Incest कर्ज और फर्ज - एक कश्मकश - Page 18 - SexBaba
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Incest कर्ज और फर्ज - एक कश्मकश

अध्याय - 20 --- " बेवफ़ाई या बेहयाई ""

भले अरुण उसका सौतेला बाप है पर आखिर है तो एक मर्द.... और इस तरह अब इतनी बाप बेटी को ज्यादा छूट देना ठीक नहीं है। अब कुसुम को अपनी बेटी का अपने पति के साथ ज्यादा खुलापन खटक रहा था।

कुसुम से फटाफट सेनेटरी पेड लेकर रिंकी अपने कमरे में दौड़ी चली आई। और बाथरूम मे जाकर सेनेटरी पेड use करने के बाद सोचते सोचते मोबाइल उठाती है और मुझ को व्हाट्सप् मेसेज कर देती है थैंक यू सो मच बट "मेरे प्यारे पापा पैड़ का साइज बड़ा है और मेरी पैंटी की जी- स्ट्रिंग बहुत छोटी है जिस की बजह से पैड़ पेंटी से बाहर आ रहा है। रिंकी समझ नहीं पाती वो सोचती कुछ और है कर कुछ और देति है ।

मै भी उसको reply कर देता हूँ।

" मेंशन नॉट एंड sorry. कभी भी किसी भी चीज़ की ज़रूरत हो कॉल मि"।

बाहर घर के सदस्य सब तैयार हो चुके थे और रिंकी है कि अभी तक तैयार ही नहीं हुई। जानती थी कि अगर दस मिनट के अंदर तैयार नहीं हुई तो मम्मी अच्छा खासा हंगामा कर देगी। क्योंकि पहली बात तो यह कि जब मम्मी तैयार हो जाती तो उनसे सब्र नहीं होता और दूसरी और जरूरी बात कि आज दोपहर में जो माँ बेटी के बीच तानो भरा संवाद हुआ था उससे मम्मी भड़की हुई थी।

यह तो शुक्र मनाओ कि रिंकी ने बाथरूम में जाने से पहले खुद के कपड़े तो निकाल कर रख दिए थे। अब फटाफट हाथ मुंह धोकर कपड़े चेंज कर लिए। हल्का फुल्का मेकअप किया ही था कि इतने में बाहर से पापा की आवाज आने लगी,

" अरे रिंकी बेटी कितनी देर लगेगी तुम्हें जल्दी आओ। देर हो रही है"

इससे पहले कि रिंकी कुछ कहती उसकी मम्मी कुसुम ने चिल्लाना शुरू कर दिया,

" जब कह दिया था कि जल्दी तैयार हो जाना तो तैयार नहीं हो सकती थी। बस धीरे-धीरे समय बर्बाद करने में लगी हुई है"

पूरा प्रोग्राम बस लेट करने में लगी हुई है।

रिंकी को अब पता था कि मम्मी ने चिल्लाना शुरू कर दिया है। अब सब का मूड खराब होना लाजमी है। अब जब तक मम्मी उसे दो चार बातें ना सुना लेगी तब तक उन को चैन नहीं मिलेगा। खैर रिंकी फटाफट अपने सैंडल पहने लगी तो ये क्या सैंडल ही टूट गए। अब उसके पास तो पहनने के लिए कुछ भी नहीं। आखिर में मै कुसुम के कुछ कहने से पहले मै रिंकी का स्टेट्स देखने के लिए उसके कमरे में आया,

" क्या है रिंकी तुम अभी तक तैयार नहीं हुई हो। मम्मी तुम्हारा इंतजार कर रही हैं। तुम्हारी मौसिया भी वहां हम लोगों का इंतजार कर रही होगी"

मुझे देखकर रिंकी ने अपने टूटे हुए सैंडल दिखाते हुए कहा,

" मैं क्या करूं पापा ? मेरे सैंडल ही टूट गए हैं और मेरे पास दूसरी भी नहीं है"

मै बनावटी गुस्सा करते हुए " हे भगवान! तुम इतनी लापरवाह कैसे हो सकती हो? एक और जोड़ी एक्स्ट्रा में नहीं रख सकती हो। जाकर देखो मम्मी की कोई सैंडल रखी हो तो वो पहन लो"

" पर मम्मी के सेंडल मुझे कैसे आएंगे? मम्मी के पैर मुझसे बड़े हैं" रिंकी ने धीरे से कहा। इतने में कुसुम भी दन-दनाती हुई कमरे में आ गई और चिल्लाते हुए बोली,

"अरे चलना नहीं है क्या तुम दोनों को? देर हो रही है" फिर रिंकी के हाथ में टूटे हुए सैंडल देखकर चिल्लाते हुए बोली, " बस शुरू हो गया इसका तमाशा। कभी एक दिन भी ऐसा गया है कि जब कहीं जाना हो और इसने तमाशा शुरू ना किया हो। अब शुभ काम में जा रहे हैं तो ये महारानी सामने ये टूटी हुई चप्पल लेकर आ गई"

रिंकी ने अपने आप को संभालते हुए कहा,

" पर मम्मी मैंने जानबूझकर तो नहीं तोड़ा ना। ये काफी पुराने हो गए थे। उस दिन मैंने आपसे कहा भी था कि मम्मी मुझे सैंडल लानी है पर आपने मुझे पैसे देने से मना कर दिए थे"

" हां तो पैसे का पेड़ पर उगते हैं क्या? और मैं तो तुझे लेकर जा ही रही थी ना बाजार लेकिन अब तेरे काम ही पूरे नहीं हो तो मैं क्या कर सकती हूं ?जिसको नाटक करना है वो तो कहीं से भी कुछ भी नाटक कर लेता है"

मैने बात संभालते हुए कहा," एक काम करते हैं रास्ते में से नए सैंडल दिला देंगे"

मेरी बात सुनकर कुसुम जोर से चिल्लाई,

" हां, हम तो फालतू बैठे हैं। अब समय बर्बाद नहीं होगा। रहने दो इसे यहीं पर जब घर में अकेली रहेगी तो अकल ठिकाने आ जाएगी"

" पर मम्मी.."

मै इससे पहले कुछ कहता मेरी मम्मी (दादी) ने कहा कुसुम मात्र टूटी सैंडल के पीछे इतना बखेड़ा क्यो खड़ा कर रही हो। तुम, अरुण के साथ जाओ, मै अपनी प्यारी बिटिया रिंकी को नयी सैंडल खरीदवा कर फंक्शन में उसके साथ ही आती हू।

मै भी ज्यादा कुछ कह ना पाया और रिंकी को घर पर ही छोड़कर मै और कुसुम रवाना हो गए। रिंकी की आंखों में आंसू आ गए। सोचते सोचते ही रिंकी की आंखों में से आंसू बहे जा रहे थे। क्या..??? आज सिर्फ एक सैंडल के कारण उसे मम्मी पापा छोड़ कर चले गए।

खैर शाम के चार साढ़े चार बजे मै और कुसुम पहुँच गए. ससुर जी ने अच्छा इंतज़ाम कर रखा था. शहर के बाहरी इलाके में एक मैरिज हाल में सब घर वालों के रुकने का था और वहीं शादी के सभी रस्मो रिवाज़ होने थे. बारातियों के रुकने के लिए नज़दीक के ही एक होटल में किया गया था.मैरिज हाल एक काफी बड़े लॉन में था. उसमें दो बैंक्वेट हाल थे: एक छोटा, एक बड़ा और 16 कमरे थे. शादी के लिए बड़ा वाला बैंक्वेट तय किया गया था और भोजन बाहर लॉन में. कमरे तो परिवार वाले मेहमानों को दे दिए गए. मेरे साढू प्रीति के पति हमसे पहले आ चुके थे. वो अपने दोनों बच्चे अपनी सास के पास छोड़ के दोनों मियां बीवी ही आए थे. तो हमको एक कमरा दे दिया गया, जो साढू वाले कमरे के बगल वाला था. जब मैंने कमरे से बाहर निकलती हुयी अपनी साली प्रीति को भली भांति देखा. कम्बख्त क्या गज़ब की क़ातिल जवानी दिख रही थी.

उसने एक नील रंग की साड़ी पहनी थी, उसकी जवानी उसके ब्लाउज से बाहर आने को बेकरार लग रही थी और नीला रंग उसके गोरी त्वचा पर बेहद फब रहा था,माथे में लगा गहरा सिंदूर उसके सुहाग की निशानी थी और हाथो की घनी चूड़ियां उसे और भी प्यारा बना रहे थे,,उसने अपने घने वालो को खुला ही रखा और जो उसके कमर को छू रहे थे,कमर में उसने पतला चांदी का करधन पहना, जो की उसके पतले और साड़ी से झांकते पेट को और भी मादक बना रहा था,.. कुल मिलाकर वो किसी भी मर्द को आकर्षित कर देने को तैयार थी, हल्की गंध वाली परफ्यूम से महकती हुई वो मुस्कुराते हुए मेरे पास आयी

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… मैने जीजा साली के मजाकिया लहजे में पूछा....!

“किस पर जादू चलाने वाली हो “

उसकी आंखे चंचलता में मचली ..

“सभी पर “वो खिलखिलाई और कुसुम को जोरो से बाहों में जकड़ लिया। मैने शरारती अंदाज में कहा अपने जीजा से गले नही मिलोगी....??? उसने मुझे झूठे गुस्से से देखा..... और बोली “सबसे मुश्किल काम यही है “

इस तरह तो तुम्हारा हाथ पकड़ में आयेगा नही, लगता है चूड़ियों की दुकान खोलनी पड़ेगी मुझे...... मैने फिर से मजाकिया लहजे में कहा।

तो खोल लो.... ह्म्म्म ह्म्म्म

तभी कमरे से मेरे साढू भी बाहर आ गये उसका डॉक्टर पति मेरा साढू. मेरे सामने कहीं से ठहरता ही नहीं था. पांच फुट पांच इंच का मरियल सा बुजुर्ग की तरह दिखने वाला आदमी. औरतों जैसी पतली आवाज़. हाथ मिलाया तो पिलपिला सा हाथ. पिछली बार जब मुलाकात हुयी थी उसके मुकाबले अब कुछ ज्यादा ही बुड्ढा सा लग रहा था. उधर मैं चमड़ी चोर, ठरकी साला घाट घाट का पानी पिया हुआ पांच फुट ग्यारह इंच का हट्टा कट्टा, हैंडसम आदमी जिसके बदन से ताकत फूट पड़ती थी. कोई तुलना थी ही नहीं. यह तो पक्का था कि मेरी बड़ी साली प्रीति जैसी कामुक पटाखे को झेलना मेरे बूढ़े साढू के बस का रोग तो था नहीं. इसका अर्थ यह हुआ कि मेरी साली प्रीति एक ज़ोरदार मर्दानी चुदाई के लिए तरसती रहती होगी.

फिर हम चारों ऊपर से उतर कर नीचे आ गये ज़्यादातर मेहमान छोटे वाले बैंक्वेट में जमा हो गए. चाय पकोड़ों के दौर चलने लगे, जैसा शादियों में हुआ करता है. कुसुम देवी और प्रीति अपने रिश्तेदारों से गप्पे मरने में व्यस्त हो गई. बीच में बीच में मेरे आस पास मंडराती भी रही. दो तीन बार चाय लाकर भी दी. साढू महाशय भी साथ बैठा था और कुछ कुछ बोले जा रहा था. मैं भी उस को झेलता हुआ हूँ हाँ हूँ हाँ किये जा रहा था जबकि आज मेरा पूरा ध्यान अपनी बड़ी साली प्रीति पर केंद्रित था. उसके एक एक हाव भाव को, उसकी चाल को, उसके बदन के हर एक अंग को बड़े गौर से देख रहा था और अपने बेसाख्ता अकड़े हुए लौड़े को गहरी गहरी साँसें लेकर बिठाने की चेष्टा कर रहा था.

बार बार मैं उसे अपनी तरफ देखता हुआ पाता. जब भी आँखें मिलतीं तो वह निगाह पलट लेती. कभी माथे पर आयी हुई अपने बालों की लट को वापिस सिर तक ले जाती, नाज़ुक से सुन्दर से हाथों से. कभी अपने कानों के बुंदों को कुछ करती, तो कभी बैठ के अपने पैरों के बिछुओं के साथ कुछ घसर पसर करती. मैं उसकी नज़रों में भयंकर काम वासना बिजली की तरह कौंधती हुई देख रहा था.

कई बार मैंने जानबूजकर उसको अपने लौड़े वाली जगह पर सेहलाते (खुजाते) हुए दिखलाया। मै ठरकी जीजा बार बार अपना लौड़ा खुजाते हुए अपनी बड़ी साली प्रीति को अंदाज़ा और भरोसा दिलाने की कोशिश कर रहा था कि मेरी पैंट के नीचे जो औज़ार छुपा है वो कैसा है, कितना लम्बा है, कितना मोटा है. इसमें तो कोई संदेह था ही नहीं कि मै उसे चोदने को बेक़रार था. सवाल ये था कि कहाँ और कैसे. और दूसरा महत्वपूर्ण सवाल ये था कि पहल कैसे की जाए. मैने तो सब संकेत दे दिए थे तो अब यह जिम्मेदारी उसकी भी थी कि वो भी अपना पहला क़दम उठाये और जिससे मै चुदाई के लिए कोई जगह का इंतज़ाम करूं.

संयोग देखिए उसी वक्त फंक्शन में कुसुम का वही पुराना प्रेमी, "एक कमसिन बेवा (विधवा) की तन्हाई का साथी" दिनेश (उसका रिश्ते का कजिन मामा जिसने कुसुम जैसी जवान विधवा लड़की की तन्हाई से भरी जिंदगी में प्यार के दो पल दिये और आगनबॉडी में नौकरी लगवाने में मदद की थी) उसकी बीवी और उसका छोटा बच्चा आया हुआ था. मैंने दिनेश को जैसे ही देखा, तुरंत मैंने कुसुम के चेहरे को देखा. उसने नजरें झुका लीं.।

ये एक ऐसा संयोग था और ये तभी होता है जब किस्मत के सितारे किसी बहुत खास मौके पर किसी खास दिशा में आपकी गांड फाड़ने के लिए एक साथ तैयार हों. मेरे ख़याल से इसे और किसी तरीके से बतलाया नहीं जा सकता. ये वास्तव में एक अदुभूत संयोग था.

ऐसे तो कई मर्द थे जो कुसुम के दीवाने थे लेकिन ये पहला था जिसकी कुसुम दीवानी थी ,मैं आज उससे पहली बार मिलने वाला था,पता नही क्यो लेकिन मुझे थोड़ा नर्वस फील हो रहा था ...अब कुसुम का चहरा बिल्कुल ही खिला खिला लग रहा था ,लेकिन फिर भी वो थोड़ी डर जाती शायद उसे इस बात का डर था की उसकी इतनी खुशी मुझे तकलीफ ना दे लेकिन मैंने फिर से उसे थोड़ा समझाया और वो अब खुल कर अपनी खुशी दिखा रही थी ..

मैंने कुसुम से मजाक में कहा- तुम्हारा पहला आशिक इधर ही आ रहा है, थोड़ा संभल कर के रहना.

वो झूठा गुस्सा दिखाती हुई बोली- धत् आप भी ना… ऐसा कुछ नहीं है.

