Incest आह..तनी धीरे से.....दुखाता. - Page 51 - SexBaba
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Incest आह..तनी धीरे से.....दुखाता.

Gagan-deep आपसे कुछ कम है दोस्त.....
 
स्वागत है कहानी पढ़ कर कहानी पर अपने विचार अवश्य रखें यही एकमात्र कथाकार के लिए आपका सहयोग होगा
 
आप सभी की सराहना और इस कहानी के पटल पर आकर अपने विचार रखने के लिए धन्यवाद ऐसे ही कुछ पाठकों का साथ मिलता रहा तो यह कहानी निश्चित ही आगे बढ़ती रहेगी जुड़े रहिए और अपनी भावनाएं अच्छी या बुरी खुलकर व्यक्त करते रहे
 
Sorry u have to read story from this forum only।

I am sending update 90 to u rest available on story page..

Please do offer your comment good or bad फुलस्टॉप कामा एनीथिंग will work....
 
धन्यवाद यू ही साथ बनाए रखें...

Silent readers please come forward...

Still I see views on the story and feeling sad for you shy fellows
 
फिलहाल अभी तो नहीं....आपको चाहिए तो भेज सकता हूं...

आगमन के लिए धन्यवाद....
 
आप सभी को धन्यवाद यूं ही जुड़े रहे और आनंद लेते रहे
 
भाग 91



सरयू सिंह ने अपने लंड के आवागमन को पूरी तरह विराम दे दिया था…वह मनोरमा की स्थिति को भलीभांति समझ रहे थे और उसकी पीठ को धीरे-धीरे सहला रहे थे मनोरमा एक मासूम और अबोध की तरह उनके सीने पर लपटी अपनी इस अद्भुत चूदाई के सुख को महसूस कर रही थी और तृप्त हो रही थी कुछ देर यूं ही दोनों पड़े रहे।

अचानक मनोरमा में एक ऐसा प्रश्न पूछ लिया जिसका उत्तर देना सरयू सिंह के लिए बेहद कठिन था सरयू सिंह को पसीने छूटने लगे मनोरमा मैडम के प्रश्न का उत्तर देना इतना आसान न था और प्रश्न से बचना उतना ही कठिन..

मनोरमा ने मनोरमा में अपनी बड़ी-बड़ी आंखें खोल कर सरयू सिंह के गाल को सह लाते हुए पूछा



"बताइए ना…?".

अब आगे…

सरयू सिंह मौन थे परंतु मनोरमा तो जैसे पीछे ही पड़ गई थी।

" बताइए ना सरयू जी उस दिन बनारस महोत्सव में मुझे किसके हिस्से का संभोग सुख मिला था?"

स्त्रियों में अपने कौतूहल को रोक पाने की क्षमता शायद कुछ कम होती है… मनोरमा पढ़ी-लिखी और विलक्षण महिला भी इससे अछूती ना थी। जाने वह क्यों अधीर हो चली थी परंतु सरयू सिंह टस से मस ना हो रहे थे ।

अपनी बातों और व्यवहार से स्त्रियों का मन मोह लेने वाले सरयू सिंह निरुत्तर थे….

कोई और चारा न देख कर सरयू सिंह ने एक बार फिर मनोरमा की को बाहों में भर और उसके होठों पर चुंबन बरसाने लगे । अपने होठों से मनोरमा के होठों को कैद कर वह मनोरमा के कौतूहल और प्रश्नों को रोकना चाह रहे थे परंतु यह संभव न था.. मनोरमा बार-बार उनसे आग्रह कर रही थी वैसे भी वह अब से कुछ देर पहले जी भर कर चुद चुकी चुकी थी और इन बातों के दौरान आराम कर एक नई ताजगी से भर रही थी।

आखिरकार सरयू सिंह ने अपने तने हुए लंड की तरफ मनोरमा का ध्यान खींचते हुए कहा

"मैडम पहले इसको शांत कर लें फिर बात करे?"

