Incest Pyaar - 100 Baar - Page 23 - SexBaba
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Incest Pyaar - 100 Baar

अपडेट 126

आवरण- 1


सांझ 7 बज चुके थे जब शंकर जी घर में दाखिल हुए. उन्हें आज इस वक़्त होना तोह राममेहर सिंह की हवेली पर था लेकिन इस अकस्मात मुठभेड़ की वजह से सारा कार्यक्रम इधर उधर हो गया. ढेरो सवाल थे और जवाब देने वाले लोग भी किसी टुकड़ो वाली पहेली की तरह सबकुछ नहीं जानते थे. गलियारे से भीतर वाले आँगन में आये तोह ऋतू, कोमल और प्रियंका के साथ ये अनजान लड़की बैठी कॉफ़ी पी रही थी. शंकर जी को देखते हे उसने हाथ जोड़ कर नमस्ते किया तोह परिचय दूसरी तरफ से आती तारा ने दिया.

"मां जी ये हिमानी है, अर्जुन के आचार्य दादा जी की नातिन और हमारी सहेली. और हिमानी दीदी ये है मेरे प्यारे मां जी और अर्जुन के पापा.", तारा फिर से अपने मां की बगल में लगी कड़ी हो गयी.

"नमस्ते अंकल. आपके बारे में भी नाना जी बताया है के आप एक फेमस सर्जन है.", शंकर जी को ख़ुशी हुई की जिस लड़की को देख कर कभी ऋतू नाराज हुई थी वो आज उसकी हे बगल में बैठी थी. लेकिन आँखों पर चस्मा वो भी शाम के वक़्त.?

"नमस्ते बीटा, ये तुम्हारा भी घर है तोह बेफिक्र रहा करो. शास्त्री जी शहर से बहार है क्या?", शंकर जी अभी बात कर रहे थे की रेखा जी ने पानी का गिलास दिया तोह एक मुस्कान के साथ उन्होंने पानी लेकर पीते हुए बीवी को भी देखा और फिर हिमानी का जवाब सुन्न ने लगे. रेखा जी वही कड़ी रही.

"जी नाना जी को जरुरी काम था इसलिए वो आउट ऑफ़ इंडिया है लेकिन परसो आ जायेंगे. एंड ी ऍम रियली कम्फर्टेबले हेरे, थैंक यू सो मच."

"हिमानी दीदी पापा कह रहे है के ये गॉगल्स क्यों लगा रखे है.", ऋतू ने चुटकी ली तोह शंकर जी भी हंसने लगे अपनी शरारती बेटी की बात सुन्न कर लेकिन हिमानी थोड़ा सा झेंप गयी. वो अब पहले से बेहतर बोलने लगी थी इन लोगो के साथ रहने से.

"अंकल सबको इतना ाचा नहीं लगता जितना ऋतू को मुझे बिना चश्मे के देख के लगता है.", इतना कह कर हिमानी ने चस्मा हटाया तोह ऋतू अपने पिता का चेहरा देखने लगी. जहा शन्न भर के लिए हे हैरत थी जो सबको नहीं दिखे और उसके बाद एक मुस्कान.

"ओने इन ा मिलियन तोह ऋतू को ाचा हे लगेगा और बाकी सबको भी बेटी. यू अरे गिफ्टेड. खुश रहना जरुरी है और तुमको तोह डबल रहना चाहिए. हर कोई इतना लकी नहीं होता. मुझे, मेरे बचो को हे देख लो सबकी एक जैसी हे बोरिंग आईज है.", शंकर जी के इतना हलके में लेने और तारीफ के साथ साथ अपना हे मजाक उड़ाने पर सभी खुश थे, हिमानी के साथ साथ.

"सचमुच ऋतू और कोमल लकी है के उनके डैड इतने हंसमुख और पॉजिटिव है.", हिमानी ने अर्जुन को शामिल नहीं किया तोह रेखा जी अब मुस्कुराई. उन्हें पता था के बात जरूर होगी अब.

"बीटा बाप तोह मैं रुपाली और अर्जुन का भी हु."

"हाहाहा. सॉरी अंकल वो रुपाली से अभी इतना मिलना नहीं हुआ और वो भी ाची लड़की है. बूत don't मंद अर्जुन इस सलीगःती बेटर थान एवरीवन, नोन और अननोन. उसको कपड़े करना मतलब उसपे डाउट करना. नाना जी भी ऐसा नहीं करेंगे.", हिमानी ने इसमें आचार्य जी तक को शामिल किया था और शंकर जी को ाचा लगा के लड़का अपने व्यक्तित्व को सही रखता है.

"हैं कहा वो जनाब? घर में तोह सभी गाडी और उसकी मोटरसाइकिल कड़ी है. रेखा, बाथरूम में कपडे रख दो फिर मुझे जाना है. तारा मेरे लिए चाय बना देगी.", उन्होंने अर्जुन का पुछा था और चाय ले कर आरती इधर आ गयी थी अपने बड़े पापा के लिए.

"अर्जुन और भैया का शोर नहीं सुना था क्या जब आप घर में आये बड़े पापा?", आरती ने जैसे ये कहा शंकर जी कप ले कर बहार की तरफ चल दिए क्योंकि बैठक से हे वो शोर आ रहा था जिस पर उनका ध्यान नहीं गया. आरती और तारा भी पीछे हे चल दी, रेखा जी कमरे से अपने पति के कपडे लाने.

"भैया भैया आप आगे रहो न ये फाइनल ड्रैगन है और मेरे पास बस 2 चांस है. ये पावर मुझे लेने दो."

"रुक मैं आगे हु तोह मैं लेज़र लेता हु तू 'स' से काम चला. संभल उस दूसरी तरफ वाले को.", यहाँ तोह टेलीविज़न की आवाज 50 पर थी और दोनों भाई शोर मचाते धड़ाधड़ गोलिया चला रहे थे. रामेश्वर जी तोह घर थे नहीं कौशल्या जी को ले कर जो सुबह से बहार थे. शंकर जी के आने का भी इन पर कोई प्रभाव न पड़ा तोह वो हैरत से Tara-Aarti को देखने लगे की ये लड़के कितनी उम्र के है. अर्जुन तोह मान लिया लेकिन संजीव, वो तोह एक अधिकार और गंभीर युवक था. लेकिन यहाँ सब समझ से बहार. ऋतू ने आँख मारते हुए आँगन में लगे बिजली के स्विच को निचे गिरा दिया.

"ओह्ह्ह.. इस लाइट को भी अभी जाना था. हो गया न किया कराया सब खराब भैया? जनरेटर लेके आते है जिस से ये झंझट हे ख़तम.", अर्जुन ने रिमोट गुस्से में जमीन पर पटका तोह संजीव भैया भी झुंझलाते हुए बोल पड़े.

"चल अरोरा अंकल की दूकान पर चलते है. वैसे भी थानेदार साहब ने 5 दिन बाद लगवाना है तोह आज हे सही. ऊपर वाले कमरे में सेट करते है गेम और आते हुए अलादीन और स्ट्रीट फाइटर की कसेट्टी भी लेते आएंगे.", संजीव ने कमीज पहन कर खड़े होते कहा तोह दोनों की हे नजर बहार खड़े हँसते हुए सभी चेहरों पर पड़ी.

"अरे जनरेटर क्यों एक बड़ा टीवी, वो महंगी वाली वीडियो गेम और छोटा फ्रिज भी लेते आना हवा वाले गद्दे के साथ. एक की शादी होने वाली है, दूसरा बाप से भी 3 इंच ऊँचा हो गया लेकिन अभी तक निक्कर बदल कर पंत नहीं बानी.", शंकर जी के ऐसा कहने पर अर्जुन तोह अपने भैया की तरफ हो गया और जैसे हे नजर बहार की तरफ जलती लाइट पर पड़ी वो सब भूल कर चिल्ला उठा.

"ये ऋतू दीदी ने किया है भैया. ऊपर भी गेम यही बंद करती थी और आज बिजली भी इन्होने हे भागे है. कश्यप जी के तोह लाइट है.", उसकी बात पर शकर जी हंसने लगे और ऋतू अंगूठा दिखती फुर्र हो गयी. शंकर जी ने हे बिजली चालू की और हँसते हुए नहाने चले गए.

"चल अब बहार हे चलते है, डॉक्टर दांग आ गए तोह हमारा यहाँ रहना ठीक नहीं.", संजीव भैया ने कदम बहार बढ़ाये थे और अर्जुन भी अपने पापा के इस नए नाम पर हँसता हुआ उनके साथ हो लिया.

"भैया हिमानी को भी छोड़ दीजियेगा इसके घर. यही पार्क के पास है.", प्रियंका दीदी ने कहा तोह हिमानी इशारे से मन करने लगी.

"आ जाओ गुड़िया, हम वही जा रहे है.", संजीव भैया ने गुड़िया कहा तोह हिमानी की वो झिझक थोड़ी काम हुई. लेकिन अलका ने एक और फरमाइश रख दी.

"भैया आप उधर हे जा रहे है तोह chhole-tikki भी लेते आना.", उसकी शकल देख कर संजीव भैया ने सर हिला दिया.

"भैया और मेरे लिए दही भल्ले.", आरती ने अलग फरमाइश रख दी तोह तारा भी बोल पड़ी.

"3 प्लेट, प्लीज."

"ठीक है ठीक है, सब ले आएंगे. चल छोटे.", इलो की सीट पर बैठने लगा तोह उन्होंने अर्जुन को हिमानी के लिए दरवाजा खोलते देख ाचा लगा. कार घर से बहार निकली और इधर रोमिला जी के साथ रेणुका भी घर में दाखिल हो गयी थी. 1 मिनट बाद हे रामेश्वर जी शुदा छोल साहब और कौशल्या जी के वापिस आ गए.

"पापा, आज सारा दिन आप कहा थे? माँ भी आपके साथ हे गयी थी?", तैयार हो कर शंकर जी बैठक में वापिस आये तोह रामेश्वर जी सोफे पर आराम से पसरे हुए थे और छोल साहब पानी पी रहे थे. कोमल वीडियो गेम को सही से समेत कर रख रही थी.

"तेरी माँ के लाडले भाई को कार्ड देने गए थे और फिर जितना सोचा उतना काम कर नहीं पाए. तुम अभी घर पे हे हो?"

"हाँ बस जा रहा था और माँ के लाडले भाई कही भजन मां की तोह बात नहीं कर रहे आप?", शंकर जी भी छोटे सोफे पर बैठ गए. उनकी माता जी कपडे बदलने गयी थी.

"हाँ और फिर तेरी माँ तोह सरकार के जैसे वह जम्म हे गयी. वैसे कभी कभी हमसे भी सलाह मशवरा कर लिया करो भाई. बुड्ढे है लेकिन थोड़ा बहोत तोह काम कर हे सकते है."

"मुझे लगा के ऐसे वक़्त में आपको परेशां करना ठीक नहीं रहेगा और बात घर तक नहीं जानी चाहिए.", शंकर जी का संकोच देख छोल साहब में हाथ पर हाथ रखते हुए कहा.

"आणि चाहिए शंकर जिस से सब संभाला जा सके. पता है अगर तुम साथ न देते तोह बड़ी अनहोनी हो सकती थी और संजीव ने भी भाई साहब को समय रहते पूरी खबर दी. अर्जुन ये सब खुद हे करने वाला था उमेद और धर्मवीर भाई साहब के साथ.", अब शंकर जी को समझ आया था के उनका बीटा क्या करने लगा था.

"आइंदा पहले आपसे बात करूँगा अगर बात ऐसी हुई तोह. वैसे मान न पड़ेगा के आप लोग एक संस्था की तरह काम करते हो.", शंकर जी ने अपने पिता की तरफ देखते हुए कहा और छोल साहब हंसने लगे.

"बुड्ढे लोग तोह भाई अब ऐसा हे कर सकते, जवानो की तरह सामना करनी की उम्र नहीं है न जो सर पे कफ़न बांध कर खुद मौत को निमंत्रण देने लगे. अब ये अपने मां को अर्जुन से दूर रखना, मैं भी कोशिश करूँगा. आज धर्मवीर भाई से मदद ली है कल भजन को शामिल कर लिया तोह ये लड़का जाने क्या ulat-palat कर रख दे.", रामेश्वर जी ने व्यंग किया तोह जिसका मतलब गहरा था.

"कर देगा तोह कर देगा. गलत नहीं करने वाला वो कुछ भी और शंकर तू कल समय से ले जइयो सबको उधर. मैं और तेरे पापा उधर अर्जुन, सतीश भाई साहब के साथ जाने वाले है. राजकुमार बबिता का कन्यादान करेगा तो ललिता भी साथ जाएगी और बच्चियां भी.", कौशल्या जी की बात पर अब शंकर जी क्या कहते, सर हिला दिया.

"घर पे कौन रहेगा यहाँ?", ये सवाल अपनी जगह ठीक था.

"दिन का समय है शंकर, टाला लगा कर चाबी सतीश के घर दे देंगे. सतीश के घर पर तोह Parvati-Mukesh देख हे लेंगे.", मतलब साफ़ था के दोनों हे परिवार जा रहे थे कल और विवाह गाँव में होने थे.

"वह सेफ्टी के लिए कुछ सोचा है पापा?", बेटे का ये सवाल उन्हें भी पसंद आया लेकिन जवाब माँ ने दिया.

"तेरे से बड़ी सेफ्टी क्या हो सकती है उधर? हमारे साथ उमेद होगा. शादी में जा रहे है या बॉर्डर पर?"

"कौशल्या gaav-kasbe का माहौल है घर की बेटियां जा रही है तोह शंकर का चिंतित होना लाज़मी है. अपनी रिवॉल्वर रख लेना साथ और एक गाडी मुनीर ले जायेगा. हमारे साथ सब ठीक है उधर क्योंकि उमेद के सुरक्षाकर्मी होंगे हे.", आपने पिता की बात से शंकर जी कुछ हद्द तक निश्चिंत तोह हुए लेकिन उन्होंने सोच लिया था के वह वो अपने आप हे सुरक्षा का इंतजाम कर लेंगे. जाने की इजाजत लेते हुए वो अपनी एस्टीम कार निकल कर बढ़ गए राममेहर सिंह की हवेली के लिए. रात के 8 बजने वाले थे और फ़िलहाल ध्यान बस कल के कार्यक्रमों पर हे था.

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"ये लड़की ख़ास थी क्या छोटे?", दोनों भाई अरोरा इलेक्ट्रिकल पर जनरेटर का आर्डर देने के बाद अब मॉडल टाउन में लगी रेहड़ियों से खाने पीने का सामान पैक करवा रहे थे. जनरेटर तोह अब परसो हे लगने वाला था क्योंकि रात को आदमी भी नहीं थे और अगले दिन सोमवार होने की वजह से दूकान बंद रहने वाली थी. बात शुरू हुई हिमानी से तोह अर्जुन भैया की बात पर थोड़ा गंभीर हो गया.

"भैया ये आचार्य जी की दोहती है और सच कहु तोह ज़िन्दगी का जो कड़वा पहलु होता है न इसको बस वही नसीब हुआ है. अकेलापन, maa-baap का साया नहीं, पुरुषो से डर और अपने वजूद से भी हारी हुई. कोशिश कर रहा हु के इनकी ज़िन्दगी कुछ बदल सकू. मेरे गुरु और दोस्त होने के साथ साथ आचार्य जी मेरे दादा जी भी है. बहोत कुछ सिखाया है उन्होंने मुझे वो भी हर सवाल का जवाब देने के साथ.", संजीव भैया को तोह अर्जुन हमेशा हे सबसे प्यारा था लेकिन उसका ये रूप देख सम्मान बढ़ गया .

"छोटे पता है तू कुछ साल उसके जैसे हे माहौल में रहा लेकिन तेरा ज़िन्दगी के लिए नजरिया बिलकुल विपरीत बना. इसलिए मैं हमेशा कहता हु के तू न एक वरदान है और तेरे लिए हमेशा दिल में एक डर लगा रहता है. घर न सचमुच तेरे आने के बाद बिलकुल बदल गया है यार. सब आपस में करीब है, हँसते है, एक दूसरे का ख्याल रखते है और बाबा (पंडित जी) तोह 10 साल जवान हे हो गए."

"ये हमेशा ऐसा हे रहने वाला है भैया क्योंकि ये सब आप लोगो ने किया है मैंने नहीं. वैसे ये सब छोड़िये असली बात बताये के आपके फ़ोन पर दादा जी ने कैसे प्रतिकिर्या दी थी आज? भड़क गए थे न वो आप पर?", अर्जुन थोड़ा हंस रहा था लेकिन खुद को रोक भी रहा था.

"साले तू काण्ड हे ऐसे करता है. लेकिन अगर तू वो सलाह न देता तोह काम बिगड़ जाता. देखा न कैसे तीनो एक साथ हे उठा लिए और पुलिस गायब हे करवा दी थी सम्पत के पास से. सही जगह पर सही तीर तू चला गया छोटे."

"वैसे अगर वो सब नहीं भी होता तोह पापा और चाचा संभल लेते भैया लेकिन चोट भी लग सकती थी और उनके हाथ ज्यादा हे गंदे हो जाते. मैं भी कोशिश कर सकता था लेकिन वो पापा है तोह उनके सामने नहीं और ऊपर से दादा जी ने तोह आज हे मेरा बोरिया बिस्तर घर से कही दूर लगवा देना था. ाचा कल आप हमारे साथ चलेंगे उधर बड़ी दादी के घर शादी में?", अर्जुन ने ये बात कुछ सोच कर हे कही थी जिसका पता संजीव का जरा भी न था.

"ना, चाचा के साथ जाऊंगा मैं. वह तोह मेरे पापा जायेंगे और वह किसी से ज्यादा बोलचाल मत शुरू कर देना. दादी को जानता है उधर तोह बस उन्ही तक सिमित रहना.", भैया की बात सुन्न कर अर्जुन मुस्कुराने लगा.

"जानता तोह मैं वह सुशीला बुआ को भी हु, बिजेन्दर भैया, बबिता और ऋचा दीदी को भी. बाकी आप कहते है तोह बस बड़ी दादी से बोलचाल करूँगा.", अर्जुन की बात पर संजीव भैया को भी हंसी आ गयी. उन्हें याद आ गया के आज ये परिवार इतने करीब है तोह उस घटना के बाद से जब अर्जुन ने उन्हें बचाया था.

"बबिता और बिजेन्दर को देखा है कैसे पहाड़ से bhai-behan है दोनों. मिला हु मैं उन दोनों से अपने दादा जी के साथ और बबिता बहोत गुस्सैल थी जितना मुझे याद है.", अर्जुन को जैसे याद आ गया था के बबिता ने एक वादा किया था उसको और वो उनका बेजोड़ संसर्ग.

"न भैया वो तोह बहोत ज्यादा हे प्यारी है.", अर्जुन को ऐसे खोये देख संजीव भैया जैसे कुछ समझ गए.

"अबे तू क्या बोल रहा है? कुछ लफड़ा तोह नहीं कर दिया क्योंकि उसकी माँ जो है वह नाक पर गुस्सा लिए फिरती है."

"सुशीला जी तोह अपनी बुआ है, प्यारी बुआ और बबिता दीदी से तोह मेरी ाची जमती है. टेंशन मत लो वह की, सब अपने है और जो नहीं है वो जान जायेंगे की रामेश्वर जी का छोटा पौता आ रहा है. उचित ध्यान रखा जाये नहीं तोह पापा थोड़े ज्यादा हे फेमस है मेरे.", अर्जुन के मजाक के साथ हे दोनों ने वो tikki-bhalle लिए और घर की तरफ मदद गए. संजीव भैया ने एक बार भी सिग्रत्ते नहीं सुलगाई थी इस दौरान.

"देख मैं वह के बारे में ज्यादा नहीं जानता छोटे लेकिन इतना पता है के उधर सभी लोग अपने परिवार के हितेषी नहीं है. तू उनकी नजरो में आएगा जरूर और इस बात का मुझे डर है. हाँ दादा जी के होते तोह तू बिलकुल सुरक्षित है."

"भैया, वो भी सिर्फ इस वजह से हे सुरक्षित है. लेकिन आप टेंशन मैट लीजिये, न मैं हाथ गंदे करूँगा और न किसी को करने दूंगा जब तक वो इंसान हमारे परिवार को चोट पहुंचने की कोशिश नहीं करता.", अर्जुन का बदला स्वर ऐसा था जिसमे संजीव भैया को झलक मिली के वो उनसे भी कही ज्यादा जानता है.

"वैसे तेरी लव लाइफ कैसी चल रही है? याद है पहली बार तेरा प्रैक्टिकल मैंने हे करवाया था और अब सुन्न रहा हु के तू वह भी सचिन बना हुआ है.", अर्जुन उनकी इस बात को सुन्न कर हँसता हुआ बहार देखने लगा.

"मैं कुछ नहीं करता बस हो जाता है भैया लेकिन आप मेरी छोडो अपनी बताओ. न तोह भाभी की तस्वीर देखने को मिली, न आपने कोई जीकर हे किया उनका और ऊपर से सबकुछ एकदम हे हो रहा है. चक्कर क्या है? लव मैरिज को अर्रंगे तोह नहीं करवा रहे आप?", संजीव का दिमाग जरूर हिल गया था अर्जुन की बात से लेकिन जाहिर न करते हुए हंसने लगा.

"देख छोटे ये न एक सरप्राइज है. तेरी होने वाली भाभी और तू बस डायरेक्ट हे मिलना. उसको भी तेरे बारे में कुछ नहीं पता है लेकिन इतना बता देता हु के परिवार थोड़ा बड़ा है और भीड़ ाची लगने वाली है.", दोनों हे ऐसे बातें करते हुए घर तक चले आये तोह बहार हे प्रीती दिख गयी जो शायद अभी अपने घर से आ रही थी. अर्जुन भी पहले हे उतर गया और भैया मुस्कुराते हुए अंदर चले गए.

"मेमसाब, आज बिना प्रोटेक्शन के?", अर्जुन ने करीब जाते हे मजाक में कहा तोह प्रीती उसको ऊपर से निचे देखने के बाद सीधा बोल पड़ी.

"तुम्हे हे बुलाने आ रही थी मैं. पता नहीं कहा उड़ते फिरते हो हर वक़्त. चलो मेरे साथ इस से पहले कोई टांग अदाए.", प्रीती ने अंदर देखने के बाद गेट लगा दिया बहार से हे. और अर्जुन को तोह कुछ समझ हे नहीं आ रहा था के वो क्या चाह रही है.

"कर क्या रही हो तुम और यहाँ घर पर दादी के साथ साथ ऋतू ने भी जान ले लेनी है क्योंकि 8 बज गए है.", अर्जुन प्रीती को तोह ना कर हे नहीं सकता था लेकिन समझते हुए उसके साथ उनके हे घर की तरफ चल दिया.

"मैंने खाना बनाया हुआ है हम दोनों का और mom-bua उधर हे है रात खाने पर. आजकल कुछ ज्यादा हे वो रेखा माँ के साथ चिपकी रहती है, 10 बजे तक वो वापिस आने वाली है दादा जी के साथ. तुम अंदर चलो और ये ऋतू दीदी या दादी जी का राग अलापना बंद करो, उन्हें कुछ नहीं पता लगता.", प्रीती घर के अंदर आते हे उसका हाथ पकड़ कर अपने कमरे में हे जा घुसी. अर्जुन भोचक्का था के एकाएक प्रीती को ये क्या हो गया. अभी वो कुछ बोलता उस से पहले हे प्रीती की टीशर्ट एक तरफ जा गिरी और अर्जुन को बीएड पर गिरते हुए वो उसके ऊपर थी.

"दरवाजा खुला है और ये तुमने टॉप क्यों उतार दिया? मरवाओगी प्रीती. उम्मम्मम", और होंठो पर अपने होंठो का टाला लगाती प्रीती ने अर्जुन को खामोश कर दिया. और अब वो खुद शामिल हो चूका था प्रीती के साथ इस मनचाहे सफर पर. दोनों हाथ उस रेशमी जालीदार ब्रा के ऊपर रखते हुए अर्जुन कठोर स्टैनो को दबाता प्रीती का मीठा मुखरास पीने में इतना खो गया था के हॉल में हैरत से उनको देखती विक्की का भी आभास न हुआ. प्रीती ने इस मिलान को आगे ले जाने के लिए अपना पजामा खिसकाया हे था के गाला खंखारने की आवाज से दोनों हे इस अवरोध की तरफ देखने लगे जिसकी उपस्थिति ने मजा खराब कर दिया था.

"ी didn't मैं तो डिसट्रब यू बोथ. योर दूर इस ओपन प्रीती.", विक्की इतना बोल कर सपाट चेहरे से रसोईघर में चली गयी और प्रीती ने अर्जुन के ऊपर से उठते हुए एक और चुम्बन कर दिया.

"बोलती है के मैं रोमांटिक नहीं हु.", प्रीती ने आँख मारते हुए अर्जुन से इतना हे कहा और टीशर्ट पहन ने के लिए बिस्टेर से उठ कड़ी हुई. अर्जुन को तोह कुछ समझ हे नहीं आ रहा था.

"उसने दरवाजा बंद करने को कहा तोह टॉप क्यों पहन रही हो?", अर्जुन की हालत खराब थी और लिंग तनाव से पूरा खड़ा कर दिया था प्रीती ने उसका.

"इडियट, चलो अपने घर जाओ. दरवाजा बंद करू वो भी इस टाइम पर.?", इतराते हुए प्रीती आईने में अपने बाल ठीक करने लगी तोह अर्जुन मायूसी से उठ कर जाने हे लगा था के प्रीती ने हाथ थाम लिया.

"तुमने हे तोह कहा था वेडनेसडे को और मैं तैयार भी हु. विक्की को बस दिखाना जरुरी था इसलिए ऐसा किया. उम्मम्मम.. होप यू अंडरस्टैंड."

"अब तुम ऐसे कहोगी तोह मैं क्यों बुरा मान ने लगा. ी लव यू."

"ी लव यू तो अर्जुन. चलो मैं तुम्हे घर तक छोड़ देती हु, वैसे भी लोग नजर बहोत लगा रहे है. माँ को जाने दो एक बार वापिस फिर विक्की मार ले अपने पाँव पर कुल्हाड़ी.", प्रीती ने भी एक बार ाचे से गले लगने के बाद अर्जुन का चेहरा चूमा और दोनों वापिस उनके घर की और चल दिए. रसोई में कड़ी विक्की शरीर से चिपकी लेग्गिंग के ऊपर से हे छूट को सेहला कर होंठ दबा रही थी.

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"तुम्हारा नाम मुस्कान है न बेटी?", सितारा देवी के यहाँ बेशक एक मौत हुई थी जिस वजह से विवाह समारोह बिलकुल सदा रखा गया था लेकिन घर की अगली पीढ़ी में ये पहला विवाह था तोह पिछले आँगन में संगीत और खाने पीने की व्यवस्था उन्होंने खुद बोल कर रखवाई थी जिस से अनुपमा को भी कुछ रहत हो. महिलाये और युवतिया हे इधर शामिल थी. वही गिने चुने लोगो के लिए नोहरे में थोड़ा खाने पीने का इंतजाम विकास और दोस्तों ने अपने जिम्मे ले लिया था. सब से फारिग होने के बाद अब शंकर जी हवेली के बहार वाले आँगन में आराम करने लगे थे तोह अक्षरा की जगह उनके लिए दूध मुस्कान ले कर आ गयी.

"जी अंकल जी, मुस्कान मिर्ज़ा मेरा पूरा नाम है और आपके उधर हे यूनिवर्सिटी स्टूडेंट हु.", थोड़ा झिझकते हुए मुस्कान ने अपना पूरा नाम बताया तोह शंकर जी ने चारपाई पर एक तरफ बैठते हुए इस लड़की को भी सामने बैठने को कहा.

"शबनम तुम्हारी बहिन है न बेटी?"

"बदकिस्मती से वो मेरी बड़ी बहिन है और बिंदिया सिंह जो अब मिर्ज़ा है वो मेरी माँ. ी क्नोव उन सबके साथ मैं भी आपकी गुनेहगार हु लेकिन मैंने कभी उन्हें न अर्जुन की कोई इन्फ्रोमेशन दी और न उनके वो काम पूरे होने दिए जिस से नुक्सान हो सकता था किसी का.", शंकर जी को हैरत थी की ये लड़की निडर होने के साथ साथ शबनम या बिंदु की तरह फरेबी नहीं है. होंठो पर जो बात थी वो दिल से हे निकल रही थी और ढेर सारा पश्चाताप था.

"तुम्हारी बड़ी बहिन तोह कह रही थी की मैं तुम्हारे साथ कुछ न करू, कोई नुक्सान न पहुचौ? और तुम अलग बात कह रही हो. जानती हो वो मेरी कस्टडी में है.", शंकर जी ने मुस्कान को थोड़ा सहज करने के लिए उसकी तरफ एक तकिया बढ़ाया तोह पहली बार वो थोड़ा मुस्कुराई. गॉड में तकिया ले कर अब वो सही से बैठ गयी थी. शंकर जी की बेटी ऋतू भी तोह ऐसे हे बैठती थी जब पाँव लटका कर वो बात करती थी.

"क्या है न अंकल वो brain-washed होने का नाटक जरुरी करती है लेकिन शबनम को तोड़ना किसी के भी बस का नहीं है, फिजिकल पैन दे कर तोह बिलकुल भी नहीं. मुझे तोह इतना पता है के माँ ने शादी की थी सिर्फ हमारी फॅमिली के लेवल और पैसे को देख कर. और मेरे पापा कहते रहे के माँ ने उनसे सच्चा प्यार किया है. भला जो आदमी चल हे नहीं सकता उस से एक विडो इंडिया से इंग्लैंड आ कर हफ्ते में हे सच्चा प्यार कर बैठी? शबनम को माँ के साथ साथ और भी बहोत से लोगो ने ट्रैन किया है और मैं कुछ जान नहीं पायी क्योंकि कभी ध्यान था हे नहीं इस सब पर जब इंग्लैंड थी. बस ध्यान रखना के वो नाम भी बताएगी तोह उनके जिन्हे रस्ते से हटवाना हो. इतना तोह इंडिया आने के बाद मैं जान हे गयी.", मुस्कान का इतना सब बताना और ऐसे मासूम चेहरे के साथ याद करते समय सर झटकना शंकर जी को भी बेहद ाचा लग रहा था.

"तुम्हारी माँ का ससुराल और मायका तोह यहाँ है. कभी गयी नहीं वह?"

"मेरा तोह उनसे कोई रिश्ता है नहीं और वैसे भी ी वास् जस्ट ा बैत (चारा) फॉर थम और अब वो भी हाथ से निकल गया. हाँ बिजेन्दर भैया और सुशीला मौसी से मिलने जा सकती हु वो भी अगर कभी पॉसिबल हुआ तोह. वैसे आप अर्जुन के पापा है न?", मुस्कान का सुशीला को मौसी कहना शंकर जी को थोड़ा खटका और फिर अर्जुन का जीकर करना भी.

"हाँ, मेरा बीटा है अर्जुन. तुम मिली हो अर्जुन से, शायद जब वो अपने दादा जी के साथ यहाँ आया था तब?"

"नहीं नहीं अंकल. तब मैं यहाँ नहीं थी जब वो लोग आये थे. अर्जुन ने हे तोह मेरी जान बचाई है और बाद में शबनम को भी. यूनिवर्सिटी और स्टेडियम में हम थोड़े टाइम से नोन है और उसने हे मुझे इस सब से बहार निकला क्यूंकि वो समझ गया था के मैं उस पर नजर रख रही हु जो मुझे आता भी नहीं था.", शंकर की जो ऐसी बातें भी खुसी दे रही थी जिनमे काम का कुछ था भी नहीं लेकिन ये लड़की शायद दिल हल्का कर रही थी और उन्हें मुस्कान ाची भी लगी.

"वो तोह स्कूल में है फिर यूनिवर्सिटी कैसे? तुमसे मिलने तोह नहीं आता बीटा?"

"ः. नथिंग लिखे तहत अंकल. वो कॉम्प्लिकेटेड लड़का है और लाइब्रेरियन से ले कर कंप्यूटर डिपार्टमेंट के साथ इन्वॉल्व रहता है. मोस्टली स्टडी पर्पस से और कभी कभी मुझसे भी मिल लेता है अगर बास्केटबॉल खेल रही होती हु या लाइब्रेरी में पढ़ते टाइम. आप कहते है वो स्कूल में है लेकिन जैसे सोच चूका है के आगे क्या सब्जेक्ट लेने है. बूत यस वे अरे गुड फ्रेंड्स क्योंकि मेरे दोस्त है हे नहीं उधर.", शंकर जी ऐसे वक़्त पर अब गंभीर बात नहीं करने चाहते थे तोह वो भी बची की ख़ुशी देख खुश होते रहे.

"उसकी लाइफ है बीटा लेकिन कल मेरी वाइफ और बेटियां भी आएँगी यहाँ तोह पॉसिबल है तुम्हे और भी दोस्त मिल जाये. एक तोह इस सेशन से तुम्हारे हे ुनिवर्सिय से ब स्टार्ट करने वाली है, कोमल नाम है उसका. दोस्त होने चाहिए और वही आपकी बुरे समय में ताक़त बनते है."

"सी मैं जो बताने आयी थी वो सिर्फ डर की वजह से नहीं बता पायी. आप सचमुच उतने स्ट्रिक्ट या कहु डेंजरस नहीं है जितना सुना था. माँ की एक बात सुनी थी मैंने की आप हमेशा नजर में हे रहते हो. 'जो भी है उसमे शंकर और नरिंदर को कभी कुछ नहीं होगा क्योंकि उन्हें सब अपनी आँखों से देखना होगा.' और अंकल अगर आप कोशिश करे तोह उन लोगो को पकड़ सकते है क्योंकि वो फ़ोन करने वाला माँ के मायके के aas-pas से है. और शबनम की भी यहाँ हर तरफ बहोत से लोगो ने हेल्प की है. आपके घर पर या शहर में तोह ऐसा कुछ करने की हिमाकत वो नहीं करेंगे लेकिन जैसा आपने कहा के फॅमिली भी यहाँ आएगी तोह सचेत रहना.", मुस्कान का स्वर एकदम हे धीमा हो गया था इतनी लम्बी बात बताते हुए. और शंकर जी को जो झटका लगा उसकी तोह कोई सीमा हे नहीं थी. बिंदु भी तोह नरिंदर के पंजाब वाले घर ऐसा हे कुछ करवाने वाली थी.

"उस फ़ोन के बारे में तुम इतना सही से कैसे कह सकती हो के वो तुम्हारी माँ के मायके से आया था.?"

"क्योंकि डिस्प्ले पर 91-12** तोह दिख गया था बाकी नजर नहीं आया क्योंकि वो हमेशा हाथ रख लेती थी जब भी कॉल आती थी इंडिया से, चाहे पास में कोई हो या न हो. उन्होंने कभी घर से यहाँ इंडिया फ़ोन नहीं किया ये भी उनकी खूबी है. इनकमिंग वाले नंबर बिल पर प्रिंट नहीं होते. अब ये कोड तोह वही का है न जहा वो पैदा हुई?", मुस्कान ने सही कोड बताया था शंकर जी को और अब कई सवाल उठ गए थे दिमाग में.

"तुमने सुना कैसे जब वह नंबर हे छिपा कर बात करती है तोह?"

"मैंने डायरेक्ट कन्वेसशन नहीं सुनी अंकल. जितना नंबर दिखा वो अचानक दिखा और उस वक़्त मैं कसेट्टी से एक सांग क्लियर करने के लिए वह बैठी थी. फ़ोन आने पर माँ ने बहार जाने को कहा तोह मेरा कसेट्टी रिकॉर्डर मैं वही भूल गयी. अब सबसे इजी वे तोह यही है न किसी सांग को हटाना हो तोह साइलेंट जगह बस रील का उतना हिस्सा रिकॉर्डिंग पर लगा दो सब साफ़. लेकिन वह इतना हे रिकॉर्ड हुआ और रील ख़तम क्योंकि आखिरी सांग था वो. मैं कोई डिटेक्टिव नहीं हु बस ये सब अनजाने में हुआ और अगर मेरे कुछ करने से ये सब रुक सकता है तोह मैं ऐसा हे करुँगी. आप कोई बुरे लोग तोह नहीं है और मुझे तोह वजह भी नहीं पता के ये ऐसे खेल खेले हे क्यों जा रहे है.? चलती हु मैं अंकल और अगर आपको कुछ भी पूछना हो तोह कभी भी पूछ सकते है. गूडनिघत.", मुस्कान के शुभरात्रि कहने पर शंकर जी ने भी सर पे हाथ फेरते हुए खुश रहने का आशीर्वाद दिया और अब गहराई से सब सोचने लगे जो इस लड़की ने उनसे बिना पूछे हे बता दिया था. एक बात तोह साफ़ थी की मुस्कान अपने ऊपर दाग नहीं लगने देना चाहती थी और न अपने पिता पर.

'हल नहीं निकलेगा इतने सबूत से. वो कोड पीसीओ का हे होगा और फ़ोन करने वाले का पता करना घांस के ढेर से सूई निकलना. इतना साफ़ है के जेड वही गाड़ी है जहा सब शुरू हुआ. लेकिन मुझपर नजर कौन रख सकता है? ये लड़की अपने वह के परिवार को बचाना चाहती है और इसके बदले खुद खतरे में है. शंकर, ये गुत्थी एक दिमाग से नहीं सुलझने वाली.', अपने आप से बातें करते हुए शंकर जी बेचैन हो चुके थे. बिंदु के साथ वो दूसरा कौन हो सकता है जो उनको और नरिंदर को कुछ नहीं करना चाहता.

"चाचा जी अभी तक जाग रहे हो?", विकास भी इधर आ कर खाट पर लेट गया और शंकर जी को बैठे देख बात की शुरुआत की.

"हाँ यार, आदत नहीं है न इतनी जल्दी सोने की और ऊपर से कल फिर सबसे जरुरी दिन है. सॉरी तेरा उतना साथ नहीं दे पाया यार. हॉस्पिटल और बहार के काम की वजह से 2 दिन ज्यादा हे व्यस्त रहा."

"चाचा जी, अभी से हम लोगो को आदत पड़ेगी तोह आगे चल कर कुछ संभल सकेंगे. किया तोह अभी भी आपने और उमेद अंकल ने हे है सबकुछ. दादा जी ने भी बाकी काम करवा दिए लगे हाथ. मैंने और मेरे दोस्त ने तोह बस आने वाले मेहमानो और यही छोटा मोटा काम संभाला. अब आप आराम कीजिये क्योंकि बड़े काम से पहले शरीर का तैयार रहना भी जरुरी है.", विकास ने तोह अपने खिलाडी वाले जीवन की बात कही थी लेकिन शंकर जी को ये बात अपने हिसाब से भी सही लगी. बड़े काम से पहले खुद को शांत रखना.

"यार तेरा छोटा भाई (अर्जुन) भी कुछ करता धर्ता है स्टेडियम में या सिर्फ टाइम पास हे हो रहा है उसका? मैं तोह ज्यादा देख रेख नहीं कर पता उसकी."

"वो उनमे से है जो खेत न भी जाए तोह खली जमीन देख कही भी म्हणत करनी शुरू कर दे चाचा जी. अनुशाशन भी है और लगन का भी पक्का है बस थोड़ी चिंता होती है के वो न जज्बाती और दिल से चलने वाला लड़का है. सभी वैसे नहीं होते और इसलिए उसका ख्याल ज्यादा रखना पड़ता है. बॉक्सिंग ट्रायल में स्टेट चैंपियन हे धो दिया था लड़के ने जबकि पहले कोई अनुभव नहीं था उसको.", शंकर जी को ये बात अपने पिता से भी पता चली थी की अर्जुन ने ऐसा काम किया है.

"वही उसने सुदर्शन वाला काण्ड भी किया था. तब तोह अनुशाशन नहीं दिखा उसमे.", कटाक्ष भी कुछ सोच कर करते थे शंकर जी लेकिन विकास समझदार था.

"ज़िंदा छोड़ कर अनुशाशन हे तोह दिखाया अर्जुन ने. आप वह होते तोह पक्का जान ले लेते ऐसे इंसान की. बाकी बात जब लड़की की इज्जत पर आये तोह अर्जुन को वो करना बिलकुल सही था. उस दिन भी उसने खुद को काबू हे किया था चाचा जी नहीं तोह आज हालात दूसरे हो सकते थे सभी परिवारों में. दिलेर भी है और माफ़ करना भी जानता है.", विकास के लफ्जो में अर्जुन के लिए प्यार और परवाह थी जिसको देख कर शंकर जी ने हलकी सी गर्दन हिला दी सोने की मुद्रा लेने से पहले.

"हाँ वो बड़ी गलती थी सुदर्शन की और वैसा नहीं होना चाहिए था. शेर इंसान पैदा होता है, तैयार नहीं किया जा सकता. ताक़त गलत हो तोह अंजाम भी वैसा हे मिलता है."

