Incest पाप ने बचाया - Page 2 - SexBaba
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Incest पाप ने बचाया

अपडेट-11

एक दो दिन ऐसे ही बीत गए

एक दिन रजनी कुएं के पास फूल तोड़ रही थी तो सामने से जाती हुई नीलम जो उसकी बचपन की सहेली थी उसने आश्चर्य से देखा तो बोली- अरे रजनी तू कब आयी?

रजनी- अरे नीलम तू कैसी है? मुझे तो आये कुछ दिन हो गए।

नीलम- बड़ा गदरा गयी है तू, जीजा जी खूब मेहनत कर रहे हैं क्या?

नीलम बहुत मजाकिया किस्म की थी, बेबाक कुछ भी बोल देती थी।

रजनी- उनके बस का है जो करेंगे? मुझसे मतलब होता तो लापता ही क्यों होते?

नीलम- क्या... लापता?

रजनी- हाँ, कुछ पता नही कहाँ गए, एक साल होने को आया, मुझे तो रहना भी नही अब उनके साथ, है न मेरे बाबू अब यहीं रहूंगी हमेशा।

नीलम- अब यहीं रहेगी, मायके में, हाँ ठीक है और क्या, जब उन्हें तेरी कोई कद्र नही तो तू क्यों फिक्र करेगी, तू भी अपनी मनपसंद जिंदगी जी, एक बात बोलूं।

रजनी- हाँ बोल

नीलम- जितना प्यार तुझे तेरे बाबू करते हैं, दुनिया में कोई नही करेगा। वही तेरा ख्याल रखेंगे, वही फिक्र करेंगे और कोई नही।

रजनी- (मन में गदगद होते हुए) मैं भी उनकी सदा सेवा करूँगी, हमेशा उनके पास ही रहूंगी।


इस तरह रजनी और नीलम कुछ देर बात करती रहीं फिर नीलम चली गयी।

रजनी घर में आई तो काकी से बोली- काकी वो जो घर के पीछे बरगद का पेड़ है न वहां क्यारी में सब्जियां लगाई हुई हैं।

काकी- हाँ लगाई तो हैं फिर

रजनी- उसकी निराई गुड़ाई करनी है तो मैं जाती हूँ कर दूंगी।

काकी- रुक मैं भी चलती हूँ, गुड़िया तो सो गई है, मैं भी चलती हूँ।

रजनी - ठीक है चलो।


दोनों घर के पीछे क्यारी में आ जाती है बरगद के पेड़ के नीचे, वहां काफी घनी छाया होती है।

रजनी और काकी दोनों को अभी काम शुरू किये कुछ ही देर हुआ था कि इतने में बीना वहां आ जाती है। कुछ ही देर में शेरु भी पीछे पीछे आ जाता है।

आज तो बहुत ही गर्मी पड़ रही है न काकी, लेकिन यहां बरगद के नीचे काफी राहत है- रजनी ने बोला

शेरु और बीना भी गर्मी से हांफ रहे थे बीना ने पैर से जमीन में थोड़ा गढ्ढा किया, और फिर उसमें बैठ गयी, जमीन में काफी नमी थी तो उसे ठंडक महसूस हो रही थी वहां।

शेरु बीना के आस पास घूम रहा था, बीना आज कुछ ज्यादा ही कूं कूं कर रही थी।

काकी बोली- रजनी देख ये दोनों भी यही आ गए, आज इनका मुझे कुछ गड़बड़ लग रहा है, आज मुझे लग रहा है कि शेरु बीना की बूर सूंघेगा। मौसम आज गरम है लगता है कि बीना को गर्मी बर्दाश्त नही हो रही।

रजनी ने एकदम से काकी की तरफ देखा, उसने नही सोचा था को काकी बूर शब्द बोलेंगी, वो शर्मा गयी और मुस्कुरा दी।

तभी शेरु ने वो किया जिसका काकी को अनुमान था, शेरु पहले तो थोड़ी देर इधर उधर घूमता रहा फिर एकदम से बीना की बूर को सूंघने लगा, बीना खड़ी हो गयी, ताकि शेरु को आराम से अपनी बूर सुंघा सके।

रजनी को अपनी आंखों के सामने ये दृश्य देखकर विश्वास नही हुआ।

रजनी- काकी ये तो सच में अपनी ही बेटी की बूर सूंघ रहा है बेशर्म।

काकी- देख ले अब खुद ही, मैं न कहती थी।


इतने में ही शेरु जीभ निकाल के बीना की बूर को अब चाटने लगा, बीना की बूर से हल्का हल्का पेशाब निकल जाता, और वो थरथरा जाती, पर शेरु को पूरा सहयोग कर रही थी

रजनी को काटो तो खून नही, वो इस बात से चकित थी कि बीना पूरा सहयोग कर रही थी, उसे भी मजा आ रहा था। एक बाप अपनी बेटी की बूर कैसे चाट सकता है, पर अब ये उसके सामने हो रहा था तो उसे विश्वास करना ही था।

रजनी गरम होने लगती है, काकी का भी कुछ ऐसा ही हाल था पर ज्यादा नही।

इतने में नीलम वहां आ जाती है, नीलम का खेत रजनी के घर के पीछे ही था, वो खेत में कुछ घास लेने आयी थी, रजनी और काकी को देखती है तो उनके पास आ जाती है अभी तक नीलम की नजर शेरु पर नही पड़ी थी पर जैसे ही नज़र पड़ती है-

नीलम- हाय दैया! रजनी ये तेरा शेरु तो अपनी बेटी की ही बूर चाट रहा है, उफ्फ्फ!

रजनी की सांसे तो पहले ही तेज़ हो चुकी थी अब नीलम भी एक टक लगा के देखने लगी।

काकी क्यारी में गुड़ाई करती और कनखियों से देख लेती पर रजनी और नीलम एक टक लगा के देख रहे थे।

शेरु बीना के चारो तरफ घूमने लगा, बार बार घमता फिर पीछे आ के बूर को सूंघता फिर चाटने लगता, जैसे ही शेरु बीना की बूर को जीभ लगता रजनी को ऐसा लगता कि जैसे शेरु की जीभ उसकी खुद की बूर पर लग रही हो और वो बैठे बैठे ही अपनी जांघों से अपनी बूर को हल्का सा दबा लेती, और iiisssssshhhhhhh की आवाज उसके मुंह से निकल जाती, नीलम का भी यही हाल हो चला था, वो भी अब वहीं बैठ गयी।

आज विक्रमपुर में ये अनर्थ और महापाप हो रहा था भले ही जानवर के रूप में ही क्यों न हो।

काकी, रजनी और नीलम अब तीनो ये नज़ारा देखने लगी, काकी का तो कम, पर रजनी और नीलम का अब हाल बुरा होने वाला था, क्योंकि उन्होंने कभी कुत्ता कुतिया की चुदाई नही देखी थी

बीना चुपचाप खड़ी थी और शेरु चपड़ चपड़ उसकी बूर चाटे जा रहा था, बीना अब बिल्कुल गरम हो चुकी थी, बूर चाटते चाटते एकदम से ही शेरु का बड़ा सा लंड बाहर आ गया

रजनी की तो अब हालत खराब हो गयी अपने ही शेरु का लाल लाल लंड देखके,

रजनी (फुसफुसाते हुए)- काकी देखो तो इसका कैसा है, कितना लाल और बडा सा है, और हाय! अपनी ही सगी बेटी की बूर चाटने में इसको कितना मजा आ रहा है।

रजनी भी अब बेशर्मी से "बूर" शब्द बोल गयी।

काकी- अपनी बेटी का ख्याल रखता है तो उसकी ये इक्छा भी तो वही पूरी करेगा न, मुझे तो लग रहा है कि अब पक्का चोदेगा बीना को।

नीलम- हे भगवान कितना मजा आ रहा होगा इन दोनों को, रजनी तेरा कुत्ता तो बहुत भाग्यशाली है रे घर में ही मिल गयी इसको तो बूर वो भी अपनी ही बेटी की।


रजनी का शर्म और मजे से बुरा हाल था।

तभी शेरु का पूरा लंड बाहर आ गया, वो करीब 6 इंच तक लंबा और 2 इंच मोटा होगा, रजनी उसे उखड़ी उखड़ी सी देखती रही, उसकी खुद की दबी हुई चुदास को उसके खुद के ही कुत्ते की कामलीला ने जगा दिया था।

तभी शेरु एकदम से उछला और बिना के ऊपर चढ़ गया और अपना लंड बीना की फूली हुई बूर के मुहाने पर लगाने लगा पर असफल हो गया और नीचे खड़ा हो गया, फिर उसने दुबारा सुंघा, चाटा और फिर चढ़ गया, चढ़ते ही वो जोश के मारे तेज तेज धक्के मारने लगा, उसका लंड बार बार कभी बीना की बूर की दायीं फांक पर टकराता कभी बाई फांक पर टकराता, कभी कभी बीना भी थोड़ा हिल जाती, पर तभी एकदम से निशाना सही बैठा और शेरु का लंड बीना की बूर में जड़ तक समा गया।

रजनी और नीलम के मुंह से aaaaahhhhhhhh! uuuuuuuuuiiiiiiiiiimmmaaaaaaaaaannn निकल गया, जैसे शेरु का लंड उनकी ही बूर में घुस गया हो।

काकी- आखिर बीना ने अपने बाप को दे ही दिया इनाम, मैंने शेरु को, जबसे बीना की माँ मरी है आजतक किसी दूसरी कुतिया को चोदते नही देखा, और आज देखो अपनी ही बेटी को कैसे घच्छ घच्छ चोद रहा है। आखिर बेटी की बूर का मजा ही कुछ और है।

नीलम - hhhaaaaiiiiiiii काकी क्या क्या बोले जा रही हो, आपको कैसे पता कि बाप को बेटी की बूर चोदने में ज्यादा मजा आता है, आपने चुदवा रखा है क्या अपने बाबू से (नीलम से तपाक से मजे लेते हुए कहा, और रजनी खिलखिला के हंस पड़ी)

काकी- अरी कहाँ रे नीलम, मेरे बाबू अगर मेरा इतना ख्याल रखते होते न जितना तुम लोगों के और खासकर रजनी के बाबू रखते है तो मैं तो सच कह रही हूं उनको घर की चार दिवारी के भीतर छुप छुप के बूर का ऐसा मजा देती की उनका जीवन धन्य हो जाता। पर हाय री किस्मत। खैर अब तो वो हैं ही नही इस दुनियां में।


रजनी और नीलम ये सुनकर दंग रह जाती है, की काकी ने कैसे बड़े ही बेशर्म तरीके से अपने मन में छुपी हुई बात इतने बेबाक तरीके से कह दी।

रजनी को आज काकी के कामुक स्वभाव का आभास हुआ था, काकी की ऐसी बातें सुनकर उसके अंदर की चुदास पूरी तरह खुल गयी, अभी तक वो गंदी बात करने से या अपने अंदर की छुपी हुई कामाग्नि को जाहिर करने से झिझकती थी काकी के सामने, क्योंकि वो उसकी माँ समान थी, उसने उसे बचपन से पाला पोशा था, और रजनी सभ्य भी थी, पर आज खुद जब काकी ऐसी गंदी बात खुलकर उसके ही सामने बोल गयी, तो उसे ऐसा लगा कि उसे एक साथी मिल गया हो, जिससे वो खुलकर गंदी बात कर सकती है, उसने मन में सोचा कि वो काकी से बाद में घर में जाकर इस विषय पर बात करेगी।

नीलम सलवार के ऊपर से ही अपनी बूर को हल्का हल्का सहला रही थी।

रजनी उसे देखकर हंस पड़ी और बोली-, तेरे से बर्दाश्त नही हो रहा तो तू भी चुदवा ले मेरे शेरु से।

नीलम- hhhhhaaaaiiiii चुदवा लेती यार, पर उसे तो अपनी बेटी ही चोदनी है। बेटी चोदने का मजा अलग ही होगा न। और बीना को देखो कैसे मजे से अपने ही बाप के मोटे से लंड से चुद रही है, कैसे गचा-गच लन्ड बूर में जा रहा है, आखिर बाप से चुदने का मजा अलग ही होगा न।

रजनी को नीलम की ये बात अंदर तक झकझोर देती है कि- "बाप से चुदने का मजा ही अलग होगा न" तो उसका चेहरा शर्म से लाल हो जाता है।

रजनी कामुक अंदाज में- तो तू अपने बाबू जी को लाइन मार न क्या पता बात बन जाये (रजनी ने चुटकी लेते हुए कहा)

नीलम- dhatt पगली, बेशर्म, मैं तो ऐसे ही कह रही थी (हालांकि नीलम के बदन में ये सोचकर झुरझुरी सी दौड़ गयी)


शेरु ताबड़तोड़ बीना की बूर में धक्के लगाए जा रहा था, बीना की बूर अब पूरी खुल चुकी थी वो शांत खड़ी थी और अपने ही बाप को अपनी कमसिन बूर चखाने में भरपूर सहयोग कर रही थी
 
अपडेट- 12

काफी देर बीना की बूर चोदने के बाद शेरु अपनी बेटी की बूर में थरथरा के झड़ने लगा, बीना का भी कुछ ऐसा ही हाल था, बाप बेटी का मिलन हो चुका था।

ये देखकर रजनी बेहाल सी हो गयी, नीलम के मुंह से aaaahhhhh निकल गया ये देखकर और वो बोली- hhhaaaiiii अब फंस जाएंगे ये दोनों एक दूसरे में, अटक जाएगा शेरु का बीना की बूर में, कितना मजा आ रहा होगा दोनों को uuuuffffff.

इतने में दूर से गांव की कोई औरत उस तरफ आती दिखाई दी तो नीलम ये बोलकर की काकी मैं चलती हूँ, आज तो मजा ही आ गया इनको देखकर, अब तो ये ऐसे ही कुछ देर अटके रहेंगे, कोई हमे देखेगा इनको देखते हुए तो क्या सोचेगा, मैं चलती हूँ

रजनी की सांसे धौकनी की तरफ ऊपर नीचे हो रही थी, वो उसे देखकर हंस पड़ी, इतने में नीलम उठी और अपने घर की तरफ भाग गई।

रजनी का भी अब काम में कहां मन लगता उसकी तो हालत खराब हो चली थी, वो बार बार कभी काम करने लगती तो कभी बीना की बूर में अटके हुए शेरु के लंड को देखती और सिरह जाती। फिर वो एकदम से उठी और बोली- काकी अब रहने दो चलो मुझसे नही होगा अब काम, बाद में कर लेंगे, फिर वो भी घर के पीछे वाली कोठरी में जिसका एक दरवाजा बाहर की तरफ खुलता था उसको खोलकर कोठरी में चली गयी और वहां पड़ी खाट पर औंधे मुंह पसर गयी, वो जैसे हांफ रही थी, सांसे काफी तेज चल रही थी उसकी, बार बार वो अंगडाई लेती आंखें बंद करती तो कभी शेरु और बीना की चुदाई उसके सामने आ जाती तो कभी उसके बाबू का गठीला मर्दाना जिस्म, अनायास ही उसके मुंह से निकल गया- aaaaahhhhhhh बाबू, पास होकर भी क्यों हो तुम मुझसे इतना दूर। ऐसे ही वो बुदबुदाते जा रही थी

तभी काकी घर में आती है तो देखती है कि रजनी कोठरी में खाट पे लेटी है।

रजनी उन्हें देखती है तो उठकर बैठ जाती है, काकी उसके पास बदल में खाट पे बैठ जाती है और उसको अपने सीने से लगते हुए बोलती है- मैं जानती हूं बिटिया तेरी हालत, आखिर मैं भी एक स्त्री हूँ, मैं भी इस अवस्था से गुजरी हूँ।



रजनी बेधड़क काकी के गले लग जाती है और बोलती है- काकी हम स्त्रियों को आखिर इतना तड़पना क्यों पड़ता है, हमारा क्या कसूर है, हम स्वच्छन्द क्यों नही, क्यों नही हम अपने मन की कर सकते? क्यों हम इतना मान मर्यादा में बंधे हैं?

