता है कि दोनों एक दूसरे को बिना कुछ कहे एक दूसरे के अंदर का मर्म समझ लेती हैं लेकिन यहां तो दूर दूर तक ऐसा कुछ है ही नहीं। इतना कुछ हो जाने के बाद भी इन्हें ये एहसास नहीं हुआ कि जिस बेटी के हृदय में ये नश्तर चला रही हैं उसी बेटी के प्रेम की वजह से आज हम दुबारा लोगों के बीच सिर उठा कर चलने के क़ाबिल बनने वाले हैं। इन्हें ये एहसास नहीं है कि जिस बेटी पर ये अब तक लानत भेजती आईं हैं उसी बेटी के प्रेम की वजह से इस घर की दूसरी बेटियों का भविष्य उज्ज्वल होगा।"
"य...ये सब आप क्या कह रहे हैं भैया?" रूपा कांपते स्वर में बोली। वो बेहद घबराई हुई नज़र आ रही थी। बार बार अपनी मां को भी देख रही थी वो।
"मैं एक ऐसा सच कह रहा हूं मेरी बहन।" रूपचंद्र ने दो टूक भाव से कहा____"जिसे ये लोग जानते तो हैं मगर हजम नहीं कर पा रहे हैं। झूठा मान गुमान अभी भी इनके अंदर घर बनाए बैठा हुआ है। इन्हें आज की वास्तविकता दिखती तो है लेकिन ये उसे मानने से इंकार कर रहे हैं। ख़ैर छोड़ो, सच तो ये है मेरी बहन कि ये परिवार और परिवार के ये सब लोग तेरे लायक हैं ही नहीं। तू तो चमकता हुआ एक नगीना है जिसे इस घर में नहीं बल्कि एक ऐसे घर में होना चाहिए जहां के लोग तेरी सच्चे दिल से क़दर करें। आज ललिता देवी ने जिस तरह अपनी बातों से तेरा दिल दुखाया है उससे मेरा भी मन दुखी हो गया है। मैंने फ़ैसला कर लिया है कि जहां मेरी बहन रहेगी वहीं मैं रहूंगा। सारी उमर तेरे के साथ रहूंगा और तेरा ख़याल रखूंगा। कल सुबह हम दोनों इस घर से हमेशा के लिए चले जाएंगे।"
"न....नहीं।" ललिता देवी भयभीत सी हो कर चीख पड़ीं। भाग कर वो रूपचंद्र के पास आईं और फिर रोते हुए बोलीं____"ये तू कैसी बातें कर रहा है बेटा? तू....तू अपनी मां को छोड़ के कैसे चला जाएगा यहां से? नहीं नहीं, मैं तुझे कहीं नहीं जाने दूंगी। मुझे माफ़ कर दे। पढ़ी लिखी नहीं हूं ना इस लिए मुझमें रत्ती भर का भी दिमाग़ नहीं है। तू मेरी बातों को भुला दे बेटा।"
"नहीं ललिता देवी।" रूपचंद्र ने सपाट लहजे में कहा____"जिस औरत के दिल में मेरी बहन के लिए कोई लगाव, कोई इज्ज़त और कोई क़दर नहीं उस औरत को मुझे बेटा कहने का कोई अधिकार नहीं है।"
"न...नहीं ऐसा मत बोल मेरे लाल।" ललिता देवी आहत भाव से बोलीं____"मैंने कहा न कि मुझसे भूल हो गई है। मेरा यकीन कर, अब से मैं किसी को कुछ नहीं कहूंगी।"
