Incest पाप ने बचाया - Page 10 - SexBaba
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Incest पाप ने बचाया

Update- 70

नीलम और महेन्द्र लालटेन की रोशनी में कागज में लिखा बिरजू का जवाब पढ़ने लगे, कागज मे बिरजू ने लिखा था-

" बेटी हिम्मत तो नही हो रही ऐसा कदम उठाने की, ये एक बाप और बेटी दोनों के लिए ही बहुत शर्म की बात है क्योंकि ये पाप ही नही महापाप है समाज की नज़र में गलत है, समाज इसको स्वीकार नही करेगा। परंतु जब बेटी की इच्छा की पूर्ति के बारे में सोच रहा हूँ तो न जाने क्यों सबकुछ ताक पर रखकर इसको अंजाम देने से खुद को नही रोक पा रहा हूँ, दिल बार बार यही कह रहा है कि माना कि ये गलत है, महापाप है, पर बेटी की इच्छा भी तो कुछ मायने रखती है, एक पिता का फर्ज होता है कि वो अपने बच्चों की इच्छा की पूर्ति करे, कम से कम जो उसके सामर्थ्य में है वो तो करे ही, कभी कभी कुछ इच्छाएं ऐसी होती हैं जो हमे आनेवाली जिंदगी में लगने वाले लांछन से बचाती हैं, शुरू में भले ही वो गलत लगे पर उसके दूरगामी सकारात्मक लाभ होते हैं और फिर मन ये कहता है कि चोरी तो हर कोई करता है पर चोर वही होता है जो पकड़ा जाता है, इस दुनियां में जो आया है वो कहीं न कहीं कभी न कभी जाने अनजाने में छोटा या बड़ा पाप करता ही है, तो फिर अपनी ही बेटी की इच्छा पूर्ति के लिए अगर ये पाप का कदम उठाना पड़े तो मैं इससे पीछे कैसे हटूं, आखिर मेरी बेटी मुझे इतना चाहती है कि वो मेरी सीरत को एक नई जिंदगी में पिरोकर इस दुनियां में लाना चाहती है, उसे संजो कर रखना चाहती है तो ये मेरे लिए उसका अगाढ़ प्रेम दर्शाता है वरना आजकल बेटियां कहाँ ऐसा सोचती हैं, मैं कितना भाग्यशाली हूँ जो मुझे तुम जैसी बेटी मिली, जो मेरी निशानी चाहती है, फिर सोचता हूँ कि ये पापकर्म अगर हमेशा गुप्त रहेगा तो पता ही किसको चलेगा और मेरी बेटी की इच्छा पूर्ति भी हो जाएगी, एक बार किसी अच्छे कर्म के लिए गुप्त रूप से किया गया पाप स्वीकार है मुझे, एक बार करने में कोई बुराई नही है इसलिए तुम सो जाना मैं रात को आऊंगा पलंग पर। पर ये ध्यान रखना की कभी तुम्हारी अम्मा को ये पता न लगे कि हमने एक रात मिलकर इस पाप को किया था, ये राज सिर्फ हमेशा हमारे ही बीच रहेगा, बस बेचैनी इस बात की हो रही है कि मुझे तुम्हे एक स्त्री के रूप में ग्रहण करने में अपार ग्लानि हो रही है, कैसे कर पाऊंगा मैं ये सब, जो मेरी बेटी है मेरी सगी बेटी उसके साथ वो सब जो एक पुरुष स्त्री के साथ करता है, पर मैं करूँगा, जैसे भी हो करूँगा, एक बार ही तो करना है, बेटी की खुशी के लिए करना पड़ेगा तो करूँगा और मुझे माफ कर देना दामाद जी, गुप्त रूप से तुम्हारी सहमति को मैं समझ रहा हूँ, तुम सच में घर गृहस्ती को समझने वाले इंसान हो, घरगृहस्थी को बांधकर कैसे चलाया जाता है अपनों की खुशियों के लिए उसमें कैसे कैसे समझौते करने पड़ते है ये तुम्हे अच्छे से आता है इस बात को मैं अब तुम्हारी इस मौन स्वीकृति को देखते हुए समझ गया हूँ, तुम वाकई में समझदार इंसान हो, वरना छोटी छोटी बातों को लेकर लोग बखेड़ा खड़ा कर देते है, अपनो की ही जिंदगी छीन लेते है सिर्फ छोटी छोटी बातों पर ही, उस हिसाब से तो ये बहुत बड़ा पाप है जिसको तुमने मौन स्वीकृति दी है, और मैं ये भी जनता हूँ कि तुम मेरा सामना नही कर पाओगे और न ही मैं इसलिए कमरे में अंधेरा ही रखना, मैं आऊंगा कुछ देर में। मुझे माफ़ कर देना।"

(बिरजू ने जानबूझ कर अंतिम लाइनों में अपने दामाद की बड़ाई कर दी थी ताकि उसे ये लगे कि वो एक महान इंसान है)

नीलम ने कागज को मोड़कर अपनी मुट्ठी में ले।लिया और मारे शर्म से अपना चेहरा अपने घुटनों में छुपाकर बैठ गयी, महेन्द्र ने उसे संभाला और बोला- मैं तो डर रहा था की बाबू जी कहीं गुस्से से लाल पीले होकर हमें ही न डांट लगा दें, पर सच में आज मैंने उन्हें अच्छे से जाना है कि वो कैसे इंसान हैं, सच में वो तुमसे बहुत प्यार करते हैं, मैं तुम्हारी मन स्थिति समझ सकता हूँ नीलम पर अब आगे बढ़ो, चलो लालटेन बुझा दो सोते हैं।

नीलम कुछ नही बोली कागज को उसने तकिए के नीचे घुसा दिया और लालटेन बुझा कर आई पलंग पर लेट गयी, कमरे में गुप्प अंधेरा हो गया, पलंग काफी चौड़ी थी तीन लोग अगर फासला बनाकर सोएं तो बीच में एक एक हाँथ का फासला बनता था।

महेन्द्र बायीं तरफ लेटा था नीलम ज्यादा से ज्यादा महेन्द्र की तरफ लेटी थी, आधे से लगभग थोड़ा ज्यादा पलंग खाली थी, नीलम ने ऐसा जानबूझ के किया ताकि महेन्द्र को लगे कि ओ शर्म से गड़ी जा रही है, कैसे अपने बाबू की ओर लेटे?

महेन्द्र और नीलम बहुत देर चुप करके लेटे रहे महेंद्र ने नीलम को बाहों में भर लिया नीलम चुपचाप महेन्द्र की बाहों में आ गयी, दोनों पलंग पर ऐसे गुपचुप लेटे थे मानो डर के मारे पलंग में दुबके हों, किसी जंगल में सुनसान भूतिया हवेली के किसी कमरे में पलंग पर दुबके एक दूसरे को एक दूसरे का सहारा बनते हुए ढांढस बंधा रहे हो, और मिन्नतें कर रहे हों कि वो भूत इस कमरे में न आ जाये, हे ईश्वर हमे बचा लो, उनको देखकर तो ऐसा ही लग रहा था पर वास्तव में नीलम तड़प तड़प कर अपने बाबू का अंदर से इंतज़ार कर रही थी और महेन्द्र शर्म से गड़ा जा रहा था, नीलम तो बस दिखावा कर रही थी।

महेंद्र ने नीलम के गालों पर पप्पियाँ लेनी शुरू कर दी तो नीलम थोड़ा कसमसाई और बोली- अभी रुको न, जल्दी भी क्या है, बाबू को आ जाने दो, उनको सो जाने दो तब कर लेना जो करना हो।

महेन्द्र- बाबू यहां सोने के लिए थोड़ी आएंगे।

नीलम- वो तो मैं भी जानती हूं, इसलिए तो शर्म आ रही है।

महेन्द्र- आओ तुम्हारी शर्म दूर कर देता हूँ।

ऐसा कहकर महेंद्र ने नीलम को और कस के बाहों में भर लिया और उसके गालों और होंठों को चूमने लगा, महेन्द्र का लन्ड धीरे धीरे उठने लगा, पर न जाने क्यों नीलम को महेन्द्र के साथ वो मजा नही आ रहा था, उसे तो प्यास थी अपने बाबू की, ऊपरी मन से वो बस महेन्द्र को हल्का हल्का सहला रही थी, महेन्द्र नीलम पर अपना नियंत्रण करने की कोशिश कर रहा था दरअसल जब वो नीलम को अपनी बहन सुनीता समझ कर चूमता तो उसे अत्यधिक उत्तेजना होती और जब वह बाबू के बारे में सोचता कि अभी वो कमरे में आएंगे तो थोड़ा ठंडा पड़ जाता पर उससे रहा नही गया तो उसने नीलम के कान में कहा- दीदी.....ओ मेरी दीदी

नीलम समझ गयी कि क्या चीज़ महेन्द्र को उत्तेजित कर रही है उसने भी धीरे से फुसफुसाकर कहा- भैया......मेरे भैया जी।

महेन्द्र- दीदी.......दोगी मुझे आज

नीलम- क्या भैया......

महेन्द्र ने झट से नीलम की दहकती बूर जो अपने बाबू का इंतज़ार कर रही थी उसपर हाँथ रखकर पूछ बैठा जिससे नीलम थोड़ा चिहुँक गयी- ये.......ये चाहिए मुझे दीदी

नीलम हल्का सा सिसक गयी और महेन्द्र को रिझाने के लिए बोली- बहन के साथ गलत काम करोगे, कोई भाई अपनी बहन की वो मांगता है भला, पाप है ये।

महेन्द्र- बहन हो तो क्या हुआ, मैं तुम्हे चाहता हूं, तुमसे प्यार करता हूँ, अब अपनी बहन से ही प्यार हो गया है तो क्या करूँ।

नीलम- अपनी ही सगी बहन से कोई भला वो वाला प्यार कर बैठता है, भाई बहन का प्यार तो पवित्र होता है।

महेन्द्र- मैं जानता हूँ दीदी पर बहन भी तो एक लड़की, एक स्त्री ही होती है न और भाई एक पुरुष तो अगर किसी की बहन का सम्मोहित सा करने वाला बदन उसके भाई का मन मोह ले और वो उसे उस रूप में चाहने लगे तो उसमे भाई का क्या दोष..... बोलो दीदी

नीलम ने बहन का रोल अदा करते हुए अपने पति महेन्द्र से बोला- बात तो भैया आप ठीक कह रहे हैं पर समाज इसको मानेगा नही न, समाज की नजर में ये अनैतिक कार्य है, ये पाप है, एक स्त्री और पुरुष में प्यार तब होता है जब उनका मन एक दूसरे के प्रति आसक्त हो जाता है और मन के साथ साथ जब तक तन न मिले तो प्यार पूर्ण नही होता और भाई और बहन समाज के सामने शादी तो कर नही सकते तो वो अपने प्यासे तन को मिलाएंगे कैसे? जैसे भाई अपनी बहन पर आसक्त हो सकता है वैसे बहन भी अपने भाई पर आसक्त हो सकती है पर वो दोनों समाज के डर से अपने तन बदन को नही मिला सकते, ये पाप है, मन तो चुपके चुपके मिला सकते है क्यूंकि किसी के मन में झांककर तो कोई नही देख रहा पर भाई बहन को आपस में अपना तन मिलाते हुए किसी ने देख लिया तो अनर्थ हो जाएगा भैया.....अनर्थ।

महेन्द्र ये सुनकर खुश हो गया और धीरे से बोला- दीदी एक बात पुछूं?

नीलम ने सुनीता बनकर बोला- हाँ मेरे भैया बोलो न।

महेन्द्र- तुम बस समाज के डर से इस पाप का आनंद लेने से अपने मन को दबा रही हो न, वैसे तो तुम मेरे साथ वो करना चाहती हो न, वो सुख लेना चाहती हो न?

नीलम ने महेन्द्र को खुश करने के लिए बड़े ही मादक अंदाज़ में उसको अपने ऊपर खींचते हुए बोला- हाँ मेरे भैया......मैं भी अपने सगे भैया के साथ वो करके उसका सुख लेना चाहती हूं, मेरा भी मन करता है कि मेरे भाई का वो कैसा होगा?, कितना बड़ा होगा?, दिखने में कैसा है?, वो पाप मैं भी करना चाहती हूं, पर समाज से डरती हूँ, कहीं पकड़े गए तो।

महेन्द्र नीलम के ऊपर पूरा चढ़ चुका था अत्यधिक उत्तेजना के मारे महेन्द्र का लन्ड बुरी तरह खड़ा होकर नीलम की जाँघों में चुभने लगा, कुछ पल के लिए दोनों भूल गए कि अभी बिरजू आने वाला है।

महेन्द्र नीलम को ताबड़तोड़ चूमने लगा नीलम मंद मंद हंसने लगी अपने गाल घुमा घुमा के महेन्द्र को चुम्मा देने लगी आखिर वो उसकी बहन का रोल जो प्ले कर रही थी, महेन्द्र ने फिर बोला- दीदी हम छुप छुप के मिलन कर लिया करेंगे न, जब किसी को पता ही नही चलेगा तो डर कैसा, माना की भाई और बहन शादी नही कर सकते पर एक दूसरे को छुप छुपकर भोग तो सकते हैं न, अगर बहन राजी है तो वो अपना रस भाई को छुप छुप कर पिला सकती है न, और सगे भाई के मर्दाना धक्कों का सुख अपनी गहराई में महसूस कर सकती है न.......बोलो न दीदी......हम छुप छुप के करेंगे.......बोलो दोगी न मुझे वो? मैं तुम्हे पूर्ण संतुष्टि दूंगा दीदी सच.....क्योंकि मैं तुम्हारा प्यासा हूँ, अपनी बहन का प्यासा।

महेन्द्र जोश में बहकर बोले जा रहा था, नीलम ने उसकी पीठ को सहलाया और बोली- धीरे से.....धीरे धीरे बोलो.......बाबू आते होंगे, हाँ मैं अपने भैया को अपनी वो दूंगी, चाखाउंगी तुम्हें, दिखाउंगी तुम्हें की वो कैसी होती है, देखने में वो कैसी लगती है, क्यों उसको देखने के लिए एक मर्द तड़पता है, कैसी बनावट होती है उसकी, उसका छेद कैसा होता है (ये लाइन बोलते वक्त नीलम भी सिरह गयी), और उसमे कैसे और कहां डालते हैं, सब दिखाउंगी अपने भैया को छुप छुपकर, मैं भी तड़पती हूँ भैया आपके लिए, ऐसा कहकर नीलम महेन्द्र का लन्ड पकड़ लेती है फिर बोलती है - आपके इसके लिए भैया आपकी बहन भी तड़पती है, बस कहती नही है लेकिन आज कहती हूँ, दूंगी मैं अपने भैया को, आखिर मेरा सगा भाई है वो जब उसकी बहन के पास भी है वो चीज़ तो उसका भाई आखिर उस चीज़ के लिए क्यों इतना तड़पे, मैं अपने भाई को अब नही तड़पने दूंगी, आखिर जब मैं उसको राखी बांधती हूँ तो वो मेरी रक्षा करने का वचन देता है और फिर मैं उसको मिठाई खिलाती हूँ मिठाई का मतलब मीठा ही हुआ न, तो हमारी वो चीज़ भी तो मीठी ही होती है न, क्यों न मैं अपने सगे प्यारे भाई को जो मेरी रक्षा का वचन देता है उसको अपनी असली मिठाई खिलाऊँ, क्यों मैं उसको अपनी असली मिठाई से दूर रखती हूं सिर्फ समाज के डर से, जब वो मेरा सगा भाई है और मेरी उस मिठाई के लिए तड़प रहा है तो क्या बदले में मैं कभी उसको अपनी छोटी सी ये चीज नही चखा सकती, क्या बिगड़ जाएगा इससे मेरा, छुप छुप कर तो सब किया जा ही सकता है, हम लड़कियां बेवजह डरती रहती है, अपने घर में ही अपने सगे भाई का प्यार उन्हें बहुत आसानी से मिल सकता है, इससे बहन और भाई का प्यार और मजबूत ही होगा कम नही होगा और इसीलिए अब मैं अपने भाई को तड़पता हुआ नही देख सकती।

महेन्द्र नीलम की ये बातें सुनकर इतना उत्तेजित हो गया कि मानो उसका लन्ड बहन की चाहत में फट ही जायेगा, वो कराहते हुए बोला- ओह दीदी मेरी प्यारी दीदी.....अब मैं रह नही सकता तुम्हारे बिना।

नीलम- थोड़ा आराम से जी मैं सच में सुनीता नही तुम्हारी पत्नी हूँ, और अब बस करो मजा दिया न इतनी देर, अब बस बाद में ऐसा खेल खेलेंगे, अब रुको।

महेन्द्र- अब रुका नही जाता, क्या सच में सुनीता ऐसा ही मेरे बारे में सोचती होगी जैसा तुमने अब तक बोला।

नीलम- नही भी सोचती होगी तो मैं सोचवा दूंगी, अब तुम उसकी फिक्र मत करो।

महेन्द्र खुश होते हुए नीलम को चूमने लगा फिर बोला- और बोलो न भैया, मैं तुम्हारे साथ सुनीता को सोचकर ही संभोग करूँगा।

नीलम- ठीक है जैसा तुम्हारा मन करे, पर ये मेरे बाबू जी के सामने कैसे करोगे और मैं तुम्हे भैया नही बोल पाऊंगी ये फिर किसी और दिन कर लेना।

महेन्द्र ने विनती करते हुए कहा- धीरे धीरे कान में भैया बोल देना न,अब आग लगा दी है तो सब्र नही होता।

नीलम- मैंने कहाँ आग लगाई तुमने ही शुरू किया था....मेरे कान में दीदी ओ दीदी बोलकर।

महेन्द्र को याद आया कि हां शुरू तो उसने ही किया था।

कमरे में गुप्प अंधेरा था, बिरजू के पास एक छोटी सी टॉर्च हुआ करती थी, जो कि एक छोटी sketch colour के पेंसिल जितनी ही थी, उसकी रोशनी ज्यादा नही बस दो फुट के दायरे तक ही होती थी, उसको जलाकर वो घर के अंदर दाखिल हुआ, उस कमरे तक गया जिसमें आज रात रस बरसने वाला था, टॉर्च बंद कर दी और हल्के से सटाये हुए दरवाजे को खोलकर अंदर दाखिल हो गया और सिटकनी लगा दी। बाहर का दरवाजा वो अंदर से पहले ही बंद कर आया था।
 
Update- 71

बिरजू जैसे ही दरवाजा खोलकर कमरे में दाखिल हुआ और पलटकर दरवाजे की सिटकनी लगाई महेन्द्र जो नीलम के ऊपर चढ़ा हुआ था धीरे से अंधेरे में नीचे उतरकर बायीं तरफ लेट गया, नीलम मंद मंद हंसने लगी। बिरजू अंदाजे से पलंग तक आया और धीरे से बिस्तर पर लेट गया पलंग पर लेटते ही हल्की चरमराहट की आवाज हुई, ये पलंग बिरजू की शादी की थी जो उसके ससुर ने दी थी उपहार में, काफी पुरानी हो गयी थी पर अब भी मजबूत थी, इसी कमरे में हमेशा रखी रहती थी, काफी लंबी चौड़ी और भारी होने की वजह से कोई इस पलंग को जल्दी अपनी जगह से इधर उधर नही करता था।

कमरे में गुप्प अंधेरा था, सब सोने की कोशिश करने लगे, नीलम बीच में थी महेंद्र बायीं तरफ और बिरजू नीलम से थोड़ा सा दूर दाईं तरफ, नींद किसको आ रही थी, बिरजू ने पैर के पास रखा हल्का चादर उठाया और सर से लेकर पैर तक ओढ़कर लेट गया, कमरे में गुप्प अंधेरा होने के बावजूद भी आंखें अभ्यस्त होने के बाद हल्का हल्का दिख ही रह था।

