Adultery ☆ प्यार का सबूत ☆ (Completed) - Page 6 - SexBaba
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Adultery ☆ प्यार का सबूत ☆ (Completed)

अध्याय - 47

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अब तक....

विभोर अभी कुछ बोलने ही वाला था कि तभी बाहर से किसी के द्वारा दरवाज़ा बजाए जाने से तीनों के तीनों ही उछल पड़े। पलक झपकते ही तीनों के चेहरों पर हवाइयां उड़ती हुई नज़र आने लगीं। दरवाज़े की तरफ टकटकी लगाए वो अपलक देखने लगे थे। डर और घबराहट के मारे कुछ ही पलों में तीनों का बुरा हाल हो गया। सबकी आंखों में एक ही सवाल मानों ताण्डव सा करने लगा था कि कौन हो सकता है बाहर?

अब आगे....

बाहर से कोई बार बार दरवाज़ा बजाए जा रहा था किंतु विभोर अजीत और गौरव में से किसी में भी हिम्मत नहीं पड़ रही थी कि जा कर दरवाज़ा खोलें। सबके चेहरों पर बारह बजे हुए थे। डर और घबराहट के मारे चेहरा पसीने पसीने हुआ पड़ा था। गुज़रते वक्त के साथ उन तीनों की हालत और भी ज़्यादा ख़राब हुई जा रही थी।

"क...क..कौन हो सकता है गौरव?" विभोर के हलक से बड़ी मुश्किल से मरी हुई आवाज़ निकली____"क.. कहीं वो तो नहीं आ गया?"

"य..ये क्या कह रहे हो विभोर भाई?" गौरव को अपनी गांड़ फटती हुई महसूस हुई, बोला____"भ..भला वो यहां कैसे आ सकता है? उसे क्या पता हम यहां होंगे? नहीं नहीं, ये कोई और ही होगा।"

"ले..लेकिन कौन?" अजीत हिम्मत कर के पूछ ही बैठा____"इस वक्त कौन हो सकता है? और तो और बोल भी नहीं रहा, बस दरवाज़ा ही बजाए जा रहा है।"

"अ..अब क्या करें?" गौरव जब कोई जवाब न दे सका तो विभोर दबी हुई आवाज़ में बोला____"क्या हमें दरवाज़ा खोल कर देखना चाहिए कि बाहर कौन है?"

"इसके अलावा कोई दूसरा चारा भी तो नहीं है विभोर भाई।" गौरव मानों बेबस भाव से बोला____"दरवाज़ा तो हमें खोलना ही पड़ेगा। संभव है बाहर कोई ऐसा व्यक्ति हो जो हमारा ही आदमी हो।"

गौरव की बात सुन कर विभोर और अजीत के चेहरों पर तनिक राहत के भाव उभरते नज़र आए लेकिन डर और घबराहट में कोई कमी न हुई। इस बीच दरवाज़ा फिर से बजाया गया। उन तीनों के लिए सबसे ज़्यादा परेशानी वाली बात ये थी कि बाहर जो कोई भी था वो बोल कुछ नहीं रहा था बल्कि सिर्फ़ दरवाज़ा ही बजाए जा रहा था। इधर ये तीनों एक दूसरे का चेहरा देख रहे थे और ये उम्मीद भी कर रहे थे कि दरवाज़ा खोलने कौन जाने वाला है? आख़िर हिम्मत जुटा कर गौरव ही दरवाज़े की तरफ बढ़ा। धीमें क़दमों से चलते हुए वो दरवाज़े के क़रीब पहुंचा। अपनी घबराहट को बड़ी मुश्किल से काबू करने का प्रयास करते हुए उसने कांपते हाथ से दरवाज़े की शांकल को पकड़ा और फिर उसे बहुत ही आहिस्ता से खींच कर कुंडे से अलग किया। दिल की धड़कनें उसकी कनपटियों पर मानों हथौड़ा बरसा रहीं थी। सूखे हलक को उसने थूक निगल कर तर किया और शांकल को अपनी तरफ खींच कर दरवाज़े के पल्ले को धड़कते दिल के साथ खोला।

अभी दरवाज़े का पल्ला थोड़ा ही खुला था कि तभी वो पल्ला भड़ाक से उसके चेहरे पर बड़ी तेज़ी से टकराया जिससे दो बातें एक साथ हुईं। पहली तो गौरव के हलक से दर्दनाक चीख निकली और दूसरी उसका जिस्म हवा में लहराते हुए पीछे कमरे में जा कर धड़ाम से गिरा। कमरे के अंदर मौजूद विभोर और अजीत अचानक हुए इस कृत्य से बुरी तरह उछल पड़े। दहशत के चलते उनके हलक से चीख भी निकल गई थी।

गौरव को कमरे की ज़मीन पर यूं धड़ाम से गिर गया देख उन दोनों की जान हलक में आ कर फंस गई थी। बात सिर्फ़ इतनी ही होती तो शायद उन्हें अपने ज़िंदा होने का आभास भी हो जाता लेकिन दरवाज़े से जिस शख़्स को अंदर आते देखा उसे देख उन दोनों की आत्मा उनका शरीर छोड़ देने के लिए मानो बगावत कर उठी।

"कैसे हो मेरे खानदान के नमूनों?" मैंने उन दोनों की तरफ देखते हुए सर्द लहजे में कहा____"स्वागत नहीं करोगे हमारा?"

"व..व..वैभव..भ..भैया।" विभोर के हलक से अटकता हुआ स्वर निकला। मुझे किसी जिन्न की तरह प्रगट हो गया देख उसकी घिग्घी सी बंध गई थी। चेहरा कागज़ की तरह एकदम सफेद पड़ गया था।

"न न, वैभव भैया नहीं, हरामज़ादा।" मैंने उसकी आंखों में आंखें डाल कर उसी सर्द लहजे में कहा____"तुमने यही नाम रखा है न मेरा?"

मेरी बात सुन कर विभोर से कुछ कहते न बन पड़ा। मुझसे आंख तक मिलाने की हिम्मत न हुई उसमें। फ़ौरन ही बगले झांकने लगा था वो। अपनी धड़कनें उसे रुकती हुई सी महसूस हुईं। हलक किसी रेगिस्तान की तरह सूख गया था, जिसे तर करने के लिए मुंह में थूक का एक क़तरा भी ना बचा था। यही हाल अजीत का भी था। उधर ज़मीन पर गिरा पड़ा गौरव खुद को उठा कर कमरे के एक कोने में खड़ा कर लिया था। गांड के बल ज़मीन पर गिरा था वो इस लिए अभी भी गांड में दर्द हो रहा था उसके जिसका असर उसके बिगड़े हुए चेहरे से साफ़ नज़र आ रहा था। वैभव सिंह नाम की दहशत ने सिर्फ़ उसे ही नहीं बल्कि तीनों को ही जैसे नपुंसक बना दिया था। तीनों के जिस्म जूड़ी के मरीज़ की तरह थर थर कांपे जा रहे थे। उनकी ये हालत देख मैं मन ही मन हंसा तो ज़रूर लेकिन उनकी करनी का ख़्याल आते ही मेरा गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया।

"सांप सूंघ गया क्या तुझे?" मैं गुस्से में विभोर का कालर पकड़ कर गुर्राया____"बोल यही नाम रखा है न तूने मेरा?"

"म..मु...मुझे माफ़ कर दीजिए भैया।" विभोर मिमियाते हुए बड़ी मुश्किल से बोला।

"ठीक है, माफ़ कर दूंगा तुझे।" मैं उसी तरह उसका कालर पकड़े गुर्राया____"लेकिन ये तो बता कि ऐसा कौन सा अच्छा काम किया है तूने जिसके लिए तुझे माफ़ कर दूं? तुम दोनों ने साहूकार के इस लड़के के साथ मिल कर मुझे नामर्द बनाने का कार्य किया। इसके लिए तो मैं तुझे माफ़ भी कर सकता हूं लेकिन तूने अपनी ही बहन को घटिया काम करने पर मजबूर किया। क्या तुझे ज़रा सा भी एहसास है कि तेरे मजबूर करने पर जब उस मासूम ने ऐसे घटिया काम किए तब उस पर क्या क्या गुज़रती रही होगी? तूने अपनी ही बहन की आत्मा को छलनी किया, क्या तुझे लगता है कि इसके लिए तुझे माफ़ी मिलनी चाहिए?"

विभोर सिर झुकाए खड़ा रह गया। उसमें जैसे बोलने की अब हिम्मत ही न बची थी। मेरा मन तो कर रहा था कि उन दोनों भाईयों को वहीं ज़मीन पर जिंदा गाड़ दूं लेकिन बड़ी मुश्किल से मैं अपने गुस्से को काबू किए हुए था।

"अब बोलता क्यों नहीं हरामखोर?" उसे कुछ न बोलता देख गुस्से से मैंने एक झन्नाटेदार थप्पड़ उसके गाल पर रसीद कर दिया जिससे वो लहरा कर एक तरफ ज़मीन में जा गिरा। गुस्से से तमतमाया हुआ मैं उसके क़रीब पहुंचा। इससे पहले कि मैं झुक कर उसको उठाता मेरे सिर पर ज़ोर से प्रहार हुआ। मेरे हलक से दर्द भरी चीख निकल गई। दोनों हाथों से अपना सिर पकड़ कर लहरा गया मैं।

सिर पर हुए तीव्र प्रहार से मैं दर्द से चीखा भी था और लहरा भी गया था किंतु जल्दी ही सम्हल कर पलटा। मेरी नज़र अजीत पर पड़ी। उसके हाथ में एक मोटा सा डंडा था और चेहरे पर गुस्सा तो था लेकिन उस गुस्से में भी डर और घबराहट के भाव गर्दिश करते नज़र आ रहे थे। उसके पीछे दीवार से लगा गौरव आंखें फाड़े कभी अजीत को देखता तो कभी मुझे। शायद उसे अजीत से ऐसे कार्य की उम्मीद नहीं थी और उसे ही क्या मुझे खुद भी उससे ऐसी उम्मीद नहीं थी, लेकिन जल्दी ही समझ गया कि ऐसा करने की हिम्मत उसमें क्यों आई होगी। असल में उसे लगा होगा कि मैं अकेला ही यहां आया हूं और वो तीन लोग हैं जिससे वो मुझ पर भारी पड़ सकते हैं। मैं समझ सकता था कि मेरे प्रति इतने समय से पल रही उनकी नफ़रत ने आज शायद अपने सब्र का बांध तोड़ दिया था।

"रु..रुक क्यों गया अजीत?" अपने भाई के हाथों मुझे मार खाया देख विभोर फ़ौरन ही उठ कर खड़ा हो गया था। पलक झपकते ही उसके चेहरे पर भी नफ़रत के भाव उभर आए थे। मेरी तरफ उसी नफ़रत से देखते हुए उसने अजीत से कहा____"मार इस हरामजादे को। ये अकेला हमारा कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा। इससे डरने की ज़रूरत नहीं है छोटे। आज तसल्ली से इसको सबक सिखाएंगे हम दोनों। इसकी वजह से हवेली में कभी हमारी कोई अहमियत नहीं रही। सब इसके ही गुणगान गाते थे जैसे ये कोई इंसान नहीं बल्कि भगवान हो।"

"बहुत खूब।" विभोर की ज़हर में घुली बातें सुन कर मैं मुस्कुराते हुए बोल पड़ा____"आज पहली बार गीदड़ ने शेर बनने की कोशिश की है। ख़ैर अच्छा प्रयास है, अब इससे पहले कि तेरा और तेरे भाई का जोश ठंडा पड़ जाए दोनों अपनी मर्दानगी दिखाओ मुझे।"

"लगता है तुझे हमारी मर्दानगी देखने की बड़ी जल्दी है।" अजीत डंडे को पकड़े मेरी तरफ दो क़दम आगे बढ़ कर बोला____"फ़िक्र मत कर, आज हम तेरी वो हालत करेंगे कि तुझे अपने जन्म लेने पर अफ़सोस होगा।"

"पीछे से वार करने वाले हिंजड़े होते हैं बेटा।" मैंने उसकी खिल्ली उड़ाने वाले भाव से कहा____"सच्चा मर्द है तो अब आगे से वार कर के दिखा। मैं भी तो देखूं कि बिल में रहने वाले चूहों में कितना कसबल है?"

मेरी बात सुन कर दोनों भाई बुरी तरह तिलमिला उठे और यही तो मैं चाहता था। गुस्से में तिलमिलाए हुए अजीत ने तेज़ी से डंडे को घुमा कर मुझ पर प्रहार किया लेकिन मैंने आराम से झुक कर उसके वार से खुद को बचा लिया। इससे पहले कि वो संभल पाता मेरी टांग घूम गई जोकि सीधा उसके डंडे पर पड़ी, परिणामस्वरुप डंडा उसके हाथ से छूट कर दूर फिसल गया। उसके बाद जल्दी ही मैंने उसकी पीठ पर दुहत्थड़ जमा दिया जिससे वो ज़मीन चाटता नज़र आया। अभी मैं सम्हला ही था कि पीछे से विभोर ने मुझे दबोच लिया।

"अजीत जल्दी से उठ और डंडे को उठा कर इसका सिर फोड़ दे।" मुझे मजबूती से पकड़े विभोर ज़ोर से चिल्लाते हुए अजीत से बोला था____"आज या तो ये नहीं या फिर हम नहीं।"

विभोर की बात पर अजीत ने फ़ौरन ही अमल किया। वो तेज़ी से उठा और दूर पड़े डंडे को उठा लिया। इधर मैं विभोर से छूटने की कोशिश कर रहा था। विभोर पूरी ताक़त से मुझे पकड़े हुए था। शायद करो या मरो वाली बात उसके ज़हन में समा गई थी। उसे पता था कि अगर उन दोनों भाईयों ने मुझे मौका दिया तो ये उनके लिए ठीक नहीं होगा। इधर मैं भी जानता था कि इस वक्त वो दोनों होश में नहीं हैं। मेरे प्रति उनके अंदर जो नफ़रत भरी हुई थी वो उन्हें होश में आने ही नहीं दे सकती थी।

अजीत डंडे को मजबूती से पकड़े मेरी तरफ बढ़ा। मैंने जब देखा कि वो मेरे क़रीब ही आ गया है तो मैने जल्दी से अपनी कुहनी का वार पीछे विभोर के चेहरे पर किया जिससे उसने दर्द से बिलबिलाते हुए जल्दी ही मुझे छोड़ दिया। अभी मैं उससे छूट कर सम्हला ही था कि उधर अजीत का डंडा घूम गया जो तेज़ी से मेरी तरफ आया। मैं बिजली की सी तेज़ी से एक तरफ को हट गया जिससे डंडे का वार कच्ची ज़मीन पर ज़ोर से पड़ा।

मेरे ख़्याल से तमाशा बहुत हो गया था और अब इस तमाशे को ख़त्म करने का वक्त आ गया था। मैंने देखा विभोर फिर से मुझे पकड़ने के लिए मेरी तरफ लपका लेकिन मैंने एक लात उसके पेट पर जमा दी जिससे वो पेट पकड़ कर दोहरा हो गया। इधर अजीत एक बार फिर से डंडा लिए मेरी तरफ लपका मगर हवा में ही मैने उसके डंडे को थाम लिया और एक लात उसके पेट पर जमा दिया जिससे वो भी अपना पेट पकड़ कर दर्द से दोहरा हो गया। मैंने उसके हाथ से डंडा छुड़ाया और फिर दे दनादन दोनों भाईयों पर डंडे बरसाने शुरू कर दिए। कमरे में दोनों की चीखें गूंजने लगीं। दीवार से पीठ टिकाए खड़ा गौरव उन दोनों को इस तरह दर्द से चीखते देख थर थर कांपे जा रहा था। मैंने विभोर और अजीत पर तब तक डंडे बरसाए जब तक कि वो दोनों मुझसे रहम की भीख न मांगने लगे। कमरे की ज़मीन पर दोनों लहू लुहान हुए पड़े थे। मुझे उन दोनों पर इतना गुस्सा आया हुआ था कि मैं एक बार फिर से दोनों पर डंडे बरसाने ही चला था कि तभी कमरे के दरवाज़े से आई एक भारी आवाज़ को सुन कर रुक गया।

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दरवाज़े पर पिता जी यानि दादा ठाकुर खड़े थे और उनके पीछे जगताप चाचा के साथ साथ और भी कई सारे लोग थे। पिता जी का चेहरा जहां शांत था वहीं जगताप चाचा के चेहरे पर गुस्सा दिख रहा था। दरवाज़े पर उन सबको खड़ा देख कमरे में मौजूद विभोर अजीत और गौरव तीनों की ही नानी मर गई।

कुछ ही पलों में एक एक कर के सब कमरे में आ गए। गौरव ने जब अपने ताऊ मणि शंकर को देखा तो उसकी हालत और भी ज़्यादा ख़राब हो गई। कमरे में हमारे अलावा पिता जी, जगताप चाचा, बड़े भैया (अभिनव सिंह) और साहूकार मणि शंकर थे। पिता जी के साथ सुरक्षा के लिए जो हमारे आदमी आए थे वो बाहर ही रुक गए थे।

जगताप चाचा विभोर और अजीत की तरफ गुस्से से देखे जा रहे थे। प्रतिपल उनका गुस्सा बढ़ता ही जा रहा था। अचानक वो आगे बढ़े और मेरे हाथ से डंडा छीन लिया। इससे पहले कि वो गुस्से में कुछ करते पिता जी की शख़्त आवाज़ सुन कर अपनी जगह पर रुक गए।

"मुझे मत रोकिए बड़े भैया।" फिर वो गुस्से से कह उठे____"आज इन दोनों ने मुझे आपकी नज़रों से गिरा दिया है। मुझे यकीन नहीं हो रहा कि ये मेरी अपनी औलादें हैं जिन्होंने इतना घटिया कर्म किया है। इससे अच्छा तो यही है कि मैं ऐसा कुकर्म करने वाली अपनी औलादों की अपने हाथों से ही जान ले लूं।"

"होश में आओ जगताप।" पिता जी ने शख्त लहजे में कहा____"इस मामले को शांति से और ठंडे दिमाग़ से देखना है हमें। हम जानना चाहते हैं कि इन लोगों ने जो कुछ भी किया है वो क्यों किया है और किसके कहने पर किया है?"

"अब सुनने को रह ही क्या गया है भैया?" जगताप चाचा ने सहसा दुखी भाव से कहा____"सब कुछ तो बाहर से सुन ही लिया है हम सबने। मुझे बस इजाज़त दीजिए ताकि ऐसी औलादों को मैं अपने हाथों से मार मार कर ख़त्म कर सकूं।"

"हमने क्या कहा तुम्हें समझ में नहीं आया क्या?" पिता जी ने इस बार जगताप चाचा की तरफ गुस्से से देखते हुए कहा____"अब ख़ामोश रहो और हमें इन लोगों से बात करने दो।"

जगताप चाचा पिता जी की बात सुन कर ख़ामोश रह गए। एक तरफ जहां बड़े भैया सोचो में गुम से हो कर खड़े थे वहीं दूसरी तरफ मणि शंकर भी चेहरे पर अजीब से भाव लिए ख़ामोश खड़ा था। इधर विभोर अजीत और गौरव एक कोने में सिमटे हुए बैठे हुए थे। चेहरों पर मुर्दानगी छाई हुई थी उनके।

"हमने ये तो सुन लिया है कि तुम दोनों ने वैभव के साथ वो सब इस लिए किया क्योंकि तुम दोनों इससे नफ़रत करते थे।" पिता जी ने विभोर और अजीत दोनों को बारी बारी से देखते हुए कहा____"और ये भी सुन लिया है कि इसके लिए तुमने खुद अपनी ही बहन और हमारी बेटी कुसुम को भी मजबूर कर रखा था। अब हम ये जानना चाहते हैं कि इसके अलावा और क्या किया है तुमने और साथ ही ऐसे काम में गौरव के अलावा और कौन कौन तुम्हारे साथ शामिल है?"

पिता जी की बातें सुन कर विभोर और अजीत दोनों ही कुछ न बोले। डर और घबराहट से उन दोनों का बुरा हाल था और साथ ही शर्मिंदगी के मारे उनका चेहरा झुका हुआ था। जब काफी देर गुज़र जाने पर भी वो दोनों कुछ न बोले तो पिता जी ने तेज़ आवाज़ में घुड़कते हुए दुबारा वही सब पूछा।

"इसके अलावा और कुछ नहीं किया हमने।" विभोर ने दबी हुई आवाज़ में बोलने का साहस किया____"हमारे इस काम में सिर्फ़ गौरव ही हमारे साथ रहा है। इसका काम सिर्फ दवा लाना ही था। हमें नहीं पता कि ये कहां से वो दवा ले कर आता था जिसे चाय में हर रोज़ थोड़ा थोड़ा मिला कर पिलाने से इंसान की मर्दानगी समाप्त हो जाती है।"

"और बड़े भैया को ऐसी कौन सी घूंटी पिलाते थे तुम लोग?" मैंने उन दोनों की तरफ देखते हुए शख़्त भाव से पूछा____"जिसके प्रभाव से ये हमेशा तुम दोनों के साथ ही चिपके रहते थे?"

