Incest Porn Kahani Rishta - Page 3 - SexBaba
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Incest Porn Kahani Rishta

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सबसे पहले तू आपका बहुत बहुत धन्यवाद् की आपने इस कहानी को पसंद किया और उसमे एक कमी बताई है. आपने ऐसा मुद्दा उठाया है जिसके बारे में लोगों की अलग अलग राइ हो सकती है.

मैंने जब पहली कहानी शुरू की थी तब मैंने उसे किसी भी केटेगरी में नहीं रखा था, लेकिन पाठको के सुझाव और काफी दबाव के बाद उसको इन्सेस्ट केटेगरी दिया गया था.

जंहा तक मेरी समझ है अडुल्टेरी और इन्सेस्ट में जयादा फर्क नहीं है, सिर्फ इसके की इन्सेस्ट ब्लड रिलेशन में सेक्स है. आपकी बात को अगर समझू तू उसके हिसाब से अगर आदित्य संध्या को माँ कहे तू इन्सेस्ट नहीं तू अडुल्टेरी.

मैं आपसे जानने की इच्छुक हु की अगर दो विपरीत लिंग के व्यक्तियों में परस्पर प्रेम हो और वो सेक्स का रूप ले ले और उसके बाद या सेक्स से पहले कोई रिलेशनशिप जिसका कोई नाम दिया जा sake(jaise की पति पत्नी) बनता है तब वो न तू अडुल्टेरी रहेगा और न hi इन्सेस्ट क्योँकि पति पत्नी में तू सेक्स अल्लोवेद है. अब प्रश्न ये है की उसे किस केटेगरी में रखें.

मेरे लिए कहानी किसी भी केटेगरी में हो इम्पोर्टेन्ट नहीं है, मेरे लिए इम्पोर्टेन्ट है की जो मैं लिख रही हु क्या वो लोगों को पसंद आया या नहीं और उसको पढ़कर आनंदित हुए की नहीं.

आपके सुझाव मेरे लिए महत्वपूर्ण है, कृपया अवगत कराएं

धन्यवाद्
 
अपडेट 9



मेरी बात सुनकर संध्या बोली "प्रॉब्लम अगर बड़ी हुई तू फिर आपका और बच्चों का ख्याल कौन करेगा" मैंने कहा "इसलिए तू कह रहा हु की तुम्हे डॉक्टर को दिखने में भलाई है ताकि समस्या का समाधान ढूंढा जा सके" लेकिन मेरे बहुत बार कहने के बावजूद वो नहीं गयी और मैं भी पुणे आ गया.

मैं जब पुणे आ गया तू यंहा पर सेठजी के जानने वाले ने मुझे एक घर किराये पर दिलवा दिया और वंहा पर एक ऐसे इवनिंग स्कूल में एडमिशन भी ले लिया जंहा पर यह सुविधा थी की एक hi साल में दसवीं कर सकते थे और 6 महीने बाद एग्जाम होने थे जिसका फॉर्म 3 महीने बाद भरना था. अब मेरे सामने दो समस्यांए थी पहली तू स्टोर को बनवाना और दूसरा पढाई करना.

मैंने जी तोड़ म्हणत करके स्टोर को बनवाने और साथ में पर पूरा ध्यान केंद्रित कर दिया. 6 महीने बाद दसवीं की परीक्षा में मेरे पेपर्स बहुत अच्छे गए और मैं फर्स्ट डिवीज़न से पास हो गया लेकिन टीचर की गलती से मेरे पर्टिक्युलर्स गलत लिखे गए. मैंने जब यह बात बताई तू टीचर ने कहा की इन्हे बदलवाने के लिए कोर्ट में एफिडेविट और प्रूफ देना पड़ेगा. प्रूफ तू मैं ला सकता था लेकिन उसके लिए मुझे गाँव जाना पड़ता जो मैं करना नहीं चाहता था.

मैंने टीचर से पूछा की "अगर मैं इस नाम और पर्टिक्युलर्स का सर्टिफिकेट रखता हु तू कोई गड़बड़ तू नहीं होगी" उसने कहा "कैसे होगी, सर्टिफिकेट पर तुम्हारी फोटो भी लगी हुई है, बस अब से जो भी डाक्यूमेंट्स बनेगे वो सब इन्ही पार्टिकल्स से होंगे"

मैंने काफी सोचा और फिर दिल को समझा लिया और सोच लिया की अब मेरे ऑफिसियल पर्टिक्युलर्स यही होगा, वैसे भी उस नाम से मुझे कौन सी परेशानी होनी थी.

मैंने वंहा पर बाइक और कार चलनी भी सीख ली और लाइसेंस भी बनवा लिया और बैंक अकाउंट भी खुल गया. बिच बिच में घर भी जाता था और संध्या को कई बार बोलै की डॉक्टर के पास चलने के लिए परन्तु हर बार कोई न कोई बहाना करके वो नहीं गयी.

मैं उन सब की जरूरते पूरी करता रहा खासकर रुचिका की हर फरमाइश को पूरा करने की कोशिश करता था. जब छोटी थी तू चॉकलेट वगेरा और जब थोड़ी बड़ी हुई तू खिलोने लेकिन उससे तू हर बार नै नै डॉल में hi जयादा मज़ा आता था, जो मैं ला देता था. आदित्य भी बड़ा हो रहा था और उसको खेलकूद का सामान अच्छा लगता था, मैं दोनों बच्चों को सब कुछ जो मेरी हैसियत में होता था ले देता था.

इधर धीरे धीरे वक़्त गुज़रता गया और मैंने ग्रेजुएशन भी कर ली थी और अब व्युओंपर ने भी काफी तैराकी कर ली थी और मैं काफी पैसे कमाने लगा था और मेरा अच्छा खासा बैंक बैलेंस भी हो गया था. कारोबार के चक्कर में मुझे कई शहरों में भी जाना पड़ता था और कई बार बिज़नेस मीटिंग में कपल के लिए फ्री रहना, खाना पीना होता था तू मैं संध्या को मनाकर अपने साथ ले गया, लेकिन उससे उनकंफर्टबले फील होने लगा क्योँकि उसके लिए बड़े होटल में अपने आप को एडजस्ट करना मुश्किल होता था और दूसरी लेडीज के साथ बात न कर पाने के लिए उसने मेरे साथ जाना छोड़ दिया.

मैंने उसे दसवीं करने के लिए कहा तू उसने दो तीन बार तरय किया लेकिन सफल न हो पाई. फिर उसने मन में बैठा लिया की अब मेरे साथ घूमने नहीं जाएगी और घर में hi सीममत कर रह गयी और बच्चों के साथ hi खुश रहने लगी.

इधर वक़्त के साथ बच्चे बड़े होते गए और रुचिका ने दसवीं बहुत hi अच्छे नम्बरो से पास कर ली तू उसके रिजल्ट से रुचिका से जयादा संध्या खुश हुई और ऐसा लग रहा था की जैसे उसने खुद दसवीं पास की हो न की रुचिका ने. फिर रुचिका ने गर्ल्स कॉलेज में पढ़ने जाने लगी और आदित्य नौंवी में स्कूल जाता था

मैं जब भी आता तू रुचिका को कॉलेज लेने या छोड़ने बाइक पर hi जाता था. रुचिका को भी मेरा साथ बहुत अच्छा लगता था जब उसको कॉलेज से लेकर आता था तो कई बार ऐसा होता था उसकी सहेलियां मुझे बड़ी हसरत से निहारती थी और मुझे समझ नहीं आता था की ऐसा क्यों है.