"बड़ी दादी ने लाड लाड में ज्यादा ढील दे दी थी उसको और एकलौता था न तब हवेली पर तोह ताक़त का भी पता चल गया था. अब न करेगा वो ऐसी हिमाकत और अब बिजेन्दर उधर है तोह समझो हवा भी टाइट रहेगी क्योंकि वो कायदे से रहने वाला ाचा इंसान है जिसके लिए परिवार सबकुछ है.", विकास ने तकिया सही करते हुए आँखें बंद की तोह शंकर जी भी अनुसरण करते हुए सोने लगे. 10 बज चुके थे रात के और अब हवेली में कोई शोर भी न था.

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रात के 9 बजे सोमबीर सिंह की हवेली में सन्नाटा नहीं था. एक तरफ जहा मल्टी जी अपनी जेठानी के कहे अनुसार गहने, कपडे आदि सही से व्यवस्थित कर रही थी वही सुशीला सिंह अपने बेटे को भी सबकुछ समझा रही थी की क्या रस्मे होती है और फिर गाँव वापिस आने पर सबसे पहले किन जरुरी रिवाजो को पूरा करना होता है. बिजेन्दर भी सबकुछ सुनते हुए अपने कल पहने जाने वाले कपड़ो को हैंगर में दाल कर अलमारी में रख देता है. आज हवेली में और भी कुछ रिश्तेदार थे जिस वजह से बबिता ऊपर वाली मंजिल पर उसी कमरे में अपनी तैयारी कर रही थी जहा दिन में वो ऋचा के साथ थी. यहाँ एक दूर की भाभी भी उसके साथ मदद कर रही थी.

"तेरे पापा तोह ऐसे वक़्त भी शामिल नहीं होंगे हमारे साथ. यही तोह अन्याय है जो मुझे हमेशा दुःख देता है. काम से काम तेरा तोह सोच सकते थे लेकिन नहीं वो तोह अपने प्यार भरे परिवार के साथ कल एक परै लड़की के बाप बन्न रहे है.", मधुलता भी यहाँ ऋचा के लिए कपडे तैयार कर रही थी और जो भी देना था बबिता को वो अलग से पैक करती हुई आदतन गुस्सा हो रही थी.

"उनका असली परिवार तोह वही है माँ. यहाँ सिर्फ एक मेरे लिए तोह वो सबको छोड़ नहीं देंगे और वैसे भी हवेली और इस गाँव के हिसाब से तोह वो मेरे बस dharam-chacha है. आप पहन लो जरा ब्याहता की साड़ी और मांग भर लो अगर मैं गलत कह रही हु तोह?", कल अपनी माँ द्वारा पहने जाने वाले odhni-kameej और घाघरे को देख कर ऋचा ने कुछ जरुरी सामान अलग करते हुए सवाल किया तोह अब मधुलता की बारी थी जवाब देने की.

"जितने इस हवेली में हु तोह ये बेरंग कपडे भी मेरे जीवन का हे सच है. मैं तोह तेरे लिए कह रही थी की वो आ सकते थे यहाँ."

"बहिन के लिए उसका भाई आ रहा है तोह मुझे उतने में हे ख़ुशी है. हाँ आपकी डिमांड अपने लिए है तोह फ़ोन कर के बुला लेती, वैसे भी आपसे तोह वो डरते हे है.", ऋचा ने ये प्रसाधन का सामान एक बैग में डालते हुए एक नजर अपनी माँ को खोये देखा और अंदर हे अंदर मुस्कुराने लगी. कहा तोह मधुलता इतना कभी सुनती नहीं और आज बोलती बंद थी.

"हाँ कर लियो जी पूरा अपने सौतेले भाई से मिल कर. उसके गुण तोह तेरी दादी भी जाती रहती है, जरा परवाह नहीं की ऐसे लड़के को प्यार करने में जिसने इस घर के बड़े बेटे को अधमरा कर के नरक जैसी ज़िन्दगी दी. सबको बस वही भला लगता है जो छाती तान कर लोगो के घर उजाड़े.", कटाक्ष करते समय वो ये भी नहीं सोच रही थी की आज हे तोह बेटी ने उसको सब समझाया था लेकिन इंसान जेह्रीला हो जाये तोह फिर साफ़ खून पसंद भी कहा करता है.

"फिर तोह आपको विधवा करने वाले के साथ मुझे पैदा करके आपने कुछ अलग नहीं किया माँ. वैसे भी सुदर्शन भैया ने अर्जुन की मंगेतर को उठाने की कोशिश की थी, मर्द लड़ता नहीं बचता है. जिन्होंने मर्दानगी दिखाई वो तोह न रहे लेकिन हाँ कुछ लोग ऐसे है जो तब भी एक परछाई थे और आज भी वही है. आप क्यों बिना वजह इतना सोचती हो? शादी यहाँ है और यही अपना परिवार है. आप करो अपनी भाभी और मौसी से बात मैं ऊपर जा रही हु बबिता दीदी के कमरे में. सवेरे टाइम से न उठी तोह जगाने आ जाना.", ये make-up और वैसा हे सामान का थैला लिए ऋचा पिछले आँगन में जाती हुई दोनों बड़े कुत्तो को भी आजाद करती ऊपर चल दी.

'हाँ अब तू हे सिखाएगी के मुझे किसके साथ रहना चाहिए और किसके साथ नहीं? कर लेने दो एक रात और आराम उस तेरी प्यारी आंटी और अर्जुन की माँ को. मेरी हालत में शंकर होगा तोह फिर उसको भी अकाल आएगी के एक मयान में 2 तलवार रखना हमेशा फायदा का सौदा नहीं होता. तू बच गयी इसका शुक्र मन और उस अर्जुन को में दिखती हु चक्रव्यूह का 8व दरवाजा.', मधुलता ने स्टील का वो गिलास गुस्से में इतनी जोर से दबाया था के नरम हाथो ने भी उसका अकार बदल कर नाकारा कर दिया था. गहरी सांस लेने के बाद खुद को सहज करती वो अपने कमरे में चली गयी.

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रामेश्वर जी के यहाँ तोह 11 बजे हे निचला हिस्सा शांत होता था और वो भी जरुरी नहीं था के सभी सो जाते थे इस वक़्त. ऊपरी भाग का कोई समय नहीं था जहा पिछले भाग में लड़किया 2 बजे तक भी जागती रहती थी वही अर्जुन वैसे हे कुछ न कुछ करता रहता था. संजीव भैया को दादा जी ने बैठक में सोने को कहा था तोह आज भी वो यहाँ अकेला हे किताबो में खोया बैठा था. 2 घंटे से वो बस पढाई में हे लगा था और अब पानी की बोतल खाली देख कर दूसरे कमरे में आया तोह यहाँ भी कोई न था.

'आज तोह अकेले नहीं सोने वाला मैं. इनका ठीक है 4-5 एक साथ रहती है और उधर माधुरी दीदी के साथ भी प्रियंका दीदी और कोमल दीदी के साथ रुपाली दीदी. भैया इतने दिन बाद आये लेकिन उन्हें भी निचे हे सुला दिया.' अपने आप से हे बातें करता वो ऋतू दीदी के कमरे में गया तोह जैसा सोचा था वैसा हे नजारा मिला लेकिन आज पढ़ाई की जगह सभी अपनी अपनी ड्रेस निकल कर देख रही थी की वो क्या पहनेंगी कल और उसके बाद अर्जुन को पता था के इनके मेकअप वाला टॉपिक चालू हो जायेगा.

"ोये, निकल यहाँ से. ज्यादा taak-jhaank नहीं कर रहा?", ऋतू दीदी ने दरवाजे के बीच खड़े होते जैसे उसको अंदर देखने से रोका. लेकिन फिर भी नजर आ हे गया के वह प्रीती और विक्की भी बैठी थी.

"ये बिल्ली आज रात को यही सो रही है?", अर्जुन ने इतना पुछा तोह दरवाजा मुँह पर हे बंद करती ऋतू दीदी ने बस इतना हे जवाब दिया.

"जा के सो जा, ज्यादा इधर उधर मैट देखा कर.", और अर्जुन अपना मुँह लिए निचे चल दिया. उसको तोह पहले हे अंदेशा था की यहाँ फ़िलहाल िज्जात्त नहीं मिलने वाली थी. निचे रसोई में पानी पीने के बाद उसने माँ का हे दरवाजा हलके से खटकाया.

"नींद नहीं आ रही थी क्या ऊपर?", रेखा जी ने सर सहलाते हुए अपने लाडले को कमरे में अंदर किया और चिटकनी लगा दी. वो अमूमन दरवाजा बंद करती थी लेकिन चिटकनी सिर्फ कभी कभी. अर्जुन भी सिर्फ बनियान और पाजामे में बिस्टेर पर जा लेता.

"नहीं माँ, भैया ऊपर होते तब भी मैं शायद आराम से न सो पता.", बेटे की ये बात सुन्न कर रेखा जी ने आंवला तेल की शीशी उठाई और एक अंगोछा अपनी गॉड में बिछाते हुए अर्जुन का सर वह रख लिया. हथेली में तेल गिरा कर वो बड़े प्यार से अपने बेटे के सर को मालिश से हल्का करने लगी.

"पता है जब शरीर ज्यादा काम करे तोह नींद आसानी से आती है और जब दिमाग का प्रयोग ज्यादा हो तोह तनाव. तुम्हे खुद को कुछ कदम पीछे हे रहना चाहिए बीटा. अभी सुकून से रहोगे तोह आगे बेहतर काम कर सकोगे.", रेखा जी अगर दिल से बात करती थी तोह ज्यादातर वो अपने बचो या जेठानी के साथ हे होता था. लेकिन अर्जुन इसमें भी ख़ास था जहा कोई एक परिभाषा नहीं थी इस prem-dor की.

"अभी सब ठीक हो जाये तोह फिर हमेशा सुकून रहेगा न माँ. और मुझे ाचा लगता है क्योंकि आप यही तोह करती है. सबको प्यार और इज्जत देती हो, कभी कोई सवाल नहीं कोई मांग नहीं. तोह बताओ मैं ऐसा क्यों न करू?", अर्जुन नीचे लेता हुआ अपनी माँ के चेहरे को देख रहा था जिसके साथ वो किसी की तुलना नहीं करता था. रेखा जी के चेहरे पर बस हमेशा वाली मुस्कान थी अपने बेटे के लिए.

"वो मेरा दायित्व है बीटा और मुझे ये हमेशा करना हे होगा. तुम्हे अभी कक्षा में घूमना चाहिए ना की खुद केंद्र बन्न न. मुझे नाज है तुम पर क्योंकि जब हर इंसान ये कहता है के अर्जुन समझदार है, सबका ख़याल रखता है या सुरक्षा करना जानता है दिल को एक ख़ुशी मिलती है जिसके लिए शब्द भी काम लगे. लेकिन क्या ये सही है जब तुम एक किशोर हो और घर की पहचान अभी तुमसे नहीं होनी चाहिए बीटा. किसी को निराश कभी मैट करना और हमेशा बड़ो की बात को वचन की तरह लेना लेकिन अपने इस मैं को थोड़ा सिमित करो जो बिना किसी के मांगे परवाह देने चला जाता है.", रेखा जी की बातों की गहराई बताती थी की उनका ज्ञान साधारण नहीं है. एक किशोर बेटे की परवाह और जीवन के सुनहरे पालो का मूल्य उन्हें मालूम था. उंगलिया सचमुच अर्जुन को आराम देती हुई जैसी किसी अदृश्य जकड़न से आजाद कर रही थी.

"फिर भी माँ, अगर सब एकदम सही हो जाये तोह ाचा रहेगा न."

"तू ऐसा जवाब देगा ये उम्मीद नहीं थी अर्जुन. तेरे इस ा कम्पलीट प्रोसेस बिहाइंड एव्री क्लियर प्रोजेक्ट. िफ़ यू ऐड अडिश्नल फाॅर्स और स्किप अन्य रिक्वायर्ड स्टेप, आईटी विल रुइन it's नेचर एंड फार्मेशन. बचा 5 महीने में बहार नहीं निकल सकते या फिर अगर कहु की पृथ्वी 12 घंटे में अपनी धुरी पर घूमने लगे तोह जीवन हे नहीं होगा. सब ठीक करने की कोशिश में उतावलापन और जल्दबाजी वही अतिरिक्त ऊर्जा और गायब क्रमांक का काम करेंगे जो उम्मीद से इतर परिणाम देगा.", अब कही अर्जुन लाजवाब हो गया था. उसने अपने पापा वाले काम में कुछ ऐसा हे किया था, दादा जी भी तोह उसको मन कर रहे थे की वो दूर रहे अब ऐसी किसी भी घटना से.

"सॉरी माँ, मैं समझ गया के आप क्या कहना छह रही हो. गलती हो जाती है जब मैं ज्यादा सोचने लग जाता हु."

"वही तोह मैंने कहा था न सबसे पहले की अपने मैं को नियंत्रित करो. अभी जो सामने दिखाई दे उसके बारे में सोचो, उस से जुडी परेशानी के बारे में पता करो और कोशिश करो के वो सही तरीके और सही इंसान की मदद से सुलझे. घर में रहो, अपने दोस्तों के साथ milo-julo, जो घर के काम हमेशा करते रहते हो उन पर ध्यान दो और सही दिशा में अपने लक्ष्य पर काम करो. मेरा सबकुछ सिर्फ तुम्ही हो और मेरा जीवन तभी सार्थक होगा जब तुम अपने जीवन से संतुष्ट होंगे. दिल से, दिमाग या बहरी कमाई से नहीं. इन कंधो पर इतना बोझ अभी से मैट लो की जरुरत पड़ने पर ये झुक जाए.", सर थपकने के बाद वो उसके कंधे और गर्दन पर ख़ास तरह से दबाव देती हुई मालिश करने लगी.

"आप इतना गहराई से कैसे जानती है सबकुछ? मतलब हर टॉपिक पर आप पकड़ रखती है लेकिन सबसे ज्यादा आप इंसान को समझती है माँ. लेकिन फिर भी इतनी शांत और बस मेरी परछाई सी रहती है.", अर्जुन ने लेते हुए हे माँ के गाल पर हौले से हाथ फिराया तोह वो भी झुक कर उसके माथे पर प्यार देने के बाद मुस्कुराने लगी.

"तेरी परछाई नहीं हु मैं बीटा, तू मेरी तपस्या का वो वरदान है जिसका आवरण बन कर मुझे हे रहना होगा. चल अब तू आराम कर मैं हाथ धो कर आती हु.", अर्जुन के सर पर लगाया तेल उस सफ़ेद अंगोछे से ाचे से साफ़ करने के बाद उन्होंने कंधे और चेहरे को भी प्यार से साफ़ किया जिस से कही भी तेल का निशाँ न रहे और कमरे से निकल कर बाथरूम चली गयी.

अर्जुन बस यही सोच रहा था के माँ इतनी असीमित ज्ञान रखती है और उतनी हे शांत रहती है. ये कैसा संतुलन बना लिया है उन्होंने जिसमे कोई तर्क या विवाद की झलक देखने को नहीं मिलती. माँ उसको भी इतना जानती है जितना वो खुद नहीं जान पाया. तभी तोह वो उसका आवरण है. इधर सोच से बहार आया तोह अब दिमाग बिलकुल हे शांत हो गया था अगला दृश्य देख कर. माँ ने वही काली निघ्त्य पहन ली थी जो उसने उन्हें उपहार स्वरुप दी थी.

"शांत होने के बाद हे तुम सो पाओगे.", बड़ी लाइट को बंद करते हुए उन्होंने वो जीरो की रौशनी जला दी थी लेकिन उनके सामने शायद पहले वाली लाइट भी बेमतलब हे थी. इस नैसर्गिक सौन्दर्य की तुलना करना बेमतलब हे था.
 
आज भाई एक कहानी में नजर पड़ी. आईटी इस सो वेल रिटेन तहत ी जस्ट रीड ा रैंडम अपडेट. बूत आईटी वास् ा कॉम्बिनेशन ऑफ़ 2 ऑफ़ माय फवौरीते स्टोरीज विथ writer's पर्सनल स्किल्स तहत ी रीड आईटी प्रॉपरलय. लेकिन मेरी बुलेट, मेरी रानी वह देख के बड़ा अजीब लगा.

बूत ी डेफिनिटेली विल रीड आईटी कम्प्लीटली. नररातिओं इस तू गुड.
 
सबसे बड़े सवालों से कल आवरण जरूर हटेगा. Mahesh007 भाई, Billi420 Fâķîřă भाई के जवाब तोह दे सकता हु लेकिन सच कहु तोह 404 Tony stark Professsor aka3829 Nano को नजर अंदाज भी नहीं कर सकता.

XLNC खामोश है Sphinx भी क्योंकि ये नजर ऐसी रकते है की वेव की समझ बहुत ज्यादा है.

सचमुच हैरान हे हु के ये कहानी आज उस जगह ले आयी की मज़बूरी में कुछ और भी लिखना पढ़ रहा है.

दिवाली के बाद एक वीकली स्टोरी होगी मेरी जिसका शीर्षक रहेगा 'एक चौराहा'
 
10 मिनट में एक अपडेट आ रहा है और उसके पीछे हे दूसरा
 
अपडेट 127

आवरण - 2


"ये भाभी तोह भोकाल है मांगे भैया, काहे अवधेश बाबूजी यह को भगवन के पास भेजन चाहवत है? दिल कैसे मान गया भैया तुम्हार यह काम के वास्ते?", रात 11 बजे 3 लोग इस उजाड़ से खंडहर में बैठे देसी दारू की बोतल खोले ये संक्षिप्त सी महफ़िल लगाए बैठे थे. देखने से हे लगता था के वो परदेसी है जो यहाँ गलत मकसद से हे आये थे. देखने में तीनो हे दिहाड़ी मजदूर से लगते थे लेकिन सिर्फ देखने में. पतले, हलकी बेतरबी दाढ़ी और औसत kad-kaathi के ये लोग बस रात के लिए जैसे यहाँ डेरा लगाए थे.

"ऐसा है भाई दिनु, हम लोग है बंधुआ अवधेश बाउजी के. जान की कोनो कीमत नहीं हमारी उनकी नजर में पत्र 50 हजार माँ हमार बीत्या का ब्याह हो जाए और बिंटू भी पढाई वास्ते बड़े स्कूल दाखिला ले सकत. यह निश्चिन्त है भाई के हम वापस न जा सकत तुहार भोजाई के पास. लेकिन कोनो गम नहीं भाई." मांगे नामक ये व्यक्ति कोई 38-39 बरस का था और उसका मंतव्य स्पष्ट था उस काम के लिए जिसको करने वो घर से इतनी दूर आया था. तीसरा वाला तोह बस खामोश बैठा पन्नी से मुर्गा निकल कर परोसने में लगा था.

"हम क्या कहत रहे मांगे भैया के यह जो गाँव है न यह संकरा है और ावन जवान वास्ते 2 हे रस्ते लगत रहे. यह सब हम पता लगाई रहे के ब्याह के कार्यक्रम वास्ते और बा देखत यह चीज समझ आ रही है के मौत निश्चिंत है. यह रस्ते से शहर से भोजाई (रेखा) आवत रही और यहाँ मुश्किल है. आगे हवेली में रेहत रही सब लेडीज़ तोह उधर प्रवेश वर्जित. यह मंदिर है जहा हम अंजाम दे सकत इस काम को लेकिन इन्ही भी रिकास कोनो काम नहीं.", दिनु ने एक कागज़ बिछाते हुए गाँव का नक्शा हे सामने बिछा दिया. मांगे के साथ साथ तीसरा व्यक्ति भी आग की रौशनी में वो सब देखने लगा जो नक़्शे पर चित्रित था.

"ऐसा है दिनु, इस बार अवधेश भैया कोनो देसी कट्टा न दिए मांगे भैया को. बरेली की राजकुमारी दिए है जा की पहुंच 20 हाथ से ज्यादा होवत रही. हवेली से लगन वास्ते जावत रहे मंदिर तोह ावन समय सामने से हे पीतल भर दायी यह भोजाई के. भीड़ माँ गाडी तोह जल्दी घुमत नहीं तोह तुम रहिये चारा की गाडी लिए तैयार और हम इन्हे लेके मिलेंगे इस हवेली के पास, सड़क किनारे बंद हवेली है ये (बबिता की हवेली). चारा गाडी न देखत रहा कोई और अगर हम पकडे जाए तोह 25000 हमार बिटुआ को देई डीओ. माँ नहीं है उसकी और हम हे अकेले है जो है सो है.", तीसरे वाले ने तोह एकाएक सबकुछ समझा दिया था. बाकी दोनों तोह हैरत से इस साथी को देखने लगे.

"तू हुंका बचवन चाहि हरिया? इत्ता तोह कोनो हमर बारे न सोचत रही. का हुई जो तुम्हार ज़िन्दगी खतरे में पड़ जाई?", मांगे ने बड़ी चिंता और हैरत से ये कहा तोह सामने वाला व्यक्ति थोड़ा मुस्कुरा दिया.

"मांगे भैया, हमार तोह न जोरू है न बीत्या. एक मुन्ना है तोह यह के ज़िन्दगी बन्न जाये बस इत्ती सी चाह है. तुम्हारी गोली भी हमको सीने पे लेनी पडत रही तोह कोनो गम नहीं. दिनु का भी परिवार है तोह उसको सब से दूर हे रखियो.", हरिया ने एक सांस में हे अपना गिलास हलक से उतारने के बाद सिर्फ नमक चाट कर आँखें बंद करते हुए अपनी दिल की बात कही.

"तुम कबि छोटी बात न करात रहे भैया लेकिन आज दिल जीत लिए हमार. हम भी वादा करात रहे की या तोह ेकन साथ जाएंगे नहीं तोह कोनो हे न जा पायी.", दिनु ने जज्बाती होते हुए प्लास्टिक की बोतल से तीनो के गिलास में शराब खाली करते हुए कहा तोह इस बार जाम अलग तरह से भिड़ाया गया. तीनो ने इसको ज़िन्दगी के नाम किया और पीने के साथ साथ मुर्गे का लुत्फ़ लेने लगे. हवा से उड़ती हुई वो तस्वीर अलाव में जा गिरी जिसकी परवाह इन्हे जरा भी न थी. ख़ुशी में दिनु ने तोह वो नक्शा भी जलती आग के हवेली कर दिया और तीनो हे वही पसर गए. हरिया कोई kavita/geet गए रहा था इस सुरूर और अपनी ज़िन्दगी के लिए

'सावन की पवैया गायब

पोखर, ताल, तलैय्या गायब

काट गए सारे पेड़ गाँव के,

कोयल और गौरैय्या गायब

भोर हुई तोह चाय की चुस्की,

चना, चबेन, लैय्या गायब

भोजाई देखत रही रास्ता,

शहर गए थे भैय्या गायब' (क्रेडिट: कुंवर दीपक सिंह बदल)

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"एक लालच की बात करू? बुरा लगे तोह कुछ भी मैट कहना और मैं बात वही रोक दूंगी.", इस मादक उजाले में अर्जुन बस मूकदर्शक सा देख रहा था के आज सपना है या भगवन ने उसके दिल की सुन्न ली है. जालीदार कपडे से अपने एक उरोज को अनावृत करती रेखा ने अपना पहला हुआ निप्पल उसके मुँह में देने के बाद कुछ देर बस सर को सहलाया और जैसे हे अर्जुन का हाथ ज्यादा की चाह में उनके पुष्ट नितम्ब पर आया तोह दोनों के होंठ आपस में जुड़ गए. किसी भी चुम्बन में ये मिठास या स्वाद न था जो अर्जुन ने भोगा था. ये सर्वोपरि था और इसके लिए अर्जुन सिर्फ किस्मत सहारे हे था. न मांग न सवाल, बस मिला तोह जैसे मन्नत.

"आपको और लालच? आप ऐसा कह कर शर्मिंदा न करे माँ. मेरा तोह बस यही सपना है के आप जो कहे वो मैं करू लेकिन आप कुछ कहती हे नहीं.", अर्जुन उस अनावृत सख्त गोले को देख रहा था जो अभी उसके होंठो से अलग हुआ था. कैसे माँ के उरोज इस उम्र में भी इतने सख्त और आकर्षक थे.

"सुना है आजकल यही कहा जाता है के प्यार किसी आकर्षण से होता है. लेकिन मेरा नजरिया अलग है अर्जुन और हो सकता है ये सामाजिक न हो. शरीर को छूना तोह हाथ या अधिकार से हो सकता है लेकिन आत्मा सिर्फ एक बार हे कोई छू सकता है. तुम्हे कुछ इस बारे में विरोध हो तोह बे हिचक कह सकते हो."

"आप मेरी माँ, मार्गदर्शक और एक खामोश दिल होने के साथ वही प्रेमिका है जो बेवजह कुछ नहीं चाहती. मेरी आत्मा तोह वजूद में हे आप लेके आयी हो माँ."

"ये अंदाजा कैसे लगाया के मैं कुछ नहीं चाहती? हो सकता है के चाहत इतनी बड़ी हो के तुम अभी वो देने के लिए तैयार हे न हो और मैं इन्तजार में हु. हर प्रेमिका, माँ और शिक्षक अपने प्रिय से कुछ उम्मीद जरूर रखते है बीटा और मैं कोई अलग नहीं. अब तुम अपने विचारो को विराम दो, कल का दिन बड़ा रहने वाले है.", रेखा जी ने अपना दूसरा सतांन अर्जुन की तरफ बढ़ाते हुए खाली हो चुके पहले वाले को वस्त्र में किया और अर्जुन का सर सहलाती हुई बड़ी मंद आवाज में कुछ गुनगुनाए लगी. अर्जुन कहा संसर्ग का सोच रहा था और अब सब खयालो से दूर बोझिल पलके बंद करता गहरी नींद में जाने लगा. माँ ने बस वो आवरण इसलिए पहना था क्योंकि ये उन दोनों के लिए हे ख़ास था.

अर्जुन के सोने के बाद रेखा जी ने समय देखा तोह तक़रीबन आधी रात हो चुकी थी. चूचक अर्जुन के होंठो से निकला हुआ देख वो भी आहिस्ता से कड़ी हुई और कपडे बदलने के बाद करवट लेती हुई अपने विचारो में खो गयी. आज अर्जुन ने सामने से हे कह दिया था के वो हमेशा खामोश रहती है और सवाल भी नहीं करती. बेटे के लिए वही उसकी सर्वोच्च प्रेमिका थी. अर्जुन की आँखों में आज कितना कुछ था जब वो कमरे आयी थी लेकिन वैसी हे चाहत के बावजूद उन्होंने खुद को बड़ी मुश्किल से रोका था.

'मेरे लिए भी तोह तुम्ही सबकुछ हो अर्जुन. ये सोच कर अपने घर से विदा ली थी की जो अनकहे सपने हमेशा से सिर्फ दिल में रहे वो यहाँ आने के बाद पूरे होंगे. पति हे प्रेमी होगा और मुझे वैसा हे pyaar-sammaan देगा जिसकी कल्पना हर युवती करती है. सुहाग सेज पर हे दिल बिखर गया था जब मुझे मेरा स्थान तुम्हारे पिता ने बताया. सब सुख देने का वादा लेकिन दिल में कोई और पहले से है जिसका सम्बन्ध मरते दम तक रखने का दावा अपने बीवी के सामने भर दिया. पहली हे रात प्यार के बदले फरेब, शायद हे कोई इतना बदनसीब होता होगा. सब कहते थे रेखा लाखो में एक है और इन्होने वही तोह बना दिया मुझे. लाखो में एक अभागिन जिसको मालूम हो के पति के पास देने को वो प्यार हे नहीं जिसके लिए अपना सबकुछ छोड़ मैं एक नए संसार में आ गयी.', आँखों से वो अनमोल मोती सी 2 बूँद बहती बहार आ गयी थी रेखा के चेहरे पर.

'शरीर पर हक़ कैसे जताया फिर उन्होंने? सिर्फ इसलिए की मैं अब उनके नाम लिख दी गयी थी? बचे होंगे तोह शायद मुझे प्यार मिले तोह ये भी सही लेकिन ये और पतित करना साबित हुआ. 22 साल सिर्फ एक जागीर जिसके साथ अपना मैं हुआ तोह जैसा चाहा वैसा संसर्ग किया. खुद को हर तरह से उनके काबिल बनाने की कोशिश की लेकिन कभी इन आँखों ने वो प्यार न महसूस किया जिसका अरमान लिए मैं यहाँ आयी थी. आज तुम ये daasi-pratha बदल कर उन्हें प्यार सीखना चाह रहे हो तोह ये मंजूर नहीं मुझे. जीने की वजह 2 परिवारों का सम्मान और मर्यादा थी लेकिन अब सबसे बड़ी वजह तुम हो अर्जुन. बस वो कोशिश न करो जिस से पहली बार रेखा देहलीज से बहार चली जाए. मेरे बचे और परिवार मेरा आवरण है और इसमें अब कोई और शामिल न होगा.', दिल जैसे इतने जख्म खाये था के वो शायद हे कभी उबार पाए. रेखा के शांत मैं को अनजाने हे अर्जुन के किसी प्रयास ने आहात कर दिया था जो अब सेहन नहीं हो रहा था.

'भोगी कभी प्रेमी नहीं हो सकता. कोई प्रेम के बदले असंख्यों को प्रेम दे उस से शिकायत नहीं लेकिन हर युवती को अपने नीचे लाने के मनसूबे रखने वाला मेरा प्रेमी इस जनम में नहीं होगा. कितने हे दृश्य इन आँखों ने देखे है अर्जुन मैं कैसे किसी को बयान कर दू. सबमे सिर्फ वासना और जोर था, सामने वाला का एक पल ख़याल नहीं. गुजारिश है के ऐसे प्रयास रोक दो, मैं टूट गयी तोह तुम भी एकत्रित न कर पाओगे इस रेखा को.' तनाव और चिंतन के बीच आंसू बिस्टेर पर गिरे और नींद में अर्जुन का हाथ अपनी माँ के ऊपर आया तोह जैसे वो नींद में हे तड़प उठा. रेखा ने पलट कर उन बंद पलकों को देखा था दिल बैठ गया. अर्जुन नींद में हे उनके दर्द से जुड़ गया था.

'मेरे बचे, मैं तेरे पास हु और हमेशा रहूंगी. हमेशा मेरा साया तुझ पर रहेगा, बस रोना नहीं.', सीने के साथ अर्जुन को लगते हुए रेखा ने पल में हे अपने विचारो पर purn-viraam लगा दिया. सब दर्द भूल कर वह बस अर्जुन को सहलाती रही और उसके द्वारा खुद को पकड़ने पर कुछ हे पल में वो भी उस से लिपटी सो गयी थी. रात 1:30 तोह विचारो में हे बज गए थे और आने वाला दिन जाने क्या कुछ समेटे था खुद में.

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भोर हुई तोह शंकर जी भी समय पर उठ खड़े हुए. पानी पीने के बाद नित्यक्रम से निबट कर बस चाय हे पी और 9 बजे तक आने का बोल कर सितारा देवी का आशीर्वाद लेते हुए घर के लिए निकल पड़े. सुनसान सड़क और हलकी चलती हवा से मैं ाचा महसूस कर रहा था. गाँव से बहार निकलते हे एक नजर बड़ी हवेली पर पड़ी तोह बहोत कुछ याद आ गया. बचपन, सुशीला के साथ वो bhai-behno वाली मस्ती और लड़ना झगड़ना. चलती कार स्वतः हे धीमी हो गयी. बहोत समय बाद यहाँ मरम्मत हुई थी और अब ये कुछ कुछ वैसी हे लग रही थी जैसी बरसो पहले थी बस aas-paas बहुत कुछ बदल गया था और कुछ घने वृक्ष गायब थे.

'वक़्त. बस वही तोह लौट नहीं सकता कभी.', अपने आप से इतना कह कर एक सिग्रत्ते सुलगा ली और अपने रस्ते हो लिए. इस विवाह से निबटने के बाद क्या करना है इसका विचार मुस्कान से मिलने के बाद हे बना लिया था और बस ये आज का दिन जैसे तैसे निकलना भर था. मुख्या मार्ग से घर तक आने में 20 मिनट हे लगे थे. सही 5 बजे कार घर में कड़ी करते वो hath-mooh धो कर अपने पिता के पास आ बैठे.

"सब सही है न शंकर? कुछ रह गया हो तोह जाते हुए ले जाना. बड़ी भाभी बिजेन्दर के साथ हे आने वाली है उधर.", अपने बेटे से बात शुरू करते हुए पंडित जी ने चेहरे पर झाग बनाते हुए खुद को आईने में देखा.

"हाँ, सब सही है पापा. इतना कुछ taam-jhaam तोह है नहीं इस तरफ. Gine-chune लोग आएंगे और भोजन करके wapis.Samay लगेगा तोह वो फेरो में लगेगा. विदाई 2-3 बजे तक हो जानी है. आपकी तरफ थोड़ा ज्यादा काम रहने वाला है.", शंकर के आने का पता कौशल्या जी को भी लग गया था और वो तुलसी में अर्घ देने के बाद रसोई में चली गयी.

"काम तोह वह भी कुछ नहीं है. बरात आएगी 50-60 लोगो की और 100 लोग शायद हवेली की तरफ से हो बाकी गाँव वालो का भोजन करक्याकरम अलग से धर्मशाला में है जिधर हमारा कोई काम नहीं. तुम बड़ी गाडी ले जाना अपने साथ और संजीव भी 4 लोग इलो में ले जायेगा. सोमबीर सिंह की तरफ जितने काम लोग जाए उतना हे ठीक है.", रामेश्वर जी के ऐसा कहने पर शंकर को आभास तोह हो हे गया था के उनके मैं में चिंता है किसी बात की लेकिन सवाल पूछने का दिल नहीं हुआ.

"वैसे कौन कौन जा रहा है आपके साथ.?"

"सतीश की गाडी बड़ी है तोह उसमे 6-7 लोग आ हे जायेंगे और बाकी जिसको अर्जुन अपनी गाडी में जगह दे वो उसके साथ बैठ जायेगा. विवाह के बाद तुम्हारी माँ और मैं आज रघुबीर के हे घर रुकने वाले है. सतीश बाकी सबको ले आएगा और अर्जुन के साथ जाने वाले अर्जुन के साथ हे वापिस आएंगे.", रामेश्वर जी रसोर गाल पर चलते हुए अब चुप हुए तोह शंकर को थोड़ा अजीब लगा अर्जुन के बारे में जानकार.

"वो कार उसकी है तोह ये मतलब तोह नहीं पापा के अपने साथ साथ वो बाकी सबको खतरे में डाले. आपने इजाजत कैसे दे दी की वो शहर से बहार कार लेके जा सकता, खुद चला कर.?"

"तुम्हारा कोनसा पेच ढीला है भाई? कल उसका पक्का लाइसेंस आ गया घर और रात को वो मुझे दिखा भी गया के अब मैं उसको मन न करू. तुम 15 के थे जब जीप चलने लगे थे और वो भी बाप की सरकारी, बिना पूछे ले जाने वाले. अर्जुन को मैं मन नहीं करने वाले, तुम्हे करना है तोह करो.", वापिस अपनी दाढ़ी साफ़ करते हुए वो खामोश हुए तोह कौशल्या जी दोनों के लिए चाय ले आयी.

"अब आप क्या समझने लगे इसको इतनी सवेरे?"

"माँ कुछ नहीं बस मैं पापा से कह रहा था के वो अर्जुन को थोड़ी ज्यादा हे ढील दे रहे है. खुद गाडी चला के जाना ठीक नहीं उसका वह गाँव तक लेकिन ये कह रहे है के उसका पक्का लाइसेंस आ गया है तोह रोकेंगे नहीं.", शंकर जी को लगा था के अब माँ उनकी तरफ से पापा से बहस करेंगी.

"हाँ सो तोह है जी. अर्जुन को अभी से आदत डालनी चाहिए थोड़ा बहार भी कार चलने की. ये लोग घर नहीं होते तोह सतीश भाई को परेशां करना पड़ता है या फिर तारा को. अब आगे पूर्णिमा के घर में चक्कर लगने वाले है तोह अर्जुन को रस्ते से ाचे से पता होने हे चाहिए.", अपनी माँ का ऐसा जवाब सुन्न कर अब शंकर ने बहस करना बंद हे कर दिया. रामेश्वर जी चेहरा साफ़ करते हुए मुस्कुराते हुए शंकर को देखने लगे.

"बरखुरदार, अब जरा सुनो अपने बाप की भी बात. आइंदा से मैं अर्जुन को कोई भी aadesh-nirdesh नहीं देने वाला हु. पढाई करे, खेले कूड़े और अपनी ज़िन्दगी जीए. और तुम करोगे नरिंदर और राजकुमार के साथ घर के सारे काम. हॉस्पिटल जाओ, विवाह के सभी काम देखो और मुझसे सलाह करो या अपनी माँ से. वो लड़का अगर मुझे रोजाना के काम से अलग कुछ करता दिखा तोह ठीक नहीं रहेगा.", रामेश्वर जी ने एकाएक अर्जुन को सब नियमो और दायित्व से आजाद कर दिया था. शंकर जी के लिए ये बात चौकाने वाली थी.

"और वो हाथ से बहार निकला तोह क्या करेंगे आप? उसको अपनी नजर में रखने की जरुरत है पापा, आप हे तोह कहते है के वह जल्दी भटकने लगता है."

"मैंने भटकना नहीं कहा था शंकर, ऊर्जा कही और न लगाने लगे ये कहा था. जो कर रहा हु तुम्हरी हे बेहतरी के लिए कर रहा हु. ज्यादा अपने करीब रखूँगा तोह कही वह तुम्हारे हे पीछे न पड़ जाये. आज वो जहा जा रहा है उसको आजाद जाना चाहिए नहीं तोह बातें कब और कहा से निकल आये पता नहीं चलता.", रामेश्वर जी खड़े हुए और इधर शंकर का सर कुछ सोच कर झुक गया.

"वो कुछ गलत नहीं कर रहे शंकर और तुझे ये समझना हे होगा की अर्जुन की अपनी एक ज़िन्दगी है. कल जो भी हुआ इस से इनके दिल को कितनी ठेस लगी है ये तुम समझ नहीं सकते. अर्जुन को वैसे हे जीना होगा जैसा वो हमेशा रहता था यहाँ वापिस आने के बाद. इसमें हे सबकी भलाई है और सबसे ज्यादा तुम्हारी.", कौशल्या जी ने अपने बेटे को समझते हुए सर पे हाथ फिराया और अंदर चली गयी.

'माँ अब तोह मैं चाह कर भी कुछ बदल नहीं सकता.', शंकर ने चाय ख़तम करते हुए गलियारे से अंदर का रुख किया तोह पसीने में भीगा अर्जुन सिर्फ निक्कर और बनियान में सीढ़ियों से निचे आ रहा था. पिछले एक घंटे से उसने जम्म कर पसीना बहाया था उस छोटी व्यायामशाला में.

"कैसे हो पापा? आज आप इतनी जल्दी?", अर्जुन ने तोलिये से चेहरा साफ़ करने के बाद उनके पाँव छुए और फिर कुर्सी पर बैठ गया. दादी उसका भी दूध और खुराक ले कर इधर रख गयी थी.

"हाँ वापिस भी जाना है सबको ले कर. तुम आज बहार नहीं गए दौड़ लगाने?"

"नहीं, परसो से जाना शुरू करूँगा पापा. अभी आचार्य जी बहार है और आज दीदी भी आराम कर रही थी. अकेले जाने का दिल नहीं करता.", अर्जुन की बाजू पर उभरती मछली 16 इंच की हो चली थी जहा वासा की lesh-matra झलक न थी. पहले वाला भारी जिस्म अब एक सम्पूर्ण कटाव लिए तराशा जा चूका था.

"ाची बात है के उतना हे पसीना तुम यही निकल कर रूटीन खराब नहीं कर रहे. वैसे तुम्हारी माँ कहा है? कमरा तोह खली दिख रहा है.", शंकर जी ने अपनी बीवी को जीकर किया तोह अर्जुन ने गिलास निचे रखते हुए कहा.

"आपके कपडे यही बाथरूम में टांग कर वो ऊपर हे गयी है. बाकी कपडे कमरे में टेबल पर हैं. दीदी को उनकी मदद चाहिए थी इसलिए माँ उनके पास गयी है.", अर्जुन ने जानकारी दी और शंकर जी बिना कुछ कहे स्नान करने बाथरूममे चले गए. ऊपर वाली मंजिल पर दोनों हे तरफ आज लड़कियों ने कब्ज़ा जमाया हुआ था और दादी ने कह दिया था के कोई ऊपर नहीं जाएगा. न संजीव, न शंकर या और कोई. दूध ख़तम करके अर्जुन भी बहार बगीचे में पानी देने चला गया.

"छोटे तू यही सब करता रहता है क्या?", संजीव भैया बहार वाले आँगन के बाथरूम से नाहा कर बहार निकले तोह कही कही चोट के निशाँ उजागर थे लेकिन कसरती बदन इनका भी आकर्षक था. अर्जुन को peid-paudho में खोया देख उन्होंने जिस्म पर बनियान पहनते हुए ख़ामोशी भांग की तोह अर्जुन मुस्कुरा दिया.

