अपडेट 130 सान्वी एंड चावला इन लव
संजना उस दिन शाम को 3 बजे अपनी कार लेकर निकली अपने पापा से मिलने जाने को. दीप्ति भी जाना चाहती थी मगर सान्वी ने कहा के दीप्ति को बुरी आदत पर जाएगी इस तरह से हर रोज़ कार में गुमने को, तो संजना ने दीप्ति को समझा बीझा कर घर पर hi रहने दिया और वो चली गयी.
सान्वी और चावला साहब तबसे लेकर शाम 7 बजे तक अकेले रहे एक लोविंग कपल की तरह कभी एक दूसरे के बाहों में तो कभी दीप्ति उनके बीच में जैसे चावला साहब hi दीप्ति के पिता थे.
चावला साहब कल की सान्वी और आरव के एक साथ रहने की बात को लेकर एक कन्वर्सेशन करने लगे सान्वी के साथ. तब दीप्ति उन् के बीच नहीं थी, उस्सको हमें थमा कर ऊपर उस्सकी छोटी जेल में चोर दिया था सान्वी ने. मगर बात किसी और सब्जेक्ट से शुरू हुई थी तब जाके आरव पर होने लगे.
लाउन्ज में काउच पर बैठे, सान्वी चावला साहब के बाहों में थे, उस्का सर उनके छाती से लगे हुए थे बिल्कुल प्यार में डूबे थे दोनों. हमेशा की तरह सान्वी उनके छाती के बालों में अपनी उँगलियाँ फरते हुए बात किये जा रही थी, और चावला साहब सान्वी के सर के बालों में अपने उँगलियाँ फरते हुए बात कर रहे थे.
सान्वी ने बड़े प्यार से पूछा,
“आप किश दिन को मुझसे इस तरह के चाहने लगे थे, बहोत पहले की बात है, दीप्ति के जनम से पहले या बाद में?”
चावला साहब ने कहा, “तुम यकीन नहीं करोगे अगर सच कहूंगा तो!”
सान्वी: “क्यों यकीन नहीं करुँगी, यकीन करुँगी आप बताएँ तो!”
चावला: “अगर मैं कहूं के जिस दिन तुम इस घर में पहले दिन आयी थी तभी से मैं तुमको चाहने लगा था तो यकीन करोगी?”
सान्वी ने हँस्ते हुए कहा, “नहीं अभी तो आप झूट बोल रहे हो!”
चावला: “देखा मैं ने कहा नाह के तुम यकीन नहीं करोगी!”
सान्वी उनके सीने से उठते हुए उनके चेरे में देखने लगी थोड़ा हैरानी से और कहा,
“मगर यह कैसे मुमकिन है? आप तो मेरे तरफ देखते भी नहीं थे उन् दिनों को, कब और कैसे आप मुझे चाहने लगे थे तब भला?”
चावला “तुम दुल्हन की लिबास में थी, मैं पीछे लाउन्ज में खड़ा था, तुम्हारा स्वागत विवान के दूर के चहियों और उनके बेटियों ने किया था, मैं तुम्हारे सामने था मगर तुम्हारी नज़र झुके हुए थे, मैं वहां किचन के पास खड़ा सीधे तुम्हारे चेहरे मं देख रहा था, जिस वक़्त तुमने वो चावल वाले बर्तन पर लात मार्के गिराया था मेरी नज़र तुम्हारे पाऊँ पर पड़े थे, तुम ने कुछ देर अपने पाऊँ को ऐसे hi हवा में उठाये रखा था, मैं तुम्हारे पाऊँ की रंग और उँगलियों को देख रहा था, अदमीरे कर रहा था, कितनी कोमल और नाज़ुक दिख रहे थे, फिर मैं ने नज़र ऊपर उठाकर तुम्हारे ेंखों को देखा , उन् में एक उदासी थी, शायद अपने घर को चौररने वाली उदासी थी, फिर तुम्हारे गालों को, नाक को, पेशानी को, थोड़ी को, तुम्हारे नाक की उस नथनी में जो चैन लगा हुआ है जो कान की बाली तक जाता था उस्सको देखा, तब देखा एक बार तुम्हारी नज़र मुझ पर पड़े उस वक़्त मैं ने नज़रों को हटाया एक पल के लिए….”
