Incest आह..तनी धीरे से.....दुखाता. - Page 147 - SexBaba
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Incest आह..तनी धीरे से.....दुखाता.

भाग 208

आइए सोनी और सूरज को इस अद्भुत मिलन के आनंद में डूबा छोड़कर आपको लिए चलते हैं विद्यानंद के आश्रम में जहां मोनी आज उदास थी…




स्वामी विद्यानंद के उस भव्य और विशाल आश्रम में दोपहर का सन्नाटा पसरा हुआ था। धूपदानी से निकलता हुआ चंदन का धुआँ हवा में तैर रहा था, जिससे पूरे वातावरण में एक मादक और शांत सुगंध घुली हुई थी। इस शांत दोपहर में, आश्रम के एक एकांत और आलीशान कक्ष में बैठी वज्रनंदिनी (मोनी) पूरी तरह विचारों में खोई हुई थी। उसका पुत्र परमानंद बनारस की उस अनजानी यात्रा के लिए आश्रम से प्रस्थान कर चुका था और इस समय एयरपोर्ट के रास्ते में था, पर मोनी का ममतामयी दिल रह-रहकर उसी भव्य कमरे में थमी उसकी अंतिम तैयारियों को याद कर रहा था।

मोनी की आँखों के सामने कुछ ही समय पहले का वह दृश्य किसी जीवंत चित्र की तरह घूम गया। इसी विशाल कमरे में उसका १८ वर्षीय बलिष्ठ, सुडौल और तेजस्वी पुत्र परमानंद अपने प्रस्थान की अंतिम तैयारियों में जुटा था। वह अपनी रोज़मर्रा की दुनिया से अलग, एक सुंदर ब्रीफकेस में कुछ अत्यंत आवश्यक और प्राचीन धार्मिक ग्रंथ, कुश का पवित्र आसन और अपनी दैनिक साधना की गुप्त सामग्री को बहुत सलीके से सहेज रहा था। उस प्रतापी ऋषि कुमार की चौड़ी छाती, वर्जिश और कठिन अभ्यास से कसी हुई जंघाएं और माथे पर चमकता चंदन का तिलक उसकी शारीरिक और आध्यात्मिक सुदृढ़ता की गवाही दे रहे थे।

तभी मोनी अत्यंत चिंतित कदमों से उसके पास पहुँची थी। अपने इस दिव्य बालक को देखकर उसका मातृत्व उमड़ आया था, पर साथ ही आशंकाओं का एक बवंडर भी उठ खड़ा हुआ था। उसने अपने स्वर को सामान्य रखते हुए पूछा था, "परमानंद, तुम इतनी उत्सुकता से किस बात की तैयारी कर रहे हो? कहाँ जाने का विचार है तुम्हारा?"

परमानंद ने उस सुंदर ब्रीफकेस को बंद करते हुए अत्यंत विनीत भाव से अपनी माता के चरण स्पर्श किए थे और अपनी ओजस्वी आँखों में एक नई चमक लिए खड़ा हो गया था। उसने कहा था, "गुरुमाता, मुझे परम पूज्य गुरुदेव स्वामी विद्यानंद जी का आदेश प्राप्त हुआ है। बनारस में होने वाले भव्य 'बनारस महोत्सव' की तैयारियाँ अपने अंतिम चरण में हैं, और मुझे वहाँ जाकर उस पूरे आयोजन का जायजा लेने और अपनी देखरेख में उसे सुचारू रूप से संपन्न कराने के लिए तुरंत बनारस प्रस्थान करना होगा।"

परमानंद के मुँह से 'बनारस' का नाम सुनते ही मोनी के भीतर जैसे समय का चक्र पीछे की ओर घूम गया था। वह भली-भांति जानती थी कि स्वामी विद्यानंद का आदेश साक्षात नियति का आदेश है, जिसे टालना किसी के लिए भी संभव नहीं था। फिर भी, अपनी ही कोख से जन्मे इस बालक को, जो अब तक आश्रम की सुरक्षित और मर्यादित दीवारों के बीच ही पला-बढ़ा था, अकेले उस मायावी नगरी में भेजने के विचार मात्र से उसका माँ का दिल बेहद असहज और व्याकुल हो उठा था।

जैसे ही 'बनारस' शब्द गूंजा था, मोनी के मानस पटल पर अपनी बड़ी बहन 'सुगना' का चेहरा सजीव हो उठा था, जिसने बड़ी बहन होने के बावजूद उसे अपनी सगी बेटी की तरह अगाध प्रेम देकर पाल-पोसकर बड़ा किया था। सीतापुर की वे गलियाँ, जहाँ उसका बचपन बीता था, एक-एक करके उसकी आँखों के सामने आने लगी थीं।

मनी सुगना और उसके साथ बिताए गए अपने किशोरावस्था के दिन याद करने लगी सुगना उसे भी उतनी ही प्यारी थी जितना सोनू और सोनी को थी।

पर इस ममता के ठीक पीछे अतीत की वह अत्यंत भयानक, काली और डरावनी रात का दृश्य छिपा हुआ था, जिसने मोनी के जीवन की पूरी दिशा ही बदल दी थी और उसे इस साधना आश्रम के भव्य परिवेश तक पहुँचा दिया था। उसे वह खौफनाक दृश्य याद आने लगा, जब उसने अपनी ही सगी बहन सुगना और अपने भाई सोनू को एक साथ, मर्यादा की सारी सीमाओं को छिन्न-भिन्न करके, उस निषिद्ध और अंधियारे कमरे में अंतरंग होते देख लिया था। भाई और बहन के बीच के उस पाप और उग्र समागम के दृश्य ने उस समय मोनी के भीतर के सारे विश्वास को हिलाकर रख दिया था।

तब मोनी ने एक गहरी और ठंडी साँस लेकर परमानंद के दोनों कंधों को अपने हाथों में थामा था और उसकी आँखों में देखते हुए बेहद गंभीर स्वर में कहा था, "पुत्र, जिस बनारस की ओर तुम कदम बढ़ा रहे हो, वह केवल संतों, घाटों और पावन गंगा की नगरी नहीं है। वह नगर एक ऐसा मायाजाल है जहाँ अध्यात्म के उच्चतम शिखर के साथ-साथ वासना और मानव मन के सबसे गहरे अंधकार का भी वास है। बनारस सत और असत का ऐसा अद्भुत संगम है, जहाँ कदम-कदम पर तुम्हारी इंद्रियों की परीक्षा होगी। वहाँ की चमकीली गलियों और भव्य हवेलियों के पीछे कई ऐसे राज छिपे हैं, जो मर्यादा की हर सीमा को खंडित कर चुके हैं। तुम वहाँ केवल एक उत्सव के साक्षी बनने नहीं जा रहे हो, बल्कि उस धरती पर पैर रखते ही तुम्हारा सामना जीवन के उस नग्न और आदिम सत्य से होगा जिसे तुमने इस आश्रम की शांत दीवारों के भीतर कभी नहीं देखा। स्वामी विद्यानंद जी ने तुम्हें वहाँ की पावनता के साथ-साथ वहाँ के मोह से बचने की जो चेतावनी दी है, उसे अपने अंतर्मन में बांध लो। बनारस की वह माटी जितने गहरे रहस्य समेटे हुए है, उतनी ही उग्रता से वह मनुष्यों के भीतर दबी हुई कामनाओं को भी भड़काती है। तुम्हें वहाँ अपनी साधना की अग्नि को और तीव्र रखना होगा, ताकि वहाँ का कोई भी अनैतिक सत्य तुम्हारी आभा को छू भी न सके।"

इस दोपहर के सन्नाटे में बैठी मोनी इसी विचार से बार-बार सिहर रही थी कि उसका पुत्र अब आश्रम से दूर, एयरपोर्ट की तरफ बढ़ रहा है जहाँ से वह सीधे उसी बनारस की धरती पर कदम रखेगा। पर मोनी को इस बात का रत्ती भर भी अहसास नहीं था कि नियति ने परमानंद के लिए पहले ही क्या बिसात बिछा रखी थी। वह इस सच से पूरी तरह अनजान थी कि बनारस पहुँचने से पहले ही, एयरपोर्ट के आधुनिक और कोलाहल भरे माहौल में परमानंद की मुलाकात मनोरमा और पिंकी से होने वाली थी।

अब तक केवल वेदों, शास्त्रों, योग और कठिन ब्रह्मचर्य की कड़क मर्यादाओं के बीच पले-बढ़े १८ वर्षीय परमानंद के जीवन में यह एक बहुत बड़ा मोड़ था। पहली बार, आश्रम के बाहर की इस खुली दुनिया में कदम रखते ही, उस प्रतापी ऋषि कुमार के मन में विपरीत लिंग के प्रति एक अलग, अनजाना और गहरा आकर्षण अंकुरित होने वाला था। स्त्रियों की कोमलता, उनकी चितवन और उनके बदन से उठती एक मादक महक ने परमानंद के भीतर के सुप्त पौरुष को पहली बार एक अजीब सी सिहरन से भरने की तैयारी कर ली थी। वह अंतर्मन जो अब तक केवल ईश्वर और साधना में लीन रहता था, वह अब विपरीत लिंग की इस नई और सम्मोहक ऊर्जा के प्रति एक अलग ही भाव महसूस करने के मुहाने पर खड़ा था, जिससे खुद परमानंद भी पूरी तरह अचंभित होने वाला था।

एयरपोर्ट के उस आधुनिक और चमचमाते टर्मिनल पर, जहाँ यात्रियों की भारी भीड़ और अनावरण का माहौल था, परमानंद के भीतर का संयम पहली बार डगमगा रहा था। जब से उसकी आँखें पिंकी से मिली थीं, उसके मन में एक अजब सी, अनजानी हलचल मच चुकी थी।

ऐसा नहीं था कि परमानंद ने इसके पहले कभी स्त्रियों को नहीं देखा था। आश्रम की सीमाओं से बाहर, जब-जब वह अपने पूज्य गुरुदेव और पिता स्वामी विद्यानंद के साथ ऊंचे मंचों पर बैठता था, तब-तब उसके ओजस्वी प्रवचनों को सुनने के लिए हजारों की संख्या में लड़कियां और स्त्रियां वहाँ उपस्थित होती थीं। परंतु, अब तक उसने एक उच्च चरित्रवान और निश्छल युवा की तरह अपने कठिन ब्रह्मचर्य व्रत का पूरी तरह पालन किया था। उसकी दृष्टि में हमेशा एक साधक की पवित्रता और वैराग्य का भाव रहता था।

पर आज, इस कोलाहल भरे परिवेश में दृश्य पूरी तरह बदल चुका था। आज पहली बार पिंकी की उस सम्मोहक उपस्थिति ने उसके १८ वर्षीय युवा हृदय में एक तीव्र व्याकुलता पैदा कर दी थी। पिंकी की चंचल चितवन, उसके चलने का अंदाज और उसका वह आधुनिक रूप बार-बार परमानंद के ध्यान को अपनी ओर खींच रहा था।

पिंकी का वह सुगठित, अनोखा और तरुणाई से भरा बदन, जो पाश्चात्य वस्त्रों में उसकी सुघड़ बनावट को उजागर कर रहा था, परमानंद की आँखों के सामने एक जादुई सम्मोहन की तरह तैरने लगा। अब तक केवल मंत्रों और शास्त्रों के ध्यान में लीन रहने वाला उसका मस्तिष्क, चाहकर भी पिंकी के उस निषिद्ध आकर्षण से खुद को दूर नहीं कर पा रहा था। उस कोमल बदन की छुअन और उसकी मादक सुगंध की कल्पना मात्र ने परमानंद के भीतर बरसों से सुप्त पड़े आदिम पौरुष को पूरी तरह जगा दिया था, जिसने उस युवा ऋषि कुमार को अंदर तक झकझोर कर रख दिया था।

बनारस के लाल बहादुर शास्त्री हवाई अड्डे (बाबतपुर एयरपोर्ट) पर जैसे ही परमानंद के कदम पड़े, वहाँ का पूरा वातावरण जयकारों से गूंज उठा। जिस प्रकार आश्रम के सैकड़ों समर्पित अनुयायियों और ऋषिकुमारों की भारी भीड़ उसे विदा करने एयरपोर्ट आई थी, ठीक उसी तरह बनारस में भी उसके स्वागत के लिए जनसैलाब उमड़ पड़ा था। स्थानीय आश्रम के वरिष्ठ पदाधिकारी, वेदपाठी ब्राह्मण और श्रद्धा से भरे अनुयायी मालाएँ, शंख और पुष्पगुच्छ लिए घंटों से पलकें बिछाए खड़े थे।

18 वर्षीय तेजस्वी परमानंद के गले में जब गेंदे और गुलाब की भारी मालाएँ पहनाई गईं और उसके माथे पर काशी की पावन मिट्टी और चंदन का तिलक लगाया गया, तो उसकी तीखी, ओजस्वी आँखों में एक अलग ही विनम्रता तैर गई। शंखध्वनि और "हर हर महादेव" के गगनभेदी नारों के बीच उसका ऐसा भव्य और अलौकिक स्वागत हुआ कि एयरपोर्ट पर मौजूद अन्य यात्री, यहाँ तक कि उसे उत्सुकता से निहार रहीं मनोरमा और पिंकी भी इस दृश्य को देखकर दंग रह गईं।

इस भव्य स्वागत समारोह के बाद, परमानंद को पूरे राजकीय सम्मान और सुरक्षा के साथ अनुयायियों केकाफिले के बीच वीआईपी गाड़ियों में बैठाया गया, और वह एयरपोर्ट से बनारस स्थित आश्रम की शाखा की तरफ निकल पड़ा।

गाड़ी की खिड़की से बाहर देखते हुए परमानंद का मन बनारस की जीवंतता में पूरी तरह रम गया था। सड़कों पर आते-जाते लोग, पान की दुकानों पर होने वाली चर्चाएं और हवा में तैरती वह खास बोली उसे अंदर तक मंत्रमुग्ध कर रही थी। यहाँ के लोगों के बातचीत करने का लहजा, जिसमें बनारसीपन के साथ-साथ भोजपुरी की मिठास साफ झलक रही थी, उसे अपनी तरफ खींच रहा था।

ऐसा नहीं था कि परमानंद ने यह भाषा पहली बार सुनी थी। आश्रम के भव्य कमरों और गलियारों में भी उसने कई सेवादारों और अनुयायियों को आपस में इस भाषा में बात करते सुना था। यहाँ तक कि उसकी माँ वज्रनंदिनी (मोनी) ने भी भावुकता के क्षणों में अनजाने में ही सही, इसी भाषा के शब्दों का प्रयोग किया था। पर न जाने क्यों, आज बनारस की इस खुली आब-ओ-हवा में इस बोली को सीधे लोगों के मुँह से सुनकर उसके भीतर एक अजीब सा रस घुल रहा था। वह सम्मोहन, जो एयरपोर्ट पर पिंकी को देखकर शुरू हुआ था, अब इस शहर की मिट्टी और भाषा से जुड़कर और गहरा होता जा रहा था।

अपनी व्याकुलता और कौतूहल को शांत करने के लिए, उसने अपनी बगल की सीट पर बैठे मुस्तैद कमांडो की तरफ देखा। सुरक्षा में तैनात वह कमांडो बेहद गंभीर मुद्रा में था। परमानंद ने सहजता से मुस्कुराते हुए उससे पूछा, "क्या आप भी भोजपुरी भाषा बोलते हैं? यहाँ के लोग जिस तरह बात कर रहे हैं, वह मुझे बहुत मनमोहक लग रहा है। क्यों न इस लंबे रास्ते के सफर को काटने के लिए आप मुझे भी भोजपुरी के कुछ शब्द सिखाएं?"

ऋषिकुमार और आश्रम के होने वाले उत्तराधिकारी के मुँह से ऐसी सरल और आत्मीय बात सुनकर कमांडो का कड़क चेहरा भी थोड़ा नरम पड़ गया। उसने आदरपूर्वक सिर झुकाया और मुस्कुराते हुए कहा, "जी महाराज, हम तो यहीं पूर्वांचल के रहने वाले हैं। भोजपुरी हमारी मातृभाषा है। अगर आप सीखना चाहते हैं, तो यह हमारे लिए सौभाग्य की बात है।"

रास्ते का सफर काटने के लिए परमानंद का यह अनोखा प्रयोग पूरी तरह सफल रहा। गाड़ी जैसे-जैसे बनारस के ट्रैफिक को पार करते हुए आश्रम की तरफ बढ़ रही थी, परमानंद बड़ी उत्सुकता से कमांडो से भोजपुरी के रोज़मर्रा के शब्द, अभिवादन के तरीके और उनका सही लहजा सीखने लगा। अब तक केवल कठिन संस्कृत श्लोकों और शास्त्रीय भाषा में रमने वाली उसकी जीभ जब भोजपुरी के मीठे और ठेठ शब्दों को दोहरा रही थी, तो उसके चेहरे पर एक बाल सुलभ और अद्भुत संतोष तैर रहा था।

गाड़ियों काकाफिला जैसे ही बनारस की व्यस्त सड़कों को पार कर आश्रम के मुख्य और भव्य मुख्य द्वार के सामने पहुँचा, त्यों ही परमानंद ने अपने बगल में बैठे कमांडो की तरफ देखा। उस कमांडो के चेहरे पर अभी भी एक शिक्षक जैसी सहज मुस्कान थी, जिसने पिछले आधे घंटे में इस प्रतापी ऋषिकुमार को अपनी मातृभाषा के कई शब्द सिखाए थे।

परमानंद ने बेहद आत्मीयता से मुस्कुराते हुए और अपनी आवाज में वही ठेठ बनारसी और भोजपुरी का लहजा लाते हुए कहा:

"अच्छा ठीक बा, अब बाकी बाद में सिखा दिहा।"

परमानंद के मुख से निकले भोजपुरी के इन चंद शब्दों ने गाड़ी में बैठे कमांडो, आगे की सीट पर तैनात सुरक्षाकर्मियों और साथ चल रहे सभी अनुयायियों को पूरी तरह अचंभित कर दिया। मात्र आधे घंटे के सफर में, बिना किसी पूर्व अभ्यास के, परमानंद ने जिस शुद्धता, प्रवाह और सटीक उच्चारण के साथ इस वाक्य को कहा था, उसने वहाँ उपस्थित हर व्यक्ति के दिल को छू लिया। भाषा पर इतनी त्वरित पकड़ और वो भी उसी खास स्थानीय पुट के साथ, सचमुच असाधारण थी।

यह केवल एक भाषा सीखने का प्रयास नहीं था, बल्कि यह उस विलक्षण मेधा का प्रमाण था जो इस 18 वर्षीय युवा के भीतर रची-बसी थी। स्वामी विद्यानंद का यह पुत्र, जो अब तक केवल शास्त्रों और योग की गुप्त विद्याओं में लीन रहता था, सचमुच बेहद प्रतिभाशाली और एक ऐसे आश्चर्यजनक, चुंबकीय व्यक्तित्व का स्वामी था जो पहली ही मुलाकात में किसी को भी अपना बना ले। आश्रम के मुख्य द्वार पर उतरते ही उसकी यह अनूठी प्रतिभा उसके इस काशी प्रवास के एक बेहद रोमांचक और नए अध्याय का संकेत दे रही थी।

अगले दिन भोर की पहली किरण के साथ ही बनारस की आब-ओ-हवा में एक नई हलचल शुरू हो चुकी थी। रात भर की यात्रा और बनारस की मिट्टी से मिले उस अनजाने अपनेपन की सुखद अनुभूति के बाद, परमानंद अपनी पूरी ऊर्जा के साथ जाग चुका था।

सुबह की नित्य क्रिया और सूर्य अर्घ्य से निवृत्त होने के बाद, परमानंद ने आश्रम के खुले प्रांगण में अपनी दैनिक वर्जिश और कठिन अभ्यास शुरू किया। जब वह सूर्य की कोमल किरणों के बीच प्राणायाम, दंड-बैठक के जटिल दांव-पेच कर रहा था, तो आश्रम के सेवादार और अन्य लोग वहीं ठिठक गए। अपने सुंदर, सुडौल और गठीले शरीर से वर्जिश करते हुए परमानंद को देखकर आश्रम के लोग पूरी तरह आश्चर्यचकित हो रहे थे। उसकी चौड़ी छाती पर बहता पसीना और हर हरकत के साथ उभरती उसकी कसी हुई मांसपेशियां एक अलौकिक दृश्य पैदा कर रही थीं। वहाँ मौजूद हर व्यक्ति मन ही मन सोच रहा था कि इतना सुंदर, ओजस्वी और अद्भुत शारीरिक सौष्ठव वाला युवा संसार में बिरला ही होता है। उसे देखकर ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे विधाता ने उसे बहुत फुर्सत और खूबसूरती से, किसी विशेष और महान नियति के लिए ही गढ़ा है।

इस ऊर्जावान कसरत के बाद, परमानंद ने अपने पारंपरिक और गरिमामयी वस्त्र धारण किए। उसने अपनी बलिष्ठ देह पर कड़ा हुआ श्वेत कुर्ता और रेशमी धोती पहनी थी, जिसके ऊपर कंधे पर हल्के केसरिया रंग का अंगवस्त्र उसकी आध्यात्मिक आभा को और निखार रहा था। माथे पर लगा ताजा चंदन का त्रिपुंड और उसकी तीखी, ओजस्वी आँखें किसी प्रतापी युवा राजा और दिव्य ऋषिकुमार का अद्भुत मिश्रण प्रस्तुत कर रही थीं।

आज का दिन उसके इस काशी प्रवास का पहला और अत्यंत महत्वपूर्ण व्यावहारिक कदम था। स्वामी विद्यानंद जी के आदेशानुसार, उसे 'बनारस महोत्सव' के उस भव्य आयोजन स्थल का बारीकी से निरीक्षण करना था और अपने आश्रम की विशेष रूपरेखा व पंडालों की स्थिति तय करने के लिए साइड सर्वे पर निकलना था। उसने अपने इस महत्वपूर्ण कार्य के लिए आश्रम के कुछ बेहद चुनिंदा और अनुभवी साथियों, वास्तुशास्त्र के मर्मज्ञों और स्थानीय प्रबंधकों की एक छोटी सी टीम तैयार की। सुरक्षा की कड़ी व्यवस्था के बीच, उसकी गाड़ियाँ बनारस के प्रसिद्ध घाटों और महोत्सव के लिए निर्धारित उस विशाल मैदान की ओर कूच कर गईं, जहाँ देश-विदेश के दिग्गज जुटने वाले थे।

जैसे ही परमानंद का यह छोटाकाफिला आयोजन स्थल पर पहुँचा, वहाँ का विशाल परिदृश्य देखकर उसकी आँखों में एक साधक की दूरदर्शिता चमक उठी। गंगा की लहरों के ठीक समीप फैले उस विस्तृत भूभाग पर चारों तरफ बल्लियाँ गाड़े जाने, बड़े-बड़े मंच तैयार होने और भव्य द्वारों के निर्माण का काम युद्धस्तर पर चल रहा था। हवा में अभी से एक उत्सव का उत्साह और बनारस के स्थानीय कारीगरों की गूँजती आवाजें तैर रही थीं।

गाड़ी से उतरते ही परमानंद ने अपने हाथ में महोत्सव का पूरा नक्शा लिया। उसके चलने के अंदाज में एक अजीब सा पौरुष और आत्मविश्वास था, जिसने वहाँ काम कर रहे बड़े-बड़े इंजीनियरों और प्रशासनिक अधिकारियों का ध्यान तुरंत अपनी ओर खींच लिया। कोई नहीं कह सकता था कि यह 18 वर्षीय युवा, जिसने कल ही बनारस की धरती पर कदम रखा है, इतनी परिपक्वता से इस विशाल स्थल का जायजा लेगा।

परमानंद ने मैदान के चारों कोनों का चक्कर लगाना शुरू किया। उसने गंगा से आने वाली हवा की दिशा, मुख्य मंच से भक्तों के बैठने की दूरी और वीआईपी प्रवेश द्वारों की स्थिति का सूक्ष्मता से अध्ययन किया। उसने अपने साथियों को रुकने का संकेत दिया और नक्शे पर उंगली रखते हुए बेहद गंभीर और सधे हुए स्वर में कहा, "हमारे मुख्य आश्रम का जो पंडाल और दिव्य वेदी बनेगी, वह ठीक इस कोण पर होनी चाहिए। यहाँ से गंगा मैया का सीधा दर्शन भी होगा और जब पूज्य गुरुदेव स्वामी विद्यानंद जी का आगमन होगा, तो उनकी आध्यात्मिक ऊर्जा इस पूरे परिसर को बिना किसी बाधा के प्रभावित कर सकेगी।"

उसने वहीं खड़े-खड़े वास्तु और सुरक्षा दोनों को ध्यान में रखते हुए अपने साथियों को कुछ ऐसे निर्देश दिए, जिसने वहाँ मौजूद अनुभवी प्रबंधकों को भी निरुत्तर कर दिया। उसकी इस कदर विलक्षण मेधा और बारीक समझ को देखकर उसके साथी मन ही मन मुस्कुरा उठे—वे समझ गए थे कि विद्यानंद जी का यह चुनाव कितना सटीक था।

परंतु, इस पूरे सर्वे के दौरान, जहाँ एक तरफ परमानंद का मस्तिष्क पूरी तरह से आश्रम की रूपरेखा और महोत्सव की व्यवस्थाओं में लगा हुआ था, वहीं उसके अंतर्मन के किसी कोने में कल एयरपोर्ट पर छूटी वह स्मृति भी रह-रहकर कौंध जाती थी। पिंकी के उस चंचल रूप, उसकी मादक चितवन और उसके अनोखे बदन का जो पहला अहसास उसके हृदय में हलचल मचा गया था, वह इस बनारस की उन्मुक्त हवा में पूरी तरह ओझल नहीं हो पाया था।

जैसे ही वह गंगा की ओर बहती हवा को महसूस करने के लिए आँखें मूँदता, उसे उस कोमल बदन की महक का भ्रम होने लगता। परमानंद ने एक गहरी साँस ली, अपने भीतर के द्वंद्व को संभाला और अपनी चेतना को पुनः उस भूमि की पैमाइश पर केंद्रित कर दिया। वह अपनी नियति के इस नए अध्याय को पूरी तरह से जीने के लिए तैयार था, लेकिन उसे यह आभास नहीं था कि इस महोत्सव की भव्य ज़मीन पर, जहाँ वह आज अपने आश्रम की नींव तय कर रहा था, वहीं उसकी जिंदगी के सबसे बड़े रहस्यों और काम-अध्यात्म के सबसे बड़े टकराव का मंच भी सज रहा था।

आज का दिन उसके इस काशी प्रवास का पहला और जैसे ही परमानंद का यह छोटा काफिला आयोजन स्थल पर पहुँचा, वहाँ का विशाल परिदृश्य देखकर उसकी आँखों में एक साधक की दूरदर्शिता चमक उठी। गंगा की लहरों के ठीक समीप फैले उस विस्तृत भूभाग पर चारों तरफ बल्लियाँ गाड़े जाने, बड़े-बड़े मंच तैयार होने और भव्य द्वारों के निर्माण का काम युद्धस्तर पर चल रहा था। हवा में अभी से एक उत्सव का उत्साह और बनारस के स्थानीय कारीगरों की गूँजती आवाजें तैर रही थीं।

इसी बीच, आयोजन स्थल के मुख्य प्रवेश द्वार से धूल उड़ाता हुआ सफेद गाड़ियों का एक प्रशासनिक काफिला अंदर आता हुआ दिखाई दिया। सभी गाड़ियों पर सरकारी और प्रशासनिक बोर्ड लगे हुए थे, जो इस बात का संकेत थे कि कोई बड़ा अधिकारी व्यवस्थाओं का जायजा लेने पहुँचा है।

परमानंद और उसके साथियों की नजरें स्वाभाविक रूप से उस काफिले की तरफ मुड़ गईं। बीच की एक मुख्य गाड़ी से जैसे ही सुरक्षाकर्मी ने उतरकर दरवाजा खोला, वहाँ एक गंभीर और रौबदार व्यक्तित्व की महिला अधिकारी बाहर निकलीं। यह कोई और नहीं, बल्कि मनोरमा ही थीं! बनारस महोत्सव जैसे देश-विदेश में ख्याति प्राप्त और भव्य आयोजन को सुचारू रूप से संपन्न कराने के लिए सरकार की तरफ से मनोरमा को इस बार का मुख्य प्रशासनिक कार्यभार संभालने के लिए विशेष रूप से नियुक्त किया गया था। वे इस पूरे आयोजन की नोडल अधिकारी और मुख्य व्यवस्थापक थीं।

एयरपोर्ट के उस आधुनिक टर्मिनल के कोलाहल के बाद, अब सीधे इस कर्मक्षेत्र की धूल और काम के बीच मनोरमा को इस रूप में देखकर परमानंद एक क्षण के लिए ठिठक गया। मनोरमा को देखते ही उसके दिल की धड़कनें तेज हो गईं और उसकी नजरें तुरंत ही गाड़ी और उसके आसपास पिंकी को खोजने लगीं। उसका मन व्याकुल हो उठा कि क्या पिंकी भी इस काफिले के साथ यहाँ आई है, क्योंकि एयरपोर्ट पर पिंकी को देखकर जो हलचल उसके दिलो दिमाग में शुरू हुई थी, वह अब भी उसके अंतर्मन में पूरी तरह हावी थी।

जैसे ही मनोरमा की नज़रें परमानंद से मिलीं परमानंद के चेहरे पर एक पर एक मुस्कुराहट आ गई..



