तृप्ति घर से निकल गई थी एक नए सफर के लिए,,, यह पहली बार था जब वह कहीं जाने के लिए अपनी मां से इजाजत मांगी थी और उसकी मां भी खुशी-खुशी उसे जाने की इजाजत दे दी थी क्योंकि वह कहीं और नहीं बल्कि अपने ही कॉलेज की मैडम की जन्मदिन पर जा रही थी पर वह भी शाम तक वापस लौट आना था इसीलिए उसकी मां ने उसे इजाजत दे दी थी,,,, तृप्ति बहुत खुश थी पीले और ब्राउन रंग के सूट सलवार में वह परी लग रही थी,,,, और इस कपड़े में देखकर संदीप भी लार टपकाने लगा था,,, तभी तो वह तृप्ति को माल कहकर संबोधन किया था जिसका तृप्ति ने भी हंस कर स्वागत की थी,,,,। संदीप अपना मोटरसाइकिल लाया था यह जानकार तृप्ति बहुत खुश थी,,, क्योंकि खुद का मोटरसाइकिल होने की वजह से आने जाने का समय बच जाता,,,,।
तृप्ति मोटरसाइकिल के पीछे बैठ गई थी,,, यह उसका पहला मौका था जब वह कीसी लड़के के साथ मोटरसाइकिल पर बैठी थी,,, वैसे तो आते जाते वह कई लड़कियों को इसी तरह से जवान लड़कों के पीछे बैठकर आते-जाते देखी थी और उन्हें देखकर वह भी अपने मन में यही सोचती थी कि उसका दिन कब आएगा जब वह अभी इसी तरह से मोटरसाइकिल पर बैठकर शहर घूमेगी,,, और ऐसा लग रहा था कि जैसे आज बहुत दिन आ गया था जब वह अपनी ख्वाहिश पूरी कर रही थी,,,,।
तर्प्ति बहुत खुश थी,,, लेकिन तभी उसे सुबह वाला वाक्या याद आ गया,,, और पल भर में उसके चेहरे पर सुर्ख लालीमा छाने लगी,,, उस पल के बारे में सोचकर,,, तृप्ति की सांसें ऊपर नीचे होने लगी, क्योंकि वह कभी सपने में भी नहीं सोची थी कि अपने भाई के कमरे में उसे इस तरह के दृश्य देखने को मिलेगा,,, वह कभी सोची नहीं थी कि उसका भाई सारे कपड़े उतार कर नंगा होकर सोता होगा,,, तृप्ति इतना भी बर्दाश्त कर लेती लेकिन अपने भाई को नंगा देखने पर और उसके नंगे पन की चरम सीमा को देखकर खुद उसके होश उड़ गए थे,,,, जिंदगी में पहली बार वो किसी मर्दाना लंड को अपनी आंखों से देख रही थी और वह भी किसी गैर मर्द के नहीं बल्कि अपने ही भाई के लंड को,,,।
लंड की शक्ल सूरत और उसका भूगोल देखकर उसके होश उड़ गए थे,,, वह कभी सपने भी नहीं सोची थी कि मर्दों का लंड इतना बम पिलाट होता है,,, इतना मोटा लंबा और तगड़ा जिसमें बिल्कुल भी लचक नहीं थी और छत की तरफ मुंह उठाए खड़ा था,,, जवान लड़की के लिए यह दृश्य पूरी तरह से कामोत्तेजना से भरा हुआ होता है,,, लड़की के ही क्यों हर उस औरत के लिए जिनकी टांगों के बीच जवानी बरकरार रहती है,,, ऐसी हर एक औरत के लिए यह दृश्य,,, मादकता का काम करती है,,,, और वही मादकता तृप्ति के दिलों दिमाग पर छाया हुआ था,,,, वह मोटरसाइकिल पर बैठकर संदीप के साथ कॉलेज की मैडम के वहां जा रही थी लेकिन उसका दिमाग पूरी तरह से अपने भाई के लंड पर टिका हुआ था,,, कॉलेज में पढ़ने