मनोरमा ने और जिद न की सरयू सिंह ने जो मांगा था वह उनका हक भी था.. जिस खूबसूरत और तने हुए लंड ने मनोरमा को खुशियों से नवाजा था वह उसकी सेवा करने को आतुर हो उठी और बिस्तर पर पीठ के बल आकर अपनी दोनों जांघें फैला दी…

सरयू सिंह उठकर मनोरमा की जांघों के बीच आ गए और अपने तने हुए लंड को मनोरमा की बुर में एक बार फिर जड़ तक उतार दिया। सरयू सिंह के ऊपर होने की वजह से लंड बुर के आखिरी छोर तक पहुंच गया और गर्भाशय के मुख को खोलने का प्रयास करने लगा… मनोरमा को अब उस लंड की ताकत का बखूबी एहसास हो रहा था और वह अपने होंठ अपने दांतो में दबाए उस अद्भुत मिलन की अनुभूति कर रही थी। सरयू सिंह के धक्के बढ़ने लगे और मनोरमा चुदने लगी… सरयू सिंह ने मनोरमा के दोनों हाथों को दोनों तरफ फैला दिया था और बीच-बीच में वह मनोरमा को चुमते तथा अपने मजबूत लंड से उसे अपनी इच्छा अनुसार चोद रहे थे …

चूदाई के रफ्तार सहज होते ही..

अचानक मनोरमा ने अपने होंठ खोले और एक बार फिर वही प्रश्न दोहरा दिया

"अब तो बता दीजिए?

सरयू सिंह को अब यह प्रश्न चुभने लगा था… उनका मूड खराब हो रहा था उन्होंने मनोरमा की चूदाई रोक दी और मनोरमा की कमर में हाथ लगा कर उसे पलट दिया… उसकी कमर को अपनी तरफ खींच कर उन्होंने मनोरमा को घोड़ी बनने का इशारा किया… मनोरमा उनके दिशा निर्देश को मानते हुए तुरंत ही डॉगी स्टाइल में आ गई ।

मनोरमा शहर की युवती थी उसे हर आसन बखूबी आता था… अपने पेट को लगभग बिस्तर से सटाए उसने अपने दोनों नितंबों को उठा दिया और सरयू सिंह के सामने एक खूबसूरत दृश्य ला दिया… चुदचुद कर फूल चुकी बुर् के होंठ अलग अलग हो चले थे…ऐसा लग रहा था जैसे मनोरमा की बुर भी अब उसकी तरह बेशर्म हो चली थी और सरयू सिंह को खुला आमंत्रण दे रही थी ।

सरयू सिंह ने अपनी दोनों हथेलियों से मनोरमा की खूबसूरत कमर को पकड़ा और लंड बिना किसी विशेष प्रयास के मनोरमा की बुर में घुसता चला गया।

मनोरमा का चेहरा अब सरयू सिंह की निगाहों से दूर था पर मनोरमा का कामुक बदन दूधिया प्रकाश में चमक रहा था। सरयू सिंह ने एक बार फिर रफ्तार पकड़ ली सरयू सिंह के मन में मनोरमा द्वारा पूछा गए प्रश्न घूम रहा था। वह किस मुह से बताते हैं कि उस दिन वह अपनी ही पुत्री सुगना को चोदने के लिए गए थे।

सुगना का नाम आते ही सरयू सिंह का दिमाग एक अजब मझधार में घूमने लगा परंतु लंड अपनी सर्वप्रिय महबूबा को याद कर और बेतहाशा उछलने लगा। सरयू सिंह ने मनोरमा की चूदाई की रफतार बढ़ा दी।

दिमाग के द्वंद्व को दरकिनार करते हुए सरयू सिंह मनोरमा को गचागच चोदने लगे…

वासना ने प्रेम पर विजय पा ली थी।

मनोरमा की चूदाई की रफ्तार बढ़ गई…शराब के नशे ने दोहरा काम किया था…एक तरफ जहां उसने सरयू सिंह को उग्र कर दिया वही मनोरमा की सहन शक्ति को बढ़ा दिया..

मनोरमा शरीर सिंह के आवेग से निश्चित ही मन ही मन करा रही थी जैसे कहना चाह रही हो

"सरयू जी तनी धीरे से…… दुखाता" परंतु मनोरमा ने सरयू सिंह की खुशी के लिए अपने मन को अपनी राह में बदल दिया और उन्हें शीघ्र स्खलित होने के लिए उकसाने लगी..

