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बहुत बहुत शुक्रिया आभार अभिनंदन
कहानी लिखते समय लेखक अलग दुनिया में जीता है, उस समय उसे लिखी गई कहानी/इबारत सबसे खास लगती है जो की सत्य नही है। कहानी की खासियत तो आप और आप जैसे खास रीडर/पाठक ही बता सकते है, जो कहानी को पढ़ते ही नही बल्कि महसूस करते हैं। कहानी के पात्रों के साथ जीते हैं और उनकी की गयी गलतियों को अपने प्यारे से शब्दों में लेखक को लिख कर बताते/अवगत करते है।
(( अरुण मानसिक रूप से कमजोर और उसे समझ नहीं आ रहा है क्या करना है....... ऐसा आपको लगा))
ये दिल, दिमाग, उम्र, समझ, जिस्म से परिपक्व (mature) लोगों की त्रिकोणीय प्रेम कहानी है, इसमें रिंकी के किरदार को छोड़कर बांकी अरुण की मम्मी, कुसुम, खुद अरुण तीनों ही रिश्तों की अहमियत, मर्यादाए, भली भाँति समजते है, उनके एक गलत कदम, एक गलती, गलत फैसला उनकी और उनके परिवार की खुशियों का खतम कर देगा। एक ही परिवार में सगे रिश्तों में ऐसे रिश्ते आसानी से नही पनपते है। इन रिश्तों में हालातों, मजबूरियों, नादानियों, जरूरतों के चलते बहुत सी वजह होती है जिन्हे हर एक इंसान नही समझ सकता है। मेच्योर हीरों और कमसिन् जवान लड़की के ऊपर बनाई गयी यश चोपड़ा निर्देशित लम्हे फिल्म को यू ट्यूब पर देखिये। जिसमें अनिल कपूर को उसकी प्रेमिका की बेटी प्यार करने लगती है, और अपनी सारी हदें पार कर उसे seduce करती हैं। ऐसा नही है हीरो उसे पसंद नहीं करता या उत्तेजित नही होता, वो उसे चूमना चाहता है, लेकिन जब चूमने का ख्याल लाता है तो उस ख्याल के साथ उसे हीरोइन में अपनी बेटी नजर आती है, जिसे उसने पाला था पिता की तरह। ठीक ऐसी ही हालत अरुण की है । रिश्तों की मर्यादा तोड़ना एक मेच्योर समझदार इंसा के लिए कभी भी सहज नही होता है।
"" अरुण रिंकी को पाने की हिम्मत तो कर सकता है लेकिन कमीनापण कहा से लायेगा"""

माँ बेटे के बीच आकृषण होना बहुत सहज होता है, ऊपर से जब परिवार छोटा/एकल (पति, पत्नी, बेटा/बेटी) हो । परिवार में इक्लोता लड़का/लड़की किन हालातों में होता है इस पर शायद किसी ने गौर नही किया हो। बच्चे का जनम दो जिस्मो के मिलन से होता है। कभी भी कोई भी स्त्री एक बच्चे से संतुष्ट नही होती है, उसको कम से कम तीन बच्चो को जनम देने की इच्छा आजीवन रहती है। लेकिन पति की लाचारी, मजबूरी, बुरी आदतें, असहमति, शारीरिक परेशानी, घरेलू कलह की वजह से दूरी, शादी में उम्र का अंतर, और भी अन्य परेशानियों की से वो एक बच्चे को जनम देकर संतोष कर लेती है। वही पति एक बच्चे को पैदा कर सामाजिक तौर पर मर्द होने का ठप्पा लगवा कर खुश हो जाता है।
((na to wo apni souteli beti ki taraf akarshit ho pa raha hai nahi apni ma ki taraf,))
अरुण अपनी माँ की तरफ कब से और कैसे आक्रषित हुआ है ये बात मै साफ करना चाहूंगा। इक्लोता होने की वजह से और पापा के दूसरे शहर में पोस्टिंग होने की वजह से वो छोटे से अपनी माँ के करीब रहा है। घर में ढेड़ आदमी के लिए खाना बनाने के अलावा उसकी मा के पास कोई काम नही था। कपड़े धोने, गेंहू पीसने, और अन्य कामों के लिए मशीनें लगी थी। इसलिए अरुण की माँ ज्यादतर अपना समय घर की साफ सफ़ाई, आँगन, छत, फर्श धोना, बाथरूम, आदि पर खर्च करती, इस दोरान अरुण