वाली पढ़ी लिखी लड़की होने के साथ-साथ तृप्ति, पूरी तरह से जवान हो चुकी थी,, मर्द औरत के बीच के रिश्ते को अच्छी तरह से समझती थी और वह यह भी जानती थी कि उत्तेजित होने पर ही मर्द का लंड खड़ा होता है,,, और यही जानकारी उसे अचंभित कर रही थी अपने भाई के पक्ष में,,, क्योंकि सुबह-सुबह उसका भाई तो पूरी तरह से गहरी नींद में सो रहा था उत्तेजित करने वाली एक भी वस्तु या स्त्री उसके भाई के समीप बिल्कुल भी नहीं थे तो उसका भाई किसी भी उत्तेजित हो रहा था और उसकी उत्तेजना का मापदंड तृप्ति उसके लंड के खड़े होने पर लगा रही थी और इसीलिए तो वह हैरान थी,,,।
लेकिन वह इस बात से बिल्कुल अनजान थी कि सहज और प्राकृतिक रूप से सुबह-सुबह हर मर्द का लंड खड़ा ही रहता है,,, ज्यादातर पेशाब की तीव्रता की स्थिति मे,,, लेकिन ईस ज्ञान से तृप्ति पूरी तरह से अंजान थी,,,, अपने भाई का ख्यालों से पूरी तरह से उत्तेजित किए जा रहा था जिसका असर उसे अपनी दोनों टांगों के बीच की पतली दरार में महसूस हो रहा था,,, उसे अपनी पेंटिं गीली होती हुई महसूस हो रही थी,,, क्योंकि उसकी बुर से कम रस टपक रहा था,,,, तृप्ति कुछ बोल नहीं रही थी,,, वह खामोश थी,, और उसे खामोश देखकर संदीप बोला,,,।
क्या हुआ तर्प्ति कुछ बोल क्यों नहीं रही हो,,,।
नहीं कुछ नहीं,,,बस ऐसै ही,,,,।
(तृप्ति अपनी और संदीप के बीच हाथ रख कर बैठी हुई थी और ऐसा लग रहा था कि जैसे वह अपनी और संदीप के बीच हाथ की दीवार खड़ी करके रखी हो ताकि दोनों का बदन आपस में स्पर्श न हो और संदीप बार-बार कोशिश भी कर रहा था ब्रेक लगा कर की झटका खाकर त्रप्ती का बदन उसकी पीठ से स्पर्श हो जाए,,, लेकिन तृप्ति के कारण ऐसा हो नहीं पा रहा था इसलिए संदीप बोला,,,)
कंधे पर हाथ रख कर बैठ जाओ,,,, तब आराम से बैठ पाओगी,,,,।
(संदीप जानबूझकर तृप्ति को अपने कंधे पर हाथ रखने के लिए बोल रहा था क्योंकि वह जानता था कि जब वह उसके कंधे पर हाथ रखेगी तो उसका हाथ ऊपर की तरफ हो जाएगा और ऐसे हालात में,,, जब भी ब्रेक लगाने पर उसका बदन उसकी पीठ से स्पर्श होगा तो उसकी चूचियां भी उसकी पीठ से रगड़ खा जाएंगी,,,, और ऐसा ही हुआ,,, संदीप के कहने पर तृप्ति अपना हाथ उसके कंधे पर रख दी थी,,, और जब जब संदीप ब्रेक लग रहा था तब तब उसके एक तरफ का संतरा उसकी पीठ से दब जा रहा था और उसकी नरमाहट संदीप को अपनी पीठ पर बहुत अच्छे से महसूस हो रही थी जिसके कारण वह अपने बदन में उत्तेजना का अनुभव कर रहा था,,, उसे बहुत मजा आ रहा था और इस बात का एहसास तृप्ति को भी हो रहा था तृप्ति को भी पता चल रहा था कि जब-जब संदीप ब्रेक लग रहा था तब तक वह एकदम से संदीप से सट जा रही थी,,, और उसकी चूची भी उसकी पीठ से दब जा रही थी,,,।