मैंने कहा- दिनेश की तो लार टपक रही होगी तुम्हें सजा-धजा देख कर, उसने न जाने कैसे छोड़ दिया शादी से पहले तुमको. मैं तुम्हारा प्रेमी रहता तो तुम्हें पेले बिना किसी और का नही होने देता.

वो इस बात से झूठा गुस्सा होकर मुझे मुक्का मारने लगी और बोली- छीः कैसा बोलते हैं आप?

दिनेश वाकयी में गोरा चिट्टा और स्मार्ट था. परंतु भाग्य देखिए कि उसकी बीवी उसके बिल्कुल विपरीत थी. दिनेश की बीवी का नाम नीतू था. वो 5 फीट 3 इंच की नाटी और सांवली थी. उसकी उम्र लगभग 40 वर्ष रही होगी अर्थात मेरी बीवी से 05 वर्ष बड़ी.

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उसकी बॉडी का साईज 36-34-36 का रहा होगा मतलब वो मोटी भी थी. मेरी कुसुम के सामने वो कुछ भी नहीं थी. कहां मेरी बीवी हूर की परी और कहां वो नाटी और मोटी और सांवली....

कुछ पल बाद ही वो वक्त आ गया जब दिनेश अपनी बीवी बच्चो के साथ हमारे .. सामने आन खड़ा हुआ। लेकिन जैसा मैंने सोचा था उसका उल्टा हुआ ,वो कुसुम की ओर लपकने के बदले बेहद ही सादगी से पेश आया,शायद उसे इस बात का इल्म था की कुसुम अब शादी शुदा है और उसका पति भी साथ में मौजूद है ..वो बेहद ही सभयता से व्यवहार कर रहा था उल्टे कुसुम बेहद खुस थी और उसके पास खड़ी हुई बिल्कुल किसी बिन ब्याही कुवारी लड़की जैसे व्यव्हार कर रही थी ,जैसे मैं हु ही नही ,

लेकिन दिनेश को मेरे होने का आभास था, जब कभी कुसुम बातों बातों में अपना हाथ उसके हाथ और पीठ पर मार देती वो मुझे देखता लेकिन मेरे तरफ से कोई खास रियेक्सन ना पाकर रिलेक्स हो जाता ,मैं भी उसकी बातो का मजा ले रहा था,वो किसी बिछड़े दोस्तो (प्रेमियों) की तरह एक दूजे के बातो और किस्सों में ही गुम हो गए थे, दिनेश जरूर झेंप रहा था लेकिन धीरे धीरे उसकी वो झेंप गायब होने लगी लेकिन अब भी वो अपनी मर्यादा में ही था,वो सच में एक अच्छा लड़का था जिसे अपनी मेहबूबा की शादी शुदा जीवन के खराब होने का भी डर रहता है ..

“ओहो सच में कितना बात कर रही हु,आप लोगो को तो बात करने का मौका ही नही मिला ..”

“तुम ऐसे भी किसी को कहा बोलने देती हु

“ दिनेश की बात से कुसुम बस मुस्कुरा कर रह गई ।

मैंने दिनेश से हाथ मिलाया और “अरे अब मैं क्या बात करू ,तुम दोनो सालो बाद मिले हो तो बाते करो “

“हमारी बाते तो कभी खत्म नही होंगी ,

और तू भी कम नहीं है कमीने..”

कुसुम उसे बड़े प्यार से कमीना कह रही थी , कुसुम की ये हँसी ठिठोली देखकर मुझे सच में दिनेश से जलन होने लगी क्योकि मेरी उसके (कुसुम) जैसी कोई (मेहबूबा) कभी नही रही थी ,उन दोनों की पुरानी यादे और बाते तो मेरे दिमाग की समझदानी के परे थी।

खैर … हम सब एक साथ कुर्सियों पर आ बैठे. मेरे बगल में मेरी बीवी और दूसरी तरफ दिनेश और उसकी मोटी बीवी. मेरे साढू प्रीति के साथ किसी और रिश्तेदार से मिलने चले गए थे,

मेरी कुसुम ने उस वक्त साड़ी पहनी थी और वो साड़ी में सबसे अच्छी लगती है. उस समय भी वो लाल गुलाबी रंग की साड़ी, सेक्सी ब्लाउज पहने हुई थी और उसने बहुत अच्छा मेकअप किया हुआ था. उसने गहरे रंग का चेरी रेड लिपस्टिक लगाई हुई थी. वो किसी अप्सरा से कम नहीं दिख रही थी. वो बला की खूबसूरत लग रही थी.

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दिनेश बार बार मेरी बीवी को बहुत हसरत भरी निगाहों से देख रहा था और मायूस भी था. आखिर हो भी क्यों ना, जिसे वो जान से ज्यादा चाहता था और इतनी खूबसूरत और सेक्सी लड़की को कौन नहीं पाना चाहेगा.वो कभी कभी कुसुम के हंसते हुए चहरे को बड़े प्यार से देखता और थोड़ी देर के लिए खो जाता,फिर झेंप कर चहरा दूसरी ओर कर लेता, मैंने कुसुम को घूरते हुए बहुत से लड़को को देखा था लेकिन किसी की आंखों में कुसुम के लिए ऐसा प्यार कभी नही देखा था,उसकी आंखों में प्यार भी था तो कही कही कोई दुख कोई टीस सी भी थी ,जैसे जैसे वक्त की घडिया गुजरती जा रही थी माहौल में कुछ अजीब सी उदासी छा रही थी ,ऐसा लग रहा था जैसे कोई आशिक अपना टूटा हुआ दिल ले के बैठा है,लेकिन कुछ कह नही पा रहा कुछ जता नही पा रहा है।

एकाएक एक बार दिनेश और मेरी बीवी कुसुम की नजरें मिलीं, तो दिनेश की आंखें डबडबा गईं और कुसुम ने भी अपनी नजरों को नीचे कर लिया.

बातों को बीच में ही छोड़कर दिनेश उठ गया और कुछ जरूरी कॉल के बहाने वहां से चला गया. मैं और कुसुम इस बात को समझ गए थे और एक दूसरे को देखने भी लगे, पर कुछ बोले नहीं.. ..

मैंने कुसुम से कान में कहा- यार, दिनेश अब भी तुमसे बहुत प्यार करता है.

वो मायूस होकर बोली- लेकिन मैं अब सिर्फ आपसे प्यार करती हूँ.

मैंने कहा- यार, कितना हैंडसम है और कैसी बीवी मिल गई, तुम्हारे सामने तो वो कुछ भी नहीं है. कैसे वो जिंदगी काट रहा होगा.

कुसुम बोली- हां, बहुत बुरा हुआ उसके साथ!

अब मैंने नोटिस किया कि कुसुम को भी कहीं ना कहीं दिनेश से हमदर्दी थी और उसके मन में अभी भी उसके लिए कुछ तो था.........शायद प्यार........????

थोड़ी देर बाद दिनेश घूम फिर कर वापस आ गया..... और हम बातचीत करने लगे

दिनेश से बातचीत के क्रम में पता चला कि मै जिस कॉलोनी में रहता हूँ, वहां भी दिनेश बिजनेस के सिलसिले में जाता है.

मैंने उससे वादा लिया कि अगली बार जब भी आए, मेरे यहां जरूर पधारे. वो कुसुम को देखकर मेरी बात से खुश हो गया और उसने आने का वादा कर दिया.

कुसुम ये सब सुनकर चुप थी.

तभी दिनेश का बच्चा सामने लगे आइस क्रीम काउंटर पर बच्चो को आइस क्रीम खाते देख आइस क्रीम की जिद करने लगा तो दिनेश की बीवी उसको लेकर जाने लगी, मेने दिनेश की बीबी को टोकते हुए कहा नीतू भाभी चलिए मै भी साथ चलता हूँ.... और सभी के लिए आइस क्रीम लेकर आता हू।

दिनेश मुझसे बोला आप बैठो मैं लेकर आता हू.... दिनेश को देखने से ऐसा नहीं लग रहा था. मैं समझ गया कि वो बहाना बना रहा है. खैर … यही तो मैं चाहता था।

तो मैंने झट से कहा कि आप यहां ही ठहरेंगे...... थोड़ा नानुकुर के बाद वो मान गया.

मैं कोई जानबूझकर या ककोल्ड और जलन की भावना से ऐसा नहीं कर रहा था मैं तो बस अपनी बीवी के दिल में छिपे राज और उसके प्यार को जानने के लिए प्रयास कर रहा था, कि मेरी बीवी कुसुम को उसके दिल में दबी यादें और बातें करने का कीड़ा पूर्ण रूप से मरना ही चाहिए.

फिर मै और दिनेश की बीवी नीतू भाभी आइस क्रीम कांउटर पर चले गए. दिनेश की नजर कुसुम से हट ही नहीं रही थी.

कुसुम शो ऑफ करते हुए अपना मोबाईल चला रहा थी. तभी दिनेश उठा और कुसुम के पास रखी हुयी मेरी रिक्त की गयी कुर्सी पर कुसुम के बगल में बैठ गया.

उसने कुसुम से पूछा- खुश तो हो कुसुम?

कुसुम बोली- पता नही और तुम ?

वो बोला- जिंदगी कट रही है! मेरे मां बाप ने बिना मेरी पसंद की लड़की से शादी कर दी, जो मुझे पसंद नहीं है. खैर तुमको तो काफी अच्छा लड़का मिला है, जैसा तुम चाहती थी. लंबा चौड़ा, सुंदर, नौकरी वाला सब है.

कुसुम बोली- हां वो तो है, अरुण बहुत अच्छे हैं. मेरा बहुत ख्याल रखते हैं.

इधर उधर की बात करते करते दिनेश ने अपने प्यार के दिनों की बात छेड़ दी और कुसुम भी उन्हीं यादों में खो गई.

मगर कुछ अल्फ़ाज़ ऐसे होते हैं कि आदमी चाह कर भी उन्हे नज़रअंदाज़ नही कर सकता, खास कर अगर वो अल्फ़ाज़ अपनी शादी शुदा आर्धगिनी के मुँह से सुन रहा हो तो. जब मैने कुसुम को वो बात कहते सुना तो मेरे कान खड़े हो गये....

एकाएक दिनेश बोला- याद है वो हमारा पहला किस?

कुसुम बोली- हां, उसे मैं कैसे भूल सकती हूं. दोनो ही खिलखिला कर हँस पड़े और देखते ही देखते दोनो की आंखों में आंसू आ गया,दोनो ने ही खुद को सम्हाला ।

लेकिन फिर भी मैं कुसुम के चहरे में आये हुए दुख के भाव को पहचान सकता था।

अब कुसुम काफ़ी समय तक चुप रही बस सुन रही थी और बीच बीच 'हाँ', 'हुंग', 'मैं जानती हूँ' कर रही थी. आख़िरकार अंत में वो बोली "मैं वो सब करके देख चुकी हूँ मगर कोई फ़ायदा नही. अब हमारी ज़िंदगी उस पड़ाव पर पहुँच गयी है।

ये सब बात करते करते दिनेश कुसुम के करीब आ गया था और कुसुम की आंखों में देखने लगा. कुसुम भी उसकी आंखों में खो गई.

तभी एकाएक कुसुम ने अपनी उंगलियों से अपने बालों को सहलाया और चेहरे पर गिरी हुयी जुल्फो, लटो को कान के पीछे की तरफ कर ठीक किया.

कुसुम के गालों को प्यार से चूमती हुयी जुल्फो की लटो को देखते हुए दिनेश बोला- तुम पहले से भी ज्यादा सुंदर हो गई हो और तुम्हारी जवानी तो कयामत ढा रही है.

ये सुन कर कुसुम शर्मा गई. कुसुम भी उस समय अलग ही दुनिया में थी.

उफफफ्फ़ मैं अब जाकर समझा था. मेरी बीवी मुझसे शादी करने के बाद भी खुश नही थी और दिनेश से शिकायत कर रही थी या अपना दुखड़ा रो रही थी. जाहिर था दिनेश अब भी कुसुम के दिल के बहुत नज़दीक था. इसीलिए वो उस शख्स से इतने खुलेपन और भरोसे से बात कर रही थी.

फिर से एक लंबी चुप्पी छा जाती है और वो सिर्फ़ सुनती रहती है. तब वो बोलती है "मुझे नही मालूम मैं क्या करूँ, मेरी समझ में कुछ नही आता. कभी कभी मैं रात भर चैन से सो भी नही पाती ।

मैने कभी भी अपनी बीवी कुसुम को बेवफ़ाई और बेहहयाई शब्द के साथ जोड़ कर नही देखा था. वो मेरे लिए इतनी पूर्ण, इतनी निष्कलंक थी कि मैं जानता भी नही था कि उसकी भी एक अधूरी मोहब्बत थीं हर औरत...की ही तरह. वो मेरे लिए सिर्फ़ पत्नी थी सिर्फ़ पत्नी, एक औरत कभी नही.

पूरी शुद्ध और पवित्र. जब उसकी बातचीत ने इस ओर इशारा किया कि उसके पास भी एक दिल है जो तड़प रहा है, धड़क रह है सिर्फ उसके यार के लिए. बस, मैं और कुछ नही देखना चाहता था. मैं यह भी भूल गया कि मैं यहाँ क्या कर रहा था और क्या करने गया था. मैं वहाँ से दूर हट जाना चाहता था इतना दूर की कुसुम को ना देख सकूँ।

बेवफ़ाई का दर्द क्या होता है ये मुझ जैसे ठरकी आदमी को अब समझ आ रहा था।

जिसे पहले कक्कोल्ड और वाइफ स्वैप खेलने का कीड़ा लगा बैठा था । और अब इस वक्त अपनी ही बीवी के अतीत के राज जानकर करके अपनी ही गांड जला रहा था, लेकिन मेरा दिमाग काम कर रहा था, कुसुम का मोबाइल अभी उसके हाथों में था जिस पर अभी अभी कोई मेसेज आया था,अब वो नंबर सेव हो चुका था, दिनेश के नाम से ,उत्सुकता तो बहुत हुई की उसका मेसेज जो मेरे फोन पर भी दिखा पढू लेकिन फिर दिमाग ने कहा की कोई नही अभी रहन दो एक बार जब कुसुम पढ़ ले उसके बाद पढ़ूँगा।

“एक्सक्यूज़ मि भाई साहब .. चलिए बच्चे ने आइस क्रीम ले ली अब चलते हैं, नीतू भाभी मुझसे बोली और हम वापस अपने अपने पति - पत्नी के पास जा पहुँचे ..”

हमें वापस उनकी ओर आता देख कुसुम और दिनेश दोनो ही खामोश हो गये थे ,एक अजीब सी खामोशी फैल रही थी , मैने दिनेश को आइस क्रीम देनी चाही... दिनेश बड़ी मुश्किल से अपने होठो पर झूठी हँसी ला पाया, लेकिन मैं उसके चहरे में आये हुए दुख के भाव को पहचान सकता था,

“माफ करो यार अरुण लेकिन मुझे भूख लगी है , और अब खाना खाता हूँ, आप भी ना चलो तुम लोग भी खाना खा लो “

इतना केहकर दिनेश ने हमसे इजाजत मांगी, कुसुम और दिनेश दोनो बिदा होते समय भी चुप ही थे,

“अच्छा लड़का है “

उसके जाने के बाद मैंने कुसुम से कहा

“हा बहुत ही अच्छा लड़का है ..”

