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- Dec 5, 2013
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अपडेट 13
रुचिका मेरी तरफ देखने लगी तू मैंने उसे कहा की जो पसंद है ले लो. उसने कुछ नहीं लिया तू बहार आकर पूछने पर उसने कहा "आप मुझे बाद में ले देना, अभी कॉलेज जल्दी जाना है और दूसरा माँ को क्या बताउंगी" मैंने उसे कुछ न कहते हुए बाइक से कॉलेज छोड़ दिया. वो तू चली गयी लेकिन मोहनलाल के दिल में खलबली मचा गयी.
मोहनलाल वहां से जाने लगा लेकिन आज उसका मन बहुत विचलित था और उसका दिल कह रहा था की काश थोड़ा वक़्त और मिल जाता रुचिका के साथ गुजरने के लिए. लेकिन ये मुमकिन नहीं था और भरी मन से वह घर की तरफ चल पड़ा.
घर पहुँच कर संध्या ने पूछा "क्या बात है बहुत देर लगा दी" तो उसके जवाब में मोहनलाल ने कहा की "संध्या के लिए गहने लेने चला गया था और लेकर उसे कॉलेज में दे कर आया हूँ"
संध्या बात जानकार बहुत ख़ुशी हुई चलो एक काम तो निपटा और उससे ख़ुशी इस बात की थी की उसकी बेटी आज अच्छी लगेगी. उसके बाद वो जाकर मोहनलाल के लिए चाय लेकर आई तू मोहनलाल अपनी सोचो में गम थे और अपने आप से लड़ रहे थे की संध्या के चाय लेन से उनकी तन्द्रा भांग हुई और जब चाय देने के लिए वो झुकी तू उसका पल्लू सरक गया तू मोहनलाल के मन में आने लगा की वो कैसे अपनी बीवी को उस दर्द से छुटकारा दिलवाये तू उसने बड़े प्यार से उससे अपने पास बैठा लिया और उसको कहा की वो भी अपनी चाय ले आये और साथ में बैठ कर पिए.
संध्या बहाना करने लगी लेकिन मोहनलाल की ज़िद के सामने उसकी एक न चली और वो भी चाय लेकर आ गयी. दोनों चाय पिने लगे तू मोहनलाल उससे बड़े hi प्यार से बात करने लगा और उसको अपनी चिकनी चुपड़ी बातों में फंसा कर कह रहा था की वो उसके साथ डॉक्टर के पास चलकर पता कर ले की कोई बीमारी है तू उसका इलाज करवा लेते हैं.
संध्या उससे कहने लगी की उससे डॉक्टर के पास जाने में दर लगता है की अगर कुछ बड़ी बीमारी हुई तू फिर उसको हॉस्पिटल में एडमिट होना पड़ेगा और उसके बच्चों का ख्याल कौन करेगा.
मोहनलाल ने अपने एक हाथ को उसके कंधे पर रखकर कहा "तुम ऐसे hi चिंता कर रही हो, एक बार डॉक्टर को दिखा कर अपने दर को ख़तम कर लो", संध्या ने कहा "अगर कुछ बड़ी बात हुई तू".