रुचिकाज जिससे घर में रूचि कहते थे मैं मैं भी उसे रूचि कह कर पुकारता था. उस वक़्त रूचि बहुत hi शर्मीली लड़की थी और अपने काम से काम रखती थी. हाँ यह बात जरूर थी की मेरे आने से वह खुश हो जाती थी और और जब मेरे साथ कॉलेज से आ रही होती थी तब कई बार बड़ी hi मासूमियत से मुझे कहती थी थी "पापा आइस क्रीम खिला दो न" और मैं उसके अंदाज़ में खो जाता था और उसे आइस क्रीम खिलता था. उसे आइसक्रीम खता हुआ देखकर मुझे बहुत सुकून मिलता था. वह कॉलेज में ऐसे कपडे पहनती थी जिससे की उसका पूरा शरीर ढाका हुआ होता था और उसके शरीर का बिलकुल भी पता नहीं लगता था. वह पुरे गले का कुरता और सलवार पहना करती थी जिससे लोगों को उसके शरीर का बहन न हो सके और कभी भी मेकअप नहीं करती थी. वह एक साधारण सी लड़की लगती थी और सिर्फ और सिर्फ पढ़ाई पैर ध्यान देते थी.

जब वह अन्तर मैं पहुंची तो एक दिन की बात है की उसे कॉलेज के फंक्शन में राजस्थानी लड़की का रोल करना था जिसमें उसने ट्रेडिशनल घागरा चोली पहना था, उसने अपनी माँ से इस बारे में बात की तो उसने मन कर दिया लेकिन साथ में यह भी कहा की कल तेरे पापा आ रहे हैं और अगर वह इजाजत देते हैं तू उनके साथ जाकर खरीद लेना.

अगले दिन मैं जब घर पहुंचा तू मुझे इस बारे में बताया गया और मैं रूचि की तरफ देख कर उसे इस बात की इजाजत दे दी और उसे कहा की चलो लेलो. मैं संध्या को भी साथ चलने के लिए कहा लेकिन वह नहीं गई और मैं रूचि को घागरा चोली दिला लाया.

चलो मोहनलाल को अपनी सोचो में छोड़कर देखते हैं की आदित्य और संध्या क्या कर रहे हैं

संध्या: आदित्य सॉरी आज जो कुछ भी हुआ वो नहीं होना चाहिए था..

आदित्य: माँ आप उस बारे में ज़यादा सोचो मत, बस मुझ से कभी नाराज़ मत होना. आप का प्यार ही मेरे लिए सब कुछ है.

संध्या: पागल मैं तुझ से कभी नाराज़ नहीं हो सकती और ना ही घर का कोई और व्यक्ति तुझ से नाराज़ हो सकता है.

फिर हम यही सब बाते करते करते मार्केṭ में पहुँच गए, वहां से शाम की parṭy के लिए खाने पीने का सामान लिया और घर की तरफ चल दिए.

संध्या: आदित्य कहीं बाइक रोक ना आज पानी पूरी खाने का मन कर रहा है.

आदित्य: हाँ माँ अभी थोड़ा सा आगे एक पानी पूरी वाला है हम वहां रुकते है.

थोड़ी दूर चलने पर वो sṭaal आ गया और आदित्य और संध्या वहां जा कर खड़े हो गए.

संध्या: (पानी पूरी वाले से) भैया थोड़ा तीखा ज़यादा रखना

फिर उसने हम दोनों को एक एक प्लेṭ दी लेकिन आदित्य ने उसे सिर्फ माँ को खिलाने के लिए कहा. आदित्य माँ को पानी पूरी खाते हुए देख रहा था. उन्होंने honṭho पर ḍआर्क रेḍ कलर की lipasṭic लगा राखी थी और उनके honṭh बिलकुल रास से भरे हुए लग रहे थे जैसे कोई स्ट्रॉबेरी हो. आदित्य उनको लगातार देखे ही जा रहा था.

संध्या ने इशारा किया और इस तरह से देखने का काराṇ पूछा. आदित्य ने धीरे से कहा "माँ आप आज बहुत ब्यूटीफुल लग रही हो, मन करता है बस ऐसे ही देखे जॉन.

संध्या मुस्कुरा देती है और आदित्य की peeṭh पर एक चपत लगा कर बोलती है "अच्छा मैं तुझे बस आज ही ब्यूटीफुल लग रही हूँ क्या , बाकी दिन मैं अच्छी नहीं लगाती??

आदित्य: ऐसी बात नहीं है माँ लेकिन तीखा खाने के बाद आप का चेहरा बिलकुल ऐसे लाल हो गया है जैसे सुबह के सूर्य की लालिमा हो.

उसकी बात सुनकर संध्या शर्मा गयी, लेकिन अपनी शर्म को छुपाते हुए पूछा

संध्या: एक बात बता बहुत देर से देख रही हु की तूने मुझे गर्लफ्रेंड से फिर माँ बना दिया है.

आदित्य: माँ वो क्या है न की मुझे लगा की आप मुझसे नाराज़ हो गयी है, इसलिए मैंने सोचा की अब मैं आपको माँ hi कहुगा ताकि आपकी शान में कोई गुस्ताखी न हो सके

संध्या: अब मुझे समझ आया की क्योँ तूने पानी पूरी नहीं खाई, क्योँकि तुम माँ के साथ थे न की गर्लफ्रेंड के. अगर गर्लफ्रेंड के साथ होता तब जरूर खता

आदित्य: नहीं नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है

संध्या: (नाराज़ होते हुए) मैं सब समझती हु, पहले तू माँ को गर्लफ्रेंड बना दिया और जब उसको साथ लाया तू सोचा की बुढ़िया को गर्लफ्रेंड बनाने का क्या फायदा

आदित्य: यह आप क्या बोल रही हैं. आप मेरी माँ पहले हैं और आपके लिए तू मैं कुछ भी कर सकता हु और रही बात गर्लफ्रेंड की तू वो आपने hi कहा था की आपको बुरा लगेगा अगर कोई मुझे कुछ कहेगा की इतना बड़ा होने पर माँ के साथ घूमने आता है, इसलिए मैंने आपको गर्लफ्रेंड का सुझाव दिया था. आपको अगर लगता है की माँ बनकर चलने में आपको कोई समस्या नहीं है तू मुझे कभी भी इस बात से कोई भी तकलीफ नहीं है. मेरे लिए आप का खुश रहना जयादा इम्पोर्टेन्ट है न की मैं आपको क्या समझाता हु माँ या गर्लफ्रेंड. ये मैं आप पर छोड़ता हु की आप क्या पसंद करती हो

संध्या: (खुश होते हुए) मुझे इस बात की बहुत ख़ुशी है की तुम्हे मेरा ख्याल है और तुम मेरी ख़ुशी चाहते हो तू तुमने ये कैसे सोच लिया की मैं अपनी ख़ुशी को पाने के लिए तुम्हे दुखी करुँगी.

आदित्य: आपने मुझे कब दुखी किया और मैं आपके साथ जाकर कभी भी दुखी नहीं हु

संध्या: मैं समझ सकती हु की तुम मेरे साथ जा कर दुखी नहीं हो लेकिन मुझे यह भी समझ आ रहा है की अगर मैं तुम्हारे साथ तुम्हारी माँ बनकर जाउंगी तू तुम मुझे मज़बूरी में लेकर जाओगे और अगर मैं तुम्हारी गर्लफ्रेंड बनकर जाउंगी तब तुम जयादा ख़ुशी से ले जाओगे.

आदित्य: माँ ऐसा कुछ भी नहीं है जैसा आप सोच रही हैं. मैंने आप को कहा है की मैं आपकी ख़ुशी चाहता हु और वो मैं दिल दे से कह रहा हु न किसी मज़बूरी की वजह से. आप को घूमने में मुझे जो ख़ुशी मिलेगी वो आप सोच भी नहीं सकती और मुझे इसमें भी कोई प्रॉब्लम नहीं है की कोई मुझे क्या कहता है. माँ अप्प ऐसा करो की आप मेरे साथ माँ बनकर hi चलो और जरा सा भी अगर आपको लगे की मुझे किसी की बात का बुरा लग रहा है तब आप चाहो तू मेरी गर्लफ्रेंड बनकर चल देना.

