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भाग 208
आइए सोनी और सूरज को इस अद्भुत मिलन के आनंद में डूबा छोड़कर आपको लिए चलते हैं विद्यानंद के आश्रम में जहां मोनी आज उदास थी…
स्वामी विद्यानंद के उस भव्य और विशाल आश्रम में दोपहर का सन्नाटा पसरा हुआ था। धूपदानी से निकलता हुआ चंदन का धुआँ हवा में तैर रहा था, जिससे पूरे वातावरण में एक मादक और शांत सुगंध घुली हुई थी। इस शांत दोपहर में, आश्रम के एक एकांत और आलीशान कक्ष में बैठी वज्रनंदिनी (मोनी) पूरी तरह विचारों में खोई हुई थी। उसका पुत्र परमानंद बनारस की उस अनजानी यात्रा के लिए आश्रम से प्रस्थान कर चुका था और इस समय एयरपोर्ट के रास्ते में था, पर मोनी का ममतामयी दिल रह-रहकर उसी भव्य कमरे में थमी उसकी अंतिम तैयारियों को याद कर रहा था।
मोनी की आँखों के सामने कुछ ही समय पहले का वह दृश्य किसी जीवंत चित्र की तरह घूम गया। इसी विशाल कमरे में उसका १८ वर्षीय बलिष्ठ, सुडौल और तेजस्वी पुत्र परमानंद अपने प्रस्थान की अंतिम तैयारियों में जुटा था। वह अपनी रोज़मर्रा की दुनिया से अलग, एक सुंदर ब्रीफकेस में कुछ अत्यंत आवश्यक और प्राचीन धार्मिक ग्रंथ, कुश का पवित्र आसन और अपनी दैनिक साधना की गुप्त सामग्री को बहुत सलीके से सहेज रहा था। उस प्रतापी ऋषि कुमार की चौड़ी छाती, वर्जिश और कठिन अभ्यास से कसी हुई जंघाएं और माथे पर चमकता चंदन का तिलक उसकी शारीरिक और आध्यात्मिक सुदृढ़ता की गवाही दे रहे थे।
तभी मोनी अत्यंत चिंतित कदमों से उसके पास पहुँची थी। अपने इस दिव्य बालक को देखकर उसका मातृत्व उमड़ आया था, पर साथ ही आशंकाओं का एक बवंडर भी उठ खड़ा हुआ था। उसने अपने स्वर को सामान्य रखते हुए पूछा था, "परमानंद, तुम इतनी उत्सुकता से किस बात की तैयारी कर रहे हो? कहाँ जाने का विचार है तुम्हारा?"
परमानंद ने उस सुंदर ब्रीफकेस को बंद करते हुए अत्यंत विनीत भाव से अपनी माता के चरण स्पर्श किए थे और अपनी ओजस्वी आँखों में एक नई चमक लिए खड़ा हो गया था। उसने कहा था, "गुरुमाता, मुझे परम पूज्य गुरुदेव स्वामी विद्यानंद जी का आदेश प्राप्त हुआ है। बनारस में होने वाले भव्य 'बनारस महोत्सव' की तैयारियाँ अपने अंतिम चरण में हैं, और मुझे वहाँ जाकर उस पूरे आयोजन का जायजा लेने और अपनी देखरेख में उसे सुचारू रूप से संपन्न कराने के लिए तुरंत बनारस प्रस्थान करना होगा।"
परमानंद के मुँह से 'बनारस' का नाम सुनते ही मोनी के भीतर जैसे समय का चक्र पीछे की ओर घूम गया था। वह भली-भांति जानती थी कि स्वामी विद्यानंद का आदेश साक्षात नियति का आदेश है, जिसे टालना किसी के लिए भी संभव नहीं था। फिर भी, अपनी ही कोख से जन्मे इस बालक को, जो अब तक आश्रम की सुरक्षित और मर्यादित दीवारों के बीच ही पला-बढ़ा था, अकेले उस मायावी नगरी में भेजने के विचार मात्र से उसका माँ का दिल बेहद असहज और व्याकुल हो उठा था।
जैसे ही 'बनारस' शब्द गूंजा था, मोनी के मानस पटल पर अपनी बड़ी बहन 'सुगना' का चेहरा सजीव हो उठा था, जिसने बड़ी बहन होने के बावजूद उसे अपनी सगी बेटी की तरह अगाध प्रेम देकर पाल-पोसकर बड़ा किया था। सीतापुर की वे गलियाँ, जहाँ उसका बचपन बीता था, एक-एक करके उसकी आँखों के सामने आने लगी थीं।
मनी सुगना और उसके साथ बिताए गए अपने किशोरावस्था के दिन याद करने लगी सुगना उसे भी उतनी ही प्यारी थी जितना सोनू और सोनी को थी।
पर इस ममता के ठीक पीछे अतीत की वह अत्यंत भयानक, काली और डरावनी रात का दृश्य छिपा हुआ था, जिसने मोनी के जीवन की पूरी दिशा ही बदल दी थी और उसे इस साधना आश्रम के भव्य परिवेश तक पहुँचा दिया था। उसे वह खौफनाक दृश्य याद आने लगा, जब उसने अपनी ही सगी बहन सुगना और अपने भाई सोनू को एक साथ, मर्यादा की सारी सीमाओं को छिन्न-भिन्न करके, उस निषिद्ध और अंधियारे कमरे में अंतरंग होते देख लिया था। भाई और बहन के बीच के उस पाप और उग्र समागम के दृश्य ने उस समय मोनी के भीतर के सारे विश्वास को हिलाकर रख दिया था।
तब मोनी ने एक गहरी और ठंडी साँस लेकर परमानंद के दोनों कंधों को अपने हाथों में थामा था और उसकी आँखों में देखते हुए बेहद गंभीर स्वर में कहा था, "पुत्र, जिस बनारस की ओर तुम कदम बढ़ा रहे हो, वह केवल संतों, घाटों और पावन गंगा की नगरी नहीं है। वह नगर एक ऐसा मायाजाल है जहाँ अध्यात्म के उच्चतम शिखर के साथ-साथ वासना और मानव मन के सबसे गहरे अंधकार का भी वास है। बनारस सत और असत का ऐसा अद्भुत संगम है, जहाँ कदम-कदम पर तुम्हारी इंद्रियों की परीक्षा होगी। वहाँ की चमकीली गलियों और भव्य हवेलियों के पीछे कई ऐसे राज छिपे हैं, जो मर्यादा की हर सीमा को खंडित कर चुके हैं। तुम वहाँ केवल एक उत्सव के साक्षी बनने नहीं जा रहे हो, बल्कि उस धरती पर पैर रखते ही तुम्हारा सामना जीवन के उस नग्न और आदिम सत्य से होगा जिसे तुमने इस आश्रम की शांत दीवारों के भीतर कभी नहीं देखा। स्वामी विद्यानंद जी ने तुम्हें वहाँ की पावनता के साथ-साथ वहाँ के मोह से बचने की जो चेतावनी दी है, उसे अपने अंतर्मन में बांध लो। बनारस की वह माटी जितने गहरे रहस्य समेटे हुए है, उतनी ही उग्रता से वह मनुष्यों के भीतर दबी हुई कामनाओं को भी भड़काती है। तुम्हें वहाँ अपनी साधना की अग्नि को और तीव्र रखना होगा, ताकि वहाँ का कोई भी अनैतिक सत्य तुम्हारी आभा को छू भी न सके।"
इस दोपहर के सन्नाटे में बैठी मोनी इसी विचार से बार-बार सिहर रही थी कि उसका पुत्र अब आश्रम से दूर, एयरपोर्ट की तरफ बढ़ रहा है जहाँ से वह सीधे उसी बनारस की धरती पर कदम रखेगा। पर मोनी को इस बात का रत्ती भर भी अहसास नहीं था कि नियति ने परमानंद के लिए पहले ही क्या बिसात बिछा रखी थी। वह इस सच से पूरी तरह अनजान थी कि बनारस पहुँचने से पहले ही, एयरपोर्ट के आधुनिक और कोलाहल भरे माहौल में परमानंद की मुलाकात मनोरमा और पिंकी से होने वाली थी।
