Incest आह..तनी धीरे से.....दुखाता. - Page 141 - SexBaba
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Incest आह..तनी धीरे से.....दुखाता.

167 वाले अपडेट के लिए सोनी की पिक्चर चाहिए
 
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1 कहानी के अच्छे और बुरे पहलू के बारे में मुझे सूचित करके

2. कहानी से मिलती-जुलतीकोई उत्तेजक पिक्चर डालकर

3.. कुछ भी और साथी पाठको के पढ़ने लायक
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भाग 169

रोजी को अहसास हुआ कि शायद समर्पण ही वह चाबी है जो सूरज के मन के बंद दरवाजे खोल सकती है। उसने तय किया कि वह अब अपनी सुंदरता को केवल एक आभूषण नहीं, बल्कि एक अस्त्र की तरह प्रयोग करेगी। वह सूरज को उस चरम सुख की दहलीज तक ले जाएगी, जहाँ पहुँचकर इंसान सब कुछ भूल जाता है और अपनी संगिनी के तन-बदन और रूह में समा जाता है।

उसने अपने जन्मदिन को एक 'अंतिम हथियार' की तरह इस्तेमाल करने का सोचा। उसने मन ही मन ठान लिया कि वह अपनी पूरी गरिमा और सुंदरता को सूरज के सामने 'समर्पित' कर देगी, ताकि सूरज के मन से हर दूसरा ख्याल मिट जाए और सिर्फ 'रोजी' ही शेष रहे।

अब आगे..

शाम को कॉलेज की लाइब्रेरी के सबसे पिछले और सुनसान कोने में, जहाँ पुरानी किताबों की महक हवा में घुली हुई थी, रोजी और सूरज साथ बैठे थे। सूरज का ध्यान अभी भी अपनी एनाटॉमी की किताब पर था, लेकिन रोजी की आँखों में कुछ और ही शरारत और बेचैनी नाच रही थी। सहेलियों की बातों ने उसके भीतर एक नई हिम्मत भर दी थी। उसने धीरे से अपना पैर मेज के नीचे सूरज के पैर से सटाया और अपनी उंगलियों से उसकी कलाई को सहलाने लगी।

रोजी (मधुर और दबी आवाज़ में): "सूरज... तुम हमेशा इन बेजान हड्डियों और मांसपेशियों में खोए रहते हो। कभी इस 'जीते-जागते' जिस्म की धड़कन भी सुनी है?"

सूरज ने चौंककर उसकी ओर देखा। रोजी आज कुछ अलग लग रही थी। उसकी कुर्ती का गला थोड़ा गहरा था और उसकी आँखों में एक अजीब सा निमंत्रण था।

सूरज: "रोजी, तुम जानती हो एग्जाम्स करीब हैं। और वैसे भी, तुम इतनी खूबसूरत लग रही हो कि मेरा ध्यान भटक जाता है।"

रोजी ने एक शरारती मुस्कान बिखेरी और थोड़ा और करीब झुक गई, जिससे उसके इत्र की मादक खुशबू सूरज के नथुनों से टकराई।

रोजी: "अच्छा? ध्यान भटकता है या बस दिखावा करते हो? सच बताओ सूरज, हम इतने वक्त से साथ हैं... क्या तुम आज भी उतने ही 'मासूम' और 'कोरे' हो जितना पहले दिन थे? या किसी और ने इस मेडिकल स्टूडेंट का 'प्रैक्टिकल' ले लिया है?"

सूरज की धड़कनें तेज हो गईं। मौसी के बाद अब रोजी भी उसी राह पर थी।

सूरज (हल्की हंसी के साथ): "प्रैक्टिकल? तुम क्या कहना चाहती हो रोजी?"

रोजी (उसकी शर्ट के कॉलर से खेलते हुए): "मेरा मतलब है कि क्या तुम अब भी 'वर्जिन' हो? क्या तुम्हारी जवानी की ये आग अब तक किसी ने शांत नहीं की? तुम इतने सुगठित और तने हुए दिखते हो कि मुझे यकीन नहीं होता कि तुम अब तक कुंवारेपन का बोझ ढो रहे हो।"

उसने अपनी उंगली सूरज की हथेली पर गोल-गोल घुमाते हुए उसके चेहरे की ओर देखा, मानो उसके मन की गहराई टटोल रही हो।

रोजी: "सच कहूँ तो, मुझे डर लगता है कि कहीं तुम अंदर ही अंदर किसी ज्वालामुखी की तरह फट न जाओ। क्या तुम... क्या तुम मेरे साथ उस 'खास मिलन' के लिए उत्सुक नहीं हो? क्या तुम्हें मेरी बाहों में वो सुकून नहीं चाहिए जिसकी तलाश हर मर्द को होती है?"

सूरज ने गहरी सांस ली। उसके दिमाग में मौसी की छुअन और रोजी का ये खुलापन एक युद्ध छेड़ रहे थे।

सूरज: "रोजी, प्यास तो बहुत है... और हाँ, मैं अब भी 'कोरा' हूँ। पर ये उत्सुकता कभी-कभी इतनी बढ़ जाती है कि मुझे खुद पर काबू पाना मुश्किल लगता है। मैं पत्थर नहीं हूँ, मेरा भी मन करता है कि तुम्हें अपनी बाहों में भरकर उस चरम सुख तक ले जाऊँ।"

रोजी की आँखों में चमक आ गई। उसने सूरज के कान के पास जाकर धीरे से काटा और फुससाई, "तो फिर इस 'कोरेपन' को खत्म क्यों नहीं करते? मैं पूरी तरह तुम्हारी होने के लिए तैयार हूँ। मेरा ये तराशा हुआ बदन सिर्फ तुम्हारी छुअन का इंतजार कर रहा है। बताओ... कब मुझे अपना बनाओगे? मैं तुम्हें अनोखा उपहार देना चाहती हूँ। मैं चाहती हूँ कि हमारे बीच की यह दूरी हमेशा के लिए खत्म हो जाए। उस दिन हम होंगे, और हमारा मिलन होगा।"

उसकी आवाज़ में एक ऐसी खनक और आमंत्रण था जिसे नजरअंदाज करना नामुमकिन था। रोजी ने इशारों ही इशारों में साफ़ कर दिया था कि वह उस दिन अपनी कौमार्य की दहलीज पार कर सूरज के साथ पूर्ण मिलन के सुख को अनुभव करना चाहती है।

सूरज, जो अब तक मौसी सोनी की यादों के 'हस्तमैथुन' और कल्पनाओं के भंवर में फंसा हुआ था, रोजी की इस प्रत्यक्ष और जीवंत पेशकश से चौंक उठा। एक पल के लिए सोनी का चेहरा धुंधला हुआ और रोजी का यौवन उसकी आँखों में चमकने लगा। जब उसने देखा कि उसकी प्रेमिका, जो उसे बेपनाह चाहती है, खुद आगे बढ़कर अपनी देह और आत्मा को उसे समर्पित करने का आह्वान कर रही है, तो सूरज के भीतर का पुरुष जाग उठा। उसे लगा कि शायद यही वह रास्ता है जो उसे मौसी के प्रति अपनी उस 'अतृप्त और वर्जित प्यास' से मुक्ति दिला सकता है।

सूरज भावुक हो गया और उसने रोजी को अपने आलिंगन में ले लिया। दोनों प्रेमी एक-दूसरे में समा जाने की कोशिश करने लगे। रोजी अमरबेल की तरह सूरज से लिपटी हुई थी और अपने कानों पर सूरज की सांसों की गर्मी महसूस कर रही थी। तभी सूरज ने उसके चेहरे को खुद से अलग किया और उसके होंठों को चूम लिया। चुंबन की गहराई बढ़ती गई और सूरज पूरे तन-मन से रोजी की पीठ पर अपनी हथेलियाँ फिराता रहा, यहाँ तक कि उसकी हथेलियों ने रोजी के नितंबों का भी जायजा लेने की कोशिश की। रोजी ने कोई प्रतिरोध नहीं दिखाया, अपितु सूरज का यह प्यार देखकर वह पिघल गई थी।

किसी अनजान की आहट से दोनों अलग हुए। पर सूरज का दुर्भाग्य, रोजी जैसी सुंदरी के इस काम-निमंत्रण और अद्भुत आलिंगन के बावजूद उसके लिंग में कोई तनाव नहीं आया।

पर रोजी के इस समर्पण ने सूरज के मन में एक नई ऊर्जा भर दी। वह खुश था, उत्साहित था। उस शाम वे दोनों घंटों तक एक-दूसरे का हाथ थामे बैठे रहे।


अगले रविवार को रोजी का जन्मदिन था। उसने इस दिन को यादगार बनाने के लिए एक साहसी निर्णय लिया। उसने अपनी सहेली के सूने पड़े फ्लैट की चाबियाँ हासिल कीं और सूरज को एक 'एकांत में' मुलाकात का न्योता दे दिया।

सूरज अब जब रोजी को देख रहा था, तो उसकी नजरों में वह बेरुखी नहीं, बल्कि प्यार की वह चमक थी जो अब वासना का रूप लेकर मिलन की पराकाष्ठा प्राप्त करने वाली थी। रोजी के तराशे हुए बदन की कल्पना अब उसे उत्तेजित करने लगी थी, पर लिंग के तनाव का वही हाल था। सूरज ने मन ही मन तय कर लिया था कि वह रविवार को रोजी के प्रेम की गहराई में उतरकर अपनी उन तमाम बेचैनियों को शांत कर देगा जो उसे रात भर जगाए रखती थीं। अब इंतज़ार था तो बस उस 'सुनहरे संडे' का, जहाँ मर्यादा और प्रेम का एक नया संगम होने वाला था।

सूरज के मन का बोझ हल्का हो चुका था। रोजी के निमंत्रण ने जहाँ उसे एक नई राह दिखाई थी, वहीं उसके मन के कोने में छिपा वह डर कि 'क्या वह उस मिलन को पूर्ण कर पाएगा', उसे रह-रहकर कचोट रहा था।


घर पहुँचने के बाद, शाम की हल्की धुंधली रोशनी में जब सोनी मौसी चाय का प्याला लेकर उसके कमरे में दाखिल हुईं, तो उन्होंने सूरज की आँखों में पसरी उस अनजानी चिंता को तुरंत पढ़ लिया।

सोनी ने चाय की मेज पर प्याला रखा और सूरज के करीब बैठते हुए बड़े ही आत्मीय स्वर में पूछा।

सोनी: "क्या बात है सूरज? आज फिर चेहरा लटका हुआ है? कॉलेज से तो तुम बड़े उत्साह में लौटे थे, फिर अचानक ये उदासी कैसी?"

सूरज ने एक ठंडी आह भरी। वह जानता था कि इस दुनिया में सोनी ही वह शख्स है जो बिना कहे उसकी शारीरिक और मानसिक तड़प को समझ सकती है। उसने अपनी हिचक को एक तरफ रखा और अपनी मौसी की आँखों में झाँकते हुए बोला।

सूरज: "मौसी... मैं एक अजीब कशमकश में हूँ। रोजी ने मुझे रविवार को अपने जन्मदिन पर बुलाया है।"

सोनी ने अनजान बनते हुए पूछा, "कौन रोजी?"

सूरज: "अरे मौसी, मेरी दोस्त!"

सोनी (रोजी का चेहरा जेहन में लाते हुए): "अच्छा, वह जो तेरे जन्मदिन पर आई थी? अरे, वह तो एकदम गुड़िया जैसी है। बहुत सुंदर लगती है। वह तुझे पसंद करती है?"

सूरज के चेहरे पर लालिमा छा गई, वह शर्मा गया। सोनी ने सूरज का हाथ पकड़ लिया, परंतु यह ध्यान रखा कि वह अंगूठा उसकी उंगलियों से दूर ही रहे। वह उसकी हथेलियाँ सहलाते हुए बोली, "अरे, मैं तेरी मौसी भी हूँ और दोस्त भी। मुझे शर्माने की जरूरत नहीं है, मुझसे खुलकर अपनी बात बता सकता है।"

सूरज ने सधी हुई जुबान में धीरे से बोला, "मौसी, रोजी ने मुझे अपने जन्मदिन पर एकांत में बुलाया है।"

सोनी: "यह तो खुशी की बात है, सूरज। रोजी तुम्हें बहुत प्यार करती है। इसमें परेशानी की क्या बात है?"

सूरज (बेबसी से जाँघों के बीच इशारा करते हुए): "परेशानी प्यार को लेकर नहीं है मौसी... परेशानी इसे लेकर है।"

सोनी: "सूरज, तूने कहा कि रोजी तुझे एकांत में बुला रही है... पर मुझे ये तो बता कि तू उसके बारे में सोचता क्या है? वह दिखने में कैसी है? मेरा मतलब है, तेरे लिए उसकी सुंदरता के क्या मायने हैं?"

सूरज थोड़ा हिचकिचाया, फिर अपनी यादों की परतों को खोलने लगा। उसकी आँखों में एक चमक सी आ गई।

सूरज: "मौसी, वो... वो बहुत अलग है। उसकी त्वचा एकदम कुंदन जैसी दमकती है। जब वो चलती है, तो ऐसा लगता है जैसे कोई कविता आकार ले रही हो। उसकी आँखें हमेशा कुछ न कुछ कहती रहती हैं, जैसे उनमें कोई गहरा समंदर छुपा हो।"

सोनी ने देखा कि सूरज अब अपनी झिझक छोड़ रहा है। उसने उसकी हथेलियों को सहलाना शुरू किया, जिससे सूरज के भीतर का संकोच और कम होने लगा।

सोनी (मुस्कुराते हुए): "सिर्फ आँखें ही? और क्या अच्छा लगता है तुझे उसमें? आखिर तू एक मेडिकल स्टूडेंट है, तेरी नजर तो पारखी होगी ही।"

सूरज ने गहरी सांस ली और थोड़ा और खुल गया।

सूरज: "मौसी, उसकी गर्दन... बहुत सुराहीदार है। जब वो अपने बाल पीछे करती है, तो उसके कानों के पीछे की वो छोटी सी जगह मुझे बहुत आकर्षित करती है। और उसकी मुस्कुराहट... जब वो हंसती है, तो उसके होंठों की जो बनावट है, वो किसी को भी मदहोश कर दे। मैंने... मैंने उसे लाइब्रेरी के अंधेरे कोने में महसूस किया है, मौसी।"

सोनी (धीमी आवाज़ में): "महसूस किया? मतलब, क्या तूने उसे कभी करीब से छुआ है?"

सूरज अब पूरी तरह सोनी के प्रभाव में था। उसने उन पलों का वर्णन करना शुरू किया जो अब तक उसके सीने में दफन थे।

सूरज: "हाँ मौसी... आज लाइब्रेरी में जब हम अकेले थे, तो उसने मेरा हाथ थामा। उसकी उंगलियाँ मेरी कलाई पर रेंग रही थीं। फिर उसने मुझे चूम लिया। उसके होंठों का स्पर्श इतना कोमल और गर्म था कि लगा जैसे मैं पिघल जाऊँगा। मैंने उसे अपनी बाहों में भरा, उसे कसकर भींचा। मेरा हाथ उसकी पीठ पर था, और फिर धीरे-धीरे... मौसी अब बस…सूरज शर्मा गया।"

सोनी की सांसें थोड़ी तेज हुईं, पर उसने खुद पर काबू रखा और सूरज को और बोलने के लिए उकसाया।

सोनी: "तो फिर? उसने तुझे इतवार को बुलाया है, क्या उसने कुछ साफ़ तौर पर कहा?"

सूरज: "उसने कहा कि वह अपना जन्मदिन मेरे साथ अकेले बिताना चाहती है। उसने एक फ्लैट का इंतजाम किया है। पर मुझे घबराहट हो रही है।"

सोनी…इसमें घबराने की क्या बात है?

सूरज की आवाज़ में अचानक एक भारीपन आ गया। वह उत्साह जो अभी तक झलक रहा था, अब एक गहरी निराशा में बदल गया। उसने सोनी की ओर अपनी बेबस नजरों से देखा।

सूरज: "पर मौसी... यही तो त्रासदी है। जब मैं उसे चूम रहा था, जब मेरी हथेलियाँ उसके जिस्म के उतार-चढ़ाव का जायजा ले रही थीं, जब उसका इतना सुंदर बदन मेरे आलिंगन में था... तब भी मेरे इस नामकूल में कोई हरकत नहीं हुई। मेरा लिंग एकदम बेजान रहा। मुझे ऐसा लगा जैसे मैं अंदर से मर चुका हूँ।"

उसने अपना सिर झुका लिया और सोनी के हाथों को कसकर पकड़ लिया। सोनी ने सूरज के चेहरे को ऊपर उठाया। उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक और विजय का भाव था। उसने सूरज के माथे को चूमते हुए उसे सांत्वना दी।

सोनी: "तू फिक्र मत कर मेरे बच्चे। तू उस दिन जाएगा और तू एक 'मर्द' की तरह पेश आएगा। तूने अपनी बात मुझसे कह दी, यही बहुत है। मैं तुझे उस दिन तैयार करके भेजूँगी। मेरा हाथ जब तेरे उस जादुई अंगूठे पर पड़ेगा, तो तेरी रगों में वो आग भरेगी जो पूरे दिन नहीं बुझेगी। तू रोजी को वह तोहफा देगा जो वो कभी नहीं भूल पाएगी।"

सूरज को लगा जैसे उसके ऊपर से कोई बहुत बड़ा बोझ हट गया हो। उसे अपनी मौसी के शब्दों पर अटूट विश्वास था। वह नहीं जानता था कि यह 'उपचार' उसे किस दिशा में ले जा रहा है। सूरज की आँखों में चमक लौट आई। उसे लगा जैसे उसकी डूबती नैया को किनारा मिल गया हो। भावनाओं के आवेग में आकर उसने सोनी को आलिंगन में भरने के लिए हाथ बढ़ाए, लेकिन सोनी ने बड़ी चतुराई और शालीनता से उसे रोक दिया। उन्होंने झुककर उसके माथे पर एक पवित्र चुंबन अंकित किया।

सोनी: "मर्यादा मत भूल सूरज... तेरी खुशी रोजी के साथ है।"

सूरज ने सोनी की चमचागिरी करते हुए कहा

“ मौसी आप तो मेरे लिए भगवान हो मेरी खुशियों की चाभी आपके ही पास है”

अच्छा बच्चू मुझे मस्का लगा रहा है पर मैं पिघलने वाली नहीं हूं । पर हां तुझे रोजी के लिए तैयार कर दूंगी यह मेरा वादा है।

सूरज खुश हो गया और उसका चेहरा खिल उठा।

तभी दरवाजे पर सुगना (सूरज की माँ) की आहट हुई। सूरज के खिले हुए चेहरे और सोनी की मुस्कुराहट को देखकर सुगना का मन भी प्रसन्नता से भर गया। वह अंदर आई और सोनी के कंधे पर हाथ रखते हुए बोली।

सुगना: "अरे वाह! सोनी, तू तो इस लड़के के लिए सच में कोई वरदान जैसी है। कॉलेज से आने के बाद ही इसका चेहरा बुझा हुआ था, और तेरे आते ही जैसे सूरज खिल उठा। कौन सा जादू कर दिया है तूने इस पर?"