शेष अगले भाग में
 
भाग 209

एयरपोर्ट के उस आधुनिक टर्मिनल के कोलाहल के बाद, अब सीधे इस कर्मक्षेत्र की धूल और काम के बीच मनोरमा को इस रूप में देखकर परमानंद एक क्षण के लिए ठिठक गया। मनोरमा को देखते ही उसके दिल की धड़कनें तेज हो गईं और उसकी नजरें तुरंत ही गाड़ी और उसके आसपास पिंकी को खोजने लगीं। उसका मन व्याकुल हो उठा कि क्या पिंकी भी इस काफिले के साथ यहाँ आई है, क्योंकि एयरपोर्ट पर पिंकी को देखकर जो हलचल शुरू हुई थी, वह अब भी उसके अंतर्मन में पूरी तरह हावी थी।

जैसे ही मनोरमा की नज़रें परमानंद से मिलीं परमानंद के चेहरे पर एक आधार पूर्ण मुस्कुराहट आ गई..

अब आगे..

परमानंद ने सहज भाव से अपने दोनों हाथ जोड़कर उनका अभिवादन किया। यद्यपि परमानंद का कद, उसका आध्यात्मिक और सामाजिक औदा उसके हज़ारों-लाखों अनुयायियों की वजह से बहुत ऊँचा था, और सामान्य स्थिति में वह स्वयं आगे बढ़कर शायद ही पहले कभी किसी को इस तरह प्रणाम करता हो। पर न जाने क्यों, आज मनोरमा के उस गरिमामयी और मातृवत स्वरूप को देखकर उसके हाथ स्वयं ही जुड़ गए। उस तेजस्वी ऋषिकुमार का यह विनीत और मर्यादित अभिवादन मनोरमा नकार न सकीं। मनोरमा ने बेहद अदब और सम्मान से न सिर्फ उसके प्रणाम को स्वीकार किया, बल्कि खुद भी थोड़ा झुककर उसका आदरपूर्वक अभिवादन किया। मनोरमा के भीतर भारतीय संस्कारों की जड़ें बहुत गहरी थीं और संतों के प्रति एक स्वाभाविक श्रद्धा हमेशा कायम थी।

इसके बाद, एक कदम परमानंद ने आगे बढ़ाया और एक कदम मनोरमा ने। देखते ही देखते दोनों एक-दूसरे के बिल्कुल करीब आ गए। आयोजन स्थल की उस उड़ती हुई धूल के बीच, दोनों का इस तरह समीप आना वहां खड़े हर शख्स के लिए स्तब्ध कर देने वाला था। आसपास तैनात भारी पुलिस प्रशासन और परमानंद की सुरक्षा में मुस्तैद मुख्य अंगरक्षक आमने-सामने खड़े होकर इस अद्भुत मिलन को एकटक देख रहे थे। प्रशासनिक अमले के लिए यह दृश्य पूरी तरह से अप्रत्याशित था, और आश्रम के अंगरक्षकों के लिए भी अपने ऋषिकुमार का किसी सांसारिक महिला की तरफ इस तरह कदम बढ़ाना एकदम अकल्पनीय था। पर दोनों न जाने किस अदृश्य और गहरे आकर्षण से बंधे थे—एक ऐसा आकर्षण जो मर्यादा, ओहदे और सांसारिक बंधनों से परे था।

सचमुच, मनोरमा और परमानंद दोनों ही किसी परिचय के मोहताज नहीं थे। दोनों का अपना-अपना एक ऐसा प्रभावशाली और चुंबकीय व्यक्तित्व था कि देहरादून एयरपोर्ट के मिलन के बाद, दोनों ने ही अपने-अपने स्तर पर एक-दूसरे के बारे में पूरी जानकारियां इकट्ठी कर ली थीं। यही वजह थी कि आज उनके बीच कोई अजनबीपन नहीं था। मनोरमा के दिमाग में परमानंद की जो तस्वीर बनी थी, वह एक अत्यंत आदर्श, संस्कारवान और अद्भुत रूप से काबिल युवा की बन चुकी थी।

दोनों के बीच की वह शुरुआती खामोशी तब टूटी जब परमानंद ने अपने चेहरे पर एक विनीत मुस्कान लाते हुए व्यवस्थाओं को लेकर बातचीत की पहल की। उसने नक्शे की ओर इशारा करते हुए कहा, "मैडम, पूज्य गुरुदेव स्वामी विद्यानंद जी के आदेशानुसार इस बार हमारे आश्रम का पंडाल और मुख्य वेदी ठीक इसी भूभाग पर आकार लेने जा रही है। हम चाहते हैं कि यहाँ आने वाले लाखों भक्तों को गंगा मैया के दर्शन में कोई असुविधा न हो।"

मनोरमा ने परमानंद की बात को बहुत ध्यान से सुना और परमानंद की आँखों में देखते हुए बेहद नपे-तुले स्वर में कहा, "महाराज जी, आपकी वेदी का स्थान आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत उत्तम है, लेकिन प्रशासन के दृष्टिकोण से यहाँ दो बड़ी चुनौतियाँ हैं। पहली—यह क्षेत्र गंगा के घाटों के बिल्कुल समीप है, जहाँ भारी भीड़ होगी। दूसरी—सुरक्षा और आपातकालीन निकास (Emergency Exit) के लिए हमें इस मार्ग को थोड़ा खुला रखना होगा।"

परमानंद ने तुरंत व्यावहारिक समाधान ढूंढते हुए कहा, "आपकी चिंता पूरी तरह उचित है, मैडम। तो क्या हम अपने पंडाल के मुख्य द्वार की दिशा को थोड़ा सा उत्तर की ओर मोड़ दें? इससे आपातकालीन मार्ग भी सुरक्षित रहेगा और भक्तों को नदी की ओर जाने के लिए एक सीधा गलियारा भी मिल जाएगा।"

परमानंद के इस त्वरित समाधान को देखकर मनोरमा के चेहरे पर एक गहरा संतोष उभर आया। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, "अद्भुत! अगर आप पंडाल के मुख को उस तरफ मोड़ देते हैं, तो हमारी आधी समस्या वहीं हल हो जाएगी। इसके साथ ही, बैरिकेडिंग और बिजली की आपूर्ति के लिए हमारे विभाग के लोग आपके आश्रम के स्वयंसेवकों के साथ मिलकर काम करेंगे।" पहली ही मुलाकात में, बिना किसी प्रशासनिक गतिरोध के, दोनों ने मिलकर महोत्सव की व्यवस्थाओं की एक ऐसी ठोस नींव रख दी थी, जिसने मनोरमा के मन में परमानंद की परिपक्वता और काबिलियत के प्रति सम्मान को और बढ़ा दिया था।

जहाँ एक तरफ बनारस महोत्सव के आयोजन स्थल पर मर्यादा, व्यवस्था और अध्यात्म का ताना-बाना बुना जा रहा था, वहीं दूसरी तरफ मालती की दुनिया का रंग पूरी तरह जुदा था। वक्त के साथ मालती के मिजाज में एक गजब की बेबाकी और बिंदासपन आता जा रहा था, जो अब उसके सलीके और पहनावे से साफ झलकने लगा था। वह अपनी ढलती उम्र को मात देकर जवानी के एक ऐसे दहलीज पर खड़ी थी, जहाँ उसका अंग-अंग किसी मदमस्त दरिया की तरह उफान मार रहा था।

आज जब वह अपने कक्ष से बाहर निकली, तो उसकी एक विशेष सफेद शर्ट और चुस्त जींस में उसकी कामुकता का एक ऐसा रूप सामने आया जिसे देखकर किसी का भी संभलना मुश्किल हो जाए। मालती ने जो सफेद शर्ट पहन रखी थी, उसका घेरा बेहद बड़ा और ढीला-ढाला था, जो उसकी पतली कमर तक आ रहा था। लेकिन उस ढीले कपड़े की भी यह मजाल नहीं थी कि वह मालती के बदन के उभारों को छुपा सके। उसके सीने पर सजी भारी-भारी, सुडौल और मदमस्त चूचियों के भारी तनाव की वजह से वह सफेद शर्ट उन उभारों पर बुरी तरह कस गई थी। चूचियों के उस उग्र उभार पर अटक कर वह शर्ट नीचे से पूरी तरह फैल चुकी थी, जिससे एक गजब का झोल पैदा हो रहा था।

जब मालती अपनी विशेष मस्तानी चाल से आगे बढ़ती, तो हर कदम के साथ उस शर्ट का निचला हिस्सा हवा में लहराता। उस लहराते घेरे के बीच से उसकी गोरी, दूधिया नाभि और मखमली पेट का कुछ हिस्सा रह-रहकर बाहर झांक जाता था। वह गोरा, बेदाग दूधिया बदन सूरज की रोशनी में इस कदर दमक रहा था कि वह हर शख्स की नजरें उसकी नाभि के उस सम्मोहक उतार-चढ़ाव पर जाकर टिक जाती थीं। दूर से देखने पर ऐसा भ्रम होता था मानो वह पूरी सफेद शर्ट मालती के जिस्म पर नहीं, बल्कि उसकी चूचियों पर टंगी हुई हो। मालती इस लिबास में बला की कामुक और मादक लग रही थी।

आँगन में बैठी सुगना ने जब मालती को इस रूप में अपने कक्ष से बाहर आते देखा, तो उसका माँ का दिल और सदियों पुराने पारिवारिक संस्कार एक पल के लिए सिहर उठे। वह अपनी जगह से उठ खड़ी हुई और थोड़ी चिंता और उलाहने भरे स्वर में बोल पड़ी, "अरे पगली! यह क्या पहनी है? कहा जा रही है ..कोई ऐसे कपड़े पहनता है क्या? कम से कम लाज-लिहाज का तो थोड़ा ध्यान रख!"

मालती सुगना से अगाध प्रेम करती थी और दिल से उसकी बेहद इज्ज्त भी करती थी, पर पिछले कुछ समय से उसके भीतर जो एक अल्हड़ और बिंदासपन आ गया था, वह अब थमने का नाम नहीं ले रहा था। शायद उम्र के इस पड़ाव पर आकर बड़ी लड़कियां अपनी माँ को सिर्फ माँ नहीं, बल्कि अपनी सहेली समझने लगती हैं। मालती ने सुगना की बात का जरा भी बुरा नहीं माना, बल्कि वह खिलखिलाकर मुस्कुराई और झटके से आगे बढ़कर सुगना के गले लग गई।

जैसे ही मालती ने सुगना को अपनी बांहों में भींचा, आज पहली बार सुगना को अपनी बेटी के शरीर में आए बदलावों और उसकी जवानी के उस भारी, उग्र उभार का सीधा अहसास हुआ। मालती की वे सुगठित और भारी-भारी मदमस्त चूचियाँ जब सुगना के सीने से टकराईं, तो सुगना के भीतर एक अजीब सी झिझक और असहजता दौड़ गई। उसने चाहकर भी पूरी आत्मीयता से मालती को नहीं भींचा, बल्कि एक संकोच और बेमन से उसे गले लगाया, मानो वह इस बात से डर रही हो कि उसकी बेटी अब उसके हाथ से निकलकर अपनी कामुकता के उस रास्ते पर बढ़ चली है।

अभी सुगना और मालती के बीच वह संकोच भरा आलिंगन टूटा ही था कि तभी आँगन के दूसरे कोने से लाली अंदर दाखिल हुई। जैसे ही लाली की नजर मालती की उस सफेद ढीली शर्ट, कसी हुई जींस और चूचियों पर टंगे उस कातिलाना लिबास पर पड़ी, वह वहीं ठिठक गई। लाली की आँखों में एक शरारती चमक कौंध गई और वह अपनी आदत के मुताबिक तुरंत ताली बजाकर हंस पड़ी।

वह मटकते हुए मालती के करीब आई और भोजपुरी के तड़के के साथ ठिठोली करते हुए बोल पड़ी, "अरे दादा! अरे हीरोइन, ई का रूप धरले बाड़ू? अइसन चकाचक बदन चमका के कहाँ जात बाड़ू हो?"

लाली की बात सुनकर मालती ने अपनी शर्ट के निचले घेरे को थोड़ा और सलीके से झटकते हुए अपनी नाभि को छुपाने का नाटक किया, पर उसके चेहरे पर एक बिंदास मुस्कान तैर गई। मालती ने अपनी आँखें नचाते हुए कहा, "कहीं नहीं जा रहे हैं लाली मौसी। अब क्या घर में भी अपने मन के कपड़े पहनना मना है?"

"अरे हटो! ई अच्छा कपड़ा है कि जवानी का ढिंढोरा?" लाली ने मालती की कमर के उस पतले हिस्से और ऊपर तनी हुई भारी-भारी चूचियों की तरफ तिरछी नजरों से देखते हुए उसे छेड़ा। फिर सुगना की तरफ देखकर आँख मारते हुए मालती से बिल्कुल करीब होकर फुसफुसाई, "पगली, घर में तो हम सब मेहरारू ही हैं, पर देह पर जब ई सफेद कपड़ा अइसे तंग होकर फूल जाता है न, तो देखने वाले की नियत डोल जाती है। सुन, कान खोलकर सुन ले... अइसन बिंदास होकर गलियों में या बहरवा घूमोगी न, तो कोई न कोई मर्द मौका पाकर ऐसा मसल देगा कि सारा बिंदासपन धुआँ हो जाएगा!"

लाली की यह ठेठ और बेबाक बात सुनकर सुगना ने तुरंत अपनी आँखें तरेरीं और डांटते हुए कहा, "ए लाली! फालतू बात मत कर।"

पर मालती कहाँ मानने वाली थी। लाली की इस छेड़खानी और 'मसल देने' वाली बात ने उसके भीतर एक अजीब सी सिहरन पैदा कर दी, जिसे छुपाते हुए उसने लाली को धीरे से एक धक्का दिया और हंसते हुए बोली, "धत् मौसी! तुम भी न, कुछ भी बोलती हो। किसी की इतनी मजाल कहाँ जो मालती को हाथ भी लगा दे!" मालती की इस ढिठाई और लाली की इस ठिठोली ने उस शांत आँगन के माहौल को एक पल के लिए बेहद चंचल और मादक बना दिया था।

कुछ ही देर बाद राजू अपने कमरे से बाहर आता दिखाई दिया। लाली ने बिना समय गंवाए उसे झटपट गरमा-गरम नाश्ता कराया। इधर आँगन में मालती और सुगना अभी भी आपस में बातें कर रही थीं, उधर राजू नाश्ता खत्म करके फुर्ती से अपनी हवेली से बाहर निकल आया। बाहर आकर उसने अपनी पुरानी फटफटिया (मोटरसाइकिल) को किक मारकर स्टार्ट कर दिया।

फटफटिया की वह जानी-पहचानी भारी आवाज़ जैसे ही गूँजी, मालती के कान खड़े हो गए। वह तुरंत सुगना से अलग हुई और अपने तेज़, मदमस्त कदमों से चलती हुई हवेली के बाहर आ गई। इससे पहले कि राजू क्लच छोड़कर फटफटिया को आगे बढ़ाता, मालती ने एक झटके में अपनी कसी हुई जींस वाली टांग हवा में लहराई और उसकी पिछली सीट पर आकर बैठ गई। उसकी इस अचानक फुर्ती से वह ढीली सफेद शर्ट हवा में और उड़ गई, जिससे उसकी गोरी नाभि एक पल के लिए पूरी तरह उजागर हो गई।

पर इससे पहले कि फटफटिया आगे बढ़ती, लाली हाथ का काम छोड़ते हुए दौड़कर हवेली के मुख्य द्वार पर आ खड़ी हुई। उसने मालती को राजू के साथ इस तरह सज-धजकर आगे बढ़ते हुए देख लिया था। लाली ने तुरंत आवाज़ लगाते हुए टोका, "अरे! इतना सुबह-सुबह दोनों जन कहाँ जात बाड़ू हो?"

लाली के इस सवाल पर मालती ने फटफटिया की आवाज़ के ऊपर चिल्लाकर उत्तर दिया, "राजू भैया गंगा घाट दिखाए ले जात बाड़े!"

मालती ने जानबूझकर उसी ठेठ भोजपुरी अंदाज़ में बोलकर लाली को खुश करने और उसका मुँह बंद करने की कोशिश की थी। मालती की यह मीठी बोली सुनकर लाली के चेहरे पर एक पल के लिए मुस्कान तो आई, पर उसकी पारखी आँखें धोखा नहीं खा सकती थीं। वह मालती के इस कातिलाना लिबास, उसकी आँखों की चमक और राजू की इस सुबह-सुबह की हड़बड़ी को देखकर अच्छी तरह भाँप चुकी थी कि आज फिर ये दोनों मिलकर कोई न कोई नया कांड करने वाले हैं। लाली ने हाथ नचाते हुए दोनों को जाते देखा और मन ही मन बुदबुदाई, "गंगा घाट के बहाने ई जवानी आज कवनो नया तूफ़ान लाने वाली बा!"

लाली हवेली के मुख्य द्वार से भागती हुई वापस अंदर आई और सुगना के पास बैठकर बात करने लगी। मालती और राजू के इस तरह सुबह-सुबह निकलने की बात बताते-बताते दोनों सहेलियाँ अतीत की गहरी और कड़वी यादों के सिलसिले में डूब गईं। बातचीत के इसी क्रम में दोनों ने उस अजीब सच को स्वीकार किया।

लाली ने सुगना की आँखों में झांकते हुए कहा, "ना जाने ई परिवार के खून में अइसन का बा सुगना, जो बार-बार अपने ही मुँहबोला और आपने रिश्ता में प्यार खोजेला! मर्यादा के हर दीवार यहाँ आके ढह काहे जाला?"

दोनों एक-दूसरे को पुरानी बातें याद दिलाने लगीं। लाली ने उस अतीत का ज़िक्र छेड़ा जिसे वे दोनों चाहकर भी नहीं भूल सकती थीं। लाली ने आगे कहा, "तोहे याद बा सुगना, कइसे सोनू हमहीं से प्यार कइले रहे? दीदी दीदी कह के धीरे धीरे साया में घुस गइल।"

यह सुनते ही सुगना ने अपनी नज़रें झुका लीं। उसके चेहरे पर अतीत के उन पन्नों की सिहरन साफ दिख रही थी। लाली ने सुगना को और झकझोरते हुए याद दिलाया, "और सिर्फ हमहीं से काहे? सोनू के मन में तो तोरे प्रति भी वैसी ही वासना जाग उठी रहे। ऊ तोहार पावन रूप देखला के बाद भी अपनी कामुकता के रोक ना पावल। ई घर के हवा में ही न जाने कइसन सम्मोहन और कइसन वासना घुलल बा।"

जब लाली बार-बार यह बात दोहरा रही थी और सोनू की उस दीवानगी व वासना के किस्से याद दिला रही थी, तब सुगना पूरी तरह खामोश थी। वह लाज और संकोच के मारे अपनी नज़रें झुकाए ज़मीन को निहारती रही। उसके पास लाली की इन बेबाक बातों का कोई जवाब नहीं था। लाली ने एक गहरी सांस ली और बात खत्म करते हुए बोली, "एहसे कहत बानी सुगना, आज अगर मालती और राजू भी ओही रास्ता पर आगे बढ़ त बाड़न, तो अचरज कइसन? ई खानदान के इतिहासवे अइसन रहल बा।"

तब सुगना ने धीरे से अपनी नज़रें उठाईं और लाली की तरफ देखते हुए बहुत ही गंभीर और चिंतित स्वर में बोला, "जवन भइले से भइले, पर ई सब ठीक नइखे।"

अपनी नज़रें लाली के चेहरे पर टिकाते हुए उसने अपनी बात आगे बढ़ाई, "अतीत में जो कुछ भी भइल, ऊ एक दुःस्वप्न नियन रहे। ओकरा के याद कइला से सिर्फ छाती में दरद होला। पर आज जब हम मालती और राजू के ओही राह पर देखत बानी, तो हमार करेजा काँप उठता। खानदान के इतिहास चाहे जवन भी रहल हो, पर कवनो गलत परंपरा के आगे बढ़ावल ठीक नइखे। हमनी के चुपचाप बइठ के ई सब तमाशा ना देखल चाहीं।"

सुगना की आँखों में एक माँ की बेबसी और आने वाले कल का डर साफ झलक रहा था। लाली की बेबाक बातों ने उसके दिल में लगी चिंता की आग में घी का काम किया था। उसे साफ दिखने लगा था कि अगर इन दोनों को समय रहते नहीं रोका गया, तो इतिहास खुद को एक बार फिर से दोहराएगा और मर्यादा की रही-सही दीवारें भी ढह जाएंगी।

सुगना ने मन ही मन यह दृढ़ संकल्प कर लिया कि अब राजू और मालती को एक-दूसरे से अलग करने का वक्त आ गया है। मालती की वह बिंदास सफेद शर्ट, उसकी आँखों की ढिठाई और राजू की फटफटिया की आवाज़ उसके कानों में गूँज रही थी। सुगना जानती थी कि इस बार उसे केवल डांट-फटकार से काम नहीं लेना होगा, बल्कि बहुत ही सूझबूझ और कड़ाई से कोई ठोस कदम उठाना होगा। उसने खुद से वादा किया कि राजू और मालती के बीच पनप रहे इस घालमेल और बढ़ते कदमों पर वह हर हाल में लगाम लगाकर रहेगी, चाहे इसके लिए उसे कोई भी कड़ा रुख क्यों न अपनाना पड़े।

सुगना आँगन से निकलकर गहरे विचारों में डूबी हुई अपने कमरे की तरफ जा रही थी। उसका पूरा ध्यान राजू और मालती को अलग करने की योजना पर था, जिसके कारण उसका ध्यान ज़मीन से पूरी तरह हट चुका था। तभी फर्श पर पड़े हल्के गीलेपन की वजह से उसका पैर अचानक बुरी तरह फिसल गया। वह संभलने का मौका पाती, इससे पहले ही उसका संतुलन पूरी तरह बिगड़ गया और वह ज़ोर से कूल्हे के बल फर्श पर गिर पड़ी। गिरने की आवाज़ इतनी तेज़ थी कि पूरा आँगन गूँज उठा।

लाली, जो कुछ ही दूरी पर खड़ी सुगना को जाते हुए देख रही थी, जैसे ही उसने सुगना को लड़खड़ाते देखा, वह चीखते हुए उसे थामने के लिए आगे झपटी। लाली ने पूरी ताकत से अपनी बाहें बढ़ाईं ताकि सुगना को ज़मीन पर गिरने से पहले ही लपक सके। उसने चिल्लाकर कहा, "अरे सुगना! संभलऽ...!"

पर तब तक बहुत देर हो चुकी थी। लाली के हाथ सुगना को छू भर पाए, लेकिन भारी शरीर के असंतुलन के आगे उसकी यह कोशिश नाकाम रही। सुगना तब तक पूरी तरह ज़मीन से टकरा चुकी थी। गिरने के उस भीषण झटके के साथ ही सुगना के मुँह से एक चीख निकल गई और वह दर्द के मारे कराहते हुए अपने कूल्हे को पकड़कर वहीं तड़पने लगी। लाली घबराकर उसके पास घुटनों के बल बैठ गई, उसका पूरा शरीर डर के मारे कांप रहा था।

लाली के सहारे से सुगना बहुत मुश्किल से फर्श से उठकर खड़ी हुई। गिरने की वजह से उसका पूरा बदन दर्द से कांप रहा था, पर उसने लाली के कंधे पर अपना पूरा वजन डाल दिया। लाली ने सुगना का चेहरा देखा, जो दर्द के मारे पीला पड़ चुका था। उसने घबराते हुए ठेठ भोजपुरी में उसका हाल-चाल पूछा, "अरे सुगना… कइसन लागत बा हो? ढेर चोट आ गइल का? कमर उखाड़ गइल का तोहार?"

सुगना ने एक गहरी सांस ली और अपने भीतर उठते दर्द के उस तीखे उफान को दबाते हुए, चेहरे पर शिकन न लाने की कोशिश की। उसने लाली से कहा, "ना लाली, ठीक बानी हम। तनी पैर फिसल गइल रहे, अइसन कवनो बात नहीं बा।"

अपनी लड़खड़ाती हुई चाल और धीमे कदमों से चलते हुए सुगना किसी तरह अंदर कमरे में दाखिल हुई और वहाँ रखे सोफे पर जाकर बैठ गई। लाली ने उसे आराम से बैठाया और तुरंत रसोई की तरफ भागी। वह सुगना के लिए गरमा-गरम नाश्ता तैयार करके ले आई। लाली ने बड़े प्यार से सुगना को नाश्ता कराया और फिर खुद भी उसके पास ही सोफे पर बैठ गई। दोनों सहेलियाँ साथ बैठकर धीरे-धीरे बातें करने लगीं, जिससे सुगना का ध्यान दर्द से थोड़ा हट सके।

तभी अचानक लाली को सुगना की पीठ और कमर का धीमा खिंचाव महसूस हुआ। लाली उठ खड़ी हुई और अचानक भोजपुरी में बोलते हुए कहा, "ए सुगना, अइसे बइठला से दरद अउर बढ़ जाई। लाओ, तनी तेल लगा देईं कमर के पास, मालिश कइ देब त एकदम ठीक हो जाई।"

सुगना ने झिझकते हुए तुरंत मना किया, "ना लाली, अइसन कवनो बात नहीं बा, अपने से ठीक हो जाई। तेल-वेल लगाने की कवनो जरूरत नहीं बा।"

पर लाली कहाँ मानने वाली थी, उसकी ज़िद जारी रही। उसने सुगना को डांटते हुए भोजपुरी में कहा, "चुप करा सुगना! चोट अंदरूनी बा, अगर अभी तेल ना लगल तो कल तक कमर जाम हो जाई। हमार बात माना।" लाली के इस अपनेपन और अधिकार भरी ज़िद के आगे आखिरकार सुगना को झुकना ही पड़ा।

कुछ ही देर में सुगना अपने कमरे में बिस्तर पर पेट के बल लेट चुकी थी। उधर लाली रसोई घर से सरसों का तेल हल्का गुनगुना करके कटोरी में लिए हुए उसके बिस्तर के पास आ पहुँची। कमरे का दरवाज़ा बंद था और चारों तरफ एक अजीब सी शांति पसरी हुई थी। आज कई वर्षों बाद ऐसा मौका आया था जब लाली सुगना के इतने करीब थी। सुगना के दर्द को कम करने के लिए लाली ने धीरे से उसके पेटीकोट का नाड़ा ढीला किया और वस्त्र को थोड़ा नीचे खिसकाकर उसके नितंबों को अनावृत किया। जैसे ही कपड़ा हटा, सुगना का वह चमकता हुआ गोरा बदन लाली की आँखों के सामने पूरी तरह खुल गया। उम्र के इस पड़ाव पर आने के बाद भी सुगना का वह भरा-पूरा और सुगठित जिस्म आज भी उतना ही मादक और सम्मोहक था। उसकी मखमली त्वचा पर एक अनोखी दमक थी, जिसे देखकर लाली के हाथ एक पल के लिए कटोरी थामे हुए हवा में ही ठिठक गए।

सुगना को पीठ के बल लेटे-लेटे ही यह अहसास हो गया कि उसके अंग पूरी तरह अनावृत हो चुके हैं और पीछे खड़ी लाली बिना हिले-डुले बस उसे एकटक निहार रही है। कमरे में पसरी उस अजीब सी खामोशी को भांपकर सुगना ने धीरे से अपना सिर किनारे घुमाया और तिरछी नज़रों से लाली की तरफ देखते हुए भोजपुरी में टोक दिया, "अरे! का देखत बाड़ू हो? तेल लगावे के बा कि खाली निहारे के बा?"

सुगना को अपनी कामुक नितंबों के उजागर होने का एहसास और लाली की आंखों में शरारत दिखाई पड़ी गयी थी।



शेष अगले भाग में
 
भाग 210

कमरे में पसरी उस अजीब सी खामोशी को भांपकर सुगना ने धीरे से अपना सिर किनारे घुमाया और तिरछी नज़रों से लाली की तरफ देखते हुए भोजपुरी में टोक दिया, "अरे! का देखत बाड़ू हो? तेल लगावे के बा कि खाली निहारे के बा?"

सुगना को अपनी कामुक नितंबों के उजागर होने का एहसास और लाली की आंखों में शरारत दिखाई पड़ी गयी थी।


अब आगे..

सुगना को पीठ के बल लेटे-लेटे ही यह अहसास हो गया कि उसके अंग पूरी तरह अनावृत हो चुके हैं और पीछे खड़ी लाली बिना हिले-डुले बस उसे एकटक निहार रही है। कमरे में पसरी उस अजीब सी खामोशी को भांपकर सुगना ने धीरे से अपना सिर किनारे घुमाया और तिरछी नज़रों से लाली की तरफ देखते हुए भोजपुरी में टोक दिया, "अरे! का देखत बाड़ू हो? तेल लगावे के बा कि खाली निहारे के बा?"

