Incest Pyaar - 100 Baar - Page 5 - SexBaba
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Incest Pyaar - 100 Baar

अपडेट 34

घर की लड़किया और उनकी बातें


कमरे में ठण्ड होने से तारा ने तोह चद्दर ली नहीं थी तोह वह खिसक कर अर्जुन की चादर में आ गई. नींद में जैसे सबके साथ होता है. अर्जुन भी मजे से सो

रहा था और भूल गया था के वो किसके साथ है. अपनी बाहों में भर के नींद में हे उसने अपने होंठ तारा से मिला दिए हाथ कमर पर थे. दोनों में से किसी ने

कोई हरकत न की थी लेकिन तारा की नींद टूट चुकी थी अपने होंठो पर इस एहसास के होने से. गौर से उसका चेहरा देखती वो खुद जैसे चाहती थी की अर्जुन एक

बार फिर से उसके होंठो पर अपने होंठ रख दे. लेकिन वो तोह अब बस कास के तारा से चिपका सो रहा था. कुछ और होते न देख तारा वापिस हल्का निचे खिसक उसके

सीने में सर दिए सोने लगी. कोई एक या डेढ़ घंटे बाद अर्जुन की आँख अपने रोज के समय पर हे खुल गई. बाहों में तारा को देख थोड़ा हैरान हुआ फिर चादर

पर नजर गई तोह हल्का मुस्कुराता समझ गया इसका कारण. प्यार से बाजु को उठा कर तकिया निचे रख कर वो बाथरूम में घुसा और थोड़ी देर में तैयार हो कर

नीचे चल दिए. आज तोह दादाजी की तरफ भी शांति थी. आँगन में 2 गाड़िया कड़ी थी जिन्हे एक बार देख वो गेट खोलता घर से बहार आ गया. उधर छोल साहब

के घर का दरवाजा भी खुला तोह प्रीती उसकी तरफ आती दिखी.

"तुमने कसम खाई है एक कभी आना और फिर गायब हो जाना.?" आते हे अर्जुन ने उसको शिकयत हे की. गोरा गुलाबी चेहरा जो अभी तजा धुला था किसी गुलाब सी दिख

रही थी वो.

"जब मुझे कुछ काम होता है तभी मई आती हु. मुझे तुम्हारी तरह पहलवान तोह नहीं ban-na." हलके कदमो से दोनों भागने लगे तोह प्रीती ने बात करि.

"मतलब आज किसको पीटना है?" अर्जुन ने भी मसखरी करि

"है कोई जा ज्यादा परेशां करता है और अभी भी कर रहा है." प्रीती ने हँसते हुए इशारा उसकी तरफ हे किआ

"तोह फिर बताओ आज इतनी सुबह आने की वजह क्या है?" अर्जुन ने अब सीधे मतलब की बात कही.

"रात को मेरे घर आ जाना. दरवाजा कूद के 12 बजे के बाद. यही कहने के लिए इतनी सुबह आई हु और नींद भी नहीं आई." नजरे झुकाती सी वो बोली तोह अर्जुन को

जैसे मौका मिल गया था. "रात को तुम्हहारे घर, वो भी कूद के. मतलब मई हे मिला छोल साहब की गोली खाने क लिए तुम्हे. और गली में किसी ने पकड़ लिए तोह

पिटाई होगी वो अलग." अर्जुन ने वैसे हे जवाब दिए तोह प्रीती ने हलके गुस्से से कहा, "तुम्हे बताया था के आज दादाजी जा रहे है 2 दिन के लिए. ऊपर से अगर तुम्हे

इतना डर लगता है तोह फिर मई आ जाउंगी तुम्हारे घर लेकिन फिर सभी होंगे वह. देखती हु सबके सामने कैसे बोलते हो के मई तुम्हारी जान हु." और वापिस मुड़ने लगी

लेकिन मुड़ते हे अर्जुन ने प्रीती को सीने से लगा लिए. "अभी कह दू सबके सामने के तुम्ही मेरी जान हो. तुम सिर्फ मेरी हो प्रीती.? तुम मेरे साथ मजाक करो तोह ठीक

लेकिन मई करू तोह?" ऐसे हे गले लगाए उसने प्रीती को प्यार से कहा. "और आ जाऊंगा मई तुम्हारे घर. छोल अंकल होंगे तब भी डर नहीं है मुझे. वो घर भी

तोह मेरा हे है." एक बार गाल चूम के आगे बढ़ दिए तोह प्रीती भी खुसी में साथ सत् के दौड़ने लगी. अर्जुन ने फिर से एक शरारत करि. अपनी चाल एक दम धीमे कर

दी तोह प्रीती उस से आगे दौड़ने लगी और वो रुक कर उसको पीछे से देखने लगा. "रुक क्यों गया और क्या देख रहे हो.?" 15-20 कदम दूर से प्रीती ने पुछा तोह अर्जुन

बस वही खड़ा हंस रहा था. दोनों हे सुनसान जगह थे और सुबह 5 बजे कोण यहाँ उन्हें देखता. वो चलती वापिस उसके पास आकर कड़ी हुई तोह अर्जुन ने होल से अपने

हाथ उसके पीछे कर दिए. प्रीती को लगा के फिर से बाहों में लेने लगा है लेकिन जब हाथ अपने कूल्हों पर महसूस हुए तोह एक पल के लिए सास रुकी फिर संभल कर

बोली, "ये क्या है?"

"तुम्हारी बात का जवाब. ये देख रहा था के भागते हुए कितने दिलकश लगते है." और मांसल आकर लिए हे दोनों कूल्हे दबा के खुद से लगा लिए.

"सब तुम्हारा है मैंने कोनसा तुम्हे मन किआ हुआ है." आज ये दोनों तोह अँधेरे में हे laila-majnu बने थे.

"ाचा यार अब चलो यहाँ से. मुझे वापिस भी जाना है. दादा जी 6 बजे निकल जायेंगे." प्रीती ने खुद को अलग करते कहा तोह अर्जुन ने बात मान ली. अगले 20 मिनट

वो सिर्फ दौड़ पूरी करने के बाद घर के बहार खड़े थे.

"ोये पुत्तर. बड़ा पसीने बहा रहा है." घर से बहार निकलते छोल साहब ने अर्जुन को देखा जो प्रीती के साथ हे खड़ा था अभी आ कर.

"गुड मॉर्निंग छोटे दादू. ये लड़की न हार नहीं मानती इस चक्कर में ज्यादा हे दौड़ लग गई थोड़ी." अर्जुन ने प्रीती की तरफ इशारा करते कहा. खुद तोह उसकी

साँसे सम्भली हुई थी लेकिन प्रीती हल्का हांफ रही थी.

"ाची बात है ये तोह. लेकिन बिल्ली हांफ रही है और शेर को सिर्फ पसीना." उन्होंने भी प्रीती को छेड़ते कहा.

"दादू आप भी इसकी साइड लोगे. ये मेरे से कभी नहीं जीत सकता आप खुद पूछ लीजिये के 2 बार हार चूका है मेरे से."

"ओह बीटा जी वो तेरे से हर बार हारेगा क्योंकि कुछ लोग शायद ऐसे हे वो जीत लेते है जो उनके लिए जरुरी होता है." बड़ी गहरी बात उन्होंने कह दी थी.

"और तू भी चल अंदर आ. आज तुझे मई यहाँ का दूध पिलाता हु." अर्जुन को अंदर साथ लिए वह ड्राइंग रूम में आये जहा उनका एक अटेची रखा हुआ था. "पारवती

बीटा, जरा इसके लिए एक गिलास दूध बना के दे, मेवा दाल के और 4 केले भी लेती आना." इतना बोलकर इशारे से बाथरूम दिखाया तोह अर्जुन सीधा वह चला गया.

प्रीती अपने कमरे में बने बाथरूम में जा चुकी थी. दोनों लगभग एक साथ हे वापिस आये ड्राइंग रूम में तोह टेबल पर एक गिलास दूध, एक गिलास जूस और केले रखे थे.

छोल साहब एक कप चाय का लिए वही बैठे थे. "पुत्तर चल शुरू हो जा." इतना कह कर उन्होंने गिलास उसको दिए इधर प्रीती बालो से रबर निकलने के बाद जूस पीने

लगी थी. अर्जुन ने भी अनुसरण किआ तोह कुछ देर बाद 2 केले और दूध का गिलास हजम कर चूका था. "प्रीती बीटा अपनी डाइट के साथ कोई कोम्प्रोमाईज़ नहीं." बचे दोनों

केले उन्होंने उसकी और कर दिए.

"ाचा बीटा मई चलता हु. और प्रीती अगर तुम्हारा दिल करे तोह इनके घर सो जाना नहीं तोह Alka/Ritu को यहाँ बुला लेना." उन्होंने इतना बोलै और दोनों को गले लगा कर

गाडी निकल चले गए. अर्जुन भी प्रीती को bye कह के निकल लिए.

.

.

"दीदी, सब सामान रख लिए मैंने. आप एक बार देख लीजिये." रेखा जी ने ललिता जो को बताया के वो गांव जाने के लिए जितना जरुरी था उतना सामान, कपडे रख चुकी

है. तोह ललिता जी ने रसोईघर से हे हाथ हिला दिए के ठीक है.

आज तोह इतनी सुबह हे नाश्ता बन रहा था. अर्जुन नाहा के अंदर आया तोह माधुरी दीदी, चाचा जी और कोमल दीदी नाश्ता कर रहे थे. ताईजी परांठे बना रही थी.

"आप लोग तोह आज ज्यादा हे जल्दी नाश्ता करने लगे हो." अर्जुन ने वही बैठ कर ये बात कही तोह नरेंदर जी ने जवाब दिए, "मुन्ना अभी आधे घंटे में निकल रहे

है अगर तू कहता है तोह नहीं करते नाश्ता." हंसने लगे वो. कोमल दीदी शांति से बैठी खाना खा रही थी लेकिन माधुरी दीदी तोह बार बार जैसे अर्जुन को देख रही

थी जैसे उनका कोई दिल नहीं था जाने का गांव. "बीटा चल ये पहन ले. पीछे से ऐसे हे नहीं बैठे रहना. और एक बार ऋतू को उठा दे उसका इम्तिहान भी है." टीशर्ट

पकड़ते हुए उन्होंने कहा तोह अर्जुन उसको पहन कर अपनी माँ के गले लगता हुआ बोलै, "ाचा फिर आप जल्दी आना." वो बस अपने बेटे के चेहरे पर हाथ रखती मुस्कुरा दी.

अर्जुन अंदर आया तोह देखा के अलका दीदी वह नहीं थी सिर्फ ऋतू दीदी हे सोइ हुई थी. मतलब छत्त पर से उठने के बाद भी ये अभी यहाँ आ कर सो गई थी. थोड़े मजाक

के मकसद से अर्जुन उनके ऊपर झुका हे था के ऋतू ने किसी बिल्ली की तरह झपट्टा मारते हुए उसके होंठो को चूम लिए और फिर छोड़ते हुए बोली, "तेरा हे तोह इन्तजार

था. मुँह मीठा हो गया तोह पेपर भी ाचा जायेगा." उन्होंने इतना कहा तोह अर्जुन ने हलके से उनके दूध पकड़ते हुए कहा, "दीदी यहाँ दही शक्कर नहीं है लेकिन इधर

से शायद मुँह मीठा हो जाये." टीशर्ट के अंदर उनके उभर खुल्ले थे जिनके निप्पल थोड़े कड़े लग रहे थे. "ोये बस कर और चल उठ मेरे ऊपर से. ये मुँह मीठा बाद

में करेंगे." हंसती हुई वो उसके नीचे से निकल कर उस से पहले हे बहार आ गई.

"बीटा ये तोह अभी उतना समझदार है नहीं. तू हे इसके खाने और कपड़ो का ध्यान रखना." रेखा जी ने ऋतू को समझते कहा और फिर कौशल्या देवी भी पिछले आँगन

में आ गई. "चल बीटा तू सामान रखवा गाडी में और नरेंदर तू भी अब उठ जा बीटा." उनकी बात सुनकर अर्जुन ने बैग, अटेची उठा लिए और अपनी माँ और दीदी के साथ

बहार की तरफ चल दिए जहा पर कोमल दीदी, माधुरी दीदी, दादाजी पहले से हे थे. सब सामान आराम से आ गया तोह रामेश्वर जी ने अर्जुन को एक तरफ बुला कर कुछ

हिदायते दी और अलका ऋतू के सर पर प्यार दिए. सभी लोग बैठ गए तोह चाचा गाडी निकल कर चल दिए. उनकी दोनों बेटियां तोह अभी सो हे रही थी.

"संजीव भैया तोह उठ जाते है." अंदर आते हुए अर्जुन ने अलका दीदी से ये बात कही तोह वो मुस्कुराती बोली, "उठ भी गए थे और चले भी गए. शाम तक आएंगे

वापिस वो. पास के एक गांव में कुछ काम था." उनकी बात सुनकर अर्जुन भी अंदर आ गया तोह ऋतू दीदी तैयार होने चली गई और अलका दीदी घर की सफाई में लग गई. ऐसे

हे घूमता सा वो माधुरी दीदी के कमरे में गया तोह वह पर प्रियंका दीदी और आरती सो रहे थे. अर्जुन की नजर एक जगह का नजारा कर के वही रुक गई. हलके पीले

टीशर्ट के गले से प्रियंका दीदी के उभार दबे हुए बहार को निकल रहे थे और उनकी गेहटी नाभि गोरा पेट भी नुमाया था. "ये तोह बिलकुल कोमल दीदी जैसी हे है."

एक बार ाचे से उन्हें देख कर वो वापिस बहार आया और कुछ सोचता सा ऊपर अपने कमरे की और चल दिए.

बीएड पर लेती तारा को कोई होश नहीं था अपने कपड़ो को. निक्कर का कपडा कूल्हों की दरार में फंसा था, गुलाबी बिना बाजु की टीशर्ट से निप्पल के पहले तक का भाग उजागर

हो रखा था और चेहरा बिलकुल मासूम सा तकिये पे रखा था. चादर कब की बीएड से निचे गिर चुकी थी. अर्जुन ने चादर वापिस उनके बदन पर दाल दी और संजीव

भैया के बीएड पर उल्टा सा लेत गया. "पता नहीं क्या हो रहा है आजकल. जितना सोचता हु ध्यान बार बार एक हे जगह जाने लगता है." ऐसे सोचते हुए उसने खड़े हो

कर संजीव भैया की अलमारी से एक किताब निकाल ली जिसके ऊपर अखबार का कागज चढ़ा था. भैया ने बड़ी सफाई से ये किताब छुपाई थी. "Tantra-sex काम की विधि"

नाम की ये किताब उसने कोमल दीदी से मधुर मिलान करने से पहले 3 भाग तक पढ़ी और देखि थी. कुल 12 भाग थे इसमें. कमरे का किवाड़ ाचे से लगा कर वो आगे

पढ़ने लगा. किताब में नारी पुरुष की विभिन्न शरीर के अनुसार उनके बारे में बहुत कुछ बताया हुआ था. और rati-kriya के कई अलग भाग थे की कैसे क्या करना

चाहिए या क्या नहीं. तक़रीबन हर पृष्ट पर हाथ से बनाये चित्र भी थे. वो पूरे ध्यान से उसमे लिखे घ्यान को समझने लगा और फिर एक घंटे बाद सब वैसे

हे कर के बहार आया. तारा अब बिस्टेर पर नहीं थी और शायद बाथरूम चली गई थी. ऐरकण्डीशन को बंद करते समय उसने घडी की तरफ देखा तोह 8 बज चुके थे.

अब नीचे से भी हलकी आवाज आ रही थी.

"उठ गई आप दोनों?" बहार टेबल पर चाय के कप रखे थे और Priyanka/Aarti दीदी बातें कर रही थी अलका दीदी के साथ.

"हमको उठे तोह आधा घंटा हो गया लेकिन तू कहा था अभी तक.?" आरती ने ये बात कही थी. और ऋतू दीदी तैयार हो कर अर्जुन के सर पे हाथ रख बहार निकल गई जहा प्रीती स्कूटरी पर उनका इन्तजार कर रही थी.

"मई वो ऊपर किताब पढ़ रहा था. पहले आपके पास गया तोह आप दोनों हे सो रही थी." उसकी इस बात पर प्रियंका ने आरती की तरफ अजीब तरह से देखा. "है वो क्या

है न ज्यादा आराम नहीं मिला था 2 दिन से तोह कुछ ज्यादा हे नींद आई थी. कल से तेरे साथ उठ जाया करेंगे." कह कर आरती हंसने लगी तोह अर्जुन भी कुर्सी पर

बैठ गया हँसते हुए.

"अर्जुन जब तेरे पास टाइम हो तोह थोड़ा सामान ला देगा यही पास की मार्किट से?" अलका दीदी की बात सुनकर उसने हामी भर दी.

"है जब बहार जाये तोह मई भी साथ चलूंगी कुछ सामान लेना है मैंने भी." निचे उतरती तारा ने ये कहा तोह चारो उसकी और देखने लगे. एक रेशमी सफ़ेद कुरता

जिसकी बाजू न के बराबर थी और, लाल रंग की बिलकुल कासी हुई सलवार और हलके गीले खुले बालो में तोह वह केहर सा ध रही थी.

"तू मार्किट में आग लगा देगी. कपडे fire-brigade के और खुद चलती फिरती आग." प्रियंका दीदी की इस बात पर वो हंसती सी अर्जुन और उनके बीच की कुर्सी पर बैठ गई.

शरीर से बड़ी ाची महक आ रही थी. शायद नहाने के बाद भी 2-3 क्रीम या इत्र लगा कर हे वो आई थी.

"ठीक है जब जाऊंगा तोह तुम्हे बता दूंगा." अर्जुन के जवाब से वो थोड़ा मुस्कुराई लेकिन अलका दीदी की त्योरिया छड्ड गई तू सुनकर.