"इसका जवाब मैं देता हूं वैभव।" पिता जी के पीछे खड़े बड़े भैया अचानक से बोल पड़े तो मैं और पिता जी पलट कर उनकी तरफ देखने लगे, जबकि उन्होंने आगे कहा____"जब मुझे पता चला था कि मेरा जीवन काल ज़्यादा समय का नहीं है तो मैं इस बात से बेहद दुखी हो गया था। एकदम से ऐसा लगने लगा था जैसे दुनिया में अब मेरे लिए कुछ रह ही नहीं गया है। मुझे कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था कि अचानक से मेरे साथ ये क्या हो गया था? उधर तू अपनी ही दुनिया में मस्त रहता था। मुझे तुझसे हमेशा ईर्ष्या होती थी लेकिन ये भी सोचता था कि सबके नसीब में जीवन का ऐसा आनंद कहां? अगर तू अपने ऐसे जीवन से खुश है तो मुझे तुझसे ईर्ष्या नहीं करनी चाहिए, बल्कि खुश होना चाहिए। आख़िर तू मेरा छोटा भाई है। ख़ैर, अपने साथ ऊपर वाले के द्वारा की गई इस नाइंसाफी की वजह से मैं बहुत व्यथित था। तेरी भाभी भी इस सबसे बेहद दुखी थी लेकिन अब भला इसमें किसी का क्या ज़ोर चल सकता था? पिता जी ने इस बारे में किसी को कुछ भी बताने से मना कर रखा था लेकिन इन्हें भला इस बात का एहसास कैसे हो सकता था कि मुझ पर क्या गुज़र रही थी? सोचा था अपने दिल का हाल तुझे बताऊंगा और तेरे साथ अपनी ज़िंदगी के बचे हुए दिन गुज़ारुंगा लेकिन तभी एक दिन तुझे भी पिता जी ने बहिष्कृत कर के गांव से निकाल दिया। सबको ये भी कह दिया कि जो कोई भी तुझसे मिलने की या संबंध रखने की कोशिश करेगा उसको भी वही सज़ा दी जाएगी। तेरे यूं अचानक से चले जाने के बाद मैं एकदम से अकेला पड़ गया। हर गुज़रते दिनों के साथ ये सोच सोच कर मेरी हालत बद से बदतर होती जा रही थी कि एक दिन ऐसा आ जाएगा जब मैं सबको छोड़ कर इस दुनिया से चला जाऊंगा। अंदर ही अंदर मुझे ये दुख खाए जा रहा था जिसकी वजह से मैं चिड़चिड़ा हो गया।हर रोज़ तेरी भाभी पर गुस्सा करने लगा, जबकि उस बेचारी का तो कोई कसूर ही नहीं था। ख़ैर एक दिन मैंने विभोर और अजीत को जीप से कहीं जाते हुए देखा तो मैंने इन दोनों को रुकने को कहा और फिर इनके साथ मैं भी जीप में बैठ कर चल दिया। मैं नहीं जानता था कि ये लोग कहां जा रहे थे अथवा मुझे अपने इन छोटे भाइयों के साथ जाना चाहिए था कि नहीं लेकिन खुद को बहलाने के लिए उस वक्त मुझे जो सही लगा मैंने वही किया। इन दोनों के साथ सारा दिन मैं इधर से उधर घूमता रहा। हवेली के कमरे में इतनों दिनों तक पड़े पड़े मैं ऊब गया था इस लिए उस दिन मुझे इनके साथ घूमने से थोड़ा अच्छा महसूस हुआ। उसके बाद मैं हर रोज़ इन दोनों के साथ घूमने जाने लगा। फिर एक दिन गौरव से मुलाक़ात हुई। शुरू शुरू में गौरव मेरी वजह से असहज महसूस करता था लेकिन फिर हमारे बीच सब कुछ सामान्य हो गया। मैं नहीं जानता था कि ये तीनों जब एक साथ होते थे तो क्या करते थे लेकिन एक दिन मैंने इन्हें बगीचे वाले मकान में गांजा पीते हुए देख लिया। इन तीनों की तो हालत ही ख़राब हो गई थी लेकिन मैंने इन लोगों को उसके लिए कुछ नहीं कहा। कहता भी क्यों, सबको अपनी इच्छा के अनुसार जीवन जीने का हक़ है। उनके पास बहुत बड़ा जीवन था इस लिए वो हर चीज़ का आनंद उठा रहे थे, लेकिन मेरे पास तो कुछ ही समय का जीवन था। मैंने सोचा अपने इन छोटे भाइयों के साथ मैं भी खुशी के कुछ पल गुज़ार लेता हूं। बस, उसके बाद से यही सिलसिला चलने लगा। मैं भी इन लोगों के साथ गांजा पीने लगा। धीरे धीरे मुझे गांजा पीने की लत लग गई तो मैं खुद ही इन लोगों को साथ ले कर हवेली से निकल लेता और कहीं एकान्त में जा कर हम तीनों गांजा पीते। विभोर ने बताया था कि गांजे का जुगाड़ गौरव करता था। मैंने इससे कभी नहीं पूछा कि ये कहां से ऐसा गांजा ले कर आता था जिसे पीने के बाद मैं अपने सारे दुख दर्द भूल जाता था। गांजा पीने के बाद मैं एक अलग ही तरह की रंगीन दुनिया में खो जाता था। एक ऐसी रंगीन दुनिया में जहां जीवन बहुत ही सुंदर दिखता था और इस बात का एहसास ही नहीं रह जाता था कि एक दिन मुझे हक़ीक़त वाली दुनिया से रुखसत भी हो जाना है।"

बड़े भैया चुप हुए तो कमरे में ब्लेड की धार की मानिंद पैना सन्नाटा छा गया। सबके चेहरों पर गभीरता के भाव गर्दिश करते नज़र आ रहे थे। इधर मैं ये सोचने लगा था कि मेरे न रहने पर मेरे भैया को कितना कुछ सहना पड़ा था। मैं समझ सकता था कि वो उस समय कितनी बुरी स्थित से गुज़रे रहे होंगे।

"हमें माफ़ करना बेटे, हमने कभी तुम्हारी तकलीफ़ों को दूर करने या उन्हें साझा करने का प्रयत्न नहीं किया।" पिता जी ने गंभीर भाव से कहा_____"लेकिन यकीन मानों कुल गुरु की उस भविष्यवाणी को सुन कर हम भी बेहद दुखी थे। किसी के सामने अपने सीने के नासूर बन गए दर्द को दिखा नहीं सकते थे और यही हमारे लिए सबसे बड़े दुःख का कारण बन गया था। हर पल ऊपर वाले से यही पूछते थे कि आख़िर क्यों उसने हमारे बेटे का जीवन इतना कमतर बनाया?"

"आपको माफ़ी मांगने की ज़रूरत नहीं है पिता जी।" बड़े भैया ने कहा____"मैं समझ सकता हूं कि ये सब आपके लिए भी कितना असहनीय रहा होगा।"

"बड़े भैया, क्या मैं आपसे कुछ पूछ सकता हूं?" मैंने झिझकते हुए बड़े भैया से कहा तो वो मेरी तरफ देख कर मुस्कुराए और फिर बोले____"बेझिझक हो के पूछ छोटे। तुझे मुझसे इजाज़त लेने की कोई ज़रूरत नहीं है।"

"क्या इसके अलावा भी आप इन दोनों के साथ कुछ करते थे?" मैंने एक बार फिर से झिझकते हुए कहा____"मेरा मतलब है कि ये लोग हवेली की नौकरानी शीला को कुसुम के कमरे में ले जा कर उसके साथ रंगरलियां मनाते थे तो क्या आप भी इस काम में इनका साथ देते थे?"

"मैं तो रात में इनके पास गांजा पीने जाता था वैभव।" बड़े भैया ने कहा____"जैसा कि मैंने बताया मुझे गांजा पीने की लत लगी हुई थी इस लिए तेरी भाभी के सो जाने के बाद मैं इनके कमरे में गांजा पीने के लिए जाता था। एक दिन मुझे इन दोनों का ये राज़ भी नज़र आ गया कि ये लोग हवेली की एक नौकरानी के साथ मौज मस्ती भी करते हैं। पहले तो मुझे ये सोच कर हैरानी हुई थी कि ये दोनों भी तेरे नक्शे क़दम पर चल रहे हैं लेकिन फिर ये सोच कर इन्हें कुछ नहीं कहा कि जीवन इनका है इस लिए मुझे इनके किसी भी तरह के काम में हस्ताक्षेप नहीं करना चाहिए। वैसे भी मैं ज़्यादा समय का मेहमान नहीं था इस लिए मैं किसी से बैर भाव या मन मुटाव जैसी बात नहीं रखना चाहता था। ख़ैर, मैंने इन्हें कुछ नहीं कहा और इनके पास से गांजा ले कर एक दूसरे खाली कमरे में चला गया। कई बार तो जब मैं गांजे के नशे में होता था तो ये लोग मेरे सामने ही शीला के साथ रंगरलियां मनाते थे। मुझे अंधेरे में ठीक से कुछ दिखता तो नहीं था किंतु आवाज़ों से पता चलता रहता था कि क्या हो रहा है।"

"क्या इन लोगों ने कभी आपको शीला के साथ वो सब करने के लिए नहीं कहा?" मैंने बड़ी हिम्मत कर के पूछा तो बड़े भैया ने पहले वहां मौजूद सबकी तरफ देखा उसके बाद शांत भाव से कहा____"कई बार इन दोनों ने हंसी मज़ाक में मुझसे कहा था लेकिन मैं कभी इसके लिए राज़ी नहीं हुआ। एक दिन मैंने देखा कि ये लोग कुसुम के कमरे में शीला के साथ लगे हुए थे तो मैं इन दोनों पर बेहद गुस्सा हुआ। ये दोनों डर तो गए थे लेकिन फिर इन्होंने मुझे यकीन दिलाया कि कुसुम को इस बारे में कुछ भी पता नहीं है। मैंने जब डांटते हुए इनसे ये कहा कि कुसुम को पता हो या न हो लेकिन ऐसा गंदा काम उसके कमरे में नहीं करना चाहिए तो इन लोगों ने कहा कि ये ऐसा इस लिए करते हैं ताकि इससे अलग तरह का एहसास हो और एक अलग ही तरह का मज़ा आए।"

अपने से बड़ों के सामने खुल कर ऐसी बातें करने और सुनने में यकीनन मुझे और शायद भैया को भी शर्म और झिझक महसूस हो रही थी किंतु इसके बावजूद मैं ये सब बातें सबके सामने करवा रहा था ताकि असलियत सबको पता चल जाए। हालाकि मणि शंकर की मौजूदगी में ऐसी बातें नहीं होनी चाहिए थीं लेकिन अब जब बातें खुल ही गईं थी तो भला किसी की मौजूदगी से क्या फ़र्क पड़ता था?

"और क्या आपको भी ये पता था कि ये दोनों कुसुम के द्वारा चाय में नामर्द बनाने वाली दवा मिला कर मुझे पिलाते थे?" मैंने एक एक नज़र विभोर और अजीत की तरफ डालते हुए बड़े भैया से कहा____"क्या आपको कभी इन पर उस सबके अलावा और किसी भी चीज़ का शक नहीं हुआ?"

"शक तो तब होता है छोटे जब किसी से ऐसे किसी काम की उम्मीद हो।" बड़े भैया ने कहा____"मैं तो ज़्यादातर गांजे के नशे में ही गुम रहता था। ऐसा भी कह सकते हो कि मैं हर किसी से विरक्त हो गया था। मुझे भला ये कैसे पता हो सकता था कि ये लोग मेरे पीठ पीछे और क्या क्या कारनामें करते थे?"

"हे ईश्वर!" जगताप चाचा सहसा आहत भाव से बोल पड़े____"ये कैसी नीच औलादों को मेरी औलादें बना कर भेजा है तूने? मैं सोच भी नहीं सकता था कि मेरे ये दोनों सपूत इतने गंदे और घटिया काम भी करते होंगे। आज इनकी वजह से मेरा सिर शर्म से झुक गया है। मैं किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं रहा। मुझे अपने देवता समान बड़े भैया की नज़रों से ऐसा गिराया है कि अब शायद ही मैं कभी सिर उठा पाऊं।"

कहने के साथ ही जगताप चाचा का चेहरा एकाएक गुस्से से भभक उठा। इससे पहले कि कोई कुछ समझ पाता वो तेज़ी से आगे बढ़े और ज़मीन पर पड़े डंडे को उठा कर विभोर और अजीत को मारना शुरू कर दिया। कमरे में एकदम से दर्द भरी चीखें गूंज उठीं। मैं, बड़े भैया और मणि शंकर तो अपनी जगह पर ही खड़े रहे किंतु पिता जी जगताप चाचा की तरफ तेज़ी से बढ़े।

"रुक जाओ जगताप रुक जाओ।" उनके क़रीब पहुंचते ही पिता जी ने जगताप चाचा के उस हाथ को थाम लिया जिस हाथ में उन्होंने डंडा ले रखा था, फिर कठोर भाव से बोले____"बस बहुत हुआ। अब अगर तुमने इन दोनों पर हाथ उठाया तो हमसे बुरा कोई नहीं होगा।"

"मुझे मत रोकिए भैया।" जगताप चाचा क्रोध से खीझते हुए बोले____"आज मैं इन लोगों को जान से मार दूंगा। मुझे ऐसे बेटों के मर जाने का ज़रा सा भी दुख नहीं होगा जिन्होंने ऐसे ऐसे नीच कर्म किए हैं। मुझे तो सोच कर ही शर्म आती है कि इन लोगों ने क्या क्या किया है जबकि ऐसा नीच और गंदा काम करने पर इन्हें रत्ती भर भी शर्म नहीं आई। मुझे मत रोकिए भैया, इन्हें जीवित रहने का कोई अधिकार नहीं है।"

"तुमने किसी के बारे में फ़ैसला सुनाने का अधिकार कब से अपने हाथ में ले लिया?" पिता जी ने इस बार गुस्से से कहा____"मत भूलो कि इस गांव का ही नहीं बल्कि आस पास के अठारह गांव के लोगों के बारे में फ़ैसला सुनाने का हक़ सिर्फ़ और सिर्फ़ हमें है।"

"मुझे माफ़ कर दीजिए भैया।" जगताप चाचा की आंखों से सहसा आंसू छलक पड़े____"इस वक्त मुझे किसी बात का होश नहीं है। मुझे बस इतना पता है कि मेरे इन कपूतों ने ऐसा कुकर्म किया है जिसके लिए इन्हें इस धरती पर जीवित रहने का कोई अधिकार नहीं है।"

"इन दोनों के साथ क्या करना है इसका फ़ैसला हम करेंगे।" पिता जी ने शख़्त भाव से कहा____"मगर उससे पहले हम मणि शंकर जी के उस भतीजे से भी जानना चाहते हैं कि उसने इन दोनों का ऐसे काम में साथ क्यों दिया? क्या उसे ज़रा भी इस बात का ख़्याल नहीं रहा था कि इस सबका अंजाम क्या हो सकता है?"

पिता जी की बातें सुन कर जगताप चाचा कुछ न बोले बल्कि गुस्से से डंडे को एक तरफ फेंक दिया। विभोर और अजीत जो कि पहले ही मेरे द्वारा की गई कुटाई से लहू लुहान हो गए थे वो जगताप चाचा के डंडों की मार से फिर से दर्द में कराहने लगे थे। उधर उन दोनों के पीछे दीवार से टिका गौरव अपनी सांसें रोके खड़ा था। डर और घबराहट से उसका बुरा हाल था।

"हमने अपनी तरफ से पूरा प्रयास किया है मणि शंकर जी कि हमारे परिवारों के बीच अच्छे संबंध बने रहें।" पिता जी घूम कर मणि शंकर से मुखातिब हुए____"और दोनों ही परिवारों के बच्चे एक दूसरे से अच्छा बर्ताव करते हुए आपस में मैत्री भाव रखें लेकिन मैत्री भाव का मतलब ये नहीं होता कि किसी एक की मित्रता के लिए दूसरे के साथ इतना बड़ा धोखा या इतना बड़ा कुकर्म किया जाए।"

"ठाकुर साहब, इस बारे में मैं अपने भतीजे का बिलकुल भी पक्ष नहीं लूंगा।" मणि शंकर ने गंभीरता से कहा____"मैं ये भी नहीं कहूंगा कि ये लोग अभी बच्चे हैं क्योंकि बच्चों वाला इन्होंने काम ही नहीं किया है। जो लड़के किसी लड़की अथवा किसी औरत के साथ ऐसे संबंध बनाते फिरते हों वो बच्चे तो हो ही नहीं सकते। इस लिए ना तो मैं अपने भतीजे का पक्ष ले कर ये कहूंगा कि आप इसके अपराधों के लिए इसे क्षमा कर दीजिए और ना ही आपके भतीजों का पक्ष लूंगा। ये सब अपराधी हैं और इनके अपराधों के लिए आप इन्हें जो भी दंड देंगे मुझे स्वीकार होगा।"

मणि शंकर की बात पूरी होते ही एक बार फिर से कमरे में ब्लेड की धार की मानिंद पैना सन्नाटा पसर गया। मैं मणि शंकर के चेहरे को ही अपलक निहारे जा रहा था और समझने की कोशिश कर रहा था कि उसकी बातें उसके चेहरे पर मौजूद भावों से समानता रखती हैं अथवा नहीं?



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अध्याय - 48

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अब तक....



"ठाकुर साहब, इस बारे में मैं अपने भतीजे का बिलकुल भी पक्ष नहीं लूंगा।" मणि शंकर ने गंभीरता से कहा____"मैं ये भी नहीं कहूंगा कि ये लोग अभी बच्चे हैं क्योंकि बच्चों वाला इन्होंने काम ही नहीं किया है। जो लड़के किसी लड़की अथवा किसी औरत के साथ ऐसे संबंध बनाते फिरते हों वो बच्चे तो हो ही नहीं सकते। इस लिए ना तो मैं अपने भतीजे का पक्ष ले कर ये कहूंगा कि आप इसके अपराधों के लिए इसे क्षमा कर दीजिए और ना ही आपके भतीजों का पक्ष लूंगा। ये सब अपराधी हैं और इनके अपराधों के लिए आप इन्हें जो भी दंड देंगे मुझे स्वीकार होगा।"




मणि शंकर की बात पूरी होते ही एक बार फिर से कमरे में ब्लेड की धार की मानिंद पैना सन्नाटा पसर गया। मैं मणि शंकर के चेहरे को ही अपलक निहारे जा रहा था और समझने की कोशिश कर रहा था कि उसकी बातें उसके चेहरे पर मौजूद भावों से समानता रखती हैं अथवा नहीं?



अब आगे....



"हमारे घर के इन बच्चों ने।" पिता जी ने मणि शंकर की तरफ देखते हुए गंभीर भाव से कहा____"और आपके इस भतीजे ने जो कुछ भी किया है वो बहुत ही संगीन अपराध है मणि शंकर जी। अगर बात सिर्फ लड़ाई झगड़े की होती तो इसे नज़रअंदाज़ भी किया जा सकता था लेकिन ऐसे कुत्सित कर्म को भला कैसे नज़रअंदाज़ किया जा सकता है? एक तरफ हमारे भतीजे हैं जो अपने ही बड़े भाई को नफ़रत की वजह से नामर्द बना देना चाहते थे और दूसरी तरफ आपका भतीजा है जिसने हमारे भतीजों के ऐसे निंदनीय कर्म में उनका साथ दिया। हमें समझ नहीं आ रहा कि अपने ही भाईयों के बीच ऐसी नफ़रत आख़िर कैसे हो गई? आख़िर ऐसा क्या ग़लत कर दिया था वैभव ने जिसके लिए हमारे इन भतीजों ने उसे नामर्द बना देने के लिए इतना कुछ कर डाला?"

पिता जी बोलते हुए कुछ पलों के लिए रुके। उनकी इन बातों पर जवाब के रूप में किसी ने कुछ नहीं कहा जबकि सबकी तरफ बारी बारी से देखते हुए उन्होंने आगे कहा____"और उसके ऐसे काम में आपके भतीजे गौरव ने हर तरह से सहायता की। उसने एक बार भी नहीं सोचा कि ये सब कितना ग़लत है और इसका क्या अंजाम हो सकता है। मित्रता का मतलब सिर्फ़ ये नहीं होता कि मित्र के हर काम में उसकी सहायता की जाए बल्कि सच्चा मित्र तो वो होता है जो अपने मित्र को हमेशा सही रास्ता दिखाए और ग़लत रास्ते पर जाने से या ग़लत काम करने से उसे रोके।"

"शायद मेरी परवरिश में ही कोई कमी रह गई थी बड़े भैया।" जगताप चाचा ने दुखी भाव से कहा____"जिसकी वजह से आज मेरे इन कपूतों ने मुझे ऐसा दिन दिखा कर आपके सामने मुझे शर्मसार कर दिया है। जी करता है ये ज़मीन फटे और मैं उसमें समा जाऊं।"

"धीरज रखो जगताप।" पिता जी ने गंभीरता से कहा____"इनकी वजह से सिर्फ़ तुम ही नहीं बल्कि हम भी शर्मसार हुए हैं। इन्होंने वैभव के साथ जो किया उसे तो हम भुला भी देते लेकिन इन लोगों ने हमारी फूल सी कोमल बेटी के दिल को भी बुरी तरह दुखाया है जिसके लिए इन्हें हम किसी भी कीमत पर माफ़ नहीं कर सकते।" कहने के साथ ही पिता जी मणि शंकर की तरफ पलटे और फिर बोले_____"हम सच्चे दिल से चाहते हैं मणि शंकर जी कि हमारे परिवारों के बीच संबंध अच्छे बने रहें इस लिए आपके भतीजे ने जो कुछ किया है उसका फ़ैसला हम आप पर छोड़ते हैं। हम नहीं चाहते कि हमारे किसी फ़ैसले के बाद आपके मन में ऐसी वैसी कोई ग़लत बात या ग़लत सोच पैदा हो जाए।"

"ये आप कैसी बातें कर रहे हैं ठाकुर साहब?" मणि शंकर ने चौंकते हुए कहा____"भला मेरे मन में ऐसी वैसी बात क्यों आ जाएगी? मैं तो आपसे पहले ही कह चुका हूं कि आप इन लोगों को जो भी दंड देंगे वो मुझे स्वीकार होगा। ऐसा इस लिए क्योंकि मुझे अच्छी तरह एहसास है कि इन लोगों ने कितना ग़लत काम किया है और ऐसे ग़लत काम की कोई माफ़ी नहीं हो सकती। आपकी जगह मैं होता तो मैं भी इनके ऐसे ग़लत काम के लिए इन्हें कभी माफ़ नहीं करता।"

"इसी लिए तो हमने आपको अपने भतीजे का फ़ैसला करने को कहा है।" पिता जी ने कहा____"आप इसे अपने साथ ले जाइए और इसके साथ आपको जो सही लगे कीजिए। हम अपने परिवार के इन बच्चों का फ़ैसला अपने तरीके से करेंगे।"

मणि शंकर अभी कुछ कहना ही चाहता था कि पिता जी ने हाथ उठा कर उसे कुछ न कहने का इशारा किया जिस पर मणि शंकर चुप रह गया। उसके चेहरे पर परेशानी के साथ साथ बेचैनी के भी भाव उभर आए थे। ख़ैर कुछ ही पलों में वो अपने भतीजे गौरव को ले कर कमरे से चला गया। उन दोनों के जाने के बाद कुछ देर तक कमरे में सन्नाटा छाया रहा, तभी...