मोहनलाल ने उसकी गर्दन के पीछे से हाथ निकलकर उसके कंधे को पकड़ कर अपने आगोश में लेते हुए उसके माथे को चूमकर उससे कहा "देखो जब तक हम दिखाएंगे नहीं तू हमें पता कैसे लगेगा की बात छोटी है या बड़ी, और चलो मैं एक मिनट के लिए मान लेते हैं की बात बड़ी है, जिसके लिए मेरा दिल नहीं मंटा फिर भी अगर बड़ी है तू उसका इलाज करवाएंगे और आजकल तू हर बीमारी का इलाज है"
संध्या भी उसकी बात सुनकर भावुक हो गयी और अपने चेहरे को मोहनलाल के कंधे पर रखकर आने लगी ,"अगर कुछ बड़ा हुआ तू मेरे बाद मेरे बच्चों का क्या होगा"
मोहनलाल: (उसके कंधे को सलहाते हुए) तुम तो बगैर कुछ जाने इतनी बड़ी बात बोल रही हो, हो सकता है की कुछ हो hi न और तुमने पता नहीं क्या क्या सोच लिया
संध्या: और कुछ हुआ तो
मोहनलाल: तो उसका इलाज करेंगे
संध्या: इलाज के लिए ऐसे कहाँ से आएँगे
मोहनलाल: तुम पैसों की चिंता क्यों कर रही हो और दूसरी बात यह मन कर क्यों चल रही हो की तुम्हें कोई बहुत बड़ी बीमारी हो गई है
संध्या: मुझे ऐसा लग रहा है
मोहनलाल: मैं तुम्हारी अब कुछ नहीं सुनूंगा और चलो तैयार हो जाओ तुम्हें डॉक्टर पास ले चल रहा हूँ
संध्या: फिर बच्चों का क्या होगा
मोहनलाल: अब बच्चे बच्चे नहीं रहे वह बड़े हो गए हैं (उसकी आँखों में रुचिका का अकास उभर आया)
संध्या: फिर भी
मोहनलाल: तुम नहीं चाहती की तुम नार्मल लाइफ जिओ और जिंदगी को एन्जॉय करो
संध्या: मैं क्यों नहीं चाहूंगी मुझे मालूम है की मैं मैं आपको पिछले कई सैलून से सुख नहीं दे पायी हूँ. मैं तो चाहूंगी की आपको पूरा सुख दूँ लेकिन मन में एक अजीब सा दर है
मोहनलाल: (उसके गालो को सहलाते हुए और उसके होठों पैर अपने अंगूठे से मलते हुए) बाकि बातें छोडो और चलो डॉक्टर के पास
संध्या मोहनलाल की बात मानकर तैयार होकर आ गई और वह दोनों बाइक पैर यह बैठकर डॉक्टर के पास जाने लगे तू आज मोहनलाल को फील हुआ की जैसे पीछे संध्या नहीं रुचिका बैठी हो.
वो दोनों डॉक्टर के पास पंहुच गए तू वंहा 2 पेशेंट्स पहले से वेट कर रहे थे, उनका नंबर आने पर वो अंदर गए तू डॉक्टर से बात की और फिर वो संध्या को एग्जामिनेशन रूम में ले गयी और मोहनलाल को बहार भेज दिया. 30 मिनट बाद मोहनलाल को बुलाया गया तू डॉक्टर जो एक अधेड़ उम्र की महिला थी उसने कहा "मैंने अच्छी तरह से चेक कर लिया है और जयादा घबराने की बात नहीं है, हाँ थोड़ा इलाज लम्बा चल सकता है, मैंने साडी बातें संध्या को समझा दी हैं और थोड़ी बातें मुझे तुम से अकेले में करनी हैं इसलिए संध्या तुम बहार इंतज़ार करो"
संध्या के बहार जाने पर डॉक्टर ने कहा की "देखो उसको योनि की जो मसल्स हैं वो इंटरकोर्स के वक़्त टाइट हो जाती हैं जिसका कारन जानना इतना आसान नहीं होता, कई बार ये प्रॉब्लम टेम्पररी होती है और कई बार बहुत लम्बे वक़्त तक चलती है और ऐसे वक़्त में तुम्हे उसके साथ जबरदस्ती नहीं करनी और उसे ये भी नहीं लग्न चाहिए की तुम इस वजह से उससे दूर हो रहे हो. सेक्स की जरुरत तुम्हारी भी है और उसकी भी है, इंटरकोर्स नहीं करना है जब तक वो ठीक न हो जाये, लेकिन दूसरे तरीकों से उसको रिलैक्स फील करवाना जरुरी है, नहीं तू बीमारी बाद जाएगी. तुम्हे कितना भी गुस्सा आ रहा हो या मूड ख़राब हो लेकिन उसके सामने कभी भी मत दिखाना क्यु उसका सीधा असर उसकी मनोदशा पर पड़ेगा और बीमारी ठीक होने की बजाये बढ़ जाएगी"
मोहनलाल: मैंने तू कभी भी उससे गुस्सा नहीं किया है फिर उसका इस तरह से बेहवे करना.