"ऐसे कबसे बात करने लगा अर्जुन अपने से बड़ो से?" बेशक वो उस से प्यार करती थी लेकिन उन्हें ाचा नहीं लगा उसका ऐसे तारा को बुलाना.

"अलका अब तू हमारे बीच में मत बोल. ये बचपन से मुझे तारा कह के बुलाता है और मई भी इसको नाम से बुलाती हु. हम दोनों को हे यही ठीक लगता है तोह तू टेंशन

मत ले. बाकी सबको तोह दीदी बोलता हे है न?" तारा की बात से अलका अर्जुन को घूरने लगी.

"आपको अगर बुरा लगा तोह सॉरी. अब से नाम ले लिए करूँगा जैसे तारा जी." अलका दीदी को कहता अर्जुन इतना बोलै तोह सभी हंसने लगे. "ये बन्दर नहीं सुधरने वाला.

और तारा जी? सुनकर हे अजीब लगता है." प्रियंका दीदी ने बोलै तोह तारा भी हंसती बोली, "हम दोनों में tu-mai हे ठीक है या Tara-Arjun ये जी वि भूल जा."

फिर कुछ समय बाद प्रियंका दीदी ने सबके लिए खाना गरम किआ और तारा और आरती दीदी को भी परोस दिए. अलका दीदी नहाने चली गई इधर अर्जुन मार्किट जाने के लिए

कपडे बदलने ऊपर आ गया.

"वैसे तारा, तेरी ये ट्रेनिंग किस चीज की है?" आरती दीदी ने उस से पुछा तोह तारा ने थोड़ा खुलकर बात करते हुए बताया, "वो आरती मेरा फैशन डिज़ाइन का कोर्स

चल रहा न दिल्ली में तोह 2 साल के बाद ये 6 महीने की ट्रेनिंग जरुरी थी काम को समझने के लिए. जैसे की कपडा कैसे तैयार करते है, डिज़ाइन और क्वालिटी, फिर

इनके मुख्या मार्किट और डिस्ट्रीब्यूशन कैसे होता है. और जिस कंपनी में ये ट्रेनिंग करनी है तोह एक तोह वो पापा के नोन है दूसरा अकेले दिल्ली में रहके लाइफ ज्यादा

हे बोरिंग हो गई थी. यहाँ पर nana-naani और बाकी सब भी है. इसलिए मैंने सोचा की फिर यही जगह ठीक है. और अब तोह शहर भी ाचा हो गया है आते हुए देखा

था मैंने. ट्रेनिंग के बाद देखते है की जॉब करनी है या मास्टर की डिग्री."

"वाह यार तेरा सही है. इधर तोह वही गर्ल्स कॉलेज में जाओ फिर घर आने के बाद घर के काम और फिर वापिस पढाई. दिल्ली में तोह सुना है ज़िन्दगी हे अलग है." आरती

ने थोड़ा उत्साह से कहा.

"है. ऐसा हे लगता है जब हम जिस जगह नहीं रहते तोह वह शायद ज्यादा ाची लगती है. बड़ा शहर है, आजकल अपनी जनरेशन के लोग थोड़े आज़ाद ख़याल के है लेकिन फिर उसके नुक्सान भी बहोत है." कहने के बाद कुछ सोचने लगी वो.

"क्यों कुछ गलत हुआ क्या तेरे साथ वह?" प्रियंका दीदी ने खाना रोकते हुए ये बात कही थी.

"ऐसा है न दीदी गलत और सही लोग हर जगह हे होते है. बस वह अकेली थी तोह कुछ लोगो पर ज्यादा भरोसा कर लिए था जब नै थी." एक लम्बी सांस लेते वो थोड़ा

खामोश हो गई थी.

"क्या हुआ था जरा बता तोह. कही कुछ?" आरती ने चिंता से ये बात कही लेकिन फिर अधूरी छोड़ दी.

"अरे यार इतना कुछ भी नहीं बस किस्मत थी और शायद ये समझ ले की भगवन ने के सब दिए था मुझे. कहा तोह मैंने आज तक अपने हाथ से प्लेट तक नई उठाई थी

और आज तू खुद बता क्या तुझे मई वैसे दिखती हु? कॉलेज का पहला साल था तोह अपने हिसाब से हे दोस्त बना लिए. किसी के पास गाडी तोह कोई मेरे से ज्यादा मॉडर्न.

दोस्तों में लड़के भी थे और फिर एक दिन पार्टी के बाद 2 सीनियर दोस्त, दोनों हे लड़के थे और एक लड़की. हम सब पार्टी करके वापिस आ रहे थे तोह उन्होंने मेरा फायदा

उठाना चाहा. उस दिन अगर सही मौके पे वह पुलिस की गाडी न आती तोह फिर मई शायद ज़िंदा न होती या मेरा सबकुछ लूट गया होता. लेकिन उसके बाद से मैंने ये

पार्टी और नाम के high-fi दोस्त बंद हे कर दिए. कॉलेज से हॉस्टल और फिर हॉस्टल से घर. लेकिन है पहनती वही हु जो मुझे ाचा लगता है." आखिरी बात कहती

वो हंसने लगी.

"ये तोह बहोत हे बड़ी घटना हो जाती तेरे साथ." आरती ने ये कहा तोह प्रियंका ने भी सर हिला दिए.

"देखो दीदी ये इज़्ज़त विज़्ज़ात जैसी सोच अलग है मेरी. अगर कोई पसंद हो तोह शायद मई उसपे सब वार दूंगी. लेकिन जो वह होने वाला था वो सिर्फ भूक और जबरदस्ती

वाला था. न हे वो लड़के मुझे पसंद थे और न हे वो तरीका. कोई ऐसा जो दिल में उतर जाये तोह उसके लिए मई खुद कपडे उतार दू." खिलखिलाती सी बोली तोह दोनों

बहने एक दूसरी का मुँह देखने लगी.

"ये क्या बात कहने लगी? शादी से पहले ये सब नहीं होना चाहिए. पाप है ऐसा सोचना भी." प्रियंका दीदी की ाअत आधी सच और आधी झूठ हे थी.

"आपको कभी प्यार हुआ है क्या दीदी? एक बार करके देखना फिर आपको ये जिस्म उसके सामने कुछ नहीं लगेगा जब कोई आपकी सीधा रूह में उतर जायेगा. और ये सब ढोंग

है कुंवारापन या लड़की की इज़्ज़त. दिल्ली में आधी से ज्यादा लड़किया या तोह अपने प्रेमी से या फिर दोस्तों के साथ सब कर लेती है. और जो अकेली है वह भी अपने आप को

सुख देना जानती है. लेकिन मैंने भी सोच रखा है के जिस से प्यार करुँगी वो सब उसके साथ. फिर शादी उसके साथ होती है या किसी और के साथ या करनी भी नहीं

वो सब बाद की बात." तारा ने जब ये बात कही तोह अलका नाहा के आ चुकी थी और सब सुन रही थी.

"तोह इसमें गलत बात क्या है तारा? प्यार शायद सिर्फ शरीर से नहीं होता. शारीरिक मिलान उसका एक हिस्सा है लेकिन उसकी गहराई तोह जैसे एक अलग दुनिया तक जाती है."

अलका की बात पर आरती ध्यान से कभी तारा को तोह कभी अलका को देख रही थी.

"अलका सच्चा बता के क्या तुझे कभी प्यार हुआ है? और ऐसे तोह तू ये बात कहने से रही. मई नाम या उसके बारे में नहीं जान न चाहती. बस अगर हुआ है तोह बता."

प्रियंका दीदी की जिज्ञासा इस बार थोड़ी ज्यादा हे हो गई थी.

"हाँ. मुझे प्यार हुआ है और मई खुदको खुशकिस्मत मानती हु. लेकिन मुझे कभी अंजाम की फ़िक्र नहीं है. शादी कहा होगी, कब होगी वो सब घर के बड़े हे फैंसला

करेंगे. लेकिन मेरा दिल, ये मेरा है तोह मई भी चाहती हु के ये किसी के नाम हो. और अब ये है भी." बात ख़तम करती सी वो शांत हो गई.

"यार तू सही है. हम दोनों जब कॉलेज जाती है तोह सिर्फ आवारा किस्म के लड़के हे दीखते है और फिर कभी ध्यान नहीं दिए इस तरफ. कभी कभी लगता है जिंदगी

ऐसे हे काटनी थी तोह फिर मिली हे क्यों? आरती ने गंभीरता से कहा. "सिर्फ फिल्मो में जो देखा उसके सपने देख लेती हु कभी लेकिन वह भी यही होता है के शादी

परिवार की मर्जी से या बगावत."

"देख आरती फिल्म शायद सही उदाहरण नहीं है एक सच्चे प्यार का. क्योंकि जहा तक मेरी समझ है ये जिद्द, बगावत या sach-jhoot से परे है. हांसिल करना कोई

प्यार तोह नहीं. और जब प्यार सच्चा हो तोह फिर इसका ढिंढोरा पीटना भी जरुरी नहीं. बस अपने सपने पूरे करो और जितना हो सके वो लम्हे जीने की कोशिस करो."

अलका ने बात ख़तम करते हुए कहा और कड़ी हो गई.

"मेरी भी यही सोच है आरती. ज़िन्दगी का क्या भरोसा. अगर 2 कतरे किसी के प्यार के मिल जाये तोह क्या दौलत और क्या ये नाम के सुख. खुद का पूरा होना हे ज्यादा

ाचा लगता है." तारा की बात ख़तम हुई थी की अर्जुन एक नीली जीन्स और आसमानी टीशर्ट पहनकर नीचे आ गया. एक पल के लिए तारा और अलका दोनों ने हे उसको

देखा फिर अर्जुन ने कहा, "दीदी, क्या सामान लेके आना है? तारा चलो फिर ये काम निपटा के आते है."

अलका दीदी ने उसको सब सामान बता दिए तोह वह चल दिए. पैसे लेने से मन कर के. तारा भी एक फैंसी चप्पल जल्दी से पहन के उसके साथ चल दी. स्कूटरी पर दोनों

बैठे तोह तारा लड़को की तरह दोनों तरफ पेअर करके बैठी.

"कोई दिक्कत तोह नहीं न? मुझे ऐसे हे बैठना आता है." अर्जुन ने हँसते हुए ना में गर्दन हिला दी और दोनों हे चल दिए. पीठ पर दबते गुब्बारे उसका ध्यान हटा

रहे थे लेकिन वो इस मजे के अनुभव में आराम से मार्किट आ गया.

"आपको क्या लेना है? पहले वही लेते है." अर्जुन ने कहा तोह तारा उसको देखने लगी. "ाचा तुम्हे जो लेना है वो पहले लेते है" अर्जुन की इस बात पर वह हंसती सी

उसके साथ चलने लगी. "पहले तोह मुझे एक डायरी, पेनस और मार्कर लेने है. फिर कुछ चॉकलेट्स और लास्ट में nimbu-jeera वाला सोडा." वो किसी बची की तरह चहक

रही थी. कुछ लड़के भी तारा के हुस्न का दीदार कर रहे थे जो अर्जुन ने भी देखा लेकिन कुछ कहा नहीं. आराम से सब सामान लेकर दोनों एक दूकान से nimbu-jeera

लेकर बहार खड़े पीने लगे तोह तारा ने भी देखा की 2-3 लड़के उनके पास हे खड़े उसको देख रहे थे. "इन्होने लड़की नहीं देखि कभी जो ऐसे घूर रहे है?"

उसकी आवाज में हल्का गुस्सा था लेकिन अर्जुन मुस्कुराते हुए बोलै, "इतनी खूबसूरत शायद नहीं देखि होगी. और देखने से क्या होता है? कोई हरकत तोह नहीं करि न."

उसकी बात पर तारा के चेहरे पे हलकी लाली और मुस्कान दोनों आ गई थी. जब उन्होंने गिलास रखे तोह वह अलका दीदी का सामान लेने बस आगे हे बढे थे की उनमे से

एक मनचले ने आवाज देते हुए कहा, "बिलकुल रेड & वाइट सिग्रेटे है भाई. गरम और कमाल की." शायद वह यहाँ आसपास के नहीं थे. सरकारी स्कूल की वर्दी जिसमे

शर्ट पंत के बहार थी. पतले, थोड़े पक्के रंग के और हलके शरीर वाले.

"कुछ कहा भाई?" अर्जुन ने तारा को वही रोक कर वापिस आ कर आराम से पुछा.

"तुझे कुछ थोड़ी कहा है. अपनी बात कर रहे हम." उस लड़के ने इतना कहा और अपने दोस्तों की तरफ देखने लगा. अर्जुन आराम से वापिस तारा के पास आया और दोनों

किरयाना स्टोर में चले गए. ये सेक्टर की सबसे बड़ी दूकान थी. ठन्डे की बड़ी बोतल, मग्गी, ब्रेड, सॉस और ऐसा हे कुछ सामान लेने के बाद दोनों स्कूटरी की

तरफ चल दिए तोह अब वही 3 लड़के पेड़ के निचे खड़े थे और एक उनकी स्कूटरी पर बैठा था. "उठो भाई हमारी है." अर्जुन ने विनम्रता से ये बात कही थी.

और उनको ये लगा के लड़का सिर्फ शरीर से बड़ा है बाकी कोई ऐसा वैसा हे होगा. इतनी सी पर दोनों बैठ जाओगे. वैसे पिछली सीट गरम बहोत है." ये वही लड़का

था जो पहले तारा के ऊपर फब्ती कास चूका था और अब सीट से उठते हुए भी अपनी मनचली हरकते दिखा रहा था. अर्जुन ने आराम से वो बड़ा थैला जमीन पर रखा

और बिना कुछ कहा सीधे हाथ का करारा थप्पड़ उस डेढ़ पसली के गाल पर जड़ दिए, जो अगले पर पक्की जमीन पर किसी कटी हुई टहनी सा गिर गया था. "समझ नहीं

आती एक बार में. और तुम दोनों को भी कुछ चाहिए क्या?" अर्जुन ने अपनी टीशर्ट को हल्का सा खींचते हुए उन लड़को को कहा तोह वो बस कभी अर्जुन को तोह कभी जमीन

पर घुटने के बल खड़े होते अपने दोस्त को देख रहे थे. गाल और होंठ के जोड़ से खून निकल रहा था और पूरा बड़ा पंजा उसके उलटे गाल पर छप्प चूका था.

"नहीं भाई. हम तोह पेपर देके आये थे और यही लाया था हमे." उनमे से एक ये बात बोलता दूसरे का हाथ पकड़ के पीछे करता हुआ बस बिना वापिस देखे चल दिए.

"और तुझे अभी से सिग्रेटे पसंद है?' जैसे हे वह मनचला थोड़ा सम्भला तोह अर्जुन ने उसकी कालर पकड़ते हुए 2 और कास के उसके गाल पर रसीद कर दिए. बेचारा

छोटे बचे की तरह हाथ जोड़कर रोने हे लगा था. "चल इसको छोड़ अब अर्जुन. गलत इंसान के हाथ चढ़ गया. और तू भाग यहाँ से." तारा ने उसको अलग करते कहा

और इतनी देर में वो सच में वह से भाग गया.

"तू तोह बिलकुल हे हीरो है रे. मई तोह समझी थी की सिर्फ शरीर से पहलवान है." तारा उसके पौरुष पर mar-miti थी और अर्जुन थैला आगे रखता हँसता हुआ बोलै,

"तारा, ये वो काम कर रहे थे जो इनका शरीर भी मन करता है. और मेरी ताक़त का गलत प्रयोग मैं करना नहीं चाहता था. देखा था ने के पहले कैसे आराम से

बात करि थी."

"हाँ. तोह मुझे तोह खुसी हुई की तू समझदार है. और अपने आप को काबू में रखता है. लेकिन कुछ भी बोल मई तोह तेरी फैन हो गई." स्कूटरी चलने लगी तोह तारा

ने अपने दोनों हाथो से जकड़ते हुए कहा. अर्जुन को फिर वही मजा आने लगा लेकिन पहले से भी ज्यादा. "ाचा ये यहाँ सड़क पे नहीं करो ऐसे. अपना घर इधर हे है."

थोड़ा सकुचाते हुए उसने कहा तोह तारा भी मजे लेती हुई बोली, "फिर जहा तू कहेगा वह पकड़ लुंगी. जगह तोह बता जरा." और हंसने लगी खुद को ठीक करने के बाद.

अर्जुन को मूड भी ाचा हो गया था अब और दोनों ऐसे हे घर आ गए. उनके पीछे हे प्रीती और ऋतू दीदी भी आ गई. "क्या लाया है ये सब? और तारा के साथ?"

ऋतू दीदी थोड़ा हैरान होते बोली तोह तारा ने हे जवाब दिए, "क्यों ये मेरे साथ लड़ाई कर सकता है तोह फिर बहार क्यों नहीं जा सकता? हम ये पास से सामान लेके आये

और मेरे ऑफिस के लिए डायरी, पेन." प्रीती से हाथ मिलते तारा ने कहा इधर अर्जुन प्रीती को देख के मुस्कुरा रहा था जहा तारा की पीठ उसकी तरफ थी.

"चलो अंदर. आ प्रीती तू भी आजा." तारा उसका हाथ पकड़ के अंदर ले चली. "स्कूटरी?" प्रीती ने कहा तोह तारा ने कहा के अर्जुन लगा देगा और चाबी उसकी और

उछाल दी.

"है तुम सब महारानियों का नौकर मई हे हु" अर्जुन थोड़ा जोर से ये बात बोल गया तोह ऋतू दीदी ने आँखें दिखाई.

"लो दीदी आपका बताया सब सामान आ गया." अलका दीदी को टहलिए पकड़ने के बाद वो इधर उधर देखने लगा.