अब तक केवल वेदों, शास्त्रों, योग और कठिन ब्रह्मचर्य की कड़क मर्यादाओं के बीच पले-बढ़े १८ वर्षीय परमानंद के जीवन में यह एक बहुत बड़ा मोड़ था। पहली बार, आश्रम के बाहर की इस खुली दुनिया में कदम रखते ही, उस प्रतापी ऋषि कुमार के मन में विपरीत लिंग के प्रति एक अलग, अनजाना और गहरा आकर्षण अंकुरित होने वाला था। स्त्रियों की कोमलता, उनकी चितवन और उनके बदन से उठती एक मादक महक ने परमानंद के भीतर के सुप्त पौरुष को पहली बार एक अजीब सी सिहरन से भरने की तैयारी कर ली थी। वह अंतर्मन जो अब तक केवल ईश्वर और साधना में लीन रहता था, वह अब विपरीत लिंग की इस नई और सम्मोहक ऊर्जा के प्रति एक अलग ही भाव महसूस करने के मुहाने पर खड़ा था, जिससे खुद परमानंद भी पूरी तरह अचंभित होने वाला था।
एयरपोर्ट के उस आधुनिक और चमचमाते टर्मिनल पर, जहाँ यात्रियों की भारी भीड़ और अनावरण का माहौल था, परमानंद के भीतर का संयम पहली बार डगमगा रहा था। जब से उसकी आँखें पिंकी से मिली थीं, उसके मन में एक अजब सी, अनजानी हलचल मच चुकी थी।
ऐसा नहीं था कि परमानंद ने इसके पहले कभी स्त्रियों को नहीं देखा था। आश्रम की सीमाओं से बाहर, जब-जब वह अपने पूज्य गुरुदेव और पिता स्वामी विद्यानंद के साथ ऊंचे मंचों पर बैठता था, तब-तब उसके ओजस्वी प्रवचनों को सुनने के लिए हजारों की संख्या में लड़कियां और स्त्रियां वहाँ उपस्थित होती थीं। परंतु, अब तक उसने एक उच्च चरित्रवान और निश्छल युवा की तरह अपने कठिन ब्रह्मचर्य व्रत का पूरी तरह पालन किया था। उसकी दृष्टि में हमेशा एक साधक की पवित्रता और वैराग्य का भाव रहता था।
पर आज, इस कोलाहल भरे परिवेश में दृश्य पूरी तरह बदल चुका था। आज पहली बार पिंकी की उस सम्मोहक उपस्थिति ने उसके १८ वर्षीय युवा हृदय में एक तीव्र व्याकुलता पैदा कर दी थी। पिंकी की चंचल चितवन, उसके चलने का अंदाज और उसका वह आधुनिक रूप बार-बार परमानंद के ध्यान को अपनी ओर खींच रहा था।
पिंकी का वह सुगठित, अनोखा और तरुणाई से भरा बदन, जो पाश्चात्य वस्त्रों में उसकी सुघड़ बनावट को उजागर कर रहा था, परमानंद की आँखों के सामने एक जादुई सम्मोहन की तरह तैरने लगा। अब तक केवल मंत्रों और शास्त्रों के ध्यान में लीन रहने वाला उसका मस्तिष्क, चाहकर भी पिंकी के उस निषिद्ध आकर्षण से खुद को दूर नहीं कर पा रहा था। उस कोमल बदन की छुअन और उसकी मादक सुगंध की कल्पना मात्र ने परमानंद के भीतर बरसों से सुप्त पड़े आदिम पौरुष को पूरी तरह जगा दिया था, जिसने उस युवा ऋषि कुमार को अंदर तक झकझोर कर रख दिया था।
बनारस के लाल बहादुर शास्त्री हवाई अड्डे (बाबतपुर एयरपोर्ट) पर जैसे ही परमानंद के कदम पड़े, वहाँ का पूरा वातावरण जयकारों से गूंज उठा। जिस प्रकार आश्रम के सैकड़ों समर्पित अनुयायियों और ऋषिकुमारों की भारी भीड़ उसे विदा करने एयरपोर्ट आई थी, ठीक उसी तरह बनारस में भी उसके स्वागत के लिए जनसैलाब उमड़ पड़ा था। स्थानीय आश्रम के वरिष्ठ पदाधिकारी, वेदपाठी ब्राह्मण और श्रद्धा से भरे अनुयायी मालाएँ, शंख और पुष्पगुच्छ लिए घंटों से पलकें बिछाए खड़े थे।
18 वर्षीय तेजस्वी परमानंद के गले में जब गेंदे और गुलाब की भारी मालाएँ पहनाई गईं और उसके माथे पर काशी की पावन मिट्टी और चंदन का तिलक लगाया गया, तो उसकी तीखी, ओजस्वी आँखों में एक अलग ही विनम्रता तैर गई। शंखध्वनि और "हर हर महादेव" के गगनभेदी नारों के बीच उसका ऐसा भव्य और अलौकिक स्वागत हुआ कि एयरपोर्ट पर मौजूद अन्य यात्री, यहाँ तक कि उसे उत्सुकता से निहार रहीं मनोरमा और पिंकी भी इस दृश्य को देखकर दंग रह गईं।
इस भव्य स्वागत समारोह के बाद, परमानंद को पूरे राजकीय सम्मान और सुरक्षा के साथ अनुयायियों केकाफिले के बीच वीआईपी गाड़ियों में बैठाया गया, और वह एयरपोर्ट से बनारस स्थित आश्रम की शाखा की तरफ निकल पड़ा।
गाड़ी की खिड़की से बाहर देखते हुए परमानंद का मन बनारस की जीवंतता में पूरी तरह रम गया था। सड़कों पर आते-जाते लोग, पान की दुकानों पर होने वाली चर्चाएं और हवा में तैरती वह खास बोली उसे अंदर तक मंत्रमुग्ध कर रही थी। यहाँ के लोगों के बातचीत करने का लहजा, जिसमें बनारसीपन के साथ-साथ भोजपुरी की मिठास साफ झलक रही थी, उसे अपनी तरफ खींच रहा था।
ऐसा नहीं था कि परमानंद ने यह भाषा पहली बार सुनी थी। आश्रम के भव्य कमरों और गलियारों में भी उसने कई सेवादारों और अनुयायियों को आपस में इस भाषा में बात करते सुना था। यहाँ तक कि उसकी माँ वज्रनंदिनी (मोनी) ने भी भावुकता के क्षणों में अनजाने में ही सही, इसी भाषा के शब्दों का प्रयोग किया था। पर न जाने क्यों, आज बनारस की इस खुली आब-ओ-हवा में इस बोली को सीधे लोगों के मुँह से सुनकर उसके भीतर एक अजीब सा रस घुल रहा था। वह सम्मोहन, जो एयरपोर्ट पर पिंकी को देखकर शुरू हुआ था, अब इस शहर की मिट्टी और भाषा से जुड़कर और गहरा होता जा रहा था।
अपनी व्याकुलता और कौतूहल को शांत करने के लिए, उसने अपनी बगल की सीट पर बैठे मुस्तैद कमांडो की तरफ देखा। सुरक्षा में तैनात वह कमांडो बेहद गंभीर मुद्रा में था। परमानंद ने सहजता से मुस्कुराते हुए उससे पूछा, "क्या आप भी भोजपुरी भाषा बोलते हैं? यहाँ के लोग जिस तरह बात कर रहे हैं, वह मुझे बहुत मनमोहक लग रहा है। क्यों न इस लंबे रास्ते के सफर को काटने के लिए आप मुझे भी भोजपुरी के कुछ शब्द सिखाएं?"