सोनी ने तिरछी नजरों से सूरज को देखा और हंसते हुए कहा, "दीदी, जादू-वादू कुछ नहीं... बस इसकी डॉक्टरी की पढ़ाई का तनाव कम कर रही थी। आखिर आपका बेटा बड़ा डॉक्टर जो बनने वाला है!"

सुगना ने सूरज के सिर पर हाथ फेरा। वह इस बात से अनभिज्ञ थी कि पर्दे के पीछे 'अंगूठे' और 'पौरुष' का कौन सा खेल चल रहा है।

शनिवार की दोपहर, कॉलेज की कैंटीन से निकलकर सूरज जब कॉफी शॉप की ओर जा रहा था, उसका मन एक अजीब से भंवर में था। रास्ते भर उसके दिमाग में रोजी का वह 'बार्बी डॉल' जैसा अक्स घूमता रहा। उसने कल्पना की कि कल जब वह उस एकांत फ्लैट में होंगे, तो वह पहली बार रोजी के उन अंगों को देख पाएगा जो अब तक सिर्फ कपड़ों की परतों में छिपे थे।

उसने सोचा कि रोजी की वह मखमली त्वचा, जो सूरज की रोशनी में कुंदन की तरह दमकती है, उसके हाथों के नीचे कैसी महसूस होगी? उसकी कल्पनाओं में रोजी के उभरे हुए वक्ष और उसकी पतली कमर का वह उतार-चढ़ाव एक संगीत की तरह बज रहा था। उसने कल्पना की कि वह रोजी की कुर्ती की डोरी खींच रहा है और वह 'संगमरमर की मूरत' धीरे-धीरे उसके सामने अनावृत हो रही है। रोजी का वह सुगठित और तना हुआ बदन, जो अभी-अभी पूर्ण यौवन की मादकता से भरा था, सूरज की बंद आँखों के सामने नाचने लगा। उसे लगा जैसे वह रोजी के रेशमी बदन पर अपनी उंगलियों से कोई इबारत लिख रहा हो।

कॉफी शॉप के एक कोने में, जहाँ हल्की खुशबू और मंद संगीत का माहौल था, रोजी उसका इंतज़ार कर रही थी। उसने गहरे नीले रंग का सूट पहना था, जिसमें उसका गोरा रंग और भी निखर आया था।

रोजी (धीमी और रसभरी आवाज़ में): "सूरज... कल का दिन मेरे लिए सिर्फ जन्मदिन नहीं है। मैं चाहती हूँ यह दिन हम दोनों के जीवन में यादगार हो। कल ग्यारह बजे... सिर्फ तुम और मैं।"

सूरज ने मेज पर रखी उन चाबियों को देखा। रोजी की आँखों में एक अजीब सी 'प्यास' थी, एक ऐसा निमंत्रण जिसे ठुकराना नामुमकिन था। दोनों ने कल की रूपरेखा तय की—एक-एक पल, एक-एक छुअन की योजना उनके जेहन में पहले ही बन चुकी थी। कॉफी खत्म कर जब वे अलग हुए, तो दोनों के भीतर मिलन की ज्वाला धधक रही थी।

दोनों प्रेमी युगल एक दूसरे के लिए उपहार खरीदने बाजार की तरफ चल पड़े। युवाओं के भी अपनी कल्पनाएं होती हैं सूरज और रोगी ने एक दूसरे के लिए अनोखे उपहार खरीदे उन्हें पैक कराया और लेकर अपने-अपने घर की तरफ चल पड़े।

घर पहुंचने के बाद सोनी सूरज का इंतजार कर रही थी जैसे ही उसने सूरज के हाथ में रंग बिरंगा पैकेट देखा उसने सूरज के हाथों से झटके से छीन लिया और बोला

“अरे वाह….आज पहली बार अपनी मौसी के लिए गिफ्ट लेकर आया”

सूरज ने शर्माते हुए कहा “मौसी यह रोजी के जन्मदिन के लिए है…”

“क्या है इसमें ?मुझे देखना है आखिर देखो तो मेरे सूरज की पसंद कैसी है” सोनी बच्चों की भांति उछल रही थी सूरज उसे रोकना चाह रहा था परंतु सोनी मानने को तैयार नहीं थी।

आखिरकार सूरज ने अपनी सहमति दे दी और सोनी ने वह अनोखा पैकेट खोल दिया…वह उपहार सचमुच लाजवाब था…

सूरज की पसंद और कल्पनाएं लाजवाब थी…सोनी को सूरज पर गर्व हो रहा था…. सूरज अब जवान हो चुका था और उसकी भावनाएं भी..

रविवार की सुबह सूरज के लिए किसी परीक्षा से कम नहीं थी। वह तैयार तो था, पर मन के किसी कोने में वही 'बेजान' होने का डर उसे खाए जा रहा था। तभी सोनी मौसी उसके कमरे में आईं। आज उनकी आँखों में एक अलग ही अधिकार और आत्मविश्वास था।

सोनी: "सूरज, तू घबरा क्यों रहा है? मैंने कहा था न, तू आज एक विजेता की तरह जाएगा।"

उन्होंने सूरज के पास आकर उसका दाहिना हाथ अपने हाथों में लिया। सोनी की हथेलियाँ बेहद नर्म और गर्म थीं। उन्होंने सूरज के हाथ के अंगूठे को अपनी उंगलियों से सहलाने लगीं।

हमेशा की तरह सूरज के लिंग में तनाव भरने लगा। सूरज के पेट का उभार कुछ ज्यादा ही दिखाई पड़ने लगा और सूरज को बेचैनी महसूस होने लगी। सोनी ने शायद अंगूठे को कुछ ज्यादा ही सहला दिया..

मौसी बस “फट जाएगा… बहुत ज्यादा हो गया सूरज अपने पेंट को आगे पीछे कर उसे तने हुए लंड को अपने पेट में व्यवस्थित करने की कोशिश करने लगा पर उसे अब भी परेशानी हो रही थी।

सोनी सूरज के चेहरे पर तनाव महसूस कर रही थी शायद उसके लिंग में तनाव हद से ज्यादा हो गया था..

सोनी ने सूरज की तरफ देखकर उसे अपनी आंखें बंद करने के लिए कहा और पेट की जिप खोलकर उसे तने हुए लंड को बाहर निकाल लिया। बात सच थी सूरज का लिंग सामान्य से कहीं ज्यादा तना हुआ और बेहद बड़ा दिखाई पड़ रहा था…

रोजी अभी-अभी जवानी की दहलीज पर कदम रखी थी और अब तक कुंवारी थी। इस अवस्था में इस विशाल लंड को आत्मसात कर पाना उसके लिए असंभव था। सोनी को अपने पुराने दिन याद आ रहे थे जब उसे अपने पति विकास का छोटा सा लंड भी बहुत बड़ा दिखाई पड़ता था और उसे अपनी जांघों के बीच पनाह देने में ही उसके पसीने छूट जाते थे।

आखिरकार सोनी ने एक बार फिर अपने होंठ गोल किए और सूरज के लंड का तनाव गायब कर दिया और फिर पुनः उसके अंगूठे को प्यार से सहलाते हुए उसमें तनाव भरा पर आवश्यकता के अनुसार..

अब तक सूरज अपनी आंखें खोल चुका था.. उसने सोनी का हाथ पकड़ लिया और बोला मौसी बस वो अभी बच्ची जैसी है ज्यादा होने पर तकलीफ हो सकती है…

सोनी मुस्कुरा उठी उसे यह देखकर अच्छा लगा कि सूरज को रोजी की चिंता है और वह वासना में डूबा हुआ वहशी नहीं है..

सोनी ने सूरज का अंगूठा तो छोड़ दिया पर सूरज के तने हुए लंड को अपनी कोमल उंगलियों से सहलाते हुए बोली..बेस्ट ऑफ लक

सूरज खुश हो गया उसने अपने तने हुए लंड को पैंट के अंदर किया.. और सोनी को अपने आलिंगन में भरता हुआ बोला..

मौसी थैंक यू…

सोनी ने सूरज को उसका गिफ्ट पकड़ाते हुए कहा" अब जा... रोजी तेरा इंतज़ार कर रही है। आज उसे वो सुख देना पर प्यार से । मेरा आशीर्वाद और ये 'जादू' तेरे साथ है

सूरज जब उस फ्लैट पर पहुँचा, तो उसका आत्मविश्वास सातवें आसमान पर था। रोजी ने दरवाजा खोला। वह गुलाबी पारभासी (translucent) नाइटी में किसी अप्सरा जैसी लग रही थी। उसके बदन की खुशबू और उस लिबास की झलकी ने सूरज के भीतर के 'सोए हुए शेर' को झकझोर दिया।

बिना कुछ कहे, सूरज ने रोजी को अपनी बाहों में भर लिया। आज उसका आलिंगन कमजोर नहीं था। रोजी ने सूरज की जांघों के बीच की गर्मी को महसूस किया वह बेहद प्रसन्न हो गई।

रोजी: "सूरज... तुम... आज तो पूरे मूड में हो?"

सूरज ने उसके होंठों पर अपने होंठ रख दिए। उसकी हथेलियाँ रोजी की चिकनी पीठ पर रेंगने लगीं और धीरे-धीरे नीचे की ओर बढ़ते हुए उन मांसल नितंबों को भींचने लगीं। रोजी ने अपनी आँखें मूंद लीं। उसे यकीन हो गया था कि आज सूरज उसे उस चरम सुख की दहलीज के पार ले जाएगा जिसका वादा उसने खुद से किया था।

सूरज को महसूस हुआ कि मौसी के उस 'अंगूठे वाले उपचार' ने अपना काम कर दिया है। उसकी रगों में दौड़ती आग अब रोजी की कसी हुई जवानी को पिघलाने के लिए तैयार थी।


शेष अगले भाग में

कृपया अपडेट पढ़ने के बाद अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दें यदि लिखने पढ़ने में दिक्कत है तो हमारी महिला पाठकों के लिए सूरज के खूबसूरत लिंग की तस्वीर साझा करे... उसे यदि उसे सोनी द्वारा चूमते हुए दिखा सकते हैं तो अति उत्तम..


पर शांत मत बैठिएगा मुझे आप सबका इंतजार रहता है...
 
167 के लिए शानदार अपडेट अति उत्तम यह सब लिखने से काम नहीं चलेगा

अपने मन में चल रही सोनी की एक पिक्चर भेजनी होगी
 
भाग 170

सूरज ने उसके होंठों पर अपने होंठ रख दिए। उसकी हथेलियाँ रोजी की चिकनी पीठ पर रेंगने लगीं और धीरे-धीरे नीचे की ओर बढ़ते हुए उन मांसल नितंबों को भींचने लगीं। रोजी ने अपनी आँखें मूंद लीं। उसे यकीन हो गया था कि आज सूरज उसे उस चरम सुख की दहलीज के पार ले जाएगा जिसका वादा उसने खुद से किया था।

सूरज को महसूस हुआ कि मौसी के उस 'अंगूठे वाले उपचार' ने अपना काम कर दिया है। उसकी रगों में दौड़ती आग अब रोजी की कसी हुई जवानी को पिघलाने के लिए तैयार थी।

अब आगे..

फ्लैट के भीतर का माहौल किसी स्वप्नलोक जैसा था। रोजी ने कमरों को मद्धम पीली रोशनी और मोगरे के फूलों की महक से महकाया हुआ था।

रोजी ने उसे फ्लैट को बड़ी मेहनत से इस अदभुत मिलन के लिए तैयार किया था।


योजना के अनुसार, दोनों ने एक-दूसरे के दिए हुए 'विशेष वस्त्रों' के पैकेट थामे और अलग-अलग कमरों में चले गए। यह उनके मिलन की पहली औपचारिक रस्म थी—एक-दूसरे की पसंद में खुद को ढालना।

जब सूरज ने रोजी द्वारा दिए गए पैकेट को खोला, तो उसके भीतर मलमल की एक बेहद महीन सफेद धोती और वैसा ही एक अंगवस्त्र (stole) था। रोजी चाहती थी कि उसका प्रेमी किसी आधुनिक लड़के जैसा नहीं, बल्कि किसी प्राचीन कामदेव जैसा प्रतापी और पौरुष से भरा दिखे। सूरज ने पैकेट में अपने अंतर वस्त्र को ढूंढा पर शायद रोगी ने उसे पैकेट में जानबूझकर वह नहीं रखा था। आखिरकार सूरज को बिना अंडरगारमेंट्स के ही धोती पहनी पड़ी। बिना किसी सहारे के, उसका सुगठित तना हुआ लंड उस झीनी धोती के नीचे अपनी पूरी मर्दानगी के साथ आज़ाद था।

दूसरी ओर, रोजी ने सूरज का दिया हुआ पैकेट खोला .. पैकेट में सिर्फ एक सफेद कुर्ता था वह भी बेहद झीना। ना कोई पेंट ना कोई ब्रा ना पैंटी। रोजी ने मन ही मन सूरज की कामुकता को सराहा पर वह शर्म से पानी पानी हो रही थी। यह कुर्ता इतना बारीक था कि उसकी त्वचा का हर पोर उससे झाँक रहा था। इसमें कोई बटन नहीं थे, बस सामने से दो परतें थीं जो उसकी छाती के उभारों से होती हुई नीचे उसकी जाँघों के जोड़ तक आ रही थीं। रोजी ने खुद को आईने में देखा तो एक तरफ उसे उसकी नग्नता दिखाई पड़ी परंतु दूसरी तरफ वह ईश्वर को धन्यवाद करती नजर आ रही थी कि उसे भगवान ने इतनी सुंदर काया दी थी जो इस सफेद झीने ने कुर्ते में और भी मादक लग रही थी।

ठीक ग्यारह बजे, दोनों कमरों के दरवाजे एक साथ खुले। हॉल के बीचों-बीच जब दोनों की नज़रें मिलीं, तो वक्त जैसे ठहर गया।

सूरज एक टक रोजी के इस अद्भुत रूप को देखे जा रहा था उसकी निगाहें रोजी के मासूम चेहरे से उसकी छाती के के ऊपर उसकी तनी हुई चूचियों और सपाट पेट से होती हुई जांघों के जोड़ पर पहुंच रही थी। उसका दिया हुआ सफेद कुर्ता रोजी की मादक काया को दीक्षा ज्यादा रहा था छुपा कम।

परंतु जांघों के जोड़ पर रोजी उसे झीने ने कुर्ते के किनारो को अपनी मुट्ठी से पकड़ी हुई थी और अपने अमृत कलश के ऊपर एक मुट्ठी का आवरण दी हुई थी सूरज की निगाहें रोजी की नंगी जांघों पर पड़ी. कितनी सुंदर कितनी बेदाग और कितनी चिकनी जांघें थी रोजी की…सूरज के मुंह से एक मीठी आह निकल गई वह ईश्वर से उसे रोजी को उसकी झोली में डालने के लिए कृतज्ञता जाहिर कर रहा था।

रोजी साक्षात कुंदन की मूरत लग रही थी। कुर्ते में बटन न होने के कारण, उसने अपने दोनों हाथों से सामने की परतों को कसकर पकड़ा हुआ था, ताकि उसकी कुंवारी योनि और वक्षों का उतार-चढ़ाव पूरी तरह नुमाया न हो सके । लाज और शर्म से उसकी पलकें झुकी हुई थीं, और उसके गालों पर गुलाबी रंगत तैर रही थी। वह अपनी पवित्रता और कामुकता के बीच एक सुंदर संतुलन बनाए हुए थी।

जब रोजी ने धीरे से अपनी नजरें ऊपर उठाईं, तो उसके सामने 'सूरज' नहीं, बल्कि पौरुष का साक्षात अवतार खड़ा था। धोती की सिलवटें उसके सुगठित पैरों और मजबूत जाँघों को उभार रही थीं। उसका चौड़ा सीना और कसरती कंधे अंगवस्त्र के नीचे से अपनी शक्ति का प्रदर्शन कर रहे थे।

लेकिन रोजी की निगाहें जैसे ही सूरज की कमर के नीचे टिकीं, उसकी सांसें अटक गईं। धोती के पतले आवरण के भीतर, सूरज के लिंग का अप्रत्याशित उभार किसी पहाड़ की चोटी की तरह साफ़ दिखाई दे रहा था। अंतर्वस्त्र न होने के कारण, वह भुसावली केले की तरह तना हुआ धोती को फाड़कर बाहर आने को बेताब लग रहा था। रोजी को यकीन नहीं हो रहा था कि यह वही सूरज है जो कल तक 'बेजान' होने की शिकायत कर रहा था। सोनी मौसी का वह जादुई स्पर्श और रोजी के प्रति उसकी दबी हुई वासना ने उसे उत्तेजना से भर दिया था।

सूरज की आँखों में एक अजीब सी चमक थी—जैसे किसी प्यासे को मीठे पानी का झरना मिल गया हो। वह धीरे-धीरे कदम बढ़ाते हुए रोजी के पास पहुँचा। रोजी शर्म के मारे और सिमट गई, उसने कुर्ते की परतों को और मजबूती से पकड़ लिया।

सूरज (गहरी और भारी आवाज़ में): "रोजी... तुम आज सिर्फ सुंदर नहीं, तुम एक ईश्वरीय वरदान जैसी लग रही हो।"

सूरज ने अपने मजबूत हाथ रोजी की कमर पर रखे और उसे धीरे से अपनी ओर खींचा। जैसे ही रोजी का कोमल बदन सूरज के फौलादी सीने से टकराया, दोनों के मुंह से एक साथ आह निकली।

रोजी ने जैसे ही आलिंगन में खुद को ढीला छोड़ा, उसके पेट के निचले हिस्से पर सूरज के लिंग का जबरदस्त तनाव महसूस हुआ। वह कोई मामूली छुअन नहीं थी; ऐसा लग रहा था जैसे कोई गर्म दहकता हुआ अंगारा उसके कुंवारेपन की दहलीज पर दस्तक दे रहा हो। रोजी का रोम-रोम खिल उठा। उसके भीतर एक अजीब सी सनसनी दौड़ गई, जिसने उसके घुटनों को कमजोर कर दिया।

सूरज ने उसके कान के पास झुककर फुसफुसाया, "महसूस कर रही हो? ये उत्साह सिर्फ तुम्हारे लिए है।”

रोजी ने अपनी पकड़ कुर्ते से ढीली कर दी और अपने हाथ सूरज के चौड़े कंधों पर रख दिए। वह झीना कुर्ता अब खुल चुका था, और सूरज की धोती और रोजी के बदन के बीच अब कोई पर्दा नहीं बचा था। सूरज की हथेलियाँ अब रोजी के नितंबों की गोलाई को अपने शिकंजे में कसने लगी थीं, और रोजी ने अपना सिर सूरज के कंधे पर टिका दिया, यह जानते हुए कि आज वह पूरी तरह से उसकी होने वाली है।