सब चुपचाप लेटे थे, नीलम का भी आखिरी वक्त पर वाकई में शर्म से बुरा हाल था माना कि सब उसी की इच्छा थी, सब उसने ही किया था पर अब आखिरी वक्त पर उसे भी लज़्ज़ा आ रही थी, महेन्द्र तो बकरी बनकर बायीं तरफ लेटा हुआ था हालांकि वो नीलम से लिपटा हुआ था पर अभी तक वो जितना भी उत्तेजित हुआ था सब मानो छूमंतर सा हो गया था, बिरजू तो दायीं तरफ थोड़ा दूर ही लेटा था। नीलम समझ गयी कि मुझे ही कुछ करना पड़ेगा, नीलम ने अपना सीधा हाँथ अंधेरे में सरकाकर अपने बाबू की ओर बढ़ाया और उनकी धोती को पकड़कर हल्का सा खींचकर चुपचाप अपनी तड़प का इशारा किया, बिरजु ने अपनी बेटी के हाँथ को अंधेरे में अपने हाँथ में लिया और हल्का सा दबाकर थोड़ा सा सब्र रखने का इशारा किया। नीलम ने फिर हाँथ वापिस खींच लिया और महेन्द्र के कान में धीरे से बोला- भैया

ये सुनते ही महेन्द्र को अजीब सी सनसनाहट हुई, लन्ड में उसके हल्का सा कंपन हुआ, नीलम सीधी पीठ के बल लेटी थी और महेंद्र दायीं तरफ करवट लेकर नीलम के बायीं तरफ लेटा था, नीलम ने बहुत धीरे से महेन्द्र को भैया बोला था पर फिर भी बिरजू तक आवाज गयी, बिरजू जो अब सबकुछ जान चुका था उसको ज्यादा कुछ खास अचंभा नही हुआ, वो जनता था कि नीलम शरारती है कुछ न कुछ वो करेगी ही, सब कुछ बिरजू के सामने खुल ही गया था बस दिखावे की एक लज़्ज़ा की दीवार थी पर इस दीवार को तोड़कर निर्लज्ज कोई नही होना चाहता था क्योंकि असली मजा तो शर्म में ही है।

महेन्द्र ने भी धीरे से नीलम के कान में सकुचाते हुए बोला- दीदी......मेरी प्यारी बहना

इतना कहकर महेन्द्र नीलम को चूमने लगा, धीरे धीरे वो नीलम के ऊपर चढ़ने लगा नीलम भी बड़े आराम से शर्माते हुए महेन्द्र के नीचे आने लगी, शर्म झिझक और असीम वासना का मिला जुला अहसाह देखते ही बन रहा था, जीवन में आज पहली बार महेन्द्र अपनी पत्नी के ऊपर चढ़ रहा था और बगल में उसका ससुर लेटा था जो कि जग रहा था, यही हाल नीलम का भी हो चला था किसी ने सच कहा है सोचने और वास्तविक रूप में करने में काफी फर्क होता है, कितना अजीब लग रहा था कि उसके बाबू की मौजूदगी में महेन्द्र उसके ऊपर चढ़ रहा था, और बहन भाई की कल्पना की उमंग ने अलग ही रोमांच बदन में भर दिया था, देखते ही देखते महेन्द्र का उत्तेजना के मारे बुरा हाल हो गया क्योंकि नीलम उसके कान में धीरे धीरे भैया.....मेरा भाई...बोले ही जा रही थी, वो संकोच की वजह से बहन कम ही बोल रहा था पर व्यभिचार के इस लज़्ज़त को महसूस कर अतिउत्तेजित होता जा रहा था, धीरे धीरे नीलम और महेन्द्र की झिझक कम होती गयी और वो दोनों एक दूसरे के होंठों को चूसने लगे, महेन्द्र नीलम के ऊपर पूरा चढ़ चुका था वो उसके बदन को बेतहाशा सहला रहा था, नीलम ने भी शर्माते शर्माते महेन्द्र को अपनी बाहों में भर ही लिया और प्रतिउत्तर में उसके होठों को चूसने लगी, एकाएक महेन्द्र का हाँथ नीलम की 34 साइज की सख्त हो चुकी चूची से जा टकराया तो उसने तुरंत ब्लॉउज में कैद नीलम की नरम मोटी चूची को जिसके निप्पल अब सख्त हो चुके थे अपनी हथेली में भरकर दबा दिया, नीलम हल्का सा सिसक गयी, महेन्द्र दोनों हांथों से नीलम की दोनों चुचियों को दबाने लगा, नीलम घुटी घुटी आवाज में हल्का हल्का कसमसाने लगी, उत्तेजना बदन में हिलोरें मारने लगी, नीलम को उत्तेजना इस बात से ज्यादा हो रही थी कि बाबू उसके बगल में ही लेटे अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे हैं और ये अब कितना रोमांचक होने लगा है, कमरे में गुप्प अंधेरा था अगर उजाला होता तो शायद ये सम्भव न हो पाता, लज़्ज़ा की चादर ओढ़े अब धीरे धीरे काम वासना तन और मन पर कब्ज़ा करने लगी थी, नीलम अब खुलने लगी, महेंद्र लगातार उसकी नरम नरम गुदाज चूचीयों को दोनों हांथों से मसले जा रहा था, नीलम के खड़े हो चुके निप्पल को पकड़कर वो मसलने लगा, ऐसा करने से एक सनसनी नीलम के बदन में ऊपर से नीचे तक दौड़ गयी, कराह कर वो दबी आवाज में बोली- आआआआहहहह...भैय्या.....धीरे से

बूर नीलम की गरम तो पहले से ही थी पर अब मारे जोश के पिघलने सी लगी, नीलम का आधे से ज्यादा ध्यान अपने बाबू पर था, उसने अपनी मांसल जाँघों को फैलाकर पैर को उठाया और महेन्द्र की कमर में कैंची की तरह लपेट दिया, नीलम का महेन्द्र को इस तरह स्वीकारना बहुत अच्छा लगा, महेन्द्र नीलम के चेहरे को बेताहाशा चूमते हुए गर्दन पर आ गया नीलम बड़े प्यार से अपना बदन महेन्द्र को सौंपे जा रही थी, महेन्द्र ने नीलम की गर्दन पर गीले गीले चुम्बन देना शुरू कर दिया तो मस्ती में नीलम ने भी अपनी आंखें बंद करते हुए सर को ऊपर की तरफ पीछे करते हुए अपनी गर्दन को उभारकर महेन्द्र को परोस दिया, दोनों लाख कोशिश कर रहे थे कि आवाज न हो पर फिर भी चूमने सिसकने की हल्की हल्की आवाज हो ही रही थी।

चूमते चूमते महेन्द्र नीचे आया और नीलम के ब्लॉउज का बटन खोलने लगा अब नीलम मारे उत्तेजना के सिसक उठी क्योंकि अब वो निवस्त्र होने वाली थी, बगल में उसके बाबू लेटे थे, दोनों दुग्धकलश अब उसके बेपर्दा होने वाले थे, नीलम ने खुद ही अपने दोनों हाँथ को उठाकर सर के ऊपर रख लिया जिससे ब्लाउज में कसी उसकी दोनों चूचीयाँ और ऊपर को उठ गई, महेंद्र ने पहले तो झुककर नीलम की काँख में मुँह लगाकर उसके पसीने को अच्छे से सुंघा फिर ब्लॉउज के ऊपर से ही काँख में लगे पसीने को चाटने लगा, थोड़ी गर्मी की वजह से, थोड़ा उमस की वजह से और ज्यादा वासना और उत्तेजना की वजह से तीनों पसीने से तर भी हो रहे थे, नीलम का पसीना अच्छे से चाटने के बाद महेन्द्र ने एक ही झटके में नीलम के ब्लॉउज के सारे बटन खोलकर ब्लॉउज के दोनों पल्लों को अगल बगल पलट दिया और ब्रा में कैद नीलम की उत्तेजना से ऊपर नीचे होती हुई दोनों मोटी मोटी 34 साइज की चुचियों के बीच की घाटी में सिसकते हुए मुँह डालकर ताबड़तोड़ चूमते हुए धीरे से बोला- ओह बहना.....और एक हाँथ से दायीं चूची को हथेली में भरकर मीजने लगा, नीलम ने कराहते हुए हाथ बढ़ा कर थोड़ा दूर लेटे अपने बाबू का हाँथ पकड़ लिया और जोश में उनकी उंगलियों में अपनी उंगलियां फंसा कर दबाने लगी। इधर महेंद्र मानो नीलम की चूचीयों को अपनी बहन सुनीता की चूची समझते हुए उनपर टूट ही पड़ा जिससे नीलम थोड़ा जोर जोर सिसकने लगी और अपने दोनों पैर के अंगूठों को उत्तेजना में तेज तेज आपस में रगड़ने लगी।

बिरजू सर तक पूरा चादर ओढ़े अभी तक सन्न पड़ा हुआ उत्तेजना में लाल हो चुका था उसका 8 इंच का तगड़ा काला लन्ड फुंकार मारने लगा। वो बस नीलम के नरम नरम हांथों को मारे उत्तेजना के हौले हौले दबा रहा था लेकिन अपने बाबू की केवल इतनी सी छुवन नीलम को उत्तेजना से भर दे रही थी, अंधेरे में एक तरफ उसका पति उसके ऊपर चढ़कर उसकी चूचीयाँ खोले मसल रहा था और दूसरी तरफ उसके बाबू सिर्फ उसके नरम हाथ को प्यार से सहलाकर काम चला रहे थे।

महेन्द्र ने हाथ पीछे ले जाकर नीलम की ब्रा का हुक भी खोल दिया और उसकी ब्रा को निकालकर पलंग से नीचे ही गिरा दिया, नीलम ने हल्का सा उठकर खुद ही अपना ब्लॉउज भी अंधेरे में निकाल दिया अब वो सिर्फ साड़ी में रह गयी थी कमर से ऊपर का हिस्सा उसका पूरा निवस्त्र हो चुका था, झट से वो लेट गयी और इन सभी क्रिया में उसके माध्यम आकर के खरबूजे समान उन्नत दोनों चूचीयाँ इधर उधर स्वच्छंद हिलकर महेंद्र को पागल कर गयी, जैसे ही वो लेटी उसकी दोनों चूचीयाँ किसी विशाल गुब्बारे की तरह उसकी छाती पर इधर उधर हिलने लगे, महेंद्र से अब सब्र कहाँ होने वाला था झट से वो उन सपंज जैसी उछलती मचलती चूचीयों पर टूट पड़ा और बेसब्रों की तरह चूचीयों पर पहले तो जहां तहां चूमने लगा फिर एकाएक बारी बारी से दोनों निप्पल को पीने लगा, नीलम के निप्पल तो फूलकर किसी जामुन की तरह बड़े हो गए थे और वासना में कड़क होकर खड़े हो चुके थे, कुछ देर तक वो नीलम की चूचीयाँ पीता और मसलता दबाता रहा फिर नाभी को चूमने लगा नीलम मस्ती में एक हाँथ से उसका सर सहलाने लगी और दूसरा हाँथ जो उसके बाबू के हाँथ में था उससे वो अपने बाबू के हाँथ को सहला रही थी, अब उससे रहा नही जा रहा था वो अब बस खुद को दो मर्दों के बीच मस्ती में डूबी एक औरत समझ रही थी जिसको सिर्फ और सिर्फ अब लन्ड चाहिए था, एक के बाद एक लन्ड।

उसकी शर्म और झिझक अब काफी हद तक गायब हो चुकी थी, उसने जानबूझ कर धीरे से कई बार महेन्द्र को भैया बोला ताकि महेन्द्र ज्यादा उत्तेजित होकर जल्दी अपना काम करके हटे और फिर आज की रात असली पाप हो।

इधर बिरजू भी चादर में से अपना मुँह निकालकर नीलम को देखने लगा नीलम ने सर घुमाकर अपने बाबू को देखा तो वो उसकी तरफ ही देख रहे थे नीलम ने उनके हाँथ से अपना हाथ छुड़ाकर उनके होंठों पर अपनी उंगलियां रख दी और अंधेरे में बड़े प्यार से उनके होंठों पर अपनी उंगलियां रगड़ने लगी मानो कह रही हो कि मुझे अपने बदन पर एक एक अंग पर इन होंठों से चुम्बन चाहिए।

इधर बिरजू ने चादर के अंदर ही दूसरे हाँथ से अपनी धोती खोल कर काला विशाल लन्ड बाहर ही निकाल लिया था।

महेन्द्र के सब्र का बांध अब टूट चुका था तो उसने नीलम की साड़ी को नीचे से ऊपर की ओर उठाना शुरू कर दिया शर्म और झिझक तो अब भी उसके मन में थी पर वासना भी भरपूर थी, नीलम अब और भी मचल उठी क्योंकि अब उसकी जाँघों के बीच की जन्नत उजागर होने वाली थी, महेंद्र ने साड़ी को आखिर कुछ ही पलों में उठाकर कमर तक कर दिया और अपने हांथों से नीलम की दोनों मांसल जाँघों और उसमे कसी कच्छी को ऊपर से ही सहलाने लगा जैसे ही उसने नीलम की कच्छी के ऊपर से ही उसकी बूर पर हाँथ रखा तो वह वहां भरपूर गीलापन महसूस कर मदहोश हो गया और झुककर कच्छी के ऊपर से ही बूर के रस को चाटने लगा, अंधेरे में इस अचानक हमले से नीलम सिसकते हुए चिहुँक पड़ी और ओह मेरे भैया कहते हुए उसके सर को सहलाने लगी, कुछ देर महेन्द्र झुककर ऐसे ही नीलम की जाँघों और कच्छी के ऊपर से महकती रसीली बूर को चाटता रहा जब नीलम ने नही बर्दास्त हुआ तो उसने बिरजू के होंठों के अंदर अपनी एक उंगली घुसेड़ते हुए महेंद्र से धीरे से बोला- भैया खोलो न कच्छी अपनी बहना की कब तक हम ऐसे ही शर्माते रहेंगे अब बर्दास्त नही होता।

ये सुनते ही बिरजु धीरे से पलंग से उठा और जल्दी से अंधेरे में खुली धोती दुबारा लपेटी और जानबूझकर धीरे से कमरे से बाहर जाने लगा वो जनता था कि जबतक वो यहां रहेगा महेन्द्र खुलकर नीलम को नही चोद पायेगा, बस थोड़ी देर के लिए वो बाहर जाना चाहता था हालांकि नीलम पहले तो चुपचाप उनके हाँथ को पकड़कर रोकना चाही पर फिर वो भी समझ गयी और हाँथ छोड़ दिया, बिरजू धीरे से कमरे से बाहर निकल गया और बाहर आकर खिड़की के पास खड़ा हो गया।

महेंद्र भी ये जान गया कि बाबू जी बाहर क्यों चले गए, आखिर उनके अंदर एक मर्यादा थी, महेंद्र तो मानो अब गरज उठा और नीलम को ताबड़तोड़ चूमने लगा नीलम भी उसका साथ देने लगी धीरे से बोली- भैया कच्छी खोलो न।

महेन्द्र- कच्छी खोलूं दीदी, देख लूं आपकी वो

नीलम सिसकते हुए- हाँ मेरे भाई खोल के देख न जल्दी अपनी बहन की बूर

नीलम के मुँह से बूर शब्द सुनकर महेंद्र बौरा गया

महेन्द्र- पर दीदी मेरे पास रोशनी नही है कैसे देखुंगा।

नीलम- रुक मेरे भाई रुक बाबू की छोटी टॉर्च यहीं होगी

नीलम ने थोड़ा उठकर बिस्तर पे टटोला तो टोर्च हाँथ लग गयी उसने टॉर्च को जला कर अपनी जाँघों के बीच दिखाया और बोली- लो भैया अब उतारो मेरी कच्छी, और देखी मेरी बूर

महेंद्र छोटी टॉर्च की हल्की नीली रोशनी में नीलम की मोटी मोटी जांघे और उसमे कसी छोटी सी कच्छी और उसपर बूर की जगह पर गीलापन देखकर मदहोश हो गया उसने झट से नीलम की कच्छी को पकड़ा और जाँघों से नीचे तक खींच कर उतार दिया, हल्के काले काले बालों से भरी नीलम की रस बहाती वासना में फूलकर हुई पावरोटी की तरह महकती बूर को देखकर महेन्द्र मंत्रमुग्ध सा कुछ देर बूर की आभा को देखता ही रहा।

नीलम- भैया कैसी है बहन की बूर?

महेंद्र- मत पूछ मेरी बहन तेरी बूर तो जन्नत है।

बनावट इसकी कितनी प्यारी है......कितनी मादक है तेरी बूर....दीदी।

बस फिर सिसकते हुए महेंद्र बूर पर टूट पड़ा नीलम ने झट से कच्छी को पैरों से निकाल फेंका और दोनों पैर फैलाकर मखमली बूर महेन्द्र के आगे परोस दी महेन्द्र "ओह मेरी बहना क्या बूर है तेरी" कहता हुआ नीलम की बूर पर टूट पड़ा, नीलम भी एक मादक सिसकारी लेते हुए "आह मेरे भैया चाटो न फिर अपनी बहना की बूर, बहुत प्यासी है आपके लिए", महेन्द्र के बालों को अपनी बूर चटवाते हुए सहलाने लगी।
 
Update- 72

महेन्द्र बड़ी सी जीभ निकाले नीलम की वासना में फूली हुई पनियायी बूर को नीचे से लेकर ऊपर तक चाटने लगा, महेन्द्र की जीभ की रगड़ अपनी बूर की दोनों फाँकों के बीच, फांकों पर, बूर के तने हुए दाने पर पाकर नीलम के विशाल 36 साइज के नितंब बरबस ही सनसनाहट में थिरक जा रहे थे, पहले तो उसने अपने दोनों पैर महेन्द्र की पीठ पर रखे हुए थे पर बूर चटाई का और सुख लेने के लिए नीलम ने दोनों पैरों को और चौड़ा करके हवा में फैला दिए और इतना ही नही फिर नीलम ने जानबूझ कर महेन्द्र को और जोश चढ़ाने के लिए अपने सीधे हाँथ की उंगली से अपनी बूर की दोनों फाँकों को चीरकर उसका प्यारा सा गुलाबी छेद दिखाते हुए बड़े ही विनती के भाव में बोली- भैया जल्दी जल्दी चाटो अपनी दीदी की बुरिया को............कहीं अम्मा न आ जाये.............जल्दी जल्दी सब कुछ करो न......... बहुत मजा आ रहा है.......कभी कभी तो मौका मिलता है.......…..बहुत मजा आता है भाई के साथ गंदा काम करने में........ऊऊऊऊऊईईईईईईईईई.......अम्मा।

महेन्द्र ने अपनी जीभ नुकीली बना के नीलम की बूर के गुलाबी छेद पर भिड़ा दी थी इसलिए नीलम सिसकारी लेते हुए चिहुँक गयी।

नीलम के मुँह से ये बोल सुनकर महेन्द्र से रहा नही गया वो और तेज तेज बूर का चप्पा चप्पा चाटने लगा, नीलम जोश और बदन में उठ रही तेज सनसनी के मारे अपने ही दोनों हांथों से अपनी गुब्बारे जैसी फूली हुई दोनों चूचीयों को मसलने लगी, दोनों तने हुए निप्पल को खुद ही मीजने लगी, चुदास इतना सर चढ़ जाएगी ये उसने भी कभी सोच नही था।

