सुगंधा ने दूध वाले की तरह ही अपने बेटे को अपनी चुचियों का जलवा दिखाने की युक्ति को स्थगित कर दी थी क्योंकि उसे अपनी जवानी का जलवा दिखाने जितना समय ही नहीं था वरना वह अपने मन में तय कर चुकी थी कि आज झाड़ू लगाते समय वह अपने बेटे को अपनी उभरती हुई जवानी का जलवा जरूर दिखाएगी,,, लेकिन अपने बेटे के कमरे में प्रवेश करते ही उसकी आंखों के सामने जो नजर नजर आया था उसे देखकर उसके तन बदन में आग लग चुकी थी और वह अपने मां पर बिल्कुल भी काबू नहीं कर पाई थी चादर ओढ़ कर सो रहे अंकित के खुंटे को अपनी आंखों से देख कर उसे पकड़ने की अपनी इच्छा को सुगंधा दबा नहीं पाई थी और इसी के चलते वहां चादर के ऊपर से ही सही अपने बेटे के लंड को छूने की कोशिश की थी और जिसमें वह कामयाब भी हो चुकी थी एक नहीं बल्कि दो दो बार,,,, उम्र के इस पड़ाव पर पहुंच चुकी सुगंधा को समझते देर नहीं लगी थी कि उसके बेटे के पास का हथियार बेहद दमदार है जो कि किसी भी औरत को पूरी तरह से तृप्त कर सकता है,,,
अपने बेटे के लंड को चादर के ऊपर से ही स्पर्श करने की खुशी में हो पूरी तरह से उत्तेजित हो चुकी थी,,, जिसका असर उसे अपनी बुर में बराबर महसूस हो रहा था और वह अपनी बुर की गर्मी को शांत करने के लिए बाथरूम में प्रवेश करके अपनी उंगलियों का सहारा लेकर वह अपने आप को शांत करने की कोशिश कर रही थी,,,।
सुगंधा का दिमाग पूरी तरह से उन्मादित हो चुका था उसमें अब सही गलत के सोचने की क्षमता नहीं रह गई थी पहले तो वह दूसरे लड़कों की दोनों टांगों के बीच की स्थिति का कल्पना में ही जायजा लिया करती थी लेकिन अब उसकी नजर अपने ही जवान बेटे पर थे जो की पूरी तरह से भला भला था उसे तो इस बात का अहसास तक नहीं हुआ था की चोरी से उसकी मां उसके कमरे में जाकर उसके खड़े लंड को चादर के ऊपर से पकड़ ली थी,,,। सुगंधा ने अपने मां पर बिल्कुल भी काबू न करके जिस तरह की हरकत अपने बेटे के साथ की थी उसे देखते हुए वहां अपने बेटे को चाय पानी खाना देने पर भी उससे,, नजर नहीं पिला पा रही थी क्योंकि उसने हरकत ही ऐसी कर दी थी पहले ही एक औरत होने के नाते वह अपने बेटे को उसे समय मर्द समझकर उसके खड़े लंड को अपने हाथों से पकड़ ली थी लेकिन आखिरकार थी तो वह उसे मर्द की मा ही,,, इसलिए सुगंधा के साहजिक होने पर उसमें की औरत दूर हो जाती थी और उसमें एक मां नजर आने लगती थी इसलिए वह अपने बेटे से नजर नहीं मिल पा रही थी लेकिन अंकित को तो कुछ पता ही नहीं था कि उसके साथ क्या हुआ था वह तो पूरी तरह से सहज था,,,,।
कभी-कभी सुगंधा को अपनी हरकत पर शर्मिंदगी महसूस होती थी और वह इस झमेले से निकलने की कोशिश करती थी लेकिन वह जितना भी इस झमेले से निकलने की कोशिश करती थी उतनी ही उसके अंदर डूबती चली जाती थी,,,, आखिरकार वासना का दरिया ही होता है इतना गहरा की सब कुछ अपने अंदर डूबा ले जाता है और ऐसा ही सुगंधा के साथ भी हो रहा था,,,,।
