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प्यार और परिवार
घर की सभी महिलाये पड़ोस वाले गुप्ता जी के घर गई हुई थी जहाँ होली की कथा सुनाई जा रही थी. दोपहर का 1
बज रहा था और इस समय रामेश्वर जी भोजन करने के बाद अपने कमरे में नींद ले रहे था. ऋतू और अलका एक साथ
बैठी पधारी भी कर रही थी और कुछ खुसुर फुसुर भी. कोमल का भी फाइनल का इम्तिहान था तोह वो दूसरी मंज़िल
वाले ड्राइंग रूम, जहा इस समय कोई नहीं था बैठी हुई िटमिनियन से नोट्स बना रही थी. संजीव भी गुप्ता जी के
हे घर पर था क्योंकि उसको वही से दादी जी और घर की बाकी महिलाओं के साथ पूजा का सामान लेकर होलिका स्थान पर
जाना था. गुप्ता जी का बीटा अरुण संजीव का ाचा मित्र था तोह वो दोनों अलग कमरे में बैठे गप्पे हेंक रहे थे.
और यहाँ घर पर माधुरी भीतर वाले आँगन में बने बाथरूम में स्टूल पर बैठी किसी बात को सोच मुस्कुरा रही
थी. "हाय राम. ये ऋतू भी न, क्या जरुरत थी मुझे ये सब देने की", खुद से बातें करती हुई वो अपनी योनि पर
उग्ग आये जंगल को सहलाते हुए उनपे क्रीम लगा रही थी. पूरा शरीर दमक रहा था उसका और पूरी योनि के ird-gird
सफ़ेद क्रीम लगी थी. ऐसे बैठे होने से उसके दूध अपने आप सख्त हो रहे थे और उनपर चिपके हुए वो भूरे रंग
के निप्पल नंगे होने के एहसास भर से तीर की तरह तीखे हो चुके थे. पूरे शरीर पर रोये खड़े हो गए थे.
माधुरी के शरीर में भी एक बात कमाल की थी. उसके किसी भी हिस्से पर कही कोई बाल नहीं था. न हाथो पर और
न हे कही जांघ, पिंडलियों या चूतड़ों पर. सिर्फ छूट के ऊपर एक उल्टा व् के आकर का जंगल थे और ऐसे हे बड़े हलके
से बाल छूट के चारो तरफ. "ऋतू ने बोलै था के 10 मिनट लगा कर रखना है फिर कपडे से साफ़ करके धोना है",
यही याद आते हे माधुरी ने अपनी आँखें बंद कर ली और अगले हे पल उसकी साँसों की रफ़्तार बढ़ गई. "हाय अभी भी
ऐसा लग रहा है जैसे वह पागल अपना डंडा घिसा रहा हो मेरी मुनिया पर.", ऐसा एहसास होते हे उसकी छूट से एक ौस
की बूँद बहार निकल आई और छूट के मुहाने पर रुक गई. और उसके मुँह से हलकी सिसकारी निकल गई , "शह्ह्ह्ह पागल कर
दिए है इस लड़के ने तोह. और क्या हालत कर दी है मेरी." खुद से बातें करते हुए जब माधुरी की नजर सामने लगे
शीशे पर पड़ी तोह उसने देखा छोटे छोटे नीले निशान उसके निप्पलों के आसपास बने हुए, लाल लाल खरोंच के निशाँ
और सूजे हुए दोनों निप्पल जो अब पहले से कही बड़े दिख रहे थी. जैसे हे उसने अपने निप्पल को छूआ, वो छूट पर रुकी
शबनम की बूँद फर्श पर जा गिरी. "ूई माँ." फिर जब उसने ड़याँ दिए के क्रीम सूखने लगी है तोह पास में रखे गीले
कपडे से उसने ऊपर से निचे तक रगड़ के पांच दिए. "वाह." माधुरी के मुँह से अपनी छूट देख कर यही निकला बस.
जहा पहले जंगल था वो जगह अब ऐसे दमक रही थी जैसे कोई बाल वह ऊगा हे न था. और उसकी छूट के दोनों मोठे
होंठ अब साफ़ गोर और पहले से ज्यादा पहले दिख रहे थे. कुछ सोच कर वो शरमाई और सारा कचरा एक पॉलिथीन में
दाल दिए. छूट को ठन्डे पानी से धोने के पाउडर लगाया और कपड़े पहन चल दी अपने कमरे में कोई गण गुनगुनाते हुए.
अर्जुन जैसे हे घर पंहुचा बिना किसी को देखे सीधे अपने कमरे की तरफ दौड़ लिए. जाते हे टीशर्ट उतार फेंकी और
बनियान पहन कर ड्राइंग रूम में घुस गया. सामने का नजारा देख पेअर वही जम्म गए. कोमल दुनिया से बेखबर छाती
के भार लेती स अपने नोट्स बना रही थी और उसके गोर गोर उभार कमीज से नुमाया हो रहे थे. पजामी के ऊपर से कमीज
कमर पर छड़ी हुई थी और उसका भाई पिछवाड़ा सलवार से चिपका हुआ बड़ा दिलकश नजारा दे रहा था.
"दीदी आप यहाँ." अर्जुन ने खुद को सँभालते हुए कोमल को पुकारा
"ओह. है भाई वो क्या है न निचे शोर हो रहा था. मेरे कमरे में ऋतू और अलका कब्ज़ा कर के बैठी थी. पापा अपने कमरे
में सो रहे है तोह मई यहाँ चली आई. अगर तुझे कुछ काम है तोह मई उठ जाती हु.", बिना हिले हे कोमल दीदी ने अर्जुन
को सब बता दिए.
"अरे नहीं दीदी. आपका हे तोह है ये भी. मई तोह बोर हो रहा था तोह सोचा टेलीविज़न हे देख लेता हु. लेकिन आप कर लो
पढाई मई कही और बैठ जाऊंगा." इतना बोलकर जैसे हे वो मुदा तोह कोमल ने उसको रोक लिए.
"चल आजा यहाँ मेरे पास बैठ. मेरा काम भी हो हे गया है. कभी मेरे भी साथ समय बिता लिए कर." और वह सीधी हो गई.
"आप हे सारा दिन घर के काम या पढ़ाई में लगी होती हो. मई तोह हमेशा यही होता हु अकेला." मासूम सा चेहरा बनता हुआ
वो सोफे पे आ बैठा और कोमल ने भी लेते हुए अपना सर छोटे भाई की गौड़ में रख लिए टेलीविज़न की तरफ मुँह करके.
"कुछ ाचा सा लगा न भाई. क्रिकेट मत लगाइओ बस.", बड़े लाड से उसने ये बात कही तोह अर्जुन ने रिमोट का बटन दबाया
और फिर भो चैनल पर रोक दिए. यहाँ एक रोमांटिक मूवी आ रही थी जो अभी शुरू हुई थी. अर्जुन इंग्लिश फिल्म भी इसलिए
देखता था की उसकी इंग्लिश पर पकड़ बानी रहे. और कोमल जो की खुद फाइनल ईयर में थी उसको भी इंग्लिश की ाची समझ थी.