सोनी मौसी का दिया हुआ आत्मविश्वास और रोजी का यह अद्भुत समर्पण अब एक ऐसी आग में बदलने वाला था, जिसकी तपन वे दोनों उम्र भर नहीं भूलने वाले थे।

बिस्तर की मखमली चादर पर बैठते ही, रोजी के भीतर की झिझक और जिज्ञासा के बीच एक युद्ध छिड़ गया। सूरज ने उसके नाजुक हथेली की अपनी धोती की गांठ पर लाकर उसे खोलने का इशारा किया। रोजी ने अपनी कांपती उंगलियां सूरज की मलमल की धोती की गांठ की ओर बढ़ाईं। जैसे ही उसने उस गांठ को सरकाया, वह बारीक कपड़ा सरक कर नीचे गिर गया।

रोजी की आँखें विस्फारित हो गईं। उसके सामने सूरज की मर्दानगी अपनी पूरी भव्यता और उग्रता के साथ अनावृत थी। पहली बार किसी पुरुष अंग को इतनी निकटता से और इस प्रचंड अवस्था में देखकर रोजी के हलक में जैसे जान अटक गई।

सूरज का वह अंग तना हुआ और सख्त था। उसकी जड़ें इतनी मजबूत थीं कि ऐसा लग रहा था मानो वे सीधे सूरज के हृदय की धड़कनों से ऊर्जा खींच रही हों। ऊपर की ओर बढ़ता हुआ वह अंग गहरा लाल और बैंगनी रंगत लिए हुए था, जिस पर नीली नसें किसी बेल की तरह लिपटी हुई थीं, जो उसमें दौड़ते हुए गर्म खून की गवाही दे रही थीं।

अंग का अग्रभाग (Glans) एक चिकने और चमकीले मुकुट की तरह था, जहाँ से काम-रस की एक नन्हीं सी बूंद छलकने को बेताब थी। रोजी ने मन ही मन सोचा, "क्या कुदरत ने पुरुष को इतना शक्तिशाली और इतना सुंदर बनाया है? यह अंग तो किसी हथियार की तरह कठोर है, पर इसकी त्वचा रेशम जैसी मुलायम दिख रही है।"

रोजी ने हिम्मत जुटाई और अपनी कोमल, मखमली हथेली को धीरे से उस गर्म अंग पर रखा। स्पर्श होते ही उसके पूरे शरीर में बिजली की एक लहर दौड़ गई। वह अंग इतना गर्म था जैसे किसी बुखार से तप रहे व्यक्ति का सर। रोजी डॉक्टरी की पढ़ाई कर रही थी उसका दिमाग भी डॉक्टर की तरह ही चल रहा था। उसने अपनी उंगलियों को उस सख्त लंबाई पर धीरे-धीरे फेरना शुरू किया।

"सूरज... बाप रे इतना सख्त…?" रोजी के स्वर में भय और रोमांच का एक अद्भुत मिश्रण था।

सूरज ने गहरी सांस ली और अपना सिर पीछे की ओर झुका लिया। रोजी की हथेलियों का वह कोमल घर्षण उसे पागल कर रहा था। रोजी अब और भी साहसी हो गई थी। उसने अपनी मुट्ठी में उस वज्र जैसे अंग को भरा और उसे ऊपर-नीचे सहलाने लगी। उसे महसूस हुआ कि जैसे-जैसे वह सहला रही है, वह अंग और भी ज्यादा तनता जा रहा है, मानो वह रोजी की कोमलता को चीरकर बाहर आना चाहता हो।

रोजी की उंगलियों का वह जादुई स्पर्श सूरज के संयम की हर दीवार को ढहा रहा था। जैसे-जैसे रोजी का साहस बढ़ता गया, उसकी हरकतें और भी अधिक लयबद्ध और गहरी होती गईं। वह न केवल अपनी हथेलियों से, बल्कि अपनी भावनाओं से भी सूरज को महसूस कर रही थी।

सूरज की सांसें अब अनियंत्रित हो चुकी थीं। कमरे की हवा में एक अजीब सी गर्माहट और भारीपन छा गया था। रोजी ने जब उसे अपनी गिरफ्त में लेकर धीरे-धीरे सहलाना शुरू किया, तो सूरज को लगा जैसे उसके शरीर का सारा रक्त एक ही दिशा में बहने लगा है।


उसने अपनी उंगलियों के पोरों से उस गर्मी को कुरेदना शुरू किया, जिससे सूरज के मुंह से एक दबी हुई आह निकल गई।

उसने मजबूती से बिस्तर की चादरों को जकड़ लिया, उसकी गर्दन की नसें खिंच गई थीं और उसका पूरा अस्तित्व बस रोजी के उन कोमल हाथों के स्पर्श पर टिक गया था।

जैसे-जैसे रोजी के हाथों की हरकतें बढ़ीं, कमरे का सन्नाटा सूरज की भारी होती सांसों से भरने लगा। रोजी ने अपनी आंखें बंद कर लीं और पूरी तरह से उस अहसास में डूब गई। उसकी मखमली त्वचा और सूरज की उस कठोर गर्माहट के बीच का घर्षण एक ऐसी आग पैदा कर रहा था, जिसे अब बुझाना नामुमकिन था।

रोजी एक बच्चे की तरह उसे अद्भुत खिलौने से खेल रही थी जो उसकी जवानी का पहला खिलौना था। आज से पहले जब भी उसने सूरज के लिंग को महसूस किया था वह एक सभ्य सौम्य और हमेशा झुका हुआ प्रतीत होता था पर आज तो जैसे वह रोजी की जवानी को सलामी दे रहा था।

रोजी ने अब अपनी उंगलियों का दबाव थोड़ा और बढ़ाया और एक विशेष लय (rhythm) के साथ उसे सहलाने लगी। सूरज का पूरा शरीर पसीने की बारीक बूंदों से चमकने लगा था। वह कभी अपनी मुट्ठी को कसती, तो कभी धीरे से उसे ढीला छोड़ देती, जैसे वह सूरज के सब्र का इम्तहान ले रही हो।

सूरज अब और सहन नहीं कर पा रहा था। उसने अपने दोनों हाथ पीछे टिका दिए और अपनी पीठ को हवा में धनुष की तरह मोड़ लिया। उसके गले से निकलने वाली सिसकियाँ अब गहरी कराहों में बदल चुकी थीं।

रोजी ने महसूस किया कि जैसे-जैसे वह ऊपर-नीचे सहला रही है, उसकी मुट्ठी में कैद वह अंग धड़कने लगा है। वह अब और भी ज्यादा सख्त और गर्म हो चुका था, जैसे फटने को तैयार कोई ज्वालामुखी हो।

अचानक, सूरज के शरीर में एक बिजली सी कौंधी। उसने रोजी की कलाई को मजबूती से पकड़ लिया, मानो उसे रुकने या और भी तेज करने का इशारा कर रहा हो। रोजी ने उसकी आँखों में देखा, जहाँ जुनून और समर्पण का एक गहरा समंदर था।

अगले ही पल, सूरज के मुंह से एक लंबी, थकी हुई लेकिन संतोषजनक आह निकली। उसके शरीर के हर अंग ने एक साथ जवाब दे दिया। रोजी और सूरज के बीच का वह पल अपनी चरम सीमा पर पहुँच चुका था। रोजी ने अपनी पूरी कोशिश की कि वह उस वेग को अपनी मुट्ठी में थाम ले, लेकिन प्रकृति के उस सैलाब को रोकना उसकी कोमल कलाइयों के बस की बात नहीं थी।

जैसे ही सूरज का शरीर पूरी तरह से तना, उसके भीतर संचित सारी ऊर्जा एक तीव्र विस्फोट के साथ बाहर निकलने लगी। रोजी ने उस सख्त और थरथराते हुए अंग को अपनी हथेली में और भी मजबूती से जकड़ने की कोशिश की, ताकि वह उस हलचल को संभाल सके, लेकिन वीर्य का वेग इतना प्रबल था कि वह बार-बार उसकी उंगलियों की पकड़ से छिटकने को आतुर था।


वह धार इतनी शक्तिशाली थी कि वह सीधा ऊपर की ओर उठी, मानो कमरे की छत को छू लेना चाहती हो। रोजी अपनी बड़ी-बड़ी आँखों से उस अद्भुत नज़ारे को देख रही थी।

वह गर्म और सफेद धार कभी रोजी के गुलाबी गालों को भिगोती, तो कभी उसके कुर्ते के खुले गले से फिसलती हुई उसकी अर्ध-नग्न छाती के उतार-चढ़ाव पर जा गिरती। कुछ बूंदें उसकी जांघों पर बिखरीं, तो कुछ खुद सूरज के पेट पर गिरकर उसकी त्वचा को गर्माहट से भर गईं।

रोजी के चेहरे पर एक शरारती और संतोषजनक मुस्कान थी। वह थकी नहीं थी, बल्कि इस अद्भुत स्खलन की साक्षी बनकर रोमांचित थी। उसने देखा कि कैसे सूरज की आँखें बंद हैं और उसका चेहरा आनंद के एक ऐसे शिखर पर है जहाँ शब्द छोटे पड़ जाते हैं। सूरज उस वक्त जैसे इस दुनिया से परे, आनंद के एक गहरे सागर में गोते लगा रहा था, जहाँ सिर्फ सुकून और तृप्ति थी।

जब अंततः वह हलचल शांत हुई, तो कमरे में सिर्फ उन दोनों की तेज़ चलती सांसों की आवाज़ गूँज रही थी। रोजी ने धीरे से सूरज के सीने से उसके वीर्य को अपनी उंगलियों पर लिया और उसे अपनी तर्जनी और अंगूठे के बीच मसर उसकी चिकनाई को महसूस किया आज पहली बार वह अपने किताबी ज्ञान को हकीकत का जामा पहनाया था और वह हर अनुभव को प्राप्त कर लेना चाहती थी।

सूरज और रोजी के बीच का वह एकांत क्षण अब एक ऐसी पराकाष्ठा पर था, जहाँ शरीर और आत्मा की दूरियाँ मिट चुकी थीं। सूरज ने एक गहरी और तृप्त सांस ली और रोजी को अपनी बांहों के घेरे में कस लिया। उसके बदन पर बिखरा वह चिपचिपा और गर्म वीर्य उनके मिलन की जीवंत गवाही दे रहा था।

रोजी के खूबसूरत बदन पर उसके वीर्य की बूंदे चमक रही थी। सूरज ने अपनी मजबूत हथेलियों से रोजी के शरीर को पोंछने की कोशिश की, लेकिन तभी उसकी उंगलियां रोजी के अर्ध-खुले वक्ष की कोमलता से टकरा गईं।

वे कुंवारी नग्न चूचियाँ, जो अब तक किसी भी स्पर्श से अनभिज्ञ थीं, सूरज की वीर्य से सनी हथेलियों के नीचे मखमल की तरह महसूस हो रही थीं। सूरज ने अपनी उन्हीं गीली हथेलियों से उन कोमल उभारों को धीरे-धीरे सहलाना शुरू कर दिया। वीर्य की वह फिसलन भरी परत रोजी की त्वचा पर फैल गई, जिससे स्पर्श और भी अधिक कामुक और गहरा हो गया।


पहली बार किसी पुरुष का नग्न और अधिकारपूर्ण हाथ अपनी छाती पर महसूस कर रोजी के शरीर में सिहरन दौड़ गई। उसकी उत्तेजना बढ़ती गई, और उसकी सांसें सूरज के चेहरे पर गर्म हवाओं की तरह टकरा रही थीं। सूरज उन कोमल उभारों की नरमी में खोया हुआ था, मानो वह दुनिया के सबसे खूबसूरत अहसास को अपनी मुट्ठी में कैद कर लेना चाहता हो।

अगले ही पल, सूरज ने रोजी को बड़े प्यार से उठाकर अपनी गोद में बैठा लिया। रोजी की टांगें सूरज की कमर के दोनों ओर थीं। सूरज की हथेलियां अभी भी उन चूचियों को सहलाने और उनके आकार को महसूस करने में व्यस्त थीं। इसी बीच, रोजी को अपनी जांघों के बीच एक परिचित और सख्त हलचल महसूस हुई।

सूरज का वह वज्र जैसा अंग, जो स्खलन के बाद भी अपनी गरिमा और अकड़ बनाए हुए था, रोजी की कोमल जांघों से टकराकर उसे चुनौती दे रहा था। रोजी ने अपनी जांघों को थोड़ा और फैलाया, जिससे वह तना हुआ अंग एक बार फिर बाहर निकल आया और रोजी की नज़रों के सामने अपनी मौजूदगी दर्ज कराने लगा।

रोजी ने विस्मय और उत्सुकता भरी नज़रों से उसे देखा और सूरज से पूछा—

"अरे... यह तो अब भी वैसे ही तना हुआ है? क्या इसे थकान नहीं होती?"

सूरज के चेहरे पर एक मदहोश कर देने वाली मुस्कान तैर गई। उसने झुककर रोजी के गुलाबी गालों पर एक लंबा और गहरा चुंबन अंकित किया और फुसफुसाते हुए बोला—

"तुम्हारी खूबसूरती और इस कातिल आगोश में आकर भला यह कैसे सो सकता है ?"

रोजी मुस्कुरा उठी, उसका रोम-रोम अब पूरी तरह जागृत हो चुका था। उसने एक बार फिर उसकी सुपारी जैसे अग्रभाग को छूने के लिए हाथ बढ़ाया, लेकिन वह हिस्सा अब अत्यधिक संवेदनशील हो चुका था। सूरज ने तुरंत उसका हाथ थाम लिया और प्यार भरी झिड़की देते हुए बोला—

"अरे... थोड़ा तो आराम करने दो इसे। अभी इसे तुम्हारी बहुत सेवा करनी है, और मुझे भी तुम्हें खुशियों के उस मुकाम तक ले जाना है जहाँ अब से कुछ देर पहले तुमने मुझे पहुंचाया था।

रोजी का चेहरा शर्म से लाल हो गया…


वह उस मजबूत लिंग अपनी अनछुई और कुवारी बुर में जाते सोच कर सिहर उठी…

तभी रोजी को अपने उस 'सरप्राइज' का ख्याल आया जो उसने इस मिलन की खुशी में मनाने के लिए रखा था। वह बड़ी अदा से सूरज की गिरफ्त से बाहर निकली। यद्यपि सूरज का रोम-रोम उसे अपनी बाहों में कैद रखना चाहता था, पर रोजी की उस शरारती मुस्कान ने उसे मंत्रमुग्ध कर दिया। वह उठी और रसोई की ओर उसे केक को लेने बढ़ गई जो उसने अपने और सूरज के पहले मिलन के उत्सव को मनाने के लिए लिए लाया था।

रोजी जब केक लेकर वापस कमरे की ओर आ रही थी, तो दृश्य किसी अप्सरा के आगमन जैसा था। उसके बदन पर अब भी वह सफेद झीना कुर्ता था, लेकिन अब वह शर्म की बंदिशों से आजाद हो चुकी थी। सूरज की निगाहें उसके चेहरे से फिसलती हुई उसकी जाँघों के उस संधि स्थल पर जाकर टिक गईं, जहाँ रोजी की जवानी का सबसे गहरा राज छुपा था।

कुर्ते की झीनी परत के नीचे से रोजी की बेदाग, गोरी जाँघें किसी तराशे हुए संगमरमर की तरह चमक रही थीं। जाँघों के जोड़ पर, जहाँ उसकी कुंवारी योनि का वास था, वहाँ एक बारीक गुलाबी रेखा जैसा चीरा दिखाई दे रहा था। सूरज उस दृश्य को देखकर सुध-बुध खो बैठा। रोजी ने जब सूरज की प्यासी निगाहों को अपनी कली पर टिका देखा, तो उसने केक के डिब्बे को थोड़ा नीचे कर लिया, मानो उस अनमोल खजाने को सूरज की नज़रों की तपिश से बचा रही हो।

रोजी बिस्तर पर आई और सूरज के बिल्कुल सामने पालथी मारकर बैठ गई। उसने केक को उनके बीच के अंतराल में रखा। पालथी मारकर बैठते ही, रोजी यह भूल गई कि कुर्ते का वह झीना घेरा अब खिंच चुका है। जउसकी जाँघों के बीच छुपी वह कुंवारी 'बुर' (योनि) अपने पंखुड़ी जैसे होंठ खोल चुकी थी।

सूरज की आँखों के ठीक सामने अब वह दृश्य था जिसे देखने के लिए वह बरसों से तड़प रहा था। वह योनि किसी सुनहरे फल के बीच लगे एक गहरे, गुलाबी कट की तरह दिख रही थी—एकदम साफ, बेदाग और कुंवारी। उस कली की मासूमियत और उसकी बनावट इतनी सुंदर थी कि सूरज केक का चाकू थामे हुए भी जड़वत हो गया।

रोजी (शरमाते हुए): "तुम बहुत बदमाश हो गए हो सूरज! केक काटने पर ध्यान लगाओ, मेरी... मेरी तरफ मत देखो।"

सूरज ने मदहोशी में सिर हिलाया, पर उसकी आँखें उस गुलाबी दरार से हट ही नहीं रही थीं। रोजी ने तुरंत स्थिति को भाँपा और वज्रासन की मुद्रा में बैठ गई, जिससे उसकी जाँघें आपस में जुड़ गईं और वह सुंदर दृश्य ओझल हो गया।

सूरज ने केक का प्लास्टिक वाला चाकू पकड़ा और रोजी ने अपना हाथ उसके हाथ पर रख दिया। जैसे ही चाकू ने केक की मुलायम सतह को छुआ, दोनों की धड़कनें एक लय में आ गईं। यह केवल केक काटना नहीं था, बल्कि उनके कौमार्य भंग होने के मार्ग पर पहला कदम था।

केक का एक टुकड़ा काटकर रोजी ने बड़े प्यार से सूरज के मुँह के करीब लाया। लेकिन इससे पहले कि सूरज उसे खाता, रोजी ने अपनी उँगलियों पर लगी क्रीम को सूरज के होंठों पर मल दिया। सूरज ने अपनी जुबान से उन होंठों को साफ़ किया और फिर रोजी की उन क्रीम से सनी उँगलियों को अपने मुँह में ले लिया।

सूरज (भारी आवाज़ में): "केक मीठा है... पर तुम्हारी उँगलियों का स्वाद इससे कहीं ज़्यादा नशीला है।"

रोजी का चेहरा लज्जा से सिंदूरी हो उठा। उसे याद आया कि अब से कुछ देर बाद, वह मजबूत लिंग उसकी उस कुंवारी कली की गहराई नापने वाला है। उस विचार मात्र से उसकी जाँघों के बीच एक अनजानी नमी और सिहरन दौड़ गई। सूरज अब केक को भूल चुका था। उसने अपनी क्रीम लगी उँगलियों को रोजी के कुर्ते के भीतर सरकाया और उसके चुचियों के निप्पल पर की तनी हुई चोटी पर उस ठंडक को लपेट दिया।

रोजी के मुँह से एक दबी हुई सिसकारी निकली।

अरे बहुत ठंडा है….सोनी चिहुंक उठी।

सूरज ने एक पल भी देर नहीं की…. उसने झुक कर रोजी के उसे क्रीम से लिपटे हुए निप्पल को अपने गम होठों से चूस लिया…और एक पल के लिए अपना होंठ उससे अलग करते हुए और रोजी की आंखों में देखते हुए बोला अब ठीक है…

रोजी शर्म से पानी पानी हो रही थी उसने सूरज के सर को खुद से अलग करने की कोशिश की परंतु सूरज रोजी की चूचियों पर लगे क्रीम का आनंद लेने लगा.. रोजी की अधखिली चूचियां सूरज की उत्तेजना को बढ़ा रही थी और उसके होठों में मिठास खोल रही थी..