बस इतना बोलकर कुसुम वँहा से सीधे ही सामने से सोलह श्रृंगार किये हुए आती हुयी मेरी छोटी साली जूली के पास में चली गई।

जारी है.....!
 
बस इतना बोलकर कुसुम वँहा से सीधे ही सामने से सोलह श्रृंगार किये हुए आती हुयी मेरी छोटी साली जूली के पास में चली गई।

दो तीन लड़कियो के साथ साथ धीरे धीरे से किसी नागिन की तरह कमर मटकाती हुयी हाल में एंट्री लेती हुयी अपनी छोटी साली जूली से मेरी नजर मिली तो बेचारी खुद शरमा गई... .. क्या कामुक् पटाखा दिख रही थी।

बालो के बीच सितारो से जड़ा माँग टीका, गालो को छेड़ती सहलाती लटे, खूब घनी कतर सी तिरछी भौहे, सपनिलि बड़ी आँखो मे हल्की सी काजल की रेखा, पलको पे हल्का सा मास्कारा, प्यारी सी आइ लॅशस, हल्के गुलाबी रूज से हाइ चीक बोन्स, उसकी लंबी सुतवा नाक मे एक छोटी सी नथ, जिसमे एक मोटी और दो छोटे छोटे घुंघरू,, उसके नैचरल गुलाबी होंठो पे हल्की सी वेट लुक वाली गुलाबी लिपस्टिक जो उसके पंखुड़ी जैसे होंठो को और रसीला बना रही थी. गहरी चिबुक के ठीक बीच मे जो ब्यूटी स्पॉट, तिल था उसने उसे और गाढ़ा कर दिया था. और जब मेरी निगाह और नीचे गयी तो उसकी स्लेंडरर लंबी गर्दन के नीचे, उसकी चोली, वो तो कुछ ज़्यादा ही लो कट, और सिर्फ़ एक स्ट्रिंग से पीठ पे बँधी. लेकिन थी बड़ी सुंदर, हल्की, गुलाबी प्याजी, और उस पर खूब खूबसूरत चाँदी का भारी काम, एक दम उभारो से चिपकी, और उनको और उभारती, और उन्ही के शेप के साथ बीच मे सन्करि. बस लग रहा था, दो अध खिले, कमल के फूल हो और उसमे उसके उरोज. मेकप वालीयो ने जूली के क्लीवेज पे भी पूरा मेकप किया था जिससे उसका रंग उसके बाकी मेकप की तरह ही हो जाय और उसे थोड़ा सा और डार्क कर के जिससे क्लीवेज की गहराई और खुल के और उसके कारण उरोजो के उभार भी. उसके अंदर हल्की सी बहुत पतली लेसी पुश अप पिंक ब्रा थी जो उभारो को और उभार रही थी..........हाथो मे पूरी कुहनी तक भर भर के गुलाबी, लाल चूड़िया, हाथी दाँत का चूड़ा और जडाउ कंगन, बाहों मे बाजू बंद और हाथ मे हथ फूल, और हाथो मे लगी मेहंदी को उन्हे फ्रेश मेहंदी लगा के रेफ्रेश कर दिया था जिससे मेहदी की हल्की सी महक भी आ रही थी. लहंगा भी 24 कली का गुलाबी, चाँदी का भारी काम किया हुआ, और इतने नीचा कि बस किसी तरह उसके कुल्हो के सहारे टिका था. और पतली कमर मे सोने के घुंघरू जड़े पतली सी रूपहली करधन.

पालर वालियों ने उसकी गहरी नाभि पे ना सिर्फ़ उन्होने हल्का सा मेकप किया था बल्कि मेहदी से वहाँ भी डिज़ाइन बना दी थी. पैरो मे खूब घुंघरू लगी चाँदी की चौड़ी सी पायल और बिछुए. ब्यूटी पारलर वालीयो ने गुलाबी बड़ी सी चुनर इस तरह ऊढा दिया कि ना सिर्फ़ देह अच्छी तरह से ढँक गयी बल्कि घूँघट भी थोड़ा सा क्लीवेज और चोली का उभार अभी भी दिख रहा था. उन्होने चुनरी को लहँगे और चोली मे ठीक से सेट भी कर दिया था.. .. ..

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हुआ यह कि खाना से पहले सबने कहा कि एक ग्रुप फोटो हो जाए. सब लोग ग्रुप फोटो के लिए फोटोग्राफर की सुझाई हुई जगह पर इकट्ठे होने लगे. बच्चे लोग बैठ गए. उनके पीछे बुज़ुर्ग लोग कुर्सियों पर बिठा दिए गए. उनके पीछे बचे हुए लोग खड़े हो गए. तीनों बहने (कुसुम, जूली,प्रीति) साथ साथ खड़ी थीं लेकिन मैं अपनी सालियों जूली और प्रीति दोनों के बीच घुस गया. मेरा साढू भी मेरी देखा देखी कुसुम की दूसरी तरफ खड़ा हो गया. फोटोग्राफर ने सबको दाएं बाएं सरका कर एडजस्ट किया ताकि सबकी फोटो आ जाए.

जब तक वो यह सेटिंग जमा रहा था, मैंने एक हाथ प्रीति के नितम्बों पर फेरना शुरू किया और दूसरे हाथ से जूली के नितम्ब सहलाने लगा. प्रीति ने ज़ोर से मेरी बांह पर नोचा. मैंने और ज़ोर से उसके चूतड़ दबाये. प्रीति ने दो तीन बार नोच कर हथियार डाल दिए. वह जानती थी कि मैं रुकने वाला नहीं तो मज़े से चूतड़ दबवाने का मज़ा क्यों न लिया जाए. वैसे भी उसको मेरी छेड़ छाड़ में, चूतड़ या चुची या जांघें सहलवाने में बड़ा आनन्द आ रहा था, जबकि सब लड़कियों की तरह ऊपर से नक़ली गुस्सा दिखा रही थी.

जूली ने कुछ नहीं कहा, न ही मेरा हाथ हटाने की कोशिश की, वो चुपचाप नितम्ब पर हाथ फिरवाती रही. ह्म्म ह्म्म..... मैं उसके मुलायम नितम्ब सहला रहा था और उसके शरीर में बार बार एक तेज़ झुरझुरी आ रही थी. मैं समझ गया था कि शायद उसकी चूत बुरी तरह से सुलगने लगी है. परन्तु चुदाई के लिए तो अभी प्रबंध करना बाकी था. मैं दिमाग दौड़ा रहा था कि क्या किया जाए.

खैर फोटो सेशन पूरा हुआ और सब लोग डिनर के लिए चल दिए. डिनर बाहर लॉन में लगाया गया था. वहां जाते हुए प्रीति ने फिर से मेरी बांह पर चुटकी काट कर फुसफुसाते हुए कहा- ये क्या बदमाशी कर रहे थे तुम जीजू … हैं? आराम से फोटो नहीं खिंचवा सकते थे......?

मैंने कहा- साली साहिबा, तेरे साथ तो हर वक़्त ऐसी बदमाशी करने का मन करता रहता है, तो बोल क्या करूँ?

“चुप रह कमीने जीजू… लोग देख लेते तो क्या सोचते… कुछ तो ध्यान रखा कर कि कहाँ है, किसके सामने है!”

साली के मुह से प्यार से कमीना सुन

मैंने कहा- हाय मेरी …. प्रीति जिंटा… कौन देखता… या तो शादीशुदा मर्द देखते तो उनको भी अकल आ जाती कि अपनी सालियों को कैसे प्यार करना चाहिए…???अगर शादीशुदा लड़कियां देखती तो वो अपने पतियों को डांटती कि कमीने ऐसे अपनी सालियों को प्यार किया जाता है…??? और अगर कुंवारे लड़के या लड़कियां देख लेती तो उनको पता चल जाता कि कैसे इश्क़ लड़ाना चाहिए… इसमें प्रॉब्लम क्या है सबके फायदे का दृश्य होता न......... ह्म्म ह्म्म.......!!!

प्रीति ने नक़ली गुस्से से कहा- और बुड्ढे लोग देखते तो.....????

मैंने हँसते हुए कहा- बहनचोद अगर बुड्ढे लोग देखते तो साले अफ़सोस करते कि क्यों ज़िन्दगी में अच्छे से सालियों से प्यार नहीं किया… कसमें खाते कि अगले जनम में सालियों तो छोड़ो सालों से भी बेहिसाब प्यार करेंगे. ससुराल में किसी की भी जवानी बर्बाद नहीं होने देंगे...... ह्म्म ह्म्म

प्रीति ने आँखें तरेर के कहा- हरामी ठरकी जीजा, तुझ से बातों में आज तक कोई जीता है जो मैं अपना दिमाग ख़राब करूँ… मैं जा रही हूँ कुसुम दीदी से बातें करने… तू चुपचाप अच्छा बच्चे की तरह यहाँ बैठ… मैं थोड़ी देर में आती हूँ फिर खाना साथ खाएंगे… और हाँ फिर कोई बदमाशी नहीं करियो…समझ गया न?

मैंने हस्ते हुए कहा- जी हाँ मेरी साली साहिबा, अच्छा बच्चा बन के बैठा रहूंगा आपके आने तक. और कोई हुकुम डॉक्टरनी जी का?

लॉन में पहुँच कर प्रीति अपनी कुसुम दीदी से बातचीत में लग गयी. इधर जूली मेरे पास आयी और बोली- वहां क्या गड़बड़ कर रहे थे आप… कितने सारे लोग थे… देख लेते तो कितनी बदनामी होती न!

मैं बोला- मैंने कुछ नहीं किया… आपके दूसरे डॉक्टर जीजा ने किया होगा.....??

जूली की हंसी छूट गई, बोली- वो तो अकेले में भी ऐसा नहीं करते तो सबके सामने क्या करेंगे… दूसरे आप यह बताइये कि अगर अपने कुछ नहीं किया तो आपको क्या पता कि मैं किस गड़बड़ की बात कर रही हूँ....??

मैंने कहा- जूली जी, कान पकड़ता हूँ कि आगे से ऐसी गड़बड़ किसी के सामने नहीं करूँगा.

जूली - अच्छा जी… मतलब यह कि गड़बड़ करनी ज़रूर है… यही हुआ न आपकी बात का मतलब?

मैं- अच्छा अब खाना खा लें या गड़बड़ पुराण ही चलता रहेगा… जूली जी आपसे बहुत सी बातें करनी हैं… यहाँ इतनी भीड़ भाड़ में तो हो नहीं पायँगी… कल दिन में तो कुछ काम है नहीं… क्यों न किसी होटल में मिल लें और तसल्ली से बातें करें.

जूली ने इठलाते हुए कहा- जीजा जी, कल की कल देखी जायगी.

इतना बोल के वह भी प्रीति की तरह इधर उधर सरक ली किसी से गप्पें चोदने.... बहनचोद इन लड़कियों को गपास्टिक चोदने में कितना आनन्द आता है. घंटों बिना थके गप्पें लगा सकती हैं. सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि उसने यह नहीं कहा कि होटल में क्यों जाना है… यहीं बात क्यों नहीं हो सकती… ऐसी क्या बातें हैं जिसके लिए होटल में जाना ज़रूरी है… वग़ैरा, वग़ैरा.

मेरा पहला क़दम बिल्कुल सही था, तीर निशाने पर लगा था. वो तैयार थी होटल में चलने के लिए. तैयार न होती तो यह न कहती कि कल की कल देखेंगे बल्कि साफ़ साफ़ मना कर देती.... .. अब मुझे होटल का इंतज़ाम करना था. सुबह सबसे पहले यही करने का फैसला कर लिया. मैंने तीन चार घंटों से अकड़े लौड़े की वजह से टट्टों में होते हुए दर्द से विचलित होकर अभी शादी ब्याह में संस्कारी औरतों का मुजरा (लेडी डांस) का कार्यक्रम में मजे लेकर काम चलाने का फैसला किया..... ।

खैर … दस पंद्रह मिनिट बाद रिंकी भी दादी के साथ आ जाती है। मेरी सास उनका वेलकम करती है । सब बात करते है। हालचाल पूछते है । डिटेल्स काफी है पर अभी हम सिर्फ अपने ठरकी जीजा और सालियों पर ही फोकस करेंगे की इतने लोगो के बीच उनकी लव स्टोरी कैसे आगे बढ़ती है शादी वाले माहौल में।

किस्मत से यह मौका जल्दी ही मिल गया. हुआ यह कि नाचने गाने का हॉल मे इन्तेजाम था, म्यूज़िक सिस्टम, गाने के कॅसेट सब कुछ. थीम थी 70-80 के दशक का बॉलीवुड, मेरी तैया सास, जानी मेरा नाम की हेमा की तरह, आई थी, और थी भी वो खूब गोरी, मस्त बड़े बड़े चूचे, भारी भारी नितंब और मेरी बुआ सास मुमताज बन के, रेशमी सलवार जालीदार कुर्ता, जिससे उनकी ब्लैक व्हाइट जवानी रंगीन होकर छितकी पड़ रही थी. और तो और मेरी सगी सास ख़ास तौर से, एक खूब टाइट टॉप और हिप हगिंग जिस मे ज़ीनत अमान की तरह दम मारो दम गर्ल बन के.....

सबसे पहले मेरी तैया सास ने शुरू किया "ओ बाबुल प्यारे", और " मेरी सास ने सावन भादों का 'कान मे झुमका, चाल मे ठुमका, बदन मे चोटी लटके वाले गाने पे खूब चूतरो को हिलाया। सब लोग खूब झूम के नाचे लेकिन सालियाँ बोली अब पुराने गाने नही होंगे सिर्फ़ नये और रिमिक्स ..और उस के बाद तो एक से एक, कुसुम ने तो मेरी बेरी के बेर मत तोडो, काँटा लगा ऐसे अपने उभारो को उभार कर डांस किया कि आज की रीमिक्स गर्ल्स भी मात हो जाए.

और फिर मेरी प्यारी बेटी रिंकी कैसे बचती, उसे भी सभी ने मिल के खींच लिया और फिर रिंकी ने भी, मेरे हाथों मे नई नई चूड़िया है गाने पे नाचना शुरू कर दिया, और जब उसने " मेरे दर्जी से आज मेरी जंग हो गयी, मेने चोली सिलवाई थी, तंग हो गई पे "" अपने चोली मे कसे उभारो को अपनी मम्मी कुसुम की तरह मस्ती से उभारा तो चारों ओर मस्ती छा गई. उसकी जूली मौसी की एक सहेली बोली, उसे पकड़ के, "उसके उभारो को दबा के कहा, "अर्रे बहुत उभर रहे है , लगता है तूने दब्वाना शुरू कर दिया है, इसीलिए इन जोबनों पे इतने कस के उभर आ रहे है." एकदम खुल के मौज मस्ती छाइ थी, क्योंकि सिर्फ़ ज्यादतर औरते और लड़किया ही नाच रही थी.