ऋषिकुमार और आश्रम के होने वाले उत्तराधिकारी के मुँह से ऐसी सरल और आत्मीय बात सुनकर कमांडो का कड़क चेहरा भी थोड़ा नरम पड़ गया। उसने आदरपूर्वक सिर झुकाया और मुस्कुराते हुए कहा, "जी महाराज, हम तो यहीं पूर्वांचल के रहने वाले हैं। भोजपुरी हमारी मातृभाषा है। अगर आप सीखना चाहते हैं, तो यह हमारे लिए सौभाग्य की बात है।"
रास्ते का सफर काटने के लिए परमानंद का यह अनोखा प्रयोग पूरी तरह सफल रहा। गाड़ी जैसे-जैसे बनारस के ट्रैफिक को पार करते हुए आश्रम की तरफ बढ़ रही थी, परमानंद बड़ी उत्सुकता से कमांडो से भोजपुरी के रोज़मर्रा के शब्द, अभिवादन के तरीके और उनका सही लहजा सीखने लगा। अब तक केवल कठिन संस्कृत श्लोकों और शास्त्रीय भाषा में रमने वाली उसकी जीभ जब भोजपुरी के मीठे और ठेठ शब्दों को दोहरा रही थी, तो उसके चेहरे पर एक बाल सुलभ और अद्भुत संतोष तैर रहा था।
गाड़ियों काकाफिला जैसे ही बनारस की व्यस्त सड़कों को पार कर आश्रम के मुख्य और भव्य मुख्य द्वार के सामने पहुँचा, त्यों ही परमानंद ने अपने बगल में बैठे कमांडो की तरफ देखा। उस कमांडो के चेहरे पर अभी भी एक शिक्षक जैसी सहज मुस्कान थी, जिसने पिछले आधे घंटे में इस प्रतापी ऋषिकुमार को अपनी मातृभाषा के कई शब्द सिखाए थे।
परमानंद ने बेहद आत्मीयता से मुस्कुराते हुए और अपनी आवाज में वही ठेठ बनारसी और भोजपुरी का लहजा लाते हुए कहा:
"अच्छा ठीक बा, अब बाकी बाद में सिखा दिहा।"
परमानंद के मुख से निकले भोजपुरी के इन चंद शब्दों ने गाड़ी में बैठे कमांडो, आगे की सीट पर तैनात सुरक्षाकर्मियों और साथ चल रहे सभी अनुयायियों को पूरी तरह अचंभित कर दिया। मात्र आधे घंटे के सफर में, बिना किसी पूर्व अभ्यास के, परमानंद ने जिस शुद्धता, प्रवाह और सटीक उच्चारण के साथ इस वाक्य को कहा था, उसने वहाँ उपस्थित हर व्यक्ति के दिल को छू लिया। भाषा पर इतनी त्वरित पकड़ और वो भी उसी खास स्थानीय पुट के साथ, सचमुच असाधारण थी।
यह केवल एक भाषा सीखने का प्रयास नहीं था, बल्कि यह उस विलक्षण मेधा का प्रमाण था जो इस 18 वर्षीय युवा के भीतर रची-बसी थी। स्वामी विद्यानंद का यह पुत्र, जो अब तक केवल शास्त्रों और योग की गुप्त विद्याओं में लीन रहता था, सचमुच बेहद प्रतिभाशाली और एक ऐसे आश्चर्यजनक, चुंबकीय व्यक्तित्व का स्वामी था जो पहली ही मुलाकात में किसी को भी अपना बना ले। आश्रम के मुख्य द्वार पर उतरते ही उसकी यह अनूठी प्रतिभा उसके इस काशी प्रवास के एक बेहद रोमांचक और नए अध्याय का संकेत दे रही थी।
अगले दिन भोर की पहली किरण के साथ ही बनारस की आब-ओ-हवा में एक नई हलचल शुरू हो चुकी थी। रात भर की यात्रा और बनारस की मिट्टी से मिले उस अनजाने अपनेपन की सुखद अनुभूति के बाद, परमानंद अपनी पूरी ऊर्जा के साथ जाग चुका था।
सुबह की नित्य क्रिया और सूर्य अर्घ्य से निवृत्त होने के बाद, परमानंद ने आश्रम के खुले प्रांगण में अपनी दैनिक वर्जिश और कठिन अभ्यास शुरू किया। जब वह सूर्य की कोमल किरणों के बीच प्राणायाम, दंड-बैठक के जटिल दांव-पेच कर रहा था, तो आश्रम के सेवादार और अन्य लोग वहीं ठिठक गए। अपने सुंदर, सुडौल और गठीले शरीर से वर्जिश करते हुए परमानंद को देखकर आश्रम के लोग पूरी तरह आश्चर्यचकित हो रहे थे। उसकी चौड़ी छाती पर बहता पसीना और हर हरकत के साथ उभरती उसकी कसी हुई मांसपेशियां एक अलौकिक दृश्य पैदा कर रही थीं। वहाँ मौजूद हर व्यक्ति मन ही मन सोच रहा था कि इतना सुंदर, ओजस्वी और अद्भुत शारीरिक सौष्ठव वाला युवा संसार में बिरला ही होता है। उसे देखकर ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे विधाता ने उसे बहुत फुर्सत और खूबसूरती से, किसी विशेष और महान नियति के लिए ही गढ़ा है।
इस ऊर्जावान कसरत के बाद, परमानंद ने अपने पारंपरिक और गरिमामयी वस्त्र धारण किए। उसने अपनी बलिष्ठ देह पर कड़ा हुआ श्वेत कुर्ता और रेशमी धोती पहनी थी, जिसके ऊपर कंधे पर हल्के केसरिया रंग का अंगवस्त्र उसकी आध्यात्मिक आभा को और निखार रहा था। माथे पर लगा ताजा चंदन का त्रिपुंड और उसकी तीखी, ओजस्वी आँखें किसी प्रतापी युवा राजा और दिव्य ऋषिकुमार का अद्भुत मिश्रण प्रस्तुत कर रही थीं।
आज का दिन उसके इस काशी प्रवास का पहला और अत्यंत महत्वपूर्ण व्यावहारिक कदम था। स्वामी विद्यानंद जी के आदेशानुसार, उसे 'बनारस महोत्सव' के उस भव्य आयोजन स्थल का बारीकी से निरीक्षण करना था और अपने आश्रम की विशेष रूपरेखा व पंडालों की स्थिति तय करने के लिए साइड सर्वे पर निकलना था। उसने अपने इस महत्वपूर्ण कार्य के लिए आश्रम के कुछ बेहद चुनिंदा और अनुभवी साथियों, वास्तुशास्त्र के मर्मज्ञों और स्थानीय प्रबंधकों की एक छोटी सी टीम तैयार की। सुरक्षा की कड़ी व्यवस्था के बीच, उसकी गाड़ियाँ बनारस के प्रसिद्ध घाटों और महोत्सव के लिए निर्धारित उस विशाल मैदान की ओर कूच कर गईं, जहाँ देश-विदेश के दिग्गज जुटने वाले थे।