"कैसे यकीन करूं?" मैंने कहा____"अगर आपको अपनी भूल का एहसास हो गया होता तो इस वक्त आप मुझसे नहीं बल्कि मेरी बहन से माफ़ी मांगती और सच्चे दिल से अपनी बेटी को स्नेह और प्यार देते हुए उसे अपने कलेजे से लगा लेती। मगर नहीं, आपको तो सिर्फ अपने बेटे से मतलब है। आप नहीं चाहती कि आपका बेटा आपको और इस घर को छोड़ कर कहीं चला जाए। मतलब साफ है कि अभी भी आपको अपनी बेटी से और उसकी किसी बात से कोई मतलब नहीं है।"
"नहीं नहीं, ऐसी बात नहीं है रूप बेटा।" ललिता देवी हड़बड़ा कर बोलीं____"रूपा मेरी बेटी है और मैं उससे भी उतना ही प्यार करती हूं जितना कि तुझसे।"
"तो फिर साबित कीजिए।" रूपचंद्र ने कहा____"मुझे दिखाइए कि आप अपनी बेटी से कितना प्यार करती हैं और उसकी कितनी क़दर करती हैं।"
ललिता देवी अपने बेटे की बात सुन कर झट से रूपा के पास गई और उससे बोलीं____"मुझे माफ़ कर दे मेरी बच्ची। मैंने सच में तुझे हमेशा ग़लत ही समझा है। अपनी बातों से तेरा बहुत दिल दुखाया है मैंने। ईश्वर किसी बेटी को मेरे जैसी मां न दे।"
"नहीं मां।" रूपा बुरी तरह तड़प कर अपनी मां से लिपट गई, बोली____"ऐसा कभी मत कहना। मैं ईश्वर से यही प्रार्थना करती हूं कि मुझे हर जन्म में आप ही मां के रूप में मिलें।"
रूपा की ये बात सुन कर ललिता देवी की आंखें छलक पड़ीं। उन्होंने कस कर रूपा को अपने कलेजे से लगा लिया। कुछ दूरी पर खड़ा रूपचंद्र नम आंखों से ये अनोखा मंज़र देख रहा था। उसके चेहरे पर एक अलग ही तरह की खुशी की चमक दिखने लगी थी। एक ऐसा सुकून महसूस हो रहा था उसे जिससे उसे परम संतुष्टि सी हो गई थी। ऐसा लग रहा था जैसे उसने कोई बहुत बड़ा काम कर दिया था। इधर मां बेटी काफी देर तक एक दूसरे से लिपटी आंसू बहाती रहीं। फिर दोनों अलग हुईं और एक दूसरे के आंसू पोछने लगीं।
दरवाज़े के बाहर कुछ लोगों की मौजूदगी का रूपचंद्र को एहसास हुआ तो उसने पलट कर उस तरफ देखा। उसकी दोनों भाभियां और बहनें दरवाज़े की ओट में खड़ी थीं। उन सबकी आंखों में आंसू दिखाई दे रहे थे। उन्हें इस तरह खड़े देख एकाएक रूपचंद्र के चेहरे पर गुस्से के भाव उभर आए।
"क्या यहां पर कोई तमाशा हो रहा है जिसे आप सब यहां चुपचाप खड़ी देख रहीं हैं?" फिर उसने लगभग ऊंची आवाज़ में उनके क़रीब जा कर कहा____"दफा हो जाओ यहां से वरना मुझसे बुरा कोई नहीं होगा।"
रूपचंद्र गुस्से से दहाड़ा तो जहां एक तरफ दरवाज़े के बाहर खड़ी वो लोग बहुत ज़्यादा घबरा गईं वहीं दूसरी तरफ ललिता और रूपा ने चौंक कर रूपचंद्र की तरफ देखा।
"क...क्या हुआ बेटा?" फिर ललिता देवी ने फ़ौरन ही चिंतित भाव से उससे पूछा____"किसे दफा हो जाने को बोल रहा है तू और...और इतना गुस्से में क्यों नज़र आ रहा है तू?"