सुगना को अपनी कामुक नितंबों के उजागर होने का एहसास और लाली की आंखों में शरारत दिखाई पड़ी गयी थी।

सुगना की यह बात सुनकर लाली जैसे किसी गहरी तंद्रा से जागी। उसके चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान और आँखों में गहरी प्रशंसा के भाव आ गए। उसने एक गहरी सांस ली और सुगना के उस मखमली बदन पर अपनी उंगलियां टिकाते हुए भोजपुरी में बोली, "अरे सुगना! का बताईं, तू आजुओ एतना सुंदर बाड़ू! तोहार ई अनमोल संपत्ति देख के मन डोल जाता। सच बताईं, त विधाता काहे तोहार ई रूप जिया करत बाड़े? कवनो मर्द एकरा कदरदान होखे के चाहत रहे।"

लाली की यह बेबाक और प्रशंसा भरी बात सुनकर सुगना के गालों पर अचानक लज्जा की एक सुर्खी दौड़ गई। उसने तुरंत अपना मुंह दूसरी तरफ घुमा लिया, पर लाली के इन शब्दों ने उसके भीतर दबी हुई स्त्री-सुलभ चेतना को एक पल के लिए झकझोर कर रख दिया था।

लाली ने अपनी कटोरी से गुनगुना तेल हथेलियों पर लिया और उन्हें आपस में रगड़कर सुगना के नितंबों पर टिका दिया। तेल की गर्माहट और लाली के हाथों का स्पर्श पाते ही सुगना के शरीर की जकड़न को थोड़ी राहत मिली। लाली हल्के हाथों से दबाव बनाते हुए मालिश करने लगी, पर वह अपनी पुरानी आदतों और शरारतों से कहाँ बाज़ आने वाली थी। अतीत में भी उन दोनों के बीच एक अलग तरह का खुलापन रहा था, और आज भी लाली का इरादा सिर्फ मालिश तक सीमित नहीं था।

धीरे-धीरे मालिश करते हुए लाली की उंगलियाँ सुगना के नितंबों के उभारों के बीच के संकरे हिस्से में गहराई से घूमने लगीं। सुगना ने लाली की इस बढ़ती ढिठाई और उंगलियों के उस खास घर्षण को महसूस किया, पर दर्द और देह के अचानक जागे सम्मोहन के कारण वह उसे रोक नहीं पाई। इस छुअन से सुगना के पूरे बदन में एक सिहरन दौड़ गई और वह एक अनजान, मादक अहसास के सागर में डूबने लगी। लाली की उंगलियों की हर हरकत के साथ सुगना की दोनों जांघों के बीच छुपा हुआ उसका सबसे संवेदनशील हिस्सा धीरे-धीरे पिघलने और पसीजने लगा, जिससे एक अजीब सी आर्द्रता वहाँ महसूस होने लगी।

इस अप्रत्याशित और मखमली छुअन ने सुगना को चेतना और अचेतना के उस मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया, जहाँ समाज के नियम धुंधले पड़ जाते हैं। वह अपनी आँखें बंद किए बिस्तर पर पड़ी रही, लेकिन उसका दिमाग उसे अतीत की गलियों में खींच ले गया। बंद आँखों के पीछे वह उसी अनजान और परम सुख को दोबारा भोग रही थी, जो सालों पहले उसे एक बंद कमरे में मिला था—जब ठीक इसी तरह उसकी देह पर तेल लगाते हुए सरयू सिंह की मर्दानी उंगलियों ने उसे छुआ था। लाली की उंगलियों की सरसराहट में सुगना को सरयू सिंह का वही पुराना, कड़ा और आदिम अहसास वापस मिलता हुआ महसूस हो रहा था, जिससे उसकी सांसें भारी होने लगीं।

सरयू सिंह का ध्यान आते ही सुगना जैसे किसी गहरी और डरावनी नींद से चौंककर जाग उठी। अतीत की उस याद ने उसके पूरे वजूद को झकझोर कर रख दिया। उसे अहसास हुआ कि वह किस कदर मर्यादा की सीमा लांघकर एक अजीब से भटकाव में बहती जा रही थी। उसने तुरंत अपनी आँखें खोलीं और अपने मन को उस तरफ से पूरी तरह भटकाया।

उसने खुद को सचेत किया और बिस्तर पर थोड़ा सा करवट लेते हुए लाली का हाथ पीछे ढकेला और भरे हुए लहजे में बोली, "अब बस कर लाली! ढेर हो गइल। अब दरद में आराम बा।"

लाली की उंगलियों ने जो हलचल मचाई थी, उससे सुगना के भीतर वासना और देह की सुप्त आकांक्षाएं जाग तो रही थीं, पर उसका संस्कारी और पारंपरिक मन उसे स्वीकार करने को कतई राजी न था। वह खुद को एक माँ, के रूप में देखती थी, और लाली के इस स्पर्श से पैदा होने वाले सुख को स्वीकार करना उसे अपने खुद के सिद्धांतों के खिलाफ लग रहा था। वह अपनी जांघों को सिकोड़ते हुए बिस्तर पर उठ बैठने की कोशिश करने लगी, ताकि इस मादक और कटीले माहौल को यहीं खत्म किया जा सके।

लाली सुगना का इशारा भांपते ही तुरंत अपना हाथ पीछे खींच ली, लेकिन वह इतनी आसानी से हार मानने वाली नहीं थी। वह पैंतरा बदलते हुए सुगना के ठीक सामने बैठ गई और उसकी आँखों में आँखें डालकर ज़बरदस्ती हक जताते हुए बोली कि पहले एक वादा करो।

सुगना ने उसे घूरते हुए ठेठ सहेली वाले अंदाज़ में टोक दिया, "पहले बात बोल लाली! तू कवन चाल चलत बाड़ू, जब ले ऊ ना जानब, तब ले हम कवनो वादा-वादा ना करे वाली बानी।"

भले ही सुगना ऊपर से कड़क बन रही थी, पर लाली के हाथों की मालिश से उसकी देह को जो सुख और आराम मिला था, उससे उसका मिजाज भीतर से एकदम ढीला पड़ चुका था। उसने लाली को ढीठपना करते देख हंसते हुए कहा, "अच्छा चल, ढेर नौटंकी मत कर, बोल का बात बा?"

लाली को तो जैसे इसी मौके का इंतज़ार था। वह तुरंत सुगना के और करीब सड़ गइल और उसकी आँखों में आँखें डाल के एकदम मादक और कमसिन वाली बदमाशी के साथ फुसफुसाते हुए बोली, "अरे! एक बार अपन ऊ मालपुआ त देखा दऽ ना! जुग बीत गइल देखे हुए। पहिले त ऊ एकदम गदराइल और कयामत रहे, अबहूँ त देखीं कि कइसन बा या बस नामे के बचल बा!"

सुगना ने पहले तो एक झटके में साफ मना कर दिया और लाली को डांटते हुए पीछे ढकेलना चाहा। पर लाली कहाँ मानने वाली थी, वह दोनों हाथ जोड़कर सहेली वाले कड़े अधिकार और मिन्नत के साथ अड़ गई। लाली की इस बार-बार की ज़िद और मनुहार के आगे आखिरकार सुगना का मन भी थोड़ा ढीला पड़ गया।

उसने लाली को घूरते हुए अपने पेटिकोट को ऊपर उठाने के बजाय, कमर के पास से उसे थोड़ा सा और नीचे की तरफ खिसका दिया। कपड़ा हटते ही उसके उस गुप्त हिस्से का ऊपरी भाग लाली की प्यासी निगाहों के सामने एक झलक के लिए पूरी तरह उजागर हो गया।

आज भी सुगना बाहर से जितनी खूबसूरत और सलोनी दिखती थी, उसका वह छुपा हुआ हिस्सा उतना ही रसीला, गदराया हुआ और मादक था। समय के थपेड़ों और उम्र के इस पड़ाव के बाद भी वहाँ की त्वचा में वही पुरानी कशिश और एक अजीब सा आकर्षण बरकरार था, जिसे देखते ही लाली की सांसें एक पल के लिए थम सी गईं।

लाली सुगना के उस रूप को देखकर आपे से बाहर होने लगी। वह तुरंत घुटनों के बल नीचे बैठी और अपनी उंगलियों से सुगना का साया (पेटीकोट) पकड़कर उसे और नीचे खींचने की कोशिश करने लगी ताकि उस छिपे हुए हिस्से को पूरी तरह निहार सके।

पर सुगना तुरंत सचेत हो गई। उसने एक झटके से लाली का हाथ पकड़ा, साए को वापस ऊपर खींचा और अपनी लाज को ढकते हुए मुस्कुरा कर बोली, "धत् पागल! एकदम पगला गइल बाड़ू का हो? ई का करत बाड़ू!"

सुगना की इस डांट में कोई गुस्सा नहीं था, बल्कि सहेलियों वाली वही पुरानी शरारत और अपनापन था। सुगना की बात सुनकर लाली भी झेंपते हुए खिलखिलाकर हंस पड़ी और दोनों सहेलियाँ कमरे की उस खामोशी को अपनी हंसी से गुंजाने लगीं।

वे दोनों ऊपर से भले ही हंस रही थीं और बात को रफा-दफा करने की कोशिश कर रही थीं, पर भीतर ही भीतर दोनों के बदन और मन में बरसों से सोई हुई वासना की आग सुलग चुकी थी। लाली के उस बेबाक स्पर्श और सुगना के अनावृत बदन की उस एक झलक ने कमरे के माहौल को पूरी तरह भारी और मादक बना दिया था।

सुगना की नज़र अचानक दीवार पर टंगी घड़ी पर गई। समय देखते ही उसके चेहरे पर चिंता और उत्सुकता के मिले-जुले भाव आ गए। उसने तुरंत अपने कपड़ों को सलीके से ठीक किया, पलंग से उतरी और लाली का हाथ पकड़ते हुए बोली, "अरे लाली! देख तनी, कतना देर हो गइल बा! कुछ ही देर में विकास, सोनू अउर सूरज अपनी नैनीताल के यात्रा खत्म कइके वापस आ जाईं सन। अब ई सब बदमाशी छोड़ऽ, जवन भइल से भइल, अब हमनी के ओ लोगन के स्वागत के तैयारी करे के चाहीं।"

कमरे के भीतर पसरा हुआ वह मादक सन्नाटा एक झटके में गायब हो गया और दोनों सहेलियाँ वापस अपने गृहस्थी के रंग में लौट आईं। सुगना के चेहरे पर एक माँ की स्वाभाविक खुशी और चमक वापस आ गई थी। आज का दिन उसके लिए बेहद खास था; संतान सप्तमी का पावन व्रत और अनुष्ठान पूरा करके उसके परिवार के तीनों पुरुष सदस्य आज सकुशल घर लौट रहे थे।

दोनों सहेलियाँ बिना समय गंवाए तुरंत रसोई घर की तरफ बढ़ीं और बड़े उत्साह के साथ काम में जुट गईं। सुगना ने भारी परांत में मैदा और सूजी निकाली, जबकि लाली ने चूल्हा सुलगाकर कढ़ाई चढ़ाई। देखते ही देखते रसोई की हवा तरह-तरह के पकवानों, खस्ता कचौड़ियों, और मीठे पुआरों की खुशबू से महकने लगी। दोनों आपस में हाथ बंटाते हुए नैनीताल से आने वालों के पसंद के खाने तैयार करने लगीं।

पकवान बनते ही सुगना ने पीतल की एक सुंदर और चमकदार थाली निकाली। उसने थाली के बीचों-बीच रोली और चंदन से स्वास्तिक बनाया, अक्षत (चावल) बिखेरे, ताजे गेंदे के फूल सजाए और घी का एक दीया कपूर के साथ बीच में रख दिया।

आरती की थाल पूरी तरह सजकर तैयार हो चुकी थी। सुगना ने गहरी संतुष्टि के साथ थाली को ड्योढ़ी के पास बने ऊंचे चबूतरे पर रखा। उसका मन अपने बेटों और परिवार की खुशहाली की कामना से भरा हुआ था। वह बार-बार मुख्य द्वार की तरफ देखती, जहाँ किसी भी पल गाड़ी के हॉर्न की आवाज़ गूँजने वाली थी और उसका सूना पड़ा घर एक बार फिर अपनों की किलकारियों से जीवंत होने वाला था।

उधर, नैनीताल की वादियों को पीछे छोड़ते हुए विकास, सोनू और सूरज की गाड़ी अब तेज़ी से बनारस की तरफ बढ़ रही थी। हाईवे की साफ सड़क पर गाड़ी सरपट दौड़ रही थी। सूरज पूरी एकाग्रता के साथ स्टीयरिंग थामे ड्राइव कर रहा था, जबकि विकास बगल वाली सीट पर बैठा बाहर के बदलते नज़ारों को देख रहा था।

गाड़ी की अगली सीट पर बैठे विकास का शरीर भले ही बनारस की तरफ बढ़ रहा था, लेकिन उसका मन और दिमाग अभी भी पीछे ही छूटा हुआ था। वह पूरी तरह से खोया हुआ था—संतान सप्तमी के उस आखिरी और सबसे रहस्यमयी पल में, जो ठीक उसकी आँखों के सामने घटित हुआ था।

उसकी बंद होती और खुलती आँखों के सामने रह-रहकर वही दृश्य घूम रहा था, जब सूरज सोनी को बेतहाशा चोदते हुए उसकी वर्जित कामनाओं को पूरा कर रहा था।

इस अद्भुत और कामुक मिलन को सब अपने-अपने तरीके से याद करते हुए बनारस की तरफ पढ़ रहे थे।

नैनीताल की ठंडी और धुंधली वादियों के बीच स्थित उस होटल के कमरे में संतान सप्तमी की वह अनोखी पूर्णाहुति आखिरकार संपन्न हो चुकी थी। बंद कमरे के भीतर का वह आदिम और उग्र सैलाब अब शांत था, लेकिन सूरज के भीतर का मानसिक तूफान अभी थमने का नाम नहीं ले रहा था।

पूर्णाहुति के पश्चात जब उसने अपने मौसी से पूछ कर अपनी आंखों की पट्टी हटाई थी और उसके बाद जो हुआ था उसने सूरज के मन मस्तिष्क में एक ऐसी अनूठी याद कैद करती थी जिसे वह हमेशा हमेशा के लिए अपने अंतर मन में बसा चुका था। उसके बाद जो हुआ वह सिर्फ सूरज को नहीं अपित सोनी को भी बखूबी याद था।


सोनी को जी भरकर चोदने के बाद सूरज निकलकर नीचे होटल की सुनसान लॉबी में आकर बैठ गया था।

लॉबी के सोफे पर अकेला बैठा सूरज संध्या काल में घटे उस पूरे घटनाक्रम को एक-एक कर अपनी यादों में दोहरा रहा था। जैसे-जैसे वे दृश्य उसकी आँखों के सामने आ रहे थे, उसका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा और उसके भीतर एक गहरी घबराहट समाने लगी। उसे सबसे बड़ा डर इस बात का सता रहा था कि कहीं मौसा जी (विकास) को आज के इस अप्रत्याशित और अनोखे घटनाक्रम की भनक न लग जाए। यद्यपि विकास खुद उस कमरे के कोने में बैठा इस पूरे अनुष्ठान का मूक गवाह था, लेकिन सूरज को यह अंदेशा परेशान कर रहा था कि मर्यादा की हदें पार होने की यह बात अगर किसी भी रूप में बाहर आई, तो क्या होगा।

सूरज की घबराहट की एक बड़ी वजह वह उग्रता थी, जिससे उसने इस कृत्य को अंजाम दिया था। आज जिस प्रचंड वेग और दीवानगी के साथ उसने सोनी के गोरे और सुगठित बदन को मथा था, उसके बाद उसे इस बात का पूरा यक़ीन था कि उसके पौरुष के गहरे निशान और अक्ष सोनी की देह पर साफ़ छप गए होंगे। समागम के उन आखिरी पलों में सोनी की बदलती साँसें और उसके चेहरे के तीखे खिंचाव को सूरज ने खुद अपनी उंगलियों से महसूस भी किया था।

लॉबी की बड़ी काँच की खिड़की से बाहर नैनीताल की शांत वादियों को निहारते हुए सूरज का मन आत्मग्लानि और डर से घिरने लगा। भावनाओं के उस तीव्र बहाव और अपने अनियंत्रित उन्माद में आकर उसने सोनी के कोमल बदन के साथ जो मर्यादाहीन और उग्र व्यवहार किया था, उसका पछतावा अब उसकी चेतना पर भारी पड़ने लगा था। वह मन ही मन अपने इष्ट का स्मरण करने लगा और उनसे बेहद कातर भाव से प्रार्थना करने लगा कि वे उसे इस विकट और संवेदनशील स्थिति से सुरक्षित बाहर निकाल लें, ताकि परिवार की मर्यादा और विश्वास पर कभी कोई आँच न आए।

तभी विकास सीढ़ियों से उतरते हुए लॉबी की तरफ आता है। चारों तरफ नजर दौड़ाने के बाद जब उसकी नजर सोफे पर बैठे सूरज पर पड़ती है, तो वह उसके पास आ जाता है। सूरज के चेहरे पर छाई घबराहट को भांपे बिना, विकास बेहद सहज और शांत आवाज में कहता है, "सूरज, यहाँ अकेले क्यों बैठे हो? चलो, ऊपर कमरे में खाना लग गया है। सोनी कब से डाइनिंग टेबल पर तुम्हारा इंतजार कर रही है।"

मौसा जी की यह सहजता और उनके चेहरे पर कोई शिकन न देखकर सूरज को थोड़ी राहत तो मिलती है, लेकिन उसका दिल अभी भी अंदर ही अंदर तेजी से धड़क रहा होता है। वह अपनी भावनाओं को संभालते हुए सोफे से खड़ा होता है और विकास के पीछे-पीछे दबे कदमों से ऊपर कमरे की तरफ बढ़ने लगता है।

कमरे का दरवाजा खोलते ही सामने का नजारा सूरज की धड़कनों को और बढ़ा देता है। सोनी टेबल पर सलीके से खाना परोस रही होती है। सूरज ने कुछ ही देर पहले जिस बदन को अपने उन्माद से मथा था, वह अब पूरी तरह कपड़ों में ढका हुआ था। जैसे ही दरवाजे की आवाज होती है, सोनी पलटकर देखती है। उसकी नजरें सीधे सूरज की आंखों से टकराती हैं। उन आंखों में थकान, एक अजीब सी चमक और कुछ देर पहले हुए उस उग्र समागम की पूरी दास्तान साफ पढ़ी जा सकती थी। सोनी का यह शांत मगर गहरा रूप देखकर सूरज एक बार फिर अंदर तक सिहर उठता है।

डाइनिंग टेबल पर बैठते ही कमरे का तनाव थोड़ा कम हुआ, लेकिन वहाँ पसरी खामोशी बहुत कुछ बयां कर रही थी। सोनी ने जब झुककर सूरज की थाली में गरमा-गरम खाना परोसा, तो उसके कुर्ते के ढीले गले से उसकी सुगठित गर्दन और छाती का ऊपरी हिस्सा साफ नुमायां हो रहा था। सूरज की नजरें जैसे ही वहाँ पड़ीं, उसके दिल की धड़कन एक पल के लिए रुक गई। सोनी की गोरी गर्दन पर सूरज के मजबूत हाथों के तीखे खिंचाव और उग्र आलिंगन की लाल सुर्खी साफ चमक रही थी। उसके बदन के उतार-चढ़ाव पर छाए वे हल्के निशान उस आदिम और प्रचंड महा-मिलन की मूक गवाहियाँ दे रहे थे, जिसे उन दोनों ने कुछ ही देर पहले मुकम्मल किया था। सूरज ने तुरंत अपनी नजरें झुका लीं, क्योंकि उसे महसूस हो गया था कि उसके उन्माद के अक्ष सोनी के बदन पर कितनी गहराई से छप चुके हैं।

तभी विकास ने अपनी आदत के मुताबिक माहौल को एकदम हल्का करते हुए कहा, "चलो भाई, अब फटाफट खाना शुरू करो, नैनीताल की इस ठंड में खाना बहुत जल्दी ठंडा हो जाता है।" विकास की सहज आवाज ने दोनों को वापस धरातल पर ला दिया। सोनी ने खुद को पूरी तरह संभाला और अपनी साड़ी के पल्लू को थोड़ा और सँभालते हुए टेबल पर बैठ गई। इसके बाद, तीनों के बीच बहुत ही सामान्य और घरेलू बातचीत शुरू हो गई, मानो कुछ देर पहले उस बंद कमरे में मर्यादाओं का कोई तूफान आया ही न हो। विकास ने पानी का गिलास उठाते हुए कहा, "सूरज अब कल सुबह हमें यहाँ से लखनऊ और फिर आगे के लिए निकलना होगा। गाड़ियों का टाइमिंग और रूट मैंने चेक कर लिया है।" सोनी ने भी बेहद स्वाभाविक लहजे में अपनी बड़ी बहन का जिक्र करते हुए कहा, "हाँ, दीदी से भी मेरी बात हुई थी। वो भी बनारस में अपनी पूजा संपन्न कर चुकी हैं और हमारे लौटने का इंतजार कर रही हैं। कल सुबह जल्दी निकलेंगे तो रास्ते में कोई दिक्कत नहीं होगी।" सूरज ने बस हाँ में सिर हिलाया और खाने की तरफ ध्यान देने लगा। विकास और सोनी को इस तरह सहजता से कल की वापसी की योजना बनाते देख उसके मन की घबराहट धीरे-धीरे शांत होने लगी।

अगली सुबह नैनीताल की ठंडी हवाओं को पीछे छोड़ते हुए तीनों बनारस के लिए निकल चुके थे। गाड़ी जैसे-जैसे आगे बढ़ रही थी, खिड़की से बाहर देखते हुए सोनी के मन में पिछले कुछ दिनों की यादें किसी फिल्म की तरह तैर रही थीं। संतान सप्तमी के इस पूरे सप्ताह में उसने सूरज के साथ जिस उग्र और अगाध समर्पण का अनुभव किया था, वह सचमुच उसकी कल्पनाओं से परे और अद्भुत था। खासकर कल शाम की वह पूर्णाहुति तो उसके जीवन का सबसे यादगार और तीव्र क्षण बन चुकी थी। सूरज के उस प्रचंड पौरुष और दीवानगी के प्रहारों की गूँज आज भी सोनी के पूरे वजूद में महसूस हो रही थी। गाड़ी के हिचकोलों के साथ जब भी उसका बदन थोड़ा थिरकता, उसे अपनी जांघों और कमर के निचले हिस्से में एक मीठा सा दर्द और भारीपन महसूस होता। उसका बदन आज भी उस कामुक मिलन की गवाही को अपने भीतर समेटे हुए था, मानो सूरज का स्पर्श अब भी उसकी त्वचा पर ज़िंदा हो। बगल की सीट पर बैठा विकास रास्ते के नजारों को देखने में मग्न था और आगे की सीट पर बैठा सूरज खामोशी से बाहर देख रहा था। सोनी ने एक बार चुपके से शीशे में सूरज के चेहरे को निहारा, जिसमें अब कल रात जैसी उग्रता नहीं, बल्कि एक अजीब सा संतोष और गंभीर शालीनता थी।

रास्ते में सूरज ने फोन निकालकर बनारस में इंतजार कर रही सुगना को घंटी मिलाई और हवेली पहुँचने का अनुमानित समय बता दिया। उधर सुगना तो जैसे पल-पल गिन रही थी। फोन रखते ही वह आरती की थाली सजाने में जुट गई, क्योंकि संतान सप्तमी के इस पावन सप्ताह का सबसे मुख्य और आखिरी अनुष्ठान अब उनके घर की दहलीज पर होना था। जैसे ही गाड़ी हवेली के मुख्य द्वार पर आकर रुकी, तीनों के कदम भीतर बढ़े। जैसे ही सोनी, विकास और सूरज ने हवेली के मुख्य हॉल में प्रवेश किया, सामने सुगना आरती की थाली लिए पूरी श्रद्धा और ममता के साथ उपस्थित खड़ी थी। उसके चेहरे पर बड़ी बहन और एक माँ का अटूट विश्वास चमक रहा था। सुगना की दिली इच्छा और मानसिक संकल्प यही था कि वह संतान सप्तमी के निज मन्नतधारी—यानी अपनी छोटी बहन सोनी और विकास—की एक साथ पति-पत्नी के रूप में आरती उतारे और इस अनुष्ठान को संपूर्ण करे।

सुगना ने जैसे ही थाली उठाई और विकास-सोनी के सामने आई, तभी सोनी के मन में न जाने क्या आया। उसने मुड़कर कुछ दूरी पर खड़े सूरज को देखा। सोनी के बदन में अभी भी कल शाम की उस उग्र पूर्णाहुति की गर्माहट और थकान बची हुई थी, और उसका अंतर्मन इस सच को पूरी तरह स्वीकार कर चुका था। उसने तुरंत सूरज को आवाज दी, "अरे सूरज, तू वहाँ दूर क्यों खड़ा है? इधर आ, तू भी आ जा हमारे साथ!" सुगना अपने बेटे सूरज से अगाध प्रेम करती थी। अपने इकलौते जवान बेटे के चेहरे पर एक अनोखा तेज, तृप्ति और खुशी देखकर सुगना के मन में रत्ती भर भी एतराज नहीं आया। उसने मुस्कुराकर सूरज को भी पास बुला लिया। जाने-अनजाने, नियति ने एक ऐसा खेल रचा कि उस थाली के मद्धम दीये की रोशनी और मंत्रों के दिव्य घेरे के भीतर सोनी, विकास और सूरज—तीनों ही एक साथ आ गए।

सुगना पूरे समर्पण से दीया घुमाते हुए मन ही मन ईश्वर से लगातार यही गुहार लगा रही थी कि उसकी छोटी बहन सोनी की सूनी गोद जल्दी से हरी हो जाए। वह अपनी बंद आँखों से जिस दिव्य आशीष की कामना कर रही थी, उससे वह पूरी तरह अनजान थी। सुगना को क्या पता था कि उसकी यह अधूरी इच्छा, उसकी बहन की सूनी झोली और उस परिवार की सबसे बड़ी मन्नत को उस बंद कमरे में पहले ही मुकम्मल किया जा चुका है। सुगना जिस अजन्मी संतान के लिए आरती उतार रही थी, उसका बीज सूरज कल शाम ही सोनी के गर्भ की गहराइयों में पूरी शिद्दत से रोप चुका था।
 
भाग 211

सुगना पूरे समर्पण से दीया घुमाते हुए मन ही मन ईश्वर से लगातार यही गुहार लगा रही थी कि उसकी छोटी बहन सोनी की सूनी गोद जल्दी से हरी हो जाए। वह अपनी बंद आँखों से जिस दिव्य आशीष की कामना कर रही थी, उससे वह पूरी तरह अनजान थी। सुगना को क्या पता था कि उसकी यह अधूरी इच्छा, उसकी बहन की सूनी झोली और उस परिवार की सबसे बड़ी मन्नत को उस बंद कमरे में पहले ही मुकम्मल किया जा चुका है। सुगना जिस अजन्मी संतान के लिए आरती उतार रही थी, उसका बीज सूरज कल शाम ही सोनी के गर्भ की गहराइयों में पूरी शिद्दत से रोप चुका था।

अब आगे..

सुबह के सुनहरे उजाले में, जब बनारस की गलियाँ अभी पूरी तरह जाग ही रही थीं, मालती और राजू चुपके से हवेली से निकलकर अपनी फटफटिया से सिनेमा हॉल की तरफ बढ़ चले थे। आज दोनों के मन में एक अलग ही रोमांच और धुकधुकी थी, क्योंकि आज उन्होंने एक 'एडल्ट फिल्म' देखने का पक्का प्लान बनाया था। यद्यपि बनारस जैसे पारंपरिक और रूढ़िवादी शहर में किसी परिचित की नज़र में आ जाना उनके लिए काफी रिस्की हो सकता था, पर उनके भीतर की मचलती तरुणाई और बेबाक इश्क भला कहाँ मानने वाला था। वैसे भी, वह जवानी ही क्या जो प्यार में थोड़ा रिस्क न ले!