जैसे तैसे करके दिन गुजरने लगे सुगंधा अपने मन में बहुत चाहती थी कि वह अपने बेटे को अपनी जवानी का जलवा दिखाएं लेकिन उसे समझ में नहीं आ रहा था कि वह किस तरह से अपने आप को तैयार करें अपने बेटे के सामने प्रदर्शन करने के लिए,,,,, क्योंकि जब भी वह कोशिश करती थी उसके अंदर घबराहट और शर्म एकदम साफ नजर आती थी वह इस बात से घबरा जाती थी कि अगर उसके बेटे को जरा भी इस बात का एहसास हो गया कि उसकी मां,,, जानबूझकर अपने अंगों की नुमाइश उसके सामने कर रही है तब क्या होगा तब उसका बेटा कैसा बर्ताव करेगा उसके बारे में क्या सोचेगा यही सब सोच कर उसका मन बैठ जाता था,,,, लेकिन जो काम हो घर में नहीं कर पाती थी वह खुद के लिए अद्भुत कार्य को अपनी क्लास में कर जाती थी अपने विद्यार्थियों के सामने,,,।
एक दिन वह अपने विद्यार्थियों को पढ़ा रही थी,,, और ब्लैक बोर्ड पर कुछ लिख रही थी उसे इस बात का अहसास तक नहीं था कि उसके लिए एकदम सहज क्रिया को उसके जवान विद्यार्थी वासना भरी नजरों से देख रहे थे क्योंकि जिस तरह से वह अपना हाथ ऊपर करके ब्लैक बोर्ड पर चौक से कुछ लिख रही थी उसकी इस क्रिया पर उसके नितंबों का आकार कुछ ज्यादा ही उभर कर सामने नजर आ रहा था,,, और वैसे भी सुगंधा की आदत थी वह साड़ी को कमर पर एकदम कसकर बांधती थी जिसकी वजह से उसके नितंबों का आकार साड़ी के ऊपर से भी झलकता रहता था,,, और उसकी यही आदत मर्दों की कमजोरी बन जाती थी,,, और इस समय सुगंधा का यह रूप क्लास के कुछ आवारा लड़कों की आंखें सेंकने का काम कर रही थी,,,, अपनी टीचर की खूबसूरती और उसके अंगों का कटाव उभारओर मरोड़ देखकर विद्यार्थियों के मुंह से गर्म आ निकल जाती थी,,, और वह आवारा लड़के दूसरी बेंच पर बैठकर यही सब देखा करते थे उन लोगों को सुगंधा क्या पड़ता है इससे कोई मतलब नहीं था उन लोगों को मतलब था सिर्फ सुगंधा की खूबसूरती को अपनी आंखों से देखने का उसके खूबसूरत बदन के रस को अपनी आंखों से पीने का जो कि वह बखूबी कर रहे थे,,,।
जिस तरह से सुगंधा चौक से ब्लैक बोर्ड पर एक-एक शब्द को लिख रही थी उसके हाथ के झटका के साथ-साथ उसके बदन में भी लहर उठ रही थी उसके नितंबों में एक अद्भुत तरीके की थिरकन हो रही थी मानो कि जैसे कोई शांत नदी में कंकड़ फेंकने पर लहर उठती है ठीक उसी तरह से सुगंधा के नितंबों में भी लहर उठ रही थी जिसे देखकर आगे बेंच पर बैठे लड़कों का लंड खड़ा हो चुका था,,,, उनमें से एक लड़का धीरे से दूसरे के कान में बोला,,,।
बाप रे मैडम की गांड तो देख मेरा तो लंड खड़ा हो गया है,,,
मेरा भी यही हाल है यार बस एक बार डालने का मौका मिल जाए तो समझ लो जिंदगी सफल हो गई,,,।