"यही सब ठीक है भैया नहीं तोह दादा जी इस बार मुझे कोई ढील नहीं देने वाले. वैसे भी ये उस सब से ज्यादा ठीक है.", कल दोनों हे भाइयो को जम्म कर फटकार लगी थी पंडित जी से. और यही वजह थी की रेखा जी भी अर्जुन के लिए चिंतित हो गयी थी.

"अपने थानेदार जी दिल के बड़े ाचे है यार. वो हमेशा सही कहते है और तुझे भी तोह मैंने समझाया था न के सब उन्हें हे करने दे जो ये हमेशा करते आ रहे है. वैसे सच कहु तोह ज़िन्दगी सबसे ाची भी यही है मेरे भाई. तू सबके साथ और सब तेरे साथ. ये छोटी छोटी खुशियां, एक दूसरे के काम करना और घर को घर बनाये रखना हर किसी के बस की बात नहीं. सबको ऐसी जिंदगी नहीं मिलती.", संजीव भैया जाने क्या याद करने लगे थे और अर्जुन उनकी बात सुन्न कर छिड़काव करते हुए बोलै.

"सबको मिलती है भैया लेकिन हमारे चुनाव और चाहत ये सब नहीं समझते. मैं यही तोह कोशिश कर रहा था के जो इस सबसे दूर है उन्हें शामिल करू. लेकिन आप भी सही है, जो जैसा करना चाहता है उन्हें करने दो. अब आदत एक दिन में तोह बदलने वाली नहीं जो 20-25 साल से लगी हो.", अर्जुन ने हाथ बढ़ा कर अमरुद की एक सूखी टहनी टॉड कर एक तरफ रख दी. संजीव भैया भी चलते हुए करीब आ गए. रामेश्वर जी पर दोनों की हे नजर नहीं पड़ी जो कबसे इनको देखते हुए बातें सुन्न रहे थे.

"ये सब छोड़ और तू बस अब वही कर जिस से तुझे ख़ुशी मिले, सबको ाचा लगा और हमारे थानेदार जी को भी बुरा न लगे के तू सही से जी नहीं रहा. अभी सब व्यस्त है, चल आधा घंटा गेम खेलते है.", अर्जुन को पानी बंद करते देख भैया ने वीडियो गेम का सुझाव दिया तोह अर्जुन भी तुरंत पानी से हाथ पाँव धो कर उनके साथ आँगन की तरफ आने लगा.

"एक तोह है हे ऐसा और दूसरा उसके साथ रह कर जड़ बूढी हो जाता है. 6 बजे तुम दोनों वीडियो गेम खेलोगे?", रामेश्वर जी अंदर से तोह बहोत खुश थे लें बहार झूठे गुस्से से कहा और इधर इन दोनों की ये सोच कर फट रही थी की वो तोह पीठ पीछे अपने दादा को थानेदार कह कर बात कर रहे थे.

"वो दादा जी, सबने 8 बजे निकलना है और अभी 6 नहीं बजे पूरे. ऊपर दोनों तरफ तोह दीदी लोग तैयार हो रही है तोह इतनी देर हम करे भी तोह क्या करे?", संजीव तोह अर्जुन को बोलने से रोक हे रहा था लेकिन अर्जुन ने मज़बूरी जताई तोह रामेश्वर जी हंस दिए.

"7 बजे से पहले टेलीविज़न के सामने से हट जाना दोनों नहीं तोह वीडियो गेम बगीचे में दबा दूंगा मैं तुम्हारी.", मंजूरी मिलते हे दोनों भाई जा बैठे अपनी जगह और रामेश्वर जी मेहमान कमरे को बंद करते हुए अपनी रिवॉल्वर को साफ़ करने में जुट गए. बेशक वो ये चलते नहीं थे लेकिन जब भी परिवार के साथ बहार जाते थे तब इसको भी ले कर जाते थे. उन्हें ये पसंद भी बहुत थी और इसको चमकना भी.

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हवेली कितने हे बरसो बाद जगमग हुई थी और आज इतनी सवेरे भी हर तरफ लगी rang-birangi लड़ियाँ मद्दिम रौशनी देती जगमग थी. पारिवारिक लोग और सम्बन्धी सभी हवेली में हे थे और ज्यादातर तोह साढ़े 6 बजे पूरी तरह तैयार भी हो चुके थे. लड़के की बरात 10 बजे निकलने वाली थी और इसके बाद हे लड़की के विवाह का कार्यक्रम शुरू होने वाला था. सामने वाले नोहरे और उसके साथ के एक एकड़ मैदान को समतल करवाने के बाद रात हे शामियाने लगा दिए गए थे. हवेली के अंदर भी अगले और पिछले आँगन को बड़े बड़े टेंट से सजाया जा चूका था. चंद्रो देवी खुद हे घूम फिर कर नाश्ता बना रहे लोगो और सम्बन्धियों को देख रही थी. सुलतान को बिजेन्दर ने यही मंगवा लिया था अपने दोस्त से जो अब बड़ी शान से इस लम्बे चौड़े आँगन में घूम रहा था.

"चरण स्पर्श बड़ी काकी, आपको देख कर मैं प्रसन्न हो गया.", हवेली के बहार एक विदेशी लम्बी कार और जिप्सी आ कर रुकी तोह माहौल कुछ पल के लिए अशांत सा हो गया. 6 सुरक्षाकर्मी जिप्सी से उतर के कार के बराबर आ खड़े हुए. एक ने दरवाजा खोल कर अपने मालिक को उतरने में सहायता की तोह सवा 6 फ़ीट का ये 50 वर्षीया रौबदार व्यक्ति बहार निकला. दूसरी तरफ से भी 2 दरवाजे खुले और 2 युवक भी उतर आये जो इस व्यक्ति के बेटे हे थे. व्यक्तित्व प्रभावशाली था इनका. कान में सोने के कुण्डल, गले में रुद्राक्ष की swarn-jadit माला और ताम्बे कुर्ते के निचे सफ़ेद पाजामे के साथ महंगी चमड़े की चप्पल. एक युवक करीब 27-28 साल का था जो घनी दाढ़ी के साथ साथ औसत तंदरुस्त था. दूसरे वाला 24-25 का थोड़ा आधुनिक और अपने बाप का लाडला.

"तोह आज हमारे दर पर अवधेश मिश्रा खुद पधारे है? और वो भी अपने बेटो के साथ. सदा खुश रहो.", चंद्रो देवी ने आशीर्वाद देते हुए सर पर हाथ न रखा और बड़े बेटे ने बस हाथ जोड़े, छोटा वाला कमर पर हाथ रखे इधर उधर देख रहा था जैसे कहा ले आया उसका बाप इस उजाड़ से गाँव में.

"निमंत्रण आपने भिजवाया हो तोह हम कौन होते हैं ना आने वाले. ये हमारे बड़े सुपुत्र है ब्रजेश मिश्रा और यह वाले हमारे जिगर के टुकड़े भानु मिश्रा. बीटा वो जो तुम्हारे बाबा बताते रहते थे न सोमबीर सिंह जी की बातें, ये उन्ही का घर है और आप हैं हमारी बड़ी काकी आदरणीय चंद्रो देवी जी.", अभी ये सब खड़े हे थे और जल्द हे 5-6 कुर्सियां छायादार जगह में लगाने के बाद सबको पानी दिया गया. भानु ने हाथ से हे मन करते हुए फिर से इधर उधर नजर दौड़ानी शुरू कर दी.

"ाची बात है के तुम अपना कीमती समय निकल कर यहाँ इतनी दूर गाँव तक आये. चाय पानी लो इतने में कोठी का टाला खुलवाती हु. साफ़ सफाई करवा दी गयी है और बाकी नहाने आराम करने की भी उचित व्यवस्था है.", चंद्रो देवी ने इनकी सेवा में 2 आदमियों को नियुक्त किया और बिजेन्दर भी इधर आ गया था अपनी माँ को ले कर. भानु ने अलग हे चेहरा बनाते हुए एक नजर सुशीला सिंह को देखा जो व्हीलचेयर पर थी.

"कैसे हो अवधेश? बिजेन्दर ये तुम्हारे दादा जी के मित्र के बेटे है अवधेश मिश्रा, और ये है मेरा बीटा जिसका ब्याह है.", बिजेन्दर ने पाँव छुए और सुलतान तीनो को सूंघने के बाद सुरक्षाकर्मियों को भोंकने लगा. अवधेश मिश्रा ने जेब से एक सोने का कड़ा निकल कर बिजेन्दर के हाथ में रखा तोह उसने लेने से इंकार कर दिया.

"आशीर्वाद बहुत अंकल, इस सबकी जरुरत नहीं है."

"रख लो बीटा, प्यार से दे रहे है. वैसे तुम्हारा कुत्ता इतना भोंक क्यों रहा है भाई.", दादी ने भी बिजेन्दर को लेने को कहा तोह उसने कड़ा अपनी माँ को पकड़ा दिया. सुलतान को कुत्ता कहने पर थोड़ा बुरा लगा था लेकिन आज वो ऐसा कुछ नहीं करना चाहता था जिस से किसी को ठेस पहुंचे.

"जी सुलतान को ऐसे लोग पसंद नहीं जिनके पास हथियार हो. हवेली के भीतर हथियार लाने की मनाही है.", बिजेन्दर के ऐसा कहने पर भानु ने अपनी कमीज ख़ास अंदाज में ऊपर करते हुए अपनी रिवॉल्वर की झलक दिखने का बचपना किया तोह बिजेन्दर मुस्कुरा दिया.

"ाची बात है के इस हवेली में अब हथियार मन है, वैसे सुदर्शन तोह शौक़ीन था इस सबका."

"बचो को मनाही नहीं है अंकल, वो खेल सकते है जितना दिल करे बस बाकी सबको मन है.", बिजेन्दर का कटाक्ष सुन्न कर भानु की झांटे सुलग गयी थी और बिजेन्दर वह से चला गया तैयार होने. एक तरफ कड़ी नयी फोर्ड एस्कॉर्ट कार पर कुछ लोग फूल लगाने की तैयारी करने लगे थे.

"हवेली की बागडोर अब बिजेन्दर के हाथो में है अवधेश और उसके नियम सभी मानते है.", चंद्रो देवी ने इतना कहा और 2 आदमियों ने यहाँ मेज लगते हुए chai-doodh मिठाई नमकीन इनके सामने लगा दिए. अवधेश मिश्रा ने भी हाथ का इशारा करते हुए अपने सभी सुरक्षाकर्मियों को बहार जाने को कहा. भानु और ब्रजेश की नजर एक साथ सामने से आती इस पारी पर गयी तोह वो दोनों बस देखते हे रह गए. ऋचा नहाने के बाद फ़िलहाल एक साफ़ salwar-suit हे पहने थी, ख़ास ड्रेस उसने बाद के लिए राखी थी.

"दादी आपको पंडित जी बुला रहे है, उन्हें कुछ बात करनी है आपसे.", चंद्रो देवी बाकी सबको अभी आने का कहती अपनी लाड़ली के साथ चल पड़ी. सुशीला सिंह अवधेश से बातें कर रही थी और दोनों भाई इस जाती हुई हिरणी को हे देख रहे थे.

"ये मधुलता के बेटी है अवधेश, ऋचा नाम है इसका. इनकम ताड अफसर बन गयी है और एक साल ट्रेनिंग के बाद चंडीगढ़ ड्यूटी करेगी.", सुशीला सिंह ने परिचय दिया तोह अवधेश ने गर्दन हिलाते हुए कहा.

"ब्याह हो जाना चाहिए बिटिया का भी. ब्रजेश के लिए भी लड़की देख रहे है हम, माइनिंग का सारा बिज़नेस हमारे बड़े बेटे हे देखते है.", अपने बाप की बात सुन्न कर ब्रजेश खुश हो गया था लेकिन भानु के चेहरे पर नाराजगी साफ़ झलक रही थी.

"इसका ब्याह शंकर की मर्जी से होगा अवधेश और ये उसकी हे लाड़ली है.", अब अवधेश के भी चेहरे पर चिंता के बादल छ गए थे ये नाम सुन्न कर.

"चलो भाई जरा कोठी तक छोड़ दो और सब दिखा दो. थोड़ा आराम करने के बाद बिटिया को शगुन दे कर फिर समय से निकलना भी है.", सेवा में लगाए व्यक्ति से अवधेश ने इतना कहा और उठ खड़ा हुआ. वो भी इन्हे ले कर सरपंच के साथ वाले घर की तरफ चल दिया जो चंद्रो देवी की हे संपत्ति था.

"भैया वो लड़की पसंद है मुझे.", एक कमरे में दोनों भाई बिस्टेर पर बैठ गए तोह भानु ने अपने दिल की बात कही बड़े भाई से.

"हमको पता है तुम्हे वो कितनी पसंद आयी है भानु. एक रात वाली पसंद यहाँ नहीं चलती और तुमने नहीं देखा के पापा ये 'शंकर' नाम सुन्न कर कैसे उठ कर चले आये. कुछ ऐसा वैसा मैट करना जिस से उनकी परेशानी बढ़ी. ये हमारा इलाका नहीं है के बन्दुक के दम पर तुम मनमानी करो और सब खामोश रहे."

"यार तुम न सचमुच हे फत्तू हो भैया, बताया था न पापा ने के यहाँ घर में कोई मर्द नहीं है. वो लड़का भी निकल जायेगा बुढ़िया के साथ अपनी शादी के लिए, मौका मिला तोह साली को कही भी दबा कर पेल दूंगा. पसंद आ गयी है तोह अब आ गयी है.", रिवॉल्वर को टेबल पर रखता वह अपने कपडे ढीले करते हुए बाथरूम में घुस गया और ब्रजेश चिंता में सिग्रत्ते सुलगते हुए अपने भाई के बारे में सोचने लगा. वही हवेली के अंदर चंद्रो देवी दबी आवाज में लता को झाड़ रही थी.

"मुन्नी, तूने न्योता दिया न अवधेश को? मुँह खोल और बता के ऐसा क्यों किया जब पता है के ऐसे लोग हवेली में कदम नहीं रखने चाहिए.?", मधुलता नजरे झुकाये कड़ी बहार से तोह शांत थी लेकिन अंदर वो इस औरत को भी मारने का सोच रही थी.

"फ़ोन आया था भाई साहब का माँ जी तोह मैंने यही बताया के आप Bijender-Babita के विवाह की वजह से शहर गयी हो. इन्होने हे खुद को आमंत्रित कर लिया तोह मैं क्या करू?"

"तुमने मुझे तोह नहीं बताया के अवधेश का फ़ोन आया था? आज यहाँ अगर कुछ भी अनहोनी हुई तोह जानती हो परिणाम क्या होगा? सुना है के तेरे भाई ने मेरी पौती पर हाथ डालने की हिमाकत की थी? देखो मुन्नी, जो भी हो ध्यान रखना के सब नियंत्रण में रहे.", मधुलता को जरा भी उम्मीद नहीं थी की उसकी सास ऐसी बात भी कह सकती है और उन्हें चंदरभान के बारे में पता होगा.

"मेरे सामने तोह नहीं हुआ था न माजी. गलती करि तोह फिर मारा गया, इसमें मैं कहा बीच में आ गयी?"

"घर में ब्याह का माहौल है तोह इसको खराब नहीं करना. तुम काम देखो और तैयार हो जाओ, मैं अपने पौटे के साथ जाउंगी और इधर रामेश्वर देखेगा सबकुछ. गलती नहीं मुन्नी बस इतना हे कहूँगी.", चंद्रो देवी ने बात न बढ़ाते हुए मधुलता को सचेत करने के बाद अपने कमरे का रुख कर लिया.

'अगर बुढ़िया को कुछ पता है तोह शादी के बाद ये जरूर कुछ न कुछ करेगी. धमकी भी दे हे दी और फिर झूठा दिखावा करके बता रही है के मैं उसकी बहु हु. साली शीला और उसके लोंदे भी इसका कुछ न कर सके. ये चुटिया अवधेश भी जाने क्या सोच कर अपनी मरवाने इधर आ गया जबकि पता है के वह एक भी पकड़ा गया तोह फसेगा यही.' मुन्नी खुद को तोह समझा रही थी लेकिन अब डर भी था के कही कुछ भेद सामने आया तोह वो भी फंसेगी. 8 बजने तक सब तैयार हो चुके थे और aas-pados की महिलाओ के साथ बिजेन्दर को कुर्सी पर बैठा कर गीत गाये जा रहे थे.

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शंकर जी सफ़ेद रंग का आरामदायक नया कुरता पायजामा पहन कर तैयार हो चुके थे. नाश्ता उन्हें ललिता जे ने करवा दिया था और अब वो अपने बड़े भाई राजकुमार, छोल साहब और पापा के साथ बातचीत में लगे थे. घडी ने पौने 8 का समय दिखाया तोह वह सबको चलने का बोलने के लिए भीतर आँगन में आ गए. माधुरी, प्रियंका और कोमल ने जाने से मन कर दिया था जिस पर रामेश्वर जी ने भी सहमति दे दी थी और वो निश्चिंत भी थे क्योंकि सबने सांझ से पहले हे वापिस आ जाना था.

"भाभी, बिजलिया गिराने की सचमुच कोई उम्र नहीं होती.", शंकर जी आदतन अपनी बड़ी भाभी को छेड़ रहे थे जिन्होंने hari-sunehari साड़ी पहन राखी थी और उनके gore-gadraaye जिस्म पर ये बेहद दिलकश भी लग रही थी. लाल चूड़ियां, गले में मंगलसूत्र, हाथ में 2 कड़े सोने के और उचित लाली के साथ गोल लाल बिंदी. ललिता जी बिजली हे तोह गिरा रही थी.

"हाँ तेरे पे हे गिरा दी मैंने साड़ी बिजली. तेरे वाली को देख और फेर बता के वो बिजली गिरा रही है या तूफ़ान.", उनके गोल चेहरे पर मोतियों सी चमकान वाली मुस्कराहट सचमुच ख़ास थी. हमेशा की तरह मुँहफट और हंसमुख ललिता जी का कोई सांई न था. और सीढ़ियों से उतरती प्रीती ऋतू पर नजर पड़ते हे शंकर जी बस इन बच्चियों को हे देखते रह गए. बिना ब्याह का रेशमी neela-safed सलवार कमीज और वैसे हे रंगो का डुपट्ट लिए प्रीती आज हिंदुस्तानी अवतार में थी. माथे पर एक गोल सफ़ेद बिंदी और कानो में पतली चैन वाले झुमके. भूरे बाल करीने से एक स्टाइलिश छोटी में बंधे थे, साथ हे पंजाबी जूती, पायल और कलाई में नीली सफ़ेद चूड़ियां.

"वाओ, अब लगता है मेरी बेटी सबसे सुन्दर है.", शंकर जी ने प्रीती से मुस्कुराकर कहा तोह ऋतू भी हंसने लगी. आज ऋतू के भी गोर चेहरे पर सिर्फ एक बिंदी और काजल लगा था. समंदर के mile-jule रंगो वाला कमीज और ढीली पटियाला सलवार में वो वैसी हे लग रही थी जैसे अथाह नीला समंदर.

"थैंक यू अंकल. ऋतू दीदी के कपडे है और अलका दीदी ने तैयार किया मुझे.", अभी वो अलका का जीकर हे कर रही थी की अलका, तारा और रुपाली के साथ विक्की भी सलवार कमीज में हे तैयार हो कर इधर आ गयी थी. 6 खूबसूरत नवयुवतियां देख कर शंकर जी को सही लगा था सांगवान जी से वह सुरक्षा लेना.

"मां जी, अब किसका वेट कर रहे हो आप? सब तैयार है तोह निकालिये गाडी.", तारा हमेशा की तरह सबसे हे अलग कपड़ो में थी. फ्रॉक जैसे लम्बे कमीज और निचे बिलकुल चुस्त सलवार और गले में बारीक चैन के बीच कला चमकदार पत्थर. अर्जुन ने ाचा निखारा था अपने प्यार से तारा को जो आज हर अंग तराशा हुआ लगता था.

"तुम्हारी मामी नहीं दिख रही इसलिए खड़ा हु बीटा."

"माँ तोह अपने कमरे में हे है.", कोमल दीदी ने दरवाजा खोल कर रेखा जी को चलने का बताया तोह उनके साथ हे रोमिला और रेणुका भी बहार आ गयी. न चाहते हुए भी शंकर जी के दिल में रोमिला ने हलचल मचा दी थी. ग्रीक सुंदरी ने उनकी हे बीवी की एक गुलाबी साड़ी पहनी हुई थी और वो भी पारम्परिक मेकअप के साथ. सीना शायद रेखा से भी थोड़ा भारी था और रंग कुदरती सफ़ेद. अपने पति को ऐसे संधान की तरफ देखते रेखा जी की भी नजर पड़ हे गयी, जो सबसे आखिर में कमरे से निकली.

"माँ आप कमाल लग रही हो." ये बात प्रीती ने कही थी जिस से शंकर जी का ध्यान हटा तोह अपनी बीवी पर नजर गयी. मधु बुआ का दिया वो जरीदार salwar-kameej आज धन्य हो गया होगा इस खूबसूरती के पर्याय रेखा से लिपट कर. लाल कुर्ती के सामने लकड़ी के सजावटी बटन और किनारे पर बना सुनहरी जरीदार डिज़ाइन. सर पे सादगी से लिया दुपट्टा जो सीने भी ढके था. प्रीती रेखा जी से हे जा कर लिपटी थी.

"तुम भी बहोत प्यारी लग रही हो. नजर न लगे मेरी बेटी को.", रेखा जी ने आँख से काजल निकल कर प्रीती के नजर का टिका लगाया और सभी बहार चलने लगे. अब शंकर जी को अपनी गलती महसूस हो रही थी की उन्हें ये नहीं करना चाहिए था. काम से काम रेखा के सामने तोह बिलकुल भी नहीं.

"अर्जुन कहा है?", ऋतू दीदी ने बहार आते हे सब तरफ देखा लेकिन यहाँ अर्जुन न था. इलो को बहार निकले संजीव भैया भी तैयार खड़े थे. रेखा, रोमिला, रुपाली सफारी में बैठ गए थे जिसका एक शंकर जी ने चालू कर दिया था. रामेश्वर जी ने घडी में समय देखा तोह ठीक 8 बज चुके थे और सीढ़ियों से निचे उतरता अर्जुन सफ़ेद खाड़ी के कुर्ते की आस्तीन सलीके से मदद कर आँगन में आ खड़ा हुआ. आज हाथ पर चमड़े के पते वाली ये महंगी घडी थी जो उसको मधु बुआ ने भेंट की थी. काले रंग का 'रे बन' और सफ़ेद कैसे हुए वस्त्रो में अपने बेटे को देख एक पल के लिए शंकर जी भी प्रशंशा कर हे गए.

"सब ऐसे क्या देख रहे हो, चलो अपनी अपनी गाडी में बैठो.", अर्जुन के कहने पर रामेश्वर जी ने उसका कान मरोड़ दिया, हलके से.

"सबसे आखिर में तू हे आया है. इनकी गाड़ियां निकलने दे फिर हम भी चलते है.", शंकर जी ने अपने पिता की बात सुन्न कर संजीव को देखा तोह उसने भी कार चालु कर दी जिसमे आरती, तारा, रेणुका और अलका बैठ गयी. दोनों गाड़ियां घर से निकली तोह छोल साहब ने गेट के पास गाडी लेकर आये मुनीर को रखवाली करने का समझया और बता दिया के वो लोग 3 बजे तक आ जायेंगे. रामेश्वर जी अपने धरम भाई छोल साहब के साथ अगली सीट पर सवार हुए तोह पीछे राजकुमार जी अपनी बीवी और माँ के साथ. अर्जुन अपनी चमकती काली लांसर में बैठा तोह प्रीती ने हे ऋतू दीदी को बगल वाली सीट पर बैठते हुए खुद पिछली बड़ी सीट पर कब्ज़ा जमा लिया.

"ये तुम्हारा पर्स दिया था माँ ने"

"और ये रुमाल." ऋतू दीदी ने पर्स और प्रीती ने रुमाल आगे बढ़ाया तोह अर्जुन ने गियर लगते हुए मुस्कुराते हुए दोनों हे चीज कार के गियर के पास रख दी.

"प्लानिंग ज्यादा हे नहीं करके रखती आप दोनों.?", आगे चलती बड़ी गाडी के पीछे हे वो चल दिया. एक नजर ऋतू दीदी के महकते हुस्न को देखने के साथ हे बीच वाले आईने से प्रीती को भी निहार लिया था उसने. गाडी में अलग हे मदहोशी भर गयी थी दोनों के आते हे.

"वैसे प्रीती तुम्हे यहाँ बैठना चाहिए था.", ऋतू ने अपनी सीट के लिए प्रीती को कहा तोह प्रीती ने कद वाला बटन दोनों के बीच से हे दबाते हुए जो जवाब दिया उस से दोनों भाई बहिन एक पल के लिए निरुत्तर हे हो गए.

"फिर आप इसकी गॉड में बैठ जाती और हम कही कंबाइंड हनीमून पर तोह चले नहीं जो ऐसा करेंगे. शादी में जा रहे है और आगे चलती गाडी में जो बैठे है उनके किसी के भी नजर का चस्मा नहीं लगा हुआ."

"तू मार खायेगी मेरे से. मैं तोह इसलिए कह रही थी की ये सीट तेरी हे तोह है.", ऋतू दीदी ने शर्म के साथ हे मुस्कुराते हुए कहा और अर्जुन ने गाडी एक तरफ रोक दी.

"आप भी पीछे बैठ जाइये दीदी और कोई सवाल नहीं.", अर्जुन ने जैसे हे ये कहा ऋतू भी समझ गयी की अर्जुन प्रीती को वही मान देना चाहता है जो वो देने की कोशिश कर रही थी. अगली गाडी धीमी हुई थी लेकिन अब दोनों हे पीछे बैठ गयी तोह अर्जुन ने सड़क पर ध्यान देते हुए कार की रफ़्तार 60 के पार कर दी. हलकी आवाज में गाने चलने के साथ हे पीछे बैठी दोनों लड़कियां भी बातें करने लगी और अर्जुन बस बिपास से निकलते इस रस्ते को देखने लगा. थोड़ी आगे निकलते हे अर्जुन ने ध्यान दिया तोह अब एक जिप्सी दादा जी के आगे चल रही थी और उसकी कार के पीछे.

"फीलिंग विप जैसी आ रही है दीदी. आपने देखा दादा जी का कमाल, अपने पीछे सिक्योरिटी है और आगे भी.", प्रीती ने ध्यान दिलाया तोह ऋतू दीदी ने भी गौर से देखा.

"वो तोह कोई प्राइवेट सिक्योरिटी है, पुलिस नहीं लेकिन सबकी ड्रेस एक जैसी है.", ऋतू दीदी का निरिक्षण भी कमाल का हे था. और उधर शंकर जी सफारी को 100 की रफ़्तार से चला रहे थे वही संजीव बिलकुल अपना चाचा के बराबर कार दौड़ा रहा था. दोनों गाँव एक दूसरे से विपरीत थे और इनका शहर ठीक बीच में.

"चाचा जी गाडी क्यों रोक दी.?", संजीव ने कार सड़क से उतारते हे सफारी को एक तरफ रुकते देख खुद भी गाडी थोड़ा आगे लगा कर रोक दी. शंकर जी के पास भुप्पी को खड़े देख संजीव ने चरण स्पर्श किये और देखने लगा.

"शंकर भाई सांगवान चाचा ने 10 लोग तोह हवेली वाले हिस्से में लगवा रखे है और 10 मंदिर के बराबर. यहाँ भी 3 लोग रहेंगे और 3 गाँव से उधर जाते रस्ते पर. मैं मंडप के पास हे रहूँगा और ये दोनों आदमी हवेली की छत पर. सुना है अवधेश मिश्रा वह दूसरी शादी में आया हुआ है, उमेद ने फ़ोन पर चाचा को बताया थोड़ी देर पहले तोह उन्होंने वह भी 12 लोग भेज दिए है 2 जिप्सी के साथ.", भुप्पी ने रिवॉल्वर लोड करके शंकर की तरफ बधाई तोह उनोहने मन कर दिया.

"मेरी डार्लिंग गाडी में हे राखी है जानी, तू बस मेरे साथ ब्याह के मजे ले. अवधेश इधर ऐसा वैसा कुछ नहीं करेगा और अगर गलती की तोह वो गज्जू के निशाने पर है. बाकी बात उधर चल के करते है, मुझे कुछ जरुरी बात करनी है तेरे साथ.", शंकर जी ने रुपाली को इशारा से अपनी माँ के पास बैठने का कहा और भुप्पी को बगल में बैठते हुए वो हवेली की तरफ आ गए. लोगो के खाने पीने का प्रबंध यहाँ भी ाचे से किया गया था और हवेली के सामने वाले नोहरे में हे शामियाने लगवा कर एक कतार में 20 बड़ी टेबल खाने के बर्तनो से सजने वाली थी. महिलाओ और लड़कियों को हवेली के अंदर ले जा कर खुद शंकर जी ने हे Akshara-Muskaan से उनका परिचय करवाया और साथ हे सितारा देवी से भी.

"ताई आप सबसे jaan-pehchaan करवाओ मैं जरा बाकी सब देख लेता हु.", हवेली के बहार वाले आँगन में हे महिलाओ के लिए पंडाल और टेंट लगवाया गया था जहा फ़िलहाल तैयारी चल रही थी. अक्षरा सभी लड़कियों को ले कर अपने बहिन के कमरे की और चली गयी जो पहले बबिता का होता था.

"भुप्पी, मेरे ऊपर नजर कौन रख सकता है? या नरिंदर पर? ऐसी नजर की सामने वाले को हम दोनों भाइयो की हर वक़्त की खबर रहे.?", संजीव आते हे विकास के साथ काम में लग गया था और ये दोनों बहार लगे टेंट की छाया में खड़े गुफ्तगू करने लगे.

"इम्पॉसिबल है भाई शंकर की तेरे ऊपर नजर राखी जा सके. तेरे बारे में तोह सिर्फ तुझे हे पता होता है और रही नरिंदर की बात तोह उसका तोह रकबा इस हवेली जितना है. नजर रखने की जरुरत हे नहीं क्योंकि वो वह घर और अपने काम के सिवा कही नहीं जाता. दिक्कत क्या आ रही है और जरा तफ्सील से बता.?"

"बिंदु. बिंदु का कनेक्शन है किसी ऐसे से जो गाँव का हे है उनके और वो फ़ोन करता रहता है उसको जिस से हमारी सूचना बिंदु को मिलती रहे. एक कड़ी है ये इंसान जो परछाई जैसा है. परछाई की कोई सूरत नहीं होती और न उसको पकड़ सकते.", शंकर जी ने ठन्डे का एक गिलास भुप्पी की तरफ बढ़ाया और एक खुद उठा लिए इस सेवक से जो कैटरिंग वालो की तरफ से काम कर रहा था. भुप्पी के गंभीर चेहरे पर दुनिया जहाँकि सोच आ चुकी थी इस समय.

"बहनचोद ऐसा कौन फन्ने खान आ गया बे जो तेरी सूचना रख सकता है? कोई तोह झोल है शंकर और अगर ऐसा है भी तोह अब तू निश्चिंत हो जा. गाँव में आबादी हे कितनी है वह? 5000 मुश्किल से तोह फ़ोन के कनेक्शन होने हद्द 100, देख जरा अब इस परछाई की माँ का भोसड़ा."

"भुप्पी बात तेरी ठीक है लेकिन वह 3 पीसीओ है और फ़ोन वही से हुए होंगे क्योंकि इंटरनेशनल सुविधा तोह हवेली वाले फ़ोन में भी नहीं है. सिर्फ उमेद के घर है और वह तक मजाल नहीं के कोई घुस भी सके. पीसीओ का हम कुछ कर नहीं सकते.", आसपास छिड़काव करके मिटटी को ाचे से बैठाया जा रहा था तोह दोनों हे चलते हुए थोड़ा आगे की तरफ हो लिए. सुरक्षा चौकस थी यहाँ तोह उन्हें कोई डर न था.

"पीसीओ की डिटेल भी निकल जाती है मेरे भाई. और गाँव से इंग्लैंड नंबर मिलते हे कितने लोग होंगे? हाँ वो मैं सड़क वाले पीसीओ पर थोड़ी ज्यादा म्हणत हो सकती है. बिंदु का फ़ोन नंबर मिल सकता है क्या?"

"मिल जायेगा, बिन्ना परेशानी."

"बस फिर अब एक बार पर वो नंबर किसी भी पीसीओ से मैच कर जाये फिर जो भी घंटी बजायेगा उसकी मैं बजा दूंगा. तू निश्चिन्त रह और काम देख. मैं भी जरा संजीव से बतला लू." यहाँ 9 बजे अब काम jor-shor से शुरू हो चूका था. खाने का कार्यक्रम 10 बजे से 1 बजे तक था जो घंटा ज्यादा भी चल सकता था और बरात का समाया 11 बजे का था, फेरे भी 1 से 2 के बीच होने वाले थे हवेली से 200 गज दूर स्थित मंदिर में. यहाँ पर सवेरे 7 बजे से नजर रख रहे दिनु की हवा खुश्क हो गयी थी ऐसी घेरा बंदी देख कर. सफ़ेद कमीज और काली पंत में वो कैटरिंग वालो की वेशभूषा में गली और नोहरे में काम कर रहा था. कुछ सोच कर वो खली बाल्टी लिए एक तरफ निकल चला जहा शायद उसके बाकी दोनों साथी थे.

"मांगे भैया, जोर की घेराबंदी है यह तोह. यह भोजाई हम देखे अभी 30 मिनट पहले और उनके साथ और भी कई पारी जैसी लोंड़िया आयी हुई हाँ. 8 आदमी असला लिए दोनों तरफ नजर रखे है तोह ऐसे में हाथ हिलने से पहले शरीर माँ 8 नया छेड़ बना देई ओह ससुरे.", दिनु यहाँ मंदिर की बगल में घास काट रहे मांगे को सब सूचना देने लगा तोह वो वैसे हे घास तराशते हुए धीमी आवाज में जवाब देने लगे.

"इधर भी कोनो अलग हाल नहीं दिनु. 6 आदमी मंदिर के aaju-baju पहरा दे रहे.", खड़े होते हुए मांगे ने खाली बाल्टी में नलके से पानी भरना शुरू किया तोह दिनु कपडे से अपना चेहरा साफ़ करने लगा. अब खिचड़ी दाढ़ी की जगह चिकना चेहरा था उसका, शेव करने की वजह से. हरिया भी एक साइकिल लिए इधर हे चला आया. करियर पर हरा चारा बंधा था और सर पे अंगोछा. जेब से बीड़ी निकल कर वो साइकिल पर स्टैंड पर लगता किनारे की पटरी पर बैठ गया.

"एक काश हुंका भी लगवा दो भैया.", दिनु ने अभिनय करते हुए ऐसा कहा क्योंकि सामने से हे कुछ लोग मंदिर में जा रहे थे. अब दोनों हे अलग अलग बीड़ी जलाये बैठे थे. दिनु ने इशारे से मांगे को करीब आने को कहा तोह वो बाल्टी वही छोड़ कटी हुई घास उनके करीब बैठ कर एकत्रित करने लगा.

"बहार वाली हवेली के पास भी पहरा है भैया और छत्त पर भी. आप दोनों निकल लो इन्हे से, हम कर दायी यह मैडम का काम. तमंचा हमार हवाले कर देयो भैया, छिपाने में भी दिक्कत न होएगी.", हरिया की बात सुन्न कर मांगे ने विचार करते हुए जवाब दिया.

"काम दिनु करेगा हरिया. इसके पास वर्दी भी है और कोनो शक भी नहीं करेगा. तुम दूसरे रस्ते पहुँचो, हम भी वही मिलते है. पंडित कह रहे के 1 बजे इन्हे रसम होगी, दिनु मैडम के साथ आ सकत है आराम से और बाहिर से हे निशाना लगा कर ये दिवार कूद के सीधा गाँव से बाहिर. ओह बाजे का आवाज निकल कर शोर मचा देंगे तोह गोली की आवाज डब्ब जाई."

"ठीक है भैया, यही सही रहेगा.", अभी वो बात कर रहे थे के दिनु के गाल पर ये करारा तमाचा लगने से बीड़ी दूर जा गिरी. मांगे अपना काम करता रहा लेकिन हरिया तैश में आ गया. दिनु की आवाज सुन्न कर ख़ामोशी से साइकिल उठा कर वो सीधा चल दिया.

"मादरचोद भोस्डिके के 150 रुपये बीड़ी फूंकने के दूंगा क्या मैं तुझे? तेरी माँ साफ़ करेगी वह जो बर्तन का ढेर लगा है? भोस्डिके के गन्दी नाली के कीड़े काम करना नहीं और लात साहब की तरह यहाँ बीड़ी पीते हुए कामचोरी कर रहे है.", ये मोटा सा अधेड़ आदमी कैटरिंग का ठेकेदार था और जब सिर्फ तमाचे हे दिल नहीं भरा तोह एक लात कस के दिनु के पिछवाड़े पर जमा दी.

"गलती हो गयी सेठ जी. ाःह.. जा रहे हम उधर हे, पानी लेने अभी आये थे इन्हे तोह बीड़ी मांग ली. माफ़ कर दो सेठ जी हम अभी सफाई कर देते है.", गांड मसलता वो मैं मसोस कर पानी की बाल्टी लिए उधर हे चल दिया जहा से आया था. मांगे ने बेशक देखा नहीं था लेकिन आवाज सुन्न कर खून तोह उसका भी खोल गया था.

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सोमबीर सिंह की हवेली के बहार गाड़ियों का काफिला रुकते हे शंकर जी ने पहले सुरक्षा वाली अगली जिप्सी का रुख किया. यहाँ उन्हें हैरानी हुई की गुलाटी खुद हे इन्हे ले कर आया था. सफ़ेद उजली कमीज जो हमेशा वो हॉस्पिटल में पहनता था और खाखी पतलून के साथ वैसे हे जूते में वह यहाँ भी डॉक्टर हे लग रहा था.

"यार ये सब क्या है मेहुल?"

"चाचा जी, सांगवान चाचा ने इन सबको भेजा और मैं आपके साथ रहने वाला हु. आप अंदर मुलाकात कीजिये इतने मैं इन्हे समझा देता हु के ये कहा कहा निगरानी करेंगे. हवेली के अंदर तोह कोई नहीं जायेगा लेकिन मंदिर और यहाँ बहार की सुरक्षा मैं लगवाता हु.", गुलाटी ने पंडित जी के सामने बड़े सांगवान जी का नाम लिया तोह वह बस मुस्कुरा दिए. गुलाटी का गाल सहलाते हुए उन्होंने उसको भी फारिग होते हे अंदर आने का कहा.

"चलो भाई सब उतरो और ये अर्जुन कार में हे क्यों बैठा है?", कौशल्या जी पास चली आयी तोह पंडित जी ने अर्जुन के कार से बहार न निकलने पर सवाल किया.

"दरवाजा इस तरफ से भी खोल दो.", कौशल्या जी जवाब देती उस से पहले बिजेन्दर ने गेट पर खड़े व्यक्ति से कहा. एक बड़ा दरवाजा पूरा खुला था और अब दूसरा खुलते हे अर्जुन ने कार इधर बढ़ा दी. दिवार के करीब हे रखते हुए सही जगह पर कार लगते हुए अर्जुन बहार उतर आया.

"शादी मुबारक हो बड़े भैया.", अर्जुन ने दूल्हे की पोषक पहने खड़े बिजेन्दर को गले लगते हुए कहा. सिर्फ पगड़ी सेहरा हे बाकी था जो वो मंदिर में धोक लगाने के समय हे पहन ने वाला था. चंद्रो देवी के साथ हे पूर्णिमा जी और राजेश्वरी भी इधर आ गए थे.

"थैंक यू सो मच अर्जुन. और मुझे माँ ने बता दिया था के तेरी गाडी यही लगने वाली है. चरण स्पर्श दादा जी, दादी जी.", बिजेन्दर ने सबसे आशीर्वाद लिया और इधर अर्जुन चंद्रो देवी के गले लगने के बाद पूर्णिमा जी और अपनी चची से भी गले हे लग कर मिला. कार से बहार निकलती ऋतू और प्रीती ने सबको हाथ जोड़ कर नमस्ते की थी जिसके बदले में दोनों को हे बड़ी दादी और बाकी सबसे स्नेह मिला.

"गुड्डी, बबिता के कमरे में ले जा ऋ इन्हे. ख़ास ख्याल रखियो इन दोनुआ का, ऋचा तोह है हे वह.", गुड्डी काकी भी दोनों लड़कियों को प्यार से सर पर हाथ फेरने के बाद अपने साथ ले गयी. यहाँ अर्जुन अपनी सुशीला बुआ से मिलने बिजेन्दर के साथ हे अंदर चल दिया और चंद्रो देवी इन सबको ले कर बैठक की तरफ चल दी. यही लोग थे जो उनके बुरे समय से ले कर आज तक साथ रहे तोह इनका सत्कार ख़ास था.