संध्या: (मुस्कराते हुए) मैं आज अगर तुम्हारी माँ बनकर तुम्हार साथ घूमने गयी और मुझे पता लगा की किसी ने तुम्हे कुछ कहा है जिससे मुझे बुरा लगे तब मैं अपना रोले बदलकर एह कनहींकी मैं तुम्हारी गर्लफ्रेंड हु तब तुम्हारे लिए और जयादा समस्या कड़ी हो जाएगी.

आदित्य: समस्या कैसे कड़ी हो जाएगी

संध्या: तुम मुझे बताओ अभी अगर हम घूमने जायेंगे तू तुम लोगों से मेरे बारे में क्या कह कर मिलवाओगे

आदित्य: ये मेरी माँ हैं

संध्या: और अगर मुझे कुछ बुरा लगा तब मैं तुम्हारे कहे अनुसार क्या बन कर तुम्हारे साथ जाउंगी "गर्लफ्रेंड" न

आदित्य: हाँ

संध्या: ( मुस्कराते हुए) तू सोचो की जिन लोगों को तुमने मेरे बारे में बताया होगा की मैं तुम्हारी माँ हु और अब गर्लफ्रेंड हु, तू लोग तुम्हारे बारे में क्या क्या सोचेंगे

आदित्य: माँ आप बात तू सही कह रही हो, फिर तू वाकई hi समस्या कड़ी हो जाएगी.

संध्या: फिर बता क्या करना चाहिए

आदित्य: माँ मैं क्या बताऊँ, मैं तू सिर्फ और सिर्फ आपकी ख़ुशी चाहता हु

संध्या: तू चल अभी घर चलते हैं और सोचानेगे की क्या करना है

आदित्य: ठीक है माँ चलो फिर चलते हैं

घर जब पंहुचे तू मोहनलाल अपने hi ख्यालों में खोया हुआ था और उनके आने से वो ख्यालों से निकलकर अपने आप को संभालते हुए उन्हें बताया की रुचिका बसों गई है, इसलिए शोर न करते हुए बाते करेंगे जो उन दोनों ने मान ली.
 
अपडेट 10



घर जब पंहुचे तू मोहनलाल अपने hi ख्यालों में खोया हुआ था और उनके आने से वो ख्यालों से निकलकर अपने आप को संभालते हुए उन्हें बताया की रुचिका सो गई है, इसलिए शोर न करते हुए बाते करेंगे जो उन दोनों ने मान ली.

ड्राइंग रूम में आकर सब ने बैठ कर बातें करनी शुरू की

मोहनलाल: बीटा अब तुम्हारी पढाई कब तक ख़तम हो जाएगी.

आदित्य: पापा लास्ट सेमेस्टर है, 3-4 महीने और हैं, वैसे अगले हफ्ते से प्लेसमेंट शुरू हो रही है.

मोहनलाल: तुम प्लेसमेंट यंहा नज़दीक की लोगो या दूर की.

आदित्य: पापा, नज़दीक की जॉब में पैसे काम मिलेंगे और शुरू में hi अगर कोम्प्रोमाईज़ कर लिया तू फिर पूरी जिंदगी पछताना पड़ेगा.

मोहनलाल: तू तुम बहार की जॉब करोगे या फॉरेन की करोगे.

आदित्य: जो भी बेटर ओप्पोर्तुनिटी मिलेगी वो चाहे देश की हो या विदेश की उसे पाने की पूरी कोशिश करूँगा.

मोहनलाल: अगर तुम्हे बहार की या फॉरेन की जॉब मोल जाएगी, मुझे तू बहुत ख़ुशी होगी, लेकिन तुम्हारी माँ को फिर मेरे साथ या तुम्हारे साथ जाना पड़ेगा क्योँकि वो अकेले तू नहीं रह सकती न.

आदित्य: पापा ये बात तू आप ठीक कह रहे हैं.

मोहनलाल: संध्या अब तुम तयारी करलो मेरे साथ jane.ki

संध्या: अभी तू काफी टाइम है, अभी से परेशान क्योँ होना, जब वक़्त आएगा तब देखेंगे.

मोहनलाल: लेकिन सोचना तू पड़ेगा hi न

संध्या: आप कब से चिंता करने लगे, आप तू कभी भी किसी चीज से नहीं घबराते थे, अब क्या हो गया है.

मोहनलाल: गभरा नहीं रहा हु, आगे क्या करना है वो सोच रहा था, वैसे तू जो होना है वो होकर hi रहेगा.

संध्या: आपकी इन्ही बातों से hi तू मुझे शक्ति मिलती है.

मोहनलाल: आदित्य, यार ये बताओ की अब तुम बड़े हो गए हो और साथ में समझदार भी तू ये बताओ की कोई गर्लफ्रेंड भी बनाई है की नहीं.

आदित्य: क्या पापा आप भी न, मुझे पढाई और खेलकूद से hi फुर्सत नहीं मिलती

मोहनलाल: यार ऐसा कैसे हो सकता है, जवान हो, हैंडसम हो और पढ़ने लिखे भी हो, तू ये कैसे हो सकता है की किसी लड़की की तुम पर नज़र न पड़ी हो

आदित्य: पापा, छोडो न, आप भी क्या ले बैठे.

मोहनलाल: यार तुम तू ऐसे शर्मा रहे हो, जैसे लड़की हो, वैसे अगर नहीं बताना तू कोई बात नहीं.

आदित्य: पापा ऐसा कुछ नहीं हैं, एक है जिसका अभी पता नहीं की वो मेरी गर्लफ्रेंड बानी है की नहीं

मोहनलाल: (स्माइल्स) ये हुई न बात, अब लग रहा है मेरा बीटा जवान हो गया है, बन जाएगी अगर नहीं बानी तू, वैसे कैसी दिखती है

आदित्य: (संध्या को देखते हुए) पापा क्या बताऊँ, हैं तू वो बहुत hi खूबसूरत और दिल की भी बहुत अच्छी है लेकिन अभी पता नहीं की वो मेरी गर्लफ्रेंड बानी है की नहीं और ये भी क्लियर नहीं है की बनेगी भी की नहीं

मोहनलाल: देखो यार अगर तुम्हे पसंद है तू लगे रहो, गर्लफ्रेंड तू वो बन hi जाएगी, मुझे तुम पर पूरा विश्वास है

आदित्य: (चेरे पर दबी हुई मुस्कान ) पापा एक प्रॉब्लम और भी है बी ये है की वो मुझसे उम्र में थोड़ी बड़ी है

मोहनलाल: अरे यार उम्र का प्यार से कोई मतलब नहीं है, बस दिल मिलना चाहिए और जब दिल मिल गए तू वो सबसे अहम् है. सबसे बड़ी बात दोनों को एक दूसरे के प्रति समर्पण की भावना होनी चाहिए.

आदित्य: (संध्या को देखते हुए) पापा अभी तू ये भी नहीं पता की वो गर्लफ्रेंड है भी की नहीं

संध्या थोड़ा शर्माकर उन दोनों की बाते सुनकर वंहा से जाने लगाती है और कहती है "आप दोनों गप्पे मारो, मैं थोड़ा काम निपटा लेती हु". वंहा से जाने के बाद मन hi मन मुस्कराती है और सोचती है की "कितना बेशरम है बाप से बात कर रहा है और बाप को कह रहा की आपकी बीवी को गर्लफ्रेंड बनाने की बात कर रहा हु. और बाप है की अनजाने में बेटे को उकसा रहा है की जा बीटा बना ले गर्लफ्रेंड, उम्र का कोई मतलब नहीं हैं"

मोहनलाल: क्योँ बात नहीं हुई उससे अभी तक

आदित्य: हुई है एक दो बार, लेकिन कन्फ्यूज्ड लग रही थी

मोहनलाल: क्योँ

आदित्य: उसे शायद लग रहा हो की उसकी उम्र मुझसे थोड़ी जयादा है

मोहनलाल: अरे भाई उसके साथ घूमो फिरो, उसके साथ धीरे धीरे खुलकर बात करो और अगर तुम्हारे दिल मिलते हैं तू उम्र का कोई मतलब नहीं है