जैसे ही परमानंद का यह छोटाकाफिला आयोजन स्थल पर पहुँचा, वहाँ का विशाल परिदृश्य देखकर उसकी आँखों में एक साधक की दूरदर्शिता चमक उठी। गंगा की लहरों के ठीक समीप फैले उस विस्तृत भूभाग पर चारों तरफ बल्लियाँ गाड़े जाने, बड़े-बड़े मंच तैयार होने और भव्य द्वारों के निर्माण का काम युद्धस्तर पर चल रहा था। हवा में अभी से एक उत्सव का उत्साह और बनारस के स्थानीय कारीगरों की गूँजती आवाजें तैर रही थीं।
गाड़ी से उतरते ही परमानंद ने अपने हाथ में महोत्सव का पूरा नक्शा लिया। उसके चलने के अंदाज में एक अजीब सा पौरुष और आत्मविश्वास था, जिसने वहाँ काम कर रहे बड़े-बड़े इंजीनियरों और प्रशासनिक अधिकारियों का ध्यान तुरंत अपनी ओर खींच लिया। कोई नहीं कह सकता था कि यह 18 वर्षीय युवा, जिसने कल ही बनारस की धरती पर कदम रखा है, इतनी परिपक्वता से इस विशाल स्थल का जायजा लेगा।
परमानंद ने मैदान के चारों कोनों का चक्कर लगाना शुरू किया। उसने गंगा से आने वाली हवा की दिशा, मुख्य मंच से भक्तों के बैठने की दूरी और वीआईपी प्रवेश द्वारों की स्थिति का सूक्ष्मता से अध्ययन किया। उसने अपने साथियों को रुकने का संकेत दिया और नक्शे पर उंगली रखते हुए बेहद गंभीर और सधे हुए स्वर में कहा, "हमारे मुख्य आश्रम का जो पंडाल और दिव्य वेदी बनेगी, वह ठीक इस कोण पर होनी चाहिए। यहाँ से गंगा मैया का सीधा दर्शन भी होगा और जब पूज्य गुरुदेव स्वामी विद्यानंद जी का आगमन होगा, तो उनकी आध्यात्मिक ऊर्जा इस पूरे परिसर को बिना किसी बाधा के प्रभावित कर सकेगी।"
उसने वहीं खड़े-खड़े वास्तु और सुरक्षा दोनों को ध्यान में रखते हुए अपने साथियों को कुछ ऐसे निर्देश दिए, जिसने वहाँ मौजूद अनुभवी प्रबंधकों को भी निरुत्तर कर दिया। उसकी इस कदर विलक्षण मेधा और बारीक समझ को देखकर उसके साथी मन ही मन मुस्कुरा उठे—वे समझ गए थे कि विद्यानंद जी का यह चुनाव कितना सटीक था।
परंतु, इस पूरे सर्वे के दौरान, जहाँ एक तरफ परमानंद का मस्तिष्क पूरी तरह से आश्रम की रूपरेखा और महोत्सव की व्यवस्थाओं में लगा हुआ था, वहीं उसके अंतर्मन के किसी कोने में कल एयरपोर्ट पर छूटी वह स्मृति भी रह-रहकर कौंध जाती थी। पिंकी के उस चंचल रूप, उसकी मादक चितवन और उसके अनोखे बदन का जो पहला अहसास उसके हृदय में हलचल मचा गया था, वह इस बनारस की उन्मुक्त हवा में पूरी तरह ओझल नहीं हो पाया था।
जैसे ही वह गंगा की ओर बहती हवा को महसूस करने के लिए आँखें मूँदता, उसे उस कोमल बदन की महक का भ्रम होने लगता। परमानंद ने एक गहरी साँस ली, अपने भीतर के द्वंद्व को संभाला और अपनी चेतना को पुनः उस भूमि की पैमाइश पर केंद्रित कर दिया। वह अपनी नियति के इस नए अध्याय को पूरी तरह से जीने के लिए तैयार था, लेकिन उसे यह आभास नहीं था कि इस महोत्सव की भव्य ज़मीन पर, जहाँ वह आज अपने आश्रम की नींव तय कर रहा था, वहीं उसकी जिंदगी के सबसे बड़े रहस्यों और काम-अध्यात्म के सबसे बड़े टकराव का मंच भी सज रहा था।
आज का दिन उसके इस काशी प्रवास का पहला और जैसे ही परमानंद का यह छोटा काफिला आयोजन स्थल पर पहुँचा, वहाँ का विशाल परिदृश्य देखकर उसकी आँखों में एक साधक की दूरदर्शिता चमक उठी। गंगा की लहरों के ठीक समीप फैले उस विस्तृत भूभाग पर चारों तरफ बल्लियाँ गाड़े जाने, बड़े-बड़े मंच तैयार होने और भव्य द्वारों के निर्माण का काम युद्धस्तर पर चल रहा था। हवा में अभी से एक उत्सव का उत्साह और बनारस के स्थानीय कारीगरों की गूँजती आवाजें तैर रही थीं।
इसी बीच, आयोजन स्थल के मुख्य प्रवेश द्वार से धूल उड़ाता हुआ सफेद गाड़ियों का एक प्रशासनिक काफिला अंदर आता हुआ दिखाई दिया। सभी गाड़ियों पर सरकारी और प्रशासनिक बोर्ड लगे हुए थे, जो इस बात का संकेत थे कि कोई बड़ा अधिकारी व्यवस्थाओं का जायजा लेने पहुँचा है।
परमानंद और उसके साथियों की नजरें स्वाभाविक रूप से उस काफिले की तरफ मुड़ गईं। बीच की एक मुख्य गाड़ी से जैसे ही सुरक्षाकर्मी ने उतरकर दरवाजा खोला, वहाँ एक गंभीर और रौबदार व्यक्तित्व की महिला अधिकारी बाहर निकलीं। यह कोई और नहीं, बल्कि मनोरमा ही थीं! बनारस महोत्सव जैसे देश-विदेश में ख्याति प्राप्त और भव्य आयोजन को सुचारू रूप से संपन्न कराने के लिए सरकार की तरफ से मनोरमा को इस बार का मुख्य प्रशासनिक कार्यभार संभालने के लिए विशेष रूप से नियुक्त किया गया था। वे इस पूरे आयोजन की नोडल अधिकारी और मुख्य व्यवस्थापक थीं।
एयरपोर्ट के उस आधुनिक टर्मिनल के कोलाहल के बाद, अब सीधे इस कर्मक्षेत्र की धूल और काम के बीच मनोरमा को इस रूप में देखकर परमानंद एक क्षण के लिए ठिठक गया। मनोरमा को देखते ही उसके दिल की धड़कनें तेज हो गईं और उसकी नजरें तुरंत ही गाड़ी और उसके आसपास पिंकी को खोजने लगीं। उसका मन व्याकुल हो उठा कि क्या पिंकी भी इस काफिले के साथ यहाँ आई है, क्योंकि एयरपोर्ट पर पिंकी को देखकर जो हलचल उसके दिलो दिमाग में शुरू हुई थी, वह अब भी उसके अंतर्मन में पूरी तरह हावी थी।
जैसे ही मनोरमा की नज़रें परमानंद से मिलीं परमानंद के चेहरे पर एक पर एक मुस्कुराहट आ गई..