तभी प्रीति और जूली ने कान मे कुछ कहा, और वो दोनो मुस्कराते हुए दबे पाँव बढ़ गई. नाचते हुए मुझ को चॅलेंज किया, थोड़ी देर तक तो मैं शरमाता रहा पर सालियों के उकसाने पे मै भी मैदान मे आ गया. फिर तो सालियों को पकड़ के जो नाचा. उसके बाद तो मुझ ठरकी जीजा की चाँदी हो गयी. मैने तो जोड़े बना के खूब खुल के जूली के साथ " तेरी पतली कमरिया, जीजा की तिरछी नजरिया.... बलम करे नोकरिया... जीजा पकड़े कमरिया " फिर प्रीति भी अपने शबाब पर आ गयी "" आलम बलाम साजना, मै कुछ भी कर जाऊंगी... बाजरे के खेत में तुझको ले जाऊंगी "" गाने पे सालियों को खूब नचाया

और साथ साथ कुसुम को भी "रफ़्ता रफ़्ता आँख मेरी लड़ी है" साथ मे रिंकी ने भी मुझ को " मार गयी मुझे तेरी जुदाई, डस गयी ये तन्हाई. .. रात जो तेरी याद आई तो नींद नही आई " के साथ और सिर्फ़ इतना ही नही, थोड़ी ही देर मे शादी के गाने, सीधे गालियो पे पहुँच गये और वो भी पूरी तरह नोन-वेज और सिर्फ़ गालियाँ ही नही नाच भी....... मेरी सास की नन्द मेरी बुआ सास ने साड़ी उठा उठा कर नाच गाना शुरू किया।

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" भौजी पे पीपल वालों भूत... भौजी पे पीपल वालों भूत... दिन में मांगे सेव, संतरा रात में मांगे चूत...... "" और जो संगीत समारोह शाम को 8-9 बजे तक ख़तम होने वाली थी वो 10 बजे के बाद ख़तम हुई........

मेरी सास ने मेरी मम्मी से कहा आप लोग रात मे होटल में रुक जाओ. मम्मी बोली, अरुण के पापा घर पे परेशान होंगे सास ने

मेरे साले रिंकू को मेरी मम्मी को घर छोड़ने साथ भेज दिया...... और हमें होटल के कमरो में आराम करने, सोने के लिए कहने लगी....!

मै अपनी बीवी और बेटी के साथ अपने कमरे की तरफ चल दिया मेरे दिमाग में अपनी सालियों के साथ अगले दिन क्या और कैसे करना प्लानिग के घोड़े दौड़ रहे थे.......!

जारी.......!
 
मै अपनी बीवी और बेटी के साथ अपने कमरे की तरफ चल दिया मेरे दिमाग में अपनी सालियों के साथ अगले दिन क्या और कैसे करना प्लानिग के घोड़े दौड़ रहे थे.......तभी मेरी सास ने रिंकी को आवाज देकर रोक लिया और उससे बोली रिंकी तुझे जूली मौसी ने अपने कमरे में बुलाया है, चल मेरे साथ अपने पापा मम्मी को आराम से सोने दे...... ये सुनते ही कुसुम ने भी हाँ में हाँ मिलाते हुए रिंकी को सास के साथ भेज दिया।

जैसे ही हम कमरे में गए तो मैंने तीन चार घंटों से अकड़े लौड़े की वजह से टट्टों में होते हुए दर्द से विचलित होकर अपनी लाइसेंसी बीवी कुसुम देवी की जम के चुदाई की. बेचारी को तीन बार चोदा. उसकी चूत से हमेशा की भांति जूस की ज़बरदस्त बरसात हुई. मैने हमेशा की तरह खूब दिल खोल के पिया वह अलौकिक रस. मैने तभी तो उसका नाम "रस मलाई" रखा है. मैने मन ही मन सोचा कि अगर कुसुम की बहने जूली और प्रीति भी रस निकालने की ऐसी ही चैंपियन हुई तो "सालीचोदन" करने में मज़ा आ जायगा. लंड ने भी फ़ौरन फुदक के अपनी सहमति जताई.

वैसे तो कुसुम चुदाई के बाद सोना चाहती थी लेकिन सालियों को चोदने, भोगने, चूसने के ख्यालों के कारण मैं बहुत अधिक भड़का हुआ था, तो मैंने उसको सोने नहीं दिया. पहली चुदाई के बाद जैसे ही उसको आंख लगी तो मैंने उसके घुटनों के पीछे जीभ फिराई. वो कूँ कूँ कूँ करके जग गई और झट से चुदाई को तैयार.......!

दूसरी चुदाई के बाद उसकी नींद लगते ही मैंने उसकी नाभि में जीभ फिराई तो उसका भी वही नतीजा निकला जो पहले निकला था. ऊँऊँऊँऊँऊँ… कुसुम देवी फिर से मचल गई चुदने के लिए. ह्म्म ह्म्म......

चुदाई में वह शोर भी बहुत मचाती है. ज़ोर ज़ोर से किलकारियां मारना, चोदन सुख में मदमस्त होकर आहें भरना और चीखें निकालना, बार बार मेरा नाम लेकर चिल्लाना, ज़ोर ज़ोर से धक्के ठोकने की गुहार लगाना उसकी आदत है. जब वह इतनी आवाज़ करती है तो मैं भी उत्तेजना से भर के मेरी "रस मलाई"… "रस मलाई" चिल्लाता हूँ, खासकर झड़ते समय तो और भी ज़्यादा......

अगली सुबह नोवेम्बर की मीठी मीठी गुलाबी सर्दी में, मैं तो 7 बजे ही कुसुम को सोता छोड़कर होटल की तलाश में ये सोच कर चल दिया कि कल शाम को जब मैंने अपनी साली जूली को किसी होटल में जाकर बात करने के लिए बोला तो उसने कोई जवाब नहीं दिया था, मतलब वो चुदने के लिए तैयार थी, और मेरे पास बस आज दिन का ही समय अपनी सालियों की चूत पर अपने लंड का ठप्पा लगाकर एक जिम्मेदार जीजा होने का फर्ज निभाने का..........

नोवेम्बर की गुलाबी सर्दी में रात को शादी के माहौल में सब लोग देर से ही सोये थे, इसलिए कोई भी जगा हुआ नहीं मिला. लॉन में जाकर पहले तो दो कप चाय पी और फिर बाहर निकल के एक रिक्शा पकड़ा. रिक्शा वाले से पूछा कि यहाँ नज़दीक कोई सस्ता से सस्ता और अच्छा सा होटल है क्या. वो बोला कि हाँ साहिब पास में ही राज टाकीज के पास होटल पुष्पांजलि है वहां ले चलूँ?

मैंने कहा कि चल देखूं कैसा होटल है. . ??

गिर्राज बार एंड होटल उसका नाम था. जहाँ हम ठहरे हुए थे, वहां से रिक्शा से दस मिनट से भी कम के फासले पर एक बहुमंज़िला इमारत थी. रिसेप्शन पर जाकर पता किया तो रूम मिल सकते थे. किराया भी कोई ज़्यादा महंगा नहीं था, मात्र 300 रुपए.... मैंने रूम देखने को कहा तो उन्होंने एक रूम खोल कर दिखा दिया. रूम काफी अच्छा था. साफ सुथरा, अच्छा साफ़ बाथरूम और अच्छे साफ़ सफ़ेद तौलिये. मैंने रूम बुक करवा दिया, मिस्टर एंड मिसेज़ राजकुमार जैन के नाम से, और बोला कि ग्यारह बजे के करीब चेक-इन करेंगे. छोटे छोटे शहरों में कायदा अच्छा होता है, बड़े बड़े शहरों की तरह होटल में कमरा बुक करने के लिए कोई आइडेंटिटी प्रूफ, कोई एड्रेस प्रूफ नहीं देना पड़ता। बस नाम लिखो, कुछ एडवांस पेमेंट करो और रूम आपका.

वापिस आया तो साढ़े आठ बजे थे. कमरे में आया तो कुसुम महारानी गहरी नींद में थी. यह बहुत महत्वपूर्ण था. अगर जगी हुई होती तो वह ज़रूर पूछती कि इतनी सुबह सर्दी में कहाँ और क्यों जा रहे हो.

10 बजे तक लोग तैयार होकर नाश्ते के लिए जाने लगे थे. " प्रोफेसर जी आप तैयार नहीं हुए" प्रीति के पति मेरे साढू साहब तो नए सूट बूट में ये कह कर मेरे कमरे में आकर शीशे में अपने बाल सवारने लगे........ अपने तरीके से तो मैं तैयार हो ही चुका हूँ। अब इससे ज्यादा मैं कैसे तैयार हो पाऊं। गलती उनकी भी नहीं। ये मेरे ससुराल में मेरी शादी के बाद पहली शादी है। और ले देकर मैं यही अपनी शादी में पहना हुआ पुराना कोट पैंट आज दूसरी दफा पहन रहा हूँ। साढू साहब तो नए सूट बूट में ये कह कर चल भी दिये । पर मैं थोड़ा सोच में पड़ गया।

मेरे ससुर के मुझसे बड़े वाले दामाद बहुत पैसे वाले हैं। उनके पहनावें की तो बात ही कुछ और है। एक झलक देखा उनको अभी। किसी राजकुमार की तरह लग रहे थे। मैं आईने के पास खड़ा खुद को देख रहा था। इससे अच्छा मुझे आना ही नहीं चाहिए था। कुसुम और रिंकी को ही भेज देता सिर्फ। आखिर आज कल मेहगाई इतनी बढ़ गयी कि रिंकी के कपड़े और कुसुम की साड़ियां ही इतनी महँगी हो गई कि खुद के लिए बजट ही नहीं जम पाता।

तभी फिर से साढू साहब आ गए " अरुण जी! मैं निकलता हूँ, आप भी जल्दी कीजिये, बाकी लोग भी रेड्डी हैं, आप सबको लेकर नीचे हॉल में पहुंचिए। वैसे आपकी अर्धागिनी कुसुम देवी जी नज़र नहीं आ रही?"

"हाँ मैं देखता हूँ" मैने उन्हे जबाब दिया।

ये बीवीया भी ना! मायके की शादी में आ जाने के बाद खुद में ही बिजी रहती है। खुद तो एक घंटे पहले ही तैयार हो गई थी। फिर से लगी होगी अपनी बहनों के साथ मेकअप में। झुंझलाहट में, मै कुसुम को ढूंढने नीचे उतर ही रहा था कि दरवाजे के किसी कोने से लग मेरे कोट का बाजू थोड़ा फट गया। अब क्या करूँ मैं?रही सही कसर भी..! मैं वहीं पड़े कुर्सी पर बैठ कुछ सोच ही रहा था कि तेज कदमों से मेरी तरफ ही कुसुम को आते देखा. . . .. !

"कहाँ चली गई थी तुम! कबसे ढूंढ रहा हूँ! यहाँ आते ही तुम्हारे तो तेवर ही बदल जाते हैं! सिर्फ अपना ध्यान है तुम्हें! सारी तैयारियां कर के दे दी तुम्हें फिर भी पता नहीं क्या..?" मैंने अपनी पूरी झुंझलाहट निकाल दी। पर मन हल्का नहीं हुआ। कुसुम को देख दिल भर आया। उसकी आँखों में आँसू जो उतर आए थें।

"माफ कर दो कुसुम! दरअसल ये पुराना कोट भी आज फट गया, झुंझलाहट में समझ नहीं आया.." मैंने अपनी सफाई देनी चाही पर जुबान साथ नहीं दे रही थी। मैं गर्दन झुकाए खड़ा था।

"ये पहन लो तुम! और जल्दी चलो सब इंतज़ार कर रहे होंगे" कुसुम के हाथों में मेरे लिए नया कोट पैंट था।

"ये कहाँ से?"

"फिर वही बात पति की कमाई पर जितना हक पत्नी का होता है, उतना ही पत्नी की कमाई पर पति का होता.... वो अपनी मैचिंग और शृंगार के लिए जब मार्केट गयी थी तो मुझे ये कोट सूट पसंद आ गया था और मैने खरीद लिया था। "

"तो तुम्हारी मैचिंग, और शृंगार ..?"

"तुम इसे पहन लो तो..मेरी मैचिंग! और थोड़ा हँस दो तो..मेरा शृंगार..!'

उसने इतनी मासूमियत से कहा कि.. मेरी हँसी रुक नही रही थी....! मैं तो तैयार पहले ही हो गया था बस ये कुसुम ने जो अभी कोट दिया है उसे बदन पर डालना था. कुसुम भी तकरीबन तैयार हो ही चुकी थी. फिर हम रूम लॉक कर नीचे आ गये।

नाश्ता बाहर लॉन में बढ़िया धूप में लगा था. प्रीति और मेरे साढू भी वहां मिल गए. प्रीति बहुत ही कामुक लग रही थी. एकदम सेक्स बम. उसने बड़े भड़कीले मैरून रंग की प्रिंट वाली पटियाला सलवार और हल्की गुलाबी शमीज़ डाल रखी थी. गले में गहरे गुलाबी रंग का दुपट्टा और पैरों में बेल बूटेदार, सुर्ख जयपुरी जूतियां... . ... ।

"" शायद किसी से सही कहा है औरत जिस मर्द को प्रभावित करने के लिए महंगे कपड़े पहनती है असल में वो मर्द उस औरत को बिना कपड़ो के नँगा देखना चाहता है ""

नाश्ते के दौरान जैसे ही उसने मौका देखा तो मेरे पास आयी और बोली- तुम लोग कितना हल्ला गुल्ला करते हो… रात भर सोने नहीं दिया तुम दोनों के शोर ने… सारी दुनिया को पता लग गया होगा कि आप कुसुम को " रस मलाई" कहते हैं.

मैंने हंसकर कहा- साली जी, आप क्यों जाग रही थी उस टाइम… आपको भी शायद साढू जी सोने नहीं दे रहे होंगे. अगर आप सोई होती तो शोर आपको कहाँ सुनाई पड़ता… और पता चल गया कुसुम का नाम तो चलने दो क्या फर्क पड़ता है...

प्रीति के चेहरे पर दुःख की एक गहरी छाया दौड़ गई. शायद मैंने उसकी दुखती रग पर हाथ रख दिया था. मौका देखते ही मैंने उसको बोल दिया कि होटल पुष्पांजलि बिलकुल पास में है वहां ग्यारह बजे मिलेंगे, दिल खोल के बहुत सी बातें करेंगे.......मैंने कहा- बाहर निकल के रिक्शा ले लेना, चार पांच मिनट में होटल आ जायगा. उसने सिर हिला दिया किन्तु बोली कुछ नहीं....और कुसुम के साथ अन्य महिलाओ के साथ गप्पे मारने चली गई।

वही सामने लगे मिठाईयों के काउंटर पर जब मेरी नजर रबड़ी से भरे डोंगे पर गयी तो खुद को रोक नही पाया क्योकि मुझे मीठा कुछ ज्यादा ही पसंद है, और उसी दिशा में चल दिया। इशारे से मैने अपने साढू को साथ चल कर खाने को कहा तो उन्होंने शुगर की बीमारी का केहकर पल्ला झाड़ लिया। और मै अकेले ही एक दोने में रबड़ी लेकर एक कोने में रखी कुर्सी पर बैठ कर बड़े मजे से रबड़ी खाने लगा।

उसी कोने में मेरे ठीक पीछे दो अधेड़ उम्र के सज्जन बैठे थे जो करीब 45 से 50 साल के आसपास के होंगे। "" दिल्ली के दो कमरों के फ्लैट में बूढ़ी मां और दो जवान बच्चों के बीच पति-पत्नी आखिर करे तो क्या करे और कहां करे? क्या उम्रदराज पति-पत्नी को रिश्तों को जीने का हक नहीं है, क्या ये गलत है?""