दोनों भाई बहिन फिल्म देख रहे थे और अर्जुन अपने हाथ से बहिन का सर सेहला रहा था. दूसरा हाथ उसका वैसे हे दीदी की
कमर से ऊपर रखा था. फिल्म काफी ाची थी तोह कोमल तोह उसमे हे खो गई. अर्जुन की एक पल नजर हटी तोह उसका ध्यान
अपनी दीदी की कमर पर गया, जहा से कमीज ऊपर सरक चूका था. एक बार अपनी बहिन की सपाट चिकनी कमर देख कर उसने
वह से नजर हटाई और अपनी दीदी का चेहरा देखने लगा. बिलुल मासूम सा चेहरा था कोमल का और त्वचा ऐसी बेदाग के
कही कोई टिल भी नहीं. आँखों पे चस्मा लगा हुआ था जो की काफी जंचता था और छोटा पावर का था वह. ऊपर वाला होंठ
थोड़ा उठा हुआ नाक की दिशा में एकदम गुलाब जैसा. सीढ़ी प्यारी नाक और बादाम जैसा चेहरा. कोमल के चेहरे पे एक अलग
हे नूर था. ना तोह उसपे ऋतू जैसी चंचलता थी, न हे अलका जैसा बचपना. एक अलग हे सकूं से भरा चेहरा था उसका.
आज पहली बार अर्जुन ने अपनी इस बड़ी दीदी को इतने ध्यान से देखा था और वो उसमे हे खो गया था. अब उसके मैं में कोई काम
विचार या वासना नहीं थी, सिर्फ एक एहसास था के ये पल बस यही रुक जाये. उसका दिल रुक रुक कर धड़क रहा था और काफी देर
से बानी इस ख़ामोशी को देख कोमल ने सिर्फ अपनी नजर हिलाई, गर्दन नहीं. अपने भाई को खुद के चेहरे में खोया देख एक बार
तोह उसको अजीब लगा लेकिन जैसे हे उसने अर्जुन की आँखों को देखा वो खुद भी शांत हो गई. अर्जुन bhaav-shunya सा खोया था
और उसको कुछ पता नहीं चला. बस उसकी दीदी के गाल हलके गुलाबी हो गए थे. कोमल के होंठ धनुषाकार हो चुके थे. लाज
शर्म, और सिर्फ इस विचार से की उसका भाई कितने वात्सल्य से उसको देख रहा है.
हिम्मत कर के कोमल ने इस बार नज़र घुमाई और अपने भाई का चेहरा देखने लगी जैसे वह देख रहा था. बड़ी गहरी भूरी
आँखें, घुंगराले कुंडली बाल, चेहरे पे एक तेज जिसको कोई नजर अंदाज न कर सके, हलके bhoore-gulabi होंठ जिनके ऊपर
अभी मूछ के अंकुर बस निकलने हे लगे थे, तराशा हुआ चेहरा. और बस यही दोनों की नजर एक हो गई.
अपनी दीदी की गहरी आँखों की तरफ अर्जुन झुकता हे चला गया और कोमल के हाथ खुद बा खुद भाई की गर्दन को घेर कर
आपस में जुड़ गए. दोनों एक दूसरे की साँसों को महसूस कर रहे थे. टेलीविज़न पर फिल्म ख़तम हो चुकी थी लेकिन यहाँ शुरू
हो चुकी थी. कोमल ने खुद से हे अपने लबों को अर्जुन के लबों से मिला दिए. इस चुम्बन में lesh-maatra भी वासना न थी.
अर्जुन ने अपने होंठो से कोमल का ऊपर वाला होंठ चुभलाया तोह उसकी आँखें सुकून से बंद हो गई. गर्दन पर पकड़ और
मजबूत. जैसे वह कह रही हो के भाई मुझको खुद से अलग मत करना. अर्जुन ने भी अब कोमल के दोनों होंठ अलग कर अपनी
जीभ से उसकी जीभ को छु लिया था और एक हाथ के अंगूठे से उसके गरम हो रहे नाजुक गाल को सेहला रहा था. गीले होंठ
एक बार फिर जोरदार तरीके से चिपक गए और जब अलग हुए तोह अर्जुन की गर्दन सोफे की तक पर लुढ़क गई और कोमल अपने
भाई की गौड़ में आँखें बंद किये निढाल मूर्छित सी पड़ी थी.
वो उठी और जब उसने देखा के उसका भाई अभी भी साँसे दुरुस्त कर रहा है तोह एक बार फिर कोमल ने झुक कर अपने भाई के
होंठो पे प्यार से एक छोटा सा चुम्बन दिए और अपनी किताबे लेकर निचे चली गई, एक नै ऊर्जा और प्यार से भरी.
"ऐसा जादो तोह मुझे सेक्स करते वक्त भी नहीं हुआ. और मेरी नजर को कुछ भी दिखाई क्यों नहीं दिए?" सोचते हुए वो अपने बीएड
पर निढाल होकर नींद के आगोश में चल दिए.
.
.
इधर ऋतू और अलका के कमरे में.
ऋतू- यार सोचा है कुछ कल जन्मदिन के बारे में?
अलका - क्या सोचना है वही सुबह उठकर पूजा करनी है दादी जी के साथ. ऊपर से फाग है तोह रंग खेलेंगे और शाम को
जैसे हर साल होता है वैसे हे मेरी पसंद का खाना बनेगा और जो दादा जी daan-puniya करवाएंगे. नया क्या होगा? जन्मदिन
तोह अप्रैल में बनता है.
ऋतू (सोच के लहजे में)- है यार जन्मदिन तोह दादा जी अर्जुन का हे मानते है. देखा नहीं जब वह 8 साल नहीं था तब भी बड़ी
धूम धाम से मानते थे, जैसा खुद उनका हे जनम हुआ हो उस दिन. लेकिन प्यार तोह वह तुझे हे करते है सबसे ज्यादा उसके बाद.
अलका- अरे ये देख के तोह मुझे कही ज्यादा ख़ुशी होती है. छोटा भाई है हमारा और प्यार तोह सभी करते है उस से. जहा
तक मुझे याद है तोह तू हे सारा दिन उसको गौड़ में लिए छोटा काका- छोटा काका करती रहती थी बचपन. कितनी बार तोह उसके
रोने से तू हे रोने लग जाती थी के देखो काके के क्या हुआ.. और खिलखिलाने लग पड़ी
ऋतू मुस्कुराते हुए बोली," यार बचपन कितना प्यारा था न और अब देख ये पिताजी के चक्कर में 12 घंटे तोह किताबो में निकल जाते
है." किसी तरह अर्जुन क टॉपिक को उसने बदल दिए. जब भी उसके सामने अर्जुन का चेहरा आता था वह खुद हे नज़र हटा लेती थी.
जाने क्या था उसके दिल में जो अपने भाई से 8 साल दूर होने के बाद घर कर गया था.