काफी देर बूर का चप्पा चप्पा चाटने से बूर एकदम गीली हो गयी, नीलम की बूर महेन्द्र के थूक से लबालब सन गयी थी, बूर पर हल्के हल्के काले काले बाल थूक से सराबोर हो चुके थे, बूर पूरी फूलकर किसी पावरोटी की तरह उभर आई थी और दोनों फांकों के बीच तना हुआ दाना जोश के मारे लाल हो गया था, सच पूछो तो बूर अब लन्ड मांग रही थी, नीलम तड़पते हुए छोटी टॉर्च को बुझाकर अपने दोनों हांथों से सर हो अगल बगल तड़पकर पटकते हुए अपनी चूचीयों को खुद ही मसले दबाए जा रही थी, कभी वो जोश के मारे सर को अगल बगल हिलाती तो कभी अपनी चूची और कमर से ऊपर के हिस्से को किसी धनुष की तरह ऊपर को मोड़कर तान देती जिससे उसकी चूचीयाँ किसी दो पहाड़ की तरह और ऊपर को उठ जाती।

नीलम के बदन में वासना की तरंगे, चुदाई की खुमारी अब उफान पर आ चुकी थी, किसी सागर की बेकाबू लहरों की तरह उसका बदन मचल रहा था और सच में एक गदराए यौवन की स्त्री के बदन में वासना जब खुलकर हिलोरे मारने लगती है और वो लोक लाज छोड़कर तड़पने मचलने लगती है तो एक अनुभवी पुरुष ही उसे अच्छे से काबू कर सकता है, आज महेन्द्र की बूर चटाई नीलम के मन भा गयी थी न जाने क्यों आज महेन्द्र से बूर चटवाने में नीलम को मजा आया था शायद इसकी वजह उसके बाबू की मौजूदगी थी, ये सोचकर उसे अति आनंद और रोमांच हो रहा था कि कैसे वो अपने बाबू की जानकारी में अपने पति से बूर चटवा रही है, हो न हो बाहर से जरूर उसके बाबू उसे देख रहे होंगे और ये सच भी था बाहर बिरजू खिड़की के पास खड़ा अपनी बेटी की मादक सिसकियां सुनकर अति उत्तेजित हो ही रहा था।

नीलम से जब नही रहा गया तो उसने महेन्द्र के चेहरे को पकड़ा और उसका मुँह बूर से छुड़ाया और कंधों से पकड़कर ऊपर चढ़ने का इशारा किया महेन्द्र झट से नीलम के ऊपर चढ़ गया नीलम ने अपने पैर महेन्द्र की कमर पर दुबारा कैंची की तरह लपेट दिए, महेन्द्र का लोहे की तरह तन्नाया लंड नीलम की बूर पर, उसकी फाँकों पर, फांकों के बीच में जहां तहां ठोकरें मारने लगा, और एकाएक बूर के गरम गरम रसीले छेद पर सेट हो गया तो नीलम जोर से सिसक उठी- ओओओहहहह........भैयायायाया........चोद दो न जल्दी.........डालो न अपना लंड अपनी दीदी की बुरिया में.....कहीं अम्मा न आ जाये......आज पहली बार अपनी बहन को चोदने जा रहे हो.......आह कैसा लग रहा है भाई के ही साथ चुदाई करने में, जिसको मैं राखी बांधती हूँ आज उसी से चुदवा रही हूं.........आह भैया...…..करो न.......डालो अब बर्दाश्त नही होता।

(नीलम जानबूझ कर महेन्द्र से ऐसी कामुक बातें कर रही थी)

आखिर महेन्द्र भी कब तक चुप रहता वासना उसके सर चढ़कर गरजने लगी, इतना जोश उसे कभी नही चढ़ा था, उसने नीलम को कस के अपनी बाहों में जकड़ लिया और गालों होंठों पर ताबड़तोड़ चूमते और लंड को बूर की फांकों पर ऊपर ऊपर रगड़ते हुए नीलम से बोला- दीदी आज कितना अच्छा लग रहा है तुझे पा के, मैंने कभी सपने में भी नही सोचा था कि मुझे अपनी ही सगी बहन की मखमली बूर मिलेगी चोदने को।

(महेन्द्र लगतार अपना लंड नीलम की बूर की फांकों के बीच रगड़ रहा था)

नीलम- हां भैया मैं भी तेरा लंड पाकर निहाल हो गयी, अब चोद न जल्दी, कोई आ जायेगा नही तो घर में, बड़ी मुश्किल से मौका मिला है तू देर क्यों कर रहा है।

ऐसा कहते हुए नीलम ने खुद ही अपने नितंब को ऊपर की ओर उठाने लगी।

महेन्द्र से भी अब नही रहा गया और उसने जोर का एक धक्का नीलम की तरसती बूर में मारा तो महेन्द्र का लंड सरसराता हुआ गच्च से बूर की गहराई में उतर गया। बूर अंदर से किसी तेज भट्टी की तरह सुलग रही थी, उसकी तेज गर्माहट अपने लन्ड की चमड़ी पर महसूस कर महेन्द्र मदहोश हो गया, दोनों के मुँह से ही एक जोर की मादक सिसकारी निकली, नीलम ने महेन्द्र को कस के अपने से लिपटा लिया और महेन्द्र ने अपने दोनों हांथों से नीलम के भारी नितंब थामकर अपना लन्ड एक बार तेजी से बाहर निकाल कर दुबारा गच्च से बूर में पेल दिया तो नीलम लंड के लज़्ज़त भरे मार से सिसकते हुए कराह उठी।

दोनों अमरबेल की तरह एक दूसरे से लिपट गए, कुछ देर दोनों आंखें बंद किये एक दूसरे के बदन की लज़्ज़त और लंड-बूर के मिलन के असीम आनंद को अच्छे से महसूस करते रहे, कोई कुछ बोल नही रहा था बस आंखें बंद किये एक दूसरे को महसूस कर रहे थे, बीच बीच में महेन्द्र अपना लंड बूर में से बाहर खींचकर दुबारा किसी पिस्टन की तरह बूर की गहराई तक पेलता तो नीलम लन्ड की लज़्ज़त भरी मार को गहराई में महसूस कर चिहुकते हुए महेन्द्र की पीठ पर नाखून से चिकोट लेती, महेन्द्र नीलम के गालों को चूमने लगा और धीरे से बोला- दीदी

नीलम- हम्म

महेन्द्र- रोशनी करो न थोड़ा अपने चेहरे पर।

नीलम- क्यों भैया

महेन्द्र- आज बरसों तड़पने के बाद अपनी बहन की बूर मिली है मैं देखना चाहता हूं कि मेरी दीदी के चेहरे का क्या हाव भाव है, तुम्हे अच्छा लग रहा है कि नही।

नीलम- धत्त....गंदे भैया.....एक तो बहन की बूर में अपना खूंटे जैसा लन्ड घुसाए हुए हो ऊपर से उसका चेहरा भी देखना है, मुझे लाज आती है।

(नीलम ने जानबूझ कर नाटक किया)

महेन्द्र- जलाओ न बत्ती दीदी, देखूं तो सही तुम्हारे चेहरे की लज़्ज़ा

नीलम ने बगल में पड़ी टॉर्च उठा के महेन्द्र को दी और बोली- लो खुद ही जला के देख लो बहन की लाज.....गंदे

महेन्द्र ने टॉर्च को जलाकर नीलम के चहरे पर किया तो नीलम शर्मा गयी, टॉर्च की रोशनी ज्यादा तो थी नही, सिर्फ चेहरे और उनके आस पास तक ही थी।

महेन्द्र ने नीलम को शर्माते हुए देखा तो और भी जोश से भर गया, नीलम ने एक बार महेन्द्र की आंखों में देखा फिर शर्मा कर मुस्कुराते हुए चेहरा बायीं तरफ घुमा लिया और बोली- धत्त बेशर्म भैया, एक तो अपनी सगी बहन को चोरी चोरी चोदते हो ऊपर से उसकी लज़्ज़ा भी देखते हो.....हम्म....गंदे।

महेन्द्र- हाय मेरी बहना, कितनी खूबसूरत है तू

नीलम- सच

महेन्द्र- बिल्कुल सच मेरी बहना, मेरी सुनीता, मेरी जान

नीलम- आह मेरे भैया

(दरअसल महेन्द्र ने एक गच्चा बूर में तेज़ी से मार दिया था तो नीलम चिहुँक पड़ी)

नीलम ने टॉर्च बंद कर दी और धीरे से बोली- अब चोदो न अपनी बहन को

(दरअसल नीलम देर नही करना चाहती थी, उसे तो इंतज़ार था अपने बाबू का, अपने मन पसंद पुरूष का, महेन्द्र के साथ ये सब खेल तो वो बस इसलिए खेल रही थी की वो जल्दी निपट जाए)

हालांकि वासना और चुदास कि तड़प में तर बतर तो वो भी हो चुकी थी पर वो झड़ना अपने बाबू के अत्यधिक मजबूत लंड की रगड़ से चाहती थी न कि महेंद्र के, और उपाय के नियम भी यही थे।

नीलम ने टार्च बंद कर दी तो महेन्द्र अब नीलम की गीली बूर में धीरे धीरे धक्के मारने लगा, नीलम हल्का हल्का सिसकने लगी, दोनों पैर उसने महेन्द्र की कमर पर लपेट रखे थे और उसकी पीठ और कमर को बड़े दुलार के साथ लगातार सहला रही थी, महेन्द्र ने धक्के मारते वक्त महसूस किया कि वो अपने सामर्थ्य से तो अपना समूचा लंड नीलम की बूर की गहराई में पेल रहा है पर फिर भी वो उसकी बूर की गहराई के आखिरी छोर को छू नही पा रहा है, मानो उसका लंड नीलम की बूर की गहराई के हिसाब से छोटा पड़ रहा हो, हालांकि मजा तो उसे भरपूर आ रहा था, पर वो धक्के मारते हुए अपने दोनों पैरों को पलंग की पाटी से टेक लगाकर तेज तेज धक्के लगाते हुए नीलम की बूर की अत्यंत गहराई तक लंड पहुचाने की भरपूर कोशिश कर रहा था पर वो उस गहराई को छू नही पा रहा था और इस बात को नीलम पहले ही अच्छे से महसूस कर चुकी थी, वो भी कई बार नीचे से अपने मादक विशाल नितंब उठाकर महेन्द्र के लन्ड के टोपे को बूर की गहराई के आखिरी छोर तक टच कराने की कोशिश करती पर लन्ड वहां तक नही पहुंच पा रहा था, जिससे नीलम को कुछ कमी महसूस हो रही थी, वो मजा उसे नही मिल पा रहा था हालांकि महेन्द्र को पूरा मजा मिल रहा था और वो अब ताबड़तोड़ धक्के पे धक्के मारे बूर चोद रहा था, नीलम भी दिखावे की सिसकारी लेते हुए महेन्द्र को सहलाती और चूमती जा रही थी पर कहीं न कहीं कुछ खालीपन था।

जबकि पहले ऐसा नही था पहले महेन्द्र का लंड जब नीलम की बूर में घुसता था तो नीलम और महेन्द्र दोनों को यही लगता था कि बूर बस इतनी ही गहरी है, महेन्द्र का पूरा लंड बूर में समा जाता था तो महेन्द्र को लगता था कि बूर की गहराई तक वो पहुँच गया है पर असल में नीलम की बूर की गहराई की और परतों को खोलकर उसे और गहरा बनाया था उसके सगे पिता के विकराल लंड ने, नीलम को भी पहले क्या पता था कि उसकी बूर और गहरी है, जब पहली बार महेन्द्र का लंड सुहागरात में नीलम की बूर में गया था तो उसे भी यही लगा था कि लंड इतना ही बड़ा होता है और गहराई इतनी ही होती है बूर की, पर कल की रात जब पहली बार उसके बाबू का लंड उसकी कमसिन बूर में उतरा तब उसे समझ में आया कि लंड क्या होता है, उसे वो पल याद है जब कल उसके बाबू का लन्ड उसकी बूर की अनंत गहराई की अनछुई मांसपेशियों को चीरता हुआ उस जगह पर जा पहुँचा था जो बरसों से वीरान पड़ी थी जिसका आभास स्वयं नीलम को भी नही था, कैसे उसके बाबू के विशाल लन्ड ने वहां पँहुच कर उस जगह के चप्पे चप्पे को बड़े प्यार और दुलार से चूमा था, कैसे वहां अपना परचम लहराया था, तभी तो उसके बदन में एक अत्यंत खूबसूरत झनझनाहट हुई थी, जैसे बरसों की प्यास बुझी हो और वो उसी सुख को पाकर अपने बाबू के लन्ड की कायल हो गयी थी, दरअसल बूर को भी वही लंड भाता है जो उसकी अनछुई गहराई तक पहुँचकर वहां कलश में रखे मटके को फोड़कर उसका रस पी सके और वहां के चप्पे चप्पे को चूमकर एक झनझनाहट बूर में पैदा कर दे, और इस दौरान जब महेन्द्र भी नीलम को हुमच हुमच कर चोद रहा था तो नीलम उसी सनसनाहट और सुख को पाने का भरकस प्रयास अपनी गाँड़ को उछाल उछालकर कर रही थी पर वो झनझनाहट वाला मजा उसे महेन्द्र के लन्ड से मिल नही पा रहा था।

दूसरा फर्क ये था कि उसके बाबू का काला लंड जब फुंकार मारकर खड़ा होता है तो उसपर काफी सारी नसें उभर आती है, और जब वो लंड बूर में अंदर बाहर होता है तो वो नसें बूर की दीवारों से एक दरदरा सा घर्षण पैदा करके असीम सुख देती हैं, साथ ही साथ लंड के इर्द गिर्द काले काले बाल, जब लंड बूर में जड़ तक घुसता है तो वो काले काले बाल बूर की फांकों और बूर के तने हुए दाने से बार बार टकराकर बदन में बिजली जैसा कंपन पैदा करते है जिससे नीलम को अपार सुख मिलता है, और इस वक्त उसे वो सुख महेन्द्र के लंड से न मिलने पर वो उस लन्ड को मिस कर रही थी।

चोदते चोदते महेन्द्र रुक गया। नीलम ने सवालिया निगाहों से अंधेरे में उसे देखा।

नीलम- क्या हुआ भैया......चोदो न रुक क्यों गए, बहन की बूर में मजा नही है क्या?

महेन्द्र- दीदी.....तेरी बूर में मजा तो इतना है कि जी करता है उम्र भर इसे चोदता रहूं।

नीलम- फिर......फिर क्या हुआ मेरे राजा भैया....चोदो न अपनी बहना को......कितना मजा आ रहा था।

महेन्द्र- मुझे बस एक बात पूछनी है दीदी।

नीलम- तो पूछ न.....चोदता भी रह और पूछता भी रह।

महेन्द्र फिर हल्का हल्का बूर चोदने लगा और बोला- दीदी

नीलम- ह्म्म्म........ .........आह.... हाँ ऐसे ही चोद

महेन्द्र- जीजा तुम्हे नही चोदते न

नीलम- एक बात बताऊं मेरे भैया

महेन्द्र- हाँ मेरी प्यारी दिदिया।

नीलम- अगर वो मुझे चोदते होते न, फिर भी मैं तुझसे छुप छुप के चुदवाती, तुझे तेरे हक़ का देती, नही तो भगवान भी मुझे माफ़ नही करेगा।

महेन्द्र- कैसा हक़ दीदी? क्या से सच है....की फिर भी तुम मुझसे चुदवाती।

नीलम- हां मेरे भैया सच........आह....ऐसे ही गप्प गप्प लंड डाल मेरी बूर में.....आह भाई.... मजा आ रहा है बहुत।

महेन्द्र- पर क्यों दीदी?

नीलम सिसकते हुए- क्योंकि तू मेरा भाई है......मैं तुझे राखी बांधती हूँ न, और तू मेरी रक्षा का वचन देता है।

महेन्द्र- हाँ देता तो हूँ वचन।

नीलम- तो जरा सोच मेरे प्यारे भैया........जब एक पुरुष 18 19 साल बाद किसी स्त्री के जीवन मे आकर उससे शादी करता है..........और शादी के फेरों के दौरान वो उस स्त्री की रक्षा का वचन देता है फिर उस पुरुष को उस स्त्री की बूर सुहागरात में मिलती है चखने को.......... और दूसरी तरफ वो भाई जो बचपन से उसकी रक्षा का वचन देता आ रहा है बदले में उसको कुछ नही?.........उसको भी तो बहना की बूर चखने को मिलनी चाहिए न............बहन की शादी से पहले न सही पर शादी होने के बाद कभी न कभी चुपके से तो उसे उसके हक़ का मिलना चाहिए न.......... आखिर वो भी तो उसकी रक्षा का वचन बचपन से देता चला आ रहा है और रक्षा कर भी रहा है, तो ये नाइंसाफी एक भाई के साथ क्यों भला?......इसलिए मेरे भैया मेरी बूर पर तेरा पूरा हक है.......कोई बहन अपने भैया को अपनी बूर चखाये या न चखाये मैं तो जरूर चाखाउंगी अपने प्यारे भैया को.........आखिर एक दिन मर ही जाना है ये मिट्टी का तन मिट्टी में मिल ही जाना है.............और जवानी भी तो हमेशा नही रहेगी.......तो क्यों तड़पे मेरा भाई बूर के लिए ...क्या उसकी बहन के पास नही है बूर........अगर भाई नही चाह रहा होता तो बात अलग थी......जब भाई प्यासा है.......तो क्यों न बहन अपनी बूर चखाये अपने सगे भाई को.....औऱ चुपके से उसकी प्यास बुझा दे.....जो जीवन भर उसकी रक्षा का वचन देता है.........आखिर एक भाई बचपन से बहन की रक्षा का वचन निभाता है.....एक रस भरी मिठाई की रक्षा बचपन से जवानी तक जब तक बहन की शादी नही हो जाती करता है.......और शादी होने के बाद बहन उस मिठाई को किसी ऐसे पुरुष को खिला देती है जो इतने सालों बाद उसकी जिंदगी में आया है..............इतना भी नही सोचती की इस मिठाई पर थोड़ा हक़ तो उस भाई का भी है जिसने बचपन से इसकी रक्षा की है..........उस नए पुरुष को वो मिठाई दे देती है चाहे वो उसकी इज्जत करे या न करे, पर उसे नही देती जिसने उस मिठाई पर कभी एक मक्खी तक नही बैठने दी........ सिर्फ समाज के डर से, पर ये एक भाई के साथ नाइंसाफी है, और केवल शादी तक ही नही भाई तो बहन की रक्षा शादी के बाद भी मरते दम तक करता है, पर बहन शादी होने के बाद भी भाई को उसके हक़ की मिठाई नही खिलाती, कम से कम शादी के बाद चुपके से कभी न कभी अपनी बूर का स्वाद एक बहन अपने सगे भाई को चखा ही सकती है, क्या भाई बहन को कम संतुष्टी देगा.......कदापि नही........ इसलिए मेरे भाई चोद लो अपनी बहन को जी भरके........तेरे लंड की प्यासी है तेरी बहना की बूर, और इसलिए अगर तेरे जीजा मुझे चोदते होते तो भी मैं तुझे अपनी बूर चखाती।

नीलम ने सिसकते और कराहते हुए लंबा चौड़ा एक मादक भाषण दे डाला, महेन्द्र नीलम की लॉजिक भरी बातें सुनकर दंग रह गया, ऐसे ही बेबाक जवाब होते थे नीलम के, महेन्द्र को ये सब सुनके इतनी मस्ती चढ़ी की उसने कस के नीलम को दबोचा और "ओह मेरी दीदी......हाय मेरी प्यारी दीदी........तू मुझे इतना प्यार करती है......की अपनी मिठाई मुझे परोस दी........सच में तेरी बूर के आगे सारी मिठाई फीकी है........मैं मर जाऊंगा तेरे बिना.........तेरी बूर के बिना मैं नही रह पाऊंगा.......आह क्या बूर है तेरी मेरी बहन" कहते हुए दनादन नीलम की बूर में गच्च गच्च लंड पेल पेल कर नीलम को चोदने लगा।

नीलम की चाल को महेन्द्र फिर नही समझ पाया, नीलम मंद मंद मुस्कुराती रही और हल्का हल्का कभी कभी लंड के आड़े तिरछे धक्के बूर की दीवारों पर लगने से आह....ऊई अम्मा करते हुए सिसकती रही, पर वो एक कमी उसे बहुत खल रही थी।