इन सबके बावजूद भी तृप्ति को बिल्कुल भी संदीप से ऐतराज नहीं हो रहा था बल्कि ना जाने क्यों उसके बदन में मदहोशी का आलम उबाल मार रहा था उसे संदीप के हरकत बहुत अच्छी लग रही थी जब जब ब्रेक लगाने पर उसकी चूची संदीप की पीठ से रगड़ खाती थी तब तब उसके बदन में सिहरन सी दौड़ने लगती थी,,,,,,एक तो अपने भाई के लंड का ख्याल और ऊपर से संदीप की हरकत की वजह से उसकी चुचियों का उसकी पीठ से रगड़ खाना कुल मिलाकर उसकी पेंटिं को पूरी तरह से गीली करने पर उतारू हो गए थे,,,,,,।
पहली बार इस तरह का एकांत दोनों को मिला था लेकिन फिर भी दोनों एक दूसरे से बात नहीं कर रहे थे क्योंकि दोनों अपने-अपने तरीके से एक दूसरे से मजा ले रहे थे,,,, तर्प्ति की चूची की रगड़ से संदीप का लंड खड़ा हो गया था,,, और इस एहसास से तृप्ति की बुर पानी छोड़ रही थी,,, और इसी आनंद की पराकाष्ठा में दोनों एक दूसरे से बात करना भूल गए थे नतीजन मैडम का घर आ गया था,,,, वैसे तो दोनों यही सोच रहे थे कि यह सफर कभी खत्म ना हो लेकिन एक दूसरे में दोनों इस तरह से डूब गए थे कि सफर की दूरी का पता ही नहीं चला,,,।
यही है मैडम का घर,,,,(संदीप एकदम बड़े से दरवाजे के आगे मोटरसाइकिल रोक दिया था जिससे तृप्ति अंदाजा लगाते हुए बोल रही थी और वाकई में जिस दरवाजे के आगे दोनों रुके थे वही घर मैडम का था,,,,,)
हां यही है,,,,।
लेकिन देख कर लग तो नहीं रहा है कि मैडम का जन्मदिन है,,,,
,,, हां,,, ऐसा भी हो सकता है कि हम दोनों सबसे पहले पहुंच गए हो,,,,चलो चलकर देखते हैं,,,,
(संदीप मोटरसाइकिल खड़ी करके गेट खोल के अंदर जाने लगा और पीछे-पीछे तृप्ति भी जाने लगी,,,, दरवाजे के आगे पहुंचकर संदीप डोर बेल बजा दिया,,, थोड़ी ही देर में दरवाजा खुला और दरवाजे पर मैडम खड़ी थी दोनों को देखकर मुस्कुराने लगी,,, मैडम को देखकर संदीपबोला,,,)
हैप्पी बर्थडे मैडम,,,, साथ में त्रप्ती भी मैडम को जन्मदिन की बधाई दी,,,।
(मैडम एकदम से खुश होते हुए बोली)
अच्छा हुआ संदीप तुम पहले आ गए,,,
पहले आ गए मतलब,,,,।
मेरा मतलब है कि अभी बाकी बच्चों का आना बाकी है और अच्छा हुआ तुम आ गए,,, क्योंकि जल्दी आ गए हो तो काम में हाथ भी बंटा लोगे,,,।
यह तो हमारा सौभाग्य है मेडम,,(संदीप बोलता है इससे पहले ही तृप्ति बोल पड़ी,,, और तृप्ति,, की तरफ देखते हुए मैडम बोली,,,)
तुम्हारा नाम,,,,,,(कुछ सोचते हुए मैडम बोली)
मैडम इसका नाम तृप्ति है और यह भी अपनी ही कॉलेज में पढ़ती है,,,(संदीप मैडम से तृप्ति को मिलाते हुए बोला,,,,)
ओहहहह,,,,, तुम दोनों बाहर क्यों खड़े हो आओ जल्दी अंदर आओ,,,, और जल्दी से मेरे काम में हाथ बंटाओ,,,।
(इतना कहकर मैडम इन दोनों को घर में ले आई और उन दोनों को एक कमरे में लेकर गई जहां पर वह खुद सब्जी काटने बैठी हुई थी,,,, और वह संदीप और तृप्ति से बोली,,,)