कमरे में अब केक की मिठास और वासना की गर्माहट एक दूसरे में घुल रही थी। उत्सव की यह शुरुआत अब उस अंतिम अध्याय की ओर बढ़ रही थी, जहाँ सूरज और रोजी एक दूसरे में विलीन होने वाले थे।

नियति इस प्रेमी युगल को देखकर मोहित हो रही थी पर वह मजबूर थी..

शेष अगले भाग में
 
भाग 171

रोजी शर्म से पानी पानी हो रही थी उसने सूरज के सर को खुद से अलग करने की कोशिश की परंतु सूरज रोजी की चूचियों पर लगे क्रीम का आनंद लेने लगा.. रोजी की अधखिली चूचियां सूरज की उत्तेजना को बढ़ा रही थी और उसके होठों में मिठास खोल रही थी..

कमरे में अब केक की मिठास और वासना की गर्माहट एक दूसरे में घुल रही थी। उत्सव की यह शुरुआत अब उस अंतिम अध्याय की ओर बढ़ रही थी, जहाँ सूरज और रोजी एक दूसरे में विलीन होने वाले थे।

नियति इस प्रेमी युगल को देखकर मोहित हो रही थी पर वह मजबूर थी..

अब आगे..

इधर सूरज रोगी की चूची चूसने में व्यस्त था उधर रोजी का तन-बदन मुस्कुरा रहा था। उसका रोम-रोम अब पूरी तरह जागृत हो चुका था। उसने एक बार फिर सुरज के लंड के सुपाड़े को छूने के लिए हाथ बढ़ाया सूरज सचेत हो गया। वह हिस्सा अब अत्यधिक संवेदनशील हो चुका था। सूरज ने तुरंत उसका हाथ थाम लिया और प्यार भरी झिड़की देते हुए बोला—

"अरे... थोड़ा तो आराम करने दो इसे। अभी इसे तुम्हारी बहुत सेवा करनी है, और मुझे भी तुम्हें खुशियों के उस मुकाम तक ले जाना है जहाँ अब से कुछ देर पहले तुमने मुझे पहुंचाया था।

रोजी का चेहरा शर्म से लाल हो गया…उसने अपनी गर्दन झुका ली।

वह उस मजबूत लिंग अपनी अनछुई और कुवारी बुर में जाते सोच कर सिहर उठी…

सूरज ने रोजी की ठुड्डी को पकड़कर ऊपर उठाया। उसकी आँखों में वह 'प्यास' अब एक 'शिकार' की भूख में बदल चुकी थी। उसने देखा कि रोजी के चेहरे पर पसीने की छोटी-छोटी बूंदें चमक रही थीं और उसकी सांसें उसके सीने की धड़कन के साथ तालमेल बिठा रही थीं।

सूरज ने रोजी को धीरे से बिस्तर पर लिटाया। वह सफेद कुर्ता अब पूरी तरह खुल चुका था और रोजी का वह तराशा हुआ, कुंवारा बदन सूरज के सामने एक खुली किताब की तरह था। सूरज ने अपने अंगूठे से रोजी के होठों को सहलाया और फिर उसकी नजरें सीधे रोजी की जाँघों के बीच उस पवित्र स्थान पर टिकीं, जहाँ आज उसे अपनी विजय पताका फहराने थी।

सूरज ने धीरे से रोजी की रेशमी जाँघों पर हाथ रखा और उस मंदिर के पट खोलना की कोशिश की जिसकी देहरी पर उसे पूर्ण समर्पण करना था । सूरज की लप लपाती जीभ देखकर रोजी ने एक सिहरन के साथ अपनी आँखें मूंद लीं और अपनी हथेलियां आपस में जोड़ लीं। उसके चेहरे पर शर्म की जो सुर्खी थी, वह सूरज को और भी ज्यादा दीवाना बना रही थी।

रोजी (कांपती आवाज़ में): "सूरज... प्लीज, वहां नहीं । मुझे बहुत शर्म आ रही है... तुमने बाकी सब तो देख ही लिया है। अब बस आ जाओ।"

उसने अपनी बाँहें फैला दीं, जैसे वह हार मान चुकी हो, लेकिन उसकी जाँघें अभी भी एक-दूसरे से जुदा होने को तैयार नहीं थीं। सूरज ने उसकी मासूमियत को देखा। वह सफेद झीना कुर्ता अब पूरी तरह से बेमानी हो चुका था। सूरज ने अपने हाथ आगे बढ़ाए और रोजी को अपनी बाहों में भरने की कोशिश की। सूरज की बाहों में जाकर उसका तन-बदन जैसे सूरज से एक जाकर हो गया था वह उस स्पर्श की उत्तेजना को सह नहीं पा रही थी और खुद को सूरज के फौलादी सीने में छुपा लेना चाहती थी।

सूरज अब लगभग पूरी तरह रोजी के ऊपर आ चुका था। दोनों के जिस्मों के बीच अब हवा का एक झोंका ही गुजर सकता था। रोजी की धड़कनें सूरज के सीने पर साफ सुनाई दे रही थीं। तभी, जैसे किसी अदृश्य शक्ति ने रोजी के भीतर के सारे बंधनों को तोड़ दिया हो, उसने अपनी आँखें खोलीं और धीरे-धीरे अपनी 'जाँघों' के द्वार खोल दिए।

जैसे ही रोजी की जाँघें खुलीं, सूरज ने खुद को उस 'मखमली खाई' के बीच सटा दिया। वह एहसास अद्भुत था। रोजी की जाँघों की अंदरूनी कोमलता और सूरज के मजबूत जांघों से रगड़ खाती गई.. लिंग की वह पत्थर जैसी कठोरता जब रोजी की पेडू से टकराई तो पूरे कमरे का तापमान जैसे एकदम से बढ़ गया।

क्योंकि रोजी ने सूरज को अपने उसे गुप्त अंग को देखने के लिए रोक दिया था सूरज अंदाज से ही अपने लंड से उसकी कुंवारी बुर को छूने की कोशिश कर रहा था।

सूरज का वह 'जादुई अंग' अब सीधे रोजी की उस नाजुक दहलीज के समीप था, जहाँ से कुंवारेपन की सीमा समाप्त होती थी। रोजी ने महसूस किया कि सूरज का भारीपन और उसकी गर्मी उसके भीतर एक अजीब सी हलचल पैदा कर रही है। वह स्वयं अब उसे मिलन के लिए छटपटा रही थी।

सूरज ने अपने कूल्हों को थोड़ा आगे बढ़ाया। रोजी ने अपने दांतों तले अपना निचला होंठ दबा लिया। उसे महसूस हो रहा था कि वह 'फौलादी अंग' अब धीरे-धीरे उसकी कुंवारी बुर के बिल्कुल करीब आ चुका है

सूरज ने रोजी के माथे पर पसीने की बूंदों को चूमा। उसे अहसास हुआ कि सोनी मौसी ने जिस 'अंगूठे' के जादू की बात की थी, वह अब अपने चरम पर था। उसकी रगों में दौड़ता खून अब एक सैलाब बन चुका था, जो रोजी के इस 'गुप्त खजाने' को फतह करने के लिए पूरी तरह तैयार था।

जैसे ही सूरज का वह लोहे जैसा सख्त लंड रोजी की कुंवारी देह की उस रेशमी दहलीज के पहरेदार (भग्नाशे) से सटा, नियति ने अपना क्रूर खेल खेल दिया। वह स्पर्श, जिसे पाकर किसी भी मर्द का पौरुष ज्वालामुखी बन जाना चाहिए था, सूरज के लिए किसी बर्फीले झोंके जैसा साबित हुआ।

जैसे किसी फूले हुए गुब्बारे में अचानक सुई चुभो दी गई हो, सूरज के अंग का वह सारा गर्व, वह सारी अकड़ और वह पर्वत जैसी कठोरता पल भर में काफूर हो गई।

रोजी ने अपनी आँखें मूंद रखी थीं, वह उस 'प्रहार' का इंतज़ार कर रही थी जो उसे लड़की से औरत बनाने वाला था, लेकिन उसे महसूस हुआ कि वह सख्त दबाव अचानक एक नरम छुअन में बदल गया है। सूरज का वह अंग, जो अभी कुछ पल पहले एक फौलाद जैसा था, अब एक 'मुरझाए हुए केले' की तरह बेजान होकर उसकी जाँघों के बीच लटक गया।

कमरे में मोगरे की महक और मिलन की वह तड़प अचानक एक ठंडी, डरावनी खामोशी में बदल गई। वह क्षण, जो सूरज के जीवन का सबसे गौरवशाली पुरुषार्थ बनने वाला था, उसकी सबसे बड़ी त्रासदी में तब्दील हो गया।

सूरज के माथे पर पसीने की मोटी बूंदें उभर आईं। उसका दिल इतनी जोर से धड़क रहा था मानो सीना फाड़कर बाहर निकल आएगा। उसने पागलों की तरह अपने हाथों से उस बेजान लंड को पकड़ा, उसे सहलाया, उसे झकझोरा कि शायद वह वापस जाग जाए, पर सब व्यर्थ था। वह अंग अब किसी कटे हुए पेड़ की टहनी की तरह निढाल था।

रोजी ने जब कोई हलचल नहीं महसूस की, तो उसने धीरे से आँखें खोलीं। सूरज का चेहरा पीला पड़ चुका था और उसकी आँखों में छटपटाहट थी। रोजी बिस्तर पर उठकर बैठ गई। उसकी नजर जब सूरज के पैरों के बीच गई, तो वह ठिठक गई। वह अंग, जिसे वह अभी कुछ देर पहले एक अद्भुत और शक्तिशाली अस्त्र समझ रही थी, अब पूरी तरह शांत और लटका हुआ था। वह अब भी अपनी बनावट में खूबसूरत था, लेकिन उसकी 'आत्मा' यानी उसका तनाव गायब था।

रोजी (धीमी और उलझन भरी आवाज़ में): "सूरज... क्या हुआ? अचानक तुम्हें क्या हो गया? यह... यह ऐसा क्यों हो गया?"

सूरज के पास कोई जवाब नहीं था। वह अंदर ही अंदर चिल्ला रहा था—"हे विधाता! यह तूने मेरे साथ क्या किया? जब मंजिल सामने थी, तो तूने मेरे पैर क्यों काट दिए?" उसे अपनी मौसी सोनी का वह जादुई स्पर्श याद आया, जिसने उसे सुबह एक विजेता जैसा महसूस कराया था, पर अब वह खुद को एक 'नपुंसक' की तरह महसूस कर रहा था।

सूरज अपनी पीठ बिस्तर के सिरहाने से टिककर बैठ गया। उसे अपनी देह से घृणा होने लगी थी। उसे लग रहा था जैसे वह एक अभिशप्त जीवन जी रहा है। रोजी का हर स्पर्श अब उसे सांत्वना नहीं, बल्कि एक घाव की तरह लग रहा था। उसकी मर्दानगी का वह पतन उसके आत्मविश्वास को राख कर चुका था।

पूरे कमरे का वह मादक वातावरण अब एक 'अस्पताल के वार्ड' जैसा बोझिल हो गया था। मिलन की वह आग बुझ चुकी थी और पीछे छोड़ गई थी केवल निराशा, अपमान और एक ऐसा सवाल जिसका जवाब सूरज के पास नहीं था।

फ्लैट के उस खूबसूरत हाल में जहाँ मोगरे की खुशबू और पीली रोशनी ने एक जादुई संसार रचा था, वहाँ अब एक भारी और दमघोंटू खामोशी पसरी हुई थी। वह बिस्तर, जो कुछ क्षण पहले तक दो रूहों के मिलन की पवित्र वेदी बनने वाला था, अब सूरज की पराजय और रोजी की अधूरी प्यास का गवाह बन गया था।

सोनी रोजी बिस्तर से उठी पास पड़े रुमाल से अपनी जांघों के बीच रिस रहे काम रस को पोछा और अपनी आंखें बंद किये कुछ सोचने लगी।

सूरज बिस्तर के एक कोने में सिर झुकाए बैठा था। उसकी आँखों में वह चमक गायब थी, जो थोड़ी देर पहले किसी विजेता की तरह दमक रही थी। वह 'पौरुष' जो फौलाद बनकर उभरा था, अब रेत के महल की तरह ढह चुका था। उसके शरीर की मांसलता अब भी वैसी ही थी, लेकिन उसका आत्मविश्वास जैसे किसी गहरी खाई में गिर गया था।

रोजी ने धीरे से अपने खुले हुए सफेद कुर्ते को समेटा। उसके चेहरे पर जो गुलाबी रंगत थी, वह अब एक फीकी उदासी में बदल गई थी। उसने देखा कि सूरज की उंगलियां कांप रही हैं। वह समझ सकती थी कि एक पुरुष के लिए अपनी प्रेमिका की बाहों में इस तरह 'हार' जाना मौत से कम नहीं होता।

रोजी उठी और बिना किसी शब्द के सूरज के पास जाकर बैठ गई। उसने अपने ठंडे हाथ सूरज के चौड़े और कसरती कंधों पर रखे। सूरज सिहर उठा—जैसे किसी घाव पर नमक पड़ गया हो।

सूरज (रुँधे हुए गले से): "रोजी... मुझे माफ़ कर दो। मैं... मैं नहीं जानता यह क्या हुआ। मैं तुम्हें वो सुख, वो पूर्णता नहीं दे पाया जिसका मैंने वादा किया था। मैं खुद को एक अपराधी महसूस कर रहा हूँ।"

रोजी ने अपना सिर उसकी मजबूत पीठ पर टिका दिया। उसे सूरज के दिल की धड़कनें महसूस हो रही थीं, जो किसी घायल परिंदे की तरह फड़फड़ा रही थीं।

रोजी (धीमी और रेशमी आवाज़ में): "शशश... सूरज, अपने आप को दोषी मत ठहराओ। तुम मेरे लिए सिर्फ एक 'अंग' नहीं हो, तुम मेरा पूरा संसार हो। आज अगर तुम्हारा शरीर साथ नहीं दे पाया, तो क्या हुआ? मेरी रूह तो तुम्हारी बाहों में ही सुकून पा रही है।"

रोजी ने हार नहीं मानी थी। उसका प्यार अब उसकी कामुकता के साथ एकाकार हो रहा था। उसने सूरज को धीरे से बिस्तर पर लेटाया और खुद उसके ऊपर झुक गई। उसका झीना कुर्ता अब भी पूरी तरह बंद नहीं था, और उसके वक्षों की गर्मी सूरज के चेहरे पर महसूस हो रही थी।

उसने सूरज की बंद आँखों को चूमा और फिर धीरे-धीरे नीचे की ओर बढ़ी। उसने अपने कोमल हाथों से सूरज के उस निढाल अंग को फिर से अपनी हथेलियों में लिया। वह अब भी उतना ही सुंदर और कोमल था, बस उसमें वह 'अकड़' नहीं थी। रोजी ने अपनी जीभ की नोक से उस शांत मुकुट को छुआ।

"सूरज, ये तुम्हारी कमजोरी नहीं, ये शायद तुम्हारी बेपनाह मोहब्बत का बोझ है। तुम मुझे पाने के लिए इतने व्याकुल थे कि तुम्हारी धड़कनों ने तुम्हारे जिस्म का साथ छोड़ दिया।"

रोजी ने उसे अपनी मुट्ठी में भरकर धीरे-धीरे सहलाना शुरू किया। उसकी उंगलियों का दबाव एक ही समय में कोमल भी था और उत्तेजक भी। वह उसे चूम रही थी, उसे सहला रही थी, जैसे किसी रूठे हुए बच्चे को मनाया जाता है। सूरज ने महसूस किया कि रोजी का यह निस्वार्थ समर्पण उसके भीतर के डर को धीरे-धीरे कम कर रहा है।

सूरज ने रोजी के बालों में अपनी उंगलियां फँसा दीं। उसे अहसास हुआ कि मर्दानगी सिर्फ पत्थर जैसी कठोरता में नहीं, बल्कि इस गहरे जुड़ाव में भी है। भले ही उस रात वह 'अंतिम प्रहार' नहीं हो सका, लेकिन उनकी रूहों ने एक-दूसरे को नग्न अवस्था में स्वीकार कर लिया था।

सूरज की आँखों से आंसू थे।

सूरज: "रोजी, मुझे वक्त दो। मैं वापस आऊंगा... उस रूप में जिसे तुमने आज देखा था।

रोजी ने उसे कसकर गले लगा लिया। उनका मिलन अधूरा रहा, लेकिन उनकी प्रेम कहानी में एक ऐसा अध्याय जुड़ गया जिसने उन्हें जिस्मों से परे ले जाकर रूहों के धरातल पर मिला दिया था।

उधर हवेली के शांत कमरे में दोपहर की मद्धम धूप फर्श पर सुनहरी लकीरें खींच रही थी। सुगना बिस्तर पर लेटी थी, पर उसकीआँखें बोझिल थी, एक अनकही बेचैनी थी। माँ और पुत्र के बीच का रिश्ता केवल रक्त का नहीं, बल्कि रूह का होता है—एक ऐसा अदृश्य तार जो सात समंदर पार भी धड़कनों को जोड़ देता है।

सुगना की पलकें भारी हुईं और वह अर्ध-चेतन अवस्था (Trance) में चली गई शायद यह सुगना और सूरज के बीच की टेलीपैथी ही थी जिसने सुगना को उसके अतीत में धकेल दिया…

समय का पहिया पीछे घूमा और सुगना का मन बनारस महोत्सव की उस धुंधली शाम के गलियारों में पहुँच गया, जिसे उसने अपनी स्मृति की सबसे गहरी परत में दफन कर दिया था।

सुगना को याद आया 'विद्यानंद' का वह रहस्यमयी कक्ष। चारों ओर जलती लोबान की गंध और दीवारों पर उकेरे गए विचित्र यंत्र। सुगना तब सूरज को अपनी गोद में लिए वहां पहुँची थी। नन्हा सूरज, जिसकी आँखों में गजब का तेज था, पर विद्यानंद की शांत और पारखी नज़रों ने उस तेज के पीछे छिपे एक भयंकर अवरोध को देख लिया था।

विद्यानंद की वह भारी और गूँजती हुई आवाज़ आज फिर सुगना के कानों में पिघले हुए शीशे की तरह उतरने लगी:

"देवी, यह पुत्र विलक्षण है... इसमें बुद्धिमत्ता का भंडार होगा, यह बालक पूरे विश्व के लिए एक सम्मानित और प्रतिष्ठित व्यक्ति बनेगा।

पर इसका जन्म एक ऐसे संयोग (पाप) की कोख से हुआ है जो इसके पौरुष को उम्र भर के लिए जकड़ देगा। परायी स्त्री से समागम के समय इसकी मर्दानगी इसका साथ छोड़ देगी।"

सुगना का कलेजा काँप उठा था। उसने सिसकते हुए पूछा था, "क्या विधाता के लिखे को बदलने का कोई मार्ग नहीं है महाराज?"