अलका ने बात आगे बधाई," वैसे तू मुझे क्या दे रही है? चाचा जी ने तोह 2 कंगन बनवाये है मेरे लिए सोने के. चची जी
ने एक नया फुलकारी वाला सूट, माधुरी दीक्षित जैसा. पापा तोह कल हे देंगे लेकिन दादा जी ने बैंक में अकाउंट खुलवा दिए है और
50,000 जमा किये मेरे नाम से." बिस्तर पर दोनों आमने सामने लेती थी झुकी हुई सी.
"यार तेरा सही है. इतना कुछ मिला है तोह मई सोच रही थी के तू हे उपहार देदे मुझे." बोलकर ऋतू खिलखिला उठी. सबके
सामने हिटलर सी रहने वाली ऋतू सिर्फ अलका, शंकर जी और अपने दादी जी के साथ हे खुलकर बात करती थी. दादी तोह खुद हिटलर
थी तोह उनको अपनी यही गुस्सैल पोती पसंद थी और पिताजी भी ऐसे हे थे. लेकिन अलका और ऋतू बचपन से एक साथ रही थी और
अलका का विपरीत स्वाभाव हे था के ये दोनों एक दूसरे से जान तक जुडी थी.
"है तोह तुझे पता हे है मई कोनसा कंगन पहनती हु. तेरे हे है वह और जो भी संजीव भैया देंगे वह भी तुझे हे मिलेगा.",
अलका ने प्यार से उसकी थोड़ी ऊपर उठा के बोलै तोह ऋतू ने कुछ न कहा बस हलके से चूंटी काट दी अलका के झांकते हुए अभारो
पर.
"अह्ह्ह.. कमीनी", इतना बोलकर दोनों मुस्कुरा di.."Tu कभी नहीं सुधरेगी न? जब देखो तुझे यही दीखता है." अलका ने झूठे गुस्से
से कहा तोह ऋतू ने पलट वॉर किआ, "दिखती है तभी तोह दीखते है मेरी जान. वैसे कुछ भी के अलका तुझे देखती हो तोह ऐसा
लगता है के मई तोह कुछ भी नहीं तेरे सामने. भगवान् ने तुझे न जैसे अपने स्वर्ग के लिए हे बनाया था और भेज दिए यहाँ." इतना
बोलकर एक बार फिर उसने अलका के उभार पकड़ लिए.
"क्या करती है पागल कुछ भी बोलती है. तू शायद ये भूल रही है तू क्या चीज है यार. पिछले साल याद है न फ्रेशर टाइम
क्या हुआ था? लड़के पुलिस की लाथिऑन खाने से भी हेट नहीं थे तुझे साड़ी में देख कर." अलका ने ऋतू का हाथ हटाने के कोई
कोशिश नहीं की, उल्टा खुद भी उसके गले से निचे हाथ फेरने लगी.
"इतना खूसूरत होने का फायदा हे क्या हम दोनों का जो शादी तक रहना हे जेल में है. और फिर शादी के बाद पता नहीं कैसा घर
माहोल मिले." दार्शनिक अंदाज में अपनी बात कहते हुए ऋतू अब अपना पूरा हाथ अलका की कमीज में घुसाए उसका एक चूचा दबा रही
थी..
"सष्ठ.. बस कर यार. तेरा तोह पता नहीं लेकिन मई तोह जिंदगी जीने में यकीन करती हु. काट ता तोह कुत्ता भी है और हम पढ़े
लिखे इंसान है." अपनी चूची के दबाये जाने से मजे में आती अलका ने भी ऋतू का निप्पल खींच लिए और उसकी भी सिसकी फूट गई
"मत आग लगा कामिनी. Pachtayegi."Itna बोलकर ऋतू ऊपर आ गई अलका के लेकिन अपना पूरा वजन नहीं डाला. "और क्या कह रही है के
तू जिंदगी जीने में यकीन करती है? कोई शहजादा तोह नहीं आ गया तेरे सपने में?" इतना बोलकर इस बार ऋतू ने अपने दोनों हाथ अलका
की कमीज में घुसा दिए और पूरा कमीज उल्टा दिए गले तक.
"ोये अभी मत कर. तेरा ये मस्ती करना दोनों को भरी पद जायेगा किसी दिन." अलका बोल तोह रही थी लेकिन खुद उसने भी ऋतू की टीशर्ट
में दोनों हाथ घुसा दिए थे. "और कोई शहजादा वेह्जादा नहीं आया सपने में. अब जो भी आएगा सामने हे आएगा. और प्यार होना है तोह
होकर हे रहेगा. शादी जहा मर्जी हो.", इतना बोलकर उसने भी ऋतू की ब्रा उलट दी.
"वाह मेरी भगत सिंह. क्रान्ति की बातें कर रही है." ऋतू ने अब अलका के दोनों चुके जो की बिलुल सर उठाये खड़े थे, एकदम
गोर ुर लालिमा लिए हुए अपने दोनों हाथो से सहलाने दबाने शुरू कर दिए. उनपर उगे नुकीले हलके भूरे निप्पल कड़े होकर सुलग
ने लगे थे. वही ऋतू के एकदम सफ़ेद चूचे जो किसी भी प्रकार से अलका से काम न थे वह भी अकड़ने लगे. उनपे हलकी नीली रागे
साफ़ दिख रही थी.
अलका ने उन्हें मसलते हुए kaha,"Dekh मेरी जान कल को किसी अजनबी से शादी करके घर तोह बसना हे है. फिर चाहे रोना पड़ा या
हंसना तोह उस से पहले जीना कोई गुनाह तोह है नहीं.", इतना कहकर उसने ऋतू का एक पूरा चूचा चूसना शुरू कर दिए और ऋतू
भी अलका का सर सहलाने लगी..
"सही कह रही है मेरी जान तू. यहाँ सब आराम है लेकिन क्या फायदा इन सुख सुविधा का जहा अपनी मर्जी से बहार हे न जा सके."
अगले 10 मिनट तक दोनों हे एक दूसरे को ऐसे हे गरम करती रही जोकि ये महीने में 2-3 बार करती हे थी जब भी अकेली होती थी.
दोनों के तन पे सिर्फ पजामा हे था और ऐसा प्रतीत होता था के 2 अप्सराये एक दूसरी से नागिन की तरह लिपटी है. और तभी
दरवाजे पे "Thak-Thak"
"कौन है?", ऋतू ने पास राखी टीशर्ट पहनते हुए कहा और अलका को उसकी कमीज पकड़े. दोनों ने बिना ब्रा के हे वह पहन लिए.
"अरे ऋतू दरवाजा तोह खोल. मुझे बुक्स रखनी है और मई चाय बना रही हु तू दादा जी और पापा को उठा दे. 4 बज रहे है.
बाकी सब भी पूजा से आने वाले होंगे." कोमल ने इतना बोलै था के दरवाजा खुल गया. वो अंदर आई अपनी किताबे रखकर सीधा
बहार चली गई. और ये दोनों मुस्कुराती हुई अपनी अपनी ब्रा पहन कर, कपडे ठीक कर ऋतू चली गई शंकर जी को उठाने और
अलका अपने दादा जी को.