"गुस्से में नज़र ना आऊं तो क्या करूं?" उसने आवेश में आ कर कहा____"ये सब यहां खड़ी चुपचाप तमाशा देख रही हैं। ये वो लोग हैं मां जो कहने को तो इस घर की बहू बेटियां हैं लेकिन बहू बेटियों जैसा कोई काम नहीं किया है इन्होंने।"
"अरे! ये क्या बोले जा रहा है तू?" ललिता देवी के चेहरे पर आश्चर्य के भाव उभर आए____"तेरा दिमाग़ तो ठीक है ना? ये क्या अनाप शनाप बोले जा रहा है तू?"
"मैं अनाप शनाप नहीं बोल रहा मां।" रूपचंद्र ने कहा____"बल्कि इनकी सच्चाई बता रहा हूं। जैसे अब तक आप अपनी बेटी को दुश्मन की नज़र से देखती आ रहीं थी वैसे ही ये सब मेरी बहन को अपना सबसे बड़ा दुश्मन समझती रही हैं। इनमें से किसी ने भी रूपा से बात करना तो दूर उसकी तरफ देखना तक गवारा नहीं किया था। इतना कंजर तो कोई दुश्मन भी नहीं होता जितना कि ये सब हैं।"
रूपचंद्र की बातें सुन कर उन सबने शर्म से सिर झुका लिया। उन सबके चेहरों से साफ नज़र आ रहा था कि वो अपने किए पर शर्मिंदा हैं। इधर कमरे में पलंग पर बैठी रूपा अपने भाई को देखते हुए ये सोच कर खुशी से गदगद हुई जा रही थी कि उसके रूप भैया आज सबसे उसके ऊपर किए गए दुर्ब्यौहार का बदला ले रहे हैं और सबको खरी खोटी सुना रहे हैं। जाने क्यों इस सबसे रूपा को एक असीम सुख और शांति का आभास होने लगा था।
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भाभी मेरे पास आ कर मेरे बगल से ही कच्ची ज़मीन पर बैठ गईं थी। हम दोनों की आंखों के सामने लगभग तीन क़दम की दूरी पर अनुराधा की चिता थी जहां पर अब जली हुई राख तो थी किंतु वो भी चिता के चारो तरफ दूर दूर थोड़ा थोड़ा पड़ी हुई नज़र आती थी। ऐसा इस लिए क्योंकि चिता के बीच में गोबर से लीप दिया गया था। उसमें अब सूखे हुए कुछ फूल ही पड़े दिख रहे थे जो अब लगभग मुरझा गए थे। कुछ दिन पहले तक उसमें कुछ अनाज के दाने भी पड़े हुए दिखते थे किंतु चिड़ियों ने उन्हें चुग लिया था।
मैं हर रोज़ उसी चिता को अपलक देखते हुए बैठा रहता था और अपनी समझ में अपनी अनुराधा से बातें करता रहता था। जबकि सच तो यही था कि मैं खुद ही बड़बड़ाता रहता था। न वहां पर कोई मेरी बातें सुनता था और ना ही मेरी अनुराधा मेरी किसी बात का कभी कोई जवाब देती थी। जवाब तो वो तब दे जब वो वहां पर कहीं हो।
"आप मां के साथ गईं नहीं?" एकाएक जब मेरी नज़र भाभी पर पड़ी तो मैंने उनसे निर्विकार भाव से पूछा____"और...और यहां इस तरह क्यों बैठ गईं हैं? आप जाइए यहां से, मुझे अकेले में अपनी अनुराधा से अभी बहुत सारी बातें करनी है।"
"मुझे भी उससे ढेर सारी बातें करनी है।" भाभी ने एक नज़र मेरी तरफ देखने के बाद कहा____"आख़िर वो मेरी भी तो छोटी बहन थी। क्या तुम मुझे मेरी छोटी बहन से बातें नहीं करने दोगे?"
"ह...हां हां क्यों नहीं।" मैं एकदम से बोल पड़ा____"मुझे माफ़ कर दीजिए। आप सही कह रही हैं। आपको अपनी छोटी बहन से ज़रूर बात करनी चाहिए। आप उससे बात कीजिए भाभी। शायद वो आपको ही कोई जवाब दे, मुझे तो वो कोई जवाब ही नहीं देती है। पता नहीं क्यों इतना नाराज़ हो गई है मुझसे?"