रजनी ने एक ही साथ कई सवाल दाग दिए

काकी- मैं तेरी तड़प समझ सकती हूं बिटिया।

स्त्री के हिस्से में अक्सर आता ही यही है, पुरुष स्वच्छन्द हो सकता है पर स्त्री इतनी जल्दी नही हो पाती खासकर हमारे गांव और कुल में, यहां कोई गलत नही कर सकता, करना तो दूर कोई सोच भी नही सकता, खासकर पुरुष वर्ग, स्त्रियां तो बहक सकती हैं पर जहां तक मैं जानती हूं हमारे कुल के पुरुष तो जैसे ये सब जानते ही नही है, हमारे गांव और कुल में तो ऐसा है कि अगर किसी की स्त्री या मर्द मर जाये या उसको उसका हक न दे तो वो पूरी जिंदगी तड़प तड़प के बिता देगा या बिता देगी पर कोई ऐसा काम नही करेंगे जिससे हमारे गांव की सदियों से चली आ रही मान मर्यादा भंग हो, हमारे पूर्वजों के द्वारा संजोई गयी इज्जत, कमाया गया नाम (कि इस कुल में, इस गांव में कभी किसी भी तरह का कुछ गलत नही हो सकता) कोई मिट्टी में नही मिलाएगा, यही चीज़ हमे दुनियां से अलग करती है

इसलिये ही हम जैसे लोग जो विधवा है, या जिनके पति नही है, या ऐसे पुरुष जिनकी पत्नी नही हैं उनकी जिंदगी एक तरह से नरक के समान ही हो जाती है, किसी से कुछ कह नही सकते, बस तड़पते रहो।

काकी कहे जा रही थी और रजनी उनकी गोदी में लिपटे सुने जा रही थी।

रजनी- लेकिन काकी ये कहाँ तक सही है, क्या ये तर्क संगत है?

काकी कुछ देर चुप रहती है और रजनी आशाभरी नज़रों से उनकी आंखों में देखती है।

काकी- नही! बिल्कुल नही मेरी बेटी। ये गलत है, पर हम स्त्रियाँ कर भी क्या सकती हैं

रजनी- क्या हमारे कुल के पुरुष, हमारे गांव के मर्द इतने मर्यादित है, मेरे बाबू भी ( रजनी ने फुसफुसके कहा)

काकी- मैं पक्के तौर पर नही कह सकती बेटी, ये तो खुद औरत को मर्द का मन टटोल कर देखना पड़ता है कि उसके मन में क्या है?

रजनी- अच्छा काकी क्या सच में आप वो करती अपने बाबू के साथ (रजनी ने मुस्कुराते हुए कहा)

काकी- क्या? (जानबूझकर बनते हुए)

रजनी- वही जो अपने बाहर कहा था

काकी उसकी आँखों में देखती हुए- क्या कहा था मैंने?

रजनी काकी का हाँथ हल्का सा दबाते हुए भारी आवाज में फुसफुसाते हुए बोली- यही की आप अपने बाबू को अपनी बूर का मजा उनको देती अगर वो मेरे बाबू जैसे होते।

काकी- hhhhaaaaiiiiii, हां क्यों नही, क्यों नही देती भला, आखिर ये उनका हक होता न, आखिर उन्होंने मुझे पाल पोष के बड़ा किया, मेरा इतना ख्याल रखा, और अगर मुझे ये पता लगता कि वो मुझसे वो वाला प्यार करते है जो एक औरत और मर्द करते है, या मुझे ये पता लगता कि वो मुझे दूसरी नज़र से देखते है तो मैं भला क्यूं पीछे रहती। भले ही वो मेरे पिता थे पर थे तो वो भी एक मर्द ही न। (काकी की भी आवाज भर्रा जाती है)

रजनी फिर से गरम होते हुए- पर काकी आपको ये कैसे पता लगता, आप ये अंतर कैसे कर पाती की वो आपको बेटी की नज़र से नही देख रहे बल्कि वासना की नजर से देख रहे हैं

काकी- ये तो बिटिया रानी औरत को खुद ही पता लगाना होता है कि उसके घर के मर्द उसे किस नज़र से देखते हैं। उनकी हरकतों से।

रजनी काफी देर सोचती है फिर

रजनी- तो काकी सच में आपने अपने बाबू को मजा दिया था।

काकी- नही री पगली, मेरी ऐसी किस्मत कहाँ, मेरे बाबू मुझे ज्यादा मानते नही थे, बचपन में ही उन्होंने मेरा विवाह कर दिया और मैं यहां ससुराल चली आयी, उसके कुछ ही सालों बाद तेरे काका चल बसे और मैं विरह में कई वर्षों तक तड़पती रही, अब तो जैसे आदत पड़ गयी है, तेरे जैसी मेरी किस्मत कहाँ मेरी की मेरे ससुराल वाले बोलते की बेटी तू उम्र भर अपने पिता के पास रह सकती है।

रजनी को मन ही मन इस बात पे नाज़ हुआ।

काकी- तू मुझे गलत तो नही समझ रही न बेटी।

रजनी- ये क्या बोल रही हो काकी, आप तो मेरी माँ जैसी हो, और आज तो मैं और भी खुश हूं कि एक दोस्त की तरह आपने अपने मन की बात अपनी इस बिटिया को बताई, कोई बात नही छुपाई, मुझे तो आज आप पर नाज़ हो गया जो मुझे आप जैसी माँ मिली, जो मेरा दर्द समझ सकती है।

रजनी और काकी एक दूसरे को गले से लगा लेती हैं

काकी- ओह्ह! मेरी बेटी, बेटी मैं कोई ज्ञानी या सिद्ध प्राप्त स्त्री तो नही की भविष्य देख सकूँ पर इतना तो मेरा मन कहता है कि जो पीड़ा मैन झेली है वो तू नही झेलेगी, तेरे हिस्से में सुख है, समय अब बदलेगा, जरूर बदलेगा।

ऐसे कहते हुए वो रजनी के माथे को चूम लेती है और बोलती है कि तू जाके नहा ले गर्मी बहुत है थोड़ी राहत मिल जाएगी, शाम हो गयी है तेरे बाबू भी आते होंगे

रजनी- हाँ काकी


और रजनी नहाने चली जाती है, काकी कुछ देर बैठ के सोचती रहती है फिर अचानक ही गुड़िया उठ जाती है तो काकी उसको लेके बाग में घूमने चली जाती है रजनी के ये बोलकर की वो नहाने के बाद गुड़िया को दूध पिला देगी।

रजनी को नहाते नहाते काकी की बात याद आती है की औरत को खुद ही अपने घर के मर्द का मन टटोलना पड़ता है कि वो उसको किस नज़र से देखता है, और इस वक्त घर में एक ही मर्द था वो थे उसके पिता, यह बात सोचकर वो रोमांचित हो जाती है, और सोचती है कि वो अब ऐसा ही करेगी। वो उस दिन कुएं पर हुई बात सोचती है कि कैसे उस दिन बाबू ने मुझे बाहों में भरकर मेरी पीठ को सहला दिया था और मेरी सिसकी निकल गयी थी। हो न हो उसके मन में कुछ तो है।

ऐसा सोचते हुए वो जल्दी जल्दी नहा कर एक गुलाबी रंग की मैक्सी डाल लेती है। आज गर्मी बहुत थी और अभी खाना भी बनाना था, फिर वो गुड़िया को दूध पिलाती है और खाना बनाने के लिए चली जाती है।

आज काफी देर हो गयी पर उदयराज अभी तक आया नही था, अंधेरा हो गया था, रजनी खाना बनाते हुए बार बार बीच में उठकर बाहर आती और जब देखती की उसके बाबू अभी तक नही आये तो उदास होकर फिर जाके खाना बनाने लगती।

काकी इस वक्त गुड़िया को लेके अपने घर की तरफ गयी हुई थी कि तभी उदयराज हल और बैल लेके आ जाता है, बैल बंधता है और पसीने ले लथपथ सीधा घर में रजनी, ओ रजनी बोलता हुआ जाता है।

रजनी उदयराज को देखके चहक उठती है वो उस वक्त आटा गूंथ रही होती है अपने बाबू के मजबूत और गठीले बदन पर जब उसकी नजर जाती है तो वो रोमांचित हो जाती है और उदयराज के जिस्म की पसीने की मर्दानी गंध उसको बहुत मनमोहक लगती है, वो उदयराज से बनावटी गुस्सा दिखाते हुए बोलती है कि- क्या बाबू, कब से मैं राह देख रही हूं आज इतनी देर।

उदयराज अपनी बेटी को आज मैक्सी में देखकर बहुत खुश होता है और बोलता है- बेटी, मैं तो वक्त से ही घर आने के लिए निकला था कि रास्ते में कुछ लोग मिल गए तो उन्ही से बात करने लगा।

रजनी- अच्छा! लगता है आपको अपनी बेटी की याद नही आती (रजनी ने जानबूझकर ऐसे बोला)

उदयराज- याद नही आती तो भला घर क्यों आता मेरी बिटिया रानी। बस इतना है कि थोड़ी देर हो गयी, और अब मेरी बेटी अगर इस बात से मुझसे नाराज़ हो जाएगी तो मैं तो जीते जी मर जाऊंगा।

रजनी - आपकी बेटी आपसे नाराज़ नही हो सकती ये बात उसने आपसे पहले भी कही है न बाबू

रजनी आटा गूथ रही थी और उसका मादक बदन हिल रहा था, उदयराज सामने खड़ा खड़ा एक टक उसे ही देख रहा था, रजनी कभी शर्मा जाती, कभी मुस्कुरा देती, कभी खुद सर उठा के अपने बाबू की आंखों में देखने लगती।

फिर रजनी एकाएक बोली- ऐसे क्या देख रहे हो मेरे बाबू जी, अभी सुबह ही तो देखके गए थे, क्या मैं माँ जैसी दिख रही हूं क्या? और मुस्कुराके हंस दी।

उदयराज- अपनी बेटी को देख रहा हूँ, जो कि अपनी माँ से भी कहीं ज्यादा खूबसूरत है, और इस वक्त मुझे लगता है कि मुझसे नाराज है।

रजनी फिर हंसते हुए - अरे बाबू मैं आपसे गुस्सा नही हूँ मैं तो ऐसे ही बोल रही थी।

उदयराज- काकी कहाँ है?

रजनी- वो गुड़िया को लेके अपने घर की तरफ गयी हैं।

उदयराज- कितनी देर हो गयी?

रजनी- अभी अभी तो गयी हैं

अब उदयराज ने बड़ी ही चालाकी से ये बात घुमा के बोली- तो अगर एक बेटी अपने पिता से नाराज़ नही होती, और घर में उन दोनों के सिवा कोई न हो, तो भला वो अपने पिता से इतना दूर होती।

रजनी ने जब ये सुना और इस बात का अर्थ समझा की उसके बाबू क्या चाहते हैं तो उसके चेहरे पर उत्तेजना के भाव आ गए और वो मुस्कुराते और शर्माते हुए आटा गूँथना छोड़कर भागकर उदयराज के गले लग जाती है, उदयराज उसे और वो उदयराज को कस के बाहों में भर लेते हैं। एक बार फिर रजनी का गुदाज बदन उदयराज की गिरफ्त में था, इस बार वो रजनी की पीठ फिर सहला देता है और रजनी की aaahhhh निकल जाती है,

रजनी अपना हाँथ उदयराज की पीठ पर नही रख पाती क्योंकि उसके हाँथ में आटा लगा होता है, परंतु उदयराज उसे कस के अपने से इतना सटा लेता है कि उसका एक एक अंग उदयराज के अंग से भिच जाता है।

रजनी उदयराज की आंखों में मुस्कुराके देखने लगती है, और अपने पिता की मंशा पढ़ने लगती है, उदयराज भी रजनी की आंखों में देखने लगता है।

रजनी खिलखिलाकर हंसते हुए- अब आपको पता चला कि मैं आपसे नाराज़ नही हूँ।

उदयराज- हाँ, तुम मुझसे नाराज़ होगी न तो मैं तो जी ही नही पाऊंगा अब।

रजनी- अपनी बेटी से इतना प्यार करने लगे हो।

उदयराज- बहुत

रजनी- पहले तो ऐसा कभी नही किया

उदयराज- क्या नही किया।

रजनी- (लजाते हुए), यही की जब कोई न हो तब बेटी को बाहों में लेना।

उदयराज- मेरी बेटी है ही इतनी खूबसूरत, की क्या करूँ, उसकी खूबसूरती को बाहों में भरकर मेरी थकान मिट जाती है।

रजनी खिलखिलाकर हंस दी- अच्छा आपकी थकान बस इतने से ही मिट गई।

उदयराज- हाँ सच।

रजनी- तो मुझे रोज अकेले में बाहों में ले लिया करो, जब जी करे, और कहके हंसने लगी

उदयराज उसके लाली लगे हुए होंठो को देखने लगा, की तभी काकी की आहट सुनाई दी, रजनी ने जल्दी से उदयराज के कानों में फुसफुसाते हुए कहा- काकी आ रही है, अब बस करो, मेरे बाबू

उदयराज- मन नही भरा मेरा।

रजनी- थकान नही मिटी, अभी तक (हंसते हुए)

उदयराज- नही, बिल्कुल नही

रजनी ने आज पहली बार शर्माते हुए एक बात उदयराज के कान में बोली- आज जल्दी सो मत जाना रात को आऊंगी आपके पास, फिर थकान मिटा लेना।

उदयराज- जिसकी बेटी इतनी सुंदर हो उसको नींद कहाँ आने वाली।

रजनी- धत्त, बाबू.....गंदे...