इतनी मादक बातें सुनकर और नीलम की लज़्ज़त भरी बूर में काफी देर से लंड पेलते रहने की वजह से अब महेन्द्र का टिक पाना मुश्किल था, उधर बिरजू भी कमरे से आ रही मादक सिसकियों को सुनकर बेचैन होता जा रहा था, कभी वो इधर उधर घूमने लगता तो कभी खिड़की के पास खड़ा हो जाता, उमस और गर्मी हो ही रही थी, तभी आंगन में खड़े होने की वजह से बिरजू के ऊपर बारिश की हल्की हल्की दो चार बूंदे गिरी, बिरजू ने सर उठा के ऊपर देखा तो काले काले बादल छा चुके थे, बारिश होने वाली थी अब तेज।

बिरजू ने अब अंदर जाना उचित समझा, जैसे ही उसने घर के अंदर प्रवेश करने के लिए दरवाजा खोला हल्की चर्रर्रर्रर की आवाज हुई और तभी जोर से बादल गरजे और बिजली चमकी, बिलजी इतनी तेज चमकी की एक पल के लिए पूरा आंगन जगमगा गया और कमरे में भी भरपूर रोशनी हुई, जिससे नीलम और बिरजू की नजरें मिल गयी, नीलम मारे लज़्ज़ा के गनगना गयी की कैसे एक पिता ने अपनी

सगी बेटी को चुदवाते हुए देख लिया, और वो किस तरह लेटकर महेन्द्र से चुदवा रही है।

महेन्द्र ने भी पलटकर बिरजू की ओर देखा, बिरजू ऊपर से बिल्कुल नंगा था, नीचे उसने धोती पहन रखी थी, जिसमे उसका काला जंगली सा लंड कब से फुंकार मार रहा था, एक पल के लिए तेज रोशनी होने से बिरजू ने महेंद्र को नीलम के ऊपर चढ़कर उसको हचक हचक के चोदते हुए देख लिया, नीलम और महेन्द्र मदरजात नंगे थे, नीलम ने झट से एक बड़ा चादर उठा कर महेंद्र और अपने ऊपर डालकर ढक लिया, और मारे उत्तेजना के तेज तेज अपने बाबू के सामने सिसकने लगी, महेन्द्र से भी अब रुका नही जा रहा था वो नीलम को बहुत तेज तेज चोदने लगा, बिरजू की मौजूदगी का अहसाह कर अब नीलम के बदन में अजीब सी झुरझुरी होने लगी, एक अलग ही रोमांच का अहसाह उसे होने लगा, जिससे वो हल्का हल्का झड़ने के करीब जाने लगी थी कि तभी महेंद्र हुंकार मारते हुए नीलम की बूर में आखिरी धक्का लगाकर गनगना के झड़ने लगा, धक्का उसने इतना तेज मारा था कि पलंग हल्का सा चरमरा गई थी पर लंड उसका फिर भी बूर की उस गहराई को नही छू पाया था जहां तक जाने की आशा नीलम कर रही थी। पूरे कमरे में न चाहते हुए भी तेज तेज कामुक सीत्कार गूंज उठी।

एक बड़ी चादर के अंदर महेन्द्र और नीलम एक दूसरे से गुथे पड़े थे, पूरा बदन दोनों का ढका हुआ था बस पैर और मुँह बाहर थे, महेन्द्र के लंड से वीर्य की एक मोटी धार झटके ले लेकर कई बार निकली और नीलम की प्यासी बूर को भरने लगी, महेन्द्र जोर जोर से हाँफता हुआ, नीलम के ऊपर ढेर हो गया, नीलम ने उसे किसी बच्चे की तरह दुलारते हुए अपने आगोश में भर लिया और हौले हौले उसकी पीठ सहलाने लगी, अपने अंदर का सारा लावा नीलम की प्यासी बूर में उड़ेलने के बाद महेन्द्र धीरे धीरे शांत हुआ।

अब नीलम और महेन्द्र दोनों को ये तो पता था कि बाबू कमरे में मौजूद हैं, और बिरजू को भी पता था कि महेन्द्र उसकी बेटी की बूर में झड़ चुका है।

उपाय के नियम के अनुसार कुछ देर शांत पड़े रहने के बाद अब महेन्द्र धीरे धीरे अपना हल्का सा मुरझाया लंड नीलम की बूर में पेलने लगा, नीलम को अब और मस्ती चढ़ने लगी और वो जानबूझ कर सिसकने लगी, महेन्द्र लगातार लंड बूर में पेलने लगा, बूर एकदम गीली थी, महेन्द्र के वीर्य से लबालब भरी हुई थी।

इधर बिरजू अपनी धोती खोलकर पलंग पर रख देता है और पूरा नंगा हो जाता है वो पलंग पर चढ़कर बिल्कुल महेन्द्र के पीछे आ जाता है, नीलम और महेन्द्र का बदन तो चादर में ढका हुआ था, नीलम ने अपने दोनों पैर फैलाकर अब हवा में उठा लिए थे, पलंग पर बिरजू के चढ़ने से पलंग एक बार फिर चरमरा गई और नीलम और महेन्द्र को बिरजू के एकदम करीब आने से एक तेज सनसनाहट का अहसाह हुआ, बिरजू नीलम के दोनों पैरों के बीच महेन्द्र के पीछे पूरा नंगा अपना दैत्याकार काला लन्ड हाँथ में लिए बैठा था, वो सब कुछ बिल्कुल उपाय के अनुसार करना चाहता था कहीं कोई चीज़ छूट न जाये, नीलम और महेन्द्र भी बिल्कुल वैसा ही कर रहे थे पर शर्म और लज़्ज़ा से उनका बुरा हाल था। महेन्द्र लगातार अपना लंड नीलम की बूर में अंदर बाहर कर रहा था उसकी गाँड़ ऊपर नीचे हिलती हुई गुप्प अंधेरे में भी दिख रही थी, बूर वीर्य से लबालब भरी होने की वजह से कमरे में फच्च फच्च की लगातार गूंज रही थी।

अब महेन्द्र का लन्ड भी अपने ससुर को बिल्कुल ठीक अपने पीछे मौजूद होने से एक अजीब रोमांच में सख्त होने लगा की तभी नीलम को अपनी बूर की गहराई में झनझनाहट महसूस हुई उसे लगा कि अब वो झड़ जाएगी तभी उसने जोर से कहा- अब बस....अब रुक जाओ।

(ये इशारा था महेन्द्र को, की वो अब उपाय के अनुसार हट जाय, महेंद्र और बिरजू दोनों समझ गए कि नीलम झड़ने की राह पर आ चुकी है)

महेन्द्र ने पक्क़ से वीर्य से सना हुआ खड़ा लंड नीलम की वीर्य से भरी लबालब बूर में से निकाला और चादर के अंदर से निकलकर बगल में पड़ा एक दूसरा चादर ओढ़ते हुए नीलम के बायीं ओर पलंग पर लेटकर अपने खड़े लंड पर लगे वीर्य को चादर में ही पोछने लगा।

इधर नीलम ने झट से अपने दोनों पैर फिर से फैला लिए हालांकि उसने अपने बदन को पूरा चादर से ढका हुआ था, बिरजू पोजीशन बनाकर हाहाकारी मूसल जैसा काला लंड खोले उसकी दोनों टांगों के बीच बैठ गया और धीरे से बोला- मेरी बेटी.....मेरी बच्ची

नीलम शर्म से कुछ नही बोली और तेज तेज सांसें लेने लगी।

बिरजू ने अंधेरे में फिर बोला- नीलम.....मेरी बच्ची

नीलम बहुत धीरे से- हाँ बाबू

बिरजू- आखिर वो पाप करने का वक्त आ ही गया न, मुझे माफ़ कर देना बेटी।

नीलम- ऐसे न बोलो बाबू......बहुत शर्म आ रही है मुझे।

बिरजू- नीलम मेरी बच्ची......तू मेरी प्यारी बच्ची होने के साथ साथ एक यौवन से भरपूर स्त्री भी है और मैं सगा पिता होने के साथ साथ एक पुरुष भी हूँ, वैसे तो एक पुरुष जब एक यौवना स्त्री को देखता है या उसके बारे में सोचता है तभी उसके मन मे संभोग की इच्छा जागृत हो जाती है पर यहां मेरे और तेरे बीच सगे पिता पुत्री का जो रिश्ता है वो मुझे उत्तेजना के उस चरम पर नही जाने दे रहा जिससे एक सफल यौन संबंध स्थापित हो पाए और हम एक सफल संभोग करते हुए चरम सुख की प्राप्ति करें। ये पवित्र रिश्ता बीच में आड़े आ रहा है मेरी बच्ची। एक पिता का अपनी बेटी के साथ यौन संबंध बनाना महापाप है शायद यह सोच मुझे उत्तेजित होने से रोक रही है, और जब तक एक पुरुष अच्छे से उत्तेजित न हो वो सफल यौन संबंध कैसे बना पायेगा और सफल सभोग कैसे कर पायेगा, तू इस सोच के खंडित कर दे मेरी बच्ची।

नीलम बहुत लजाते हुए- मेरे बाबू.....एक बेटी होने के नाते मुझे बहुत लज़्ज़ा आ रही है पर मैं नही चाहती कि मेरे बाबू अपने दिए वचन को पूरा न कर पाएं और मेरी इच्छा अधूरी रह जाये, और उनके स्वाभिमान को ठेस पहुंचे, इसलिए आप ही मुझे बताइए कि आप पूर्ण रूप से कैसे उत्तेजित होंगे और में आपके आदर्श सोच को कैसे खंडित करूँ।

बिरजू कुछ देर चुप रहा फिर बोला- जब तक मैं तेरी महकती हुई जवान योनि नही देख लेता मुझे चरम उत्तेजना नही आएगी बेटी, एक आमंत्रित करती हुई योनि देखने के बाद ही एक पुरुष के अंदर मान मर्यादा की दीवार टूटती है मेरी बच्ची और वो रिश्ते नाते तक भूल जाता है, इतना तो तू समझ ही सकती है और जबतक ये पवित्र रिश्ते की दीवार नही गिरेगी हम उस कार्य को अंजाम नही दे सकते।

नीलम- बाबू......

बिरजू- हां मेरी बच्ची......मुझे अपना यौवन दिखाना होगा तुझे.......अपनी महकती हुई योनि दिखानी होगी आज अपने बाबू को।

नीलम सच में शर्मा गयी, क्योंकि महेंद्र भी एकदम बगल में चादर ओढ़े लेटा सब सुन रहा था उसका लंड भी लोहे की तरह दुबारा सख्त हो चुका था अपने ससुर की बातें सुनकर।

नीलम कुछ देर चुप रहने के बाद धीरे से शर्माते हुए बोली- बाबू जी तो फिर अपनी आंखें बंद कीजिए पहले......मैं धीरे से दिखती हूँ आपको अपनी योनि, आपकी अपनी ही सगी बेटी की योनि और आप भी उधर मुँह कर लीजिए (नीलम ने महेन्द्र को कहा तो महेन्द्र ने करवट बदलकर मुँह चादर में ढककर पलटकर लेट गया)

बिरजू ने अंधेरे में आंखे बंद की नीलम ने चादर को ऊपर कमर तक खींचकर अपनी मांसल जांघे बड़ी ही मादक अदा से खोल दी जिससे उसकी कमसिन रसीली बूर की फांके फैल गयी और बूर उभरकर बाहर की तरफ आ गयी, नीलम ने फिर शर्माते हुए टॉर्च उठायी और उसको अंधेरे में एकदम अपनी बूर के ऊपर लाकर जला दी।

बिरजू आँखे फाड़े अपनी सगी शादीशुदा बेटी की दामाद के वीर्य से भरी गीली बूर को देखकर मानो पागल ही हो गया, और बोला- आह मेरी बच्ची क्या योनि है तेरी, बहुत नरम और रसीली है ये तो और तेरी जांघे कितनी मोटी मोटी हैं मेरी बच्ची मेरी बेटी?

नीलम शर्म के मारे पानी पानी हो गयी

क्या बूर थी नीलम की, कितनी गीली हो रखी थी, दोनों फांके, फांकों के बीच मे तना हुआ भगनासा जो कि फूलकर लगभग अलग ही चमक रहा था, गीले गीले फांक फैलने से उनके बीच वीर्य के दो तीन तार बन गए थे, काले काले बालों से घिरी लगभग एक बित्ता लंबी बूर, जांघे फैलने से लगभग दोनों फांक खुल गए थे और अंदर का गुलाबी छेद जिसमे से महेन्द्र का वीर्य अब भी बहकर बाहर आ रहा था बरबस ही जल्द से जल्द लंड डालने के लिए ललचा रहा था। नीलम ने चुपके से अपना बायां हाँथ नीचे लेजाकर अपनी दो उंगलियों से बूर की फाँकों को अच्छे से चीरकर उसका गुलाबी गुलाबी रसीला छेद अपने बाबू को दिखाकर उनको और ललचाया और फिर अपने बूर के दाने को रगड़कर उनको जल्दी से जल्दी अपनी सगी शादीशुदा बेटी की बूर में अपना लंड डालने की विनती सी की और जमकर चोदने का इशारा किया।

बिरजू सच में आज नीलम की बूर देखकर वासना में दहाड़ उठा, अभी कल ही सारी रात इसी बूर को चोदा था पर न जाने क्यों आज अलग ही नशा चढ़ गया उसका लन्ड अपने पूरे ताव में आ गया, नीलम से झट से टॉर्च बंद की और बगल में रख दी वो समझ गयी कि अब उसके बाबू उसे रौंद डालेंगे उसने जिस तरीके से अपने बाबू को ललचाया था वो सच में आग लगा देने वाला था, बिरजू ने गरजते हुए जल्दी से अपने दहाड़ते लंड के मोटे सुपाड़े पर से चमड़ी खींचकर पीछे की और सीधे हाँथ से लंड को थामकर अपनी बेटी के मखमली गुदाज बदन पर चढ़ गया, नीलम ने भी झट से अंधेरे में अपने दोनों पैर फैलाकर अपने मनपसंद पुरुष की कमर में कैंची की तरह लपेट दिया और खुद ही अपनी विशाल गुदाज गाँड़ उठा कर अपने सपनो का पसंदीदा लौड़ा अपनी बूर की असीम गहराई में उतरवाने के लिए लपकने लगी, बिरजू ने जल्दी से उसपर झुकते हुए एक हाँथ को नीचे लेजाकर उसकी बूर की दोनों फांकों को चीरा और दूसरे हाँथ से 8 इंच लंबा और 3 इंच मोटा काले नाग जैसे लंड का फूला हुआ छोटी सी गेंद जैसा सुपाड़ा उसकी बूर की कमसिन से गुलाबी छेद पर रखा, गरम गरम सुपाड़े की छुवन अपने बूर की छेद पर महसूस कर नीलम हल्का सा सिसक गई, महेन्द्र ने भी इस सिसकन को भांप लिया कि लंड का सुपाड़ा बूर की छेद पर रखा जा चुका है, बिरजू ने वासना में चिंघाड़ते हुए "ओह मेरी बेटी मुझे माफ़ कर देना" अपना समूचा लंड एक ही बार में गनगना के बूर की अनंत गहराईयों में उतार दिया। नीलम इतनी जोर से सीत्कारी की उसकी आवाज आंगन तक गयी,

नीलम- "आआआआआआआआआआआआआआआआआआआआआआआआआहहहहहहहहहहहहहहहहहह.........बबबबबबाबाबाबाबाबूबूबू बूबूबूबूबूबूबूबूबूबूबू............... मेरीबूबूबूबूबूबूररररररर..........मर गयी दैय्या............हाय.......अम्मा............

धक्का इतना तेज था कि नीलम की दोनों जांघे अच्छे से फैल गयी थी और उसका बदन लगभग एक फुट ऊपर को सरक गया दोनों चूचीयाँ बुरी तरह हिल गईं, दोनों पैर हवा में ऊपर को उठ गए, दर्द से उसका मुँह खुल गया और वो बुरी तरह तड़प उठी, एक ही बार में उसके बाबू का काला लंड बूर की गहराई को चीरता हुआ उस जगह पर जा पहुंचा जिसके लिए नीलम कब से तरस रही थी, तेज तेज सिसकारियां लेते हुए उसकी साँसे फूलने लगी, पर न जाने क्यों उसे बहुत अच्छा लगा।

महेन्द्र भी समझ गया कि उसकी पत्नी की बूर में उसके ही सगे पिता का लंड समा चुका है, एक पिता का मूसल जैसा लन्ड अपनी ही शादीशुदा बेटी की कमसिन बूर में जड़ तक घुस चुका है, एक पिता और बेटी के बीच एक दर्दभरा रसीला यौनसंबंध कायम हो चुका है, उसका लंड जोश के मारे चिंघाड़ने लगा कि कैसे उसकी पत्नी उसी के बगल में लेटकर, उसकी मौजुदगी में ही अपने सगे पिता से चुद रही है और वो भी अपनी मर्ज़ी से........ये बात वाकई में उत्तेजना से लंड की नसें तक को फाड़ देने वाली थी, ये बात सच है कि लंड और बूर का कोई रिश्ता नही होता, महेन्द्र ने अंधेरे में धीरे से चादर में से मुँह निकाल कर दोनों बाप बेटी को देखने की कोशिश की तो देखकर उसका मुँह खुला का खुला रह गया।

महेन्द्र ने चुपके से देखा कि कैसे उसके ससुर ने अपनी बेटी को दबोच रखा है जैसे कोई शेर किसी कमसिन हिरन के बच्चे को दबोच के रखता है, दरअसल बिरजू पूरी तरह नीलम के ऊपर चढ़ गया था और उसका लन्ड जड़ तक नीलम की बूर में समाया हुआ था, नीलम तड़पती मचलती हुई बिरजू के नीचे सिसकते हुए पड़ी थी, थोड़ी देर चुप शांत पड़े रहने के बाद महेन्द्र ने जो देखा वो देखकर वो सन्न रह गया, नीलम ने अंधेरे में हल्का सा सिसकते हुए अपने दोनों हाँथ अपने बाबू की पीठ पर ले गयी और धीरे धीरे प्यार से सहलाने लगी, फिर उसने प्यार से अपने बाबू के बालों को सहलाया और धीरे धीरे दोनों हाँथ कमर से नीचे गाँड़ पर ले गयी और अपने बाबू की गाँड़ को अपनी बूर की तरफ बड़े प्यार से कई बार दबाया और दबाकर ये इशारा किया कि उसे उनका लन्ड अत्यधिक पसंद आया, इसका मतलब ये था कि बाबू आपका लंड मेरे पति के लंड से कहीं ज्यादा आनंददायक और रसीला है और मुझे यह भा गया, इतना ही नही नीलम ने अपने बदन को और मोड़कर अपने हाँथ को और नीचे लेजाकर सिसकते हुए अपने बाबू के दोनों बड़े बड़े लटकते हुए आंड मस्ती में भरकर हल्का हल्का कराहते हुए सहलाने लगी, ये एक स्त्री का अपना मनपसंद पुरुष प्राप्त करने के बाद अपनी खुशी जाहिर करने का तरीका था कि उस पुरुष का साथ उसका लंड उसे स्वीकार है, वो उससे चुदना चाहती है।

महेन्द्र ये देखकर एक अजीब सी गुदगुदी अपने अंदर महसूस करने लगा और चादर के अंदर ही अपना लंड हल्का हल्का हिलाने लगा, न जाने कौन सा आनंद उसे अपनी ही पत्नी को अपने पिता से चुदवाते हुए देखकर मिल रहा था।

महेन्द्र ने फिर देखा कि कैसे बिरजू ने नीलम के इस तरह उसे कबूल करने पर, उसके लंड की लज़्ज़त को स्वीकार करने पर, अपना आधा लंड बूर में से निकाल कर फिर दुबारा गच्च से बूर में घुसेड़ दिया तो इस बार नीलम के मुँह से न चाहते हुए भी निकल ही गया- ओह बाबू.....आपका लंड.....जरा धीरे घुसाइये।

आखिर नीलम भी कब तक चुप रहती वासना की आग में वो भी कब से जल रही थी

बिरजू ये सुनकर नीलम को बेताहाशा चूमने लगा और नीलम जोर जोर कराहने सिसकने लगी, नीलम भी अपने बाबू के सर को पकड़कर दनादन जहां तहां चूमने लगी, काफी देर तक दोनों एक दूसरे को चूमते रहे, नीलम से रहा नही गया तो उसने कह ही दिया- बाबू आप बहुत अच्छे हो।

बिरजू- आह मेरी बच्ची तू भी बहुत रसीली है......बहुत रसीली, ऐसा सुख मुझे आजतक नही मिला।

बिरजू का समूचा लन्ड महेन्द्र के वीर्य से सन चुका था।

नीलम ने धीरे से सराहा- बाबू

बिरजू- हाँ मेरी बच्ची

नीलम- अपना वो बहुत मोटा और लंबा है

(नीलम ने ये जानबूझकर महेन्द्र को सुनाने के लिए कहा)

बिरजू- वो क्या मेरी बेटी?