कहने के साथ ही मेरी आवाज़ भर्रा गई और आंखों से आंसू छलक पड़े। भाभी ने मेरी तरफ देखा और फिर अपना एक हाथ मेरे पीछे से बढ़ा कर मेरा बाजू पकड़ते हुए खुद से छुपका लिया।
"वो तुमसे नाराज़ नहीं हुई है वैभव।" भाभी ने बड़े प्यार से समझाते हुए कहा____"बल्कि मैं तो ये कहूंगी कि वो तुमसे नाराज़ हो ही नहीं सकती। तुम उसे इतना प्रेम करते हो कि वो एक पल के लिए भी तुमसे नाराज़ नहीं हो सकती।"
"तो फिर वो मुझसे बात क्यों नहीं करती भाभी?" मैंने दुखी हो कर कहा____"उससे कहिए न कि एक बार मुझे अपनी आवाज़ सुना दे। सिर्फ एक बार, हां भाभी बस एक बार अपने मुख से मेरा नाम ले कर मुझे पुकारे। बदले में मैं भी उसे ठकुराईन कहूंगा। आपको पता है उसे मेरे मुंह से अपने लिए ठकुराईन सुनना बहुत अच्छा लगता था। आप उससे कहिए न कि वो मुझे एक बार अपनी आवाज़ सुना दे।"
मेरा इतना कहना था कि भाभी ने तड़प कर मुझे और भी ज़्यादा खुद से छुपका लिया। उनकी आंखों से आंसू छलक पड़े थे। अपनी रुलाई को बड़ी मुश्किल से रोका हुआ था उन्होंने।
"अगर ये संभव होता तो मैं ज़रूर उससे कहती वैभव।" फिर उन्होंने गंभीरता से कहा____"और वो भी ज़रूर अपनी आवाज़ तुम्हें सुनाती लेकिन ये तो ऐसी बातें हैं जो कभी संभव ही नहीं हो सकतीं। अगर ऐसा होता तो क्या मैं एक बार भी तुम्हारे भैया की आवाज़ न सुन पाती? आज भी अकेले में उन्हें आवाज़ देती हूं और उनसे फ़रियाद करती हूं कि सिर्फ एक बार मेरे ख़वाब में ही आ कर मुझे अपनी सूरत दिखा दें लेकिन वो कभी ऐसा नहीं करते। जानते हो वैभव वो ऐसा क्यों नहीं करते?"
"क..क्यों नहीं करते भाभी?" मैंने उनसे अलग हो कर उनकी तरफ देखा।
"क्योंकि वो बहुत दूर जा चुके हैं।" भाभी ने उसी गंभीरता से कहा____"एक ऐसी जगह जहां से मेरे ख़्वाबों में आने के लिए उन्हें कोई रास्ता ही नहीं दिखता।"
"क्या सच में?" मैंने हैरानी से उन्हें देखा____"पर ऐसा क्यों भाभी? उन्हें रास्ता क्यों नहीं दिखता?"