"भैया, वो ऋचा तोह आप हे देखो. मुझे तोह वो दोनों चाहिए या काम से काम वो भूरे बालो वाली. तबाही माल और वो भी इस गाँव में.", भानु अब तक यहाँ से थोड़ा परिचित हो चूका था और टेंट में बैठा वो अपने भाई के साथ प्रीती ऋतू को देख भी चूका था.

"भानु गलती न करियो कोई, लड़की खूबसूरत है लेकिन वो इस घर की ख़ास है."

'माँ छुड़ाए ये साला फत्तू, इतने सिक्योरिटी गार्ड है मेरे पास और ये रिवॉल्वर भी. साली को अकेला देखते हे दबोच लूंगा.', भुनभुनाता हुआ वो उठ कर हवेली के कमरों की तरफ जाने लगा था लेकिन सामने बैठे सुल्तान की गुर्राहट बता रही थी की आगे लक्समन रेखा है तोह अपनी हद्द में हे रहो.

"आंटी जी इस कुत्ते को बाँध क्यों नहीं देती? अब बाथरूम जाना हो तोह ये तोह अंदर जाने नहीं देगा.", सुशीला सिंह अब तैयार होने के बाद पारम्परिक वेशभूषा में थी लेकिन व्हीलचेयर की जगह एक तरफ हॉकी का सहारा लिए. भानु के ऐसा कहने पर उन्होंने सटीक जवाब दिया.

"बीटा बाथरूम उस तरह है और वो भी 2-2, एक सामने वाले प्लाट में भी है और 3 बगल वाली कोठी में भी जहा तुम ठहरे हो. सुल्तान समझा रहा है के वह सिर्फ लेडीज है.", सुशीला सिंह की बात सुन्न कर भानु को गुस्सा तोह आया लेकिन वो ज्यादा उलझ नहीं सकता था. उसके पिता अभी कोठी में हे थे और वो साथ होते तोह शायद भानु कुछ हिमाकत करता.

"जी पता नहीं था आंटी. वैसे बड़े पुराने रूल है आपके यहाँ, लेडीज और गेट्स के अलग अलग हिस्से."

"न बीटा ऐसा नहीं है लेकिन यहाँ ghar-pariwar और अतिथि के बीच फैसला जरूर रखा जाता है.", अभी वह इतना जवाब दे रही थी की बगल से अर्जुन ने उन्हें बाहों में लेते हुए गाल चूम लिया.

"तोह मेरी प्यारी बुआ जी आप यहाँ हो. अंदर भैया के पास आप दिखी नहीं.", सुशीला के चेहरे पर भी एक मुस्कान आ गयी थी अर्जुन के ऐसा करने पर. भानु बड़े गौर से अर्जुन को देख रहा था. इतना लम्बा चौड़ा लड़का और वो भी इतना बेखौफ हो कर इस औरत से मिल रहा था.

"तुझे देखने हे आयी थी मैं इधर लेकिन नहीं दिखा तोह बिजेन्दर के पास हे आने वाली थी. ये है भानु, बाहुबली अवधेश मिश्रा का सुपुत्र.", अर्जुन को एक तरफ से अपने साथ लगाए हे सुशीला ने सामने खड़े लड़के का परिचय दिया तोह अर्जुन भी ध्यान से देखने लगा और फिर सिर्फ मुँह से अभिवादन किया.

"Hello, अर्जुन शर्मा थिस साइड."

"बाहुबली भानु मिश्रा.", अपने नाम के साथ ये उपाधि लगते हुए भानु ने 34 इंच की छाती बहार निकलते हुए जवाब दिया और मदद कर वापिस चल दिए.

"बुआ, इसके पेट में दर्द था क्या? हाहाहा.. चलो भैया बुला रहे है.", अर्जुन ने हँसते हुए कहा और सुशीला भी साथ हे हंस पड़ी. दोनों हे बिजेन्दर के कमरे की तरफ चल दिए जहा उसकी दूर की बुआ और कुछ लोग तैयार करने के साथ गीत भी गए रही थी.

"अब बाहुबली बन्न के भी तोह दिखाना था न उसने, पंत गिरने वाली थी जो बच गयी जैसे तैसे.", सुशीला भी मजाक में साथ देती अर्जुन को लिए इधर आ गयी. लोगबाग हवेली के बाहरी बड़े आँगन में आने लगे थे और सामने वाली तरफ भी पंडाल में चहल पहल शुरू हो चुकी थी. सरपंच वाले घर को छोड़ कर आसपास की 4 एकड़ जमीन सिर्फ हवेली के मालिक की हे थी. उमेद सिंह भी बहार अपने आदमी लगाने के साथ पार्किंग, पंडाल भी जांच रहे थे. मर्द और परिचित लोग उमेद से हे मिल रहे थे जिसके साथ मेहुल गुलाटी भी ठंडा पीते हुए चहल कदमी कर रहा था. बिजेन्दर की कार भी तैयार कड़ी थी ढेर सारे फूल से सजने के बाद. पंडाल में गुलाब का इत्र दाल कर पानी के कूलर बेआवाज चल रहे थे.

"उमेद भाई ये अवधेश है कौन? और यहाँ तोह हवेली में सभी को जाने की इजाजत भी नहीं है. लोग तोह तुमसे हे मिल रहे है और फिर पंडाल में जा रहे है."

"मेहुल भाई, ताऊजी का बड़ा नाम रहा है और अब ताई जी का है. गाँव तोह 3 से 1 हो गए लेकिन अगर यही शादी 25 साल पहले होती तोह 10 एकड़ में पंडाल लगता. सारे गाँव भोज पर आते. हाँ हवेली के अंदर सिर्फ पहचान वाले और वो भी शादी की वजह से जा रहे है. आँगन तक हे पुरुष बैठ सकते है उसके आगे सिर्फ परिवार.", उमेद सिंह के हाथ में भी एक बेतार था जिस पर उनके लोगो की बात वो सुन्न सकते थे. अभी पंडाल में रौनक लगने लगी थी और कोठी से तैयार हो कर अवधेश मिश्रा अपने 2 सुरक्षाकर्मियों के साथ इनके करीब आ खड़ा हुआ.

"कैसे हो मिश्रा जी? स्वागत है आपका.", उमेद सिंह के पहल करने पर अवधेश मिश्रा ने भी हाथ मिलते हुए वैसा हे जवाब दिया.

"भाई तुम्हारे जैसे तोह ठाठ नहीं है उमेद सिंह बस गुजरे लायक कमा खा रहे है. Hello.", बाद में गुलाटी से भी हाथ मिलाया तोह उसने भी ाचे से अभिवादन किया.

"बाहुबली अवधेश मिश्रा तोह अपने आप में एक मिसाल है. दिल्ली से ले कर पूर्वांचल तक जिसका डंका बजता हो वो ऐसे कहते ाचा नहीं लगता. वैसे गाडी ाची ली है तुमने.", रर लिखी वो विदेशी कार सबसे अलग हे थी यहाँ कड़ी 3 दर्जन गाड़ियों में से.

"तुम साथ दो तोह हरयाणा और पंजाब तक जा सकते है, ऐसी गाड़ियां हर महीने बदल लेना.", अभी ये लोग बात कर रहे थे की एक तरफ से भानु अपने बाप के बराबर आ खड़ा हुआ और उसके साथ परिचय करवाते हे खुद अवधेश की नजर इस लगभग सवा 6 फ़ीट के विदेशी सांड से तगड़े युवक पर पड़ी. ास्ति उतना हे मुड़ी हुई थी जितना कलाई से ऊपर जा सकती थी लेकिन इस लड़के को aas-pas खड़ा लगभग हर व्यक्ति निहार रहा था.

"ये हीरो कौन है, हवेली से आ रहा है लेकिन हवेली का तोह नहीं लगता?"

"अर्जुन नाम है इसका और मेरा गॉड लिया बीटा है.", उमेद के इतना कहने के साथ हे अर्जुन अपने से 3 इंच लम्बे चाचा के गले लग गया. लम्बाई अवधेश मिश्रा की भी ाची थी लेकिन शरीर इतना मजबूत और चौड़ा जरा भी न था.

"चाचा आप यहाँ धुप में काले हो रहा हो और बाबा आपको अंदर बुला रहे है. नमस्ते अंकल.", अर्जुन ने मेहुल के पाँव छूने का उपक्रम किया तोह उन्होंने भी गले लग्न बेहतर समझा.

"बीटा आप है..

"बाहुबली अवधेश मिश्रा जी, प्रणाम. अर्जुन शंकर शर्मा.", अर्जुन ने पहले हे नाम बताते हुए हाथ जोड़ते हुए एक मुस्कान दी तोह अवधेश मिश्रा भी बहार से मुस्कुराते हुए हाथ जोड़ने लगा. अर्जुन तुरंत हे वापिस चला गया.

"मतलब भाई के बेटे को हे गॉड ले लिया और नाम भी ख़ास दिया है इस लड़के को. चाल तोह शंकर जैसी नहीं है इसकी लेकिन चेहरा कुछ कुछ वैसा हे है. और बताओ भाई उमेद, जब हम आराम करने गए तोह यहाँ कुछ ख़ास हलचल न थी लेकिन अब देखो तोह दर्जनों लोग सिक्योरिटी पर लगे है.", अवधेश मिश्रा ने कुछ सोच कर विषय बदल दिया था. उमेद भी पता न लगने देने के साथ हर बात ध्यान से सुन्न रहा था.

"शंकर ने भेजा है इन्हे और दिग ने भी यहाँ और मंदिर पर पहरा लगवाया है. पता नहीं क्या जरुरत थी इस सबकी लेकिन सुना है उधर राममेहर काका की तरफ तोह पूरी छावनी बना राखी है शंकर और दिग ने.", इतना सुन्न कर हे अवधेश के अंदर पानी चलने लगा था. ये उम्मीद न थी की वह एक मामूली शादी में कुछ ऐसा होगा.

"चलो भाई तुम भी मिलो सबसे अंदर और मैं भी दूल्हे को नेग दे कर फिर निकलता हु.", अवधेश अपने छोटे बेटे को साथ लिए इनके साथ हे हवेली के अंदर चल दिया. गुलाटी पंडाल में चल दिया था क्योंकि प्यास लग आयी थी. उमेद सिंह सीधा हे बैठक की तरफ चल दिए क्योंकि अब चंद्रो देवी ने भी बिजेन्दर के साथ मंदिर से अगले गाँव चले जाना था.

"बिटिया के फेरो के बाद हे जाना अवधेश, ऐसे अपशकुन होता है.", थोड़ी हे देर बाद जाने की इजाजत मांगने पर ये बात चंद्रो देवी ने कही थी अवधेश मिश्रा को और अब वो आया अपनी मर्जी से था लेकिन जाना चंद्रो देवी के हिसाब से पड़ना था.
 
अपडेट 128

आवरण -3


"जी बड़ी काकी. चलो भाई तुम दोनों भी पंडाल में नाश्ता पानी लो जरा हम यही टहल रहे है.", अवधेश मिश्रा की बेचैनी कोई और भी बड़े ध्यान से देख रहा था. दूसरी मंजिल पर कमरे में कड़ी लता सब गौर से देख रही थी. यहाँ वो दहेज़ में जाने वाला सामान 2 लोगो से निचे भिजवा रही थी लेकिन मैं में उसके भी खटका लग चूका था.

'मरजाना अब ये न मूट दे कही. चौधर में आया थे 6 हिजड़े लेके अपने साथ और thaanedar-Umed ने शायद हवा निकाल दी. उनको भी बड़ा शोक है हर जगह अपनी ताक़त दिखने का. बिंदु काम न रुकने देना बहिन, वो साली आज जाएगी तभी सबसे बड़ी चोट लगेगी रामेश्वर के परिवार को.', मैं हे मैं वो दुआ कर रही थी की वैसा न हो जैसा उसका दिल कह रहा है. अवधेश मिश्रा ने अपने अपने 2 सुरक्षाकर्मी को पास बुला कर एकांत में कुछ गुफ्तगू की और अगले 10 मिनट तक सब समझाता रहा. तुरंत हे उसकी जिप्सी यहाँ से निकल गयी. चेहरा साफ़ करता वो भी मैं हे मैं बिंदु को कोस रहा था.

'साली अगर बता देती की वह शंकर और इतने लोग होंगे सुरक्षा के लिए तोह गलती से भी हाँ न भरता. दिनु थप्पड़ में हे मूट देगा अगर शंकर के हाथे चढ़ गया तोह. बहनचोद ाचा चुटिया बनाया मेरा.', अभी ये सब वो मैं में हे बड़बड़ा रहा था और इधर बरात को ले कर वह जाने वाले सभी निकलने लगे थे. दूल्हे के रूप में बिजेन्दर बखूबी जाँच रहा था और सुशीला ने तिलक लगा कर कार में बैठाया तोह बगल में चंद्रो देवी ने स्थान ले लिया. चुनिंदा गाड़िया भी बिजेन्दर के पीछे हे चल दी थी क्योंकि वह बरात लम्बी चौड़ी ले जाने से खुद हे चंद्रो देवी ने मन किया था.

"आज तोह क़यामत लग रही हो आप.", यहाँ बबिता के कमरे से ऋचा अपने साथ साथ Ritu-Preeti को भी ले कर निचे आ गयी थी. उसको भी अपने भाई के साथ मंदिर में तस्वीर करवानी थी. सजी धजी वो बेहद खूबसूरत लग रही थी और साथ में 2 परियों सी लड़कियां अलग हे छटा बना रही थी इस पल में. अब कमरे में बबिता दुल्हन के रूप में अर्जुन के सामने अकेली थी. भरे शरीर की 6 फ़ीट ऊँची बबिता का ये अवतार बेजोड़ हे था.

"तेरे लिए हे बानी हु और सुना है तुम फेरे पर मेरे साथ जाने वाले हो और कल ले कर वापिस आओगे यहाँ मुझे."

"आने लायक रहे तोह जरूर बाकी हालत बता देगी. दिल तोह कर रहा है के बस अभी पकड़ लू.", अर्जुन ने करीब आते हुए बबिता के होंठो पर एक चुम्बन किया तोह वो हंसती हुई अलग हो गयी.

"लाली बाद में खा लियो मेरी जान, अभी तू बहार जा नहीं तोह मैं भी रुक न सकुंगी.", फिर से करीब आते हुए बबिता ने हे उसका हाथ अपने दिल पर रख दिया.

"इन्तजार रहेगा अपनी सुहागरात का.", हलके से उभर को दबाता वो बहार निकल आया तोह निचले गलियारे में कड़ी मधुलता से भेंट हो गयी.

"नमस्ते आंटी जी.", अर्जुन ने पाँव छू कर आशीर्वाद लेने का उपक्रम किया तोह लता ने भी सर पे हाथ रखने के बाद अपनी बात कही.

"मेरे सीने पर कांटे लगे है जो गले न मिल सकता?", उनके इस तीखे अंदाज को देख कर अर्जुन ने उन्हें खुद हे गले से लगा लिया. न चाहते हुए भी लता के हाथ जब उसकी मजबूत पीठ पर बंधे तोह बेचैनी होने लगी. अर्जुन जैसे बिना जोर लगाए हे उसको अपने अंदर खींच रहा था.

"मंदिर ले चल मुझे, बाकी सब तोह निकल गए.", अभी वो इतना हे कह पायी थी की ऋचा उधर आ गयी.

"चलो, कार लेके जल्दी. सब मंदिर चले गए है और हमको भी जाना है."

"चलिए आंटी, सभी वही चल रहे है.", लता को ऋचा की मौजदगी जरा न भाई लेकिन सर पर ओढ़नी ठीक करके वो भी बहार वाले आँगन की तरफ चल दी. गेट के बहार कड़ी प्रीती और ऋतू के पास ित्रता हुआ भानु आ रुका था. और इधर लता ने अर्जुन और ऋचा को ये टोकरे उठाने को कहा जो मंदिर ले जाना बाकी लोग भूल गए थे.

"तुम हमको पसंद आ गयी हो. हम ऐसा किसी से नहीं कहते क्योंकि लड़कियां भानु मिश्रा पर खुद मरती है. तुम हाँ कहो तोह अभी पापा से हमारी शादी की बात कर ले.?", प्रीती की तोह हंसी छूट गयी इस रंगीले की बातें सुन्न कर. इस दौरान वो अपनी रिवॉल्वर वाली तरफ से कमीज उठा कर रौब भी दिखा रहा था.

"ऐसा है भैया इसकी तोह शादी पक्की हो चुकी है उस लड़के से. तोह दाल यहाँ नहीं गलेगी.", ऋतू ने प्रीती का हाथ पकड़ कर कार की तरफ आते जवाब दिया. दोनों हंसती हुई अर्जुन के पास आ कड़ी हुई. अर्जुन डिक्की में मिठाई की टोकरी रखने के बाद सीधा हुआ तोह दोनों को हँसते देख खुद भी मुस्कुरा दिया.

"माँ ये प्रीती है, अर्जुन की मंगेतर और ये ऋतू है शंकर काका की छोटी बेटी और अर्जुन की बड़ी बहिन.", माधलता ने इतना सुन्न कर दोनों के सर पर हाथ फिर दिया. अंदर हे अंदर गुस्सा तोह बहोत आ रहा था लेकिन मजबूर थी. सभी को बैठने के बाद अर्जुन ऋचा के बताये रस्ते पर चल निकला. पंडित जी के कहने पर इधर हवेली के हे आँगन में वेदी स्थापित होने लगी थी क्योंकि ये घर का पहला विवाह था. इस से पवित्र हवं और कोई हो नहीं सकता था जिस वजह से ऐसा किया जा रहा था. गुड्डी काकी और सुशीला सिंह भी साथ काम करवाते हुए बाकी काम करने वालो को निर्देश दे रही थी. थोड़ी देर तक गोलू की बरात भी इधर आने हे वाली थी.

"यही मंदिर था क्या जहा तारा और प्रियंका दीदी आये थे? बड़ा सुन्दर है ये तोह और पुराण भी.", यहाँ पहले से हे ाची खासी भीड़ थी और सुरक्षा भी पूरी. अर्जुन की कार को उमेद जी ने खुद हे ठीक सामने खड़ा करवाया.

"आप लोग जाइये मैं मंदिर के बहार हे हु.", अर्जुन के ऐसा कहने पर ऋतू ने कोई सवाल जवाब न किया. वो जानती थी की अर्जुन किसी धार्मिक जगह नहीं जाता.

"तुम भाई उधर आम के पेड़ की तरफ टहल लो, मुझे भी बिजेन्दर के तिलक करने जाना है. टेंशन मैट लेना यहाँ सभी पहचान के है.", उमेद जी ने नलके से हाथ मुँह धोने के बाद सीढ़ियों पर कदम रखने से पहले अर्जुन को उस बगीचे की तरफ इशारा किया तोह वो मुस्कुराता हुआ उधर हे चल दिया टहलने. यहाँ अलग हे सुकून था बेशक मंदिर करीब हे था लेकिन ये बगीचा घाना भी था और तीन तरफ से इस विशालकाय मंदिर को घेरे हुए भी.

"तुम्हारा भाई मंदिर क्यों नहीं आया?", लता भी सीढ़ियों से पहले हे रुक गयी थी. विधवा होने के बाद वो भी अंदर नहीं गयी थी लेकिन मंदिर में ऐसा कोई कानून न था के वो दर्शन नहीं कर सकती.

"वो कहता है के उसके भगवन उसके साथ है. आप भी चलिए आंटी?", ऋतू के ऐसा कहने पर लता ने ना में गर्दन हिला दी.

"मेरी दूर से हे ram-ram है इन्हे. जाओ तुम लोग भाई के साथ तस्वीर निकलवा लो मैं इधर हे हु.", अभी ये बातें हो रही थी की अवधेश मिश्रा भी अपने बेटो के साथ यहाँ आ गया. ब्राह्मण आदमी था और pooja-path करने वाला भी. हाथ मुँह धो कर वो भी दोनों को लिए मंदिर के प्रांगण में चल दिया. रस्मे हो रही थी और पुजारी मंगलगान करते हुए बिजेन्दर से पूजा करवा रहे थे. चंद्रो देवी भी ाचा खासा चढ़ावा दे चुकी थी और उन्हें भरपूर ख़ुशी थी की इतने बरसो बाद घर में मांगलिक कार्यक्रम हो रहा है. सभी धीरे धीरे कर के यहाँ से निकल गए थे और अर्जुन अपनी हे धुन में ठीक मंदिर के पीछे जा चूका था. लता भी उसको देखने की चाह लिए उधर की तरफ बढ़ गयी.

"सब चले गए ऋतू दीदी आपकी पूजा के चक्कर में. यहाँ हम दूल्हे के साथ आये थे और आप इधर आ कर भी लग गयी चालीसा पढ़ने.", प्रीती की बात पर ऋतू ने सर पर ली हुई चुन्नी वापिस निचे करते हुए गले में ठीक की और हँसते हुए कहने लगी.

"अर्जुन की कार वो कड़ी और वो कैसे जा सकता है हमको छोड़ कर.?"

"वैसे लेके तोह मैं भी जाना चाहता हु तुम्हे, उसकी तोह शादी पक्की हो गयी पर तुम कुंवारी हो और शायद मर्द की जरुरत भी है तुम्हे.", सीढ़ियों के आगे हे भानु एक तरफ से कमीज उचका कर उनके सामने आ खड़ा हुआ.

"छुहारे जैसी शकल है तुम्हारी और अपने बारे में बता ऐसे रहे हो जैसे कही के राजकुमार हो. कान के निचे एक लगेगा और दूसरे वाले का भी पर्दा काम करना बंद कर देगा. हट साले दफा हो इधर से नहीं तोह मजाक के साथ साथ छित्तर परेड करने में भी मुझे टाइम नहीं लगता."

"तू ऐसे नहीं मानेगी छमिया, पटक कर पेलुँगा तभी अकाल आएगी.", अब वो स्टील चमक वाली रिवॉल्वर उसके दाए हाथ में थी और तीनो लड़कियों के पाँव जम्म चुके थे. बहार 2 सुरक्षाकर्मी खड़े थे लेकिन वो दोनों हे भानु के आदमी थी. अवधेश मिश्रा अपने बड़े बेटे के साथ जैसे हे मंदिर के सामने आया तोह चौंक गया. ब्रजेश तुरंत जूती उतार कर अपने भाई की तरफ लपका.

"ोये तू पागल तोह नहीं हो गया है भानु? लड़की पर पिस्तौल और वो भी मंदिर में, इन्ही के यहाँ हम आये है. पागलपन मैट कर."

"चल साले फत्तू एक तरफ हो जा. देख ये तीनो हे है यहाँ और मैं यही से इन्हे उठा कर ले जाने वाला हु. गाडी बहार हे कड़ी है, सीट पर बैठ जा जा कर.", भानु सचमुच हे एक सरफिरा और थोड़ा मानसिक तौर पर हिला हुआ लड़का था जिस वजह से अवधेश उसको मनमर्जी करने देता था. अब उसको भी समझ नहीं आ रहा था के क्या करे लेकिन बराबर में उमेद सिंह आ खड़ा हुआ.

"देख रहे अवधेश अपने बेटे की करतूत. अब बताओ इसके साथ क्या होगा?", उमेद को इतना शांत देख कर अवधेश की चिंता भी बढ़ चुकी थी.

"देखो भानु थोड़ा सरफिरा है, उस लड़की से शादी की बात करने का वादा मिलते हे वो रिवॉल्वर हटा देगा. लेकिन जोर जबरदस्ती करने पर वो मुझ पर भी गोली चला सकता है."

"इस सबके लिए बहोत देरी हो चुकी है अवधेश मिश्रा. अगर वो ज़िंदा बचा तोह ले जाना नहीं तोह अपनी जान के बारे में सोचो.", अर्जुन इधर आया तोह एक पल के लिए हैरान हे हो गया. सबकुछ ाचा भला था तोह आधे घंटे में ये क्या हो गया? ऋतू के गले के सामने पिस्तौल देख कर वो सेकंड के 100वे हिस्से में हे सबकुछ भूल गया.

"तेरी हिम्मत कैसे हुई मेरी ऋतू पर रिवॉल्वर रखने की?" Kadddakkk-kadaaak. भानु इसके लिए तैयार हे कहा था क्योंकि सारा ध्यान तोह इन तीन लड़कियों पर था उसका. लेकिन कलाई के साथ हे कोहनी का जोड़ भी डंडी की तरह तोड़ते हुए अर्जुन ने गर्दन पकड़ कर 5 गज दूर फेंक कर मारा तोह उसका रुदन इस पूरे इलाके को हिला गया.

"आह मारो साले को. मेरा हाथ.. आअह्ह्ह.. माँ मेरा हाथ टूट गया..", शरीर सुन्न पड़ने से अभी उसको अपनी हालत का पता भी न था के सर से भी खून बह रहा है लेकिन अर्जुन के कदम उसकी हे तरफ बढ़ रहे थे. बहार खड़े दोनों सुरक्षाकर्मी तुरंत हरकत में आये लेकिन ये ड्राइवर थे जिनके पास बन्दूक न थी. उमेद ने भी न रोका लेकिन अवधेश की कलाई मजबूती से पकडे राखी.

"ये गलत हो रहा है उमेद."

"तुम्हारे आदमियों को नहीं रोका मैंने अवधेश, तुम्हे रोक रहा हु.", इधर ऋतू ने तुरंत निचे गिरी पिस्तौल ब्रजेश से पहले उठा ली थी.

"जाओ बचा लो अपने भाई को.", ऋतू ने जिस दिलेरी से कहा था तोह एक तरफ कड़ी लता और पुजारी भी आँखे फाड़े देख रहे थे उस तांडव को जो वह उनके सामने चल रहा था.

"आअह्ह्ह.. बाउजी बचो.. ", अर्जुन ने पाँव के निचे हे भानु को दबा रखा था और एक आदमी का सर धरती पर पटक कर मूर्छित करते हुए अब दूसरे वाले की तरफ बढ़ रहा था.

"भाई देखो, हमको जाने दो.. आह्हः.."

"मेरी ऋतू पर जिसने बन्दूक उठाई उसके परिवार का नमो निशाँ मिटा दूंगा कमीने.", लाल चेहरे में अर्जुन सचमुच हे काल लग रहा था जिसको बस वह सभी अपराधी दिख रहे थे. इस आदमी का सर वृक्ष से जा लगा तोह दोनों रुक गए. अब अर्जुन ने जांघो के बीच दूसरा हाथ फंसते हुए जैसे हे उसको ऊपर उठाया कुरता चररर से fat-ta हे चला गया. दहाड़ मारते हुए उसने वही फेंक कर मारा इस व्यक्ति को जहा पहले हे 2 शरीर पड़े थे. नजर ब्रजेश पर पड़ी तोह वो जमीन पर हे बैठ गया अपने हाथ जोड़ कर.

"रुक जाओ अर्जुन, बहोत हो गया. हम शादी में आये है यहाँ. देखो चाचा भी लेने आ गए.", ऋतू ने गले लगते हुए अर्जुन को बाहों में जकड लिया तोह उसका चेहरा एकदम शांत हो गया. पसीना जोरो से टपक रहा था और वो लम्बी सांसें लेने लगा.

"उठा कर ले जाओ इन्हे अवधेश, अगर कोई और गलती हुई तोह उसके पागलपन के सामने तुम भी नहीं टिक सकोगे. तुम्हारा बीटा सिर्फ सरफिरा है लेकिन अर्जुन पूरा पागल हो जाता है अगर बात उसके चाहने वाले पर मुसीबत की हो तोह.", उमेद सिंह ने कलाई छोड़ी और बहार लगी भीड़ को ऊँची आवाज में अपने अपने काम करने को कहा. अवधेश मिश्रा बेबस सा अपने बेहोश बेटो को उठा कर कार तक लेके आया और जाने से पहले भीगी आँखों से उमेद से हाथ मिला कर कार में बैठ गया.

"वह मुलाकात होगी जो जगह तुम्हारी नहीं होगी उमेद सिंह. पागलपन तोह मैंने शंकर का भी ठीक किया था और इसका भी जरूर करूँगा.", मूर्छित ड्राइवर को वही छोड़ वो बिना जवाब सुने यही बहार से हे अपने रस्ते हो लिया. उमेद बस मुस्कुरा रहा था.

'वही मारूंगा तुझे जहा तेरी हवा है. मेरे बचो पर बन्दूक तानी थी तेरे लोंदे ने अवधेश, सजा मैं दूंगा तेरे घर में घुस कर.', उमेद सिंह निर्णय ले चूका था और इस बार शंकर की मर्जी हो या न हो. फिर अंदर चलता वो अर्जुन के पास आया तोह वो अब ठीक था. जमीन पर मूर्छित पड़े दोनों आदमियों पर पुजारी पानी दाल रहा था जिस से उन्हें होश आ जाये.

"इनका ख्याल मेरे आदमी रख लेंगे पुजारी जी, मैं आपको हे लेने आया था उधर पूजा करवाने के लिए. ऋचा तुम अर्जुन के साथ सामने दरजी पर चली जाओ, इसके माप का कुरता फ़िलहाल तोह नहीं मिलेगा लेकिन वो सिलाई कर देगा. तुम लोग मेरे साथ चलो और घर पे इस बात का जीकर मैट करना."

"देवर जी, अर्जुन के साथ मैं चली जाती हु आप इन तीनो को ले जाओ. ऋचा इनके साथ न दिखी तोह गुड्डी दीदी पूछ सकती है.", माधलता की बात पर ज्यादा सवाल न करते हुए उमेद ने सिर्फ हामी भर दी.

"ये जल्दी सील दो अंकल. जरुरी है.", अर्जुन ने तुरंत हे उस छोटी सी दूकान पर कुरता उतार कर दरजी के सामने कर दिया था. काख के पास से साड़ी सिलाई खुल चुकी थी. बनियान में कैद उस तगड़े जिस्म को दरजी और लता दोनों हे देख रहे थे बस दरजी तुरंत अपना काम करने लगा और ओढ़नी में से हे लता अर्जुन को निहारे जा रही थी.

"बहोत प्यार करते हो तुम अपनी बहिन से.? शकल से तोह तुम बिलकुल मासूम लगते हो लेकिन वह तोह जैसे कोई प्रेत आ गया था तुम में.", लता ने हे इस खामोश माहौल को भांग करते हुए बात शुरू की.

"मेरी बहाने मेरा सबकुछ है आंटी और उनके लिए मैं कुछ भी कर सकता हु. ऋचा दीदी हे क्यों न होती वह तब भी मैं यही करता.", अर्जुन उनकी तरफ नहीं देख रहा था, बस ध्यान था तोह चलती सिलाई मशीन और अभी हुए उस हादसे पर. शुक्र था के वह घर के और लोग नहीं थे.

"चलो ाची बात है के तुम सबकी परवाह करते हो लेकिन कई बार दुश्मन दिमागवाला भी हो सकता है. ऐसे सबसे उलझना ठीक नहीं है."

"उनसे तोह मैं पहले हे 2 कदम आगे रहता हु. ये अवधेश मिश्रा के तार जहा तक जुड़े है मुझे पता है और आपने तोह ये भी नहीं पूछा के मैं आपको कैसे पहचान गया जब मिले हे पहली बार है हम.", अर्जुन ने दरजी की दुकान में हे लगे आईने में देख कर खुद को ठीक किया. कुरता दोनों तरफ ek-ek सिलाई से हे सही हो गया था. तुरंत पहन कर जेब से 100 का नोट देते हुए वो कार की तरफ चल दिया. लता पीछे तोह चल रही थी लेकिन अब वो भी बेचैन हो चुकी थी.

"मुझे कैसे जानते हो तुम? मुझे लगा तुम्हे मेरे बारे में ऋचा ने बताया होगा या निचे किसी ने शकल दिखाई होगी मेरी.", अर्जुन ने पहले उनकी तरफ का दरवाजा खोला जो पिछली सीट का था और फिर उनके बैठने के बाद खुद ड्राइवर सीट पर विराजमान हो गया.

"आपकी शकल तोह ऋचा दीदी से मिलने से पहले हे देख चूका था आंटी जी. आप भी तोह ऊपर वाले कमरे से मुझे देखे जा रही थी. बताएंगी के आपने कैसे पहचाना मुझे?"

"वो तोह बस वैसे हे देख रही थी क्योंकि तुम पहली बार आये हो यहाँ और मेरे देवर से तुम्हारी शकल मिलती है.", मधुलता अब दुविधा में पड़ चुकी थी की ये लड़का कोण सा बम फोड़ने वाला है.

"बिंदिया आंटी आपकी बचपन की सहेली है न? तोह समझ लीजिये के मैं आपको उतने हे समय से जानता हु. हंसाये दूर हो सकते है फिर भी साथ हे है.", अर्जुन हवेली के अंदर कार करना चाहता था लेकिन बरात आ चुकी थी जिस वजह से यहाँ पूरा माहौल बन चूका था. बड़े गेट पर हे गोलू अपने दोस्तों की मदद से रिबन कटाई के लिए खड़ा था.

"मैं आपके साथ कोई दुर्व्यवहार नहीं कर सकता क्यूंकि मेरे पापा आपसे प्यार करते है. लेकिन आपकी तरफ से भी यही वचन चाहिए मुझे बदले में. अगली कोई गुस्ताखी माफ़ नहीं होगी. सूत्रधार आंटी मधुलता सिंह उर्फ़ लता शर्मा उर्फ़ मुन्नी जी.", अर्जुन ने आँखों पर कला चस्मा लगते हुए कदम हवेली के अंदर बढ़ाया और इधर बहार कड़ी मधुलता दिवार का सहारा लिए ठंडी पड़ चुकी थी.

'अज्जू कहता था सूत्रधार मुन्नी जी और लता शर्मा. ये लड़का वो बात कैसे जान गया? बिंदिया मैं मर्डर गयी आज मेरी बहिन.', बदहवास सी मधुलता को ये लड़का अपना काल हे नजर आ रहा था.

"अरे मुन्नी बहु, यहाँ धुप में क्या कर रही हो? चलो अंदर चलो, लगता है तुम्हे चक्कर आया है गर्मी की वजह से.", ये पड़ोस की एक बुजुर्ग महिला थी जो अपनी बहु के साथ मधुलता को अंदर ले गयी. आँगन में सभी व्यस्त थे और बहार पंडाल में भी ाची खासी भीड़ जमा हो चुकी थी. गाँव के लोगो के साथ साथ अब बाराती भी jal-paan में लग गए थे. अर्जुन अंदर अपने दादा दादी और बाकी सबसे मिलने के बाद बहार पंडाल में हे आ गया था, बहिन की शादी में काम करवाने.

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"पापा, आप भानु का इलाज इधर हे क्यों नहीं करवा लेते? बड़ा सेहर है और हॉस्पिटल भी ाचे होंगे.", ब्रजेश ाची रफ़्तार से ये विदेशी कार दौड़ा रहा था. पिछली सीट पर अपने ज़ख़्मी बेटे का सर गॉड में रखे अवधेश मिश्रा भी चिंतित था लेकिन उसने यहाँ कार रोकने से साफ़ मन कर दिया.

"चांडाल भी डॉक्टर है और उसकी पकड़ भी यहाँ मजबूत है. बात बेटी पर आयी है उसकी तोह पता लगते हे वो हम तीनो को शहर पार भी नहीं करने देगा ब्रजेश. तुम बस 2 घंटे स्टीयरिंग संभाले रखो, ये कार 140 से आगे भी जा सकती है.", अपने बाप को पहली बार ऐसी हालत में देख कर ब्रजेश भी हैरान था. कहा तोह वो एक बाहुबली व्यक्ति था जिस से बड़े बड़े राजनेता भी अदब से बात करते थे और जाने कितने हे गुंडे उनके नीचे काम करते थे. लेकिन आज इसके विपरीत ब्रजेश ने बहुत कुछ बस थोड़े हे समय में देख लिया था. उमेद सिंह के सामने बेबस होना, चंद्रो देवी की बात मान कर न चाहते हुए भी रुकना, उस लड़के के हाथो बेटे को मार खाते देखना और अब यहाँ जख्मी बेटे का इलाज करवाने से भी मन करना.

"ऐसा कौनसा चांडाल हो गया जो आपको भी दबा सके? मैंने पहले इतना परेशां और कमजोर आपको कभी नहीं देखा पापा. हमारे पास अनगिनत लोग है, पैसा है और पहुंच भी है. ये लोग हमारे सामने कुछ भी नहीं, फिर आप क्यों डर रहे हो."

"बीटा बात जगह जगह की है और इनका नेटवर्क यहाँ इनकी ताक़त है. मैं यहाँ दखल नहीं दे सकता और ये हमारे उधर दखल नहीं दे सकते. लेकिन इसकी कीमत उस लड़के और उमेद सिंह को जरूर चुकानी पड़ेगी. कुत्तो ने अपने जगह घेर कर दबाया है अवधेश मिश्रा को तोह इसका परिणाम भी भुगतना हे पड़ेगा."

"पापा, आपको लगता है के वो लड़का कुत्ता था? जैसे वो आदमियों को कपडे की तरह धो रहा था उसको देख कर आधे लोग तोह दहशत से हे पास न जाए. मैं तोह वो 1 मिनट भुला हे नहीं प् रहा जो मंदिर में देखा.", अपने बेटे की इस बात पर अब अवधेश मिश्रा भी खामोश हो गया था. अर्जुन सचमुच शेर हे था इसलिए तोह उमेद ने उसके आदमियों को रोका तक नहीं. मतलब वो जानता था इस लड़के की ताक़त को.

"मान लेता हु के वो लड़का कुत्ता नहीं था लेकिन समाया आने पर शेर भी एक छड़ी के हिलने पर उठक बैठक करने लगता है. ऐसा हे हाल मैं इन सबका करूँगा बस एक बार बॉर्डर पहुंच जाए हम लोग. और साली उस छिनाल बिंदिया की भी माँ छोड़ कर रहूँगा जिसकी वजह से एक और अनहोनी हो गयी.", अवधेश मिश्रा के ऐसे भड़कने पर ब्रजेश को भी जैसे कुछ याद आ गया.

"हमारे आदमी कहा है पापा? वो तोह दिखाई नहीं दिए इतने समय से."

"उन्हें कही जरुरी काम से भेजा है बीटा. अगर वो समय रहते वह नहीं पहुंचे तोह हमको तैयार रहना पड़ेगा एक बड़ी जुंग के लिए. फिर समझौता तोड़ने का कसूर भी हमारा होगा और नुक्सान अलग. उस बिंदिया ने बहुत बड़ा चल किया है मेरे साथ अधूरी बात बता कर.", यहाँ अवधेश मिश्रा अपने आप को बुरी तरह घिरा महसूस कर रहा था हवेली से 50 किलोमीटर दूर आने के बाद भी.

वही राममेहर के गाँव में बिजेन्दर की बरात आने के बाद सभी लोग भोजन का लुत्फ़ ले रहे थे और अक्षरा ने नेग में बिजेन्दर से गले की चैन हे उतरवा ली थी. माहौल बहुत दिनों के बाद यहाँ खुशनुमा हुआ था. दूल्हे की seva-satkaar ाचे से की जा रही थी और उतना हे ख़याल चंद्रो देवी का रखा गया था. हवेली के भीतर सितारा देवी की बहुओं के साथ साथ रेखा जी भी मेहमानो और यही गाँव की आमंत्रित महिलाओ की सेवा में लगी थी. बिजेन्दर और अनुपमा ने पंडित जी के परिवार की मजूद सभी लड़कियों के साथ तस्वीर करवाई थी. मुस्कान के साथ अलका और तारा की सही जम्म गयी थी थोड़ी हे देर में. वही अक्षरा के साथ काम में लगी आरती और रुपाली को वो पसंद आयी थी. तीनो का हे दिमाग पढ़ाई में तेज था.

1 बजने हे वाला था जब शंकर जी ने सितारा देवी से मुलाकात करते हुए फेरो का जीकर किया. बिजेन्दर ने भी सहमति जताई क्योंकि वापिस जाने की जल्दी उसको भी थी.

"संजीव बीटा, अपने भूपिंदर चाचा को बोल कर पहले मंदिर तक का रास्ता जांच लो. बिजेन्दर को समय रहते हे गाँव वापिस भी जाना है.", शंकर जी ने संजीव को सब समझाया और विकास ने भी बाकी काम छोड़ कर इधर हे ध्यान दिया. फेरो में प्रयोग होने वाला सामान और सामग्री वह भेजी जा चुकी थी. बाकी सब सामान विकास और संजीव ने अपने हाथो में उठा लिया.

"संजीव भाई, अभी जीकर न करना किसी से. दूसरी तरफ कोई पन्गा हो गया था थोड़ी देर पहले. अर्जुन ने किसी मिश्रा के लड़के और गॉर्डस की रेल बना दी वह मंदिर में जब बिजेन्दर वह से इधर आने के लिए निकला.", विकास की बात सुन्न कर संजीव के चेहरे पर गंभीर भाव आ गए.