दूसरी तरफ संदीप और उसकी माता जी भी पूजा से फारिग होकर घर आ गए थे. वापिस आने में उनको कोई 3 घंटे तोह लग हे
गए थे. घर में घुसते हे रजनी जी की नजर पड़ी बीएड पर लेती हुई ज्योति पर फर्श पर रखे जला उतरने वाले ब्रश पर.
"बेटी, क्या हुआ? ये कोनसा समय है सोने का?", रजनी जी ने बड़े प्यार से ज्योति के सर पर हाथ फेरते हुए उसको उठाया.
"वो माँ मई दिवार से मकड़ी के जले निकाल रही थी के टेबल सरक गया और मई निचे गिर गई. लगता है जांघ की नस चढ़
गई कोई और पाँव भी दुःख रहा था.", ज्योति ने बड़ी सफाई से झूठ बोलै रोनी सूरत बना कर.
"क्या पड़ी थी बीटा ये सब काम तुझे करने की? इसके लिए ये संदीप और तेरे पिताजी है न. अब देख त्यौहार के दिन तुझे चोट
लग गई." उन्होंने भावुकता से उसका माथा सहलाया. "तुझे तोह बुखार भी आ गया है बीटा. संदीप, जरा दवा का डब्बा और
पानी लेकर आ यहाँ."
संदीप ने अपनी माँ के हाथ में डब्बा पकड़ाया तोह रजनी जी ने उसमे से क्रोसिन दवा निकल कर अपनी बेटी को खिलाई और पानी दिए.
"माँ मैंने दर्द की दवा खा ली थी. रात तक ठीक हो जाउंगी मई. आप चिंता मत करो और पापा को मत बताना कुछ भी." ज्योति
की बात सुनकर रजनी जी को हंसी आ गई. "चल बेटी तू आराम कर मई रसोई में जा रही हु कल के लिए पकवान और गुझिअ भी
बनानी है." एक बार फिर प्यार से हाथ फेर कर रजनी जी चल दी रसोईघर में और संदीप अपनी दीदी के पैरो की तरफ बैठ
गया. "दीदी मई वापिस आकर कर हे देता. देखो अब आप तोह बीमार पढ़ गई. कल फाग कौन खेलेगा?" उसने थोड़ा जज्बाती होकर
ये बात कही अपनी दीदी से. संदीप और ज्योति में आपस में प्यार तोह बहुत था लेकिन इन दोनों में एक सीमा थी जिसकी दोनों इज़्ज़त
करते थे.
"अरे 3-4 घंटे की तोह बात है भाई. देख फिर कल जमकर रंग लगाएंगे सबको." उसने भी प्यार से जवाब दिए
"ाचा दीदी, वह अर्जुन कब गया था घर.? वो मैंने उसको रुकने का बोलै था और मुझे हे देर हो गई."
अर्जुन का नाम सुनकर हे ज्योति की छूट कुलबुला गई. हाय रे कितना जालिम है तेरा दोस्त और उसका लुंड. तेरी बहिन को बीएड
पे लिटा कर खुद मजे कर रहा है. ज्योति ने ये मन में हे सोचा.
"भाई वो तोह 10 मिनट इंतज़ार करके हे वापिस चला गया था. मई बहार सफाई कर रही थी तब.? बड़ी सफाई से एक और झूठ
बोलै ज्योति ने और उसकी दुखती हुई छूट में खारिश शुरू हो गई.
"ाचा दीदी आप आराम करो मई रसोई में मम्मी के मदद करता हु." इतना बोलकर वो उठ गया वह से और ज्योति ने अपनी छूट को
कास कर सेहला दिए. "अगली बार तेरा पूरा मुँह खुलवाउंगी उसके लौड़े से", अपनी मुनिया को बोल हँसते हुए ज्योति ने भी पलके बंद
कर ली.
"ाचा माँ अभी तोह मई काम से जा रहा हु, देर रात तक आऊंगा तोह आपसे कल सुबह हे मिलूंगा." शंकर जी ने चाय ख़तम
करते हुए एक छोटा सा डब्बा रामेश्वर जी को दिए और पास में बैठी अपनी माँ कौशल्या जी के हाथ में एक शगुन का लिफाफा थमा
दिए. "एंड फॉर माय स्वीट लिटिल प्रिंसेस, हेरे इस ा स्माल लिटिल बर्थडे प्रेजेंट." रेखा जी के हाथ से एक चमकदार छोटा सा
डब्बा उन्होंने लेकर अलका का दिया और उसका माथा चूम लिए. "Thank's ा बंच चाचा जी." उसने भी उनके गले लगकर अपना प्यार
जताया.
"भाई कभी हमे भी ले जाया करो अपनी कासुअल मीटिंग्स में", रामेश्वर जी ने ठहाका लगते हुए कहा तोह शंकर जी अपने पिता
की बात पर मुस्कुरा दिए और जाते जाते आँखों से हे अपनी पत्नी रेखा जी को कुछ इशारा कर गए जिसे देखकर वह शर्माती हुई
वापिस रसोई की तरफ चल दी जहाँ ललिता जी और कोमल मीठी पूरियां बना रहे थे, माधुरी गुझिअ बेल रही थी.
"वैसे एक बात तोह है चाची, आप और चाचा अभी तक जवान हो. लगता नहीं कोमल और ऋतू जितने बड़े बचे होंगे आपके",
माधुरी की इस बात से जहा रसोईघर में आती हुई कौशल्या जी के साथ साथ ललिता जी और कोमल भी हंस दिए, वही रेखा जी
पेअर के अंगूठे से जमीन कुरेदने लगी.
"चल इधर ला ये थाल. कुछ भी बोलती है. मार खायेगी मुझसे", उन्होंने झूठा दिखावा किआ लेकिन मुँह पे शर्म चाय थी.
"तोह सही तोह कह रही वह. गलत क्या कह दिए मेरी बची ने. अब तुम दोनों महीने में 1-2 बार हे मिलोगे तोह जवान हे रहोगे."
कौशल्या जी ने भी माहोल को थोड़ा और रंगीन कर दिए लेकिन यही उनसे गलती हो गई. रेख जी तोह कुछ बोली नहीं लेकिन कोमल
ने बड़ा खूब कहा, "दादी तभी मई कहु के आप तोह खुद अभी माँ की बड़ी बहिन लगती हो. देखो तोह सर के बाल भी अब तक
नहीं पके आपके." और माधुरी की तरफ आँख मार दी. ऐसे हे ये लोग हसी ख़ुशी काम करते रहे. कौशल्या जी की एक बात
तोह तारीफ के काबिल थी के वह अपनी bahu-betion में फरक नहीं करती थी. और हंसी मजाक भी खूब कर लेती थी gahe-bagahe.
रामेश्वर जी भी अपनी बीवी के ऊपर हुए इस तारीफ युक्त हमले को सुनकर हँसते हुए वह से निकल चले अपने बगीचे की तरफ.