बाकी का सब काम तो हो गया है लेकिन सब्जियां काटना रह गया है बस यही काम हो जाए तो छुटकारा हो जाए वैसे भी मेरे बच्चे केक लेने गए हैं,,, वैसे मैं ज्यादा लोग को बुलाई नहीं हूं लेकिन बहुत खास खास को बुलाई हुं ,,,,,(इतना कहकर मैडम वहीं पर बैठ गई और फिर से सब्जी काटने लगी मैडम को सब्जी काटता हुआ देखकर तृप्ति बोली,,,)
अरे अरे मैडम यह आप क्या कर रही है मेरे होते हुए आपको यह सब करने की जरूरत नहीं है,,,,।
(इतना सुनते ही मैडम तृप्ति की तरफ देखने लगी और मुस्कुराते हुए बोली,,,)
तुम कर लोगी ना,,,,
जी मैडम मैं कर लूंगी मेरा तो रोज का काम है,,,,।
हां,,, हां,,,, मैडम हम दोनों यह काम कर लेंगे मैं भी सब्जी काटने में अपनी मां की मदद करता ही रहता हूं,,,,।
ओहहहह ,,, तुम दोनों कितने अच्छे हो,,,,,।
हम कर लेंगे मैडम आप चिंता ना करें आप दूसरा काम संभालो,,,,(इतना कहते हुए तृप्ति वहीं बैठ गई सब्जी काटने के लिए और तृप्ति की बात सुनकर मैडम बोली,,,)
तुम दोनों कितने अच्छे हो अच्छा हुआ तुम दोनों पहले आ गए वैसे तो अब कुछ काम बचा नहीं है बस मुझे नहाना है और अगर तुम दोनों यह काम कर लोगे तो हमें जल्दी से जाकर नहा लूंगी और फिर खाना तो जल्दी बनजाएगा,,,।
कोई बात नहीं मैडम आप जल्दी से जाकर नहा लीजिए तब तक हम दोनों सब्जी काट लेते हैं,,,,।
ठीक है,,,,(और इतना कहने के साथ ही मैडम नहाने के लिए चली गई,,,, मैडम के जाते ही तृप्ति बोली)
लो यहां तो अभी खाना ही नहीं बना है,,,, लगता है सारा काम हम लोगों को ही करना होगा,,,।
अरे वह बात छोड़ो लेकिन यह तो देखो मैडम हम दोनों को कमरे में अकेला छोड़ कर चली गई नहाने,,,,
तोक्या हुआ,,,?(सब्जी काटते हुए तृप्ति बोली,,,)
तो क्या हुआ,,,, समझ नहीं रही हो एक जवान लड़का और एक जवान लड़की कमरे में इस तरह से अकेले रहेंगे तो क्या होगा,,,,।
क्या होगा,,,,?(तृप्ति संदीप के खाने के मतलब को अच्छी तरह से समझ रही थी इसलिए संदीप की तरफ देखे बिना ही वह शर्म के मारे नजर नीचे झुकाए हुए सब्जी काटते हुए बोली)
यह पूछो क्या नहीं होगा,,,,,(और इतना कहने के साथ ही बैठे-बैठे ही संदीप अपने प्यास होठों को तृप्ति के देखते हुए होठों की तरफ आगे बढ़ने लगा संदीप की हरकत से तृप्ति के बदन में सिहरन सी दौड़ने लगी,, एक तो सुबह का नजारा और फिर बाइक पर चुचियों का रगड़ खाना यह सब पहले से ही तृप्ति के तन बदन में आग लगाया हुआ था,, और अभी यह कमरे में एकांत कुल मिलाकर तृप्ति को मदहोश कर रहा था और देखते ही देखते संदीप भी अपने होठों को एकदम उसके होठों के करीब ले गया इतना करीब कि दोनों की सांस एक दूसरे के गालों पर अपनी गर्माहट का एहसास दिलाने लगी,,,, संदीप की हरकत की वजह से तृप्ति के बदन में मदहोशी का नशा छाने लगा उसकी