(दोनों आपस में इस तरह से बात कर रहे थे और आगे ब्लैकबोर्ड पर लिख रही सुगंध को कुछ सुनाई नहीं दे रहा था बस उसे इतना ही एहसास हो रहा था कि कोई बातें कर रहा है लेकिन क्या बातें कर रहा है किसके बारे में बातें कर रहा है यह उसे नहीं मालूम था तो वह धीरे से नजर घुमा कर उन दोनों की तरफ देखी तो उसके होश उड़ गए पहले तो उसे पता नहीं चला लेकिन जैसे ही उन लड़कों की नजरों का पता चला सुगंधा के बदन में सिहरन सी दौड़ने लगी क्योंकि वह लड़के प्यासी नजरों से उसके नितंबों के उभार को ही देख रहे थे,,,, उन लड़कों की नजरों को देखकर सुगंधा कुछ बोल नहीं पाई और वापस ब्लैक बोर्ड पर सहज होकर लिखने का नाटक करने लगी लेकिन अब उसके कान खड़े हो चुके थे वह उन लड़कों की बातों को सुनना चाहती थी क्योंकि उन दोनों की नजरे उसकी गांड पर ही टिकी हुई थी और इतना तो वह समझता ही थी कि ऐसा जवान लड़के कब करते हैं वह ब्लैकबोर्ड पर लिख रही थी तभी वह बड़े गौर से सुनने लगी और उसे हल्का-हल्का सुनाई देने लगा,,,)
कसम से मैडम की गांड कितनी बड़ी-बड़ी है,,,,,
(उनमें से एक लड़का बोला और सुगंधा को केवल गांड कितनी बड़ी-बड़ी है इतना ही सुनाई दिया लेकिन उसे समझते देर नहीं लगी कि वह दोनों किसके बारे में बात कर रहे थे वह जान गई थी कि वह लड़के उसके बारे में ही बातें कर रहे थे एकदम खुलकर,,, इतना सुनकर सुगंधा का दिल जोरो से धड़कने लगा जहां एक तरफ उसे थोड़ा अजीब लग रहा था वहीं दूसरी तरफ लड़कों की बातें और उन दोनों की नजरों को देखकर उसकी सांसे ऊपर नीचे हो रही थी उसके बदन में उत्तेजना की लहर उठ रही थी,,,, वह धड़कते दिल के साथ हुआ ब्लैक बोर्ड पर इस तरह से लिखे जा रही थी और उन दोनों की बातें सुनी जा रही थी तभी उनमें से एक लड़का बोला,,,)
कसम से मुझे मिल जाए तो मैं तो मैडम की गांड दोनों हाथों से पकड़ कर अपने लंड को उसकी बुर में डालकर चोदना शुरू कर दुं,,,।
(उसे लड़के की पूरी बात एक-एक शब्द सुगंधा के कानों में एकदम साफ-साफ सुनाई दिया था और इसे सुनकर तो उसकी बुर का पूरा तालाब नमकीन खारे पानी से भर गया और उसमें से बहने भी लगा उसे समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करें सारे विद्यार्थी उसके बेटे की उम्र के थे उसका दिल जोरो से धड़कने लगा था,,,उन, लड़कों की बात सुनकर वह पूरी तरह से गर्म हो चुकी थी,,, तभी उसके मन में ख्याल आया कि क्यों ना वह जो युक्ति अपने बेटे पर आजमाना चाहती थी वही युक्ति अपने विद्यार्थियों पर आजमाए,,,, यह ख्याल उसके मन में आते ही उत्तेजना के मारे उसकी बुर फूलने पिचकने लगी और वह अपनी युक्ति को क्लास में ही आजमा लेना चाहती थी वह अपने विद्यार्थियों के चेहरे पर बदलते भाव को देखना चाहते कि वह देखना चाहती थी कि उसकी चूचियों को देखकर उसके विद्यार्थियों पर क्या प्रभाव पड़ता है और इसके लिए वह अपने आप को पूरी तरह से तैयार कर चुकी थी इसलिए जैसे ही वह विद्यार्थियों की तरफ घूमी वह अपने हाथ से चौक के टुकड़े को नीचे गिरा दी,,,, और उसे उठाने के लिए नीचे झुक गई और झुकाने की वजह से जवानी से भरी हुई लबालब उसकी