"तुम्हे किसने बताया और ये बात चाचा या किसी और को तोह पता नहीं लगी.", संजीव एकाएक मुस्तैद हो गया था ये नाम सुन्न कर.

"वो हवेली के अंदर मैं गया तोह ऋचा ने वह से फ़ोन किया था अक्षरा को. अक्षरा ने हे बताया के अभी किसी को बताना मैट. हाँ कोई बाहुबली अवधेश मिश्रा के बेटे और आदमियों को कूटा उसने."

"तोह सांगवान दादा जी की चिंता व्यर्थ नहीं थी. भुप्पी अंकल, जरा सुनो.", संजीव ने मंदिर के प्रांगण में सामान रखने के साथ हे भुप्पी चाचा को अकेले में आने को कहा. दोनों मंदिर से आगे कुछ देर तक बातें करते रहे और विकास भी इधर उधर देखने लगा. मंदिर की बगल में बने छोटे बगीचे में घास काटने के बाद मांगे मुँह पर गमछा ओढ़े सोने की एक्टिंग कर रहा था जिसको विकास ने नजरअंदाज कर दिया.

"ऐ माली खड़े हो जाओ.", भुप्पी ने तोह इधर आते हे सबसे पहले मांगे को हे आवाज लगाई लेकिन वो न उठा तोह कमर पर ठोकर मारते हुए उसको उठाया.

"चलो निकलो इधर से और कल से पहले इधर नजर मैट आना. खाल उधेड़ दूंगा.", भुप्पी ने चेतावनी दी तोह विकास बड़े गौर से मांगे को देखने लगा.

"बहनचोद, तू है कौन बे.? पुजारी जी, ये माली कब आया यहाँ?", विकास ने तोह उसकी गर्दन हे दबोच ली थी. मांगे अभी तक तोह बहार से सिर्फ थोड़ा परेशां लग रहा था क्योंकि अगर घबराता तोह पकड़ा जाता.

"बीटा ये तोह आज हे देखा है मैंने, पुछा तोह कह रहा था के इसके भाई की तबियत ठीक नहीं थी इसलिए ये उसकी जगह आ गया."

"नाम पुछा था क्या आपने इस से? बोल बे तेरे भाई का नाम क्या है.?", विकास पहलवान था और ये साढ़े 5 फ़ीट का आदमी ऐसी मजबूत पकड़ से निकल नहीं सकता था.

"जी भूरेलाल नाम है हमारे भाई का.", और इसके साथ हे 'चटाक' की तेज आवाज के साथ उसका गाल लाल हो चूका था.

"भूरेलाल? भोस्डिके कमीं तेरी न शकल न देखि थी मैंने जब तू सो रहा था. यहाँ का माली है राजू और उसका कोई भाई नहीं है क्योंकि वो हमारे खेत में भी काम करता है. ज़िंदा भट्टी में जला दूंगा अगर जुबान न खोली तोह." अब इस तरफ संजीव का ध्यान गया तोह उसने सीधा रिवॉल्वर मांगे की पतलून में डालते हुए उसको मंदिर से परे दिवार के साथ लगा दिया.

"सच उगल वार्ना ये पूरी खाली करने में मुझे देर नहीं लगेगी.", इधर ये 3 लगो मांगे को घेरे थे और वह 3 कार में सवार हो कर घर के मुख्या लोग इधर आ चुके थे. बाकी सभी पैदल आ रहे थे आपस में बतियाते हुए. Dulha-dulhan को लिए चंद्रो देवी सबसे आगे थी और उनके साथ सितारा देवी अपनी पौती सुकन्या और अक्षरा के साथ. मांगे के चेहरे पर एकाएक ये मुस्कान आ गयी थी सामने कुछ देख कर.

"भोजाई का तोह उड़द गया फ्यूज.", रेखा जी सफारी में बैठी थी और उनके सामने वेटर की वेशभूषा में दिनु जो ट्रे के निचे तमंचा अपने शिकार की तरफ करने लगा था.

"चची...", संजीव चीखता हुआ उस तरफ भगा और इधर भुप्पी ने निशाना लगा दिया दिनु की टांग पर. लेकिन यहाँ 4 धमाके हुए थे लगभग एकसाथ. सफारी से 10 कदम दूसरी तरफ साइकिल के निचे पड़ा था हरिया जिसके हाथ में देसी कट्टा धुआं छोड़ रहा था और माथे के ठीक बीच में छेड़ हो चूका था. इधर गाडी के पास दिनु तड़फ रहा था जिसकी टांग में भुप्पी की गोली जा फांसी थी. सफारी की ड्राइवर सीट पर बैठे अचम्भे में थे शंकर जी जिनके चेहरे के सामने वाला शिक्षा choor-choor हो चूका था, दिनु की गोली के दिशा भटकने की वजह से और विकास की गिरफ्त में दम टॉड चूका था मांगे, हरिया के काटते से निकली गोली की वजह से.

"ऐसा है भोले के तू है नीरा जड़बुद्धि. रिवॉल्वर रखने का पता है लेकिन चलने का नहीं.", उमेद सिंह को अपने सामने देख शंकर को होश आया. इतनी गोलियां एक साथ चलने पर एक पल के लिए दिमाग शुन्य हो गया था क्योंकि गाडी में बीवी, बेटी और बहिन भी थी उनके साथ. बहार निकल कर जमीन पर पड़ी लाश को देख कर हैरान हो गए. उमेद का हे था ये निशाना जो ठीक मातेह के बीच छेड़ कर गया था. एक तरफ विकास और भुप्पी के पास ये लाश पड़ी थी.

"ये ज़िंदा है चाचा. ये बताएगा कौन था इसके पीछे.", संजीव ने दिनु की रिवॉल्वर अपने कब्जे में ले ली थी और उसको घसीट को एक तरफ ले आया था.

"मैं बता देता हु भतीजे श्री के इसका सूत्रधार कौन है. शंकर जी के प्रिय श्री अवधेश मिश्रा, हरदोई वाले.", धायें की आवाज एक बार और गूंजी जब दिनु ने हाँ में सर हिलाया और उमेद ने उसका भी वही हाल किया जो हरिया का किया था. ठीक माथे के बीच सटीक निशान.

"इस साले के माँ की...

"ना ना, गाली नहीं शंकर गाली नहीं. काम ख़तम कर और कल आराम से इस बारे में विचार करेंगे डॉ धर्मवीर सांगवान जी के साथ मेरी हवेली पर.", उमेद वापिस जाने लगा तोह शंकर ने हाथ पकड़ लिया.

"ये खबर तुम्हे किसने दी उमेद?"

"खुद अवधेश मिश्रा ने फ़ोन किया था हवेली के नंबर पर. और उसने कबूल किया के ऐसा सिर्फ बिंदु के बहकावे में आने पर वो कर गया. उसको नहीं पता था के ये हुम्ला हमारे परिवार पर हो रहा है. अर्जुन ने उसके बेटे को इतना थोक बजा दिया है के खून की उलटी आने लगी थी, तोह ***** शहर में मैंने मंजूरी दी है के वो अपने बेटे का इलाज करवा ले 24 घंटे तक उसको कोई कुछ नहीं करेगा. 120 किलोमीटर शायद बीटा सेहन नहीं करता शंकर. कल बात करते है और भाभी इसके साथ बहार मैट आया करो.", उमेद अपनी मेरसेदेज़ में बैठ कर धुल उडाता हुआ तुरंत सबकी नजरो से ओझल हो गया था.

"ऐ ये सब गंदगी हटाओ रे. कुछ नहीं हुआ इधर और आप लोग मंदिर में चलिए. दुश्मन को मार कर शुभ काम किया जाए तोह शगुन ाचा होता है.", भुप्पी ने तुरंत अपने आदमियों को तीनो लाश हटाने के लिए कहा और बाकी परिवार के लोगो को विलम्ब किये बिना फेरो में बैठने की बात कहते हुए बिजेन्दर के सर पर भी हाथ फिर दिया. शगुन वाली बात पर अब वो भी मुस्कुरा रहा था.

"शंकर चाचा कब तक चलेगा ये खेल?"

"बस बीटा तू आज यहाँ से विदा ले फेर तेरा चाचा ये खेल और नहीं खेलेगा.", शंकर जी ने बिजेन्दर को अंदर भेजा और बाकी सबके साथ रेखा जी भी मंदिर में प्रवेश कर गयी.

"निशाना देखा शंकर तेरे भाई का? बहनचोद इतनी सफाई से तोह सिर्फ तू ब्लेड चला सकता है और वो 20 गज दूर से साइकिल वाले का भेजा खोल गया."

"वो गज्जू है भुप्पी, जाने कब कहा से आ जाता है मुझे बचने. अब तोह गिनती हे भूल गया हु कितनी बार वो ऐसा कर चूका है. लेकिन दुश्मनी भी िज्जात्त से निभाता है देख ले. अवधेश के बेटे की हालत देख कर इसने मोहलत दे दी लेकिन जल्द हे ये उसको घर में घुस कर मारेगा, मेरे साथ.", शंकर जी ने गाडी का शीशा देखने के बाद मंदिर का रुख कर लिया जहा अब उनकी जरुरत थी. बस अब देखना ये बाकी था के लता अपना आवरण कब तक सुरक्षित रख पाएगी. अवधेश मिश्रा ने आज तोह उसको बचा लिया था लेकिन अर्जुन का खौफ सर पे आज से मंडराने लगा था.
 
सभी सवाल अपनी जगह सही और ऐसा बहोत कुछ है जो मैंने यहाँ नहीं लिखा, जानबूझ कर.

1. अर्जुन के हाथ सिर्फ कुछ सुराग लगे है, अभी वो पूरी तरह वाकिफ नहीं है मधुलता से. शुरुआत गौशाला से हे हुई जैसा सभी अनुमान लगा रहे है. मुस्कान, कोमल दीदी और 2 अज्ञात के द्वारा उसको कुछ हद्द तक पता है के बिंदु और लता में पुराण और घनिष्ठ सम्बन्ध है. लता और अज्जू वाला काण्ड उसको बिलकुल भी नहीं पता क्योंकि ये नाम अभी तक अर्जुन को कही सुन्न ने को नहीं मिला.

2. अवधेश मिश्रा सिर्फ शादी के लिए यहाँ नहीं आया था लेकिन उपस्थिति दिखा कर वो कही और सेंध लगाने की फिराक में था. वो जिप्सी वाले गार्ड्स गाँव तोह नहीं गए फिर ऐसी कोनसी जगह भेजे होंगे अवधेश ने?

3. मुस्कान का सामने से शंकर जी को इतना कुछ बता जाना अपने आप में एक सकरात्मक संदेह दर्शाता है. ये लड़की बहोत कुछ जानती है तोह सबसे करीबी व्यक्ति को वो बता चुकी होगी और उसके कहने पर हे शंकर जी को थोड़ा व्यस्त किया जा रहा है.

4. अवधेश मिश्रा का जुड़ाव हवेली से बाप के समय से है. तोह Madhulata-Bindiya का भी गहरा नाता जरूर होगा. अभी तक बिंदिया उर्फ़ बिंदु के परिवार की पृष्ठभूमि सामने नहीं आयी है. इसको ध्यान में रखा जाए.

5. रेखा जी पर हुम्ला करवाना वह भी ऐसे व्यक्तियों से जो यहाँ के नहीं थे अपने आप में एक चाल है. यहाँ लता का काम बिंदु करवा रही थी और उसके लिए रेखा से जरुरी भी कुछ और है फ़िलहाल. रेखा इसमें मारी जाती तोह भी मकसद कुछ और था बिंदु का और बच गयी है तब भी उसने लता को सुरक्षित रखा. लेकिन हुम्ला हुआ है रेखा पर और शंकर जी की उपस्थिति में. ये बात दूर तक जाएगी बेशक रेखा जी हमेशा की तरह खामोश रहे.

6. भुप्पी उस पीसीओ को ढूंढ़ने में लगेगा यहाँ से फारिग होते हे. क्या वो यहाँ लता तक पहुंच पायेगा? एक कोड कसबे के साथ साथ बहुत से गाँव भी कवर करता है. उलझन बढ़ने वाली है ऐसा करने पर.

7. चंद्रो देवी भी बहुत कुछ जानते हुए खामोश है. गौर करने वाली बात और सुशीला सिंह का अर्जुन से इतना खुलकर प्रेम जाताना तोह ऐसा नहीं लगता के अर्जुन इस से पहले सिर्फ एक हे बार उनसे मिला है.

8. पंजाब में अर्जुन रुका था कृष्णा जी और नरिंदर जी के शयनकक्ष में. अधिक पढ़ने वाला व्यक्ति बहोत कुछ लिखता भी रहता है. वही शंकर और नरिंदर में कुछ और भी आदत एक जैसी हो सकती है क्योकि दोनों हंसाये है.

9. अवधेश मिश्रा ने कहा था के उसने शंकर को भी ठीक किया था एक बार. शंकर ने भी उमेद को उस से उलझने से रोका था. वो वजह क्या होगी? और अगर ये बड़ी ताक़तों का टकराव बनाया गया है तोह साफ़ है के यहाँ बिंदु और लता के साथ कोई और भी है.

10. Richa+Akshara+Babita+ मुस्कान +कोमल +?

इनके बीच बहोत कुछ साँझा हुआ है . एक व्यक्ति इनसे जुड़ कर वो सब जान सकता है. अक्षरा और उस अज्ञात को जोड़ कर 4 परिवारों की प्रमुख लड़कियां सब बता सकती है.

11. एक सरदार जी अन्नू के पापा. उनका क्या रोले हो सकता है? वो क्या नौकरी करते है? अन्नू की माता जी यहाँ पंडित जी के घर आती रहती थी लेकिन फिर बंद क्यों कर दिया? रेखा जी ने कहा था के वो उनके घर खुद कार्ड देने जाएँगी अर्जुन के साथ. मतलब लोग गहरी पहचान के है साथ हे सरदार जी का अर्जुन को अपने पंडित जी का पुत्तर कहना साफ़ बताता है की वो संपर्क में है बस यहाँ आ नहीं रहे.

विचार कीजियेगा और इतने प्यार के लिए सभी का धन्यवाद्. ❤️
 
अपडेट 129

मुठभेड़ (1)


"अरे ये कुछ अलग नहीं हो रहा? लगता है ये लोग समझ हे नहीं रहे के ये क्या करवा रहे है.", यहाँ सोमबीर सिंह की हवेली के आँगन में सब रस्मो के बाद अब var-vadhu फेरे लेने लगे थे. राजकुमार जी ने हे बाप की सभी रस्मे निभाई थी सुशीला की मौजदगी में. पति के न होने पर खुद सुशीला सिंह ने ये अधिकार अपने इस भाई को दिया था जिसका निर्वाह राजकुमार जी ने दिल से किया. गोलू के साथ आये दोस्त ख़ुशी ख़ुशी में ज्यादा हे सोमरस पी गए थे तोह फेरो के वक़्त उमेद के न होने पर रामेश्वर जी से आज्ञा ले कर सुशीला ने हे अर्जुन से गोलू को सँभालते हुए फेरे करवाने को कहा था. ऋतू, जो अभी प्रीती के साथ हे इधर आयी थी वो अनजाने में हे ऋचा के गले में हाथ डाले हैरत से बस वही कह गयी जो उसकी ख़ास नजरो ने देखा था.

"समझ तोह किसी को भी नहीं आ रहा लेकिन बबिता दीदी की ख़ुशी तोह देखो जरा. इतनी देर से अर्जुन यहाँ नहीं था तब तोह ऐसे बैठी थी जैसे जबरदस्ती ये शादी हो रही है. अब इतनी खुश है जैसे फेरे मनचाहे हो गए.", ऋतू इस आवाज को सुन्न कर भौचक्की रह गयी. बेध्यानी में प्रीती की जगह वो ऋचा के गले में हाथ डाले कड़ी और उसकी बात सुन्न कर वो बबिता को ध्यान से देखने लगी.

"ये चल क्या रहा है ऋचा दीदी? लगता है आप बहोत कुछ जानती हो.", ऋतू ने खुद को सँभालते हुए सवाल किया लेकिन ऋचा ने अपने हाथ में उसकी हथेली थामते हुए एक बार चेहरे को देखा और फिर धीमी आवाज में बोली.

"वैसे ये 'मेरी ऋतू' वाला चक्कर क्या है? बबिता दीदी तोह जा रही है अब तुम तोह पास हो मेरे. और दीदी विदी छोड़ो ऋचा बुलाया करो. अब बताओ."

"क्या होगा 'मेरी ऋतू' का मतलब.? अर्जुन मेरा सबकुछ है क्योंकि जब साल भर का था तबसे सिर्फ मेरे हे तोह साथ रहा है. मेरा खिलौना भी वही था उस वक़्त और आज भी हम दोनों एक हे है. अब आप बताओ के ये सामने चल क्या रहा है?", ऋतू ने जो भी कहा था वो सब सच था और ऋचा भी समझ गयी थी की इनके बीच मजबूत निस्वार्थ प्यार, bhai-behan वाला. लेकिन फिर वही बात पूछने पर ऋचा ने इधर उधर देखा. प्रीती को मंडप में बैठे देख धीमी आवाज में ऋतू के कान में कहा.

"बबिता दीदी की जान बस्ती है अर्जुन में. और आज जैसे उनके मैं की मुराद पूरी हो रही है. तुम अर्जुन की सगी बहिन हो तोह ज्यादा खुल कर नहीं कह सकती और ऊपर से प्रीती को भी पता नहीं चलना चाहिए.", ऋचा ने जिन लफ्ज़ो में ये कहा तोह वो पर्याप्त थे ऋतू को समझने के लिए की चक्कर कुछ गहरा हे है.

"ऐसा पहली बार नहीं हो रहा, आपकी जानकारी के लिए बता देती हु. आप भी तोह बहिन हे है फिर क्या हिचकिचाना."

"मतलब?", ऋचा ने एक बार फिर मंडप की तरफ देखा तोह बबिता आगे चल रही थी और गोलू को सहारा दिए अर्जुन पीछे.

"ये टेढ़ी खीर है, जाने क्या क्या करता फिरता है लेकिन इतना पता है के अर्जुन की गोपियाँ और भी है.", ऋतू की बात पर ऋचा को अंदर हे अंदर एक अलग सी बेचैनी होने लगी थी. बबिता दीदी ने भी तोह कहा था के वो जैसे प्यार करता है लड़की दीवानी हो हे जाती है.

"हाँ.. हाँ एक और भी है जिसको मैं जानती हु. मुस्कान. किसी को कहना मैट तुम, हम बाकी बातें वही करेंगे तुम्हारे घर.", ऋचा ने अपनी माँ को इधर हे आते देखा तोह ऋतू को सावधानी से अलग होने को कहा. लता भी इनके बराबर आ कड़ी हुई, अब वो शांत थी.

"आंटी, मैं कुर्सी ला कर दू आपको?", ऋतू ने लता को खड़े देख कर औपचारिकता से पुछा तोह लता का जवाब अलग हे आया.

"बिटिया तुम मेहमान हो हमारी, हाँ ये बात तोह उन्हें पूछनी चाहिए जो हवेली के है.", ऋचा अपनी माँ की बात सुन्न कर गलियारे की तरफ तुरंत निकल gayi,kursi लाने. लता को बात करने का मौका मिल गया था क्योंकि अंदर की सभी हलकी कुर्सियां तोह पहले हे आँगन में थी.

"तोह अर्जुन की जान तुम में बस्ती है? बहोत प्यार करता है वो तुमसे."

"नहीं आंटी जी, मेरी जान उसमे बस्ती है. उसकी जान और भगवान् हमारी माँ है. बाकी प्यार वो सभी से करता है. वैसे आप कभी हमारे उधर नहीं आयी, ऋचा दीदी तोह परसो आ रही है. आप उनके साथ कुछ दिन वह आ जाओ.", ऋतू ने जो न्योता दिया तोह उसको सुन्न कर लता का मैं खामोश हे हो गया. कहा तोह वो उस घर में घुसने की जुगत लगाती फिरती थी और यहाँ सामने से ये मासूम सी लड़की उसको आमंत्रित कर रही थी.

"हवेली से बहार सिर्फ माँ जी के साथ लेकिन तुम आ सकती हु मुझसे मिलने. वैसे तुम्हारी बात सुन्न कर तोह लगता है के तुम्हारी मम्मी सबसे ज्यादा अपने बेटे को हे प्यार करती है. कही लड़का है और वो भी छोटा इस वजह से तोह नहीं?", ऋतू तोह इस बात पर हंसने हे लगी थी. इधर ऋचा भी एक प्लास्टिक की कुर्सी इधर ले आयी.

"आंटी जी, माँ तोह किसी में भी फरक नहीं करती. 4 bhai-behan है हम उनसे लेकिन उनके लिए मेरे चाचा जी की दोनों बेटी और ताऊजी के भी 3 बचे हमारे बराबर हे है. ऋचा दीदी से हे पूछ सकती है के वो तोह इन्हे भी उतने प्यार से हे मिली थी. हाँ, अर्जुन उनका मुन्ना है न तोह वो अभी तक माँ के साये में हे रहता है.", ऋतू के जवाब ने तोह लता को थोड़ा उलझा के रख दिया था. रेखा का स्थान बेशक लता की नजरो में कुछ न था लेकिन अपनी हे बेटी को प्यार देना उनके द्वारा और ये 4 बचे. वो कुर्सी पर बैठ तोह गयी लेकिन फेरो की तरफ देखते हुए मैं की बात पूछ हे ली.

"मैंने तोह सुना था तुम 3 bhai-behan हो."

"हाँ पहले 3 थे अब 4 है आंटी. रुपाली मेरी हमउम्र है और उनके पिता के गुजरने के बाद पापा ने उसको हम में शामिल कर दिया. अब वो सगी बहिन है हमारी और अर्जुन के साथ हे स्कूल जाती है. दादी जी बुला रहे है तोह मैं अभी आती हु.", ऋतू इतना कह कर अपनी दादी के पास चली गयी जो Babita-Golu को आशीर्वाद देने के बाद ladka-ladki को शगुन दे रही थी.

"तूने तोह न बताया ऋचा के तुझे रेखा ने लाड लड़ाया?", भृकुटि तन्न गयी थी एक बार तोह लता की लेकिन आवाज दबाये हे वो अपनी बेटी से सवाल करने लगी.

"गले में चैन दाल दी थी पहली हे बार में रेखा आंटी ने और कोई फरक नहीं किया मेरे साथ. वैसे आप बड़ी जानकारी ले रही थी ऋतू से. ध्यान रखना वो लड़की उसकी हे औलाद है जिसकी मैं हु. पिस्तौल ऐसे पकड़ी थी जैसे उसको इस सबका बहोत पता है.", ऋचा और आग में घी लगाती हुई मंडप में चली गयी. सभी ladka-ladki को उपहार दे रहे थे और अर्जुन गेट पर खड़े सेंटर में सामान डालने वालो पर ध्यान रख रहा था. लता को भी हवेली की बहु और लड़की की चची के हिसाब से वैसा हे करना पड़ा जैसे कौशल्या जी ने करवाया. बस एक यही महिला थी जिनके aas-pas जाना लता को सिर्फ घबराहट देता था.

"ओह अर्जुन, चल अपनी बेबे को कार में बैठा. भाई गॉड में लेके बैठाया करे है मंडप से गाडी तक.", सुशीला सिंह की इस रौबदार आवाज और ऐसे आदेश पर कौशल्या जी भी हंसने लगी थी और पंडित जी छोल साहब के कान में कुछ कहते हुए ठहाके लगाने लगे.

"बुआ एक तोह जरा दीदी को देखो और ऊपर से इनके ये भारी कपडे. मतलब आज घर अपने पाँव पर नहीं जाने देना चाहती मुझे. वैसे ये तोह रो भी नहीं रही विदा होते हुए?", अर्जुन ने मजाक में हे ये सब कहा था और बबिता उदास चेहरा बनती अपनी माँ को देखने लगी.

"तेरे कान खींचने पड़ेंगे. अगली दूर नहीं जा रही कही और रोना किसलिए, नयी शुरुआत हंस के होनी चाहिए. ध्यान से उठाइयो.", कौशल्या जी भी कड़ी हो कर बबिता के करीब आ गयी. राजकुमार जी ने गोलू को सहारा दिया हुआ था और अर्जुन बबिता के करीब आते हे कान में कुछ बोलने के बाद सीधे हाथ को कूल्हों से कुछ निचे टिकते हुए बड़े आराम से उठाये धीरे धीरे चलने लगा. वस्त्रो का उचित ड़याँ रखते हुए.

"माँ जी, अर्जुन मेरे हे नाम कर दो. इतने आराम से बबिता को उठाये है तोह हवेली भी ढंग से संभल लेगा.", ये बात सुशीला ने मजाक में कही थी और उनकी व्हीलचेयर लिए चलती ललिता जी भी मुस्कुराने लगी ये नजारा देख कर.

"हाँ तू चल पड़ वह मेरे साथ वो ज्यादा ठीक नहीं. हवेली चंद्रो बहिन जी को सँभालने दे जितने बिजेन्दर सब समझ नहीं जाता. वैसे इन लोगो को बोल दे सुशीला के घर में बरात भी आने वाली है तोह उसकी भी तैयारी कर ले बेटी विदा करके.", कौशल्या जी को ये भी ध्यान था के बिजेन्दर भी आने हे वाला होगा. गाँव की महिलीलाये बिदाई के गीत गाने लगी थी और सुशीला ने गले मिल कर बेटी को प्यार दिया. रामेश्वर जी ने दोनों को आशीर्वाद देने के बाद कार के सामने जल चढाने के बाद अर्जुन को धक्का देने को कहा.

"ये स्टार्ट तोह है बौ जी, इतने भारी भी नहीं है दोनों की धक्का देना पड़ा.", अर्जुन ने अनजाने में हे ये कहा था और सभी के चेहरे पर आंसू की जगह हंसी आ गयी थी.

"खोते डा पुत्तर. ोये रिवाज है ये और धक्के का मतलब बस हाथ लगा कर विदा कर.", रामेश्वर जी ने भी माहौल को खुशनुमा हे रखा था. बबिता हवेली से निकली हे थी और सुशीला की आँखों से आंसू जहर जहर बहने लगे. यही हाल पूर्णिमा जी, गुड्डी काकी और कौशल्या जी का था. अर्जुन का ध्यान अपनी ताई जी पर गया तोह उनकी भी आँखे गीली थी.

"ये लो सब दीदी के जाते हे रोने लगे. मैं वापिस ले आता हु उन्हें, गली में तोह है अभी.", सुशीला ने अर्जुन को कस के गले लगा लिया था ऐसा कहने पर. अर्जुन को ाचा महसूस हो रहा था क्योंकि ये कुछ ख़ास था जैसे सुशीला दिल से आज बहोत हल्का महसूस कर रही थी.

"बीटा, इतने साल बाद इस हवेली में कुछ मंगल काम हुआ. मुझे ख़ुशी है के मेरे दोनों बचो के साथ मेरी ज़िन्दगी संवारने वाला तेरे जैसा बीटा इस सबमे शामिल रहा. ये आंसू बेटी की विदाई के नहीं है रे, उस भगवन के बड़े दिल की वजह से है जिसने एक गलत औरत को भी नयी ज़िन्दगी और अवसर दिए. मेरे बेटे तू वो जरिया है जिसने ये बदलाव जाने कैसे ला दिया. माँ (कौशल्या जी) सही कहती है के रेखा की तपस्या का परिणाम हो तुम.", भीगी आँखों से भी सुशीला के चेहरे पर मुस्कान थी और घुटनो के भार बैठे अर्जुन को सीने से अलग करती वो उसका माथा चूमने लगी.

"तभी तोह दादी कह रही है के हमारे साथ चलो आप, माँ भी आपसे मिल कर खुश होगी. और मैं तोह हमेशा आपके पास हे हु.", अर्जुन ने हे रुमाल से उनका चेहरा साफ़ किया तोह पूर्णिमा जी ने भी करीब आ कर अर्जुन के सर को सेहला दिया.

"तुम किसी एक के तोह हो हे नहीं मुन्ना. सबने जो भी खोया हो हमारे परिवारों में लेकिन उसकी पूर्ति तुमने कर दी है. बस सदा ऐसे हे रहना मेरे बचे और हर घर तुम्हारा हे है.", पूर्णिमा जी ने दिल से ये बात कही थी और एक पल के लिए कौशल्या जी के चेहरे पर कुछ भाव आये जो रामेश्वर जी के ना में गर्दन हिलने से चले गए.

"हाँ, अब बस आपके हे घर आना बाकी है लेकिन उमेद चाचा कहते है के वह तोह कुछ है हे नहीं.", अर्जुन के भोलेपन को देख ऋतू बीच में हे बोल पड़ी जो पहले गेट के पास कड़ी ऋचा प्रीती को देख रही थी. उनके इशारे पर ऋतू ने अर्जुन को इस माहौल से आजाद हे करवा दिया.

"ारु, पटके चलने का टाइम हो गया.", इतना सुनते हे अर्जुन बहार की और निकल लिया पीछे पीछे ऋतू भी. बाकी सब बस देख रहे थे के ये लोग क्या कर रहे है. जल्द हे प्रवेश द्वार के आगे ये लम्बी पटाखों की लड़ी ऋचा और ऋतू बिछाने लगी थी जो अर्जुन ने डिक्की से निकल कर उन्हें दी थी. रामेशवर जी भी उनकी तरफ हे चल दिए थे छोल साहब को ले कर.

'taddd-taddd-taddd-tadddd' के शोर से माहौल गूंजने लगा था और अर्जुन द्वारा रखा एक बड़ा पटाखा खुद रामेश्वर जी ने प्रज्वलित किया जब चंद्रो देवी भी कार से उतर कर गेट के पास चली आयी. दिन के उजाले में भी वो 21 पटाखे आसमान में ाची रौशनी कर रहे थे और साथ साथ हे ढोल का शोर शुरू हो गया.

"रामेश्वर, ये तोह रौनक सचमुच हे दशकों के बाद लगी है.", इस बार चंद्रो देवी ने 100-100 के नोटों की गद्दी हे बच्चो के ऊपर से वार कर ढोल बजने वाले पर उड़ा दी. Bijender-Anupama की डोली वाली कार इस शोरगुल में हवेली के अंदर दाखिल हुई तोह सुशीला ने खुद तिलक का थाल राजकुमार जी के हाथ में दे दिया. अर्जुन के साथ बहार अब गुलाटी जी भी मस्ती में लग चुके थे जो अपने हे गले में ढोल डालते हुए पूरे जोश में hudd-dang कर रहे थे.

"नचा ले तेरी भाभी को, मैं न रोकती. और मेहुल को भी अंदर बुला ले, बीटा तोह वो भी है मेरा.", चादरों देवी ने पहली बार शायद हवेली में महिलाओ वाले कानून को घर से निकाल फेंका था जब प्रीती पाँव हलके थिरकते देखे, ताली बजाते हुए. उन्होंने ऋचा को भी छूट दे दी थी की वो यही आँगन में अनुपमा को नचा ले इन लड़कियों के साथ. यहाँ जल्द हे संजीव भैया भी कार में बाकी बहनो को लिए आ चुके थे.

"भाभी जी, बहोत बहोत मुबारक हो आपको ये खुशियों का दिन. एक बार इनको भाई साहब का भी आशीर्वाद लेने दो. फिर बचे कर लेंगे जितनी मस्ती करनी है.", छोल साहब ने चंद्रो देवी को याद दिलाया के हवेली में सबसे पहले तोह बिजेन्दर और अनुपमा को स्वगीय सोमबीर सिंह के आशीर्वाद से जीवन शुरू करना चाहिए.

"देवर जी, सोमबीर सिंह का हे तोह आँगन, एक फोटू के सामने कैसा आशीर्वाद. बचे खुशिया मनाये तोह वो भी खुश. चलो अब इनको करने दो मस्ती और 2 बातें हम बैठक में करते है.", बिजेन्दर भी सुन्न रहा था के आज दादी ने कैसा फैंसला लिया. गुलाटी जी के साथ उमेद सिंह अंदर आये तोह उनका जोश बता रहा था के आज यहाँ उन्हें भी नाचने की आजादी है. सबसे ख़ास बात थी की आज गोलियों के शोर की जगह dhol-nagade बज रहे थे जिस पर घूंघट वाली पड़ोस की युवतिया और घर की लड़कियां भी हाथ पाँव हिला रही थी. सुशीला के कहने पर संजीव ने भी बिजेन्दर को अपने साथ ले लिया था बस अर्जुन हे तारा के साथ यहाँ से ओझल दिखा.

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यहाँ पंडित जी के घर बैठक में शंकर जी, भुप्पी के साथ रेखा जी, रोमिला और रेणुका बैठे थे. रुपाली को शंकर जी ने कहा था के कोमल से चाय बनाने का बोल दे और थोड़ी देर यहाँ कोई न आये.

"देखो बाकी किसी को ये नहीं पता के आज जो भी हुआ वो हुम्ला रेखा पर हुआ था. मैं पता लगा रहा हु के ऐसा कैसे मुमकिन हुआ क्योंकि पहली नजर में तोह यही लगा था के उनके निशाने पर मैं, बिजेन्दर या कोई और पुरुष सदस्य होगा. इसके पीछे की मंशा तोह मैं न बता पाव लेकिन आज पहली बार परिवार की एक महिला को निशाना बनाने की कोशिश हुई है तोह मामला गहरा हे होगा.", शंकर जी ने तीनो महिलाओ को समझने के अंदाज में बात शुरू की थी और भूपिंदर जी ने भी सहमति जताई.

"पर भैया, रेखा भाभी हे क्यों? इनकी ज़िन्दगी तोह हमेशा इस घर में हे रही है फिर कोई इन पर हे क्यों हुम्ला करने लगा? और कौन है ये अवधेश मिश्रा?", रेणुका का स्वर गंभीर और चिंता से भरा था. यहाँ सिर्फ शांत था तोह वो सिर्फ रेखा जी, जिन्हे मारने की आज एक बड़ी कोशिश की गयी थी वो भी जनता के सामने और दिन के उजाले में.

"यही तोह पता करना है रेणुका. अवधेश मिश्रा तक मेरी बीवी की सूचना जाना और फिर दूसरी तरफ उसका हवेली पर विवाह में शामिल होना फ़िलहाल समझ से बहार है. लेकिन मैंने आप तीनो को इसलिए यहाँ बुलाया है के इस बात का जीकर किसी से भी मैट कीजियेगा.", शंकर जी ने अपने लफ्ज़ अंग्रेजी में हे कहे थे जिस से यहाँ बैठे बाकी लोग ाचे से परिचित थे.

"वह भीड़ थी शंकर, सबने देखा है तोह हमारे बताने या न बताने से कैसा फरक पड़ेगा? ऐसा तोह इटली में भी अब नहीं होता जैसा मैंने इंडिया में आज देखा. ओपन फायरिंग वो भी जिसमे 3 लोग मारे गए. ये बात अखबार तक जा सकती है."

"रोमिला, इनका मतलब है के ये बात सिर्फ एक हमले की तरह हे देखि जाए. किसी को ये नहीं कहना की ये मुझ पर किया गया था.", रेखा जी के सटीक जवाब से एक पल के लिए शंकर और भूपिंदर हैरत में पड़ गए थे की जिस बात को वो घुमा फिर कर कहने वाले थे रेखा ने सीधा बोल दिया.

"जी भाभी जी, रेखा भाभी ने जैसा कहा है वैसा मतलब है हमारा. घर के ऐसे सदस्य पर हुम्ला होना गलत सन्देश देगा बहार. तोह आप लोग बात पूछे जाने पर बस यही कहेंगी की वह हुम्ला हुआ था लेकिन किस पर ये आपको नहीं पता. बस रेखा भाभी का नाम इसमें कभी भी नहीं आना चाहिए.", भुप्पी ने भी मंतव्य स्पष्ट किया लेकिन रोमिला गर्दन ना में हिलने लगी.

"मुझे ये ठीक नहीं लग रहा है शंकर लेकिन अगर तुम ऐसा हे चाहते हो तोह फिर यही सही. तुम्हे कानूनी तरीके से मुख्या अपराधी को पकड़ना चाहिए और जो भी तुम्हारे झगडे है बहार उनसे परिवार के किसी सदस्य पर किसी किस्म का संकट नहीं आना चाहिए. अंकल से तुम बात नहीं कर सकते तोह तोह मैं ये बात रख सकती हु. आज रेखा पर अटैक हुआ है, कल को कॉलेज जाती हुई किसी बेटी पर हुआ तोह क्या जवाब होगा तुम्हारे पास. एव्री डे इस नॉट संडे शंकर. किस्मत और सुरक्षा हर जगह नहीं मिलती.", रोमिला का भड़कना देख एक पल तोह शंकर जी की नजरे हे झुक गयी. सच था के आज रेखा पर गोली चलाई गयी थी और कल komal-Ritu या किसी भी सदस्य पर हुम्ला हो सकता है. लेकिन रेखा जी ने रोमिला का हाथ पकड़ते हुए ना में गर्दन हिला दी.

"ये संभल लेंगे रोमिला और यहाँ शहर में ऐसा मुमकिन नहीं है. बस ध्यान रखो के ये बात अर्जुन को पता न लगे. रेणुका वो तुमसे भी बहोत लगाव रखता है इसलिए इसका जीकर प्रीती या किसी भी सदस्य से मैट करना.", रेखा जी ने तोह साफ़ नाम हे ले दिया था के उनके पति और दोस्त को अगर किसी के पता लगने का डर है तोह वो अर्जुन है. रेणुका और रोमिला ने अब सहमति दे दी थी की ये बात वो किसी से नहीं करेंगी.

"थैंक यू. और अब मैं विश्वास दिलाता हु के ये जो भी व्यक्ति थे वो फिर कभी ऐसा नहीं कर पाएंगे. अर्जुन थोड़ा भावुक लड़का है तोह उसकी चिंता है मुझे. जवान लड़का ऐसे हादसे होने पर गलत निर्णय ले लेते है इसलिए मैं बताने से मन कर रहा हु.", शंकर जी बोल तोह रहे थे लेकिन मैं सचमुच अशांत हो चूका था क्योंकि उनकी बीवी भी जानती थी की उन्हें चिंता क्यों है.

"वैसे वह हम तीनो के सिवा और भी 3 लोग थे और वो तीनो अर्जुन के उतने हे करीब भी है. उन्हें भी तोह पता है के हुम्ला मुझ पर किया गया था. आपने उनसे बात की है जी?", रेखा जी के इस सवाल पर शंकर ने भुप्पी की तरफ देखा तोह उसने 2 उंगलिया की.

"वह संजीव और गज्जू हे तोह ये जानते थे, और वो इसका जीकर नहीं करने वाले. तीसरा कौन था वह?", शंकर जी को विश्वास था भुप्पी पर भी और खुद की नजर पर भी.

"तारा. और संजीव अलका, तारा और आरती को ले कर वही गया है. आप बात करके देख लीजिये वह, कही ऐसा न हो के तारा कुछ बता दे और अर्जुन उमेद भाई साहब या संजीव से सवाल करने लगे.", रेखा जी ने याद दिलाया तोह शंकर जी तुरंत हे फ़ोन की तरफ लपके. उनकी फुर्ती देख कर बाकी चारो का भी ध्यान वही चला गया. नंबर तोह जुबानी याद था जिसको मिलाने के बाद वो हैंडल कान से लगाए जाती हुई घंटी की प्रतीक्षा करने लगे. सामने जानी पहचानी आवाज कानो में गुंजी.

"Hello, हांजी कौन बोल रहा है?"

"लता, वह तारा है तोह उस से बात करवाना.", शंकर जी ने नाम भी ले दिया था बेध्यानी में लेकिन अपनी बात कह दी.

"तुम इधर नहीं आये, ऋचा को भी ाचा लगता अगर यहाँ आते.", लता तोह यहाँ अपने हे राग ले कर बैठ गयी थी. जल्दबाजी में शंकर जी ने ये गलती भी कर हे दी.

"वो सब बाद में, तारा से बात करवाओ या फिर पापा से.", शंकर जी का सहस जवाब दे रहा था क्योंकि रेखा को छोड़ कर बाकी तीनो उन्हें हे देख रहे थे.

"पंडित जी तोह माँ जी के साथ बैठक में मीटिंग कर रहे है. सभी बड़े वही है और ये तारा कौन है? यहाँ तोह बहार आँगन में Ritu-Preeti के साथ 2 और लड़कियां है जिनके साथ ऋचा भी है. ऋचा से बात करवौ क्या?"

"ध्यान से सुनो, फूलो की ड्रेस में एक गोरी सी लड़की होगी ऋतू की उम्र की. अगर वो आँगन में है तोह उस से मेरी बात करवा दो और और कोई सवाल नहीं.", शंकर जी थोड़ा सँभालने का प्रयास कर रहे थे क्योंकि जो नजरे उन्हें नहीं देख रही थी उनसे हे जैसे परेशानी हो रही थी इस वक़्त. वही मधुलता हमेशा की तरह हावी थी

"ाचा वो लड़की, वो तोह अर्जुन की कार के अंदर बैठी है जबसे आयी है. क्या लगती है वो तुम्हारी? अर्जुन की ज्यादा हे ख़ास दिख रही है मुझे तोह."