मैं उन दोनों की बातें सुनकर हाथ में रबड़ी का दोनां पकड़े कुर्सी पर बैठा-बैठा यही सुन रहा था।

पहला सज्जन अपनी व्यथा का बयान कर रहा था - यार, मम्मी बेड पर सो रही थी, हम दोनों पति पत्नी नीचे जमीन पर गद्दा डाले पड़े थे। रात को पत्नी का मन कर गया तो मैंने कहा सो जा, मम्मी क्या सोचेगी। इस उम्र में भी दोनों...दूसरे कमरे में भी हम दोनों नहीं जा सकते थे, वहां हमारे दोनों जवान बच्चे सो रहे थे।

इतना सुनते ही दूसरा सज्जन बोला- अरे भाई, इस उम्र में अच्छा नहीं लगता ये सब। भगवान में मन लगा। बच्चों की शादी की उम्र हो गई है। मेरे बच्चे जब से समझने लगे हैं, मैंने बीवी से कह दिया है कि तू बच्चों के साथ सोया कर। मैं अकेले सोऊंगा। अच्छा नहीं लगता यार, बच्चे क्या सोचेंगे, मम्मी पापा अभी भी साथ साथ....

तो क्या करूं। मेरे पास तो दो ही कमरे हैं। बीवी मेरी मानती नहीं, कहती है कि अकेले नहीं सोऊंगी। पहले सज्जन की बात सुनकर दूसरे सज्जन ने राय दी- तो भाई तू ऐसा कर, अपनी मम्मी को बच्चों के कमरे में शिफ्ट कर दे और तू पति पत्नी एक कमरे में रह।...पहला दोस्त बोला- लेकिन मेरे बच्चे कमरे में दादी के साथ रहना नहीं चाहते। कहते हैं कि दादी सोते सोते बड़बड़ाती रहती है, क्या करूं, बता?...

दूसरा सज्जन कहने लगा- तो भाई अब भगवान का नाम ले बस, इस उमर में यही अच्छा लगता है। मेरा भी मन करता है लेकिन क्या करूं, इस उमर में अच्छा भी नहीं लगता।

अपने हाथ में थामे रबड़ी के दोने में से रबड़ी को तो खतम होना ही था। खाली दोने को डस्टबिन में फेंक कर मै दूसरे कोने में लगे पानी के काउंटर की तरफ चल दिया। मैं आज के उम्रदराज पति पत्नियों की समस्या से पहली बार रूबरू हुआ तो बहुत सोच में पड़ गया कि हमारा समाज उम्र के आधार यह जज करने लगता है कि किस उम्र तक ये सब करना सही है, और किसी उम्र के बाद ये सब करना गलत। लेकिन सही गलत के पैमाने पर जज करने वाला यह समाज यह नहीं समझता कि अंदर ही अंदर कितनी समस्याएं आदमी और औरत दोनों झेलते हैं और किसी से कह भी नहीं पाते हैं। क्या उम्र के आधार पर संभोग या इटीमेसी को हम तय कर सकते हैं, क्या इसे सही या गलत कह सकते हैं? ऐसे लोगों को क्या भगवान के भजन में लग जाना चाहिए या फिर दूसरा रास्ता तलाशना चाहिए?

खैर सामाजिक चिंतन को खतम कर और पानी पीने के बाद मै कुसुम के पास चला गया मैंने इशारे से उसे बुला कर कहा कि यही पास में मेरा एक दोस्त रहता है प्रदीप शर्मा, मैं उससे मिलने जा रहा हूँ. वैसे भी शाम तक तो कुछ काम है नहीं. बारात आएगी 8 बजे, उसके पहले ही आ जाऊंगा. तुम आराम से अपनी चचेरी ममेरी बहनों से गप्पें मारो।

कुसुम ने कहा- ठीक है तुम जाओ अपने दोस्त के पास. मैं तो सोने जा रही हूँ… तुमने बहुत ही ज़्यादा तंग किया था रात भर… सारा बदन दुःख रहा है. दो चार घंटे नींद लूंगी तो ठीक रहेगा.

करीब पौने ग्यारह बजे मैं होटल जा पहुंचा और लॉबी में बैठ कर प्रीति का इंतज़ार करने लगा. पंद्रह बीस मिनट के बाद प्रीति आ गई.

मैं उठकर उसके पास चला गया और उसको रूम में साथ ले चलने लगा. प्रीति ने कहा- अरे आपने तो रूम ले लिया… मैं तो समझी थी हम रेस्टोरेंट में बैठ कर बातचीत करेंगे.’

मैंने कहा- साली साहिबा जी जो बातचीत करनी है वह रेस्टोरेंट में नहीं हो सकती… उसके लिए तो कमरा ही चाहिए… रेस्टोरेंट में करनी होती तो वहीं कर लेते न… यहाँ क्यों आपको आने की तकलीफ देता. आइये रूम में चलिए.’

हम रूम की तरफ चल दिए जो कि फर्स्ट फ्लोर पर था. रास्ते में मैंने प्रीति से पूछा- आप क्या बहाना लगा के आईं होटल में? मैंने तो कुसुम से कहा कि एक दोस्त से मिलने जा रहा हूँ.

प्रीति ने हँसते हुए कहा- मैंने भी इनसे यही कहा कि मेरी स्कूल में साथ पढ़ी एक सहेली है जो पास में रहती है… उसको मिलना चाहती हूँ.

हम दोनों अपनी बहानेबाज़ी पर हँसते हुए रूम तक पहुँच गए. रूम नंबर 102 का लॉक खोल कर मैं अंदर घुसा फिर प्रीति को अंदर आने का इशारा किया.

प्रीति जैसे ही अंदर घुसी मैंने बिजली की तेज़ी से दरवाज़ा बंद करके उसको ज़ोर से आलिंगन में बांध लिया और अपने तपते होंठ उसके होंठों से लगा दिए. मैंने इतना कस के भींचा था और इतने ज़ोर से होंठ से होंठ चिपकाए थे कि प्रीति को शायद साँस घुटती महसूस हुई क्यूंकि थोड़ी देर मचलने के बाद उसको खांसी आ गयी. मैंने थोड़ी पकड़ ढीली की और होंठ हटा लिए.

उसने जल्दी जल्दी गहरी गहरी साँसें लीं और फिर बोली- यहाँ बातचीत करने बुलाया था या मेरा दम घोंटने को… और यह क्या हरकत की? कैसा मजाक है ये? अगर किसी को भनक भी पड़ गई तो क्या हशर होगा कुछ ध्यान भी है आपको… मेरी तो इज़्ज़त का जनाज़ा निकल जायगा… बताइये क्यों बुलाया था… और हाँ ज़रा दूर से...... ?? ?

जारी है ✍️
 
उसने जल्दी जल्दी गहरी गहरी साँसें लीं और फिर बोली- यहाँ बातचीत करने बुलाया था या मेरा दम घोंटने को… और यह क्या हरकत की? कैसा मजाक है ये? अगर किसी को भनक भी पड़ गई तो क्या हशर होगा कुछ ध्यान भी है आपको… मेरी तो इज़्ज़त का जनाज़ा निकल जायगा… बताइये क्यों बुलाया था… और हाँ ज़रा दूर से...... ?? ?

मैंने हँसते हुए कहा- प्रीति तू इतनी भोली तो न बन… तू दूध पीती बच्ची नहीं है… यहाँ होटल में बुलाया था तो इतनी तुझ में भी समझ तो है कि होटल में बराखडी का पाठ तो नहीं करेंगे… पाठ तो होगा ज़रूर लेकिन काम शात्र का...... लेकिन उससे पहले तुम ये बताओ क्या खाओगी.....? कुछ खाने के लिए ऑर्डर कर देते है... ??

और उसने मुस्कुरा कर मेन्चुरियां ग्रेवी और कोल्ड ड्रिंक की फरमाइश कर दी..... मैने जल्दी से रिसेप्शन पर फोन से ऑर्डर लगा कर फिर से उसको दबोच लिया और होंठ चूसने लगा.

उसको बाँहों में बांधे बांधे सरकता हुआ मैं बिस्तर तक जा पहुंचा और उसको लिए लिए बेड पर आ गया. अब तक उसने भी प्रतिरोध करने का नाटक बंद कर दिया था और अपनी सुलगती हुई चूत की बात मान कर मज़े से होंठ चुसवाने लगी. अपनी टांग उसने मेरी टांग के ऊपर लपेट ली और उसके नाख़ून मेरी पीठ में चुभने लगे. अब वो भी मुझे कस के लिपटी हुई थी.

थोड़ी देर चुम्बन के बाद अचानक प्रीति ने अलग किया और खड़ी होकर बोली- रुकिए ज़रा… सारी कुर्ती मुस मुसा जायेगी… थोड़ी सी तो मुस भी गयी.. . .. उसने अपने कपड़ों को हाथ से तह करके ठीक करना शुरू किया. मैंने उसके कन्धों पर हाथ रख कर उसको बिस्तर पर बिठा दिया और नीचे बैठ कर उसकी जयपुरी जूतियां उतार दीं.

जूतियों की गिरफ्त से आज़ाद होते ही उसके खूबसूरत पैरों ने मेरा मन मोह लिया. पहले मैंने जूतियां सूंघी जिनमें उसके पांवों की नशीली महक आ रही थी. आआ आआआह!

प्रीति बोली- यह क्या कर रहे हैं जीजाजी आप… छोड़िये इन जूतियों को.

मैं बोला- आपके इन हद से ज़्यादह सुन्दर पैरों की खुशबू ले रहा हूँ इन जूतियों में… काश मैं ये जूती होता तो आपके इन मादक चरणों से लिपटा तो रहता हर समय!

प्रीति ख़ुशी से झूम उठी और बोली- अच्छा महाराज… डायलॉग बहुत हो गए अब बताइये कौनसा पाठ पढ़वाने को बुलाया था?

उसकी शराबी सी आँखों में हवस के लाल लाल डोरे तैर रहे थे. जो मैंने उसकी जूतियां सूंघ कर उसके पांवों की प्रशंसा की उससे उसकी कामेच्छा और भी अधिक भड़क उठी थी.

लौड़े ने पूरी तरह अकड़ के चार पांच तुनके मार कर सूचना दी कि हाँ उसको भी जूतियों से आयी हुई प्रीति के पैरों की सुगंध से मज़ा आया. लेकिन प्रीति की बात से और उसकी आँखों से यह साफ़ लग रहा था कि वो चुदने के लिए ज़्यादा इंतज़ार नहीं करना चाहती. तभी तो पाठ पढ़ने की बात शुरू की थी कमीनी ने. माँ की लौड़ी को अभी अच्छे से पढ़ाऊंगा कामदेवता का मस्त पाठ. जिससे बाकी के सब पाठ भूल जायगी.

मैंने उठकर रूम की बत्तियां बुझा दीं, केवल बेड की साइड में रखा हुआ टेबल लैंप जलने दिया. टेबल लैंप की रोशनी वासना को बहुत तीव्र करने वाली होती है इसलिए होटलों में बेड की दोनों तरफ टेबल लैंप रखे जाते हैं. यह मद्धम रोशनी वासना तो भड़काती ही है, आँखों को भी सुहाती है.

मैं फिर फर्श पर लगे गलीचे पर बैठ गया और प्रीति की पटियाला सलवार का कमरबंद खोल दिया. प्रीति अपनी कुहनियों के बल अधलेटी सी थी. आराम से उसने सलवार खोल लेने दीं. कुछ देर तक मैं स्तब्ध सा उसकी रेशम जैसी चिकनी मुलायम टांगों की सुंदरता आँखों में बसाता रहा, फिर प्रीति को हौले से उठाकर उसकी शमीज़ भी उतार डाली. प्रीति ने शर्म से आँखें बंद कर रखी थीं परन्तु ज़रा सा भी प्रतिरोध नहीं कर रही थी. उसके बदन में कंपकंपी छूट रही थी. अब वह सिर्फ ब्रा और चड्डी में थी.

वाह! वाह! वाह! माशाअल्लाह… क्या बदन था मेरी साली का. एकदम परफेक्ट! उसकी नाभि अधिकतर नाभियों के भांति भीतर घुसी हुई नहीं थी बल्कि बाहर उभरी हुई थी. ऐसा लगता था किसी नवजात शिशु की नन्ही सी लुल्ली हो.

मेरे मुंह से खुद ब खुद इस गीत की कुछ पंक्तियाँ गुनगुनाते हुए निकल गयीं. यह गाना लड़की की कामुक सौंदर्य का बखान करने के लिए सबसे उत्तम है. पाठकों को सलाह है कि यह पूरा गीत यू ट्यूब पर ज़रूर देखें अपनी पत्नी/ माशूका के साथ नंगे लेट कर और उसे कहें कि यह गाना मैं तेरे लिए गाना चाहता था लेकिन मेरी आवाज़ इतनी अच्छी नहीं है, इसलिए मोहम्मद रफ़ी की मस्त आवाज़ में यह तेरी नज़र करता हूँ. फिर देखिये क्या ज़बरदस्त, भेजा उड़ा देने वाला मज़ा वो आपकी लौंडिया चुदाई में देगी.

चेहरा है जैसे झील में हँसता हुआ कमल.

या ज़िन्दगी के साज़ पे छेड़ी हुई ग़ज़ल.

जान ए बहार तुम किसी शायर का ख्वाब हो

चौदहवीं का चाँद हो, या आफताब हो

जो भी हो तुम खुदा की कसम लाजवाब हो!

प्रीति मुनमुनाई- झूठे कहीं के. शायरी के साथ झूठ बोल रहे हैं.

किन्तु उसके चेहरे की मुस्कान बता रही थी कि वो ख़ुशी से फूली नहीं समां रही थी. ये बात तो वो पहले से ही जानती तो थी ही कि वह एक बहुत सुन्दर हसीना है.

मैं बोला- ना ना प्रीति, झूठ ज़रा भी नहीं. सच तो यह है कि मैंने तेरी पूरी जनम कुंडली जान ली है और इसी लिए वह गाना तेरे लिए एकदम सही बैठता है.

प्रीति ने आँखें खोल लीं, और उचक के बैठ गयी. ‘अच्छा जी… आप क्या ज्योतिषी भी हैं? अभी परखती हूँ आपको… बताइये क्या हैं मेरी जनम कुंडली?

मैंने हँसते हुए कहा- बात यह है प्रीति कि तुझे दूसरों की तरह विधाता ने नहीं गढ़ा… उसने जब तुझे बनाने का टाइम आया तो जनाब ने कामदेव को यह कार्य सौंप दिया… कामदेव ने अपनी पूरी कलाकारी तेरे में भर डाली… हुस्न और सेक्स से भरपूर एक कन्या का निर्माण किया जो बड़ी होकर प्रीति देवी कहलायी… यह है तेरी जनम की दास्तान.’

शर्म से प्रीति का गोरा बदन सुर्ख हो गया, वो भर्रायी सी आवाज़ में बोली- आप बड़े वो हैं… जाइए मैं नहीं आपसे बात करती.

कह के उसने पलटी खायी और दोनों बाँहों के बीच में सिर घुसा कर उलटी होकर लेट गई.