आदित्य: पर पापा लोग क्या कहेंगे और उसे क्या कहकर घूमने ले जॉन

मोहनलाल: दोस्ती तुमने करनी है या लोगों ने? अगर तुम दोनों को अच्छा लगता है की नहीं ये इम्पोर्टेन्ट है न की लोग क्या कहेगे. और घूमने के लिए तुम्हारे पास बहनों की कमी है जो इतना इंटेलीजेंट है की बचपन से hi नए नए बहाने बनाकर खेलकूद की चीज़े मुझसे ले जाता था वो ये नहीं कर सकता, मैं नहीं मान सकता

अभी ये दोनों बात कर hi रहे थे की रुचिका उठाकर आ गई और उन दोनों की बात सुनकर पूछने लगी "किस्से दोस्ती हो रही है"

आदित्य: दी, कुछ नहीं वो पापा बता रहे थे की किसी से दोस्ती कैसे की जाती है

रुचिका: हमें भी कोई गुर दो न की कैसे गर्लफ्रेंड और बॉयफ्रेंड बनाया जाता है और उससे घूमने के लिए क्या बहाने करने हैं

वो सब खिलखियकार हंसने लगे की तभी वंहा संध्या भी आ गई और कहने लगी "बीटा तुम उठ गयी हो तो पहले खाना खा लेते है क्योंकि तुम्हे कल जल्दी निकलना है"

रुचिका: मेरा तू अभी आपके पास रहने का दिल था लेकिन क्या करू कुछ समझ नहीं आ रहा है

संध्या: कोई बात नहीं, चलो जल्दी से दिंनिंग टेबल पर आ जाओ, मैं डिशेस लगाती हु

आदित्य: चलो मैं आपकी मदद कर देता हु

संध्या: नहीं रहने दे मैं कर लुंगी

आदित्य संध्या की बात न मानते हुए उसके पीछे पीछे जाते हुए कहता है "कोई बात नहीं, आज की पार्टी में मेरा भी योगदान होना चाहिए न"

किचन में जब वो दोनों पंहुचे तू खाने पीने का सामान बड़े बर्तनो में रखने लगे तू कुछ बड़े बर्तन कप्बोर्ड में ऊपर थे तू संध्या ने आदित्य से उतरने के लिए कहा तू आदित्य ने हाथ बढ़ा कर कप्बोर्ड को खोलने लगा तू वो क्योँकि संध्या के बिलकुल पीछे खड़ा था तू ऐसा लग रहा था की आदित्य एकदम से संध्या के ऊपर लड़ सा गया हो और इस सब में आदित्य की चाहती संध्या की पीठ से रगड़ खाने लगी, हुआ तू ये सब अनजाने में hi सही लेकिन दोनों के मन में एक चिंगारी लगा गया.

जब आदित्य जो अपने पंजे के बल पर खड़ा था बर्तन लेकर नीचे लेन लगा तू उसका पेट ने नीचे आते हुए संध्या के नरम नरम नितम्बों से रगड़ खाई जो दोनों की भावनाओं को थोड़ा और भड़काने में मदद कर रहा थी. जब आदित्य को इस का एहसास हुआ तू वो थोड़ा पीछे हैट गया और अपनी भावनाओं को काबू में करने लगा और चुपके से कुछ बर्तन लेकर ड्राइंग रूम में चला गया.

उधर संध्या को भी एक अलग hi एहसास होने लगा और इस एहसास की वजह से वो दुविधा में आ गयी की ये क्या हो रहा है, एक तरफ तू उसकी सोई हुई भावनाएं भड़काने लगी और दूसरी तरफ उससे ये एहसास होने लगा की कुछ गलत हो रहा है. वो इन् बातो को लेकर अपने में hi गुमसुम होने लगी.

आदित्य वापिस किचन में आया तू देखता है की उसकी माँ गुमसुम लग रही थी तू उसे लगा की शायद उसकी माँ उससे नाराज़ है लेकिन इस वक़्त उसने इस बारे में कोई बात न करना hi ठीक समझा और चुपके से दो डिशेस के बर्तन लेकर वंहा से ड्राइंग रूम में आ गया. वो अपने मन में सोचने लगा की अभी अपनी माँ से दूर रहेगा.

संध्या किचन में सोच रही थी की वो ड्राइंग रूम में कैसे जाये क्योँकि सोच सोच कर वो कभी खुश होती तू कभी शर्मा जाती की ये क्या हो रहा है, उसकी साँसें तीव्र गति से चलने लगाती तू उससे लग रहा था की इस नए एहसास ने उससे एक नयी अल्हड़ युवती जैसा बना दिया है जो किसी मर्द के पहले स्पर्श को फील करके खुश भी होती है और शर्माती भी है.

उसने सोचा की कंही उसकी मनोदशा को कोई पहचान न ले, इसलिए उसने एक नकली हंसी अपने चेरे पर ोौड ली और ड्राइंग रूम में आ गयी जंहा पर तीनो थे. उसने सबसे कहा, "आ जाओ पार्टी करते हैं"

सब दिंनिंग टेबल पर आ गए और सुबह की तरह hi बैठे लेकिन इस बार माँ बीटा दोनों hi अपने ख्यालों में गुमसुम थे और नज़र झुकाये बैठे थे, लेकिन एक बात थी चिंगारी तू दोनों के दिलों में लग चुकी थी और इसलिए कनखियों से बिच बिच में एक दूसरे को निहार लेते थे और जब नज़रे मिलती तू ऐसा पेश करते जैसे कुछ हुआ hi न हो परन्तु दोनों के दिलों में तूफान उठना शुरू हो गया था.

रुचिका मोहनलाल को कहते हुए निहार रही थी और कई बार ऐसा हुआ की कहते हुए उसके सर के बालों की लत आगे उसके चेरे पर आ गयी तू वो झटका देकर उसे पीछे करती तू मोहनलाल की नज़रे उसके चेरे पर जैम जाती और इशारो में पूछता की क्या हुआ तू वो आँखों के इशारे से कहती के सब ठीक है. बिच बिच में मोहनलाल उसकी गर्दन और उरोजों के ऊपर के हिस्से को निहारने लगते तू वो मोहनलाल को तंग करने के इरादे से अपने आँचल से अपने आप को इस तरह धक् लेती की उसके उरोज नज़र न आये.

मोहनलाल अपने चेरे को मोड़कर संध्या की तरफ करके इस तरह पेश आते की जैसे वो उससे चिढ़ाने के लिए संध्या के उरोजों को ललचाई नज़रो से इस तरह देखने लगता की रुचिका को बुरा लगे.

इस तरह चुहलबाजी करते हुए खाना ख़तम करके इसक्रीम खा रहे थे तू मोहनलाल ने सब को बैठा लिया और कहने लगे

मोहनलाल: देखो हो सकता है की मुझे एक जरुरी काम से विदेश जाना पड़े और हो सकता की मैं 6 महीने या उससे जयादा बहार राहु

संध्या: आपने पहले तू बताया नहीं

मोहनलाल: तुम्हारी बेटी आई थी तू इसलिए मैं तुम्हे डिस्टर्ब नहीं करना छह रहा था.

संध्या: कब जाना होगा

मोहनलाल: देखो अभी कह नहीं सकता लेकिन एक महीने के भीतर जाना hi पड़ेगा. इसलिए मैं तुम सब को जो बताने जा रहा हु उसे ध्यान से सुनो

1. ये मकान मैंने शुरू में hi संध्या के नाम करवा दिया था ताकि कोई प्रॉब्लम न हो.

2. संध्या का अकाउंट ऐसा है की अगर पैसा न निकले तू वो ऑटोमेटिकली फड़ में रहता है और आज की डेट में करीब 2 लाख है लेकिन 20 दिन से पहले उस पैसे को न निकलना नहीं तू 10000 इंटरस्ट का नुक्सान हो जायेगा. 20 दिन बाद जब मर्जी निकालो या सेविंग्स अकाउंट की तरह उसे करो.