नीलम ने कराहते हुए कहा- आप समझ जाइये न बाबू?

बिरजू- मुझे नही समझ आ रहा तू बता न मेरी बच्ची।

नीलम ने कुछ नही बोला तो बिरजू ने दुबारा पूछा- बोल न नीलम....मेरी प्यारी बच्ची......बाबू का क्या अच्छा है।

नीलम - वो

बिरजू ने लन्ड से एक गच्चा बूर में मारा तो नीलम फिर कराह उठी और बिरजू बोला- बोल न बेटी.......तेरे मुँह से सुनकर ही शुरू करूँगा।

नीलम ने फिर शर्माते हुए बोला- आपका लंड

बिरजू- हाय मेरी बच्ची.......सच

नीलम- हाँ बाबू......बहुत रसीला है.......उसका आगे का भाग....उसका मुँह कितना चिकना है और बड़ा है इस वक्त मेरी बूर में कितने अंदर तक घुसा हुआ है।

बिरजू- तेरी वो भी तो कितनी रसीली और नरम नरम है।

नीलम - वो क्या बाबू?

बिरजू- वही जहां से मेरा नाती पैदा होगा?

नीलम- कहाँ से पैदा होगा बाबू.....बोलो न

बिरजू- मेरी बच्ची की बूर से, मेरी बेटी की चूत से।

नीलम ये सुनकर मस्ती में मचल गयी और बिरजु को "ओह मेरे बाबू" अपने मेरी इच्छा पूरी कर दी, करो न बाबू अब

महेन्द्र ने देखा कि कैसे उसके ससुर ने अपनी बेटी की चूचीयों पर से चादर हटा के उसको निवस्त्र कर दिया और नीलम ने रात के अंधेरे में उनका पूरा साथ दिया, महेन्द्र की आंखों के सामने अंधेरे में भी नीलम की दोनों विशाल चुचियाँ जोश के मारे तनी हुई थी अंधेरे में उनकी तनी हुई आकृति देखकर, उनका फूला हुआ आकार देखकर महेन्द्र का लंड मारे जोश के तन्नाया हुआ था, दोनों निप्पल कितने कड़क हो चुके थे ये साफ दिख रहा था, और अब कितनी बेशर्मी से नीलम खुद अपनी दायीं चूची को पकड़कर कराहते हुए अपने सगे बाबू के मुँह में चूसने के लिए दे रही थी।

बिरजू पागलों की तरह अपनी सगी बिटिया की मदमस्त फूली फूली गुदाज चूचीयों को मुँह में भर भर के बारी बारी पीने लगा और नीलम जोर जोर से मचलते हुए उन्हें बड़े प्यार से उनका सर सहलाते हुए अपनी चूचीयों पर दबाने लगी, नीलम खुलकर अब सिसकने लगी थी, तेज तेज अपने बाबू के सर को और पीठ को सहलाते हुए उन्हें बारी बारी से अपनी चूचीयाँ परोस परोस के निप्पल पिलाने लगी, महेंद्र ने चुपके से साफ देखा कि कैसे नीलम ने रुककर अपनी एक चूची अपने हांथों में ली और कितने प्यार से अपनी बाबू के मुँह में डाल दी।

इतना जोश महेन्द्र को अपने जीवन में कभी नही चढ़ा था, एक सगे बाप बेटी का मिलन वो अपनी आंखों से देख रहा था और न जाने क्यों उसे ये रोमांचित कर रहा था।

बिरजु नीलम की चूचीयों को खूब जोर जोर से कराहते हुए दोनों हांथों से दबाने मसलने लगा और दोनों पलंग पर एक दूसरे को बाहों में लिए पलटने लगे, नीलम से अब बर्दाश्त कर पाना मुश्किल हो गया तो उसने आखिर बिरजू से धीरे से कहा- बाबू

बिरजू- हाँ मेरी बच्ची

नीलम- पेलिये न अब......अब चोद दीजिए मुझे.......अपनी बच्ची को

बिरजू ये सुनकर फिर वासना से और भर गया और उसने बगल में रखा तकिया उठाया और उसको नीलम की गाँड़ के नीचे लगाने लगा नीलम ने अच्छे से गाँड़ उठा कर पूरा सहयोग किया।

नीलम की गाँड़ ऊपर उठने से बूर और ऊपर उठकर ऊपर को उभर गयी फिर बिरजू ने कस के एक तेज धक्का मारा तो नीलम दर्द से सिरहते हुए बोली- बस बाबू.....बहुत अंदर तक जा चुका है......अब चोदिये मुझे.....बर्दाश्त नही हो रहा है मुझे.....मर जाउंगी मैं........मेरी प्यास बुझा दीजिए........तृप्त कर दीजिए अपनी बच्ची को अपने लन्ड से।

नीलम का इतना कहना था कि बिरजु ने अपने दोनों हाँथ नीचे ले जाकर नीलम की चौड़ी गाँड़ के दोनों मांसल पाटों को थाम कर हल्का सा और उठा लिया जिससे नीलम का बदन अब किसी धनुष की तरह मुड़ गया था, पर उसे मजा बहुत आ रहा था, तेज दर्द में भी असीम सुख की अनुभूति उसे हो रही थी।

बिरजू ने नीलम के होंठों को चूमते हुए धीरे धीरे बूर में धक्का मारना शुरू किया, नीलम ने भी अपने बाबू के होंठ चूसते हुए कस के उन्हें बाहों में भरकर अपने पैरों को अच्छे से उनकी कमर से लपेट दिए।

अभी धीरे धीरे ही बूर में धक्के लग रहे थे कि इतने से ही नीलम को असीम आनंद आने लगा और वो सातवें आसमान में उड़ने लगी, उसे अपनी बूर में अपने ही सगे पिता के लन्ड का आवागमन इतना प्यारा लग रहा था कि वो सबकुछ भूलकर लन्ड में ही खो गयी, लन्ड के ऊपर फूली हुई मोटी मोटी नसें कैसे बूर की अंदरूनी मांसपेशियों से रगड़ खा रही थी, कैसे उसके बाबू के लन्ड का मोटा सा सुपाड़ा बार बार बूर की गहराई में अंदर तक बच्चेदानी पर ठोकर मारकर उसे गनगना दे रहा था, कैसे उसके बाबू चोदते वक्त बीच बीच में अपनी गाँड़ को गोल गोल घुमा घुमा कर लन्ड को आड़ा तिरछा बूर में कहीं भी पेल दे रहे थे जिससे नीलम जोर से सिसक जा रही थी।

बिरजू अब थोड़ा तेज तेज धक्के मारने लगा, नीलम का समूचा बदन तेज धक्कों से हिल जा रहा था, नीलम की आंखें असीम आनंद में बंद थी और वो परमसुख की अनुभूति और रसीले धक्कों की कायल होकर " आह.... बाबू....ऊई मां.....उफ़्फ़फ़फ़.....आह.....ऐसे ही बाबू........तेज तेज बाबू........पूरा पूरा डालो न........हाँ ऐसे ही........अपने दोनों हांथों को मेरी पीठ के नीचे ले जाकर कस के आगोश में लो न बाबू मुझे.........हाँ ऐसे ही.......गोल गोल घुमा के गच्च से पेलो न बूर में.. ....हाँ बिल्कुल ऐसे ही..........आआआआहहहह.......और पेलो बाबू....ऐसे ही........मारो मेरी चूत बाबू.......अपनी बच्ची की चूत मारो......आखिर चूत तो मारने के लिए ही होती है........तेज तेज करो.........कितना अंदर तक जा रहा है अब आपका लंड........... मेरी बच्चेदानी को हर बार चूम कर आ रहा है मेरे सपनों का लन्ड.........चोदो बाबू मुझे......ऐसे ही.......हां..... ऊऊऊऊऊईईईईईईईईई......... मां....... कितना तेज धक्का मारा इस बार.......थोड़ा धीरे बाबू........हाय मेरे बाबू।

अत्यधिक जोश में नीलम ऐसे ही बोले जा रही थी, अब वो बिल्कुल खुल चुकी थी उसे अब ये भी होश नही था कि बगल में महेंद्र लेटा हुआ चादर के अंदर से सब देख रहा है, और खुद महेन्द्र नीलम को अपने पिता से चुदवाते हुए देखकर अपना लन्ड हिलाकर एक बार और झड़ चुका था।

बिरजू बीच बीच में रुककर अच्छे से अपनी गाँड़ को गोल गोल घुमाकर अपने मोटे लन्ड को बूर में गोल गोल बूर के किनारों पर रगड़ने की कोशिश करता था जो नीलम को बहुत पसंद था वो अपने बाबू के इसी हरकत की कायल थी, जब भी बिरजू ऐसा करता नीलम जोर जोर से अपनी गाँड़ नीचे से उछाल उछाल के अपने बाबू की ताल में ताल मिलाती और रसभरी चुदाई का भरपूर मजा लेती।

बिरजू का लन्ड इतना जबरदस्त नीलम की बूर को चीरकर उसमे घुसा हुआ था कि नीलम की बूर किसी रबड़ के छल्ले की तरह लन्ड के चारों ओर फैलकर चिपकी हुई थी।

बिरजू के धक्के अब बहुत तेज हो चले थे पूरी पलंग हल्का हल्का चरमरा रही थी, जहां पहले शर्म और लज़्ज़ा कि वजह से बड़ी मुश्किल से सिसकियां निकल रही थी वहीं अब पूरा कमरा तेज तेज चुदाई के आनंद भरे सीत्कार से गूंज उठा था, चुदाई की फच्च फच्च की आवाज वासना को और बढ़ा दे रही थी, तेज तेज धक्कों से दोनों बाप बेटी की अंदरूनी जाँघों की टकराने की थप्प थप्प की आवाज अलग ही आनंद दे रही थी।

इतनी तेज तेज वहशीपन से भी बूर को चोदा जाता है ये नीलम आज महसूस कर रही थी और इस वहशी और जंगलीपन चुदाई का तो अनोखा ही मजा था, और बगल में लेटा कोई देख रहा है ये रोमांच अलग ही सुरसुरी बदन में पैदा कर रहा है।

बिरजू अब पागलों की तरह बहुत तेज तेज हुमच हुमच कर अपनी कमसिन सी बेटी की बूर में अपना वहशी लन्ड पेलने लगा और नीलम को इससे अथाह आनंद आने लगा, नीलम जोर जोर से कराहते और हाय हाय करते हुए नीचे से अपनी गाँड़ तेज तेज उछालने लगी, दोनों बाप बेटी अब मदरजात नंगे पलंग पर एक दूसरे में समाए हुए थे, चादर अस्त व्यस्त होकर बदन से हट चुका था, बाहर घनघोर बारिश होने लगी थी, काफी देर तक बिरजू दनादन अपनी बेटी की चूत मारता रहा, तभी तेज बिजली कड़की और एक बार फिर पूरे कमरे में रोशनी फैल गयी, एकाएक नीलम और बिरजू ने एक दूसरे को देखा और दोनों वासना में मुस्कुरा उठे नीलम ने मारे शर्म के अपना चेहरा अपने बाबू के सीने में छुपा लिया, तभी न जाने क्यों बिजली कई बार चमकी, कभी धीरे कभी तेज, कभी बहुत तेज, इस दौरान नीलम और बिरजू ने एक दूसरे को आपस मे चुदाई करते हुए अच्छे से देखा और नीलम बार बार शर्मा गयी, बिरजू कस कस के अपनी शादीशुदा बेटी की चूत मारते हुए उसके होंठों को अपने मुंह में भरकर पीने लगा, नीलम के बदन में एक सनसनाहट सी होने लगी, उसकी रसीली बूर की गहराई में तरंगे उठने लगी, किसी का होश नहीं रहा उसे अब, नीचे से खुद भी गाँड़ उछाल उछाल के अपने पिता से अपनी चूत मरवा रही थी, तभी बिरजू ने अपनी जीभ नीलम के मुँह में डाली और जैसे ही तेज तेज धक्के चूत में मारते हुए अपनी जीभ नीलम के मुंह में घुमाने लगा नीलम जोर से कराहती हुई गनगना के अपनी गाँड़ को ऊपर उठाते हुए अपनी बूर में अपने बाबू का लंड पूरा लीलते हुए झड़ने लगी, उसकी बूर से रस की धार किसी बांध की तरह टूटकर बहने लगी, उसकी बूर अंदर से लेकर बाहर तक संकुचित होकर काम रस छोड़ने लगी, उसकी बूर की एक एक नरम नरम मांसपेशियां मस्ती में सराबोर होकर मानो अपने बाबू के लन्ड से लिपटकर उसका धन्यवाद करने लगीं, गनगना कर वो बहुत देर तक अपने बाबू से लिपटकर हांफती रही, काफी देर तक उसकी बूर झड़ती रही, इतना सुख सच में आज पहली बार उसे मिला था। बिरजू का लन्ड अभी भी नीलम की चूत में डूबा हुआ था, वो नीलम को अपने आगोश में लिए बस प्यार से चूमे सहलाये जा रहा था, बिजली अब भी हल्का हल्का कड़क रही थी, बारिश हो रही थी, अब बिरजू से भी बर्दाश्त नही हो रहा था उसके लन्ड की नसें भी मानो जोश के मारे फटी जा रही थी।

थोड़ी ही देर के बाद जब नीलम की उखड़ती साँसे कुछ कम हुई बिरजू ने अपने लंड को अपनी बेटी की चूत से बाहर खींचा और गच्च से दुबारा रसीली चूत में डाल दिया नीलम फिर से गनगना गयी लेकिन अब बिरजू कहाँ रुकने वाला था अपनी बेटी को उसने फिर अपने आगोश में अच्छे से दबोचा और जमकर उसकी चूत मारने लगा नीलम बेसुध सी हल्का हल्का सिसकते हुए अपनी कमसिन सी चूत फिर से अपने बाबू से मरवाने लगी, तेज तेज धक्के मारते हुए अभी दो तीन ही मिनिट हुए होंगे कि बिरजू भी अपनी बेटी की नरम चूत की लज़्ज़त के आगे हार गया और तेज तेज कराहते हुए झड़ने लगा "ओह मेरी बच्ची कितनी मुलायम और नरम चूत है तेरी......आआआआआहहहहह.......इतना मजा आएगा अपनी बेटी को चोदकर........उसकी चूत मारकर......ये कभी सपने में भी नही सोचा था.......आह मेरी बच्ची......चूत इतनी भी नरम और लज़्ज़त भरी होती है आज तेरी चूत मारकर आभास हुआ मेरी बच्ची.......आह

नीलम ने बिरजू को चूमते हुए अपनी बाहों में भर लिया और बिरजू मोटी मोटी वीर्य की गरम गरम धार नीलम की चूत में उड़ेलते हुए उसपर जोर जोर से हांफते हुए लेट गया, नीलम की बूर अपने बाबू के गरम गरम गाढ़े वीर्य से भर गई, नीलम अपने बाबू का गाढ़ा गर्म वीर्य अपनी बूर की गहराई में गिरता महसूस कर गुदगुदा सी गयी, दोनों बाप बेटी अपनी उखड़ी सांसों को काबू करते हुए एक दूसरे को बेताहाशा चूमने लगे, बाहर तेज बारिश लगातार हो रही थी, कभी तेज बिजली चमकती तो दोनों एक दूसरे को देखकर मुस्कुरा देते, बिरजू ने बड़े प्यार से नीलम के चेहरे को अपने हांथों में लिया और होंठों को चूमते हुए बोला- मेरी बच्ची.......आज कितना अनमोल सुख दिया तुमने अपने पिता को।

नीलम ने भी प्यार से अपने बाबू के होंठों को चूमा और बोली- मेरे प्यारे बाबू.....अपने भी तो अपनी बच्ची को तृप्त कर दिया अपने मोटे लन्ड से।

महेन्द्र चादर में मुंह ढके दोनों को देखता रहा।
 
आज ये update लिखने में पूरा दिन लग गया
 
Update- 73

बिरजू ने धीरे से नीलम के बगल में लेटते हुए अपना लंड उसकी रसीली जोश में उभरी और फूली हुई बूर में से निकाल लिया, जब लंड बाहर आने लगा तो बूर की अंदरूनी मखमली दीवारें जैसे उससे लिपट लिपट कर न जाने की विनती करने लगी और भरी हुई बूर के अंदर फिर से खालीपन होने लगा जिससे नीलम के मुंह से हल्का सा "अहह" की आवाज निकली, दोनों अगल बगल लेट गए, वीर्य की धार बूर से निकलकर जाँघों से होती हुई बिस्तर पर गिरने लगी, मानो लन्ड के निकल जाने से बूर आंसू बहाने लगी हो, बिरजू के काले लंड पर सफेद सफेद काम रस ऐसे लिपटा हुआ था मानो उसने मक्ख़न के डिब्बे में से अपना लंड निकाला हो, बिजली का कड़कना और तेज बारिश जारी था, जब जब रोशनी होती तब तब बिरजू और नीलम एक दूसरे को देखकर मुस्कुरा देते, नीलम ने पलटकर महेन्द्र की तरफ देखा, वो चादर ओढ़े सन्न पड़ा हुआ था मानो सो गया हो, पर वो सोया नही था बल्कि अपनी पत्नी को उसी के सगे पिता के साथ अतिआनंदमय व्यभिचार का सुख लेते हुए बार बार उत्तेजित हो रहा था।

बिरजू ने नीलम को अपनी तरफ खींचकर अपने आगोश में ले लिया, उसका थोड़ा शांत हुआ लन्ड नीलम की जाँघों में इधर उधर टकराने लगा मानो किसी घोड़े को मैदान में खुला छोड़ दिया हो और वो इधर उधर दौड़ लगाकर अपनी खुशी जाहिर कर रहा हो। लन्ड जो कि वीर्य से सना हुआ था नीलम की जाँघों और बूर पर जहां तहां टकराकर वहां भी काम रस लगा दे रहा था, जिसको नीलम बखूबी महसूस कर रही थी, नीलम को अपने बाबू का मस्तमौला लंड अपनी जाँघों और बूर पर जहां तहां टकराता हुआ असीम सुख की अनुभूति करा रहा था।

नीलम अपने बाबू की तरफ और सरककर उनके आगोश में आ गयी और अपनी नाक को धीरे से अपने बाबू की नाक से रगड़ने लगी, फिर अपनी नाक को अपने बाबू की नाक के दाहिने तरफ ले गयी और नाक की छोटी सी बाली को उनकी नाक पर बड़ी अदा से रगड़ने लगी, बिरजू को अपनी बेटी की ये अदा इतनी अच्छी लगी कि उसने उसकी नाक की बाली को कई बार चूमा फिर उसके होंठों को अपने होंठों में भरकर लगभग पीने सा लगा, नीलम ने मस्ती में आंखें बंद की और अपने बाबू के मचलते लंड को अपने नाजुक हांथों में ले लिया और उसपर लगे वीर्य को चादर से पोछने लगी फिर एक दो बार ऊपर से नीचे तक अच्छे से मुआयना किया, बिरजू ने चादर से पूरा का पूरा खुद को और नीलम को ढंक लिया फिर कान में धीरे से कहा-मुझे माफ़ कर देना बिटिया।