सांस उखड़ने लगी और उसकी आंखें अपने आप बंद हो गई यही मौका देखकर संदीप अपने प्यासे होठों को,,, तृप्ति के दहकते हुए होठों पर रख दिया,,, और मानो,,, तृप्ति भी इसी मौके का इंतजार कर रही हो वह तुरंत अपने होठों को खोल दी और गरमा गरम चुंबन में पूरा सहकार देने लगी दोनों पूरी तरह से पागल हो गए दोनों के हाथों से सब्जी काटने वाला चाकू छोड़कर नीचे गिर गया और दोनों एक दूसरे की बाहों में समाने लगी देखते ही देखते संदीप अपना हाथ आगे बढ़ाकर कुर्ती के ऊपर से ही,,, उसकी चूचियों को दबाना शुरू कर दिया।
संदीप की हरकत से तृप्ति के बदन में उत्तेजना और गर्माहट दोनों पूरी तरह से अपना असर दिखाने लगी,,, उसकी सांसे ऊपर नीचे हो रही थी वह पागल हुए जा रही थी देखते ही देखते संदीप उसके दोनों संतरों को पकड़ कर दबाना शुरू कर दिया,,,, जिस उत्तेजना के साथ संदीप उसकी चूचियों को दबा रहा था उसे तृप्ति,, को दर्द का एहसास तो हो ही रहा था लेकिन आनंद भी बेहद मिल रहा था,,, दोनों का चुंबन इतना गहरा था कि दोनों के लार और थुक एक दूसरे के मुंह में आदान-प्रदान हो रहे थे,,, दोनों पूरी तरह से पागल हो जाएंगे उन्हें इस बात की भी परवाह नहीं थी कि दरवाजा खुला हुआ है वह तो गनीमत था कि मैडम नहाने के लिए बाथरुम में चली गई थी,,,।
दोनों की हालत खराब हो गई थी इस तरह के एकांत में तृप्ति पूरी तरह से उत्तेजित हो गई थी उसकी बुर से मदन रस लगातार बह रहा था,,,, उसकी बाहों को पड़कर संदीप उसे खड़ी कर दिया और कुछ पल के लिए उसके होठों से अपने होठों को दूर करके उसके खूबसूरत चेहरे को देखने लगा पल भर में ही तृप्ति का गोरा चेहरा टमाटर की तरह लाल हो गया था,,, तृप्ति की सांस ऊपर नीचे हो रही थी साथ में उसकी चूचियां भी लहरा रही थी,,,।
संदीप,,, हमें यह नहीं ,,,, करना चाहिए,,,,(एकदम मदहोश होते हुए गहरी सांस लेते हुए वह बोली तो संदीप बोला)
ऐसा मौका फिर कभी नहीं मिलेगा तृप्ति,,,,
लेकिन समझने की कोशिश करो मैडम भी इधर ही है,,,।
( खेला खाया संदीप,, तृप्ति की बातों से ही समझ गया कि उसका भी मन है,,,, इसलिए वह धीरे से दरवाजे को बंद करतेहुए बोला,,,)
मैडम की चिंता मत करो वह बाथरूम में है,,,,।
तो,,(गहरी सांस लेते हुए तृप्ति बोली)
तो,,, क्या,,, इस मौके का फायदा उठाना चाहिए,,,,(और इतना कहने के साथ ही फिर से अपने होठों को उसकी तरफ आगे बढ़ाने लगा और देखते ही देखते फिर से दोनों एक दूसरे के होठों को चूसना और चबाना शुरू कर दिए,,,, तृप्ति पूरी तरह से मदहोश हो चुकी थी उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करना है बस वह संदीप की हरकतों का मजा ले रही थी और संदीप अपनी हरकत को धीरे-धीरे आगे बढ़ा रहा था,,,, उसकी चूचियों पर से उसके दोनों हाथ नीचे की तरफ फिसलते उसकी कमर पर आ गए थे और कमर पर आते ही वह धीरे से अपने हाथों को उसकी गोल-गोल नितंबों पर रख दिया था नितंबों पर संदीप के हाथों का स्पर्श इसे पूरी तरह से मदहोश कर रहा था वह पागल हुए जा रही थी और पागलों की तरह संदीप के होठों को चूस रही थी संदीप भी अपनी हरकत को अनजान देते हुए उसके नितंबों को दोनों हथेलियां में कसकर दबा दबा कर मजा ले रहा था,,,,,।