मनोरमा सरयू सिंह की उत्तेजना से आश्चर्यचकित थी… ऐसा क्या हो गया था कि सरयू सिंह सिंह इतने आवेग में आ गए थे… परंतु मनोरमा सरयू सिंह को यथा शीघ्र स्खलित करना चाहती थी… उसकी बुर पूरी तरह फैल चुकी थी…फिर भी मनोरमा अपनी बुर से तरह-तरह के संकुचन और घर्षण कर सरयू सिंह को इस स्खलन में सहयोग देने की कोशिश कर रही थी।

उसकी मेहनत रंग लाई और सरयू सिंह को स्खलित करते करते वह एक बार खुद स्खलित होने लगी…. सरयू सिंह ने इस बार अपने धक्के और तेज कर दिए और किए परंतु उनकी गहराई और बढ़ा दी ऐसा लग रहा था जैसे वह मनोरमा के अंदर और गहरे तक समा जाना चाहते थे …वह इस बार मनोरमा के साथ ही स्खलित होना चाहते थे।

परंतु ल** को और गहराई में उतार पाना अब संभव न था मनोरमा ने ल** को पूरी तरह आत्मसात कर लिया था सरयू सिंह के प्रयास अब मनोरम और सरयू सिंह की जांघों पर थाप के रूप में कमरे में गूंज रहे थे

थप…थपा…. थप… थप…. कमरे में इस अद्भुत प्रेम ढोलक की आवाज गूंज रही थी मनोरमा इस मधुर ध्वनि को सुनते हुए झड़ रही थी बुर् के संकुचन लंड को सहला रहे थे परंतु सरयू सिंह जिस जोश में थे उन्हें कुछ न सूझ रहा था…लंड पागल हो चुके सांड की तरह मनोरमा की बुर में घुड़दौड़ कर रहा था।

अचानक तुम्हें मनोरमा की चूचियों की याद आई…

वासना के आवेग में उनकी हथेलियों ने मनोरमा की चुचियों को मसल दिया….

"आह …..मैडम जी…." सरयू आनंद के अतिरेक में स्वयं कराह उठे…

मनोरमा को अंदाजा हो चुका था कि सरयू सिंह झड़ने वाले थे उसने अपनी लहराती आवाज में कहा

"सरयू जी भीतर नहीं…"

सारा तारतम्य बिगड़ चुका था…मनोरमा मैडम का आदेश मानना कठिन था पर इनकार करना दोहरी समस्या में डाल सकता था…

जैसे ही अंडकोषों ने लावा उगलना शुरू किया… उन्होंने अपना लंड बाहर खींच लिया…मनोरमा झट पलटकर पीठ के बल आ गई …

वह सरयू सिंह के स्खलन को देखना चाहती थी वीर्य की धारा फूट पड़ी…. और सरयू सिंह का लंड उछल उछल कर मनोरमा को भिगोने लगा। मनोरमा मुस्कुरा रही थी और अपने दोनों हाथों से अपने चेहरे को ढकने का प्रयास कर रही थी।

परंतु उंगलियां बारिश को रोक पाने में नाकाम थी। वीर्य की धारा से मनोरमा का अंग अंग भीग रहा था और गोरी काया पर सजी हुई चूचियां जिनके निप्पल फूल कर कुप्पा हो चले थे मनोरमा का सपाट पेट पर वह छोटी सी नाभि सरयू सिंह के वीर्य से पूरी तरह भर चुकी ।

मनोरमा के मादक बदन पर वीर्य की बूंदे मोती की तरह चमक रही थीं.. आखरी बूंद सरयू सिंह ने मनोरमा की तृप्त बुर पर अपने लंड को पटक-पटक कर झाड़ दी…बुर और भागनाशे पर सरयू सिंह के वार कर रहे थे और मनोरमा उसे सह रही थी…उसने अपनी आंखें खोलकर देखा सरयू सिंह छत की तरफ देख रहे थे उनके चेहरे पर असीम तृप्ति के भाव थे। चेहरा .. उत्तेजना से लाल था…. जब तक मनोरमा सरयू सिंह से कुछ कह पाती..

अचानक डोर बेल की आवाज सुनाई पड़ी..

" हे भगवान इतनी रात को कौन होगा?"