डॉक्टर: देखो जैसा की मैंने पहले भी कहा है की इस बीमारी का ठीक से बता पाना की क्योँ शुरू हुई बहुत मुश्किल है, लेकिन इसके कई कारन हो सकते है जैसे
1. किसी बात का दर
2. बचपन में घाटी कोई घटना
3. बच्चे के जनम के बाद योनि की मसल्स का कुछ जयादा सिकुड़ना
4.अर्ली मीनोपॉज
5. एंग्जायटी
6. साइकोलॉजिकल
और भी बहुत कुछ है, लेकिन इस बीमारी को दूर करने के लिए संयम की जरुरत है.
फिर डॉक्टर ने संध्या को बुलाकर इन दोनों की काउन्सलिंग की और कुछ खाने की दवाइयन और एक्सरसाइज बताई और हमेशा खुश रहने के लिए कहा. उसने कुछ टेस्ट्स भी बताये लेकिन ये कहा की 3 महीने लगातार दवाई खाने के बाद करना.
उसने सबसे जयादा जरुरी बात बताई की 'तुम दोनों में असली प्रेम की जरुरत है जो शारीरिक तू हो लेकिन बिना सहवास के और संयम रखे'
वंहा से निकलने के बाद घर पंहुच कर संध्या परेशान होने लगी और कहने लगी 'मैं अब आपके लायक नहीं रही और आपको पत्नी का सुख भी नहीं दे पाऊँगी'
मोहनलाल: (उसको अपने आगोश में लेते हुए और उसके माथे को चूमते हुए) तुम बिलकुल भी इस बारे में मत सोचो, मैंने कभी भी तुम से इस बारे में शिकायत की है ? देखो अब तू तुम्हे खुश होना चाहिए की तुम्हे कोई बहुत बड़ी बीमारी नहीं है. ये तू ठीक हो जाएगी, थोड़ा वक़्त लगेगा, इंतज़ार कर लेंगे.
संध्या: (सुबकते हुए) मैं आपको सुख नहीं दे सकती, आप दूसरी शादी कर लीजिये
मोहनलाल: तुम तू बिना बात के परेशान हो रही हो, सहवास hi तू नहीं कर सकते बाकि सब कुछ तू कर सकते हैं और वो भी कुछ वक़्त के लिए, तुम जब ठीक हो जाओगी तू फिर कर लेंगे.
संध्या: तब तक मैं बूढी हो जाउंगी और आपके किसी काम की नहीं रहूगी.
मोहनलाल: पहली बात तू तुम्हे बूढ़ा होने में बहुत वक़्त है, दूसरा कुछ वक़्त में तुम ठीक हो जाओगी. तुम तू अभी रुचिका की बड़ी बेहेन लगाती हो न की माँ
संध्या: (मुस्कराते हुए) जब भी मौका मिलता है छेड़ने लगते हो
मोहनलाल उसकी बात सुनकर संध्या को कास कर पकड़ लेता है और उसके रसभरे होंठों को अपने होंठों में जकड लेता है और धीरे धीरे चूसने लगता है और संध्या भी उससे सपोर्ट करने लगती है और दोनों धीरे धीरे एक दूसरे के शरीर को फील करने लगते हैं, परन्तु मोहनलाल अपने मन पर नियंत्रण करते हुए उससे आराम से बैठा देता है और कहता है 'तुम बहुत अच्छी हो'
संध्या शर्माने लगाती है और फिर किचन से कुछ खाने का लेकर आती है और दोनों बड़े प्यार से एक दूसरे को चढ़ते हुए खाना कहते रहे.