"सब ऊपर है." अलका दीदी ने मुस्कान के साथ कहा तोह अर्जुन ने उनको बाहो में भर लिए. "मतलब यहाँ तोह कोई नहीं है फिर." और उनके होंठो को हलके से चूम के ऐसे हे

खड़ा था की पीछे से ऋतू दीदी की आवाज आई, "ये सब अब खुलेआम करोगे तुम दोनों? मतलब घर में कोई बड़ा नहीं तोह कही भी शुरू." आवाज थोड़ी तीखी थी लेकिन फिर

पीछे से अर्जुन के गाल को चूमती हुई कुछ सामान लेकर निकल गई.

"कहा था थोड़ा सबर रखा कर." अलका दीदी हँसते हुए बोली. "सोच अगर यहाँ तारा या Priyanka/Aarti होती तोह"

"सॉरी. बड़ा दिल कर रहा था आपको गले लगाने का. और आपने प्रीती का नाम नहीं लिए." अर्जुन सोचते हुए बोलै

"उसको क्या फरक पड़ेगा." इतना बोलकर वो भी ऊपर चल दी अर्जुन को ऐसे हे सोचते छोड़कर.

"यार ये सच में बहोत सुन्दर है." आरती दीदी प्रीती को ध्यान से देखती बोली "और भगवान् ने इसकी आँखें भी सबसे अलग हे दी है. हाय ऋ मेरी खराब किस्मत."

उनकी बात पर तारा हंसने लगी तोह ऋतू दीदी ने फिर से प्रीती को छेड़ दिए. "सुन रही है न तू. इसलिए हे तोह तू मेरी जान है." और बाकी सबकी तरफ आँख मार दी.

"वैसे सच बात है यार. मई देखती थी की कोमल और ऋतू हे घर में सबसे खूबसूरत लड़किया है. ऐसा नहीं के माधुरी दीदी, अलका, तारा या आरती किसी से काम है,

लेकिन अगर किसी एक को अगर सबसे सुन्दर कहना हो तोह वो ऋतू और कोमल हे लगती है मुझे लेकिन प्रीती को देखती हु तोह ये लगता है की शायद इसकी तोह मिटटी अलग

से बनाई होगी भगवान् ने. ऊपर से देखो तोह कही हलकी सी चर्बी कही भी हो. बस जहा होनी चाहिए वह भी परफेक्ट शेप है." प्रियंका दीदी वैसे तोह इतना

कहती नहीं थी कभी लेकिन आज उन्होंने भी अपने दिल की बात कर हे दी. और प्रीती सर झुका के बैठ गई शर्माती सी जिसको एक तरफ से ऋतू दीदी ने जकड़ा हुआ था.

"कल यही बात तोह मई कह रही थी. सच में यार बता न ऐसा कैसे है? मई लड़का होती तोह पक्का बस यही लड़की मेरा प्यार होती." तारा ने बिना झिझके हे कहा तोह

अंदर आई अलका ने बीएड पर बैठते हुए कहा, "देख सच बोलू तोह अब ये उतनी सुन्दर नहीं रही जितना हमे याद है. क्यों ऋतू?" और उनकी बात पर ऋतू दीदी ने हामी

भरी.

"ये समझ लो की एक गोरी मेम बस अब आधी हिंदुस्तानी हो गई. इनकी मम्मी तोह इस से भी कही ज्यादा सुन्दर होती थी जितना याद है. और ये बिलकुल सफ़ेद, neeli-hari

इन आँखों के साथ किसी गुड़िया जैसी थी. अब भी अगर इसका शरीर इतना कैसा हुआ और तराशा हुआ है तोह ये सब इसकी म्हणत है. रनिंग में अपना अर्जुन इस से हार

जाता है ऊपर से 2-3 घंटे टेनिस खेलती है और चंडीगढ़ में स्टेट लेवल जीत चुकी है. इतनी म्हणत हम में से कोई करती तोह काली जरूर हो जाती और ये गुलाबी

हो गई मैडम." अपनी बात शरारत से ख़तम करती वो भी प्रीती के गले में बाहे दाल उसको छेड़ने लगी.

"अब मेरी बात हो गई हो तोह कुछ और कर ले क्या दीदी?" प्रीती ने शरमाते हुए कहा तोह अलका ने फिर उसको फंसा दिए, "जो करना हो तू ऋतू के साथ कार्यो. यहाँ सिर्फ

बातें हे होंगी." उनकी बात ख़तम हुई तोह ऋतू दीदी ने भी गाल चूम लिए प्रीती के. "अहा. देख ले इसको कैसे tera-mera नाम पक्का कर रही है."

"ाचा यार बस अब कोई इसको नहीं सताएगा. प्रीती जब तू इतनी सुन्दर है, स्पोर्ट्स में भी है ऊपर से चंडीगढ़ रह चुकी तोह पक्का कोई बॉयफ्रेंड तोह होगा." तारा

ने बात को ख़तम करना चाहा था लेकिन यहाँ तोह फिर से बेचारी की बोलती बंद हो गई.

"इसको इस सब में इंटरेस्ट नहीं है रे. इसका रिश्ता पक्का हो चूका है पहले हे और इसने भी काबुल कर लिए घर का फैंसला." ऋतू दीदी को लगा के ज्यादा हो रहा है

तोह उन्होंने अब बात को ख़तम करने से ये कहा.

"वाह. मतलब यहाँ किसी का बॉयफ्रेंड है नहीं और इसका तोह रिश्ता भी हो चूका है." आरती ने थोड़ा हैरान होते कहा तोह अलका दीदी ने झट से कहा, "किसी का हो या

न हो मेरा तोह है." ऋतू दीदी ने भी हाँ कहा तोह ये उनके लिए भी नै बात थी. "ऋतू तेरा भी बॉयफ्रेंड है?" प्रियंका ने हैरानी से कहा

"जब अलका ने कहा के है तोह मान लिए. मई कह रही हो तोह क्या दिक्कत हो गई? ये प्रीती मेरी ख़ास है मतलब ये नहीं के एहि मेरी एक दुनिया है." हँसते हुए उन्होंने

ये कहा तोह प्रीती भी उनके साथ हे हंसने लगी.

"मतलब ये मॉडर्न तारा का भी नहीं और हम दोनों बहनो का भी नहीं. लेकिन तुम तीनो जो हमसे छोटी हो उनका है." प्रियंका दीदी की इस करुणगाथा पर सभी हंसने लगे

थे. "मेरा भी मिल तोह गया है लेकिन पता नहीं की उसको मई पसंद हु या नहीं." तारा ने तोह बम फोड़ दिए ये कह कर.

"अभी 3 घंटे पहले तोह इसको राजकुमार का इन्तजार था और अब वो मिल भी गया? हो क्या रहा है ये?' आरती झुंझलाती सी बोली तोह अलका ने प्रीती के कान में कहा

"ये पक्का हमारे वाला हे है. शर्त लगा ले मेरे से." बात धीमी जरूर थी लेकिन ऋतू ने भी सुन ली थी और तीनो के चेहरे पर मुस्कान तैर गई और ऋतू ने सिर्फ

इतना कहा, "कृष्ण कन्हैया."

"ये तुम तीनो क्या बात कर रही हो." तारा ने उधर ध्यान देते कहा. थोड़ी चिंता हो गई थी उसको.

"अरे बात कहा कर रही है. ये अलका हे बोली की कोई कृष्ण कन्हैया मिल गया लगता है तारा को तोह मैंने वही कहा कृष्ण कन्हैया." ऋतू ने झट्ट से बात

संभल ली थी.

"है कह तोह तुम सच रही हो. कृष्णा जैसा हे है वह." एक हलकी आह सी भर्ती वो बोली.

"ाचा चल तू अर्जुन के लिए फल काट दे ऋतू और मई सबके लिए मग्गी बना के लाती हु." अलका ये कहती कड़ी हुई तोह ऋतू ने प्रीती को जाने का इशारा किया और

वो बिना कुछ कहे अलका दीदी के साथ निचे चल दी.

"तेरा सही है. मतलब प्रीती तोह सच में जैसे तेरे दिल से जुडी हुई है." आरती ने ये कहा तोह मुस्कुराते हुए ऋतू ने भी कह दिए. "यार गहरा नाता है इस से और

प्यार भी बहोत करती है सबसे अपने यहाँ."

फिर कुछ सोच कर आरती बोल पड़ी, "ऋतू बुरा मत मानियो यार लेकिन एक बात बता के ये जो लोग प्यार व्यार की बातें करते है क्या इस सब में फिजिकल रिलेशन जरुरी

होता है?"

"मुझे ऐसा तोह नहीं लगता के जरुरी होता है. है लेकिन एक बात जरूर है के खुद के ladki/aurat होने का सम्पूर्ण एहसास तभी होता है जब प्रेमी दिल के सब तार

छेड़ दे. और मिलान सिर्फ भूख या सेक्स हे न हो. सम्मान, इज्जत और परवाह हो हर एक चुहान में तोह फिर शारीरिक मिलान किसी स्वर्ग जैसा हे लगता है."

"मतलब तू कर चुकी है क्या?" प्रियंका दीदी ने ये बात कही तोह वह हंसने लगी. "क्या दीदी, कुछ भी सोचती हो. ये सब मेरी फीलिंग्स है और कभी हुआ तोह मई

यही सब चाहती हु के मुझे महसूस हो." उसकी बात पर आरती मुस्कुरा दी और तारा भी.

अर्जुन नीचे से हे फल खा कर अपने दोस्त संदीप के घर चला गया था अलका दीदी को बोल कर ये लड़किया बस ऐसे हे 4 बजे तक बातें करती रही और हल्का फुल्का

खा लिए था इन्होने.

.

.

"संदीप कहा है दीदी?" घंटी बजने पर ज्योति ने दरवाजा खोला तोह अर्जुन ने पुछा. उसको लगा के शायद वो गलत समय आ गया क्योंकि ये दोपहर का वक़्त था.

"अंदर तोह आ पहले या धुप में खड़ा रहेगा?" ज्योति एक मुस्कान बिखेरती उसको तमीज से अंदर लेकर आ गई.

"बैठ यहाँ मई बस ये थाली रख के आई." टेलीविज़न देखते हुए शायद वो खाना खा रही थी जो लगभग हो चूका था. गांड मटकती वो रसोईघर की तरफ चली

गई और अर्जुन उसके पिछवाड़े को देख रहा था. तभी अंदर के कमरे से संदीप तैयार हो कर वह बहार के बैठक वाल्के कमरे में पंहुचा.

"तू घंटी क्यों बजता है भाई, तेरा भी तोह घर है." वो उसके पास हे बैठ कर बोलै. जूते, कमीज और जीन्स पहने वह कही जाने को तैयार सा लग रहा था.

"हम कही जा रहे है क्या?" अर्जुन ने पुछा उत्सुकता से तोह वो मुस्कुरा कर धीरे से बोलै, "भाई छोटा सा काम है बस अभी आ जाऊंगा. तू यही बैठ."

"चारु के पास?" अर्जुन ने इतना कहा तोह वो मुस्कुरा दिए.

"भाई तू आ गया न तोह मुझे घर पे दांत नहीं पड़ेगी की घर पर दीदी को अकेले छोड़ गया. मई बस 1 घंटे तक आ जाऊंगा तू इतने यही रह. प्लीज." उसकी बात

पर कुछ सोचते हुए बस उसने हां कह दिए. और संदीप उसको गले लगाने के बाद बोलै, "दीदी कुछ पूछे तोह बोल डीओ के एक दोस्त तक गया है अभी आ जायेगा."

और वह वह से निकल लिए बिल्ली के सिरहाने दूध छोड़कर.

उसके जाते हे अर्जुन ने देखा के रसोईघर के बहार दिवार से लगी ज्योति मुस्कुरा रही है. फिर वो उसके सामने से चलती हुई बैठक का दरवाजा बंद कर उसकी गौड़

में आ पसरी.

"कितनी देर का बोलकर गया है वह?

"एक घंटा काम से काम. वैसे उसको आने जाने में इतना टाइम लगेगा." अर्जुन ने खुद पहल करते हुए उस बिंदियो वाले सूट के कमीज के ऊपर से हे दोनों बड़े खरबूजे

पकड़ लिए. "आज तोह मेरा शेर भी जोश में है." और ज्योति उसके गले पर जीभ फिरने लगी. अर्जुन ने भी कमीज के अंदर नीचे से हाथ दाल कर दोनों दूध पकड़

कर दबाने शुरू कर दिए. "चल अंदर चलते है." इतना ज्योति ने कहा तोह अर्जुन ने उसको गौड़ में हे उठा लिए और अंदर बीएड पर पटक कर एक झटके में पजामी अलग

कर दी. वो बिस्टेर पर पड़ी मुस्कुराती उसको देख रही थी. सांवली ज्योति का हर अंग भरा भरा था. मांसल जाँघे चिकिनी मुलायम थी. अर्जुन उसको देखते हुए हे

अपनी जीन्स नीचे सरकने लगा. "ला ये मई करती हु." आगे बढ़ कर ज्योति ने उसका कच्चा निचे किआ तोह gulaabi-laal लुंड पूरे जोशी में उसके मुँह से आ लगा.

"पहले से हे तैयार है ये तोह." हाथो में पकड़ कर वो उसकी आँखों में देखती बोली तोह अर्जुन ने निचे झुक कर उसका कमीज का सीरा दोनों तरफ से पकड़ लिए. "उतार

दे रे ये ले." अपने हाथ ऊपर करती ज्योति ने खुद हे उसका काम आसान कर दिए. यहाँ वो एक घिसी हुई सफ़ेद ब्रा और एक पतली काली कच्ची में थी. उसके सांवले मॉटे

उभार ब्रा में झूल रहे थे और इधर अर्जुन का लुंड मजे की शिद्दत से और फूल रहा था. अपनी गांड उठा के ज्योति ने वो कच्ची निकलने की कोशिश की तोह अर्जुन

ने कूल्हों के निचे से उसको पकड़ कर खींच लिए. छूट पर हाथ रख के सहलाते हुए वह ऐसे हे ज्योति के ऊपर हो गया और दोनों एक दूसरे के होंठ पागलो की तरह

चूसने लगे. लुंड को छूट की दरार में रगड़ते हुए अर्जुन को छूट के गीलेपन का एहसास हुआ. वो पूरी पनिया सी गई थी.

"नीचे तोह बड़ी गीली हो दीदी" उसने अपना चेहरा उठाते हुए कहा तोह ज्योति पूरी बेशर्मी से बोली, "तेरे हे इसको देख के गीली हुई है. अब कर दे इसको ठंडा नहीं

तोह फिर और बुरा हाल हो जायेगा." टाँगे पूरी खोल के अर्जुन की कमर से लपेट ते हुए वह फिर से उसके मुँह को चूमने लगी. इधर अर्जुन ने वो ढीली सी ब्रा ऊपर

करते हुए दोनों बड़े चुके आजाद कर दिए थे जिनको वह अब ाचे से मसल रहा था. "सेह लोगी न मेरा?" एक बार फिर पूछते हुए उसने अपना हाथ नीचे करते हुए

लुंड छूट के छेड़ पर टिकाया जो बुरी तरह से तपने लग रही थी.

"जान भी लेले मेरी लेकिन ये तेरा डंडा अंदर दाल दे रे और मेरी परवाह किये बिना बस जी भर के छोड़ मेरी इस मुनिया को." वो बिलकुल देसी भाषा में बोलती अपनी

छूट उचकने लगी थी लेकिन लुंड का मोटा सूपड़ा ऐसे तोह जाना नहीं था अंदर.

उसके होंठ मुँह में दबाते हुए अर्जुन ने लुंड पकडे हुए हे अपनी कमर जरा तेजी से आगे बढ़ा दी. चुतरस से भीगा मोटा सूपड़ा गच्छ से उस मुलायम गरम छूट में

धस्स गया. एक पल के लिए ज्योति तदपि लेकिन अर्जुन ने एक और धक्का साथ में हे जड़ दिए. आधे से ज्यादा लुंड अब उसकी छूट में कास गया था. ऐसे हे रुक कर उसने

अपनी हथेली में दोनों दूध दबाते हुए ज्योति के होंठ चूसने जारी रखे. वो कसमसाई थोड़ी देर फिर शांत हो गई.

"मार दिए रे तेरे इस लौड़े ने. आह पेट दुखने लगा इसकी मोटाई से." होंठ अलग होते हे ज्योति शिकायत और दर्द से बोली लेकिन अर्जुन बस उसका एक भूरा निप्पल मजे

से चूसक्ता रहा. 2 मिनट बाद हे छूट में गीलापन आने लगा तोह वो भी सिसकने लगी और टैंगो को हल्का ढीला फिर सख्त करने लगी.

"करू?" अर्जुन ने आँखों में देखते हुए कहा तोह ज्योति भड़क गई, "तो क्या सिर्फ यही डालने के लिए अंदर ठोका है. फाड़ दे न इस कामिनी को."

अर्जुन ने 3 इंच लुंड बहार खींचा जिस से उसको हल्का सा दर्द हुआ और वापिस अंदर पेल दिए.

"आह अब बीच में कुछ न बोलियों रे. करता रह है ऐसे हे." अपने दोनों दूध खुद हे दबती वो बोली तोह अर्जुन अब 5-6 इंच तक गहरे धक्के लगाने लगा था. हर

धक्के पर वो खरबूजे हिलते तोह उसको और मजा आने लगता. अपने हाथ ज्योति की मोती गांड के निचे रख कर उसने छूट को और ऊपर उठाने के बाद एक कास के धक्का

लगा दिए. लुंड चाक़ू की तरह चीरता वह तक चला गया जहा पिछली बार नहीं गया था.