और शर्माते हुए रसोई में भाग जाती है, इतने में काकी आ जाती है और उदयराज बाल्टी उठा के नहाने चला जाता है
 
Update- 13

जिंदगी में आज पहली बार उदयराज के मन में लड्डू फूटा था, उसके रूखे, नीरस, उत्साहहीन, सूखे जीवन में उसी की सगी बेटी ने एक कामुक और रसीला सा संभावित संकेत देके उसकी मन की गहराइयों में छिपे यौनतरंग के तारों को आज छेड़ दिया था जिससे ऐसा प्रतीत होता था कि अब वो बादलों में उड़ रहा है, आने वाली जिंदगी अब कितनी लज़्ज़त से भरी होगी और उसमें कितना मिठास होगा, बस यही बार बार सोच कर वो गुदगुदा जा रहा था

आज उदयराज ने नहाने में जरा भी वक्त नही लगाया, सोच कर ही शरीर में आज उसके इतनी गर्मी बढ़ गयी थी कि कुएं का ठंडा पानी भी आज उसको शांत नही कर पा रहा था।

परंतु फिर भी उसके मन की स्थिति असमंजस में थी, की क्या पता वैसा न हो जैसा वो सोच रहा है तो? क्या पता ये रजनी का केवल बेटी वाला प्रेम हो तो?

एक तरफ उसके संस्कार, उसकी मर्यादा, उसे बार बार अपने कुल की मर्यादा, बाप बेटी के पवित्र रिश्ते की दुहाई देती, उसके इतने नेक पुरुष होने पर सन्देह करती, उसे ये अहसास दिलाती की तू गांव का मुखिया है, जब तू ही ये अनर्थ करेगा तो गांव के लोगों में तेरी जो एक आदर्श छवि है उसका क्या होगा?

दूसरी तरफ नारी सुख की बरसों की दबी प्यास, नारी को भोगने पर मिलने वाले मजे की लज़्ज़त का अहसास कराती, वो कहती कि किसी को पता ही क्या चलेगा, और जब तेरी बेटी ही यह चाहती है तो पुरुष होने के नाते तेरा एक फ़र्ज़ ये भी है कि एक तड़पती, प्यासी नारी को तू संतुष्ट कर, चाहे वो तेरी बेटी ही क्यों न हो, सोच कितना मजा आएगा, और ये गलत तो तब होता जब तू जबरदस्ती कर रहा होता। सोच जरा पगले स्वर्ग की अप्सरा सी तेरी बेटी तेरे पौरुष द्वार पर आके यौनसुख की विनती कर रही है और तुझे लोक लाज की पड़ी है, क्या ये पुरुष का फर्ज नही की वो अपने घर की औरत को संतुष्ट करे, आखिर रजनी अपना पूरा जीवन तेरी सेवा करने तेरे पास चली आयी, तो क्या तेरा उसके प्रति कोई फ़र्ज़ नही।

फिर उसका दूसरा मन कहता तू इतना गिर गया है उदयराज, तू ये कैसे कह सकता है कि रजनी भी यही चाहती है? वो तेरी बेटी है वो भला ऐसा पाप करेगी।

फिर उसका पहला मन कहता है- अगर ऐसा न होता तो रजनी उसकी बाहों में भला क्यों आती, चलो माना कि वह बेटी के नजरिये से उसकी बाहों में आई, पर उसके मुंह से जो आह और सिसकी निकली वो क्या था, और अगर ऐसा न होता तो वो इतने मादक रूप में भला उसके कान में ऐसा क्यों बोलती।

उदयराज तू अपनी बेटी की मंशा को समझ, सबको ऐसा बेटी सुख नही मिलता, सोच तू कितना भाग्यशाली है, वो तुझे घर की चार दिवारी में चुपके चुपके यौनसुख देना चाहती है, इस मौके को मत खो, देख गलत तो तू फिर भी हो ही जायेगा, एक फ़र्ज़ की तरफ देखेगा तो दूसरा छूट जाएगा, और दूसरा फ़र्ज़ ये है कि एक पुरुष को एक प्यासी औरत को संतुष्ट करना ही चाहिए, और जब गलत होना ही है तो मजे ले के होने में क्या बुराई है

खैर उदयराज कोई सिद्ध और योगी पुरुष तो था नही जो अपने आपको इस ग्लानि, विषाक्त, घृणा, वासना, यौनसुख की लालसा के मिले जुले मन स्थिति से निकाल ले जाता, वो असहाय हो गया और सबकुछ नियति पे छोड़ दिया।

फटाफट नहा के आया वो और रजनी ने खाना लगा रखा था, रजनी को देखते ही उसे फिर खुमारी चढ़ने लगी, रजनी अपने बाबू की मन स्थिति को देखकर मंद मंद मुस्कुराये जा रही थी, वो छुप छुप के तिरछी नजर से अपने बाबू को देखकर कामुक मुस्कान देती और उदयराज का आदर्श, मानमर्यादा, कुल की लाज, सब एक ही पल में धराशाही हो जाता, वो वासना के दरिया में ख्याली गोते लगते हुए खाना खाए जा रहा था, कभी कभी जब एक टक लगा के रजनी को निहारता तो रजनी आंखों के इशारे से शिकायत करती की अभी ऐसे न देखो कहीं काकी न देख ले, (जैसे वो कोई प्रेमिका हो), उदयराज अपनी बेटी की इस अदा पर कायल हो जाता।

सबने खाना खाया और उदयराज आज अपनी खाट कुएं के और नजदीक ले गया, बिस्तर लगा के उसपर करवटें बदलने लगा।

रजनी ने बर्तन धोया, बिस्तर लगाया फिर काकी और रजनी अपने अपने बिस्तर पर रोज़ की तरह लेट गए, रजनी की बेटी उसी के पास थी, रजनी का बिस्तर रोज की तरह घर के मुख्य द्वार के ठीक सामने नीम के पेड़ के नीचे था और उदयराज का बिस्तर 200 मीटर कुएं के पास था, रजनी आज अपने बाबू को छेड़ना चाहती थी, पहले तो वो काकी से इधर उधर की बातें करती रही, फिर बोली- काकी मैं बाबू के सर पर तेल मालिश करके आती हूँ आप सोइए।

काकी- हां जा न, ला गुड़िया को मेरी खाट पे लिटा दे, तू जा उदय के सर की तेल मालिश कर आ और हां बदन की भी मालिश कर देना, थक जाता है बेचारा

रजनी- हां काकी जरूर

रजनी इतना कहकर घर में जा के कटोरी में तेल और एक हाँथ में बैठने का स्टूल लेके अपने बाबू की खाट की तरफ जाने लगती है

अभी कृष्ण पक्ष की ही रातें चल रही थी, चाँद थोड़ी ही देर के लिए निकलता था वो भी रात के दूसरी पहर में, अंधेरी रात होने की वजह से गुप्प अंधेरा पसरा हुआ था, बहुत हल्का हल्का सा पास आने पर दिखता था

रजनी ने उदयराज की खाट के पास आके कहा- बाबू, ओ मेरे बाबू, सो गए क्या? मैं आ गयी।

उदयराज ने झट से सर उठा के अपनी बेटी की तरफ देखा तो उसकी बांछे खिल गयी, धीरे से बोला- नही बेटी, तेरे आदेश का पालन कर रहा हूँ।

रजनी (हंसते हुए)- वो मेरा आदेश नही आग्रह था बाबू, एक बेटी भला अपने बाबू को आदेश करेगी।

उदयराज- क्यों नही कर सकती, कर सकती है, मैं तो तेरा गुलाम हूँ।

रजनी- अच्छा जी

उदयराज- हम्म

रजनी- और क्या क्या हैं आप मेरे?

उदयराज- बाबू हूँ, गुलाम हूँ, और....और...बताऊंगा वक्त आने पर।

रजनी- हंस देती है, अरे वाह! मेरे बाबू मुझे इतना चाहते हैं कि मेरे गुलाम बन गए, जबकि मैं तो खुद आपकी दासी हूँ।

उदयराज- तू मेरी दासी नही मेरी बेटी।

रजनी- फिर, फिर मैं क्या हूँ आपकी।, बेटी तो मैं हूँ ही, इसके अलावा और क्या हूँ।

उदयराज- तू मेरी रानी है। (ऐसा कहते हुए उदयराज की आवाज जोश में थोड़ी भारी हो जाती है)

रजनी- सच, और आप मेरे राजा....ऐसा कहते हुए रजनी अपने हांथ की उंगलियाँ अपने बाबू के हाँथ की उंगलियों में cross फंसा लेती है और उनके ऊपर झुकते हुए अपना चेहरा उनके कानों के पास लाकर धीरे से बोलती है- आपको थकान नही लगी, क्या अब?

उदयराज- वो तो मुझे बरसों से लगी है।

रजनी फिर अपने बाबू को छेड़ने की मंशा से - तो लाओ न बाबू आपके सिर पर तेल मालिश कर दूं, थकान उतर जाएगी। (और रजनी मन ही मन हंसने लगती है, अपने बाबू को तडपाने में उसको मजा आ रहा था)

उदयराज आश्चर्य में पड़ जाता है, की उसकी बेटी ने उसकी बाहों में आकर थकान मिटाने की बात बोली थी, ये तेल मालिश की बात बीच में कहां से आ गयी, परंतु वो तुरंत ही समझ जाता है की रजनी उसे तड़पा रही है, फिर वो भी चुप रहकर थोड़ा इंतज़ार करता है।

रजनी स्टूल लेके अपने बाबू के सिरहाने बैठ जाती है, और हाथ में तेल लेकर उनके सिर की हल्के हल्के मालिश करने लगती है, रजनी की नर्म नर्म उंगलियों की छुअन से उदयराज को अद्भुत सुख की अनुभूति होती है, दोनों चुप रहकर एक दूसरे को महसूस करते हैं कुछ पल, फिर रजनी एकाएक बोली- अब थकान मिटी बाबू।

उदयराज- मेरी थकान सिर्फ तुम्हारी उंगलियों से कहाँ मिटने वाली बेटी, मेरे पूरे बदन को तुम्हारा पूरा बदन चाहिए।

रजनी- ओह्ह! मेरे बाबू

ऐसा कहते हुए रजनी स्टूल से उठकर उदयराज की खाट पर उसके बगल में लेट जाती है, दोनों एक दूसरे को कस के बाहों में भर लेते हैं, रजनी के मुँह से oooohhhhhhh मेरे बाबू, और उदयराज के मुंह से oooohhhhhh मेरी बेटी, मेरी रानी, की धीमी धीमी कामुक आवाज, और सिसकियां आस पास के वातावरण में गूंज जाती हैं।

रजनी दायीं तरफ होती है और उदयराज बाई तरफ, दोनों का बदन एक दूसरे में मिश्री की तरह घुल रहा होता है, दोनों ही कुछ देर के लिए सुन्न से हो जाते है, विश्वास ही नही हो रहा था दोनों को, की आज वो हो गया, जो अभी तक सिर्फ ख्यालों में ही था, तभी उदयराज के हाँथ रजनी की पीठ को हौले हौले सहलाने लगते हैं तो रजनी अपनी जांघों को भीच के सिसक उठती है।

उदयराज अब अपना हाथ थोड़ा नीचे की ओर रजनी की गांड की तरफ जैसे ही सरकाता है रजनी ये महसूस करती है कि side side में लेटे होने की वजह से उसके बाबू उसकी गांड को अच्छे से नही सहला पाएंगे, तो इसकी सहूलियत के लिए वो धीरे धीरे aaaaahhhhh करती हुई उदयराज के ऊपर आ जाती है, और उदयराज को अपनी सगी बेटी की ये मौन स्वीकृति इतना जोश से भर देती है कि वो अपने दोनों हाथों से उसकी अत्यंत मांसल उभरी हुई गांड को भीच देता है, कभी वो मैक्सी के ऊपर से ही अपनी बेटी के मोटे चूतड़ की दोनों फांकों को अलग कर उसमें हाँथ फेरने लगता कभी अपने दोनों हथेलियों में मांसल गांड को भर भर के सहलाने लगता।

रजनी- aaaaaaaahhhhhh, ooooooohhhhhhh bbbbbbbaaaabbbbbuuuuu,, ssssshhh

एकाएक उदयराज ने रजनी को नीचे किया और उसके ऊपर चढ़ गया, रजनी की तो बस सिसकियां ही निकली जा रही थी, शर्म के मारे वो कुछ न बोली, बस oooohhh baabu

उदयराज ने एक जोरदार चुम्बन रजनी के गाल पे जड़ दिया, फिर रजनी ने जानबूझ के अपना दूसरा गाल आगे कर दिया उदयराज ने इस गाल पे भी एक दूसरा जोरदार चुम्बन किया और अब वो ताबड़तोड़ रजनी के गालों पे, कान के नीचे, गर्दन पे, माथे पे, आंखों पे चूमने लगा, इतना मजा तो उसको अपनी पत्नी के साथ भी नही आया था जितना बेटी के साथ आ रहा था, रजनी को तो मानो होश ही नही रहा अब, वो तो बस hhhaaaaai hhhhhhaaaai कर के सिसके जा रही थी।

जैसे ही उदयराज ने अपना सीधा हाँथ रजनी के बायीं चूची पे रखा, उसे गांव वालों की कुछ आवाज़ें उत्तर की तरफ से आती हुई सुनाई दी, जैसे गांव के कुछ लोग मुखिया के घर की तरफ ही आ रहे थे कुछ फरियाद लेके, रजनी ने भी जब ये आवाज सुनी जो उनके घर की तरफ आती हुआ महसूस हुई तो दोनों ही बड़े मायूस होके खाट से उठे और रजनी बोली- बाबू लगता है कुछ गांव के लोग इतनी रात को आपसे मिलने आ रहे हैं, अभी मुझे जाना होगा।

उदयराज मायूस होते हुए- हाँ बेटी, देखता हूँ क्या मामला है।

रजनी खुद उदास हो गयी थी, थोड़ी दूर जाके वो वापिस पलटी और फिर एक बार भाग के अपने उदास बाबू की बाहों में समा गई, उदयराज रजनी को एक बार फिर बड़ी शिद्दत से चूमने लगा, रजनी ने सिसकते हुए उसे रोका- बाबू वो लोग अब ज्यादा ही नजदीक आ गए हैं, थोड़ा सब्र करो अब, फिर आऊंगी कल।

इतना कहकर रजनी उखड़ती सांसों से अपने बिस्तर की तरफ भाग गई और उदयराज उसे देखता रहा।
 
Update- 14

उदयराज रजनी को जाते हुए देखता रहा, फिर आकर अपनी खाट पर बैठ गया, तभी गांव के कुछ लोग जिसमे परशुराम भी था, हाथ में लालटेन लिए कुएं के सामने वाले रास्ते से उदयराज की तरफ आ गए, उसमे से कुछ लोग रो भी रहे थे। उदयराज उन्हें देखकर खाट से उठकर उनके पास आया।

उदयराज- क्या हुआ परशुराम? इतनी रात को कैसे आना हुआ? क्या हुआ आखिर, सब ठीक तो है।

परशुराम- मुखिया जी हमे माफ करना जो इतनी रात को आपके पास आना पड़ा, बिरजू है नही वो किसी काम से 1 दिन के लिए बाहर गया है, हमे मजबूरन अब आपके पास आना पड़ा, क्योंकि अब आप ही सहारा हो, परशुराम हाथ जोड़े खड़ा था।

उदयराज- अरे! कोई बात नही, मेरे पास नही आओगे तो किसके पास जाओगे, ऐसा मत बोलो, आखिर बात क्या है ये बताओ।

तभी शम्भू और एक दो आदमी उदयराज के पैरों में गिर पड़े और रोने लगे, हमे बचाओ मुखिया जी, हमारी रक्षा करो, आखिर क्यों ऐसा हो रहा है हम लोगों के साथ, कहाँ जाएं हम कैसे बचें इस समस्या से।

उदयराज- उठो! उठो शम्भू रोओ मत, आखिर क्या बात है खुल के साफ साफ बताओ।

परशुराम- मुखिया जी आप तो जानते ही थे कि शम्भू के घर में उसके तीन बेटों में से दो की तबियत पिछले हफ्ते बिगड़ी थी और आज देखो अभी कुछ देर पहले उनकी मौत हो गयी, इसी तरह लखन के घर में भी दो मौत हुई है, और वो सब रोने लगते हैं।

उदयराज ये सुनकर सन्न रह जाता है, ये क्या हो रहा था उसके गांव में, लोग वैसे स्वस्थ दिखते थे, बस कुछ होता, बीमार पड़ते और कुछ हफ्तों में मर जाते।

शम्भू- मुखिया जी हम तो इलाज़, और झाड़ फूक करा करा के थक गए थे पर कुछ नही पता चला, कब तक हम अपनों को ऐसे खोते रहेंगे, कब तक?