विद्यानंद ने एक लंबी और बोझिल चुप्पी के बाद सुगना की आँखों में झाँकते हुए वह 'कठोर सत्य' कहा था, जिसे सुनकर सुगना की रूह तक काँप गई थी:

"प्रकृति के इस दोष का निवारण प्रकृति के ही विरुद्ध जाकर संभव है। जिस ऊर्जा ने इसे जन्म दिया है, उसी ऊर्जा की ऊष्मा इसे पूर्ण करेगी। इसे अपनी ही माँ या अपनी सगी बहन के साथ संभोग की उस अग्नि परीक्षा से गुज़रना होगा, जहाँ इसके पुरुषार्थ अवरोध हमेशा के लिए टूट जाए। अन्यथा... यह जीवन भर एक प्यासे राही की तरह अपनी प्यास लिए भटकता रहेगा।"

सुगना अचानक एक झटके के साथ बिस्तर पर उठकर बैठ गई। उसका पूरा शरीर पसीने से लथपथ था और साँसें इस कदर तेज़ थीं जैसे वह किसी डरावने सपने से जागी हो। उसने अपने काँपते हाथों से पानी का घूंट पिया, पर उसके गले की खुश्की कम नहीं हुई।

सुगना के अंतर्मन में स्मृतियों का वह द्वार खुल गया था, जहाँ केवल अंधेरा और नियति का अट्टहास था। वह कोई साधारण वासना नहीं, बल्कि काल का एक क्रूर छलावा था।

बरसों पहले, जब सरयू सिंह और सुगना एक-दूसरे की देह के आकर्षण में बंधे थे, तब उन दोनों में से किसी को भी इस बात का लेशमात्र इल्म नहीं था कि वे एक ही रक्त के दो छोर हैं। नियति ने परिस्थितियों का ताना-बाना कुछ ऐसा बुना था कि पहचान धुंधली हो गई थी और वह वासना प्रबल। वो अनोखा मिलन अद्भुत था जिसमें पूर्ण तृप्ति थी संतोष था पर वह ऐसा 'अनजाना महापाप' था, जिसका फल आज सूरज के रूप में पल रहा था।

विद्यानंद की वाणी अब सुगना के कानों में गूंज रही थी।

नियति का षड्यंत्र इतना गहरा था कि उसने पिता-पुत्री के उस मिलन का दंड सूरज की नपुंसकता के रूप में चुना।

यद्यपि सुगना को अब तक इस बात का इल्म नहीं था कि सूरज अपनी इस मर्दाना कमजोरी से जूझ रहा है पर फिर भी न जाने उसे यह सपना क्यों आया?

सुगना अनजान थी पर अब समय का पहिया वहीं लौट आया था। सुगना बिस्तर पर लेटी पसीने से भीग रही थी, क्योंकि वह जानती थी कि जिस गाँठ को नियति ने अनजाने में लगाया था, उसे 'जान-बूझकर' ही खोलना होगा। सूरज की मुक्ति का द्वार अब उसी वर्जित अग्नि से होकर गुज़रना था।

वह शब्द—"माँ या बहन से संभोग"—किसी अभिशाप की तरह उसके दिमाग में तांडव मचा रहे थे।

हवेली के उस भारी सन्नाटे और सुगना के मानसिक द्वंद्व के बीच, कमरे के दरवाज़े पर हुई दस्तक किसी ठंडी हवा के झोंके की तरह महसूस हुई। दरवाज़ा खुला और ढलती हुई धूप के साथ मधु ने भीतर प्रवेश किया। कॉलेज की किताबों को सीने से चिपकाए, चेहरे पर वही चिर-परिचित मासूमियत लिए मधु को देखकर सुगना के चेहरे पर एक फीकी ही सही, पर सच्ची मुस्कान उभर आई।

मधु को देखते ही सुगना को याद आया कि विद्यानंद ने उस डरावनी भविष्यवाणी का बीज उसके मन में बोया था, तब सुगना कितनी टूट गई थी। वह खुद को उस 'पाप' का भागीदार नहीं बनाना चाहती थी, लेकिन अपने बेटे की विफलता भी उससे देखी नहीं जा रही थी।

तभी उसने विधाता से एक अनोखी मन्नत माँगी थी। उसने कठिन तप, व्रत और न जाने कितनी पूजा-अर्चना की थी, ताकि उसके घर में एक पुत्री का जन्म हो। सुगना के लिए मधु केवल एक संतान नहीं थी, बल्कि वह 'सूरज की मुक्ति' का वह विकल्प थी जिसे उसने समय रहते तैयार किया था।

मधु अपनी माँ के पास आकर बिस्तर पर बैठ गई और चहकते हुए कॉलेज की बातें करने लगी। सुगना उसे निहार रही थी, पर उसके दिमाग में विद्यानंद के वे शब्द अब भी गूंज रहे थे: "माँ या बहन।"

सुगना ने बड़े प्यार से मधु के सिर पर हाथ फेरा। मधु को अंदाज़ा भी नहीं था कि उसकी माँ की ममता भरी नज़रों के पीछे कितना गहरा और वर्जित संकल्प छिपा है। सुगना ने निश्चय कर लिया था कि वह आने वाले समय में आवश्यकता पड़ने पर मधु को इस तरह तैयार करेगी कि वह अनजाने में ही अपने भाई के उस 'अवरोध' को तोड़ने का जरिया बन जाए।

सुगना ने मधु का हाथ अपने हाथ में लिया और उसे खींचकर अपने करीब बिस्तर पर बैठा लिया। मधु की हथेलियाँ गुलाब की पंखुड़ियों जैसी नरम और अभी भी बचपन की छुअन लिए हुए थीं। सुगना ने उन छोटी-छोटी उंगलियों को सहलाना शुरू किया, पर उसकी आँखों में जो भाव था, वह केवल वात्सल्य नहीं था; वह एक पारखी की नज़र थी जो उस 'भविष्य की मुक्ति' को नाप रही थी।

सुगना की निगाहें धीरे-धीरे मधु के चेहरे से उतरकर उसके बदन पर घूमने लगीं। मधु अपनी अठारहवीं बसंत देख रही थी, पर उसकी देह में अभी भी किशोरावस्था की वह मासूमियत बाकी थी। उसके कंधे अभी भी सुकुमार थे, और सफेद कॉलेज कुर्ते के भीतर उभरती हुई उसकी काया किसी अधखिले फूल की तरह थी, जिसे अभी पूरी तरह खिलने के लिए वक्त और धूप की ज़रूरत थी।

सुगना ने महसूस किया कि मधु का रंग कुंदन जैसा साफ़ था, और उसकी गर्दन की सुराहीदार बनावट उसे किसी प्राचीन प्रतिमा जैसा रूप दे रही थी। सुगना ने मन ही मन कल्पना की—जब यह कली पूरी तरह खिलेगी, जब इसके नयन-नक्शों में वह मादकता आएगी जिसे देखकर पत्थर भी पिघल जाए, तभी यह सूरज की कामाग्नि को दिशा दे पाएगी और उसे मुक्ति दिला पाएगी।

सुगना की कल्पनाओं में एक धुंधला सा दृश्य उभरने लगा—सूरज का वह फौलादी बदन और उसके सामने मधु का यह कोमल, चंदन जैसा शरीर। उस वर्जित मिलन की कल्पना मात्र से सुगना के भीतर एक सिहरन दौड़ गई। वह देख रही थी कि कैसे मधु का यह निष्पाप यौवन सूरज के उस 'अवरोध' को पिघलाकर उसे एक नया जीवन दे रहा है।

तभी मधु ने अपनी माँ की आँखों में खोया हुआ सा भाव देखा और सुगना के हाथ को हल्के से झकझोरा।

मधु (हैरानी से): "मां.. ! कहाँ खो गई आप? ऐसे क्या सोच रही हैं जैसे मैं कोई पराई हो गई हूँ?"

सुगना एक झटके से यथार्थ में लौटी। उसकी गालों पर एक अनजानी सी लालिमा (लाज) तैर गई, जैसे उसका कोई बहुत गहरा राज़ पकड़ा गया हो। उसने तुरंत अपनी नज़रों को सँभाला और मधु के गाल को हल्के से सहलाया।

सुगना (मुस्कुराते हुए): "अरे कुछ नहीं लाडो... बस देख रही थी कि मेरी छोटी सी गुड़िया अब कितनी बड़ी हो गई है और इतनी सुंदर हो गई है कि तुझे किसी की नज़र न लग जाए।"

मधु खिलखिलाकर हँस पड़ी और अपनी माँ के गले से लिपट गई। उसे अंदाज़ा भी नहीं था कि जिस माँ के सीने से वह आज अपनी थकान मिटा रही है, उसी माँ ने उसे सूरज के 'अनोखे उपचार' के लिए विधाता से माँग कर लाया है।

सुगना (मन ही मन): "हे महादेव, आपने मेरी पुकार सुनी थी। मैंने मधु को इसीलिए माँगा था ताकि वह अपने भाई के जीवन के उस अंधेरे को मिटा सके। मैं खुद को इस बोझ से मुक्त रखूँगी, पर सूरज को अधूरा नहीं रहने दूँगी। समय आने पर, मैं स्वयं इन दोनों के बीच की उस झूठी मर्यादा की दीवार को गिरा दूँगी।"

हवेली की दीवारों ने आज एक नया और डरावना राज़ अपने भीतर दफन कर लिया। सुगना की आँखों में अब हताशा नहीं, बल्कि एक अजीब सा संतोष था। उसे लग रहा था कि उसने अपने बेटे को बचाने का 'सुरक्षित' रास्ता खोज लिया है—एक ऐसा रास्ता जहाँ वह स्वयं किनारे पर रहकर सूरज को किनारे लगा सकेगी।

पर हाय री सुगना की किस्मत….. उसे यह ज्ञात ही नहीं था की जिस मधु के भरोसे वह सूरज की मुक्ति का मार्ग खोज रही है वह उसकी सगी बहन नहीं है अपितु उसका सृजन सोनू के वीर्य से हुआ है और वह लाली के गर्भ से जन्मी है.. यह करामात भी सूरज की मौसी सोनी की थी….

नियति विधाता के विधान के पन्ने पलट रही थी और उनके लेख को समझने का प्रयास कर रही थी..
 
भाग 172

हवेली की दीवारों ने आज एक नया और डरावना राज़ अपने भीतर दफन कर लिया। सुगना की आँखों में अब हताशा नहीं, बल्कि एक अजीब सा संतोष था। उसे लग रहा था कि उसने अपने बेटे को बचाने का 'सुरक्षित' रास्ता खोज लिया है—एक ऐसा रास्ता जहाँ वह स्वयं किनारे पर रहकर सूरज को किनारे लगा सकेगी।




पर हाय री सुगना की किस्मत….. उसे यह ज्ञात ही नहीं था की जिस मधु के भरोसे वह सूरज की मुक्ति का मार्ग खोज रही है वह उसकी सगी बहन नहीं है अपितु उसका सृजन सोनू के वीर्य से हुआ है और वह लाली के गर्भ से जन्मी है.. यह करामात भी सूरज की मौसी सोनी की थी….



नियति विधाता के विधान के पन्ने पलट रही थी और उनके लेख को समझने का प्रयास कर रही थी..



अब आगे..शाम हो चुकी थी….सूरज और रोजी के उस एकांत फ्लैट से बाहर निकलने का दृश्य किसी युद्ध के मैदान से लौटे पराजित सैनिकों जैसा था। बाहर की ठंडी हवा ने उनके जिस्मों को तो शांत कर दिया था, लेकिन ज़हन में सवालों का एक बवंडर अब भी उठ रहा था।रोजी के मन में एक अजीब सी कशमकश थी। उसने सूरज का वो प्रचंड रूप देखा था—वो लिंग की अद्भुत कठोरता और फिर वो अचानक हुआ पतन। वह इस विज्ञान को समझ नहीं पा रही थी। उसे लगा कि शायद उसकी ही किसी कमी ने सूरज को विचलित कर दिया। वहीं सूरज के लिए आज का दिन किसी भयावह सपने जैसा था। वह बार-बार सोनी मौसी के उस 'उपचार' के बारे में सोच रहा था। क्या वो असर सिर्फ कुछ देर का था? क्या वह वाकई कभी एक पूर्ण मर्द बन पाएगा?दोनों ने भारी मन से एक-दूसरे को विदा किया। सूरज जब अपने घर पहुँचा, तो उसकी आँखों में थकान और हार का एक ऐसा मिश्रण था जिसे छुपाना नामुमकिन था।रोजी के घर से निकलते वक्त सूरज के ज़हन में अभी भी उसकी बातों और यादों का खुमार था, लेकिन बनारस की गलियों में कदम रखते ही हकीकत का शोर उससे टकराया। शहर की आबोहवा आज बदली-बदली सी थी। जैसे-जैसे वह मुख्य मार्ग की ओर बढ़ा, उसे भगवा वस्त्रों का एक सैलाब अपनी ओर आता दिखाई दिया।

सड़क पर साधुओं का एक विशाल झुंड चला आ रहा था। कोई शंख नाद कर रहा था, तो कोई हाथों में त्रिशूल लिए हर-हर महादेव के नारे लगा रहा था। लगभग 100 से 200 साधुओं के इस जत्थे ने पूरी सड़क को अपने घेरे में ले लिया था, जिससे एक लंबा जाम लग गया। गाड़ियों के हॉर्न की आवाज़ें उन साधुओं के भजनों और मंत्रोच्चार के बीच दबकर रह गई थीं।

सूरज अपनी बाइक रोककर किनारे खड़ा हो गया। उसकी नज़रों के सामने एक अजीब सा मंजर था—भस्म रमाए साधु, लंबी जटाओं वाले तपस्वी और भगवा चोले में लिपटे हुए युवा साधक और साध्वियां…बनारस आज अपनी उस आदिम ऊर्जा को समेटे हुए लग रहा था जिसे दुनिया देखने आती है।

तभी सूरज की नज़र कुछ साधुओं पर पड़ी जो दीवारों पर बड़े-बड़े रंगीन पोस्टर चिपका रहे थे। पोस्टर के सबसे ऊपर मोटे अक्षरों में लिखा था: "बनारस महोत्सव: 20 वर्षों का महा-संगम"।

सूरज ने इस महोत्सव के बारे में बुजुर्गों से सुन रखा था। यह कोई साधारण मेला नहीं था; यह दो दशकों में एक बार आने वाला वह योग था जब देश-दुनिया के सिद्ध महात्मा गंगा तट पर एकत्रित होते थे। अगली पूर्णमासी से शुरू होने वाला यह उत्सव पूरे बनारस के लिए आस्था और आकर्षण का सबसे बड़ा केंद्र बनने वाला था।

सूरज की धड़कनें तब थम गईं जब उसकी नज़र पोस्टर के केंद्र में छपी दो तस्वीरों पर पड़ी। एक ओर एक दिव्य महात्मा थे, जिनकी आँखों में ब्रह्मांड की गहराई थी—वे साक्षात् विद्यानंद लग रहे थे। लेकिन दूसरी ओर जो तस्वीर थी, उसने सूरज के होश उड़ा दिए।

वहाँ एक अति सुंदर साध्वी की फोटो लगी थी। भगवा रेशमी वस्त्र, गले में रुद्राक्ष की माला और मस्तक पर अष्टगंध का तिलक। उस साध्वी के नैन-नक्श, वह सुराहीदार गर्दन और आँखों की वह चमक... सूरज को लगा जैसे वह सोनी को देख रहा हो। हालाँकि, वह चेहरा और भी दिव्य, और भी प्रखर लग रहा था, जैसे किसी ने सोनी की छवि को दिव्यता के सांचे में ढाल दिया हो।

साध्वी के चेहरे पर एक ऐसी शांति और अधिकार का भाव था जो उनके विलक्षण होने की गवाही दे रहा था। सूरज चाहकर भी अपनी नज़रें उस पोस्टर से हटा नहीं पा रहा था। पोस्टर पर नीचे लिखा था—'महा-अनुष्ठान की मुख्य संरक्षिका: परम पूज्य वज्र-नंदिनी' । जाम धीरे-धीरे खुलने लगा, साधुओं का झुंड आगे बढ़ गया, लेकिन सूरज वहीं जड़ खड़ा रहा। उसके मन में सवालों का बवंडर उठने लगा। क्या यह महज़ एक इत्तेफाक था या सोनी के जीवन का कोई ऐसा पक्ष था जिसे वह अब तक नहीं जान पाया था? पूर्णमासी अब दूर नहीं थी, और बनारस की फिज़ाओं में किसी बड़े रहस्य के खुलने की गन्ध आने लगी थी।

सूरज को एक पल के लिए उसे साध्वी की फोटो में सोनी दिखाई पड़ने लगी। सोनी सूरज के लिए वरदान थी या अभिशाप यह तो कहना कठिन था पर अब तक सूरज को जितना भी सुख मिला था वह सोने की बदौलत ही मिला था वह अब भी उसे देवीय वरदान के रूप में ही मान रहा था।

सूरज के दिमाग में न जाने कितनी बातें चल रही थी कभी-कभी उसे लग रहा था की साधु बन जाना ही उचित है ना दुनिया की चिंता आगे बढ़ने की ललक बस शांत और निश्चल भाव से अपना जीवन जीना….

रोजी के साथ हुई असफलता से हुई निराश सूरज को परेशान कर रहे थी और वह अपने दिमाग में झंझावात लिए हवेली की ओर प्रस्थान कर रहा था।



तुलसी के चौरे पर दीया जलाकर सुगना जैसे ही पलटी, उसकी नज़र सूरज पर पड़ी। सूरज का उतरा हुआ चेहरा और उसकी बुझी हुई देह देख सुगना चिंतित हो गयी और बोली..सुगना (हैरानी और चिंता से): "अरे सूरज! आ गया बेटा? सुबह को तो तू बड़े चाव से निकला था, फिर अभी ऐसा क्यों लग रहा है जैसे किसी भारी मुसीबत से लड़कर आ रहा हो? चेहरा इतना उतरा हुआ क्यों है ?"