मालती आज सफेद शॉर्ट शर्ट और नीली जींस पहने हुए थी, जिसमें उसका सुगठित बदन और आधुनिक अंदाज़ किसी को भी दीवाना बनाने के लिए काफी था। राजू उसके बगल में चलते हुए बार-बार तिरछी नज़रों से उसके इस बदले रूप को निहार रहा था और मन ही मन अपनी किस्मत पर नाज़ कर रहा था।

हॉल के बाहर पहुँचते ही राजू ने सावधानी से चारों तरफ नज़र दौड़ाई कि कहीं कोई पहचान का आदमी न दिख जाए। उसने तेज़ी से काउंटर की तरफ कदम बढ़ाए और एडल्ट शो की दो टिकटें अपनी जेब में छुपा लीं।

टिकटें मालती के हाथ में थमाते हुए राजू ने मुस्कुराकर कहा, "चलो मालती, अंदर का माहौल बाहर से ज़्यादा सुरक्षित है। वहाँ हमें रोक-टोक करने वाला कोई नहीं होगा।"

सिनेमा हॉल के गलियारे में पैर रखते ही वहाँ पसरा हुआ धुंधला अंधेरा और एसी की ठंडी हवा सीधे उनके बदन से टकराई। उस रूमानी और ठंडे माहौल को महसूस करते ही मालती के दिल की धड़कनें और तेज़ हो गईं। उसने घबराहट और उत्साह के मिले-जुले भाव से राजू का मजबूत हाथ थाम लिया।

जैसे ही वे अपनी सीटों की तरफ बढ़े, पर्दे पर फिल्म के शुरुआती दृश्यों की मादक आवाज़ें और संगीत गूँजने लगा। हॉल के उस सुनसान और अंधेरे कोने में बैठते ही, मालती and राजू को यह साफ अहसास हो गया कि आज की यह सुबह उनकी ज़िंदगी में मर्यादा और चाहत की एक नई इबारत लिखने जा रही है। सुगना भले ही हवेली में बैठकर पाबंदियों के ताने-बाने बुन रही थी, पर यहाँ इस बंद केबिन में राजू का हाथ अब मालती की नीली जींस पर अपनी पकड़ मजबूत करने लगा था।

सिनेमा हॉल के उस धुंधले और एकांत कोने में, screen से छनकर आती नीली-लाल रोशनी दोनों के चेहरों पर तैर रही थी। बड़े पर्दे पर चल रही फिल्म एक बेहतरीन और कलात्मक एडल्ट ड्रामा थी, जहाँ दो प्रेमियों के बीच का तीव्र शारीरिक और भावनात्मक खिंचाव अपनी पूरी भव्यता के साथ पर्दे पर उतारा जा रहा था। स्क्रीन पर बैकग्राउंड में एक धीमा, रूहानी और मादक संगीत गूँज रहा था। नायक और नायिका एक-दूसरे की आँखों में डूबे हुए थे, और उनके बीच की कशिश शब्दों से इतर उनके स्पर्श से बयां हो रही थी।

पर्दे पर नायक ने बेहद शालीनता और दीवानगी के साथ नायिका के चेहरे को अपने हाथों में लिया और उसके होंठों पर एक गहरा, लंबा चुंबन अंकित कर दिया। कैमरा धीरे-धीरे ज़ूम इन हुआ, जिसमें दोनों की भारी होती सांसें और चेहरे पर उभरते तीव्र उन्माद के भाव साफ़ दिख रहे थे। इसके बाद, पर्दे का दृश्य उनके बदन के कपड़ों के उतरने और उस मखमली छुअन के सुंदर संयोजन को दिखाने लगा, जहाँ वासना से ज़्यादा एक आदिम और अगाध समर्पण का अहसास था।

इस कलात्मक और उत्तेजक दृश्य ने राजू के भीतर के सब्र को पूरी तरह पिघला दिया। उसने मालती की तरफ रुख किया, जो पूरी तरह स्क्रीन पर खोई हुई थी, पर उसकी सांसें तेज़ी से चल रही थीं। राजू ने अपनी उंगलियों को धीरे से मालती की ठोड़ी पर टिकाया और उसका चेहरा अपनी तरफ घुमा लिया। मालती की आँखों में डर नहीं, बल्कि एक गहरा, पिघलता हुआ आमंत्रण था।

राजू ने झुककर मालती के कांपते हुए होंठों को अपने आगोश में ले लिया। सिनेमा हॉल के उस ठंडे केबिन में, उनके होंठों के इस गहरे मिलन ने पर्दे पर चल रहे दृश्य को जैसे हकीकत में बदल दिया था। राजू का एक हाथ मालती की नीली जींस के ऊपर उसकी जांघ पर टिक गया, जहाँ वह हल्के दबाव के साथ उसे सहलाने लगा। जींस के कपड़े के पार भी मालती को उस छुअन में एक कशिश और सुरक्षा का अहसास हो रहा था।

पर्दे पर अब नायक-नायिका के बीच का वह रूमानी महा-मिलन अपने चरम की ओर बढ़ रहा था, जहाँ केवल उनके हिलते हुए बदन और सांसों की गूँज थी। ठीक उसी तरह, इस अंधेरे कोने में मालती और राजू भी समाज की हर बंदिश और हवेली के खौफ को भुलाकर, केवल एक-दूसरे के स्पर्श और इस मादक वातावरण के जादू में पूरी तरह विलीन हो रहे थे।

सिनेमा हॉल के उस सबसे पिछले और अंधेरे कोने में, बड़े पर्दे पर चल रहे उस कलात्मक एडल्ट ड्रामे की मादकता अब सीधे तौर पर उन दोनों के शरीरों में उतर चुकी थी। स्क्रीन पर नायक और नायिका का वह रूमानी और उग्र समर्पण अपने चरम की ओर बढ़ रहा था, और उसकी धीमी, maदक गूँज हॉल के सन्नाटे को और गहरा कर रही थी।

राजू का हाथ जो अब तक मालती की नीली जींस के ऊपर जमा हुआ था, वह अब पूरी तरह से बेकाबू हो चुका था। उसने अपनी उंगलियों को धीरे से जींस के कड़े मुहाने और कमर के हिस्से से थोड़ा नीचे खिसकाया और कपड़े की तंग सरहद को लांघते हुए भीतर प्रवेश कर गया। जींस के भीतर उस मखमली और अगाध गर्माहट को छूते ही राजू की अपनी सांसें भी रुक सी गईं।

मालती ने इस अप्रत्याशित और सीधे स्पर्श पर एक बार अपनी आँखें पूरी तरह बंद कर लीं। राजू की उंगलियाँ जींस और अंतःवस्त्र की महीन परतों को पार करती हुई धीरे-धीरे मालती के बदन के उस सबसे संवेदनशील और गुप्त हिस्से की गहराइयों तक पहुँच गईं, जहाँ बरसों की दबी हुई प्यास और काम-रस की एक मखमली आर्द्रता पहले से ही सुलग रही थी।

जैसे ही राजू की उंगलियों ने मालती की उस गीली और रसीली योनि के मुहाने पर अपना धीमा घर्षण और हलचल पैदा करना शुरू किया, मालती के भीतर उत्तेजना का एक भीषण ज्वार उमड़ पड़ा। वह इस मादक प्रहार के सामने पूरी तरह बेचैन हो उठी। उसका सुगठित बदन सीट पर थोड़ा ऊपर की तरफ उठा और उसकी नीली जींस राजू के हाथों के उस तीखे खिंचाव के साथ और कस गई।

वह कभी अपनी जाँघों को भींचकर राजू की उंगलियों के उस सुखद अत्याचार को थामने का प्रयास करती, तो कभी गहरे सम्मोहन में आकर खुद ही अपनी कमर को थोड़ा और आगे की तरफ धकेल देती। उसकी सफेद शॉर्ट शर्ट के भीतर उसकी छाती इतनी तेज़ी से ऊपर-नीचे हो रही थी कि उसकी सांसों की तेज़ आवाज़ पर्दे पर चल रहे संगीत को भी मात दे रही थी।

मालती ने तड़पते हुए अपने दोनों हाथों से राजू के मजबूत कंधों को पूरी शिद्दत से पकड़ लिया और अपनी उंगलियों के नाखून उसके कुर्ते के पार उसकी त्वचा में चुभा दिए। बड़े पर्दे पर अब फिल्म की नायिका भी अपने प्रेमी के इसी तरह के एक उग्र और कलात्मक मर्दन के सामने बेसुध होकर सिसक रही थी, और ठीक उसी के समानांतर, इस अंधेरे केबिन में मालती भी मर्यादा और समाज के सारे बंधनों को भुलाकर राजू की उंगलियों से पैदा होने वाली उस आदिम और मखमली हलचल के सागर में पूरी तरह डूबती जा रही थी।

सिनेमा हॉल के उस सबसे पिछले और अंधेरे कोने में, बड़े पर्दे पर चल रहे दृश्यों की मादकता अब पूरी तरह से इन दोनों प्रेमियों के जिस्मों पर हावी हो चुकी थी। राजू की उंगलियों ने मालती की जांघों के बीच जो मखमली हलचल पैदा की थी, उसने मालती के भीतर छिपी काम-अग्नि को पूरी तरह सुलगा दिया था। वह उत्तेजना और बेचैनी के उस मोड़ पर थी जहाँ सुध-बुध पूरी तरह खो जाती है।

मालती की इस बेकाबू तड़प को भाँपते हुए, राजू ने अपनी कमर को सीट पर थोड़ा आगे खिसकाया। उसने जींस की ज़िप को बेहद खामोशी से नीचे सरकाया, जिससे उसका वह कड़ा और सुलगता हुआ पौरुष बाहर आ गया। राजू ने मालती के कांपते हुए हाथ को पकड़ा और उसे सही जगह का रास्ता दिखाते हुए, अपने उस तने हुए अंग को उसकी कोमल हथेलियों के बीच थमा दिया।

जैसे ही मालती की उंगलियों का स्पर्श राजू के उस गर्म और कड़े पौरुष से हुआ, उसके पूरे बदन में एक तीव्र करंट दौड़ गया। शुरुआत में वह थोड़ी झिझकी, पर अगले ही पल उसने अपनी उंगलियों का कसाव उस पर मजबूत कर लिया और बेहद सधे हुए अंदाज़ में उसे ऊपर-नीचे सहलाना शुरू कर दिया।

हॉल के भीतर कोई और उनके इस गुप्त खेल को न देख सके, इसके लिए मालती ने बड़ी चतुराई से काम लिया था। उसने अपने शरीर पर पड़े स्कार्फ को इस तरह फैलाया कि उसने अपने और राजू के हाथों की उस बढ़ती चाहत और इस कामुक खेल को पूरी तरह से ढक लिया। दुपट्टे के उस मखमली ओट के पीछे, अंधेरे का फायदा उठाते हुए, दोनों की हथेलियाँ एक-दूसरे के सबसे संवेदनशील हिस्सों को मथने में जुटी हुई थीं।

पर्दे पर नायक और नायिका के बीच का वह कलात्मक महा-मिलन अब अपने अंतिम मुकाम की ओर बढ़ रहा था, और ठीक उसी के समानांतर, दुपट्टे के नीचे छुपा मालती और राजू का यह आदिम और बेबाक खेल मर्यादा की हर सरहद को पार करने के लिए पूरी तरह मचल चुका था।

सिनेमा हॉल के उस सबसे पिछले और अंधेरे कोने में जहाँ मालती और राजू दुपट्टे की ओट में अपने इस बेहद निजी और कामुक खेल में पूरी तरह डूबे हुए थे, वहीं नियति ने उनके पीछे एक ऐसा जाल बुन दिया था जिससे वे दोनों पूरी तरह बेखबर थे। आज लगता था कि इन दोनों का यह गुप्त प्यार हवेली की दहलीज से बाहर निकलकर सरेआम उजागर होने वाला था।

ठीक पीछे की एक सीट छोड़कर, अंधेरे का फायदा उठाते हुए कोई और नहीं, बल्कि राजू का छोटा भाई राजा बैठा हुआ था। राजा अपने कुछ दोस्तों के साथ फिल्म देखने आया था, लेकिन उसकी नज़रें शुरुआत से ही आगे की सीट पर बैठे इस जोड़े की अजीब हरकतों पर टिक गई थीं। हॉल के भीतर जब बड़े पर्दे की रोशनी अचानक थोड़ी तेज़ हुई, तो राजा की आँखें अचरज से फटी की फटी रह गईं।

सफेद शॉर्ट शर्ट और नीली जींस में बैठी वह लड़की कोई और नहीं बल्कि मालती थी, और उसके साथ इतनी घनिष्ठता में डूबा हुआ शख्स खुद उसका बड़ा भाई राजू था।

राजा ने देखा कि कैसे मालती ने अपने दुपट्टे से उन दोनों के बीच चल रही हलचल को ढक रखा था, लेकिन सीट के नीचे से राजू की जांघों का हिलना और मालती की भारी होती सांसों के साथ उसकी छाती का तेज़ी से ऊपर-नीचे होना सब कुछ बयां कर रहा था। राजा को यह साफ समझ आ गया कि दुपट्टे के उस मखमली ओट के पीछे मालती के हाथ इस वक्त राजू के पौरुष को थामे हुए हैं और राजू की उंगलियाँ मालती की जींस के भीतर कोई गहरा तूफान खड़ा कर रही हैं।

अपने ही सगे भाई और मालती को इस तरह समाज की परवाह किए बिना एडल्ट फिल्म के शो में इस हद तक जाते देख राजा के भीतर एक अजीब सा हड़कंप मच गया। एक तरफ भाई का यह बेबाक रूप था, तो दूसरी तरफ हवेली की वह कड़क मर्यादा, जिसे सुगना और लाली किसी भी कीमत पर बचाना चाहती थीं। राजा बिना हिले-डुले, अपनी साँसें रोके पीछे की सीट से इन दोनों की हर हरकत को एकटक निहार रहा था, और उसका दिमाग अब तेज़ी से दौड़ने लगा था कि इस बड़े राज के सामने आने के बाद बनारस की हवेली में कैसा भूचाल आने वाला है।

फिल्म में जैसे ही इंटरवल हुआ, हॉल की बत्तियां जल उठीं। रोशनी होते ही मालती ने हड़बड़ाहट में अपने दुपट्टे को थोड़ा और ऊपर खींचकर अपने चेहरे को ढकने की कोशिश की, ताकि कोई उसे पहचान न सके। राजू उसकी घबराहट को ताड़ गया और माहौल को सामान्य करने के लिए कुछ खाने-पीने का सामान लाने नीचे काउंटर की तरफ उतर गया।

राजू के जाते ही, पीछे की सीट से उठकर राजा दबे कदमों से मालती के ठीक बगल वाली खाली सीट पर आकर बैठ गया। मालती ने जैसे ही बगल में किसी की आहट महसूस की, उसने घबराकर अपनी नजरें घुमाईं। सामने राजा को मुस्कुराते हुए देख मालती के पैरों तले जमीन खिसक गई। वह अंदर तक हक्का-बक्का रह गई; उसे दूर-दूर तक उम्मीद नहीं थी कि इस अंधेरे में राजा उन पर नजर रखे हुए था।

दोनों के बीच का संवाद कुछ इस तरह आगे बढ़ा:

राजा (चेहरे पर एक शरारती और तीखी मुस्कान लाते हुए): "अरे दीदी! आप यहाँ? इस एडल्ट फिल्म के शो में?"

मालती (थूक गटकते हुए, आवाज में घबराहट छुपाने की नाकाम कोशिश के साथ): "रा... राजा? तुम यहाँ? अरे नहीं, वो... हम तो बस ऐसे ही सहेली के साथ आए थे। वो बाजार आई थी न, तो उसने कहा तो मैं भी आ गई।"

राजा (चारों तरफ खाली सीटों को देखते हुए व्यंग्य से): "अच्छा? सहेली के साथ? पर मुझे तो यहाँ आस-पास आपकी कोई सहेली नहीं दिख रही?"

मालती (माथे पर आए पसीने को पोंछते हुए, बात घुमाने के लहजे में): "हाँ, वो... वो अभी वाशरूम गई है। बस आती ही होगी। तुम यहाँ अपने दोस्तों के साथ आए हो क्या? घर पर मत बताना कि हम यहाँ... मतलब बाजार आए थे।"

राजा (मालती की नीली जींस और अभी-अभी सँभाले गए दुपट्टे की तरफ देखते हुए कड़े लहजे में): "दीदी, अब ज़्यादा बात मत घुमाइए। हम पीछे ही बैठे थे और दुपट्टे के नीचे जो खेल चल रहा था न, वो सब अपनी आँखों से देख चुके हैं। और जो 'सहेली' आपके लिए नीचे पॉपकॉर्न लाने गई है, वो कोई और नहीं, हमारे बड़े भैया राजू हैं।"

राजा के इस सीधे प्रहार से मालती की जुबान पूरी तरह सिल गई। उसकी चोरी पकड़ी जा चुकी थी और अब उसके पास मुकरने का कोई रास्ता नहीं बचा था। वह थर-थर कांपते हुए राजा का मुंह ताकने लगी, क्योंकि वह जानती थी कि अगर यह बात हवेली तक पहुँची, तो सुगना और लाली के गुस्से का सामना करना उसके लिए नामुमकिन हो जाएगा।

राजा ने आखिरकार वह आखिरी बम भी फोड़ दिया। वह मालती के और करीब खिसका और बेहद धीमी मगर तीखी आवाज़ में बोला, "दीदी, आप भैया के साथ मिलकर यह सब कर रही हैं? आप दोनों घर में तो भाई-बहन जैसे रहते हैं, पर यहाँ... सच में, आपसे यह उम्मीद नहीं थी।"

राजा के मुँह से यह अकाट्य सच सुनते ही मालती का पूरा वजूद काँप उठा। उसका चेहरा सफेद पड़ गया और आँखों में डर के आँसू तैरने लगे। वह पूरी तरह घबरा गई और उसने बिना सोचे-समझे सिनेमा हॉल की उस धुंधली रोशनी में राजा के सामने अपने दोनों हाथ जोड़ दिए। वह गिड़गिड़ाते हुए मद्धम आवाज़ में मिन्नत करने लगी, "राजा... बाबू, तुम्हारे पैर छूती हूँ, यह बात घर में किसी से मत बताना। सुगना मम्मा और लाली मौसी जान जाएँगी तो मैं जीते जी मर जाऊँगी। प्लीज राजा, मेरी इज़्ज़त तुम्हारे हाथ में है।"

मालती को इस तरह बेबस और हाथ जोड़े देख राजा के चेहरे पर एक कुटिल और शातिर मुस्कान तैर गई। उसकी आँखें मालती के चेहरे से फिसलकर उसकी सफेद शॉर्ट शर्ट के भीतर उभरी हुई उसकी सुगठित चुचियों और जींस में कसे उसके गदराए बदन पर घूमने लगीं। मालती की घबराहट और उसकी तरुणाई का यह मादक रूप देखकर राजा के मन में भी एक अजीब सी हलचल मचने लगी थी। उसने मालती के बदन के उतार-चढ़ाव को अपनी प्यासी निगाहों से ऊपर से नीचे तक पूरा नापा।

अपनी कुटिल मुस्कान को बरकरार रखते हुए उसने मालती को राहत देते हुए कहा, "ठीक है दीदी, आप इतना डरिए मत। मैं घर में किसी से कुछ नहीं कहूँगा।"

मालती ने राहत की एक गहरी सांस ली ही थी कि राजा अपनी सीट से उठा और जाने के लिए मुड़ते हुए बेहद शातिर अंदाज़ में फुसफुसाकर एक नई शर्त रख गया, "ठीक है, मैं किसी को नहीं बताऊंगा... पर एक बात याद रखिएगा, आप भी भैया को मत बताइएगा कि मुझे सब पता चल चुका है।"

यह कहते ही राजा एक रहस्यमयी मुस्कान के साथ अंधेरे गलियारे की तरफ बढ़कर दूसरी तरफ चला गया। मालती वहीं सीट पर जड़ होकर रह गई। राजा के जाने से उसका एक डर तो कम हुआ था, लेकिन उसकी आँखों में छिपी वह भूखी निगाह और उसकी आखिरी बात मालती के भीतर एक नया खौफ पैदा कर गई थी। उसे समझ आ गया था कि राजा ने यह राज सिर्फ छुपाया नहीं है, बल्कि उसने अपने फायदे के लिए इस बड़े राज पर अपना हक जता दिया है।

मालती का दिल अभी भी सीने में हथौड़े की तरह थिरक रहा था। राजा की वह कुटिल मुस्कान और उसकी भूखी निगाहें मालती के दिमाग में किसी खौफनाक मंज़र की तरह घूम रही थीं। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह इस आने वाले तूफान से खुद को और राजू को कैसे बचाए।

कुछ ही देर में, इंटरवल खत्म होने का हूटर बजा और राजू दोनों हाथों में पॉपकॉर्न के पैकेट और कोल्ड ड्रिंक के गिलास संभाले मुस्कुराता हुआ अपनी सीट की तरफ वापस लौट आया। उसने बड़े उत्साह से पॉपकॉर्न का पैकेट मालती की तरफ बढ़ाया, "लो मालती, एकदम गरमा-गरम है। अब आराम से बैठ कर बाकी फिल्म देखी जाए।"

लेकिन जैसे ही राजू की नज़र मालती के चेहरे पर पड़ी, उसकी मुस्कान हवा हो गई। मालती के चेहरे पर हवाइयाँ उड़ रही थीं, माथे पर पसीने की बारीक बूंदें चमक रही थीं और वह शून्य में एकटक निहार रही थी।

राजू ने पॉपकॉर्न साइड में रखा और मालती का कांपता हुआ हाथ थामकर फिक्रमंद लहजे में पूछा, "क्या हुआ मालती? तुम्हारा चेहरा एकदम सफेद क्यों पड़ गया है? तबीयत तो ठीक है न? अचानक इतना क्यों घबरा रही हो?"

राजू का यह अपनापन और चिंता देखकर मालती की आँखों में आँसू आने को हुए, पर उसे तुरंत राजा की आखिरी चेतावनी याद आ गई—'भैया को मत बताइएगा।' उसने बहुत मुश्किल से खुद को संभाला, ज़बरदस्ती अपने होठों पर एक झूठी मुस्कान लाई और बात को टालते हुए बोली:

"अरे... नहीं राजू, ऐसी कोई बात नहीं है। वो... बस अचानक एसी की ठंडी हवा से थोड़ा जी मिचलाने लगा था। और कुछ नहीं... तुम चिंता मत करो, अब मैं ठीक हूँ। चलो, फिल्म शुरू हो गई है, फिल्म देखी जाए।"

भले ही मालती ने बात को रफा-दफा कर दिया और अपनी नज़रें दोबारा बड़े पर्दे पर टिका दीं, लेकिन अब न तो उसका ध्यान फिल्म के किसी दृश्य पर था और न ही राजू के बढ़ते स्पर्श पर। दुपट्टे के नीचे राजू ने जब दोबारा उसका हाथ थामा, तो मालती का बदन एक अनजाने खौफ से सिहर उठा। उसे रह-रहकर यही लग रहा था कि पीछे की किसी सीट से राजा की वही शातिर आँखें इस वक्त भी उसके जिस्म को चीर रही हैं। हवेली का जो राज अब तक सिर्फ उन दोनों के बीच था, वह अब एक तीसरे और खतरनाक खिलाड़ी के हाथ लग चुका था।

पर्दे पर फिल्म की कहानी एक बार फिर अपने पूरे रोमांच पर आ चुकी थी। हॉल के भीतर छाए उस गहरे धुंधलके में राजू ने एक बार फिर माहौल को रूमानी बनाने की कोशिश की। उसने मालती की नीली जींस पर टिके अपने हाथ को धीरे से आगे बढ़ाया और उसकी जाँघों के बीच उस कामुक हलचल को दोबारा जगाने के लिए उंगलियों का दबाव बढ़ाना चाहाq।

पर इस बार मालती का मन वहाँ बिल्कुल नहीं था। उसके भीतर का सारा रोमांच अब एक खौफनाक डर में बदल चुका था। राजा की वे कुटिल आँखें और उसकी चेतावनी मालती के दिमाग में इस कदर हावी थीं कि राजू का वही स्पर्श, जो कुछ देर पहले उसे परम सुख दे रहा था, अब उसे अंदर से डरा रहा था।

जैसे ही राजू ने उसकी शर्ट के निचले हिस्से की तरफ हाथ बढ़ाना चाहा, मालती ने तुरंत अपनी ठंडी पड़ चुकी हथेलियों से राजू के मजबूत हाथ को बीच में ही कसकर रोक लिया।

राजू ने अचरज से मालती की तरफ देखा। मालती के चेहरे पर छाई हवाइयाँ और उसकी कांपती सांसें साफ़ बता रही थीं कि वह यहाँ एक पल भी और नहीं रुकना चाहती। मालती ने राजू के करीब अपना मुँह ले जाकर बेहद धीमी और घबराई हुई आवाज़ में ज़िद करते हुए कहा, "राजू... प्लीज, अब मेरा यहाँ मन नहीं लग रहा है। जी बहुत घबरा रहा है... चलो यहाँ से बाहर निकलो, मेरी बात मानो।"

राजू को मालती की यह अचानक बदली हुई हालत समझ नहीं आई, लेकिन उसकी आँखों में सच्चा डर देखकर उसने आगे कोई ज़िद नहीं की। उसने मालती का हाथ थामा, पॉपकॉर्न का पैकेट वहीं सीट पर छोड़ा और दोनों चुपके से उस अंधेरे केबिन से बाहर निकलकर सिनेमा हॉल के मुख्य निकास द्वार की तरफ बढ़ गए।

हॉल से बाहर निकलते ही बनारस की धूप और खुली हवा उनके चेहरों पर पड़ी। मालती ने राहत की एक गहरी सांस ली और अपने चेहरे पर दुपट्टे का पर्दा और मजबूत कर लिया। राजू अभी भी उसे उलझन भरी नज़रों से देख रहा था, वहीं मालती मन ही मन बस यही दुआ कर रही थी कि राजा के हाथ में लगा यह खतरनाक राज जल्द से जल्द इसी धूप में पिघल जाए, नहीं तो हवेली की मर्यादा का बिखरना अब तय था।

 
भाग - 212

हॉल से बाहर निकलते ही बनारस की धूप और खुली हवा उनके चेहरों पर पड़ी। मालती ने राहत की एक गहरी सांस ली और अपने चेहरे पर दुपट्टे का पर्दा और मजबूत कर लिया। राजू अभी भी उसे उलझन भरी नज़रों से देख रहा था, वहीं मालती मन ही मन बस यही दुआ कर रही थी कि राजा के हाथ में लगा यह खतरनाक राज जल्द से जल्द इसी धूप में पिघल जाए, नहीं तो हवेली की मर्यादा का बिखरना अब तय था।


अब आगे..

मालती घर पहुंची और अपने कमरे में घबराई हुई बिस्तर पर लेटी थी, उसे एक पल के लिए भी चैन नहीं मिल रहा था। कमरे के सन्नाटे में घड़ी की टिक-टिक की आवाज़ भी उसे किसी बड़े खतरे की दस्तक जैसी लग रही थी। वह बार-बार करवटें बदल रही थी, लेकिन जैसे ही वह अपनी आँखें बंद करती, उसे सिनेमा हॉल का वह पूरा मंज़र याद आ जाता।

राजू के साथ बिताए वे कामुक पल अब एक तरफ छूट चुके थे और उनकी जगह राजा के उस अचानक सामने आने के खौफ ने ले ली थी। मालती को बार-बार राजा का वह शातिर चेहरा, उसकी वह कुटिल मुस्कान और सबसे ज़्यादा उसकी वे नशीली और भूखी आँखें याद आ रही थीं। उसे रह-रहकर यही लग रहा था कि राजा की वे निगाहें अभी भी अंधेरे में से उसके जिस्म को चीर रही हैं।

उसने डर के मारे चादर को अपने गले तक खींच लिया। राजा ने भले ही सिनेमा हॉल में राजू के सामने राज न खोलने का वादा किया था और वहाँ से चला गया था, पर जाते-जाते उसने जो शर्त रखी थी—"आप भी भैया को मत बताइएगा कि मुझे सब पता चल चुका है"—वह मालती के कानों में किसी ज़हरीले नाग की फुसकार की तरह गूँज रही थी।

मालती अच्छी तरह समझ चुकी थी कि राजा की उन नशीली आँखों में सिर्फ एक राज़ छुपाने की तसल्ली नहीं थी, बल्कि उसमें एक गहरी वासना और ब्लैकमेल करने का इरादा साफ़ झलक रहा था। वह इस बात से भी घबरा रही थी कि उसने राजू से यह इतनी बड़ी बात छुपा कर रखी है।

इधर मालती का दिल धक-धक कर रहा था उधर कमरे के बाहर हवेली में रात के भोजन के बाद, हवेली की रसोई में बर्तनों की खनक गूँज रही थी। सुगना, लाली और सोनी तीनों मिलकर रात के जूठे बर्तन समेटने और रसोई को साफ करने में जुटी हुई थीं। काम के सिलसिले में जब सोनी बार-बार नीचे झुक रही थी, तो उसकी साड़ी का पल्लू सरक जाता और कमर का हिस्सा अपनी झलक दिखा जाता था।

तभी बर्तनों को रैक पर रखते हुए लाली की पैनी नज़र सोनी की गोरी गर्दन और उसकी पतली कमर के निचले हिस्से पर ठहर गई। वहाँ की मखमली त्वचा पर गहरे नीले और लाल रंग के कुछ अजीब से दाग उभर रहे थे। लाली ने थोड़ा और गौर से देखा तो उसे साफ समझ आ गया कि वे दाँतों और उंगलियों के गहरे दबाव से बने तीखे निशान थे।

अपनी उत्सुकता को रोक न पाने के कारण, लाली बर्तन धोना छोड़कर सीधे सोनी के करीब आई और कौतूहल भरे लहजे में पूछ बैठी, "अरे सोनी! ज़रा इधर तो मुड़ना। तुम्हारी गर्दन और कमर के पास यह लाल-नीले दाग कैसे पड़े हैं?