उदयराज उन सबको सांत्वना देता है और तुरंत रजनी और काकी को सारी बात बता कर उन लोगों के घर जाने लगता है।

रजनी को भी सुनकर काफी चिंता हो जाती है, काकी भी हैरान हो जाती है ये सुनकर।

उदयराज उन लोगों के घर जाता है तो देखता है कि चार लोगों की लाशें एक जगह रखी हुई होती है, घर के लोग रो बिलख रहे थे, वो भी बेचैन हो जाता है और उसकी भी आंखें नम हो जाती है, ये समस्या उसके control में नही थी, वो भी बस अन्य लोगों की तरह सांत्वना दे सकता था, करे भी क्या? वो काफी सोच में डूब जाता है।

पूरे गांव में शोक की लहर फैल जाती है।

आखिर मरे हुए लोगों को अंतिम संस्कार के लिए ले जाया जाता है और अगले दिन गांव के कुल वृक्ष के नीचे एक बैठक रखने का फैसला होता है, गांव का कुल वृक्ष नदी के पास था वह एक पवित्र बहुत बड़ा बरगद का वृक्ष था उसके नीचे काफी बड़ी चौकी बनी हुई थी।

उदयराज रात भर वहीं रहता है उन लोगों के साथ, आखिर वो मुखिया था उसे अपना कर्तव्य भी निभाना था।

सुबह उदयराज अपने घर आया तो उसने काकी और रजनी को आज की होने वाली बैठक के बारे में जानकारी दी, काकी ने बोला की वो भी बैठक में शामिल होगी।

उदयराज ने देखा कि रजनी की आंखें लाल थी तो वो उससे पूछ बैठा- रजनी बिटिया, तुम्हारी आंखें लाल है, मेरी बिटिया की इतनी सुंदर आंखें लाल हों ये मुझे मंजूर नही, तुम रात भर सोई नही न, क्यों?

रजनी- जिस बेटी के बाबू रात भर अपना फर्ज निभाने के लिए जाग रहे हों वो इतनी खुदगर्ज़ तो नही है न बाबू की सो जाए, मैं आपकी बेटी हूँ, और अब मुझे आपके बिना नींद नही आएगी (ये अंतिम लाइन उसने धीमे से कहा)

उदयराज- मुझे अपनी बेटी पर नाज़ है, पर तुम अभी दिन में आराम कर लेना, मैं और काकी बैठक में जा रहे हैं कुछ देर में आएंगे।

रजनी और उदयराज कुछ देर तक एक दूसरे को तरसते हुए देखते रहे फिर अपने आपको जैसे तैसे संभाल लिया, क्योंकि अभी का वक्त गमहीन था

रजनी ने दोनों के लिए नाश्ता बनाया, उदयराज और काकी ने नाश्ता किया और चले गए।

बैठक में सभी बड़े बुजुर्ग शामिल हुए, बहुत ही गमहीन माहौल था, बिरजू भी आ चुका था, वो उदयराज के बगल में बैठा था।

कुछ देर तक सब चुप ही थे फिर लखन बोला- मुखिया जी इस समस्या का हल कुछ तो होगा, आखिर ऐसा क्या है हमारे गांव में, क्यों हम अपनों को खो रहे हैं धीरे धीरे? हमारी संख्या कितनी कम हो गयी है, अपनो को खोने का दुख तो आपने भी झेला है।

बिरजू- लखन तुम्हारा दर्द केवल तुम्हारा नही है, ये पूरे गांव, पूरे कुल का है, हम सभी ने अपनों को खोया है, और खो रहे हैं, जबकि हमारे गांव में हमारे कुल के लोगों में लेश मात्र भी न तो कोई गलत भावना है, न गलत नीयत है, न वो गलत करते हैं, इतने ईमानदार, सही, सच्चे, प्रकृति के अनुरूप चलने वाले लोग हैं हम, फिर भी न जाने नियति हमसे क्या चाहती है। लेकिन हम सब मिलकर इसका हल निकालेंगे, की आखिर ऐसा क्यों हो रहा है?

उदयराज अभी चुप रहकर सुन ही रहा था वह मन ही मन बिरजू की इस बात से झेंप जाता है।

एक बुजुर्ग महिला बोली- लेकिन जिस का हल हमारे बड़े बुजुर्ग लोग, जो एक पीढ़ी इस दुनिया से चली गयी वो नही निकाल पाई तो हम कैसे निकालेंगे, और इसका हल होगा क्या?

अब उदयराज बोला- हां बात तो ये बिल्कुल सही है, की इसका हल हम जैसे आम इंसान के पास नही होगा, होगा तो किसी सिद्ध पुरुष, किसी महामुनि, या किसी दैवीय पुरुष के पास ही होगा।

इतने में थोड़ी दूर बैठी एक अत्यंत बूढ़ी स्त्री बोली- उदय बेटा, एक उम्मीद की किरण तो है।

उदयराज और बिरजू- हां अम्मा बोलो न, क्या उम्मीद की किरण है जो हमारी समस्या को हल कर सकती है।

बूढ़ी स्त्री- हमारे गांव से दक्षिण की तरफ करीब 300 किलोमीटर दूर एक जंगल है जहां एक सिद्ध पुरुष आदिवासियों के साथ रहते हैं करीब यही 8, 10 साल से, उसके बारे में ज्यादा तो नही पता पर इतना ही जानती हूं कि वो कोई विदेशी पुरुष थे जो हमारे देश में तपस्या कर सिद्धियां प्राप्त करने आये थे, उन्होंने कई लोगों की बहुत सी समस्याओं का समाधान किया है, उन्होंने उस जंगल के आदिवासियों को बहुत बड़ी मुसीबत से निकाला था, इसलिए वो आदिवासी अब उन्हें ही अपना राजा मानते हैं और उस सिद्ध महात्मा पुरुष की पूजा करते है, वो महात्मा उन आदिवासियों की सेवा से इतने खुश हुए की वो अब उन्ही के साथ रहते हैं जंगल के बीचों बीच उस महात्मा का आश्रम है और आदिवासी जंगल के बाहर तक पहरा देते हैं, कोई आम इंसान इतनी आसानी से बिना आज्ञा के जंगल के भीतर भी नही जा सकता, मैं बस इतना ही जानती हूं, परंतु ये कहना चाहती हूं कि, और जानकारी पता करके हमे अपनी फरियाद लेके उनके पास जाना चाहिए क्या पता कोई रास्ता निकाल आये।

बिरजू- लेकिन अम्मा आपने तो अभी कहा कि आम आदमी इतनी आसानी से उनसे नही मिल सकते तो इतने सारे लोग एक साथ अगर जाएं तो नामुमकिन ही होगा मिलना।

बूढ़ी स्त्री- हां जाना तो एक दो लोगों को ही पड़ेगा, सबका मुमकिन नही।

बिरजू- हां तो मैं चला जाऊंगा।

उदयराज- (बिरजू के कंधे पर हाँथ रखते हुए) बिरजू मेरे भाई, मुखिया होने के कुछ काम मुझे भी कर लेने दे, मेरे सारे काम तू ही करेगा तो आने वाली पीढ़ी मुझे धिक्कारेगी, क्या मैं सिर्फ नाम का मुखिया हूँ, ये काम मैं ही करूँगा।

बिरजू- तो फिर मैं और आप चलते हैं।

उदयराज- नही बिरजू, तू यहीं रह गांव की देख रेख कर, वहां आने जाने में 2 3 दिन तो लगेंगे ही इस बीच गांव में कोई मुख्य जिम्मेदार इंसान तो होना चाहिए न। तू यहीं रह, मैं चला जाऊंगा।

गांव के और लोगों ने उदयराज के साथ जाने की जिद की परंतु उदयराज ने सबको रोक दिया, बैठक समाप्त हुई, यह निर्णय हुआ कि उदयराज उस दैवीय पुरुष से मिलने जाएगा।
 
Update- 15

बैठक समाप्त हुई, सब लोग अपने अपने घर आ गए, उदयराज और काकी भी घर आ गए, लगभग शाम हो गयी थी। रजनी अपने बाबू और काकी को देखके खुश हो गयी और पीने के लिए पानी लायी, उदयराज भी रजनी को देखकर एक पल के लिए सब भूल गया, वो उसे कुछ देर के लिए देखता रहा, रजनी अपने बाबू की आंखों में बेसब्री और इंतज़ार देखकर थोड़ा मुस्कुरा दी और इशारे से थोड़ा सब्र और धीरज रखने को बोली फिर उदयराज हाथ मुँह धोकर फ्रेश हुआ और द्वार पर खाट पे बैठ गया।

रजनी- बाबू लो, पानी पियों, बताओ क्या हुआ बैठक में कोई हल निकला?

उदयराज और काकी ने पानी पीते हुए रजनी को सब बताया।

रजनी- अपने अकेले वहां जाने का निर्णय ले लिया और गांव वालों ने आपको आसानी से अकेले जाने के लिए सहमति जता दी।

उदयराज- अरे नही बेटी, ऐसा नही है, बिरजू तो सबसे पहले बोला कि मैं जाऊंगा, मैंने ही उसे मना किया फिर वहां बैठे हर लोग साथ जाने के लिए तैयार थे परंतु वहां बहुत सारे लोग जा नही सकते, इसलिए मुखिया होने के नाते मैं ही वहां जाऊंगा।

रजनी- अपने मना किया और गांव वाले आसानी से मान गए, कोई भी ऐसा नही निकला जो जिद पकड़ के बैठ जाता कि कुछ भी हो हम अपने मुखिया को अकेले नही जाने देंगे, माना कि आप मुखिया हो और ये आपका फ़र्ज़ है पर गांव वालों का भी तो फ़र्ज़ है कि वो अपने मुखिया को अकेले न छोड़ें। आखिर आप जा तो वहां हमारे कुल, हमारे गांव की समस्या के लिए ही रहे हो न बाबू।

उदयराज- नही बेटी गांव वालों पे संदेह न कर मेरी बिटिया, एक भी इंसान वहां मेरे साथ जाने के लिए पीछे नही हटा, मैंने ही रोका उन्हें।

रजनी- पर आपने ये कैसे सोच लिया कि आपकी अपनी ये बेटी आपको अकेला जाने देगी, मैं आपको वहां अकेला हरगिज नही जाने दूंगी, आपके सिवा कौन है मेरा, न जाने कैसा रास्ता होगा, कितना वक्त लगेगा, कभी उस तरफ कोई गया नही, कितना दुर्गम रास्ता होगा, न जाने वो लोग कैसे होंगे, जब आप खुद बता रहे हो कि वो महात्मा आदिवासियों के बीच रहता है तो ऐसे आदिवासियों के बीच मैं आपको हरगिज़ अकेले नही जाने दूंगी, न जाने रास्ते में कहां कहां रुकना पड़े, कब तक आप अकेले बैलगाड़ी चलाओगे, कहाँ ठहरोगे, क्या खाओगे, क्या पियोगे, किसी भी कीमत पर मैं आपको अकेला नही छोड़ सकती, इतना कहते हुए रजनी रुआँसी हो गयी।

उदयराज ने उठकर रजनी को काकी के ही सामने बाहों में भर लिया- ओह्ह मेरी बेटी, मैं अब क्या बोलूं, लेकिन एक छोटी बच्ची को लेके तेरा मेरे साथ जाना क्या ठीक होगा?