"मैं फ़ोन होल्ड पर रख रहा हु तुम उसको बुलाओ.", शंकर जी ने जैसे तैसे खुद को खामोश किया और 1 मिनट की प्रतीक्षा एक साल के बराबर लगी थी लेकिन तारा की आवाज सुनते हे थोड़ा चैन मिला.

"हाँ मां जी, कहिये.", तारा के पास हे मधुलता कड़ी थी जो मां कहने पर मुँह टेढ़ा करने लगी.

"अर्जुन से तुमने किसी बात का जीकर तोह नहीं किया जो भी आज शादी में हुआ?", एक पल के लिए तारा ये सुन्न कर खामोश हो गयी और फिर मधुलता को वह से जाने का इशारा करने के बाद बोली.

"ये आंटी सर पे कड़ी थी मां जी. इनको प्राइवेसी की समझ नहीं है क्या कोई? हाँ तोह मैंने अर्जुन को क्या बताना था? बस वही सब बातें हो रही थी की वह मैं अक्षरा सी मिली, मुस्कान से भी और क्या कुछ नया देखने को मिला. थकान थी तोह कार में बैठे थे एक चला कर. क्यों वह ऐसा क्या हुआ था जो अर्जुन को नहीं बताना?", तारा जैसे सामने से हे बुलवाना चाहती थी और नजर उसकी दरवाजे के बहार से दिखती परछाई पर भी थी. मधुलता के बदन में चींटियां दौड़ गयी थी जैसे तारा ने उसको कमरे से बहार जाने का कहा था और फिर शिकायत लगाईं थी.

"वो गोली चलने वाली घटना के बारे में तोह कुछ नहीं बताया न तुमने उसको? वो बात अर्जुन को नहीं बतानी, अर्जुन तोह क्या किसी को भी नहीं कहना कुछ.", तारा ये सुन्न कर न जाने क्यों खुश हो रही थी लेकिन फिर जवाब दिया.

"अब ये बातें तोह नहीं करने वाली न मां जी मैं उसके साथ किसी और के घर में. मुझे ये सब टॉपिक पसंद नहीं है और मैं थोड़ी हे देर में आने हे वाली हु घर.", अभी वो फ़ोन रखती उस से पहले मधुलता कमरे में दाखिल हो गयी जो तारा को फ़ोन रखते देख रही थी.

"बिटिया, मुझे भी बात करनी थी उनसे. इसलिए मैं कड़ी थी यहाँ. उन्होंने फ़ोन काट दिया क्या?"

"हाँ आंटी जी, मां थोड़ा परेशां है और उन्होंने कहा के फ़ोन रख रहे है. मिला लो आप नंबर या मैं मिला देती हु.", तारा ने हैंडल सही से नहीं रखा था और लाइन चालु थी.

"न, फिर कभी सही. मैं तोह देवर जी से पूछ रही थी की वो शादी में नहीं आये.", अब तारा ने हे फ़ोन काट दिया.

"क्या आंटी जी, एक टाइम पर 2 जगह मां जी कैसे हो सकते है. जहा जरुरी था वह चले गए.", और तारा बहार चली गयी पीछे लता को इतनी हे देर में कई झटके देने के बाद.

"तारा ने अर्जुन को कुछ नहीं कहा और वो बताएगी भी नहीं. अभी मैं चलता हु क्योंकि जरुरी काम है इस सिलसिले में. भैया और संजीव बाकी सबको लेके थोड़ी हे देर तक आ जायेंगे. अर्जुन Ritu-Tara को छोड़ कर बबिता के ससुराल जाने वाला है तोह वो कल हे वापिस आएगा फिर.", शंकर जी ने घडी में समय देखा तोह 4 बज रहे थे. और इसके साथ हे हवेली के हे नंबर से फ़ोन की घंटी बज उठी.

"Hello."

"भोले, चाचाजी और धर्मवीर अंकल मेरे घर तुझे बुला रहे है. 6 बजे तक पहुंच जाना, उनके पास कुछ कबूतर है और 2 चूजे मेरे पिंजरे में भी. थे वेरे आफ्टर देवदरोप बूत फेल्ड. नक्शा कही और का खींचा, प्लाट कही और दिखाया लेकिन जमीन अपने वाली चाहिए थी. 6 बजे.", उमेद क्या कह गया था कुछ देर तक तोह शंकर के पहले से अशांत मैं में समझ न आया और वो बस बुदबुदाने लगे

"देवदरोप"

"औंस की बूँद", रेणुका उठते हुए बोली तोह रोमिला भी रेखा जी के साथ अंदर की तरफ चल दी. 2 कप चाय रखते हुए कोमल ने एक और हिंदी अनुवाद दिया इस शब्द का.

"शबनम देवदरोप.", और वो भी ट्रे ले कर माँ के पीछे चली गयी.

"शंकर तू तोह भाई घर न हे आया कर. तेरी फटी पड़ी थी अभी जब फ़ोन पे था. और ये सारे हे लोग पंडित जी ने त्रिनेड कर रखे है क्या? भाभी कुछ बोलती नहीं लेकिन जब बोलती है तोह द्रोणाचार्य. ये छोल साहब की बहु, इसमें भी एक आर्मी है और रेणुका बहिन भी गहरा सोचती है. तू वही ठीक है यहाँ अर्जुन को इस इंद्रप्रस्थ में अकेले रहने दे और 5 गाँव लेके बहार हे चल.", भुप्पी चाय की चुस्की लेते हुए गंभीर बात भी मजाक में कर रहा था.

"सचमुच यार. इस घर में साला गांड फट रही थी आज मेरी. ये चाय यही छोड़ और चल बहार. जाते हुए मेरी बेटी भी बोल गयी शबनम. ये गज्जू भी मेरे बाप की तरह सीढ़ी बात नहीं करता, जैसे सब कोई इसपर भी नजर रखे हुए हो.", शंकर जी पल भर भी वह न रुके और एक नजर सफारी के टूटे कांच पर डालने के बाद उसको कवर से ढकते हुए एस्टीम में हे भुप्पी के साथ बहार निकल गए.

"हाँ. नज़र रखे हुए है?", भुप्पी ने यही पंक्ति दोहराई और फिर खामोश हो गया. वही अब रेखा जी के कमरे में सिर्फ रोमिला और रेखा जी हे थे. रेणुका बाकी सबके साथ माधुरी के कमरे में चली गयी थी. चाय पीते हुए बात रोमिला ने हे शुरू की और जैसा देख कर लग रहा था के रेखा और रोमिला में अब घनिस्तता बढ़ चुकी थी.

"ये सब देख कर तुम इतना शांत कैसे रह सकती हो रेखा? मैं अभी तक सदमे में हु और तुम्हारे पति ऐसे सबको चुप रहने को कह रहे है.", साड़ी में जो चेहरे सवेरे गुलाब सा खिला था वो अब चिंतित और कुछ थका सा लग रहा था. वही रेखा जी के चेहरे पर हमेशा वाली हलकी मुस्कान थी.

"गुस्सा भी क्यों करू रोमिला? किसी और ने हुम्ला किया जिसमे इनका तोह कोई कसूर नहीं. बचे परेशां न हो इसलिए वो ऐसा कह रहे है और जरुरी बात है के मैं बिलकुल ठीक तुम्हारे सामने हु. ये उदासी तुम पर ाची नहीं लग रही.", रेखा ने रोमिला का खाली हाथ थाम कर आग्रह किया तोह अब कही वो थोड़ी कोशिश करने लगी थी ठीक होने की.

"जितना मैं समझ रही हु बात अलग है रेखा. ऐसे हमले तभी होते है जब किसी को अप्रत्यक्ष नुक्सान पंहुचा कर कमजोर होने का एहसास करवाया जाये. जिसने भी ये किया वो दुश्मन होगा शंकर या अंकल जी का. तुम परिवार की एक बहोत हम सदस्य हो और तुम्हे मार कर वो वही करना चाहते थे. लेकिन ज्यादा चिंता शंकर को ये है की अर्जुन तक बात न जाए, जबकि होना चाहिए की वो तुम्हारा ख्याल रखता और हिम्मत देता.", रोमिला को अभी भी फ़िक्र रेखा की थी और थोड़ा गुस्सा शंकर पर.

"अर्जुन को दूर रखना जरुरी है रोमिला, प्रीती ने तोह तुम्हे बताया हे होगा. और मुझे इस सबसे जरा भी डर नहीं लगा रोमिला बस चिंता थी तोह तुम्हारी और बचो की. सब सही है और हम अपने घर है.", रेखा जी ने कप रखने के बाद एक नया गाउन अलमारी से निकल कर छोटी टेबल पर रख दिया, रोमिला के लिए.

"हाँ प्रीती, विक्की और रेणुका ने अपने अपने किस्से सुनाये थे मुझे अर्जुन के बारे में. वो सक्षम है और अब तुम्हारे कहने से मैं भी समझ रही हु की शंकर क्यों अपने बेटे तक बात नहीं जाने देना चाहता.", रोमिला ने रेणुका का जीकर किया तोह रेखा को थोड़ा अजीब लगा के अर्जुन का ऐसा कौनसा किस्सा हो गया जिसमे रेणुका शामिल थी. रोमिला ने भी ये भांप लिया था के रेखा कुछ विचार कर रही है.

"वो इसलिए हे ऐसा कर रहे है रोमिला क्योंकि ये ghar-pariwar अगर आज खिल रहा है तोह उसकी वजह maa-papa के साथ साथ अर्जुन है. अर्जुन कुछ ज्यादा हे भावुक है और ऐसी किसी बात का पता लगने पर जो दुःख उसको होगा वो गलत असर करेगा. लो तुम कपडे बदल लो मैं बाथरूम से आती हु अभी.", रेखा का जवाब बेशक सच था लेकिन रोमिला के पास जैसे इसका भी जवाब था. आँचल गिरते हुए वो साड़ी ढीली करने के साथ हे अपने दिल की बात कहने लगी.

"इस बात से मैं इत्तेफ़ाक़ रखती हु रेखा की अर्जुन जरूर चिंता करेगा और वो होना भी लाजमी है. पूरी बात ये है की वो अपनी माँ को नुक्सान पहुंचने वाले के पीछे जाएगा और सही सजा भी देगा. हमारी बेटी (प्रीती) के लिए वो जब कुछ भी कर गुजर सकता है तोह तुम तोह अर्जुन की माँ हो. आगे तुम भी समझती हो और मैं भी कहना नहीं चाहती. चलो ाची बात है के वो लड़का इस सबमे न हे पड़े.", रेखा ने भी सर हिलाते हुए हाँ कहा और saree-blouse आदि लेकर बाथरूम में चली गयी. रोमिला भी दरवाजा बंद करती अपने वस्त्र बदलने लगी कुछ सोचने के साथ.

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5 बजे तक अर्जुन और संजीव हवेली के सभी सदस्यों से मिलने के बाद अनुमति लेते हुए अपनी अपनी कार की तरफ बढे तोह उमेद सिंह के इशारे पर कौशल्या जी ने दोनों को रोक लिया. अर्जुन की कार में अब अलका, प्रीती, तारा के साथ ऋतू बैठी और इलो में आरती, राजकुमार जी और ललिता जी. ये लड़कियों ने अपनी मर्ज़ी से हे किया था. शगुन, मिठाई आदि पहले हे संजीव की गाडी में चंद्रो देवी ने रखवा दिए थे.

"गाडी थोड़ी भी इधर उधर चलाई तोह दोनों उलटे लटका दूंगी. शाम का टाइम है और पूरी सावधानी से जाना घर.", अर्जुन अपने भैया की तरफ देखने लगा के दादी अब नाराज कैसे हो गयी.

"जी दादी, आराम से हे जायेंगे और अर्जुन अपनी कार मेरे पीछे हे रखेगा. वैसे दूसरी हवेली पर दीदी को लाने ये अकेला हे जायेगा क्या?", अब वही सवाल हो गया था जो अर्जुन बिलकुल नहीं चाहता था.

"हाँ तोह चला जायेगा अकेला, मुझे चिंता कार में बैठे पूरे परिवार की है. तुम दोनों ज्यादा वीडियो गेम खेलते हो और कही असली में इन करो के साथ ऐसा वैसा न करने लग जाओ यही चिंता है. अर्जुन, सवेरे दिन निकलते हे बबिता को मंदिर दर्शन के बाद सीधा यहाँ छोड़ के 7 बजे घर मिलना चाहिए.", कौशल्या जी की खरी खरी सुनते हुए उमेद सिंह को हंसी आ रही थी. मैं तोह उनका भी अशांत था लेकिन यही हुनर था उमेद सिंह में की वो हर पल को सबके साथ वैसे हे जीता था जैसे ाचा लगे.

"बस कर कौशल्या, तू इन्हे शिक्षा दे रही है आप तोह दिल्ली से यहाँ 4 घंटे में पहुंचने का हुकुम दिया करती. ये समझदार बचे है और अर्जुन सवेरे जब दिल करे आ जइयो और वापिस भी अपनी मर्जी से जाना है. तेरी ये दादी अपना टाइम भूल गयी वो मैं याद करवा दूंगी.", चंद्रो देवी ने मीठी झिड़क लगते हुए कौशल्या जी को और कुछ कहने से मन किया. उमेद ने भी अर्जुन को अकेले में कुछ समझाया और फिर दोनों हे भाई घर की तरफ निकल लिए.

"ताई जी अब आज्ञा दीजिये हमको भी निकलना होगा. शालिनी और बचे उडीक रहे होंगे वह घर पर और थोड़ा जरुरी काम भी है. मैं रात में चक्कर लगा जाऊंगा एक बार.", उमेद सिंह ने हाथ जोड़ कर इजाजत मांगी और बैठक से रामेश्वर जी के साथ गुलाटी और छोल साहब भी बहार आ गए. पूर्णिमा जी ने भी हाथ जोड़ कर फिर आने का कहा. चंद्रो देवी ने सभी को शगुन दिया था जिसको वो रिश्ते में छोटे होने की वजह से इंकार न कर सके सिवाय रामेश्वर जी के.

"भाभी ये बोझ मैट चढ़ाओ आज. पौती मैंने विदा की है और मुझे हे शगुन दे रही हो आप?"

"रख ले रामेश्वर, तू पहले भी ले चूका है मेरे से. वो बात अलग है तब ब्याह नई हुआ था तेरा लेकिन बड़ी हु मैं तोह उस हिसाब से दे रही हु.", इस बात से साफ़ हो गया था के पंडित जी का सम्बन्ध यहाँ दशकों पुराण था.

"हाँ, मैंने भी सुना था के वो (रघुबीर) और भाई साहब आपसे हर काम के बदले ब्याज वसूलते थे.", पूर्णिमा जी के इस खुलासे से कौशल्या जी थोड़ी हैरानी से अपने पति को देखने लगी जो अब आराम से शगुन का लिफाफा ले कर जेब में रख रहे थे.

"मैं आयी थी ब्याह के 15 बरस की. बड़े पंडित के साथ ये दोनों इधर आते थे उपहार देने के बदले भी 4 आने वसूलते थे. रघुबीर तोह उल्टा मेरा नेग हे जेब में दाल के ले गया था जो मुँह दिखाई में मिला था. आज शर्म आ रही रामेश्वर को लेकिन वो टाइम भूल गया ये.", चंद्रो देवी ने माहौल को आज एक पल भी उदास न होने दिया था.

"अपना ख्याल रखना भाभी, सवेरे जाने से पहले मैं मिल कर जाऊंगा.", रामेश्वर जी ने भी समय और चर्चा का रुख देखते हुए निकलने में हे भलाई समझी. हँसते मुस्कुराते हुए चंद्रो देवी ने सबको विदा किया और आज कितने हे सालो बाद वो हवेली के खुले आँगन में चैन से खाट पर बैठ गयी थी. न कोई चिंता, न ऊँची आवाज और जरा भी गुस्सा न दिखाया था उन्होंने. सुल्तान भी हिलता डुलता उनके हे सामने आ बैठा था जिसके साथ बिजेन्दर एक कुर्सी ले कर आया था.

"आज मेरी दादी 25 साल जवान लग रही है.", बिजेन्दर साफ़ कुर्ते पाजामे में मुस्कुराता हुआ उनका हाथ पकड़ते हुए कहने लगा तोह चंद्रो देवी ने वो हरे पैन जड़ी मोटी चैन अपने पौटे के गले में दाल दी.

"अब मैं निश्चिंत हो गयी बीटा. ये स्वर्गीय मनफूल सिंह (सोमबीर सिंह के पिता) के वारिस को उसकी जिम्मेदारी मुबारक. मैं अब रिटायर और तू आज से गद्दी का मालिक. कर खेती, देख भत्ते और बना हवेली के नियम जैसा दिल करे. बस ये बुढ़िया अब अपने अंतिम दिन चैन से गुजरना चाहती है.", बिजेन्दर मन करते करते रुक गया था आखिरी लाइन सुन्न कर. यहाँ मधुलता और गुड्डी काकी के साथ ऋचा भी आ गयी थी. परिवार में आये रिश्तेदार हवेली के पिछले हिस्से में आराम कर रहे थे.

"बिलकुल ठीक कहा दादी ने भैया. अब मैं भी इनके साथ ये पूरा महीना बिताना चाहती हु जो पहले संभव नहीं था. हम दोनों अब घुमाई करेंगे, क्यों दादी.?", ऋचा ने अपनी दादी के गले में बाहें डालते हुए गाल चूम लिया.

"जमा सही बात कही मेरी बची ने. बहोत हो गया ये khet-dangar और गाँव की पंचायत देखना, हुकुम चलना. अब सारा कुछ तू संभल और बाकी जायदाद सांझी है लेकिन मेरे जाने के बाद 4 हिस्से करना चाहो तोह कर लियो. कथे रहो तोह और भी बढ़िया.", चंद्रो देवी दोनों हे बचो को दुलार रही थी. सुशीला भी व्हीलचेयर पर इस तरफ आ गयी कुछ काम से फारिग हो कर.

"माँ जी 4 हिस्से? बिजेन्दर, सुदर्शन और रविंदर हे तोह हैं.", मधुलता कहा ज्यादा चुप्प रह सकती थी.

"मुन्नी तुझे लड़के हे दीखते है घर में? हवेली तोह मेरी लाडो की हे है लेकिन बाकी सबकुछ इन बचो का. बस जब ऋचा छोटी थी तोह शंकर संरक्षक था और अब मुस्कान जितने नहीं साथ रहती इतने बिजेन्दर उसकी कमाई बैंक में डलवाता रहेगा. है तोह वो भी मेरी हे बची.", चंद्रो देवी की बात पर सबसे ज्यादा खुश बिजेन्दर और ऋचा हे थे.

"हाँ दादी, मुस्कान दिल से मेरी बहिन है. सबसे छोटी बहिन और बबिता दीदी भी चाहती है के वो उनके साथ हे रहे.", बिजेन्दर का उत्साह देख मधुलता वो न कह पायी जो वो बोलना चाहती थी लेकिन फिर भी गलत बात निकल हे गयी.

"माँ जी मुझे लगा के आप चौथा नाम कही अर्जुन का लेने वाली हो."

"मुन्नी तू सच में मुन्नी हे है बीटा. वो लड़का लेने वालो में से नहीं है और हमारी क्या बिसात के उसको dhan-daulat दे सके.? शंकर के दादा की पूरी वसीयत में 3/4 का मालिक वो अकेला है और कौशल्या के पिता जी की भी पूरी वसीयत अर्जुन के नाम है, कुछ बनवारी की बिटिया के नाम छोड़ कर. अब वो भी उसकी सगी बहिन है. वो इंसान की कदर करता है ये पता होते हुए भी की बाकी 3 हवेलियों के मालिक भी उसकी जायदाद के सामने कुछ नहीं है. बस मैं भी कुछ दिन उसकी तरह जीना चाहती हु.", मुन्नी की जुबान को लकवा हे मार गया था ये जान कर. वो जानती थी की पंडित रामेश्वर शर्मा की जायदाद ाची खासी है लेकिन सबकुछ एक हे लड़के के नाम है और वो भी दोनों तरफ की.

"हाँ दादी अर्जुन वैसे हे खुश रहता है और बाकी सब भी तोह वह घर में कितने मिलनसार है. पापा बता रहे थे हवेली तोह उनके पास भी है लेकिन वह उनके चाचा जी रहते है, पंजाब में.", ऋचा ने भी बात जारी राखी.

"तेरी पूर्णिमा दादी है न वो वही से हे हैं. शंकर के दादा राजा के मुंशी थे और पूर्णिमा के पिता का वही लकड़ी का कारखाना और जमींदारी थी. रघुबीर के लिए तोह एक मिनट में पूर्णिमा को पसंद कर लिया गया था. चल छोड़ ये बातें, आज तू चूल्हे पर चाय रख के दिखा मेरी बची. देखे तू सुशीला से बढ़िया बना सकती है या नहीं.", चंद्रो देवी ने किस्से सुनाने बंद करते हुए सेवक को वो आँगन में पड़ा हुक्का स्टोर में बंद करने का आदेश दिया और कमीज ढीली करती हुई खाट पर पसर गयी, हलकी जलन थी ठीक हो रही खाल पर.

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रस्ते भर लड़कियां बस अपने अपने अनुभव साँझा करती हुई बातों में लगी रही. अर्जुन बड़े ध्यान से कार चलता हुआ पूरे रस्ते अपने बहिया के पीछे हे चला था. 35 मिनट बाद सभी अपने घर लौट आये थे और Arjun-Sanjiv ने सलीके से कार कड़ी करने के बाद सामान निकल कर बैठक में रख दिया था. एक नजर कला लबादा ओढ़े कड़ी बड़ी गाडी पर डालने के बाद अर्जुन सीधा ऊपर अपने कमरे में चला गया. कपडे बुरी तरह मैले थे और बिना नहाये अब चैन भी नहीं मिलने वाला था.

बाकी सभी का भी कुछ ऐसा हे हाल था और लड़कियां सुविधानुसार भीतर आँगन वाले बाथरूम और उनके कमरे वाले में कपडे बदलने, नहाने चल दी. रेखा जी ने अपने jeth-jethani और बाकी बचो के लिए रसोई में चाय की पतीली चले पर चढ़ा थी. इतनी bhaag-daud के बाद सबको इसकी दरकार तोह थी हे. संजीव बहार वाले आँगन में हे फुर्ती से mooh-haath धोने के बाद जरुरी काम का बता कर निकल गया था.

"तुम कितनी देर में निकल रहे हो अर्जुन?", रेखा जी सबको चाय देने के बाद ऊपर अपने बेटे के कमरे में चली आयी. साफ़ कपडे देते हुए उन्होंने अर्जुन के उतरे हुए कपड़ो में से पर्स निकल कर वही रखते हुए पुछा. अर्जुन अभी सिर्फ अंदरूनी वस्त्रो में था और माँ को देख कर उनके गले लग गया. कुछ पल बस उन्हें महसूस करके वो अलग हुआ और इस्त्री किया हुआ ये नया पजामा पहनते हुए जवाब देने लगा. रेखा जी तोह उसके ऐसे मिलने से थोड़ा परेशां हो गयी थी लेकिन हमेशा की तरह चेहरे पर सिर्फ मुस्कराहट थी.

"अभी निकलूंगा माँ तोह अँधेरा होने से पहले हे पहुंच जाऊंगा. लेकिन सुबह 7 बजे घर वापिस लौट आऊंगा. आप बताये के आज आपको ाचा लगा बहार जा कर?", अब इस बात पर रेखा जी न झूठ बोल सकती थी न सच. बीटा जा भी रहा था और वो बातें भी करना चाहती थी जिस से दिल कुछ हल्का हो जाये. लेकिन बोलना तोह था हे क्योंकि एक यही तोह था जिस से वो कुछ खुल कर बतला सकती थी.

"तेरे साथ जाती तोह ज्यादा ाचा लगता मुझे. वह कौन था मेरी पहचान का और ऊपर से तेरी सासु माँ को जो परेशानी हुई वो अलग. वैसे उधर सब ठीक रहा न?"

"मैं भी चाहता था के मैं आपके साथ हे चालू माँ लेकिन शायद ाचा हे हुआ के मैं इधर चला गया. लेकिन आपको मैंने वह नहीं जाने देना था, दिल अजीब सा रहा कुछ देर और..", कहते कहते अर्जुन रुक गया. ये थोड़ा ढीला कुरता पहन कर वो बटन बंद करने लगा तोह रेखा जी ने टेबल से उठा कर कलाई घडी अर्जुन के बांध दी.

"और फिर ारु ने तोह जो पिटाई की वह उस लड़के और उसके साथ आये सिक्योरिटी गुरदस की तोह देख कर मजा आ गया माँ. उमेद चाचा भी ारु को देख कर खुश हो रहे थे.", ऋतू पीछे से अपनी माँ से लिपट कर इतना हे कह पायी थी की रेखा जी के हाथ अर्जुन का पर्स उठाते उठाते रुक गए. अंदर प्रीती और कोमल दीदी भी आ गयी थी.

"ये क्या सुन्न रही हु मैं अर्जुन? तुमने वह लड़ाई की वो भी शादी वाली जगह?", रेखा जी के चेहरे पर गुस्सा तोह नहीं लेकिन गंभीरता जरूर छा गयी थी. और जैसे हे ऋतू के हाथ में वो चमचमाती रिवॉल्वर देखि तोह तुरंत कब्जे में लेते हुए गोलियां अलग कर दी. अर्जुन बस दांग खड़ा था के माँ ने ये क्या किया.

"वो माँ यही पिस्तौल मेरे ऊपर उस लड़के ने लगाई थी जिसको बाद में ारु ने पीटा था. उसने तोह प्रीती के साथ भी बदतमीजी की थी. और ये सब मंदिर में हुआ था शादी में नहीं.", रेखा जी ने एक नजर कोमल को देखा और फिर ऋतू और प्रीती के सर पर हाथ फेरते हुए कहने लगी. पिस्तौल एक तरफ राखी थी अब.

"गलत करने वाले के साथ गलत ban-na जरुरी तोह नहीं? अर्जुन ने रक्षा में जो किया वो उसका फ़र्ज़ है बेटी लेकिन आइंदा हथियार को हाथ में नहीं लेना. एक गलती बहुत लोगो का भविष्य अंधकारमय कर सकती है और मेरे बचे ऐसी कोई गलती नहीं करेंगे. कोमल, ये यहाँ से ले जाओ और जब तुम्हारे दादा जी आये तोह उनके सुपुर्द कर देना.", रेखा जी ने दोबारा उस पिस्तौल को हाथ नहीं लगाया और अर्जुन ऋतू की ये नासमझी चुपचाप देख रहा था.

"माँ, ये पिस्तौल मैं नहीं उठती तोह वो लोग उठा लेते. बस उसके बाद ये मेरे साथ हवेली आ गयी और वह से इधर. लेकिन आपको कैसे पता था के इसकी बुलेट्स ऐसे निकलती है.?", ऋतू के इस सवाल पर रेखा जी का साधारण सा जवाब था.

"बीटा फिल्मे मैंने भी देखि है थोड़ी बहोत. वैसे वो लड़का हवेली या पहचान का तोह नहीं था?", अर्जुन तोह चुपचाप अपनी चमड़े की चप्पलो पर कपडा मारने लगा और कोमल दीदी के साथ प्रीती मुस्कुरा रही थी.

"वो किसी अवधेश मिश्रा बाहुबली का बीटा था माँ, भाई ने तोह बस उसकी बलि दे हे दी थी और वो अवधेश मिश्रा जो भगा वह से अपने बेटो के लेकर जब उमेद चाचा ने धमकाया तोह वो फिर नजर हे नहीं आया. ाचा मैं तोह ये बताने आयी थी की सरोज मौसी का फ़ोन था और वो कह रही थी की आप उनसे बात कर लो.", ऋतू इतना बता कर प्रीती के साथ निकल गयी और कोमल ने भी वो असला वह से हटा दिया. अब अर्जुन और रेखा जी फिर से वह अकेले थे.

"तुम पर मुझे हमेशा नाज रहा है अर्जुन और मुझे विश्वास है के तुम ऐसे हे सबका ख्याल रखोगे. जब भी हाथ उठाओ तोह वो सिर्फ सुरक्षा में हे उठाना बीटा और वो भी अगर स्थिति वैसी बन जाये.", रेखा जी ने बेटे का माथा चूमने के बाद गाल सहलाया और मैले कपडे उठा कर बहार चली गयी. अर्जुन फिर से यही देख रहा था माँ ने उस से कोई सवाल हे नहीं किया. कलाई पर बढ़ी घडी पर नजर पड़ते हे वो बहार वाले रस्ते से हे अपनी मंज़िल की तरफ बढ़ गया.

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स्वगीय रघुबीर सिंह जी की हवेली में ठीक 6 बजे ये गंभीर मंत्रणा शुरू हो चुकी थी. इस ख़ास कमरे में डॉ धर्मवीर सांगवान के साथ रामेश्वर जी, छोल साहब एक तरफ बैठे थे और उमेद, शंकर, भुप्पी, गुलाटी और संजीव कुर्सियों पर अर्धगोलाकार स्वरुप में ठीक उनके सामने. किसी साधारण श्वान (डॉग) से दोगुना बड़ा ये भेड़िया जैसा कुत्ता पूरी मुस्तैदी से रामेशवर जी की बगल में बैठा सामने वालो को देख रहा था.

"आज धर्मवीर भाई और उमेद सचेत न होते तोह जानते हो शंकर क्या दुर्घटना हो सकती थी? शबनम को किस से पूछ कर तुम हॉस्पिटल से बहार ले कर गए थे?", रामेश्वर जी की आवाज बिलकुल साधारण थी लेकिन वो कुत्ता 'gurrr-gurrr' करने लगा तोह उसके सर पर उन्होंने हाथ रख दिया. शंकर के पास अब इस बात का क्या जवाब होता क्योंकि ऐसा फैंसला तोह वो सिर्फ अकेले में लेने की गलती कर सकते थे.

"मुझे लगा था के इस से वो थोड़ा बेहतर महसूस करेगी और अपनेपन में कुछ बात बता देगी. लेकिन मैं शहर से बहार नहीं गया था पापा. शहर तोह क्या मैं हॉस्पिटल से भी सिर्फ 2 किलोमीटर तक गया था. लेकिन अवधेश मिश्रा को ये खबर नहीं लग सकती की शबनम कहा राखी गयी है.", शंकर ने जो बात छुपाई थी वो सुन्न कर जहा छोल साहब और गुलाटी थोड़ा हैरान थे वही उमेद ने नजरे झुका ली थी.

"तुमने उस दिन किसको बताया था के उस हॉस्पिटल जा रहे हो या फिर शबनम से मिले हो? सोचो शंकर, अवधेश मिश्रा तोह कभी भी यहाँ था हे नहीं. कोई ऐसी कड़ी तुम देख नहीं प् रहे हो जो तुम्हारे aas-pas हे है. आज की घटना बेशक हॉस्पिटल से शबनम को निकलने के लिए रचा जाल था लेकिन 2 जगह परिणाम कुछ बड़े हो सकते थे. ऋतू और रेखा की जान जा सकती और तुम्हे तब भी समझ नहीं आता की ये सब कौन करवा रहा है. अवधेश मिश्रा बस एक चेहरा है.", सांगवान जी की ये बात सुन्न कर सचमुच शंकर के चेहरे पर पसीने आ गए थे. एक नजर उमेद को देखा तोह उसने भी हाँ में सर हिला दिया.

"अर्जुन न होता तोह शायद Ritu-Preeti में से किसी एक पर आज भानु मिश्रा गोली चला चूका होता या फिर ऋचा समेत तीनो लड़कियों को लेके वह से निकल जाता. देखा जाए तोह अर्जुन हे था जिसकी वजह से उधर मैं तुम्हारे पास पहुंच सका और मैंने हे ऋचा को कहा था के वो अक्षरा से बात करके वो घटना बताये. अक्षरा ये संदेसा किसी को आगे दे. अपने बेटे की जान बचने के एवज में अवधेश ने मुझे बताया के उसके लोग क्या करने वाले है.", उमेद ने हकीकत बताई तोह गुलाटी ने शंकर की पीठ थपथपी जैसे कह रहा हो के सब ठीक है.

"वैसे तुम्हे विचार करना चाहिए शंकर की ऐसा कौन है जो अवधेश मिश्रा को यहाँ आने पर मजबूर कर सके. बिंदु वो शख्स नहीं हो सकती क्योंकि उस तक भी सूचना जायेगी तोह यही से जाएगी.", छोल साहब की बात में शंकर के प्रति सहानुभूति थी क्योंकि वो जानते थे शंकर थोड़ा भोला है.

"सही कहते हो आप चाचा जी, भोले बस थोड़ा सा दिल से चलता है. करना तोह ये हमेशा ठीक हे चाहता है लेकिन इसको भी नहीं पता चलता के गलती कहा हो जाती है. शबनम को अपनेपन से हे तोडा जा सकता है क्योंकि वो पहले हे शारीरिक दर्द और चेहरा छुपाने में माहिर है.", उमेद ने भी शंकर के कंधे पर हाथ रखा तोह रामेश्वर जी ने खुद को आराम देना हे बेहतर समझा.

"हम जल्द हे उस कड़ी को ढून्ढ लेंगे चाचा जी. मुस्कान ने जो शंकर को कोड बताया है उसके हिसाब से एक व्यक्ति तोह यहाँ आसपास से हे हैं और वही इंग्लैंड फ़ोन करके बिंदु को खबर करता है. मैं पूरी जानकारी कल दोपहर तक निकाल कर आपके सामने रख दूंगा और अगली बार फ़ोन नंबर मिलते हे वो व्यक्ति हमारे कब्जे में होगा.", भुप्पी का जोश देख कर जिस तरह रामेश्वर जी मुस्कुराये थे उनका साथ सांगवान जी और संजीव ने भी दिया. और संजीव पर नजर पड़ते हे शंकर जी ऐसे देखने लगे जैसे उसने हे कुछ छुपाया हो.

"चाचा जी, मुझे सिर्फ इतना पता है के मुस्कान अर्जुन पर विश्वास करती है.", संजीव थोड़ा चिंतित जरूर हो गया था लेकिन आगे बात उमेद ने कही.

"वो विश्वास भी करती है और उसके कहे अनुसार हे चलती है भोले. अर्जुन ने हे तुम्हे खुद भेजा है एक सबूत जुटाने के लिए अगर मुस्कान ने तुम्हे ऐसा बताया है तोह. लेकिन इसका मतलब साफ़ है के उसको वो व्यक्ति पता चल चूका है. मुस्कान को गॉड लेने के लिए अर्जुन ने हे मुझे कहा था और इसका सीधा मतलब है के उसकी जान खतरे में है. कुछ और हिंट दी थी तुम्हे मुस्कान ने?", उमेद के ऐसा कहने पर अब सभी की नजरे शंकर और भुप्पी पर टिक चुकी थी.

"मुस्कान ने शंकर को कहा था के शादी में सतर्क रहे और इसलिए मैं खुद शामिल हुआ था.", भुप्पी के ऐसा कहने पर पहली बार सांगवान जी आवाज थोड़ी आप से बहार हुई थी.

"नीरे चूतिये हो तुम दोनों जो ये भी नहीं समझ सकते की सीढ़ी सीढ़ी शतरंज पर तुम हे प्यादे हो दूसरी तरफ से. लड़की कह रही है के कल हमला हो सकता है तोह क्या जरुरत थी बहु और बच्चों को लाने की? एक महीने में ये सब साफ़ नहीं किया तोह मैं भाई साहब के सामने कहता हु की फिर इन्हे मेरा साथ देना होगा ये सब निबटने में. यहाँ कोई अवधेश मिश्रा या सारंग कुमार दुश्मन नहीं है, दुश्मन कोई अपना है और अगर वो लड़का जड़ तक पहुंच गया तोह अंजाम बहोत भयंकर होगा.", पहली बार वो कुत्ता भोंका था और एक पल को गुलाटी के साथ संजीव भी सेहम गया था.

"मैं सब साफ़ कर दूंगा चाचा जी फिर चाहे सारंग हे क्यों न हो. लेकिन अर्जुन तक बात कभी नहीं जानी चाहिए.", अब रामेश्वर जी थोड़ा बोखला गए थे अपने बेटे की बात पर.

"तुम हमेशा धर्मवीर को सही साबित कर देते हो एक मिनट से पहले. वो कह रहा है के जड़ सम्भालो तुम अभी भी अवधेश और सारंग के पीछे पड़े हो. शमा चाहता हु सभी से अपनी भाषा के लिए लेकिन शंकर तुम नरिंदर के आने तक बस काम पर रहोगे और उसके बाद उमेद के पास. अब मैं धर्मवीर भाई से पूछना चाहता हु के वो क्या सोचते है इस बारे में."

"पंडित जी, मैं आपसे इत्तेफ़ाक़ रखता हु इस सारे मामले में लेकिन एक गुजारिश और भी है. शबनम को ब्रिटिश कस्टडी में भेजने से पहले 2 दिन अर्जुन के सुपुर्द कर दीजिये. संजीव भी यही है तोह इन दोनों पर हे दांव खेलना बेहतर है. इतने शंकर और दलीप राजवीर (राजू) पर नजर रखेंगे और भुप्पी को मैं सारंग के पीछे लगता हु. मेहुल तुम बीटा फ़िलहाल हॉस्पिटल सम्भालो और लाइन पर रहना. उमेद अपना काम कर रहा है और जहा जरुरत पड़ेगी सतीश भाई इसके साथ रहेंगे. अर्जुन को बताना कुछ नहीं है, ये संजीव को देखने दो."

"मैं सहमत हु सांगवान चाचा से. संजीव दिमाग से सबसे तेज और परिपक्व है. वह भी अपनी चची के सामने इसने जाहिर नहीं होने दिया था के ये पुलिस अफसर है. जो हर घडी दिमाग सही रखे वही अर्जुन को संभल सकता है.", भुप्पी ने कुछ ज्यादा हे कह दिया था जिसपर न चाहते हुए भी संजीव ने भुप्पी की तरफ हाथ करते हुए अपने दादा जी को गुहार हे लगा दी.

"सबकुछ ध्यान से करना है और हर छोटी बात को नजर अंदाज नहीं करना. संजीव को तुम काबिल अफसर कह रहे हो और मैं भी ये मानता हु लेकिन क्या तुमने शंकर से पुछा के वो नरोत्तम दस वाला काण्ड एकदम कैसे हो गया.? संजीव के साथ साथ अर्जुन ने मुझे और कम तक को घसीट लिया, रही सही कसार ये की 3 लोगो को धर्मवीर ने खुद ऊपर पहुंचाया. पूछो जरा अपने चाचा से के अर्जुन ने इनके लिए क्या किया ऐसा.", रामेश्वर जी के इस खुलासे पर अब संजीव झेंप रहा था और बाकी दोनों बुजुर्ग मुस्कुरा रहे थे.

"वक ने मेरे हॉस्पिटल का गठजोड़ इंग्लैंड वाली यूनिवर्सिटी के अंदर आते हॉस्पिटल से करवा दिया है. वो आदमी रिश्वत नहीं लेता और डरता भी नहीं है. अर्जुन ने ये उपहार बिना मांगे दे दिया मुझे और बदले में ये माँगा के उसके पिता को हम सुरक्षित रखे.", धमाका तोह असली अब हुआ था जिस पर बाकी तीन डॉक्टर एक दूसरे को देख रहे थे. उमेद जानता था के शंकर भी यही करना चाहता था लेकिन अर्जुन पहले कर गया.

"मैं देखता हु चाचा जी इस इंसान को जो यहाँ कसबे से सूचना आगे भेज रहा है.", शंकर का दिमाग जैसे शुन्य हो चूका था जब ये बात मुँह से निकली.

"शंकर तू न पूर्णिमा के पास जा कर सो जा बीटा. अभी बताया है के उस लकीर के फ़क़ीर को नहीं ढूंढ़ना जो फ़ोन मिला रहा है. उसके पीछे कौन है ये पता करना है जो तेरी हरकत भी जानता है. दलीप करेगा ये काम और सीड में उस से बेहतर कोई है भी नहीं आजतक, सिवाए उसके पिता के जो छोटे ओहदे पर हे चल बेस. वैसे एक सलाह मैं आप सबको हे देना चाहता हु के शादी तक हो सके तोह शांत रहना हे ठीक है. दुशमन को भी आराम करने दे और ताक़त भी बढ़ा ले.", रामेश्वर जी की आखिरी बात सुन्न कर सांगवान जी ने तुरंत हामी भर दी.

"शिकार तोह वैसे हे करते थे भाई साहब हम ये तो इस नयी पीढ़ी ने तमंचे ज्यादा हे चला दिए. छोल की रूपरेखा, आपका भागना और मेरा पिंजरे में बंद करना. सटीक निशाना तोह आपके भाई रघुबीर जी का था जो एक पर गोली चला कर बाकी सबको तड़पा देते थे. उमेद भी सीखेगा ये एक दिन क्योंकि ये फ़िलहाल आपके जैसा है.", रामेश्वर जी किसी नौजवान की तरह किंग को गर्दन से पकड़ कर अपनी गॉड में रखते हुए खुश हो रहे थे. कान मसले जाने से किंग भी उन्हें उतना हे प्यार दे रहा था.