लाली का यह अचानक किया गया सवाल सुनते ही सोनी के हाथ से स्टील की थाली छूटते-छूटते बची। उसका पूरा बदन घबराहट से सिहर उठा। उसे अच्छी तरह याद आया कि जब सूरज कामुकता से पूरी तरह अंधा हो चुका था, तब उसने दीवानगी में सोनी की गर्दन को अपने दाँतों से बेरहमी से भींच लिया था और उसकी कमर को अपनी मजबूत उंगलियों से कसकर जकड़ रखा था। यह उसी उग्र और कामुक मिलन के गहरे निशान थे।

सोनी ने हड़बड़ाहट में अपनी साड़ी के पल्लू को ठीक करते हुए बात को संभालने की कोशिश की, "अरे... नहीं लाली दीदी, वो... वो तो बस पहाड़ों पर चढ़ते समय एक जगह मेरा पैर फिसल गया था, तो कमर के बल सूखी लकड़ियों पर गिर गई थी। ये उसी की खरोंच और मोच के निशान हैं।"

सोनी भले ही लाली को चोट की झूठी कहानी सुनाकर गुमराह कर रही थी, लेकिन पास ही खड़ी सुगना इस पूरे दृश्य को बड़े गौर से देख रही थी। सुगना भली-भाँति जानती थी कि ये किसी चोट के निशान नहीं हैं। यह तो निश्चित ही किसी मर्द के बेकाबू पौरुष, तीखे चुंबनों और कामुक मिलन के वो मादक निशान थे, जो एक औरत के बदन पर चरम सुख की तड़प के दौरान छप जाते हैं।

सुगना मन ही मन सोचने लगी कि विकास ने नैनीताल की वादियों में सोनी को किस कदर अपनी बाहों में मथा होगा कि उसके बदन पर आज भी वह दीवानगी साफ़ दिखाई दे रही है।

सुगना ने माहौल की गंभीरता और सोनी की घबराहट को ताड़ते हुए लाली को टोकते हुए कहा, "अरे लाली, तुम भी न... बस बात का बतंगड़ बनाने लगती हो। पहाड़ों की चढ़ाई में ऐसी छोटी-मोटी खरोंच लग ही जाती है। अब तुम सोनी को छेड़ना बंद करो और जल्दी से ये बर्तन समेटो, रात बहुत हो चुकी है।"

सुगना के बीच में आते ही लाली ने अपनी बात वहीं रोक दी, और सोनी ने राहत की एक बहुत गहरी सांस ली। वह चुपचाप अपना मुँह फेरकर बर्तन धोने लगी, लेकिन उसका दिल अभी भी ज़ोरों से धड़क रहा था। सुगना जहाँ इस निशान को विकास की दीवानगी का प्रतीक मानकर शांत हो गई थीं, वहीं सोनी का बदन इस बात को सोचकर अंदर तक काँप रहा था कि अगर इन दोनों को ज़रा भी भनक लग गई कि उसकी गर्दन और कमर को इस कदर नोचने वाला कोई और नहीं, बल्कि इसी हवेली का जवान बेटा सूरज है, तो इस रसोई से लेकर पूरी हवेली तक में मर्यादा का ऐसा खून बहेगा जिसकी भरपाई कोई नहीं कर पाएगा।

सुगना ने सोनी के थके हुए चेहरे और आँखों की नीली छटा को देखा, जिसमें नैनीताल के लंबे सफर और रात के उस उग्र समागम की थकान साफ झलक रही थी। सुगना ने बड़े लाड़ से सोनी के दोनों कंधे पकड़े और मुस्कुराते हुए बोली, "सोनी, अब तू यहाँ एक पल भी मत रुक। इतना लंबा सफर करके आ रही है, शरीर टूट रहा होगा तेरा। जा, अपने कमरे में जाकर आराम कर, बाकी का काम मैं और लाली निपटा लेंगे।"

अपनी बड़ी बहन का यह निश्छल और अगाध प्यार देखकर सोनी का अंतर्मन अंदर तक भीग गया। उसके दिल में एक अजीब सी कसक उठी कि जो दीदी उस पर इतना विश्वास करती हैं, वह उन्हीं की पीठ पीछे उनके ही बेटे के पौरुष का रस चख कर आई है। सोनी ने सुगना का हाथ थामते हुए भावुक लहजे में कहा, "नहीं दीदी, ऐसा कैसे हो सकता है? आप दोनों यहाँ काम करेंगी और मैं जाकर सो जाऊँगी? चलिए, हम सब साथ में ही मिलकर जल्दी-जल्दी हाथ बंटा लेते हैं, फिर साथ में ही चलेंगे।"

परंतु सुगना कहाँ मानने वाली थी। उसने सोनी की एक न सुनी और बड़ी बहन वाले अधिकार से मुस्कुराते हुए सोनी के दोनों हाथ पकड़े और उसे पीछे से ज़बरदस्ती ढकेलते हुए रसोई के दरवाज़े से बाहर कर दिया। बाहर करते हुए वह कड़क मगर मीठी आवाज़ में बोली, "अरे! ज़्यादा बहस मत कर। हम बोल रहे हैं न कि जा और आराम कर। तू सचमुच बहुत थक गई है, तेरी आँखें बंद हो रही हैं। अब एक शब्द भी मत बोलना, सीधे अपने कमरे की राह पकड़!"

अपनी दीदी की इस ममताभरी ज़िद के आगे आखिरकार सोनी को झुकना ही पड़ा। वह एक धीमी मुस्कान के साथ मुड़ी और दबे कदमों से अपने कमरे की तरफ बढ़ गई।

उधर रसोई में अब सिर्फ सुगना और लाली बची थीं। सोनी के जाते ही रसोई का माहौल अचानक बदल गया। सुगना ने सिंक में पड़े आखिरी पीतल के लोटे को उठाया और मांजते हुए गहरी सोच में डूब गई। लाली जो कब से सुगना के चेहरे के बदलते भावों को ताड़ रही थी, वह अपनी आदत के मुताबिक चुप नहीं रह सकी। वह दबे पांव सुगना के एकदम करीब आकर खड़ी हो गई। चूल्हे की मद्धम राख को समेटते हुए लाली ने सुगना की तरफ देखा और दबी ज़बान में पूछा, "का हो सुगना? तुम तो सोनी को ऐसे बाहर भेज दी जैसे सचमुच उसे कोई भारी मोच आई हो। पर तुम्हारी आँखें कुछ और कह रही हैं। सच-सच बताओ, तुम्हें क्या लगता है? सोनी की गर्दन और कमर पर वे दाग सचमुच सूखी लकड़ियों के ही थे क्या?"

सुगना ने लोटे को पानी से धोकर रैक पर रखा और अपने आंचल से हाथ पोंछते हुए लाली की आँखों में झाँका। उसके चेहरे पर एक अनुभवी औरत की मादक और समझदार मुस्कान तैर गई। सुगना ने चारों तरफ देखते हुए आवाज़ को एकदम धीमा किया और फुसफुसाकर बोली, "अरे लाली! तू अभी भी बच्ची ही है क्या? झाड़ियों वाली बात कहकर सोनी सिर्फ बात को घुमा रही है, और तू उसकी बातों में आ गई! मैं कोई नादान नहीं हूँ, मैंने दुनिया देखी है। वे निशान किसी लकड़ी या कीड़े के काटने के नहीं हैं, बल्कि वे निश्चित रूप से किसी मर्द के बेकाबू पौरुष और कामुक मिलन के गहरे निशान हैं!"

सुगना की यह बेबाक बात सुनकर लाली की आँखें अचरज से फटी की फटी रह गईं। सुगना ने आगे कहा, "सोनी भले हमसे छुपाए, पर वो निशान साफ चिल्ला-चिल्ला कर कह रहे हैं कि नैनीताल की उन ठंडी वादियों में विकास ने उसे किस कदर अपनी बाहों में मथा है। दांतों के वो तीखे कट और कमर पर उंगलियों की वो पकड़... हुंह! साफ पता चल रहा है कि दोनों के बीच कितना उग्र और मादक समागम हुआ है।"

पर विकास के साथ तो सोनी सालों से है मैने तो आज तक ऐसे निशान कभी न देखे…लाली ने अपना संशय जाहिर करते हुए कहा..

सुगना ने लाली की तरफ आश्चर्य से देखा और बोला तू कहना क्या चाहती है?

लाली ने सुगना के और करीब सटते हुए बेहद शरारती और उत्सुक लहजे में पूछा, "सच में सुगना? क्या सचमुच विकास ने सोनी को इस कदर बेकाबू होकर प्यार किया है? वैसे, पहाड़ों की ठंडी हवाओं में तो बड़े-बड़ों का सब्र डगमगा जाता है पर विकास ऐसा हैं तो नहीं। ?"

सुगना ने एक गहरी और मादक सांस ली, मानो उसके ज़ेहन में भी बंद कमरों की पुरानी यादें ताज़ा हो गई हों। उसने लाली की तरफ देखा और मुस्कुराते हुए बोली, "अरे लाली, एक औरत जब चरम सुख की तड़प में होती है, तो उसका बदन खुद गवाही देता है। सोनी भले ही अपनी साड़ी के पल्लू से उन निशानों को छुपा रही थी, पर उसकी आँखों की वो चमकीली तृप्ति और चेहरे का वो गुलाबी निखार साफ बता रहा था कि उसे उन वादियों में वो सुख मिला है जो बनारस की मर्यादा में कभी नहीं मिल सकता। विकास जी ने सचमुच इस बार कोई कसर नहीं छोड़ी होगी।"

लाली सुगना की बातें सुनकर अंदर ही अंदर सिहर उठी। रसोई की उस मद्धम रोशनी में दोनों औरतें सोनी और विकास के उस काल्पनिक समागम की उग्रता को सोचकर खुद भी एक अजीब सी सिहरन महसूस कर रही थीं। लाली ने धीरे से कहा, "तब तो सुगना, संतान सप्तमी का यह व्रत सचमुच सफल हो गया। जब मिलन इतना गहरा और उग्र हुआ है, तो निश्चित ही हवेली को जल्द ही कोई बड़ी खुशखबरी सुनने को मिलेगी।"

सुगना ने हामी में सिर हिलाया, "हाँ लाली, बस यही आस है। चलो, अब ये बत्तियाँ बुझाओ और सोने चलो, सुबह जल्दी उठकर बाकी के काम भी देखने हैं।"

लाली में जो संदेह जाहिर किया था अब वह सुगना के मन में भी बारंबार घूम रहा था सचमुच विकास तो पहले कभी ऐसे ना थे?

रसोई की बत्तियां बुझाकर जब दोनों सहेलियां गलियारे की तरफ बढ़ीं, तो लाली के मन में एक अजीब सी शरारत और छटपटाहट हिलोरे मारने लगी। उसे रह-रहकर दोपहर का वह नज़ारा याद आ रहा था, जब वह सुगना की मालिश कर रही थी। उस वक्त सुगना की साड़ी के खिसके हुए मुहाने से उसकी गोरी, सुगठित जाँघों के बीच छुपे उस मखमली 'मालपुए' की जो एक हल्की सी, अधूरी झलक लाली को मिली थी, वह दृश्य उसके दिमाग से हट नहीं रहा था। लाली के भीतर उस गुप्त खजाने को और करीब से महसूस करने और उसे एक बार खुलकर देखने की बेचैनी इस शांत रात में और गहरी हो गई थी।

अपनी धड़कनों को संभालते हुए, लाली ने थोड़ी हिम्मत बटोरी और सुगना का हाथ पकड़कर रुकते हुए, अपनी पूरी चाहत को अपनी माटी की बोली, यानी भोजपुरी में सुगना के सामने उड़ेल दिया।

लाली ने सुगना के चेहरे के करीब अपना मुंह ले जाते हुए धीमे और मादक लहजे में कहा:

"अरे सुगना! सुनऽ नऽ, आजु न जाने काहे रातिया में अकेले मन बहुते घबरात बा। कवनो अजीब सा बेचैनी लागत बा जियरा में... चलऽ नऽ आजु हमार साथे, हमरहीं कमरे में सुतल जाओ।"

लाली की आवाज़ में छिपी वह मिन्नत और उसकी आँखों की चमक साफ़ बता रही थी कि वह सिर्फ सोने की बात नहीं कर रही थी, बल्कि उस बंद कमरे के एकांत में अपनी अधूरी रह गई उत्सुकता को पूरा करने का बहाना ढूंढ रही थी। सुगना ने अंधेरे में लाली की तरफ देखा, उसकी इस अचानक उठी ज़िद पर वह थोड़ी हैरान तो हुई, पर अपनी सहेली के इस बदले और मचलते हुए अंदाज़ को वह तुरंत पूरी तरह समझ नहीं पाई और हड़बड़ी में हां कर बैठी।

लाली बेहद खुश हो गई और वह सुगना का हाथ पकड़ कर अपने कमरे तक ले आई।

लाली के कमरे का दरवाज़ा बंद होते ही बाहर की दुनिया जैसे पूरी तरह थम गई। कमरे में फैली मद्धम रोशनी और खिड़की से आती रात की खामोश हवा ने एक अलग ही माहौल बना दिया था। दोनों सहेलिया बिस्तर पर एक-दूसरे के करीब लेट गईं। शुरुआत में तो दोनों साधारण तौर पर पुरानी यादों और हवेली के बीते दिनों की बातें करती रहीं, लेकिन आज लाली पूरे मूड में थी। उसके मन में जो शरारत और बेचैनी रसोई से ही सुलग रही थी, उसे बाहर निकालने के लिए उसने बातों का रुख धीरे-धीरे उस दौर की तरफ मोड़ना शुरू किया, जहाँ मर्यादा की सीमाएं धुंधली पड़ जाती थीं।

लाली ने करवट बदली, अपना हाथ सुगना के कंधे पर रखा और मुस्कुराते हुए बेहद दबी और मादक आवाज़ में पुरानी यादों का वो पन्ना खोला जिसके बारे में अमूमन पहले खुलकर बात करती थीं पर पिछले कई वर्षों से (सरयू सिंह की मृत्यु के पश्चात) इन कामुक बातों पर विराम लग चुका था।। उसने सुगना की आँखों में शरारत से देखते हुए कहा, "सुगना, याद बा तोके वो पुरानका घर? तू आज भले हवेली की मर्यादा के एतना बड़ा पहरेदार बनल बाड़ू, पर हम भुलाएल नहीं बानी कि कैसे तू हमरा और सोनू के बीच के उ कुल काम चुपके से देखत रहलू।"

लाली की यह बात सुनते ही सुगना का बदन जैसे अचानक जागृत हो गया उसका दिमाग सचेत हो गया। उसकी आँखों के सामने बरसों पुराना वह मंज़र तैर गया अपने भाई सोनू और लाली के बीच बेबाक संभोग को उसने एक नहीं कई बार देखा था।


पुरानी रातों और उस आदिम खेल की बातें छेड़कर लाली दरअसल सुगना के भीतर सोई हुई उस पुरानी प्यास को जगाना चाहती थी, ताकि वह उस बहाने सुगना के उन गुप्त हिस्सों तक पहुँच सके जिन्हें देखने के लिए वह तड़प रही थी। सुगना की आंखों के सामने अपने छोटे भाई सोनू का वह मजबूत लंड घूम गया जिसने उसके जीवन में कामुकता के नए आयाम स्थापित किए थे। सुगना को न जाने क्यों आज सोनू को उस रूप में याद करना पाप नहीं लग रहा था। उसका बदन जैसे कामुकता में बहा जा रहा था और उसका मालपुआ उसकी आर्द्रता में फूला जा रहा था। लाली सुगना के और करीब आती जा रही थी…

आखिर जब लाली की उंगलियों ने सुगना मालपुए को छुआ सुगना सचेत हुए और उसने लाली का हाथ पकड़ लिया..

उधर हवेली के दूसरे छोर पर बने अपने कमरे में, सूरज बिस्तर पर लेटा हुआ करवटें बदल रहा था। कमरे की खिड़की से आती रात की ठंडी हवा उसके चेहरे से टकरा रही थी, लेकिन उसके भीतर की तपन कम होने का नाम नहीं ले रही थी। पूरी हवेली गहरी नींद में सो चुकी थी, पर सूरज की आँखों से नींद कोसों दूर थी। उसके दिमाग में लगातार नैनी पीक की उस बर्फीली शाम के नज़ारे किसी ज्वलंत चलचित्र की तरह घूम रहे थे।

सूरज ने अपने हाथ अपनी छाती पर रखे और अपनी आँखें मूँद लीं। बंद आँखों के पीछे उसे सिर्फ सोनी का वह रूप दिखाई दे रहा था—जब पहाड़ों की उस ठंडी और धुंधली वादियों में, खुले आसमान के नीचे उसने सोनी के बदन से कपड़ों की सरहद को पूरी तरह हटा दिया था। उस कड़ाके की ठंड में सोनी का वह गोरा, कँपकँपाता हुआ बदन और उसकी साँसों की तेज़ रफ़्तार सूरज के पौरुष को आज भी पूरी तरह जाग्रत कर रही थी।

उसे रह-रहकर याद आ रहा था कि कैसे उसने दीवानगी में अंधा होकर सोनी को पीछे से अपनी मजबूत बाहों में भींच लिया था। जब उसने सोनी की मखमली गर्दन पर अपने दाँतों का तीखा दबाव बनाया था, तो सोनी के मुँह से निकली वह मद्धम सिसकारी उस सूने पहाड़ की हवा में विलीन हो गई थी। उसकी उंगलियों ने जिस बेरहमी और हक से सोनी की पतली कमर को जकड़ा था, वह अहसास सूरज की हथेलियों में अब भी ताज़ा था।

बिस्तर पर लेटे-लेटे सूरज ने अपनी मुट्ठियाँ भींच लीं। वह सोच रहा था कि इस वक्त सोनी अपने कमरे में विकास के बगल में लेटी होगी। यह विचार उसके भीतर एक अजीब सी ईर्ष्या और बेचैनी पैदा कर रहा था। पर साथ ही उसे इस बात का भी पूरा गुमान था कि भले ही दुनिया की नज़रों में सोनी विकास की पत्नी हो, लेकिन नैनी पीक की उस चोटी पर सोनी के रोम-रोम को मथने वाला और उसके बदन पर अपनी मर्दानगी के गहरे नीले-लाल निशान छोड़ने वाला कोई और नहीं, बल्कि वह खुद था।

उसने करवट बदली और तकिए को कसकर पकड़ लिया। माँ सुगना और मौसी लाली की बनाई मर्यादा की दीवारें इस हवेली में चाहे कितनी भी ऊँची क्यों न हों, सूरज जान चुका था कि उसने सोनी के भीतर की काम-अग्नि को उस मुकाम तक सुलगा दिया है, जहाँ से वापस लौटने का कोई रास्ता नहीं था। वह बस इसी फिराक में था कि कब दोबारा उसे हवेली के किसी अंधेरे कोने में सोनी का वह गदराया बदन और उसकी प्यासी आँखें अपने करीब मिलें।

उध‍र लखनऊ की उस शांत दोपहर में, पिंकी के कमरे का माहौल पूरी तरह से मादक और बेचैन करने वाला हो चुका था। युवा पिंकी जब से अपने माता-पिता की अनुपस्थिति में हॉलिवुड की प्रसिद्ध फिल्म 'द ब्लू लैगून' (The Blue Lagoon) के वे बेहद कलात्मक और अंतरंग दृश्यों को देख चुकी थी, तब से उसके भीतर की सोई हुई तरुणाई पूरी तरह से बगावत पर उतर आई थी। फिल्म में नायक और नायिका का वह बेबाक, उन्मुक्त और आदिम शारीरिक मिलन पिंकी के दिमाग में इस कदर छप गया था कि उसकी रातों की नींद और दिन का चैन गायब हो चुका था। अब आलम यह था कि टीवी पर जब भी कोई रोमांटिक गाना आता, या किसी युवा जोड़े को एक-दूसरे के आलिंगन में बंधते और कोमल होठों से निकट आते हुए देखती, पिंकी के बदन में बिजली का एक करंट दौड़ जाता। उन दृश्यों को देखते ही उसकी सुगठित जाँघों के बीच एक अजीब सी, मीठी मगर असहनीय कसक उठने लगती थी।

उस कसक के उठते ही, पिंकी के बदन का तापमान बढ़ने लगता और उसकी जाँघों के जोड़ आपस में भींच जाते। उसकी वह कोमल और संवेदनशील 'पिंक मुनिया' अब रोज़ अपने ही भीतर सुलगती काम-अग्नि की तड़प में, अपने गुलाबी और नाजुक होठों से काम-रस के गाढ़े आँसू बहाने लगती थी। उस मखमली हिस्से से रिसने वाला वह चिपचिपा और गर्म पानी पिंकी की जाँघों के बीच की गर्माहट को और बढ़ा देता था। पिंकी बिस्तर पर लेटे हुए अपनी आँखें बंद कर लेती और अपनी ही हथेलियों को अनजाने में अपनी जाँघों के मुहाने पर टिका देती।

बेचारी मासूम पिंकी को भला इस बात का कहाँ अंदाज़ा था कि उसके भीतर सुलग चुकी यह आदिम आग ऐसे नहीं बुझाने वाली थी; सिर्फ टीवी के दृश्यों को देखने या करवटें बदलने से यह शांत होने वाली नहीं थी। यह तो जवानी की वह तीखी और बेबाक प्यास थी, जो एक बार भड़क जाए तो बदन के रोम-रोम को झुलसा कर ही दम लेती है। बिस्तर के ठंडे एकांत में लेटी पिंकी जब भी अपनी आँखें मूँदती, उसकी उंगलियाँ खुद-ब-खुद उसकी नाइटी के महीन कपड़े को पार करती हुई उसकी जाँघों के उस सुलगते हुए मुहाने की तरफ बढ़ने लगतीं। जैसे ही उसकी अपनी कोमल उंगलियों का स्पर्श उस गीली और काम-रस से भीगी हुई गहराई के नाजुक होठों से होता, पिंकी के मुंह से एक मद्धम सिसकारी निकल जाती। वह अपनी ही उंगलियों के धीमे घर्षण से उस असहनीय कसक को दबाने का प्रयास करती, लेकिन यह आत्म-सुख उसकी प्यास को बुझाने के बजाय उसे और भड़का देता था।

उसकी सुगठित छाती तेज़ी से ऊपर-नीचे हो रही थी और माठे पर पसीने की बारीक बूंदें चमकने लगी थीं। उसे साफ़ अहसास होने लगा था कि उंगलियों का यह हल्का सहारा उस भीषण ज्वार के सामने कुछ भी नहीं था। पिंकी को अब शिद्दत से इस बात की कमी खल रही थी कि काश कोई मजबूत, कड़ा और बेबाक पौरुष इस वक्त उसके पास होता, जो उसकी इन सुलगती जाँघों को अपने पूरे भार से भींच लेता और उसकी इस मखमली गहराई में उतरकर इस आग को हमेशा-हमेशा के लिए शांत कर देता।

पिंकी के दिमाग के बंद गलियारों में अब विचारों का एक ऐसा बवंडर उठ खड़ा हुआ था, जिसे संभाल पाना उसके बस में नहीं था। बिस्तर पर लेटे-लेटे जब वह अपनी आँखें मूँदती, तो अंधेरे पर्दे पर बार-बार दो अलग-अलग मगर बेहद कड़े और दमदार पुरुषों के चेहरे उभरने लगते। एक तरफ परमानंद का वह जाना-पहचाना चेहरा था, जिससे वह साक्षात मिल चुकी थी और जिनकी मौजूदगी का अहसास उसके ज़ेहन में अब भी ताज़ा था। वहीं दूसरी तरफ, अखबार के पन्नों से झांकता हुआ सूरज का वह बिंदास, बेबाक और गठीला मर्दाना चेहरा था, जिसने पिंकी के दिल में एक अलग ही हलचल मचा दी थी। सूरज के उस चेहरे पर न केवल एक युवा तरुणाई का आकर्षण था, बल्कि अपनी कड़ी मेहनत और लगन से हासिल की गई सफलता की एक अनोखी चमक भी साफ़ दिखाई दे रही थी। वह सफलता सूरज के पौरुष को और भी ज़्यादा प्रभावशाली और सम्मोहक बना रही थी।

पिंकी के लिए ये दोनों ही मर्द अपनी-अपनी जगह एक बेहद मजबूत, आकर्षक और चुंबकीय व्यक्तित्व के स्वामी थे। जब भी वह अपनी जाँघों के बीच उठती उस तीखी कसक को शांत करने की कल्पना करती, तो उसके सपने धुंधले होने लगते और उसका दिमाग इन दोनों के बीच ही डोलने लगता। परमानंद से तो वह मिल चुकी थी, उनके बात करने का अंदाज़ और उनकी शख्सियत को महसूस कर चुकी थी, लेकिन सूरज... सूरज का वह अजनबी आकर्षण पिंकी के भीतर एक अलग ही कौतूहल पैदा कर रहा था। अखबार की उस तस्वीर में छिपी मर्दानगी को देखकर पिंकी का अंतर्मन अनजाने में ही सही, पर एक बार उस जवान खून के स्पर्श की कल्पना करने लगा था। परमानंद से साक्षात मुलाकात हो चुकी थी, पर सूरज से उस जादुई मिलन का होना अभी बाकी था, और यही 'बाकी' रह जाना पिंकी की सुलगती जवानी को एक अनजाने रोमांच की तरफ खींच रहा था।

उधर परमानंद अपने विशाल पंडाल की तैयारी में पूरे जी-जान से लगा हुआ था। बनारस महोत्सव के लिए सज रहा यह भव्य पंडाल महज़ बांस, लकड़ियों और रंग-बिरंगे कपड़ों का ढांचा नहीं था, बल्कि यह तो एक ऐसा रंगमंच था जो न जाने कितने दिलों की अधूरी हसरतों और उम्मीदों को पूरा करने वाला था। परमानंद अपनी पारखी नज़रों से एक-एक कोने की सजावट को देख रहा था, पर उसका दिमाग इस भौतिक तैयारी से कहीं आगे भविष्य के ताने-बाने बुन रहा था।

समानांतर रूप से, समय के उस अनंत चक्र में नियति विधाता की उस अद्भुत और रहस्यमयी किताब के पन्नों को बार-बार पलट रही थी। उस किताब में बनारस की उस रूढ़िवादी हवेली से लेकर नैनीताल की बर्फीली चोटियों और लखनऊ के बंद कमरों तक की वासना, प्रेम और राज के सारे समीकरण पहले से ही लिखे जा चुके थे।

राजू-मालती की सिनेमा हॉल की वो बेबाक चोरी और राजा की वो नशीली ब्लैकमेल करती आँखें, उधर सोनी के बदन पर छपे सूरज के पौरुष के वो तीखे लाल निशान जिन्हें सुगना विकास का प्यार समझ बैठी थी, लाली के मन में सुगना के उस मखमली हिस्से को खुलकर देखने की मचलती शरारत, और इधर लखनऊ में अपनी 'पिंक मुनिया' से काम-रस बहाती पिंकी के सपनों में परमानंद और सूरज के मर्दाना चेहरों का वो हिचकोले खाना—ये सब उसी विधाता के बनाए गए जटिल समीकरण थे। नियति अब और सब्र करने के मूड में नहीं थी। वह इन तमाम किरदारों को एक ही केंद्र बिंदु, यानी इसी बनारस महोत्सव के पंडाल की तरफ खींच रही थी। विधाता खुद अपनी उस अद्भुत किताब में लिखे गए इस कामुक, वर्जित और रोमांचक खेल को साक्षात धरती पर घटित होते देखने के लिए बेहद बेचैन थे, जहाँ मर्यादा की हर सरहद का टूटना और नए रिश्तों की इबारत का लिखा जाना अब बिल्कुल तय हो चुका था।
 
लगता है आप सब भी बोर हो गए है और सच पूछिए तो मैं भी..

पाठकों का घटता रुझान कहानी की गति को धीमा कर रहा है...