शेष अगले भाग में
आइए सोनी और सूरज को इस अद्भुत मिलन के आनंद में डूबा छोड़कर आपको लिए चलते हैं विद्यानंद के आश्रम में जहां मोनी आज उदास थी…
स्वामी विद्यानंद के उस भव्य और विशाल आश्रम में दोपहर का सन्नाटा पसरा हुआ था। धूपदानी से निकलता हुआ चंदन का धुआँ हवा में तैर रहा था, जिससे पूरे वातावरण में एक मादक और शांत सुगंध घुली हुई थी। इस शांत दोपहर में, आश्रम के एक एकांत और आलीशान कक्ष में बैठी वज्रनंदिनी (मोनी) पूरी तरह विचारों में खोई हुई थी। उसका पुत्र परमानंद बनारस की उस अनजानी यात्रा के लिए आश्रम से प्रस्थान कर चुका था और इस समय एयरपोर्ट के रास्ते में था, पर मोनी का ममतामयी दिल रह-रहकर उसी भव्य कमरे में थमी उसकी अंतिम तैयारियों को याद कर रहा था।
मोनी की आँखों के सामने कुछ ही समय पहले का वह दृश्य किसी जीवंत चित्र की तरह घूम गया। इसी विशाल कमरे में उसका १८ वर्षीय बलिष्ठ, सुडौल और तेजस्वी पुत्र परमानंद अपने प्रस्थान की अंतिम तैयारियों में जुटा था। वह अपनी रोज़मर्रा की दुनिया से अलग, एक सुंदर ब्रीफकेस में कुछ अत्यंत आवश्यक और प्राचीन धार्मिक ग्रंथ, कुश का पवित्र आसन और अपनी दैनिक साधना की गुप्त सामग्री को बहुत सलीके से सहेज रहा था। उस प्रतापी ऋषि कुमार की चौड़ी छाती, वर्जिश और कठिन अभ्यास से कसी हुई जंघाएं और माथे पर चमकता चंदन का तिलक उसकी शारीरिक और आध्यात्मिक सुदृढ़ता की गवाही दे रहे थे।
तभी मोनी अत्यंत चिंतित कदमों से उसके पास पहुँची थी। अपने इस दिव्य बालक को देखकर उसका मातृत्व उमड़ आया था, पर साथ ही आशंकाओं का एक बवंडर भी उठ खड़ा हुआ था। उसने अपने स्वर को सामान्य रखते हुए पूछा था, "परमानंद, तुम इतनी उत्सुकता से किस बात की तैयारी कर रहे हो? कहाँ जाने का विचार है तुम्हारा?"
परमानंद ने उस सुंदर ब्रीफकेस को बंद करते हुए अत्यंत विनीत भाव से अपनी माता के चरण स्पर्श किए थे और अपनी ओजस्वी आँखों में एक नई चमक लिए खड़ा हो गया था। उसने कहा था, "गुरुमाता, मुझे परम पूज्य गुरुदेव स्वामी विद्यानंद जी का आदेश प्राप्त हुआ है। बनारस में होने वाले भव्य 'बनारस महोत्सव' की तैयारियाँ अपने अंतिम चरण में हैं, और मुझे वहाँ जाकर उस पूरे आयोजन का जायजा लेने और अपनी देखरेख में उसे सुचारू रूप से संपन्न कराने के लिए तुरंत बनारस प्रस्थान करना होगा।"
परमानंद के मुँह से 'बनारस' का नाम सुनते ही मोनी के भीतर जैसे समय का चक्र पीछे की ओर घूम गया था। वह भली-भांति जानती थी कि स्वामी विद्यानंद का आदेश साक्षात नियति का आदेश है, जिसे टालना किसी के लिए भी संभव नहीं था। फिर भी, अपनी ही कोख से जन्मे इस बालक को, जो अब तक आश्रम की सुरक्षित और मर्यादित दीवारों के बीच ही पला-बढ़ा था, अकेले उस मायावी नगरी में भेजने के विचार मात्र से उसका माँ का दिल बेहद असहज और व्याकुल हो उठा था।
जैसे ही 'बनारस' शब्द गूंजा था, मोनी के मानस पटल पर अपनी बड़ी बहन 'सुगना' का चेहरा सजीव हो उठा था, जिसने बड़ी बहन होने के बावजूद उसे अपनी सगी बेटी की तरह अगाध प्रेम देकर पाल-पोसकर बड़ा किया था। सीतापुर की वे गलियाँ, जहाँ उसका बचपन बीता था, एक-एक करके उसकी आँखों के सामने आने लगी थीं।
मनी सुगना और उसके साथ बिताए गए अपने किशोरावस्था के दिन याद करने लगी सुगना उसे भी उतनी ही प्यारी थी जितना सोनू और सोनी को थी।
पर इस ममता के ठीक पीछे अतीत की वह अत्यंत भयानक, काली और डरावनी रात का दृश्य छिपा हुआ था, जिसने मोनी के जीवन की पूरी दिशा ही बदल दी थी और उसे इस साधना आश्रम के भव्य परिवेश तक पहुँचा दिया था। उसे वह खौफनाक दृश्य याद आने लगा, जब उसने अपनी ही सगी बहन सुगना और अपने भाई सोनू को एक साथ, मर्यादा की सारी सीमाओं को छिन्न-भिन्न करके, उस निषिद्ध और अंधियारे कमरे में अंतरंग होते देख लिया था। भाई और बहन के बीच के उस पाप और उग्र समागम के दृश्य ने उस समय मोनी के भीतर के सारे विश्वास को हिलाकर रख दिया था।
तब मोनी ने एक गहरी और ठंडी साँस लेकर परमानंद के दोनों कंधों को अपने हाथों में थामा था और उसकी आँखों में देखते हुए बेहद गंभीर स्वर में कहा था, "पुत्र, जिस बनारस की ओर तुम कदम बढ़ा रहे हो, वह केवल संतों, घाटों और पावन गंगा की नगरी नहीं है। वह नगर एक ऐसा मायाजाल है जहाँ अध्यात्म के उच्चतम शिखर के साथ-साथ वासना और मानव मन के सबसे गहरे अंधकार का भी वास है। बनारस सत और असत का ऐसा अद्भुत संगम है, जहाँ कदम-कदम पर तुम्हारी इंद्रियों की परीक्षा होगी। वहाँ की चमकीली गलियों और भव्य हवेलियों के पीछे कई ऐसे राज छिपे हैं, जो मर्यादा की हर सीमा को खंडित कर चुके हैं। तुम वहाँ केवल एक उत्सव के साक्षी बनने नहीं जा रहे हो, बल्कि उस धरती पर पैर रखते ही तुम्हारा सामना जीवन के उस नग्न और आदिम सत्य से होगा जिसे तुमने इस आश्रम की शांत दीवारों के भीतर कभी नहीं देखा। स्वामी विद्यानंद जी ने तुम्हें वहाँ की पावनता के साथ-साथ वहाँ के मोह से बचने की जो चेतावनी दी है, उसे अपने अंतर्मन में बांध लो। बनारस की वह माटी जितने गहरे रहस्य समेटे हुए है, उतनी ही उग्रता से वह मनुष्यों के भीतर दबी हुई कामनाओं को भी भड़काती है। तुम्हें वहाँ अपनी साधना की अग्नि को और तीव्र रखना होगा, ताकि वहाँ का कोई भी अनैतिक सत्य तुम्हारी आभा को छू भी न सके।"
इस दोपहर के सन्नाटे में बैठी मोनी इसी विचार से बार-बार सिहर रही थी कि उसका पुत्र अब आश्रम से दूर, एयरपोर्ट की तरफ बढ़ रहा है जहाँ से वह सीधे उसी बनारस की धरती पर कदम रखेगा। पर मोनी को इस बात का रत्ती भर भी अहसास नहीं था कि नियति ने परमानंद के लिए पहले ही क्या बिसात बिछा रखी थी। वह इस सच से पूरी तरह अनजान थी कि बनारस पहुँचने से पहले ही, एयरपोर्ट के आधुनिक और कोलाहल भरे माहौल में परमानंद की मुलाकात मनोरमा और पिंकी से होने वाली थी।