मेरी ऊपर की साँस ऊपर और नीचे की नीचे रह गई. उसकी मलाई जैसी पीठ, मस्त गोल गोल चूतड़ और सांचे में ढली हुई टाँगें. सुन्दर सी एड़ियां और गुलाबी मुलायम तलवे. ऐसा लगा कि दिल की धड़कन रुक गयी हो. लौड़ा उछल उछल के अलग से पागल किये दे रहा था. उसकी चड्डी के पीछे का भाग इकठ्ठा सा होकर दोनों नितम्बों के बीच आ गया था जिसके कारण दोनों चूतड़ पूरे के पूरे अच्छे से दिख रहे थे.

उस मोहक, मादक दृश्य को निहारते हुए मैंने जल्दी जल्दी अपने कपडे उतार दिए. लौड़ा हरामी पूरे ज़ोरों से तन्नाया हुआ था, काफी देर से पैंट की क़ैद में फंसकर अकड़ा हुआ था और काफी परेशान था. बिस्तर पर चढ़ कर मैंने धीमे से अपनी जीभ प्रीति की पीठ पर फिराई, और मेरा एक हाथ उसके चूतड़ों पर जाकर उनको सहलाने लगा. जब पिछली शाम यह चूतड़ फोटो सेशन में सहलाए थे तो यह नहीं मालूम था कि ये इतने नायाब निकलेंगे. सचमुच यह जवानी किसी शायर का ख्वाब का सत्य हो जाने समान थी.

मैं उसकी ब्रा का हुक खोल दिया, कि तभी दरवाजे की डोर बैल बजी.... प्रीति एकदम से उचक कर सीधी बैठ गयी और बोली कौन है दरवाजे पर..... ???? मैने कहा अरे टेंशन मत लो वो डिलीवरी बॉय होगा.... खाने का सामान जो ऑर्डर किया था वो पार्सल लेकर आया होगा.... जाओ दरवाजा खोल कर ले आओ।

धत.... पूरे पागल तो नही हो गये जीजा जी आप, ऐसे सिर्फ चड्डी में नंगी पुंगी दरवाजा खोलू.... ना, मै को शर्म आयेगी....!

मैने उसके चूचे दबाते हुए कहा अरे मेरी जान its जस्ट फन बहुत मजा आयेगा तुम दरवाजा खोलो और मै बाथरूम में से छिप कर मोबाइल से शूट करता हूँ और उस डिलीवरी बॉय की जो हालत होगी जब तुम देखोगी तो मुझे शाबाशी दोगी..... अगर तेरी बहन कुसुम, मेरी बीवी होती तो वो तो नंगी ही चली जाती.... और उसे देख कर सामने वाले का लंड पेंट के अंदर ही पानी छोड़ देता...... ये व्योरिसम् है इसका अलग ही मजा है, और हाँ जितना ज्यादा हो सके उतना ज्यादा वक्त लगाना, इधर उधर की बातें बना कर.... मैने अपनी साली को आँख मारते हुए कहा... प्यारी समझ गयी।

" " जूली, प्रीति और कुसुम तीनों सगी बहन है, प्रीति और कुसुम हम उम्र है और उन का चेहरा, मोहरा, नैन नकश् शारीरिक रंग रूप, बनावट, चाल, ढाल, अदाये लगभग एक दूसरे से हु ब हु मिलता है, जबकि जूली और मेरी बेटी रिंकी इन दोनों के सिर्फ नैन नकश् काफी हद तक समान है, शायद यही वजह थी कि मुझे इस वक्त अपनी शादी शुदा साली प्रीति में अपनी पत्नी कुसुम नजर आ रही थी और मेरे अंदर की ककोल्ड पति वाली फैंटेसी बाहर निकल रही थी ""

मेरी बात सुनकर प्रीति में थोड़ी थोड़ी हिम्मत आने लगी पर संकोच कर रही थी। मैने उसे तोलिया देते हुए कहा एक काम कर ये तोलिया लपेट कर दरवाजा खोल दो और मौका मिलते ही धीरे धीरे खिसका देना..... मेरा ये सुझाव प्रीति को पसंद आया। और फिर तभी दोबारा से डोर बैल बजी।

Coming... Wait ! ".

दरवाजे का बेल बजा तो प्रीति ने तुरंत मुड़कर बाथरूम कि ओर देखा. बाथरूम का दरवाजा थोड़ा सा खुला हुआ था. प्रीति ने जो तौलिया अपने बदन पर लपेट रखा था, उसकी गाँठ उसने अपनी चूचियों पर थोड़ी सी ढीली कर दी, फिर से एक दफा बाथरूम के दरवाजे कि ओर देखा, तौलिये कि गाँठ एक बार और चेक कि, और फिर दरवाजे कि ओर चल पड़ी.

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बेल फिर एक बार बजा ही था कि प्रीति ने दरवाजा खोल दिया.

" मैडम आपका आर्डर... ". दरवाजे के बाहर खड़े डिलीवरी बॉय ने पार्सल आगे बढ़ाते हुये कहा.

" एक्स्ट्रा कैरीबैग नहीं था क्या भैया ??? कैसे पैकिंग करते हो आपलोग... ये देखो, पूरा ग्रेवी गिर गया है ! ". प्रीति ने पार्सल डिलीवरी बॉय के हाथों से लेते हुये कहा.

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" सॉरी मैडम जी... एक साथ कई सारे कस्टमर्स के पैकेट थें ना तो वो नीचे दब कर हो गया होगा ! ". डिलीवरी बॉय किसी भी प्रकार के इमोशन के बगैर रोबोट कि तरह बोला.

" किस कस्टमर का पैकेट था, क्या था, कितना था, उससे मुझे कोई मतलब नहीं ... ". दाएँ तरफ से बाए तरफ अपने बालों को अपने दूसरे हाथ से धीरे धीरे झाड़कर लहराते हुये प्रीति गुस्से से, मगर नम्र होकर बोली. " मुझे सिर्फ अपने पार्सल से मतलब होगा ना भैया ! ऐसे कोई पार्सल डिलीवर करता है क्या ? "

" सॉरी मैडम जी... ". डिलीवरी बॉय ने टालने कि खातिर बेमन से कहा.

" ऐसे कैसे चलेगा भैया... आप अभी सॉरी बोल रहे हो ! आपके रेस्टोरेंट से ही ऐसा हर बार होता है... ".

ये तो प्राय: हर ग्राहक का रोज़ का खिचखिच था उस डिलीवरी बॉय के लिए. किसी तरह फिलहाल अभी यहाँ से अपना पीछा छुड़ाने के लिए वो ज़रूर फिर से अपने बने बनाये वाक्यों में से कुछ बोलता, उसने अपना मुँह खोला भी, लेकिन अचानक से रुक गया.

ढीले गाँठ कि वजह से प्रीति के शरीर से बंधा तौलिया उसके सीने के उभारों से अपने आप खुल गया, और सरसराकर सीधे नीचे ज़मीन पर उसके पैरों पर आ गिरा. प्रीति दरवाजे पर अब नंगी खड़ी थी !!!

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लगभग नंगी - पैंटी तो उसने पहन रखी थी, लेकिन ब्रा नदारद थी !

" छोड़ो भैया... आपलोग का तो हर बार का यही है ! ". प्रीति ने अपने बालों कि लट को अपने कान के पीछे खोसते हुये ऐसे कहा जैसे कि कुछ हुआ ही ना हो. " मैं पैसे लेकर आती हूँ... ".

उसने एक बार डिलीवरी बॉय को चोर नज़रों से देखा, और फिर अपना गिरा हुआ तौलिया बिना उठाये या फिर खुद का नंगा बदन ढंकने कि कोई कोशिश तक किये बिना ही कैरीबैग हाथ में झुलाते हुये वापस कमरे में आ गई. उसने पार्सल टेबल पर रखा, बाथरूम कि ओर फिर से देखा, कुछ सोचा, और फिर से दरवाजे पर जाकर डिलीवरी बॉय से पूछा.

" अच्छा आप कार्ड पर पेमेंट लेते हो क्या ? ".

" अभी कैसे मैडम जी... मशीन लेकर हम लोग तो नहीं आते ना... कैश... ". डिलीवरी बॉय बोला.

" अरे हाँ भैया... True ! कितना हुआ है ? ". प्रीति ने उसे बीच में ही टोका.

" कैरीबैग में बिल है मैडम जी... ".

" ओह अच्छा... ".

ओह अच्छा... ".

डिलीवरी बॉय को बेवकूफ़ कि तरह वहीँ दरवाजे पर खड़ा छोड़ प्रीति फिर से कमरे में आई, कैरीबैग से बिल कि पर्ची निकाल कर चेक किया, बिस्तर पर पड़े तकिये के नीचे से मेरे पर्स में से कुछ नोट निकालें, बाथरूम कि ओर देखा, हल्की सी मुस्कुराई, और वापस से दरवाजे पर जाकर डिलीवरी बॉय को पैसे दे दियें.

" थैंक यू मैडम जी... ". कहते हुये डिलीवरी बॉय चलता बना.

प्रीति ने दरवाज़ा बंद कर दिया, अपना तौलिया उठाया, कमरे में वापस आई, एक लंबी गहरी साँस ली, बेड पर धम्म से बैठते हुये तौलिया वहीँ पर फेंक दिया, और खिलखिलाकर हँस पड़ी.

बाथरूम का थोड़ा सा खुला हुआ दरवाज़ा अंदर से अब पूरा खुल गया और बाथरूम से मै नंग धन्ग अपने हाथ में मोबाइल लिए हँसते हँसते बाहर निकला.

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" Too good साली साहिबा... ".

मुझ को आते देख प्रीति ने अपना तौलिया उठाकर मेरे ऊपर फेंक मारा. अपने हाथ से तौलिये को वहीँ ज़मीन पर झटक कर गिराते हुये मै बेड तक आया और प्रीति को गले से लगाकर उसे चूमते हुये बोला.

" लव यू यार ! ".

झूठा गुस्से वाला मुँह बनाते हुये प्रीति ने मुझ को धकेल कर खुद से अलग कर दिया और शर्माते हुये मुस्कुराकर बोली.

" धत्त... कितना Embarrassing था !!! ".

मैने जैसे प्रीति कि ये बात सुनी ही नहीं.

मैने वहीँ बिस्तर पर उसके बगल में बैठते हुये उसकी कमर से कसी हुई उसकी पैंटी के इलास्टिक को खींचते हुये पूछा.

" और ये पैंटी क्यूँ नहीं उतारकर गई थी ??? ".

" पैंटी खोलने कि बात नहीं हुई थी जीजू... कुछ भी ना ??? ".

" What do you mean पैंटी खोलने कि बात नहीं हुई थी ??? ". मैने चौंकने वाला मुँह बनाते हुये कहा. " Full naked का क्या मस्त मजा आता ??? ".

" अच्छा जीजू ??? तो किसी एरे गैरे मर्द को अपनी चूत भी दिखा दूँ ??? ". प्रीति ने पहले गुस्से से कहा, फिर अपनी बात पर खुद ही हँस पड़ी, और बोली. " वो भी एक डिलीवरी बॉय को ??? ".

" Come on साली साहिबा ... चूत ही तो... बॉडी का एक पार्ट ! It's not a big deal बेबी ! चूत... Pussy... चूत... Pussy... तुम लड़कियां कुछ ज़्यादा नहीं करती ??? ".

" कहा ना No !!! अपनी फिलोज़फी अपने पास ही रखो... ओके ! मेरी चूत बस मेरा हस्बैंड और आज मेरा प्यारा जीजा देखेगा ! ".

प्रीति कि बात पर मै हँस पड़ा, फिर उसकी बांह चूमते हुये बोला.

" देखो... एक पैंटी कि वजह से पूरी वीडियो ख़राब हो गई !!! ".

वीडियो का नाम सुनते ही प्रीति कि सारी नाराज़गी जाती रही और वो खिसक कर मुझ से सट कर बैठ गई, और चहकते हुये उतावली होकर बोली.

" अरे हाँ... जीजू दिखाओ वीडियो ! कैसा हुआ ? ".

ख़ुशी ख़ुशी मैने अपने मोबइल पर एक वीडियो चला दिया, और बहुत ही उत्साहित होकर प्रीति को दिखाने लगा.

वीडियो भले ही बाथरूम के थोड़े से खुले हुये दरवाजे कि फांक से चोरी छुपे बनाया गया था, पर उसमें अभी अभी कमरे में हुई सारी गतिविधि बिल्कुल साफ साफ कैद हो गई थी, यहाँ तक कि प्रीति और डिलीवरी बॉय के बीच हुई छोटी सी अनबन तक भी.

हम दोनों बड़े ही चाव से पास पास बैठे वो वीडियो देखते देखते उसके बारे में बातें करने लगें.

" मैं मोटी लग रही हूँ ना ??? ".

" नही साली साहिबा... ".

" हाँ... मेरी Thighs देखो ना ! और कमर ??? कैसे बोल रहे हो नही साली साहिबा ? ".

" हॉट लग रही हो साली साहिबा ... मोटी नहीं !... हॉट !! हॉट समझती हो ??? ".

" बेचारे का मुँह तो देखो जब मेरा तौलिया गिरा... ".

" कैसा बेचारा ??? एक चीज़ देखोगी ? ये देखो... पहले जब तुम्हारा टॉवल खुला तो उसने तुम्हें ठीक से नहीं देखा... पर जब तुम वापस रूम में आने के लिए मुड़ रही हो तो वो तुम्हें पीछे से घूर रहा है... See !!! ".

" अरे हाँ... वाकई तो ! ".

Look... देख रही हो इसकी नज़र... लो Pause कर देता हूँ... अब देखो... तुम्हारा ये बेचारा बंदा तुम्हारी गांड़ देख रहा है... देखो देखो !!! ".

" कमीना उतना शरीफ नहीं है ! जब सामने आ रही हूँ तो कैसे आँखें नीचे कर ले रहा है ! God !!! कैसे कैसे ठरकी लोग होते हैं ना ??? ".

" चूतिया है... इतनी सेक्सी औरत को सामने से एक बार भी ठीक से नहीं देखा...लानत है यार ! पीछे से देखकर क्या करेगा इडियट ? ".

" काम चलाने भर का नज़ारा तो देख ही लिया है हरामी ने...समझ नहीं रहे हो ? ये वाला फिर से दिखाना... ".

" अभी रेस्टोरेंट वापस पहुँचते ही बाथरूम में जाकर हिलायेगा... नहीं तो रात को घर में तुम्हारे नाम पर पक्का मूठ मारेगा साला !!! ".

मेरी साली और मै ठहाके मारकर हँसने लगें.........!

जारी है...... ✍️
 
🤣😜😂 आप के होनहार छात्रों में से एक है अरुण, और आप उसकी योग्यता पर संदेह कर रहे है। वो आपका ही चेला है, मछली की आँख में ही निशाना बनाकर बैठा है 😜 वो तो बस अपनी साली प्रीति के साथ खेल रहा है, इतना तो बनता है, इस पल में मजा मस्ती के साथ साथ थोड़ा सी फेंटेसी भी पूर्ण कर रहा है। निहाइति खूबसूरत स्त्रियाँ उसकी जिंदगी में आई है तो उन्हे पर्दे में रख कर, छिपा कर रखना उन स्त्रियों के हुस्न की तौहीन होगी 😂🤣😜

वैसे व्योरिसम् या अंग प्रदर्शन करना कोई गलत नहीं होता है, ये तो बड़ा ही पुण्य का काम है, आज के युग हर स्त्री इसी तरह अंग प्रदर्शन कर सफलता प्राप्त कर रही है, हर फील्ड में आप देखिये जो दिखता है वो ही बिकता है🤣😜 उदाहरण के लिए मेरे पास एक 56 भोग से सजी हुई खाने की थाली है, और कोई गरीब भूखा व्यक्ति दरवाजे पर आता है तो उसे खिला नही सकते तो उसे भोजन दिखा कर उसकी आत्म सुख तो दे ही सकते है...... साई इतना दीजिये जा में कुटुंब सामाये, मै भी भूखा ना रहु, साधु ना भूखा जाये 🤣😜😂
 
" चूतिया है... इतनी सेक्सी औरत को सामने से एक बार भी ठीक से नहीं देखा...लानत है यार ! पीछे से देखकर क्या करेगा इडियट ? ".