फिर संध्या ने मोहनलाल को रुचिका को लेन के लिए कहा तू मोहनलाल बाइक लेकर रुचिका को लेने चला गया.
मोहनलाल जब रुचिका को लेने पंहुचा तू फंक्शन ख़तम हो चूका था और वो कॉलेज के बहार बस स्टैंड पर वेट कर रही थी. उसके साथ उसकी एक सहेली भी वही वेट कर रही थी और दोनों hi थोड़ा घबराई हुई थी.
जब वो उससे लेने पंहुचा तू फंक्शन ख़तम हो चूका था और रुचिका कॉलेज के बहार बस स्टैंड पर वेट कर रही थी. उसके साथ उसकी एक सहेली भी वही वेट कर रही थी और दोनों hi थोड़ा घबराई हुई थी.
उनको उस तरह देखकर मोहनलाल ने पूछा की क्या हुआ तू उसने जवाब में इतना hi कहा "जल्दी चलो"
मोहनलाल ने कहा बैठो तू वो दोनों hi मेरे पीछे बाइक पर बैठ गयी. अब सीट की लमबी काम होने की वजह से मुझे थोड़ा आगे होना पड़ा लेकिन फिर भी रुचिका मुझसे बिलकुल सात गयी क्योँकि उसकी सहेली उसके पीछे बैठी थी. उसके सटने से रुचिका की चूचियां मोहनलाल की पीठ से दबने लगी जो की बहुत hi नरम और मुलायम लग रही थी. उसका इस तरह का स्पर्श उससे एक अजीब सी फीलिंग दे रहा था, लेकिन उसका दिमाग़ कह रहा था की ये क्या सोच रहा है वो तेरी बेटी है. अभी दिल और दिमाग में लड़ाई चल रही थी कुछ ऐसा हुआ जिससे मोहनलाल को एकदम से बाइक रोकनी पड़ी और जो कुछ हुआ उससे सोचकर मोहनलाल की आँख खुल गयी
रुचिका मेरी तरफ देखने लगी तू मैंने उसे कहा की जो पसंद है ले लो. उसने कुछ नहीं लिया तू बहार आकर पूछने पर उसने कहा "आप मुझे बाद में ले देना, अभी कॉलेज जल्दी जाना है और दूसरा माँ को क्या बताउंगी" मैंने उसे कुछ न कहते हुए बाइक से कॉलेज छोड़ दिया. वो तू चली गयी लेकिन मोहनलाल के दिल में खलबली मचा गयी.
मोहनलाल वहां से जाने लगा लेकिन आज उसका मन बहुत विचलित था और उसका दिल कह रहा था की काश थोड़ा वक़्त और मिल जाता रुचिका के साथ गुजरने के लिए. लेकिन ये मुमकिन नहीं था और भरी मन से वह घर की तरफ चल पड़ा.
घर पहुँच कर संध्या ने पूछा "क्या बात है बहुत देर लगा दी" तो उसके जवाब में मोहनलाल ने कहा की "संध्या के लिए गहने लेने चला गया था और लेकर उसे कॉलेज में दे कर आया हूँ"
संध्या बात जानकार बहुत ख़ुशी हुई चलो एक काम तो निपटा और उससे ख़ुशी इस बात की थी की उसकी बेटी आज अच्छी लगेगी. उसके बाद वो जाकर मोहनलाल के लिए चाय लेकर आई तू मोहनलाल अपनी सोचो में गम थे और अपने आप से लड़ रहे थे की संध्या के चाय लेन से उनकी तन्द्रा भांग हुई और जब चाय देने के लिए वो झुकी तू उसका पल्लू सरक गया तू मोहनलाल के मन में आने लगा की वो कैसे अपनी बीवी को उस दर्द से छुटकारा दिलवाये तू उसने बड़े प्यार से उससे अपने पास बैठा लिया और उसको कहा की वो भी अपनी चाय ले आये और साथ में बैठ कर पिए.