"मर्डर गई मम्मी. निकाल ले रे तेरा मूसल... आई मेरी माँ. नहीं छुड़वाना.." दर्द में ज्योति हाथ पेअर पटकने लगी तोह अर्जुन उसका एक दूध दबाता छूट के नीचे

गांड के छेड़ को कुरेदने लगा. चुदाई तोह एक पल के लिए रुक गई थी लेकिन ज्योति बोलने के बाद भी छूट में लुंड लिए पड़ी रही. जब थोड़ी शांत हुई तोह अर्जुन

ने उस 5 फ़ीट की लड़की को ऊपर उठा लिए लुंड छूट में फंसाये हुए हे. ऐसे खड़े हो के एक हाथ पीठ पर रखे वो खुद से चिपकाये वो उसके मुँह को चूम रहा था

और दूसरे हाथ से उसकी गांड की दरार में पूरा पंजा फंसाये था. अपनी बाहे उसकी गर्दन में जकड कर ज्योति ने हिम्मत कर के खुद हे गांड चलनी शुरू की तोह

एक तिहाई लुंड अंदर बहार होने लगा जो उसकी बच्चेदानी तक ाचे से ठोकर मार रहा था. मुश्किल से 4-5 मिनट हुए थे के उसकी बस हो गई.

"Aaahh..mai गई रे अर्जुन.. मजा आ रहा है." वह गिरने को थी तोह अर्जुन ने उसको पकड़ के बीएड पर लिटा दिए. एक पल के लिए लुंड बहार निकल उसको घोड़ी की तरह

करके गीली छूट में फिर से जड़ तक लुंड थोक दिए. "जालिम इंसान.. आह ाचे से मजा.. आह तोह लेने देता." लेकिन अर्जुन बिना कुछ बोले पीछे से उसके दोनों थांन

पकड़के उसको तगड़े झटके देते हुए कास के पेलने लगा. हर धक्के के साथ वह आगे को हो जाती तोह वह उसके दूध खींचता पीछे कर फिर से सुपडे तक लुंड निकाल

वापिस पेल देता था. "दीदी सच में गजब की है तुम्हारी. इतनी गरम और टाइट है जैसे बस मेरे लुंड के नाप से हे बानी है." अब उसके दोनों हाथ ज्योति के कूल्हों की

दोनों फांके अलग करते हुए लुंड को और गहराई में ठेलने लगे थे. एक bhoora-gulabi सा सिलवटों वाला छेड़ ाचे से दिख रहा था अर्जुन को. अपना हाथ छूट पर

2-3 बार फिर कर उसने अपनी पहली ऊँगली गीली करते हुए उस छेड़ के ऊपर धीरे धीरे चलनी शुरू की तोह ज्योति की सीत्कार मजे की अधिकता से और तेज हो गई थी.

लटकते चुचो पर नीली नसे भी नुमाया होने लगी थी जो बता रही थी की वो चरम पर है. और अगले हे पल ऊँगली गांड के छेड़ में आदि बैठ गई थी.

"कमीने क्यों सत्ता रहा है? और ये कहा ऊँगली फंसा दी रे निकल जलन हो रही है." उसकी बात अनसुनी करता अर्जुन धीरे धीरे ऊँगली bahar-andar करने लगा और

छूट के अंदर तक अपना लुंड घुसता रहा.

"आह अब मजा आ रहा है. करता रह रे ये तोह बड़ा अलग मजा आ रहा है. कहा से सीख लिए ये सब." अब खुद हे ज्योति गांड उचकाने लगी थी.

"दीदी, यहाँ करवाऊंगी?" अर्जुन ने वैसे हे धक्के लगते हुए पुछा.

"तू जहा कहेगा करवा लुंगी रे. लेकिन आज सिर्फ आगे कर, मंगलवार को घर में कोई नहीं रहेगा तू आ जैव. आह.. अभी बस.. आह मेरी मुनिया का ध्यान रख."

इतना सुनते हे अर्जुन ने अब ऊँगली बहार निकल ज्योति को वापिस पीठ के बल कर दिए और दोनों टंगे खोल के पूरा लुंड जड़ तक अंदर बहार करना शुरू कर दिए था.

नीचे झुक के उन फुल्ले हुए चुचुक को ाचे से दबा के पीते हुए वह तेज तेज धक्के मरता रहा. उसका लुंड भी फूलने लगा था. मजे की अधिकता में एक 2 जगह

से दूध को काट भी लिए लेकिन दोनों हे लगे रहे. जब ज्योति की छूट में तेज संकुचन होने लगा तोह वो चीखने सी लग गई और यही अर्जुन भी किसी पागल सांड

की तरह तूफानी गति से छूट को उधेड़ने लगा था. जैसे हे छूट ने पानी बहाया अर्जुन ने भी लुंड बहार निकाल कर छूट के होंठो पे 2-3 घिसाई कर दी.

ज्योति के थोड़ी पर पहली सफ़ेद गरम पिचकारी की धार जा लगी और अगली चुचो के बीच में. ऐसे हे तक़रीबन 15 सेकंड तक सफ़ेद लावा उसके शरीर पर बिखेर कर

अर्जुन साथ में बिस्टेर पर लेत गया और साँसे दुरुस्त करने लगा.

"तू असली मर्द है रे. कसम से आह.. ऐसे कास बल ढीले करता है.. आह के एक तरफ दिल करता है के कभी तेरे पास नहीं जाउंगी.. आह लेकिन ये निगोड़ी.. इसको तू

हे पसंद है रे." अपनी कच्ची से सारा वीर्य साफ़ करती वह कपडे पहन कर उसके होंठ चूम बाथरूम चली गई. 3 बज चुके थे तोह अर्जुन ने भी खुद को दुरुस्त किआ

बाथरूम से आती ज्योति के चुके ाचे से हिल रहे थे, जैसे नरम होने लगे हो और टाँगे भी चौड़ा गई थी.

"कमीने पेशाब करते हुए भी जान निकल रही है. और ये तू क्या कह रहा था के कहा करना है?" वो पास बैठ टी बोली तोह अर्जुन ने फिर से उसकी गांड के नीचे

हाथ घुसेड़ते हुए नरम मांस पकड़ते कहा, "यहाँ जो छेड़ है वह. मैंने एक किताब में देखा था तोह मेरा दिल है की आपके इन गोल मटोल कूल्हों के बीच एक बार

मई भी कर के देखु."

"ोये पागल. यहाँ आगे तोह मैंने कभी ऊँगली और मोमबत्ती करि थी तोह तेरा लेने को तैयार हो गई लेकिन उस जगह अगर ये गया तोह पता है के बैठने लायक भी

नहीं रहूंगी. और कहा पढ़ी थी वो किताब तूने? कही इस संदीप के बचे के काम तोह नहीं जो ये उलटी सीढ़ी शिक्षा तेरे दिमाग में भरने लगा हो.?" अरजुन वह

से उठकर संदीप के कमरे में गया. उसको उम्मीद थी की वो किताब शायद अब भी वही होगी और वो वही मिली जहा छुपाई थी.

"ये देखो न दीदी" उसने वो रंगीन किताब का वही पन्ना ज्योति के सामने कर दिए जहा अंग्रेज लड़की गांड में हब्शी का लुंड लिए थी. ज्योति ने किताब को खुद पकड़

के देखा और हैरान होते वो चित्र देखने लगी. लड़की की गांड तोह उसके बराबर हे मोती थी. लुंड भी अर्जुन जैसा था उस काले आदमी का जो आधा गांड के चले

के अंदर फंसा हुआ था. पन्ना पीछे करते हे उसको 4 चित्र और दिखे. जहा वो फिरंगी लड़की कला मोटा लुंड मुँह में ले रही थी, एक में वो उसकी छूट चाट रहा था,

एक जगह वो एक लुंड चूसती एक छूट में लिए थी और सबसे नीचे वाले में गांड, छूट और मुँह में लुंड भरे हुए थे.

"ये सब क्या है रे? कैसे कर लेती है ये? मई तोह तेरे इस एक से हे मर्डर गई लेकिन ये छिनाल तोह 3-3 खा रही है."

"प्रैक्टिस है दीदी. लेकिन आपको 3 लेने की जरुरत नहीं मई अकेला हे बहोत हु."

"ओह मई भी ऐसी नहीं के तेरे सिवा किसी को हाथ लगाने भी दू. तू हे है जो इसका मालिक है और फिर मैंने वडा कर दिए मंगलवार का तोह पक्का है. बस सुबह घर

आ जैव 11 बजे तक." फिर कुछ देर दोनों प्यार भरी चुहल करते रहे. कभी वो दूध दबाता तोह कबि ज्योति उसकी गॉड में बैठ कर चूमने लगती. कोई आधे घंटे

बाद जब संदीप ने घंटी बजाई तोह अर्जुन ने बहार जा कर गेट खोला इधर ज्योति बैठक में टेलीविज़न के सामने बैठने का दिखावा करती रही. दोनों दोस्त संदीप

के कमरे में घुस गए और फिर आधे घंटे बाद अर्जुन घर निकल लिए.
 
कुछ चरक्टेर्स का build-up ाचे से करने के लिए जरुरी है उनके बारे में ाचे से लिखना. हो सकता है आप सभी को ये 2 उप्दत ज्यादा ख़ास न लगे लेकिन यकीं रखिये के यहाँ इनका इतना विस्तार से बताना इनके भविष्य को ध्यान में रखते हुए लिखा है. और पूरी कहानी में जब भी नए किरदार आयंगे तोह 10 में से 3 उपडते ऐसे हो सकते है जिनमे एडल्ट कंटेंट ज्यादा न हो. साथ बनाये रखियेगा क्योंकि ये चरित्र सभी हम है इस कहानी में अंत तक. शुभ्राति - गूडनिघत.
 
अपडेट लेट नाईट तक पोस्ट करूँगा. छोटा अपडेट देकर आप लोगो की भावनाओ से खिलवाड़ नहीं करूँगा
 
अपडेट 35

क्या से क्या हो गया


"प्रीती तू कहा चली?" अलका दीदी ने कड़ी होती प्रीती से पुछा

"दीदी घर जा रही हु. कुछ काम भी है और फिर एक बार पारवती से भी पूछ लू के अगर कुछ चाहिए हो तोह घर पे." सबसे विदा ले वो नीचे उतर आई. और इधर

अर्जुन भी पिछले आँगन में आ गया था. दोनों ने एक दूसरे को देखा और प्रीती हंसती हुई उसके पास से निकलने लगी तोह अर्जुन ने गलियारे में हे उसका हाथ थाम लिए.

"क्या बात बिना कुछ कहे हे जा रही हो.?" उसने ऐसे हे प्रीती को पकडे हे कहा तोह मुस्कुराकर उसने जवाब दिए, "मई तोह यही थी बहुत देर से लेकिन तुम हे गायब

थे जाने कहा. और अभी जरुरी काम है घर पे तोह जाना पड़ेगा. और है सॉरी प्लीज आज रात को नहीं आना, आज मुश्किल है तुम्हारा मेरे पास रहना." एक बार अर्जुन

के चेहरे पर निगाह डालती फिर नीचे देखती प्रीती ने कहा तोह वो उसकी तरफ देखता सोचने लगा.

"इतना मत सोचो न. वो बस आज के लिए सॉरी बाद में रीज़न बता दूंगी." अर्जुन ने सर हिला कर ठीक है कहा तोह वो थोड़ा तेजी से अपने घर की और निकल गई.

"अब पता नहीं इसको क्या हो गया. खुद हे आने के लिए कहा था और अब खुद हे मन कर दिए." मैं में सोचता सा वो अंदर आँगन में बने बाथरूम में हे नहाने चल

गया. शरीर से हलकी पसीने की दुर्गन्ध आ रही थी. शायद ज्योति के साथ हुई जिस्मानी मुलाकात से. नहाने लगा तोह याद आया के टोलिया तोह भूल गया है फिर

अंदर से हे ऋतू दीदी को आवाज लगाईं. "दीदी मई यहाँ बाथरूम में हु मुझे टोलिया पकड़ा देना जरा." आवाज ऊपर कमरे में बैठी लड़कियों तक गई तोह ऋतू दीदी ने आरती

की और देखा विनय से. उनका अभी उठने का दिल नहीं था. "ाचा बाबा मई दे आती हु. तू अपने पाँव यहाँ बिस्टेर पर हे रख के बैठ." आरती दीदी उसको छेड़ती सी बोली और

फिर अर्जुन के कमरे में दरवाजे पर टंगे तोलिये को उठती नीचे चल दी. अर्जुन ये सोच रहा था के सब ऊपर है तोह दीदी से थोड़ा मजाक मस्ती कर लेगा लेकिन यहाँ कुछ

और हे होने जा रहा था. दरवाजा हल्का खुल्ला रखा उसने की वो हाथ अंदर करके टोलिया पकड़ा देंगी और वह हाथ खींच लेगा. हुआ भी कुछ ऐसा हे था लेकिन दोनों के हे

होश उड़ गए. "सॉरी दीदी गलती से हो गया मेरा ध्यान आपके हाथ पर नहीं गया." भीगे बदन अर्जुन शावर के नीचे खड़ा था और उसके हाथ में आरती दीदी की कलाई थी. तन्न पर सिर्फ एक नीले रंग का जांघो से नीचे तक का का इलास्टिक वाला कच्चा. आरती पहले तोह सदमे से में थी लेकिन अब बस अर्जुन के इस तगड़े भीगे बदन को हे

देख रही थी. होश आया तोह थोड़ी फुहार पानी की उसके ऊपर भी गिर रही थी. "फिर हाथ तोह छोड़ मेरा." इतना बोलते हे अर्जुन ने हाथ छोड़ दिए और एक बार फिर

माफ़ी मांगी. आरती फुर्ती से बहार निकल कर सीढ़ियों पर कड़ी हो अपनी धड़कन काबू में करने लगी थी. सूट की कमीज़ पर से हे उसके मॉटे दूध हिल रहे थे. ऐसा

उसकी ज़िन्दगी में पहली बार हुआ था के किसी लड़के ने उसको ऐसे स्पर्श किआ हो और उसने भी किसी को इस हालत में देखा हो. उसको यही लग रहा था के अर्जुन ने तोलिये की

जगह उसका हाथ खींच लिए था, गलती से. फिर मुस्कुराती हुई वो ऊपर चल दी बिना ये सोचे के उसका सूट हल्का गीला हो चूका है.

"अब ये क्या करके आ गई?" प्रियंका दीदी ने सबसे पहले यही बात कही तोह सबकी नजर आरती पर गई.

"कुछ नहीं. वो रसोईघर में मग्गी की प्लेट्स पर टूंटी से पानी चलाया था तोह छींटे उछाल कर गिर गए." बात को तुरंत हे संभल कर वह वापिस बैठ गई इधर

अर्जुन अपने को पांच कर पजामा पहन ऊपर चलने लगा. वो थोड़ा घबरा भी रहा था अंदर से लेकिन इतना जरूर पता था के दीदी किसी और को कुछ नहीं बताएंगी लेकिन

उस से अकेले में जरूर पूछताछ करेंगी. फिर खयालो से बहार आता वो दरवाजा खोल वह बैठी अपनी बहनो की तरफ देखे बिना अपने कमरे में आ गया.

"वैसे एक बात तोह है यार अलका, ये अर्जुन कितनी जल्दी बड़ा हो गया न. देख अभी से इतना तगड़ा हो गया है, मुँह पर बाल नहीं आये लेकिन लम्बाई तोह मेरे पापा से

भी ज्यादा हो गई और शरीर भी." प्रियंका दीदी ने एक बार अर्जुन को देखा था अभी अपने कमरे में जाते हुए और उसके अंदर जाते हे ये बात कह दी.

"है दीदी लेकिन दादा जी कहते है के वह अपने पापा पर हे गया है बस कद थोड़ा उनसे भी बड़ा हो गया. जाने कहा जाकर रुकेगा ये ताड़ का पेड़." अलका और प्रियंका

की बात सुनकर आरती के अंदर फिर अभी थोड़ी देर पहले हुई घटना उमड़ आई. "सच में वो है तोह किसी hatte-katte घोड़े जैसा. और क्या था वह उसके अंडरवियर में

फुला हुआ डंडे जैसा. हे राम." एक बार फिर उसकी साँसे थोड़ी तेज़ हो गई थी. अपना ध्यान वापिस अपनी बहनो पर कर वो खुद को संभालती सी लगी.

"सबसे ख़ास बात है की उसका चेहरा अभी भी मासूम है किसी पहलवान की तरह aadha-tedha नहीं और वो दिल का भी नादान हे है." ऋतू दीदी ने भी अपने मैं की कह

दी. तारा थोड़ा मुस्कुरा उठी उसकी बात सुनकर. "सबसे ज्यादा वाइज तू हे तोह जानती है उसको या फिर अलका." तारा बस इतना हे बोलकर चुप हो गई लेकिन उन दोनों के चेहरे

पर भोली सी मुस्कान आ गई.

"ाचा तुम तोह पड़ी रहोगी ऐसे हे लेकिन घर का काम बहोत पड़ा है. 5 बज गए है और संजीव भैया भी आने वाले होंगे. अर्जुन को भी दूध बना के देना है

और दादी जो उसके लिए लड्डू बना के गई है वह भी याद से देने को बोलकर गई थी. चल तू मेरे साथ नीचे आजा आरती." अलका ने खड़े होते हुए कहा तोह आरती के

साथ हे प्रियंका और ऋतू भी उठ गई. सभी नीचे चले गए तोह अर्जुन कमरे से अपने बाल ठीक करके और एक साफ़ टीशर्ट पहन कर बहार आया.

"पूरा हीरो बन गया है रे तू तोह. थोड़ी देर यहाँ भी बैठ जा फिर पता नहीं कहा गायब हो जाये." तारा ने उसकी तरफ देखते कहा और अर्जुन बीएड पर बैठ गया. तारा

थोड़ा सा उसके करीब होती बीएड से तक लगा के बैठ गई.