शुभकामनाएं
 
भाग 213

नियति अब और सब्र करने के मूड में नहीं थी। वह इन तमाम किरदारों को एक ही केंद्र बिंदु, यानी इसी बनारस महोत्सव के पंडाल की तरफ खींच रही थी। विधाता खुद अपनी उस अद्भुत किताब में लिखे गए इस कामुक, वर्जित और रोमांचक खेल को साक्षात धरती पर घटित होते देखने के लिए बेहद बेचैन थे, जहाँ मर्यादा की हर सरहद का टूटना और नए रिश्तों की इबारत का लिखा जाना अब बिल्कुल तय हो चुका था।

अब आगे

बनारस महोत्सव की तारीखें जैसे-जैसे नज़दीक आ रही थीं, प्रशासनिक गलियारों में हलचल अपनी चरम सीमा पर पहुँच चुकी थी। इस पूरे भव्य आयोजन को सुचारू रूप से संपन्न कराने का जिम्मा सीनियर प्रशासनिक अधिकारी मनोरमा के कंधों पर था। कड़क मिजाज, अनुशासनप्रिय और अपनी पैनी कार्यशैली के लिए जानी जाने वाली मनोरमा अपने आलीशान दफ्तर में बैठी हुई फाइलों के अंबार के बीच बेहद गंभीर मुद्रा में डूबी हुई थी।

सामने मेज पर बनारस महोत्सव का पूरा खाका बिखरा पड़ा था। सुरक्षा व्यवस्था, गणमान्य अतिथियों का आगमन, और परमानंद के उस भव्य पंडाल की सुरक्षा जैसे बेहद संवेदनशील मुद्दों को देखते हुए मनोरमा को एक ऐसी कोर-टीम (प्रशासनिक अधिकारियों की लिस्ट) तैयार करनी थी, जो बिना किसी चूक के इस दबाव को संभाल सके। वह बेहद बारीकी से एक-एक नाम पर विचार कर रही थी और उन्हें अपनी लिस्ट में शामिल कर रही थी। मनोरमा को अच्छे से पता था कि बनारस की इस धरती पर राजनीति, रसूख और कानून-व्यवस्था के बीच संतुलन बनाना कितना पेचीदा काम है।

तभी दफ्तर के भारी दरवाज़े पर हल्की सी दस्तक हुई। मनोरमा ने फाइल से नज़रें उठाकर देखा। कमरे में उसके वरिष्ठ और बेहद अनुभवी सीनियर अधिकारी ने प्रवेश किया, जिनके हाथों में बनारस के विभिन्न विभागों के तेजतर्रार अधिकारियों की एक गोपनीय रिपोर्ट थी।

सीनियर अधिकारी ने मनोरमा के सामने वाली कुर्सी संभाली, और गंभीर लहजे में बोले, "मैडम, बनारस महोत्सव कोई साधारण आयोजन नहीं है। इस बार भीड़ और संवेदनशीलता पिछले कई सालों के मुकाबले दोगुनी होने वाली है। आपको अपनी टीम में सिर्फ कागजी तौर पर मजबूत लोग नहीं, बल्कि जमीन पर उतरकर सिचुएशन को संभालने वाले 'रफ एंड टफ' लोग चाहिए।"

मनोरमा ने अपनी पेन को डायरी पर टिकाते हुए कहा, मैं उसी स्तर के अधिकारियों की लिस्ट बना रही हूँ। सुरक्षा और मैनेजमेंट के लिए मुझे एक ऐसे निडर और बेबाक अधिकारी की ज़रूरत है, जो स्थानीय रसूखदारों के दबाव में न आए और कानून व्यवस्था को लोहे के हाथ से संभाल सके।"

यह सुनते ही सीनियर अधिकारी के चेहरे पर एक गहरी और सोची-समझी मुस्कान तैर गई। उन्होंने अपनी फाइल से एक विशेष पन्ना निकाला और मनोरमा की तरफ बढ़ाते हुए कहा:

"अगर आपको ऐसा ही दमदार और बेखौफ आदमी चाहिए, तो मेरी नजर में एक नाम है जो इस काम के लिए बिल्कुल परफेक्ट फिट बैठता है। आप अपनी इस खास लिस्ट में 'संग्राम सिंह उर्फ सोनू' का नाम शामिल कीजिए।"

'संग्राम सिंह उर्फ सोनू' का नाम सुनते ही मनोरमा के कान खड़े हो गए। संग्राम सिंह बनारस और आस-पास के इलाकों में अपनी कड़क कार्यशैली, तेजतर्रार छवि और अपराधियों व मनचलों के छक्के छुड़ाने के लिए मशहूर था। लेकिन मनोरमा इस बात से पूरी तरह अनजान थी कि विधाता की जिस अद्भुत किताब में बनारस की उस रूढ़िवादी हवेली के गुप्त राज लिखे जा रहे हैं, यह संग्राम सिंह उर्फ सोनू उसी कहानी का एक बेहद अहम और पुराना हिस्सा है। यह वही सोनू था जिसके साथ कभी लाली ने अपनी चढ़ती जवानी के बेबाक और कामुक पल बिताए थे, जिसे सुगना चुपके से किवाड़ की ओट से निहारा करती थी।

सीनियर अधिकारी ने सोनू की तारीफ करते हुए आगे कहा, "संग्राम सिंह को बनारस की रग-रग का अंदाजा है। स्थानीय लोग उसे 'सोनू' के नाम से जानते हैं और उसका अपना एक अलग ही रुतबा है। चाहे कितना भी बड़ा वीआईपी प्रेशर हो, वह डिगता नहीं है। अगर वह आपकी टीम में रहेगा, तो पंडाल से लेकर पूरे महोत्सव की सुरक्षा को लेकर तुम बिल्कुल निश्चिंत रह सकती हो।"

मनोरमा ने कुछ पल के लिए संग्राम सिंह उर्फ सोनू की प्रोफाइल को देखा। उसकी मर्दाना, रोबीली और आत्मविश्वास से भरी तस्वीर को देखकर मनोरमा को भी लगा कि यह शख्स सचमुच इस महोत्सव के चक्रव्यूह को संभालने का दम रखता है। उसने बिना किसी हिचकिचाहट के अपनी खास लिस्ट में संग्राम सिंह उर्फ सोनू का नाम सबसे ऊपर दर्ज कर लिया।

बेचारी मनोरमा को कहाँ पता था कि वह जिसे महज़ कानून व्यवस्था का एक मोहरा समझकर अपनी टीम में शामिल कर रही है, वह वास्तव में नियति के उस बड़े बवंडर का हिस्सा है जो बनारस महोत्सव के इस भव्य पंडाल में दस्तक देने जा रहा है। एक तरफ परमानंद का सजता हुआ रंगमंच, दूसरी तरफ पिंकी और सोनी के बदन में सुलगती वासना के अंगारे, और अब हवेली के अतीत के बंद पन्नों से निकलकर आ रहा यह जांबाज अधिकारी सोनू—विधाता के समीकरण अब पूरी तरह से सेट हो चुके थे और सभी किरदार अनजाने में एक ही महा-संगम की तरफ बढ़ रहे थे।

उधर लाली के कमरे में बिखरी मद्धम रोशनी के बीच गुज़रे वक्त की परतें एक-एक कर खुलने लगी थीं। सुगना के शरीर में आई कड़वाहट और सन्नाटे को भांपते हुए लाली के होंठों पर एक और गहरी, मादक मुस्कान उभर आई। उसने सुगना की बांह को धीरे से सहलाया और उसकी आँखें सीधे सुगना की थमी हुई निगाहों से जा टकराईं।

ए सुगना ते सोनू के काहे छोड़ देले…ऊ हमेशा तोरा के याद करेला…

लाली की यह बात सीधे सुगना के कलेजे को चीरती हुई उस अतीत में ले गई सुगना के ज़ेहन में सोनू के साथ मनाई गई रंगरलिया याद आ गई। पर उसने अपनी भावनाओं को काबू में रखा।

लाली की बेबाकी और उतावलापन उतना ही बढ़ता जा रहा था। वह बिस्तर पर सुगना के और करीब खिसक आई, यहाँ तक कि उसकी गर्म साँसें सुगना के गालों को छूने लगीं। लाली के दिमाग में सिर्फ सलेमपुर की वह एक रात नहीं थी, बल्कि उसके भीतर एक बरसों पुराना गहरा शक कुलबुला रहा था। वह शक था कि उसके और सोनू के अलग होने के बाद भी, पीठ पीछे सुगना और उम्र में छोटे सोनू के बीच अंतरंग संबंध लगातार बने हुए थे।

आज लाली किसी भी मर्यादा को मानने के मूड में नहीं थी। वह बार-बार सुगना को वही पुराना दृश्य याद दिला रही थी जब वह खुद सोनू के साथ संभोग में लीन होती थी और सुगना खिड़की की झिर्री से एकटक उन्हें देखा करती थी।

लाली ने सुगना की ठुड्डी को उंगलियों से पकड़ा और उसकी कतराती हुई आँखों में सीधे झाँकते हुए भोजपुरी और हिंदी के मिले-जुले बिंदास लहजे में कहा, "काहे शरमात बाड़ू सुगना? आज हमनी के बीच कवनो पर्दा नाहीं बा। याद करऽ उ दुपहरी, जब हम और सोनू एक-दूसरे के बदन में डूबल रहनी और तू बाहर खड़ी होकर हमनी के हर एक हरकत के अपनी आँखों में भरत रहलू। तोहार उ देखना सिर्फ देखना ना रहे, तोहरे भीतर भी सोनू के पौरुष को पाने की आग सुलग रही थी।"

लाली बार-बार सुगना के छोटे भाई सोनू का नाम ले-लेकर सुगना के भीतर सोई हुई उसी पुरानी आग को दोबारा भड़का रही थी। उसका असली मकसद सुगना की उस सख्त हिचक और हवेली की पहरेदार वाली छवि को पूरी तरह से तोड़ देना था। वह चाहती थी कि सुगना आज अपने सारे बांध तोड़कर खुलकर इस बात को स्वीकार कर ले कि हाँ, लाली के अलावा भी सोनू के साथ उसका अपना एक गुप्त और गहरा शारीरिक संबंध था।

लाली ने सुगना के हाथ को अपने हाथ में लेकर थोड़ा दबाते हुए उकसाने वाले लहजे में कहा, "सुगना, तू आज भले मुंह छुपावे की कोशिश करऽ, पर हम तोहार रग-रग से वाकिफ बानी। सोनू उम्र में भले हमनी से छोटा रहे, पर ओकर सामन अइसन रहे कि तू खुद के रोक नहीं पइलू। सच-सच बता सुगना, जौनपुर में सोनू ई मालपुआ चूसले रहे कि ना?,

सुगना का कलेजा धक से कर गया

आज छुपाव मत, खुलकर कह दे कि तोहरे और सोनू के बीच उ संबंध आज भी एक अटूट राज बनल बा।"

हट पागल केहू अपना भाई के साथ यह सब करेला का ? सुगना ने प्रश्न के बदले प्रश्न कर तो दिया पर उससे नज़रें मिलाने में आशाए हो रही थी उसने अपनी पलके बंद करते हुए कहा…


कमरे की उस मद्धम रोशनी में सुगना का चेहरा लाल हो रहा था और उसकी तेज़ चलती साँसें गवाही दे रही थीं कि लाली का यह तीर सीधे निशाने पर जाकर लगा था।

लाली ने जब देखा कि सुगना पूरी तरह से वासना और उत्तेजना के भंवर में बह रही है, लेकिन फिर भी उसका दिमाग मर्यादा के आखिरी धागे को पकड़कर उस सच को कुबूल करने से कतरा रहा है, तो लाली ने अपनी आखिरी और सबसे शातिर चाल चली। उसने सुगना की आँखों में आँखें डालीं और बेहद आश्वस्त लहजे में एक ऐसा सफ़ेद झूठ बोला जिसने सुगना के बचे-खुचे आत्मनियंत्रण की धज्जियां उड़ा दीं।

लाली कहा मानने वाली थी…

अव ज्यादा सीधा मत बन सोनू हमरा के सब बता देले बा.. लाली ने पूरे आत्मविश्वास के साथ कहा। सुगना अब भी चुप ही रही पर वह भीतरी भीतर हिल चुकी थी उसे सोनू से ऐसे विश्वास करके उम्मीद न थी।

लाली ने सुगना के तपते गालों को थपथपाते हुए फुसफुसाकर कहा, "सुगना, अब तू काहे छुपावत बाड़ू? तू जिससे डरत बाड़ू, उ राज तो अब राज रहवे नहीं कइल। सोनू खुद अपने मुंह से हमके तोहरे और अपने संबंधों की सारी हकीकत बता देले बा! उ खुद कुबूल कइलक कि कैसे सलेमपुर के बाद भी तुम दोनों चोरी-छिपे एक-दूसरे के बदन का रस लेत रहलु। जब सोनू ही हमसे कवनो बात नहीं छुपावलस, तो अब तोके छुपावे की कवनो ज़रूरत नहीं बा। हम सब जानत बानी।"

लाली का यह आत्मविश्वास से भरा झूठ सीधे सुगना के दिमाग पर जाकर लगा। सुगना जो इस वक्त लाली के नंगे सीने से सटी हुई थी और जिसकी चूचियाँ उत्तेजना से तानकर खड़ी थीं, वह लाली की बातों में पूरी तरह आ गई। उसे लगा कि जब उम्र में छोटा सोनू खुद अपनी बहन लाली के सामने उनके इस वर्जित रिश्ते को कुबूल कर चुका है, तो अब इस मर्यादा का ढोंग करने का कोई फायदा नहीं है।

सुगना की बची-खुची हिचक का बांध एक झटके में टूट गया। उसने एक लंबी, टूटती हुई गर्म सांस ली और लाली के आगोश में खुद को पूरी तरह ढीला छोड़ते हुए, अपनी ही भोजपुरी बोली में उस सच को हमेशा के लिए स्वीकार कर लिया।

सुगना ने लाली के कंधे पर अपना सिर टिकाते हुए बेहद मादक और दबी आवाज़ में कहा, "हाँ लाली... तू सच कहत बाड़ू। हम हार गइनी तोहरी ज़िद के आगे। सोनू भले उम्र में हमसे छोटा रहे, पर जब-जब उ हमरा करीब आइल, हम अपनी मर्यादा भूल गइनी।

सुगना के मुंह से इस बड़े राज़ को सुनते ही लाली के पूरे बदन में जीत की एक सनसनी दौड़ गई। सुगना का वह दिव्य बदन अब बिना किसी हिचक के लाली के हाथों में था, और सलेमपुर के उस अतीत का सच अब दोनों सहेलियों के बीच का सबसे बड़ा और कामुक साझा राज़ बन चुका था।

लाली की बेबाकी की सारी सरहदें टूट चुकी थीं। वह सुगना के एकदम करीब सट गई थी और उसकी उंगलियां सुगना के ब्लाउज के हुक और साड़ी के पल्लू की मर्यादा को धीरे-धीरे दरकिनार कर रही थीं। सुगना का गोरा बदन अब लाली के हाथों के घेरे में आ चुका था।

लाली ने सुगना के कानों के पास अपनी गर्म और मादक सांसें छोड़ते हुए उसकी खूबसूरत बुर की खुलकर तारीफ करना शुरू किया। वह सुगना के जाँघों के बीच छिपे उस मखमली 'मालपुए' (योनि) का ज़िक्र बार-बार कर रही थी। लाली ने पूरी दीवानगी से फुसफुसाते हुए कहा, "सुगना, तोहार उ संरचना, तोहार उ मालपुआ सचमुच दिव्य बा। भगवान तोके अइसन सुंदर और रसीला बदन कवनो अद्भुत और खास काम खातिर ही देले बाड़न। और तोर भाई सोनू... उहो तो ओतने दिव्य सामान वाला बा। अगर तोहार और सोनू का उ मिलन भइल भी बा, तो उ हमरा खातिर ओतने ही पवित्र और स्वीकार्य बा, जितना तू खुद बाड़ू। हम तोसे कवनो शिकायत नाहीं करब।"

लाली का यह बेबाक उकसावा और सुगना के नंगे बदन पर उसकी उंगलियों का रेंगना सुगना के आत्मनियंत्रण को पूरी तरह से ध्वस्त कर रहा था। सुगना की साँसें अब धौंकनी की तरह तेज़ चल रही थीं, उसकी छाती तेज़ी से ऊपर-नीचे हो रही थी। उत्तेजना के इस चरम पर सुगना की दोनों चूचियाँ पूरी तरह से तानकर खड़ी हो चुकी थीं और जब लाली ने उसे अपने आगोश में खींचा, तो सुगना के वे कड़े उभार लाली के नंगे सीने से सीधे जाकर सट गए। बदन से बदन की यह तीखी रगड़ सुगना के भीतर छिपी बरसों की वासना की आग में घी का काम कर रही थी।

लाली लगातार सुगना को उकसाए जा रही थी, उसके बदन को सहलाते हुए उसे मदहोश कर रही थी। सुगना ने आज तक कभी भी, किसी के भी सामने छोटे भाई सोनू और अपने संबंधों को स्वीकार नहीं किया था; वह हमेशा मर्यादा की आड़ में इस सच को दफ़्न रखती आई थी। लेकिन इस वक्त, लाली के उग्र स्पर्श, अपनी सुलगती वासना और बदन के चरम सुख के बहाव में बहती हुई सुगना धीरे-धीरे अपने शब्द खो रही थी। उसकी हिचक का बांध अब पूरी तरह टूटने की कगार पर था।

लाली के कमरे में रात का सन्नाटा अब दोनों के बदन की तपिश से पिघलने लगा था। सुगना की कबूलियत ने लाली के भीतर की कामुकता को सातवें आसमान पर पहुँचा दिया था। लाली ने सुगना के लाल होते चेहरे को अपने दोनों हाथों की हथेलियों में भरा, उसकी कांपती हुई पलकों को निहारा और फिर बिना एक पल गंवाए अपने होंठ सुगना के थरथराते हुए होंठों पर रख दिए।

एक सहेली का दूसरी सहेली के होठों को इस कदर बेबाकी से चूमना सुगना के लिए बिल्कुल अप्रत्याशित था। उसने लाज और शर्म के मारे अपनी आँखें कसकर मूंद लीं। लाली ने चुंबन की गिरफ्त को थोड़ा ढीला किया, पर सुगना के चेहरे को अपनी उंगलियों से जकड़े रखा। उसकी आँखों में एक अजीब सी चाहत और जिद थी।

लाली ने सुगना की नाक से अपनी नाक रगड़ते हुए भोजपुरी में बेहद धीमी और मिन्नत भरी आवाज़ में कहा, "ए सुगना... तू तऽ हमरा और सोनू के केतनी बेर संभोग करत देखले बाड़ू। खिड़की से छुप-छुप के ओकर कड़ा पौरुष निहारत रहलू नऽ?"

सुगना ने शर्म के मारे अपना चेहरा लाली के सीने में छुपाने की कोशिश की, उसका बदन बुरी तरह सिहर रहा था। उसने दबी आवाज़ में कहा, "लाली... अब बस करऽ, लाज से हमार जियरा फटा जाता। पुराना बात के काहे अब उघारत बाड़ू?"

पर लाली आज अपनी जिद पूरी करने पर आमादा थी। उसने सुगना की ठुड्डी को ऊपर उठाया, जहाँ सुगना की लाचारी साफ़ झलक रही थी। लाली ने मचलते हुए कहा, "मना मत करऽ सुगना! एक बेर... बस एक बेर हमके भी ई सौभाग्य मिले के चाहीं। हम तोहरा और सोनू के जोड़ी साक्षात अपनी आँख से देखल चाहत बानी। सचमुच, तुम दोनों की जोड़ी बहुत निराली लागेगी। प्लीज, अपनी ई सहेली की बात मान लऽ।"

सुगना ने एक गहरी और बेबस सांस ली। उसकी आँखें डबडबा आई थीं, जिसमें एक तरफ बरसों की छिपी वासना थी तो दूसरी तरफ भाई के साथ के इस सच के उजागर होने की गहरी लज्जा। उसने लाली के नंगे कंधों को पकड़कर रोकने की नाकाम कोशिश करते हुए कहा, "धत पगली! ई का कहत बाड़ू? दुनिया थू-थू करी... हम भाई के सामने कइसे खड़ा होब? हमार लाज-शर्म सब मिट्टी में मिल जाई।"

लाली ने सुगना के उन कड़े उभारों को अपने सीने से और भी भींच लिया और उसके कानों में फुसफुसाकर कहा, "केहू ना जानब सुगना... सब हमनी के बीच रही। बस एक बेर...!"

कमरे की मद्धम रोशनी में अब वासना का ज्वार अपनी सारी हदें पार कर चुका था। लाली के मुंह से निकले इन तीखे और बेबाक शब्दों ने सुगना के भीतर छिपी काम-अग्नि को पूरी तरह भड़का दिया था। सुगना की उत्तेजना अब अपने चरम बिंदु पर पहुँच चुकी थी, जहाँ मर्यादा और लोक-लाज के सारे बांध बह गए थे। उसकी सुगठित जाँघों के बीच एक अजब सी, मीठी मगर असहनीय कशिश और तड़प उठ रही थी, जो उसके पूरे बदन को कँपा रही थी।

लाली ने सुगना के बदन की इस छटपटाहट को ताड़ लिया। उसने सुगना की आँखों में देखते हुए अपनी एक हथेली को धीरे-धीरे नीचे सरकाया। जैसे ही लाली की गर्म हथेली ने नीचे बढ़कर सुगना की जाँघों के मुहाने को पार किया और उसके उस मखमली 'मालपुए' को छुआ, लाली की उंगलियों को वहाँ एक गाढ़े और अत्यधिक चिपचिपेपन का अहसास हुआ। सुगना की वह दिव्य संरचना इस वक्त काम-रस के आंसुओं से पूरी तरह भीग चुकी थी।

उस तीखे और सीधे स्पर्श के होते ही सुगना के मुंह से एक गहरी, मदहोश कर देने वाली सिसकारी निकल गई। उत्तेजना और चरम सुख के उस झटके से सुगना की दोनों जाँघें आपस में भींचने लगीं, जैसे वह उस मखमली हिस्से में हो रही हलचल को खुद में समेट लेना चाहती हो। उसकी साँसें अब तूफ़ान की तरह तेज़ चल रही थीं, और उसकी छाती के कड़े उभार लाली के सीने पर लगातार रगड़ खा रहे थे, जो इस बात की गवाही दे रहे थे कि अब पीछे हटने का कोई रास्ता नहीं बचा है।

लज्जा और बेबसी का आखिरी पर्दा भी गिर चुका था। सुगना अब किसी प्राचीन काल की आम्रपाली की तरह पूरी तरह उन्मुक्त होकर लाली के नंगे बदन से लिपट चुकी थी। उसकी बाहें लाली की पीठ पर कस गई थीं, और वह अपनी इस सुलगती जवानी को शांत करने के लिए खुद को पूरी तरह लाली के हाथों में सौंप चुकी थी, जहाँ बनारस की उस रात का यह गुप्त खेल अपने सबसे कामुक मोड़ पर पहुँच गया था।

अगली सुबह, बनारस के प्रशासनिक मुख्यालय का माहौल रोज़ की तुलना में अधिक व्यस्त था। सीनियर प्रशासनिक अधिकारी मनोरमा के दफ्तर का भारी सागौन का दरवाज़ा खुला और एक कड़क, रोबीली और सुगठित कद-काठी का युवा अधिकारी भीतर दाखिल हुआ। उसके बदन पर सलीके से सजी खाकी वर्दी और चेहरे पर एक बेबाक, मर्दाना आत्मविश्वास था।

"जय हिंद, मैडम! मैं संग्राम सिंह उर्फ सोनू," उसने बेहद सधे हुए और रोबीले अंदाज़ में सैल्यूट ठोकते हुए अपनी पहचान दी।

मनोरमा ने अपनी फाइलों से नज़रें उठाईं। अखबार की तस्वीरों और फाइलों में जो नाम उसने पढ़ा था, साक्षात वह युवक उससे कहीं ज़्यादा प्रभावशाली और चुंबकीय व्यक्तित्व का स्वामी निकला।

"बैठिए, संग्राम सिंह," मनोरमा ने मुस्कुराते हुए सामने की कुर्सी की तरफ इशारा किया। "मैंने तुम्हारी कार्यशैली की बहुत तारीफ सुनी है। बनारस महोत्सव हमारे लिए सिर्फ एक आयोजन नहीं, एक बड़ी चुनौती है। लाखों की भीड़, रसूखदारों का दबाव और सुरक्षा व्यवस्था... इन सब के बीच मुझे मुख्य पंडाल और सबसे संवेदनशील ज़ोन की सुरक्षा के लिए एक ऐसे ही निडर अफसर की ज़रूरत थी। मैं तुम्हें इस महोत्सव की मुख्य सुरक्षा कमान सौंप रही हूँ।"

सोनू ने बिना किसी हिचकिचाहट के, सीधे मनोरमा की आँखों में देखते हुए कहा, "मैडम, आप निश्चिंत रहिए। जब तक संग्राम सिंह मैदान में है, परिंदा भी पर नहीं मार सकता। आपकी दी हुई इस ज़िम्मेदारी को मैं सकुशल और पूरी मुस्तैदी से निभाऊँगा।"

उसकी बेबाक आवाज़ और कड़क लहजे से मनोरमा बेहद प्रभावित हुई। औपचारिकताएं पूरी होने के बाद, मनोरमा ने पेन को मेज पर टिकाया और थोड़ी व्यक्तिगत रुचि लेते हुए पूछा, "वैसे संग्राम सिंह, तुम्हारी प्रोफाइल से लगा कि तुम स्थानीय रसूख और यहाँ के भूगोल को बहुत अच्छे से समझते हो। क्या तुम मूल रूप से बनारस के ही रहने वाले हो? तुम्हारा फैमिली बैकग्राउंड क्या है?"

सोनू ने थोड़ा सहज होते हुए जवाब दिया, "नहीं मैडम, वैसे तो हमारी कर्मभूमि बनारस और सलेमपुर के आस-पास का इलाका रही है, लेकिन मूल रूप से मैं सीतापुर का रहने वाला हूँ।"

"सीतापुर?" मनोरमा की आँखें कौतूहल से थोड़ी बड़ी हो गईं। "अरे! कई साल पहले, जब मैं अपने करियर के शुरुआती दौर में थी, तब मैं उस कार्यक्षेत्र की एसडीएम हुआ करती थी। सीतापुर और सलेमपुर से मेरी बहुत पुरानी यादें जुड़ी हैं।"

सोनू के चेहरे पर भी एक पहचान की चमक उभरी। उसने मुस्कुराते हुए कहा, "हाँ मैडम, मुझे अच्छे से पता है। मैंने अपने बड़े-बुजुर्गों, खासकर सरयू सिंह जी के मुंह से आपका नाम और आपकी कड़क कप्तानी के किस्से कई बार सुने हैं।"

'सरयू सिंह'—यह नाम जैसे ही सोनू के होठों से निकला, मनोरमा के पूरे बदन में बिजली का एक करंट दौड़ गया। वह जहां बैठी थी, वहीं बिल्कुल सचेत और स्तब्ध हो गई। एक पल के लिए दफ्तर की दीवारें धुंधली हो गईं और अतीत का एक बेहद गहरा, कामुक और छिपा हुआ पन्ना उसकी आँखों के सामने जीवंत हो उठा।

पिछले बनारस महोत्सव की एक घनी रात... जब इसी सरयू सिंह के मजबूत, कड़े बदन और उग्र पौरुष के सामने मनोरमा की सारी प्रशासनिक हनक और मर्यादा पिघल गई थी। उस सुनसान, अंधेरे वीआईपी कमरे में सरयू सिंह के साथ किया गया वह आकस्मिक और बेबाक संभोग, बदन से बदन की वह तीखी रगड़ और उस चरम सुख का अहसास... मनोरमा के चेहरे पर अचानक शर्म और वासना की एक तीखी लालिमा दौड़ गई। उसके कान गर्म हो गए।

उसने तुरंत अपनी मेज पर रखे पानी के ग्लास को उठाया, एक घूंट भरा और अपनी अंदरूनी हलचल और कांपती साँसों पर बमुश्किल नियंत्रण पाते हुए पूछा, "सरयू सिंह...? तुम... तुम उन्हें कैसे जानते हो, संग्राम?"

सोनू मनोरमा के चेहरे पर आए उस अचानक बदलाव को पूरी तरह भांप नहीं पाया। उसने अपनी पूरी फैमिली हिस्ट्री खोलते हुए बेहद सादगी से कहा, "मैडम, सरयू सिंह जी हमारे परिवार के मुखिया और बड़े-बुजुर्गों में से हैं। हमारा पूरा परिवार हवेली की मर्यादा और अपनी साख के लिए जाना जाता है। मेरी बड़ी बहन हैं सुगना... हम सब उन्हीं के साए में पले-बढ़े हैं।"

जैसे ही सोनू के मुंह से 'सुगना' का नाम निकला, मनोरमा के चेहरे की झिझक एक झटके में गायब हो गई और उसकी जगह एक बेहद आत्मीय और गहरी खुशी ने ले ली।

"सुगना!" मनोरमा लगभग चहकते हुए अपनी कुर्सी से थोड़ी आगे झुकी। "अरे! सुगना को कौन नहीं जानता? इतनी सुंदर, शालीन और संस्कारी युवती... विधाता ने उसे सचमुच फुर्सत में गढ़ा है।"

सोनू अपनी बहन सुगना की इतनी बड़ी अधिकारी के मुंह से तारीफ सुनकर गर्व से भर गया।

मनोरमा ने अपनी आँखों में एक विशेष चमक लाते हुए आगे कहा, "संग्राम, इस बनारस महोत्सव के दौरान मैं सुगना से हर हाल में मिलना चाहती हूँ। उससे कहना कि मनोरमा दीदी ने याद किया है। जब वह पंडाल में आए, तो उसे सीधे मेरे पास लेकर आना।"

"ज़रूर मैडम, सुगना दीदी भी आपसे मिलकर बहुत खुश होंगी," सोनू ने मुस्कुराते हुए कहा।

दफ्तर के उस शांत कमरे में, जहाँ कुछ देर पहले तक सिर्फ प्रशासनिक फाइलों की औपचारिकता थी, अब अतीत के गुप्त राज और भविष्य के नए समीकरण एक साथ घुल-मिल चुके थे। मनोरमा जहाँ सरयू सिंह की यादों की कशिश और सुगना के ज़िक्र से अंदर ही अंदर रोमांचित थी, वहीं सोनू इस बात से बिल्कुल बेखबर था कि नियति ने बनारस महोत्सव के इस भव्य पंडाल में उन सभी के लिए कैसा कामुक और ऐतिहासिक चक्रव्यूह तैयार कर रखा है।
 
भाग 214

लाली ने बीती रात सुगना को अपनी बातों और सोनू की यादों की गर्माहट से सराबोर कर वासना के चरम पर पहुंचा दिया था और अपनी अब खुरदरी हो चुकी उंगलियों से सुगना के रसीले मालपुआ को करे देते हुए सुगना को स्खलन पर मजबूर कर दिया था। लाली और सुगना दोनों निहाल होकर एक सुखद नींद की आगोश में जा चुके थे।


अब आगे..