दोनों चूचियां ब्लाउज फाड़ कर बाहर आने के लिए उतारू हो गई उसके साड़ी का पल्लू कंधे पर से नीचे गिर गया था जो की वह खुद ही जानबूझकर नीचे गिरती थी और कुछ सेकेंड के लिए वह चौक के टुकड़े को उठाने के लिए नीचे झुकी रह गई थी और इतना तो उन विद्यार्थियों के लिए बहुत था उन विद्यार्थियों की नजर से ही सुगंधा की जवानी से भरी हुई चूचियों पर गई उनके तो होश उड़ गए उनकी आंखें फटी के फटी रह गई और आश्चर्य से खुला का खुला रह गया,,,
सुगंधा उसे स्थिति में अपने आप को एक बार देखने लगी और नजर उठाकर उन विद्यार्थियों की तरफ देखने लगी जो कि वह विद्यार्थी उसी की तरफ देख रहे थे विद्यार्थियों की हालत को सुगंधा अच्छी तरह से समझ गई थी,,वह साफ तौर पर देख पा रही थी कि विद्यार्थियों के चेहरे का रंग उड़ चुका था उनकी आंखों में वासना की चमक एकदम साफ नजर आ रही थी वह एकदम भूल चुके थे कि जिसे देखकर वह इतना उत्तेजित हो रहे हैं वह सही मायने में उन लोगों की गुरु थी शिक्षिका थीं उन्हें शिक्षा देने वाली थी सही मार्गदर्शन करने वाली थी लेकिन जवानी से भरी हुई है खूबसूरत औरत अगर मर्दों की नजर में वासना भारी हो तो वह फिर किसी भी रिश्ते की रेखा में नहीं आती बल्कि वह केवल एक औरत ही बनकर रह जाती है और इस समय भी यहां भी यही हो रहा था वह एक शिकायत ही और क्लास में बैठे लड़के विद्यार्थी थे लेकिन शिक्षिका और विद्यार्थी के बीच का रिश्ता मानव खत्म हो चुका था वह लड़के वासना भरी नजरों से अपनी ही शिक्षिका की अपने ही मैडम की चूचियों को नजर भर कर देख रहे थे लेकिन इसका मलाल सुगंधा को बिल्कुल भी नहीं था बल्कि वह तो अंदर ही अंदर एकदम प्रसन्न नजर आ रही थी क्योंकि उसकी युक्ति एकदम सत प्रतिशत कम कर रही थी,,,, यह नजारा कुछ सेकंड का ही था हाथ में चौक लेकर वापस सुगंधा खड़ी हो गई और अपनी साड़ी के पल्लू को ठीक करने लगी और तिरछी नजर से उन लड़कों की तरफ देख भी रही थी चौकी अभी तक बदहवास नजरों से उसे ही देख रहे थे,,,, सुगंधा आगे कुछ बोल पाती या अपनी क्रियाकलाप का प्रदर्शन यहां पर कर पाती से पहले ही छुट्टी होने की घंटी बज गई,,,। और एक खूबसूरत नाटक पर पर्दा गिर चुका था,,,।
रात को सुगंधा अपने बिस्तर पर क्लास वाली घटना के बारे में ही सोच रही थी और इस घटना के बारे में सोचकर वह पूरी तरह से उत्तेजित हुए जा रही थी वह अपने मन में यही सोच रही थी कि वह लड़के भी तो उसके बेटे की ही उम्र के थे लेकिन उन दोनों की सोच कितनी गंदी थी एक औरत को लेकर वह एक औरत को या तो किसी भी औरत के बारे में कितना गंदा सोच रखते थे जब वह लोग अपनी टीचर को ही इस नजर से देखते हैं तो घर में भी तो अपनी मां बहन को भी गंदी नजरों से देखते होंगे यही सब सोच कर सुगंधा अपने बेटे के बारे में सोच रही थी कि जब वह लड़के उसके बारे में इतना गंदा सोच सकते हैं तो उसका बेटा उसकी जवानी देखकर उसकी भरी हुई मदहोश कर देने वाली जवान देखकर उसके नितंबों का उभार और चूचियों की गोलाई देखकर क्यों नहीं उसकी तरफ आकर्षित होता,,,।