नीलम प्यार से अपने बाबू के लन्ड पर हाँथ फेरते हुए बोली- क्यों बाबू....आप ऐसा क्यों कह रहे हैं।

बिरजू ने नीलम के कान में फुसफुसा कर कहा- मैं तेरी कमसिन सी योनि को देखकर जंगली सांड बन गया था, पता नही क्यों उस वक्त क्या हुआ कि रहा ही नहीं गया, जी में आया कि इस प्यारी चूत को कस कस के चोद डालूं बस और वही मुझसे हो गया, आखिर अपनी ही सगी बेटी की कमसिन सी इस बूर पर इतना तेज तेज प्रहार नही करना चाहिए था मुझे, पर क्या करूँ योनि ऐसी है तेरी की उसे देखकर मैं पागल ही हो गया।

बिरजू ने ये बोलते हुए नीलम की गीली शांत पड़ी बूर को हथेली में भर लिया और उसकी गीली दरार में अपनी तर्जनी उंगली डुबोकर ऊपर से नीचे तक कुरेदने से लगा, नीलम अपने बाबू की जाँघों पर अपनी एक जांघ चढ़ा कर सिसकते हुए उनसे और कस के लिपट गयी कुछ देर अपने बाबू की उंगली को अपनी बूर पर इधर उधर रेंगते हुए महसूस कर उत्तेजित होती रही फिर बोली- बाबू....ये तो मेरा सौभाग्य है कि आप मेरी योनि देखकर बेसुध हो गए, एक पिता अपनी सगी शादीशुदा जवान बेटी की योनि उस वक्त देखकर बेकाबू तो हो ही जायेगा जब वो योनि खुद उसे आमंत्रित कर रही हो और बाबू बूर तो होती ही है कुचल कुचल कर चोदने के लिए.....आपका जंगलीपन तो मुझे बहुत अच्छा लगा, अगर ऐसा न होता तो मैं आपको रोक न देती, माना की थोड़ा दर्द हो रहा था पर अतुल्य सुख की अनुभूति भी हुई, जिसके लिए आज पूरे दिन मैं तरसी थी और दूसरी बात जब सांड को लाल कपड़ा दिखा के ललचाओगे तो वो जंगली तो बन ही जायेगा न, मैंने भी तो उंगलियों से चीरकर फाँकों के बीच लाल लाल दिखाया था न आपको, तो उसको देखकर पागल हो जाना तो लाज़मी है न और वो भी सगी बेटी की..योनि..का...छेद...। मुझे आपका जंगलीपन बहुत अच्छा लगा......बाबू.....बहुत अच्छा।

बिरजू- तेरी योनि ने सच में मुझे पागल कर दिया है मेरी बिटिया।

नीलम- मैं भी तो आपके विशाल लंड की दीवानी हो गयी हूँ। जब ये अंदर जाता है तो ऐसा लगता है कि मैं पूर्ण रूप से भर गई हूं, कहीं कोई कमी नही है।

ऐसा कहते हुए नीलम ने बिरजू के खड़े लन्ड को हथेली में भरकर हल्का सा मसल दिया, बिरजू ने कराहते हुए नीलम के गालों को चूम लिया।

बिरजू ने नीलम को अपने ऊपर चढ़ा लिया, चादर के अंदर ही नीलम धीरे से अपने बाबू के ऊपर लेट गयी, दोनों पूर्ण नग्न थे, नीलम का भरपूर भरा भरा मांसल बदन बिरजू के ऊपर आ गया, नीलम के बदन के एक एक कटिप्रदेश, उभार, उतार चढ़ाव, मादक गोलाईयों पर बिरजू के हाँथ रेंगने लगे, नीलम फिर से सिरहने लगी, बारिश होने की वजह से मौसम में थोड़ा ठंडक आ गयी थी, बाहर तेज हवाएं भी चल रही थी, कभी कभी खिड़की के पल्ले तेजी से खुलते और तेज आवाज के साथ फटाक से बंद हो जाते, लेकिन चादर के अंदर एक सगे बाप बेटी के पूर्ण नग्न बदन एक दूसरे से रगड़ रगड़ के अलग ही गर्मी पैदा कर रहे थे।

दोनों एक बार फिर से एक दूसरे के बदन को पूर्णतया सहलाने, दबाने में मग्न हो चुके थे, सहलाते सहलाते जब दोनों के हाँथ नीचे जाते तो एक दूसरे के उत्तेजित हो चुके लंड और बूर से खेलने लगते, खेलते खेलते दोनों और उत्तेजित हो जाते और कस कस के एक दूसरे से लिपटते, नीलम अपने बाबू के ऊपर चढ़ी हुई थी, कभी वो नीचे आ जाती और बिरजू उसके ऊपर चढ़ जाता, उस ऊपर नीचे के खेल में जब जब बिरजू का तन्नाया लंड अपनी बेटी की दहकती बूर की फांकों के बीच टकराता तो नीलम अपने कूल्हे हल्का सा दबा कर लंड को बूर में लेने की कोशिश करती और उसके मुँह से जोर की सिसकी निकल जाती।

बिरजू इस खेल के दौरान चादर को संभाले रहा, जहां कहीं से भी चादर हल्का सा खुलता वो उसे दुबारा दोनों के नग्न बदन पर अच्छे से डाल देता, उसने नीलम को एक बार फिर अपने ऊपर चढ़ा लिया और उससे बोला- तुम्हे अलग सा रोमांच का अहसाह हुआ।

नीलम शर्माते हुए बिरजू के ऊपर पूरा अच्छे से लेट गयी और बोली- बहुत रोमांच हुआ बाबू.....बहुत अच्छा लगा, एक अद्भुत गुदगुदी का अहसाह हुआ....बहुत अजीब सा भी लग रहा है.....अब भी लग रहा है

ऐसा कहते हुए नीलम महेन्द्र की तरफ देखने लगी, फिर बिरजू की तरफ देख कर अंधेरे में मुस्कुरा दी, नीलम और बिरजू की सांसें आपस में हल्का हल्का फुसफुसाते वक्त टकरा रही थी और जब सांसों के टकराने पर उनका ध्यान जाता तो दोनों को बहुत उत्तेजना होती और दोनों के होंठ आपस में मिल जाते, काफी देर दोनों एक दूसरे के होंठों को चूसते रहते और फिर कामुक बातें करने लगते कामुक बातें करते करते जब फिर होंठ हल्का हल्का फुसफुसाते हुए आपस में टकराते तो फिर दोनों एक दूसरे के होंठों को चूसने लगते ऐसा काफी देर चलता रहा।

दोनों के हाँथ एक दूसरे के यौनांग से लगातार खेल ही रहे थे जिससे दोनों काफ़ी उत्तेजित हो गये, नीलम ने धीरे से अपने बाबू के लंड की चमड़ी को खींचकर पीछे किया और चिकने गीले हो चुके मोटे सुपाड़े पर नरम नरम उंगलियां चलाने लगी, जब जब अपना अंगूठा सुपाड़े के छेद पर रगड़ती बिरजू के नितंब झनझना जाते और उसके बदन में तेज सुरसुरी होती, नीलम बार बार लंड की चमड़ी को सुपाड़े पर चढ़ाती फिर उतारती, चमड़ी उतार कर सुपाड़े को काफी देर उंगली और अंगूठे से रगड़ती, उसके छेद से निकल रहे गीले हल्के वीर्य को तर्जनी उंगली में लेकर पूरे सुपाड़े पर चुपड़ती और कभी कभी उंगली को ऊपर ला के हल्का सा चाट लेती, फिर हाँथ नीचे ले जाती और लंड से खेलने लगी, नीलम की इन अदाओं से लंड ने दुबारा से अपना विकराल रूप धारण कर लिया, नीलम बार बार लंड का पूरा पूरा मुआयना कर रही थी, हाथ को और नीचे ले जाकर जांघ और लंड के बीच की दरार में उंगलियां फिराती फिर दोनों आंड को अच्छे से हथेली में भरकर सहलाती। बिरजू भी मस्ती में आंखें बंद किये हुए चादर के अंदर अपनी सगी बेटी के एक एक अंग से खेल रहा था। कभी 36 साइज के चौड़े नितंबों को दोनों हथेली में लेकर सहलाता, तो कभी दोनों जाँघों पर हाँथ फेरता फिर कमर को सहलाते हुए धीरे धीरे पूरी नंगी पीठ पर हाँथ फेरता, नीलम कभी कभी तेज सिसकते हुए बिरजू के कंधों पर दांत गड़ा देती तो कभी गर्दन और गाल के पास चूमने लगती।

नीलम बहुत देर से अपने पिता के लन्ड से खेल रही थी, लंड को सहलाते सहलाते उसने उसकी चमड़ी को पीछे खींचकर सुपाड़ा बाहर निकाल लिया और अपने हांथों से उसे सीधा करके अपनी रस बहाती बूर के तने हुए दाने से रगड़ने लगी, बिरजू ने उसके दोनों नितंबों को पकड़कर उसकी बूर को लन्ड पर और दबा दिया, नीलम चादर के अंदर जोर से सिसक उठी, थोड़ी देर लंड को बूर की रसीली दरार में रगड़ने के बाद नीलम बोली- बाबू

बिरजू- हाँ बिटिया.....बोल न

नीलम- मुझे जोर से पेशाब आ रहा है।

बिरजू- पेशाब आ रहा है।

नीलम- हम्म्म्म

बिरजू- तो चल मैं अपनी बिटिया रानी को पेशाब करा लाऊं जैसे बचपन में करा के लाता था जब तू छोटी थी।

नीलम शर्मा गयी - नही आप लेटो मैं करके आती हूँ।

बिरजू ने धीरे से कान में फुसफुसा के कहा- चल न मेरे साथ वहीं फिर बाहर बारिश में करेंगे खूब।

नीलम को अब बात समझ में आई- अच्छा बाबू चलो मुझे पेशाब करा के लाओ, अंधेरे में मुझे बिजली चमकने से डर लग रहा है।

(नीलम ने महेन्द्र को सुनाते हुए कहा, महेन्द्र चादर को अच्छे से ओढ़ते हुए करवट बदल कर मुँह दूसरी तरफ करके मुस्कुराता हुआ लेट गया, उसको बस अब एक ही चीज़ का इंतज़ार था और वो थी उसकी बहन सुनीता)

नीलम बिस्तर पर से उठी और एक चादर से अपने रसीले छलकते यौवन को ढक लिया बिरजू भी पलंग पर से उठा अंधेरे में एक चादर उसने भी लपेट ली और नीलम को झट से अपनी बाहों में उठा लिया, नीलम बड़ी मादकता से अपने बाबू की बलशाली बाहों में आ गयी और उनसे लिपट गयी, बिरजू ने एक हाँथ नीलम के नितंब पर रखा और दूसरा हाँथ पीठ पर और नीलम को आधा अपने कंधे पर उठा लिया, नीलम की गोल गोल मोटी चूचीयाँ बिरजू के कंधे पर दब गई।

बिरजू नीलम को लेकर अंधेरे में दरवाजे तक आया और दरवाजे की सिटकनी खोली, बाहर तेज बारिश हो रही थी, खपरैल से पानी लगातार चू रहा था मानो झरना गिर रहा हो, बिरजू नीलम को कंधे पर उठाए दीवार के किनारे किनारे गुसलखाने की तरफ जाने लगा जैसे ही वो दीवार पार करके दूसरे कमरे की दीवार के किनारे किनारे बारिश से बचता हुआ नीलम को कंधे पर उठाए जाने लगा तो नीलम बोली- बाबू रुको यही, गुसलखाने में न जाओ, बारिश तेज हो रही है भीग जाएंगे, यहीं कर लेती हूं दीवार के पास, आंगन में से पार करके जा नही सकते मूसलाधार बारिश हो रही है, यहां खपरैल का ओट है रुको यहीं।

बिरजू ने ठीक है कहते हुए नीलम को उतार दिया, दोनों के चादर पानी की तेज बौछार से हल्का हल्का भीग से ही गए थे, जिससे बिरजू को भी तेज पेशाब लगी तो वो नीलम से बोला- मुझे भी पेशाब करना है अपनी बेटी के साथ, मुझे भी लगी है।

नीलम जोर से हंसते हुए- तो करिए न बाबू किसने रोका है।

नीलम मूतने के लिए वहीं बैठ गयी अपने बाबू को देखते हुए देखकर शर्मा गयी, तेज बारिश के साथ साथ बिजली चमकने से दोनों एक दूसरे को साफ देख ले रहे थे, नीलम ने जानबूझ कर मूतने के लिए चादर को अच्छे से अपनी कमर तक उठाया ताकि बैठने से उसकी चौड़ी मादक गाँड़ उसके बाबू को साफ दिख सके, बिरजू आँखें फाड़े अपनी बेटी की मादक गाँड़ को घूरने लगा, नीलम ने जानबूझ कर दिखाते हुए बैठकर अपनी बूर से पेशाब की एक तेज धार छोड़ते हुए मूतने लगी, नीलम के पेशाब की तेज धार लगभग एक फुट की दूरी पर जाकर बारिश के पानी में मिलने लगी।

बिरजू से रहा नही गया तो उसने अपना पेशाब दबा कर मूतती हुई नीलम के पास बैठकर अपना सीधा हाँथ नीलम की बूर पर ले गया और उसके गालों को चूमते हुए पेशाब निकालती हुई उसकी फैली हुई बूर को छुआ, नीलम सिरह गयी, उसने अपने बाबू के होंठों पर अपने होंठ रख दिये, बिरजू अपनी बेटी के होंठ चूसते हुए उसकी बूर टटोलने लगा, गरम गरम पेशाब उसके हाँथ से होकर जाने लगा, नीलम मदहोश हो गयी, बिरजू ने पेशाब करती हुई बूर को जी भरके छुआ, खुद को भी पेशाब करना था ये तो वो भूल ही गया।

नीलम मस्ती में शर्माती जा रही थी और सिसकते हुए मूतती जा रही थी, वाकई में उसको काफी तेज पेशाब लगा था, करीब 30 सेकंड तक वो मूतती रही और बिरजू ने जी भरके उसकी पेशाब छोड़ती बूर को सहलाया अपना पूरा हाँथ उसने अपनी सगी शादीशुदा बेटी के गरम गरम पेशाब से भिगो लिया।

नीलम- बाबू आप भी पेशाब कर लीजिए न....भूल ही गए क्या इसको छू कर

(नीलम ने बैठे बैठे कहा)

बिरजू ने ये सुनकर खड़ा होकर अपने शरीर से चादर हटाया और उसको गले में गमछे की भांति बांध लिया उसका काला लन्ड हवा में झूलने लगा नीलम बैठे बैठे उस काले लन्ड को आँखें फाड़े देखने लगी।

बिरजू ने नीलम को दिखाते हुए लंड की चमड़ी को पीछे खींचा और जोर से खड़े होकर मूतने लगा, नीलम को ये देखकर जोश भी चढ़ता गया और हंसी भी छूट गयी, वो उठी और पीछे से जाकर अपने बाबू से लिपट गयी, मोटे काले नाग जैसे लन्ड को हाथों में भर लिया और पेशाब की धार छोड़ते मोटे सुपाड़े पर उंगलियां फिराकर अपनी उंगलियां अपने बाबू के पेशाब में भिगोने लगी, मस्ती में नीलम पीछे से अपने बाबू को लगातार चूमे जा रही थी, कुछ ही देर में बिरजू पेशाब कर चुका था।

बिरजू ने एकाएक नीलम को कमरे की दीवार से सटाया और उसके एक पैर को उठाकर अपनी कमर पे चढ़ा लिया जिससे उसकी जांघे और बूर की गीली फांके खुल गयी और हल्का सा नीचे को झुककर अपने मोटे लंड के सुपाड़े को अपनी बेटी की मखमली बूर से भिड़ा दिया। नीलम जोर से सिसकते हुए बिरजू के ऊपर झूल सी गयी, बिरजू कुछ देर तक लंड को बूर से रगड़ता रहा, नीलम बिरजू पर लदी होने की वजह से उसकी बूर ऊपर थी और बिरजू का लंड नीचे जिससे लंड लगभग बूर में घुसने को तैयार बैठा था।

नीलम ने सिसकते हुए कहा - अब डाल दो न बाबू, चोद दो मुझे रहा नही जा रहा अब।

बिरजू ने अपने लंड के दहकते सुपाड़े को ठीक से बूर के मुहाने पर लगाया और नीलम उसपर बैठती चली गयी, मोटा खूंटे जैसा लन्ड एक बार फिर बूर की मखमली गहराइयों को चीरता हुए अंदर तक उतर गया, नीलम हल्का सा कराह उठी, बिरजू ने नीलम को उसकी गाँड़ पर हाँथ रखके उठा रखा था और नीलम अपना एक पैर अपने बाबू की कमर पर लपेटे केवल एक पैर पर खड़ी थी। नीलम का आधे से ज्यादा बदन अपने बाबू के बदन पर टिका था, लन्ड जबरदस्त बूर में घुसा हुआ था।

बिरजू ने नीलम को अपना दूसरा पैर भी कमर से लपेटने को कहा तो नीलम ने वैसा ही किया उसने अपने दोनों पैर अपने बाबू की कमर पर लपेट दिए और पूरी तरह अपने बाबू पर चढ़ गई, बिरजू नीलम को गोदी में लिए लिए दीवार के सहारे टिक गया और नीलम की गाँड़ को पकड़कर हल्का सा ऊपर को उठाकर अपना काला लन्ड बूर में से थोड़ा सा निकाला और एकदम से दुबारा नीलम को लन्ड पर बैठा दिया, नीलम की बूर में लन्ड जड़ तक सरसरा कर समा गया, नीलम की कोमल नरम नरम बूर एक बार फिर रबड़ के छल्ले की तरह फैल गयी, नीलम की बारिश में जोर से चीख निकल गयी- आह..... बाबू....चोदिये अब......खड़े होने की वजह से ये बहुत अंदर तक चला गया है......मेरी बूर तो फट ही जाएगी अब........ऊई अम्मा........बस बाबू.......अब चोदिये न बूर को....