"कहा हीरो बना हु. बस सारा दिन daud-dhoop करता रहता हु और शाम को जाकर कुछ चैन मिलता है नहीं तोह दादा जी का बस चले तोह रात को भी कोई नै ट्रेनिंग

शुरू करवा दे." उसने भी तारा के बराबर में हे बिस्टेर के सिरहाने तक लगा कर बैठ ते हुए कहा.

"वैसे अपने स्कूल में तोह फेमस होगा तू लड़कियों के बीच?" थोड़ा मस्ती करते तारा ने कहा तोह अर्जुन ने भी वैसे हे कहा, "ये दिल्ली नहीं है न और अभी मेरी उम्र

नहीं ये सब की. सिर्फ पढ़ाई के लिए स्कूल जाता हु और मेरा तोह दोस्त भी एक है वह."

"यार इसमें दिल्ली कहा से आ गया? अब co-education वाला स्कूल है और ाचे खासे बचे आते है तोह फिर कोई तोह तुझे पसंद करती होगी या तू भी करता होगा." तारा

जैसे कुछ सोच कर बैठी थी.

"कोई मुझे पसंद करती होगी तोह वो मुझे क्या पता. लेकिन मई किसी को स्कूल में पसंद नहीं करता. है co-ed स्कूल है तोह सिर्फ काम से कभी क्लास में बात हो जाये

तोह ये आम बात हे है. इस से अलग कुछ नहीं." अर्जुन ने आकांक्षा वाली बात नहीं बताने का सोच रखा था.

"चल स्कूल में नहीं तोह फिर स्कूल से बहार तोह होगी कोई?" तारा थोड़ी जिज्ञासा दिखने लगी तोह अर्जुन ने मुँह बंद करने के लिए कह दिए. "एक प्रीती मेरी ाची दोस्त

है क्योंकि बचपन से हे साथ खेले है. एक तुम हो और अगर मई किसी से बात करता हु तोह फिर वो सब घर में हे है." अर्जुन शराफत से बोल रहा था. चेहरा एकदम

सपाट जिस से तारा कुछ जान न पाई.

"हाँ. प्रीती तोह शुरू से है. मेरी खुशकिस्मती के तू मुझे दोस्त मानता है. लेकिन यार अब इतना ाचा शरीर, चेहरा है ऊपर से आवाज भी तेरी खराब नहीं तोह ये

मान लेना की तेरी को गर्लफ्रेंड नहीं थोड़ा हजम नहीं हो रहा." तारा ने जैसे आखिरी सवाल किआ हो.

"सुन्दर तोह तुम भी बहुत हो. दिखती भी ाची हो और मॉडर्न भी हो. इस हिसाब से तोह तुम्हारा भी बॉयफ्रेंड होना पक्का हे है. वैसे भी दिल्ली रही हो, अकेली." अर्जुन

की बात पर तारा हंसती हुई बोली, "क्या दिल्ली और क्या मॉडर्न. इस सबका बॉयफ्रेंड से तोह कोई तालुक्क नहीं. ऊपर से मेरा स्वाभाव थोड़ा अलग है तोह ज्यादा दोस्त नहीं बनाये

कभी. लड़के है क्लास में कई लेकिन ऐसा तोह कोई नहीं जो मेरे बराबर का हो."

"फिर बराबर का तोह मिलने से रहा कोई क्योंकि जब इतनी सुन्दर और लोगो से काम घुलने मिलने वाली हो तोह पक्का है के यहाँ ऐसा लड़का मुश्किल हे है." अर्जुन ने मुस्कुराते

हुए जवाब दिए.

"एक है तोह लेकिन पता नहीं वो मुझे पसंद करता भी है या नहीं. वैसे लड़का ाचा है और दिखने में भी thik-thak सा है." तारा इतराती सी अर्जुन की आँखों में देख

कहती हुई एक पल के लिए उसके चेहरे में खो हे गई थी. अर्जुन अब इतना नादान भी नहीं था लेकिन यहाँ वह बिलकुल भी पहल करने के हक़ में नहीं था.

"ऐसा है तोह बात कर लेनी चाहिए तुम्हे. और अगर वो लड़का भी निकल गया तोह फिर ढूंढ़ती रहना अपने किसी और शहजादे को." अर्जुन तारा का गाल हलके से थपकता

हुआ बोल खड़ा हुआ और बहार जाने लगा. दीदी की आवाज आ गई थी जो उसको बुला रही थी. जब अर्जुन चला गया तोह तारा अपने उसी गाल पर हाथ रखती खुद से हे बोली

"तू हे है वह और कौन होगा रे. लेकिन जल्दी हे मई खुद हे तुझसे ये कह दूंगी."

"ये साथ में क्या है ?" जब अर्जुन ने दूध के साथ कटोरी में एक लड्डू जैसा गोला देखा तोह ऋतू दीदी हंसती हुई बोली, "पता नहीं दादी ने तोह इसको लड्डू हे बताया

था लेकिन मुझे तोह ये jadi-booti और mewa-masala हे लग रहा है. लेकिन उनकी हिदायत है के ये सुबह शाम ek-ek खाना है तूने."

"ऐसा लगता है इसमें बादाम के साथ काली मिर्च, शक्कर और वो देसी जड़ी बूटिया है जो उस दिन मई लेके आया था." अर्जुन ने उस लड्डू को चखते हुए कहा. जिसका स्वाद

बिलकुल अलग था. कुछ मीठा, तीखा और फीका भी. और फिर वह मैं मार के उसको खाता हुआ साथ दूध पीटा रहा. संजीव भैया भी वापिस आ गए थे तोह आते

हे वह भी वही कुर्सी पर बैठ गए. अलका दीदी ने उनको एक कप चाय का दिए जो उन्होंने अभी बन्याया हे था.

"आप तोह आज बिना बताये हे चले गए थे." अर्जुन नखरे से अपने बड़े भैया से बोलै तोह संजीव भैया ने भी उसका जवाब दिए, "साथ तोह लेके जा नहीं सकता था.

तुझे जो घर रहना था और ऊपर से जिस समय मई गया तू यहाँ था भी नहीं. लेकिन तू दूध ख़तम कर फिर मई भी जरा मुँह हाथ धो लू, दोनों थोड़ी देर पास की

मार्किट चलते है." उनकी इस बात पर अर्जुन खुश हो उठा और ऐसे हे कुछ देर बाद दोनों भाई बहार चल दिए. संजीव भैया अलका दीदी से और प्रियंका दीदी से कुछ

बात करने के बाद हे घर से चले थे.

"ाचा तोह वह किताब कितनी पढ़ ली तूने?" दोनों भाई मार्किट के पीछे बानी छोटी दूकान के सामने एक बेंच पर बैठे थे. हल्का अँधेरा सा हो रहा था और संजीव

भैया सिग्रेटे पी रहे थे और अर्जुन दूध वाली कुल्फी. उनका ये सवाल सुनकर अर्जुन ने उनकी तरफ देखा.

"ऐसे क्या देख रहा है? वो मई तेरे हे लिए लाया था लेकिन फिर सोचा के तुझे खुद हे ढूंढ़ने दू उसको. मेरा पर्स उठाते हुए तेरी नजर गई थी न उसपे?" अर्जुन

अब हलकी शर्म और मुस्कान से उन्हें देखता हुआ सर हिलने लगा.

"देख भाई मई जानता हु के मैंने हे तुझे ये एक नै राह दिखा दी. सही है या गलत ये मुझे नहीं पता लेकिन मई चाहता था के तू ज़िन्दगी के इस सच को भी समझ

जाए और फिर sahi-galat को भी. कोई भी ाची लड़की जब प्यार करने लग जाये तोह तेरी भी उसके प्रति जिम्मेदारी बनती है कुछ. लेकिन बाजारू लड़की से बच कर रहना.

बड़ी क्लास में जायेगा तोह ाचे बुरे दोस्त बनेंगे. किसी गंदे साहित्य और गंदे दोस्त से दूर हे रहना, वो दोनों हे भ्रमित करते है. और रही बात उस किताब की तोह

सेक्स जीवन का एक सच है जो पता होना चाहिए लेकिन खुद मुझे थोड़ी देर से पता चला था और शायद गलतिया करने के बाद." अपनी बात कहने के बाद वह थोड़ा शांत

हो गए तोह अब अर्जुन ने बात कही.

"भैया उस किताब में मैंने बहुत कुछ पढ़ा और समझा है. उसमे कोई गलत बात नहीं थी लेकिन इतिहास और stri-purush के बारे में हे गहराई से हर बात बताई गई

है. ये सब मुझे कुछ भी मालूम नहीं था पहले. और आप मेरा यकीन मानिये के मई खुद एक संयंम वाला लड़का हु तोह मई दोस्ती भी किसी गलत इंसान से नहीं करूँगा."

"वो मई भी जानता हु मेरे भाई. लेकिन जो गलत होता है वो मीठा होता है और मीठा जल्दी पसंद आ हे जाता है. लेकिन एहसास तब होता है जब शरीर को मधुमेह

हो जाये. और वैसे कोई नया प्रैक्टिकल किआ क्या तूने मेरे उस तोहफे के बाद?" गंभीर बात के बाद उन्होंने ये हलकी फुलकी बात भी कह दी जो माहौल को हल्का करने के लिहाज़

से हे थी.

"वो 2 बार ज्योति के साथ किआ है मैंने." अर्जुन थोड़ा नजरे नीचे करता हुआ सा बोलै.

"वाह छोटे तू अब इतना बड़ा हो गया? और ये ज्योति वो तोह नहीं धर्मपाल अंकल की बेटी?" संजीव भैया थोड़ा चौंकते हुए बोले. उनको उम्मीद नहीं थी की अर्जुन इस खेल

को इतनी जल्दी समझ जायेगा. वैसे तोह उन्हें अभी सब सच कहा पता था.

"है वह उनका भाई मेरा दोस्त है और स्कूल में साथ हे है. ज्योति ने हे खुद से पहल की थी और फिर बाद में मुझे भी सुरक्षित लगा तोह हम दोनों ने एक बार और कर

लिए." अर्जुन की बात सुनकर अब वो थोड़ा हलके और खुशमिजाज लहजे में बोले, "एक तोह वो तेरे से 4-5 साल बड़ी, ऊपर से उसने हे पहल करि. और वह ठीक भी थी तेरे

साथ करने के बाद.?" उनके लफ्ज़ो का चुनाव अभी भी सभ्य हे था.

"हाँ. दर्द तोह दोनों को हुआ था पहली बार लेकिन फिर मजा भी आया. ज्योति ने कहा था के मई उसको शुरू से पसंद हु और वो ये सब सिर्फ मेरे साथ करना चाहती है

शादी से पहले."

"तुम दोनों ने निरोध लगाया था क्या?" संजीव भैया का सवाल थोड़ा सा चिंतित स्वर में था लेकिन वो उसके कंधे पर हाथ रखे बैठे थे आराम से.

"नहीं ज्योति ने कहा था के बहार निकाल देना. और फिर मेरा ये दुखता है निरोध से भैया." अर्जुन ने झिझकते हुए अपने बड़े लुंड वाली समस्या भी उन्हें अस्पष्ट शब्दों

में कह हे दी.

"हाहाहा. चल फिर कोई बात नहीं अगर ऐसा है तोह. लेकिन ध्यान रखिओ के ये सब लगातार और ज्यादा न हो. किसी के घर पर ऐसे ये सब करना और वह रोज जाना थोड़ा

खतरे का काम भी है. कोई ऊंच नीच या बात फ़ैल गई तोह दोस्त भी जायेगा और इज़्ज़त भी. चल अब होटल से सब्जी लेते है फिर घर चलते है." और दोनों वह से

उठा गया.

"वैसे मुझे एक बात का तोह पक्का यकीन है छोटे, स्टेडियम में भी तेरे चर्चे जरूर होंगे एक दिन. क्योंकि लड़किया तोह वह भी बहोत है और जैसा तू दीखता है

मुझे पक्का पता है के अभी बहुत साड़ी लड़कियां आने वाली है तेरी ज़िन्दगी में. बस जो भी हो कभी इज़्ज़त पर बात आ जाये तोह लड़की को मझदार में मत छोड़ देना."

संजीव ने अपने छोटे भाई को एक भोजनालय की तरफ चलते हुए कहा.

"पहली बात तोह ये है भैया के वह मई सिर्फ बॉक्सिंग के लिए जाता हु और कोच सर मेरे ऊपर कड़ी नजर रखते है. दूसरी अगर ऐसा कुछ हुआ तोह मई कोशिश करूँगा

के ये ना हो. और अगर होता है तोह फिर आपकी हे बात ध्यान में रहेगी."

"नमस्कार अंकल जी. एक दाल फ्राई, एक शाही पनीर पैक कर दो." संजीव भैया ने होटल वाले मालिक को काउंटर पर अपना आर्डर देते कहा.

"क्या हाल है संजीव बीटा. अरे छोटू एक दाल और एक शाही पनीर जल्दी लगा और पैक कर के दे. आपके हुए जी 130 रुपये." ये एक तगड़ा आदमी था कुछ 50 साल का, थोड़ी सफ़ेद दाढ़ी जो सलीके से कटी हुई थी और रौबदार शख्स.

"ये लीजिये." उन्होंने उस अंकल को पैसे दिए बटुए से निकाल कर फिर वह कुछ देर तक संजीव से बातें करते रहे. ये उनके परिवार को ाचे से जानते थे. अंदर

लम्बी टेबल की कतार लगी थी जिनके दोनों और फत्ते वाले बेंच लगे हुए थे और कोई 30-35 लोग इस समय खाना खा रहे थे. दोस्त, परिवार, कुछ अकेले. ये वैष्णो

भोजनालय प्रसिद्ध था आसपास. खाना लेकर दोनों बहार आये तोह अर्जुन की नजर बहार कड़ी एक मोटरसीले पर पड़ी.

"ये फौजी वाली मोटरसाइकिल है न भये?" ऊतस्कता से उसने पुछा और फिर वापिस उस काली, गोलाकार टंकी वाली बड़ी सी मोटरसीले को देखने लगा.

"ये इन्ही अंकल की है भाई. और फौजियों के पास भी होती है लेकिन उस रंग को छोड़कर बाकी सभी रंगो में ये आम लोगो के लिए भी है. भारी चीज है थोड़ी रॉयल

एनफील्ड नाम है लेकिन बुलेट बोलते है." और सब्जी की थैली स्कूटर पर आगे टांगते उन्होंने उसको स्टार्ट किआ तोह अर्जुन अभी भी पीछे मुड़कर उस दुपहिया को हे देख रहा था.

"आजा छोटे बैठ जा. बड़ी कक्षा में जायेगा तोह दादाजी को बोल कर तू भी ले लिओ एक. वैसे भी जन्मदिन तोह आ हे रहा तेरा अगले महीने." उनकी बात से खुश होता अर्जुन

स्कूटर पर बैठ गया. "बुलेट. सही चीज है." अपने मैं में बोलता वो एक बार फिर पलट को उसको देख फिर सीधा हो गया. 10 मिनट बाद वो घर आ चुके थे. भैया

ने सब्जी की थैली प्रियंका दीदी को थमाई और खुद बहार वाले आँगन में चले गए टोलिया लेकर. तारा के आने के बाद से हे वो ऊपर के बाथरूम में नहीं जा रहे थे.

"चल भाई तू भी हाथ मुँह धो ले और ऊपर से तारा और ऋतू को भी बुला के ले आ." अलका दीदी ने अर्जुन को कहा जो रसोईघर में आ रहा था. उनकी बात सुनकर वो ऊपर

चला गया.

"दीदी, अलका दीदी ने बुलाया है नीचे. चलिए खाना खा लीजिये मई हाथ धो के आया." वो बाथरूम के अंदर जाने से पहले बोलता गया. वो दोनों भी उठ कर नीचे

चल दी. अंदर आया तोह दरवाजे के पीछे तंगी टीशर्ट के साइड से एक गुलाबी पट्टी बहार दिख रही थी. अर्जुन ने फिर से उस तरफ हाथ बढ़ा के वो कपडा उतार लिए.

गुलाबी नरम गद्देदार ब्रा थी वह. कप के किनारे लास लगी थी और महसूस करने में वो बिलकुल चिकनी थी. उस ब्रा की पत्तिया भी पतली और किसी डोरी जैसे थी कंधो

की तरफ. जाने क्या सोच कर उसने उसको अपनी नाक से एक बार सूंघा और फिर ाचे से टटोलने के बाद वापिस वह टांग दिए. 10 मिनट बाद आज सभी एक साथ हे टेबल

पर बैठे थे. प्रीती भी वही आ गई थी जो आरती दीदी और ऋतू दीदी के बीच में बैठी थी. प्रियंका दीदी ने सबका खाना लगाया था और फिर बाकी सब्जी 2 बर्तन में

दाल के वही टेबल पर रख दी थी, रायते के साथ हे. ऋतू दीदी कुछ बात कर रही थी प्रीती के कान में जिसको सुनकर वह थोड़ा शर्मा रही थी.

"चलो अब खाना शुरू करो बैठे क्या हो?" अलका दीदी ने उन दोनों से कहा था लेकिन बाकी सब भी रोटी खाने लगे.

"मई दादाजी के कमरे में सोऊंगा और बाकी सब जहा ठीक लगे सो जाना." संजीव भैया ने बताया तोह ऋतू दीदी भी बोल पड़ी. "भैया प्रीती के घर पर भी इसके दादाजी

नहीं है और इसकी तबियत भी आज थोड़ी ठीक नहीं है तोह मई और प्रियंका दीदी वह सो जाये?" अर्जुन को झटका लगा के प्रीती की ताबिया ठीक नहीं है. इधर संजीव

भैया ने अपनी मंजूरी दे दी थी उनको देखते हुए.