वह अपने मन में यही सब सो कर उत्तेजित हुए जा रही थी और धीरे-धीरे अपने कपड़ों को उतारती जा रही थी वह अपने मन में अपने आप से ही बात करते हुए बोल रही थी कि वह लड़के तो उसे छोड़ने के लिए बोल रहे थे उसकी बड़ी-बड़ी गांड देख कर उत्तेजित हो गए थे लंड खड़ा हो गया था उन लड़कों का तो उसके लड़के का क्यों नहीं खड़ा होता लंड उसकी बड़ी-बड़ी गांड देखकर चुची देखकर क्यों उसका मन नहीं करता चोदने को अपनी मां को,,,, आखिरकार उन लड़कों की उम्र और उसके लड़के की उम्र एक ही तो थी तो उसके लड़के में यह सब बदलाव क्यों नहीं होता है एक औरत को देखकर एक खूबसूरत औरत को देख कर क्यों हुआ उत्तेजित नहीं होता कि उसका लंड खड़ा नहीं होता,,,, चोदने के लिए,,, ऐसा अपने आप से ही बात करते हुए वह धीरे-धीरे अपने कपड़े उतार कर पूरी तरह से नंगी हो गई,,, और एक बार फिर से अपने बेटे की कल्पना करके अपनी दोनों टांगों को खोल दी और फिर अपनी उंगलियों को अपनी गुलाबी बुर में डालकर अपनी जवानी की गर्मी को शांत करने की कोशिश करने लगी,,,।
दूसरे दिन सुबह जब किचन में काम कर रही थी तब तृप्ति बालों में कंघी करते हुए अपनी मां से बोली,,,।
मम्मी मुझे कुछ किताबें चाहिए,,,।
हां तो पैसे ले ले जाकर खरीद लेना,,,
नहीं मम्मी तुम खरीद कर ले आना तुम उसे किताब वाली मार्केट चलाती हो ना जहां पर आधे कीमत में ही किताबें मिलती है,,, वहीं से खरीद लेना,,,,
हां यह तु ठीक कह रही है,,, लेकिन किताबें कौन सी लानी है,,,
मैं तुमको लिख कर दे देता हूं तुमको समय मिले तो खरीद लेना,,,,
तुझे चाहिए कब,,,,,
परसों ही चाहिए क्योंकि एग्जाम की तैयारी करना है ना,,,,
तो ठीक है मैं कल जाकर ले लेती हूं वैसे भी मुझे भी कुछ किताबें खरीदना है,,,,
ठीक है मम्मी मैं अभी लिखकर लाती हूं,,,,
(थोड़ी देर में तृप्ति एक कागज के टुकड़े पर उसे जो किताबें चाहिए थी उसका नाम लिखकर अपनी मम्मी के हाथ में थमा दी,,, तीन किताबें थी और सुगंधा जानती थी कि उस किताब वाली मार्केट में जरूर मिल जाएगी,,,, सुगंधा इस बात से भी खुश थी की उसकी बेटी बहुत समझदार हो गई है वह चाहती तो नहीं किताबें ले सकती थी लेकिन,,, जब वही किताबें आधे कीमत में मिलती हो तो नई किताबें लेकर क्या फायदा इस बात को तृप्ति अच्छी तरह से जानती थी और सुगंध भी अपने बच्चों के लिए वही से ही किताबें खरीद कर लाती थी,,,, थोड़ी देर में सुगंधा खाना बना कर नाश्ता तैयार करके खुद भी तैयार होने लगी,,,)