" अभी रेस्टोरेंट वापस पहुँचते ही बाथरूम में जाकर हिलायेगा... नहीं तो रात को घर में तुम्हारे नाम पर पक्का मूठ मारेगा साला !!! "......मेरी साली और मै ठहाके मारकर हँसने लगें.........!

नंगे बदन बैठे मेरे जांघिये में पेशाब करने के लिए बनाये गये छेद से लण्ड बाहर निकल आया था, और लण्ड के सुपाड़े से पानी जैसा लसलसा सा कुछ चू रहा था. प्रीति कि नज़र जब उस पर पड़ी तो उसने लण्ड के सुपाड़े को अपनी उंगलियों से ठेल कर वापस से अंडरवीयर के अंदर घुसा दिया, फिर अपना सिर मेरे कंधे पर रखते हुये मेरा चेहरा अपने हाथ से सहलाते हुये धीरे से बोली.

" Excited हो रहे हो जीजू ??? "

जवाब में मैने प्रीति का चेहरा अपने कंधे से उठाकर अपने हाथों में ले लिया, और उसके होंठों से अपने होंठ चिपका दियें. मुँह में मुँह डाले कुछ देर तक स्मूच करने के बाद

" कब चोदोगे ??? ". मेरे होंठों से अपने होंठ अलग करते हुये प्रीति ने धीरे से फुसफुसाते हुये पूछा, फिर मेरे खड़े लण्ड को आशा भरी ललचाई नज़रों से देखते हुये थोड़ी सी ऊँची आवाज़ में बोली. " Fuck me ना प्लीज्... जीजू !!! ".

फौरन मैंने उसके दोनों तरफ घुटनो के बल बैठ कर पीछे से हाथ डाल कर चूचे पकड़ लिए, हौले हौले से उनको सहलाया. बहनचोद काफी बड़े संतरे जैसे चूचे थे वाकई में मेरी साली तो महा मर्दमार आइटम थी....

जैसे ही मेरे हाथ उसके मम्मों पर लगे एक तेज़ कंपकंपी उसके बदन में आयी. उसके मुंह से ऊँऊँऊँऊँऊँ… ऊँऊँऊँऊँ की ध्वनि निकली- ‘’ मैंने झुक कर उसकी रेशमी पीठ पर रीढ़ की हड्डी पर जीभ फिराई. नीचे से ऊपर तक, ऊपर से नीचे तक. मुंह में प्रीति जैसे पके हुए फल का स्वाद लूटने के लिए लार टपके जा रही थी इसलिए जीभ बहुत गीली थी. प्रीति ने सिसकारियाँ लेनी शुरू कर दीं. वह अपना सिर दाएं बाएं हिला रही थी जिससे उसके लम्बे बाल इधर उधर झटक रहे थे. धीरे धीरे पूरी पीठ पर जीभ घुमानी शुरू कर दी. प्रीति तड़प रही थी, आअह आअह आह आह कर रही थी.

मैं सोच रहा था कि जब साली बेहद गर्म हो जायगी तभी चूत में लंड दूंगा. जितनी तड़पेगी उतना ही चुदाई का आनन्द पाएगी.

पीछे से हाथ बढ़ाकर मैंने प्रीति की चूचियां पकड़ के हल्के से दबायीं. प्रीति चिहुंक उठी और आह आह आह करते हुए कांपने लगी. मैंने मम्मों को और ज़ोर से दबाया. प्रीति ने और ज़ोरों से आहें भरीं. मैंने उस को उठाया और पलट कर सीधा कर दिया. फ़ौरन ही प्रीति ने अपनी आँखों को दोनों बाँहों से ढक लिया. नंगी थी तो संभवतः शर्म लग रही होगी उस को. मैंने तसल्ली से उसके चूचुक पर निगाहें जमायीं. काफी बड़े संतरों जैसे गोल गोल गोल गोल चूचे थे. काली बड़ी बड़ी घुंडियां जिनके हल्के काले, काफी बड़े आकार के दायरे. बहनचोद निप्पल अकड़े हुए थे मानों कह रहे हों कि आओ मसल मसल के, कुचल कुचल के हमारी अकड़न दूर कर दो... ..

मैं प्रीति के मुंह के पास लंड ले गया और उसकी बाँहों को आँखों पर से हटा कर बोला- प्रीति, ले इस लौड़े को देख… तेरी शान में मादरचोद तन्नाया हुआ है… जब से तुझे देखा है तब से यह कमीना अकड़ अकड़ के नाक में दम किये हुए है.

मैंने लौड़ा प्रीति की नाक से लगा दिया. प्रीति ने फ़ुनफ़ुनाते हुए लंड को देखा तो देखती रह गई. सुपारा फूल के कुप्पा था. लाल सुर्ख हो रहा था. लंड की नसें अकड़न से उभरी हुई थीं और अंडे सख्त हो रहे थे. लौड़ा बार बार तुनक रहा था.

प्रीति ने लंड को गहरी गहरी साँसें लेते हुए अच्छे से सूंघा, सुपारी की खाल पीछे करके अपने गालों पर फिराया, फिर जीभ निकाल के सुपारी का स्वाद चखा. फिर अचानक से उसने लंड को जड़ से पकड़ लिया और उस पर चुम्मियों की बरसात कर डाली.

मैं बोला- साली साहिबा, आया पसंद तुझे यह लंड?,

प्रीति ने फंसी फंसी आवाज़ में कहा- बहुत सुन्दर है यह नाग… एकदम कोबरा जैसा… मैं तो हो गई इसकी गुलाम… “जब तुम्हारी गुलामी ही कर ली तो जो तुम कहो सब मंज़ूर है… जीजू… अब वो पाठ भी तो पढ़वाओ जिसके लिए यहाँ लेकर आए थे.”

मैं हंसकर बोला- क्यों, बहुत बेसब्री हो रही चुदने की… रुक ज़रा सा पहले तुझे अपनी जीभ का करिश्मा तो दिखा दूँ.

जवाब में प्रीति ने सिर्फ मुंह से आह आह आह की.

मैंने प्रीति के कान के पीछे अपनी जीभ गीली करके फिराई तो प्रीति कसमसाई. मैंने उसके कान की लौ को चूसा और फिर जीभ कान के अंदर घुमाई. प्रीति मस्ती में आकर ऊँ… ऊँ… .ऊँ… करने लगी.

उसका बदन अब बार बार कंपकंपाने लगा था. मैंने उसका मुखड़ा हाथों में लेकर उसके रसीले होंठ चूसे तो उसने भी आनन्दमग्न होकर चुम्‍मे में मेरा पूरा साथ दिया. उसने अपनी जीभ मेरे मुंह में डाल दी और उसके मुखरस का मज़ा लेते हुए मैं उसकी छोटी सी जीभ चूसने लगा।

फिर मैंने उसकी चूचियाँ निचोड़नी शुरू कीं. पहले मैं हौले हौले निचोड़ रहा था. प्रीति ने आहें भरनी शुरू कर दीं. उसने अपनी टांगें मेरी टांगों से कस के लपेट दीं. मैंने चूची अब थोड़ा ज़ोर से दबाईं. प्रीति को और मज़ा आया और वो सिसकारियां भरने लगी. मैंने चूचियाँ निचोड़ते हुए प्रीति के पेट को चाटना आरंभ किया. पेट पर जीभ गीली कर मैं दाएं से बायें चाटता, एक सिरे से दूसरे सिरे तक. उस सिरे पर पहुंच कर फिर चाटता हुआ वापस आता. इस चटाई ने तो प्रीति को बौरा दिया और वो अजीब अजीब सी आवाज़ें ऐसे निकाल रही थी जैसे उसका गला भिंच गया हो. अब वो कामावेश से तीव्र रूप से ग्रस्त थी.

मैं अब चूचियों को पूरी ताक़त से दबा रहा था, साथ साथ प्रीति के पेट को चाटते हुए अब मैं उसकी उभरी हुई नाभि तक जा पहुंचा था. नाभि को मुंह में लेकर मैंने चूसना शुरू कर दिया. फिर क्या था मज़े से पागल होकर प्रीति ने टांगें छटपटानी शुरू कर दीं. मैंने अपने दोनों अंगूठे प्रीति की चूचुक में पूरी ताक़त से गाड़ दिये.

वो मस्ता के बार बार जीजू जीजू जीजू पुकारने लगी, बोली- अब कितनी देर और इंतज़ार करवाओगे तुम? नीचे सारा जूस निकल गया… आहहह… उम्म्ह… अहह… हय… याह… जीजू जीजू… कमीने… हाय हाय हाय… किस ज़ालिम से फंसी मैं… ओ… ओ… ओ… ओ… हो.

आप से तुम और तुम से तू पर आ गयी थी प्रीति और एक गाली भी दी थी, हा हा हा आ गई हरामज़ादी लाइन पर.

मैं बोला- चुप रह कुतिया… अब पड़ी रह और मज़ा भोग… फालतू बक बक की तो तेरी मां चोद दूंगा.

अब उसकी चूत पर ध्यान देने के इरादे से मैंने उसकी पैंटी से नाक लगा कर गहरी सांस लेते हुए सूंघा. चूत की विशेष सुगंध से मेरे नथुने भर गए. आआह आआह आआह… दुनिया की सबसे नशीली सुगंध होती है चूत की सुगंध. मैंने नाक और भीतर घुसाने के कोशिश की तो कुछ सख्त सख्त सा महसूस हुआ. प्रीति ने सैनिटरी पैड लगाया हुआ था. क्या प्रीति माहवारी में थी? लेकिन चूत से माहवारी वाली खास गंध तो नहीं आयी. मैंने फिर से अच्छे से सूंघा. नहीं, माहवारी वाली सुगंध नहीं थी. फिर क्यों लगाया इस ने पैड?

इसका उत्तर तुरंत ही मिल गया. जब मैंने पैंटी उतारी तो पाया कि वो पैड पूरी तरह से सना हुआ था. यहाँ तक की पैंटी का भी कुछ भाग सना हुआ था. समझ में आ गया कि चूत का रस है. लेकिन बहुत गाढ़ा गाढ़ा.

प्रीति का जूस कोई सामान्य जूस नहीं था, यह तो शहद जैसा गाढ़ा था. यह कह लो कि मर्द के लौड़े के लावा जैसा. इसी लिए उस ने सेनेटरी पैड लगाया हुआ था वर्ना साली की पैंटी और सलवार में पिच्च पिच्च हो जाती.

मैंने मस्त होकर उछलते हुए कहा- प्रीति… यार तेरी चूत का जूस नहीं है, मलाई है… क्रीम है… रुक ज़रा चख के देखता हूँ.

मैंने पैड को ही अच्छे से चाटा. मादक स्वाद से भेजा भन्ना गया, शरीर में चुदास की ज़ोरदार तरंगें अपना ज़ोर मारने लगीं. चिकना चिकना, बहुत ही तेज़ नशे में टुन्न कर देने वाली मलाई थी. मैंने पैंटी को भी सूंघ सूंघ के चाट डाला. प्रीति की चूत और गांड की सुगंधों से नाक और मलाई के ज़ायके से मुंह के मज़े लग गए. भयंकर उत्तेजना से अंडे भारीपन से भर गए.

“आह आह आह… प्रीति तू तो सच मच में मर्द मार क़ातिल है. बहनचोद ऐसा जूस, जिसके सेवन से आदमी की रूह फड़क उठे! इसको रस कहना तो सरासर ग़लत होगा… ये तो मधु कहलाना चाहिए.”

इतना बोल कर मैंने प्रीति के झांट प्रदेश को चाटना आरम्भ किया. झांटें पांच छह रोज़ पहले साफ की गई थीं. बाल थोड़े थोड़े उगे हुए थे, किन्तु यह दिख रहा था कि बहुत गहरे काले रंग के झांटों के रोयें हैं. इसके अलावा झांटों का प्रदेश भी काफी बड़ा था. प्रीति के मुंह से बेसाख्ता सिसकारियाँ निकल रही थीं.

प्रीति बार बार मेरा नाम पुकारे जा रही थी. अब मैंने प्रीति की चूत के होंठों पर ध्यान दिया. चूत के होंठ काफी बड़े थे और गुलाबी गुलाबी थे. देखते ही अब मुझ पे पागलपन छा गया. मैंने होंठ चौड़े किये तो पूरी तरह मलाई से भरी गुलाबी चूत के जो दर्शन हुए तो यारों मेरा क्या हाल हुआ मैं बता नहीं सकता.

बुर से रस फफक फफक कर बहे जा रहा था. चूत के होंठों के ऊपर उसके स्वर्ण रस का प्यारा छोटा सा छेद दिखा जो कि ढका हुआ था. स्वर्ण रस के छेद की खाल को ज़रा सा ऊपर खींच कर छेद को नंगा कर दिया और अपनी जीभ अकड़ा के ज़ोर से छेद पर टुकुर करके मारी.

बस क्या था प्रीति तो जैसे बिदक गई. इतनी ज़ोर से सीत्कारें भरीं कि मैं डर गया कि होटल वाले दूसरे यात्री शिकायत ना कर दें कि इस कमरे में बहुत चोदाई का शोर हो रहा है. मैंने जीभ से बार ज़ोर ज़ोर से स्वर्ण रस के छेद पर प्रहार किये तो प्रीति दसियों बार झड़ी. गिड़गड़ाने लगी- जीजू, अब तो बख्श दे अब इतना तो मज़ा भी बर्दाश्त नहीं हो रहा.

मैंने गुर्रा कर कहा- अच्छा… तो बिल्कुल भी सबर नहीं हो रहा चुदक्कड़ पैदाइश… चल तू भी क्या याद करेगी अब ठोक ही देता हूँ तेरी मलाई वाली चूत को… अब हो जा तैयार इस लौड़े को झेलने!

मैंने वही किया जो प्रीति की फरमाईश थी. वो बौरा सी गयी थी. बेतहाशा फुदक फुदक कर चोदन खेल, खेल रही थी. कमरिया उछाल उछाल के अपने जीजा को चोद रही थी. क्या ज़बरदस्त चुदक्कड़ थी मेरी ये साली! क्या धक्के लगाती थी!! क्या सीत्कारें भरती थी!!! सुभानअल्लाह!!!!

हर धक्के पर मेरा टोपा धाड़ से जाकर प्रीति की बच्चेदानी पर धमाका करता जिसकी ठनक मुझे सिर तक महसूस होती. बहुत ही जबरजंग चुदाई हो रही थी. अचानक से प्रीति ने चार पांच धक्के बिजली की तेज़ी से ठोके और एक गहरी सीत्कार भरते हुए जीजू… जीजू… जीजू… मेरे जीजू पुकारते हुए स्खलित हो गई. वो एक बार नहीं कई दफा झड़ी. बुर की रसमलाई की तेज़ फुहारें मेरे लंड पर चारों तरफ से पड़ती हुई महसूस हुईं.