बिरजू खड़े खड़े अपनी बेटी की बूर चोदने लगा, नीलम अपने बाबू की गोदी में मस्त चुदाई करवाते हुए मचलने लगी, मस्ती में कराहते हुए वो अपने बाबू के गालों को, होंठों को चूसने काटने लगी।

बिरजु दनादन नीचे से अपनी बेटी को चोदे जा रहा था, चुदाई का नाश इतना चढ़ चुका था कि नीलम खुद भी अपने बाबू के लन्ड पर उछलने लगी।

बिरजू कभी नीलम की गाँड़ को एक हाँथ से थाम लेता और दूसरे हाँथ से उसकी पीठ को सहलाता और मोटी मोटी चूचीयों को दबाता तो कभी दोनों हाँथ से उसकी चौड़ी गाँड़ को भींच देता।

नीलम से रहा नही गया तो उसने कराहते हुए धीरे से बोला- बाबू नीचे लिटा कर अच्छे से चोद दीजिए मुझे, खड़े खड़े आप भी थक जाओगे।

बिरजू को ये बात ठीक लगी, उसने नीलम को चूमकर नीचे उतारा और वहीं थोड़ी सी जगह में

जल्दी से चादर जमीन पर बिछा दिया, नीलम झट से पीठ के बल उसपर लेट गयी और जल्दी से अपनी दोनों जाँघों को फैलाकर अपने हांथों से अपनी बूर की फांकों को चीरकर थोड़ा ऊपर उठाकर बूर को अपने बाबू को परोसते हुए बोली- आओ बाबू जल्दी......डालो इसमें

बिरजू झट से नीलम पर चढ़ गया और जल्दी से एक हाँथ से लन्ड को बूर के मुहाने पर सेट किया और एक तेज धक्का मारते हुए अपनी बेटी की बूर में समा गया, नीलम एक बार फिर तेजी से कराहते हुए अपने बाबू से लिपट गयी, दोनों सिसकते हुए एक दूसरे को ताबड़तोड़ चूमते हुए बारिश में दीवार के सहारे थोड़ा छिपकर चुदाई करने लगे।

नीलम ने फिर एक बार अपने पैर अच्छे से अपने बाबू की कमर में लपेट दिए और बिरजू ने नीलम को अच्छे से अपने नीचे दबोच कर उसकी 36 साइज की चौड़ी मांसल गाँड़ को अपने दोनों हांथों में थामकर जमकर बूर में अपना मोटा लन्ड पेलने लगा।

नीलम अब मस्ती में हाय हाय करने लगी, बाप बेटी की वासनामय चुदाई ने पूरा माहौल एक बार फिर गरम कर दिया था, धक्के इतने तेज हो गए थे कि बारिश की आवाज में भी चुदाई की फच्च फच्च आवाज अलग से सुनाई दे रही थी।

नीलम- आआआआआआहहहहहह.......बाबू जी......चोदो ऐसे ही हुमच हुमच के मेरी बूर को.........ऊई अम्मा......हाय....... क्या लन्ड है मेरे बाबू का........सगी बेटी को चोदने में मजा आ रहा है न बाबू.........कितना अच्छा लगता है जब अंदर ठोकर मारता है आपका मोटा लन्ड..........ऊई मां.......बाबू जरा धीरे से........गोल घुमा घुमा के डालो न बाबू लन्ड अपना...........हाँ ऐसे ही.......हाय.......

नीलम मदहोशी में ऐसे ही कामुक सिसकारियां लेते हुए नीचे से बराबर अपनी गाँड़ उछाल उछाल के अपने बाबू से चुदवा रही थी।

लगभग 15 मिनट की घनघोर चुदाई के बाद दोनों बाप बेटी एक साथ थरथरा कर झड़ने लगे, दोनों अमरबेल की तरह एक दूसरे से लिपटे हुए एक दूसरे को चूमने लगे, दोनों को ही ये होश नही था कि वो इस वक्त आंगन में अपने दूसरे कमरे की दीवार की आड़ में चादर बिछाए उसपर लेटकर चुदाई कर रहे हैं और बगल में ही घनघोर बारिश हो रही है, काफी देर तक दोनों झड़ते हुए अपनी उखड़ती सांसों को समेटते रहे, फिर नीलम ने अपनी आंखें खोलकर बिरजू को देखा बिरजू नीलम को ही देख रहा था, नीलम बिरजू को उसे ही देखता हुआ पाकर शर्मा गयी।

बिरजू- मजा आया मेरी बिटिया।

नीलम - फिर बिटिया

बिरजू- अरे अभी तो दामाद जी हैं न

नीलम- तो यहां कहाँ हैं वो, कोने में अकेले में तो बोल ही सकते हो।

बिरजू- अच्छा मेरी रांड......मजा आया।

नीलम- धत्त गंदे......हाँ मजा आया....बहुत मजा आया मेरे बाबू... .आपकी रांड आपका लन्ड पाकर तो मस्त हो जाती है.....कसम से।

फिर बाप बेटी एक दूसरे को चूमने लगे, कुछ देर बाद उठकर अंदर कमरे की तरफ चल दिये।
 
Update- 74

बिरजू और नीलम कमरे में जाकर चुपचाप पलंग पर एक दूसरे को बाहों में भरकर लेट गए, महेन्द्र सोचते सोचते सो ही गया था, बिरजू और नीलम भी काफी थक गए थे तो वो भी एक दूसरे की बाहों में सो गए।

इस तरह विक्रमपुर में पाप ने अपने पैर पसारने शुरू कर दिए थे, जो काम नीलम, बिरजू और महेन्द्र कभी सपने में भी नही सोच सकते थे आज वो सब कर डाला था, नियति तो बहुत खुश थी।

रात के 3 बज चुके थे बारिश कभी तेज तो कभी धीमी धीमी हो ही रही थी।

(तो चलिए अब चलते हैं जरा हमारी नायिका रजनी के पास और देखते हैं कि वहां क्या हो रहा है, रजनी की कहानी को यहां एक दिन पीछे जाकर देखना होगा, बात यहां से शुरू होती है जब नीलम रजनी के पास चूड़ीवाली के बारे में बताने के लिए दोपहर में आ रही थी परंतु वापिस चली गयी थी)

काकी ने नीलम को ये तो बोल दिया था कि वो शाम को नीलम के घर आएंगी पर वो और रजनी जा न सकी, दिन में जब नीलम वापिस चली गयी थी उस वक्त रजनी और उदयराज सो ही रहे थे, नीलम के वापिस जाने के ठीक आधे घंटे बाद रजनी उठती है।

रजनी- काकी...ओ काकी

काकी - हां बिटिया, उठ गई

रजनी- हाँ काकी....अब जाके थकान मिटी है कुछ

काकी- जा फिर जा के अपने बाबू को भी उठा दे, खाना तैयार है तुम लोग खा लो, फिर मैं जाउंगी जरा अपने घर।

रजनी- अपने घर.....क्या हुआ

काकी- अरे वो मेरे दालान के बगल में जो कटहल का पेड़ है न उसपर एक बहुत बड़ा मधुमक्खी का छत्ता है, काफी पुराना हो गया है, तो मैंने शहद निकालने वाले को बुलाया हुआ था वो अभी आएगा थोड़ी देर में, तो उसी वजह से जाउंगी, शहद निकलवा के ले आऊंगी, तू एक बाल्टी और कुछ उपले मुझे दे देना धुआं करने के लिए, बाकी समान तो उनके पास होता ही है। घर का पुराना शहद है, काफी काम आएगा इसलिए सोचा अब छत्ता निकलवा देती हूं, काफी मधुमखियाँ लदी रहती हैं उसपर हमेशा जो कि खतरनाक है।

रजनी- ठीक है काकी...आप बड़ा बर्तन ले जाना, छत्ता बड़ा है तो काफी शहद मिल जाएगा।

काकी- हाँ देखो....कितना निकलता है.....तू उठ जा और जा के अपने बाबू को जगा दे जल्दी.......अच्छा तू रुक मैं ही जा के उदय को जगाती हूँ तू हाँथ मुँह धो ले तब तक।

रजनी- काकी आप बाबू को जगा के लाओ तब तक मैं ही खाना निकाल देती हूं।

काकी- ठीक है.....निकाल दे सबका खाना और हां नीलम आयी थी अभी कुछ देर पहले।

रजनी- नीलम आयी थी।

काकी- हाँ.... दौड़ी दौड़ी आ रही थी तेरे को बताने की चूड़ीवाली आयी है पर मैंने ही बोला कि रजनी तो अभी सो रही है रात को काफी जगने की वजह से अभी दिन में सो रही है तो फिर बोली कि चलो मैं ही उसकी चूड़ियां पसंद करके ले लूँगी सोने दो रजनी को, और ऐसा कहकर वापिस चली गयी।

रजनी- क्या काकी अपने ऐसे बोल दिया कि रात में काफी जगने की वजह से।

काकी- अरे मैंने बहाना लगा के बोला कि रात को छोटी गुड़िया परेशान कर रही थी इसलिए सो नही पाई वो और अब दिन में उसकी आंख लग गयी है।

रजनी- अच्छा....फ़िर ठीक है.....मेरी सहेली बेचारी नीलम......कितना फिक्र करती है मेरी...काकी आप मुझे उठा देती न.....वो बेचारी मुझे बुलाने आ रही थी और आपने उसे रास्ते से ही वापिस भेज दिया, मैंने ही उसको बोला था कि जब चूड़ीवाली आएगी तो मुझे भी बताना।

काकी- अरे चलो कोई बात नही, उसके घर जा के ले आना और मिल भी लेना उससे।

रजनी- चलो ठीक है.....अभी जाउंगी शाम को या कल चली जाउंगी।

काकी- ठीक है.....मैं भी चलूंगी......उसकी अम्मा भी नही है बिरजू और वो अकेले ही होंगे दोनों।

फिर काकी गयी और उदयराज को उठाया, वही शहद वाली बात काकी ने उदयराज को भी बताई, सबने मिलकर दोपहर का खाना खाया और काकी बड़ी बाल्टी और उपले लेकर चली गयी अपने घर की तरफ। उस वक्त थोड़ी धूप खिली हुई थी।

काकी के जाते ही उदयराज घर मे आया और झट से रजनी को पीछे से बाहों में ले लिया और उसकी गर्दन और गालों पर जोरदार कई चुम्बनों की बौछार कर दी, रजनी को इस बात का आभास नही था वो थोड़ा चिहुँक सी गयी, फिर चुम्बनों के असीम सुख में खो गयी।

रजनी- मौके की तलाश में थे.. मेरे बाबू....ह्म्म्म

उदयराज- जिसकी बेटी इतनी खूबसूरत हो और उसी की हो चुकी हो तो वो भला क्यों न होगा मौके की तलाश में।

रजनी- हम्म ये तो है बाबू.....जिसके बाबू इतने अच्छे हो वो भला क्यों न हो जाये अपने ही बाबू की......अच्छा बताओ नींद पूरी हुई आपकी।

उदयराज- थोड़ी थोड़ी......पर अभी ज्यादा सोना भी नही था मुझे।

रजनी- ज्यादा सोना नही था मतलब

उदयराज- मतलब सोता ही रहूंगा तो पीछे वाली रसोई का खाना कब खाऊंगा, तुमने बोला था न कि थोड़ा आराम कर लेते हैं फिर दोपहर में अमरूद के पेड़ के नीचे खुले में मुझे पीछे वाली रसोई को खोलकर उसका खाना खिलाओगी।

रजनी- धत्त......पगलू.....बदमाश कहीं के....पीछे वाली रसोईं

उदयराज- हाँ मेरी जान.....पीछे वाली रसोई

रजनी मुस्कुराते हुए अपने बाबू की तरह पलटी और कस के उनसे लिपट गयी, उदयराज ने रजनी के भारी भरकम नितंब अपनी हथेली में थाम लिए और हल्का हल्का दबाने लगा।

रजनी- अच्छा जी.......पीछे वाली रसोई के खाने के इंतज़ार में बैठे हो आप, और मान लो काकी नही गयी होती तो।

उदयराज- तो भी अपनी बेटी को प्यार करने का मौका तो ढूंढ ही लेते।

रजनी- तो चलिए फिर दालान के बगल में अमरूद के पेड़ के नीचे, एक छोटी सी खाट ले चलिए बाबू और एक तकिया भी, वहां धूप भी आ रही है अच्छी, कोई उधर आता भी नही, तीनो तरफ से ओट है उधर।

उदयराज मारे खुशी के- अब आएगा मजा।

रजनी खिलखिलाकर हंस पड़ी और अपने बाबू के गाल खींचते हुए बोली- बदमाश बाबू.....बहुत इंतज़ार है तुम्हे पीछे वाली रसोई का.....गंदे.....बहुत गन्दू हो तुम।

उदयराज ने रजनी की गाँड़ को सहलाते हुए इशारा करके बोला- क्या करूँ ये है ही इतनी कामुक की इनको देखकर रहा नही जाता।

रजनी सिसकते हुए- तो चलो चखाती हूँ अपने बाबू को ये भी.....धूप में लेट कर

उदयराज ने रजनी को चूमा फिर एक छोटी खाट और तकिया लेकर दालान के पीछे अमरूद के पेड़ के नीचे आ गया, वाकई में सुनहरी धूप खिली हुई थी, मिलने वाले मजे के बारे में सोच सोच के उदयराज का लंड धोती में टनटनाया हुआ था, बार बार वो अपने 9 इंच मोटे लंड को हाथों से धोती के अंदर सेट कर रहा था।

अमरूद का पेड़ रजनी के घर के उत्तर की तरफ बने दालान जिसमे पशु बांधे जाते थे के पच्छिम की तरफ दीवार के पास था, सामने रजनी का घर ही था, पीछे के तरफ काकी के घर की दीवार थी, और सामने पस्चिम का एरिया पूरा दूर दूर तक खुला हुआ था, खेत ही खेत थे जिसमें ज्यादातर लंबी लंबी बाजरे की, मक्के की, और अरहर की दाल की फसल लगाई हुई थी, उस तरफ से सीधी धूप दालान के दीवार पर अमरूद के पेड़ से छनकर पड़ती थी।

रजनी की बेटी अभी सो ही रही थी उसने सोते सोते ही उसे थोड़ा और दूध पिला दिया जिससे कि वो उठे न, कुछ देर और सोती रहे, बेटी को उसने बरामदे में खाट पर सुला कर थोड़ी देर थपकी दी और एक कजरौटा और चाकू उसके सर के पास रखा ताकि वो सोते सोते कोई बुरा सपना देखकर चौंके न, वो निश्चिन्त होकर गहरी नींद सो गई।

दिन में ही खुले में चुपके चुपके अपने बाबू के साथ जवानी का खेल खेलने के बारे में सोचकर ही रजनी की भी साँसे वासना में कब से फूल रही थी, जल्दी से अपनी बेटी को सुलाकर वो साड़ी का पल्लू ठीक करती हुई इधर उधर एक बार नज़र दौड़ाती हुई दालान के पीछे चली गयी जहां उसके बाबू खाट पर लेटे उसका इंतजार कर रहे थे, धूप खिली हुई थी।

दोनों एक दूसरे को देखकर मुस्कुराए।

रजनी ने एक बार थोड़ा आगे बढ़ कर खेतों का मुआयना करना चाहा कि कहीं कोई आस पास है तो नही, पर अक्सर उधर कोई आता नही था फिर भी रजनी गयी, रजनी जब जा रही थी तो उदयराज अपनी बेटी के थिरकते हुए मादक चौड़े नितंब देखकर मंत्रमुग्ध सा होता जा रहा था, रजनी ने कुछ दूर आगे जाकर इधर उधर अच्छे से देखा और पलट कर दूसरी तरफ से घूमकर आने लगी पर वहां रास्ते में एक थोड़ी चौड़ी नाली थी जिसमे से पानी बहकर खेतों में जा रहा था, रजनी उछलकर नाली पार करती हुई अपने बाबू के पास आ गयी, उदयराज रजनी को ही निहार रहा था, नाली पार करते वक्त उछलने से रजनी की मादक 34 साइज की दोनों भरी भरी चूचीयाँ ब्लॉउज के अंदर एक बार तेज और दो बार हल्का सा उछल गयी जिसको देखकर उदयराज मदहोश हो गया।
 
Update- 75

रजनी अपने बाबू के पास आकर बोली- मेरे शुग्गू बाबू दूर दूर तक कोई नही है सुनसान है सब जगह खेतों की ओर, पर फिर भी जोखिम लेना ठीक नही और काकी का भी कोई भरोसा नही क्या पता बीच में कुछ लेने ही आ जाएं, इसलिए मैं जल्दी से घर में से एक चादर लाकर अमरूद के पेड़ की लटकती डाली से बांधकर लटका देती हूं इस तरफ से थोड़ा ओट हो जाएगा और वैसे ही काकी को भी एक नज़र देख आऊंगी.........जाऊं मैं?

(रजनी ने बड़ी मासूमियत से अपने बाबू की तरफ देखकर पूछा)

उदयराज ने झट से रजनी की बांह पकड़ के अपनी तरफ खींचा और रजनी लड़खड़ाती हुई अपने बाबू की गोद में जा बैठी, उसका छलकता गदराया यौवन उदयराज की बाहों में आ गया, उदयराज का खड़ा लंड सीधा रजनी की रसगुल्ले जैसी गाँड़ में धस गया जिससे रजनी मुस्कुराती हुई "ऊई अम्मा, कितना खड़ा है ये बदमाश" बोलकर थोड़ा उछल सी गयी।

उदयराज- जल्दी दोगी नही तो ऐसे ही इंतजार करता रहेगा और ऐसे ही सारा वक्त निकल जायेगा बिटिया रानी।

रजनी- अरे मेरे शुग्गू मुग्गु बाबू.....मेरा तो सबकुछ आपका है......मैं तो खुद तड़प रही हूं आपको देने के लिए, पर जरा सावधानी से न, कोई देख लेगा तो ये पाप करते हुए, फिर मजा किरकिरा हो जाएगा......मैं बस जल्दी से आती हूँ थोड़ा सा और बर्दाश्त कर लो।

(ऐसा कहकर रजनी ने उठते हुए अपने बाबू का खड़ा हो चुका मोटा लंड हल्का सा मसल दिया जिससे वो धोती में और उछलने लगा।)

उदयराज- सुनो

(उदयराज ने रजनी को खींचकर फिर से गोद में बैठा लिया, रजनी फिर "हाय दैय्या" बोलती हुई थोड़ा हंसकर गोद में बैठ गयी)

रजनी- ह्म्म्म.....जाने दो न बाबू।

उदयराज- तेल लेती आना जरूर....तेल लगा के करेंगे।

रजनी- धत्त......

उदयराज- हाय मेरी बेटी तेरी अदा....…ले आओगी न तेल....सरसों के तेल से बहुत चिकना चिकना हो जाएगा सब।

रजनी- नही......बिल्कुल नही

उदयराज- क्यों.....ले आना न....नही तो तुम्हें दर्द होगा जब डालूंगा अंदर।

रजनी- तेल नही

उदयराज- फिर

रजनी ने धीरे से अपने बाबू के गाल चूमकर कहा- थूक......थूक लगा के डालना अंदर।

उदयराज- हाय.....थूक......

रजनी- हम्म.......थूक

उदयराज- थूक से ज्यादा मजा आता है?

रजनी ने मुस्कुराते हुए अपने बाबू के गाल पर चिकोटी काट ली फिर झट से अपने मुंह से हल्का सा थूक अपनी उंगलियों में लिया और अपने बाबू के होंठों पर लगाते हुए "हाँ" कहकर शर्माकर भाग गई, उदयराज उसे पीछे से भागता हुआ देखकर अपना खड़ा लंड मसलने लगा।

रजनी पहले गयी काकी के घर की तरफ दूर से उसने काकी को देखा, शहद वाला आ चुका था पेड़ पर अभी चढ़ने ही जा रहा था, काकी थोड़ी दूर जमीन पर मचिया लेकर बैठी थी।

रजनी ने जानबूझकर काकी को दूर से बुलाया- काकी

काकी ने पलट के देखा और बोली- अरे तू यहां क्यों चली आयी पगली, देख वो शहद निकालने वाला धुआं ले कर पेड़ पर चढ़ रहा है, मधुमक्खियां कैसे भनभनाने लगी है, मैं भी देख कितना दूर बैठी हूँ, काट लेगी बिटिया मधुमक्खी...... जा यहां से

(काकी रजनी को देखकर दूर से ही चिल्लाई)

रजनी- अरे काकी मैं तो पूछने आयी थी कि किसी चीज़ की जरूरत तो नही...जरूरत हो तो मैं ले आऊं।

काकी- नही नही......कुछ जरूरत नही..... बस इतना ही समान चाहिए.....बाकी सब उसके पास है....अब तू जा यहां से और एक दो घंटे इस तरफ मत आना......उदय को भी बोल देना इधर न आये...मैं आऊंगी दो घंटे बाद.....तू जा घर पर।

रजनी- काकी आपको नही काटेगी मधुमक्खी?