मनोरमा ने अपने चेहरे पर आश्चर्य के भाव लाते हुए सरयू सिंह से पूछा…।

सरयू सिंह क्या उत्तर देते वह तो अभी अपने आनंद में डूबे हुए थे । उन्होंने अपना चेहरा नीचे की तरफ किया और लंड को निचोड़ कर मनोरमा से अलग हुए…और बोले…

"देखता हू मैडम"

"आप रुकिए मैं देखती हूं"

मनोरमा उठी उसने अपनी अलमारी से झटपट एक नाइटी निकाली और अपनी कामुक बदन पर डालकर दरवाजा खोलने चली गई जाते समय उसने उंगलियों से सरयू सिंह को चुप रहने का इशारा किया और बलखाती हुई हॉल में आ गई और दरवाजा खोल दिया…

" मैडम आपका खाना"

रेडिसन होटल में मनोरमा द्वारा आर्डर किया गया खाना आ चुका था। मनोरमा ने दरवाजा बंद किया और खाना लेकर कमरे में आ गई।

सरयू सिंह बिस्तर पर मनोरमा मैडम का आदेश मानकर नंग धड़ंग बैठे हुए थे मनोरमा उन्हें इस अवस्था में देख कर मुस्कुराने लगी और बेहद प्यार से बोली

"अरे अब तो कपड़े पहन लीजिए या कुछ और इरादा है?"

"अरे आपने ही तो मना किया था ..मेरे कपड़े तो हॉल में है"

मनोरमा मुस्कुराने लगी और बोली

"अच्छा पहले खाना खा लीजिए फिर पहन लीजिएगा आप ऐसे और भी अच्छे लग रहे हैं….तब तक कपड़े थोड़ा और सूख जाएंगे।

सरयू सिंह ने मनोरमा के अटैच बाथरूम में जाकर अपने हाथ साफ किए और मनोरमा मैडम के साथ बिस्तर पर बैठ कर खाना खाने लगे।

मनोरमा अभी भी नाइटी में थी सरयू सिंह बार-बार मनोरमा को देख रहे थे। उनका जी मनोरमा से अब भी नहीं भर रहा था…

इससे पहले कि मनोरमा खाना परोसती सरयू सिंह ने हिम्मत जुटाई और बोले

" मैडम यह नाइंसाफी है आपने मुझे ऐसे रखा है और खुद" उन्होंने मनोरमा की नाइटी की तरफ इशारा किया..

एक ही पल में मनोरमा ने अपनी नाइटी उतार कर बाहर फेंक दिया और उनके सामने साक्षात नंगी बैठकर भोजन करने लगी… मनोरमा का कामुक बदन एक बार फिर सरयू सिंह का मन मोह रहा था…

आज सरयू सिंह और मनोरमा ने शराब के नशे वह सब कुछ कर लिया था जो सरयू सिंह कभी अपने वाहियात खयालों में देखा करते थे। किसी स्त्री को इतना बेदर्दी से चोदना सरयू सिंह की फितरत में न था परंतु आज शराब के नशे में उन्होंने जिस तरह मनोरमा मैडम को चोदा था मनोरमा उनकी इस अद्भुत जुदाई को हंसते-हंसते सह गई थी।

यह कहना गलत नहीं होगा कि उन्होंने जो सपने देखे थे आज मनोरमा अनजाने में ही सही पर उसे सच कर गई…थी...

भोजन समाप्त होने के पश्चात मनोरमा ने बाथरूम में जाते जाते एक बार फिर अपना पुराना प्रश्न दोहरा दिया… सरयू सिंह को अब कोई बहाना नहीं सूझ रहा था परंतु वह किसी भी परिस्थिति में सुगना का नाम नहीं लेना चाह रहे थे ।

जैसे ही मनोरमा बाथरूम में गई सरयू सिंह हॉल में आ गए और अपने लंड को लंगोट में कैद कर लिया… नंगी मनोरमा सरयू सिंह को ढूंढते हुए हाल में आ गई और सरयू सिंह को कपड़े पहने देख उदास हो गई…

शायद उसे यह अहसास हो गया था कि सरयू सिंह अब उसे छोड़कर जाने वाले हैं..

अब इतनी रात हो गई है ….सुबह चले जाइएगा ..