प्यार और परिवार
घर की सभी महिलाये पड़ोस वाले गुप्ता जी के घर गई हुई थी जहाँ होली की कथा सुनाई जा रही थी. दोपहर का 1
बज रहा था और इस समय रामेश्वर जी भोजन करने के बाद अपने कमरे में नींद ले रहे था. ऋतू और अलका एक साथ
बैठी पधारी भी कर रही थी और कुछ खुसुर फुसुर भी. कोमल का भी फाइनल का इम्तिहान था तोह वो दूसरी मंज़िल
वाले ड्राइंग रूम, जहा इस समय कोई नहीं था बैठी हुई िटमिनियन से नोट्स बना रही थी. संजीव भी गुप्ता जी के
हे घर पर था क्योंकि उसको वही से दादी जी और घर की बाकी महिलाओं के साथ पूजा का सामान लेकर होलिका स्थान पर
जाना था. गुप्ता जी का बीटा अरुण संजीव का ाचा मित्र था तोह वो दोनों अलग कमरे में बैठे गप्पे हेंक रहे थे.
और यहाँ घर पर माधुरी भीतर वाले आँगन में बने बाथरूम में स्टूल पर बैठी किसी बात को सोच मुस्कुरा रही
थी. "हाय राम. ये ऋतू भी न, क्या जरुरत थी मुझे ये सब देने की", खुद से बातें करती हुई वो अपनी योनि पर
उग्ग आये जंगल को सहलाते हुए उनपे क्रीम लगा रही थी. पूरा शरीर दमक रहा था उसका और पूरी योनि के ird-gird
सफ़ेद क्रीम लगी थी. ऐसे बैठे होने से उसके दूध अपने आप सख्त हो रहे थे और उनपर चिपके हुए वो भूरे रंग
के निप्पल नंगे होने के एहसास भर से तीर की तरह तीखे हो चुके थे. पूरे शरीर पर रोये खड़े हो गए थे.
माधुरी के शरीर में भी एक बात कमाल की थी. उसके किसी भी हिस्से पर कही कोई बाल नहीं था. न हाथो पर और
न हे कही जांघ, पिंडलियों या चूतड़ों पर. सिर्फ छूट के ऊपर एक उल्टा व् के आकर का जंगल थे और ऐसे हे बड़े हलके
से बाल छूट के चारो तरफ. "ऋतू ने बोलै था के 10 मिनट लगा कर रखना है फिर कपडे से साफ़ करके धोना है",
यही याद आते हे माधुरी ने अपनी आँखें बंद कर ली और अगले हे पल उसकी साँसों की रफ़्तार बढ़ गई. "हाय अभी भी
ऐसा लग रहा है जैसे वह पागल अपना डंडा घिसा रहा हो मेरी मुनिया पर.", ऐसा एहसास होते हे उसकी छूट से एक ौस
की बूँद बहार निकल आई और छूट के मुहाने पर रुक गई. और उसके मुँह से हलकी सिसकारी निकल गई , "शह्ह्ह्ह पागल कर
दिए है इस लड़के ने तोह. और क्या हालत कर दी है मेरी." खुद से बातें करते हुए जब माधुरी की नजर सामने लगे
शीशे पर पड़ी तोह उसने देखा छोटे छोटे नीले निशान उसके निप्पलों के आसपास बने हुए, लाल लाल खरोंच के निशाँ
और सूजे हुए दोनों निप्पल जो अब पहले से कही बड़े दिख रहे थी. जैसे हे उसने अपने निप्पल को छूआ, वो छूट पर रुकी
शबनम की बूँद फर्श पर जा गिरी. "ूई माँ." फिर जब उसने ड़याँ दिए के क्रीम सूखने लगी है तोह पास में रखे गीले
कपडे से उसने ऊपर से निचे तक रगड़ के पांच दिए. "वाह." माधुरी के मुँह से अपनी छूट देख कर यही निकला बस.
जहा पहले जंगल था वो जगह अब ऐसे दमक रही थी जैसे कोई बाल वह ऊगा हे न था. और उसकी छूट के दोनों मोठे
होंठ अब साफ़ गोर और पहले से ज्यादा पहले दिख रहे थे. कुछ सोच कर वो शरमाई और सारा कचरा एक पॉलिथीन में
दाल दिए. छूट को ठन्डे पानी से धोने के पाउडर लगाया और कपड़े पहन चल दी अपने कमरे में कोई गण गुनगुनाते हुए.
अर्जुन जैसे हे घर पंहुचा बिना किसी को देखे सीधे अपने कमरे की तरफ दौड़ लिए. जाते हे टीशर्ट उतार फेंकी और
बनियान पहन कर ड्राइंग रूम में घुस गया. सामने का नजारा देख पेअर वही जम्म गए. कोमल दुनिया से बेखबर छाती
के भार लेती स अपने नोट्स बना रही थी और उसके गोर गोर उभार कमीज से नुमाया हो रहे थे. पजामी के ऊपर से कमीज
कमर पर छड़ी हुई थी और उसका भाई पिछवाड़ा सलवार से चिपका हुआ बड़ा दिलकश नजारा दे रहा था.
"दीदी आप यहाँ." अर्जुन ने खुद को सँभालते हुए कोमल को पुकारा
"ओह. है भाई वो क्या है न निचे शोर हो रहा था. मेरे कमरे में ऋतू और अलका कब्ज़ा कर के बैठी थी. पापा अपने कमरे
में सो रहे है तोह मई यहाँ चली आई. अगर तुझे कुछ काम है तोह मई उठ जाती हु.", बिना हिले हे कोमल दीदी ने अर्जुन
को सब बता दिए.
"अरे नहीं दीदी. आपका हे तोह है ये भी. मई तोह बोर हो रहा था तोह सोचा टेलीविज़न हे देख लेता हु. लेकिन आप कर लो
पढाई मई कही और बैठ जाऊंगा." इतना बोलकर जैसे हे वो मुदा तोह कोमल ने उसको रोक लिए.
"चल आजा यहाँ मेरे पास बैठ. मेरा काम भी हो हे गया है. कभी मेरे भी साथ समय बिता लिए कर." और वह सीधी हो गई.
"आप हे सारा दिन घर के काम या पढ़ाई में लगी होती हो. मई तोह हमेशा यही होता हु अकेला." मासूम सा चेहरा बनता हुआ
वो सोफे पे आ बैठा और कोमल ने भी लेते हुए अपना सर छोटे भाई की गौड़ में रख लिए टेलीविज़न की तरफ मुँह करके.
"कुछ ाचा सा लगा न भाई. क्रिकेट मत लगाइओ बस.", बड़े लाड से उसने ये बात कही तोह अर्जुन ने रिमोट का बटन दबाया
और फिर भो चैनल पर रोक दिए. यहाँ एक रोमांटिक मूवी आ रही थी जो अभी शुरू हुई थी. अर्जुन इंग्लिश फिल्म भी इसलिए
देखता था की उसकी इंग्लिश पर पकड़ बानी रहे. और कोमल जो की खुद फाइनल ईयर में थी उसको भी इंग्लिश की ाची समझ थी.