"हमें माफ़ कर दीजिए ताऊ जी।" विभोर और अजीत एक साथ पिता जी के पैरों में गिर कर रोते हुए बोल पड़े____"हमसे बहुत बड़ा अपराध हो गया है। हम हमेशा वैभव भैया से ईर्ष्या करते थे और ये ईर्ष्या कब नफ़रत में बदल गई हमें खुद इसका कभी आभास नहीं हो पाया। उसके बाद हम जाने क्या क्या करते चले गए। हमें इस सबके लिए माफ़ कर दीजिए ताऊ जी। आगे से भूल कर भी ऐसा कुछ नहीं करेंगे हम। हमेशा वही करेंगे जो हमारे कुल और खानदान की मान मर्यादा और इज्ज़त के लिए सही होगा।"

"चुप हो जाओ तुम दोनों।" पिता जी ने शांत भाव से कहा____"और चुपचाप हवेली चलो। तुम दोनों के साथ क्या करना है इसका फ़ैसला बाद में होगा।"

उसके बाद हम सब वहां से हवेली की तरफ चल दिए। रात घिर चुकी थी। हमारी सुरक्षा के लिए हमारे काफी सारे आदमी थे। वक्त और हालात की नज़ाकत को देखते हुए रात में हवेली से बाहर अकेले रहना ठीक नहीं था इस लिए इतने सारे लोग हथियारों से लैस हमारे साथ आए थे और अब वापस हवेली की तरफ चल पड़े थे। कुछ ही समय में हम सब हवेली पहुंच गए।

रास्ते में पिता जी ने जगताप चाचा से कह दिया था कि वो इस बारे में हवेली में बाकी किसी से भी कोई ज़िक्र न करें। ख़ैर हवेली पहुंचे तो मां ने स्वाभाविक रूप से विभोर और अजीत के बारे में पूछा क्योंकि वो दोनों सारा दिन हवेली से गायब रहे थे। मां के पूछने पर पिता जी ने बस इतना ही कहा कि दूसरे गांव में अपने किसी मित्र के यहां उसकी शादी में मौज मस्ती कर रहे थे।

रात में खाना पीना हुआ और फिर सब अपने अपने कमरों में सोने के लिए चले गए। कमरे में पलंग पर लेटा मैं इसी सबके बारे में सोच रहा था। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि पिता जी ने गौरव के बारे में फ़ैसला करने के लिए मणि शंकर को क्यों कहा था और इतनी आसानी से उसे छोड़ क्यों दिया था? विभोर और अजीत के बारे में भी उन्होंने जो कुछ किया था उससे मैं हैरान था और अब सोच में डूबा हुआ था। आख़िर क्या चल रहा था उनके मन में?



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सोचते विचारते पता ही नहीं चला कब मेरी आंख लग गई थी किंतु शायद अभी मैं गहरी नींद में नहीं जा पाया था तभी तो सन्नाटे में हुई आहट से मैं फ़ौरन ही होश में आ गया था। मैंने सन्नाटे में ध्यान से सुनने की कोशिश की तो कुछ ही पलों में मुझे समझ आ गया कि कोई कमरे के दरवाज़े को हल्के से थपथपा रहा है। मेरे ज़हन में बिजली की तरह पिता जी का ख़्याल आया। पिछली रात भी वो ऐसे ही आए थे और हल्के से दरवाज़े को थपथपा रहे थे। मैं फ़ौरन ही पलंग से उठा किंतु फिर एकाएक जाने मुझे क्या सूझा कि मैं एकदम से सतर्क हो गया। मैं ये कैसे भूल सकता था कि आज कल हालात कितने नाज़ुक और ख़तरनाक थे। दरवाज़े के क़रीब पहुंच कर मैंने बहुत ही आहिस्ता से दरवाज़े को खोला और जल्दी ही एक तरफ को हट गया।

बाहर नीम अंधेरे में सच में पिता जी ही खड़े थे किंतु उनके पीछे बड़े भैया को खड़े देख मुझे थोड़ी हैरानी हुई। दरवाज़ा खुलते ही पिता जी अंदर दाखिल हो गए और उनके पीछे बड़े भैया भी। उन दोनों के अंदर आते ही मैंने दरवाज़े को बंद किया और फिर पलंग की तरफ पलटा। पिता जी जा कर पलंग पर बैठ गए थे, जबकि बड़े भैया पलंग के किनारे पर बैठ गए थे। मैं भी चुपचाप जा कर पलंग के दूसरी तरफ किनारे पर ही बैठ गया। मुझे पिता जी के साथ इस वक्त बड़े भैया को देख कर हैरानी ज़रूर हो रही थी लेकिन मैं ये भी समझ रहा था कि अब शायद पिता जी भी चाहते थे कि बड़े भैया को भी उन सभी बातों और हालातों के बारे में अच्छे से पता होना चाहिए जो आज कल हमारे सामने मौजूद हैं।

"हमने तुम्हारे बड़े भाई को वो सब कुछ बता दिया है जो अब तक हुआ है और जिस तरह के हालात हमारे सामने आज कल बने हुए हैं।" पिता जी ने धीमें स्वर में मेरी तरफ देखते हुए कहा____"हमारे पूछने पर इसने भी हमें वो सब बताया जो इसने विभोर और अजीत के साथ रहते हुए किया है। इसके अनुसार इसे इस बारे में कुछ भी पता नहीं था कि वो दोनों इसकी पीठ पीछे और क्या क्या गुल खिला रहे थे।"

"हां वैभव।" बड़े भैया ने भी धीमें स्वर में किंतु गंभीरता से कहा____"मुझे ये बात बिल्कुल भी पता नहीं थी कि विभोर और अजीत अपनी ही बहन को मजबूर किए हुए थे और उसके हाथों चाय में नामर्द बनाने वाली दवा मिला कर तुझे देते थे। जब से मुझे इस बात के बारे में पता चला है तभी से मैं इस बारे में सोच सोच कर हैरान हूं। मैं ख़्वाब में भी नहीं सोच सकता था कि वो दोनों ऐसा भी कर सकते थे।"

"सोच तो मैं भी नहीं सकता था भैया।" मैंने भी धीमें स्वर में किंतु गहरी सांस लेते हुए कहा____"लेकिन सच तो यही है कि ऐसा उन्होंने किया है। दोनों ने कबूल किया है कि ऐसा उन्होंने इसी लिए किया है क्योंकि वो मुझसे नफ़रत करते थे। दोनों के अनुसार हवेली में हमेशा सब मेरा ही गुणगान गाते थे जबकि आप सबको पता है कि ऐसा कुछ भी नहीं है। मैंने आज तक भला ऐसा कौन सा काम किया है जिसके लिए हवेली में कभी कोई मेरा गुणगान गाता? मैंने तो हमेशा वही किया है जिसकी वजह से हमेशा ही हमारा और हमारे खानदान का नाम मिट्टी में मिला है। मुझे समझ में नहीं आ रहा कि उन दोनों के मन में इस तरह की बात आई कैसे? जहां तक मुझे याद है मैंने कभी भी उन दोनों को ना तो कभी डांटा है और ना ही किसी बात के लिए उन्हें नीचा दिखाने का सोचा है। सच तो ये है कि मैं किसी से कोई मतलब ही नहीं रखता था बल्कि अपने में ही मस्त रहता था।"

"जैसा कि तूने कहा कि तू अपने में ही मस्त रहता था।" बड़े भैया ने कहा_____"तो भला तुझे ये कैसे समझ में आएगा कि तेरी कौन सी बात से अथवा तेरे कौन से काम से उनके मन में एक ऐसी ईर्ष्या पैदा हो गई जो आगे चल कर नफ़रत में बदल गई? तू जिस तरह से बिना किसी की परवाह किए अपने जीवन का आनंद ले रहा था उसे देख कर ज़ाहिर है कि उन दोनों के मन में भी तेरी तरह जीवन का आनंद लेने की सोच भर गई होगी। अब क्योंकि वो तेरी तरह बेख़ौफ और निडर हो कर वो सब नहीं कर सकते थे इस लिए वो तुझसे ईर्ष्या करने लगे और उनकी यही ईर्ष्या धीरे धीरे नफ़रत में बदल गई। नफ़रत के चलते उन्हें अच्छे बुरे का ज्ञान ही नहीं रह गया था तभी तो उन दोनों ने वो किया जो कोई सोच भी नहीं सकता था।"

"हम तुम्हारे बड़े भाई की इन बातों से पूरी तरह सहमत हैं।" पिता जी ने अपनी भारी आवाज़ में किंतु धीमें स्वर में कहा____"यकीनन ऐसा ही कुछ हुआ है। वो दोनों जिस उमर से गुज़र रहे हैं उसमें अक्सर इंसान ग़लत रास्ते ही चुन बैठता है।"

"ये सब तो ठीक है पिता जी।" मैंने उनकी तरफ देखते हुए कहा____"लेकिन मेरी समझ में ये नहीं आ रहा कि आपने गौरव के बारे में खुद कोई फ़ैसला करने की बजाय मणि शंकर को ही उसका फ़ैसला करने को क्यों कहा?"

"इसकी दो वजहें थी।" पिता जी ने ठंडी सांस खींचते हुए कहा____"एक तो यही कि हम समझ गए थे कि गौरव ने अपनी मित्रता के चलते ही उन दोनों का साथ दिया था और उन तीनों के ऐसे काम में किसी चौथे का कोई हाथ नहीं था। किसी चौथे के हाथ से हमारा मतलब है कि ऐसे काम के लिए उन लोगों की मदद ना तो साहूकारों ने की है और ना ही जगताप ने। सदियों बाद हमारे साथ बने अपने अच्छे संबंधों को साहूकार लोग इस तरह से नहीं ख़राब कर सकते थे। जगताप भी ऐसी बचकानी हरकत करने या करवाने का नहीं सोच सकता था, खास कर तब तो बिलकुल भी नहीं जबकि ऐसे काम में उसकी अपनी बेटी का नाम भी शामिल हो। दूसरी वजह ये थी कि अगर साहूकार अपनी जगह सही होंगे तो वो ऐसे काम के लिए गौरव को ज़रूर ऐसी सज़ा देंगे जिससे हमें संतुष्टि मिल सके। यानि गौरव के बारे में किया गया उनका फ़ैसला ये ज़ाहिर कर देगा कि उनके दिल में हमारे प्रति किस तरह के भाव हैं?"

"यानि एक तीर से दो शिकार जैसी बात?" मैंने कहा____"एक तरफ आप ये नहीं चाहते थे कि आपके द्वारा गौरव को सज़ा मिलने से मणि शंकर अथवा उसके अन्य भाईयों के मन में हमारे प्रति कोई मन मुटाव जैसी बात पैदा हो जाए? दूसरी तरफ मणि शंकर को गौरव का फ़ैसला करने की बात कह कर आपने उसके ऊपर एक ऐसा भार डाल दिया है जिसके चलते अब उसे सोच समझ कर अपने भतीजे का फ़ैसला करना पड़ेगा?"

"बिलकुल ठीक समझे।" पिता जी ने कहा____"ख़ैर हमारी स्थिति ऐसी है कि हमारे पास हमारे दुश्मन के बारे में अब ऐसा कोई भी सुराग़ नहीं है जिससे कि हम उस तक किसी तरह पहुंच सकें इस लिए इस सबके बाद भी हमें उनसे अच्छे संबंध ही बनाए रखना होगा। तुम दोनों उनके और उनके बच्चो के साथ वैसा ही ताल मेल बना के रखोगे जैसे अच्छे संबंध बन जाने के बाद शुरू हुआ था। उन्हें ये बिलकुल भी नहीं लगना चाहिए कि गौरव के ऐसा करने की वजह से हम उनके बारे में अब कुछ अलग सोच बना बैठे हैं।"

"आज के हादसे के बाद।" बड़े भैया ने कहा____"जगताप चाचा भी हीन भावना से ग्रसित हो गए होंगे। संभव है कि वो ये भी सोच बैठें कि आज के हादसे के बाद अब हम उन्हें ही अपना वो दुश्मन समझेंगे जो हमारे चारो तरफ षडयंत्र की बिसात बिछाए बैठा है। इस लिए ज़रूरी है कि हमें उनसे भी अच्छा बर्ताव करना होगा।"

"बड़े भैया सही कह रहे हैं पिता जी।" मैंने पिता जी की तरफ देखते हुए संजीदा भाव से कहा____"हालातों के मद्दे नज़र हम इसी निष्कर्ष पर पहुंचे थे कि जगताप चाचा ही वो षड्यंत्रकारी हैं जबकि ऐसा था नहीं। साफ़ ज़ाहिर है कि असल षड्यंत्रकर्ता ने अपनी चाल के द्वारा जगताप चाचा को हमारे शक के घेरे में ला कर खड़ा कर दिया है। वो चाहता है कि हमारा आपस में ही मन मुटाव हो जाए और फिर हमारे बीच एक दिन ऐसी स्थिति आ जाए कि गृह युद्ध ही छिड़ जाए।"

"सही कहा तुमने।" पिता जी ने सिर हिलाते हुए कहा____"हमारे दुश्मन की यकीनन यही चाल है इस लिए हमें अपने अपनों के साथ बहुत ही होशो हवास में और बुद्धिमानी से ताल मेल बना के रखना होगा। ख़ैर जैसा कि हमने कहा हमारे पास दुश्मन के बारे में कोई सुराग़ नहीं है इस लिए अब हमें इस बात का ख़ास तौर से पता करना होगा कि हमारे बीच मौजूद हमारे दुश्मन का ख़बरी कौन है और वो किस तरह से हमारी ख़बरें उस तक पहुंचाता है?"

"अगर ख़बरी हमारे हाथ लग जाए तो शायद उसके द्वारा हम अपने दुश्मन तक पहुंच सकते हैं।" बड़े भैया ने कहा____"वैसे जिन जिन लोगों पर हमें शक है उन पर नज़र रखने के लिए आपने अपने आदमी तो लगा दिए हैं न पिता जी?"

"हमने अपने आदमी गुप्तरूप से उनकी नज़र रखने के लिए लगा तो दिए हैं।" पिता जी ने सोचने वाले अंदाज़ से कहा____"लेकिन हमें नहीं लगता कि इसके चलते हमें जल्द ही कोई बेहतर नतीजा मिलेगा।"

"ऐसा क्यों कह रहे हैं आप?" बड़े भैया ने उलझ गए वाले अंदाज़ से कहा____"भला ऐसा करने से हमें कोई नतीजा क्यों नहीं मिलेगा?"

"ये सच है कि हमने दुश्मन के मंसूबों को पूरी तरह से ख़ाक में मिला दिया है।" पिता जी ने हम दोनों भाईयों की तरफ बारी बारी से देखते हुए कहा____"और इसके चलते यकीनन वो बुरी तरह खुंदक खाया हुआ होगा लेकिन हमें यकीन है कि वो अपनी इस खुंदक के चलते फिलहाल ऐसा कोई भी काम नहीं करेगा जिसके चलते हमें उस तक पहुंचने का कोई मौका या कोई सुराग़ मिल सके।"

"मुझे भी ऐसा ही लगता है पिता जी।" मैंने सोचपूर्ण भाव से सिर हिलाते हुए कहा____"हमारे दुश्मन ने या ये कहें कि षड्यंत्रकर्ता ने अब तक जिस तरीके से अपने काम को अंजाम दिया है उससे यही ज़ाहिर होता है कि वो हद से भी ज़्यादा शातिर और चालाक है। भले ही हमने उसके मंसूबों को नेस्तनाबूत किया है जिसके चलते वो बुरी तरह हमसे खुंदक खा गया होगा लेकिन ऐसी परिस्थिति में भी वो ठंडे दिमाग़ से ही सोचेगा कि खुंदक खा कर अगर उसने कुछ भी हमारे साथ उल्टा सीधा किया तो बहुत हद तक ऐसी संभावना बन जाएगी कि वो हमारी पकड़ में आ जाए। इतना तो अब वो भी समझ ही गया होगा कि हमारे पास फिलहाल ऐसा कोई भी सुराग़ नहीं है जिससे कि हम उस तक पहुंच सकें और अब हम भी इसी फ़िराक में ही होंगे कि हमारा दुश्मन गुस्से में आ कर कुछ उल्टा सीधा करे ताकि हम उसे पकड़ सकें। ज़ाहिर है उसके जैसा शातिर व्यक्ति ऐसी ग़लती कर के हमें कोई भी सुनहरा अवसर नहीं प्रदान करने वाला।"

"यानि अब वो फिलहाल के लिए अपनी तरफ से कोई भी कार्यवाही नहीं करेगा।" बड़े भैया ने मेरी तरफ देखते हुए अपनी संभावना ब्यक्त की____"बल्कि कुछ समय तक वो भी मामले के ठंडा पड़ जाने का इंतज़ार करेगा।"

"बिलकुल।" पिता जी ने कहा____"लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि हम उसकी तरफ से ये सब सोच कर बेफ़िक्र हो जाएं अथवा अपनी तरफ से उसके बारे में कुछ पता लगाने की कोशिश ही न करें। एक बात अच्छी तरह ध्यान में रखो कि जब तक हमारा दुश्मन और हमारे दुश्मन का सहयोग देने वाला कोई साथी हमारी पकड़ में नहीं आता तब तक हम न तो बेफ़िक्र हो सकते हैं और ना ही बिना किसी सुरक्षा के कहीं आ जा सकते हैं।"

"आप दारोगा से मिले कि नहीं?" मैंने पिता जी की तरफ देखते हुए पूछा____"वो हमारी नौकरानी रेखा की लाश पोस्टमार्टम के लिए ले कर गया था। उसकी रिपोर्ट से और भी स्पष्ट हो जाएगा कि रेखा की मौत ज़हर खाने के चलते ही हुई थी अथवा उसकी मौत के पीछे कोई और भी कारण था।"

"रेखा ने तो खुद ही ज़हर खा कर खुद खुशी की थी ना?" बड़े भैया ने मेरी तरफ सवालिया भाव से देखते हुए कहा____"फिर तू ये क्यों कह रहा है कि उसकी मौत के पीछे कोई और भी कारण हो सकता है?"

"मेरे ऐसा कहने के पीछे कारण हैं भैया।" मैंने उन्हें समझाने वाले अंदाज़ से कहा____"सबसे पहले सोचने वाली बात यही है कि रेखा के पास ज़हर आया कहां से? ज़हर एक ऐसी ख़तरनाक चीज़ है जो उसे हवेली में तो मिलने से रही, तो फिर उसके पास कहां से आया वो ज़हर? अगर वो सच में ही खुद खुशी कर के मरना चाहती थी तो उसने हवेली में ही ऐसे तरीके से मरना क्यों पसंद किया? अपने घर में भी तो वो ज़हर खा कर मर सकती थी। दूसरी सोचने वाली बात ये कि आख़िर सुबह के उस वक्त ऐसा क्या हो गया था जिसकी वजह से खुद खुशी करने के लिए वो हवेली के ऐसे कमरे में पहुंच गई जो ज़्यादातर बंद ही रहता था? मेनका चाची के अनुसार हम लोग जब सुबह हवेली से निकल गए थे तभी कुछ देर बाद उसको खोजना शुरू किया गया था। खोजबीन करने में ज़्यादा से ज़्यादा आधा पौन घंटा लग गया होगा। उसके बाद वो एक कमरे में मरी हुई ही मिली थी। अब सवाल ये है कि उस समय जबकि हम लोग भी नहीं थे जिनसे उसे पकड़े जाने का ख़तरा था तो फिर ऐसा क्या हुआ था कि उसके मन में उसी समय खुद खुशी करने का खयाल आ गया था?"

"बात तो तुम्हारी तर्क़ संगत हैं।" पिता जी ने मेरी तरफ देखते हुए कहा_____"लेकिन ये सब कहने से तुम्हारा मतलब क्या है? आख़िर क्या कहना चाहते हो तुम?"