रजनी- कुछ भी हो, मैं उसे भी ले चलूंगी, पर मैं आपको अकेले नही जाने दूंगी।

काकी को भी रजनी की बात ठीक लगी, उदयराज का एक ऐसी जगह अकेले जाना ठीक नही था, और उदयराज ने ये फैसला किया था कि ये काम केवल मुखिया के हांथों ही होगा तो कम से कम मुखिया के घर वाले तो जा ही सकते है उसके साथ, किसी भी इंसान का बिल्कुल अकेले जाना ठीक नही, बात यह नही थी कि उन आदिवासियों से कोई डर था क्योंकि वो तो एक महात्मा के रक्षक थे वो भला किसी को नुकसान क्यों पहुचायेंगे बल्कि बात ये थी कि रास्ता लंबा है, अकेले बैलगाड़ी चलाते चलाते वो थक जाएगा तो एक प्यारी सी गोद चाहिए जिसपर सर रखके वो आराम कर ले, भूख लगेगी तो कोई प्यारे प्यारे हांथों से खाना खिला दे, धूप में चलते चलते थक जाए तो अपनी जुल्फों तले छाया दे दे, और ये सब काम कोई पुरुष नही बल्कि स्त्री ही कर सकती थी और रजनी से अच्छा तो कोई कर ही नही सकता था।

उदयराज भी रजनी का साथ छोड़ना नही चाहता था, वो चाहता था कि वो जहां भी रहे उसकी बेटी उसके साथ हो।

काकी- तो मैं यहां अकेले क्या करूँगी, मेरा भी तो फ़र्ज़ है कि मैं अपनी बेटी को अकेले न छोडूं, आखिर उसके साथ छोटी सी बच्ची है मैं रहूंगी तो उसको संभाले रहूँगी, कोई दिक्कत नही होगी, आखिर मुझे भी मेरा फ़र्ज़ पूरा करने दो, मुझे भी साथ ले चलो।

उदयराज- परंतु काकी, यहां घर का और जानवरों के ख्याल रखने के लिए कोई तो चाहिए।

काकी- उसके लिए मैं बिरजू और उसकी बेटी नीलम को बोल देती हूं, जानवरों का ध्यान रख लेंगे वो।

उदयराज - ठीक है फिर, मैं खुद बिरजू को बोल देता हूँ, पर एक बात मेरे मन में है कि मुझे अपने मित्र, रजनी के ससुर बलराज को भी ये घटना और हमारा ये निर्णय लेना सूचित करना चाहिए, आखिर वो मेरे मित्र हैं, उन्हें कुछ पता नही है अभी तक, बाद में पता चलेगा कि हमने इतना बड़ा निर्णय लिया है तो शायद उन्हें बुरा लगेगा, आखिर उन्होंने रजनी को मेरी सेवा के लिए उम्र भर यहां छोड़ दिया, उनका कितना बड़ा त्याग है, मुझे उन्हें बताना चाहिए।

रजनी- हां बाबू जरूर, ससुर जी को बता दीजिए, ये आपने सही कहा।

उदयराज ने तुरंत एक संदेशवाहक को भेज के बलराज को अपने घर आने के लिए आग्रह किया, बलराज ने संदेश वापिस भिजवाया की वो एक घंटे में उनके घर आ रहा है। इधर काकी बिरजू के घर जाके उसको और उसकी बेटी नीलम को जानवरों की देखभाल की जिम्मेदारी दे आयी, बिरजू तो काकी को देखके हाथ जोड़के खड़ा हो गया और बोला- काकी ये क्या बोल रही हो, आपको तो बोलने की भी जरूरत नही, आखिर उदय भैया हम सब लोगों के लिए ये कर रहे है, क्या हमारा इतना भी फ़र्ज़ नही, आप बेफिक्र रहिए।

नीलम को मन ही मन रजनी के इस निर्णय पर की वो अपने बाबू के साथ जरूर जाएगी, नाज़ होता है, वो सोचती है कि रजनी कितनी भाग्यशाली है जो हर वक्त अपने बाबू के साथ रहती है जैसे उनकी ही जीवनसंगिनी हो, ये सोचते हुए वो भी अपने बाबू बिरजू की तरफ देखने लगती है, और मुस्कुरा देती है। एक तो उस दिन शेरु और बीना की चुदाई देख जो खुमारी और नशा चढ़ा था वो उतरा नही था, ऊपर से रजनी का अपने बाबू के प्रति प्रेम नीलम पर भी असर कर रहा था वो भी अपने बाबू को न जाने क्यों बार बार देखती रहती थी छुप छुप कर। चुदाई की लालसा मन में बैठ गयी थी, उसका अब मायके में मन नही लग रहा था क्योंकि ससुराल में होती तो पति से चुदती पर यहां कौन उसे कस कस के चोदेगा? बूर ने उसकी बगावत कर रखी थी, बस वो उसे समझाए ही जा रही थी और अब उसका मन बदल रहा था, उसे अपने बाबू पर प्यार आ रहा था धीरे धीरे। रिझाना तो वो चाहती थी अपने बाबू को पर डरती बहुत थी, क्योंकि अभी ये सब एकतरफा ही था, बिरजू को इसकी आहट भी नही थी।

थोड़ी देर में उदयराज के घर से सामने कुएं के पास सड़क पर एक तांगा आके रुका, बलराज उसमे से उतरा, उदयराज ने देखते ही आगे बढ़के अपने समधी का स्वागत किया, रजनी घर में चली गयी जल्दी से और एक लाल रंग की साड़ी पहन कर घूंघट डाल कर दोनों के लिए पानी लेकर आई और अपने ससुर के पैर छुए,

बलराज- जुग जुग जियो बहू।

रजनी- पिताजी आप कैसे हैं।

बलराज- मैं ठीक हूँ बहू, तुम कैसी हो।

रजनी- मैं भी ठीक हूँ और आपकी पोती भी ठीक है, रजनी अपनी बेटी को ला के ससुर की गोद में दे देती है और वो उसे खिलाने लगता है। फिर रजनी को दे देता है। रजनी अंदर चली जाती है।

उदयराज और बलराज बातें करने लगते है उदयराज बलराज को सारी बातें बताता है, बलराज उसके निर्णय से बहुत खुश होता है कि आखिर वो उदयराज जैसे इंसान का मित्र और समधी है जिसे अपने गांव और कुल की जीवन रक्षा की इतनी चिंता है और उसे अपनी बहू पर भी नाज़ हुआ।

बलराज- तो कब निकलोगे वहां के लिए।

उदयराज- सोच रहा हूँ कल सुबह जल्दी ही निकल जाऊं।

बलराज- मैं भी चलना चाहता हूं तुम्हारे साथ मित्र।

उदयराज- नही मित्र, अभी तो मुझे ही जाने दो, आगे फिर कभी जरूरत पड़ी या दुबारा जाना हुआ तो बताऊंगा, वैसे भी वहां ज्यादा लोगों का जाना ठीक नही।

बलराज- ठीक है मित्र, जैसा तुम्हे ठीक लगे। तो फिर मुझे आज्ञा दो जाने की।

उदयराज- अरे! ऐसे कैसे, आज रात रुको कल सुबह जाना, कितने दिनों बाद तो आना हुआ है, ऐसे तुरंत नही जाने दे सकता मैं तुम्हे। रुको अभी सुबह चले जाना। लेटो आराम करो।

बलराज जाने की कोशिश करता है पर उदयराज उसे आज रात रुकने के लिए बोल देता है।

बलराज- ठीक है मित्र, फिर बिस्तर पर लेटकर दोनों बातें करने लगते है।

अंधेरा हो चुका था रजनी खाना बनाने लगती है, खाना बनने के बाद सबने खाना खाया फिर सब सो जाते हैं, सुबह उदयराज रजनी और काकी जल्दी उठकर सारी व्यवस्था करते है जाने की, रजनी नाश्ता तैयार करती है, काकी रास्ते के लिए कुछ राशन पानी रखने लगती है और उदयराज बैलगाड़ी तैयार करने लगता है, सारी व्यवस्था होने के बाद गांव वालों को सूचित किया जाता है कि वो अब निकल रहे हैं, नाश्ता करके बलराज भी अब घर जाने के लिए तैयार हो जाता है फिर गांव वाले इकठ्ठे हो जाते है सबलोग मिलकर उदयराज, रजनी और काकी को विदा करते है, बलराज भी अपने घर चला जाता है, उदयराज बैलगाड़ी चला रहा होता है और रजनी और काकी पीछे बैठे होते है, बैलगाड़ी के ऊपर छत भी होती है जिससे धूप न लगे, अभी तो खौर सूर्य भी नही निकला था जब वो लोग निकले।

सब गांव वाले चले जाते है परंतु नीलम और बिरजू वहीं खड़े जब तक बैलगाड़ी ओझल नही हो जाती देखते रहते हैं

नीलम- बाबू, रजनी कितनी खुशनसीब है न।

बिरजू- क्यों बिटिया, क्या हुआ?

नीलम- देखो न हर वक्त अपने बाबू का ख्याल रखती है।

बिरजू- हां ये तो है, पर खुशनसीब तो मेरी बिटिया भी है, क्या वो अपने बाबू का ख्याल नही रखती, बिल्कुल रखती है।

नीलम खुशी से झूम उठती है, और अपने बाबू के साथ घर की तरफ चलने लगती है।

 
Update-16

नीलम और बिरजू अपने घर आ जाते हैं, उस वक्त सूर्य भी नही निकला था बिरजू एक बार फिर अपने बिस्तर पे लेट जाता है और उसकी आंख लग जाती है, नीलम घर में जाके कुछ काम करने लगती है और सोचती है कि आज उसको गेहूं धोना है, मां ने बोला था कल ही गेहूं धो देना घर में आटा खत्म हो गया है, गेहूं धो कर छत पे फैला देना धूप में सूखने के लिए।

उसकी माँ थोड़ी बूढ़ी हो गयी थी वो घर का ज्यादा काम नही कर पाती थी, सब जानते थे कि नीलम की माँ की उम्र उसके बाप बिरजू से ज्यादा थी, उनके बाप दादाओ ने उस वक्त आपसी प्यार और जानपहचान होने की वजह से उम्र का अंतर होने पर भी शादी कर दी थी, इसलिए बिरजू अभी काफी जवान हष्टपुष्ट था पर नीलम की माँ ढल गयी थी।

सर्य निकल गया, बिरजू उठा और फ्रेश होकर नीलम से बोला- नीलम बेटी, मैं जरा घास लेने जा रहा हूँ, आज थोड़ी ज्यादा घास लानी होगी, उदय भैया की भैसों के लिए भी लाना होगा, बैल तो वो ले गए हैं, यहां पे जो गाय और भैंस हैं उनके लिए चारा ले कर आता हूँ।

नीलम- हां बाबू ठीक है, पर एक काम करो न, अपने घर के पीछे जो बजरी बोई है न उसमे काफी घास हो गयी है, उसी खेत में से काट लो, दूर न जाओ बाबू, बहुत घास है उसमें।

बिरजू- ठीक है बेटी, जाता हूँ वहीं और घर के पीछे की तरफ खेत में चला जाता है।

नीलम के घर के बिल्कुल पीछे बांस (bambooo) लगाया हुआ था और उसके पीछे खेत था, बांस इतने बड़े और लंबे लंबे थे कि पूरे छत को cross करके ऊपर तक फैले हुए थे।

नीलम ने भी घर में आके गेहूं धोना स्टार्ट कर दिया, धो धो कर बाल्टी में रखकर ऊपर छत पर फैलाने के लिए ले जाने लगी, छत पे पहुंच कर उसने छत पे ही खाट बिछाई और उसपे चादर डाल दिया फिर गेहूं उस खाट पे पलट कर हाँथ से फैलने लगी कि तभी उसको अपने बाबू बिरजू नीचे थोड़ी दूर खेत में घास काटते दिखाई दिए, सूर्य की रोशनी उनपर पड़ रही थी, सांवला बदन चमक रहा था, नीलम गेहूं फैलाना रोक कर बांस की ओट से कुछ देर देखती रही, ऐसा लग रहा था कि वो अपने बाबू की दीवानी हो रही है, प्यार हो रहा है उसे अपने बाबू से ही,

घास काटते हुए बिरजू को जरा भी ये अहसास नही था कि उसी की जवान शादीशुदा बेटी उसे निहार रही है, उस पर आसक्त हो रही है, दिल दे बैठी है वो उसे, कुछ चाहती है वो उससे, किस्मत खुलने वाली है उसकी। बड़े ही लालसा भारी और उम्मीद भारी नजरों से नीलम छुप छुप कर अपने बाबू को ताड़ रही थी, कभी शर्मा कर गेहूं फैलाने लगती कभी रुक कर फिर देखने लगती।

मन में सोच रही थी कि काश उसके बाबू उसकी मंशा जान लेते, कितना मजा आया होगा बीना को उस वक्त जब वो अपने पिता से चुदवा रही थी, क्यों है इतना नशा इस रिश्ते में? और छुप छुप के घर में ही हो तो कितना मजा आ जाये, पर न जाने मेरे बाबू कब ध्यान देंगे की उनकी बेटी अब उनसे क्या चाहती है, मुझे तो अपने ही बाबू से प्यार होता जा रहा है, क्या सोचेगी दुनिया अगर किसी को पता चल गया तो, खैर सोचे जो सोचे मुझे किसी की परवाह नही, भाड़ में जाये मान मर्यादा, बस मेरे बाबू मेरे हो जाएं, ससुराल भी न जाऊं मैं तो फिर, बहाने कर कर के यहीं रहूँगी।

कितना मन कर रहा है मेरा मिलन करने का, कैसे मैं रिझाऊं बाबू को, कैसे बताऊं उन्हें, किससे अपनी मन की व्यथा कहूँ, रजनी भी नही है जाने कब आएगी, लेकिन मैं रजनी से कहूंगी जरूर की वो कोई रास्ता या तरीका बताये, मैं जानती हूं वो इसे गलत नही कहेगी, वो मेरी बचपन की सहेली है, मेरी मन की व्यथा को समझेगी, क्योंकि उस दिन वो भी बीना और शेरु की चुदाई मजे से देख रही थी। अगर वो बाप बेटी के इस मिलन को गलत मानती तो उस दिन बीना और शेरु को चुदाई शुरू करने से पहले ही पत्थर मारकर भगा देती, या खुद उठकर भाग जाती, पर वो देखती रही, इसका मतलब वो इसे गलत नही मानती, हाय! रजनी जल्दी आ जा मेरी सहेली, अब तुझसे कुछ बात करना है मुझे। (मन में ही ये सब सोचे जा रही थी और कभी कभी मुस्कुरा उठती)

न जाने ऐसा क्यों हो रहा है, मेरे बाबू मेरे मन में उस रूप में बसते जा रहे है, पहले मैं उनको बस पिता की नजर से ही देखती थी पर अब मैं उनमे एक मर्दाना पुरुष ढूंढ रही हूं, ये सब उस दिन बीना और शेरु की चुदाई देखकर ही हुआ है, उन दोनों ने मेरा नजरिया बदल दिया है। काश मेरे बाबू मेरी प्यास बुझा देते। काश! कितना मजा आ जाता, हाय!... काश!