दोनों भाई बहिन फिल्म देख रहे थे और अर्जुन अपने हाथ से बहिन का सर सेहला रहा था. दूसरा हाथ उसका वैसे हे दीदी की
कमर से ऊपर रखा था. फिल्म काफी ाची थी तोह कोमल तोह उसमे हे खो गई. अर्जुन की एक पल नजर हटी तोह उसका ध्यान
अपनी दीदी की कमर पर गया, जहा से कमीज ऊपर सरक चूका था. एक बार अपनी बहिन की सपाट चिकनी कमर देख कर उसने
वह से नजर हटाई और अपनी दीदी का चेहरा देखने लगा. बिलुल मासूम सा चेहरा था कोमल का और त्वचा ऐसी बेदाग के
कही कोई टिल भी नहीं. आँखों पे चस्मा लगा हुआ था जो की काफी जंचता था और छोटा पावर का था वह. ऊपर वाला होंठ
थोड़ा उठा हुआ नाक की दिशा में एकदम गुलाब जैसा. सीढ़ी प्यारी नाक और बादाम जैसा चेहरा. कोमल के चेहरे पे एक अलग
हे नूर था. ना तोह उसपे ऋतू जैसी चंचलता थी, न हे अलका जैसा बचपना. एक अलग हे सकूं से भरा चेहरा था उसका.
आज पहली बार अर्जुन ने अपनी इस बड़ी दीदी को इतने ध्यान से देखा था और वो उसमे हे खो गया था. अब उसके मैं में कोई काम
विचार या वासना नहीं थी, सिर्फ एक एहसास था के ये पल बस यही रुक जाये. उसका दिल रुक रुक कर धड़क रहा था और काफी देर
से बानी इस ख़ामोशी को देख कोमल ने सिर्फ अपनी नजर हिलाई, गर्दन नहीं. अपने भाई को खुद के चेहरे में खोया देख एक बार
तोह उसको अजीब लगा लेकिन जैसे हे उसने अर्जुन की आँखों को देखा वो खुद भी शांत हो गई. अर्जुन bhaav-shunya सा खोया था
और उसको कुछ पता नहीं चला. बस उसकी दीदी के गाल हलके गुलाबी हो गए थे. कोमल के होंठ धनुषाकार हो चुके थे. लाज
शर्म, और सिर्फ इस विचार से की उसका भाई कितने वात्सल्य से उसको देख रहा है.
हिम्मत कर के कोमल ने इस बार नज़र घुमाई और अपने भाई का चेहरा देखने लगी जैसे वह देख रहा था. बड़ी गहरी भूरी
आँखें, घुंगराले कुंडली बाल, चेहरे पे एक तेज जिसको कोई नजर अंदाज न कर सके, हलके bhoore-gulabi होंठ जिनके ऊपर
अभी मूछ के अंकुर बस निकलने हे लगे थे, तराशा हुआ चेहरा. और बस यही दोनों की नजर एक हो गई.
अपनी दीदी की गहरी आँखों की तरफ अर्जुन झुकता हे चला गया और कोमल के हाथ खुद बा खुद भाई की गर्दन को घेर कर
आपस में जुड़ गए. दोनों एक दूसरे की साँसों को महसूस कर रहे थे. टेलीविज़न पर फिल्म ख़तम हो चुकी थी लेकिन यहाँ शुरू
हो चुकी थी. कोमल ने खुद से हे अपने लबों को अर्जुन के लबों से मिला दिए. इस चुम्बन में lesh-maatra भी वासना न थी.
अर्जुन ने अपने होंठो से कोमल का ऊपर वाला होंठ चुभलाया तोह उसकी आँखें सुकून से बंद हो गई. गर्दन पर पकड़ और
मजबूत. जैसे वह कह रही हो के भाई मुझको खुद से अलग मत करना. अर्जुन ने भी अब कोमल के दोनों होंठ अलग कर अपनी
जीभ से उसकी जीभ को छु लिया था और एक हाथ के अंगूठे से उसके गरम हो रहे नाजुक गाल को सेहला रहा था. गीले होंठ
एक बार फिर जोरदार तरीके से चिपक गए और जब अलग हुए तोह अर्जुन की गर्दन सोफे की तक पर लुढ़क गई और कोमल अपने
भाई की गौड़ में आँखें बंद किये निढाल मूर्छित सी पड़ी थी.
वो उठी और जब उसने देखा के उसका भाई अभी भी साँसे दुरुस्त कर रहा है तोह एक बार फिर कोमल ने झुक कर अपने भाई के
होंठो पे प्यार से एक छोटा सा चुम्बन दिए और अपनी किताबे लेकर निचे चली गई, एक नै ऊर्जा और प्यार से भरी.
"ऐसा जादो तोह मुझे सेक्स करते वक्त भी नहीं हुआ. और मेरी नजर को कुछ भी दिखाई क्यों नहीं दिए?" सोचते हुए वो अपने बीएड
पर निढाल होकर नींद के आगोश में चल दिए.
.
.
इधर ऋतू और अलका के कमरे में.
ऋतू- यार सोचा है कुछ कल जन्मदिन के बारे में?
अलका - क्या सोचना है वही सुबह उठकर पूजा करनी है दादी जी के साथ. ऊपर से फाग है तोह रंग खेलेंगे और शाम को
जैसे हर साल होता है वैसे हे मेरी पसंद का खाना बनेगा और जो दादा जी daan-puniya करवाएंगे. नया क्या होगा? जन्मदिन
तोह अप्रैल में बनता है.
ऋतू (सोच के लहजे में)- है यार जन्मदिन तोह दादा जी अर्जुन का हे मानते है. देखा नहीं जब वह 8 साल नहीं था तब भी बड़ी
धूम धाम से मानते थे, जैसा खुद उनका हे जनम हुआ हो उस दिन. लेकिन प्यार तोह वह तुझे हे करते है सबसे ज्यादा उसके बाद.
अलका- अरे ये देख के तोह मुझे कही ज्यादा ख़ुशी होती है. छोटा भाई है हमारा और प्यार तोह सभी करते है उस से. जहा
तक मुझे याद है तोह तू हे सारा दिन उसको गौड़ में लिए छोटा काका- छोटा काका करती रहती थी बचपन. कितनी बार तोह उसके
रोने से तू हे रोने लग जाती थी के देखो काके के क्या हुआ.. और खिलखिलाने लग पड़ी
ऋतू मुस्कुराते हुए बोली," यार बचपन कितना प्यारा था न और अब देख ये पिताजी के चक्कर में 12 घंटे तोह किताबो में निकल जाते
है." किसी तरह अर्जुन क टॉपिक को उसने बदल दिए. जब भी उसके सामने अर्जुन का चेहरा आता था वह खुद हे नज़र हटा लेती थी.
जाने क्या था उसके दिल में जो अपने भाई से 8 साल दूर होने के बाद घर कर गया था.