"ईश्वर ही जाने।" भाभी ने गहरी सांस ली____"या फिर ऐसा हो सकता है कि सच में कोई रास्ता ही न हो। अगर होता तो क्या वो कभी मेरे ख़्वाबों में नहीं आ जाते? आख़िर वो भी तो मुझसे बहुत प्रेम करते थे। तुम्हारी अनुराधा भी शायद ऐसी ही जगह चली गई है जहां से ना तो वो तुम्हें आवाज़ दे सकती है और ना ही शायद वो कभी तुम्हारे ख़्वाबों में आ सकती है लेकिन....।"
"लेकिन??" मैंने उलझन पूर्ण भाव से देखा उन्हें।
"लेकिन इसके बावजूद तुम उसे अपने बहुत पास महसूस कर सकते हो।" भाभी ने कहा____"तुम जिस जगह पर भी रहोगे वहां से भी उसे अपने पास ही महसूस कर सकते हो।"
"वो कैसे?" मैंने हैरानी से उनकी तरफ देखा।
"अपने दिल पर हाथ रख कर और आंखें बंद कर के जब भी उसका नाम लोगे तो वो तुम्हें अपनी मौजूदगी का आभास कराएगी।" भाभी ने रहस्यपूर्ण भाव से कहा____"तुम्हारे दिल की हर धड़कन में तुम्हें उसकी मौजूदगी का आभास होगा।"
भाभी ने इतना कहा ही था कि मैंने फ़ौरन ही अपना हाथ अपने दिल पर रख कर अपनी आंखें बंद कर ली। मन ही मन अनुराधा का नाम लिया और फिर उसे महसूस करने लगा। कुछ ही देर में मेरे होठों पर हल्की मुस्कान उभर आई। मुझे ऐसा प्रतीत हुआ जैसे सच में मेरी अनुराधा मेरे दिल की हर धड़कन में मौजूद है। बंद पलकों में अचानक उसका ऐसा अक्श उभर आया था जिसमें उसके चेहरे पर शर्म भी थी और मुस्कान भी। अपनी बन्द पलकों में अनुराधा को देख कर मेरी खुशी की कोई सीमा ना रही।
जाने कितनी ही देर तक मैं आंखें बंद किए और दिल पर अपना हाथ रखे बैठा रहा। मन कर रहा था कि अब यूं ही उमर भर आंखें बंद किए बैठा रहूं मगर तभी भाभी की आवाज़ से मैं उस खुशी रूपी समंदर से बाहर आ गया। आंखें खोल कर भाभी की तरफ देखा तो वो मुझे ही देख रहीं थी। एकाएक मुझे जाने क्या हुआ कि मैं लपक कर भाभी से लिपट गया।
"आपने बिल्कुल सच कहा था भाभी।" फिर मैं उनसे लिपटे हुए ही खुशी से बोल पड़ा____"मैंने सच में अपनी अनुराधा को महसूस किया और पता है....मैंने अनुराधा को भी देखा। वो मुझे देख के मुस्कुरा रही थी भाभी।"
"फिर तो ये अच्छी बात है ना?" भाभी ने मेरी पीठ पर प्यार से हाथ फेरते हुए कहा____"अब तुम जब चाहोगे तब अपनी अनुराधा को महसूस भी कर सकोगे और उसे देख भी सकोगे।"
"हां भाभी।" मैंने उनसे अलग हो कर बोला____"अब तो मैं हर रोज़ हर पल उसे महसूस करूंगा और देखूंगा भी।"
"ठीक है जैसी तुम्हारी इच्छा।" भाभी ने कहा____"अच्छा अब घर चलो। देखो शाम होने वाली है।"
"हां ठीक है।" मैं फ़ौरन उठ कर खड़ा हो गया।
भाभी ग़ौर से मुझे देख रहीं थी। शायद वो ये समझने की कोशिश कर रहीं थी कि अब मेरी मानसिक हालत कैसी है? मैं पहले की अपेक्षा थोड़ा बेहतर महसूस कर रहा था क्योंकि इतने दिनों बाद मैंने अपनी अनुराधा को महसूस किया था। इस लिए मुझे एक अलग ही खुशी का आभास हो रहा था। ख़ैर जल्दी ही मैं और भाभी मकान के पास आ गए।
मोटर साइकिल को स्टार्ट कर के मैंने भाभी को पीछे बैठाया और फिर चल पड़ा। ठंडी हवा चेहरे से टकराई तो एक अलग ही सुकून महसूस हुआ। रास्ते में भाभी मुझसे कई तरह की बातें करती रहीं। वो महसूस करना चाहती थीं कि मेरी हालत में कितना सुधार हुआ है। ख़ैर कुछ ही समय में हम दोनों हवेली पहुंच गए।
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