यही सब सोचते हुए वो गेहूं फैलाये जा रही थी, फिर वो नीचे गयी और गेहूं की दूसरी बाल्टी ले आयी, उसने दूसरी खाट डाली और उस पर एक और चादर डाला और गेहूं की बाल्टी खाट पे अभी पलटी ही थी कि उसने अपने बाबू की तरफ देखा।

बिरजू घास काटना छोड़ कर बांस की तरफ आ रहा था, नीलम को थोड़ा आश्चर्य हुआ कि बाबू बांस की तरफ क्या करने आ रहे हैं वो थोड़ा साइड में छिप सी गयी, बांस की ओट थी जिससे बिरजू उसे नही देख सकता था, वहां से बिरजू नीलम को साफ दिखाई दे रहा था, पर बिरजू को नीलम नही दिख सकती थी क्योंकि वो ऊपर छत पर बांस की ओट में थी।

एकाएक बिरजू ने दोनों साइड नजर घुमाई और पीछे देखा की कहीं कोई देख तो नही रहा, पर उसकी नज़र ऊपर नही गयी, फिर एकदम से बैठकर अपनी धोती साइड कर, मोटा, काला और लंबा लंड जो सुस्त अवस्था में भी लगभग 7 इंच लंबा था, बाहर निकाल लिया, नीलम अवाक सी रह गयी अपने ही बाबू का काला विशाल लंड देखकर, नीलम की तो सांसे ही हलक में अटक सी गयी, शर्म से वो लाल हो गयी, हाय दैय्या! बोलकर उसने एक बार इधर उधर देखा कि कहीं कोई मुझे ये देखते हुए न देख ले, फिर उसने छत पे बनी सीढ़ियों की तरफ देखा कि कहीं कोई ऊपर तो नही आ रहा, फिर पीछे होकर बांस की ओट से अपने बाबू का मदहोश कर देने वाला लंड देखने लगी।

बिरजू ने लंड की आगे की चमड़ी को आधा पीछे किया जिससे लंड का आधा सुपाड़ा बाहर दिखने लगा जो कि किसी मध्यम आकार की गुलाबी गेंद जितना बड़ा था।

नीलम मंत्रमुग्ध और बदहवास सी हो गयी, उसकी सांसे उखड़ चुकी थी, वो एक टक बिरजू के लंड को निहार रही थी।

तभी बिरजू ने पेशाब की धार छोड़ दी, और लंड की आगे की चमड़ी को मूतते हुए पूरा पीछे खींच दिया, पूरा का पूरा गुलाबी सुपाड़ा बाहर आ गया, इतना मोटा और बड़ा सुपाड़ा देख नीलम पागल सी हो गयी। धूप में चमकते काले मोटे लंड का हल्का गुलाबी सुपाड़ा गज़ब ही ढा रहा था, छत पर से कुछ दूरी होने पर भी नीलम लंड के आगे का छेद साफ देख पा रही थी और उसमें से निकलती पेशाब की धार ने उसे मदहोश कर दिया, कुछ ही पल में वो पसीने पसीने हो गयी।

बिरजू की इस तरह लंड की चमड़ी पीछे खींचकर पेशाब करने की आदत थी, पर उसकी इस आदत ने आज नीलम को मदहोश कर दिया था। एक तो वो वैसे ही चुदासी थी ऊपर से नियति ने उसे वही लंड दिखा भी दिया जिसके बारे में वो मन में अक्सर सोचती थी कि कैसा होगा, आज नियति ने साक्षात् दिखा ही दिया था कि जैसे कह रही हो ले देख ले अपने बाबू का लंड, यही तुझे अब चोदेगा, यही प्यास बुझायेगा, यही तेरी गहराई में उतरेगा।

पर कब? इसने तो अब प्यास और बढ़ा दी थी, बूर पनिया गयी नीलम की, किसी भी तरह से उसके पति का लन्ड उसके बाबू के लन्ड के आगे टिक नही सकता था।

अपने बाबू का लंड देखकर ही नीलम मचल उठी, मानो वह उसे अपनी बूर की गहराइयों में अंदर तक घुसता हुआ महसूस कर रही हो और शर्म से एक पल के लिए वहीं बैठ गयी, थोड़ी सांसे थमी तो उठी तब तक बिरजू मूत चुका था उसने अपने लंड को हल्का सा दो चार बार हिलाया ताकि पेशाब की बची बूंदें गिर जाएं और मदहोश कर देने वाले लंड को धोती के अंदर कैद कर वापिस घास काटने चला गया।

उसे जरा भी आभास नही हुआ कि उसकी सगी बेटी ने उसका लंड देख लिया है।

नीलम कुछ देर वहीं फिर से बैठ गयी, अपनी सांसों को काबू करती रही, बार बार बाबू का लन्ड नज़रों में आ जाता, कि वो कैसा था कितना बड़ा और मोटा था और उसका खुला हुआ आगे का हिस्सा hhhhhaaaaaiiiiiii.

सोचने लगी कि अब कुछ भी हो वो अपने बाबू को पा के रहेगी, वो ये जानती ही थी कि उसकी माँ अब बूढ़ी हो चली हैं तो बाबू तो प्यासे ही होंगे, और वो तो लंड देखके ही समझ गयी थी कि प्यासा तो है उनका लंड। पानी छोड़ छोड़ के उसकी पूरी पैंटी गीली हो गयी थी पर करे क्या? कैसे भी करके अपने मन को धीरज दिया, समझाया, फिर सोचने लगी आखिर हम बेटियां अपने बाबू को सुख क्यों नही दे सकती, बचपन से लेकर जवानी तक वो पुरुष, पिता के रूप में उसे पलता है, पोषता है, उसकी हर तरह से रक्षा करता है, और जब कभी वो पुरुष यौनसुख के लिए तरसने लगे तो क्या बेटी का फर्ज नही की वो अपनी अनमोल चीज़ (बूर) अपने उस पुरुष को परोस दे जिसने हमेशा उसकी रक्षा की हो, क्या उस चीज़ पर उसका कोई हक नही? क्यों करे वो लोक लाज की फिक्र, आखिर वो उन्ही के अंग से बनी है और वही अंग अगर उसमें मिल गया तो क्या गलत हो जाएगा और अगर हो भी जाएगा तो होता रहे।

यही सब सोच ही रही थी कि उसकी माँ की आवाज उसके कानों में पड़ी जो उसे बुला रही थी, उसने बाल्टी उठायी और सीधा नीचे भाग गई।
 
Update-17

बैलगाड़ी सुबह की सुहानी हवा को चीरती हुई अपने लक्ष्य को आगे बढ़ती जा रही थी, उदयराज बैलगाड़ी हांक रहा था, रजनी और काकी पीछे बैठी बातें करती हुई जा रही थी।

कहीं कहीं रास्ते में आते जाते लोग दिख जा रहे थे। गांव से वो अब काफी दूर आ चुके थे, गांव की सरहद काफी पीछे छूट चुकी थी, सुबह की हल्की सुहानी धूप अब थोड़ी गर्म होने लगी थी, लगभग 100 किलोमीटर चलने के बाद अब हल्का हल्का जंगल शुरू हो रहा था, पेड़ों की घनी छाया से सफर काफी सुहाना हो गया था, काकी कुछ देर रजनी से बात करने के बाद रात में जागे होने की वजह से ऊँघने लगी तो रजनी ने उन्हें वही लेटने को बोल दिया, और वो वहीं लेट कर सोने लगी।

बैलगाड़ी के ऊपर गोल छत बनाई हुई थी, दोनों तरफ पर्दे थे, काकी ने बच्ची को अपने पास लिटाया और सो गई, उदयराज हसीन वादियों को निहारता हुआ बैलगाड़ी हाँके जा रहा था, मन ही मन वो अपने इस निर्णय पर खुश भी था कि उसकी बेटी उसके साथ है पर इन हसीन वादियों का मजा वो अपनी बेटी के साथ लेना चाहता था, यही हाल रजनी का था।

उदयराज ने पीछे देखा तो पाया कि रजनी उसे बैलगाड़ी हांकते हुए देख रही थी, नजरें मिली तो दोनों मुस्कुरा पड़े।

तभी रजनी को कुछ सूझा

रजनी- बाबू, लाओ मैं बैलगाड़ी चलाती हूँ, कब से चला रहे हो थक गए होगे।

उदयराज- (आश्चर्य से) बैलगाड़ी चलाएगी मेरी बिटिया?

रजनी- हां क्यों नही।

उदयराज- पर तुमने कभी चलाई नही है न।

रजनी- तो सिखा दो न अपनी बेटी को।

उदयराज - तो आओ न मेरे आगे बैठो। काकी सो गई क्या?

रजनी- हां वो तो सो रही है, और गुड़िया भी उन्ही के पास है।

उदयराज जहाँ बैठा था वहीं पर थोड़ा पीछे खिसक कर अपने आगे थोड़ी जगह बनाता है और दोनों पैर फैला लेता है रजनी एक बार पीछे की तरफ काकी को देखती है और जाके उदयराज की गोदी में अपनी मदमस्त चौड़ी मखमली गुदाज गांड रखकर बैठ जाती है, बैलगाड़ी जंगल में प्रवेश कर चुकी थी, जंगल की घनी छाया अब धूप को खत्म कर चुकी थी।

उदयराज ने अपनी दोनों बाहें रजनी की दोनों बाहों के नीचे से निकालते हुए डोरी और छड़ी को पकड़ लिया और अपना चेहरा रजनी के गर्दन की दायीं तरह और कान के पास रखकर उसके बदन से आती मदमस्त खुश्बू को एक गहरी सांस लेते हुए सूंघा, अपने बाबू की गर्म सांसे अपनी गर्दन और कान के आस पास महसूस कर रजनी गनगना गयी और उसकी आंखें मस्ती में बंद हो गयी और सिसकते हुए फुसफुसाकर बोली- कोई देख लेगा बाबू?

उदयराज (धीरे से)- यहां अब जंगल में कौन देखेगा?

रजनी ने बनावटी अंदाज में कहा- काकी उठ गई तो?

उदयराज- वो तो सो रही है न।

रजनी- हां, पर उठ गई तो? (रजनी ने फिर सिसकते हुए कहा)

उदयराज अब गर्दन के दूसरी तरफ अपनी बेटी के कान के आस पास उसके बदन से भीनी भीनी आती खुसबू को सूंघने लगा, कभी कभी वो अपने गीले होंठों को गर्दन पे रगड़ने लगता, फिर सूंघता, फिर होंठ रगड़ता, रजनी तो इतने से ही बेहाल हुए जा रही थी, कभी धीरे से सिसकती तो कभी aaahhhhhh की आवाज थोड़ा तेज उसके मुह से निकल जाती।

उदयराज- अब तुम जोर से aaaahhhh करोगी तो काकी तो उठ ही जाएंगी न।

रजनी ने अपने मदमस्त आंखें खोल अपने बाबू की आंखों में देखते हुए धीरे से बोला- क्या करूँ बाबू, इसपर मेरा कोई बस नही, इतना प्यार करोगे अपनी बेटी को तो aaaahhhh तो निकल ही जाएगी न।

रजनी- अच्छा! रुको जरा बाबू!

रजनी ने इतना कहते हुए बैलगाड़ी के ऊपर बने हुए गोल छपरी के मुहाने को ढकने के लिए बनाए गए पर्दे को, जो कि मोड़कर ऊपर किया हुआ था उसको नीचे पटलकर ढंक दिया।

अपनी बेटी की इस अदा और तरीके पर खुश होके उदयराज ने एक चुम्बन उसके गाल पे जड़ दिया, रजनी के मुँह से सिसकी निकल गयी वो धीरे से बोली- सिखाओ न बाबू बैलगाड़ी चलाना।

उदयराज ने रजनी को एक हाँथ से डोरी पकड़ने को बोला और दूसरे हाँथ से छड़ी।

उदयराज- अपने बैल तो सीधे साधे हैं बस ये डोरी सीधे पकड़े रहो ये अपने आप चलते रहेंगे और जब दाएं या बाएं मुड़ना हो तो उसी हिसाब से डोरी को खींचो, बस यही है।

रजनी- अच्छा! इतना आसान है, (और रजनी दोनों बैल की डोरी पकड़कर छड़ी हाँथ में लेकर चलाने लगती है।)

उदयराज- हां मेरी बिटिया रानी, इतना ही आसान है, ये कठिन तब होता है जब बैल सीधे साधे न हों (ऐसा कहते हुए अब उदयराज अपनी बाहों को रजनी के कमर पर लपेटते हुए रजनी को कस के पीछे से बाहों में भर लेता है जिससे रजनी उदयराज से बिल्कुल चिपक जाती है)

उदयराज धीरे धीरे रजनी के पेट और उसके आस पास सहलाने लगता है।

रजनी एक बार फिर बैलगाड़ी चलाते हुए अपनी बाबू की आंखों में देखकर मुस्कुराते हुए सिसक गयी।

जंगल में अब वो काफी अंदर आ गए थे और छाया काफी गहरी हो चली थी, अभी तक तो उदयराज को रास्ता पता था इसके आगे का रास्ता उसे बताये अनुसार तय करना था, जंगल में कहीं कहीं और रास्ते भी मिलते जिससे भटकने का डर था पर उदयराज बताये अनुसार सूझबूझ से जा रहा था, उसने सोचा कि आगे चलकर जंगल में अगर कोई दिखेगा तो एक बार रास्ते के बारे में पूछताछ करके पक्का कर लेगा। उसने सोचा था कि आधा रास्ता तय करने के बाद कहीं रुकेंगे आराम करने के लिए।

उदयराज ने रजनी के पेट, कमर को दोनों हांथों से सहलाते हुए अपने हाँथ अब धीरे धीरे ऊपर चूची की तरफ बढ़ने लगा, रजनी को इसका अहसास हो गया, वो अपने बाबू की अगली मंशा को जान गयी।

एकाएक उदयराज ने अपनी दोनों हथेली अपनी बेटी रजनी के भारी उन्नत मखमली उरोजों पर रख दिये और एक प्रगाढ़ चुम्बन उसके बाएं गाल पर लेते हुए साथ ही दोनों चुचियों को पूरा पूरा हथेली में भरते हुए मसल दिया।

रजनी- uuuuiiiiiiimaaaaaaa, iiiiiiissssshhhhh bbbaaaaabbbbuuu,

धीरे धीरे, काकी देख लेंगी तो (रजनी ने बनावटी अंदाज़ में बोला)

उदयराज जोश में आकर कई ताबड़तोड़ चुम्बन रजनी के दोनों गालों पर जड़ने लगा, और धीरे धीरे मोटी मोटी चुचियों को सहलाने और दबाने लगा, चुचियों को कभी वो हथेली में लेकर थोड़ा रुककर उन्हें बहुत हौले हौले सहलाता जैसे उन्हें नाप रहा हो, तो कभी तेज तेज मसलता, कभी दोनों हांथों की तर्जनी उंगली और अंगूठे से दोनों मोटे मोटे तने हुए निप्पल को मसलता, हल्का दबाता, कभी कपड़े के ऊपर से ही निप्पल के अग्र भाग पर तर्जनी उंगली से गोल गोल घुमाता।

रजनी का तो बुरा हाल हो गया, बैलगाडी चलाना तो अब उसके बस का रहा नही, आंखें बंद हो जा रही थी उसकी नशे में, चूचीयाँ दबाए जाने से उसमे से दूध रिसने लगा था और नीचे दोनों जांघों के बीच मक्खन जैसी बूर भी रिसने लगी। कहीं बैलगाड़ी दूसरे रास्ते पर न चली जाए इस डर से रजनी कभी कभी मजबूरी में आंख खोल कर देख लेती पर अपने बाबू की हरकतें फिर उसे आपार यौन सुख सागर में गोते लगाने पर मजबूर कर देती।

उदयराज को तो जैसे होश ही नही था, वो तो बैल सीधे साधे थे वरना बैलगाड़ी रास्ते से उतर जाती जरूर।

इतने में रजनी की बेटी उठ जाती है, भूख लगी थी उसको, उसकी आवाज से काकी भी उठ जाती है।

रजनी फट से उठकर अपने को संभालते हुए पीछे आ जाती है और उदयराज एक हाँथ से धोती में बन रहे अपने तंबू को adjust करता है और दूसरे हाँथ से डोरी पकड़कर बैल हांकने लगता है।
 
Update-18

रजनी बैलगाड़ी में बनी छपरी मे आ गयी और काकी के गोदी से बेटी को लिया और दूध पिलाने के लिए सूट ऊपर करके जैसे ही बायीं चूची को एकाएक बाहर निकाला, काकी निप्पल से रिसते हुए दूध को देखकर मुस्कुरा दी, हल्के से दबाव से ही एक दो बूँदें अब भी निकल जा रही थी, जैसे किसी ने जमे हुए दही को मथ दिया हो और वह रिस रिस कर बह रहा हो।

रजनी भी मुस्कुरा दी

काकी- अपने बाबू के पास बैठी थी क्या?