अलका ने बात आगे बधाई," वैसे तू मुझे क्या दे रही है? चाचा जी ने तोह 2 कंगन बनवाये है मेरे लिए सोने के. चची जी
ने एक नया फुलकारी वाला सूट, माधुरी दीक्षित जैसा. पापा तोह कल हे देंगे लेकिन दादा जी ने बैंक में अकाउंट खुलवा दिए है और
50,000 जमा किये मेरे नाम से." बिस्तर पर दोनों आमने सामने लेती थी झुकी हुई सी.
"यार तेरा सही है. इतना कुछ मिला है तोह मई सोच रही थी के तू हे उपहार देदे मुझे." बोलकर ऋतू खिलखिला उठी. सबके
सामने हिटलर सी रहने वाली ऋतू सिर्फ अलका, शंकर जी और अपने दादी जी के साथ हे खुलकर बात करती थी. दादी तोह खुद हिटलर
थी तोह उनको अपनी यही गुस्सैल पोती पसंद थी और पिताजी भी ऐसे हे थे. लेकिन अलका और ऋतू बचपन से एक साथ रही थी और
अलका का विपरीत स्वाभाव हे था के ये दोनों एक दूसरे से जान तक जुडी थी.
"है तोह तुझे पता हे है मई कोनसा कंगन पहनती हु. तेरे हे है वह और जो भी संजीव भैया देंगे वह भी तुझे हे मिलेगा.",
अलका ने प्यार से उसकी थोड़ी ऊपर उठा के बोलै तोह ऋतू ने कुछ न कहा बस हलके से चूंटी काट दी अलका के झांकते हुए अभारो
पर.
"अह्ह्ह.. कमीनी", इतना बोलकर दोनों मुस्कुरा di.."Tu कभी नहीं सुधरेगी न? जब देखो तुझे यही दीखता है." अलका ने झूठे गुस्से
से कहा तोह ऋतू ने पलट वॉर किआ, "दिखती है तभी तोह दीखते है मेरी जान. वैसे कुछ भी के अलका तुझे देखती हो तोह ऐसा
लगता है के मई तोह कुछ भी नहीं तेरे सामने. भगवान् ने तुझे न जैसे अपने स्वर्ग के लिए हे बनाया था और भेज दिए यहाँ." इतना
बोलकर एक बार फिर उसने अलका के उभार पकड़ लिए.
"क्या करती है पागल कुछ भी बोलती है. तू शायद ये भूल रही है तू क्या चीज है यार. पिछले साल याद है न फ्रेशर टाइम
क्या हुआ था? लड़के पुलिस की लाथिऑन खाने से भी हेट नहीं थे तुझे साड़ी में देख कर." अलका ने ऋतू का हाथ हटाने के कोई
कोशिश नहीं की, उल्टा खुद भी उसके गले से निचे हाथ फेरने लगी.
"इतना खूसूरत होने का फायदा हे क्या हम दोनों का जो शादी तक रहना हे जेल में है. और फिर शादी के बाद पता नहीं कैसा घर
माहोल मिले." दार्शनिक अंदाज में अपनी बात कहते हुए ऋतू अब अपना पूरा हाथ अलका की कमीज में घुसाए उसका एक चूचा दबा रही
थी..
"सष्ठ.. बस कर यार. तेरा तोह पता नहीं लेकिन मई तोह जिंदगी जीने में यकीन करती हु. काट ता तोह कुत्ता भी है और हम पढ़े
लिखे इंसान है." अपनी चूची के दबाये जाने से मजे में आती अलका ने भी ऋतू का निप्पल खींच लिए और उसकी भी सिसकी फूट गई
"मत आग लगा कामिनी. Pachtayegi."Itna बोलकर ऋतू ऊपर आ गई अलका के लेकिन अपना पूरा वजन नहीं डाला. "और क्या कह रही है के
तू जिंदगी जीने में यकीन करती है? कोई शहजादा तोह नहीं आ गया तेरे सपने में?" इतना बोलकर इस बार ऋतू ने अपने दोनों हाथ अलका
की कमीज में घुसा दिए और पूरा कमीज उल्टा दिए गले तक.
"ोये अभी मत कर. तेरा ये मस्ती करना दोनों को भरी पद जायेगा किसी दिन." अलका बोल तोह रही थी लेकिन खुद उसने भी ऋतू की टीशर्ट
में दोनों हाथ घुसा दिए थे. "और कोई शहजादा वेह्जादा नहीं आया सपने में. अब जो भी आएगा सामने हे आएगा. और प्यार होना है तोह
होकर हे रहेगा. शादी जहा मर्जी हो.", इतना बोलकर उसने भी ऋतू की ब्रा उलट दी.
"वाह मेरी भगत सिंह. क्रान्ति की बातें कर रही है." ऋतू ने अब अलका के दोनों चुके जो की बिलुल सर उठाये खड़े थे, एकदम
गोर ुर लालिमा लिए हुए अपने दोनों हाथो से सहलाने दबाने शुरू कर दिए. उनपर उगे नुकीले हलके भूरे निप्पल कड़े होकर सुलग
ने लगे थे. वही ऋतू के एकदम सफ़ेद चूचे जो किसी भी प्रकार से अलका से काम न थे वह भी अकड़ने लगे. उनपे हलकी नीली रागे
साफ़ दिख रही थी.
अलका ने उन्हें मसलते हुए kaha,"Dekh मेरी जान कल को किसी अजनबी से शादी करके घर तोह बसना हे है. फिर चाहे रोना पड़ा या
हंसना तोह उस से पहले जीना कोई गुनाह तोह है नहीं.", इतना कहकर उसने ऋतू का एक पूरा चूचा चूसना शुरू कर दिए और ऋतू
भी अलका का सर सहलाने लगी..
"सही कह रही है मेरी जान तू. यहाँ सब आराम है लेकिन क्या फायदा इन सुख सुविधा का जहा अपनी मर्जी से बहार हे न जा सके."
अगले 10 मिनट तक दोनों हे एक दूसरे को ऐसे हे गरम करती रही जोकि ये महीने में 2-3 बार करती हे थी जब भी अकेली होती थी.
दोनों के तन पे सिर्फ पजामा हे था और ऐसा प्रतीत होता था के 2 अप्सराये एक दूसरी से नागिन की तरह लिपटी है. और तभी
दरवाजे पे "Thak-Thak"
"कौन है?", ऋतू ने पास राखी टीशर्ट पहनते हुए कहा और अलका को उसकी कमीज पकड़े. दोनों ने बिना ब्रा के हे वह पहन लिए.
"अरे ऋतू दरवाजा तोह खोल. मुझे बुक्स रखनी है और मई चाय बना रही हु तू दादा जी और पापा को उठा दे. 4 बज रहे है.
बाकी सब भी पूजा से आने वाले होंगे." कोमल ने इतना बोलै था के दरवाजा खुल गया. वो अंदर आई अपनी किताबे रखकर सीधा
बहार चली गई. और ये दोनों मुस्कुराती हुई अपनी अपनी ब्रा पहन कर, कपडे ठीक कर ऋतू चली गई शंकर जी को उठाने और
अलका अपने दादा जी को.