भी मदद करता। साफ सफाई हमेशा महिलाएं ऐसे समय करती है जब उन्हे नहाना, कपड़े धोना होता है, चूंकि अरुण भी मदद करता तो वो भी गीला हो जाता तो उसकी माँ उसे खुद ही नहला देती। जब तक वो खुद नहाये और वापस आकर अरुण को कपड़े पेहनाये तब तक अरुण नँगा ही माँ को नहाते हुए देखता। उम्र के साथ साथ अरुण की समझ भी बढ़ रही थी। लेकिन माँ इससे अंजान थी। औरत भी मर्द की तरह नहाते हुए अपना गुप्तांगो को पानी से रगड़ कर साफ करती है। अरुण की माँ भी यही करती थी। उसकी माँ को अपने बेटे के बड़ा होने का अहसास जब हुआ जब एक पड़ोसन ने अरुण को नँगा देखा और उसकी माँ से कहा।
अकेले रहने वाले लोग या तो ठरकी होते है या सनकी होते है

अरुण की फैमिली मे आय का स्रोत बहुत आसान है, पूर्वजों की कृपा से आलीशान बना हुआ मकान, सोना, गाँव में बेची गईं जमीं की राशि का ब्याज, पिता की पेंशन, उसकी तंखाह, छोटा सा परिवार सुखी जीवन। इक्लौते होने की वजह से अरुण शुरु से अपने माता पिता का लाडला पुत्र रहा है। ज्यादा दोस्ती यारी नही, नशा, जुवा कोई बुरी आदत नही।घर और ड्यूटी के मध्य उसकी जिंदगी बीती है। जो लड़के इस प्रवती के होते है वो अक्सर अपनी इच्चाये मन की मन में रखते है, किसी से कह नही पाते। अरुण भी अपने परिवार में एक्लोता है, ज्यादा दोस्ती यारी नही, नशे जुये की बुरी आदत नही पूरा समय जॉब और घर में ही गुजरता है। हर किसी की कुछ ना कुछ इच्चाये होती हैं,जिन्हे वो किसी के साथ share, करता है, राय लेता है, सेक्स भी उन्ही इच्छाओ में एक इच्छा होती हैं।
दस साल के बाद की यादे, घटना कभी नहीं मिटती हैं, अरुण की ठरकी, बनने या माँ की ओर आकर्षण की मुख्य वजह खुद उसकी माँ है। अरुण जब ठरकी पन की सीमाए लाँघ चुका है और अब उसकी बेटी ठरकपन पर उतारू है तो वो अपनी मेच्योरिटी की वजह से पहल नही कर पा रहा है।
((aur jan bibi ke karname sunne ko mile to nahi koi thos kadam utha pa raha))
मुझे आश्चर्य होता है आप आज के जमाने की खुले विचारों की महिला होकर कुसुम के नौकरी करने पर सवाल उठा रही है, कितनी महिलाएं नोकारिया कर रही है, आपको gov जॉब मिलेगी तो क्या नही करेगी????? आप अपनी राय छोड़िये । आप तो बस एक बार अपने पति से पूछीये मजाक में सही "" मुझे gov जॉब/ आगनबॉडी में जॉब मिल रही है। फिर उनकी राय सुनना। एक पति नौकरी को अहमियत देता है या पत्नी को.....!
Madam Gov. जॉब एक परमानेंट फ्यूचर है।
इस update में कुसुम के आखिर के शब्दों पर आपने ध्यान नही दिया शायद..... उसने सरकारी नौकरी के फायदे बताये। ऑफिस के लोगो के दुर्व्यवहार का तोड़ बताया।
उसने खुले शब्दों में हर बार अपने पति को बोला है मै बेहयाई नही करूँगी। जबकि अरुण हर प्रयास कर चुका है कुसुम के चरित्र में दाग ढूढने का।
((me uski halat aisi hoti dikh rahi hai jaise dhobi ka kuta ghar ka na ghat ka, Hath arun ke kuchh aana nahi aur jo hai pass me wo bhi koi aur le udega))
सजा तो सबकी निश्चित है, चाहे वो गुनाह जानबूजकर किया गया हो, या अंजाने में। मानसिक हो या शरीरिक सजा तो सजा ही है।
शब्दों शब्दों में कुछ गलत शब्द लिख दिये गये हो जो आपको गलत लगे हो तो उसके लिए माफी मांगता हूँ।
इसी तरह अपने प्यार भरे शब्दों से कहानी को प्यार देते रहिये.....