संध्या बहाना करने लगी लेकिन मोहनलाल की ज़िद के सामने उसकी एक न चली और वो भी चाय लेकर आ गयी. दोनों चाय पिने लगे तू मोहनलाल उससे बड़े hi प्यार से बात करने लगा और उसको अपनी चिकनी चुपड़ी बातों में फंसा कर कह रहा था की वो उसके साथ डॉक्टर के पास चलकर पता कर ले की कोई बीमारी है तू उसका इलाज करवा लेते हैं.
संध्या उससे कहने लगी की उससे डॉक्टर के पास जाने में दर लगता है की अगर कुछ बड़ी बीमारी हुई तू फिर उसको हॉस्पिटल में एडमिट होना पड़ेगा और उसके बच्चों का ख्याल कौन करेगा.
मोहनलाल ने अपने एक हाथ को उसके कंधे पर रखकर कहा "तुम ऐसे hi चिंता कर रही हो, एक बार डॉक्टर को दिखा कर अपने दर को ख़तम कर लो", संध्या ने कहा "अगर कुछ बड़ी बात हुई तू".
मोहनलाल ने उसकी गर्दन के पीछे से हाथ निकलकर उसके कंधे को पकड़ कर अपने आगोश में लेते हुए उसके माथे को चूमकर उससे कहा "देखो जब तक हम दिखाएंगे नहीं तू हमें पता कैसे लगेगा की बात छोटी है या बड़ी, और चलो मैं एक मिनट के लिए मान लेते हैं की बात बड़ी है, जिसके लिए मेरा दिल नहीं मंटा फिर भी अगर बड़ी है तू उसका इलाज करवाएंगे और आजकल तू हर बीमारी का इलाज है"
संध्या भी उसकी बात सुनकर भावुक हो गयी और अपने चेहरे को मोहनलाल के कंधे पर रखकर आने लगी ,"अगर कुछ बड़ा हुआ तू मेरे बाद मेरे बच्चों का क्या होगा"
मोहनलाल: (उसके कंधे को सलहाते हुए) तुम तो बगैर कुछ जाने इतनी बड़ी बात बोल रही हो, हो सकता है की कुछ हो hi न और तुमने पता नहीं क्या क्या सोच लिया
संध्या: और कुछ हुआ तो
मोहनलाल: तो उसका इलाज करेंगे
संध्या: इलाज के लिए ऐसे कहाँ से आएँगे
मोहनलाल: तुम पैसों की चिंता क्यों कर रही हो और दूसरी बात यह मन कर क्यों चल रही हो की तुम्हें कोई बहुत बड़ी बीमारी हो गई है
संध्या: मुझे ऐसा लग रहा है
मोहनलाल: मैं तुम्हारी अब कुछ नहीं सुनूंगा और चलो तैयार हो जाओ तुम्हें डॉक्टर पास ले चल रहा हूँ
संध्या: फिर बच्चों का क्या होगा
मोहनलाल: अब बच्चे बच्चे नहीं रहे वह बड़े हो गए हैं (उसकी आँखों में रुचिका का अकास उभर आया)
संध्या: फिर भी
मोहनलाल: तुम नहीं चाहती की तुम नार्मल लाइफ जिओ और जिंदगी को एन्जॉय करो
संध्या: मैं क्यों नहीं चाहूंगी मुझे मालूम है की मैं मैं आपको पिछले कई सैलून से सुख नहीं दे पायी हूँ. मैं तो चाहूंगी की आपको पूरा सुख दूँ लेकिन मन में एक अजीब सा दर है
मोहनलाल: (उसके गालो को सहलाते हुए और उसके होठों पैर अपने अंगूठे से मलते हुए) बाकि बातें छोडो और चलो डॉक्टर के पास
संध्या मोहनलाल की बात मानकर तैयार होकर आ गई और वह दोनों बाइक पैर यह बैठकर डॉक्टर के पास जाने लगे तू आज मोहनलाल को फील हुआ की जैसे पीछे संध्या नहीं रुचिका बैठी हो.