2. आदित्य मैंने तुम्हारे हर बर्थडे पर कुछ न कुछ इक्कठा करने की चाहत से पैसा फड़ में डालता रहा ताकि बड़े होने पर काम आये. अब तुम एडल्ट हो चुके हो और तुम्हारी फड़ आज से ठीक 2 महीने बाद मातुरे हो जाएगी और इसका पूरा पैसा ऑटोमेटिकली तुम्हारे अकाउंट में जोकि करीब 10 लाख होगा पंहुच जायेगा.

3. रुचिका तुम्हारे अकाउंट में भी फड़ का पैसा 15 दिन बाद मातुरे होने वाली फड़ का करीब 2 लाख पंहुच जायेगा

ये सब मैं आप लोगों को बता रहा हु ताकि मेरे पीछे कोई प्रॉब्लम न हो

आदित्य: पापा आपने तू मुझे फंसा दिया

मोहनलाल : कैसे

आदित्य: आप बहार चले जाओगे, दी भी बहार जा रही है जॉब के लिए तू अगर मेरी भी जॉब बहार लग गयी तू क्या माँ अकेली रहेगी.

मोहनलाल: अरे यार अभी तू तुम यही पर हो न

आदित्य: पापा 3 महीने बाद तू जॉब के लिए बहार जाना hi पड़ेगा और तब तक आप के हिसाब से आप बहार hi होंगे.

मोहनलाल: अगर ऐसा हुआ और तुम्हे बुरा न लगे तू माँ को अपने साथ ले जाना

आदित्य: (संध्या की तरफ प्यार भरी नज़रो से देखते हुए) पापा मुझे तू कोई प्रॉब्लम नहीं होगी, लेकिन पता नहीं माँ मेरे साथ जाना भी चाहेंगी या नहीं
 
अपडेट 11

मोहनलाल: अगर ऐसा हुआ और तुम्हे बुरा न लगे तू माँ को अपने साथ ले जाना

आदित्य: (संध्या की तरफ प्यार भरी नज़रो से देखते हुए) पापा मुझे तू कोई प्रॉब्लम नहीं होगी, लेकिन पता नहीं माँ मेरे साथ जाना भी चाहेंगी या नहीं

संध्या: जब वक़्त आएगा तब की तब देखेंगे.

मोहनलाल: तू फिर ठीक है, अब सुबह जल्दी निकलना है तू चलो फिर अब सोते हैं.

रुचिका: मैं आज माँ के साथ सोना चाहूंगी

संध्या: हाँ हाँ क्योँ नहीं, चल मैं तुम्हारे कमरे में आती हु

उसके बाद मोहनलाल, आदित्य और रुचिका अपने अपने कमरे में चले गए और संध्या किचन में काम ख़तम करके अपने बैडरूम में आयी तू मोहनलाल ने उसे कहा की "जयादा देर तक जागना मत, जल्दी सो जाना क्योँकि सुबह जल्दी निकलना है", संध्या ने उससे आश्वासन दिया की "चिंता करो, रूचि को जल्दी सुला दूंगी, आप आराम करो".

उसके जाने के बाद मोहनलाल सोने की कोशिश कर रहा था लेकिन उसे आज की बातें भी याद आ रही थी, लेकिन थके होने के कारन जल्दी hi नींद के आगोश में चला गया.

नींद के आगोश में उसे सपने में वो दिन याद आने लगा जिस दिन वो रुचिका के लिए घागरा चोली लाया था.

वो घागरा चोली लेकर बहुत खुश हुई और वो उसे पहनकर मेरे पास आयी और घुमाकर अपने आप को दिखकर पूछने लगी "कैसी लग रही हु",

मोहनलाल उससे देखता hi रह गया क्योँकि जिससे वो अब तक बच्ची समझता था वो तू एक नवयौवना बन चुकी थी, क्योँकि उसके शरीर के उतर चढ़ाव बिलकुल विकसित हो चुके थे और उसको पहली बार लगा की रुचिका अब बड़ी हो गयी है. मोहनलाल उसकी खूबसूरती और चढ़ती जवानी में खोया हुआ था तू रुचिका उसके बिलकुल करीब आकर फिर बड़े प्यार से पूछने लगी "बताओ न की कैसी लग रही हु मैं"

मोहनलाल: बहुत अच्छी लग रही है, अब मेरी प्रिंसेस बड़ी हो गयी है, इन् कपड़ो में बहुत प्यारी लग रही हो

रुचिका खुश हो गयी और दौड़कर मोहनलाल के गले लग गयी तू पहली बार उसके छोटे छोटे संतरे जैसे उरोजों ने मोहनलाल की छथि का स्पर्श किया तू उससे एक ऐसी अनुभूति हुई जो बयां नहीं की जा सकती, उसने भी अपने हाथो को लेजाकर उसकी पीठ पर रख दिए और धीरे धीरे उसकी पीठ को सहलाते हुए उसे कहने लगे की "अब तुम बड़ी हो गयी हो और बहुत प्यारी गुडियाई लग रही हो"

तभी संध्या ने उसे बोलै "जा कपडे बदल ले नहीं तू ख़राब हो जायेंगे, फिर कल क्या पहनेगी"

रुचिका: मेरा तू मैं है की मैं अब ऐसे hi कपडे पहना करूँ.

उसकी बात सुनकर मोहनलाल ने मन में सोचने लगा की "अगर ये रोज रोज ऐसे कपडे पहनेगी तू मेरे लिए तू बड़ा मुश्किल हो जायेगा, ये इतनी खूबसूरत है की मुझे पता नहीं क्या हो रहा है, फिर तू शायद मैं कोई बहुत बड़ी गलती hi न कर बैठु"

संध्या ने उससे कहा "पापा ने तुझे ऐसे कपडे दिलवा दिए, मैं तू तुझे कभी न दिलवाऊं और जयादा मत ुड्डो, पापा ने भी एक बार दिलवा दिए, बार बार नहीं दिलवाएंगे"

रुचिका: मेरे पापा हैं और आप देख लेना बार बार दिलवायेनेगे, मुझे मन नहीं कर सकते. आप देख लेना मैं कल hi पापा के साथ जाकर नया सूट लेकर आउंगी, क्योँ पापा दिलवाओगे न

मोहनलाल: (अपने विचारो में खोये हुए) हूँह

रुचिका: देखा माँ, मैं पहले hi कह रही थी की पापा मुझे मन नहीं करेंगे.

संध्या: अच्छा अच्छा पापा की लाड़ली, अभी जाकर कपडे बदल.

वो चली गयी लेकिन मोहनलाल को बहुत बड़ी परेशानी में दाल गयी. उससे तू समझ hi नहीं आ रहा था की ये क्या हो रहा है क्योंकि वो याद कर रहा था की उसका खिला हुआ मासूम चेरे, चौड़ा माथा और उसके नीची बहुत hi सुन्दर हलकी नीली आँखे जो बहुत hi àआकर्षक थी, जैसे किसीको निमंत्रण दे रही हो, गुलाब की पंखुड़ियों जैसे होंठ और चेरे के नीचे सुराहीदार गर्दन. गर्दन के नीचे सीने पर उसकी चोली में कैसे हुए उरोज जो छोटे छोटे परफेक्ट गोल संतरे लग रहे थे और ऐसा लग रहा था की चोली उसके सैंट्रो पर रख कर नाप ली गयी हो. पहली बार उसने देखा की चोली के गले में उरोजों का बहुत hi छोटा हिस्सा नज़र आ रहा था जिसकी रंगत ऐसी थी जैसे दूध में सिन्दूर को मिला दिया हो. चोली और लहंगे के बिच समतल पेट और उसपर गहरी नाभि तू ऐसी थी की वो किसी भी जवान या बूढ़े की जान ले ले.