"मैं स्पष्ट रूप से यही कहना चाहता हूं कि मुझे पूरा यकीन है कि रेखा ने खुद अपनी जान नहीं ली है बल्कि किसी ने उसे ज़हर खाने के लिए मजबूर किया था।" मैंने ये कह कर मानों धमाका सा किया____"उस वक्त हवेली में कोई तो ऐसा था जो रेखा को अब जीवित नहीं रखना चाहता था। माना कि उस वक्त रेखा को हमारे द्वारा पकड़े जाने का डर नहीं था किंतु इसके बावजूद उसे हवेली में नौकरानी बना कर रखने वाला उसे जीवित नहीं रखना चाहता था। शायद वो रेखा को अब और ज़्यादा जीवित रखने का जोख़िम नहीं लेना चाहता था।"

"शायद तुम सही कह रहे हो।" पिता जी ने सोचने वाले भाव से सिर हिलाते हुए कहा____"लेकिन अगर सच यही है तो क्या ये बात पोस्टमार्टम करने से से पता चलेगी? हमारा ख़्याल है हर्गिज़ नहीं, ये ऐसी बात नहीं है जो लाश का पोस्टमार्टम करने से पता चले। यानि दारोगा जब आएगा तो वो भी यही कहेगा कि रेखा की मौत ज़हर खाने से हुई है। वो ये नहीं कह सकता कि रेखा ने अपनी मर्ज़ी से ज़हर खाया था या किसी ने उसे ज़हर खाने के लिए मजबूर किया था।"

"बेशक वो दावे के साथ ऐसा नहीं कह सकता।" मैंने कहा____"लेकिन पोस्टमार्टम में ज़हर के अलावा भी शायद कुछ और पता चला हो उसे। जैसे कि अगर किसी ने रेखा को ज़हर खाने के लिए मजबूर किया था तो किस तरीके से किया था? मेरा मतलब है कि क्या किसी ने उसके साथ जोर ज़बरदस्ती की थी अथवा उस पर बल प्रयोग किया था? अगर ऐसा हुआ होगा तो बहुत हद तक संभव है कि रेखा के जिस्म पर मजबूर करने वाले के कोई तो ऐसे निशान ज़रूर ही मिले होंगे जिससे हमें उसके क़ातिल तक पहुंचने में आसानी हो जाए।"

"मुझे नहीं लगता कि ऐसा कुछ मिलेगा दारोगा को।" बड़े भैया ने कहा____"और अगर मान भी लिया जाए कि रेखा के साथ किसी ने जोर ज़बरदस्ती की होगी तब भी इससे कुछ भी पता नहीं चलने वाला। ये मत भूलो कि पास के कस्बे में पोस्टमार्टम करने वाला चिकित्सक इतना भी काबिल नहीं है जो इतनी बारीक चीज़ें पकड़ सके। मैंने सुना है कि ये सब बातें बड़े बड़े महानगरों के डॉक्टर ही पता कर पाते हैं। यहां के डॉक्टर तो बस खाना पूर्ति करते हैं और अपना पल्ला झाड़ लेते हैं और कुछ देर के लिए अगर ये मान भी लें कि यहां के डॉक्टर ने ये सब पता कर लिया तब भी ये कैसे पता चल पाएगा कि रेखा के साथ जोर ज़बरदस्ती करने वाला असल में कौन था? सीधी सी बात है छोटे कि इतना बारीकी से सोचने का भी हमें कोई फ़ायदा नहीं होने वाला है।"

"हमें भी यही लगता है।" पिता जी ने गहरी सांस लेते हुए कहा_____"ख़ैर, अब सोचने वाली बात ये है कि हवेली में उस वक्त ऐसा कौन रहा होगा जिसने रेखा को ज़हर खा कर मर जाने के लिए मजबूर किया होगा? क्या वो हवेली के बाहर का कोई व्यक्ति था अथवा हवेली के अंदर का ही कोई व्यक्ति था?"

"सुबह के वक्त हवेली में बाहर का कौन व्यक्ति आया था ये तो पता चल सकता है।" मैंने कहा____"लेकिन अगर वो व्यक्ति हवेली के अंदर का ही हुआ तो उसके बारे में पता करना आसान नहीं होगा।"

"हवेली में जो नौकर और नौकरानियां हैं वो भी तो बाहर के ही हैं।" बड़े भैया ने कहा____"क्या उनमें से ही कोई ऐसा व्यक्ति हो सकता है?"

"बेशक हो सकता है।" पिता जी ने कहा____"लेकिन हवेली के जो पुरुष नौकर हैं वो हवेली के अंदर नहीं आते और अगर आते भी हैं तो ज़्यादा से ज़्यादा उन्हें बैठक तक ही आने की इजाज़त है। इस हिसाब से अगर सोचा जाए तो फिर नौकरानियां ही बचती हैं। यानि उन्हीं में से कोई रही होगी जिसने रेखा को ज़हर खाने के लिए मजबूर किया होगा।"

"रेखा और शीला के बाद।" बड़े भैया ने सोचने वाले अंदाज़ से कहा____"मौजूदा समय में हवेली पर अभी लगभग छह नौकरानियां हैं, जिनमें से चार तो ऐसी हैं जो कई सालों से पूरी वफादारी के साथ काम करती आई हैं जबकि दो नौकरानियां ऐसी हैं जिन्हें हवेली में काम करते हुए लगभग दो साल हो गए हैं। अब सवाल है कि क्या उन दोनों में से कोई ऐसी हो सकती है जिसने रेखा को ज़हर खाने के लिए मजबूर किया होगा? वैसे मुझे नहीं लगता कि उनमें से किसी ने ऐसा किया होगा। रेखा और शीला ही ऐसी थीं जिन्हें हवेली में आए हुए लगभग आठ महीने हो गए थे। वो दोनों हमारे दुश्मन के ही इशारे पर यहां काम कर रहीं थी और ये बात पूरी तरह से साबित भी हो चुकी है।"

"मामला काफी पेंचीदा है।" मैंने गहरी सांस लेते हुए कहा____"इसमें कोई शक नहीं कि हम फिर से घूम फिर कर वहीं पर आ गए हैं जहां पर आगे बढ़ने के लिए हमें कोई रास्ता नहीं दिख रहा है और ये भी हैरानी की ही बात है कि एक बार फिर से हालात हमें जगताप चाचा पर ही शक करने के लिए मजबूर कर रहे हैं। न चाहते हुए भी मन में ये ख़्याल उभर ही आता है कि कहीं जगताप चाचा ही तो वो षड्यंत्रकारी नहीं हैं?"

"यकीनन।" पिता जी ने कहा_____"लेकिन अक्सर जो दिखता है वो सच नहीं होता और ना ही हमें उस पर ध्यान देना चाहिए जिस पर कोई बार बार हमारा ध्यान आकर्षित करने की कोशिश करता हो। कोई भी व्यक्ति जो ऐसा कर रहा होता है वो अपने खिलाफ़ इतने सारे सबूत और इतना सारा शक ज़ाहिर नहीं होने देता। ज़ाहिर है कोई और ही है जो हमारे भाई को बली का बकरा बनाने पर उतारू है और खुद बड़ी होशियारी से सारा खेल खेल रहा है।"

पिता जी ने जो कहा था वो मैं भी समझ रहा था लेकिन ये समझ में नहीं आ रहा था कि ऐसा कर कौन रहा था? आख़िर क्या दुश्मनी थी हमारी उससे? आख़िर ऐसा क्यों था कि उसने सिर्फ़ हम दोनों भाईयों को ही मौत के मुंह तक पहुंचा दिया था जबकि जगताप चाचा के बेटों पर उसने किसी तरह की भी आंच नहीं लगाई थी? ये क्या रहस्य था? क्या वो जगताप चाचा और उनके परिवार को अपना समझता था या फिर ऐसा वो जान बूझ कर रहा था ताकि हम जगताप चाचा पर ही शक करें और उनके अलावा किसी और के बारे में न सोचें? कुछ देर पिता जी और बड़े भैया इसी विषय में बातें करते रहे उसके बाद वो चले गए। उनके जाने के बाद मैंने कमरे का दरवाज़ा बंद किया और पलंग पर आ कर लेट गया। सोचते विचारते पता ही न चला कब आंख लग गई मेरी।



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अध्याय - 49

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अब तक....



पिता जी ने जो कहा था वो मैं भी समझ रहा था लेकिन ये समझ में नहीं आ रहा था कि ऐसा कर कौन रहा था? आख़िर क्या दुश्मनी थी हमारी उससे? आख़िर ऐसा क्यों था कि उसने सिर्फ़ हम दोनों भाईयों को ही मौत के मुंह तक पहुंचा दिया था जबकि जगताप चाचा के बेटों पर उसने किसी तरह की भी आंच नहीं लगाई थी? ये क्या रहस्य था? क्या वो जगताप चाचा और उनके परिवार को अपना समझता था या फिर ऐसा वो जान बूझ कर रहा था ताकि हम जगताप चाचा पर ही शक करें और उनके अलावा किसी और के बारे में न सोचें? कुछ देर पिता जी और बड़े भैया इसी विषय में बातें करते रहे उसके बाद वो चले गए। उनके जाने के बाद मैंने कमरे का दरवाज़ा बंद किया और पलंग पर आ कर लेट गया। सोचते विचारते पता ही न चला कब आंख लग गई मेरी।



अब आगे....



सुबह हम सब नाश्ता कर रहे थे। एक लंबी आयताकार मेज के चारो तरफ नक्काशी की हुई लकड़ी की कुर्सियां रखी हुईं थी जिन पर हम सब बैठे नाश्ता कर रहे थे। नाश्ता करते वक्त कोई बात नहीं कर सकता था किंतु मैं महसूस कर रहा था कि जगताप चाचा बार बार पिता जी की तरफ देख कर कुछ कहने की हिम्मत जुटाते और फिर बिना कुछ बोले ही सिर झुका कर थाली पर रखे परांठे को यूं ही तोड़ने का नाटक करने लगते। उधर पिता जी को भी शायद ये आभास हो गया था इस लिए वो भी कुछ पलों के अंतराल में उनकी तरफ देख लेते थे लेकिन ये संयोग अथवा इत्तेफ़ाक ही था कि इतनी देर में अब तक उन दोनों की नज़रें आपस में टकरा नहीं पाईं थी। मैंने देखा एक तरफ विभोर और अजीत भी सिर झुकाए नाश्ता करने में व्यस्त थे। उन दोनों ने अब तक सिर ही नहीं उठाया था। मैं समझ सकता था कि कल के हादसे के बाद दोनों के अंदर अब इतनी हिम्मत ही ना बची होगी कि वो हम में से किसी से नज़रें मिला सकें।

"पहले अपने मन को शांत करके नाश्ता कर लो जगताप।" तभी सहसा ख़ामोशी को चीरते हुए पिता जी ने जगताप चाचा की तरफ देखते हुए अपनी भारी आवाज़ में कहा____"उसके बाद जो भी तुम्हारे मन में हो उसे हमसे बेझिझक कह देना।"

"ज...जी बड़े भैया।" जगताप चाचा ने धीमें स्वर में किंतु सम्मान से कहा और फिर चुपचाप नाश्ता करने लगे। पिता जी कुछ पलों तक उन्हें देखते रहे उसके बाद वो भी ख़ामोशी से नाश्ता करने लगे।

आख़िर किसी तरह हम सब का नाश्ता हुआ और फिर हम सब कुर्सियों से उठे। विभोर और अजीत ऊपर अपने कमरे की तरफ जाने लगे तो जगताप चाचा ने उन्हें रोक लिया। मैं समझ गया कि कुछ तो होने वाला है। मैंने बड़े भैया की तरफ देखा तो उन्होंने भी मुझे देखा। हमने आंखों के इशारे से ही एक दूसरे से पूछा कि जगताप चाचा आख़िर क्या करने वाले हैं पर शायद इसका जवाब न उनके पास था और ना ही मेरे पास। ख़ैर पिता जी के कहने पर कुछ ही देर में हम सब बैठक में आ गए।

"हम नहीं जानते कि तुम्हारे मन में नाश्ता करते वक्त ऐसा क्या था जिसके लिए तुम कुछ ज़्यादा ही बेचैन दिख रहे थे।" पिता जी ने अपनी सिंघासननुमा कुर्सी पर बैठने के बाद कहा____"हम ज़रूर तुम्हारे मन की बात जानना चाहेंगे किंतु उससे पहले तुम ये जान लो कि हमारे भतीजों ने वैभव के साथ जो कुछ भी किया है उसके लिए हमने उन्हें माफ़ कर दिया है और यकीन मानों तुम्हारे भतीजे ने भी अपने छोटे भाइयों को माफ़ कर दिया होगा।"

"य...ये आप क्या कह रहे हैं बड़े भैया?" जगताप चाचा ने हैरान परेशान से लहजे में कहा____"आप ऐसा कुकर्म करने वाले मेरे कपूतों को कैसे माफ़ कर सकते हैं? मैं तो कल ही उन दोनों को उनके किए की सज़ा देना चाहता था लेकिन आपने ही मुझे रोक लिया था। मुझे रात भर ये सोच सोच कर नींद नहीं आई कि मेरी अपनी औलादों ने इतना गन्दा कुकर्म किया है। मैं रात भर ऊपर वाले से यही सवाल करता रहा कि आख़िर मैंने ऐसा कौन सा पाप किया था जिसकी वजह से उसने मुझे ऐसा कुकर्म करने वाली औलादें प्रदान की है? ऐसी औलाद होने से तो अच्छा था कि मेरी कोई औलाद ही न होती। मैं तो शुरू से वैभव को ही अपने बेटे की तरह प्यार और स्नेह करता आया हूं और सच कहूं तो मुझे उसके जैसा भतीजा पाने पर गर्व भी है। माना कि उसने अपने जीवन में कुछ ग़लतियां की थीं लेकिन उसकी वो ग़लतियां ऐसी तो हर्गिज़ नहीं थी जिसके लिए किसी की अंतरात्मा को ही चोट लग जाए।"

"शांत हो जाओ जगताप।" पिता जी ने कहा____"तुम्हारे जैसे इंसान को इस तरह भावनाओं में बहना शोभा नहीं देता। हम मानते हैं कि विभोर और अजीत ने जो किया है वो बहुत ही ग़लत है किंतु तुम भी जानते हो कि ग़लतियां हर इंसान से होती हैं। इंसान ग़लती करता है तो उस ग़लती से उसे अच्छे बुरे का सबक भी मिलता है। अगर कोई किसी तरह की ग़लती ही न करे तो भला कैसे किसी को अच्छे बुरे का ज्ञान हो पाएगा। इंसान को अपने जीवन में ग़लतियां करना भी ज़रूरी है लेकिन हां, ग़लतियों से हमें सबक सीखना चाहिए और फिर दुबारा वैसी ग़लतियां ना करने का संकल्प भी लेना चाहिए।"

"पर इन्होंने ग़लती कहां की है बड़े भैया?" जगताप चाचा ने आहत भाव से कहा____"इन्होंने तो अपराध किया है। हद दर्जे का पाप किया है इन लोगों ने और पाप करने पर माफ़ी नहीं दी जाती।"

"पाप से याद आया।" पिता जी ने कुछ सोचते हुए सहसा मेरी तरफ देखा____"हमने इन दोनों के मुख से और खुद तुम्हारे मुख से ये तो सुना था कि इन लोगों ने कुसुम को मजबूर किया हुआ था। हम जानना चाहते हैं कि इन दोनों ने हमारी फूल सी कोमल बेटी को आख़िर किस तरह से मजबूर किया हुआ था? हम सब जानते हैं कि कुसुम तुम्हारी लाडली है और वो खुद भी अपने सभी भाइयों में सबसे ज़्यादा तुम्हें ही मानती हैं तो ज़ाहिर है कि वो इतनी आसानी से इस बात के लिए तैयार नहीं हुई होगी कि वो तुम्हें चाय में नामर्द बना देने वाली दवा मिला कर पिलाए। हमें यकीन है कि हमारी बच्ची मर जाना पसंद करती लेकिन वो ऐसा काम इनके कहने पर हर्गिज़ नहीं करती। इस लिए हम जानना चाहते हैं कि ऐसी कौन सी बात थी जिसकी वजह से वो मासूम इतना बड़ा अपराध करने पर मजबूर हो गई थी? ऐसी कौन सी बात थी जिसके द्वारा मजबूर हो कर वो अपने उस भाई को ही नामर्द बनाने की राह पर चल पड़ी थी जिस भाई को वो दुनिया में सबसे ज़्यादा प्यार और स्नेह करती है?"

"माफ़ कीजिए पिता जी।" मैंने सहसा दृढ़ भाव से कहा____"लेकिन मैं आपको इस बारे में कुछ भी नहीं बता सकता और मेरी आपसे विनती भी है कि इस बारे में आप इन दोनों से भी कुछ नहीं पूछेंगे।"

"आख़िर बात क्या है?" पिता जी के साथ साथ जगताप चाचा के भी चेहरे पर गहन हैरानी के भाव उभर आए थे____"तुम इस बारे में कुछ भी बताने से और हमारे द्वारा इनसे पूछने के लिए क्यों मना कर रहे हो?"

"सिर्फ़ इतना समझ लीजिए पिता जी कि मैं अपनी मासूम बहन को किसी की भी नज़रों से गिराना नहीं चाहता।" मैंने गंभीरता से कहा____"मैं नहीं चाहता कि उसके प्रति सबके दिल में जो प्यार और स्नेह है उसमें कमी आ जाए।"

मेरी बात सुन कर विभोर और अजीत के अलावा बाकी सब सोच में पड़ गए थे। बैठक में एकदम से सन्नाटा सा छा गया था। विभोर और अजीत ने तो जैसे शर्म से अपना चेहरा ही ज़मीन पर गाड़ लिया था।

"अगर हमारी फूल सी कोमल बेटी की प्रतिष्ठा का सवाल है।" फिर पिता जी ने गंभीर भाव से कहा____"तो हमें इस बारे में कुछ भी नहीं जानना और हम ये भी चाहते हैं कि कोई उससे भी इस बारे में कोई बात न करे। हम किसी भी कीमत पर अपनी बेटी के चेहरे से उसकी हंसी और उसका चुलबुलापन मिटाना नहीं चाहते। ख़ैर, हमने फ़ैसला कर लिया है कि जो कुछ भी इन दोनों ने किया है उसके लिए हम इन्हें माफ़ करते हैं और आइंदा से हम इनसे बेहतर इंसान बनने की उम्मीद करते हैं।"

"आपने भले ही इन्हें माफ़ कर दिया है बड़े भैया।" जगताप चाचा ने शख़्त भाव से कहा____"लेकिन मैं इन्हें कभी माफ़ नहीं कर सकता और ना ही इनकी शक्ल देखना चाहता हूं। मुझे माफ़ कीजिए भैया क्योंकि मैं आपके फ़ैसले के खिलाफ़ जा रहा हूं लेकिन मैं बता नहीं सकता कि इनकी वजह से मेरी अंतरात्मा को कितनी ठेस पहुंची है। मैंने फ़ैसला किया है कि अब से ये दोनों इस हवेली में ही क्या बल्कि इस गांव में ही नहीं रहेंगे।"

"तुम होश में तो हो जगताप?" पिता जी एकदम कठोर भाव से बोल पड़े थे____"ये क्या अनाप शनाप बोल रहे हो तुम?"

"माफ़ कीजिए भैया।" जगताप चाचा की आंखें छलक पड़ीं, बोले____"पर आप समझ ही नहीं सकते कि इस वक्त मेरे दिल पर क्या बीत रही है। मैंने ख़्वाब में भी नहीं सोचा था कि एक दिन मुझे अपनी ही औलाद की करनी की वजह से इस क़दर शर्मिंदा होना पड़ जाएगा कि मैं आपके सामने ही क्या बल्कि किसी के भी सामने सिर उठा कर खड़ा नहीं रह पाऊंगा। काश! ऐसी स्थिति आने से पहले मुझे मौत आ गई होती।"

"ज..जगताप।" पिता जी एकदम सिंहासन से उठ कर चाचा के पास आए और उनके कंधे पर हाथ रख कर अधीरता से बोले_____"क्या हो गया है तुम्हें? आख़िर इतना हताश और दुखी क्यों हो रहे हो तुम? तुम ये सोच भी कैसे सकते हो कि महज इतनी सी बात पर तुम हमारी नज़रों से गिर जाओगे? ये जो कुछ भी हुआ है उसके बारे में तुम्हें इतना कुछ सोचने की कोई ज़रूरत नहीं है। एक बात अच्छी तरह याद रखो कि तुम जैसा भाई पा कर हम हमेशा से गर्व करते आए हैं और तुम्हारे प्रति हमारे दिल में जो ख़ास जज़्बात हैं वो कभी नहीं मिट सकते। इस लिए ये सब बेकार की बातें सोच कर तुम खुद को हताश और दुखी मत करो। विभोर और अजीत जितना तुम्हारे बेटे हैं उतना ही वो हमारे भी बेटे हैं। हम अच्छी तरह जानते हैं कि उनके अंदर वैभव के प्रति जो ईर्ष्या पैदा हुई थी उसने एक दिन नफ़रत का रूप ले लिया और फिर उस नफ़रत ने उनसे ऐसा कर्म करवा दिया था। हमें यकीन है कि अब वो ऐसी ग़लती दुबारा नहीं करेंगे, इसी लिए उनकी इस ग़लती को उनकी आख़िरी ग़लती समझ कर हमने उन्हें माफ़ कर देना बेहतर समझा।"

"आप सच में महान हैं भैया।" जगताप चाचा आंसू भरी आंखों से देखते हुए बोले____"मुझे अपनी सेवा और अपनी क्षत्रछाया से कभी दूर मत कीजिएगा। आप मेरे सब कुछ हैं। मैं मरते दम तक आपकी छाया बन कर आपके साथ रहना चाहता हूं।"

"एकदम पागल हो तुम।" पिता जी ने लरजते स्वर में कहा और जगताप चाचा को अपने गले से लगा लिया। उनकी आंखें भी नम हो गईं थी। मैं और बड़े भैया दोनों भाईयों के इस प्रेम को देख कर एक अलग ही तरह का सुखद एहसास महसूस करने लगे थे। उन्हें इस तरह एक दूसरे के गले से लगा हुआ देख मैंने बड़े भैया की तरफ देखा। उन्होंने भी मुझे बड़े ही प्रेम भाव से देखा और फिर हल्के से मुस्कुराए। जाने क्यों मेरे अंदर के जज़्बात मचल उठे और मैं एकदम से उनसे लिपट गया। उनके सीने से लगा तो बड़ा ही सुखद एहसास हुआ जिसके चलते मेरी आंखें सुकून से बंद हो गईं।



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हवेली के बाहर अचानक शोर गुल सुनाई दिया तो बैठक में बैठे हम सब चौंके। अभी मैं शोर गुल सुन कर बाहर जाने ही वाला था कि तभी एक दरबान अंदर आया। पिता जी के पूछने पर उसने बताया कि गांव के कुछ लोग चेहरे पर आक्रोश लिए हाथी दरवाज़े के अंदर आ गए हैं और बार बार दादा ठाकुर से न्याय चाहिए की बातें कह रहे हैं। दरबान की बात सुन कर पिता जी एक झटके में अपने सिंहासन से उठ खड़े हुए। उसके बाद फ़ौरन ही हम सब उनके पीछे बाहर की तरफ चल दिए।

बाहर आए तो देखा सच में गांव के काफी सारे लोग हवेली के मुख्य दरवाज़े से थोड़ी दूरी पर खड़े थे। उन लोगों में शीला और रेखा के पति भी थे। उन दोनों को देख कर मैं समझ गया कि वो लोग कौन से न्याय पाने की चाहत में यहां आए हैं।

"क्या बात है? तुम सब यहां एक साथ किस लिए आए हो?" पिता जी ने उन सबकी तरफ देखते हुए थोड़ा ऊंची आवाज़ में पूछा।

"हम सब यहां आपसे न्याय मांगने आए हैं दादा ठाकुर।" उन लोगों में से उस व्यक्ति ने तेज़ आवाज़ में कहा जिसका नाम सरजू था।

"आख़िर बात क्या है?" पिता जी ने ऊंची आवाज़ में ही पूछा____"किस तरह का न्याय मांगने आए हो तुम लोग हमसे?"