वो दोनों डॉक्टर के पास पंहुच गए तू वंहा 2 पेशेंट्स पहले से वेट कर रहे थे, उनका नंबर आने पर वो अंदर गए तू डॉक्टर से बात की और फिर वो संध्या को एग्जामिनेशन रूम में ले गयी और मोहनलाल को बहार भेज दिया. 30 मिनट बाद मोहनलाल को बुलाया गया तू डॉक्टर जो एक अधेड़ उम्र की महिला थी उसने कहा "मैंने अच्छी तरह से चेक कर लिया है और जयादा घबराने की बात नहीं है, हाँ थोड़ा इलाज लम्बा चल सकता है, मैंने साडी बातें संध्या को समझा दी हैं और थोड़ी बातें मुझे तुम से अकेले में करनी हैं इसलिए संध्या तुम बहार इंतज़ार करो"
संध्या के बहार जाने पर डॉक्टर ने कहा की "देखो उसको योनि की जो मसल्स हैं वो इंटरकोर्स के वक़्त टाइट हो जाती हैं जिसका कारन जानना इतना आसान नहीं होता, कई बार ये प्रॉब्लम टेम्पररी होती है और कई बार बहुत लम्बे वक़्त तक चलती है और ऐसे वक़्त में तुम्हे उसके साथ जबरदस्ती नहीं करनी और उसे ये भी नहीं लग्न चाहिए की तुम इस वजह से उससे दूर हो रहे हो. सेक्स की जरुरत तुम्हारी भी है और उसकी भी है, इंटरकोर्स नहीं करना है जब तक वो ठीक न हो जाये, लेकिन दूसरे तरीकों से उसको रिलैक्स फील करवाना जरुरी है, नहीं तू बीमारी बाद जाएगी. तुम्हे कितना भी गुस्सा आ रहा हो या मूड ख़राब हो लेकिन उसके सामने कभी भी मत दिखाना क्यु उसका सीधा असर उसकी मनोदशा पर पड़ेगा और बीमारी ठीक होने की बजाये बढ़ जाएगी"
मोहनलाल: मैंने तू कभी भी उससे गुस्सा नहीं किया है फिर उसका इस तरह से बेहवे करना.
डॉक्टर: देखो जैसा की मैंने पहले भी कहा है की इस बीमारी का ठीक से बता पाना की क्योँ शुरू हुई बहुत मुश्किल है, लेकिन इसके कई कारन हो सकते है जैसे
1. किसी बात का दर
2. बचपन में घाटी कोई घटना
3. बच्चे के जनम के बाद योनि की मसल्स का कुछ जयादा सिकुड़ना
4.अर्ली मीनोपॉज
5. एंग्जायटी
6. साइकोलॉजिकल
और भी बहुत कुछ है, लेकिन इस बीमारी को दूर करने के लिए संयम की जरुरत है.
फिर डॉक्टर ने संध्या को बुलाकर इन दोनों की काउन्सलिंग की और कुछ खाने की दवाइयन और एक्सरसाइज बताई और हमेशा खुश रहने के लिए कहा. उसने कुछ टेस्ट्स भी बताये लेकिन ये कहा की 3 महीने लगातार दवाई खाने के बाद करना.
उसने सबसे जयादा जरुरी बात बताई की 'तुम दोनों में असली प्रेम की जरुरत है जो शारीरिक तू हो लेकिन बिना सहवास के और संयम रखे'
वंहा से निकलने के बाद घर पंहुच कर संध्या परेशान होने लगी और कहने लगी 'मैं अब आपके लायक नहीं रही और आपको पत्नी का सुख भी नहीं दे पाऊँगी'
मोहनलाल: (उसको अपने आगोश में लेते हुए और उसके माथे को चूमते हुए) तुम बिलकुल भी इस बारे में मत सोचो, मैंने कभी भी तुम से इस बारे में शिकायत की है ? देखो अब तू तुम्हे खुश होना चाहिए की तुम्हे कोई बहुत बड़ी बीमारी नहीं है. ये तू ठीक हो जाएगी, थोड़ा वक़्त लगेगा, इंतज़ार कर लेंगे.