"मई और तू मेरे कमरे में सोयेंगे." अलका दीदी ने आरती दीदी को ये बात कही

"ठीक है जहा तू कहे मई वही सो जाउंगी. और तारा तोह फिर बर्फ के महल से बहार निकलने नहीं वाली." आरती की बात सुनकर सभी हंसने लगे.

"ऐसी तोह कोई बात नहीं है. बस छत्त पर सोने से डर लगता है और फिर मई बिस्टेर पर अपने हिसाब से सोती हु." तारा की बात पर एक बार फिर सभी मुस्कुरा रहे थे

कुछ देर में सबका खाना हो गया तोह अर्जुन गलियारे से होता बहार आ गया. कुछ हे देर में ऋतू दीदी भी वह आ गई थी.

"प्रीती को क्या हुआ है दीदी? और आप उसके घर जा रही है. आज हम दोनों भी तोह साथ सो सकते थे." अर्जुन ने आहिस्ते बात करते कहा.

"अरे वो ठीक है और ज्यादा कुछ नहीं हुआ. हम दोनों कल सो जायेंगे साथ आज मई उनके यहाँ रुकने के लिए पहले हे बोल चुकी हु. वैसे इतनी परवाह मेरी तोह नै है तुझे

जितनी प्रीती की करता है." उनकी नटखट हंसी देख अर्जुन मुस्कुराता हुआ बहार बाथरूम की तरफ हाथ धोने चला गया और ये तीनो प्रीती के घर चल दी.

"मई सोने जा रहा हु छोटे तू गेट को टाला मार दे. आज थोड़ी थकान है ज्यादा स्कूटर चला लेने से तोह अभी सोना हे ठीक रहेगा." अर्जुन कुर्सी पर बैठा अलका दीदी से बातें कर रहा था के संजीव भैया की बात सुनकर सर हिलता हुआ वापिस टाला लगाने बहार चल दिए. वापिस अंदर आया तोह अब अलका दीदी की जगह आरती दीदी बैठी

थी और अलका दीदी रसोईघर साफ़ करने में लगी थी जहा तारा उनके साथ थी.

"वो जो भी हुआ एक हादसा था. और मुझे भी बाद में एहसास हुआ के तुम्हारी कोई गलती नहीं थी क्योंकि तुमने कोई मुझे देख कर तोह अंदर खींचा नहीं था." आरती दीदी

बहुत धीमी आवाज में पलके झपकाती ये बात के रही थी अर्जुन से, जो उन्हें वह देख खुद थोड़ा हिल गया था लेकिन अब ये जानकार थोड़ा आराम महसूस कर रहा था.

"फिर भी सॉरी. वो हाथ पकड़ने के बात भी नहीं छोड़ा था मैंने क्योंकि ध्यान हे नहीं रहा था." एक अलग लहजे में उसने ये बात कह दी. और आरती वो दृश्य याद सा

करती गुलाबी हो चुकी थी. कितनी सख्त पकड़ थी उसकी नरम कलाई पर और फिर कैसे वो सिर्फ आँखों में हे देख रहा था. वो ये सब सोच रही थी की अलका ने हिलाया.

"चल अब उठ भी जा. कितनी देर से बोल रही हु. अर्जुन भी ऊपर चला गया अपने कमरे में और ये मैडम भी जाने लगी है. चल हम भी यहाँ मेरे कमरे में चलकर बातें

करते है." उनकी बात सुनकर वो चुपचाप अलका के साथ चल दी.

तारा ऊपर आई तोह उसको अर्जुन नजर नहीं आया. फिर रात को पहन ने वाले अपने कपडे लेकर वो बाथरूम चली गई नहाने के लिए. इधर अर्जुन छत्त पर टहल रहा था जैसा वो लगभग रोज हे करता था सोने से पहले. कोई 10 मिनट बाद वो नीचे आया अपने कमरे में जाने के लिए की बाथरूम का दरवाजा खोल तारा भी आती दिखी.

जामुनी बनियान सी टीशर्ट और और उस के साथ की हे सूती निक्कर जो जांघ और घुटनो के बीच तक की थी, पहने हुए. दोनों उभार जैसे कैसे कैसे थे उस कपडे में

और बालो में टोलिया रगड़ने से वो हिलने लगते थे. चिकनी गोरी जाएंगे जिनपर कुछ बुँदे फिसल रही थी.

"पहले लड़की नहीं देखि क्या मिस्टर." थोड़ा इतराते हुए तारा ने ये कहा तोह अर्जुन ने खुद को सँभालते हुए कहा ,"वो बात नहीं है. लेकिन तुम इतना चमकती कैसे रहती

हो? गोरा होना अलग बात है लेकिन तुम्हे देख कर लगता है जैसे कुछ और भी है."

"हाहाहा. वो ऐसा है न के मई अपनी स्किन का ाचे से ख़याल रखती हु और टाइम पे हेयर रिमूव भी. स्किन को भी डाइट चाहिए होती है जैसे मस्तूरिज़र, मस्सगे, ब्लीच

और नौरिश्मेंट क्रीम. तोह ये ऐसे दिखती है." अंदर से तारा बड़ी खुस हो रही थी अर्जुन को ऐसे अपनी और आकर्षित देख. उसने एक छोटे बैग से फिर एक थोड़ी बड़ी तुबे

निकाल कर कोई क्रीम निकली और बिस्टेर के किनारे पाँव लटका के उनपे वो क्रीम हलके हाथों से लगाने लगी. उस बनियान जैसी टीशर्ट से उसके उबार दूर तक नुमाया हो रहे थे. ये नजारा देख कर अर्जुन अपने कमरे की और चल दिए.

"तुम कहा चले गए अब.?" तारा ने उसके जाने पर आवाज दी और रिमोट से ऐरकण्डीशनर चालू कर दिए.

"कुछ नहीं वो कपडे बदल लू जरा फिर सोना भी है." अर्जुन ने दरवाजा लगते हुए प्रतिकिरिया में जवाब दिए.

"सोना? तुम्हे यहाँ मेरे साथ सोना है क्योंकि आज कोई नहीं है मेरे पास यहाँ सोने वाला." अपने कमरे के दरवाजे ाचे से बंद करती उसने अर्जुन को चेताया. अंदर बंद

कमरे में अपने रात का पजामा अर्जुन कुछ सोच रहा था. फिर ऊपर एक बनियान पहन कर अपनी चद्दर उठा वो तारा के बिस्टेर पर आ गया. मशीन का तापन 25 पे देख

कुछ राहत हुई चलो आज तोह सर्दी नहीं की हुई. तारा एक पाँव सीधा कर दूसरा घुटना ऊपर को किये अपने नाख़ून पर रूई फिर रही थी.

"अब रात में ये सब क्या कर रही हो?" उसके लम्बे नाख़ून पतली उंगलिओ पर जाँच रहे थे.

"Nail-polish उतार रही हु. बस हो गया ये भी. देखो मेरे हाथ." रूई को बिस्टेर की एक तरफ नीचे फेंकते हुए अपना एक हाथ अर्जुन की तरफ बढ़ाया तोह उसने अपने

हाथ में वो पकड़ा. "नाजुक और नरम हाथ है तुम्हारे. और ये नाखून कितने बड़े बड़े है." तारा के हाथ बिलकुल हे नरम थे जैसे उसने ज़िन्दगी में कोई काम हे न

किआ हो इनसे. और लम्बी पतली उंगलिअ मॉम की तरह चिकनी.

"लड़कीओ के हाथ तोह ऐसे हे होते है और ये देखो तुम्हारे हाथ. कितने भारी, बड़े और थोड़े सख्त से है." अपने हाथ में तारा उसका हाथ पकड़ कर देखती बोली.

"है वो कसरत और बॉक्सिंग की वजह से इनपर थोड़ा फरक तोह होगा हे. लेकिन मुझे तोह ऐसा लगता है जैसे तुमने आज तक शायद हे रसोईघर में काम किआ हो." अर्जुन

बिस्टेर के सिरहाने तक लगाए तारा की मुँह तरफ करते बोल रहा था. उसकी जुल्फे एक कपडे के रबर में बंधी थी और कुछ लातें बहार को निकली कानो के पास से होती

तारा की सुराहीदार गर्दन से छु रही थी. कंधे की थोड़ी उघड़ी हुई दोनों हड्डियां (कालर बोनस) बता रही थी की बदन बिलकुल तराशा हुआ है. नीचे को उठे 2

हिमालय की चोटियां सर उठाये थी और कमर का भाग बिलकुल पतला जैसे दोनों हाथों की गिरफ्त में आ सके.

"ऐसे क्या देख रहे हो? और मई काम करती हु लेकिन अपने शरीर का नारीत्व बरकरार रखते हुए. हर चीज को बराबर महत्व देना मेरी आदत है." उसके चेहरे पर

बातें करते हुए लाली चा गई थी और अर्जुन भी थोड़ा शर्मा गया था ये देख कर की तारा ने उसको घूरते हुए देख लिए था.

"वैसे तुम सुन्दर हो और खुद को ाचे से संभाले हुए भी हो. मई तोह ये जुल्फें देख रहा था. ाची लग रही है जैसे तुमने इन्हे बंधा हुआ है और कुछ पहर को

निकली हुई है." उसने हलके से तारा क कान के साथ लगती एक घूमी हुई लत्त को पकड़ते कहा. इस हलकी सी चुहान से तारा का rom-rom सिहर गया था. उधर अर्जुन उन

रेशमी बालो से फिसलती उंगलिओं के साथ जैसे उसके दिल में और गहरा जा रहा था जैसे. अगले हे पल उसकी उँगलियाँ तारा की उस बारीक टीशर्ट की पट्टी पर राखी थी.

"तुमने कहा तभी मुझे एहसास हुआ के मई शायद एक लड़की हु जो दिल में फीलिंग्स भी लिए है." किसी मदहोशी के आलम में तारा ने अपने सर एक तरफ झुकाते हुए अपने

गाल उसकी उँगलियों के ऊपर रख दिए. इतने नरम और मुलायम गाल कमरे की हलकी ठंडक के बावजूद गरम हो रहे थे. अर्जुन महसूस कर रहा था के तारा उसकी और

झुक रही है. उसको ये नहीं पता था के तारा तोह उसको पहली बार देखते हे उसकी चाहत में गिर चुकी थी.

"मैंने कुछ भी अलग नहीं कहा तारा. सिर्फ वही कहा जो मैं देख सकता हु और शायद हरेक इंसान जिसकी आँखें ठीक है वो भी यही कहेगा."

"अर्जुन बड़ी लाइट बंद कर दो. हम लेत कर बातें करते है न." तारा अब शायद उसकी नजरो से हे घायल हुए जा रही थी. जब सहना मुश्किल हुआ तोह उसको अँधेरे

के रूप में आस दिखी. जहा शायद वो अपने भाव थोड़े छुपा सके और खुलकर बात भी कर सके. अर्जुन ने पास में लगे बिजली के खटके को दबाया तोह अब कमरे में

अँधेरा था और ऐरकण्डीशनर की छोटी सी हरी बत्ती हे अलग चमक रही थी.

"अब ठीक है?" अर्जुन ने इतना कहा तोह तारा ने एक बड़ी चद्दर दोनों के ऊपर करते हुए बस सीने तक ौधा ली.

"है ऐसे ज्यादा ठीक है और अब हम आराम से बात कर सकते है." इतना बोलकर वो अर्जुन की तरफ खिसक आई. उसकी ब्याह को अँधेरे में टटोल कर अपना सर उसपे रख लिए.

अर्जुन की ये बाजू तकिये पर थी और अब उसपे तारा का सर टिका था. उसके शरीर से कोई 8-10 इंच दूर.

"तुम फिर अकेले रहती थी तोह कैसे सो पाती थी?" अर्जुन ने अपना हाथ ऐसे हे तारा की कमर की हड्डी पर टिका लिए था.

"मज़बूरी थी और फिर मुझे कोई स्पर्श करे ये पसंद नहीं. बस 2 तकिये रख लेती थी अपने हाथ के नीचे जहा अभी तुम हो." अपनी एक ब्याह तारा ने अर्जुन पर रखते

कहा. एक तरह से दोनों हे साथ में किसी प्रेमी जोड़े की तरह थे अभी. बस शरीर कुछ दुरी पर थे.

"लेकिन यहाँ तोह मेरा शरीर है और ये तुम्हे स्पर्श भी कर रहा है?" थोड़ी मस्ती में अर्जुन ने ये बात कही तोह तारा उसके बिलकुल साथ लगती थोड़ा मुँह ऊपर करती बोली

"मैंने कहा न किसी का स्पर्श. ये तोह नहीं कहा के तुम्हारा हाथ रखना मुझे बुरा लगता है. और मैंने खुद हे तोह तुम्हे पास बुलाया तुम्हारी ब्याह पर अपना सर रखा.

ये मुझे पसंद है तोह फिर मई क्यों न करू?" उसकी आवाज और शरीर दोनों हलके से कांप रहे थे जिसको तारा सँभालने की कोश्शि करती जा रही थी. लेकिन कोशिश

पूरी ख़तम हो गई उसकी बात कहने के बाद हे. अर्जुन का हाथ जो कमर की हड्डी पर था अब वो तारा की नंगी कमर और पीठ पे आ चूका था. पतली नाजुक सी कमर

जहा रोया तक न था लेकिन इतनी नरम की अर्जुन को खुद का हे हाथ सख्त महसूस हुआ वह पर. और तारा अब उसके सीने और गर्दन में अपना सर दिए पूरी चिपक गई

थी. जैसे उसके अंदर हे घुसना चाहती हो.

"ऐसा क्या पसंद है तुम्हे तारा? मुझे तोह खुद में कुछ अलग नज़र नहीं आता. और फिर एक हे दिन में तुमने ये कैसे देख या महसूस कर लिए." जिस बाजू पर पहले वो

लेती थी अर्जुन ने उसको तारा के सर के पीछे हे मोड़ कर उसको अपने करीब हे कर लिए. जैसे की वो कही अलग न हो जाये. दोनों के हे दिल अब तेज धड़क कर एक दूसरे

के शरीर पर महसूस हो रहे थे.

"तुमने पुछा था न मई किसे पसंद करती हु और कहा थे के उसको बोल देना. तोह मई वही कर रही हु अर्जुन. वो तुम्ही हो जो मेरे अंतर्मन में बैठ चुके हो. मेरे दिल

में अब बस एक तुम हे हो. और ये कुछ ऐसा तोह नहीं की इस्पे कोई जोर हो? एक नज़र हे बहोत होती है किसी को अपना बनाने के लिए या फिर साड़ियां गुजार लो किसी के साथ

अनजान रहकर." किसी शायर सी अपनी बात ख़तम करती तारा ने अर्जुन के गले के नीचे अपने होंठो से एक प्यार भरा चुम्बन जड़ दिए. अर्जुन ने उसकी तरफ देखना चाहा

तोह निचे होते सर का एहसास पा कर तारा ने अपने वही भरे भरे होंठ उसके होंठो से मिला दिए. अभी तक न अर्जुन ने उसको कुछ कहा था और न हे वो समझ पाया के

ये सब इतनी जल्दी कैसे हो गया. लेकिन जिस शिद्दत से तारा ने ये चुम्बन किआ था वो देखकर हे अर्जुन ने अपनी मूक स्वीकृति दे दी थी इस अँधेरे में बने रिश्ते को.

"मई बदले में तुमसे सिर्फ इतना चाहती हु के तुम मुझे बस इतना प्यार दो जितना मेरे लिए काफी हो. हमारे परिवार को देखते हुए ये तोह नहीं कह सकती की ये रिश्ता एक

नाम ले पायेगा या हम इसको सबके सामने क़बूल कर सकते है. कुछ कतरे बहोत है मेरे वजूद के लिए." तारा अपने आप में हे खो गई थी और एक भावुकता उसके इस

रूप में नै चीज नजर आई अर्जुन को.

"तुम्हारे हर दुःख में मई तुम्हारे साथ हु लेकिन एक वादा नहीं कर पाउँगा की ज़िन्दगी भर मई तुम्हारा हाथ पकड़ पाऊंगा. वजह तुम खुद बता चुकी हो." कास के उसको

सीने से लगते हुए अर्जुन पहली बार तारा के प्रति सजग हुआ था. उसकी भावनाओ को महसूस कर प् रहा था. "अब हमे सोना चाहिए तारा. तुम्हे ठीक लगे तोह." अर्जुन

ने उसकी पीठ सहलाते हुए कहा.

"इस पल में जब हम दोनों हे साथ है तोह मई अभी इसको जीना चाहती हु. फिर सोना तोह है हे तुम्हारी बाहों में." अपने हाथो से उसकी छाती सहलाती तारा ने अर्जुन के

पैरो पर अपनी एक टांग रखते कहा. अर्जुन बिलकुल सीधा लेत गया तोह अब वो उसके ऊपर हे आ कर लेत गई थी.

"मुझे बिलकुल विश्वास नहीं हो रहा के तुम यहाँ मेरे साथ हो और मैंने अपना दिल का हाल तुम्हे कह दिए. ये तारा तुम्हारी है अर्जुन." अपनी भारी छातियां अर्जुन के सीने

पर धंसती वो अब उसका निचला होंठ पीने लगी थी. वो छोटी सी टीशर्ट जाने कब उसके स्तनों के जोड़ तक ऊपर आ गई थी. अर्जुन दोनों हाथ उसके कूल्हों से थोड़ा ऊपर रख

बस सेहला रहा था. तारा की जिस्म से उठती हुई ये खूबसूरत महक अब अर्जुन की साँसों और शरीर में rach-bas रही थी.