"छोटे मुंह बड़ी बात होगी दादा ठाकुर।" सरजू ने सहसा अपने हाथ जोड़ते हुए कहा____"आज तक हम गांव वाले कभी आपके सामने इस तरह नहीं आए और ना ही कभी आपसे ज़ुबान लड़ाने की हिम्मत की है लेकिन हमारे साथ जो कुछ हुआ है उसका इंसाफ़ कौन करेगा? आप हमारे माई बाप हैं, इस लिए आपसे ही तो न्याय के लिए गुहार लगाएंगे न?"

"बिलकुल।" पिता जी ने कहा____"और ये तुम सबका अधिकार भी है। तुम सबकी तक़लीफों को सुनना और उन्हें दूर करना हमारा फर्ज़ है। इस लिए अगर तुम लोगों के साथ किसी प्रकार की नाइंसाफी हुई है तो उसके लिए तुम लोग बेझिझक हो कर इंसाफ़ की मांग कर सकते हो। ख़ैर, अब बताओ कि तुम लोगों के साथ क्या नाइंसाफी हुई है और किसने नाइंसाफी की है?"

"माफ़ कीजिए दादा ठाकुर पर नाइंसाफी तो आपके द्वारा ही की गई है।" उन लोगों में से एक कलुआ नाम के आदमी ने कहा____"हमारे घर की औरतें आपकी हवेली में काम करती हैं और फिर बेवजह ही अचानक से उनकी मौत हो जाती है। क्या हमारा ये जानने का भी हक़ नहीं है कि रेखा और शीला की इस तरह से मौत कैसे हो गई? अभी कल शाम की ही बात है, छोटे ठाकुर शीला को खोजते हुए उसके घर आए थे और उसके कुछ ही समय बाद उसकी हत्या हो गई। उसके पहले सुबह रेखा के बारे में पता चला था कि उसने ज़हर खा कर खुद खुशी कर ली थी। हम जानना चाहते हैं दादा ठाकुर कि हम ग़रीबों के घर की औरतों के साथ अचानक ये सब क्यों और कैसे हो गया? आख़िर क्यों रेखा ने खुद खुशी की और क्यों शीला की हत्या कर दी गई?"

"रेखा और शीला के साथ जो कुछ भी हुआ है।" पिता जी ने गंभीरता से कहा____"वो यकीनन बहुत बुरा हुआ है और हम खुद इस बात से हैरान और परेशान हैं कि उनके साथ ये अचानक से क्यों हो गया? हम इस सबके बारे में पता लगा रहे हैं। जिस किसी का भी उन दोनों की मौत में हाथ होगा उसे शख़्त से शख़्त सज़ा दी जाएगी।"

"हमें इन बातों से मत बहलाइए दादा ठाकुर।" रंगा नाम के आदमी ने पिता जी को घूरते हुए कहा____"रेखा ने आपकी हवेली में खुद खुशी की थी तो ज़ाहिर है कि हवेली में ही कुछ ऐसा हुआ होगा जिसके चलते उसे खुद खुशी कर के अपनी जान देनी पड़ी। क्या पता हवेली में किसी ने उसे ज़हर खिला कर जान से मार दिया हो और अफवाह ये उड़ा दी गई कि उसने खुद खुशी की है। इसी तरह देवधर की बीवी को खोजने आपके छोटे बेटे कुंवर आए थे और उसके कुछ ही देर बाद आपके ही बाग़ में उसकी गला रेत कर हत्या कर दी गई। ज़ाहिर है कि शीला की हत्या का मामला भी हवेली से ही जुड़ा है। हम जानना चाहते हैं दादा ठाकुर कि असलियत क्या है?"

"तुम लोगों की हिम्मत कैसे हुई दादा ठाकुर पर आरोप लगाने की?" जगताप चाचा एकाएक गुस्से से चीख पड़े थे। रंगा की बातें सुन कर गुस्सा तो मुझे भी बहुत ज़्यादा आ गया था किंतु मुझसे पहले जगताप चाचा बोल पड़े थे_____"क्या तुम लोग रेखा और शीला की मौत का जिम्मेदार हमें समझते हो?"

"शांत हो जाओ जगताप।" पिता जी ने बड़े धैर्य से कहा_____"इन पर इस तरह गुस्से से चिल्लाना ठीक नहीं है।"

"क्यों ठीक नहीं है बड़े भैया?" जगताप चाचा मानों बिफर ही पड़े____"इन लोगों की हिम्मत कैसे हुई हम पर इस तरह से आरोप लगाने की? इनके कहने का तो यही मतलब है कि रेखा और शीला की मौत के जिम्मेदार हम ही हैं। ये साफ़ साफ़ हमें उन दोनों का हत्यारा कह रहे हैं।"

"तो क्या ग़लत कह रहे हैं ये लोग?" पिता जी ने शांत भाव से कहा____"रेखा ने हवेली में खुद खुशी की तो इसके जिम्मेदार हम हैं, इसी तरह शीला की हत्या हमारे बाग़ में हुई तो उसके जिम्मेदार भी हम ही हैं। दोनों का हवेली से संबंध था यानि हमसे। ये लोग अगर उन दोनों की मौत का जिम्मेदार हमें ठहरा रहे हैं तो ग़लत नहीं है। हमें इन सबको जवाब देना पड़ेगा जगताप। हमें इनको बताना पड़ेगा कि हमारी हवेली में काम करने वाली दो दो नौकरानियां अचानक से मौत का ग्रास क्यों बन गईं?"

"तो जवाब देने से इंकार कहां कर रहे हैं हम बड़े भैया?" जगताप चाचा ने कहा____"हम खुद भी तो जानना चाहते हैं कि ऐसा क्यों हुआ है लेकिन इसके लिए ये लोग सीधे तौर पर आप पर आरोप नहीं लगा सकते।"

"जिनके घर की औरतों की इस तरह मौत हो गई हो उनकी मनोदशा के बारे में सोचो जगताप।" पिता जी ने कहा____"ये सब दुखी हैं। इस दुख में इन्हें कुछ भी समझ में नहीं आ रहा कि ये लोग क्या कह रहे हैं? इनकी जगह पर खुद को रख कर सोचोगे तो समझ जाओगे कि ये लोग अपनी जगह ग़लत नहीं हैं।"

पिता जी जगताप चाचा को समझा रहे थे और मैं ख़ामोशी से खड़ा ये सोच रहा था कि पिता जी गांव वालों पर गुस्सा क्यों नहीं हुए? वो चाहते तो एक पल में इन लोगों की हेकड़ी निकाल देते, ये कह कर कि जिन रेखा और शीला की मौत का आरोप वो हम पर लगा रहे हैं वही रेखा और शीला हमारे दुश्मन के कहने पर हमारे खिलाफ़ जाने क्या क्या गुल खिला रहीं थी। मैं इस बात से थोड़ा हैरान था कि पिता जी इस बात को उनसे कहने की बजाय उनसे ऐसा कोमल बर्ताव कर रहे थे? मुझे लगा ज़रूर उनके ऐसा करने के पीछे कोई ना कोई ख़ास कारण होगा, पर क्या?

"हम तुम लोगों का दुख अच्छी तरह समझते हैं।" पिता जी की इस बात से मैं ख़्यालों से बाहर आया। उधर वो गांव वालों से कह रहे थे____"और हमें इस बात का भी बुरा नहीं लगा कि तुम लोग रेखा और शीला की मौत का आरोप हम पर लगा रहे हो। तुम्हारी जगह हम होते तो हम भी ऐसा ही करते। इस बात को कोई नहीं नकार सकता कि उन दोनों की मौत हमारी हवेली और हमारे बाग़ पर हुई है लेकिन ऐसा क्यों और कैसे हुआ है इस बात का हम पता लगा कर ही रहेंगे। तुम लोग हमारे पास इंसाफ़ के लिए आए हो तो यकीन मानो हम ज़रूर इंसाफ़ करेंगे लेकिन उसके लिए हमें थोड़ा वक्त चाहिए। हम उम्मीद करते हैं कि तब तक के लिए तुम सब शांति और धैर्य से काम लोगे।"

पिता जी की ये बातें सुन कर गांव वाले आपस में कुछ खुसुर फुसुर करने लगे। कुछ देर बाद रंगा नाम के आदमी ने कहा____"ठीक है दादा ठाकुर, अगर आप हमसे थोड़ा वक्त चाहते हैं तो हमें मंजूर है और कृपया हमें माफ़ कीजिए कि हमने आपसे ऐसे तरीके से बातें की लेकिन यकीन मानिए हम में से किसी का भी इरादा आपका अपमान करने का नहीं था और ना ही कभी हो सकता है।"

रंगा की इस बात के बाद पिता जी ने सबको खुशी खुशी अपने अपने घर लौट जाने को कहा जिससे वो सब वापस चले गए। उन लोगों के चले जाने के बाद हम लोग भी वापस बैठक में आ गए। गांव वालों का इस तरह से हवेली पर आना और उन लोगों द्वारा इस तरीके से हम पर आरोप लगाते हुए बातें करना कोई मामूली बात नहीं हुई थी। ऐसा पहली बार हुआ था कि गांव के लोग बेख़ौफ हो कर हमारी हवेली पर आए थे और पूरी निडरता से हमसे ऐसी बातें की थी। ज़ाहिर है ये सब हमारे लिए काफी गंभीर बात हो गई थी।

पिता जी ने जगताप चाचा को इस मामले के बारे में पता लगाने का काम सौंपा तो वो बड़े अदब के साथ सिर नवा कर चले गए। विभोर और अजीत भी अंदर चले गए थे। अब बैठक में हम सिर्फ़ तीन लोग ही थे।

"आपने जगताप चाचा को इस मामले के बारे में पता लगाने का काम क्यों सौंपा पिता जी?" मैंने पिता जी को कुछ सोचते हुए देखा तो उनसे पूछा____"क्या आपको यकीन है कि वो इस मामले का पूरी ईमानदारी से पता लगाएंगे?"

"हम जानते हैं कि तुम दोनों के मन में इस वक्त कई सवाल होंगे।" पिता जी ने गहरी सांस लेते हुए कहा____"किंतु वक्त और हालात को देखते हुए हमारा ऐसा करना ज़रूरी था। जगताप को भी हमने इसी लिए ये काम सौंपा ताकि उसके मन में ये ख़्याल न उभरे कि हम उस पर संदेह करने लगे हैं। उसे ये काम सौंप कर हमने उसके मन में यही बात बैठाई है कि हमारी नज़र में अभी भी उसकी वही अहमियत है जो हमेशा से रही है। इससे वो खुश भी होगा और अपने काम में लगा भी रहेगा। अगर वो अपनी जगह बेकसूर है तो इस मामले में वो कुछ न कुछ तो करेगा ही और अगर वो हमारे खिलाफ़ है तब भी उसके द्वारा कुछ न कुछ करने से हमें लाभ हो सकता है। उसके लिए ज़रूरी है कि उस पर बारीकी से नज़र रखी जाए।"

"आपको क्या लगता है आज के वक्त में गांव के लोग हमारे बारे में क्या सोचते होंगे?" बड़े भैया ने पिता जी की तरफ देखते हुए थोड़ा झिझकते हुए पूछा____"अभी जिस तरह से गांव के कुछ लोगों ने हवेली में आ कर आपसे ऐसे लहजे में बातें की उससे क्या आपको नहीं लगता कि उनके अंदर से हमारे प्रति मान सम्मान और डर जैसी बात जा चुकी है?"

"हमारी सोच एवं नज़रिए में और तुम्हारी सोच तथा नज़रिए में यही तो फ़र्क है बर्खुरदार।" पिता जी ने हम दोनों को अजीब भाव से देखते हुए कहा____"तुम दोनों वो देख रहे थे जो फिलहाल मायने नहीं रखता था जबकि हम वो देख रहे थे जो उन लोगों में ख़ास नज़र आ रहा था। तुम दोनों ने शायद इस बात पर ध्यान ही नहीं दिया कि गांव के जो लोग आए हुए थे उनमें से सिर्फ़ वही लोग ऐसी बातें कर रहे थे जो रेखा और शीला के कुछ भी नहीं लगते थे। उन लोगों के बीच रेखा का पति मंगल और शीला का पति देवधर दोनों ही मौजूद थे लेकिन उन दोनों ने एक बार भी इस मामले में हमसे कुछ भी नहीं कहा। क्या तुम लोग इस बात को समझते हो कि ऐसा क्यों हुआ होगा?"

पिता जी की बातें सुन कर तथा उनके इस सवाल पर मैं और बड़े भैया एक दूसरे की तरफ देखने लगे और समझने की कोशिश करने लगे। उधर पिता जी हम दोनों की तरफ कुछ देर ख़ामोशी से देखते रहे उसके बाद हल्के से मुस्कुराए।

"हर समय जोश से नहीं बल्कि होश से काम लेना चाहिए।" फिर उन्होंने जैसे हम दोनों भाईयों को समझाते हुए कहा____"जिस वक्त वो लोग उस लहजे में हमसे बातें कर रहे थे उस वक्त हमें भी बुरा लगा था और हमारा भी दिमाग़ ख़राब हुआ था। मन में एकदम से ख़्याल उभर आया था कि उन लोगों की हिम्मत कैसे हुई हमसे ऐसे लहजे में बात करने की लेकिन हमने अपने अंदर मचल उठे गुस्से को रोका और ठंडे दिमाग़ से काम लिया। तभी तो हमें नज़र आया कि उन लोगों के यहां आने का असल मकसद क्या था?"

"आप ये क्या कह रहे हैं पिता जी?" बड़े भैया बोल ही पड़े____"मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा।"

"पर शायद मुझे समझ आ गया है भैया।" मैंने बड़े भैया की तरफ देखते हुए कहा____"शायद पिता जी के कहने का मतलब ये है कि गांव वालों का हवेली में आना और उनके द्वारा हमसे ऐसे लहजे में बात करने के पीछे एक ख़ास कारण है। जैसा कि पिता जी ने कहा उन लोगों में वही लोग हमसे ऐसे लहजे में बातें कर रहे थे और इंसाफ़ की मांग कर रहे थे जो रेखा और शीला के कुछ भी नहीं लगते थे जबकि रेखा और शीला दोनों के ही पति चुप थे। इसका मतलब ये हुआ कि किसी ने उनमें से कुछ लोगों को हमारे खिलाफ़ भड़काया है।"

"तुम्हारे कहने का मतलब है कि सरजू कलुआ और रंगा तीनों ऐसे व्यक्ति थे जिन्हें हमारे खिलाफ़ भड़काया गया है?" बड़े भैया ने हैरानी से मेरी तरफ देखते हुए कहा तो मैंने कहा_____"बिलकुल, शायद यही सच पिता जी हमसे ज़ाहिर करना चाहते हैं।"

"हां, लेकिन ज़रूरी नहीं कि सिर्फ सरजू कलुआ और रंगा ही ऐसे व्यक्ति हैं जिन्हें हमारे खिलाफ़ भड़काया गया होगा।" पिता जी ने कहा_____"संभव है कि गांव के कुछ और लोगों को भी इसी तरह भड़काया गया हो। अभी तो फिलहाल तीन लोग ही नज़र में आए हैं लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि ये हमारे लिए निहायत ही गंभीर बात है। उन तीनों की भड़काने वाली बातों से मंगल और देवधर उस वक्त कुछ बोले नहीं थे इससे उन लोगों को अपने मकसद में आगे बढ़ने का अवसर नहीं मिला था लेकिन ऐसी स्थिति हमेशा नहीं रहने वाली है। अगर सच में उनका इरादा मंगल और देवधर को हमारे खिलाफ़ कर देना ही है तो वो देर सवेर अपने इस इरादे में ज़रूर सफल हो जाएंगे।"

"ये तो सच में विकट समस्या वाली बात हो गई पिता जी।" बड़े भैया गंभीरता से कह उठे____"ऐसी स्थिति में अब हमें क्या करना चाहिए?"

"हमें सरजू कलुआ और रंगा पर नज़र रखनी होगी।" पिता जी ने कहा____"वो भी कुछ इस तरीके से कि उन्हें खुद पर नज़र रखी जाने की भनक तक न लग सके। अगर वाकई में उन तीनों के इरादे नेक नहीं हैं और वो किसी के कहने पर ही ऐसा कर रहे हैं तो ज़रूर उन पर नज़र रखे जाने से हमें कुछ न कुछ फ़ायदा मिलेगा।"

"फिर तो हमें जल्द ही अपने कुछ भरोसे के आदमियों को उन पर नज़र रखने के काम पर लगा देना चाहिए पिता जी।" मैंने जोशपूर्ण भाव से कहा____"हमारे पास फिलहाल अपने असल दुश्मन तक पहुंचने का कोई रास्ता या सुराग़ नहीं है तो अगर इस तरह में हमारे हाथ कुछ लग जाता है तो ये बड़ी बात ही होगी।"

कुछ देर और इस संबंध में पिता जी से हमारी बातें हुईं उसके बाद हम दोनों भाई बैठक से चले गए। एक तरफ जहां मैं इस मामले से गंभीर सोच में डूब गया था वहीं दूसरी तरफ इस बात से खुश भी था कि मेरे बड़े भैया अब मेरे साथ थे और ऐसे मामले में वो भी हमारे साथ क़दम से क़दम मिला कर चल रहे थे।



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अध्याय - 50

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अब तक....



"फिर तो हमें जल्द ही अपने कुछ भरोसे के आदमियों को उन पर नज़र रखने के काम पर लगा देना चाहिए पिता जी।" मैंने जोशपूर्ण भाव से कहा____"हमारे पास फिलहाल अपने असल दुश्मन तक पहुंचने का कोई रास्ता या सुराग़ नहीं है तो अगर इस तरह में हमारे हाथ कुछ लग जाता है तो ये बड़ी बात ही होगी।"




कुछ देर और इस संबंध में पिता जी से हमारी बातें हुईं उसके बाद हम दोनों भाई बैठक से चले गए। एक तरफ जहां मैं इस मामले से गंभीर सोच में डूब गया था वहीं दूसरी तरफ इस बात से खुश भी था कि मेरे बड़े भैया अब मेरे साथ थे और ऐसे मामले में वो भी हमारे साथ क़दम से क़दम मिला कर चल रहे थे।



अब आगे....



दोपहर का खाना खाने के बाद मैं और बड़े भैया एक साथ ही ऊपर अपने अपने कमरे की तरफ चले थे। जैसे ही हम दोनों ऊपर पहुंचे तो पीछे से विभोर के पुकारने पर हम दोनों ही ठिठक कर पलटे। हमने देखा विभोर और अजीत सीढ़ियां चढ़ते हुए ऊपर ही आ रहे थे। ये पहली बार था जब उनमें से किसी ने मुझे पुकारा था। ख़ैर जल्दी ही वो दोनों ऊपर हमारे पास आ कर खड़े हो गए। दोनों हमसे नज़रें चुरा रहे थे।

"क्या बात है?" मैंने दोनों की तरफ बारी बारी से देखते हुए सामान्य भाव से पूछा____"कोई काम है मुझसे?"

"ज...जी भैया वो मैं आपसे कुछ कहना चाहता हूं।" विभोर ने झिझकते हुए धीमें स्वर में कहा तो मैंने कहा____"जो भी कहना है बेझिझक कहो और हां, मेरे सामने तुम्हें शर्मिंदा होने की कोई ज़रूरत नहीं है। मैं चाहता हूं कि जो बीत गया है उसे भूल जाओ और एक नए सिरे से किंतु साफ़ नीयत के साथ अपने जीवन की शुरुआत करो। ख़ैर, अब बोलो क्या कहना चाहते हो मुझसे?"