"रघुबीर फिर कोई नहीं बनेगा धर्मवीर, उमेद बेशक मेरा सबसे ाचा बीटा है. इन्होने अभी तक देखा हे कहा है के खौफ क्या होता है. एक बार सतीश ने जरूर दर्शन किये थे और उसके बाद फिर कभी ये रघुबीर के यहाँ नहीं आया.", रामेश्वर जी का ये रूप तोह खुद शंकर और संजीव ने भी नहीं देखा था. वो भेड़िया उनकी गॉड में आ बैठा था और किसी साधारण कुत्ते की तरह उनके गाल चूम रहा था.

"वो चाहते तोह कुछ नहीं बचता लेकिन वनवास ले कर वो खुद को अलग हे कर गए. मैंने बस इतना हे देखा था के वो do-nali से जखम देने के बाद वह ऊँगली घुसा कर बड़े आराम से बात करते थे. और उन्ही उँगलियों के बीच कोई सिग्रत्ते कैसे पी सकता है.?" छोल साहब के इस खुलासे से उमेद की नजरे झुक गयी थी और बाकी सबकी सांस.

"पापा अलग थे और मैं बता देता हु के वो चाचा जी के साथ अर्जुन से तब तक मिलते रहे है जबतक अर्जुन 7 क्लास में न आ गया था. यादाश्त जा चुकी थी उनकी लेकिन वो इन्हे पहचानते थे, माँ और चची जी को. अर्जुन को हमेशा उन्होंने अज्जू हे खा उन आखिरी 2 सालो में. कोई भी ये नाम उसके सामने नहीं लेगा ये गुजारिश है मेरी.", उमेद उठ कर बहार चल दिया था और आज पहली बार वो थोड़ा भावुक हो चूका था.

"शंकर, तुम समझदारी से काम करो और बेशक चाहो तोह किसी को हरदम साथ रखो. अगर आज दुर्घटना हो जाती तोह सबसे पहले तुम पर हे आरोप आता मेरे बेटे. तुम सचमुच भोले हो और जज्बाती भी. जाओ अपने गज्जू के पास और उसको सम्भालो. अर्जुन उसका गॉड लिया बीटा नहीं असलियत में वो उसके साथ अज्जू की ज़िन्दगी जी रहा है. लेकिन सचमुच वो अज्जू बना तोह बेटे मैं कुछ नहीं कर सकूंगा और रघुबीर अब हैं नहीं के आवाज दे कर उस मस्ताने हठी को रोक ले.", खड़े होते हुए रामेश्वर जी ने अपने बेटे को सर सहलाते हुए कुछ नयी जानकारी देने के साथ ये भी याद दिलाया के गज्जू परेशां है.

"जी पापा. चलो गुलाटी भाई और भुप्पी तुम भी यही रुकने वाले हो आज.", शंकर फिर से भोले बन्न गया था और सांगवान जी ने माथा पीट लिया. संजीव हंस रहा था इस बीच.

"तुम जानते हो इसका मतलब जो हंस रहे हो?"

"हाँ, चाचा को आपने कहा के संभालना तोह अब वह महफ़िल जमाएंगे. यही तोह उन्हें समझ आया है और उमेद चाचा मान भी जायेंगे क्योंकि वो शंकर चाचा कह रहे है. प्रॉब्लम न इनके आपस वाले नेटवर्क में हे है दादा जी.", सभी लादले जाने के बाद संजीव ने अपनी बात कही तोह संगवान्ग जी ने आँख मार दी.

"हुनर सीखना है बीटा, वो सीख गया इनसे पहले. तू साथ है तोह जरुरत नहीं.", अब वो भेड़िया रामेश्वर जी की जगह उनकी गॉड में था जो बेशक शंकर पर भी गुर्रा चूका था. मतलब साफ़ था के नियंत्रण कैसे लिया जाता है वो इन्हे मालूम था या फिर स्वर्गीय रघुबीर सिंह को.

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"इतनी तड़प तोह पहली बार मिलने पर भी न हुई थी मेरे चाँद जितनी आज हुई.", बबिता गुलाबी लहंगे और ब्लाउज में अब अर्जुन की बाहों में उस कमरे से उन दोनों के कमरे में जा रही थी जहा पहला संसर्ग किया था दोनों ने. हवेली में कदम रखने से पहले जाने कितनी हे रस्मे बबिता ने निभाई थी लेकिन जो परंपरा थी उसके आड़े गोलू न आ पाया. वो वही से हॉस्पिटल जा चूका था अपनी बीवी को grah-pravesh करवा कर. और 2 घंटे बाद बबिता इस हवेली आयी थी अपनी परंपरा सुचारु रखने. आज यहाँ वो रहने आयी थी क्योंकि गोलू और उसकी ज़िन्दगी आगे से यही चलने वाली थी.

"तब आपकी वो कसम थी लेकिन आज हम दोनों है. मुझे इस उपहार की उम्मीद नहीं थी.", अर्जुन ने जैसे हे उस बड़े बिस्टेर पर बबिता को लिटाया तोह लाल होंठो से बबिता ने बड़ी बेसब्री में अर्जुन को जकड लिया. ये चुम्बन कही ज्यादा हे व्यथित और उत्तेजक था. बबिता जैसे बरसो से प्रतीक्षा में थी इस पल की और आज सभी रिवायते भूल कर वो बस एक हे चीज देख रही थी, अर्जुन. ये होंठो से होंठो का सिलसिला कुछ लम्बा हे चला.

"मेरी कस्मे छोड़ अर्जुन लेकिन सपना पूरा करके आज तूने बबिता जरूर अपनी बना ली. पहली बार मुझे हाथ तूने लगाया था और दिल ने यही कहा था के बस यही मेरी ज़िन्दगी है. आज फेरो में भी भगवन ने तुझे मेरे सामने ला खड़ा किया. इस से ज्यादा कुदरत क्या साथ देगी?", अर्जुन ये सब सुनते हुए गुलाबी कुर्ती पहने लेती बबिता के मासूम से चेहरे को देख रहा था. कितनी आकर्षक और साफ़ थी वो. बड़ी थी उम्र में लेकिन दिल से वही जो अर्जुन था.

"तुम मांग चुकी थी न ये रात बब्बू? मैं मन करने वाला कौन होता हु? और सचमुच ये सुहागरात मेरे लिए भी सपने सी है.", बबिता आज उसके लिए बब्बू मतलब प्रेमिका को उसने एक नाम दे दिया था. ऊपर झुकते हुए अर्जुन ने पूरी रौशनी में हे बबिता के एक मॉटे उभार तक हथेली पंहुचा दी थी.

"आअह्ह्ह.. बब्बू, अब तोह ये नाम उम्र भर याद रहेगा रे. आह्हः.. आज मैं जागना चाहती हु अर्जुन, तुम्हारी दुल्हन के रूप में. इसके बाद ज़िन्दगी जहा मर्जी ले जाए लेकिन बस ये रात बहोत है अगर तुम साथ हो.", बबिता महसूस कर रही थी की चोली के अंदर निर्वस्त्र मॉटे चुके पर अर्जुन की उंगलियों ने उसके निप्पल को जकड लिया है. होंठो से होंठ हर पल उलझ रहे थे दोनों के और कपडे पहनाये हुए हे अर्जुन ऊपर आ चूका था बबिता के मखमली असाधारण शरीर पर.

"ऐ जी, एक बार तोह आज कपडे हे गंदे कर दो. दिल कर रहा है.", बबिता ने जैसे अर्जुन को सम्बोधित किया था वो भी मुस्कुरा उठा. चोली को जोर लगा कर ऊपर करते हे सिलाई टूट गयी थी. पहाड़ जैसे वो dugdh-kalash सामने आ गए. 44 अकार अपने आप में हे असाधारण था और ऊपर से वो बड़ा जिस्म बबिता का. गुलाबी निप्पल और हिलते चुके देख अर्जुन भी बेसब्र होता उन पर झुक गया.

"आअह्ह्ह... सीई.. आजजज.. जो भी करो अपनी बना कर.. आह्हः... अर्जुननननन..", बबिता का शरीर सब थकान भूल कर बस इस लम्हे में खो गया था. उसके मॉटे चुचो पर आज फिर अर्जुन हे झुका था. वो दाने जो उसको ऊँगली लगते हे तड़पने लगे थे उन्हें ये भंवरा मुँह में ले कर चूसक रहा था. लेहंगा पहने बबिता अपनी पायलो का भी शोर मचा रही थी उत्तेजना में. धीमी गति से दोनों उभार चूसता अर्जुन एक हाथ उन मांसल जांघो में पंहुचा चूका था.

"बब्बू, तुम शहद सी हो और आज मैं सोने नहीं वाला जितने तृप्त नहीं हो जाता.", हैरानी की बात ये भी थी की लहंगे के अंदर वो फूली हुई छूट कच्ची से भी आजाद रखे हुए थी बबिता.

"तुम अगर यहाँ न भी आते तोह मैंने टाँगे वही उठा देनी थी अर्जुन, बस माँ मन कर देती तोह. कितने घंटे इन कपड़ो का बोझ उठाया है बस मैं जानती हु. लेकिन इनकी कीमत चुकाने के बाद हे वो उपहार दूंगी जो बचा कर रखा है.", बबिता के वो मॉटे कलश 5-5 किलो का मांस सनतलित किये थे. लेहंगा ऊपर सरकते हुए अर्जुन के हाथ हर इंच वो चिकनाई और कसावट माप रहे थे जो सिर्फ उन दोनों को हे पता थी.

"ाःह.. "

"बबिता.. उम्म्म्म", अर्जुन ने छूट के अंदर ऊँगली फंसा दी थी और बबिता इतने में हे पहला स्खलन हांसिल करती उसके होंठो को काटने लगी. नरम फांके कितनी सुखदाई थी ये अर्जुन जान रहा था. कपड़ो के ऊपर से हे करने की गुजारिश से बंधा वो सिर्फ अपना पजामा निचे सरकते हुए बबिता की जांघो के बीच आ गया.

"सब तुम्हारा है मेरी जान.", बबिता ने खुद हे लेहंगा ऊपर सरकते हुए वो अर्जुन का काम दंड अपने मुहाने लगा दिया. आज ये दोनों इस रौशनी में सुहागरात को अग्रसर थे वही कमरे के बहार कड़ी अक्षरा आतुर थी देखने को जो अर्जुन कर रहा था. न योनि दिखी न वो लिंग जो बबिता को चीखने पर मजबूर कर रहा था.

"आअह्ह्ह.. बहोत तगड़ा है रे तू.. थोड़ा रेहम खा... मैं विचार न बदल दू.. माआ.. ", अर्जुन का आधा लुंड तोह 2 धक्को में हे छूट को फैलते हुए अंदर जा घुसा था. बबिता के चुचो पर उसकी निर्दयता भरी पकड़ अक्षरा को हिला रही थी लेकिन बबिता तोह चाहती थी की अर्जुन आज बस उसको प्यार से मार हे डाले. मॉटे चुचो के साथ हे भारी नितम्भ भी ऊपर उठ चुके थे. अर्जुन का लिंग जैसे छूट को एक कवच बना कर रुका था.

"बहोत टाइट हो तुम बबिता... aahh..Ummmm.."

"कर दे ढीली मेरे शेर.. आठ.. तू दूध तभी पी सकेगा मेरा.. आठ.. ", बबिता नशे में कुछ भी बोल रही थी लेकिन उसकी चीख निकल गयी जब अर्जुन ने सुहागरात वाला काम कर दिया. एक तेज झटका और बाकी लुंड सीधा अंदर घुसता गर्भ से जा टकराया. एक पल को तोह समय रुक सा गया था और अक्षरा भी अपनी बड़ी दीदी का सफ़ेद पड़ता चेहरा देख दांग रह गयी.

"अब ढीली नहीं अपने लायक करूँगा बबिता. सॉरी, it's फर्स्ट नाईट.. उमाहहहह.."

"ी लव ..आठ.. यू.. अर्जुन.. आठ.. ये दर्द रहना चाहिए.. माँ.. बचने तू आ हे नहीं सकती.. ", बबिता तोह दर्द में भी मजाक कर रही थी. थिरकते कूल्हों के बीच गुलाबी कपड़ो में वो तैयार हो चुकी थी एक बड़े घमासान संसर्ग के लिए जहा जीतने वाला हे जाग कर बता सकता था के ये रात किसकी रही. मुठभेड़ आज 2 असाधारण लोगो की थी और दोनों हे इसके लिए कबसे इन्तजार में थे. वो बहार वाला क्या कूद पायेगा बीच में.?

क्रमश
 
अपडेट 130

मुठभेड़ (2)

जारी


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आज चूड़ियों और झांझर का शोर इस बंद कमरे में गूंजता हुआ बता रहा था की दोनों हे कितने उन्मुक्त तरीके से मिलान कर रहे है. चोली फट कर ऊपर सरक चुकी थी और लेहंगा मखमली पेट पर. भारी और चिकनी जाँघे ऊपर उठाये बबिता का ये दूसरा निजी पल था अर्जुन के साथ और वो दिल खोल कर जी रही थी इस पल को. गहरी और सिर्फ एक बार चूड़ी वो कासी हुई योनि दर्द के बावजूद हर रगड़ पर ख़ुशी के आंसू बहा रही थी. 9 इंच का मूल इस आसान में समूचा न जाने के बावजूद बबिता और अर्जुन को मस्ती की अलग दुनिया में ले जा रहा था.

"आह्हः.. इतनी टाइट होने के बाद भी तुम्हारी छूट में क्या फिसलन है बबिता.. उम्म्म्म.. आज लगता है के मैं छह कर भी खुद को संभल नहीं पाउँगा.", अर्जुन का हर धक्का बिस्टेर की चले हिला रहा था बबिता के जिस्म के साथ साथ. वो दिलफरेब बड़े सतांन अब अर्जुन पूरी मस्ती में मसलता हुआ बारी बारी से चूस रहा था. योरस मोटी गुलाबी फांको के निचले हिस्से से बहार बहने लगा तोह लुंड भी रफ़्तार से ठोकर मारने लगा.

"माँ.. सचमुच तुम्ही आह्हः.. संभल सकते हो इस निगोड़ी को.. फटने को हो रही है लेकिन क्या हथियार है तुम्हारा अर्जुन.. आराम से पीयो और जैसा दिल करे वैसा करो. ये बबिता दिल से सिर्फ तुम्हारी है.. उम्मम्ममाहः. इस्स्स्सस्स ..आअह्ह्ह्ह..", दर्द भी पीछे रह चूका था और वो नाजुक चुके भी अभ्यस्त हो कर अर्जुन के हाथो का मजा लेते सख्त होने लगे. बहार कड़ी अक्षरा को पता हे नहीं चला कब उसकी अनछुई छूट को वो खुद मसलने लगी थी. बबिता दीदी के वो भरी भरकम चुके अर्जुन को पीते देख वो खुद को दीदी की जगह रख रही थी.

'ये लड़का सचमुच अलग है. कैसे दीदी को हिला रहा है और वो भी दर्द भूल कर कितने मजे ले रही है. कैसा होगा अर्जुन का लिंग जो दीदी को दर्द दे गया?', वो अब सचमुच देखना चाहती थी की वो क्या जादू की छड़ी है अर्जुन के पास जिस से बबिता दीदी जैसी गुसील युवती अर्जुन को सब मनमानी करने देने के साथ खुद भी पागल सी हुई जा रही है. बबिता का दूसरा स्खलन होते हे अर्जुन ने लुंड बहार खींच लिया. एक पल के लिए तोह बबिता की दर्द भरी आह निकल गए उस मॉटे सुपडे से.

"पलट जाओ.. आठ.. मैं भी इस बार होने हे वाला हु.", अर्जुन का मतलब समझते हे बबिता ने वो गुलाबी चोली उतर कर एक तरफ उछाल दी. लहंगे का पकड़ कर वो सही मुद्रा में आयी तोह अर्जुन लुंड को जड़ के पास से दबाये एक बार खड़ा हो गया. बड़े ध्यान से वो बबिता के विशाल कूल्हे देख रहा था जो बेजोड़ थे और जैसे पानी से भरे गुब्बारे की तरह नरम. लुंड चुतरस से सना और ऐसे दबाने से अब कही ज्यादा हे मोटा हो चूका था. अक्षरा की तोह सांस हे अटक गयी थी अर्जुन का हथियार देख कर. वो हैरान थी की ये दीदी के अंदर कैसे चला गया होगा. जवाब भी तुरंत मिल गया.

"आउच.. क्या कर दिया रे इसको..? मार दिया अर्जुनंनं.. माहहहहह.. ऐसे हे .. ऐसे हे नाम लिख दे बबिता की इस दौलत पर अपना.. आह्हः..", कूल्हों के निचे फूली हुई गुलाबी छूट को अभी चैन मिलना शुरू हे हुआ था और अर्जुन ने एक धक्के में हे अपने अंडकोष छूट के निचे चिपका दिए. दोनों का हे जिस्म इस टक्कर से झुंझला गया था.

"आपको याद है न मैंने क्या कहा था.. ाःह.. जब हम ऐसे कर रहे थे पिछली बार.", पीठ भी पानी सी चिकनी थी बबिता की और उसको चूमता अर्जुन मटर के दानो से दोनों निप्पल मसलता हुआ किसी रबर की गेंद जैसे उन चुचो के अगले हिस्सों को दबा रहा था.

"आआह्ह्ह. मैं तोह चाहती भी यही हु रे.. आठ. तू इस भैंस पर ऐसे हे चढ़ कर अपना घोड़े सा लुंड चलता हुआ दूध निकले.. आह्हः.. पता है अर्जुन, ये बोब्बे तुझे हर पल याद करते है रे.. आह्हः.. नहाते हुए तोह मैं तड़प उठती हु... माँ... क्या हो रहा है.. आह्हः.", बबिता का सर बिस्टेर पर टिक गया था और ऐसा होने से वो विशाल पर्वत से कूल्हे और ऊपर उठ कर बचा खुचा आधा इंच लुंड भी अंदर लील गए. बबिता की छूट ने तोह नल हे खोल दिया था और अर्जुन ने भी उस गीली सुरंग को फाड़ते हुए कही ज्यादा तेज धक्के लगाने शुरू कर दिए.

"हहहहहह.. बबिता ...."

"आअह्ह्ह्हह.. अर्जुन भर दे रे..", बबिता ने अपनी छूट पर इतना कसाव बढ़ा दिया था की अर्जुन का लुंड अंदर हे फंस गया. उसके शरीर में होती सिहरन साफ़ बता रही थी की वो उस गहरी सुरंग में खाली होने लगा था. इतना वीर्य yada-kada हे निकला था अर्जुन के लिंग और शायद इसकी एक और वजह बबिता का जादू हे था. दोनों हे बिस्टेर पर देह चुके थे और अभी भी अर्जुन उन पुष्ट नितम्बो के बीच बबिता की छूट में हे लुंड फसाये हुए उसके ऊपर लेता था. बबिता की फैली हुई बाहों पर हाथ फेरता वो उसके मॉटे गाल चूम रहा था.

"खागड (सांड) है तू तोह पूरा का पूरा. कितना सुखदाई है ये पल अर्जुन, किस्मत इतनी मेहरबान होगी ये तोह आज भी यकीन न हो रहा. आह्हः.."

"यकीन करवाता रहूँगा जब जब मिलेंगे हम. वैसे आपको बुरा तोह नहीं लगा जब मैं तुम कह कर बुला रहा था.?", अर्जुन चेहरे पर झुका एक तरफ से हे बबिता के फूले हुए होंठो को रह रह कर प्यार दे रहा था.

"अधिकार है इस रात तुम्हारा ये और सच कहु तोह अपने हर मिलान में तुम बस मुझे ऐसे हे बुलाया करो. पहले सोचा था के बस एक बार तुम्हे अपना कुंवारापन दे कर मैं मुक्त हो जाउंगी लेकिन अब बुरा भी लग रहा है और ाचा भी. ये दिल और जिस्म दोनों हे बस तुम्हे पुकारते है अर्जुन. गोलू से झूठी होने के बाद क्या तुम ऐसे हे प्यार करते रहेगा?"

"यहाँ इस बात का क्या महत्व है? आप उनकी धर्मपत्नी बन्न चुकी हो तोह उनका भी हक़ है. और शरीर कभी झूठा नहीं हो सकता ये याद रखना. वैसे आपके ससुराल से कोई यहाँ रुकने आया क्यों नहीं.?", अर्जुन का लिंग अपने आप हे बहार आ गया था और योनि से वो सफ़ेद धार अब बिस्टेर पर धब्बा बनाने लगी थी. अक्षरा भी एक बार झड़ने के बाद अंदर पानी पीने जा चुकी थी लेकिन उसको पता था ये दोनों रुकने वाले नहीं है.

"न वो यहाँ नहीं आएँगी अभी और गोलू फ़िलहाल एक हफ्ता अभी हॉस्पिटल में हे आराम करने वाला है. हवेली की परंपरा के नाम पर मुझे तोह पहली रात यही रहना था, फिर बाद में गोलू का परिवार भी इधर आ जायेगा. अब एक बार उठो मेरे ऊपर से ये साफ़ करके आणि है और फिर तुम्हारा गिफ्ट भी देना है तोह थोड़ी तैयारी करनी हे पड़ेगी.", बबिता के ऐसे कहने पर अर्जुन मुस्कुराता हुआ एक तरफ सीधा लुढ़क गया और बबिता हिम्मत करके कुछ पल बिस्टेर पर बैठी रही. छूट को दोनों हाथो से फैला कर देखा तोह वो गोरा गदराया हिस्सा लाल पड़ चूका था. अंदर वाला नन्हा सा छेड़ अर्जुन के सुपडे ने खोल कर कुछ बड़ा कर दिया था. छूट बहार से इतनी गदराई न होती और जांघो का आपसी संपर्क न होता तोह ये छिपा हुआ छेड़ भी फटा हुआ दीखता.

"उम्म्म.. ये कर रही हो आठ?", उठने से पहले बबिता ने अर्जुन के ढीले लिंग को मुट्ठी में पकड़ कर ाचे से चूस लिया. दोनों का मिश्रित रास अजीब जरूर लगा था बबिता को लेकिन पूरी लगन से चूसने के बाद वो मुस्कुराती हुई कड़ी हो गयी.

"सीई.. इतना प्यार दिया है इसने तोह इसको चूमना बनता हे है. नमकीन तुम हो या मैं, पता नहीं लगा, मेरे आने के बाद इसको भी साफ़ कर लेना फिर सही स्वाद पता करुँगी.", बबिता जमीन पर निर्वस्त्र चल रही थी तोह अर्जुन की नजर उन मटकते कूल्हों और आपस में रगड़ काटी जांघो में हे अटक गयी. दरवाजे से पहले रुक कर बबिता ने एक अदा से कहा.

"सिर्फ देखने से मैं नहीं भरेगा तुम्हारा, थोड़ी देर में वह भी नाम लिख कर खुद हे जांच लेना के ये कैसे है."

"तुम सचमुच बहोत प्यारी हो,... ुम्हाः.", अर्जुन ने भी एक हवाई चुम्बन देते हुए बबिता को आभार जताया इतने समर्पण के लिए. एक नजर कांच के बहार खड़े साये पर डालने के बाद वो बिना कुछ कहे आँखे मूँद कर लेट गया. अक्षरा इस नजर से डर तोह गयी थी लेकिन निश्चिन्त हो गयी जब ध्यान आया के अर्जुन को वो दिख नहीं सकती. वैसे हे खिड़की को निहार रहा होगा.

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"यार गज्जू, ये बात तोह आज हे पता चली के चाचा जी अर्जुन से मिलने उसके स्कूल जाते रहे है.", छत्त पर दोनों दोस्त दिवार से तक लगाए एक हे सिग्रत्ते सांझी कर रहे थे. गुलाटी और भुप्पी रात्रिभोज के बाद संजीव के हे साथ शहर निकल गए थे क्योंकि संजीव हे एक ऐसा था इनमे से जिसने शराब को हाथ नहीं लगाया था. रामेश्वर जी अपने समय से कुछ हे देरी पर अलग कक्ष में सोने जा चुके थे और एक तरफ कौशल्या जी अपने सखी पूर्णिमा के साथ सो रही थी. उमेद अब ाचे मूड में था और हमेशा की तरह जिंदादिल हंस बोल रहा था.

"पापा तोह वह कभी कभार हे जाते थे यार उधर. फिर अर्जुन से चाचा जी ने उनकी मुलाकात करवा दी एक बार, जब वो चौथी में था. तू तोह जानता हे है के पापा तब सिर्फ चाचा जी से हे मिलते थे या अपने कमरे में बंद रहते थे. अर्जुन उन्हें पहली हे नजर में पसंद आ गया था, दिक्कत हुई थी की ये नाम बहुत कुछ याद दिलाता था उन्हें लेकिन फिर वो हर शुक्रवार शाम को जीप उठा कर निकल जाते उस से मिलने."

"उस हालत में भी वो अकेले जाते रहे? और घर में किसी को पता नहीं लगा था क्या?"

"भोले ऐसा थोड़ी कहा के अकेले जाते थे. उनका ख़ास था न जोगी, वो उन्हें लेके जाता था और फिर वो अर्जुन के साथ हे रात गुजरते. यादाश्त जाने लगी लेकिन उनका जाना बंद न हुआ लेकिन जुड़ाव इतना गहरा हो गया था के अगर माँ या मैं उन्हें घर रुकने को कहता तोह मेरा गाल सेंक देते थे. अब एक साल तोह उन्होंने अर्जुन को अपना पौता समझ कर हे प्यार दिया और जो भी बातें वो करते थे उसमे बस ज़िन्दगी और प्यार वाला सबक हे मौजूद रहता था. उसके बाद वो अलग तरह से जुड़ गए थे अर्जुन के साथ.", उमेद आसमान को देखते हुए गहरी सोच में डूब गया तोह शंकर ने ऊँगली में सिग्रत्ते फंसा दी. उमेद ने भी होंठो में दबाते हुए एक लम्बा काश लिया.

"अलग तरह यानी के अज्जू समझ कर.? एक वही तोह था जिसके साथ पापा और चाचा को हमने बचा बनते देखा है और बाद में उसका दोस्त भी. फिर उन दिनों में क्या हुआ था गज्जू?", अब उमेद के चेहरे पर मुस्कान आ गयी थी.

"वो बातें तोह ज्यादा नहीं पता क्योंकि अर्जुन भी छुपाने लगा था लेकिन एक बात पता है. वो अर्जुन को कहते थे के चल यहाँ से भाग कर घर हे चल पड़ते है, इधर सब तरफ कोई ख़ुफ़िया लोग है. कभी कहते थे की 14 का होने पर तुझे शिकार पर लेके चलूँगा और न जाने क्या क्या अतीत के पैन वो उस वर्तमान में खोले रखते थे. जानता है भोले जब पापा का आखिरी समय था तब वो बस दरवाजे की तरफ देख रहे थे. आखिर शब्द यही थे की अभी थोड़ी देर में अज्जू आएगा, उसको रामेश्वर ने सोमबीर भाई साहब को बुलाने भेजा है पूर्णिमा. माँ ने कहा के अज्जू जा चूका है और वो कभी नहीं आएगा, आप आराम करो. फिर चाचा का हाथ पकडे पकडे वो शांत हो गए. ज़िन्दगी कितनी अजीब है न भाई, जिस से लगाव हो उसका अलगाव इसको ख़तम कर देता है.", उमेद निराश नहीं था ऐसी बात करते हुए लेकिन शंकर जैसे खुद अतीत में खो गया था.

"यार यही तोह बुरा लगता है के जो सबसे बड़ी ख्वाहिश हो भगवन उसको छोड़ कर बाकी सब पूरी कर देता है. सबको लगता के इस इंसान ने तोह इतना नाम बना लिया, ये कितना सुखी होगा या इसको क्या दिक्कत हो सकती है. लेकिन सबसे बड़ा दर्द उन्हें दिखा भी नहीं सकते ये अलग गांड पन्गा है."

"गाली मैट दिया कर तू भोले. वैसे एक बार मैंने भी शामे तो शामे बात कही थी अपने दोस्त से जब वो बोलै के मैं खुशाल हु. फिर उसने मुझे एक सिद्धांत सुनाया जिसका नाम था 9 बता 10 (9/10). वो बोलै के 10 में से एक चीज हमारे हाथ में नहीं होती तोह हम बाकी 9 को महत्व नहीं देते या फिर अपने आप से भागने लगते है. अब जब वो चीज हमारे हाथ में है हे नहीं तोह उसके पीछे हे क्यों चिपके रहे, बाकी 9 तोह हांसिल हो सकती है म्हणत और लगन से. कुछ भी परफेक्ट नहीं होता लेकिन उसके नजदीक पहुंच सकते है."

"जैसे की?", शंकर ने बस 2 लफ्ज़ कहे.

"जैसे की पापा ने तोह जाना हे था एक दिन और या तोह मैं रोटा रहता अपनी माँ के सीने से लगा या फिर मैं उनकी जगह ले कर उन जैसा बन्न ने की कोशिश करता. वो तोह वापिस नहीं आ सकते न शंकर? लेकिन परिवार, उनके काम और उसूल तोह बनाये रखे जा सकते है. हाँ मुश्किल तोह कभी कभी बिस्टेर से उठने में भी होती है जो आसान काम है फिर शिकायत क्या करना मेरे भाई. चाचा को हे देख ले के वो कितना सामान्य रहते है लेकिन अज्जू के जाने के बाद सबसे ज्यादा समय उन्हें हे उबरने में लगा था. बाद में मुन्ना के रूप में उन्हें उनका सबकुछ मिल गया चाहे वो कुछ अलग है लेकिन चाचा जी संतुष्ट है.", अब जो उदाहरण उमेद ने दिए थे उन्होंने शंकर को झकझोर कर रख दिया था. सचमुच अगर शंकर ने अपने पिता को foot-foot कर रट देखा था तोह बस उन्ही 2 अवसरों पर और जब अर्जुन थोड़े समय पहले अचेत हुआ था तब उनकी आँखों में पानी आया था.

"हाँ यार ये बात झुठलाई नहीं जा सकती के कुछ तोह हमारे बस में हो हे नहीं सकता. वैसे तेरा जो भी ये दोस्त है लगता है विद्वान् है या कोई फ़कीर जिसको ज़माने की ऐसी सचाई पता है जो हर व्यक्ति चाह कर भी नहीं समझ पता है. मौका लगे तोह मिलवाना, वह भी 4 जाम जरूर लगाएंगे."

"ना भोले वो दारु नहीं पीटा क्योंकि संस्कार हे ऐसे है उसके. ऊपर से पंडित रामेश्वर शमरा और आचार्य हंस की शागिर्दी वाले लोग ऐसी बातें सबके साथ नहीं करते.", उमेद ने ठहाका लगते हुए शंकर की खिंचाई की थी. और अब शंकर के चेहरे पर भी हंसी आ चुकी थी.

"साला तुम चाचा भतीजा क्या क्या बातें करते रहते हो? और ये लड़का सचमुच कही ज्यादा हे होशियार है गज्जू. वक को ब्लैकमेल कर सकता था लेकिन सांगवान चाचा का काम वो फिर भी न करता. प्यार से उसने वो भी करवा लिया."

"तूने ये नहीं सोचा के अर्जुन को कैसे पता चला के धर्मवीर चाचा जी ऐसा कुछ करना चाहते है जिस से विदेशी डॉक्टर उनके यहाँ सेवाएं दे और कल को वो इस यूनिवर्सिटी के अंडर हे अपना मेडिकल कॉलेज खोल ले?"

"दिमाग का दही करने वाली बात है ये तोह. वो उन तक कैसे पहुंच गया क्योंकि इसका जीकर तोह किसी फाइल में भी नहीं है और ये बात चाचा के बाद हम 5 लोग हे जानते थे या फिर वक. अर्जुन कही और अंदर तक तोह नहीं घुस रहा गज्जू?"

"न न भोले, वो उतना दूर नहीं जा रहा. ऋतू का कॉलेज पड़ता है इस यूनिवर्सिटी के अंडर और धर्मवीर चाचा ने कहा था के वो उसको एक साल बाद इंग्लैंड भेज देंगे क्योकि कुछ सेटिंग है उनकी तोह यहाँ तक अर्जुन को पता था. उनकी मेडिकल कॉलेज वाली फाइल थी वक के पास जिसमे अर्जुन ने धर्मवीर चाचा और वक के बीच मध्यस्त बन्न कर कुछ fer-badal करवाए और बोर्ड मीटिंग में वो पास हो गया. अर्जुन ने उनसे उस दिन कोई सौदा नहीं किया था, चाचा तोह मजाक में कह रहे थे की उसने उन्हें लीड करने को कहा. खुद अपनी मर्जी से धर्मवीर चाचा शामिल हुए थे क्योंकि वो समझ गए थे की अर्जुन तुम्हारे लिए फ़िक्र करता है."

"यार गज्जू मैं ये बात सिर्फ तेरे साथ कर सकता हु क्योंकि तू मुझे सबसे ज्यादा समझता है. बाटी ऐसी है के शायद इन्दर को भी जीकर न करू."

"ऐसी क्या बात है जो तू इन्दर से भी नहीं कर सकता? बात मतलब लता से जुडी हुई है. बोल भोले.", उमेद वाकिफ था शंकर के दिल से. दोनों पैदाइशी हे साथ जो थे और hum-umar भी.

"हाँ. ऐसा हो सकता है के लता और रेखा साथ रह सके?"

"भूल कर भी ये ख़याल फिर से नहीं लाना भोले अपने दिमाग में. तुझे सब ाचे से पता है के वो किसकी बहु है और चाचा जी ने तेरे लिए क्या समझौता किया था ताई जी के साथ. तुझे उतने में ख़ुशी नहीं मिल रही तोह अब तू रेखा भाभी को पूरी तरह से मारना चाहता है क्या? जिस पत्ते पर तू ये दांव खेलने की सोच रहा है वो तेरे पास नहीं है याद रख और अपनी माँ के लिए अर्जुन पूरी हवेली मिटा देगा चाहे फिर तू या मैं हे बीच में क्यों न आ जाये. वैसे ये बात तू नहीं सोच सकता मेरा भाई.", उमेद ने जिस तरह से शंकर का हाथ थामा था शंकर झेंप गया था.

"लता कहती है के उसको परिवार का पूरा सुख नहीं मिला. और अर्जुन मेरा बीटा है और तुझे भी पूरी इज्जत देता है यार तोह वो मन लेगा पापा और ताई को. रही बात mitne-mitaane की तोह मैं उसका बाप भी हु और वो ऐसा कुछ करेगा भी नहीं. पहले हे बेचारी लता ने कितने दुःख देखे है गज्जू, अगर उसके साथ साथ ऋचा को भी परिवार मिल जाये तोह आगे का जीवन थोड़ा आराम देगा."

"बना ले तू कागज के जहाज और उतार दे गंगा जी में. पहली गोली तेरे चची मारेगी और दूसरी खुद लता. अर्जुन न कुछ करेगा और न होने देगा बेशक ऋचा को दिल से बहिन मानता है वो. जितना तीखा लता बोलती है और जैसे तुझे अभी तक पाँव के निचे रखती आयी है न तोह ख्वाब न ले ऐसे. ाचा नहीं लग रहा क्या हँसता खेलता परिवार और ऊपर से तू रेखा भाभी की जरा फ़िक्र नहीं करता.? आज हे घटना हुई है और तू वो भूल कर महाराजा बन्न ने की सोच रहा है. 2-2 बीवियां, वाह मेरे भोले वाह. लुंड पर धागा बाँध ले और निचे चल चुपचाप.", शंकर भी अब क्या हे कहता, उठ खड़ा हुआ उमेद के साथ साथ.

"और अगर अर्जुन ने 2 ब्याह किये तोह? फिर कौन रोकेगा उसको?", अब थोड़ा उमेद हैरान हुआ था ये सुन्न कर लेकिन बात की खोजबीन करने की जगह ठीक जवाब देना बेहतर लगा उसको.

"वो कर सकता है क्योंकि वो होगा तोह तीन लोगो की हे नहीं तेरी, chacha-chachi और बाकी सबकी मर्जी से होगा अगर हुआ तोह. बाकी मुझे जितना पता है वो प्रीती हे है जिसके साथ अर्जुन खुश रहेगा. और फिर वो 3 ब्याह करे या 4 करे, सर्वसम्मति से करेगा और प्रमुख मर्जी होगी प्रीती की. लता तुझे कभी ऐसा न करने देती अगर बात तू उस तरफ लेके जा रहा है तोह सुन्न ले. वो भी छोड़ और जरा ये बता के ब्याह के लिए तूने अपने परिवारों को उनके वह भेजा और फिर भी शादी उसने सुंडी के साथ की. घर से भागी तक न वो तेरे साथ जबकि पता था चाचा मान जायेंगे और ईश्वर जी भी. और सुन्न ले अगर बात समानता की हे आ गयी है तोह, विधवा होने के बाद भी वो क्यों हवेली में हे रही और क्यों तूने रेखा भाभी से शादी की? प्यार है न उसको तुझसे और तुझको उस से तोह कर लेते तब शादी? मन मेरे सामने किया था लता ने तुझे तब भी और तब तेरा कहना था के वो ठीक कह रही है. पापा की भी बदनामी होगी और लता के हम को भी ठेस लगेगी. कान में तेरे मेल जमा है और अब तुझे ये सब सुनाई नहीं देगा क्योंकि वो तोह लता देवी है. निचे चल और ये oont-pataang ख़याल मत लेके आ.", उमेद निचे ले जाने लगा तोह शंकर ने दूसरी सिग्रत्ते सुलगा ली. 10 मिनट बाद आने का कह कर वो अकेले रहना चाहता था अब.

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सोमबीर सिंह की हवेली में कुछ हद्द तक शान्ति थी इस समय. रात के 11 बजे तक सभी अपने कमरों में थे, सोये हुए या चेतन. बिजेन्दर के कमरे के साथ लगता था दोतरफा खुलने वाला ऋचा का कमरा जो एक तरफ उसकी माँ लता के कमरे से जुड़ा था और पिछली तरफ का दरवाजा सुशीला के कमरे से साँझा था. अभी वो बिस्टेर पर लेती दिन भर की मस्ती, घटनाये हे याद कर रही थी की कानो में ये चीख सुनाई पड़ी. इस ख़ामोशी में ये आवाज बिजेन्दर के हे कमरे से आयी थी. माँ और ताई जी की तरफ के दरवाजे ाचे से बंद थे और ऋचा ने जिज्ञासावश इधर उधर देखने के बाद इस सांझी दिवार पर नजर डाली. अमूमन हर कमरे में दिवार के बीच एक झरोका था जो बाद में बंद करवा दिया गया था या वह खिड़की लगा दी गयी थी. ऋचा ने बड़ी सावधानी से अपने बिस्टेर पर 3क्ष2 की वो टेबल रखते हुए उस रोशनदान वाली जगह से नजर दूसरी तरफ की. ऋचा के कमरे में सिर्फ एक लैंप जल रहा था तोह वो निश्चिंत थी की उसको कोई देख न सकेगा.

'बहोत ज्यादा दर्द हो रहा है क्या भोली?', बड़े आहिस्ता बोलने पर भी बिजेन्दर की आवाज ऋचा ध्यान लगाने पर सुन्न प् रही थी. सामने उन दोनों के चेहरे छोड़ कर बाकी शरीर सिधाई में आधा हे दिख रहा था. अनुपमा के कपडे और जेवर एक तरफ रखे थे और वो नाजुक दूधिया जिस्म कांप रहा था बिजेन्दर के निचे दबा.

'आराम से करते न जी, आप बहोत बुरे हो. फट गयी है मेरी तोह और लगता है खून भी आ रहा है.', रोटी हुई अनुपमा की आवाज बिजेन्दर से बेहतर सुनाई दे रही थी. और बिजेन्दर शायद अब अपनी बीवी के होंठ चूम रहा था. थोड़ी हे देर में कमर हिलने लगी लेकिन आवाज नहीं आयी. 2-3 मिनट बाद ऋचा को सुनाई दिया अनुपमा का कराहना और सिसकना. 'Aaah-aahh' और 'हाय माँ' जैसे शब्द बोलती वो बिजेन्दर की पीठ को जकड रही थी.

'मजा आ रहा है न भोली? तुम्हे पा कर मेरी ज़िन्दगी संवर गयी आह्हः.. तुम बहोत प्यारी हो उमंमाहः.', ऋचा को ऐसी बातें सुन्न में ाची लग रही थी और यहाँ से आधा अधूरा देखती हुई वो बस मुस्कुरा रही थी.