हवेली के भीतर सुबह की मद्धम धूप फैल चुकी थी, आज् सुगना देर से उठी। सुगना बाथरूम में अभी भी रात के उस मादक कृत्य को याद कर रही थी। सुगना पानी की बाल्टी के पास खड़ी थी, पर उसका ध्यान वर्तमान में कम और बीती रात के उस बवंडर में ज़्यादा था। लाली के साथ बिताई गई वह एक-एक कामुक घड़ी उसके जेहन में किसी फिल्म की तरह रील दर रील घूमने लगी थी।

जैसे ही सुगना ने स्नान करने के लिए अपने बदन से साड़ी के पल्लू को सरकाया, उसे तुरंत याद आया कि कैसे चंद घंटों पहले लाली ने इसी बेबाकी से उसके पल्लू को दरकिनार किया था। सुगना के कांपते हाथों ने जब ब्लाउज के हुक खोले, तो उसे अपनी छाती पर लाली के उन कड़े चुंबनों और सीने की वह तीखी रगड़ साफ़ महसूस होने लगी, जिसने उसकी चूचियों को उत्तेजना से तान दिया था। अब सुगना पूरी तरह से निर्वस्त्र हो चुकी थी। पानी की ठंडी बूंदें बदन पर पड़ने से पहले ही, रात की उस तपन की याद में उसका गोरा, सुगठित शरीर अंदर से सुलग रहा था। उसने आईने में अपने नंगे बदन को देखा—वही बदन, जिसे लाली ने रात भर अपनी उंगलियों से मथा था।

सुगना का हाथ अनजाने में ही अपनी जाँघों के उस संवेदनशील मुहाने, यानी अपने उस मखमली 'मालपुए' की तरफ चला गया। लाली की उंगलियों का वह पहला स्पर्श, वह गाढ़ा चिपचिपापन, और उस चरम सुख में अपनी ही भोजपुरी बोली में मर्यादा का सारा बांध तोड़कर छोटे भाई सोनू के साथ के गुप्त संबंधों को कुबूल कर लेना... यह सब याद आते ही सुगना की साँसें गुसलखाने की बंद दीवारों के बीच एक बार फिर धौंकनी की तरह तेज़ हो गईं। शर्म, लाज और वासना की एक मिली-जुली सिहरन उसके रोम-रोम में दौड़ गई। वह समझ चुकी थी कि लाली ने उसके भीतर की उस आदिम आग को दोबारा सुलगा दिया था, जिसे वह सालों से दबाए बैठी थी।

गुसलखाने की बंद दीवारों के बीच, बदन पर गिरते ठंडे पानी के बावजूद सुगना के भीतर विचारों की एक अजीब उथल-पुथल मची हुई थी। इस वक्त उसे सबसे ज़्यादा आश्चर्य, बल्कि एक गहरा धक्का इस बात पर लग रहा था कि कैसे उम्र में छोटे सोनू ने उन दोनों के बीच के उस बेहद गुप्त और वर्जित शारीरिक संबंध को लाली के सामने इस कदर उजागर कर दिया। सालों पहले, जब वे दोनों सलेमपुर की उस काली रात के बाद से अपने पुराने घर और जौनपुर के बंद कमरों में एक-दूसरे के बदन का रस लेते थे, तब दोनों ने एक-दूसरे की कसम खाई थी कि इस राज़ को वे हमेशा एक गहरा राज़ ही रखेंगे।

पानी की बूंदों को अपने चेहरे से पोंछते हुए सुगना ने ठंडे दिमाग से सोचने की कोशिश की। अचानक उसके मन में एक खयाल आया—शायद यह समय की मार थी जिसके कारण सोनू टूट गया हो। पिछले कई वर्षों से, बदली हुई परिस्थितियों और उसके स्वयं के हृदय परिवर्तन की वजह से उसने खुद को सोनू से दूर कर लिया था। इसका कारण कुछ और नहीं सिर्फ सरयू सिंह की मृत्यु थी। जब से सुगना ने यह जाना था की सरयू सिंह उसके पिता थे तब से ही उसका वासना से मोह भंग हो गया था इसी कारण सोनू और सुगना के बीच वह पुराना कामुक संबंध पूरी तरह टूट चुका था। बरसों की वह दूरी, वह शारीरिक अकेलापन और उस चरम सुख से वंचित रह जाने की छटपटाहट अब सुगना के अंतर मन पर भारी पड़ रही थी।

सुगना को लगा कि इतने सालों तक उस भारी और सुलगते हुए राज़ को अपने सीने में दबाए रखना शायद युवा सोनू के बस में नहीं रहा होगा, और इसी मानसिक हताशा या पुराने दिनों की कसक में आकर उसने लाली के सामने अपना मुंह खोल दिया। बेचारी सुगना इस बात से बिल्कुल अनजान थी कि सोनू ने ऐसा कुछ भी नहीं किया था, बल्कि यह तो लाली का बिछाया हुआ वह शातिर झूठ और जाल था जिसमें सुगना की कामुकता और लाज एक ही झटके में घुटने टेक चुकी थी।

अतीत के इस गहरे समंदर में गोता लगाते हुए, सुगना की बंद आँखों के पीछे अब सोनू की वह गठीली और मादक युवावस्था पूरी तीव्रता के साथ उभर आई थी। गुसलखाने की खामोशी में, पानी के गिरने की आवाज़ जैसे बीते कल के किसी संगीत में बदल गई थी। वह याद करने लगी कि कैसे २५-२६ वर्ष का वह नौजवान एक अद्भुत, सुगठित और फौलादी बदन का मालिक था, जिसकी एक झलक ही सुगना के अंतर्मन के भारी सन्नाटे को चीर दिया करती थी।

सोनू के वे चौड़े कंधे, कसी हुई गठीली छाती और उसके पौरुष की वह बेबाक कड़कड़ाहट... सुगना के ज़ेहन में वह सब इतनी शिद्दत से कौंधा कि उसके रोम-रोम में एक सिहरन दौड़ गई। सोनू न केवल सुगना से बेपनाह और उग्र प्यार करता था, बल्कि उस प्यार में एक ऐसा खिंचाव था जिसे चाहकर भी झुठलाया नहीं जा सकता था। जब भी वे दोनों बंद कमरों के एकांत में, दुनिया की नज़रों से छुपकर मिलते थे, तो उनकी जोड़ी एक अप्रतिम और अद्भुत विलास को जन्म देती थी। वासना और समर्पण का वह संगम ऐसा था मानो वे दोनों एक-दूसरे के बदन के लिए ही बने हो, जहाँ सारे सामाजिक बंधन और वर्जनाएँ उस कड़े बदन की तपिश में पिघलकर राख हो जाते थे।

ऊपर से सोनू सुगना की बेहद इज्जत करता था सुगना को यह बेहद पसंद आता वह चाहे कितना भी अपनी वासना में अंधा हो पर बिना सुगना की अनुमति की वह अपनी उग्रता कभी भी जाहिर नहीं करता था।

अतीत की गहराइयों में डूबी सुगना का ध्यान अब विशेष रूप से जौनपुर के उस बंद कमरे के एकांत पर टिक गया, जहाँ लोक-लाज और मर्यादा के सारे बंधन एक झटके में टूट गए थे। वह शिद्दत से याद करने लगी कि कैसे उसने अपने इस दिव्य बदन और जाँघों के बीच छिपे उस मखमली 'मालपुए' (योनि) को पूरी तरह से, एक अनमोल दहेज की तरह, उम्र में छोटे सोनू के पौरुष को समर्पित कर दिया था। उस समर्पण में कोई हिचक नहीं थी, बल्कि अपनी जवानी का सारा रस अपने ही भाई के नाम कर देने की एक अदम्य चाहत थी और नसबंदी करा चुके सोनू को एक वैवाहिक जीवन प्रदान करना था। लाली की किस्मत में सोनू को डालकर सुगना ने उन तीनों के लिए ही मनचाहा सुख दे दिया था।

उस विशेष दिन की याद सुगना के ज़ेहन में आज भी उतनी ही साफ़ और जलती हुई थी। उसे याद आया कि कैसे सोनू ने पहली बार उसके गोरे बदन को निहारते हुए, अपनी जीभ और होठों से उसके उस संवेदनशील हिस्से को छुआ था। अपने ही भाई के मुंह और होठों की वह तीखी छुअन, और उसके द्वारा दिए गए उस पहले मुखमैथुन (ओरल सेक्स) की मादकता सुगना के पूरे वजूद को हिला गई थी। सोनू का उसके उस खूबसूरत हिस्से को पूरी दीवानगी और उग्रता से चूसना, और उस तीखे स्पर्श से बदन में उठने वाली सिसकारियां सुगना को आज भी अंदर तक झकझोर देती थीं।

यह यादें इस वक्त गुसलखाने के सन्नाटे में इतनी कामुक और तीव्र होकर उभरीं कि सुगना का पूरा बदन तपने लगा। बरसों से शांत पड़ी आग लाली की उकसाहट और इन यादों के साए में अचानक भड़क उठी थी। अपनी ही सुलगती यादों के पूरी तरह वश में होकर, सुगना का आत्मनियंत्रण जाता रहा। वह धीरे-धीरे आगे बढ़ी और आईने के सामने खड़े होकर अपने स्वयं के मखमली, भीगे बदन को निहारने लगी।

कांपते हाथों से उसने अपने उभरे हुए सीने, अपनी सुगठित कमर और जाँघों के मखमली हिस्सों पर धीरे-धीरे हाथ फेरना शुरू किया। पानी की ठंडी बूंदों से भीगा होने के बावजूद, उसका वह मखमली हिस्सा अंदरूनी गर्मी से सुलग उठा। उस बीती दोपहर के चरम सुख और सोनू के होठों की याद आते ही, सुगना के उस मखमली 'मालपुए' के भीतर से एक अद्भुत, गाढ़ा और अप्रतिम काम-रस अपने आप बहने लगा, जो पानी के प्रवाह के बीच भी अपनी मादक उपस्थिति दर्ज करा रहा था। ठंडे गुसलखाने में उसका अपना ही स्पर्श, उसकी बंद आँखों के पीछे सोनू के उन्हीं पुराने, बेबाक हाथों का अहसास करा रहा था। सुगना ने गहरी सांस लेते हुए आईने पर अपनी हथेलियां टिका दीं, और उसका पूरा वजूद अतीत के उस वर्जित सुख के सैलाब में पूरी तरह बह गया।

आईने के सामने खड़ी सुगना का वजूद इस वक्त पूरी तरह से अतीत की उन कामुक लपटों में घिर चुका था। पानी की ठंडी फुहारें उसके गोरे, सुगठित बदन पर बेअसर साबित हो रही थीं, क्योंकि अंदर सुलगती आग ने उसकी नसों में रक्त के प्रवाह को तूफ़ानी गति दे दी थी। सोनू के उस अद्भुत पौरुष, उसकी अगाध इज़्ज़त और जौनपुर की उस मदहोश कर देने वाली दोपहर की याद ने सुगना के आत्मनियंत्रण की आखिरी परत भी छील दी थी।

अपने अंतर्मन में सोनू के गहरे और बेबाक स्पर्श को साक्षात महसूस करते हुए, सुगना का हाथ धीरे-धीरे उसकी भीगी जाँघों के बीच बने उस मखमली मुहाने की गहराई में उतर गया। अपनी ही लंबी, कोमल उंगलियों से वह अपने उस रसीले 'मालपुए' (योनि) को अंदर तक टटोलने लगी। हर एक छुअन के साथ जौनपुर का वह पूरा दृश्य उसकी बंद आँखों के सामने सजीव हो उठा, जहाँ सोनू ने पहली बार अपना मुंह वहाँ टिकाया था। सुगना की उंगलियों कभी उस मखमली हिस्से के संवेदनशील दाने (क्लिटोरिस) को सहलातीं और पूरी शिद्दत से रगड़तीं, तो कभी वह सोनू के उस मादक और उग्र चूसने के अहसास को याद कर भीतर तक सिहर उठती।

जैसे-जैसे यादों का यह सिलसिला गहरा होता गया, गुसलखाने की बंद हवा में सुगना की उत्तेजना अपने चरम बिंदु की तरफ बढ़ने लगी। काम-रस के गाढ़े बहाव और अपनी उंगलियों की तीखी हरकत के कारण उसका पूरा शरीर अकड़ने लगा, जाँघों में एक अजीब सी बेबसी और कशिश भर गई। पैरों में उठती इस कमज़ोरी को संभालने के लिए उसने धीरे से अपनी नंगी और भीगी पीठ को गुसलखाने की ठंडी दीवार से टिका दिया। दीवार की वह ठंडक उसके तपते बदन को एक अजीब सी राहत और उत्तेजना दे रही थी।

अब सुगना पूरी तरह से उस आदिम सुख के भंवर में डूब चुकी थी। उसका एक हाथ जहाँ नीचे उस मखमली हिस्से को बेताबी से मथ रहा था, वहीं उसका दूसरा हाथ ऊपर उठकर उसकी तानकर खड़ी हो चुकी चूचियों को बेरहमी से मसलने लगा। उंगलियों का यह दोहरा प्रहार और ज़ेहन में सोनू के पौरुष का वह अटूट सम्मोहन... सुगना को उस चरम स्खलन की दहलीज पर ले आया जहाँ साँसें धौंकनी बनकर हलक में अटक जाती हैं। वह बंद आँखों से, दीवार के सहारे खुद को पूरी तरह छोड़ते हुए, बरसों बाद अपनी उंगलियों के ज़रिए उसी वर्जित और अद्भुत सुख को दोबारा निचोड़ लेने के प्रयास में पूरी तरह लीन हो गई।

उल्तेजना और चरम सुख के उस आख़िरी मुहाने पर, जहाँ सुगना का पूरा बदन दीवार के सहारे पूरी तरह अकड़ चुका था और उसकी उँगलियाँ उस मखमली हिस्से से चरम रस निचोड़ लेने को बेताप थीं, ठीक उसी पल गुसलखाने के बाहर, उसके सूने कमरे में एक जानी-पहचानी, कड़क और मर्दाना आवाज़ गूंज उठी।

"दीदी... ओ सुगना दीदी! कहाँ बाड़ू तू?"

सोनू की वह रसीली और मधुर आवाज़ सीधे सुगना के कानों के परदों से टकराती हुई उसके अंतर्मन में उतर गई। यह वही समय था जब सुगना अपनी उँगलियों के प्रहार से स्खलन (orgasm) के ठीक करीब पहुँच कर ख़ाली हो रही थी, उसका पूरा वजूद उस सुखद झटके से कांप रहा था। ऐसे चरम क्षण में अचानक सोनू की आवाज़ का सुनाई देना सुगना के लिए किसी बहुत बड़े विस्मय से कम नहीं था।

एक तरफ़ उसका बदन काम-रस के सैलाब में भीगकर निढाल हो रहा था, और दूसरी तरफ़ बरसों बाद सोनू की वही आवाज़ साक्षात उसके कानों में मिसरी घोल रही थी। सुगना के कानों को अपनी ही सुनवाइयों पर यकीन नहीं हो रहा था। उसे लगा कि शायद यह उसकी अपनी सुलगती हुई वासना और यादों का कोई भ्रम है, कोई मायाजाल है जो इस बंद गुसलखाने में उसे सुनाई दे रहा है।

वह पूरी तरह से मंत्रमुग्ध हो चुकी थी। दीवार से टिकी उसकी पीठ, छाती पर कसा उसका हाथ और जाँघों के बीच थमी उँगलियाँ... सब कुछ जैसे एक पल के लिए जम गया। वह सांस रोककर, बिना कोई उत्तर दिए, बस उस जादुई आवाज़ को अपलक सुनती रही। उसके मुँह से कोई शब्द नहीं फूटा और फूटा तो सुगना के मालपूए का अद्भुत काम रस। , सुगना इस सच से बिल्कुल अनजान थी कि मनोरमा के दफ़्तर से ज़रूरी ज़िम्मेदारी संभालने के बाद, नियति के खेल के तहत सोनू अचानक ही सुबह-सुबह बनारस हवेली की इस चौखट पर आ पहुँचा था।

गुसलखाने के उस तूफ़ानी बवंडर और स्खलन के सुखद अहसास को समेटकर सुगना जब तैयार होकर बाहर आई, तो हवेली का माहौल पूरी तरह बदला हुआ था। कुछ ही देर बाद, पूरा परिवार एक बार फिर नाश्ते की टेबल पर एक साथ मौजूद था। प्लेटों और चम्मचों की खनखनाहट के बीच सभी के चेहरे पर सोनू के अचानक आने की खुशी साफ़ देखी जा सकती थी।

सुगना ने प्लेट में नाश्ता परोसते हुए बेहद धीमी और संकोच भरी आवाज़ में सोनू से पूछा, "सोनू... तू अइसन अचानक सुबह-सुबह कैसे? सब ठीक-टाक बा नऽ?"

आज पहली बार सुगना को सोनू की मर्दाना आँखों में आँखें डालकर बात करने में एक अजीब सी, भारी शर्म और हिचक महसूस हो रही थी। उसकी नज़रें बार-बार नीचे फर्श की तरफ झुक जाती थीं। कारण बिल्कुल स्पष्ट था; वर्षों की दूरी के बाद, अभी कुछ ही देर पहले गुसलखाने में सोनू के उसी कड़े पौरुष और जौनपुर की यादों को ध्यान में रखते हुए सुगना ने अपनी कामुकता को उत्कर्ष पर पहुँचाया था। अपनी ही उंगलियों से उस मखमली 'मालपुए' को मथने के कारण उसके चेहरे और गोरे गालों पर जो कामुक लाली और रक्तिम आभा उभरी थी, उसे वह चाहकर भी पूरी तरह छुपा पाने में नाकाम साबित हो रही थी।

लाली, जो कल रात के पूरे घटनाक्रम की सूत्रधार थी, नाश्ते की मेज पर बैठी सुगना की इस हालत का पूरा आनंद ले रही थी। सुगना की चोरी पकड़े जाने के डर और उसकी हिचक को ताड़ते हुए लाली ने तिरछी नज़र से देखा और उसे छेड़ते हुए बिंदास लहजे में कहा, "अरे! जब-जब सोनू घर आवेला, तब-तब सुगना के चेहरे पर एक अजबे नूर आ जाला। सुगना तो बहुत खुश हो जाले, जैसे ओकर संसार लौट आईल हो!"

लाली के इस दोअर्थी और शरारती तंज को भांपकर सुगना की माँ पद्मा और चाची कजरी तुरंत सुगना के पक्ष में ढाल बनकर खड़ी हो गईं। पद्मा ने कचौड़ी प्लेट में रखते हुए कहा, "अरे लाली, खुश काहे नहीं होगी? ओकर प्यारा छोटा भाई बा। बचपन से सुगना ओकरा के अपनी जान से भी ज़्यादा प्यार करेले।" कजरी ने भी हामी भरते हुए कहा, "हाँ, भाई-बहन का अइसन सनेह तो नसीब वालों के मिलेला।"

इन सब बातों के बीच, सोनू चुपचाप चाय की चुस्की लेते हुए सुगना को बहुत ध्यान से देख रहा था। अब से कुछ देर पहले ही स्नान करके निकली सुगना का वह भीगा, खिला-खिला और सुगंधित बदन... जिसे अतीत में न जाने कितनी बार सोनू ने अपनी बाहों में भींचा था, मथा था और जिसके एक-एक अंग का चरम आनंद लिया था। पिछले कई वर्षों की लंबी दूरी और सरयू सिंह की मृत्यु के बाद सुगना के बदले रवैये के कारण सोनू के मन से वे कामुक विचार लगभग पूरी तरह जा चुके थे, वह उन्हें मर्यादा की राख मान चुका था।

परंतु, पिछले कुछ दिनों में सुगना के चेहरे पर आई यह अजीब सी मादक हंसी, उसका थरथराता बदन और इस वक्त लाज से टमाटर की तरह लाल हो रहा उसका चेहरा... सोनू के भीतर सोए हुए उस २५-२६ साल के पुराने रफ एंड टफ मर्द को एक बार फिर सुगना के उसी दिव्य बदन की तरफ तीव्र गति से आकर्षित कर रहा था। सोनू को सुगना के इस रूप में हवेली के बंद कमरों का वही पुराना, वर्जित और मीठा राज़ दोबारा धड़कता हुआ महसूस होने लगा था।

टेबल के एक कोने पर बैठे नई पीढ़ी के सदस्य—सूरज, सोनी और विकास—बड़े कौतूहल से अपनी सुगना दीदी के चेहरे को निहार रहे थे। उन्होंने सुगना को हमेशा गंभीर और शांत देखा था, लेकिन आज वह किसी खिले हुए फूल की तरह सुंदर और प्रफुल्लित लग रही थी। सूरज और विकास आपस में धीमे स्वर में सोनू के रोबीले पुलिसिया अंदाज़ की तारीफ कर रहे थे, जबकि सोनी सुगना के चेहरे की अलौकिक चमक देखकर मुस्कुरा रही थी।

वहीं टेबल के दूसरे छोर पर युवाओं की पूरी टोली जमी हुई थी। मालती, राजू, राजा, रीमा और मधु—यह पूरी युवा ब्रिगेड एक साथ बैठकर नाश्ते का आनंद ले रही थी। लेकिन इस शोरगुल के बीच, मालती और राजू ने खुद को दुनिया से पूरी तरह अलग कर लिया था। उनकी आँखें आपस में इस कदर जुड़ चुकी थीं मानो पूरी टेबल पर सिर्फ वे दो ही मौजूद हों।

मालती ने चाय की प्याली होठों से लगाते हुए अपनी कजरारी आँखों की कोर से राजू की तरफ देखा। उसकी आँखों में एक अजीब सा निमंत्रण, शरारत और कल की किसी अधूरी मुलाकात की तपन साफ़ झलक रही थी। उसने अपनी पलकों को हौसले से थोड़ा झुकाया और फिर सीधे राजू की आँखों में अपनी नज़रें गाड़ दीं। राजू, जो प्लेट में रखी कचौड़ी को तोड़ने का नाटक कर रहा था, मालती की इस बेबाक और सुलगती हुई नज़र को सह नहीं पाया। उसने जब पलटकर मालती की आँखों में झांका, तो उसकी आँखों में पौरुष की चाहत और दीवानगी साफ़ दिखाई दे रही थी।

बिना एक भी शब्द बोले, दोनों ने अपनी आँखों के तीर से एक-दूसरे के बदन की चाहत को स्वीकार कर लिया था। उनकी आँखों का यह खामोश मिलन गवाही दे रहा था कि उनके बीच का संबंध बंद कमरों के उस गहरे और रसीले सुख से पूरी तरह सराबोर हो चुका है, जिसे वे इस वक्त नाश्ते की मेज पर एक-दूसरे को सौंप रहे थे। इस गुप्त खेल के साए में राजा, रीमा और मधु आपस में फुसफुसाते हुए नाश्ते की मेज पर चल रही मीठी छेड़छाड़ का मजा ले रहे थे।

राजा का ध्यान रह रहकर मालती की तरफ जाता और मालती जब जब राजा की कामुक निगाहों को अपने बदन पर महसूस करती वह सिहर जाती उसे यह डर अब भी सता रहा था कि राजा उस राज को राज रखने के बदले में न जाने उसे कौन सी कीमत वसूलेगा।

पूरी टेबल पर जहाँ बाहरी तौर पर एक सुखी और समृद्ध संयुक्त परिवार की हँसी-मजाक गूंज रही थी, वहीं अंदरूनी तौर पर अतीत की वासना, वर्तमान का आकर्षण, नई पीढ़ी के गुप्त प्रेम प्रसंग और लाली का शातिर जाल एक साथ धड़क रहा था। सुगना अपनी माँ और चाची की ओट में छुपकर अपने बहते हुए कामुक मन की सिहरन को समेटने की कोशिश कर रही थी, और सोनू अपनी चाय की चुस्की के साथ उस हवेली के पुराने, वर्जित खेल के दोबारा शुरू होने के संकेत को महसूस कर रहा था।

नाश्ते की उसी टेबल पर जहाँ चारों तरफ वासना और छुपे हुए समीकरणों की गर्माहट तैर रही थी, सूरज, सोनी और विकास के बीच का कोना भी पूरी तरह से एक मादक और कामुक तनाव में तब्दील हो चुका था। यहाँ अपराध बोध का नामोनिशान नहीं था; उसकी जगह केवल एक उग्र आकर्षण और नैनीताल की उन सर्द रातों का रसीला साया काम कर रहा था।

सूरज अब किसी भी बंधन को मानने के मूड में नहीं था। उसके मन में एक अजीब सी उन्मुक्तता और बेबाकी थी। वह नाश्ते की मेज पर पूरी तरह खुलकर, अपनी आँखों से सोनी के गोरे बदन और उसके उभरते हुए अंगों को निहार रहा था। सूरज की नज़रों में इस वक्त पौरुष की वह बेधड़क भूख थी जो समाज के नियमों को दरकिनार करने के लिए तैयार थी। वह अपनी आँखों से सोनी को यह अहसास करा रहा था कि अब वह रुकने वाला नहीं है।

सूरज की इस उन्मुक्त और सीधी कामुक नज़र ने सोनी के भीतर एक मीठा सा डर पैदा कर दिया था। सोनी के दिल की धड़कनें तेज़ हो रही थीं, और उसकी जाँघों के भीतर एक सिहरन दौड़ रही थी। उसे इस बात का डर था कि कहीं सूरज की यह बेबाक आँखें हवेली के बाकी लोगों के सामने उनका यह गुप्त राज़ न खोल दें, लेकिन साथ ही सूरज का यह मर्दानी अंदाज़ उसे अंदर तक उत्तेजित भी कर रहा था। डर और कामुकता के इस अनूठे संगम ने सोनी की साँसों को थोड़ा भारी कर दिया था, और वह शर्माकर अपनी आँखें झुका रही थी।

वहीं पास ही बैठा विकास भी एक अलग ही स्तर की उन्मुक्तता से भरा हुआ था। उसकी आँखों में कोई हिचकिचाहट नहीं थी, बल्कि सोनी के प्रति एक तीखा कामुक अधिकार था। सोनी को सूरज की नज़रों से डरते और सिहरते देख विकास के भीतर की आदिम आग और भड़क उठी थी।

विकास की नज़रें जब सोनी की कसी हुई कमर और उसकी भीगी हुई गर्दन पर टिकतीं, तो उसका दिमाग तुरंत नैनीताल में सूरज द्वारा दी गई पूर्णाहुति के उस मादक दृश्य को याद करता और उसके लिंग में तनाव आ जाता।

तभी सोनू की मर्दाना आवाज में सबका ध्यान खींचा..

“अब से बनारस महोत्सव तक हम बनारस में ही रहब”

पूरा परिवार खुशी से उछल पड़ा….

पद्मा ने सोनू से पूछा…काहे तोहार बदली बनारस हो गइल का?

मनोरमा मैडम हमर ड्यूटी बनारस महोत्सव में अपना साथ लगा देले बाड़ी …सोनू ने संजीदगी से उत्तर दिया..और आगे बोला..

सुगना दीदी मनोरमा मैडम तोहरा बारे में पूछत रहली हा…

मनोरमा का नाम सुनते ही सुगना को अतीत में हुई उसकी सारी मुलाकातें याद आ गई…सुगना मनोरमा के बारे में जानने के लिए बेचैन हों उठी...


शेष अगले भाग में...
 
भाग 215

पद्मा ने सोनू से पूछा…काहे तोहार बदली बनारस हो गइल का?

मनोरमा मैडम हमर ड्यूटी बनारस महोत्सव में अपना साथ लगा देले बाड़ी …सोनू ने संजीदगी से उत्तर दिया..और आगे बोला..

सुगना दीदी मनोरमा मैडम तोहरा बारे में पूछत रहली हा…


मनोरमा का नाम सुनते ही सुगना को अतीत में हुई उसकी सारी मुलाकातें याद आ गई…

अब आगे..

मनोरमा मैडम हमर ड्यूटी बनारस महोत्सव में अपना साथ लगा देले बाड़ी …सोनू ने संजीदगी से उत्तर दिया..और आगे बोला..

सुगना दीदी मनोरमा मैडम तोहरा बारे में पूछत रहली हा…

मनोरमा का नाम सुनते ही सुगना को अतीत में हुई उसकी सारी मुलाकातें याद आ गई…

मनोरमा का नाम सुनते ही सुगना की आँखें कौतूहल और आदर से बड़ी हो गईं। उसने तुरंत सोनू की तरफ देखते हुए पूछा, "सोनू, ई वही मनोरमा मैडम हैं न, जो पिछले बनारस महोत्सव में हम लोगों को आदर से बुलावे खातिर अपनी खास गाड़ी भेजी थीं?"