"मुझे माफ़ कर दीजिए भैया।" विभोर ने दुखी भाव से कहा____"मैंने आपके साथ क्या क्या बुरा नहीं किया लेकिन इसके बाद भी आप मुझसे इतने अच्छे से बात कर रहे हैं और सब कुछ भूल जाने को कह रहे हैं। पता नहीं वो कौन सी मनहूस घड़ी थी जब मेरे मन में आपके प्रति ईर्ष्या का भाव पैदा हो गया था, उसके बाद तो जैसे मुझे किसी बात का होश ही नहीं रह गया था।"

"भूल जाओ वो सब बातें।" मैंने विभोर के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा____"हर इंसान से ग़लतियां होती हैं। तुमने तो शायद पहली बार ही ऐसी ग़लती की थी जबकि मैंने तो न जाने कितनी ग़लतियां की हैं। ख़ैर अच्छी बात ये होनी चाहिए कि इंसान ऐसी ग़लतियां दुबारा न करे और कुछ ऐसा कर के दिखाए जिससे लोग उसकी वाह वाही करने लगें।"

"अब से हम दोनों ऐसा ही काम करेंगे वैभव भैया।" अजीत ने कहा____"अब से हम दोनों वही करेंगे जिससे आपका और हमारे खानदान का नाम ऊंचा हो। अब से हम किसी को भी शिकायत का मौका नहीं देंगे, लेकिन उससे पहले हम अपनी बहन से माफ़ी मांगना चाहते हैं।"

"हां भैया।" विभोर ने कहा____"हमने अपनी मासूम सी बहन का बहुत दिल दुखाया है। अब जबकि हमें अपनी ग़लतियों का एहसास हुआ है तो ये भी एहसास हो रहा है कि हमने उसके साथ कितनी बड़ी ज़्यादती की है। ऊपर वाला हम जैसे भाई किसी बहन को न दे।"

"मुझे खुशी हुई कि तुम दोनों को अपनी ग़लतियों का एहसास हो गया है।" बड़े भैया ने कहा____"लेकिन सिर्फ एहसास होने बस से इंसान अच्छा नहीं बन जाता बल्कि उसके लिए उसे प्रायश्चित करना होता है और ऐसे कर्म करने पड़ते हैं जिससे कि उस इंसान की अंतरात्मा खुश हो जाए जिसका उसने दिल दुखाया होता है। ख़ैर अब तुम जाओ और कुसुम से अपने किए की माफ़ी मांग लो। वैसे मुझे यकीन है कि वो तुम दोनों को बड़ी सहजता से माफ़ कर देगी क्योंकि हमारी बहन का दिल बहुत ही विशाल है।"

बड़े भैया के ऐसा कहने पर विभोर और अजीत ने अपनी अपनी आंखों के आंसू पोंछे और कुसुम के कमरे की तरफ बढ़ गए। उनके जाने के बाद हम दोनों एक दूसरे की तरफ देख कर मुस्कुरा उठे। मैंने कुछ सोचते हुए भैया को एक अहम काम सौंपा और खुद वापस सीढ़ियों की तरफ बढ़ चला।



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मैं हवेली से निकल कर अपनी बुलेट से हाथी दरवाज़े के पास ही पहुंचा था कि मुझे मुंशी चंद्रकांत एक आदमी के साथ मिल गया। मुझे देखते ही दोनों ने सलाम किया। मैंने कई दिनों बाद आज मुंशी को देखा था जिसके चलते मेरे मन में कई सारे सवाल खड़े हो गए थे।

"आज कल तो आप इर्द का चांद हो गए हैं मुंशी जी।" मैंने मोटर साईकिल उसके क़रीब ही खड़े कर के कहा____"काफ़ी दिन से आप कहीं नज़र ही नहीं आए।"

"मैं अपने बेटे के साथ उसकी ससुराल गया हुआ था छोटे ठाकुर।" मुंशी ने अपनी खीसें निपोरते हुए कहा____"ठाकुर साहब की इजाज़त ले कर ही गया था। असल में बात ये थी कि मेरी समधन काफी बीमार थीं तो उन्हीं का हाल चाल देखने गया था। वैसे गया तो मैं एक दिन के लिए ही था क्योंकि यहां काम ही इतना था कि मुझे ज़्यादा समय तक कहीं रुकने की फुर्सत ही नहीं थी किंतु वहां से जल्दी वापस आ ही नहीं पाया। समधन ने ज़बरदस्ती रोके रखा ये कह कर कि कभी आते नहीं हैं तो कम से कम एक दो दिन तो सेवा करने का मौका मिलना ही चाहिए। बड़ी मुश्किल से वहां से छूटा तो एक दिन के लिए अपनी ससुराल चला गया। असल में कोमल बिटिया काफी समय से वहीं थी तो सोचा उसको भी घर ले आऊं। अभी घंटा भर पहले ही हम सब घर पहुंचे थे। थोड़ी देर आराम करने के बाद सीधा हवेली चला आया। डर रहा हूं कि कहीं ठाकुर साहब मेरे इस तरह अवकाश करने से नाराज़ ना हो गए हों।"

"चलिए कोई बात नहीं मुंशी जी।" मैं मन ही मन ये सोच कर थोड़ा खुश हो गया था कि मुंशी अपनी बेटी कोमल को उसकी ननिहाल से घर ले आया है, किंतु प्रत्यक्ष में बोला_____"जाइए पिता जी हवेली में ही हैं। मैं किसी काम से बाहर जा रहा हूं।"

मुंशी से विदा ले कर मैं आगे बढ़ चला। मैं सोच रहा था कि क्या मुंशी सच बोल रहा था अथवा झूठ? क्या वो सच में इतने दिनों से अपने बेटे के साथ उसकी ससुराल में था या किसी और ही काम से गायब था? वैसे अभी तक मुंशी या उसके बेटे ने ऐसा कोई भी काम नहीं किया था जिसके चलते उन दोनों बाप बेटे पर शक किया जाए किंतु हालात ऐसे थे कि किसी पर भी अब भरोसा करने लायक नहीं रह गया था।

मुंशी की बहू रजनी का रूपचंद्र से जिस्मानी संबंध था और ये मेरे लिए बड़ी ही हैरानी तथा सोचने की बात थी कि दोनों के बीच ऐसा संबंध कब और किन परिस्थितियों में बना होगा? रजनी से मेरे भी संबंध थे और रजनी से ही बस क्यों बल्कि उसकी सास प्रभा से भी थे लेकिन जाने क्यों मेरा दिल अब रजनी पर भरोसा करने से इंकार कर रहा था। क्या वो रूपचंद्र के साथ मिल कर मेरे साथ कोई खेल खेल रही थी या फिर रूपचंद्र से उसका संबंध सिर्फ़ मज़े लेने तक ही सीमित था? वैसे पहली बार जब मैंने उसे छुप कर रूपचंद्र के साथ संबंध बनाते देखा था तब वो जिस तरह से रूपचंद्र को अपनी बातों से जला रही थी उससे तो यही लगता था कि वो मन से रूपचंद्र के साथ नहीं है। रूपचंद्र से जिस्मानी संबंध बनाना ज़रूर उसकी मजबूरी ही होगी। रूपचंद्र इस मामले में कितना कमीना था ये मुझसे बेहतर भला कौन जानता था? मैं इस बारे में जितना सोच रहा था उतना ही मुझे लगता जा रहा था कि रजनी मजबूरी में ही रूपचंद्र के साथ जिस्मानी संबंध बनाए हुए होगी। हालाकि औरत का भेद तो ऊपर वाला भी नहीं जान सकता लेकिन रजनी मेरे साथ कोई खेल खेल रही थी ये बात मुझे हजम नहीं हो रही थी।

जल्दी ही मैं साहूकारों के घर के सामने पहुंच गया। सड़क के किनारे ही एक पीपल का पेड़ था जिसमें पक्का चबूतरा बना हुआ था किंतु इस वक्त वो खाली था। कड़ाके की धूप थी इस लिए दोपहर में कोई घर से बाहर नहीं निकल सकता था। मैंने कुछ पल सोचा और साहूकारों के घर की तरफ बुलेट को मोड़ दी। लोहे का गेट खुला हुआ था इस लिए मैं फ़ौरन ही लंबे चौड़े लॉन से होते हुए उनके मुख्य द्वार पर पहुंच गया। बुलेट की तेज़ आवाज़ जैसे ही बंद हुई तो दरवाज़ा खुला और जिस शख्सियत पर मेरी नज़र पड़ी उसे तो बस देखता ही रह गया।

दरवाज़े के बीचों बीच दोनों पल्लों को पकड़े रूपचंद्र की बहन रूपा खड़ी थी। उसके गोरे बदन पर हल्के सुर्ख रंग का लिबास था जिसमें वो बेहद खूबसूरत दिख रही थी। चांद की तरह खिला हुआ चेहरा मुझे देखते ही हल्का गुलाबी सा पड़ गया था। कुछ पलों के लिए यूं लगा जैसे वक्त अपनी जगह पर ठहर गया हो। मैं उसे देख कर हल्के से मुस्कुराया तो जैसे उसकी तंद्रा टूटी और वो एकदम से हड़बड़ा गई। मैं उसे यूं हड़बड़ा गया देख कर हल्के से हंसा और फिर उसी की तरफ बढ़ा। मुझे अपनी तरफ बढ़ता देख उसके चेहरे पर एकदम से घबराहट के भाव उभर आए, तभी अंदर से किसी की आवाज़ आई।

"अगर किस्मत में ऐसे ही हर रोज़ इस चांद का दीदार होना लिख जाए।" मैंने रूपा के क़रीब पहुंचते ही किसी गए गुज़रे हुए आशिक़ों की तरह आहें भरते हुए कहा____"तो बंदा दुनिया के हर ज़ुल्मो सितम को सह कर भी हुस्न वालों की दहलीज़ पर दौड़ता हुआ आएगा। क़सम से तुम्हें देखने के बाद अब अगर मौत भी आ जाए तो ग़म न होगा।"

"अच्छा जी ऐसा है क्या?" रूपा ने बहुत ही धीमें स्वर में किंतु शर्माते हुए कहा तो मैंने उसकी आंखों में देखते हुए कहा_____"कोई शक है क्या?"

"कौन आया है रूपा?" अंदर से एक बार फिर किसी औरत की आवाज़ आई तो हम दोनों ही हड़बड़ा गए और मैं उससे थोड़ा दूर खड़ा हो गया।

"हवेली से कोई आया है मां।" रूपा ने मेरी तरफ देखते हुए किंतु मुस्कुराते हुए कहा____"लगता है रास्ता भटक गया है।"

"ये तो ज़ुल्म है यार।" मैंने धीमें स्वर में कहा____"जान बूझ कर अजनबी बना दिया मुझे जबकि होना तो ये चाहिए था कि चीख चीख कर सबको बताती कि एक दीवाना आया है तुम्हारा।"

"हां, ताकि मेरे घर वाले मेरे जिस्म की बोटी बोटी कर के चील कौवों को खिला दें।" रूपा ने आंखें दिखाते हुए किंतु मुस्कुरा कर कहा____"बड़े आए एक दीवाना आया है बोलवाने वाले... हुह!"

"आज शाम को मंदिर में मिलो।" मैंने अपनी बढ़ी हुई धड़कनों को काबू करते हुए कहा तो उसने आंखें सिकोड़ते हुए कहा____"क्यों...क्यों मिलूं भला?"

"अपनी देवी के दर्शन करने हैं मुझे।" मैंने मुस्कुराते हुए कहा_____"और दर्शन के साथ साथ देवी की पूजा भी करनी है। उसके बाद अगर देवी मेरी पूजा से प्रसन्न हो जाए तो वो मुझे मीठा मीठा प्रसाद भी दे सकती है।"

रूपा अभी कुछ बोलने ही वाली थी कि तभी अंदर से आती हुई एक औरत दिखी जिससे मैं थोड़ा और दूर खड़ा हो गया। मैंने रूपा को भी इशारा कर दिया कि उसके पीछे कोई आ रहा है। कुछ ही पलों में अंदर से आने वाली औरत रूपा के पास पहुंच गई। शायद वही उसकी मां ललिता थी। उन्हें देख कर मैंने बड़े आदर भाव से हाथ जोड़ कर उन्हें प्रणाम किया जिस पर उन्होंने मुस्कुराते हुए मुझे आशीर्वाद दिया।

"बाहर क्यों खड़े हो वैभव बेटा अंदर आओ ना।" रूपा की मां ललिता देवी ने बड़े प्रेम भाव से कहा____"ये लड़की भी ना, एक भी अक्ल नहीं है इसमें। देखो तो घर आए मेहमान को अंदर आने के लिए भी नहीं कहा। जाने कब अक्ल आएगी इसे?"

"मैं मेहमान नहीं हूं काकी।" मैंने नम्र भाव से कहा____"मैं तो आपका बेटा हूं और ये घर भी तो मेरा ही है। क्या इतना जल्दी मुझे पराया कर दिया आपने?"

"अरे! नहीं नहीं बेटा।" ललिता देवी एकदम से हड़बड़ा गईं, फिर सम्हल कर बोलीं____"ऐसी तो कोई बात नहीं है। तुमने सच कहा ये तुम्हारा ही घर है और तुम मेरे बेटे ही हो। अब चलो बातें छोड़ो और अंदर आओ।"

"माफ़ करना काकी।" मैंने कहा____"अभी अंदर नहीं आऊंगा। असल में किसी काम से जा रहा था तो सोचा काका लोगों से मिल कर उनका आशीर्वाद ले लूं और सबका हाल चाल भी पूंछ लूं लेकिन लगता है कि काका लोग अंदर हैं नहीं?"

"हां तुमने सही कहा बेटा।" ललिता देवी ने कहा____"असल में घर के सभी मर्द और बच्चे हमारी जेठानी की लड़की आरती के लिए एक जगह लड़का देखने गए हुए हैं। सब कुछ ठीक ठाक रहा तो रिश्ता पक्का हो जाएगा और फिर जल्दी ही ब्याह के लिए लग्न भी बन जाएगी।"

"अरे वाह! ये तो बहुत ही खुशी की बात है काकी।" मैंने खुशी ज़ाहिर करते हुए कहा____"जल्द ही इस घर में शहनाईयां बजेंगी। मैं तो कहता हूं काकी कि घर की सभी लड़कियों का ब्याह कर के जल्द से जल्द उनकी छुट्टी कर दो आप और मेरे भाईयों का ब्याह कर के नई नई बहुएं ले आओ।"

"ऐसा क्यों कह रहे हैं आप?" रूपा अपनी मां के सामने ही एकदम से बोल पड़ी____"हम लड़कियां क्या अपने मां बाप के लिए बोझ बनी हुई हैं जो वो जल्दी से हमारा ब्याह कर के इस घर से हमारी छुट्टी कर दें?"

"देखिए ऐसा है कि दुनिया के कोई भी माता पिता अपनी लड़कियों से ये नहीं कहते कि उनकी लड़कियां उनके लिए बोझ हैं।" मैंने रूपा को छेड़ने के इरादे से मुस्कुराते हुए कहा____"जबकि सच तो यही होता है कि लड़कियां सच में अपने माता पिता के लिए बोझ ही होती हैं। मैं सही कह रहा हूं ना काकी?"

"हां बेटा, बहुत हद तक तुम्हारी ये बात सही है।" ललिता देवी ने गहरी सांस लेते हुए कहा____"लड़कियां उन माता पिता के लिए यकीनन बोझ जैसी ही होती हैं जो अपनी लड़कियों का ब्याह कर पाने में समर्थ नहीं होते। जिनके घर में खाने के लिए दो वक्त की रोटी नहीं होती और अपनी जवान बेटियों के तन को ढंकने के लिए कपड़े नहीं होते। ऐसे माता पिता के लिए लड़कियां न चाहते हुए भी बोझ सी ही लगने लगती हैं।"

जाने क्यों मुझे ऐसा लगा जैसे इस मामले की बात शुरू हो जाने से माहौल थोड़ा संजीदा सा हो गया है इस लिए मैंने काकी से बाद में आने का कह कर उन्हें प्रणाम किया और उनसे विदा ले कर वापस चल पड़ा। काकी से नज़र बचा कर मैंने एक बार फिर से रूपा को आज शाम मंदिर में मिलने का इशारा कर दिया था। मुझे यकीन था रूपा मुझसे मिलने के लिए मंदिर ज़रूर आएगी।

एक बार फिर से मैं बुलेट में बैठ कर आगे बढ़ चला। मुंशी के घर के पास पहुंच कर मैंने एक नज़र उस तरफ देखा और फिर आगे बढ़ गया। काफी समय से मैं अपने नए निर्माण हो रहे मकान की तरफ नहीं जा पाया था। इस लिए मैं तेज़ रफ़्तार में उस तरफ बढ़ता चला जा रहा था। जिस तरफ मेरा मकान बन रहा था वहां पर जाने के लिए मुख्य सड़क से बाएं तरफ मुड़ना होता था। कुछ दूरी से बंजर ज़मीन शुरू हो जाती थी। पथरीली ज़मीन पर कई तरह के पेड़ पौधे भी थे। हालाकि पथरीली ज़मीन का क्षेत्रफल ज़्यादा नही था। यूं तो मुरारी काका के गांव की तरफ जाने के लिए मुख्य सड़क थी किंतु एक पगडंडी वाला रास्ता भी मुरारी के गांव की तरफ जाता था जो कि वहीं से हो कर गुज़रता था जिस तरफ मेरा नया मकान बन रहा था।

कुछ ही देर में मैं उस जगह पहुंच गया जहां पर मेरा मकान बन रहा था। मकान भुवन की निगरानी में बन रहा था इस लिए वो वहीं मौजूद था। मुझे देखते ही उसने मुझे सलाम किया और मकान के कार्य के बारे में सब कुछ बताने लगा।

"शहर से जिन लोगों को बुलाया था वो अपना काम कर रहे हैं ना?" मैंने भुवन की तरफ देखते हुए पूछा तो उसने कहा____"हां छोटे ठाकुर, आपके कहे अनुसार वो लोग रात में बड़ी सावधानी से अपना काम कर रहे हैं और इस बात का पता मेरे और आपके अलावा किसी और को बिल्कुल भी नहीं है। यहां तक कि यहां के इन मजदूरों और मिस्त्रियों को भी इस बात का आभास नहीं हुआ कि इसी मकान के नीचे गुप्त रूप से कोई तहखाना भी बनाया जा रहा है।"

"किसी को इस बात का आभास होना भी नहीं चाहिए भुवन।" मैंने सपाट लहजे में कहा____"यहां तक कि दादा ठाकुर तथा जगताप चाचा को भी नहीं। यूं समझो कि इस बात को तुम्हें हमेशा हमेशा के लिए अपने सीने में ही राज़ बना के दफ़न कर लेना है।"

"जी मैं समझ गया छोटे ठाकुर।" भुवन ने सिर हिलाते हुए कहा____"मैं अपना सिर कटा दूंगा लेकिन इस बारे में किसी को भी पता नहीं लगने दूंगा।"

"बहुत बढ़िया।" मैंने भुवन के कंधे को अपने हाथ से थपथपाते हुए कहा____"ख़ैर, और भी कुछ ऐसा है जो तुम्हें बताना चाहिए मुझे?"

"पिछले एक हफ्ते से तो हवेली का कोई भी सदस्य इस तरफ नहीं आया है।" भुवन ने कहा____"लेकिन दो दिन पहले आपके दो मित्र यहां आए थे और यहां के बारे में पूछ रहे थे। ये भी पूछा कि आप आज कल कहां गायब रहते हैं?"

"मेरे तो दो ही मित्र ऐसे हैं जो बचपन से मेरे साथ रहे हैं।" मैंने भुवन की तरफ देखते हुए किंतु सोचने वाले भाव से कहा____"चेतन और सुनील। क्या यही दोनों आए थे यहां?"

"हां हां छोटे ठाकुर।" भुवन एकदम से बोल पड़ा____"दोनों एक दूसरे का यही नाम ले रहे थे।"

भुवन से मैंने कुछ देर और बात की उसके बाद उसे सतर्क रहने का बोल कर मुरारी काका के घर की तरफ चल पड़ा। मैं सोच रहा था कि चेतन और सुनील यहां किस लिए आए होंगे और मेरे बारे में क्यों पूछ रहे थे? अगर उन्हें मुझसे मिलना ही था तो वो सीधा हवेली ही आ सकते थे। उन दोनों का तो हमेशा से ही हवेली में आना जाना रहा है। हालाकि इधर जब मुझे तड़ीपार कर दिया गया था तब वो कभी मुझसे मिलने इस जगह पर नहीं आए थे। ख़ैर मुझे याद आया कि मैंने उन दोनों को जासूसी करने का काम सौंपा था किंतु तब से ले कर अब तक में वो दोनों मुझसे मिले ही नहीं थे। दोनों मेरे बचपन के मित्र थे और हमने साथ में जाने क्या क्या कांड किए थे लेकिन अब हमारे बीच वैसा जुड़ाव नहीं रह गया था। एकदम से मुझे लगने लगा कि कहीं वो दोनों भी किसी फ़िराक में तो नहीं हैं? काफी दिनों से मेरी उन दोनों से मुलाक़ात नहीं हुई थी। मैं तो ख़ैर क‌ई सारे झमेलों में फंसा हुआ था लेकिन वो भला किस झमेले में फंसे हुए थे कि एक बार भी मुझसे मिलने हवेली नहीं आए। ये सब सोचते सोचते मुझे आभास होने लगा कि दाल में कुछ तो काला ज़रूर है। दोनों की गांड तोड़नी पड़ेगी अब, तभी सच सामने आएगा।

सोचते विचारते मैं मुरारी काका के घर पहुंच गया। बुलेट का इंजन बंद कर के जैसे ही मैं दरवाज़े के पास आया तो दरवाज़ा खुला। आज का दिन कदाचित बहुत ही बढ़िया था। उधर साहूकार के घर का दरवाज़ा जब खुला था तो एक खूबसूरत चेहरा नज़र आया था और अब मुरारी के घर का दरवाज़ा खुला तो अनुराधा की हल्की सांवली सूरत नज़र आ गई। एक ऐसी सूरत जिसमें दुनिया जहान की मासूमियत, भोलापन और सादगी कूट कूट कर भरी हुई थी। मुझे देखते ही उसके चेहरे पर एक ख़ास तरह की चमक के साथ साथ हल्की शर्म की लाली भी उभर आई थी।

"कैसी हो ठकुराईन?" मैंने मुस्कुराते हुए उसे छेड़ने के इरादे से धीमी आवाज़ में कहा तो वो एकदम शर्म से सिमट गई। गुलाबी होठों पर थिरक रही मुस्कान पलक झपकते ही गहरी पड़ गई। उसने बड़ी मुश्किल से नज़र उठा कर मेरी तरफ देखा और फिर धीमें स्वर में कहा____"आप क्यों बार बार मुझे ठकुराईन कहते हैं?"