सूरज ने अपनी माँ की नज़रों से बचने की कोशिश की। उसने अपना बैग एक तरफ पटका और बिना कुछ बोले सोफे पर बैठ गया। उसका अपनी हथेलियों में सिर छुपा लेना सुगना को और भी बेचैन कर गया।

सुगना (पास आकर, उसके कंधे पर हाथ रखते हुए): "बोल न बेटा, क्या बात है? कुछ हुआ क्या? किसी से कहा-सुनी हो गई या कोई और बात है? तू तो ऐसा बुझा-बुझा कभी नहीं रहता।"

सूरज (खिझते हुए, पर दबी आवाज़ में): "कुछ नहीं हुआ माँ, बस... एक अजीब सी थकान है। ऐसा लग रहा है जैसे दिमाग की नसें फट जाएंगी। सब कुछ होते हुए भी जैसे कुछ खाली-खाली सा लग रहा है।"

सुगना (गंभीर होकर): "खालीपन काम की वजह से नहीं आता सूरज। तेरी आँखों में वो चमक गायब है जो आज सुबह थी। तू तो ऐसे लौटा है जैसे कोई जंग हार गया हो। सोनी रोजी के बारे मैं बता रही थी तू उससे मिलने गया था ना?

सूरज घबरा गया क्या सोनी मौसी ने मां को सब कुछ बता दिया नहीं नहीं वह ऐसा नहीं कर सकती..

सुगना ने आगे बोला.. जन्मदिन की पार्टी में कोई बात हो गई क्या? क्या उसने कुछ ऐसा कह दिया जो तुझे चुभ गया?"

जन्मदिन की बात कर सुनकर सूरज को संतोष हो गया कि उसकी समझदार मौसी ने उसे अनोखे मिलन की बात निश्चित ही छुपा कर उसे जन्मदिन की पार्टी में तब्दील कर दिया है।

सूरज (तपाक से): "नहीं माँ! रोजी ने कुछ नहीं कहा। वह तो... वह बहुत अच्छी है।"

सुगना (संदेह भरी नज़रों से देखते हुए): "सूरज, तू मुझसे कुछ छुपा रहा है। तेरा ये तनाव साधारण नहीं है। तेरी उम्र में लड़के उमंग से भरे होते हैं, और तू है कि हार मानकर बैठ गया है। क्या तुझे अपनी काबिलियत पर भरोसा नहीं रहा? या फिर तू किसी ऐसी उलझन में फँस गया है जिसका रास्ता तुझे दिख नहीं रहा?"

सूरज को वो पल याद आया जब सब कुछ ठीक होते-होते अचानक खत्म हो गया था। उसके अंदर एक चीख दबी थी, पर वह अपनी शारीरिक विफलता की बात माँ से नहीं कह सकता था। उसने बात को मोड़ने की कोशिश की।

सूरज: "माँ, बस समझ लीजिए कि आज मेरा दिन नहीं था।"

सुगना (उसे ढांढस बंधाते हुए): "देख बेटा, कुछ बताएगा तो तेरी मदद कर पाऊंगी ना वरना तुझे ऐसे देखकर मैं भी उदास हो जाऊंगी"

सूरज (उठते हुए): "कोई बात नहीं है माँ, बस आज मुझे अकेले छोड़ दीजिए। मुझे बस शांति चाहिए।"

सूरज अपने कमरे की ओर बढ़ गया, लेकिन सुगना वहीं खड़ी रही। वह नहीं जानती थी कि सूरज जिस 'तनाव' की बात कर रहा है। उसे समझ आ गया था कि उसके बेटे का आत्मविश्वास बुरी तरह हिला हुआ है, और वह 'तनाव' महज़ काम का नहीं, बल्कि कुछ अनोखा है पर वह सुगना की समझ से परे था।

सुगना को सूरज अब भी एक किशोर की भांति दिखाई पड़ता था आखिर मां की नजर में बच्चे कब बड़े होते हैं सुगना को इस बात का कतई इल्म नहीं था कि विद्यानंद ने जिस अभिशाप की बात की थी वह घटित हो चुका था और उसकी झलक सूरज को दिखाई पड़ चुकी थी।

सुगना अपनी छोटी बहन सोनी के कमरे की ओर तेज़ कदमों से बढ़ रही थी। उसके मन में रह-रहकर सूरज का वह बुझा हुआ चेहरा घूम रहा था। सोनी, जो स्वभाव से चंचल और जीवन के रंगों को जीने वाली महिला थी, सुगना की हालत देखकर ठिठक गई।

"दीदी? क्या हुआ सब खैरियत तो है?" सोनी ने मुस्कुराते हुए पूछा,

सुगना ने बेहद संजीदा स्वर में कहा “सूरज….. देख ना……

सूरज का नाम सुनकर सोनी सतर्क हो गई उसने सुगना की बात काटते हुए पूछा सूरज आ गया क्या? क्या हुआ सूरज को?

उसे उम्मीद थी कि सूरज आज किसी 'विजयी' मुद्रा में लौटा होगा।

सुगना ने सोनी का हाथ पकड़ लिया, उसकी आवाज़ कांप रही थी। "सोनी, सूरज... वह लड़का पूरी तरह टूट गया है। सुबह को तो वह उमंग और उन्माद से पार्टी मनाने निकला था, पर शाम को जब लौटा तो लगा जैसे उसकी रूह ही मर गई हो। वह किसी से बात नहीं कर रहा, बस चादर ओढ़कर पड़ा है। मुझे डर लग रहा है, उसे इतना तनाव में मैंने पहले कभी नहीं देखा।"

सोनी को अपने कानों पर यकीन नहीं हुआ। "क्या? ऐसा कैसे हो सकता है? दीदी, मैंने तो उसे... मेरा मतलब है, वह तो बहुत खुश था।" सोनी के मन में हलचल मच गई। उसे लगा कि कहीं उसके 'उपचार' का कोई उल्टा असर तो नहीं हुआ? वह बिना वक्त गंवाए सुगना को ढांढस बंधाते हुए तेज़ कदमों से सूरज के घर की ओर चल दी।

कमरे में अंधेरा था। सूरज बिस्तर पर चादर ओढ़े दुनिया से कटकर पड़ा था। सोनी धीरे से कमरे में दाखिल हुई। उसने देखा कि सूरज का शरीर चादर के नीचे से उकडू लेटा हुआ पड़ा था। उसके दोनों घुटने उसके सीने से लगे हुए थे। वह बिस्तर के किनारे बैठी और बेहद कोमलता से सूरज के सिर पर अपनी उंगलियां फेरने लगी।

"सूरज.. उठ तो सही। मुझे पूरी बात बता ..आखिर हुआ क्या," सोनी ने फुसफुसाते हुए कहा।

सूरज ने चादर के भीतर से ही भारी आवाज़ में कहा, "मौसी... प्लीज, मुझे अकेला छोड़ दो। मैं बाद में बात करूँगा।"

सोनी कहाँ मानने वाली थी। उसने शरारत से उसकी चादर खींची और इधर-उधर की बातें करने लगी। परंतु सूरज कोई जवाब नहीं दे रहा था। अच्छा आज क्या हुआ? क्या गोरी गुड़िया रोजी ने तुम्हें धोखा दिया?"

सूरज की कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली। सोनी ने हार नहीं मानी। उसने सूरज का वह हाथ अपने हाथों में लेकर उसे जादुई अंगूठे को छूने की कोशिश की परंतु सूरज ने हाथ खींच लिया।

सूरज तुम्हारी इस खामोशी से मेरा कलेजा फटा जा रहा है। मैं तुम्हारी खुशी देखकर खुश और तुम्हारा दुख देखकर दुखी होती हूं मैं तुम्हें बहुत प्यार करती हूं और तुम्हारे चेहरे पर उदासी बिल्कुल नहीं देख सकती। फिर भी यदि तुम मुझसे बात नहीं करना चाहते हो तो मैं चली जाती हूं। सोनी बिस्तर से उठने का प्रयास करने लगी।

मौसी का इतना अपनापन पाकर सूरज का बांध टूट गया। वह फफक-फफक कर रो पड़ा। सोनी ने तुरंत उसे अपनी बांहों में खींच लिया। सूरज ने अपना सिर सोनी की गोद में रख दिया और फूट-फूटकर रोने लगा। बाहर खड़ी सुगना ने जब यह दृश्य देखा, तो उसकी आँखों में भी आँसू आ गए। उसने मन ही मन अपनी बहन को दुआएं दीं कि वह उसके बेटे का बोझ हल्का कर रही है।

सोनी ने सूरज को एक छोटे बच्चे की तरह अपनी गोद में समेट लिया। सूरज की सिसकियाँ सोनी के सीने के पास गूँज रही थीं। उसके गर्म आँसू सोनी की गोद को भीगो रहे थे। सूरज की गर्म सांसे कपड़ों का आवरण पर कर सोनी की जांघों पर महसूस हो रही थी जिससे सोनी को एक अजीब सी सिहरन हुई, पर इस वक्त उसकी प्राथमिकता सूरज का दुख कम करना था।

थोड़ी देर बाद, सोनी ने उसे खुद से अलग किया और अपनी हथेलियों से उसके आँसू पोंछते हुए अधिकारपूर्ण लहजे में बोली, "सुन, अपनी मौसी के सामने कभी मत रोना। तेरे चेहरे की मुस्कान ही मेरी दौलत है। अब साफ़-साफ़ बता, उस रोजी के साथ क्या हुआ? सब कुछ... विस्तार से।"

सूरज ने एक लंबी सांस ली। अब उसके और सोनी के बीच कोई पर्दा नहीं था। उसने रोजी के बारे में बताना शुरू किया—कैसे उसने फ्लैट को महकाया था, कैसे उसने वह सफेद झीना कुर्ता पहना था।

सोनी की आँखों में चमक आ गई। "अच्छा? तो वह इतनी तैयारी में थी? फिर? उसने तुम्हें कैसा देखा? क्या वह तुम्हारी मर्दानगी देखकर डरी नहीं?" सोनी ने थोड़ा 'नॉटी' होते हुए पूछा।

सूरज थोड़ा सहज हुआ और हल्के से मुस्कुराया। "मौसी, जब उसने मुझे उस धोती में देखा, तो वह दंग रह गई थी। उसने कहा कि मैं किसी प्राचीन देव जैसा लग रहा हूँ। उसने... उसने मेरा हाथ पकड़कर मुझे बिस्तर तक ले गई।"

सोनी ने चुटकी लेते हुए पूछा, "और फिर? क्या उसने उस खास हिस्से को छुआ?"

सूरज का चेहरा गुलाबी हो गया। "हाँ मौसी... उसने उसे अपनी हथेलियों में भरा। वह उसे सहला रही थी। वह बार-बार कह रही थी ये इतना सख्त और इतना सुंदर होता है…उसने अब तक इस किताबों में ही देखा था। वह इससे किसी खिलौने की भांति खेल रही थी।" सूरज अब खुलकर बता रहा था। "उसने जब उसे अपनी मुट्ठी में लिया, तो मुझे लगा जैसे मैं स्वर्ग में हूँ।"

सोनी ने अपनी भौहें मटकाते हुए बोला.. मजा तो आएगा ही अपने हाथ से थोड़ी आता है।

सोनी ने आगे पूछा …रोजी खुश तो थी ना?

सूरज मुस्कुराया "हाँ मौसी! वह तो उसे देखकर अपनी सुध-बुध खो बैठी थी। यहाँ तक कि जब मेरा स्खलन हुआ, तो वह नज़ारा देख कर वह चकित रह गई। वह वीर्य की धार उसके चेहरे और सीने पर गिर रही थी। "

सोनी के चेहरे पर एक गहरी मुस्कान थी, पर फिर उसकी आवाज़ गंभीर हुई। "तो फिर यह उदासी क्यों? जब सब इतना अच्छा था, तो तुम ऐसे दुखी दुखी क्यों लौटे? क्या स्खलन के बाद उसका तनाव कम हो गया था?

नहीं मौसी वह तो वैसे ही तना था। यह तो पहले भी होता आया है कि चाहे कितनी ही बार स्खलन कर लो उसका तनाव कम नहीं होता है। सूरज ने सोनी को समझाने की कोशिश की।

फिर क्या हुआ…सोने की आंखों में कोतूहल था

सूरज की मुस्कान फिर से गायब हो गई। उसने वह त्रासदी सुनाई—कैसे जब वह अंतिम प्रहार करने वाला था, जब वह रोजी की 'मखमली खाई' में उतरने ही वाला था, उसका वह फौलादी अंग अचानक एक 'मुरझाए केले' की तरह बेजान हो गया।

सोनी यह सुनकर हक्की-बक्की रह गई। "क्या? प्रवेश से ठीक पहले? ऐसा कैसे हो सकता है सूरज?"

सूरज ने सिसकते हुए कहा, "पता नहीं मौसी। जैसे ही मेरा लिंग उसके योनि के अग्रभाग से सटा, मेरा सारा जोश ठंडा पड़ गया। मुझे लगा जैसे मैं नपुंसक हो गया हूँ।

सूरज ठीक से बता … भगनासे पर?

शायद हाँ ….सूरज ने कहा।

सोनी ने सूरज का हाथ फिर से सहलाया। उसे समझ नहीं आया सोनी को लगा जैसे ही यह सूरज की अति उत्तेजना या मानसिक दबाव का परिणाम था। वह फिर से 'दोस्त' वाले मोड में आ गई। "अरे पागल! इसमें रोने वाली क्या बात है? यह तो बड़े-बड़े सूरमाओं के साथ हो जाता है। जब मंज़िल इतनी खूबसूरत हो, तो कभी-कभी दिल धड़कना भूल जाता है।"

उसने सूरज की ठुड्डी उठाकर शरारत से पूछा, "अच्छा ये बताओ, जब वह निढाल था, तब भी रोजी ने उसे जागने की कोशिश नहीं की? क्या उसने अपने मुँह का इस्तेमाल नहीं किया?"

सूरज अब पूरी तरह सहज हो गया था। "किया था मौसी... उसने बहुत कोशिश की। वह उसे अपने होंठों के बीच लेकर उसे जगाने की कोशिश कर रही थी, पर मैं इतना शर्मिंदा था कि मेरा दिमाग ही काम नहीं कर रहा था।"

सोनी खिलखिलाकर हँसी। "तो अगली बार हम उसे ऐसा तैयार करेंगे कि वह थकेगा ही नहीं। अब उदासी छोड़ और अपनी मौसी को यह बता कि क्या तूने उसकी उस 'गुप्त कली' को अपनी नज़रों से देखा था? कैसी थी वह?"

नहीं मौसी वह बहुत शर्मा रही थी मैंने भी जिद नहीं की पर वह है बहुत खूबसूरत मैंने उसका ऊपर वाला हिस्सा एक झलक देखा.था. सूरज ने शर्माते हुए कहा..

“और इसे…” सोनी ने अपनी चूचियों की तरफ इशारा करते हुए पूछा।

सूरज ने एक झलक सोने की भारी चूचियों की तरफ देखा और तुरंत अपनी नज़रें नीचे कर ली..

हा देखा …सूरज ने सकुचाते हुए कहा

यह हुई ना बात…तूने उसे छुआ भी ? सोनी ने उसे उकसाते हुए पूछा..

हा मौसी बड़ा मजा आया…भगवान ने आप लोगों को कितना कुछ दिया है.. सोनी पूरे संजीदगी से उसकी बातें सुन रही थी..

सूरज की आँखों में फिर से वही चमक लौट आई। उसने विस्तार से रोजी के अंगों और उनकी बनावट के बारे में सोनी को बताया। सोनी बीच-बीच में उसे छेड़ती रही, जिससे सूरज का तनाव पूरी तरह सोनी के प्यार में बह गया।

सूरज अब मुस्करा रहा था। उसे अहसास हुआ कि सोनी सिर्फ उसकी मौसी नहीं, बल्कि उसके जीवन की सबसे बड़ी राज़दार और ताकत है।

सोनी और सूरज के बीच की वह बातचीत केवल दिलासा नहीं थी, बल्कि एक नई योजना की नींव थी। सोनी ने सूरज की आँखों में आँखें डालकर उसे समझाया, "सूरज, पिछली बार तूने दोहरा मजा लेने की कोशिश की पहले हस्तमैथुन और फिर संभोग इस उम्र में उत्तेजना ज्यादा होती है इसे काबू में रखना…. इस बार याद रखना—सीधा निशाना। कोई हस्तमैथुन नहीं, सीधा प्राकृतिक संभोग।"

सूरज को मौसी की बात तार्किक लगी। कुछ दिनों की हिचकिचाहट के बाद, उसने एक बार फिर रोजी को मनाया। रोजी, जो खुद उस अधूरेपन की कसक झेल रही थी, इस बार और भी ज़्यादा उम्मीदों के साथ तैयार हो गई।

मिलन का दिन फिर आया। जाने से पहले सोनी ने सूरज को अपने पास बुलाया। उसने सूरज के अंगूठे को उसी जादुई तरीके से सहलाया, जिससे उसकी रगों में बिजली दौड़ने लगी। सूरज का अंग फिर से अपनी पूरी भव्यता के साथ जाग उठा। सोनी ने उसके माथे को चूमा और सूरज को विदा किया सोनी ने अपने ईश्वर से उसकी सफलता की कामना की और शाम होने का इंतजार करने लगी।

सूरज आत्मविश्वास से भरा हुआ रोजी के पास पहुँचा। फ्लैट का माहौल फिर से वैसा ही मादक था। रोजी ने जब सूरज के उस 'वज्र' जैसे अंग को देखा और छुआ, तो उसकी खुशी का ठिकाना न रहा। उसे लगा कि आज तो कुदरत मेहरबान है। उसने अपनी कोमल हथेलियों से उसे सहलाया, उस पर अपने रसीले होंठ रखे, लेकिन सूरज ने मौसी की हिदायत याद रखी। उसने रोजी को धीरे से बिस्तर पर लिटाया।

रोजी ने अपनी रेशमी जाँघें खोल दीं। सूरज ने खुद को उसकी 'मखमली खाई' के मुहाने पर सटाया। वह पल आ गया था। सूरज ने धीरे से अपने लिंग के शीर्ष (Glans) को रोजी की योनि के द्वार (भग्नाशे) से स्पर्श किया।

लेकिन जैसे ही वह 'गीला और गर्म' स्पर्श हुआ, नियति ने फिर वही क्रूर मज़ाक किया। वह स्पर्श, जो आग भड़काने वाला होना चाहिए था, सूरज के लिए किसी 'इलेक्ट्रिक शॉक' जैसा साबित हुआ। पलक झपकते ही, वह फौलादी अंग फिर से मुरझा गया। जैसे किसी ने जलते हुए दीपक पर बर्फीला पानी डाल दिया हो।

रोजी की आँखें फटी की फटी रह गईं। उसने अपने कोमल हाथों से उसे फिर से सहलाया, अपने मुँह की गर्माहट दी, हर वो जतन किया जो एक प्रेमिका कर सकती है, पर सब व्यर्थ। सूरज का वह अंग अब एक बेजान मांस का टुकड़ा मात्र रह गया था। दोनों की आँखों में आँसू थे। वे फिर से उसी भारी मन और अनसुलझे सवालों के साथ अपने-अपने घर लौट आए।

जब सूरज घर लौटा और उसने सोनी को सारी आपबीती सुनाई, तो सोनी के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। उसे अपनी विशेषज्ञता पर इतना भरोसा था कि उसे यकीन ही नहीं हो रहा था कि उसका 'उपचार' इस तरह फेल हो सकता है।

सोनी (हैरानी से): "यह नामुमकिन है सूरज! अगर वह जाग रहा है, तनाव में आ रहा है, तो ऐन मौके पर ही ऐसा क्यों हो रहा है? वो स्पर्श तो उसे और भड़काना चाहिए, बुझाना नहीं।"

सूरज फूट-फूटकर रोने लगा। "मौसी, मैं खत्म हो चुका हूँ। जैसे ही मेरा लिंग उसकी योनि को छूता हूँ, मुझे ऐसा लगता है जैसे उसका सारा लहू वापस लौट जाता हो और वो। निस्तेज हो जाता है। अब तो रोजी भी मुझसे दूर हो जाएगी। वह कब तक एक बेजान शरीर के साथ सबर करेगी?"