रजनी- हां काकी, बैलगाड़ी चलाना सीख रही थी।

काकी- सीख लिया।

रजनी- हां, बहुत आसान है।

काकी- सिर्फ बैलगाड़ी ही चलाई (काकी में छेड़ते हुए कहा)

रजनी- हां....तो और क्या करूँगी। काकी आप भी न।

काकी हंसते हुए - कुछ देखा न मैंने इसलिए।

रजनी- क्या?

काकी- तेरे निप्पल रस बरसा रहे थे।

रजनी- धत्त काकी आप भी न, क्या क्या सोचती और बोलती हो, अब गुड़िया नही पी पाएगी सारा दूध तो रिसेगा ही न।

काकी- जरूरी थोड़ी है कि केवल गुड़िया ही दूध की भूखी है क्या पता कोई और भी हो? (काकी ने चुटकी लेते हुए कहा)

रजनी का चेहरा शर्म से लाल हो गया, शर्म की तरंगें चेहरे पर दौड़ गयी।

रजनी- अब बस भी करो काकी, वो बाबू है मेरे, आपको तो हर वक्त मस्ती सूझती रहती है इस उम्र में भी, बड़ी बदमाश को आप।

काकी हंसने लगी फिर बोली- अरे बाबा मैं तो मजाक कर रही थी। अच्छा ये बता चलते चलते काफी देर हो गयी है न, हमे कहीं रुकना चाहिए अब, जंगल के अंदर वक्त का पता नही चल रहा है लेकिन मेरे ख्याल से 1 या 2 बज गए होंगे, बैल भी बिचारे चलते चलते थक गए होंगे उनको भी आराम चाहिए होगा।

रजनी- हां काकी मुझे तो भूख भी लग आयी।

काकी- वो तो मुझे भी लगी है, रुक मैं उदयराज से पूछती हूँ, बोलती हूँ उसको कहीं रुकने को।

उदय! ओ उदय! अरे कहीं रुकना नही है क्या तुझे, बस चलते ही जा रहा है, थोड़ा बैलों को भी आराम दे, तू भी आराम कर।

उदयराज- हां काकी रुकता हूँ, थोड़ा सही जगह देख रहा हूँ, लगभग आधे रास्ते तो पहुचने वाले हैं शायद, रुकता हूँ।

रजनी- हां बाबू रुको न अब कहीं।

उदयराज- हां बिटिया जरूर।

उदयराज बैलगाड़ी चलाये जा रहा था लगभग 2 किलोमीटर आगे जाने के बाद उन्हें एक झोपड़ी दिखी, उस झोपड़ी के आगे और घना जंगल दिख रहा था, उदयराज को थोड़ी उम्मीद जगी की हो न हो इसमें कोई तो होगा, इतने घने जंगल में अगर यहां झोपड़ी है तो कोई तो रहता होगा।

उदयराज ने वहां पँहुच कर बैलगाडी रोकी, काकी और रजनी भी झोपड़ी देख थोड़ी खुश हुई पर बैलगाडी से अभी नही उतरी। उदयराज थोड़ा आगे बढ़ा तो वहां उसे एक बुढ़िया दिखी जो लकड़ियां इकट्ठी कर रही थी, उनकी उम्र काफी थी।

उदयराज को देखते ही वो लकड़ियां छोड़ छड़ी लेकर उठते हुए बोली- कौन? इस घने जंगल में बैलगाड़ी से कौन आया है? कौन हो तुम?

उदयराज- माता जी प्रणाम, मैं विक्रमपुर गांव का मुखिया उदयराज हूँ।

बूढ़ी औरत- प्रणाम पुत्र, यहां जंगल में कैसे? अकेले आये हो?

उदयराज- माता जी मैं अकेला नही हूँ मेरे साथ मेरा छोटा सा परिवार भी है, मैं अपने गांव की एक समस्या के हल की खोज में किसी के द्वारा बताए गए मार्ग पर हूँ, चलते चलते थक कर जब मैंने कहीं रुकने का मन बनाया तभी आपकी कुटिया मुझे नज़र आई और मैं यहां चला आया।

बुढ़िया- अच्छा किया जो यहां चले आये, आओ पहले बैठो पानी पियो, और कौन है तुम्हारे साथ?

उदयराज- मेरी बेटी, और काकी है।

बूढ़ी औरत- मेरा नाम सुलोचना है और मैं यहां अपनी बेटी पूर्वा के साथ रहती हूं।

उदयराज थोड़ा हैरत से- आप इस जंगल में अपनी बेटी के साथ अकेले कैसे रह लेती हो?, और यहां रहने की जरूरत क्यों पड़ी?, क्या आप यहीं की हो या कहीं से आकर बसी हो? उदयराज ने एक साथ कई सवाल कर दिए।

सुलोचना- पुत्र पहले बैठो पानी पियो फिर सब बताऊंगी, पूर्वा! ओ पूर्वा, बेटी सुन, देख कोई आया है बैलगाड़ी से।

पूर्वा- हां अम्मा, आयी

घर के अंदर से पूर्वा आयी और सुलोचना ने उसे बैलगाड़ी के अंदर बैठी रजनी और काकी को बुला कर लाने के लिए कहा।

पूर्वा ने उदयराज को देखते ही प्रणाम किया

उदयराज- प्रणाम बेटी

पूर्वा गयी और उसने रजनी और काकी को प्रणाम किया और ले आयी।

रजनी, काकी और उदयराज को मन ही मन बड़ी राहत मिली कि चलो ऐसे नेक लोग मिले और ऐसी जगह मिली इस जंगल में जहां थोड़ा रुककर विश्राम कर सकते हैं

काकी और रजनी ने सुलोचना को प्रणाम किया।

सुलोचना- ये आपकी बेटी है।

उदयराज- हां, माता जी, इसका नाम रजनी है।

सुलोचना- परम सूंदरी है तुम्हारी कन्या।

रजनी शर्मा गयी

उदयराज- और ये मेरी काकी, इन्होंने ही रजनी को पाला पोशा है।

सुलोचना- अच्छा!.....पूर्वा सबको अंदर ले जाओ और विश्राम कराओ।

पूर्वा- जी अम्मा, (और वो काकी और रजनी को कुटिया में ले गयी)

सुलोचना- पुत्र तुम आओ यहां बैठो, पानी पियो।

उदयराज ने हाँथ मुह धोया पानी पिया। फिर उसने बैलगाड़ी से बैलों को खोल कर बड़ी रस्सी से पेड़ से ऐसी जगह बांध दिया जहां काफी घास थी बैल भूखे थे, घास चरने लगे।

उदयराज आकर सुलोचना के पास बैठ गया।

सुलोचना- पुत्र इतना तो मेरा अनुमान है कि तुम उस महात्मा पुरुष के पास जा रहे हो जो घने जंगल में आदिवासियों के साथ रहते हैं।

उदयराज- हां माता जी अपने ठीक समझा, पर आप हमें आगे का रास्ता अच्छे से समझा दे तो बहुत महेरबानी होगी।

सुलोचना- हां हां, क्यों नही पुत्र, ये तो हमारा कर्तव्य है। देखो इस जगह जहां ये कुटिया है यहां से सिंघारो जंगल की सीमा शुरू होती है जो कि बहुत विशाल है।

उदयराज- सिंघारो जंगल नाम है इसका।

सुलोचना- हां, ये जंगल काफी बड़ा है, कई जंगली जानवर भी हैं इसमें, जो कि कभी कभी बाहर तक भी आ जाते हैं, आम इंसान के लिए इसके अंदर जाना मुश्किल भरा हो सकता है, क्योंकि जितना डर जंगली जानवरों का नही है उससे ज्यादा डर बुरी आत्माओं का रहता है जो इंसान को डरा और भटका देती हैं

उदयराज- तो फिर माता जी, कैसे होगा, हमारे साथ तो एक छोटी सी गुड़िया भी है, हमने तो सोचा था कि सरल रास्ता होगा, जाना है और मिलकर आ जाना है, पर ये तो रास्ता ही बहुत कठिन है, कैसे होगा? मेरी बेटी रजनी सही कहती थी कि न जाने कैसा रास्ता हो? उसकी बात सच निकली।

सुलोचना- तू घबरा मत पुत्र, हर समस्या का हल होता है, जरा सोच इस समस्या के हल के लिए ही तो नियति ने तुम्हे मुझसे मिलाया।

उदयराज- क्या मतलब? मैं समझा नही।

सुलोचना- इस खतरनाक सिंघारो जंगल में कोई भी आम आदमी बिना किसी तंत्र मंत्र के सहारे नही जा सकता, इसके लिए उसको तंत्र मंत्र से सिद्ध की हुई ताबीज़ को अपने साथ रखना होगा ताकि रास्ते में कोई परेशानी न हो।

उदयराज- पर अब ये ताबीज कहाँ मिलेगी।

सुलोचना- वो तुम्हे मैं तंत्र मंत्र द्वारा सिद्ध करके दूंगी पुत्र, लेकिन इसके लिए मुझे एक रात का समय चाहिए होगा, अगर तुम मेरी बात मानो तो अब धीरे धीरे शाम होने को आई है, अभी लगभग आधा रास्ता तुम पार कर चुके हो आधा बाकी है, तुम यहीं रात भर रुको, खाना पीना खाकर विश्राम करो, कल सुबह तक मैं तुम सबके लिए ताबीज़ तैयार कर दूंगी और हो सके तो मैं तुम लोगों के साथ उन महात्मा के आश्रम तक भी चलूंगी अगर तुम चाहोगे तो।

क्योंकि मुझे वहां जाने में कम समय लगता है, मुझे वहां जाने के छोटे रास्ते पता है और मैं नही चाहती कि तुम लोग अकेले इधर उधर भटकते हुए जाओ, मैं रहूँगी तो समय की बचत हो जाएगी।

उदयराज उनके सामने हाथ जोड़ कर बोलता है- न जाने मैंने पिछले जन्म में क्या पुण्य किये होंगे जो आप मुझे माँ के रूप में इस कठिन यात्रा में न केवल मेरा मार्ग दर्शन करने के लिए मिल गयी बल्कि स्वयं मेरे साथ चल रही है।

सुलोचना- ये तो मेरा फ़र्ज़ है पुत्र, एक दुखी इंसान ही दूसरे दुखी इंसान की पीड़ा को समझ कर उसकी मदद कर सकता है और कोई नही, तुम्हारे मुख से माँ सुनकर मुझे मेरे पुत्र की याद आ गयी।

उदयराज- मैं भी तुम्हारा पुत्र ही हूँ माँ, ईश्वर ने शायद आज इस जंगल में तुम्हे मेरी माँ बनाकर ही मिलाया है, भला मुझे किसी बात का क्यों ऐतराज होगा, आप मेरी मदद ही तो कर रही हैं, मैं चाहूंगा कि आप भी मेरे साथ चलें, और मैं रात भर रुकने के लिए तैयार हूं।

सुलोचना- हां ठीक है पुत्र, अब तुम विश्राम करो और जब रात में सब लोग खाना पीना खा लेंगे तब मैं हवन करके मंत्र जगाऊंगी और ताबीज़ तैयार कर दूंगी, उसके लिए मुझे जंगल से कुछ दैवीय जड़ी बूटियां इकट्ठी करनी पड़ेगी।

उदयराज- तो क्या आप रात्रि का भोजन नही करेंगी।

सुलोचना- नही पुत्र, अब ताबीज़ तैयार होने के पश्चात ही मैं भोजन करूँगी। यही नियम है।

उदयराज- आप हमारे लिए कितना कष्ट झेल रही है इस उम्र में माता।

सुलोचना- अब तुमने मुझे माँ कहा है तो माँ का फर्ज है ये, इसमें कष्ट कैसा, और ये तो मेरी आदत है।

उदयराज- अच्छा आप ये तंत्र मंत्र कैसे जानती हैं, आपको देख के लगता भी है जैसे कि आप कोई सिद्धि प्राप्त स्त्री हैं। आपने अपने बारे में कुछ बताया नही।
 
Update-19

सुलोचना- पुत्र जिस तरह तुम्हारा हरा भरा गांव विक्रमपुर है ठीक वैसे ही हमारा गांव था, हमारा भी एक घर था, हंसी खुशी जिंदगी बीत रही थी पर मेरे पति को साधना, मंत्र जागृत करना, झाड़ फूक में माहिर बनना, इन सबमें बहुत रुचि थी, और इसी की खोज में वो हमेशा लगे रहते थे, घर गृहस्थी चलाने पर, धन अर्जित करने पर उनका कोई ध्यान नही था, एक बार बड़ा तांत्रिक बनने के चक्कर में अज्ञानी, पाखंडी, झूठे गुरुओं के चक्कर में आकर वो घर छोड़ कर चले गए, और गलत साधना कर बैठे बुरी आत्माएं उनपर हावी हो गयी और वो पागल हो गए, जंगल में भटकते भटकते उनकी मौत हो गयी।

मैं अपने पति से बहुत प्यार करती थी इसलिए मैंने ये प्रण किया कि मैं उनके अधूरे सपने को पूरा करूँगी और स्वयं घर छोड़कर अपनी बेटी पूर्वा को लेकर एक सच्चे, दिव्य पुरुष की तलाश में निकल पड़ी, जो मुझे सही साधना की विधि बताकर उसमे सफल बनायें।

उदयराज- तो आपके पति का सपना क्या था?

सुलोचना- मेरे पति का सपना था कि वो एक सही सच्चे तांत्रिक बनकर जन मानस की सेवा करें।

उदयराज- ये तो बहुत नेक और अच्छा विचार था उनका।

सुलोचना- हाँ, पर शुरू में उन्होंने कभी किसी से इसका जिक्र नही किया, क्योंकि उन्हें लगता था कि लोग उनपर हसेंगे, लोग ताने देंगे अगर वो सफल नही हुए तो, इसलिए उन्होंने सोचा था कि जब सफल हो जाऊंगा तब ही सबको बताऊंगा और गुपचुप तरीके से करने के लिए घर छोड़ दिया था पर गलत लोगों के हांथों में पड़कर वो गलत दिशा में चले गए और आज इस दुनिया में नही हैं।

उदयराज- तो आपको वो सच्चा सही गुरु कौन मिला जिसने आपको सही दिशा देकर आपके प्रण को सफल बनाया।

सुलोचना- वही, जिसके पास तुम जाना चाहते हो।

उदयराज- क्या?