"क्यों न कहूं?" मैंने उसे और छेड़ा____"आख़िर तुम हो तो ठकुराईन ही। अगर तुम्हें मेरे द्वारा ठकुराईन कहने पर ज़रा सा भी एतराज़ होता तो तुम्हारे होठों पर इस तरह मुस्कान न उभर आती।"

"तो क्या चाहते हैं आप कि मैं आपके द्वारा ठकुराईन कहने पर आप पर गुस्सा हुआ करूं?" अनुराधा ने अपनी मुस्कान को छुपाने की नाकाम कोशिश करते हुए कहा था।

"क्यों नहीं।" मैंने उसकी गहरी आंखों में देखा____"तुम्हें मुझ पर गुस्सा होने का पूरा हक़ है। तुम मेरी डंडे से पिटाई भी कर सकती हो।"

"धत्त! ये क्या कह रहे हैं आप?" अनुराधा मेरी बात सुन कर बुरी तरह चौंकी थी, फिर शर्माते हुए बोली____"मैं भला कैसे आपकी पिटाई कर सकती हूं?"

"क्यों नहीं कर सकती?" मैंने मुस्कुराते हुए कहा____"अगर मैं कोई ग़लती करता हूं तो तुम्हें पूरा हक़ है मेरी पिटाई करने का।"

"न जी न।" अनुराधा शरमा कर दरवाज़े से एक तरफ हट गई, फिर अपनी मुस्कुराहट को दबाते हुए बोली____"मैं तो ऐसा सोच भी नहीं सकती।"

"काकी नहीं है क्या अंदर?" मैंने अंदर आंगन की तरफ नज़र डालते हुए पूछा तो अनुराधा ने ना में सिर हिला दिया।

मैं ये जान कर बेहद खुश हुआ कि सरोज काकी घर में नहीं है। वो दरवाज़े से हट गई थी, ज़ाहिर है वो चाहती थी कि मैं घर के अंदर आऊं वरना वो शुरू में ही मुझे बता देती और अपने बर्ताव से ये भी ज़ाहिर कर देती कि उसकी मां के न होने पर मैं अंदर न आऊं। ख़ैर, मैं अंदर आया तो अनुराधा ने बिना कुछ कहे दरवाज़ा बंद कर दिया।

"अच्छा तो इसी लिए तुम इतना बेझिझक हो कर मुझसे बातें कर रही थी।" मैंने आंगन के पार बरामदे में रखी खटिया पर बैठते हुए कहा____"और मुझ अकेले लड़के को छेड़ रही थी। आने दो काकी को, मैं काकी को बताऊंगा कि कैसे तुम मुझ मासूम को अकेला देख कर मुझे छेड़ रही थी।"

"हाय राम! कितना झूठ बोलते हैं आप।" अनुराधा बुरी तरह चकित हो कर बोली____"मैंने कब छेड़ा आपको और ये क्या कहा आपने कि आप मासूम हैं? भला कहां से मासूम लगते हैं आप?"

"बोलती रहो।" मैं मन ही मन हंसते हुए बोला____"सब कुछ बताऊंगा काकी को। ये भी कि तुम मुझे मासूम मानने से साफ़ इंकार कर रही थी।"

"अगर आप ऐसी बातें करेंगे तो मैं आपसे कोई बात नहीं करूंगी।" अनुराधा के चेहरे पर इस बार मैंने घबराहट के भाव देखे। शायद वो मेरी इस बात को सच मान बैठी थी कि मैं काकी को सब कुछ बता दूंगा।

"कमाल है।" मैंने उसके मासूम से चेहरे पर छा गई घबराहट को देखते हुए कहा____"कैसी ठकुराईन हो तुम जो मेरी इतनी सी बात पर इस क़दर घबरा गई?"

"मैं कोई ठकुराईन वकुराईन नहीं हूं समझे आप?" अनुराधा ने बुरा सा मुंह बनाते हुए कहा____"और हां अब मुझे आपसे कोई बात नहीं करना। आप जाइए यहां से, वैसे भी अगर मां आ गई और उसने मुझे आपके साथ यूं अकेले में देख लिया तो मेरी ख़ैर नहीं होगी।"

"ओह! तो मेरी अनुराधा रूठ गई है मुझसे?" जाने कैसे मेरे मुख से मेरी अनुराधा निकल गया, जिसका आभास होते ही मेरी धड़कनें एकदम से तेज़ हो गईं और मैं अनुराधा की तरफ देखने लगा। यही हाल अनुराधा का भी हुआ था। वो आंखें फाड़े मेरी तरफ देखने लगी थी, किंतु जल्दी ही सम्हली और फिर बोली____"ये क्या कह रहे हैं आप? मैं आपकी अनुराधा कैसे हो गई?"

"पता नहीं कैसे मेरे मुख से निकल गया?" मैंने अपनी घबराहट को दबाने का प्रयास करते हुए कहा____"वैसे क्या तुम्हें मेरी अनुराधा कह देने पर एतराज़ है?"

"हां बिलकुल एतराज़ है मुझे।" अनुराधा के चेहरे पर अजीब से भाव उभर आए थे____"मैं सिर्फ़ अपने माता पिता की अनुराधा हूं किसी और की नहीं। अगर आप ये समझते हैं कि आप बाकी लड़कियों की तरह मुझे भी अपने जाल में फंसा लेंगे तो ये आपकी सबसे बड़ी भूल है छोटे ठाकुर।"

मैं अनुराधा के चेहरे पर मौजूद भावों को देख कर एकदम से हैरान रह गया था। मुझे ज़रा भी उम्मीद नहीं थी कि वो मेरी इस बात से इस हद तक बिदक जाएगी। मुझे समझ न आया कि जो अनुराधा मुझे देखते ही शर्माने और मुस्कुराने लगती थी वो मेरी इतनी सी बात से इस तरह कैसे बर्ताव कर सकती थी? वैसे सच कहूं तो हैरान मैं खुद भी अपने आप पर हुआ था कि यूं अचानक से कैसे मेरे मुख से मेरी अनुराधा जैसा संबोधन निकल गया था मगर अब जब निकल ही गया था तो मैं भला क्या ही कर सकता था?

"अब जल्दी से कोई डंडा खोज कर लाओ।" फिर मैंने बात को एक अलग ही दिशा में मोड़ने की गरज से कहा____"और उस डंडे से मेरी पिटाई करना शुरू कर दो।"

"ये क्या कह रहे हैं आप?" अनुराधा मेरी बात सुन कर मानो उलझ गई तो मैंने उसे समझाते हुए कहा____"सही तो कह रहा हूं मैं। कुछ देर पहले मैंने तुमसे कहा था ना कि अगर मैं कोई ग़लती करता हूं तो तुम्हें मेरी पिटाई करने का पूरा हक़ है। अब क्योंकि मैंने ग़लती की है तो इसके लिए तुम्हें डंडे से मेरी पिटाई करनी चाहिए।"

"बातें मत बनाइए।" अनुराधा ने कहा____"सब समझती हूं मैं। अगर आपके मन में मेरे प्रति यही सब है तो चले जाइए यहां से। अनुराधा वो लड़की हर्गिज़ नहीं है जो आपके जाल में फंस जाएगी। हम ग़रीब ज़रूर हैं छोटे ठाकुर लेकिन अपनी जान से भी ज्यादा हमें अपनी इज्ज़त प्यारी है।"

"तो फिर ये भी जान लो अनुराधा कि तुम्हारी इज्ज़त मुझे भी खुद अपनी जान से भी ज़्यादा प्यारी है।" अनुराधा की बातें सुन कर जाने क्यों मेरे दिल में एक टीस सी उभर आई थी, बोला____"मैं खुद मिट्टी में मिल जाना पसंद करूंगा लेकिन तुम्हारी इज्ज़त पर किसी भी कीमत पर दाग़ नहीं लगा सकता और ना ही किसी के द्वारा लगने दे सकता हूं। मैं जानता हूं कि मेरा चरित्र ही ऐसा है कि किसी को भी मेरी किसी सच्चाई पर यकीन नही हो सकता लेकिन एक बात तुम अच्छी तरह समझ लो अनुराधा कि मैं चाहे सारी दुनिया को दाग़दार कर दूं लेकिन तुम पर दाग़ लगाने की कल्पना भी नहीं कर सकता। मैं तुम्हें कई बार बता चुका हूं कि तुम वो लड़की हो जिसने मेरे मुकम्मल वजूद को बदल दिया है और मुझे खुशी है कि तुमने मेरा कायाकल्प कर दिया है। तुमसे हसी मज़ाक करता हूं तो एक अलग ही तरह का एहसास होता है। मेरे मन में अगर ग़लती से भी तुम्हारे प्रति कोई ग़लत ख़्याल आ जाता है तो मैं अपने आपको कोसने लगता हूं। ख़ैर, मैं तुम्हें कोई सफाई नहीं देना चाहता। अगर तुम्हें लगता है कि मेरे यहां आने का सिर्फ़ यही एक मकसद है कि मैं तुम्हें भी बाकी लड़कियों की तरह अपने जाल में फंसाना चाहता हूं तो ठीक है। मैं तुम्हें वचन देता हूं कि ठाकुर वैभव सिंह आज के बाद तुम्हारे इस घर की दहलीज़ पर अपने क़दम नहीं रखेगा। तुम्हारे साथ जो चंद खूबसूरत लम्हें मैंने बिताए हैं वो जीवन भर मेरे लिए एक अनमोल याद की तरह रहेंगे। ये भी वचन देता हूं कि इस घर के किसी भी सदस्य पर किसी के द्वारा कोई आंच नहीं आने दूंगा। चलता हूं अब, ऊपर वाला तुम्हें हमेशा खुश रखे।"

मैं ये सब बोलने के बाद एक झटके से चारपाई से उठा और अनुराधा की तरफ देखे बिना ही तेज़ कदमों के द्वारा आंगन से होते हुए घर से बाहर निकल गया। इस वक्त मेरे अंदर एक आंधी सी चल रही थी। दिल में सागर की लहरों की तरह जज़्बात मानों बेकाबू हो कर हिलोरे मार रहे थे। मैं अपनी बुलेट पर बैठा और उसे स्टार्ट कर तेज़ी से आगे बढ़ गया। जैसे जैसे अनुराधा का घर पीछे छूटता जा रहा था वैसे वैसे मुझे ऐसा महसूस हो रहा था मानो मेरा एक खूबसूरत संसार मुझसे बहुत दूर होता जा रहा है। दिलो दिमाग़ पर मचलते तूफान को बड़ी मुश्किल से दबाते हुए मैं आगे बढ़ा चला जा रहा था।

जिस तरफ मेरे नए बन रहे मकान के लिए रास्ता जा रहा था उस तरफ न जा कर मैं हवेली जाने वाले रास्ते की तरफ बढ़ चला। कच्चा पगडंडी वाला रास्ता था जिसके दोनों तरफ कुछ बड़े बड़े पेड़ थे। मैं जैसे ही उन पेड़ों के थोड़ा पास पहुंचा तो एकदम से दो आदमी उन पेड़ों से निकल कर सड़क के किनारे खड़े हो गए। दोनों के हाथ में मजबूत लट्ठ मौजूद था।



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अध्याय - 51

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अब तक....

जिस तरफ मेरे नए बन रहे मकान के लिए रास्ता जा रहा था उस तरफ न जा कर मैं हवेली जाने वाले रास्ते की तरफ बढ़ चला। कच्चा पगडंडी वाला रास्ता था जिसके दोनों तरफ कुछ बड़े बड़े पेड़ थे। मैं जैसे ही उन पेड़ों के थोड़ा पास पहुंचा तो एकदम से दो आदमी उन पेड़ों से निकल कर सड़क के किनारे खड़े हो गए। दोनों के हाथ में मजबूत लट्ठ मौजूद था।

अब आगे.....

कुसुम अपने कमरे में पलंग पर लेटी बार बार अपनी आंखें बंद कर के सोने का प्रयास कर रही थी किंतु हर बार बंद पलकों में कुछ ऐसे दृश्य और कुछ ऐसी बातें उभर आतीं कि वो झट से अपनी आंखें खोल देने पर बिवस हो जाती थी। ऐसा सिर्फ़ आज ही नहीं हो रहा था बल्कि ऐसा तो उसके साथ जाने कब से हो रहा था। पिछले कुछ महीनों से दिन में कभी भी आसानी से उसकी आंख नहीं लगती थी और यही हाल रातों का भी था। पिछले कुछ महीनों से वो जो करने पर मजबूर थी उसकी वजह से वो अंदर ही अंदर बेहद दुखी थी और उस सबकी वजह से उसे एक पल के लिए भी शांति नहीं मिलती थी।

दो दिन पहले तक उसे सिर्फ़ इसी बात का दुख असहनीय पीड़ा देता था कि उसका जो भाई उसे अपनी जान से भी ज़्यादा प्यार और स्नेह देता है वो उसी को चाय में नामर्द बनाने वाली दवा मिला कर पिलाने पर मजबूर है। हर वक्त उसके ज़हन में बस एक ही ख़्याल आता था कि वो ये जो कुछ भी कर रही है वो निहायत ही ग़लत है। माना कि वो अपनी इज्ज़त और मर्यादा को छुपाने के लिए वो सब कर रही थी लेकिन इसके बावजूद उसे यही लगता था कि उसके इतने अच्छे भाई का जीवन उसके अपने जीवन और उसकी अपनी इज्ज़त मर्यादा से कहीं ज़्यादा अनमोल है। वो अक्सर ये सोच कर अकेले में रोती थी कि वैभव भैया उस पर कितना भरोसा करते हैं, यानि अगर वो चाय में ज़हर मिला कर भी उन्हें पीने को देगी तो वो खुशी से पी लेंगे।अपने भाई के साथ वो हर रोज़ कितना बड़ा विश्वासघात करती है। ये ऐसी बातें थीं जिन्हें सोच सोच कर कुसुम तकिए में अपना मुंह छुपाए घंटों रोती रहती और अपने भाई से अपने किए की माफ़ियां मांगती रहती। कभी कभी उसके मन में एकदम से ख़्याल उभर आता कि अपने भाई से इतना बड़ा विश्वासघात करने के बाद अब उसे जीवित रहने का कोई अधिकार नहीं है। इस ख़्याल के चलते कई बार उसने खुदकुशी करने का मन बनाया लेकिन फिर ये सोच कर वो खुदकुशी भी नहीं कर पाई कि अगर उसने ऐसा किया तो उसका भाई उसे कभी माफ़ नहीं करेगा। उसके यूं मर जाने पर उसके भाई को बहुत दुख होगा और वो भला कैसे ये चाह सकती है कि उसकी वजह से उसके वैभव भैया को ज़रा सा भी कोई दुख हो?

एक समय था जब पूरी हवेली में कुसुम की हंसी और उसकी शरारतें गूंजती थीं। कोई कितना ही उदास क्यों न हो लेकिन कुसुम का सामना होते ही उस व्यक्ति के होठों पर मुस्कान उभर आती थी। विभोर उमर में उससे बड़ा था लेकिन अजीत छोटा था इसके बावजूद वो दोनों भाई उसे सताते रहते थे लेकिन सिर्फ़ वैभव का प्यार और स्नेह ही उसे इतना काफ़ी लगता था जिसकी वजह से वो कभी किसी भी बात पर अपने होठों की मुस्कान और शरारतें करना नहीं छोड़ती थी। वो जानती थी कि वैभव उसका वो भाई है जो उसके लिए दुनिया के कोने कोने से खुशियां खोज कर ला सकता है और ऐसा होता भी था। हवेली में वैभव के रहते किसी की मजाल नहीं होती थी कि कोई कुसुम से ऊंची आवाज़ में बात कर ले। वैभव के रहते कुसुम खुद एक शेरनी बन जाती थी। उसे ऐसा लगने लगता था जैसे हवेली में अब सिर्फ़ उसी का राज हो गया है। अपने बाप की भी ना सुनने वाला वैभव उसकी हर बात सुनता था और उसकी हर ख़्वाइश को पूरा करता था, फिर उसके लिए चाहे उसे खुद दादा ठाकुर से ही क्यों न टकरा जाना पड़े। ये सब देख कर जगताप अक्सर कहता था कि जिस दिन उसकी बेटी ब्याह होने के बाद हवेली से चली जाएगी तब क्या होगा वैभव का? कैसे रह पाएगा वो अपनी लाडली बहन कुसुम के बिना और खुद कुसुम कैसे अपने ससुराल में रह पाएगी अपने वैभव भैया के बिना?

"मुझे माफ़ कर दीजिए भैया।" जाने किस दृश्य को देख कर सहसा कुसुम की आंखों से आसूं छलक पड़े और वो रूंधे गले से किंतु धीमें स्वर में बोल पड़ी_____"आपकी इस बहन में इतनी हिम्मत नहीं है कि वो आपके सामने अपनी मजबूरी का सच बता सके। मैं जानती हूं कि आपको शायद बहुत कुछ पता चल गया है लेकिन इसके बावजूद आपने मुझसे कोई गिला शिकवा नहीं किया। उस दिन आप मुझसे जिनके लिए सज़ा मिलने की बात कह रहे थे न, मैं तभी समझ गई थी कि शायद आपको सब पता चल गया है। मैं जानती हूं कि आप उन लोगों को कड़ी से कड़ी सज़ा देना चाहते थे जिन्होंने आपकी बहन का दिल दुखाया है लेकिन भला मैं ये कैसे ऐसा चाह सकती थी? वो भी तो मेरे भाई ही हैं। भला कैसे कोई बहन अपने भाइयों को सबके सामने इस तरह से जलील होते या सज़ा पाते देख सकती थी? उन्होंने मेरा दिल दुखाया, मेरी आत्मा तक को छलनी किया, इसके बावजूद मैं उन्हें माफ़ कर देना चाहती हूं। मैं उनकी तरह नहीं हूं और मुझे यकीन है कि आप भी मुझसे ऐसी ही उम्मीद करते होंगे।"

पलंग पर तकिए में अपना मुंह छुपाए कुसुम रोते हुए जाने क्या क्या बड़बड़ाए जा रही थी। रोने से उसकी आंखें सुर्ख पड़ गईं थी और गोरा चेहरा भी। दोपहर में जब सब लोग खाना खा रहे थे तो कुसुम खाना परोसने के लिए रसोई से बाहर नहीं आई थी। अपने से उसकी हिम्मत ही नहीं पड़ती थी कि वो अपने उस भाई का सामना करे जो भाई उसे दुनिया में सबसे ज़्यादा प्यार और स्नेह करता है। एक दो बार वैभव के कमरे में उसे जाना पड़ा था लेकिन वो भी उसकी मजबूरी ही थी।

"शीला ने आपको सब कुछ बता दिया होगा न?" कुसुम के जहन में सहसा बिजली सी कौंधी तो वो बेहद दुखी भाव से बड़बड़ाई____"वो सब भी ना जो मैं किसी भी कीमत पर आपको जानने नहीं देना चाहती थी? आप सोच रहे होंगे न कि आपकी बहन कितनी गंदी है और उसके मन में कैसे कैसे गंदे विचार हैं? नहीं नहीं, भगवान के लिए ऐसा मत सोचिएगा भैया। आपकी बहन गंदी नहीं है। वो तो उस दिन मेरी सखियां खेल खेल में पता नहीं वो सब क्या करने लगीं थी। सब उनका ही दोष है भैया, मेरा यकीन कीजिए। मुझे नहीं पता था कि वो इतनी गन्दी हैं वरना मैं उनके साथ कोई खेल ही नहीं खेलती।"

कुसुम की आंखें लगातार आंसू बहाए जा रहीं थी। वो खुद से ही बड़बड़ा रही थी किंतु उसे एहसास यही हो रहा था मानों वो अपने भैया वैभव को ही ये सब बता रही हो जिसके चलते उसे बेहद शर्म भी आ रही थी।

"आप अपनी इस बहन से नाराज़ मत होना भैया।" कुसुम के दिल में सहसा एक हूक सी उठी जिसके चलते वो एकदम से फफक कर रो पड़ी____"और ना ही अपनी इस बहन के बारे में ग़लत सोचना। मैं आपकी वही छोटी और मासूम बहन हूं जिसे आप अपनी जान समझते हैं। बस एक बार अपनी इस बहन को माफ़ कर दीजिए न।"

अभी कुसुम ये सब बड़बड़ाते हुए रो ही रही थी कि तभी कमरे के दरवाज़े पर दस्तक हुई जिसके चलते वो बुरी तरह हड़बड़ा गई। पलंग पर झट से वो उठ कर बैठ गई और जल्दी जल्दी अपने आंसू पोंछने लगी। चेहरे पर घबराहट के भाव उभर आए थे। धड़कते दिल से वो कमरे के दरवाज़े को घूरने लगी थी। तभी दस्तक फिर से हुई और साथ ही बाहर से विभोर ने आवाज़ भी दी जिसे सुन कर कुसुम के चेहरे का मानों रंग ही उड़ गया। उससे जवाब में कुछ बोलते न बन पड़ा। बाहर से विभोर ने उसे आवाज़ दे कर दरवाज़ा खोलने के लिए कहा था। कुसुम की सांसें जैसे कुछ पलों के लिए रुक ही गईं थी लेकिन फिर जल्दी ही उसने खुद को सम्हाला और अपने दुपट्टे से जल्दी जल्दी अपने हुलिए को ठीक किया। तत्पश्चात वो पलंग से नीचे उतरी और फिर जा कर उसने दरवाज़ा खोला। दरवाज़े के बाहर अपने दोनों भाईयों को खड़े देख उसके चेहरे पर सहसा एक अजीब सी शख़्ती उभर आई।

"हम दोनों तुझसे माफ़ी मांगने आए हैं कुसुम।" विभोर ने अपनी नज़रें झुका कर दुखी भाव से कहा____"हम जानते हैं कि हमने तुझसे जो काम करवा के अपराध किया है उसके लिए हमें कोई माफ़ी नहीं मिलनी चाहिए फिर भी अपने गुनाहों के लिए तुझसे माफ़ी मांगने आए हैं।"

विभोर की ये बातें सुन कर कुसुम को मानों बिजली की तरह झटका लगा। वो हैरत से आंखें फाड़े अपने बड़े भाई विभोर को देखने लगी थी। उसे अपने कानों पर यकीन नहीं हुआ। उसे ज़रा भी उम्मीद नहीं थी कि उसके अपने भाई किसी दिन उससे माफ़ी भी मांग सकते हैं।

"हां दीदी।" विभोर के थोड़ा पीछे खड़ा अजीत भी अपने बड़े भाई के जैसे बोल पड़ा____"हम अपने किए पर बहुत शर्मिंदा हैं। वैभव भैया से ईर्ष्या करने के चलते पता नहीं हम क्या क्या कर बैठे जिसका कभी हमें आभास ही नहीं हुआ। ईर्ष्या और नफ़रत में अंधे हो कर हमने अपनी ही बहन को ऐसे काम के लिए मजबूर किया जो हर तरह से ग़लत था। हमें तो भाई कहलाने का भी हक़ नहीं रहा दीदी। हो सके तो हमें माफ़ कर दीजिए।"

कुसुम को एकदम से ऐसा लगा जैसे वो खुली आंखों से अचानक ही सपना देखने लगी है। उसने तेज़ी से अपने सिर को झटका। उसके लिए अपने भाइयों द्वारा कही गई ये सब बातें किसी बड़े झटके से कम नहीं थी। उसकी आंखों के सामने क़रीब दो क़दम की दूरी पर उसके दोनों भाई खड़े थे जिनके सिर अपराध बोध के चलते झुके हुए थे। कुसुम को समझ न आया कि वो उन दोनों की बातों पर क्या प्रतिक्रिया दे अथवा क्या जवाब दे?