"अगर हम एक पड़ाव से आगे निकल गए तोह वापिस लौट न पायंगे तारा. और ये तुम्हारी ज़िन्दगी का सबसे बड़ा फैंसला हो सकता है." अपने ऊपर लेती तारा का चेहरा हलके

से ऊपर करते हुए अँधेरे में हे अर्जुन ने उसकी जगमगाती आँखों में देखते कहा. वो हरगिज़ नहीं चाहता था के तारा कोई बचपना कर बैठे जिसमे खुद वो भी शामिल हो.

"यहाँ लड़की मई हु और वैसे बातें तुम कर रहे हो? मैंने लड़की हो कर खुद इज़हार किआ और तुम्हे किश किआ. इस से ज्यादा भी सबूत चाहिए क्या?" आखिरी बात में एक

अदा सी थी तारा की. जैसे हे वो आगे की तरफ सर्कि तोह उसका ध्यान गया अर्जुन के सबसे ख़ास भाग पर. तारा की जांघो के बीच में लंबवत्त पड़े हुए मोठे डंडे

पर. जो ठीक उसकी छूट के ऊपर से उसकी नाभि तक आया हुआ था. आगे होने से अर्जुन के हाथ जो कमर और कूल्हों के पास थे अब वो उस इलास्टिक वाली निक्कर के अंदर

दोनों रबर जैसे फुल्ले हुए गुदाज कूल्हों पर आ गए थे. एक पल के लिए उन्हें महसूस कर अर्जुन हैरान हो उठा. बेशक वो कपड़ो में ढके रहते थे या निक्कर को टाइट

देखा था उसने यहाँ से पिछले 2 दिनों में. लेकिन आज हाथ रखने पर पता चल रहा था के जैसे तारा ने इस भाग पर कड़ी म्हणत करके इन्हे ये बनावट और इतना गद्दे-

-दर बनाया है. पहली बार खुदसे तारा किसी मर्द के हाथ को अपने शरीर पर ाचे से महसूस करती आनंद ले रही थी.

"तुम्हारे हाथ कही गलत जगह तोह नहीं जा रहे?" हौले से तारा ने अर्जुन को चुभलाया तोह उसने अपने हाथो में वो दोनों गोल हिस्से हलके से दबाते हुए पहली बार

खुदसे तारा के दोनों होंठ मुँह में ले लिए. कूल्हे पर दबाव पड़ने से उस सूती कपडे के अंदर आजाद छूट के होंठो पर लुंड की गर्मी और सख्ती का असर भी हुआ.

मजे की लहर में तारा ने खुद अपनी कमर को नीचे दबाते हुए अपने दोनों पाँव बहार की तरफ से अर्जुन की जांघो पर कास दिए. कोई 30 सेकंड तक ाचे से उनका

मधुरस पीने के बाद अर्जुन ने होंठो को आजाद किआ तोह तारा की आँखें बंद हो चुकी थी. अर्जुन ने तारा को बिस्टेर की दूसरी तरफ पलट दिए और अब खुद उसके ऊपर

आ गया. पहले से फैली उसकी जांघो के बीच अब अर्जुन सीधा उसके ऊपर लेता था. "आँखें तोह खोलो न अपनी. इस अँधेरे में बस वही तोह दिख रही थी और उन्हें

भी तुमने मूँद लिए तारा." अर्जुन की इस बात पर तारा ने धीरे से आँखों को खोला तोह पाया के अब वह उसके मुँह के ऊपर था. मजे के दौर में उसको एहसास तक नहीं

हुआ के कब वह पलट कर इस और आ गई और अर्जुन अब उसके ऊपर था.

"अगर चाहो तोह हलकी रौशनी कर सकते हो. मई लेकिन अपनी आँखें नहीं खोलूंगी." तारा ने ये बात कही तोह अँधेरे में हे अर्जुन ने अपना सर न में हिलाया. तारा उसकी

daye-baye होती आँखों से समझ गई के वह भी बस अँधेरा हे चाहता है.

"यहाँ सिर्फ मुझ अकेले को हे ये प्यार नहीं करना तारा. तुम्हे बराबर का भागीदार रहना है. और शायद मुझ से अधिक हे. इस अँधेरे में भी हम एक दूसरे को देख सकते

है और सबसे बड़ी बात सबकुछ ज्यादा बेहतर महसूस कर सकते है तोह फिर और क्या देखना है?" अपने दोनों हाथो को उसकी निक्कर के सीरो पर रखते हुए अर्जुन तारा

के कानो की लौ को चूमने चुबलाने लगा. आज तारा के लिए हर एहसास नया था. बेशक उसको शारीरिक सम्बन्धो के बारे में पता था, वो पढ़ी लिखी लड़की थी. उसने

दिल्ली में अपनी सहेलियों के साथ कंप्यूटर पर chal-chitra देखे थे जो उसकी सहेलियों के आशिक़ उन्हें देते रहते थे. लेकिन सिर्फ एक हादसे के सिवा उसके साथ ऐसा कुछ

नहीं घटा था. वो हादसा जहा पीड़ादायक था उसके विपरीत आज जो हो रहा था वह उसके हर अंग को एक खुसी से महका रहा था. जब अर्जुन के दोनों हाथो ने उसकी निक्कर

को हल्का सा नीचे खींचा तोह तारा का ध्यान वर्तमान की स्थिति पर आया. कहने भर के लिए उसने बीच से अपनी निक्कर को पकड़ा लेकिन न हे उसको ऊपर किआ था और

न अर्जुन को मन हे किआ मुँह से. अर्जुन हल्का सा झुकता बैठ कर अपने मुँह को तारा की गर्दन से लाते हुए उसके बड़े उरोजों की घाटी तक आ गया. कमरे में चलता

ऐरकण्डीशनर अब कुछ असर करता नहीं लग रहा था. तारा के शरीर पर गर्मी से हलकी नमी आने लगी थी और अर्जुन ने अपनी जीभ उस घाटी में फिरते हुए इस नमकीन

स्वाद को चख लिए था.

"बस अभी पता लगा के तुम्हारे खुद के शरीर की गंध किसी भी मादक खुशबु से कही बढ़कर मदहोशी दे रही है." अर्जुन ने उस टीशर्ट के ऊपर से हे एक उभार के

ठीक बीच में अपना मुँह रखते हुए उस हिस्से को अंदर ले लिए.

"आह. ये कैसा जादू दिखने लगे हो तुम. मुझे समझ नहीं आ रहा के क्या हो रहा है." अपनी जांघो तक खींच चुकी निक्कर को छोड़ते हुए तारा ने अर्जुन का सर

वही दबा लिए. अर्जुन को अपनी जीभ पर उसके निप्पल का एक कड़ा एहसास हुआ तोह उसने बाकी सारा हिस्सा ढीला करते हुए सिर्फ उस मटर के दाने को होंठो में पकड़ लिए.

कपडे के बिना शायद वो मटर के दाने से भी कुछ छोटा हो. इधर तारा का जिस्म किसी नागिन की तरह उसके नीचे मचल रहा था. और कुछ न हुआ तोह वह अर्जुन की

बनियान को हे पकड़ कर फाड़ने की हद्द तक खींचने लगी थी.

"तुम्हे दर्द हो रहा है क्या तारा?" उसको मचलते और अपनी बनियान खींचते देख अर्जुन ने उसका चूचक मुँह से आज़ाद करते हुए पुछा तोह तारा का ये मजा एकदम बंद

हो गया. लगभग दर्द और हलके गुस्से से वो बोली, "वापिस करो. मैंने रुकने को नहीं कहा." अर्जुन अँधेरे में हे मुस्कुराता अपनी बनियान उतर कर उसकी टीशर्ट को ऊपर

उठता गले तक ले आया. दूसरे वाले इस बड़े उभर पर हे अनुमान से उसने अपना मुँह नंगे दूध पर लगाया तोह खुद उसको भी एक स्वर्गीय मजा मिला. जैसे मुँह में एक

मीठा रास भर गया हो. दोनों हाथो से उस बड़े उभार को दबाता वो प्यार से तारा के निप्पल को चुसकने लगा तोह तारा ने पहली दफा अपनी छूट में इतना गीलापन बनता

महसूस किआ जितना कभी कभी उसको खुद को सहलाने से भी नहीं हुआ था. वो अकेले में कभी अपनी छूट को सेहला लिए करती थी, इस यौवन की गर्मी से. लेकिन यहाँ छूट

पर तोह अभी हमला हुआ भी नहीं था. बस उसके सौन्दर्य कलश पर गरम तपते होंठ कारीगरी दिखा रहे थे. इस मजे से दोहरी होती तारा को ये भी होश न रहा के उसकी

निक्कर अब घुटनो से नीचे जा चुकी थी. अर्जुन का कड़ा और बड़ा लुंड उसके पाजामे के ऊपर से हे छूट की आग को इस हद्द तक भड़का रहा था के सहने की ताक़त ख़तम

होने चली थी. अर्जुन का बड़ा दिल कर रहा था इन नंगे गोल स्तनों को देखने का लेकिन वो दोनों हाथो में उन्हें समेटने की नाकाम कोशिश करता बस इस अँधेरे में एहसास

से हे खुश हो रहा था.

"एक दिन मई ये पूरा शरीर दिन के उजाले में देखना चाहता हु तारा. मेरे हाथो और शरीर के नीचे में इतना तोह महसूस कर सकता हु की ये नायाब है लेकिन इन्हे

आँखों से अपने दिल में भरना एक ख्वाहिश सी है. इन्तजार करूँगा उस दिन का जब दिन के उजाले में तुम मेरी गौड़ में आकर बैठो. कोई जल्दी नहीं और कोई बंदिश भी."

दूध के दोनों कलश दबाता वह उसकी गहरी नाभि में अपनी जीभ चलने लगा था. तारा बस उसकी इन बातों में भी प्यार हे देख रही थी और जैसे उसकी हर हरकत एक

अलग हे अनुभव दे रहा था वैसे हे एक सवाल भी तारा के दिल में आ गया था.

"तुमने ये सब पहले भी किआ है अर्जुन? मई नहीं jaan-na चाहती की किसके साथ और कहा. मेरे लिए ये मायने भी नहीं रखता क्योंकि अभी तुम मेरे साथ हो."

"है तारा ये मैंने पहले किआ है. तभी मई कोशिश कर रहा हु तुम्हे वो सुख देने की जो मुझे मिला था. लेकिन उस सीखने के वक़्त किये काम में और इस दिलो के मिलान में

बहोत फरक है. यहाँ हम दोनों दिल से है और वह मई सिर्फ शरीर से था और शायद किसी की वासना थी." अर्जुन का जवाब सुनते हे तारा को भी याद आ गया के ये

कितना ख़याल रख रहा है उसका. कोई जल्दबाजी नहीं कोई jor-jabardasti नहीं, सिर्फ उसके हर अंग को एक मजे में भर रहा है. तारा ने अर्जुन का पजामा ढीला करना चाहा. तोह एक पल के लिए रुक कर अर्जुन ने खुद हे वो नीचे गिरा दिए. अपनी कमर को पीछे रखते हुए उसने अपना सर तारा की जांघो की संधि पर झुका लिए.

"रतिक्रिया में सबसे महत्वपूर्ण अंग है योनि. स्तनों का मर्दन करने से हे इनमे मधुरस का संचार होता है. फिर जभी नाभि को चूमा जाये तोह एक तीव्र लहर

स्त्री की योनि तक जा कर उसके भगोष्ठ को मिलान के लिए तैयार करती है. अंत में यही क्रिया योनिमुख पर की जाए तोह नारी को अपने परमसुख से पहले हे आनंद

आ जाता है." किताब में पढ़ी ये बात अर्जुन अब आजमाने लगा था. नीचे से दोनों कूल्हों को हथेलिए से ऊपर करता वह बिना झिझक और घृणा के तारा की छूट पर

अपने लैब जमाये उसकी खटास को चख रहा था.

"आह. ये गन्दी जगह है अर्जुन." तारा इतना बोल तोह गई लेकिन उसको भी ध्यान था के एक चलचित्र में लड़का कैसे लड़की की छूट में जीभ घुसाए चाट रहा था. इतना

याद किआ था की यहाँ अर्जुन की गीली जीभ भी उसके छूट की दरार में आगे पीछे होने लगी थी. वो 7-8 बार ऐसा करने के बाद उसके छेड़ को अपनी छूट की जीभ से

कुरेदने लगा था. अब उसके हाथ कूल्हों की दरार फैलते हुए उनका मर्दन कर रहे थे.

"आह.. अपना मुँह हटा मेरा होने लगा है." तारा बोल रही थी उसको सर हटाने के लिए लेकिन खुद हे सर को छूट पर दबाये थी. एक कटरा बिना जाया किये अर्जुन ने इस

खट्टे और हलके तीखी गांड के रास को अपने अंदर समेत लिए था. तारा लगभग मूर्छित सी मुँह पर तकिया रखे पड़ी थी.

"ये मेरा खुद का पहला अनुभव था. और मेरी रतिशास्त्र के ज्ञान के हिसाब से तुम 'पद्मिनी' हो. बड़ी कमल के सामान आँखे, पतीली गर्दन, ये सम्पूर्ण सतांन, पतली

नरम और गहरी कमर, ठीक उसके नीचे कमल के बंद होते पुष्प जैसी महकती योनि और भारी नितम्भ. और योनि का स्वाद बिलकुल naam-matra गंध लेकिन एकसार स्वाद

का है." अर्जुन द्वारा एक इतिहासिक कामशास्त्र और अपने शरीर का वर्णन सुनकर तारा थोड़ा उचक गई.

"मतलब तुमने ये सब एक किताब से सीखा?" अर्जुन उसकी बात सुनकर मुस्कुराता हुआ तारा को सीधा कर उसपे लेत सा गया. "तुम सच में हे किसी अप्सरा सी हो. और मैंने जो

बात उसमे पढ़ी थी वो ये थी की प्यार करते समय कुछ बुरा या गन्दा नहीं होता क्योंकि ये सिर्फ शरीर का मिलान भर नहीं एक दूसरे के प्रति समर्पण भी है." छूट

पर दस्तक देते उस विकराल लुंड का हल्का होंठ के अंदर आता स्पर्श अब तारा को जाँघे फ़ैलाने पर मजबूर कर रहा था. "मई भी चाहती हु के अब तुम भी मेरे प्यार

का अनुभव करो अर्जुन." उसको अपनी छाती से चपकाती तारा ने अपने से छोटे अर्जुन को जिस तरह से उसके शरीर को सुख देते देखा था वो खुद अब तैयार हो गई थी वही

सब उसके साथ दोहराने के लिए.

"बस लेत जाओ." अर्जुन को सीधा लिटा कर उसके ऊपर झुकती तारा के बड़े दूध नंगी छाती पर लगने से अर्जुन के शरीर में भी तड़प उठने लगी थी. तारा ने हलके

दबाव से उसको हाथो को रोक कर गर्दन पर अपने दांत हलके गाड़ते हुए बेतहाशा उसको चूमना शुरू किआ तोह फिर वो उसकी छाती पर छोटे निप्पल पर आ रुकी. लुंड

फूल कर लोहा हो चूका था. बिंदी सामान निप्पल अब तीखे हो चुके तोह तारा ने नीचे सरकते हुए पहली बार अर्जुन के गरम लोहे को अपने हाथो में लिए. बिना किसी दर

के उसको दबती वह अर्जुन के पेट और जांघो को चूम रही थी. यहाँ अर्जुन किसी और दुनिया में उड़ने लगा पैसा पलटने के बाद. अपना हाथ उस विशाल लुंड पर निचे से ऊपर फिरते हुए तारा कुछ मिनट पहली वाली लड़की से बिलकुल अलग और अपने आपको आधुनिक प्रेमिका दर्शाती दिख रही थी.

"ये मोटा है. मई पहली बार कोशिश कर रही हु. बस सही या गलत तुम समझा देना." एक बार इतना बोलने के बाद उसने अपने होंठ अर्जुन के सुपडे पर फिरते हुए उसको

गीला कर दिए. 5-6 बार यही उपक्रम करने के बाद तारा ने पूरा मुँह खोल कर जैसे हे सुपडे को मुँह में लिए तोह वो पूरा भर सा गया था. यहाँ अर्जुन इस गरम और

गीले मुँह के एहसास से हे मारा जा रहा था.

"शठ... तराहा." उसके दूध को सख्ती से दबाता वो बस नाम ले पाया. अपनड़े दूध पर इतनी सख्ती तारा से बर्दाश्त न हुई लेकिन इसमें भी एक तरह का सुख देखती वो

लुंड पर और झुक गई. आँखों से पानी चालक आया तोह सांस लेने के लिए लुंड को बहार निकल दिए.

"मत करो. ये मुश्किल है तुम फिर कभी कोशिश कर लेना." अर्जुन बैठ कर उसको गले लगता बोलै. दोनों के नंगे जिस्म अब एक सुखद एहसास दे रहे थे. प्रेम, काम,

समर्पण और परवाह का पूरा भाव था उनमे.

"तुम तैयार हो?" अर्जुन के प्रश्न से तारा ने उसके होंठ चूम कर हे जवाब दिए. उसको बिस्टेर पर लिटा कर अर्जुन ने टाँगे फैलते हुए एक बार फिर छूट को ाचे से

मुँह में भरा और फिर जांघो के बीच बैठ गया. न कोई तेल, न कोई और तरल छूट और लुंड को चिकना करने के लिए. बस जितना छूट का पानी और उसपे अर्जुन का

थूक लगा था वही चिकनाई थी. अपने सुपडे को छूट पर ध्यान से फिरते हुए उसको स्त्री के yoni-patal और उसके खुलने से निकलने वाले खून की याद आ गई. लेकिन

इस पल में वह अलग नै होना चाहता था. कुछ सोचते हुए अर्जुन ने तकिया उठाकर तारा के कूल्हों के नीचे रख दिए. एक बार फिर वह पुराणी अवस्था में था. छूट ाचे

से गीली हो कर बता रही थी की वो तैयार है और तारा आने वाले पल को जानकार अपने मुँह चादर किये सावधान थी.