संध्या: (सुबकते हुए) मैं आपको सुख नहीं दे सकती, आप दूसरी शादी कर लीजिये
मोहनलाल: तुम तू बिना बात के परेशान हो रही हो, सहवास hi तू नहीं कर सकते बाकि सब कुछ तू कर सकते हैं और वो भी कुछ वक़्त के लिए, तुम जब ठीक हो जाओगी तू फिर कर लेंगे.
संध्या: तब तक मैं बूढी हो जाउंगी और आपके किसी काम की नहीं रहूगी.
मोहनलाल: पहली बात तू तुम्हे बूढ़ा होने में बहुत वक़्त है, दूसरा कुछ वक़्त में तुम ठीक हो जाओगी. तुम तू अभी रुचिका की बड़ी बेहेन लगाती हो न की माँ
संध्या: (मुस्कराते हुए) जब भी मौका मिलता है छेड़ने लगते हो
मोहनलाल उसकी बात सुनकर संध्या को कास कर पकड़ लेता है और उसके रसभरे होंठों को अपने होंठों में जकड लेता है और धीरे धीरे चूसने लगता है और संध्या भी उससे सपोर्ट करने लगती है और दोनों धीरे धीरे एक दूसरे के शरीर को फील करने लगते हैं, परन्तु मोहनलाल अपने मन पर नियंत्रण करते हुए उससे आराम से बैठा देता है और कहता है 'तुम बहुत अच्छी हो'
संध्या शर्माने लगाती है और फिर किचन से कुछ खाने का लेकर आती है और दोनों बड़े प्यार से एक दूसरे को चढ़ते हुए खाना कहते रहे.
फिर संध्या ने मोहनलाल को रुचिका को लेन के लिए कहा तू मोहनलाल बाइक लेकर रुचिका को लेने चला गया.
मोहनलाल जब रुचिका को लेने पंहुचा तू फंक्शन ख़तम हो चूका था और वो कॉलेज के बहार बस स्टैंड पर वेट कर रही थी. उसके साथ उसकी एक सहेली भी वही वेट कर रही थी और दोनों hi थोड़ा घबराई हुई थी.
जब वो उससे लेने पंहुचा तू फंक्शन ख़तम हो चूका था और रुचिका कॉलेज के बहार बस स्टैंड पर वेट कर रही थी. उसके साथ उसकी एक सहेली भी वही वेट कर रही थी और दोनों hi थोड़ा घबराई हुई थी.
उनको उस तरह देखकर मोहनलाल ने पूछा की क्या हुआ तू उसने जवाब में इतना hi कहा "जल्दी चलो"
मोहनलाल ने कहा बैठो तू वो दोनों hi मेरे पीछे बाइक पर बैठ गयी. अब सीट की लमबी काम होने की वजह से मुझे थोड़ा आगे होना पड़ा लेकिन फिर भी रुचिका मुझसे बिलकुल सात गयी क्योँकि उसकी सहेली उसके पीछे बैठी थी. उसके सटने से रुचिका की चूचियां मोहनलाल की पीठ से दबने लगी जो की बहुत hi नरम और मुलायम लग रही थी. उसका इस तरह का स्पर्श उससे एक अजीब सी फीलिंग दे रहा था, लेकिन उसका दिमाग़ कह रहा था की ये क्या सोच रहा है वो तेरी बेटी है. अभी दिल और दिमाग में लड़ाई चल रही थी कुछ ऐसा हुआ जिससे मोहनलाल को एकदम से बाइक रोकनी पड़ी और जो कुछ हुआ उससे सोचकर मोहनलाल की आँख खुल गयी