सरयू सिंह… मनोरमा मैडम के पास गए उन्होंने उनके दोनों हाथों को अपने हाथों में लेकर चूम लिया और बोले

मैडम मुझे जाना पड़ेगा सुगना और सोनू मेरी राह देख रहे होंगे …

ठीक है .. मनोरमा ने अपनी नाइटी वापस पहन ली। बाहर अपने सिक्योरिटी गार्ड को फोन किया और सरयू सिंह को उनकी वांछित जगह पर छोड़कर आने के लिए निर्देशित किया।

सरयू सिंह ने अब भी मनोरमा के प्रश्न का उत्तर न दिया था परंतु अब विदाई की घड़ी थी..

सरयू सिंह के जाने से मनोरमा के कलेजे में एक अजीब सी हूंक उठ रही थी.. आज सरयू सिंह के साथ उसने जीवन के वो पल बिताए थे जो हर युवती के लिए यादगार होता।

सरयू सिंह ने हाल का दरवाजा खोला और हॉल से बाहर निकल गए। मायूस मनोरमा ने दरवाजा बंद किया और अस्त व्यस्त हो चुके हॉल को देखा सरयू सिंह का एक लंगोट अब भी सोफे पर पड़ा हुआ था मनोरमा मुस्कुराने लगी उसने लंगोट को अपने हाथों में लिया और चेहरे पर लाकर उसे चूम लिया…

कमरे के अंदर से पिंकी के रोने की आवाज आई और मनोरमा मुस्कुराती हुई पिंकी के पास चली गई..

रात्रि के एक बजे चुके थे सरयू सिंह गेस्ट हाउस में आ चुके थे…

सरयू सिंह का कमरा लॉक था। उसकी चाबी सुगना के कमरे में थी जिसमें सुगना और सोनू सो रहे थे उन्होंने दरवाजा खोला नाइट लैंप की रोशनी में नाइटी पहने चमकती सुगना और सोनू को एक ही बिस्तर पर लेटे देखकर सरयू सिंह को एक पल के लिए लगा जैसे वह किसी युवा दंपत्ति के कमरे में आ गए हों।

एक पल के लिए सरयू सिंह ने अपने मन में न जाने क्या-क्या सोच लिया और फिर …

"सुगना बेटा….सुगना बेटा…"

सुगना ने कोई उत्तर न दिया। सरयू सिंह ने सुगना को छूकर उसे जगाने के लिए अपना ध्यान उसके पैरों की तरफ किया…नाइटी घुटनों तक उठी हुई थी सुगना की गोरी पिंडलियों देखकर एक बार फिर सरयू सिंह के दिमाग में घुटने के ऊपर का भाग घूम गया सरयू सिंह ने सुगना के अंगूठे को छूकर उसे जगाया

"चाबी कहां बा?" सरयू सिंह ने धीरे से कहा.

सुगना अपनी नींद से बाहर आई और सरयू सिंह को देखकर खुशी से बोली

"अरे रहुआ कहां कहां चल गई रहनी हां?"

सुगना के मुख से कई सारे प्रश्न सुनकर सरयू सिंह मुस्कुराने लगे… उत्तर सरयू के पास अब भी न था परंतु सुगना उन्हें जान से प्यारी थी उन्होंने बड़े प्यार से कहा

" सुगना बेटा बाहर बहुत बारिश होत रहल हा एहीं से अपना दोस्त के घर चल गइल रहनी हां"

*एहिजा राहुर कौन दोस्त बा?

हे भगवान यह महिलाएं कितना प्रश्न पूछती हैं । सरयू सिंह मन ही मन सोच रहे थे उन्होंने सुगना के सर पर हाथ फेरते हुए कहा

"अब सुत जा नाता पूरा नींद खराब हो जाई"

सुगना ने फिर पूछा खाना खाइनी हां?"