सुलोचना- हां, तुमने सही सुना, तुम सही जगह जा रहे हो, तुम्हारी समस्या जो भी हो उसका समाधान वही कर सकते हैं, तुम्हारे मन में अगर अब भी कोई दुविधा है तो मैं कहती हूँ उसे निकाल दो। क्योंकि मैं भी उनकी शिष्य हूँ।

उदयराज आश्चर्य से देखता रह जाता है।

उदयराज- जब आप उनकी शिष्या है और आपको सिद्धि भी प्राप्त है तो मेरी समस्या तो आप भी हल कर सकती हैं

सुलोचना- नही पुत्र, मैंने केवल एक साधना की है, उनके पास सैकड़ों शक्तियां हैं, वो दिव्य हैं, वो गुरु है, मैं इतनी शक्तिशाली नही, मैं तो बस छोटी मोटी तांत्रिक ही हूँ।

उदयराज- लेकिन अभी तक तो आपने मेरी समस्या सुनी भी नही, न ही मैंने आपको बताई, तो आप ये कैसे कह सकती हैं की आप इसका हल नही बता सकती।

सुलोचला- मैं तुम्हे देखकर अपने मंत्रों की शक्ति से ये तो जान सकती हूं कि तुम्हारी समस्या कठिन है या सरल पर मैं उसका हल नही बता सकती, और तुम्हारी समस्या बहुत जटिल है (थोड़ा रुककर) और अगर सरल भी होती तो भी मैं उसका हल नही बताती।

उदयराज चकित होकर- भला क्यों?

सुलोचला- क्योंकि यह नियति तय करती है कि किस चीज़ का समाधान कहाँ होना है, किस्से होना है, कब होना है, इंसान के हाथ में कुछ भी नही।

उदयराज के मन में कई सवाल उठ रहे थे

उदयराज- तो जब आप यहां नई नई आयी तो आपके पास तो कोई ताबीज़ नही होगी फिर आप उन तक कैसे पहुँची।

सुलोचला- उस वक्त वो सिंघारो जंगल में इतनी अंदर तक नही बसे थे, वो यहीं रहते थे।

हालांकि उदयराज के मन में काफी सवाल थे पर इस वक्त अब और सवाल करना उसने उचित नही समझा। उसने सोचा कि वो बाद में पूछेगा।

सुलोचना ने उदयराज को आराम करने को बोलकर जंगल में कुछ विशेष जड़ी बूटियां लेने पूर्वा को ये बोलकर चली गयी कि जल्दी खाना बना ले।

अंदर रजनी और पूर्वा मिलजुलकर खाना बनाने लगी वो अब तक एक पक्की सहेली बन चुकी थी।

काकी गुड़िया को लेकर बाहर आ गयी और उदयराज से बातें करने लगी।

खाना बनने के बाद सबने खाना खाया, सुलोचना ने केवल शहद का सेवन किया और फिर कुटिया में हवन करने बैठ गयी।

कुटिया के बाहर दायीं तरह एक छोटी छप्पर की कुटिया और थी जिसमे सब लेटे थे।

सबसे कोने में उदयराज लेटा था, उससे पहले रजनी, उससे पहले काकी और सबसे बाहर की तरफ पूर्वा की लेटी थी।

उन चारों में केवल काकी ही ऐसी थी जो बिस्तर पे पड़ते ही सो गई, बाकी न तो पूर्वा सोई थी, न ही रजनी और न उदय।

पूर्वा इसलिए जग रही थी क्योंकि सुलोचना को बीच में किसी भी चीज़ की जरूरत पड़ सकती थी।

अचानक उदयराज को अपने सीधे पैर के तलवों पर रजनी के अंगूठे का स्पर्श महसूस हुआ, जो उदयराज के तलवों पर अंगूठे को धीरे धीरे बड़े ही हौले हौले रगड़ रही थी।

उदयराज अपनी बेटी के इस आमंत्रण और तरीके पर कायल हो गया उसने रजनी की तरफ मुह घुमाया तो वो उसी की तरफ करवट करके लेटी थी।

बाहर जलती हुई मशाल की अंदर आती हुई हल्की हल्की रोशनी में दोनों एक दूसरे को देखकर मुस्कुरा दिए, फिर काफी देर तक एक दूसरे की आंखों में देखते रहे।

रजनी अपने अंगूठे से अपने बाबू के पैर के तलवों में गुदगुदी सी करती रही फिर उसने एक बार पीछे पलट के देखा और चुपके से हल्का सा उदयराज के और नज़दीक आ गयी।

उसके पीछे उसकी बेटी सो रही थी फिर उसके बाद काकी और फिर पूर्वा लेटी थी।

रजनी और उदयराज कुछ बोल नही रहे थे क्योंकि वो जानते थे कि पूर्वा जग रही है हालांकि उसकी पीठ उन लोगों की तरफ थी इस बात का उन्हें सुकून था।

अपनी सगी बेटी की तरफ से आमंत्रण पाकर उदयराज फूला नही समाया, और अब वह अपने पैर का अंगूठा रजनी के तलवों पे रगड़ने लगा, कभी रजनी उसे छेड़ती तो कभी वो रजनी को।

एकाएक उदयराज ने अपने पैर के अंगूठे को रजनी के पैर पर धीरे धीरे थोड़ा ऊपर करना चालू किया, रजनी को जैसे जैसे उसके बाबू का अंगूठा ऊपर आता महसूस हुआ उसने अपनी सलवार को पकड़कर ऊपर सरकाया ताकि उसके बाबू उसकी नग्नता को महसूस कर सकें पर सलवार एक लिमिट तक ऊपर आ सकती थी अब उसकी मोहरी टाइट हो गयी पैर में, तो रजनी ने हल्का सा जीभ निकालकर ठेंगा दिखाते हुए उदयराज को चिढ़ाया।

उदयराज मुस्कुरा दिया और फिर उसने बायां हाँथ रजनी के घुटनो पर रखा और धीरे धीरे सहलाता हुआ ऊपर की तरफ बढ़ने लगा, रजनी सिरह उठी, रजनी और उदय एक दूसरे की तरफ मुँह करके लेटे थे। रजनी ज्यादा सिसक नही सकती थी, ज्यादा क्या इस वक्त तो वो बिल्कुल आवाज नही कर रही थी।

उदयराज अपना हाथ जांघों तक लाया फिर कमर पे लाया और जब कमर से ऊपर बढ़ने लगा तो रजनी ने उसका हाथ पकड़कर चुपचाप सूट के अंदर डाल कर चुचियों को कपड़े के अंदर से छूने का इशारा किया न कि बाहर से।

अपनी बेटी की इस पहल और बेसब्री पर उदयराज झूम उठा।

उदयराज ने अपना हाथ चूचीयों की तरफ बढ़ाया, लेटने से पहले रजनी चुपके से ब्रा निकाल चुकी थी, जैसे ही उदयराज की उंगलियां अपनी सगी बेटी की मदमस्त मोटी सॉफ्ट सपंज जैसी चुचियों से टकराई वो दूसरी दुनिया में खो सा गया, निवस्त्र चुचियों को छुए उसे बरसों बीत गए थे, इतनी मस्त चूचीयाँ तो उसकी पत्नी की भी नही थी जितनी बेटी की थी

इस बात ने उसे रोमांचित कर दिया कि आज उसकी सगी बेटी ब्रा खोलकर उससे अपनी नग्न चूची दबवाना चाहती है।

अपने हथेली में एक चूची को पूरा भरकर उसकी नग्नता को उदयराज ने अच्छे से महसूस किया फिर हल्के हल्के दबाने लगा, रजनी के सॉफ्ट निप्पल कड़क होकर खड़े हो गए, दूध की हल्की हल्की बुँदे उदयराज की हथेली को गीला करने लगी, उदयराज अपनी तर्जनी उंगली निप्पल के किनारे किनारे गोल गोल घूमने लगा जिससे रजनी की हल्की सी सिसकी निकल ही गयी उसने तुरंत पलट के पीछे देखा पर सब ठीक था, इतने में उदयराज ने दो उंगलियों से निप्पल को पकड़कर हल्का हल्का दबा दिया, वह चाहता तो मसलना था पर वह ये भी जनता था कि रजनी के मुह से आवाज निकल सकती है जो कि अभी ठीक नही।

हल्का हल्का निप्पल को दबाने से उसमे से थोड़ा और दूध निकलने लगा तो उदयराज ने अपनी उंगलियों में लगा के उसे चाट लिया, ये देखकर रजनी अपनी बाबू की आंखों में देखने लगी, फिर धीरे से फुसफुसाके पूछा- बाबू भूख लगी है?

उदयराज धीरे से- बहुत, बरसों से।

रजनी (नशीली आंखों से देखते हुए) - अभी तो खाना खाया था न

उदयराज- मुझे इसकी भूख है।

रजनी- किसकी बाबू

उदयराज- दूध पीने की

रजनी- किसका दूध पियोगे बाबू

उदयराज- अपनी बेटी का

रजनी- oooohhhhh मेरे बाबू, सिर्फ पियोगे?

उदयराज- पहले देखूंगा, फिर पियूँगा..... दिखाओगी?

रजनी- क्या?

उदयराज- यही

रजनी- यही क्या बाबू?

उदयराज रजनी की आंखों में देखते हुए- "चूची, तुम्हारी चूची देखने का दिल कर रहा है" (उदयराज की आवाज ये बोलते हुए वासना में भारी सी हो गयी)

रजनी- uuuuuuffffffff, किसकी चूची बाबू।

उदयराज- अपनी सुंदर सलोनी बिटिया की।

रजनी- dhaaatttt गन्दू गंदे बाबू। कोई अपनी सगी बेटी की चूची देखता है।

उदयराज- कोई देखे न देखे मैं तो देखूंगा। किसी की बेटी इतना प्यार करने वाली भी तो नही है न।

रजनी- सच

उदयराज- हां, क्या मुझे दिखाओगी नही?

रजनी मुस्कुराकर अपने बाबू की आंखों में वासनामय होकर देखने लगी फिर पलटकर उसने एक बार पीछे देखा तो पूर्वा अपनी जगह पर नही थी शायद वो उठकर अपनी माँ की मदद के लिए गयी थी और उन्हें पता नही चला, रजनी को मौका मिल गया।

रजनी ने तुरंत अपना सूट ऊपर कर दाहिनी चूची को बाहर निकाल दिया, मोटी सी चूची सपंज की तरह उछलकर बाहर आ गयी, अपनी ही सगी बेटी की इतनी मदमस्त उन्नत तनी हुई सख्त चूची उदयराज की आंखों के सामने नग्न हो गयी थी, हल्की रोशनी में वो गोरी गोरी चूची की पूर्ण आभा तो नही देख सकता था पर जितना भी दिख रहा था उतने ने ही उदयराज के लंड को लोहा बना दिया।

इतनी मोटी चूची देख वो कुछ पल देखता ही रहा, उसकी खुद की बेटी ही कितनी मदमस्त यौवन की मलिका है, रजनी कभी अपने बाबू के चेहरे को देखती कभी मुस्कुरा देती और कभी पलटकर पीछे देखती की कहीं पूर्वा न आ जाये।

उदयराज ने वासना में थोड़ी कंपन करती हथेली को चूची पर दुबारा रखा और दबा दिया

रजनी सिसक उठी।

उदयराज अब पागलों की तरह चूची दबाने लगा तो रजनी सिसकते हुए बोली- बाबू अभी पी लो इसको जल्दी से, ज्यादा वक्त नही है, आ जायेगी वो।

उदयराज ने फट से मोठे तने हुए गुलाबी निप्पल जिसमे से दूध रिस रहा था मुह में भर लिया।

रजनी की तो नशे में आंखें ही बंद हो गयी, अपने बाबू के होंठ अपने निप्पल पर महसूस करके रजनी के मुह से aaahhh निकल गयी, पर उसने जल्दी से अपने को संभाला, उसे विश्वास ही नही हो रहा था कि उसके बाबू उसकी चूची पी रहे हैं, उदयराज बच्चे की तरह चूची भर भर के दूध पीने लगा, दूध की धार उसके बरसों से प्यासे गले को तर करती हुई पेट में जाने लगी। दूध के स्वाद में अलग ही लज़्ज़त और महक थी, जो उदय को दीवाना बना गयी।

अपनी सी सगी बेटी का दूध पीके वो जन्नत में था, लंड इतना सख्त हो गया था कि धोती फाड़ के अभी बाहर आ जायेगा। पर अभी उसने नीचे का हिस्सा दूर ही रखा था, शायद उसका अभी सही समय नही था या यूं समझ लीजिए लाज की एक डोर अभी भी जुड़ी हुई थी।

रजनी आंखें बंद किये बेसुध सी हो गयी थी, अपने बाबू को इस तरह अपनी चूची पीते हुए देख वो वासना से पगला सी गयी थी, उसकी चूची जितना हो सके उसके बाबू भर भर के पी रहे थे, इतना मजा उसे कभी अपने जीवन में नही आया, जितना आज उसे अपने बाबू के साथ आ रहा था, वासना और कामोन्माद में वो फिर अपने पैर अपने बाबू के पैरों से रगड़ने लगी और उससे रहा नही गया, खुद ही कस के अपने बाबू के बदन से लिपट गयी, उदयराज का सर किसी बच्चे की तरह रजनी की चुचियों के बीच था जिसमे से एक खुली थी एक सूट के अंदर थी।

उदयराज ने हथेली में चूची को भरा हुआ था और पिये जा रहा था उसका एक हाथ दूसरी चूची पर गया मानो वो कह रहा हो इसको भी खोलो।

रजनी ने बड़ी मुश्किल से पीछे मुड़कर देखा तो उसको पूर्वा के आने की आहट हुई, वो बोली- बाबू अब बस करो, बर्दाश्त नही होता, बाद में पी लेना, वो आ रही है।

उदयराज ने चूची पीना छोड़ अपनी बेटी की आंखों में देखा फिर एक बार चूची को देखा और फिर सूट को खुद ही नीचे सरका दिया इतने में पुर्वा आ गयी। दोनों कुछ देर ऐसे ही लेटे रहे एक दूसरे की आंखों में देखते हुए मुस्कुरा दिए, रजनी ने पीछे मुड़कर देखा और फिर धीरे से सीधी होकर लेट गयी, साँसे उसकी अभी तक तेज चल रही थी, उदयराज थोड़ा पीछे होकर लेट गया।
 
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