अब तक केवल वेदों, शास्त्रों, योग और कठिन ब्रह्मचर्य की कड़क मर्यादाओं के बीच पले-बढ़े १८ वर्षीय परमानंद के जीवन में यह एक बहुत बड़ा मोड़ था। पहली बार, आश्रम के बाहर की इस खुली दुनिया में कदम रखते ही, उस प्रतापी ऋषि कुमार के मन में विपरीत लिंग के प्रति एक अलग, अनजाना और गहरा आकर्षण अंकुरित होने वाला था। स्त्रियों की कोमलता, उनकी चितवन और उनके बदन से उठती एक मादक महक ने परमानंद के भीतर के सुप्त पौरुष को पहली बार एक अजीब सी सिहरन से भरने की तैयारी कर ली थी। वह अंतर्मन जो अब तक केवल ईश्वर और साधना में लीन रहता था, वह अब विपरीत लिंग की इस नई और सम्मोहक ऊर्जा के प्रति एक अलग ही भाव महसूस करने के मुहाने पर खड़ा था, जिससे खुद परमानंद भी पूरी तरह अचंभित होने वाला था।
एयरपोर्ट के उस आधुनिक और चमचमाते टर्मिनल पर, जहाँ यात्रियों की भारी भीड़ और अनावरण का माहौल था, परमानंद के भीतर का संयम पहली बार डगमगा रहा था। जब से उसकी आँखें पिंकी से मिली थीं, उसके मन में एक अजब सी, अनजानी हलचल मच चुकी थी।
ऐसा नहीं था कि परमानंद ने इसके पहले कभी स्त्रियों को नहीं देखा था। आश्रम की सीमाओं से बाहर, जब-जब वह अपने पूज्य गुरुदेव और पिता स्वामी विद्यानंद के साथ ऊंचे मंचों पर बैठता था, तब-तब उसके ओजस्वी प्रवचनों को सुनने के लिए हजारों की संख्या में लड़कियां और स्त्रियां वहाँ उपस्थित होती थीं। परंतु, अब तक उसने एक उच्च चरित्रवान और निश्छल युवा की तरह अपने कठिन ब्रह्मचर्य व्रत का पूरी तरह पालन किया था। उसकी दृष्टि में हमेशा एक साधक की पवित्रता और वैराग्य का भाव रहता था।
पर आज, इस कोलाहल भरे परिवेश में दृश्य पूरी तरह बदल चुका था। आज पहली बार पिंकी की उस सम्मोहक उपस्थिति ने उसके १८ वर्षीय युवा हृदय में एक तीव्र व्याकुलता पैदा कर दी थी। पिंकी की चंचल चितवन, उसके चलने का अंदाज और उसका वह आधुनिक रूप बार-बार परमानंद के ध्यान को अपनी ओर खींच रहा था।
पिंकी का वह सुगठित, अनोखा और तरुणाई से भरा बदन, जो पाश्चात्य वस्त्रों में उसकी सुघड़ बनावट को उजागर कर रहा था, परमानंद की आँखों के सामने एक जादुई सम्मोहन की तरह तैरने लगा। अब तक केवल मंत्रों और शास्त्रों के ध्यान में लीन रहने वाला उसका मस्तिष्क, चाहकर भी पिंकी के उस निषिद्ध आकर्षण से खुद को दूर नहीं कर पा रहा था। उस कोमल बदन की छुअन और उसकी मादक सुगंध की कल्पना मात्र ने परमानंद के भीतर बरसों से सुप्त पड़े आदिम पौरुष को पूरी तरह जगा दिया था, जिसने उस युवा ऋषि कुमार को अंदर तक झकझोर कर रख दिया था।
बनारस के लाल बहादुर शास्त्री हवाई अड्डे (बाबतपुर एयरपोर्ट) पर जैसे ही परमानंद के कदम पड़े, वहाँ का पूरा वातावरण जयकारों से गूंज उठा। जिस प्रकार आश्रम के सैकड़ों समर्पित अनुयायियों और ऋषिकुमारों की भारी भीड़ उसे विदा करने एयरपोर्ट आई थी, ठीक उसी तरह बनारस में भी उसके स्वागत के लिए जनसैलाब उमड़ पड़ा था। स्थानीय आश्रम के वरिष्ठ पदाधिकारी, वेदपाठी ब्राह्मण और श्रद्धा से भरे अनुयायी मालाएँ, शंख और पुष्पगुच्छ लिए घंटों से पलकें बिछाए खड़े थे।
18 वर्षीय तेजस्वी परमानंद के गले में जब गेंदे और गुलाब की भारी मालाएँ पहनाई गईं और उसके माथे पर काशी की पावन मिट्टी और चंदन का तिलक लगाया गया, तो उसकी तीखी, ओजस्वी आँखों में एक अलग ही विनम्रता तैर गई। शंखध्वनि और "हर हर महादेव" के गगनभेदी नारों के बीच उसका ऐसा भव्य और अलौकिक स्वागत हुआ कि एयरपोर्ट पर मौजूद अन्य यात्री, यहाँ तक कि उसे उत्सुकता से निहार रहीं मनोरमा और पिंकी भी इस दृश्य को देखकर दंग रह गईं।
इस भव्य स्वागत समारोह के बाद, परमानंद को पूरे राजकीय सम्मान और सुरक्षा के साथ अनुयायियों केकाफिले के बीच वीआईपी गाड़ियों में बैठाया गया, और वह एयरपोर्ट से बनारस स्थित आश्रम की शाखा की तरफ निकल पड़ा।
गाड़ी की खिड़की से बाहर देखते हुए परमानंद का मन बनारस की जीवंतता में पूरी तरह रम गया था। सड़कों पर आते-जाते लोग, पान की दुकानों पर होने वाली चर्चाएं और हवा में तैरती वह खास बोली उसे अंदर तक मंत्रमुग्ध कर रही थी। यहाँ के लोगों के बातचीत करने का लहजा, जिसमें बनारसीपन के साथ-साथ भोजपुरी की मिठास साफ झलक रही थी, उसे अपनी तरफ खींच रहा था।
ऐसा नहीं था कि परमानंद ने यह भाषा पहली बार सुनी थी। आश्रम के भव्य कमरों और गलियारों में भी उसने कई सेवादारों और अनुयायियों को आपस में इस भाषा में बात करते सुना था। यहाँ तक कि उसकी माँ वज्रनंदिनी (मोनी) ने भी भावुकता के क्षणों में अनजाने में ही सही, इसी भाषा के शब्दों का प्रयोग किया था। पर न जाने क्यों, आज बनारस की इस खुली आब-ओ-हवा में इस बोली को सीधे लोगों के मुँह से सुनकर उसके भीतर एक अजीब सा रस घुल रहा था। वह सम्मोहन, जो एयरपोर्ट पर पिंकी को देखकर शुरू हुआ था, अब इस शहर की मिट्टी और भाषा से जुड़कर और गहरा होता जा रहा था।
अपनी व्याकुलता और कौतूहल को शांत करने के लिए, उसने अपनी बगल की सीट पर बैठे मुस्तैद कमांडो की तरफ देखा। सुरक्षा में तैनात वह कमांडो बेहद गंभीर मुद्रा में था। परमानंद ने सहजता से मुस्कुराते हुए उससे पूछा, "क्या आप भी भोजपुरी भाषा बोलते हैं? यहाँ के लोग जिस तरह बात कर रहे हैं, वह मुझे बहुत मनमोहक लग रहा है। क्यों न इस लंबे रास्ते के सफर को काटने के लिए आप मुझे भी भोजपुरी के कुछ शब्द सिखाएं?"