दूसरे दिन स्कूल से छूटने के बाद वह सीधा इस किताब के बाजार में चली गई चौकी उसकी स्कूल से तकरीबन 2 किलोमीटर और आगे था अपने स्कूल के बाहर ही वह रिक्शा पड़कर थोड़ी ही देर में किताब के बाजार में पहुंच गई,,, यहां पहुंच कर देखी की मार्केट में कुछ ज्यादा भीड़भाड़ था इसलिए वह धीरे-धीरे आगे जाने लगी वह अपने बच्चों के लिए किताबें एक ही दुकान से खरीदती थी और वह दुकान वाला सुगंध को अच्छी तरह से जानता था इसलिए किताबों पर अच्छा खासा डिस्काउंट भी दे देता था काउंटर पर पहुंच कर सुगंधा ने उसे दुकान वाले को परची थमा दी और वह दुकान वाला किताबें निकालने लगा,,,,। और सुगंधा इधर-उधर नजर घुमा कर देखने लगी,, उसे दुकान में किताब के साथ-साथ बहुत सारी स्टेशनरी के साथ-साथ दूसरी वस्तुएं भी मिलती थी जैसे की हेयर तेल साबुन वगैरह-वगैरह जो की काउंटर के पास में ही कांच वाले काउंटर में सजा कर रखा हुआ था तभी उसकी नजर,,,, एक छोटे से पूछ पर गई जिस पर कुछ गंदी तस्वीर छपी हुई थी जिसमें एक मर्द औरत आलिंगन होकर एक दूसरे के होठों का रस चूस रहे थे,,, पहले तो सुगंध को समझ में नहीं आया कि वह वस्तु क्या है जो इतना अश्लील चित्र होने के बावजूद कि उसे दुकान वाले ने उसे काउंटर में सजा कर रखा है लेकिन जब बड़े गौर से उसे पूछ के ऊपर लिखे हुए नाम को पढ़कर देखी तो उसके होश उड़ गए उसकी दोनों टांगों के बीच हलचल होने लगी वह कोहिनूर कंडोम था जिसे देखते ही उसकी सांसे ऊपर नीचे होने लगी,,, उसके पति ने कभी भी कंडोम का उपयोग नहीं किया था इसलिए उसने आज तक कंडोम को अपनी आंखों से देखी भी नहीं थी लेकिन इतना जानती जरूर थी कि कंडोम एक ऐसा प्रोडक्ट है जिसे मर्द इस्तेमाल करते हैं जो कि गर्भ निरोधक के लिए काम आता है,,,
उसे प्रोडक्ट के बारे में सुगंधा और कुछ सोचती इससे पहले ही वह दुकान वाला किताबें लेकर काउंटर पर पहुंच गया और सुगंध भी अपनी नजरों को उसे कंडोम के पैकेट से हटा दी,,,,।
कितना हुआ भैया,,,,
रुकिए हिसाब करके बताता हूं,,,,(इतना कहने के साथ ही वहां तीनों किताब की कीमत लिखकर उसे जोड़ने लगा लेकिन तभी सुगंधा ने उसे काउंटर वाले आदमी पर गौर की वह तिरछी नजरों से उसकी छतिया की तरफ देख रहा था जो की हल्की सी पारदर्शी साड़ी होने की वजह से उसकी चूचियों के बीच की पतली दरार काफी खूबसूरत नजर आ रहा था उसे देखकर वह मन ही मन उत्तेजित हो रहा था इस बात का अहसास होते ही सुगंधा एकदम से सचेत हो गई लेकिन वह उसे काउंटर वाले आदमी के सामने अपनी साड़ी को ठीक करना भी नहीं चाहती थी क्योंकि ऐसा करने पर उसे आदमी को एहसास हो सकता था कि उसने उसकी हरकत को देख ली है इसलिए वह एकदम सहज बनने की कोशिश करने लगी,,,, और वह भी तिरछी नजर से उसे आदमी की तरफ देखने लगी और इस तरह से इधर-उधर देखने लगी कि मानो जैसे कुछ हुआ ही ना हो वह आदमी अभी भी उसकी छातियों की तरफ घूर-घूर कर देख रहा था और बिल बना रहा था,,, उसे आदमी की हरकत को देखकर सुगंध अपने मन में सोचने लगी की दुनिया के सारे मर्द उसकी छाती की तरफ देखते हैं लेकिन उसका बेटा ही नहीं देखता,,,।