उस वक़्त सान्वी बहोत hi हैरान चावला साहब को सुन रहे थे और, अपने पाऊँ को अपने करीब किया और चावला साहब को दिखाते हुए कहा, “यह रहा किआ है इस में नार्मल तो है…..”
चावला साहब ने कहा. “तुम मेरी नज़रों से देखोगी तब नाह तुमको वो दिखेगा जो मुझे दिखा था….”
और चावला साहब ने तुरंत सान्वी की उस पाऊँ को चूमा, सान्वी को हंसी आयी और पाऊँ को खिंच लिया मगर अब चावला साहब सान्वी के पाऊँ को और चूमना और प्यार करना चाहता था… तो वो निचे फर्श पर बैठ गए और, सान्वी की पाऊँ को अपने हाथ में पकड़ने की कोशिश में था मगर सान्वी ने अपने पाऊँ को साडी के अंदर छुपा लिया हँस्ते हुए….
“नहीं चोररये नाह हम्म किआ कर रहे हो आप किआ है मेरे पाऊँ को चोररये नाह मुझको गुदगुदी हो रहा है हाहाहाहाहा!” ऐसा कुछ कहने लगा सान्वी जब चावला साहब उसस्के पाऊँ को पकड़ने की कोशिश में लग गया था….
आखिर में चावला साहब ने सान्वी की एक पाऊँ को अपने हाथ में ले लिया और वह, किआ बात है, कभी एक हसीं जवान औरत की गोरी पाऊँ को करीब से देखा है किसी ने? बहोत रोमांटिक होता है जब एक मर्द एक खूबसूरत गोरी, पाऊँ को अपने हाथों में लेता है, सहलाता है, चूमता है. यह सब चावला साहब करने लगा सान्वी के पाऊँ को… सान्वी के रौंदते खड़े हो गए थे उस वक़्त, और सिकुड़ सी गयी थी उस छुवन से….. वो चावला साहब के चेहरे में देख रही थी पाऊँ को अपने तरफ खींचने की कोशिश में, मगर चावला साहब को जैसे उसस्के उस पाऊँ से प्यार था, उस्सने पाऊँ को थोड़ा सा ऊपर उठके उसस्के तलवे को चुम्मा, और उसस्के उँगलियों को मुंह में ले लिए चुस्सने को… सान्वी ने ेंखें मुंध लिए और एक गहरी सांस लेते हुए तड़पती आवाज़ में कहा, “उफ्फ्फ प्लीज चोररये नाह किआ कर रहे हो आप, प्लीज बुसस कीजिये नाह अब तो!!”
चावला साहब ने तब ऊपर नज़रें करके सान्वी के चेहरे में देखा हाथ में पाऊँ को लिए हुए और कहा, “क्यों कैसा लग रहा है तुमको?”
सान्वी ने ेंखें खोली और उनके नज़रों की गहराई में देखते हुए धीमी आवाज़ में कहा, “उफ़ मैं नहीं बता सकती के कैसा लग रहा है आप बड़े वो हो! मुझको बहोत अजीब laga…weise आप ने पिछले 5 सालों में तो कभी नहीं कहा कुछ भी मेरे पाऊँ के बारे में और पिछले कई बार इश्क करते वक़्त भी आप ने तो मेरे पाऊँ को कबि भी नहीं छुआ ऐसे तो आज किआ हुआ आप को?!”
चावला साहब ने मुस्कुराते हुए हाथ में में पाऊँ को थामे और सहलाते हुए कहा, “तुम तो ऐसे कह रहजी हो जैसे पिछले 5 सालों से तुमसे यह सब करता आया हूँ, हम ने तो सिर्फ 4 या 5 बार सेक्स किया है डार्लिंग, और हर बार रश में किया हैं, कभी ऐसे आराम से प्यार करने मौका कब मिला हैं हमें? तुम्हारे जिस्म के हर एक हिस्से को प्यार करता हूँ, पुरे जिस्म को एक्स्प्लोर करने का मौका hi कहाँ मिला है अभी? तुम्हारे साथ कभी 6 घंटे भी मिले साथ बिताने को तो भी कम होगा तुम्हारे पुरे जिस्म के हर कोने को छूना और चूमना और निहारना….”