कहानी लिखते समय लेखक अलग दुनिया में जीता है, उस समय उसे लिखी गई कहानी/इबारत सबसे खास लगती है जो की सत्य नही है। कहानी की खासियत तो आप और आप जैसे खास रीडर/पाठक ही बता सकते है, जो कहानी को पढ़ते ही नही बल्कि महसूस करते हैं। कहानी के पात्रों के साथ जीते हैं और उनकी की गयी गलतियों को अपने प्यारे से शब्दों में लेखक को लिख कर बताते/अवगत करते है।
(( अरुण मानसिक रूप से कमजोर और उसे समझ नहीं आ रहा है क्या करना है....... ऐसा आपको लगा))
ये दिल, दिमाग, उम्र, समझ, जिस्म से परिपक्व (mature) लोगों की त्रिकोणीय प्रेम कहानी है, इसमें रिंकी के किरदार को छोड़कर बांकी अरुण की मम्मी, कुसुम, खुद अरुण तीनों ही रिश्तों की अहमियत, मर्यादाए, भली भाँति समजते है, उनके एक गलत कदम, एक गलती, गलत फैसला उनकी और उनके परिवार की खुशियों का खतम कर देगा। एक ही परिवार में सगे रिश्तों में ऐसे रिश्ते आसानी से नही पनपते है। इन रिश्तों में हालातों, मजबूरियों, नादानियों, जरूरतों के चलते बहुत सी वजह होती है जिन्हे हर एक इंसान नही समझ सकता है। मेच्योर हीरों और कमसिन् जवान लड़की के ऊपर बनाई गयी यश चोपड़ा निर्देशित लम्हे फिल्म को यू ट्यूब पर देखिये। जिसमें अनिल कपूर को उसकी प्रेमिका की बेटी प्यार करने लगती है, और अपनी सारी हदें पार कर उसे seduce करती हैं। ऐसा नही है हीरो उसे पसंद नहीं करता या उत्तेजित नही होता, वो उसे चूमना चाहता है, लेकिन जब चूमने का ख्याल लाता है तो उस ख्याल के साथ उसे हीरोइन में अपनी बेटी नजर आती है, जिसे उसने पाला था पिता की तरह। ठीक ऐसी ही हालत अरुण की है । रिश्तों की मर्यादा तोड़ना एक मेच्योर समझदार इंसा के लिए कभी भी सहज नही होता है।
"" अरुण रिंकी को पाने की हिम्मत तो कर सकता है लेकिन कमीनापण कहा से लायेगा"""
माँ बेटे के बीच आकृषण होना बहुत सहज होता है, ऊपर से जब परिवार छोटा/एकल (पति, पत्नी, बेटा/बेटी) हो । परिवार में इक्लोता लड़का/लड़की किन हालातों में होता है इस पर शायद किसी ने गौर नही किया हो। बच्चे का जनम दो जिस्मो के मिलन से होता है। कभी भी कोई भी स्त्री एक बच्चे से संतुष्ट नही होती है, उसको कम से कम तीन बच्चो को जनम देने की इच्छा आजीवन रहती है। लेकिन पति की लाचारी, मजबूरी, बुरी आदतें, असहमति, शारीरिक परेशानी, घरेलू कलह की वजह से दूरी, शादी में उम्र का अंतर, और भी अन्य परेशानियों की से वो एक बच्चे को जनम देकर संतोष कर लेती है। वही पति एक बच्चे को पैदा कर सामाजिक तौर पर मर्द होने का ठप्पा लगवा कर खुश हो जाता है।
((na to wo apni souteli beti ki taraf akarshit ho pa raha hai nahi apni ma ki taraf,))
अरुण अपनी माँ की तरफ कब से और कैसे आक्रषित हुआ है ये बात मै साफ करना चाहूंगा। इक्लोता होने की वजह से और पापा के दूसरे शहर में पोस्टिंग होने की वजह से वो छोटे से अपनी माँ के करीब रहा है। घर में ढेड़ आदमी के लिए खाना बनाने के अलावा उसकी मा के पास कोई काम नही था। कपड़े धोने, गेंहू पीसने, और अन्य कामों के लिए मशीनें लगी थी। इसलिए अरुण की माँ ज्यादतर अपना समय घर की साफ सफ़ाई, आँगन, छत, फर्श धोना, बाथरूम, आदि पर खर्च करती, इस दोरान अरुण भी मदद करता। साफ सफाई हमेशा महिलाएं ऐसे