सोनी ने सूरज को गले लगा लिया। वह खुद परेशान थी, उसके पास इस 'विचित्र' समस्या का कोई तुरंत जवाब नहीं था। फिर भी, उसने हार नहीं मानी। उसने सूरज के आँसू पोंछे और बेहद गंभीर होकर बोली:

ईश्वर पर विश्वास रख….सब ठीक हो जाएगा।

सोनी का खुदपर से विश्वास उठ चुका था इसलिए उसने भगवान का सहारा लिया।

सोनी का दिमाग काम नहीं कर रहा था यह एक अनोखी समस्या थी जिस पर यकीन कर पाना कठिन था।

रात का सन्नाटा गहरा चुका था, पर सोनी की आँखों में नींद का नामो-निशान नहीं था। वह अपने कमरे की खिड़की के पास खड़ी चाँदनी को ताक रही थी, लेकिन उसका मन उन सवालों के चक्रव्यूह में फँसा था जिसका सिरा कहीं मिल ही नहीं रहा था। सूरज की वह विचित्र समस्या—स्पर्श होते ही पौरुष का ढह जाना—सोनी के लिए अब केवल एक पारिवारिक चिंता नहीं, बल्कि एक मानसिक गुत्थी बन चुकी थी।

सोनी एक नर्स थी उसे कई सारी समस्याओं और बीमारियों के बारे में पता था पर यह अनुभव उसके लिए बिल्कुल नया था। जितना ही वह इसके बारे में सोचती उतना ही उलझती जाती।

उसने सूरज के लिंग को अपने हाथों से महसूस किया था हाथों से ही क्या उसे अपने होठों और अपनी जीभ तथा मुंह की उष्णता से उसे स्खलित भी किया था। परंतु उसमें उसे कोई कमी दिखाई नहीं पड़ी थी। पर जब जब सोनी सूरज के अंगूठा सहलए जाने से उसके लिंग में आने वाले तनाव के बारे में सोचती वह उसे किसी दैवीय विधि विधान की तरह दिखाई पड़ने लगता।

सोनी को बखूबी याद था कि बचपन में भी वह इस अनुभव को खेलखेल में कई बार कर चुकी थी और बाद में सुगना के कई बार डांटने के पश्चात उसने यह कार्य छोड़ दिया था।

क्या उसे सूरज की मदद नहीं करनी चाहिए? क्या वह सूरज की इस समस्या को स्वयं देखना चाहेगी? वो जितना ही इस बारे में सोचती उतनी ही परेशान होने लगती।

पर कैसे? सोनी यहीं पर आकर रुक जाती क्या वह यह प्रयोग खुद कर सकती है?

प्रश्न भी सोनी के थे और उत्तर भी उसके ही पास था पर उत्तर देने के लिए सोनी शायद अभी तैयार नहीं थी।

सूरज किताबों के बीच घिरा रहता, पर रह-रहकर उसका ध्यान अपनी उस शारीरिक विफलता की ओर चला जाता। उसकी उदासी गहरी थी। सोनी यह भांप लेती और बीच-बीच में उसके पास आती। वह उसे अकेलापन महसूस नहीं होने देती थी।

वक्त गहरे घावों को भी भर देता है.. सूरज अपनी मर्दाना कमजोरी को भूलकर अपनी दिनचर्या में लीन होने की कोशिश करने लगा परीक्षाएं सर पर थी वह एक होनहार विद्यार्थी था। परंतु अब भी उसकी मां एकांत में अपनी उसे कमजोरी पर चला जाता और वह बहुत ज़्यादा निराश हो जाता।

उसकी एक मात्र हमराज उसकी मौसी सोनी ही थी जो उसका मर्म समझती। कभी कभी सोनी मुस्कुराते हुए उसके पास बैठती और हौले से उसके अंगूठे को सहलाने लगती। वह स्पर्श सूरज की रगों में सोई हुई उत्तेजना को फिर से जगा देता। वह उसे हस्तमैथुन (Masturbation) के जरिए उस दबाव को बाहर निकालने का मौका देती, ताकि उसका मन हल्का हो सके। सूरज ने भी धीरे-धीरे अपनी इस विडंबना को नियति मानकर स्वीकार कर लिया था। उसे अहसास था कि अभी उसकी मुक्ति का मार्ग केवल किताबों के पन्नों से होकर गुज़रता है।

एक शाम, सूरज अपनी मेज पर सिर टिकाए बैठा था। सामने एनाटॉमी की भारी-भरकम किताबें खुली थीं, पर उसकी नज़रें शून्य में थीं। सोनी दूध का गिलास लेकर कमरे में दाखिल हुई।

सोनी (प्यार से सिर सहलाते हुए): "क्या हुआ मेरे डॉक्टर साहब? आज फिर किताबों से हार मान ली क्या?"

सूरज (एक लंबी सांस लेकर): "मौसी, ये पढ़ाई... ये सब बेमानी लगता है। मैं दूसरों का इलाज करने की पढ़ाई कर रहा हूँ, जबकि खुद एक ऐसी बीमारी का शिकार हूँ जिसका इलाज किसी किताब में नहीं है।"

सोनी ने दूध का गिलास मेज पर रखा और सूरज की आँखों में आँखें डालकर बोली, "तू बस अपनी परीक्षाओं पर ध्यान लगा सूरज। तू इस कॉलेज का सबसे काबिल लड़का है। अगर तूने इस बार टॉप किया, तो मैं तुझे एक ऐसा 'उपहार' दूँगी जिसकी तूने कल्पना भी नहीं की होगी।"

सूरज के मुरझाए चेहरे पर एक हल्की सी जिज्ञासा उभरी। उसने सोनी का हाथ थाम लिया।

सूरज: "उपहार? कैसा उपहार मौसी?

सोनी…मै तुझे अभी नहीं बता सकती पर मुझे पता है तुझे उसकी सबसे ज्यादा जरूरत है…

क्या मुझे अपनी पसंद का उपहार माँगने का हक होगा?" सूरज ने पूरी मासूमियत से पूछा

सोनी के चेहरे पर एक रहस्यमयी और मादक मुस्कान तैर गई। उसकी आँखों में एक ऐसी चमक थी जिसे सूरज पूरी तरह समझ नहीं पाया, पर उसने एक सिहरन महसूस की।

सोनी (धीमी आवाज़ में): "हाँ सूरज... वादा करती हूँ। उपहार तेरी पसंद का ही होगा। तू जो माँगेगा, वह तुझे मिलेगा। बस तुझे कॉलेज में अव्वल आना होगा।"

सूरज की धड़कनें तेज़ हो गईं। उसने सोनी की हथेलियों की नरमी को महसूस किया। उसे लगा जैसे मौसी के इस वादे के पीछे कोई बहुत बड़ा राज़ छुपा है।

सूरज (उत्साह के साथ): "सच मौसी? जो मैं चाहूँगा वही? क्या आप मुकरेंगी तो नहीं?"

सोनी ने अपनी उंगली उसके होंठों पर रख दी। "मौसी कभी अपने वादे से नहीं मुकरती। अब अपनी सारी ऊर्जा इस पढ़ाई में लगा दे। तुझे साबित करना है कि तू कमज़ोर नहीं है। तेरा यह दिमाग ही तेरी सबसे बड़ी ताकत है।"

सोनी के इस प्रोत्साहन और उस 'अनोखे उपहार' की लालसा ने सूरज के भीतर एक नई जान फूँक दी। वह पूरी लगन से पढ़ाई में जुट गया।

सूरज किताबों में डूब गया और सोनी दूर खड़ी उसे देखती रही, यह सोचते हुए कि जब परीक्षा के बाद वह 'उपहार' देने का वक्त आएगा, तो क्या वह खुद को संभाल पाएगी?

उसे अंदेशा था कि सूरज क्या मांगेगा..

शेष अगले भाग में

 
भाग 173

सोनी के इस प्रोत्साहन और उस 'अनोखे उपहार' की लालसा ने सूरज के भीतर एक नई जान फूँक दी। वह पूरी लगन से पढ़ाई में जुट गया। उसे नहीं पता था कि वह उपहार कोई वस्तु नहीं, बल्कि स्वयं सोनी का वह समर्पण था जो उसकी मर्दानगी की असली परीक्षा लेने वाला था।

सूरज किताबों में डूब गया और सोनी दूर खड़ी उसे देखती रही, यह सोचते हुए कि जब परीक्षा के बाद वह 'उपहार' देने का वक्त आएगा, तो क्या वह खुद को संभाल पाएगी? मर्यादा और ममता की बलि देकर वह सूरज को नया जीवन देने के लिए अब बस सही समय का इंतज़ार कर रही थी।

अब आगे…

अगली सुबह जब सूरज ने चाय की मेज पर वह पोस्टर की फोटो अपने मोबाइल में दिखाया, तो सुगना के हाथ से कप छूटते-छूटते बचा और सोनी की चंचलता पत्थर जैसी खामोशी में बदल गई।

सुगना (कांपते स्वर में): "यह... यह तो मोनी है! मेरी छोटी बहन! पर यह साध्वी का भेष? ये वज्र-नंदिनी?"

सोनी (हैरानी से): "दीदी, २० साल बाद यह वापसी? पोस्टर पर लिखा है 'महा-अनुष्ठान की संरक्षिका'। यह कोई साधारण संयोग नहीं है।"

सूरज ने अपनी माँ और मौसी की व्याकुलता देखकर उन्हें संभाला। उसे अब समझ आ रहा था कि उसकी 'मोनी मौसी' ही वह रहस्यमयी साध्वी है।

विवशता और प्रतीक्षा

सुगना: "सूरज, मुझे अभी उसके पास ले चल! मेरी बहन इतने पास है और मैं यहाँ बैठी हूँ?"

सूरज: "माँ, अभी मुमकिन नहीं है। विद्यानंद जी और साध्वी जी बनारस महोत्सव में ही आएंगे । हमें तब तक इंतज़ार करना ही होगा।"

विद्यानंद की बात सुनकर सुगना एक बार फिर अतीत में खो गयी…

समय बीतता गया। कुछ दिनों बाद….

विश्वविद्यालय के परिणामों की सूची में सबसे ऊपर 'सूरज सिंह' का नाम किसी कोहिनूर की तरह चमक रहा था। यह खबर जैसे ही बनारस की उस भव्य हवेली की दहलीज़ तक पहुँची, पूरे माहौल में एक असीम ऊर्जा दौड़ गई। सुगना की आँखों से ममता और गर्व के आँसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे। उसने हवेली के आँगन में स्थित मंदिर में एक-एक कर कई घी के दीये जलाए और हाथ जोड़कर अपनी संतानों के भाग्य की इस सुनहरी लकीर को सराहा।

सूरज जब हवेली पहुँचा, तो दृश्य किसी राज्याभिषेक से कम नहीं था। हवेली के मुख्य द्वार को ताजे गेंदे के फूलों और आम के पत्तों के बंदनवारों से बड़ी खूबसूरती से सजाया गया था। शाम ढलते ही हवेली के बड़े दालान में एक भव्य भोज का आयोजन हुआ, जिसमें घर के हर छोटे-बड़े सदस्य ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।

जैसे ही सूरज ने हाल में कदम रखा, उसकी बड़ी बहनों—रीमा और मालती—ने हाथ में थाली लेकर उसकी आरती उतारी और बलैयाँ लीं। "मेरा भाई अब बड़ा डॉक्टर बन गया है! अब हमारे पूरे खानदान का नाम रोशन होगा," रीमा ने उसके माथे पर चंदन का तिलक लगाते हुए बड़े गर्व से कहा। मालती ने एक महीन रेशमी कुर्ता उसे भेंट किया, जिसे उसने खास तौर पर सूरज के लिए ही चुना था।

भाई राजू और राजा की खुशी का तो ठिकाना ही न था; उन्होंने सूरज को अपने कंधों पर उठा लिया। राजा ने जोश में चिल्लाकर कहा, "अब किसी को भी इलाज के लिए बाहर भटकने की ज़रूरत नहीं डॉक्टर हमारे पास है।" दोनों भाइयों ने मिलकर उसे एक कीमती कलाई घड़ी उपहार में दी।

छोटी बहन मधु तो अपने बड़े भाई के गले से ही लिपट गई। उसने अपनी छोटी सी सेविंग (बचत) को तोड़कर सूरज के लिए एक असली 'स्टेथोस्कोप' खरीदा था। "भैया, अब आप बिल्कुल असली वाले डॉक्टर लगोगे," उसने मासूमियत से कहा, जिसे सुनकर सबकी हँसी छूट गई।

सुगना मधु की मासूमियत को देख रही थी विधाता ने उसे किस संकट में डाल दिया था…

आगे घर के तीनों महारानियां एक साथ खड़ी थी। सुगना सूरज की मां, सुगना की सहेली और सोनू की पत्नी लाली और उसके पश्चात हम सब की वर्तमान में चहेती सोनी। सूरज ने सबसे पहले सुगना के चरण छुए.

सुगना तो जैसे निहाल हो गई थी, वह बार-बार सूरज का माथा चूमती और कहती, "आज मेरा जीवन सफल हो गया, मेरे लाल।"

लाली की भी कमोवेश यही प्रतिक्रिया रही.. सूरज था ही इतना प्यारा और अब तो वह सब की आंखों का तारा बन चुका था।

इसके पश्चात सूरज ने अपनी प्यारी सोनी मौसी के चरण छूने की कोशिश की पर सोनी ने उसे बीच में ही रोक लिया और उसे अपने आलिंगन में ले लिया सूरज और सोनी का यह आलिंगन निश्चित ही प्रेम का था पर सोनी और सूरज दोनों अपने-अपने हिस्से की कामुकता जीवंत कर रहे थे जब सोनी को यह एहसास हुआ तो उसने सूरज को अलग किया और उसके माथे पर चुमते हुए बोली..

1 मिनट रुक.. सोनी ने अपने गले में पड़ी हुई सोने की चैन उतारी और उसे सूरज के गले में पहनाते हुए बोली मेरे सोना के लिए यह सोना मेरी तरफ से…

सभी जानते थे की सोनी सूरज को बहुत प्यार करती है शायद इसलिए भी की भगवान ने उसे कोई संतान नहीं दी थी।

सभी सूरज और सोनी को लेकर भावुक हो गए।

इस जश्न के खास अवसर पर हवेली में दो और महत्वपूर्ण शख्सियतें मौजूद थीं। लाली के पति और सुगना का भाई सोनू, जो अब एक प्रभावशाली शासकीय अधिकारी बन चुके थे, और विकास, जो सोनी के पति और एक प्रतिष्ठित व्यवसायी थे।

सूरज ने पूरी विनम्रता से उन दोनों के पैर छुए। सोनू और विकास ने भी उसे बाहों में भरकर इस बड़ी उपलब्धि के लिए ढेरों बधाइयां दीं।

आज सुगना का पूरा भरा-पूरा परिवार एक ही छत के नीचे था। सुगना की माँ पदमा और उसकी सास कजरी—ये दोनों हवेली की सबसे बुजुर्ग और सम्मानित स्तंभ थीं। सफेद सूती साड़ियों और चांदी जैसे सफेद बालों में वे किसी तपस्विनी जैसी गरिमामयी और सुंदर लग रही थीं। बढ़ती उम्र के बावजूद ईश्वर ने उन्हें ऐसा तेज दिया था कि उनके चेहरों पर झुर्रियां नहीं, बल्कि अनुभव की चमक झलकती थी। सूरज ने अपनी नानी और दादी के पैर छुए, तो दोनों ने उसे दिल खोलकर भोजपुरी में आशीष दिया।

पदमा (सूरज की नानी) ने सूरज को दुलारते हुए अचानक एक ऐसा प्रस्ताव रख दिया जिसने माहौल में एक नई हलचल पैदा कर दी। उन्होंने सोनी की ओर इशारा करते हुए कहा:

पदमा: "अब सूरज बाबू डॉक्टर बन गइलें, तँ अब इनके खातिर कवनो सुघर, गुनवान लइकी देखे के चाहीं। हमार तँ आँख तरस गइल बा हवेली में नई पतोहू के आवे के राह देखत-देखत।"

सोनी, जो सूरज की उस अंदरूनी कमजोरी (मर्दाना समस्या) और उनके बीच हुए उस गुप्त 'उपचार' के राज़ को दिल में दबाए बैठी थी, एक पल के लिए हक्का-बक्का रह गई। उसे समझ नहीं आया कि वह क्या कहे। उसने बात को सँभालने की कोशिश करते हुए कहा:

सोनी: "अरे माई, अभी तँ बेचारा पढ़ के निकलल बा। थोड़ा ओकरा के अपने काम में जमे दँ, अभी बियाह के का जल्दी बा?"