सुगना के लिए उस गाड़ी का आना महज़ एक सवारी नहीं, बल्कि उसके जीवन का एक बेहद विशेष और ऐतिहासिक मोड़ था। सलेमपुर की उस तंग और रूढ़िवादी पृष्ठभूमि से निकलते वक्त, जब मनोरमा की उस बड़ी सरकारी गाड़ी के दरवाज़े सुगना के लिए खुले थे, तो पूरे गाँव की निगाहें फटी की फटी रह गई थीं। गाँव वालों की आँखों में अपने प्रति जो ईर्ष्या, अचरज और सबसे बढ़कर सम्मान की भावना सुगना ने उस दिन देखी थी, उसने उसके अंदर के सारे संकोच को धो डाला था। उस पल को याद कर आज भी सुगना का मन अंदर तक गदगद हो उठा। सचमुच, वह पहली बार मनोरमा की वजह से स्वयं को समाज में इतना ऊंचा और सम्मानित महसूस कर पाई थी। सुगना के ज़ेहन में मनोरमा का वह बेहद सभ्य, शालीन और मर्यादित चेहरा घूम गया; उस पहली मुलाकात में मनोरमा के ऊंचे व्यक्तित्व ने सुगना को जितना प्रभावित किया था, ठीक उतना ही सुगना की सादगी और शालीनता ने मनोरमा को भी अपना मुरीद बना लिया था।

सुगना ने बेहद आत्मीयता से सोनू से पूछा, "अरे सोनू, तनी ई तो बताओ कि मैडम कैसी हैं? उनका परिवार कुशल-क्षेम ठीक बा न?"

सोनू जो अब तक चाय की चुस्कियां ले रहा था, सुगना के इस सीधे सवाल पर थोड़ा संकुचित और सहमित (मर्यादित) हो गया। वह अपने अनुशासन और मैडम के रुतबे को अच्छी तरह जानता था। उसने बेहद शालीन तरीके से गर्दन हिलाते हुए जवाब दिया, "दीदी, वो मेरी सीनियर अधिकारी हैं, मेरी मैडम हैं। अनुशासन के नाते मैं उनसे दफ़्तर में काम के अलावा ज़्यादा पारिवारिक बातें नहीं कर सकता। आप जब खुद उनसे मिलिएगा, तो उनका हाल-चाल पूछ लीजिएगा।"

सुगना ने अपनी सादगी में थोड़ा संकोच करते हुए हँसकर कहा, "अरे सोनू! वह इतनी बड़ी सरकारी अधिकारी हैं, भला मुझसे काहे मिलेंगी? हम ठहरे सीधे-साधे घरेलू लोग, वो हमसे काहे बात करने लगीं!"

तभी सोनू ने मुस्कुराते हुए गंभीर आवाज़ में कहा, "नहीं दीदी, आप गलत सोच रही हैं। वह सचमुच आपसे मिलना चाहती हैं। दफ़्तर में काम के दौरान भी वह बहुत आदर से आपके बारे में मुझसे पूछ रही थीं। उनका विशेष निर्देश था कि जब भी मैं घर जाऊं, तो आपको उनका प्रणाम कहूं।"

सोनू के मुंह से यह बात सुनते ही सुगना की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। उसे अपनी कानों पर यकीन नहीं हो रहा था कि समाज के इतने ऊंचे पायदान पर बैठी एक महिला अधिकारी की नज़रों में वह आज भी उतनी ही सम्माननीय और आदरणीय है। इस बात ने सुगना के भीतर एक अद्भुत आत्मविश्वास और गर्व भर दिया, जिससे उसका चेहरा फूलों की तरह और अधिक खिल उठा।

नाश्ते की टेबल पर बैठी परिवार की बाकी मंडली भी अब इस बातचीत में पूरी तरह डूब चुकी थी। सुगना की माँ पद्मा, चाची कजरी, और यहाँ तक कि लाली भी सोनू की बातें बड़े कान लगाकर सुन रही थी। जब पूरे परिवार ने यह सुना कि इतनी बड़ी अधिकारी सुगना से मिलने की तीव्र चाहत रखती है और उसके बारे में इतनी फिक्र से पूछती है, तो पूरी नाश्ते की मेज पर एक गहरा सन्नाटा और आदर का भाव छा गया।

सुगना निराली थी.. सुगना का आत्मविश्वास और भी बढ़ गया था और उसके चेहरे की चमक कई गुना हो गई थी मनोरमा जैसी बड़ी और प्रतिष्ठित अधिकारी में उससे मिलने की चाहत जाहिर कर हवेली के हर सदस्य के मन में सुगना की इज्जत और बड़प्पन कई गुना बढ़ गया था।

सूरज, सोनी और विकास जो अपने-अपने अंतर्द्वंद्व में खोए थे, वे भी बड़े गर्व से सुगना दीदी की तरफ देखने लगे। मालती और राजू की नज़रों का खेल भी एक पल के लिए थम गया और पूरा परिवार सुगना के इस सामाजिक गौरव को देखकर भीतर से सम्मान से भर उठा। नाश्ते की टेबल की यह अंतिम बातचीत सुगना को हवेली की मर्यादा और आदर के सर्वोच्च शिखर पर स्थापित कर चुकी थी, जहाँ उसके अतीत के गुप्त बवंडर पर इस सामाजिक सम्मान ने एक पवित्र चादर डाल दी थी।

सब नाश्ते की टेबल पर नाश्ता कर चुके थे पर लाली अब भी सोनू और सुगना में डूबी हुई थी और उन्हें ही याद कर रही थी।

आज बरसों बाद सोनू और सुगना की हालत देखकर लाली को अतीत का वह दौर याद आ गया, जब सुगना पहली बार सोनू के नए घर जौनपुर से वापस बनारस आई थी। यह ठीक वही दौर था जब दोनों के बीच की वर्जित दूरियां ढह चुकी थीं और वे एक-दूसरे के जिस्म के बेहद करीब आ गए थे। लाली के ज़ेहन में उस पूरे गुप्त इतिहास की रसीली रील घूमने लगी।

लाली इस बात से अनजान थी कि सोनू और सुगना का मिलन कैसे हुआ था। पर सुगना उसे तो यह घटनाक्रम एक-एक करके याद आ रहा था। कैसे उस शुरुआती दौर में डॉक्टर के निर्देशानुसार सुगना के भीतर सोनू के लिंग को स्खलित कर उसका पुरुषत्व बचाने की तड़प जाग उठी थी। जब सोनू गहरी और अर्धनिद्रा (दवा के प्रभाव से आधी नींद) में सोया हुआ था, तब सुगना ने लोक-लाज को दरकिनार कर उसाने सोनू के सुगठित पौरुष को जाग्रत करने के लिए उसने अपनी लंबी और कोमल उंगलियों से उसके कसरती अंग को थाम लिया था और धीरे-धीरे हस्तमैथुन (मुठ मारना) करना शुरू कर दिया था।

न जाने ऐसा क्या था कि आज सोनू सुगना और लाली तीनों अपने अतीत में खोए हुए थे जहां तीनों के मन में ही वासना धीरे-धीरे प्रबल हो रही थी तभी, कमरे के एकांत को चीरती हुई चाची कजरी की आवाज़ गूंजी।

कजरी ने अचानक ही नाश्ते के बर्तन समेटते हुए सबके सामने बात उठा दी, "अरे! बहुत दिन हो गईल। सोनू भी आइल बा, काहे नऽ हम सब अबकी सलेमपुर होकर आइल जाव? सलेमपुर का ऊ पुराना घर और दालान हमनी के बाट जोहत होई!"

सलेमपुर जाने की बात सूरज, मालती राजू और बाकी युवाओं ने भी सुनी और सब के सब एक सुर में कजरी की बात में हां में हां मिलाते हुए सलेमपुर जाने के लिए जिद करने लगे।

आज भी इस प्रकार के निर्णय लेने का अधिकार सुगना को ही था। सभी सुगना के समक्ष अपनी बात रखने लगे और कजरी की बात का समर्थन करने लगे आखिरकार सुगना ने मुस्कुराते हुए हां कर दी और जाने के लिए कल का दिन निर्धारित कर दिया।

'सलेमपुर' शब्द सुनते ही जैसे हवा में एक ज़ोरदार बिजली कौंध गई। सुगना की आँखें झटके से खुलीं और उसका दिल धक-धक करने लगा—क्योंकि सलेमपुर ही वह जगह थी जहाँ से उनकी वासना, मर्यादा टूटने और इस गुप्त रिश्ते की पहली नींव रखी गई थी। सोनू का हाथ चाय की चुस्की लेते हुए जम गया, और लाली के होठों पर एक बहुत ही शातिर, कामुक मुस्कान तैर गई। कजरी का सलेमपुर जाने का यह सुझाव उस सुलगती हुई आग में घी का काम करने वाला था।

सलेमपुर जाने की चर्चा के बाद हवेली में दोपहर का सन्नाटा पसर चुका था। धूप ढलने लगी थी और ज़्यादातर लोग अपने-अपने कमरों में आराम कर रहे थे। इसी खामोशी का फ़ायदा उठाते हुए लाली ने सोनू के कमरे का रुख किया।

आज लाली ने पूरी हिम्मत जुटाकर सोनू से सुगना और उसके रिश्तों के बारे में खुलकर बात करने का पक्का फ़ैसला कर लिया था। बीती रात जिस तरह उसने अपनी शातिर चालों से सुगना को सुलगती यादों के जाल में फंसाकर सोनू के साथ उसके कामुक संबंधों की दास्तान कबूल करवा ली थी, वही दांव आज वह सोनू पर आजमाने वाली थी। सुगना के मुँह से मिली एक-एक रसीली और गुप्त जानकारी का सहारा लेकर लाली ने बात की शुरुआत की।

लाली ने बड़े सहज अंदाज़ में सोनू के पास बैठकर कहा, "का हो सोनू... तोहरा सुगना के तनिकहू खयाल ना आवेला?"

सोनू ने चौंककर लाली की तरफ देखा और सवालिया लहजे में पूछा, "काहे? अइसन काहे पूछत बाड़ू?"

लाली ने मंद-मंद मुस्कुराते हुए उसकी आँखों में देखा, "देखऽ, ज़्यादा नादान बने के कोशिश मत करऽ। जब से सरयू चाचा गइलें हैं, तब से सुगना एकदम उदास रहेली। याद बा कि पहले कितना हँसत-खेलत रहली?"

सोनू ने चाय का खाली कप रखते हुए एक ठंडी साँस भरी, "हूँ, ई बात तो सच बा... पर अभी कुछ दिनों से सुगना दीदी वापस थोड़ा खुश रहे लागल बाड़ी। हमके देख के बहुत अच्छा लागेला।"

"हां, ई बात तो सच बा कि जब से सूरज डॉक्टर बनल बा, सुगना के चेहरे पर खुशियां लौट आईल बाड़ी..." लाली ने बात को दूसरा मोड़ देते हुए कहा, "पर सोनू... एक औरत के असली खुशी सिर्फ ई सब चीज़ों से ना मिलेला।"

सोनू ने थोड़ा उलझते हुए पूछा, "अब तू का कहे के चाहत बाड़ू लाली?"

लाली सोनू के और करीब खिसक आई और उसकी आँखों में झांकते हुए बोली, "वही... जो सुख तू सुगना के जौनपुर में देले रहलऽ!"

यह सुनते ही सोनू अवाक रह गया। उसके माथे पर पसीने की बूंदें चमक आईं। उसने हड़बड़ाते हुए कहा, "का... कौन सा सुख?"

लाली ने तिरछी नज़र से देखते हुए तंज कसा, "ज़्यादा नादान मत बनऽ सोनू! हमके सब पता बा... सुगना हमके सब कुछ बता देले बा। आखिरकार ऊ हमार पुरानी सहेली हई, हमनी के बीच कुछ छुपल ना बा।"

सोनू हक्का-बक्का रह गया। उसे अपनी सुगना दीदी से इस बात की उम्मीद कतई नहीं थी कि वह उनके इतने बरसों पुराने, वर्जित और बेहद गुप्त रिश्ते को किसी के सामने इस तरह खोलकर रख देगी। सोनू के भीतर एक गहरा धक्का लगा, लेकिन फिर भी खुद को संभालते हुए, अनजान बनते हुए पूछा, "कौन सी बात? का बता देले बा सुगना दीदी?"

तभी लाली ने बिना एक पल गंवाए, अपने दोनों हाथों से सोनू के दोनों गालों को थाम लिया। सोनू का चेहरा अपनी तरफ घुमाकर, उसकी आँखों में सीधे अपनी सुलगती नज़रें गाड़ते हुए लाली ने एकदम धीमी और मादक आवाज़ में पूछा:

"अपना 'दहेज' भूल गइलऽ का सोनू? सुगना दहेज में तोहरा के का देले रहली... सब पता बा हमके!"

'दहेज' शब्द सुनते ही सोनू के पैर तले ज़मीन खिसक गई। सुगना का अपने उस मखमली हिस्से (योनि) को दहेज के रूप में सोनू को सौंपने का राज़ सिर्फ उन दोनों के बीच का था। अब कहने और सुनने को कुछ बाकी नहीं रह गया था। सोनू को पूरा यकीन हो गया कि सुगना ने अपने और उसके बीच का एक-एक कामुक राज़ लाली के सामने उड़ेल दिया है।

अपनी झेंप, घबराहट और पकड़े जाने की बेबसी को मिटाने के लिए सोनू के भीतर का मर्द अचानक उग्र हो उठा। उसने झटके से लाली के सिर को अपनी तरफ खींचा और अपने होठों को लाली के होठों पर बेरहमी से भींच दिया। लाली इस उग्र हमले के लिए तैयार थी, वह तो इसी पल का इंतज़ार कर रही थी।

अगले ही पल, सोनू लाली के होठों को चूसने लगा, लेकिन उसके दिमाग में इस वक्त लाली नहीं, बल्कि सुगना की वही भीगी और लाल होठों वाली सूरत घूम रही थी। वह लाली के होठों में सुगना के होठों का वही पुराना, वर्जित स्वाद ढूंढ रहा था। सोनू के कड़े हाथ लाली की गाबरी (सुगठित) और चौड़ी पीठ पर बेबाकी से घूमने लगे, वह लाली के बदन को अपनी बाहों में कसता चला गया।

दोनों के बीच उत्तेजना जब अपने चरम पर पहुँचने लगी, तभी सोनू की निगाह अचानक कमरे के खुले हुए दरवाज़े की तरफ चली गई। हवेली में किसी के भी उधर आ निकलने का डर कौंधते ही, सोनू ने एक झटके से अपने होंठ लाली के होठों से हटाए और भारी साँसों के बीच हाँफते हुए बोला:

"अरे... पहले जा के दरवाज़ा बंद कर दऽ!"

सोनू की भारी साँसों के साथ निकला वह हुक्म सुनते ही लाली की आँखों में एक शातिर जीत की चमक कौंध गई। वह अच्छी तरह जानती थी कि सोनू का पौरुष अब उसके बिछाए जाल में पूरी तरह उलझ चुका है।

लाली बिना एक पल गंवाए, अपनी बिखरी हुई साड़ी की सिलवटों को एक हाथ से संभालते हुए उठी। उसकी चाल में बिल्ली जैसी एक मादक लचक थी। उसने दबे पाँव दरवाज़े के पास पहुँचकर बाहर गलियारे की तरफ एक उड़ती हुई नज़र डाली—चारों तरफ दोपहर का सन्नाटा पसरा हुआ था। उसने दरवाजे की कुंडी लगा दी।

कुंडी चढ़ाने के बाद लाली पलटी और सोनू की तरफ देखने लगी। सोनू अभी भी पलंग के किनारे बैठा हुआ, भारी साँसें लेते हुए अपने हाथों की कांपती उंगलियों को देख रहा था। उसके दिमाग में अभी भी यह बवंडर चल रहा था कि सुगना ने अपने और उसके उस-वर्जित राज़ को लाली के सामने कैसे खोल दिया। पर अब जो आग भड़क चुकी थी, वह किसी सोच की मोहताज नहीं थी।

लाली धीरे-धीरे कदम बढ़ाती हुई सीधे सोनू के सामने आ खड़ी हुई। उसने अपने दोनों हाथों से अपनी साड़ी का पल्लू कंधों से नीचे गिरा दिया। उसका गाबरा और सुगठित बदन केवल पतले ब्लाउज में सिमटा हुआ सोनू की नज़रों के ठीक सामने था।

"अब तो दरवाज़ा बंद हो गइल बा सोनू... अब किस बात का डर?" लाली ने एकदम धीमी, रसीली और मखमली आवाज़ में फुसफुसाते हुए कहा।

उसने आगे बढ़कर सोनू के शर्ट के ऊपरी बटन पर अपनी उंगलियां टिका दीं। सोनू ने नज़र उठाकर लाली का चेहरा देखा, लेकिन काम-रस के इस भंवर में उसे लाली की जगह सुगना का वही लजीला और तड़पता हुआ चेहरा नज़र आ रहा था।

"सोनू... सुगना तोहरा के जो 'दहेज' देले रहली, ओकर स्वाद तो तू सालोंलेले बाड़ऽ..." लाली ने सोनू की गोदी में बैठते हुए उसकी गर्दन में अपनी बांहें डाल दीं और उसके कान के पास अपने होंठ सटाकर बोली, "आज हमारो के वही सुख वैसे ही द जैसे सुगना के जौनपुर में देले रहला!"

लाली के मुँह से सुगना का नाम और जौनपुर का ज़िक्र सुनते ही सोनू का संयम पूरी तरह टूट गया। उसके भीतर का २५-२६ साल का वही पुराना, बेबाक और उग्र मर्द पूरी ताक़त से जाग्रत हो उठा। सोनू ने अपनी झेंप और सुगना के प्रति उठ रही तड़प को एक उग्र रूप दे दिया।

सोनू ने एक झटके में लाली की पतली कमर को अपने फौलादी हाथों में जकड़ा और उसे पलंग पर नीचे पटक दिया। सोनू के कड़े हाथ लाली के बदन पर चढ़े कपड़ों को बेदर्दी से ढीला करने लगे। लाली ने कोई विरोध नहीं किया, बल्कि वह तो अपने होठों को भींचकर सोनू की इस मर्दाना उग्रता का स्वागत कर रही थी।

इसी दौरान, सोनू की आँखों में चमकती उस बेबाक कामुकता को देखकर लाली का दिल खुशी से झूम उठा। वह भांप गई थी कि इतने सालों बाद भी सुगना का नाम सोनू के पौरुष के लिए एक अचूक चिंगारी का काम करता है। सुगना की याद और उसके गुप्त इतिहास का ज़िक्र करके लाली आज एक बार फिर सोनू के भीतर काम-रस और उग्र उत्साह भरने में पूरी तरह कामयाब हो चुकी थी।

उसने सोनू के कानों के पास अपने भीगे और सुलगते हुए होंठ सटा दिए और बेहद कामुक, रसीली आवाज़ में फुसफुसाने लगी:

"सोनू... सुगना ने हमके सब कुछ बता देले बा। जौनपुर में जब तू अर्धनिद्रा में रहलऽ, तब सुगना ने कैसे तोहार पौरुष जगावल रहल... और कैसे बाद में तू उनके उस रसीले मालपुए को निचोड़ के अपना बना लेले रहलऽ। आज सुगना के उसी राज़ के बदले... अपनी ई लाली के बदन का रस भी पूरी उग्रता से निचोड़ ले सोनू!"

लाली की इन सीधी और तीखी कामुक बातों ने सोनू के संयम का आखिरी बांध भी तोड़ दिया। सोनू ने बिना एक पल गंवाए अपने कपड़े भी उतार फेंके।

कुछ ही देर में दोनों पूरी तरह से नग्न (निर्वस्त्र) होकर पलंग के मखमली बिस्तरे पर एक-दूसरे की बाहों में थे। बिस्तर पर काम-रस का नशा अपने चरम पर पहुँच चुका था। लाली नीचे लेटी हुई गहरी साँसें भर रही थी और सोनू उसके सुगठित बदन पर पूरी तरह हावी था।

सोनू ने लाली की दोनों कसी हुई जाँघों के बीच खुद को टिका लिया था। उसका कड़ा, फौलादी पौरुष लाली के काम-स्थल की भीगी बनावट पर उग्रता से रगड़ खा रहा था, जिससे लाली के बदन में रुक-रुक कर सिहरन दौड़ जाती थी। सोनू के दोनों कड़े हाथ लाली के भारी और उभरे हुए वक्ष (चूचियों) को अपनी हथेलियों में भरकर बेबाकी से मसल रहे थे। वह कभी अपने दांतों से तो कभी होठों से उसके सुर्ख़ निप्पलों को चूसते हुए कामुकता की हदों को छू रहा था।

लेकिन इस मादक उग्रता के बीच भी सोनू के दिमाग से सुगना की याद का भूत उतर नहीं रहा था। हर धक्के और हर रगड़ के साथ उसका कौतूहल और भड़क उठता था।

सोनू ने अपने होंठ लाली के छाती से उठाकर उसके कांपते हुए चेहरे के करीब लाए और अपनी उखड़ी हुई भारी साँसों के बीच बार-बार वही सवाल दोहराने लगा:

"बोल ना लाली... अउरी का-का बतवले बाड़ी सुगना दीदी? हमनी के उस गुप्त रिश्ते का कौन-कौन सा राज़ खोली हैं ऊ? सब साफ़-साफ़ बतावऽ!"

सोनू की इस उग्र पूछताछ और नीचे चलती पौरुष की तीव्र रगड़ ने लाली को बेसुध सा कर दिया। लाली ने अपनी आँखें भींच लीं और सोनू की चौड़ी पीठ पर अपने नाखून गढ़ाते हुए कामुक सिसकारी के साथ बोली:

"आहх... सोनू! पहले सुगना के नाम पर अपनी ई लाली के बदन को पूरी तरह निचोड़ तऽ ले... सब बता देब! ऊ तोहार पौरुष का एक-एक बखान कइले बाड़ी...!"

कमरे के भीतर की हवा दो नग्न शरीरों की कामुक तपन और सुगना के गुप्त इतिहास की रसीली यादों से पूरी तरह ज़हरीली और मादक हो चुकी थी।

बिस्तर की मखमली चादरों पर दोनों के नग्न बदन एक-दूसरे से गुंथ चुके थे। सोनू का कड़ा पौरुष लाली की भीगी गहराई में उग्रता से समा चुका था, और हर थपेड़े के साथ कमरे का सन्नाटा दो शरीरों की तेज़ रगड़ तथा लाली की मदहोश सिसकारियों से गूँज रहा था।

लाली नीचे लेटी सोनू की कसरती पीठ पर अपने दोनों पैर कसे हुए थी। वह जानती थी कि सोनू का यह उग्र रूप सुगना के नाम की ही देन है। वह हर धक्के के साथ सोनू की गर्दन में अपने हाथ डालती और उसके कान में सुगना के ज़िक्र की तीखी चिंगारियाँ डालती रहती:

"आह... सोनू! मारऽ धक्का... अउरी ज़ोर से! आज ई समझ के मथऽ कि तू सुगना का वही मखमली मालपुआ निचोड़त बाड़ऽ... जो जौनपुर के बंद कमरे में तोहरे नाम भइल रहल!"

लाली के मुँह से सुगना का यह मादक ज़िक्र सुनते ही सोनू के भीतर का मर्द और बेकाबू हो जाता। उसकी आँखें लाल हो जातीं और वह दुगनी ताक़त तथा उग्रता से लाली के बदन को मथने लगता। सोनू की भारी, उखड़ी हुई साँसें लाली के गालों पर तपन छोड़ रही थीं।

सोनू (हाँफते हुए, कड़क आवाज़ में): "लाली... तू हमरा भीतर सुगना दीदी का अइसन नशा भर देले बाड़ू कि आज हमके कवनो होश नईखे! बोल... अउरी का-का बतवले रहली ऊ तोहरा से? का ऊ तोहरा के हमार ई पौरुष याद दिलावत रहली?"

लाली (सिसकते और आँखें भींचते हुए): "आहाहा... हाँ सोनू! ऊ कहत रहली कि सोनू का पौरुष जब चढ़ेला, तऽ ज़मीन-आसमान एक कर देला! ऊ तोहार एक-एक धक्के के तड़प के याद करत रहली... आज अपनी ई लाली के भी उसी तड़प में डुबो दे सोनू!"

सोनू ने लाली के दोनों हाथों को सिर के ऊपर पलंग पर ज़ोर से दबा दिया और बेहद तीखे तथा तेज़ लय में अपनी पौरुष चाल जारी रखी। लाली का गोरा बदन सोनू के फौलादी धक्कों से थरथरा रहा था। सोनू लाली की देह में सुगना के उसी पुराने, वर्जित स्वाद को ढूँढते हुए पूरी तरह बेसुध हो चुका था।

सलेमपुर जाने से ठीक एक दिन पहले, हवेली के इस बंद कमरे में सुगना के अतीत के राज़ और लाली की चालाकी ने वासना की एक ऐसी आग जला दी थी, जिसमें मर्यादा की हर सीमा भस्म हो रही थी।

चरम-सुख के उस उग्र बवंडर के शांत होते ही, कमरे में केवल दो ढीली पड़ी साँसों की भारी आवाज़ें गूँज रही थीं। सोनू और लाली दोनों ही पूरी उग्रता के साथ खाली हो चुके थे।

लाली पलंग पर सोनू की चौड़ी, पसीने से भीगी छाती पर अपना सिर टिकाए लेटी थी। उसने अपनी कोमल उंगलियों से सोनू के कसरती गालों को सहलाते हुए बड़े मीठे और कामुक अंदाज़ में कहा:

"सोनू... याद बा? जब शादी से पहले हमनी दोनों गुप्त रूप से मिलत रहली जा, तब सुगना हमनी के छुप-छुप के देखत रहली..."

सोनू ने एक गहरी साँस भरी और लाली के बालों में उंगलियां फेरते हुए भारी आवाज़ में हाँ में हाँ मिलाया, "हूँ... हमके भी याद बा। और शायद ओही से उनके भीतर भी ऊ सोइल आग जगल रहल, जेकर फल हमके जौनपुर में मिलल..."

बातचीत के इसी सिलसिले के दौरान, लाली ने अचानक अपना सिर उठाया और सीधे सोनू की आँखों में अपनी सुलगती नज़रें गाड़ दीं।

"सोनू... हमके एक बार फिर से ऊ नज़ारा देखे के बा..." लाली की आवाज़ में एक अजीब सा जुनून और तड़प थी।

सोनू ने थोड़ा हैरान होकर उसकी आँखों में झांका, "का देखे के बा? का कहे के चाहत बाड़ू?"

लाली के होठों पर एक पल के लिए हिचकिचाहट आई, पर आखिरकार उसने अपने मुँह से वह वर्जित शब्द उगल ही दिया, "हमके तोहरा के... सुगना के मालपुआ चूसत देखे के बा ओकर मालपुआ आज भी उतने सुंदर बा जैसे पहिले रहे!"

यह सुनते ही सोनू का माथा ठनक गया। उसके जेहन में सुगना की खूबसूरत मालपुआ की तस्वीर कौध गई जिसने न जाने उसने कितनी बार चूसा था चुम्मा था चाटा था और फिर मन भर कर चोदा था.. उसने झटके से लाली को देखा, "का! का बकवास करत बाड़ू लाली? ई का कहत बाड़ू तू?"

लाली ने तुरंत सोनू को अपने आलिंगन में कसकर भर लिया। उसके जिस्म की तपन सोनू के कड़े बदन में उतरने लगी। लाली उसके कान के पास फुसफुसाते हुए बोली, "सोनू... हम और सुगना अलग कहाँ बनीं? हमनी के बीच का ऊ पुराना गुप्त नाता तू भूल गइलऽ का? बस एक बार सोनू... सिर्फ एक बार!"

बात करते-करते लाली ने महसूस किया कि सोनू की जाँघों के बीच सोया हुआ उसका पौरुष (लिंग) लाली के कामुक स्पर्श और सुगना के इस वर्जित प्रस्ताव की कल्पना मात्र से एक बार फिर तने लगा था। लाली ने बिना देर किए सोनू के उस कड़े होते अंग को अपनी भीगी जाँघों के कोष में भींच लिया और बार-बार यही अनुरोध करने लगी।

आख़िरकार सोनू ने थोड़ा पीछे हटते हुए और लाली को अपने से अलग करते हुए गंभीर लहजे में कहा:

"तू एकदम पागल हो गइल बाड़ू लाली! ई कवनो जन्म में संभव नईखे। सुगना दीदी कभी ई बात ना मानेंगी... और अब समय बीत गइल बा, ऊ पहले से बिलकुल बदल गइल बाड़ी।"

लाली के होठों पर एक बहुत ही शातिर और रहस्यमयी मुस्कान तैर गई। उसने सोनू की छाती पर अपनी उंगली से गोल-गोल बनाते हुए धीमी आवाज़ में कहा:

"पहले तू तो हाँ करऽ सोनू... फिर सुगना के मनावे के ज़िम्मेदारी हमरा पर छोड़ दऽ!"

शेष अगले भाग मे
 
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