समय करती है जब उन्हे नहाना, कपड़े धोना होता है, चूंकि अरुण भी मदद करता तो वो भी गीला हो जाता तो उसकी माँ उसे खुद ही नहला देती। जब तक वो खुद नहाये और वापस आकर अरुण को कपड़े पेहनाये तब तक अरुण नँगा ही माँ को नहाते हुए देखता। उम्र के साथ साथ अरुण की समझ भी बढ़ रही थी। लेकिन माँ इससे अंजान थी। औरत भी मर्द की तरह नहाते हुए अपना गुप्तांगो को पानी से रगड़ कर साफ करती है। अरुण की माँ भी यही करती थी। उसकी माँ को अपने बेटे के बड़ा होने का अहसास जब हुआ जब एक पड़ोसन ने अरुण को नँगा देखा और उसकी माँ से कहा।
अकेले रहने वाले लोग या तो ठरकी होते है या सनकी होते है
अरुण की फैमिली मे आय का स्रोत बहुत आसान है, पूर्वजों की कृपा से आलीशान बना हुआ मकान, सोना, गाँव में बेची गईं जमीं की राशि का ब्याज, पिता की पेंशन, उसकी तंखाह, छोटा सा परिवार सुखी जीवन। इक्लौते होने की वजह से अरुण शुरु से अपने माता पिता का लाडला पुत्र रहा है। ज्यादा दोस्ती यारी नही, नशा, जुवा कोई बुरी आदत नही।घर और ड्यूटी के मध्य उसकी जिंदगी बीती है। जो लड़के इस प्रवती के होते है वो अक्सर अपनी इच्चाये मन की मन में रखते है, किसी से कह नही पाते। अरुण भी अपने परिवार में एक्लोता है, ज्यादा दोस्ती यारी नही, नशे जुये की बुरी आदत नही पूरा समय जॉब और घर में ही गुजरता है। हर किसी की कुछ ना कुछ इच्चाये होती हैं,जिन्हे वो किसी के साथ share, करता है, राय लेता है, सेक्स भी उन्ही इच्छाओ में एक इच्छा होती हैं।
दस साल के बाद की यादे, घटना कभी नहीं मिटती हैं, अरुण की ठरकी, बनने या माँ की ओर आकर्षण की मुख्य वजह खुद उसकी माँ है। अरुण जब ठरकी पन की सीमाए लाँघ चुका है और अब उसकी बेटी ठरकपन पर उतारू है तो वो अपनी मेच्योरिटी की वजह से पहल नही कर पा रहा है।
((aur jan bibi ke karname sunne ko mile to nahi koi thos kadam utha pa raha))
मुझे आश्चर्य होता है आप आज के जमाने की खुले विचारों की महिला होकर कुसुम के नौकरी करने पर सवाल उठा रही है, कितनी महिलाएं नोकारिया कर रही है, आपको gov जॉब मिलेगी तो क्या नही करेगी????? आप अपनी राय छोड़िये । आप तो बस एक बार अपने पति से पूछीये मजाक में सही "" मुझे gov जॉब/ आगनबॉडी में जॉब मिल रही है। फिर उनकी राय सुनना। एक पति नौकरी को अहमियत देता है या पत्नी को.....!
Madam Gov. जॉब एक परमानेंट फ्यूचर है।
इस update में कुसुम के आखिर के शब्दों पर आपने ध्यान नही दिया शायद..... उसने सरकारी नौकरी के फायदे बताये। ऑफिस के लोगो के दुर्व्यवहार का तोड़ बताया।
उसने खुले शब्दों में हर बार अपने पति को बोला है मै बेहयाई नही करूँगी। जबकि अरुण हर प्रयास कर चुका है कुसुम के चरित्र में दाग ढूढने का।
((me uski halat aisi hoti dikh rahi hai jaise dhobi ka kuta ghar ka na ghat ka, Hath arun ke kuchh aana nahi aur jo hai pass me wo bhi koi aur le udega))
सजा तो सबकी निश्चित है, चाहे वो गुनाह जानबूजकर किया गया हो, या अंजाने में। मानसिक हो या शरीरिक सजा तो सजा ही है।
शब्दों शब्दों में कुछ गलत शब्द लिख दिये गये हो जो आपको गलत लगे हो तो उसके लिए माफी मांगता हूँ।
इसी तरह अपने प्यार भरे शब्दों से कहानी को प्यार देते रहिये.....