तभी दादी कजरी ने पदमा का साथ देते हुए अपनी बात रखी:

कजरी: "काहे ना जल्दी बा सोनी? देखत नइखू, हमनी के उमर अब ढल रहल बा। सूरज डॉक्टर बन गइल, ई तँ भगवान के बहुते बड़ किरपा ह। अब एकर बियाह हमनी के अपने सोझा देख लेब, तँ हमनी के परान शांति से निकल जाई।"

सोनी ने घबराहट में फिर से बात घुमानी चाही, पर तभी सोनू (सूरज के मामा) ने मुस्कुराते हुए हस्तक्षेप किया:

सोनू सुगना की तरफ देखते हुए बोला "दीदी, माई और काकी सही कहत बाड़ी। सूरज अब अपने पैर पर खड़ा बा। रँउआ लोग फिकिर ना करीं, हम और विकास भाई मिलके कवनो बहुते नीक खानदान के लइकी खोजब। बस थोड़ा समय दीं।"

विकास ने भी सोनू की हाँ में हाँ मिलाते हुए कहा:

विकास: "एकदम सही बात बा। सूरज खातिर लइकी तँ हमनी के अइसन खोजब कि पूरा बनारस देखत रह जाई। बस थोड़ा नीक घड़ी और मौका देखल जाई।"

सुगना इस पूरे संवाद के दौरान बस चुपचाप मुस्कुरा रही थी। उसकी आँखों में एक अजीब सा संतोष था। उसे अपने बेटे की कामयाबी और परिवार के इस अटूट प्यार को देखकर मन ही मन बड़ी खुशी हो रही थी। वह जानती थी कि उसके परिवार के ये बड़े बुजुर्ग और मुखिया जो भी निर्णय लेंगे, वह सूरज के हित में ही होगा।

हवेली का माहौल अब पूरी तरह से हंसी-ठिठोली और भविष्य की योजनाओं में रंग चुका था। सूरज अपनी नानी और दादी के उन भोजपुरी आशीर्वादों के बीच बैठा मुस्कुरा तो रहा था, पर उसकी नज़रें रह-रहकर सोनी मौसी से टकरा रही थीं, जैसे वह उनसे पूछ रहा हो कि आगे क्या होगा …उसे उसका उपहार कब मिलेगा।

हवेली के हाल में उत्सव की वह हल्की गूँज अभी भी बाकी थी, पर रात गहराने के साथ-साथ शोर सन्नाटे में बदल चुका था। सोनू और विकास अपने पुराने दोस्तों के साथ बाहर गप्पे मार रहे थे। सूरज के मन में एक अजीब सी हलचल थी—सफलता का गौरव तो था, पर उसके भीतर का वह 'अँधेरा' उसे रह-रहकर कचोट रहा था। वह दबे पाँव सोनी मौसी के कमरे की ओर बढ़ा।

कमरे का दरवाज़ा थोड़ा खुला था। भीतर मद्धम पीली रोशनी में सोनी आईने के सामने खड़ी थी। वह अपनी भारी सिल्क की साड़ी के पल्लू को सँभालते हुए अपने कान की सोने की बाली उतारकर मेज पर रख रही थी। उस क्रिया में जब उसने अपना हाथ उठाया, तो उसकी साड़ी का पल्लू कंधे से थोड़ा और सरक गया। आईने के अक्स में उसकी मादक कमर और खुले हुए पेट की गोलाई चमक रही थी। सूरज किवाड़ से टिका उसे ललचाई नज़रों से निहारता रहा।

सोनी ने आईने में सूरज को देखा और धीरे से मुस्कुराते हुए पलटी।

सोनी (कोमल आवाज़ में): "सूरज? इतनी रात को यहाँ? सोए नहीं अब तक?"

सूरज धीरे-धीरे कमरे के भीतर आया। उसकी नज़रें सोनी के गले में चमकती उस जगह पर टिक गईं जहाँ से उसने कुछ देर पहले अपनी चेन उतारी थी। उसने अपनी गर्दन झुकाई और अपने गले में पड़ी उस सुनहरी चेन को छुआ, जो सोनी ने आज शाम सबके सामने उसे पहनाई थी।

सूरज (धीमी आवाज़ में): "मौसी... आज शाम सबके सामने आपने जब अपने हाथों से यह सोने की चेन मेरे गले में डाली, तो मुझे लगा कि मैं दुनिया का सबसे भाग्यशाली इंसान हूँ। पर सच कहूँ मौसी, मुझे ऐसे महंगे और बाहरी उपहारों की कोई आवश्यकता नहीं है।"

सोनी ने गौर से सूरज की आँखों में देखा। सूरज थोड़ा और करीब आया, उसकी आवाज़ में एक दर्द था।

सूरज: "यह चेन, यह सफलता, सब अधूरा है मौसी। मुझे आपकी ज़रूरत है आप ही मेरी इस सबसे बड़ी कमी से मुक्ति दिला सकती है। मुझे फिर से एक संपूर्ण पुरुष बनने में मदद कीजिए मौसी। यही मेरे लिए सबसे बड़ा उपहार होगा।"

सूरज की यह माँग सुनते ही सोनी का चेहरा गंभीर हो गया। उसने तुरंत इस माँग को स्वीकार नहीं किया।

सोनी (कठोर स्वर में): "सूरज! तू जानता है तू क्या कह रहा है? मर्यादा और रिश्तों की एक अपनी दीवार होती है। मैं तेरी मौसी हूँ। समाज और संस्कार हमें इसकी इज़ाजत नहीं देते। ऐसी बातें सोचना भी पाप है।"

सूरज: "मौसी, आप मेरी सिर्फ मौसी ही नहीं, मेरी सबसे अच्छी दोस्त भी हैं। यदि आप मेरी पीड़ा नहीं समझेंगी, तो कौन समझेगा? मैं घुट-घुट कर जी रहा हूँ।"

सूरज बार-बार मिन्नतें करता रहा, पर सोनी के मन में हिचकिचाहट और रिश्तों की दुहाई बनी रही। अंत में, सूरज ने अपना 'अंतिम अस्त्र' इस्तेमाल किया। वह अपने घुटनों पर बैठ गया और दोनों हाथ जोड़कर भावुकता से बोला।

सूरज: "मौसी, आपने वादा किया था कि कॉलेज टॉप करने पर आप मुझे मनचाहा उपहार देंगी। आज मैं अपना वह उपहार माँग रहा हूँ। मुझे और कुछ नहीं चाहिए, बस मेरी इस कमी को दूर करने में मेरी मदद कीजिए।

सोनी निस्तब्ध होकर उसे देख रही थी

क्या आप अपना वादा तोड़ देंगी?"

सोनी ने सूरज के चेहरे पर छाई उस हताशा को देखा जिसने उसके आत्मविश्वास को राख कर दिया था। उसने तय कर लिया कि अब मर्यादा की बेड़ियाँ काटने का समय आ गया है।

सूरज की तड़प और उसकी बेबसी देख सोनी का दिल पिघल गया। उसने अपनी गर्दन नीची की, आँखें बंद कर अपने ईश्वर को याद किया और मन ही मन एक कठिन निर्णय लिया। उसने अपनी उँगलियाँ सूरज के माथे पर फेरीं और उसे उठने का संकेत दिया।

सोनी (धीमी आवाज़ में): "ठीक है सूरज... यदि विधाता को यही मंजूर है, तो मैं ज़रूर प्रयास करूँगी। पर अभी नहीं।"

सूरज की आँखों में खुशी के आँसू आ गए। अभी यह संवाद खत्म ही हुआ था कि अचानक दरवाज़ा खुला और सोनी का पति विकास कमरे में दाखिल हुआ। सूरज की आँखों में आँसू देख वह ठिठक गया।

विकास: "अरे डॉक्टर साहब! क्या हुआ? आज इतनी बड़ी जीत का दिन है और आपकी आँखें क्यों नम हैं?"

सूरज ने तुरंत खुद को सँभाला और मुस्कुराते हुए बोला।

सूरज: "अंकल, यह खुशी के आँसू हैं। मेरी यह सफलता मौसी की वजह से ही है। इन्होंने हर वक्त और हर तरीके से मेरी मदद की है। इनके प्रोत्साहन के बिना मैं यहाँ तक नहीं पहुँच पाता।"

सोनी ने स्थिति को सँभालते हुए प्यार से सूरज को झिड़का।

सोनी (मुस्कुराते हुए): "चल-चल, अब ज्यादा मस्का मत लगा। बहुत रात हो गई है, अब जाकर सो जा।"

विकास सूरज और सोनी के इस स्नेह को देखकर बहुत खुश हुआ। उसने सूरज के कंधे पर हाथ रखा।

विकास: "वाकई सूरज, सोनी तुम्हारी बहुत फिक्र करती है। मुझे तुम पर गर्व है। अब तुम बड़े डॉक्टर हो, आने वाले समय में तुम्हें पूरे परिवार का ख्याल रखना है।"

सूरज ने विकास से आशीर्वाद लिया और खुशी-खुशी अपने कमरे की ओर लौट गया। उसके कदम अब हल्के थे, क्योंकि उसे उस दिन का इंतज़ार था जब सोनी उसे वह 'अनोखा उपहार' देने वाली थी।

उस रात में जहाँ एक ओर उत्सव की थकान थी, वहीं दूसरी ओर भावनाओं का एक गहरा ज्वार उमड़ रहा था। सूरज के कमरे से बाहर निकलते ही सोनी ने एक गहरी साँस ली। उसका मन अभी भी उस वादे के बोझ और आने वाले कल की अनिश्चितता के बीच झूल रहा था।

सोनी ने धीरे से अपने कमरे का दरवाज़ा बंद किया और आईने के सामने खड़ी होकर अपनी भारी सिल्क की साड़ी की पिने खोलने लगी। वह अपनी नाइट ड्रेस निकालने ही वाली थी कि तभी पीछे से दो मजबूत बाँहों ने उसे अपनी गिरफ्त में ले लिया। यह विकास था। कई दिनों तक व्यापार के सिलसिले में बाहर रहने के बाद, वह अपनी पत्नी की मादकता और उसकी देह की खुशबू के लिए प्यासा था।

विकास ने सोनी के गले पर अपनी पकड़ मजबूत की और उसके कंधे पर मद्धम चुंबन अंकित किया। सोनी एक पल के लिए ठिठकी। उसके दिमाग में अभी भी सूरज की बेबसी और उसकी 'अनोखी माँग' घूम रही थी।

सोनी (धीमी आवाज़ में): "विकास... अभी नहीं। घर में इतने मेहमान हैं, सब थके हुए हैं। थोड़ा रुक जाइए।"

पर विकास आज सुनने के मूड में नहीं था। उसने सोनी की गर्दन के पास फुसफुसाते हुए कहा, "इतने दिनों बाद घर आया हूँ सोनी, और आज तुम्हारी यह सुंदरता... यह सिल्क की साड़ी और तुम्हारा यह रूप मुझे पागल कर रहा है।"

विकास ने बड़े प्यार से सोनी को घुमाया और उसे अपनी बाहों में उठाकर बिस्तर की ओर ले गया। सोनी ने विरोध करने की कोशिश तो की, पर एक पत्नी होने के नाते वह अपने पति की इच्छा को टाल न सकी। उसने खुद को विकास के हवाले कर दिया, लेकिन उसका मन कहीं और भटकने लगा था।

जैसे ही विकास ने सोनी की देह से वस्त्रों का बोझ कम करना शुरू किया, सोनी की आँखों के सामने वह दृश्य तैरने लगा जो कुछ देर पहले घटित हुआ था। सूरज के वे कांपते हाथ, उसकी वह बेबसी और उसका वह वादा। विकास जब सोनी के बदन को सहला रहा था, तब सोनी के जहन में एक अद्भुत द्वंद्व चल रहा था।

वह सोचने लगी—जब वह दिन आएगा, जब सूरज मेरे सामने होगा, तब दृश्य कैसा होगा? क्या सूरज का वह पौरुष, जो रोजी के सामने हार मान गया था, मेरी मादकता के सामने चट्टान की तरह खड़ा रह पाएगा? क्या उसका वह अद्भुत लिंग मेरी देह की गर्मी पाकर अपनी कठोरता बनाए रखेगा?

सोनी इन कामुक कल्पनाओं के भँवर में डूबती चली गई। उसे अहसास भी नहीं हुआ कि विकास मैं उसे कब पूरी तरह नग्न कर दिया है। उसे इसका एहसास तब हुआ जब उसने विकास के होठों की गर्मी को अपनी प्यासी बुर पर। महसूस किया।

सोने की बुर पूरी तरह गीली हो चुकी थी विकास के होठों पर उसका काम रस लग चुका था।

विकास (हैरान होकर): "मेरी रानी... लगता है तुम भी मेरा उतनी ही शिद्दत से इंतज़ार कर रही थीं। इतनी गर्मी, इतनी चिकनाहट!"

सोनी ने कोई जवाब नहीं दिया, बस अपनी आँखें मूँद लीं। उसने विकास को अपने आगोश में लेने के लिए अपनी गोरी बाहें खोल दी..

सोनी क्या कहती विकास जो उसकी योनि के अधरों से चूम रहा था वह रस सूरज के लिए उत्सर्जित हुआ था पर उसका स्वाद विकास को मिल रहा था।। विकास संभोग की मुद्रा में आ गया।

विकास ने जैसे ही सोनी की योनि के द्वार पर अपना लिंग टिकाया, उसका सुपड़ा बिना किसी प्रतिरोध के अंदर आ गया। सोनी की योनि पूरी तरह नम और चिकनी हो चुकी थी। विकास को लगा कि यह उसकी अपनी उपस्थिति का जादू है, पर हकीकत में सोनी अपनी कल्पनाओं में सूरज के लिंग के स्पर्श को महसूस कर रही थी।

विकास ने एक जोरदार धक्के के साथ उसके भीतर प्रवेश किया। विकास का लिंग अपना काम कर रहा था, लेकिन सोनी की कल्पनाओं में वह 'सूरज का लिंग' था जो उसकी गहराइयों को नाप रहा था। उसे लगा जैसे सूरज की वह दबी हुई ऊर्जा उसके भीतर फूट रही है।

सोनी के मन में एक प्रार्थना सी गूँजी, "हे विधाता! मेरी रक्षा करना, यह मैं क्या सोच रही हूँ?" पर उसकी देह उसकी सोच के वश में नहीं थी। कल्पनाओं के उस तीव्र वेग ने सोनी की कामुकता को सातवें आसमान पर पहुँचा दिया। विकास की हर हरकत उसे उस 'आने वाले प्रयोग' की तैयारी लगने लगी।

जैसे-जैसे विकास की गति बढ़ी, सोनी का शरीर धनुष की तरह अकड़ने लगा। उसकी जाघें काँपने लगीं और उसने विकास की पीठ को अपने नाखूनों से जकड़ लिया। कल्पना और यथार्थ के उस अनोखे मेल ने सोनी को एक ऐसा चरम सुख (Orgasm) प्रदान किया, जो उसे महीनों से नहीं मिला था। उसकी पूरी देह शिथिल हो गई।

उधर विकास ने भी एक लंबी कराह के साथ अपना सारा वीर्यपात सोनी की गहराइयों में कर दिया। दोनों हाँफते हुए एक-दूसरे से लिपटे रहे। विकास को अपनी पत्नी की इस सक्रियता पर गर्व हो रहा था।

कुछ देर बाद विकास गहरी नींद में सो गया, लेकिन सोनी की आँखों में एक मद्धम चमक थी। सोनी सूरज के उसे अनोखे उपहार के बारे में सोचने लगी।

एक तरफ उसकी मर्यादा थी, वह पवित्र रिश्ता जो उसे सूरज की 'मौसी' बनाता था। समाज की नज़र में वह पूजनीय थी, रक्षक थी। दूसरी तरफ उसकी अंतरात्मा चीख-चीख कर कह रही थी कि यदि सूरज को इस नर्क से कोई निकाल सकता है, तो वह केवल वही है।

"क्या मुझे सूरज के साथ वह सब करना होगा, जो रोजी नहीं कर पाई? क्या मुझे अपनी मर्यादा की लक्ष्मण रेखा लांघकर उसके पौरुष की अग्नि को अपनी देह से सुलगाना होगा?"

यह विचार आते ही सोनी के शरीर में एक सिहरन दौड़ जाती। उसे डर था कि कहीं यह उसका 'बलिदान' नहीं, बल्कि उसके भीतर दबी हुई वासना का खेल तो नहीं? वह खुद से पूछती—क्या वह वास्तव में सूरज को ठीक करना चाहती है, या वह उस 'वज्र' जैसे अंग की शक्ति से आकर्षित हो रही है जिसे उसने अपनी आँखों से देखा और हाथों से महसूस किया था?

सोनी के ज़हन में सूरज के उस अंग की छवि बार-बार कौंधती। वह मजबूती, वह नस-नस में दौड़ती गर्मी, और फिर अचानक उसका निढाल हो जाना। सोनी को महसूस हो रहा था कि वह जाने-अनजाने सूरज के प्रति आसक्त होती जा रही है। एक औरत होने के नाते, उस 'प्रतापी पौरुष' ने उसके भीतर की सोई हुई कामनाओं को जगा दिया था।

लेकिन जैसे ही वासना का ज्वार उठता, उसकी नैतिकता उसे झिड़क देती: "सोनी! वह तेरा भांजा है। तू उसकी ढाल है, उसकी कामुकता का केंद्र नहीं। क्या तू अपनी भग्नासा (clitoris) से उसका स्पर्श करके उसे ठीक करेगी या खुद को उस पाप की आग में झोंक देगी?"

सोनी बिस्तर पर करवटें बदलने लगी। उसके मन की गूँज उसे चैन नहीं लेने दे रही थी:

"पर क्या एक मौसी का अपने भांजे के सामने नग्न होना और उसकी इंद्रिय को अपनी देह से सहलाना धर्म के विरुद्ध नहीं होगा? "

"अगर मेरा यह कदम उसे एक संपूर्ण मर्द बना सकता है, तो क्या यह पाप है या पुण्य? अगर वह ठीक नहीं हुआ, तो उसकी पूरी ज़िंदगी बर्बाद हो जाएगी। क्या एक मौसी अपने बच्चे को तिल-तिल मरते देख सकती है?"

क्या होगा अगर वह सूरज को एक 'प्रयोग' की तरह ले? क्या वह अपनी देह को एक 'औषधि' की तरह इस्तेमाल कर सकती है? उसका मन उसे मजबूर कर रहा था कि वह आगे बढ़कर सूरज की इस गुत्थी को सुलझाए।

उसे रह-रहकर याद आता कि कैसे सूरज उसके कंधे पर सिर रखकर रोया था। उसकी वह बेबसी सोनी के दिल को चीर देती थी। वह खुद से कहती, "सूरज का वह आंसू मेरी छाती पर गिरा था, वह केवल संवेदनाओं का पानी नहीं था, वह एक पुकार थी। वह मुझसे मदद मांग रहा है, जिसे वह शब्दों में कह नहीं सकता।"

सोनी ने ठंडी सांस ली। उसके भीतर की कामुकता अब ममता और कर्तव्य के साथ एकाकार हो रही थी। उसे लग रहा था कि मर्यादा की पवित्रता अपनी जगह है, लेकिन एक डूबते हुए इंसान को बचाने के लिए अगर किनारा छोड़ना पड़े, तो वह पीछे नहीं हटेगी।

"मुझे उसे महसूस करना होगा। मुझे यह देखना होगा कि जब वह मेरे करीब आता है, तो उसकी धड़कनें क्या कहती हैं। क्या मेरी भग्नासा का स्पर्श उसे वो स्थिरता दे पाएगा जो उसे एक विजेता बनाए?"

सोनी का चेहरा लाल हो गया। उत्तेजना और ग्लानि के बीच झूलती हुई वह अंततः एक निर्णय पर पहुँच रही थी। वह जानती थी कि यह रास्ता काँटों भरा है, पर सूरज की खातिर वह अपनी 'पवित्रता' की बलि देने को भी तैयार होने लगी थी।

उसने चाँदनी को खिड़की से आते देखा और मन ही मन मुस्कुराई। उसकी कल्पनाओं ने उसे डराया भी था और एक नया विश्वास भी दिया था। उसे अब लगने लगा था कि वह सूरज को उस 'अनोखे उपहार' के ज़रिए एक नया जीवन देने में ज़रूर सफल होगी।

इसी संतुष्टि और कामुक रोमांच के साथ, सोनी भी एक गहरी और सपनों भरी नींद की आगोश में चली गई…

पर सूरज जाग रहा था…

शेष अगले भाग में
 
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