" हां हां हम खाना खा ले ले बानी तू सो जा" सरयू सिंह ने सुगना के सर पर हाथ फेरते हुए कहा।

सरयू सिंह सुगना से अभी ज्यादा बातें नहीं करना चाहते थे अब भी शराब की गंध उनके मुख से निश्चित ही आ रही होगी ऐसा उनका अनुमान था।

सुगना एक बार फिर बिस्तर पर आ चुकी थी और सरयू सिंह अपनी चाबी लेकर अपने कमरे में जा चुके थे…

सुगना अब निश्चिंत हो चुकी थी .. कल होने वाले सम्मान समारोह की कल्पना कर उसका मन प्रफुल्लित हुआ जा रहा था। उसका भाई सोनू एसडीएम पद की शपथ लेने वाला था। जिस सोनू को उसने अपने संरक्षण में पाल पोस कर बड़ा किया था कल वह एक जिम्मेदार और सम्मानित नागरिक बन पूरे परिवार और अपने गांव का नाम रोशन करने वाला था ।

सुगना भाव विभोर थी और अपनी खुशियां अपने आंचल में समेटे नींद की आगोश में आ गई।

उधर सरयू सिंह बिस्तर पर लेटे आज अपनी ही मर्दानगी के कायल हुए जा रहे थे। पिछले एक-दो वर्षों से उन्हें कोई संभोग सुख प्राप्त ना हुआ था । अंतिम बार वह सुगना के दूसरे छेद का आनंद लेते लेते अपने आवेग पर काबू न कर पाए और मूर्छित होकर होटल में गिर पड़े थे।

तब से अब तक उन्होंने किसी महिला के साथ संभोग सुख का आनंद ले लिया था। उन्हें अपनी मर्दानगी पर शक होने लगा था।

परंतु आज मनोरमा के साथ उन्होंने संभोग सुख का बखूबी आनंद लिया था और अपने मर्दानगी को ठीक उसी अंदाज में साबित किया था जिस अंदाज में वह अपनी युवा अवस्था में किया करते थे।

मर्द की मर्दानगी उसका सबसे बड़ा हथियार है वह उसे हमेशा प्रफुल्लित और आनंदित रखती है कुदरत का दिया यह अनोखा उपहार जिस दिन लोगों के हाथों से जाता होगा वह दर्द कैसा होता होगा ?

सरयू सिंह उसकी कल्पना अवश्य कर पा रहे थे परंतु अपने इष्ट से हाथ जोड़ यूपी वरदान मांगते कि वह जुदाई के इस सुख को लेते लेते ही स्वर्ग सिधार जाएं।

नियति मनोदशा पढ़ने में माहिर थी उसने सरयू सिंह की मनो इच्छा को पढ़ लिया और उनके आग्रह को उनके ईस्ट तक पहुंचा दिया…

सरयू सिंह अपने मन में सुखद कल्पनाएं लिए कल्पना लोक में विचरण करने लगे. कई दृश्य धुंधले धुंधले उनके मानस पटल पर घूमने लगे कजरी… पदमा सुगना… और अब मनोरमा….. मानस पटल पर अंकित इन चार देवियों में अब भी सुगना नंबर एक पर ही थी…

सरयू सिंह को यदि यह पता न होता की सुगना उनकी पुत्री है तो वह सुगना को जीवन भर अपनी अर्धांगिनी बनाकर रखते…और सारे जहां की खुशियां उसकी झोली में अब भी डाल रहे होते….

रात बीत रही थी सूरज गोमती नदी के आंचल से निकलकर लखनऊ शहर को रोशन करने के लिए बेताब था।

शेष अगले भाग में…

प्रिय पाठको,

जैसा कि मैंने वादा किया था की कहानी के अगले एपिसोड उन्हीं पाठ को के लिए उपलब्ध कराऊंगा जिन्होंने इस कहानी को पढ़ने में अपनी उत्सुकता दिखाई है।

आपसे अनुरोध है कि इस पिछले एपिसोड की तरह इस एपिसोड को पढ़करअपने विचार कहानी के मुख्य पेज पर आकर अवश्य दें ताकि शांत और निष्क्रिय पड़े पाठकों को भी जीवित और जागृत करने में मदद मिल सके।

आप किसी भी अवस्था में गलती से भी कहानी के एपिसोड को कहानी के मुख्य पटल पर अपने कमेंट और रिप्लाई के साथ नहीं डालिएगा

कृपया मेरे अनुरोध को ध्यान रखिएगा।

जुड़े रहिए और इस कहानी पर अपना साथ बनाए रखें

 
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