चोली में से निकलते उसके गोर गोर बाज़ू बहुत hi आकर्षक लग रहे थे. ये जरूर था की हाथों और बाज़ुओं पर ध्यान से देखने से छोटे छोटे बालों के रोयें नज़र आते थे लेकिन वो भी उस पर बहुत ाचे लग रहे थे.

घागरे में उसकी लम्बी पतली टंगे बहुत hi प्यारी लग रही थी.

जब उसने अपने आप को घुमक्कड़ दिखाया तू पीछे से उसके लम्बे लम्बे बाल उसके नितम्बों तक पंहुच रहे थे. बहुत hi पतली कमर और उसके नीचे कैसे हुए नितम्ब ऐसे थे जैसे की वो बहार को निकले हुए थे और ऐसा परतीत होता था जैसे दो गैंडों को एक साथ साथ मिलकर रख दिया हो, क्या मनमोहक दृश्ये उत्तपन कर रहे थे और वो दोनों आपस में उसके चलने पर रगड़ कहते थे.

एक तरफ तू उसकी खूबसूरती उसे परेशान कर रही थी और दूसरी तरफ वो अपने आप को कोस रहा था की वो अपनी बेटी के बारे में क्या सोच रहा है. फिर अगले hi पल वो अपने आप को समझने लगता की उसके घर में एक बहुत hi सुन्दर फूल खिलने वाला है तू उसकी रक्षा करना उसका फ़र्ज़ है, साथ में ये भी उसके दिल में चल रहा था की उसकी बगिया में जो फूल है चाहे या न चाहे उसकी सुगंध तू उसको भी मिलती रहेगी. उसका दिमाग़ कह रहा था की सुगंध तू मिलेगी लेकिन उसको चुना उसके लिए वर्जित है क्योँकि वो उसका बाप है. ऐसे hi ख्यालों में वो उस रात सो गया.

अगले दिन रुचिका का फंक्शन था तू वो जब वही घाघरा चोली पहन कर आयी तू एक बार मोहनलाल का दिल फिर मचल गया लेकिन इस बार उसने अपने ऊपर काबू रखते हुए अपने विचारों को लगाम लगा कर खुद को भावशून्य दिखने की कोशिश करने लगा लेकिन उसके दिल में उसको देखकर ऐसी खलबली मच रही थी की उसे खुद समझ नहीं आ रहा था, उसे ऐसे लग रहा था की जैसे रुचिका एक चुम्बक हो और वो एक लोहे का टुकड़ा जो उसकी तरफ अपने आप hi खींचने को तैयार खड़ा हो परन्तु उसको किसी ने चुम्बक की तरफ न जाने देने के लिए पकड़ रखा हो. लेकिन उसको देखते hi मोहनलाल का दिल उछाल कर उसके पास पंहुच जाता था और वो उसकी खूबसूरती का कायल हो गया.

वंहा पर संध्या ने कहा की जल्दी से नाश्ता कर लो और रुचिका को छोड़ दो तू एक बार फिर से वो उससे बड़े गौर से देखने लगा तू रुचिका ने पूछा की "क्या देख रहे हो पापा"

मोहनलाल ने कहा "तुम बहुत खूबसूरत लग रही हो लेकिन मुझे कुछ कमी भी लग रही है और समझ नहीं आ रही की वो क्या है"

उसकी बात सुनकर संध्या भी रुचिका को गौर से देखने लगी और उसने भी कहा "रूचि तुम वाकई बहुत खूबसूरत लग रही हो. तुमने घागरा चोली तू पहन लिया है लेकिन तुमने कोई भी गहना नहीं पहना है, इसलिए तुम पारम्परिक राजस्थानी नहीं लग रही हो. तुम्हे कुछ हलके गहने पहनने पड़ेंगे जिससे तुम असल में पारम्परिक लग सको.

रुचिका: अब क्या करू

संध्या: तुम कल जब पापा के साथ गयी थी तू खरीद लती, अब कोई दुकाने थोड़ी न खुली होंगी

संध्या: मेरे पास जो हैं वो बहुत भरी हैं और वो तुम पर अच्छे नहीं लगेंगे इसलिए पापा को बोलना की नए ले देंगे.

रुचिका: लेकिन अभी क्या करू

संध्या: ऐसा करो की अभी तू कॉलेज चली जाओ और तुम्हारे पापा थोड़ी देर बाद जब दुकाने खुलेंगी तू तुम्हारे लिए लेकर कॉलेज में से देंगे.

रुचिका: लेकिन कॉलेज में ढूंढेगे कैसे

संध्या: ऐसा करो घर वाला मोबाइल तुम अपने साथ ले जाओ, जब तुम्हारे पापा लेकर आएंगे तू तुम्हे मोबाइल पर फ़ोन कर देंगे और तुम बहार आ जाना.

तब रुचिका ने मोहन तन्द्रा भांग करते हुए बोली ,"पापा, ठीक है न की आप मेरे लिए गहने ला देंगे"

मोहनलाल: गहने?

संध्या: हाँ इसका गाला, कान और हाथ खली खली लग रहे हैं, इसलिए आप इसको कॉलेज छोड़ कर बाजार से इसके लिए गहने लेकर इसको कॉलेज में मोबाइल पर बुला कर दे देना.

मोहनलाल: (रुचिका के गले और कान की तरफ देखते हुए) ये साथ जाती तू इसकी पसंद और इसके नाप के hi ले देता

संध्या: कोनसे असली लेने है, चंडी के बिना पानी चढ़े लेन है, अंदाजे से ले लेना

मोहनलाल: ठीक है जो हुकुम, पूरा करेंगे.

तभी रुचिका बोली "मुझे कॉलेज छोड़ दो न", मोहनलाल ने उसको एक बार फिर से निहारते हुए कहा "चलो" और उसने बहार जाकर मोटरसाइकिल निकली और रुचिका उसके पीछे बैठी तू उससे आज कुछ अलग अनुभूति होरही थी क्योँकि रुचिका ने आज पहली बार शायद कोई परफ्यूम लगाया था जिसकी सुगंध उसके नथुनों से जाकर उसके दिल को चढ़ रही थी.
 
फैंटास्टिक रिव्यु.

यू हैवे ड्रान थे इमिगनेटिवे अपकमिंग स्टोरी व्हिच सीम वैरी इंटरेस्टिंग. मई बे योय अरे राइट, बूत तो स्पेल आउट एनीथिंग ात थिस मोमेंट wouldn't हेल्प थे रीडर्स सो रिक्वेस्ट यू तो वेट एंड लीव यू तो प्रेडिक्ट व्हाट कुड हैपन.

विथ रेगार्ड्स तो योर सुग्गेस्टियन्स तहत Ruchika's मंद शुड बे टोल्ड, वेल आईटी वोउल्ड बे दोने ात थे राइट मोमेंट.

टिल थें थैंक्स सो मच.
 
अपडेट 12



तभी रुचिका बोली "मुझे कॉलेज छोड़ दो न", मोहनलाल ने उसको एक बार फिर से निहारते हुए कहा "चलो" और उसने बहार जाकर मोटरसाइकिल निकली और रुचिका उसके पीछे बैठी तू उससे आज कुछ अलग अनुभूति होरही थी क्योँकि रुचिका ने आज पहली बार शायद कोई परफ्यूम लगाया था जिसकी सुगंध उसके नथुनों से जाकर उसके दिल को चढ़ रही थी.

जब वो बाइक पर जा रहे थे तू आज मोहनलाल अपने होश में नहीं था.

जब उसे छोड़ कर मोहनलाल वापिस जाने लगा तू रुचिका स्माइल करके कॉलेज में चली गयी और वो उसकी स्माइल में खो गए और उस स्माइल के बारे में सोचने लगा.