काकी- अरे इन शहद निकालने वालों के पास एक किस्म का न जाने कौन सा तेल होता है वही उसने मुझे भी दिया लगाने को वहीं हाँथ पैर और मुंह में लगा के बैठी हूँ, इससे नही लगती मधुमक्खी.......कितना बदबूदार है तेल.....अभी शाम को नहाना पड़ेगा.....खैर.... जा तू अब यहां खड़ी क्यों है.....मैं आऊंगी दो घंटे बाद।

रजनी- ठीक है काकी.....ढेर सारा शहद लाना

काकी- हां ठीक है

इतना कहकर रजनी मंद मंद मुस्कुराते हुए उल्टे पैर जल्दी से वहां से आ गयी, अब वो आस्वस्त हो गयी थी कि काकी दो घण्टे से पहले तो आएंगी नही, वो झट से घर आई, घर में गयी और एक बड़ा सा चादर लिया बाहर निकलकर अपनी सोती हुई बेटी को हल्का सा कुछ देर थपथपाया और फिर अपने बाबू के पास चल दी।

उदयराज बेसब्री से रजनी का इंतज़ार कर रहा था, रजनी की छन छन पायल की आती आवाज सुनकर मन में लड्डू फूटने लगे उसके।

रजनी आयी और उसने झट से चादर अमरूद की डालियों में इस तरह बांधा की खेतों की तरफ से ओट हो गया, उदयराज ने उठकर चादर डालियों में बंधवाने में मदद की, अब लगभग चारों तरफ से ओट हो चुका था, ऊपर से धूप पत्तियों से छनकर खाट पर पड़ रही थी।

उदयराज ने झट से खड़े खड़े ही रजनी को गोद में उठाया और उसे अपनी गोद में लिए लिए "ओ मेरी जान....मेरी बेटी" बोलता हुआ खाट पर बैठ गया।

रजनी जोर से मस्ती में हंस दी। उदयराज रजनी को लेकर फिर खाट पर लेट गया, धीरे से रजनी को नीचे लिटा कर उसके ऊपर चढ़ गया, रजनी ने सिसकते हुए अपने बाबू को बाहों में भर लिया और दोनों कुछ देर एक दूसरे की आंखों में मुस्कुराते हुए देखते रहे, उदयराज धीरे धीरे मस्ती में रजनी के दोनों गालों को चूमने लगा और रजनी भी गाल घुमा घुमा के मुस्कुराती हुई अपने बाबू को चुम्मियां देने लगी। उदयराज का विशाल 9 इंच का लंड खड़ा होकर साड़ी के ऊपर से ही रजनी की बूर के ऊपर चुभने लगा, रजनी को अपने बाबू के मोटे लंड का दबाव अपनी बूर पर साफ महसूस होने लगा और उसकी बूर भी लंड की छुवन पाकर गीली होने लगी।

उदयराज ने रजनी को चूमते हुए पूछा- दिन में अपनी बेटी को प्यार करने के लिए रास्ता साफ है।

रजनी भी सिसकते हुए- हाँ बाबू बिल्कुल साफ है रास्ता.....काकी दो घंटे से पहले नही आएंगी....बस यही है कि गुड़िया न उठ जाय।

उदयराज- नही उठेगी...वो बहुत समझदार है तुम्हारी तरह।

रजनी मुस्कुरा पड़ी और अपने बाबू को चूमने लगी, उदयराज अब रजनी के ऊपर अच्छे से चढ़ते हुए उसके दोनों पैरों के बीच आ गया, रजनी ने भी अपने बाबू को अपने आगोश में लेते हुए अपने दोनों पैर हल्का फैलाकर अपने बाबू के नितंब पर रख लिए, खाट हल्का सा चरमराई, रजनी की साड़ी घुटनो से ऊपर हो चुकी थी ,दूध जैसे उसके गोरे गोर पैर धूप और पत्तियों की मिली जुली छाया में चमकने लगे। दोनों की साँसे तेज होने लगी।

उदयराज अब रजनी के गालों, गर्दन और कान के पास चूमने लगा, रजनी मचलने लगी, कुछ देर चूमने के बाद उदयराज ने अपनी जीभ निकाली और रजनी के दाहिने कान की झुमकी के नीचे जोर जोर चूमने और चाटने लगा, रजनी के बदन में एकदम तेज सनसनाहट हुई और उसने अपने बाबू को कस के दबोच लिया, उदयराज अब बार बार दोनों कान के नीचे ऐसा करने लगा, कभी गर्दन पर तेज तेज चूमता तो कभी कान के नीचे जीभ से चाटता फिर कभी पूरे कान पर चूमता, कान के पिछ्ले हिस्से को जीभ से चाटता ऐसा वो दोनों कान के साथ बदल बदल कर करने लगा, रजनी को बहुत अच्छा लग रहा था, उसका बदन बार बार मारे सनसनाहट के गुदगुदा जा रहा था, वो खुद भी बार बार अपना चेहरा इधर उधर पलट कर अपने कान और गर्दन अपने बाबू को चूमने चाटने के लिए परोस रही थी, बिरजू ने कुछ ही पलों में रजनी के दोनों तरफ के कान के आस पास के एरिये को चूम चूम के रजनी को बेताहाशा गरम कर दिया, रजनी की दोनों विशाल चूचीयाँ फूलकर सख्त हो गयी और निप्पल कड़क होकर उदयराज के सीने में गड़ने लगे। अपने बाबू की इस जादुई हरकत से रजनी के बदन में तेज सनसनाहट होने लगी, उसे अजीब सी वासनामय गुदगुदी पूरे बदन में महसूस होने लगी, वो थोड़ा तेज तेज सिसियाने लगी, अपने बाबू के प्यार करने के इस तरीके से वो इतना खुश हुई कि उसने अपने बाबू के चेहरे को हथेली में थाम लिया और उनके होंठों पर अपने होंठ रख दिये। दोनों की आंखे मस्ती में बंद हो गयी, कुछ देर तक दोनों एक दूसरे के होंठों का रसपान करने लगे। कुछ देर अपनी शादीशुदा बेटी के होंठ चूसने के बाद उदयराज का ध्यान चूचीयों पर गया तो उसने झट से दोनों 34 साइज की फूली हुई गुब्बारे जैसी चूचीयों को ब्लॉउज के ऊपर से हाथों में भर लिया।

रजनी फिर मचल उठी, उदयराज दोनों चूचीयाँ ब्लॉउज के ऊपर से ही मसल मसल के दबाने लगा, निप्पलों को उंगलियों से मसलने लगा, रजनी फिर सिसकने लगी, अपनी चूचीयों को उठा उठा के अपने बाबू से दबवाने लगी।

तभी रजनी से रहा नही गया तो वो बोली- बाबू रुकिए जरा

उदयराज रुककर रजनी के ऊपर से दोनों हाँथ अगल बगल टिकाकर थोड़ा ऊपर उठ गया, रजनी ने झट से एक बार अपना सर इधर उधर घुमा के देखा फिर अपने ब्लॉउज का बटन खोलने लगी, कुछ ही पलों में जल्दी से सारे बटन खोलकर ब्लॉउज के दोनों पल्लों को अगल बगल गिरा दिया और अपनी ब्रा को ऊपर खींचते हुए अपनी दोनों बड़ी बड़ी गोल गुब्बारे की तरह फूली हुई चूचीयों को एक ही झटके में अपने बाबू के सामने परोस दिया, दोनों चूचीयाँ किसी सपंज की तरह उछलकर सामने आ गयी, दिन में अपनी सगी शादीशुदा बेटी की मदमस्त दूध जैसी गोरी गोरी चूचीयाँ और उसपर काले काले तने हुए निप्पल देखकर तो मानो उदयराज का सारा खून उसके लंड में आकर फट जाने को हो गया। दोनों दूध जैसी गोरी गोरी चूचीयों पर तने हुए निप्पल के किनारे किनारे वो काला काला घेरा दिन की रोशनी में कयामत ढा रहा था। दोनों तनी हुई चूचीयों की ऐसी सुंदरता और मादकता आज दिन में पहली बार उजाले में देखकर उदयराज बेसुध हो गया।

रजनी के दोनों गोरे गोरे दुग्धकलश दिन में देखकर उदयराज मानो पागल ही हो गया, और ऊपर से रजनी के दिखाने की अदा आग में और घी डालने का काम कर रही थी।

उदयराज टूट पड़ा अपनी सगी बेटी की चूचीयों पर और ऐसे पीने लगा मानो बरसों रेगिस्तान में प्यासा भटक के आया हो, दरअसल दिन में रजनी की मदमस्त गोरी गोरी चूचीयाँ अलग ही चमक रही थी और उसपर काले काले निप्पल अलग ही कहर ढा रहे थे।

उदयराज जोर जोर से दोनों चूचीयों को कस कस के दबाते हुए मुँह में भर भर के पीने लगा, रजनी का दूध निकलने लगा जिसे उदयराज बच्चे की तरह पी रहा था, रजनी प्यार से कराहते हुए अपने बाबू का सर सहलाने लगी, रजनी थोड़ी देर बाद हल्का सा दायीं तरफ करवट लेने लगी तो उदयराज समझ गया और रजनी के ऊपर से उतरकर धीरे से दायीं तरफ लेट गया, चूची पीते हुए अपने बाबू को रजनी ने अपने पल्लू से ढक लिया मानो जैसे किसी छोटे बच्चे को दूध पिला रही हो, साड़ी के अंदर उदयराज भी अपनी सगी बेटी की चूची भर भरकर पीने लगा, रजनी प्यार से उसका सर साड़ी के ऊपर से हल्का हल्का सिसकते हुए सहलाती रही।

काफी देर तक उदयराज रजनी की दोनों चूचीयों को दबाता और पीता रहा, दोनों ज्यादा कुछ बोल नही रहे थे दिन का मामला था इसलिए चुपचाप ही प्यार किये जा रहे थे, पर फिर भी लाख कोशिशों के बाद भी रजनी की मादक सिसकारियां निकल ही जा रही थी।

कुछ देर बाद उदयराज बोला- बेटी

रजनी मदहोशी में- हाँ बाबू

उदयराज- बूर गीली हो गयी मेरी बोटिया की।

रजनी- हाय...धत्त....पगलू.....इतनी देर से अपनी बेटी को प्यार कर रहे हो तो गीली नही होगी.....वो तो कब का गीली हो चुकी है।

उदयराज- तो दिखा न दिन की रोशनी में आज उसका गीलापन।

रजनी ये सुनकर शर्मा गयी फिर बोली- तो फिर उठिए और मेरे पैरों के बीच बैठिए।

उदयराज ने वैसा ही किया, रजनी ने जैसे ही अपनी साड़ी को पकड़कर अपने पैर फैलाते हुए साड़ी को ऊपर घुटनों तक खींचा ऊपर अमरूद के पेड़ पर बैठे चार तोते जो कि पके पके अमरूद खा रहे थे, चहकने लगे, रजनी और उदयराज का ध्यान ऊपर गया तो रजनी खिलखिलाकर हंस दी और शर्मा गयी, उदयराज बोला- देखो ये तोते भी तुम्हारी अतुल्य सुंदर बूर को देखने के लिए लालायित है, देखो कैसे चहकने लगे, खोलो खोलो अब देर मत करो।

रजनी- न....मुझे अब शर्म आ रही है.....अपने बाबू के अलावा और मैं किसी को नही दिखा सकती।

उदयराज- दिखा दो न....देखो बिचारे कितना विनती कर रहे हैं।

तभी एक तोता उड़कर दुसरी डाल पर बैठ गया जो कि बिल्कुल रजनी के बूर के ऊपर सीध में थी, वह उस डाल पर बैठ कर चहकते हुए एक पका अमरूद अपनी लाल चोंच से फोड़कर काटने लगा कि तभी उस अमरूद का कुछ हिस्सा सीधे रजनी की बूर पर साड़ी के ऊपर आकर गिरा, उदयराज और रजनी दोनों ये देख रहे थे। रजनी ने वो मीठा सा अमरूद का टुकड़ा उठा कर अपने बाबू को खिलाया और खुद भी खाने लगी, अमरूद का टुकड़ा बहुत मीठा था।

उदयराज - देखो बिचारा कैसे तुम्हे मीठे मीठे अमरूद देकर विनती कर रहा है कि हे सुंदरी दिखा दो न मुझे भी अपनी बूर।

रजनी ये सुनकर जोर से हंस पड़ी और बोली- इसका भी मन है देखने का....हे भगवान....ये छोटा सा तोता उसको देखने के लिए मचल रहा है, सब तुम्हारे मित्र हैं मुझे पता है बाबू।

उदयराज- खाली ये तोता नही, सारे के सारे देखना चाह रहे हैं वो मादक हसीन सी चीज, देखो कैसे चहक रहे हैं, कभी इस डाल पर कूदकर बैठ रहे हैं तो कभी उस डाल पर.....अब दिखाओ जल्दी।

रजनी ने एक मादक मुस्कान के साथ अपने बाबू को देखा फिर ऊपर उन चहकते तोतों को देखकर बोली- अच्छा बाबा लो देखो जी भरके सारे के सारे बदमाश अपनी मनपसनद चीज़ को।

ऐसा कहते हुए रजनी ने धीरे से अपनी साड़ी को साये सहित ऊपर खींचकर कमर तक कर दिया और अपनी लाल रंग की कच्छी को हल्का सा साइड करके अपनी रसीली बूर की प्यारी सी झलक खोलकर दिखाते हुए बोली- लो बदमाशों देखो जी भरके।

ऐसा कहते हुए रजनी ने एक बार बड़े प्यार से अपने बाबू को देखा फिर एक कातिल नज़र ऊपर चहकते हुए तोतों पर डाली तो वाकई में वो तोते मारे खुशी के जोर जोर से चहकने लगे, उनमे से एक तोता जिसने अमरूद तोड़कर गिराया था वो सच में एक टक लगाकर रजनी की बूर को निहारे जा रहा था और उदयराज का तो बुरा हाल था, दिन की रोशनी में अपनी सगी बेटी की प्यारी सी बूर देखकर वो कहीं खो सा गया।

रजनी कुछ देर अपने एक हाँथ से अपनी कच्छी को साइड किये रही और नशीली निगाहों से अपने बाबू और ऊपर उन तोतों को मुस्कुरा कर देखती रही।

रजनी ने फिर बड़ी अदा से तोतों से बोला- अच्छा अब देख लिया न....जाओ अब उड़ जाओ.....बाद में आना फिर। रजनी ने ऐसा कहते हुए अपना एक हाँथ ऊपर को उठाया तो तीन तोते तो उड़ गए परंतू वो वाला तोता डाल पर बैठा रहा जिसने अमरूद गिराया था।

उदयराज उसे देखकर बोला- लगता है ये अच्छे से तुम्हारी पूरी बूर देखकर जाएगा।

रजनी- ये भगवान.....ये कितना बदमाश है.....गंदे.....इतना छोटा सा है और बूर देखेगा.....दिखाया न एक बार जा अब.....पर कितना प्यारा है बाबू ये....इसको देखकर मुझे प्यार आ रहा है इसपर।

उदयराज- तो दिखा दो न बेचारे को अच्छे से खोलकर, मुझे लग रहा हूं तुम्हारा छोटा दीवाना है ये, लट्टू हो गया है तुमपर, अभी उसकी हरसत पूरी हुई नही है, पूरा करके ही जायेगा, बस अब दो दीवाने बैठे हैं देखने के लिए अच्छे से...

रजनी- दो दीवाने नही दो बदमाश.....एक मेरे बाबू और एक ये छुटंकी सा...... बताओ ये भी बूर देखेगा..... तू क्या करेगा देखके बूर छुटंकी बदमाश.....ह्म्म्म....एक बार दिखा दिया पर फिर भी देखो कैसे टुकुर टुकुर मेरी बूर को देख रहा है.....गन्दू तोता।

ऐसा कहकर रजनी हंसने लगी, की तभी उस तोते ने एक बार फिर अमरूद का टुकड़ा तोड़कर रजनी की बूर पर गिराया, इस बार अमरूद का टुकड़ा सीधे रजनी के तने हुए भग्नासे से जा लगा तो रजनी जोर से सिसक पड़ी, उदयराज बोला- ओहहो! वो तुम्हारे बूर के दाने हो चूमना चाहता है। देखो कैसे दुबारा विनती कर रहा है।

रजनी ने एक मुक्का अपने बाबू की जांघ पर मारा और बोली- क्या बाबू आप भी न....धत्त...वो एक छोटा सा तोता है... आप भी न कुछ भी बना के बोले जा रहे हो।

उदयराज- बना के नही बोल रहा सच, देख लो आखिर वो बूर की तरफ देख रहा है न।

रजनी- हां देख तो रहा है.....देखो न कैसे टुकुर टुकुर देख रहा है बेशर्म....छुटंकी

उदयराज- तुम्हे उसे दिखाना अच्छा लग रहा है।

रजनी शर्मा गयी फिर बोली- हाँ... न जाने क्यों....जबकि जानती हूं कि वो बस एक तोता है....शर्म भी आ रही है।

उदयराज- दिखाओ न अच्छे से खोलकर, देखो वो भी कबसे इंतजार कर रहा है।

रजनी- तुम दोनों बहुत बदमाश हो...लो अच्छा देखो जी भरके।

ऐसा कहते हुए रजनी ने अपने दोनों पैरों को उठाकर कच्छी निकाल के बगल में रख दी और अपनी दोनों मांसल बड़ी बड़ी केले के तने के समान चिकनी जांघे खोलकर बूर को देखने के लिए परोस दिया।

ऐसा करते ही तोता एक बार फिर जोर जोर से चहकने लगा, इस बार नीलम और उदयराज औऱ भी चकित रह गए, रजनी शर्मा कर मुस्कुराते हुए कभी अपने बाबू को देखती तो कभी ऊपर उस तोते को जो नीलम की मस्त रसीली खिली खिली बूर को घूर रहा था।

रजनी- देखो बदमाश को.....कितना खुश हो गया है......बहुत बदमाश है ये तोता।

एकाएक वो तोता पेड़ से नीचे उड़कर आया और रजनी की मोटी सी गोरी जांघ पर बैठ गया, रजनी चिहुँक गयी कि तभी झट से उस तोते ने रजनी की बूर की फांकों के बीच भग्नासे पर अपनी लाल चोंच हल्के से मारी और बूर के रसीले छेद में अपनी चोंच एक बार डुबोके झट से उड़ गया।

तोते की इस हरकत से एक तरफ जहां रजनी हल्का सा चिहुँक गयी वहीं दूसरी तरह न जाने क्यों उसकी चोंच की छुवन से रजनी के बदन में गजब की सनसनाहट हुई और वो तेजी से कराह उठी, रजनी मंद मंद मुस्कुरा उठी ये सोचकर कि उसके बाबू के अलावा एक छोटा सा तोता उसकी बूर का चुम्मा लेकर उड़ गया, उसे अपने मदमस्त यौवन और रसभरी बूर पर अत्यंत नाज हुआ और दूसरे ही पल वो शर्मा गयी ये सोचकर कि एक छोटे से तोते ने उसके साथ ये किया। उसकी साँसे तेज तेज चलने लगी।

वो तोता झट से दक्षिण दिशा की ओर उड़ गया, बाकी तीन भी उस दिशा में उड़े थे पर रजनी और उदयराज ने उनपर ध्यान नही दिया था।

दरअसल वो तोता कोई और नही बस वो शैतान था जिसकी जड़ों में रजनी ने अपना दूध अर्पित किया था, वो शैतान रजनी पर मोहित हो चुका था, वो चाहता तो रजनी की बूर के दर्शन इससे पहले भी कर सकता था पर आज्ञा उसे महात्मा द्वारा अब जाके मिली थी ऐसा करने की, बिना उनकी आज्ञा के वो कुछ नही करेगा, रजनी की बूर को चूमकर वो उसमे से निकल रहा काम रस ले गया था, जो कि न तो रजनी ही जान पाई और न ही उदयराज।
 
प्रिय पाठकों,

Update कल तक आ पायेगा, अभी थोड़ा सा busy हूँ, थोड़ा वक्त दें।

धन्यवाद आप सबका
 
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