संदीप समझ गया था कि तृप्ति चुदवाने के लिए तैयार हो गई है,,,, इसलिए उसकी गांड को दोनों हाथों से पकड़ कर उसे एकदम से अपने लंड पर सता लिया और ऐसा करने पर उसका लंड जो कि पेंट में तनकर खड़ा हो गया था वह सीधे-सीधे उसकी दोनों टांगों के बीच जाकर उसकी बुर पर दस्तक देने लगा,,, तृप्ति को संदीप के लंड का एहसास अपनी बुर पर बहुत अच्छी तरह से हुआ था इसलिए उसके मुंह से हल्की सी शिकारी फूट पड़ी थी,,, और उसकी सिसकारी की आवाज सुनकर संदीप एकदम से चुदवासा हो गया और उसकी कमर को दोनों हाथों से पकड़ कर उसे उठाते हुए पास में ही पड़े टेबल पर बैठा दिया,,,,।
संदीप से अब रख पाना बहुत मुश्किल था क्योंकि जवानी का पर पूरी तरह से पार कर गया था इससे अच्छा मौका संदीप को मिलने वाला नहीं था इस तरह का एकांत उसे फिर दोबारा मिलने वाला नहीं था ऐसा एहसास उसके मन में होते ही वह तुरंत तृप्ति के सलवार की डोरी को खोलने लगा,,,, संदीप को इस तरह से सलवार की डोरी खोलता हुआ देखकर वह अपना हाथ बढ़ाकर उसे रोकने की कोशिश करने लगी लेकिन वह उसका हाथ हटा दिया और दोबारा तृप्ति में उसे हटाने की रोकने की कोशिश भी नहीं की क्योंकि अंदर से वह भी यही चाहती थी जो संदीप चाहता था देखते-देखते वह है तृप्ति की सलवार की डोरी खोलकर उसकी सलवार को ढीली कर दिया था और पेटी सहित उसे पड़कर उसके घुटनों तक खींच दिया था,,,,।
संदीप की हरकत से तृप्ति पानी पानी हो रही थी उसकी बुर लगातार पानी छोड़ रही थी,,, दोनों के बीच किसी भी प्रकार की वार्तालाप नहीं हो रही थी लेकिन पूरे कमरे में दोनों की गरमा गरम सांसो की आवाज ही गुंज रही थी,,,, संदीप की हर हरकत तृप्ति को बहुत ही अच्छी लग रही थी तृप्ति पूरी तरह से मदहोशी के आलम में हो गई थी,,, वह जवानी के नशे में डूब चुकी थी संदीप उसकी दोनों टांगों को उसके घुटनों से मोड कर उसकी गोल गोल गांड को देख रहा था और गांड की बीच उसकी गुलाबी बुर को देख रहा था,,, और उसकी बुर को देखकर उसके मुंह में पानी आ रहा था,,,, क्योंकि उत्तेजना के मारे उसकी बुर फुलकर कचोरी हो गई थी,,, संदीप की अनुभवी आंखें में तृप्ति की बुर को देखकर पहचान लिया था कि आज ही उसने क्रीम लगाकर उसे साफ की थी,,,, तृप्ति संदीप के हर हरकत को देख रही थी,,,,।