वंहा से निकल कर वो वापिस जाने की बजाये एक जानने वाले सुनार के पास गया और उससे रुचिका के लिए चंडी के गहने दिखने के लिए कहा तू उसने छेड़ते हुए पूछा 'क्या बात है आज सुबह सुबह hi, क्या भाभी जी नाराज़ हो गयी जो उस को खुश करना पद रहा है" उसकी बात सुनकर मोहनलाल ने उससे कहा

"अरे यार छोडो न, बस कुछ हलके गहने दिखा दो" दूकान दार ने उससे भरी गहने लेने के लिए भी कहा लेकिन उसने हलके गहने hi पसंद किये और उन्हें लेकर वो रुचिका के पास जाने लगा.

वो जब रुचिका के पास जा रहा था तब वो उसके बारे में hi सोच रहा था की ये गहने उसपर कैसे लगेंगे, यही बात वो तब भी सोच रहा था जब इन गहनों को खरीद रहा था. वो अपने आप से लड़ भी रहा था की क्या एक बाप का अपनी बेटी के बारे में इस तरह की सोच कैसे हो सकती है. लेकिन उसका दिल ये भी कह रहा था की वो एक लड़की भी तो है. उसकी अंतरात्मा उसको दूसरे hi पल धिक्कारने लगती की

"ये क्या कर रहे हो, 'लड़की भी है' तू क्या जो भी सुन्दर लड़की हो उसके बारे में तुम ऐसा सोचोगे और वो भी अपनी बेटी के लिए, कुछ तू शर्म करो"

यह सोचते hi उसने बाइक को ब्रेक मार कर रोक ली और उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था की वो क्या करे. काफी देर सोचने के बाद उसने अपने मन को पक्का करके ये डीडे किया की वो उससे अपनी बेटी hi समझेगा और सिर्फ नार्मल बात करेगा.

यह सोचते hi

मोहनलाल ने रुचिका को फ़ोन करके बताया की वह 10 मिनट में कॉलेज पहुँच रहा है तब रुचिका ने कहा की वो गेट के बहार मिलेगी. मोहनलाल कॉलेज पहुंचा तू देखा की वह कॉलेज गेट पैर उसका इंतज़ार कर रही थी. मोहनलाल ने उसे वह गहने पकड़कर जाने लगा तू रुचिका ने उससे कहा की "अच्छा होता आप hi मुझे पहना देते"

उसकी बात सुनकर मोहन लाल की सोइ हुई भावनाएं एकदम फिर से भड़कने लगी और वह रुचिका को देखते हुए सिर्फ इतना hi कहा "यहाँ अच्छा नहीं लगेगा तुम इसे खुद पहन लेना". रुचिका यह बात सुनकर उदास हो गयी और ऐसा लगा जैसे उसका चेहरा भुज गया हो. उसकी यह हालत मोहनलाल से बर्दाश्त नहीं हुई और उसने रुचिका से कहा "चलो बाइक पैर बैठो, लेकिन पहले यह बताओ की कॉलेज में क्या बोलोगी"

रुचिका खुश होकर मोहन लाल के पीछे बाइक पैर बैठ गई और कहने लगी की "उसने मैडम से पहले hi गहने लेन के लिए बोल दिया है" तू मोहनलाल ने बाइक को आगे बढ़ा दिया और सोचने लगा की इसको गहने कहाँ पर पहनहुँ. मोहनलाल रुचिका से कहा की "घर चलते हैं और वहीँ पैर गहने पहना दूंगा" जैसे hi उसने यह बात सुनी तो एकदम से कहा "नहीं नहीं मुझे घर नहीं जाना आप मुझे कहीं रास्ते में पहना दो"

मोहनलाल ने सोचा के रास्ते में पहनने से कोई उन दोनों को देख लेगा और तरह तरह की बातें बनाएगा, इसलिए वो उससे लेकर एक अच्छे से रेस्टोरेंट में मैं ले गया और फॅमिली केबिन में जाखड़ बैठे.

रेस्टोरेंट सुबह का वक़्त होने की वजह से बिलकुल खली था. जैसे hi फॅमिली केबिन में बैठे तू एक वेटर को बुलाकर दो कॉफ़ी और सैंडविच का आर्डर दिया.

वेटर के जाने के बाद रुचिका ने वो गहने देखे तू खुश हो गयी और मोहनलाल को आँखों के इशारे से पहनाने के लिए कहा.

मोहनलाल ने नेकलेस उठाया और खड़ा होकर रुचिका की चेयर के पीछे जाने लगा तू रुचिका ने अपनी ओढ़नी को उतर कर दूसरी चेयर पर रख दिया तू रुचिका के उभारों का कुछ हिस्सा दिखाई देने लगा और मोहनलाल (जिसने सोचा था की उसे बेटी समझेगा और नार्मल बेहवे करेगा) का रक्त परवाह बढ़ने लगा.

मोहनलाल खड़ा हुआ तू बैठी हुई रुचिका के उभारों के अंदर तक का नज़ारा नज़र आने लगा. मोहनलाल ने जैसे hi नेकलेस को उसकी गर्दन पर रखा तू उसकी उँगलियों ने रुचिका की गर्दन को स्पर्श किया और मोहनलाल ने उसकी गर्दन से बाल हटाकर नेकलेस का हुक लगाने लगा लेकिन उसकी नज़र रुचिका के उभारों पर hi थी. उसके हाथों का स्पर्श पहली बार जवान होती रुचिका को अच्छा लगने लगा और उसकी भावनाओं को भी भड़का गया. वो भी सोच में पेड़ गयी की ये क्या हो रहे है.

नेकलेस पहनाने के बाद मोहनलाल झुमके उठाने के लिए आगे आया तू देखा की रुचिका नज़ारे झुकाये अपने में खोयी हुई है.

मोहनलाल ने उसका ध्यान बताने के लिए पूछा की " झुमके पहन लोगी की वो भी पेहनौ", तू वो बोली

"अगर खुद पहनना होता तू फिर मैं यंहा क्योँ आती, आप पहली बार मेरे लिए गहने लाये हैं, ये तू मैं आपसे hi पहनूंगी"

मोहनलाल ने एक चेयर खींच कर उसके नज़दीक कर ली और उसके एक कान में झुमका डाला तू फिर से उसके हाथों का स्पर्श अपने कान में होने से उसको अच्छा भी लग रहा था और कुछ कुछ अजीब सा भी क्योँकि उसे कान में गुदगुदी और दिल में हलचल हो रही थी.

मोहनलाल का भी हाल बुरा था क्योँकि उसके नरम नरम कान में हाथ लगते हुए वो आनंद के सागर में गोते खा रहा था, लेकिन इन गोटों में से निकलते हुए उस कान में झुमका पहनाने के बाद दूसरी तरफ की चेयर को उसके नज़दीक करके उस कान में भी झुमका पहनाने के के लिए जैसे hi कान में डालने लगा तू रुचिका के मुंह से "आउच" निकला तू पूछने पर पता लगा की झुमके का पिन छेद में न जाकर उसके कान को चुभो गया तू मोहनलाल उसे "सॉरी" बोलने लगा तू रुचिका ने नाम आँखों से कहा की कोई बात नहीं.

मोहनलाल उस कान को अपने अंगूठे और एक उंगली की सहायता से हलके हलके मलते हुए उसे आराम देने लगा. मोहनलाल का इस तरह कान मलना रुचिका के लिए एक ऐसी अनुभूति थी जो शब्दों में बयां करना मुमकिन नहीं है.

फिर मोहनलाल ने अपने मुंह से गरम गरम स्वाश कान के उस हिस्से पर डालने लगा जंहा पर रुचिका को चुभन हुई थी. रुचिका तू मनो एक अलग hi दुनिया में पंहुच गई. जब उसे आराम मिल गया तू उसने दूसरा झुमका पहनाने के लिए कहा.

मोहनलाल ने उसे बड़े धयान से और बहुत प्यार से उस कान में भी झुमका पहनाया और पहनाने के बाद आकर उसके सामने की चेयर पर बैठ गया तू रुचिका कहने लगी "कैसी लग रही हु" तब तक रुचिका ने अपनी ओढ़नी को नहीं ूढा था.