ऋषिकुमार और आश्रम के होने वाले उत्तराधिकारी के मुँह से ऐसी सरल और आत्मीय बात सुनकर कमांडो का कड़क चेहरा भी थोड़ा नरम पड़ गया। उसने आदरपूर्वक सिर झुकाया और मुस्कुराते हुए कहा, "जी महाराज, हम तो यहीं पूर्वांचल के रहने वाले हैं। भोजपुरी हमारी मातृभाषा है। अगर आप सीखना चाहते हैं, तो यह हमारे लिए सौभाग्य की बात है।"
रास्ते का सफर काटने के लिए परमानंद का यह अनोखा प्रयोग पूरी तरह सफल रहा। गाड़ी जैसे-जैसे बनारस के ट्रैफिक को पार करते हुए आश्रम की तरफ बढ़ रही थी, परमानंद बड़ी उत्सुकता से कमांडो से भोजपुरी के रोज़मर्रा के शब्द, अभिवादन के तरीके और उनका सही लहजा सीखने लगा। अब तक केवल कठिन संस्कृत श्लोकों और शास्त्रीय भाषा में रमने वाली उसकी जीभ जब भोजपुरी के मीठे और ठेठ शब्दों को दोहरा रही थी, तो उसके चेहरे पर एक बाल सुलभ और अद्भुत संतोष तैर रहा था।
गाड़ियों काकाफिला जैसे ही बनारस की व्यस्त सड़कों को पार कर आश्रम के मुख्य और भव्य मुख्य द्वार के सामने पहुँचा, त्यों ही परमानंद ने अपने बगल में बैठे कमांडो की तरफ देखा। उस कमांडो के चेहरे पर अभी भी एक शिक्षक जैसी सहज मुस्कान थी, जिसने पिछले आधे घंटे में इस प्रतापी ऋषिकुमार को अपनी मातृभाषा के कई शब्द सिखाए थे।
परमानंद ने बेहद आत्मीयता से मुस्कुराते हुए और अपनी आवाज में वही ठेठ बनारसी और भोजपुरी का लहजा लाते हुए कहा:
"अच्छा ठीक बा, अब बाकी बाद में सिखा दिहा।"
परमानंद के मुख से निकले भोजपुरी के इन चंद शब्दों ने गाड़ी में बैठे कमांडो, आगे की सीट पर तैनात सुरक्षाकर्मियों और साथ चल रहे सभी अनुयायियों को पूरी तरह अचंभित कर दिया। मात्र आधे घंटे के सफर में, बिना किसी पूर्व अभ्यास के, परमानंद ने जिस शुद्धता, प्रवाह और सटीक उच्चारण के साथ इस वाक्य को कहा था, उसने वहाँ उपस्थित हर व्यक्ति के दिल को छू लिया। भाषा पर इतनी त्वरित पकड़ और वो भी उसी खास स्थानीय पुट के साथ, सचमुच असाधारण थी।
यह केवल एक भाषा सीखने का प्रयास नहीं था, बल्कि यह उस विलक्षण मेधा का प्रमाण था जो इस 18 वर्षीय युवा के भीतर रची-बसी थी। स्वामी विद्यानंद का यह पुत्र, जो अब तक केवल शास्त्रों और योग की गुप्त विद्याओं में लीन रहता था, सचमुच बेहद प्रतिभाशाली और एक ऐसे आश्चर्यजनक, चुंबकीय व्यक्तित्व का स्वामी था जो पहली ही मुलाकात में किसी को भी अपना बना ले। आश्रम के मुख्य द्वार पर उतरते ही उसकी यह अनूठी प्रतिभा उसके इस काशी प्रवास के एक बेहद रोमांचक और नए अध्याय का संकेत दे रही थी।
अगले दिन भोर की पहली किरण के साथ ही बनारस की आब-ओ-हवा में एक नई हलचल शुरू हो चुकी थी। रात भर की यात्रा और बनारस की मिट्टी से मिले उस अनजाने अपनेपन की सुखद अनुभूति के बाद, परमानंद अपनी पूरी ऊर्जा के साथ जाग चुका था।
सुबह की नित्य क्रिया और सूर्य अर्घ्य से निवृत्त होने के बाद, परमानंद ने आश्रम के खुले प्रांगण में अपनी दैनिक वर्जिश और कठिन अभ्यास शुरू किया। जब वह सूर्य की कोमल किरणों के बीच प्राणायाम, दंड-बैठक के जटिल दांव-पेच कर रहा था, तो आश्रम के सेवादार और अन्य लोग वहीं ठिठक गए। अपने सुंदर, सुडौल और गठीले शरीर से वर्जिश करते हुए परमानंद को देखकर आश्रम के लोग पूरी तरह आश्चर्यचकित हो रहे थे। उसकी चौड़ी छाती पर बहता पसीना और हर हरकत के साथ उभरती उसकी कसी हुई मांसपेशियां एक अलौकिक दृश्य पैदा कर रही थीं। वहाँ मौजूद हर व्यक्ति मन ही मन सोच रहा था कि इतना सुंदर, ओजस्वी और अद्भुत शारीरिक सौष्ठव वाला युवा संसार में बिरला ही होता है। उसे देखकर ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे विधाता ने उसे बहुत फुर्सत और खूबसूरती से, किसी विशेष और महान नियति के लिए ही गढ़ा है।
इस ऊर्जावान कसरत के बाद, परमानंद ने अपने पारंपरिक और गरिमामयी वस्त्र धारण किए। उसने अपनी बलिष्ठ देह पर कड़ा हुआ श्वेत कुर्ता और रेशमी धोती पहनी थी, जिसके ऊपर कंधे पर हल्के केसरिया रंग का अंगवस्त्र उसकी आध्यात्मिक आभा को और निखार रहा था। माथे पर लगा ताजा चंदन का त्रिपुंड और उसकी तीखी, ओजस्वी आँखें किसी प्रतापी युवा राजा और दिव्य ऋषिकुमार का अद्भुत मिश्रण प्रस्तुत कर रही थीं।
आज का दिन उसके इस काशी प्रवास का पहला और अत्यंत महत्वपूर्ण व्यावहारिक कदम था। स्वामी विद्यानंद जी के आदेशानुसार, उसे 'बनारस महोत्सव' के उस भव्य आयोजन स्थल का बारीकी से निरीक्षण करना था और अपने आश्रम की विशेष रूपरेखा व पंडालों की स्थिति तय करने के लिए साइड सर्वे पर निकलना था। उसने अपने इस महत्वपूर्ण कार्य के लिए आश्रम के कुछ बेहद चुनिंदा और अनुभवी साथियों, वास्तुशास्त्र के मर्मज्ञों और स्थानीय प्रबंधकों की एक छोटी सी टीम तैयार की। सुरक्षा की कड़ी व्यवस्था के बीच, उसकी गाड़ियाँ बनारस के प्रसिद्ध घाटों और महोत्सव के लिए निर्धारित उस विशाल मैदान की ओर कूच कर गईं, जहाँ देश-विदेश के दिग्गज जुटने वाले थे।