संवी ने चावला साहब के गाल पर प्यार से अपने हाथ फरते हुए कहा, “इतना प्यार करते हो आप मुझसे? मुझे मालूम नहीं था, मैं समझी आप सिर्फ सेक्सुअली अत्त्रक्ट हो मेरे तरफ!!”
चावला साहब ने कहा, “मैं अगर किसी से प्यार नाह करूँ तो सेक्स कर hi नहीं पाउँगा, मुझे पहले प्यार करना चाहिए तब सेक्स करूँगा वार्ना बिल्कुल भी सेक्स नहीं करूँगा…..”
सान्वी, “इस्सके मतलब वो वासना नहीं था हमारे बीच?”
चावला साहब, “बिल्कुल भी नहीं, तुम किआ उस्सको वासना समझते थे इतने दिनों से?”
सान्वी: “पता नहीं?” मेरे समझ में तो कुछ भी नहीं आया, हाँ शायद मैं इस्को वासना hi समझती रही हूँ!!..... मगर एक बात बताइये, मैं ने पिछले 5 सालों में आप को कभी भी मेरे पाऊँ को देखते हुए नहीं देखा!”
चावला साहब: “तुम किआ जनों के कब मैं तुम्हारे पाऊँ को देखता हूँ! उस वक़्त तुम मेरे तरफ देखते hi नहीं जिस वक़्त मैं वहां देखता हूँ…”
सान्वी: “मगर कब?”
चावला साहब: “जब तुम कपडे सूखने को डालती हो चाट पर, जब तुम टीवी देखती हो लाउन्ज में, जब तुम लेती रहती हो काउच या बीएड पर, जब तुम चलती आती हो कहीं भी….”
सान्वी: “और उस वक़्त मैं क्यों आप को नहीं देखती के आप मेरे पाऊँ को देख रहे हो?”
चावला साहब: “वो तुम जानों नाह?! शायद तुम यह सोचती हो के मैं निचे ज़मीन देख रहा होता हूँ हहहहए!”
और चावला साहब ने तब सान्वी के दूसरे पाऊँ को हाथ में लेकर चूमने और चाटने भी लगे, सान्वी की आवाज़ तड़प में निकली और और उस्सने फिर ेंखें मुंध लिए उंनसे रोकने की बिनती करते हुए. सान्वी की दिल की धड़कनें तेज़ होने लगी थी और और वो थोड़ा सा हांफने भी लगी थी और चावला साहब धीरे धीरे पाऊँ को किश करते हुए उस्सकी साडी को ऊपर उठाते हुए ऊपर बढ़ने लगे और उस्सकी जाँघों के तरफ जा पहुंचे…. सान्वी लेट गयी काउच पर और हांफते हुए कहा, “ोफो अभी यहाँ करोगे किआ आप?!”
चावला साहब: “करना ज़रूरी है किआ? इतना कुछ hi करना काफी होगा, क्यों तुम्को और करने का मैं कर रहा है तो बोलो करते हैं नाह किआ हर्ज है!”
सान्वी, “नहीं मुझको और नहीं करना अभी कुछ देर पहले तो किया नाह?!” वैसे अगर आप को मैं कर रहा है टी कीजिये!”
चावला साहब, “बूढ़ा हो रहा हूँ और अब तो दो दो संभालना है इस लिए बचा कर एनर्जी को रखना होगा मुझे तो इस्को जाया क्यों करूँ जानेमन, जब तुमको ज़रूरत होगी तो हिचकिचाना मत बस इशारा कर देना मैं समझ जाऊंगा okay स्वीटहार्ट?!”
सान्वी: “हम्म्म ठीक है मगर आप नशे में नहीं होंगे तब नाह इशारा करूँ, कल रात को कितना चाहिए था मुझे मगर आप लुढ़क गए थे, इसी लिए कहती हूँ ज़्यादा मत पिया करो आप!!... या थोड़ा सा पियो, फिर करने के बाद जितना चाहे पी लेना…”
चावला साहब: “हाँ यह सही कहा तुमने, करने के बाद लुढ़क जाऊंगा तो chalega…to तुम मेरी जान मुझको इशारा तब करना जब मैं पीना शुरू करूँ, ठीक है?!”