मोहनलाल उसे देखकर बहुत खुश नज़र आ रहा था क्योँकि वो गहने उस ड्रेस के साथ बिलकुल मैच कर रहे थे और रुचिका की खूबसूरती में चार चाँद लगा रहे थे. मोहनलाल से उसके उभारों का दृश्ये बर्दाश्त नहीं हो रहा था तू उसने कहा की ओढ़नी को ूद लो. रुचिका ने उसकी बात बिना प्रश्न किये मान ली.

अभी रुचिका ने ओढ़नी ोधी hi थी की वेटर ने नॉक किया तू मोहनलाल ने उससे अंदर बुलाया तू वो कॉफ़ी और सैंडविचेज़ लाया था और टेबल पर रखकर बोलै "साहब कुछ और चाइये तू आप बेल्ल बजा देना" और बोलकर वो चला गया.

उसके जाने के बाद मोहनलाल ने रुचिका से नाश्ता करने के लिए कहा तो उसने एक सैंडविच उठाया और मोहनलाल की तरफ ले जाकर उसके मुंह से लगा दिया तू मोहनलाल ने बड़े प्यार से ा एक टुकड़ा काट लिया और खाने लगा तो रुचिका बड़े प्यार से उसे कहते हुए देखने लगी और और कहा "थैंक यू"

मोहनलाल ने उससे कहा "किस बात का थैंक्स मेरी बेबी डॉल" और उसने भी दूसरा सैंडविच उठाकर रुचिका के कोमल होंठों को तरफ बढ़ाया तू उसने भी एक टुकड़ा काट लिया और खाने लगी नज़र निचे करके कहने लगी "आप मेरे लिए पहली बार गहने लेकर आये जो मुझे इतना ाचा लगा की आप को बता नहीं सकती"

मोहनलाल ने उससे कहा "पहली बात तू थैंक्स की कोई जरुरत नहीं है क्योंकि तुम मेरी बेबी डॉल हो और बचपन से लेकर आज तक मैंने तुम्हारी बात कभी ताली है. मैं तो कभी नहीं चाहता था की तुम्हारे लिए चंडी के गहने लॉन, मैं तो यह चाहता था की तुम्हारे लिए सोने के ा या हरी जड़ित गहने लॉन, ये सब तू मैंने मज़बूरी में किया है क्योंकि तुम्हे जल्दी थी"

उसकी बात सुनकर रुचिका को मोहनलाल पर बहुत प्यार आने लगा और उसने कहा की "आपके यह गहने मेरे लिए सोने चंडी या हिरे जड़ित गहनों से जयादा कीमती है और मैं इन्हे बहुत संभल कर रखिंगी"

मोहनलाल ने सैंडविच की तरफ देखा तू उस पर रुचिका की लिपिस्टिक का निशाँ आ गया था तू वो निशाँ एक बार फिर से उसकी भावनाओं को भड़काने लगे और जाने अनजाने में उसकी नज़र रुचिका की तरफ जाकर वो उसके होंठों को खूबसूरती को देख रहा था तू जब रुचिका ने उसकी तरफ देखा तू उसने अपना सैंडविच एक बार फिर उसकी तरफ बढ़ा दिया तू रुचिका ने भी अपने सैंडविच को उसकी तरफ बढ़ा दिया तू दोनों ने एक दूसरे के सैंडविच के टुकड़े को काट कर खाने लगे तू मोहनलाल को उसकी लिपस्टिक का टास्ते भी आने लगा और वो आनंद में खोने लगा.

अब मोहनलाल ने अपने सैंडविच की तरफ देखा तू उसपर भी लिपस्टिक लगी हुई थी तू मोहनलाल मन hi मन प्रासां होने लगा और बिच बिच में फिर से लिपस्टिक का आनंद लेने के लिए वो रुचिका को खिला कर अपने और उसके सैंडविच से उसके लबों पर लिपस्टिक को खता रहा लेकिन इंदिरेक्ट्ली.

सैंडविच के साथ साथ कॉफ़ी को भी वो दोनों एक दूसरे के साथ शेयर कर रहे थे तू रुचिका के होठों पर लगी लिपस्टिक धीरे धीरे मोहनलाल के मुंह से होते हुए उसके पेट में पंहुच रही थी लेकिन उसका असर दिल पर जयादा हो रहा था.

नाश्ता ख़तम करने के बाद रुचिका ने कहा की एक फोटो तू खिंच लो ताकि वो भी देख सके की वो कैसी लग रही है तू मोहनलाल ने शरत से कहा "फोटो की क्या जरुरत है, उसकी आँखों में hi देख ले उसे दिख जायेगा".

रुचिका ने बुरा सा मुंह बनाया तू मोहनलाल ने कहा "फोटो अच्छी चाहिए की नहीं तू स्माइल करो". रुचिका की स्माइल करती हुई फोटो जब उसने देखि तू बोली "क्या ओढ़नी के साथ खिंच ली, नेकलेस तू दिख hi नहीं रहा तू उसने ओढ़नी उत्तर दी और मोहनलाल पर एक बार फिर से बिजलियाँ गिरा दी.

मोहनलाल की नज़र न चाहते हुए भी उसके उरोजों पर जाकर टिक गयी, लेकिन अपने को सँभालते हुए कमरे की नज़र से उसके उरोजों का आनंद लेता रहा और फिर एक फोटो खिंच ली, जिससे देखकर रुचिका बहुत खुश हुई और फिर ओढ़नी ूढ़ ली.

उसके बाद बिल पाय करके बहार जाने लगे तू मोहनलाल ने रुचिका से कहा की उसकी लिपस्टिक ख़राब हो गयी है, वो उससे ठीक कर ले. रुचिका ने शरमाते हुए नज़र नीची करके कहा की "उसके पास लिपस्टिक नहीं है"

तब मोहनलाल ने कहा की घर चले तू रुचिका ने मन कर दिया की "माँ को क्या बताउंगी" फिर मोहनलाल ने उसे सलाह दी की नै ले लो तू उसने बात मान ली और वो दोनों लिपस्टिक लेने के लिए एक दुकान पर गए तू उसे लिपस्टिक दिलवाई तू सलेसगिरल कहने लगी की मेकअप का और भी सामान दिखाऊं.

रुचिका मेरी तरफ देखने लगी तू मैंने उसे कहा की जो पसंद है ले लो. उसने कुछ नहीं लिया तू बहार आकर पूछने पर उसने कहा "आप मुझे बाद में ले देना, अभी कॉलेज जल्दी जाना है और दूसरा माँ को क्या बताउंगी" मैंने उसे कुछ न कहते हुए बाइक से कॉलेज छोड़ दिया. वो तू चली गयी लेकिन मोहनलाल के दिल में खलबली मचा गयी.
 
सबसे पहले तू आपका बहुत बहुत धन्यवाद की इतना उम्दा रिव्यु देते हो.

दूसरा, आप इतनी टैरिफ कर देते हो जिसकी मैं बिलकुल भी हकदार नहीं हु. ये तू आप सब का प्यार और सपोर्ट भाई जिसकी वजह से मैं लिख पति हु, अगर वो न हो तू मैं बिलकुल भी नहीं लिख पाऊँगी. मैं जो भी लिखती हु वो आप सब को अच्छा लग जाता है अब इसमें मैं काया करूँ.

बस ऐसे hi साथ बनाये रखिये क्योँकि आपका साथ hi मेरी ताकत है.

शुक्रिया
 
योर आर्ट ऑफ़ रेवेविंग अन्य अपडेट इस मर्वेलौस.

आईटी शोज तहत यू रीड थे स्टोरी विथ ग्रेट इंटरेस्ट एंड नोट डाउन थे फाइनर पॉइंट्स.

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अपकमिंग उपदटेस वोउल्ड ुनफोल्ड थे फुरदर स्टोरी.

थैंक्स सो मच
 
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