दूसरी तरफ संदीप और उसकी माता जी भी पूजा से फारिग होकर घर आ गए थे. वापिस आने में उनको कोई 3 घंटे तोह लग हे
गए थे. घर में घुसते हे रजनी जी की नजर पड़ी बीएड पर लेती हुई ज्योति पर फर्श पर रखे जला उतरने वाले ब्रश पर.
"बेटी, क्या हुआ? ये कोनसा समय है सोने का?", रजनी जी ने बड़े प्यार से ज्योति के सर पर हाथ फेरते हुए उसको उठाया.
"वो माँ मई दिवार से मकड़ी के जले निकाल रही थी के टेबल सरक गया और मई निचे गिर गई. लगता है जांघ की नस चढ़
गई कोई और पाँव भी दुःख रहा था.", ज्योति ने बड़ी सफाई से झूठ बोलै रोनी सूरत बना कर.
"क्या पड़ी थी बीटा ये सब काम तुझे करने की? इसके लिए ये संदीप और तेरे पिताजी है न. अब देख त्यौहार के दिन तुझे चोट
लग गई." उन्होंने भावुकता से उसका माथा सहलाया. "तुझे तोह बुखार भी आ गया है बीटा. संदीप, जरा दवा का डब्बा और
पानी लेकर आ यहाँ."
संदीप ने अपनी माँ के हाथ में डब्बा पकड़ाया तोह रजनी जी ने उसमे से क्रोसिन दवा निकल कर अपनी बेटी को खिलाई और पानी दिए.
"माँ मैंने दर्द की दवा खा ली थी. रात तक ठीक हो जाउंगी मई. आप चिंता मत करो और पापा को मत बताना कुछ भी." ज्योति
की बात सुनकर रजनी जी को हंसी आ गई. "चल बेटी तू आराम कर मई रसोई में जा रही हु कल के लिए पकवान और गुझिअ भी
बनानी है." एक बार फिर प्यार से हाथ फेर कर रजनी जी चल दी रसोईघर में और संदीप अपनी दीदी के पैरो की तरफ बैठ
गया. "दीदी मई वापिस आकर कर हे देता. देखो अब आप तोह बीमार पढ़ गई. कल फाग कौन खेलेगा?" उसने थोड़ा जज्बाती होकर
ये बात कही अपनी दीदी से. संदीप और ज्योति में आपस में प्यार तोह बहुत था लेकिन इन दोनों में एक सीमा थी जिसकी दोनों इज़्ज़त
करते थे.
"अरे 3-4 घंटे की तोह बात है भाई. देख फिर कल जमकर रंग लगाएंगे सबको." उसने भी प्यार से जवाब दिए
"ाचा दीदी, वह अर्जुन कब गया था घर.? वो मैंने उसको रुकने का बोलै था और मुझे हे देर हो गई."
अर्जुन का नाम सुनकर हे ज्योति की छूट कुलबुला गई. हाय रे कितना जालिम है तेरा दोस्त और उसका लुंड. तेरी बहिन को बीएड
पे लिटा कर खुद मजे कर रहा है. ज्योति ने ये मन में हे सोचा.
"भाई वो तोह 10 मिनट इंतज़ार करके हे वापिस चला गया था. मई बहार सफाई कर रही थी तब.? बड़ी सफाई से एक और झूठ
बोलै ज्योति ने और उसकी दुखती हुई छूट में खारिश शुरू हो गई.
"ाचा दीदी आप आराम करो मई रसोई में मम्मी के मदद करता हु." इतना बोलकर वो उठ गया वह से और ज्योति ने अपनी छूट को
कास कर सेहला दिए. "अगली बार तेरा पूरा मुँह खुलवाउंगी उसके लौड़े से", अपनी मुनिया को बोल हँसते हुए ज्योति ने भी पलके बंद
कर ली.
"ाचा माँ अभी तोह मई काम से जा रहा हु, देर रात तक आऊंगा तोह आपसे कल सुबह हे मिलूंगा." शंकर जी ने चाय ख़तम
करते हुए एक छोटा सा डब्बा रामेश्वर जी को दिए और पास में बैठी अपनी माँ कौशल्या जी के हाथ में एक शगुन का लिफाफा थमा
दिए. "एंड फॉर माय स्वीट लिटिल प्रिंसेस, हेरे इस ा स्माल लिटिल बर्थडे प्रेजेंट." रेखा जी के हाथ से एक चमकदार छोटा सा
डब्बा उन्होंने लेकर अलका का दिया और उसका माथा चूम लिए. "Thank's ा बंच चाचा जी." उसने भी उनके गले लगकर अपना प्यार
जताया.
"भाई कभी हमे भी ले जाया करो अपनी कासुअल मीटिंग्स में", रामेश्वर जी ने ठहाका लगते हुए कहा तोह शंकर जी अपने पिता
की बात पर मुस्कुरा दिए और जाते जाते आँखों से हे अपनी पत्नी रेखा जी को कुछ इशारा कर गए जिसे देखकर वह शर्माती हुई
वापिस रसोई की तरफ चल दी जहाँ ललिता जी और कोमल मीठी पूरियां बना रहे थे, माधुरी गुझिअ बेल रही थी.
"वैसे एक बात तोह है चाची, आप और चाचा अभी तक जवान हो. लगता नहीं कोमल और ऋतू जितने बड़े बचे होंगे आपके",
माधुरी की इस बात से जहा रसोईघर में आती हुई कौशल्या जी के साथ साथ ललिता जी और कोमल भी हंस दिए, वही रेखा जी
पेअर के अंगूठे से जमीन कुरेदने लगी.
"चल इधर ला ये थाल. कुछ भी बोलती है. मार खायेगी मुझसे", उन्होंने झूठा दिखावा किआ लेकिन मुँह पे शर्म चाय थी.
"तोह सही तोह कह रही वह. गलत क्या कह दिए मेरी बची ने. अब तुम दोनों महीने में 1-2 बार हे मिलोगे तोह जवान हे रहोगे."
कौशल्या जी ने भी माहोल को थोड़ा और रंगीन कर दिए लेकिन यही उनसे गलती हो गई. रेख जी तोह कुछ बोली नहीं लेकिन कोमल
ने बड़ा खूब कहा, "दादी तभी मई कहु के आप तोह खुद अभी माँ की बड़ी बहिन लगती हो. देखो तोह सर के बाल भी अब तक
नहीं पके आपके." और माधुरी की तरफ आँख मार दी. ऐसे हे ये लोग हसी ख़ुशी काम करते रहे. कौशल्या जी की एक बात
तोह तारीफ के काबिल थी के वह अपनी bahu-betion में फरक नहीं करती थी. और हंसी मजाक भी खूब कर लेती थी gahe-bagahe.
रामेश्वर जी भी अपनी बीवी के ऊपर हुए इस तारीफ युक्त हमले को सुनकर हँसते हुए वह से निकल चले अपने बगीचे की तरफ.