'आह्हः.. जी ये क्या निकल दिया मेरे अंदर आपने? छी गन्दा कर दिया सबकुछ.. आठ.. देखो खून भी आ गया.', ऋचा को समझ आ गया था के खेल ख़तम हो गया है और अनुपमा शिकायत कर रही है.

'भोली इस से हे तोह तुम माँ बनोगी और पहली बारी में तोह खून आता हे है. इसलिए तोह यहाँ गरम पानी रखवाया था पहले. मैं साफ़ करता हु तुम इस तरफ हो जाओ.', बिजेन्दर ने जिधर अनुपमा को सरकाया था वह से ऋचा को अब उसका पूरा निर्वस्त्र जिस्म दिख रहा था. संतरे जितने 2 गोर उभर, सुन्दर चेहरे पर फैला काजल और होंठो पर आधी अधूरी लिपस्टिक. नीचे नजर गयी तोह पतली कमर के बाद जांघो के बीच में वो लकीर जो सभी लड़कियों के होती है. बिजेन्दर ने गीला कपडा वह लगाया तोह अनुपमा ने आँखों पे हाथ रख लिया. ऋचा भी मुस्कुराती हुई अपनी जगह आ कर लेट गयी.

'सही है इनका तोह. भोली. सचमुच भाबी भोली हे है. लेकिन ये खेल तोह 5-7 मिनट हे चला और बबिता दीदी तोह कह रही थी की.. छियई.. क्या हे सोचने लगी मैं. वैसे वो आज भी तोह अर्जुन के हे साथ लगी होंगी. फ़ोन पे बताया भी था के अर्जुन के साथ वो उधर हवेली आ चुकी है. फ़ोन करके देखती हु.', ऋचा अचानक हे ख़ुशी से चहक उठी. दबे पाँव वो कमरे से बहार निकल कर बैठक में जा घुसी और जाने से पहले देख लिया था के उसकी माँ सो रही है. बैठक को भी ाचे से बंद करते हुए ऋचा ने बबिता की हवेली का नंबर लगा दिया. उधर बबिता भी बिस्टेर पर नहीं थी जिसने पहली घंटी में हैंडल कान से लगा लिया.

"दीदी, क्या कर रही हो?"

"चैन न मिला तुझको जो इस टाइम फ़ोन कर रही है. हाहाहा. वैसे ठीक टाइम फ़ोन किया है तुमने, अर्जुन अंदर गया है नहाने के लिए और मैं उसका गिफ्ट तैयार कारण के लिए हे टेबल तक आयी थी. अब बोल कैसे याद किया?"

"गिफ्ट? कौनसा गिफ्ट और क्या आप सचमुच अर्जुन के साथ हे हो?", दबी आवाज में हे दोनों बातें कर रही थी. बाथरूम के अंदर से पानी गिरने की आती आवाज बता रही थी की अर्जुन व्यस्त है.

"वही गिफ्ट जो उसको पसंद है. कह रहा था के ये दिल की शेप में है तोह दिल तोह आएगा हे. उद्धघाटन के लिए तैयारी तोह करनी हे पड़ती है. तूने बताया नहीं के किसलिए फ़ोन किया?", बबिता समझ गयी थी ऋचा की बेचैनी और चेहरे पर मुस्कान बता रही थी की वो अब ऋचा के मजे ले रही है.

"वैसे हे कर लिया था दीदी. आप नहीं थी न तोह याद आ गयी. और ये दिल की शेप क्या मतलब? आपने तोह कहा था के आप दोनों पहले हे कर चुके हो फिर उद्धघाटन कैसा?", ऋचा दुविधा में थी की कैसे कहे की वो क्यों फ़ोन मिलाये बैठी है.

"लड़का पीछे से जब झुकी हुई लड़की को देखता है न डार्लिंग, उसको वो बड़े बड़े हिप्स दिल की तरह हे नजर आते है. सामने की ओपनिंग तोह करवा चुकी थी अब बस इस दिल के बीच में उसका तीर लगने वाला है. एक तगड़ा राउंड लगाने के बाद अब उसको भी खुश कर दू. तू फ़ोन कान पे लगाए रख और इधर मैं हैंडल बिस्टेर के पास हे रख देती हु. सुन्न लियो क्योंकि देखने की सुविधा तोह हैं नहीं. चल मैं हैंडल रखती हु पानी बंद हो गया.", बबिता ने तोह जैसे ऋचा की चाहत बिना कहे हे जान ली थी. धड़कते दिल के साथ ऋचा इस बंद बैठक में गर्मी की परवाह न करती हुई रइवर कान पे लगाए जम्म गयी. उधर बबिता ने भी वो चिकनाई सीधा तुबे से हे अपने गुदाद्वार में भरने के बाद अंदर आते अर्जुन पर एक नजर डाली.

"मतलब आपने इरादा बना लिया है के दर्द लेके रहोगी?", अर्जुन ने क्रीम की तुबेर सामने देखने के बाद बबिता के चमकते हुस्न से सत् कर कूल्हों पर एक थपकी लगा दी.

"आउच.. तुम दर्द दे हे नहीं सकते बस ये समझ लो के अब बबिता खुद इस एक्सपीरियंस को लेना चाहती है. रात बाकी, बात बाकी.. करना है जो, करके रहो. आजा मुन्ना पहले दूध पियो फिर जोर लगाओ.", बिंदास होते हुए बबिता ने खड़े हुए हे अर्जुन का मुँह अपने मॉटे दूध पर झुका दिया. अर्जुन ने भी देरी न करते हुए उस अकड़े हुए निप्पल को मुँह में भर लिया. एक हाथ से वो बबिता के कूल्हों की गहरी खाई में उंगलिया दबाता हुआ उस बंद छेड़ को टटोल रहा था और दूसरे से दबा दबा कर वो मोटा चुका पीने का उपक्रम करने लगा. ऐसा लग रहा था जैसे उन dugdh-haandiyo में से सचमुच हे दूध आ रहा हो.

"आह्ह्ह्ह.. अर्जुन, ऐसे हे पी रे.. बड़ा मजा आता है जब तू इन्हे ऐसे चूसता है.. तेरा ये खूंटा भी तैयार हो गया इतनी जल्दी.. आठ.. उम्म्म्म..", अर्जुन ने 1 मिनट एक चूचक पीने के बाद दूसरे वाला मुँह में भर लिया था. बबिता अपनी जांघ से उसके लुंड को सहलाती हुई सिसकारियां भरने लगी. इधर अक्षरा ये कामुक दृश्य देख रही थी वही ऋचा के पास हर आवाज पहुंच रही थी.

'ये तोह लम्बा हे खेल खेल रहे है. अर्जुन दीदी को कैसे संभालता होगा?', सोफे पर पसरी ऋचा भी अपने शरीर में झुरझुरी महसूस कर रही थी और वही अक्षरा देख रही थी के अर्जुन को बिस्टेर के किनारे बैठने के बाद दीदी घुटनो पर बैठ चुकी थी.

"कितना मोटा और लम्बा है तुम्हारा ये खूंटा, मुँह में जाएगा भी या नहीं? लेकिन लेके तोह रहूंगी, छूट में तोह ले चुकी जो मुँह से भी छोटी है. आठ.. कितना गरम है ये.."

"अगर परशानी हो तोह रहने देते है न बब्बू, तुम्हे दिक्कत नहीं होनी चाहिए. छूट उतना खुल सकती है लेकिन होंठो से आगे दांत दुखने न लगे.", अर्जुन बैठे हुए भी बबिता के चढ़े सहलाने लगा तोह उसने हाथ हटा दिया. लुंड पर ऊपर निचे हाथ चलती हुई वो इस लाल दहकते सुपडे को ध्यान से देख रही थी.

"आज ये तीनो जगह जाएगा. जिद्द समझ लो या प्यार.", बबिता ने एक चुम्मा सुपडे को देने के बाद बड़े मादक तरीके से होंठ चिपका दिए. धीरे धीरे होंठो को आगे ले जाती वो लुंड के ऊपर लार भी छोड़ रही थी. फिर वापिस ऊपर करने के बाद एक और चुम्बन देती वो सीधा अर्जुन की आँखों में देखने लगी.

"ऊह्ह्ह्ह.. सचमुच जान लेने वाली हो लगता है.. आह्हः..", जैसे हे पूरा सूपड़ा उन होंठो को फैलता हुआ बबिता के मुँह में गया अर्जुन के हाथ बबिता के सर पर चले आये. वही अक्षरा तोह इस दृश्य को देख कर सलवार हे ढीली कर बैठी.

'क्या क्या करने वाले हो तुम लोग? सीई.. दीदी आप तोह रंगीन फिल्मो को पीछे छोड़ रही हो.. इतना मुँह में लिया कैसे.. आह्ह्ह्ह..', अक्षरा ने पंतय के ऊपर से हे अपनी रास बहती मुनिया को हौले हौले रगड़ना शुरू कर दिया. फिर आगे देखने के लिए कुछ सोच कर हाथ हटा दिया लेकिन फ़ोन पर सब सुन्न कर ऋचा के कान से धुआं निकल गया था.

'ये दीदी मुँह में ले रही है वो चीज.. छियई.. और किनता बड़ा होगा जो अर्जुन उन्हें मन कर रहा है करने से.? हद्द है.. ये मुझे क्या हो रहा हो.', इधर ऋचा सब सुन्न कर सोच रही थी वही बबिता आधे लुंड को 2 मिनट तक ाचे से चूस कर गीला करने के बाद उठ कड़ी हुई.

"ओह्ह्ह ओह्ह्ह.. बहोत मोटा है तुम्हारा डंडा. अब सीधा काम पर हे लगते है अर्जुन.. huhhh..",Babita ने मुँह में थोड़ा पानी लेने के बाद गरारे करते हुए दरवाजे के पास उगल दिया.

"मुझे वैसे बुरा नहीं लगता."

"लेकिन मुझे लगता जब तुम किश करते मुझे. अब आ जाओ मैदान में.", बबिता बिस्टेर पर घोड़ी बानी तोह अर्जुन उन लटकते बड़े चुचो को सहलाने लगा. बबिता बस मुस्कुरा रही थी.

"आगे करू थोड़ी देर?"

"ना.. वो राउंड सवेरे खेलेंगे यहाँ से जाने के बाद. हाँ उंगलिया चला लेने छूट में मेरी.", बबिता ने तोह गाँठ हे बाँध ली थी की गांड मरवा के रहेगी.

"चलो जैसी आपकी इत्छा. मुझे तोह वैसे भी आपके ये सॉफ्ट और बड़े हिप्स पागल करते रहते है. थैंक यू.", अर्जुन ने दोनों लचीले हिस्सों को फैलते हुए उस छेड़ का जायजा लिया जो डेढ़-2 इंच दूर था बड़े कूल्हों के बीच. फ़ैलाने से उभरी हुई छूट भी खुल कर सामने आ गयी थी. दरदरा सा वो गुलाबी बंद छेड़ ाचे से चिकना था और अर्जुन ने अपने लुंड को कस के पकड़ते हुए सूपड़ा गुदाद्वार से भिड़ा दिया. मक्खन से नरम और चिकने हिस्से को महसूस करते हे मस्ती में दोनों की आँखे बंद हो गयी.

"जन्नत.. आठ.", अर्जुन ने इतना कहते हे एक हाथ से बबिता की कमर थाम कर पूरा दबाव बना दिया. गांड का छेड़ बंद था लेकिन लचीला और चिकना भी भरपूर. सुपडे की नोक से आगे का 1 इंच उतारते हे दोनों रुक गए और अर्जुन ने कमर हिला दी.

"Aaaiiiiiiiiiiii... मा..... उफ्फ्फ्फ़... फट गयी रे मेरी अर्जुन.. रुक एक मिनट rukk..aaaaa माआ ऋ.. क्या भर दिया रे गांड के अंदर.. आह्ह्ह्ह..", सुपडे के साथ साथ 2 इंच हिस्सा और अंदर सरक गया था. अर्जुन को भी महसूस हुआ के जैसे किसी ने उसका लुंड मुट्ठी में दबा कर भींच दिया हो. एक कूल्हे को थपकते हुए वो भी बोल उठा.

"ढीला छोडो अपनी गांड को जरा. टॉड हे डौगी क्या.. आह्हः.", अर्जुन के ऐसा कहने पर भीगी आँखें छुपाती बबिता ने गांड की पकड़ ढीली कर दी. इतनी चिकनाई के बाद भी एक मामूली सा कट लग हे गया था उस छेड़ पर.

"ओह्ह्ह्ह.. सचमुच घोड़े जैसा हे है तुम्हारा. मेरी फट गयी है लगता है.. अब आराम से करना आह्हः... मसलो इस निगोड़ी को... आराम मिल रहा है.", अर्जुन ने भी दर्द को देखते हुए छूट पर हथेली टिका दी. नरम गीली फांको को मसलते हुए वो बबिता का ध्यान हटाने लगा. एक मिनट वो बस सिसकती रही और अर्जुन ने 2 इंच लुंड बहार खींच लिया सूपड़ा अंदर हे रखते हुए.

"मुझे लगा के इतना बड़े और लचीले हिप्स है तोह ज्यादा दिक्कत नहीं होगी. ाःह.. अब आराम से खुद को ढीला रखना..", अर्जुन ने 2 इंच लुंड हे उस चले के अंदर चलते हुए छूट के साथ एक चुत्तड़ सेहलते हुए कहा. बबिता को दर्द के बावजूद गांड में इस गरम और सख्त लुंड का एहसास पसंद आ रहा था. वो रगड़ उत्तेजित कर रही थी जिस से शरीर पर रोये खड़े होने लगे.

"आह्ह्ह्हह्ह.. करो ऐसे हे अंदर बहार करो.. जोर से मसलो इस छूट को आठ.. ऐसे he..aahhh.", अर्जुन ने चुतरस से भीगी 2 उगलिया अंदर हे उतार दी थी छूट में. अब लुंड आधे से ज्यादा उस गरम सुरंग में हलचल कर रहा था. अक्षरा को तोह ये सब सपने सा लग रहा था.

"सम्भालो आह्हः.", अर्जुन ने चिकनाई देखते हुए एक करारा वार कर दिया था. वो भी उत्तेजित था और गांड की सकती के आगे होश गंवाता वो जड़ तक कूल्हों के बीच जा लगा.

"मार दिया रे जालिम.. पता नहीं आअह्ह्ह.. और क्या करेगा.. अब रुकना matt..aahhhh..", बबिता ठान चुकी थी की दर्द को ऐसे हे हटाना होगा. अर्जुन ने दोनों चुके लपकते हुए कमर एक ताल में आगे पीछे करते हुए ये तगड़ी चुदाई चालु कर दी. चेहरा लाल हो चूका था उसका और बबिता भी गांड के उस मदद तक अर्जुन का सूपड़ा टकराता महसूस कर रही थी.

"सचमुच ये सपने जैसा है बबिता.. आठ.. कैसे हिलते है ये दोनों हर धक्के पर.. आठ.. ये तुम्हार मॉटे चुके...", अर्जुन पागल हो कर बबिता की पूरी पीठ चूमते हुए दोनों पपीते जोर से मसल रहा था. गरम और गहरी गांड भी इस नए अनुभव से लुंड को मजबूती से जकड़ने में लगी थी लेकिन हर धक्का ये कोशिश नाकाम करने लगा. छेड़ भी चिकना था और अब लुंड अभ्यस्त हो कर पूरी रफ़्तार से जैसे फाड़ने पर तुला था.

"उम्म्म... मार गांड रहा है.. आह्हः.. मस्ती छूट में चढ़ रही है रे.. आह्हः.. क्या जादू कर रहा है अर्जुन.. मसल इन चुचो को और जोर से.. खुजली मिटा दे saari...aahhh..", बबिता के चुत्तड़ो पर अर्जुन की टक्कर से अब तेज thap-thap की आवाज होने लगी थी. एकेका अर्जुन ने लुंड पूरा हे बहार खींच लिया तोह सुपडे की मोटाई ने फिर से जिस्म में दर्द भर दिया बबिता के

"ओह्ह.. पागल.. ये कर क्या रहा है तू.. आह्हः.. "

"सीढ़ी हो जाओ. ये चूसते हुए करूँगा मैं.", अर्जुन ने समय न गंवाते हुए बबिता को पलट कर दोनों टाँगे अपने कंधो पर रख ली. गांड का रक्तिम छेड़ टटोल कर थोड़ी और क्रीम लगते हुए एक बार फिर अर्जुन अंदर सामने लगा तोह इस बार बबिता मजे में सिसक रही थी. दोनों बड़े गोलों को मसलते हुए अर्जुन ने एक निप्पल मुँह में ले लिया.

"आह्ह्ह्ह.. ये और मजेदार है रे.. आह्हः.. पी ले इन्हे भी लेकिन धक्के लगता रह... आठ.. कितना कस के जा रहा है तेरा खूंटा मेरी धरती में.. आह्हः....", बबिता अपनी हे छूट रगड़ती हुई कूल्हों के बीच अर्जुन के लुंड को भी सेहला देती. मस्ती में उसका सर इधर उधर हिल रहा था. अर्जुन बस इस मादकता के नशे में चूर अब अंतिम छोर तक लुंड अंदर उतारते हुए बबिता के पहले से हे बड़े चुचो को और बड़ा करने में लग गया. इन सीत्कारो और ऐसी बेशरम बातें सुन्न कर कब ऋचा का हाथ भी अपने पाजामे के ऊपर से हे छूट को सहलाने लगा उसको होश हे न रहा. दूसरे हाथ से अपना पेट सहलाती वो टीशर्ट के अंदर हे अपने एक उभर को भी दबाने लगी.

'ये क्या कर रही हो दीदी? आह्हः.. इतने गंदे वर्ड्स भी मजा दे रहे है... आउच.. मेरे साथ ये क्या हो रहा है.. उम्म्म्म.. आह्ह्ह्ह.... ऐसे नहीं होगा.', ऋचा ने पजामा निचे हे सरका दिया. अब एक हाथ कच्ची के अंदर से छूट पर लगते हे तेज सिसकी निकल गयी जिसको रोकने के लिए ऋचा ने अपना हे होंठ दांतो से काट लिया. 23-24 साल की जवानी में वो पहली बार ऐसा कुछ कर रही थी. कल रात हे तोह बबिता दीदी ने उसको छूट साफ़ करने को कहा था जिसको वो महीने डेढ़ में कभी कैंची से हे ठीक करती थी. कोरी 4 इंच की लकीर के बीच ऊँगली रगड़ते हे सीना ऊपर को उठा गया.

'आह्ह्ह्ह..' ऋचा सिसक उठी थी और उधर अर्जुन ने कुछ सोच कर लुंड गांड से निकल कर छूट में पेल दिया था. शायद इतनी देर में लुंड कुछ सूख सा रहा था. लेकिन गीली छूट में एक हे बार में पूरा लुंड घुसते हे बबिता की मस्ती भरी आवाज निकल गयी.

"हाईयीएई अर्जुन.. तू दिल की सुन्न लेता है रे.. आह्हः.. मजा आ गया.. फाड़ दाल तेरी बबिता की छूट को.. आअह्ह्ह्ह..", अब अर्जुन ने अपने होंठो का ढक्कन बबिता के मुँह पर लगते हुए जबरदस्त चुदाई शुरू कर दी थी. ये मुद्रा थी भी ख़ास जिसमे लुंड भरपूर रगड़ मारता झांट के बाल तक छूट के मुहाने लग रहा था. अक्षरा तोह काम्पटी हुई दूसरी तरफ जमीन पर हे बैठ गयी थी. छूट को रगड़ती हुई वो जल्द हे साखळीत हो कर वही पसर गयी.

'क्या करवा दिया दीदी आपने? हहहहह.. अब जितने ये मेरी वाली छुड़ेगी नै मैं जलती रहूंगी.. आह्ह्ह्ह... अर्जुन चाहे जान ले ले लेकिन यही सब मेरे साथ भी कर दे भाई.. आह्ह्ह्हह्ह...', आज अक्षरा को महसूस हुआ था के उसके निप्पल भी कठोर हो सकते है, बेशक चुके मुठीभर अकार के थे लेकिन थी वो भी एक हसीं लड़की जिसकी छूट परिपक्व हो कर बस खुलना हे चाहती थी.

"बबिता .. आठ.. थैंक यू.. आठ.. सचमुच ये रात याद रहेगी हमेशा..", फूटबाल से बड़े चुके लाल कर दिए थे अर्जुन ने और एक जोरदार धक्के के साथ बबिता की भी चीख निकल गयी. छूट ने अपना बांध टॉड दिया था और टांगो में अर्जुन को जकड़ती वो अपनी आवाज रोकने की कोशिश भी नहीं कर रही थी.

"मैं गयी रे अर्जुन.. आह्हः.. पेट में से कुछ बेहटा जा रहा है.. aahhhhhh..",Aur इसके साथ हे अर्जुन ने भी हुंकार भरी.. बबिता के कूल्हों को ऊपर उठता वो छूट की गहराई में ऐसे खाली होने लगा जैसे सीधा गर्भ में हे वीर्य भर कर आज बचे की नीव रख देगा. गहरी सांसें अब हर तरफ थी. यहाँ अर्जुन बबिता के मॉटे चुचो को छाती से दबाये ऊपर लेता था और बबिता की छूट उस गरम वीर्य के नशे में चूर फड़क रही थी वही ऋचा हैरान थी की छूट से ये क्या निकला है जो पेशाब नहीं था बस कुछ अलग महक वाला तरल था. 5 मिनट तोह वो जैसे बेहोश हे रही थी ये तरल उंगलियों पर महसूस करने से पहले

'सीई.. ये था मतलब ओर्गास्म? इतना इंटेंस.. आह्हः.. दीदी ने तोह सेक्स किया है और कितना मजा कर रही थी वो.. मतलब इस से भी ज्यादा इंटेंस होता है सेक्स?' खड़े होते हुए ऋचा के पाँव लड़खड़ा रहे थे और शराबी की तरह चलती वो जैसे तैसे अपने कमरे में पहुंच कर सीधा बिस्टेर पर ढेर हो गयी. अक्षरा भी अलग कमरे में सिर्फ एक चादर ऊपर लेती हुई निर्वस्त्र अवस्था में सो गयी. उसको गर्मी बर्दाश्त नहीं हो रही थी.

"अंदर हे डाले रख रे. ी लव यू एंड जस्ट स्लीप नाउ. उमाहहह.", अर्जुन का लिंग अभी भी छूट में था बबिता की लेकिन दोनों हे करवट के बल थे. बबिता एक टांग उसके ऊपर रखे अर्जुन के होंठो को चूम रही थी. वही अर्जुन भी एक गहरा चुम्बन करता हुआ प्यार से बबिता की पीठ सेहला रहा था. फ़िलहाल दोनों हे हिलने की स्थिति में न थे.

"गूडनिघत बब्बू. स्लीप वेल.", अर्जुन और ाचे से चिपक कर बबिता के साथ हे सो गया. ढाई घंटे में 2 बार पलंगतोड़ प्यार करने के बाद और दिनभर की थकान से दोनों हे एक दूसरे के आगोश में गहरी नींद में चले गए. ऐसी मुठभेड़ का भी अलग हे मजा था जहा इन दोनों के साथ साथ 2 और लोग भी प्यार में मारे गए थे आज. तीर ऋचा और अक्षरा के भी लगा था वो भी अर्जुन के नाम का. देखना था के दोनों इस सफर पर कैसे आगे बढ़ती है और क्या अर्जुन उन्हें ये सुख देगा भी या नहीं.?

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आज का दिन रेखा जी के लिए भी बहोत कुछ ले कर आया था. सब काम निबटा कर वो कमरे में 10 बजे आयी थी और कुछ देर Ritu-Rupali के साथ समय बिताने के लिए आज उन्होंने दोनों को हे अपने अपने कमरों में जाने को कहा. 11 बजे के बाद हे नाहा कर वो चुपचाप अपने बिस्टेर पर आ लेती. हमेशा की तरह एक साधारण गाउन पहने वो अब उतनी चमकदार नहीं लग रही थी जितनी हमेशा दिखाई देती थी. अभी वो आँखें बंद करते हुए अपने विचारो की दुनिया में हे जाने लगी थी की दरवाजे पर दस्तक होने से उठ कड़ी हुई. सामने उनकी प्यारी बेटी ऋतू एक ढीली सी टीशर्ट और पाजामे में थी.

"माँ, मेरा दिल नहीं था वह सोने का.", रेखा जी ने ऐसा निवेदन सुन्न कर ऋतू को अपने सीने से लगा लिया. दरवाजा वापिस बंद करके वो ऋतू को साथ ले कर बिस्टेर पर आ गयी.

"इतना प्यार करती हो अपनी माँ से? मैं भी अकेले नहीं सो सकती थी लेकिन मुझे लगा के शायद तुम्हे आराम की जरुरत होगी बीटा इसलिए जाने को कहा था.", अपनी माँ की बात सुन्न कर ऋतू उनके सीने से लगते हुए उनकी ब्याह पर सर टिकाये बस देखने लगी.

"आप प्यार की बात करती हो माँ, ारु के साथ साथ मेरे लिए भी आप हे हमारी दुनिया हो. आपने बताया क्यों नहीं मुझे जो आपके साथ आज हुआ उस बारे में?", रेखा जी को समझ आ गया था के तारा ने ये बात बता दी होगी ऋतू को. और अपनी बेटी के मासूम चेहरे पर छायी पीड़ा को देखते हुए उन्होंने उसका माथा हलके से चूमने के बाद कहा.

"मेरी दुनिया भी तोह तुम्हारे आने से हे बानी है न पारी. और जब मुझे किसी बात का दुःख नै है तोह तुम क्यों चिंता कर रही हो? मुझे तोह खरोच भी नहीं आयी, देख लो चाहे तुम्हारे सामने हे हु."

"माँ बात खरोच आने की नहीं है बात है के इतने लोगो में भी अटैक आपके ऊपर हुआ था. जानती हो जब आज मेरे साथ वो घटना हुई तोह वह ारु था और मुझे यकीन था के वो कुछ होने नहीं देगा और वैसा हुआ भी. लेकिन आप तोह अकेली थी जैसे, मैं सच कह रही हु न माँ? प्लीज कभी तोह मुझे कुछ बताया कीजिये.", ऋतू का ऐसे दर्द में होना वो भी माँ के लिए. रेखा से भी देखा न गया और आज उन्होंने भी सोच लिया था के बेटी को कुछ हद्द तक सहेली बनाने का वक़्त आ गया है.

"जानती हो जैसा तुम्हे ारु के साथ महसूस होता है न वैसा मुझे मेरी ज़िन्दगी में कभी महसूस नहीं हुआ ऋतू जबतक ारु बड़ा हो कर हॉस्टल से वापिस यहाँ नहीं आ गया. मैं समझती थी शुरू शुरू में वो मुझसे इसलिए बात नै करता क्योंकि वो समझता होगा के मैं उसके जाने के पीछे एक वजह थी. लेकिन सच तोह ये था के वो जानता था मैं उसके बिना कितना रोई होउंगी, मेरा दिल कितना दुख होगा. वो फिर से मेरी वैसी हालत नहीं देखना चाहता था अगर तुम्हारे पापा उसको फिर से बहार भेज देते तोह. लेकिन जब वो मेरे सीने से लगा तोह मैं पूरी हो गयी थी, एक बार फिर से माँ बन्न कर उस बचे की. थोड़े समय बाद मुझे पता लगा के ारु मेरा कवच बन्न चूका है. मैं परेशान इसलिए हुई की अगर आज ारु वह होता तोह तुम्हारे पापा उसकी नजरो में गलत साबित हो जाते. उनकी कोई गलती नहीं थी फिर भी वैसा होना स्वाभाविक था."

"आप न एक दिन ऐसे हे सबकी परवाह करती हुई मर्डर जाओगी माँ और उसके बाद कुछ बिखरेगा तोह मेरी और ारु की ज़िन्दगी. कोमल दीदी भी हमको आपके जैसा प्यार करती है लेकिन वो भी अपने घर चली जाएँगी. मैं इतनी बड़ी नहीं हु माँ के अपने साथ साथ ारु को भी संभल सकू. अब से आप जहा भी जाएँगी या तोह ारु साथ होगा नहीं तोह आप नहीं जाएँगी. आपके आज गोली लग जाती तोह हमारा क्या होता माँ...", ऋतू फफक फफक कर रोने लगी तोह रेखा जी का भी दिल बैठ गया था. ये दोनों शरीर से बड़े थे, होशियार थे और हिम्मत वाले भी लेकिन रेखा के जिस्म में इतने बरसो बाद उत्पन्न हुआ दुग्ध अभी तक एक आहार था इन दोनों के लिए. दोनों हे ख़ास एकांत में नन्हे बचे बन्न जाते थे अपनी माँ के सीने से लग कर. रेखा ने अपने बेटी को कस के सीने से लगा लिया. ऋतू का रुदन जाने क्या करवाने वाला था अब.

"मैं मेरी पारी को छोड़ कर कही नहीं जाने वाली, प्लीज रोना बंद करो बीटा. मुझे भी दर्द होता है तुम्हारी धड़कन बढ़ने से. मेरी ाची बची हो न तुम?", प्यार से ऋतू का सर सहलाते हुए रेखा जी ने भरसक कोशिश की अपनी नन्ही पारी को चुप करने की.

"माँ.. मुझे ये सोच कर हे घबराहट हो रही है की आपके साथ कुछ भी हो सकता था. माँ ारु भी अभी छोटा है, वो कुछ दिन पहले कमरे में सोया हुआ भी रो रहा था. उसके होंठो पर बस माँ माँ निकल रहा था और मैं इतना डर गयी थी की मुझे भी रोना आ गया था. आइंदा आप कही नहीं जाओगी हमारे बिना, कही भी नहीं.", हिचकियाँ लेती ऋतू अटक अटक कर बोल रही थी. और रेखा जी ने भी वैसा हे कुछ अपनी आँखों से देखा था 2-3 बार. पिछली रात भी तोह अर्जुन की पलके नम्म हो गयी थी जब वो उनकी बगल में सो रहा था.

"सपनो की भी एक अलग हे दुनिया होती है मेरी बची. कहते है की किसी का देखा सपना दूसरे को पता लग जाने से वो सच नहीं होता. मेरी तोह उम्र हे बढ़ा दी मेरे दोनों बचो ने. वो भगवन इतना निर्दयी नहीं है के इतने प्यारे बचो को दुखी कर सके. मैं हमेशा तुम्हारे पास हे रहूंगी और वादा करती हु के तुम दोनों में से कोई एक तोह हमेशा मेरे साथ रहेगा. मुझे भी आज हे पता लगा के मेरी बची पिस्तौल भी तान सकती है.", रेखा जी ने ऋतू को याद दिलाया तोह गीले चेहरे पर भी एक छोटी सी मुस्कान आ गयी.

"वो तोह मैंने बताया था न आपको माँ .. लेकिन मैं सचमुच चला देती अगर वो ारु को कुछ करते तोह. हाँ.. और अगर फ्यूचर में भी ऐसा कुछ हुआ तोह मैं खुद को रोकूंगी नहीं."

"मैट रोकना खुद को अगर बात किसी अपने को बचने की हो तब. मैं जानती हु मेरी ये छोटी सी गुड़िया कितनी बड़ी आफत है. लेकिन कभी इन आँखों में आंसू मैट लाना बेटी, बस मैं ये नहीं देख सकती की मेरे बचे कभी परेशां हो.", रेखा जी ने और ाचे से ऋतू का चेहरा साफ़ करते हुए दोनों आँखों को ऊपर से चूम लिया. एक बार फिर से वो अपने बेटी को बाहों में भरे सोच रही थी की एक हे घटना से हर व्यक्ति का नजरिया कितना भिन्न रहा. सभी तोह उनके इस परिवार से है. संजीव कैसे गोली की परवाह किये बिना उनकी तरफ दौड़ आया था. कैसे तारा ने गाडी में उन्हें झुका कर खुद को ऊपर कर लिया था जो वो जानती तोह होने न देती. उमेद एक सच्चा देवर था और अर्जुन का सही संरक्षक.

"ारु को समझाना माँ, वो शायद इस बारे में जान चूका है. वो जितना खामोश था और जैसे चला गया आराम से तोह इसका एक हे मतलब निकलता है के वो अब सबकुछ पता करेगा. आप हे समझा सकती है उसको नहीं तोह पापा कही फिर से भाई को दूर न भेज दे.", ऋतू ने अपनी घबराहट के ये एक और बड़ी वजह बताई तोह रेखा जी मुस्कुराने लगी.

"वो कल रात ऐसे हे मेरे पास होगा जैसे आज तुम हो. वो जान भी जायेगा तोह अपने दादा जी को हे बताएगा, ghar-pariwar से दूर वो भी नहीं जाएगा. मुझे बस उसकी हे चिंता है बीटा, वो रोटा नहीं लेकिन दिल में रख कर ज्यादा नुक्सान करता है."

"आपके जैसा है न माँ वो. यही तोह आप भी करती हो, हमेशा हर बात दिल में बंद रहती है आपके चाहे फिर आपको कितना भी दर्द हो.", अपनी हे बेटी के मुँह से ये सच्चाई सुन्न कर रेखा जी बस उसकी पीठ सहलाने लगी. फिर कुछ सोच कर उन्होंने विषय हे बदल दिया.

"वैसे कभी कभी लगता है के तुम कोमल से भी बड़ी हो. ऐसा हुआ तोह तुम्हारी दीदी से पहले तुम्हारी शादी करवानी पड़ेगी.", यहाँ ऋतू कुछ बेहतर महसूस करने के बाद खुद हे माँ के गाउन की चैन खोलने लगी थी.

"अभी एंजेल बेबी का दूदू टाइम शुरू. गूडनिघत.", ऋतू ने आँखें बंद करते हुए उस निर्वस्त्र सतांन से मुँह लगाया और उसके घुटने अपने आप हे किसी छोटे बचे की तरह मदद कर माँ के पेट की तरफ हो गए. उसकी माँ भी जल्द हे एक जकड़न से आजाद होती बेटी को टपकाती हुई उसके साथ हे सो गयी.
 
लाजवाब है आपके अभी तक की इस कहानी के निचोड़ से प्रभु 404

जितनी समझ हर किरदार की आपने दिखाई है फ़िरेफोक्स भाई शायद हे कोई ऐसा कर सके. हर इंसान किसी एक किरदार को अपना रुख देता है लेकिन आपके जवाब में सभी शामिल थे वो भी अपने sakratmak-nakratamak पक्ष के साथ. मैं चरित्र विश्लेषण पर ज्यादा कुछ नहीं कहूंगा क्योंकि मेरे लिए भी वो सभी ख़ास किरदार है और लेखक के नजरिये से मैं पक्षपात करूँगा तोह कहानी से वो न्याय नहीं कर पाउँगा जो होना चाहिए. यहाँ बहुत बार जीकर होता है 'हीरो' या विलन का लेकिन मेरे लिए तोह अवधेश मिश्रा भी बस एक जरुरी किरदार है और कही नहीं कही कुछ घटनाक्रमों में बाकी सभी भी समझेंगे की व्यक्ति की परिस्थिति, माहौल, मज़बूरी और चाहत क्या कुछ करवा जाती है.

मंजिले यु साकार नहीं होती ये जरा एहतियातन फिर समझ लीजे

सफर में माँ टपकता है, रेशा जलता है बस एक मंद लौ के लिए

बात करते है सबसे पहले तोह इस कहानी के शुरुवाती 16 उपदटेस की जहा पर मैं मूल कहानी में फिर से काम कर रहा हु क्योंकि वह सिर्फ ललिता जी, अर्जुन की उम्र या कुछ चरित्रों का सही विश्लेषण हे नहीं, निरंतरता में भी सुधार होना है. जैसा की वो समय ऐसा था जब मैंने पहली बार हे कुछ लिखने की चेष्टा की थी वो भी उधेड़बुन में. ख़याल, कहानी का सार, जितना मैंने भाग बनाने और विस्तार करने का अनुमान लगाया वो सब बस पहली हे बार हो रहा था. कलम कभी चलाई थी तोह कविताएं, hasya-ras, laghu-kahaniya या सामाजिक व्यंग तक वो सिमित रहा जिसमे सामने वाला आपको कुछ कह नहीं सकता, जरिया कहा होता है ऐसे लेखन में.

यहाँ लिखना शुरू किया तोह विचार मिले, सुझाव आये, प्रोत्साहन और मार्गदर्शन भी मिला. 60 उपदटेस लगे तब समझ आया के प्यारे अब तुम लिखना सीख रहे हो, इस से पहले तोह बस बता रहे थे और मस्तराम की छाया भर थे. हाँ अब थोड़ा इस चीज को बरकरार रखो नमक का पता चल गया है तोह अब मसालेदानी के सभी स्वाद भी चखो और अनुसार प्रयोग करो. तोह अपनी हे कहानी फिरि से पढ़ी लेकिन तब तक जीवन में बहुत कुछ घाट चूका था.

खैर वापिस आये तोह रूपरेखा पहले से बेहतर थी और अब लिखने में जो मजा आने लगा वो मज़बूरी जैसा नहीं था के जरुरी है भाई, लोग क्या कहेंगे. कहानी पूरी करनी है एक टारगेट है. सब भूल कर खुद हे किरदारों से जुड़ना शुरू कर दिया. लेकिन खामिया अभी भी बहोत है जो समय मिलने पर हे सुधर सकेंगी.

अब कुछ जरुरी तत्वों पर बात करते है जिनमे से सबसे पहले है रुपाली को क्या पता है और वो उसके साथ कितना न्याय किया गया. तोह फ़िलहाल वो परिवार में ढल चुकी है और अब वो बेहतर है. उसको परदे के पीछे रखने का मकसद वही है के इनका रोले सही समय पर आएगा लेकिन इन्हे जानकारी बहुत है क्योंकि baap-beti हे तोह थे बस वह गाँव में.

उमेद का किरदार मनमौजी था लेकिन 2 भाई मरने के बाद और पिता के सब लोगो से किनारा कर लेने पर ये बस अपने परिवार को हे बचने में लग गया. इंसान खोजबीन तब करता है उसके पास वो समय हो और वो सहूलियत हो. यहाँ तोह परिवार बिखरा सो बिखरा अपनी ज़िन्दगी भी दुसरो के नाम हो गयी. म्हणत और लगन से बस यही सपना पूरा करने में लगे है के वो स्वर्गीय रघुबीर सिंह के बेटे के तौर पर खुद को सार्थक कर सके. 2 परिवार जो एक है वह एक रहे, सुरक्षित रहे और अगर मिटने की भी बारी आये तोह सबसे पहले गोली इन्हे लगे. उमेद सिंह का फ़िलहाल किरदार aata-jata रहेगा लेकिन भाग 3 के 20-22 उपदटेस में वो प्रमुख रहने वाले है, शंकर और इन्दर के साथ.

अभी इतिहास बहुत बाकी है और वह की विस्तार से बताने लायक किस्से भी तोह कहनी से उस समय ये वाला अर्जुन थोड़ा थोड़ा हे दिखाई देगा. मेरा पसंदीदा भाग वही है और सभी जेड वही दफ़न है. वह माहौल भी कही बेहतर और रोचक रहने वाला है और जो लोग 50-60-70 वाले दशक से परिचित नहीं है उन्हें जरूर कुछ नया जान ने को मिलेगा.

अन्नू वालिए के किस्से मैं ज्यादा नहीं खोल कर कहता क्योंकि हर बात या तोह केहनी नहीं चाहिए या फिर बचा कर रख लो बाद में काम आएगी. वैसे भी इतना विस्तार हुआ तोह मैं अगले 5 साल प्यार 100 बार हे लिखता मिलूंगा और अपडेट होंगे कोई 1500 ;)

फिलहाल तोह यहाँ भसड़ सी मची हुई है और ये ऐसे हे चलने वाली भी है कुछ समय तक लेकिन नरिंदर के आते हे यही भोले वाले शंकर जी अपनी फॉर्म में दिखेंगे, तभी इनके पिता जी समझते रहते है. शादी ब्याह तक अपडेट कही एक पहर भी पूरा ले लेगा तोह कही 4 दिन का जीवन एक अपडेट में भी देखने को मिलने वाला है.

तहे दिल से शुक्रिया मेरे भाई 404 , आप पहले हे अपडेट से साथ हो जैसे अपने टिनटिन भैया, 2-2 आयरन मन, विराट कोहली भाई और ये जुड़ाव मुझे हमेशा प्रेरित भी कर्त्ता है की मैं निर्भीक प्रस्तुत कर सकू जो मैं लिखना चाहता हु. विषम समय में मुझे तोह कुछ कहना हे नहीं पड़ा क्योंकि आप हे लोगो ने सब संभाला और माहौल बरकरार भी रखा.

टाइटल के बारे में मैं भी एक बात कहूंगा की प्यार जो है वो 100 लोगो से एक एक बार करके 100 बार नहीं हो सकता. हाँ 100 लोग प्यार कर सकते है और उनके जीवन में उस प्यार का क्या असर होता है वो इस शीर्षक के पीछे का एक छोटा सा रहस्य है. आखिरी अपडेट में हे इसका खुलासा करूँगा और वो अपडेट सबसे पहले लिखा जा चूका
 
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