संदीप का मन तो कर रहा था कि तृप्ति की बुर को जीभ लगाकर चाटे,,, लेकिन वह जानता था कि इतना समय उसके पास बिल्कुल भी नहीं है वह तृप्ति की बुर में अपनी विजय पताका लहराना चाहता था,, इसलिए वह इस समय ज्यादा कुछ ना करते हुए अपनी हथेली को उसकी बुर पर रखकर उसे ज़ोर से मसलते हुए अपनी पेंट का बटन खोलने लगा,,,,।
संदीप के द्वारा हथेली से बुर को रगड़ने की वजह से उत्तेजना के चलते तृप्ति की आंखें एकदम से बंद हो गई थी,,,, और वह गहरी गहरी सांस लेने लगी थी लेकिन फिर वह अपनी आंखों को खोलकर संदीप की तरफ देखने लगी थी उसकी हरकतों को देखने लगी थी वह अपनी पेंट खोल रहा था और देखते-देखते वह अपनी पेट को घुटनों तक नीचे खींच दिया था लेकिन जैसे ही तृप्ति की नजर संदीप के लंड पर गई तो उसके होश उड़ गए,,,, वह अपने मन में ही सोचने लगी कि सुबह जो देखी थी उससे तो इसका आधा भी नहीं है,,,, तृप्ति,,, को कुछ समझ में नहीं आ रहा था,,, जब तक वह अपने भाई का नहीं देखी थी तब तक उसके मन में लड के आकार को लेकर वास्तव में संदीप के लंड के आकार का ही वास्तविक लंड नजर आता था,,, लेकिन सुबह अपने भाई के बम पिलाट लंड के दर्शन करने के बाद संदीप का लंड उसे बहुत छोटा लग रहा था,,,,।
Sandip or tripti
लेकिन फिर भी उसकी उत्तेजना परम सीमा पर थी वह पूरी तरह से चुदवाने के लिए तैयार हो चुकी थी,,, और संदीप उसे चोदने के लिए तैयार हो गया था,,,, लेकिन जैसे ही संदीप ने थूक को लगा कर अपने लंड को गीला किया वैसे ही डोर बेल बजने लगी,,, उसके तो होश उड़ गए उसे समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करें,,,, समय की सीमा रेखा को देखकर ही वह तृप्ति की बुर को चाटने का सुख छोड़कर एक बार उसने अपना लंड डालना चाहता है अपनी ख्वाहिश पूरी करना चाहता था और इसके लिए वह पूरी तरह से तैयार भी हो चुका था दरवाजे की घंटी बजाने के बावजूद भी वह एक हाथ में लंड पड़कर दूसरे हाथ से तृप्ति की दोनों टांगो को ऊपर उठाते हुए उसकी बुर में डालने जा रहा था कि लगातार डोर बेल बजाने की वजह से बाथरूम में से ही उसके मैडम ने आवाज लगाते हुए बोली,,,)
संदीप जल्दी से दरवाजा खोल दे बच्चे आ गए होंगे,,,,।
रहने दो संदीप,,,(लगातार डोर बैल और मैडम की आवाज सुनकर तृप्ति एकदम से घबरा गई और तुरंत टेबल पर से नीचे उतर कर अपनी सलवार की डोरी बांधने लगी,, संदीप भी समझ गया था कि अब उसके बस में कुछ भी नहीं है इसलिए वह भी अपने आप को व्यवस्थित करके दरवाजा खोलने के लिए चला गया,,, और तृप्ति वापस से सब्जी काटने लगी,,, देखते ही देखते घर में मेहमानों की संख्या बढ़ने लगी और फिर कब शाम हो गई पता ही नहीं चला,,,,।
रास्ते भर संदीप और तृप्ति एक दूसरे से बात नहीं कर रहे थे तृप्ति तो शर्म के मारे संदीप से बात नहीं कर पा रही थी और संदीप हाथ में आया । मौका चला गया था इसलिए कुछ बोल नहीं रहा था