"माफ़ी मुझसे नहीं।" फिर उसने किसी तरह खुद को सम्हाला और सपाट लहजे में कहा____"बल्कि उस इंसान से मांगिए जिनके साथ आप दोनों ने मुझसे बुरा करवाया है।"

"वैभव भैया से हमने माफ़ी मांग ली है और उन्होंने हम दोनों को माफ़ भी कर दिया है।" विभोर ने इस बार संजीदा भाव से कहा____"वो बहुत अच्छे हैं, उनका दिल बहुत विशाल है।"

"आपको पता है दीदी।" अजीत ने कहा____"पिता जी तो हमें जान से ही मार देना चाहते थे लेकिन ताऊ जी ने उन्हें ऐसा करने नहीं दिया। उसके बाद ताऊ जी ने भी हमें उस सबके लिए माफ़ कर दिया। हमने भी अब प्रण कर लिया है कि अब से हम दोनों ऐसा काम करेंगे जो हमारे साथ साथ हमारे समूचे खानदान के लिए बेहतर हो।"

"हमें सच में अपने किए पर बहुत पछतावा हो रहा है कुसुम।" कुसुम को कुछ न बोलता देख विभोर ने गंभीरता से कहा____"और अपने आपसे घृणा हो रही है। मन करता है किसी सूखे कुएं में कूद कर अपनी जान दे दें।"

"अगर वैभव भैया ने आप दोनों को माफ़ कर दिया है तो समझ लीजिए कि मैंने भी माफ़ कर दिया।" कुसुम ने पहले जैसे ही सपाट लहजे में कहा____"अब आप दोनों जाइए यहां से।"

"तेरा चेहरा और लहजा बता रहा है कि तूने दिल से हमें माफ़ नहीं किया है।" विभोर ने कुसुम की तरफ देखते हुए कहा____"बस एक बार माफ़ कर दे मेरी बहन। मैं समझ सकता हूं कि जो कुछ हमने तुझसे करवाया है वो सब भूलना इतना आसान नहीं है तेरे लिए।"

"मैं उस बारे में कोई बात नहीं करना चाहती।" कुसुम ने इस बार थोड़ा कठोरता से कहा____"ऊपर वाले से बस यही विनती करती हूं कि वो आप दोनों को सद्बुद्धि दे ताकि आज के बाद कभी आप दोनों के मन में ऐसा कुछ भी करने का ख़्याल न आए।"

कहते हुए कुसुम की आंखें अनायास ही छलक पड़ीं। विभोर और अजीत ने उसकी बातें सुन कर एक बार फिर से अपना सिर झुका लिया। कुछ पल दोनों खड़े रहे उसके बाद दोनों ने हाथ जोड़ कर फिर से कुसुम से माफ़ी मांगी और फिर चुप चाप चले गए। उनके जाते ही कुसुम ने दरवाज़ा बंद कर दिया। उसके बाद वो भाग कर पलंग पर आई और पहले की ही भांति तकिए में अपना चेहरा छुपा कर सिसकने लगी।

"आपने इतना कुछ हो जाने के बाद भी मेरी बात का मान रखा।" वो फिर से बड़बड़ा उठी____"आप सच में मेरे सबसे अच्छे वाले भैया हैं और मैं आपकी गंदी बहन हूं।"

कहने के साथ ही कुसुम की आंखें एक बार फिर से बरसने लगीं। कमरे में उसके सिसकने की धीमी आवाज़ें गूंजने लगीं थी। इस बार उसे अपने जज़्बातों को सम्हालना भारी मुश्किल लग रहा था।

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"तुम दोनों यहां क्या कर रहे हो?" मैंने बुलेट को उन दोनों के पास ही रोक कर कहा____"मैंने मना किया था न कि यूं खुले में कहीं मत घूमना?"

"माफ़ कीजिए छोटे ठाकुर।" उनमें से एक ने हाथ जोड़ते हुए कहा____"हम दोनों तो शाम के अंधेरे में ही आपके पास हवेली आते लेकिन जब हमने देखा कि आप इस तरफ ही आ रहे हैं तो हम दोनों भी आपके पीछे आ गए। दूसरी बात ये भी थी कि आपको एक ज़रूरी बात बतानी थी। हमने सोचा कि अंधेरा होने की प्रतीक्षा क्यों करें? जिस तरह के हालात बने हुए हैं उससे तो एक एक बात का पता जल्दी से लगना ज़रूरी है न छोटे ठाकुर।"

"अरे! तुम दोनों की जान से बढ़ कर कोई भी चीज़ ज़रूरी नहीं है।" मैंने उस आदमी से कहा____"मैं ये हर्गिज़ नहीं चाह सकता कि मेरी वजह से तुम दोनों पर ज़रा भी कोई आंच आए। ख़ैर, बताओ क्या ख़बर लाए हो?"

मेरे पूछने पर दोनों ने सबसे पहले इधर उधर निगाह घुमाई और फिर ख़बर के बारे में बताना शुरू कर दिया। सारी बातें सुनने के बाद मैं सोच में पड़ गया। अंदेशा तो मुझे था लेकिन ऐसा भी कुछ होगा इसकी ज़रा भी कल्पना नहीं की थी मैंने। ख़ैर, मैंने पैंट की जेब से कुछ पैसे निकाले और उन दोनों को पकड़ाया और ये भी कहा कि अपना ख़्याल सबसे पहले रखें।

एक बार फिर से मेरी बुलेट कच्ची पगडंडी पर दौड़ने लगी। ज़हन में बार बार उन दोनों आदमियों की बातें ही गूंज रहीं थी। मुझे यकीन नहीं हो रहा था कि ऐसा भी कुछ हो सकता है। ख़ैर, जल्दी ही मैं अपने गांव की आबादी में दाखिल हो गया। सबसे पहले मुंशी चंद्रकांत का ही मकान पड़ता था। मैं जैसे ही मुंशी के घर के सामने आया तो देखा मुंशी की बीवी प्रभा अपने घर के दरवाज़े के बाहर खड़ी गांव की किसी औरत से बातें कर रही थी। मुझ पर नज़र पड़ते ही वो दूसरी औरत से नज़र बचा कर हल्के से मुस्कुराई। मेरा फिलहाल उसके घर जाने का कोई इरादा नहीं था इस लिए उसकी मुस्कान का जवाब मुस्कान से ही देते हुए मैं आगे निकल गया।

साहूकारों के सामने से होते हुए मैं कुछ ही देर में हवेली पहुंच गया। बुलेट को एक तरफ खड़ी कर के मैं हवेली के अंदर दाखिल हो गया। बैठक में पिता जी के साथ कुछ लोग बैठे हुए थे जिन्हें मैं पहचानता नहीं था। ज़ाहिर है वो लोग मेरे गांव के नहीं थे। मैंने कुछ पल रुक कर पिता जी की तरफ देखा तो उन्होंने मुझे अंदर जाने का इशारा किया। मैं फ़ौरन ही अंदर चला आया। अंदर आया तो मां से मुलाक़ात हो गई।

"अच्छा हुआ कि तू आ गया।" मां ने कहा____"मैं तेरी ही राह देख रही थी।"

"क्या हुआ मां?" मैं ने फिक्रमंदी से पूछा____"कोई बात हो गई है क्या?"

"नहीं ऐसी तो कोई बात नहीं है।" मां ने सामान्य भाव से कहा____"असल में तेरी भाभी के मायके से एक संदेशा आया है। तेरी भाभी के भाई को वर्षों बाद संतान के रूप में एक बेटा हुआ है इस लिए उन्होंने संदेशा भेजा है कि हम उनकी बहन को कुछ दिन के लिए वहां भेज दें।"

"ये तो बड़ी खुशी की बात है मां।" मैं कुछ सोच कर मन ही मन खुश हो गया था किंतु प्रत्यक्ष में सामान्य सी खुशी ज़ाहिर करते हुए बोला____"साले साहब को पहली संतान के रूप में बेटा हुआ है तो ज़ाहिर है धूम धड़ाका तो करेंगे ही लेकिन भाभी को लेने वो खुद भी तो आ सकते थे?"

"अब अकेला आदमी क्या क्या करे?" मां ने कहा____"तुझे पता ही है कि तेरी भाभी का एक भाई उसके ब्याह के पहले ही कहीं चला गया था जो कि आज तक लौट कर नहीं आया। समधी जी तो घुटने के बात के चलते ज़्यादा चल फिर नहीं पाते। घर का सारा कार्यभार बेचारे वीरेंद्र के ही कंधों पर है। इसी लिए संदेशा भेजवाया है और तेरे पिता जी से विनती भी की है कि हम ही उनकी बहन रागिनी को वहां पहुंचा दें।"

"तो पिता जी ने क्या कहा?" मैंने धड़कते दिल के साथ पूछा।

"मुझसे कह रहे थे कि तू भेज आएगा अपनी भाभी को।" मां ने कहा____"और साथ में कुछ आदमियों को भी ले जाना। उनका कहना है कि ऐसे वक्त में काम का बोझ ज़्यादा हो जाता है तो मदद के लिए कुछ लोगों का वहां होना बेहद ज़रूरी है।"

"वो सब तो ठीक है मां।" मैंने कुछ सोचते हुए कहा____"लेकिन भाभी को ले कर बड़े भैया भी तो जा सकते हैं, मैं ही क्यों?"

"वो तेरी तरह ढीठ और बेशर्म नहीं है।" मां ने आंखें दिखाते हुए कहा____"आज तक क्या कभी वो उसे अपने साथ ले कर गया है जो अब जाएगा? उसे अपनी बीवी को अपने साथ लाने ले जाने में शर्म आती है और ऐसा होना भी चाहिए। इस लिए तू ही अपनी भाभी को ले कर जाएगा।"

रागिनी भाभी के साथ उनके मायके जाने की बात से में एकदम खुश हो गया था। एक पल में जाने कितने ही खूबसूरत चेहरे आंखों के सामने उजागर हो गए थे लेकिन अगले ही पल मैं ये सोच कर मायूस हो गया कि आज कल जिस तरह के हालात हैं उसमें मेरा वहां जाना बिलकुल भी ठीक नहीं है।

"ठीक है मां।" मैंने बुझे मन से कहा___"मैं कल सुबह भाभी को उनके मायके भेज कर वापस आ जाऊंगा।"

"कल नहीं, आज और अभी जाना है तुझे।" मां ने ये कह कर मानों मेरे सिर पर बम्ब फोड़ा_____"और उसे वहां भेज कर वापस नहीं आ जाना है बल्कि वहां रह कर वीरेंद्र के कामों में उनका हाथ भी बंटाना है। जिस दिन बच्चे का नाम करण होगा उस दिन तेरे पिता जी भी यहां से जाएंगे।"

मां की बातें सुन कर मानो मेरे पैरों के नीचे से ज़मीन ही खिसक गई थी। कोई और वक्त होता तो यकीनन मैं उनकी इन बातों से बेहद खुश हो गया होता लेकिन आज के वक्त में जो हालात थे उनकी वजह से मेरा इस तरह यहां से चले जाना बिलकुल भी उचित नहीं था। मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि पिता जी भला ऐसा हुकुम कैसे दे सकते थे? क्या उन्हें हालात की गंभीरता का ज़रा सा भी एहसास नहीं था?

"क्या हुआ, कहां खो गया?" मां ने मुझे हकीक़त की दुनिया में लाते हुए कहा____"जा, जा के जल्दी से तैयार हो जा। तब तक मैं देखती हूं कि रागिनी तैयार हुई कि नहीं।"

मैं भारी क़दमों से चलते हुए ऊपर अपने कमरे की तरफ चल पड़ा। साला ये क्या चुटियापा हो गया था? मुझे ये सोच कर गुस्सा आ रहा था कि पिता जी मुझे भाभी के मायके में रहने का कैसे कह सकते थे? सहसा मुझे याद आया कि आज जिन दो आदमियों से मैं मिला था उन्होंने मुझे कैसी ख़बर दी थी और अब मैं उस ख़बर के चलते क्या क़दम उठाने वाला था लेकिन अब मेरे यहां से यूं अचानक चले जाने पर सब गड़बड़ हो जाएगा।

मैं अपने कमरे के पास पहुंचा तो देखा दरवाज़ा खुला हुआ था। ज़ाहिर है कोई मेरे कमरे में मौजूद था। ख़ैर, में कमरे में दाखिल हुआ तो देखा बड़े भैया बैठे हुए थे। मुझे देखते ही वो हल्के से मुस्कुराए और मुझे पलंग पर अपने पास ही बैठने का इशारा किया।

"तेरे चेहरे के भाव बता रहे हैं कि तू अंदर से काफी परेशान है।" बड़े भैया ने कहा____"शायद तुझे मां के द्वारा पता चल चुका है कि तुझे अपनी भाभी को ले कर उसके मायके जाना है।"

"भाभी को उनके मायके ले कर जाने की बात से मैं परेशान नहीं हूं भैया।" मैंने धीर गंभीर भाव से कहा____"बल्कि इस बात से परेशान हो गया हूं कि मुझे वहां पर एक दिन नहीं बल्कि कई दिनों तक रुकना होगा। आप अच्छी तरह जानते हैं कि हालात ऐसे हर्गिज़ नहीं हैं कि मैं इतने दिनों तक कहीं रुक सकूं। मुझे समझ में नहीं आ रहा कि पिता जी ने मां से ऐसा क्यों कहा? क्या उन्हें वक्त और हालात की गंभीरता का ज़रा सा भी एहसास नहीं है?"

"हमें अच्छी तरह वक्त और हालात की गंभीरता का एहसास है बर्खुरदार।" दरवाज़े से अचानक आई पिता जी की भारी आवाज़ को सुन कर हम दोनों भाई चौंके और पिता जी को देख कर खड़े हो गए, जबकि पिता जी हमारे क़रीब आते हुए बोले____"हमें अच्छी तरह पता है कि ऐसे वक्त में हमें क्या करना चाहिए।"

मैं और बड़े भैया उनकी बातें सुन कर कुछ न बोले। उधर वो पलंग पर आ कर बैठ गए और हमें भी बैठने का इशारा किया। हम दोनों के बैठ जाने के बाद वो बोले____"सबसे पहली बात तो ये कि हालात चाहे जैसे भी हों लेकिन हमें सभी से अपने रिश्ते सही तरीके से निभाना चाहिए। तुम्हारा चंदनपुर जाना ज़रूरी है क्योंकि वहां जो कार्यक्रम होने वाला है उसकी व्यवस्था करना अकेले वीरेंद्र के बस का नहीं है। दस साल बाद वीरेंद्र को ऊपर वाले की दया से संतान के रूप में पहले पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई है। ज़ाहिर है ये उसके लिए बहुत बड़ी खुशी की बात है और वो अपनी इस खुशी को बड़े उल्लास के साथ मनाना चाहता है और ये हमारा भी फर्ज़ बनता है कि हम उसकी खुशी को किसी भी तरह से फीका न पड़ने दें। यकीन मानो अगर यहां हालात ऐसे न होते तो हम सब आज ही वहां जाते। ख़ैर, तुम्हें यहां की चिंता करने की कोई ज़रूरत नहीं है। यहां के जो हालात हैं उन पर हमारी पैनी नज़र है और बड़े से बड़े ख़तरे का सामना करने के लिए हम हर तरह से तैयार हैं।"

"ठीक है पिता जी।" मैं भला अब क्या कहता____"आप कहते हैं तो ऐसा ही करूंगा मैं। ख़ैर, आज मुझे मेरे दो ख़ास आदमियों के द्वारा कुछ खास बातें पता चली हैं।"

"कैसी बातें?" पिता जी के साथ साथ बड़े भैया के भी माथे पर बल पड़ गया था।

"जगन पर किया गया हमारा शक एकदम सही साबित हुआ।" मैंने ख़ास भाव से कहा____"वो एक नंबर का कमीना इंसान निकला।"

"साफ़ साफ़ बताओ।" पिता जी के चेहरे पर उत्सुकता के भाव उभर आए थे____"क्या पता चला है तुम्हें उसके बारे में?"

"मुझे पक्का यकीन तो नहीं था।" मैंने कहा____"लेकिन तांत्रिक की हत्या हो जाने के बाद से संदेह होने लगा था उस पर। उस रात जब हमने आपस में इस सबके बारे में विचार विमर्श किया था तो दूसरे दिन ही मैंने उसकी निगरानी में अपने दो ख़ास आदमियों को लगा दिया था। आज उन्हीं दो आदमियों ने मुझे उससे संबंधित ख़बर दी है। उन दोनों आदमियों के अनुसार पिछली रात जगन साहूकारों के बगीचे में एक ऐसे रहस्यमय आदमी से मिला जिसके समूचे जिस्म पर सफ़ेद लिबास था और चेहरा भी सफ़ेद नक़ाब से ढंका हुआ था।"

"ये क्या कह रहे हो तुम?" बड़े भैया बीच में ही मेरी बात काट कर बोल पड़े____"क्या तुम्हारे उन ख़ास ख़बरियों ने उस सफ़ेदपोश आदमी का पीछा नहीं किया?"

"किया था।" मैंने कहा____"लेकिन उससे पहले ये सुनिए कि बगीचे में सफ़ेदपोश और उस जगन के अलावा और कौन था?"



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Bhai kuch to sharm kiya karo, abhi subah hi update diya hai aur aapne update ke bare me kuch nahi likha, seedhe waiting next update...???

Abhi kuch aur bol duga to mirchi lag jaayegi bhai, apni galti kisi ko nazar nahi aati aur baad me agar writer ne kuch Kiya to saara ilzaam usi par daal doge.....had hai yaar
 
Meri sabhi readers se request hai ki update ke bare me apni taraf se thodi bahut sameeskaha zarur kiya kare. Aise comments na kiya karo bhai jise dekh kar mood ki maa bahan ek ho jaye. Sabko pata hai ki devnagari me likhne me kitni mehnat lagti hai...kuch to writer ki mehnat ka sammaan karo. Agar comment karne me ya sameeksha karne me sharm aati hai to story padhne ka bhi koi hak nahi hai aise readers ko.... 😠
 
Itna kuch likh kar post karne ke baad bhi man nahi bhara na mitra, samajh sakta hu. Insaan ko jitna milta hai wo kam hi lagta hai. Agar main ye kahu ki aapne apni sameeksha me jo likha hai wo kaha tak jayaz hai to shayad aap sahi tarike se jawaab nahi de paaoge kyoki aapko bhi pata hai ki aapne sirf khana purti hi ki hai comment kar ke. Jis din dil se kahani ki sameeksha karoge to uska prabhaav khud ko bhi alag hi nazar aayega....bilkul SANJU ( V. R. ) Bhaiya aur Death Kiñg bhai ki tarah. Well ise dil par mat lena....bas gaur zarur karna :dost:
 
Yaha par kusum ke dwara aisa kahne ka matlab yahi hai ki use khud clear pata nahi hai ki vaibhav ko uske bare me kya aur kitna pata chala hai. Use ye to pata hai ki vaibhav ko pata chal gaya hai magar sach pura pata chala hai ki nahi isme use sandeh hai. Isi liye wo khud se ye sab kahte huye badbada rahi thi. Well kahani dhire dhire apne mukhya maksad ki taraf badh rahi hai...
 
Yahi baat main bhi kah sakta hu bro ki jab aap comment kiya karo to kahani ke bare me thodi vistrat sameeksha kiya karo. Bahut hi shandar update likh dene bas se waisa hi feel hota hai jaise kisi bahut hi bhookhe insaan ke saamne khane ke naam par bas roti ka ek tukda de diya gaya ho... :D

Well shukriya bhai....koshish karuga aage se aisi galti na ho :dost:
 
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