थोड़ी देर में बिल बनकर तैयार हो गया और उसे दुकान वाले ने बिल सुगंधा के हाथों में थमा दिया लेकिन बिल थमते समय अपनी उंगली से उसके हाथ की उंगली को स्पर्श कर लिया मानो इतने से ही वह पूरी तरह से सुगंधा को का गया हो वह अंदर ही अंदर एकदम उत्तेजित और प्रसन्न हो गया उसकी हरकत का एहसास सुगंधा को भी अच्छी तरह से था लेकिन वह कुछ बोल नहीं पा रही थी क्योंकि यह सब बेहद सहज था लेकिन बिल देखकर वह उसे काउंटर वाले दुकानदार से बोली,,,)
भैया हम तो तुम्हारे पुराने ग्राहक है थोड़ा तो डिस्काउंट दीजिए,,,।
देखिए बहन जी जो बिल मैंने आपको दिया है वह डिस्काउंट काट कर ही है लेकिन आप हमारे पुराने ग्राहक हैं इसलिए ₹20 ऊपर के कम कर दीजिए,,,,(इतना कहते हुए वह सुगंधा की चूचियों की तरफ देखकर मुस्कुराने लगा,,,, सुगंधा भी जल्दी से अपने पर्स में से ₹200 निकालकर उसे दुकानदार को थमा दी और फिर वह भी मुस्कुराते हुए दुकान की सीढ़ियां उतर गई,,,, और अपने मन में सोच रही थी कि वह उसे दुकानदार को भैया बोल रही थी और वह दुकानदार भी उसे बहन जी बोल रहा था लेकिन उसे मौका मिलता तो अपनी बहन पर चढ़ने से बिल्कुल भी नहीं शर्म करता,,,, इतने से ही सुगंधा को इस बात का ख्याल हो रहा था कि दुनिया में रिश्तेदारी कोई मायने नहीं रखती बस अपनी अपनी जरूरत पूरी होनी चाहिए,,,,
उस किताब के बाजार में सब्जी मार्केट भी थी तो सुगंधा घर के लिए सब्जियां भी खरीदने लगी,,,,,,, सब्जियां खरीदने खरीदे थे उसे थोड़ी देर होने लगी क्योंकि शाम धीरे-धीरे ढल रही थी उसे मालूम था कि आज देर हो चुकी है इसलिए वह सब्जी लेकर और बच्चों के लिए थोड़ा समोसा और जलेबी लेकर वह रिक्शा पकड़ने के लिए जल्दी-जल्दी आगे बढ़ने लगी वह फुटपाथ पर चल रही थी और फुटपाथ पर जगह-जगह पर किताबें बिक रही थी एक जगह पर स्ट्रीट लाइट के नीचे आकर वह रुक गई और बिछी हुई किताबों को देखने लगी जिसमें सारा शरीर मनोहर कहानियां और फिल्मों से संबंधित कुछ किताबें रखी हुई थी सुगंधा को किताबें पढ़ने का भी बहुत शौक था,,, खास करके सरस सलिल वह पढ़ा करती थी,,,, वह धीरे से नीचे झुक कर कुछ सरस सलिल की मैगजीन को इधर-उधर करने लगी और उनमें से दो मैगजीन निकाल कर उसे अपने हाथ में पकड़ लिया और तभी उसकी नजर मनोहर कहानियां पर गई तो वह एक मनोहर कहानी उठाकर उसे जैसे ही पढ़ने को हुई कि उसमें एक दूसरी किताब उसी नजर आ गई जिसके पृष्ठ पढ़ने पर लिखा था,,, मदहोश जवानी,,, सुगंधा पहली बार इस तरह की किताब को अपने हाथ में ली थी और लेखक का नाम था मस्तराम यह सब उसके लिए पहली बार था वह उत्सुकता में उसे किताब को,,, अपने हाथ में लेकर उसके पन्ने पलटने लगी,,,,,, तभी पहले पन्ने पर ही कहानी का शीर्षक उसे दिखाई दिया दूध का कर्ज़,,,,