सान्वी: “हम्म ठीक है… मगर मेरे समझ में नहीं ारः की आप कैसे मुझसे शुरू से प्यार करते हो? आप तो बहोत सीरियस रहा करते थे, मैं तो आप से डर्टी थी बात करने को भी… आड़ है आरव के लिए खाना लेजाती थी ऊपर तो आप किश तरह से ग़ुस्से में देखते थे मुझे, और आप नहीं कहते थे के मैं हर बार आरव के लिए खाना ले जॉन ऊपर?!”
चावला साहब: “हाँ तो अब भी तुम नहीं समझी के क्यों मई नहीं चाहता था के तुम ऊपर अकेली उसस्के साथ उसस्के कमरे में रहो? अब आयी किआ बात समझ में?!”
सान्वी: हाय राम तबसे?? आप को जलन होती थी जब मैं आरव के कमरे में जाती थी? उन् दिनों से आप मुझको चाहते थे? दीप्ति के आने से पहले? मेरा प्रेग्नेंट होने से पहले? उफ़ मेरी माँ!! मुझे क्यों कुछ नहीं दिखा था तब?
चावला साहब: “तब से? अरे जिस दिन तुमने इस घर में कदम रखा था तबसे कहा मैं ने!! किआ करता मैं ने इस घर में एक औरत को नहीं देखा था पिछले 18 सालों से…. 18 सालों के बाद एक तुम जैसी खूबसूरत औरत आयी थी इस घर में, मैं अकेला था, तनहा था, और तुम बहोत अच्छी थी, बेहद खूबसूरत और कमाल की अदाओं वाली थी, तुम्हारे इंग अंग को देखता था मैं… एक दिन तो तुम नाहा रही थी अपने कमरे में तब मैं ग़ुस्सा था छुपके से तुमको झाँकने के लिए और तुम्हारे उतारे हुए कपड़ों को सुंघा था तुम्हारे घर में ान ेके 1 हफते की बात बता रहा हूँ!!”
सान्वी: “रियली? तो यह तो ठरकीपन वाली बात हुई इस में प्यार कहाँ था?!”
चावला साहब: “लो कल्लो बात अरे प्यार करता था तुमसे तभी तो तुम्हारे कपड़ों से भी प्यार करता थान नाह?!
सान्वी पागल होती जा रही थी उनके बातों को सुनकर और सोच रही थी क्यों उन् दिनों को hi उस्सने भी उंनसे प्यार नहीं कर लिया था…..
चावला साहब ने पूछा, “और तुम कब से मुझसे प्यार करने लग गयी यह तो बताओ….”
सान्वी: “जब मैं प्रेग्नेंट थी, जीन दिनों आप ने ऑफिस जाना बांध कर दिया, आप मेरे ेंखों के सामने रहते थे चारों पेहेर तब!! तबसे आप के लिए दिल में जगह बना लिया था मैं ने और तब से आज तक आप की हर हरकतों पर नज़र रखते आयी हूँ… दिन बा दिन आप के लिए प्यार और भी बहोत ज़्यादा बढ़ता गया और मैं डूबती गयी आप के प्यार में…. आप से दूर रहना मुश्किल हो गया था, जीन दिनों आप संजना के यहाँ जाने लगे थे तो मैं जैसे बीमार हो जाती थी, उन् दिनों आप को सामने देखने के लिए तड़पती थी आप को बहोत hi मिस करती थी, लगता था दिन भर घर में कुछ कमी है, लगता था मेरे जिस्म का एक अंग मिसिंग है….. बहोत दुःख होता था मुझे…..”
चावला साहब ने “ओह माय पुअर स्वीटहार्ट” कहकर बड़े ज़ोर से सान्वी को गले लगाया और दोनों एक दूसरे के बाहों में इस तरह से खो गए जैसे इस दुन्या में नहीं थे दोनों……
तो बे कॉन्टिनोएड…… (2200 वर्ड्स)