और तभी मुझे यूं लगा कि मेरे भीतर एक पटाखा फूटा. बड़े ज़ोर से मैं भी झड़ा जैसे कोई ज्वालामुखी फटा हो. दनादन मेरे लंड से वीर्य के मोटे मोटे लौंदे एक के पीछे एक बड़ी रफ़्तार से छूटे. प्रीति की सारी चूत भर गई मेरे मर्द मक्खन से. मेरा गर्म गर्म लेस चूत में जाते ही प्रीति फिर से झड़ी और एक दम से मेरे ऊपर गिर पड़ी. क्योंकि उसकी पीठ मेरी तरफ थी, इसलिये उसका मुंह मेरे घुटनों पर आ गया. उसके मुंह से गर्म गर्म साँसें हाँफते हुए मेरे घुटनों को भी गरम कर रही थीं.

मैंने प्रीति के निश्चल से निढाल शरीर को उठाकर अपनी बगल में लिटा दिया और खुद करवट लेकर उसकी तरफ मुंह करके लेट गया. मैंने प्रीति की चूचियों को सहलाता रहा जिससे प्रीति चुदने के बाद चढ़ने वाले नशे में कही सो न् जाए. मेरी बीबी कुसुम का भी यही हाल होता है. उसको भी बार बार चोदने के लिए मुझे जगाये रखना पड़ता है क्यूंकि मेरा लंड इतना हरामी है कि कमबख्त को जब तक तीन बार चूत में घुसकर उसकी खबर अच्छे से न मिले तब तक जान में आफत किये रखता है...... "

"मुझे यह अच्छे से पता है लौड़ाखोर औरतों की खासियत होती है कि चुदाई हुई और इन्हें नींद आयी. हालाँकि इस खासियत का उन मर्दो को बहुत फायदा मिलता है जिनके घरों में चूतो की भरमार होती है. एक को एक बार चोद के सुला दिया और चले गए घर में ठहरी हुई दूसरी स्त्री की आगोश में..... ह्म्म ह्म्म""

प्रीति ने मेरी नाक को उंगली और अंगूठे से बीच कर दो तीन बार हिलाया और मुस्कुराते हुए बोली- कितना दुखी करेगा साले वहशी दरिंदे… अभी तो दूध ऐसे दुःख रहे हैं जैसे इनका कचूमर निकल गया हो.’

मैं- तूने ही तो कहा था कमीनी इनका कीमा बना दो… तो बजा दिया साली साहिबा का हुक्म.

प्रीति- बड़े आए हुक्म बजाने वाले… तुम जैसों से तो मैं दूर से ही भली… पता नहीं तुम्हारी रस मलाई (कुसुम) तुम्हें कैसे झेलती है.

मैं- जैसे तूने झेला, वैसे ही वो भी झेलती है… क्यों आनन्द आया ना?

प्रीति- हाँ आया हरामी… खूब आया. जैसा मैंने तुझे पहली बार देख कर सपना लिया था वैसा ही मज़ा आया बल्कि उससे भी ज़्यादा.

मैंने पूछा- अच्छा? कब सपना देखा तूने इस चुदाई का?

प्रीति बोली- मैं क्यों बताऊँ? मैं न बताती अपने सपने को… यह तो मेरा प्राइवेट मामला है.’

मैंने ज़ोर से प्रीति के उरोजों को भँभोड़ा, तो प्रीति हुमक उठी.

“हरामज़ादी बोलेगी या असल में कीमा बना दूँ तेरा.”

“साले भेड़िये… बोलती हूँ न अब छोड़ भी दे… नहीं तो दर्द की गोली लेनी पड़ेगी… जिस दिन मैंने तुझे पहली बार देखा ना तुम्हारी शादी में उसी वक़्त कुसुम से जल भुन के मैं तो फुंक गई थी. ऐसा सजीला पति उसको मिला तो मेरी क्या गलती थी जो मेरे नसीब में बुढा जैसा निकम्मा आदमी लिखा था… पता नहीं क्यों मुझे लगने लगा था कि तू चुदाई के लिए एक जोरदार मर्द होगा… फिर कल जब तुझे फिर से देखा तो सच कहती हूँ जीजू मेरी चूत ने बगावत कर दी… मुझ से एक एक पल काटना भारी पड़ रहा था… रात को जो तुम दोनों ने शोर मचाया ना उसने तो सच में जलती आग में घी टपका दिया… मुझे बहुत ज़्यादा जलन होती है कुसुम से… मैं तो खुद ही चाह रही थी कि तू कुछ आगे क़दम बढ़ाए तो तेरा लंड का मैं भी स्वाद चखूं, मेरी चूत भी चखे… तू तो निकला एक नंबर का बदमाश… चोद ही डाला न मुझको.”

मैंने हँसते हुए कहा- प्रीति देवी, मेरा भी यही हाल था. कल जब तुझे देखा तो लंड में तेज़ सुगबुगाहट सी हुई. जब तूने गांड पर हाथ फेरने पर कुछ नहीं कहा तो समझ में आ गया कि तू चुद लेगी… कल तेरे हाव भाव भी मुझे लुभाने वाले थे.

प्रीति- ओये… मै लड़की हूँ… तुझे और कैसे संदेशा देती अपनी इच्छा का… मैंने कहा अगर समझदार होगा तो यह इशारे पढ़ लेगा, नहीं तो यह है ही नहीं मेरे लायक… अच्छा एक बात बता तू कुसुम को रस मलाई क्यों कहता है. तुझे उसकी चूत की मलाई बहुत अच्छी लगती है इसीलिए ना?

मैं बोला- दो कारण हैं… चूत की मलाई बहुत पसंद है वह तो बात है ही परन्तु उसकी चूत से मलाई इतना ज़्यादा निकलता है जितनी उसकी सू सू निकलती है… मलाई की डेयरी है… उसकी चूत... . ह्म्म ह्म्म

इन सब बातों से प्रीति उत्तेजित होनी शुरू हो गयी थी. उसके हाथ मेरे लंड को सहलाने लगे थे. लंड को तो अकड़ने में देर ही कितनी लगती है. बहनचोद साली साहिबा के हाथ लगते ही फुंफकारें मारने लगा. प्रीति ने धीरे से अण्डों को सहलाया तो लौड़ा और ज़ोर से उचका.

उस ने कहा- जीजू अब तेरी साली साहिबा तुझे इनाम देगी… तूने बहुत मस्त कर दिया … अब चुप चाप बिना हाथ पैर हिलाए पड़ा रह और इनाम का मज़ा लूट.

इतना कह कर वो उठ बैठी और मेरी टाँगें चौड़ी करके उनके बीच में बैठ गयी. झुक के लंड पर चुम्मियों पर चुम्मियाँ दागीं. फिर उसने सुपारी की खाल पूरी पीछे कर के सुपारी नंगी कर दी. जहाँ सुपारी का लंड पर टांका होता है वहां जीभ घुमाने लगी.

“आह! आह! आह!”

कुतिया जैसे जीभ पूरी बाहर निकाल के सुपारी को खूब अच्छे से लप लप लप करके चाटा. लंड की नीचे वाली मोटी सी उभरी हुई नस को दबाते हुए उस ने गप्प से लौड़ा होंठों में दबा लिया और लगी चूमने. मज़े की अधिकता से लौड़ा फड़क उठा. कमीना पूरा फूल गया और प्रीति के मुंह की गर्मी का आनन्द उठाने लगा.

अब उस ने हौले हौले मेरे टट्टे झुलाने शुरू किये और सुपारी पर जीभ से टुकुर टुकुर करने लगी. उसके मुंह में लौड़ा घुसा होने की वजह से हरामज़ादी के मुंह में पानी भर आया था. इसलिए जीभ खूब गीली थी और उसकी टुकुर टुकुर से मेरे तमाम बदन में एक तेज़ झनझनाहट ऊपर नीचे, नीचे ऊपर दौड़ने लगी.

मस्ती में डूबकर मैं चिल्लाया- हाँ हाँ… चूसे जा साली साहिबा… ऐसे ही चूसती रह… बहुत मस्त चूसती है....

उस ने लण्ड बाहर निकाल के कहा- चुप करके पड़े रहो जीजू… अब ये मेरा है… मेरा जैसा दिल में आएगा वैसा चूसूंगी… बिलकुल मत बोल बीच में… यह इनाम है बस मज़ा लूट.

यह कह के गप्प से लण्ड को फिर से होंठों में दबा लिया और लगी पहले की तरह टुकटुकारने. काफी देर तक ऐसे ही चूसती रही. कुछ समय पश्चात् लंड को बाहर निकला, खाल पीछे करके एक बार फिर से टोपा पूरा नंगा कर दिया. सिर्फ टोपा मुंह के अंदर ले कर खाल ऊपर नीचे करना शुरू किया. उसका मुंह बहुत गरम था और तर भी. लंड के मज़े लग गये.

अचानक उस ने जीभ की नोक सुपारी के छेद में घुसाने की कोशिश की. मेरे पूरे बदन में एक सरसरी सी दौड़ गयी. मज़े की पराकाष्ठा हो चली थी. उसने तेज़ तेज़ लंड को हिलाना शुरू कर दिया. उसकी जीभ कमाल का आनन्द दे रही थी. कभी वह अपनी गरम गरम राल से तर जीभ टोपे पर घुमा घुमा के चाटती और कभी वह दुबारा जीभ को मोड़ के नोक लंड के छेद में डाल के एक तेज़ करंट मेरे बदन में फैला देती. क्या बढ़िया इनाम था!

यकायक लंड पूरा का पूरा मुंह में घुसा लिया. वह ब़ड़े प्यार से अंडों को सहला रही थी और तेज़ तेज़ सिर को आगे पीछे करती हुई लंड को मुंह में अंदर बाहर, अंदर बाहर, अंदर बाहर कर रही थी. उसके घने बाल इधर उधर लहरा रहे थे.

मज़े के मारे मेरी गांड फटी जा रही थी. मैं बड़ी तेज़ी से चरम सीमा की ओर बढ़ रहा था. मेरी साँसें तेज़ हो चली थीं और माथे पर पसीने की बूंदें झलक आईं थीं. उस ने रफतार और तेज़ कर दी. उसे महसूस होने लगा था कि मैं जल्दी ही झड़ सकता हूँ. उस का मुंह रस से लबालब था, लौड़ा अंदर बाहर होता तो सड़प… सड़प… सड़प की आवाज़ें निकलती थीं.

उस ने लंड और गांड के बीच में जो मुलायम सा भाग होता है, उसे ज़ोर से दबा दिया. उसने अपने दोनों अंगूठे उस कोमल जगह पर गाड़ दिये. एकदम से एक तेज़, गरम बिजली के करंट जैसी लहर मेरी रीढ़ से गुज़री, मेरे मुंह से एक ज़ोर की सीत्कार निकली और मैं झड़ा, मैंने उस के बाल जकड़ के एक ज़ोरदार धक्का मारा. लंड बड़ी तेज़ी से उसका पूरा मुंह पार करता हुआ धड़ाम से उसके गले से जाकर टकराया. ऊँची ऊँची सीत्कार की आवाज़ें निकलता हुआ मैं बहुत धड़ाके से झड़ा.

मेरे लौड़े ने बीस पचीस तुनके मारे और हर तुनके के साथ गरम वीर्य के मोटे मोटे थक्के उस के मुंह में झाड़े. सारा मक्खन निकल गया. मैं बिल्कुल निढाल हो कर बिस्तर पर फैल गया और अपनी सांसों को काबू पाने की चेष्टा करने लगा.

मेरा लंड झड़के मुरझा चुका था और प्रीति की लार व मेरे माल की बूँदों से लिबड़ा एक तरफ को पड़ा हुआ था. प्रीति ने सारा वीर्य पी लिया था और फिर उसने मेरे लौड़े को चाट चाट कर अच्छे से साफ किया, नीचे से ऊपर तक. उस ने लंड के निचले भाग में जो मोटी सी नस होती है, उसे दबा दबा के निचोड़ा. वीर्य की एक बड़ी बूंद टोपे के छेद से निकली जिसे उसने जीभ से उठाया और पी लिया. अब वह मेरे बगल में आकर लेट गई और प्यार से मेरे बालों में उंगलियाँ फिराने लगी- सच बता न जीजू… आया मज़ा मेरे जीजू को?

मैं- हाँ साली साहिबा, बहुत मज़ा आया… तू वाकई में चुदाई और चुसाई दोनों की बेहतरीन खिलाड़ी है… मस्त कर दिया तूने मुझे… तेरे इनाम पर मैं जाऊं कुर्बान.....??

“अच्छा जीजू ज़रा टाइम तो देख कितना हुआ है?”

घड़ी मैंने उतार कर टेबल पर रख दी थी, मैं उठ कर गया और देखा कि पौने एक बज चुके थे. प्रीति ने कहा- तो काफी टाइम हो गया अब चलना चाहिए.

मैंने कहा- ठीक है, पहले तू निकल होटल से, तेरे जाने की दस पंद्रह मिनट की बाद मैं चलूँगा. दोनों का एक साथ पहुंचना गलत हो जायगा.

“सच कह रहे हो जीजू… पहले मैं ही निकलती हूँ.” कहकर प्रीति ने अपने कपड़े पहने, बाथरूम में जाकर मुंह हाथ धोये और हल्का सा मेक अप करके तैयार हो गई.

मैंने भी तब तक अपने कपड़े पहन लिए थे. चलते चलते एक बहुत लम्बी चुम्मी ली, उस की चूचियां थोड़ी सी निचोड़ी और थोड़े से नितम्ब दबाये. आलिंगन में बंधे बंधे मै सोच रहा था.... शादी - शुदा स्त्री मांग में सिंदूर होने के बावजूद जुड़ जाती हैं किसी के अहसासों से कह देती है उससे कुछ अनकही बातें ऐसा नहीं की वो बदचलन हैं..या उसके चरित्र पर कोई दाग़ हैं,,तो फिर क्या हैं जो वो खोजती हैं, सोचा कभी, स्त्री क्या सोचती हैं, तन से वो हो जाती हैं शादीशुदा पर मन कुंवारा ही रह जाता हैं, किसी ने मन को छुआ ही नहीं कोई मन तक पहुंचा ही नही बस वो रीती सी रह जाती हैं,,और जब कोई मिलता हैं उसके जैसा जो उसके मन को पढ़ने लगता हैं, तो वो खुली किताब बन जाती हैं, खोल देती है अपनी सारी गिरहें, और नतमस्तक हो जाती हैं, सम्मुख, स्त्री अपना सबकुछ न्योछावर कर देती हैं, जहां वो बोल सके खुद की बोली, जी सके खुल के दो पल, बता सकें बिना रोक टोक अपनी बातें, हंस सके एक बेख़ौफ़ सी हसीं, हां लोग इसे इश्क ही कहते है. पर स्त्री तो बस दूर करती हैं. अपने मन का कुंवारापन,,,,,

फिर प्रीति बाय कहकर चली गई. पूरे पंद्रह मिनट बाद मैंने भी होटल का बिल अदा किया और वापिस वहीं चला गया जहाँ से आए थे... ....

जारी है.. ✍️
 
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