कहानी के शीर्षक को पढ़कर सुगंधा को ऐसा ही लग रहा था कि जैसे कोई सामान्य कहानी होगी,,, सुगंधा इस तरह से खड़ी थी उसके हाथ में तो किताबें सरल सलीम की थी और दूसरे हाथ में मनोहर कहानी की थी और उसके बीच में एक दूसरी किताब थी जिसके पन्ने पलट रही थी पहले पन्ने का तो वह सिर्फ शीर्षक ही पड़ी थी,, लेकिन,दूसरा पन्ना पलट करवा उसकी दो-तीन लाइन पढ़ने की कोशिश करने लगी और पहले ही लाइन पढ़कर उसके होश उड़ गए जिसमें लिखा था अपनी मां की गुलाबी बुर देखकर संजय का लंड एकदम से खड़ा हो गया,,,, इतना पढ़ते ही सुगंधा के तो होश उड़ गए उसे समझ में नहीं आ रहा था कि यह कौन सी किताब है वह एक लाइन पढ़कर ही अपने चारों तरफ देखने लगी कि कहीं कोई उसे देख तो नहीं रहा है लेकिन उसकी किस्मत अच्छी थी कि वहां दूसरा कोई भी नहीं था इसलिए उसकी हिम्मत बढ़ने लगी और बात दूसरी लाइन बिना पढ़े तीसरे पढ़ने की तरफ आगे बढ़ गई जिसमें लिखा था,,,, संजय अपनी मां की दोनों टांगों को खोलकर उसकी मोटी मोटी जांघों को अपने दोनों हाथों से पकड़ कर उसे अपनी जांघों पर खींच लिया,,, संजय की मां पूरी तरह से व्याकुल थी अपने बेटे के साथ हम बिस्तर होने के लिए वह अपने दोनों हाथों से अपनी चूची पकड़ कर जोर-जोर से दबा रही थी,,,, सुगंधा के तो होश उड़ गए उसकी बुर से पानी निकलने लगा हुआ पूरी तरह से मदहोश हो चुकी थी वह समझ नहीं पा रही थी कि यह कैसी कहानी है लेकिन उसका मन बिना पढ़े मचल रहा था वह आगे की लाइन पढ़ने लगी,,,,
संजय अपने लंड पर ढेर सारा थूक लगाकर उसे चिकना कर रहा था और थोड़ा सा तोक अपनी मां की बुर पर भी लगा कर उसे चिकनाहट दे रहा था और थोड़ी देर में अपने मोटे लंड के सूखने को अपनी मां की बुर के मुख्य द्वार पर रखकर जोर से धक्का मारा और उसका पूरा लंड एक ही बार में उसकी मां की बुर में घुस गया,,,,
अब तो सुगंधा से रहा नहीं जा रहा था सुगंध पूरी तरह से पागल हो चुकी थी केवल चार-पांच लाइन पढ़कर ही,,,,, उसका वहां ज्यादा देर तक खड़ा रहना उचित नहीं था,,,, वह उस किताब वाले से बोली,,,
कितना हुआ भाई साहब,,,
₹40 हुए बहन जी,,,,
लेकिन तीन किताबों के तो तीस ही रुपए हुए ना,,,
बहन जी मनोहर कहानी के अंदर एक और किताब है उसका लेकर 40 रुपए हुए,,,,
(उसे किताब वाले की बात सुनकर सुगंधा शर्मिंदा हो गई उसे लग रहा था कि अनजाने में ही वह किताब उसे मनोहर कहानी के अंदर है जबकि ऐसा बिल्कुल भी नहीं था उसका बेचने का यही तरीका था क्योंकि वह जानता था कि वह चीज किताब को मनोहर कहानी में रख रहा है अगर कोई भी खरीदने वाला एक बार पड़ेगा तो वह उसे पूरा पढ़े बिना नहीं रह पाएगा और इसके लिए उसे खरीदना ही होगा जैसा की सुगंधा को भी लग रहा था कि वह इस किताब को जरूर पूरा पढेगी,,,, वह अपने चारों तरफ नजर घुमा कर देखी कि कहीं कोई देख तो नहीं रहा है और ऐसे भी यह जगह बहुत दूर थी और यहां पर उसकी पहचान वाला कोई नहीं था इसलिए वह निश्चिंत होकर लेकिन जल्दबाजी में वह किताब को अपने थेले में रख ली ताकि कोई देख ना ले और अपने पर्स में से ₹40 निकालकर उस किताब वाले को दे दी,,, और फिर थोडा आगे जाकर ओटो पकड़ के अपने घर पहुंच गई,,,,।