जैसे ही परमानंद का यह छोटाकाफिला आयोजन स्थल पर पहुँचा, वहाँ का विशाल परिदृश्य देखकर उसकी आँखों में एक साधक की दूरदर्शिता चमक उठी। गंगा की लहरों के ठीक समीप फैले उस विस्तृत भूभाग पर चारों तरफ बल्लियाँ गाड़े जाने, बड़े-बड़े मंच तैयार होने और भव्य द्वारों के निर्माण का काम युद्धस्तर पर चल रहा था। हवा में अभी से एक उत्सव का उत्साह और बनारस के स्थानीय कारीगरों की गूँजती आवाजें तैर रही थीं।
गाड़ी से उतरते ही परमानंद ने अपने हाथ में महोत्सव का पूरा नक्शा लिया। उसके चलने के अंदाज में एक अजीब सा पौरुष और आत्मविश्वास था, जिसने वहाँ काम कर रहे बड़े-बड़े इंजीनियरों और प्रशासनिक अधिकारियों का ध्यान तुरंत अपनी ओर खींच लिया। कोई नहीं कह सकता था कि यह 18 वर्षीय युवा, जिसने कल ही बनारस की धरती पर कदम रखा है, इतनी परिपक्वता से इस विशाल स्थल का जायजा लेगा।
परमानंद ने मैदान के चारों कोनों का चक्कर लगाना शुरू किया। उसने गंगा से आने वाली हवा की दिशा, मुख्य मंच से भक्तों के बैठने की दूरी और वीआईपी प्रवेश द्वारों की स्थिति का सूक्ष्मता से अध्ययन किया। उसने अपने साथियों को रुकने का संकेत दिया और नक्शे पर उंगली रखते हुए बेहद गंभीर और सधे हुए स्वर में कहा, "हमारे मुख्य आश्रम का जो पंडाल और दिव्य वेदी बनेगी, वह ठीक इस कोण पर होनी चाहिए। यहाँ से गंगा मैया का सीधा दर्शन भी होगा और जब पूज्य गुरुदेव स्वामी विद्यानंद जी का आगमन होगा, तो उनकी आध्यात्मिक ऊर्जा इस पूरे परिसर को बिना किसी बाधा के प्रभावित कर सकेगी।"
उसने वहीं खड़े-खड़े वास्तु और सुरक्षा दोनों को ध्यान में रखते हुए अपने साथियों को कुछ ऐसे निर्देश दिए, जिसने वहाँ मौजूद अनुभवी प्रबंधकों को भी निरुत्तर कर दिया। उसकी इस कदर विलक्षण मेधा और बारीक समझ को देखकर उसके साथी मन ही मन मुस्कुरा उठे—वे समझ गए थे कि विद्यानंद जी का यह चुनाव कितना सटीक था।
परंतु, इस पूरे सर्वे के दौरान, जहाँ एक तरफ परमानंद का मस्तिष्क पूरी तरह से आश्रम की रूपरेखा और महोत्सव की व्यवस्थाओं में लगा हुआ था, वहीं उसके अंतर्मन के किसी कोने में कल एयरपोर्ट पर छूटी वह स्मृति भी रह-रहकर कौंध जाती थी। पिंकी के उस चंचल रूप, उसकी मादक चितवन और उसके अनोखे बदन का जो पहला अहसास उसके हृदय में हलचल मचा गया था, वह इस बनारस की उन्मुक्त हवा में पूरी तरह ओझल नहीं हो पाया था।
जैसे ही वह गंगा की ओर बहती हवा को महसूस करने के लिए आँखें मूँदता, उसे उस कोमल बदन की महक का भ्रम होने लगता। परमानंद ने एक गहरी साँस ली, अपने भीतर के द्वंद्व को संभाला और अपनी चेतना को पुनः उस भूमि की पैमाइश पर केंद्रित कर दिया। वह अपनी नियति के इस नए अध्याय को पूरी तरह से जीने के लिए तैयार था, लेकिन उसे यह आभास नहीं था कि इस महोत्सव की भव्य ज़मीन पर, जहाँ वह आज अपने आश्रम की नींव तय कर रहा था, वहीं उसकी जिंदगी के सबसे बड़े रहस्यों और काम-अध्यात्म के सबसे बड़े टकराव का मंच भी सज रहा था।
आज का दिन उसके इस काशी प्रवास का पहला और जैसे ही परमानंद का यह छोटा काफिला आयोजन स्थल पर पहुँचा, वहाँ का विशाल परिदृश्य देखकर उसकी आँखों में एक साधक की दूरदर्शिता चमक उठी। गंगा की लहरों के ठीक समीप फैले उस विस्तृत भूभाग पर चारों तरफ बल्लियाँ गाड़े जाने, बड़े-बड़े मंच तैयार होने और भव्य द्वारों के निर्माण का काम युद्धस्तर पर चल रहा था। हवा में अभी से एक उत्सव का उत्साह और बनारस के स्थानीय कारीगरों की गूँजती आवाजें तैर रही थीं।
इसी बीच, आयोजन स्थल के मुख्य प्रवेश द्वार से धूल उड़ाता हुआ सफेद गाड़ियों का एक प्रशासनिक काफिला अंदर आता हुआ दिखाई दिया। सभी गाड़ियों पर सरकारी और प्रशासनिक बोर्ड लगे हुए थे, जो इस बात का संकेत थे कि कोई बड़ा अधिकारी व्यवस्थाओं का जायजा लेने पहुँचा है।
परमानंद और उसके साथियों की नजरें स्वाभाविक रूप से उस काफिले की तरफ मुड़ गईं। बीच की एक मुख्य गाड़ी से जैसे ही सुरक्षाकर्मी ने उतरकर दरवाजा खोला, वहाँ एक गंभीर और रौबदार व्यक्तित्व की महिला अधिकारी बाहर निकलीं। यह कोई और नहीं, बल्कि मनोरमा ही थीं! बनारस महोत्सव जैसे देश-विदेश में ख्याति प्राप्त और भव्य आयोजन को सुचारू रूप से संपन्न कराने के लिए सरकार की तरफ से मनोरमा को इस बार का मुख्य प्रशासनिक कार्यभार संभालने के लिए विशेष रूप से नियुक्त किया गया था। वे इस पूरे आयोजन की नोडल अधिकारी और मुख्य व्यवस्थापक थीं।
एयरपोर्ट के उस आधुनिक टर्मिनल के कोलाहल के बाद, अब सीधे इस कर्मक्षेत्र की धूल और काम के बीच मनोरमा को इस रूप में देखकर परमानंद एक क्षण के लिए ठिठक गया। मनोरमा को देखते ही उसके दिल की धड़कनें तेज हो गईं और उसकी नजरें तुरंत ही गाड़ी और उसके आसपास पिंकी को खोजने लगीं। उसका मन व्याकुल हो उठा कि क्या पिंकी भी इस काफिले के साथ यहाँ आई है, क्योंकि एयरपोर्ट पर पिंकी को देखकर जो हलचल उसके दिलो दिमाग में शुरू हुई थी, वह अब भी उसके अंतर्मन में पूरी तरह हावी थी।
जैसे ही मनोरमा की नज़रें परमानंद से मिलीं परमानंद के चेहरे पर एक पर एक मुस्कुराहट आ गई..
शेष अगले भाग में