"पछ" की एक आवाज से लिंगमुण्ड पहले अवरोध को तोड़ता हुआ छूट के किनारे फैलता अंदर घुस गया था और तारा इस ेशःनिया दर्द की वजह से गर्दन पटकने लगी थी.

"शांत हो जाओ तारा. ये दर्द जरुरी है क्योंकि ये एक बार हे होगा लेकिन तुम्हे याद रहेगा जीवन भर." समझदार व्यक्ति की तरह बात करते हुए अर्जुन बस उतना हे

डालकर तारा के गाल को सहलाने लगा. कुछ पल बाद तारा की हलकी दर्दभरी आवाज उसके कानो में पड़ी.

"मुझे पता है. और ये भी की तुम्हारा परता एब्नार्मल है आम लड़को से लेकिन दर्द तोह होगा. तुम एक बार में कर दो." फिर से चादर मुँह में दाल वह अगले दर्द की

प्रतीक्षा करने लगी. छूट से खून की पतली धार बस हलकी सी बहार को निकली थी जो अँधेरे की वजह से दिखाई नहीं पड़ी. अर्जुन ने संयंम रखते हुए दोनों उरोजों

का मर्दन जारी रखा. उनके निप्पल ाचे से दबाते हुए वह दर्द काम करने की कोशिश में था. कोई 3 से 4 मिनट बाद फिर से उसने शरीर को सावधान करते हुए कास के

तारा की जांघो को पकड़ा और एक तीव्र धक्का जड़ दिए. "आआह्ह्ह्हह मई मर्डर गई माँ.." ना चाहते हुए भी ये आवाज मुँह के किनारो से निकल गई. लुंड 5 इंच छूट को

फैला कर रुक गया था. छूट इतनी ज्यादा तंग थी की जैसे लुंड सांस भी लेना भूल गया हो. अर्जुन को भी इस जकड़न की वजह से दर्द हो रहा था. पुराण क्रम दोहराते

हुए वह फिर से तारा का दर्द ख़तम करने की कोशिश में लग गया. इस बार उँगलियों की जगह वह मुँह से उसका स्तनपान कर रहा था और उसके पूरे ऊपरी भाग को चूम

रहा था. इस से ज्यादा लुंड अंदर करना अब उसको गवारा नहीं था.

"आह अर्जुन ये दर्द..." तारा की बात ख़तम करते हुए उसने अब होंठो को मुँह में लेते हुए कोमल दीदी वाला अनुभव प्रयोग किआ. 2-3 इंच तक जोर से लुंड को बहार निकल कर

प्यार से अंदर करने की कोशिस. ये 2 मिनट इतने लम्बे लग रहे थे दोनों को जिसमे कोई 15-16 हे धीमे धक्के लगा पाया था छूट की असाधारण खिंचाव की वजह से.

"थोड़ा हिम्मत से तारा. मैंने कहा भी था के तुम तैयार नहीं हो शायद." अर्जुन अब पहले से बेहतर गति से अपने लुंड को छूट में तेल रहा था. और प्राकृतिक रास भी

अब इस घर्षण में सहायता करता दिखने लगा. दोनों बड़े दूध वह मुट्ठी से मसलता अब सुपडे तक लुंड खींच कर अंदर करने लगा था. पहली बार उसके शरीर में

कम्पन्न महसूस हुई थी. सिर्फ छूट के इतना ज्यादा टाइट होने की वजह से शायद.

"अभी दर्द काम है लेकिन मुझे कुछ हो रहा है अर्जुन." मजे की अधिकता अब तारा पर दर्द से ज्यादा हो गई थी. शायद ये उसके सही शरीर और kaam-sukh के लिए तड़प

हे थी. कमर हर धक्के के साथ उठने लगी और इधर अर्जुन का लुंड भी अब बहरा हो चूका था. पूरा पांच इंच लुंड का हिस्सा अब निरंतर अंदर बहार हो रहा था.

और कमरे में दोनों की आनंद और मजे की सीत्कार गूंजने लगी तोह तारा ने उसको अपने ऊपर गिरा लिए. दांत गले और गाल पर चलती वह सब भूल चुकी थी और यही

हाल उसकी छूट का हो रहा था. उसका चरमसुख ख़तम होने का नाम नहीं लेता दिख रहा था और लुंड उतनी हे गहराई में पहली बार फिसलता महसूस हुआ अर्जुन को.

जब ज्वालामुखी पूरा फटने को तैयार हो गया तोह होश में आते हुए अर्जुन ने लुंड छूट के बाहर के होंठो पर रगड़ना शुरू कर दिए. पेट की सार नादिया जैसे

इकट्ठी हो चुकी थी और फिर जैसे लावा निकलता है वैसे हे उसका वीर्य अँधेरे में हे तारा के ऊपर हे बरसने सा लगा था. कोई 10 मिनट बाद तारा की बगल में लुढ़के

अर्जुन को उसकी आवाज सुनाई पड़ी.

"आँखें बंद रखना प्लीज. मई बाथरूम से आती हु." तारा अपनी जगा से उठ तोह गई लेकिन बाथरूम तक के 10 कदम जैसे उसको अंगारो पर चलने के सामान दिखे.

एक बार फिरसे 10-15 मिनट बाद अर्जुन को तारा की आवाज सुनाई दी. "मुझे यहाँ से बीएड तक ले चलो." वो लाइट बंद करके बाथरूम के दरवाजे पर हे सहारा ले कड़ी हो

गई थी. अर्जुन एक पल में उसके पास था. बाहों में भरके वो प्यार से उसको उठाये बिस्टेर पर ले आया. "तुम आराम करो. मई सुबह जल्दी उठ कर सब ठीक कर दूंगा." इतना

कह कर उसने दोनों के ऊपर चादर ले ली और बाहों में ाचे से भरते हुए लेत गया. "सही किआ जो पूरा नहीं डाला था. ये नहीं झेल पाती" ये बात खुद से करता वो

भी थकान के मारे सो गया था. आज पहली बार वह समय से पहले झाड़ा था. शायद तारा के मुखमैथुन की वजह से या उसकी छूट की सख्त गिरफ्त.
 
अपडेट 36

आफत से शराफत


कुनमुनाते हुए तारा की जंघे जब अर्जुन के लुंड से हल्का सा रगड़ गई तोह नींद में हे उसकी सिसकी निकल गई लेकिन अर्जुन की नींद उचट गई थी. कुछ 2 मिनट तक बिस्टेर

पर संयतत होने के बाद वो उठने लगा तोह तारा के थोड़े ढीले पद चुके गुब्बारे उसकी छाती से रगड़ते गया. 'आह.. ये फिर निमंत्रण दे रहे है." खुद से कहता

अर्जुन चपलता से बिस्टेर से निकला और एक उभर को सहलाने के बाद बाथरूम की और चल दिए. लुंड में पेशाब की वजह से तनाव आ गया था. हल्का होने के बाद उसने

अपने चेहरे को दर्पण में देखा तोह गाल और गर्दन पर मामूली से तारा के दांतो के निशाँ पड़ गए थे. मुस्कुराते हुए अपना चेहरा ठन्डे पानी से धोने के बाद

वो बाथरूम की लाइट जलती छोड़ कर अब तारा के तरफ बढ़ा. कमरे में हल्का सा उजाला बहोत था उसको तारा की स्तिथि समझने के लिए.

"बड़े पपीते से स्तन जो आपस में सटे हुए बिस्टेर पर लुढ़के थे. आकर बड़ा जानलेवा था उनका और ज्यादा उजाला न होने से बस निप्पल और उनके पास के कठैई चक्र

का एहसास भर हो रहा था. कमर तोह naam-matra थी उसकी लेकिन फिर आकर्षक बहार की तरफ उभार लिए कूल्हे जिनके नीचे तराशी हुई जाएंगे बता रही थी की

शरीर नरम और लचकदार है. छूट घुटने मुड़ने की वजह से चुप्प रही थी. अपने हाथ की मदद से बड़े प्यार से अर्जुन ने जांघो को सीधा किआ तोह गौर से देखने

लगा तारा के kati-pradesh को. जहा अभी तक उसने जितनी छूट देखि थी सब थोड़ा ऊपर को और बहार की तरफ लम्बा चीरा लिए थी लेकिन यहाँ तोह कुछ अलग सा था.

तारा की छूट का अदिकतर भाग जांघो के बीच में अंदर की और था साथ हे लकीर की जगह बिलकुल बीच में एक बारीक सी चोंच बहार को उभरी हुई थी. रात को शायद

उसने खुद हे ाचे से सफाई कर ली थी क्योंकि वह खून के कोई निशाँ न थे लेकिन हालत बता रही थी की ये अभी ठीक नहीं थी.

"Tara-Tara.. उठो एक बार फिर सो जाना." 15 मिनट बाद अर्जुन अब अपने दौड़ लगाने वाले कपड़ो में था और अब एक हाथ में पानी की बोतल और 2 गोलियां थी. कुछ सोच कर

उसने तकिये के दोनों हे उचाड़ उतार कर वापिस बिस्टेर पर वैसे हे जहा के तहा रख दिए थे. उसकी आवाज से बड़ी हे धीमे धीमे तारा ने अपनी आखें खोली तोह अर्जुन

को सामने बैठा पाया.

"सोने दो न प्लीज. अभी नींद आ रही है और थोड़ा दर्द भी है." वो अर्जुन के पत् पर हाथ रखते सोने की वापिस कोशिश करने लगी तोह अर्जुन ने हलके से उसका चेहरा

ऊपर किआ. "तारा. सो जाना और जब तक दिल करे सोती रहना. बस एक बार 2 मिनट के लिए उठो क्योंकि ये जरुरी है. नहीं तोह हम दोनों हे फंस जायेंगे." अर्जुन की आवाज में

उसके लिए प्यार और चिंता थी जो अलसाई तारा ने भी सुन ली थी.

"ाचा बताओ क्या करू? बिस्टेर से खड़े होने के लिए मत कहना." अर्जुन उसकी बात से मुस्कुराता बोलै, "बस ये दवा ले लो और फिर जैसे मई कहु वैसे सो जाना." तारा ने

हिम्मत करते हुए अपनी पीठ को थोड़ा ऊपर किआ और फिर गोली की तरफ देखते हुए अर्जुन को भी देखा. "ले लो. इस से तुम बेहतर महसूस करोगी." बिना कुछ आगे कहे तारा

ने दोनों गोलियां एक साथ मुँह में राखी और फिर अजीब सा चेहरा बनती बोतल को घूँट लगा एक सांस में हे ाचा खासा पानी हलक से नीचे उतार लिए.

"कोई और हुकुम मेरे मालिक?" तारा की बात पर हँसते हुए अर्जुन ने जमीन पर राखी एक और प्लास्टिक की बोतल को उठाते हुए उसकी और बढ़ा दिए. "इसको अपनी टैंगो के बीच

रख लो. अजीब लगेगा लेकिन रहत भी मिलेगी. दिन में सबके सामने चलने में दिक्कत महसूस नहीं करोगी ज्यादा नहीं तोह चाल देख कर हे सवाल उठने लगेंगे." ये एक

गरम पानी की बोतल थी जिसको फिर खुद हे तारा की जांघो के बीच टिकते हुए अर्जुन ने ढक्कन की तरफ तकिया निचे रख दिए. हलकी सी सिसकारी ये बता गई थी की

छूट में ाचा खासा दर्द था. एक बार प्यार से गालो को चूम कर अर्जुन ने वापिस उसके शरीर को चादर से धक् दिए और कमरे में सभी तरफ एक चौकन्नी नजर फिरने

के बाद दरवाजे के दोनों पल्ले बंद कर बहार निकल लिए. अभी समय कोई 4 बजने को था और बहार बस सड़क के किनारे जलती रौशनी हे रास्ता बता रही थी. नए सेक्टर

की तरफ दौड़ते हुए अर्जुन अब अपना ध्यान रात की घटना से हटा कर बस अपने शरीर पर लगाए था. एक हफ्ते के बॉक्सिंग के अभ्यास और गयम की वजह से उसकी पिण्डलिया

कसने लगी थी और उसको अपने कंधे पहले से काफी स्थिर और मजबूत होने लगे थे. ऐसे हे दौड़ते हुए वो आज पहले से काफी आगे आ गया था जहा तक वह कभी नहीं

आया था. नया सेक्टर जहा ख़तम होता था वह ये एक सरकारी जंगल सा था. सड़क के किनारे हे एक पेड़ का कटा हुआ तना जिसकी जड़े अभी जमीन में हे थी, अर्जुन उस पर

बैठ गया. ये जगह इतनी शांत और ठंडक से भरी थी की अर्जुन वही बैठा अपने ध्यान में लग गया.

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रात के उस पहर जब सब सो रहे थे तोह कोई और भी घर में जगा हुआ था. कमरे से बहार आने के बाद ये लड़की बाथरूम से निवृत हो छत्त की तरफ चल दी थी. शायद नींद का अभाव था आँखों में दूसरी मंजिल से होकर वो ऊपर चली गई और खुली छत्त पर टहलते हुए अपनी हे सोच में गम थी. रात गहराने लगी तोह वो भी

सीढ़ियां उतरती नीचे आने लगी. पाँव नंगे थे तोह कोई आवाज भी वातावरण में नहीं हुई. इस शान्ति में एक दबी चीख की आवाज से लड़की के पेअर वही दूसरी मंजिल

पर बने कमरे के दरवाजे के बहार हे जम्म गए. सांस रोके वो फिर से ध्यान पूर्वक समझने के कोशिश करने लगी. आवाज ऐसी थी जैसे कोई दर्द में हो. फिर कानो

में हलकी आवाज आई जैसे कोई हलके से समझा रहा हो. हलकी सिसकियों की आवाजों के बाद इस लड़की के कान खड़े हो गए जब सुना "तारा हिम्मत रखो अब और दर्द नहीं दूंगा." इतना सुनते हे उसके मैं में सिर्फ 2 हे बातें घूम गई "ये तारा और अर्जुन है. और ये दोनों हे शायद वो कर रहे है नहीं करना चाहिए." इतना सोचते हुए उसकी

तन्द्रा फिर से भांग हुई जब ये सिसकियाँ थोड़े ऊँचे स्वर में होने लगी. जाहिर सी बात थी की 2 दरवाजे और सावधानी बरतने के कारण ये शोर नीचे तोह दूर की बात

सीढ़ियों तक भी नहीं सुनी जा सकती थी. लेकिन तारा के ये मजे के स्वर बहार कड़ी इस लड़की पर गहरा असर कर रहे थे. कोई साथ खड़ा होता तोह दिल धड़कन सुन सकता था जो अब इतनी बढ़ गई थी की उसका संभालना दूभर हो गया था. 20-25 मिनट बाद जब ये आवाज अब बिलकुल हे बंद हो गई तोह होश में ाइट ये लड़की सीधा

नीचे निकल चली. एक कमरे में घुसती बस वो धम्म से बिस्टेर पर जा पड़ी जहा दूसरी लड़की पहले से सोइ हुई थी.

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कोई 5 बजे अर्जुन ध्यान मुद्रा से बहार आते अब हर तरफ गहराई से देख रहा था. आकाश हल्का नीला और सफ़ेद होने लगा था तोह ये जगह पूरी नजर आने लगी थी.

घने वृक्ष शायद कुछ किलोमीटर तक आगे थे बस बीच बीच में से उनके हलकी रौशनी बता रही थी की वह जगह खाली है. एक तालाब सा ठीक जहा ये जंगल शुरू

होने लगता था वह पर. बड़ा मनोरम सा दृश्य था ये जिसको अर्जुन हैरत से देखने में लगा था. यहाँ तक जिस सड़क पर वो दौड़ता आया था वो भी अब सलेटी और थोड़ी

मिटटी वाली हो चुकी थी. "ये तोह जैसी मई शहर से हे बहार एक जंगल में आ गया हु. घर के इतनी पास ऐसी शांत और हरियाली से भरी जगह." वो खुद से कहता हुआ

बबूल की एक पतीली टहनी को टॉड कर ऐसे हे कपड़ो से साफ़ कर मुँह में चबाता वापिस घर की तरफ चलने लगा. कुछ दूर चलने पर हे नए सेक्टर की शुरुवात होती

नजर आई जहा साइकिल पर दूध के कनस्तर डाले एक आदमी पैदल चल रहा था.

"Ram-Ram बीटा." वेशभूषा से देहाती दीखता ये 45-50 साल का आदमी अर्जुन से मुखातिब हुआ.

"राम राम अंकल जी. इतनी सुबह सुबह आप इस वीरान जगह." अर्जुन को उस आदमी का अभिवादन साफ़ और स्नेह से भरा दिखा तोह उसने भी इज़्ज़त से उनका जवाब दिए. एक खुल्ला

सफ़ेद पजामा और मिटटी से हल्का रंग का सूती कुरता पहने वह बड़ी सधी हुई चाल से साइकिल को एक हाथ से हे लेके चल रहा था.

"वो बीटा अब यही हमारा गाँव है न. तोह भैंस का दूध निकल शहर में पहुँचाने जा रहा हु." इस सीढ़ी सड़क पर एक और सड़क बीच से गुजर रही थी जहा उस

आदमी ने इशारा किआ अपने गाँव की दिशा में.

"आप रोज इतनी सुबह दूध निकाल के यहाँ देने आते है?" अर्जुन ने हैरत से साइकिल पर टंगे 2 बड़े लोहे की पट्टी वाले कनस्तर देखते कहा.

"बीटा शहर में तोह सावेर 5-6 बजे होती है लेकिन हमारे यहाँ पशु 4 बजे दूध देने लगते है तोह फिर तजा हे दूध लेकर हम पहुंचने आ जाते है. रोज का हे काम है. अभी 3 घंटे बाद तोह वापिस गाँव में पहुंच चुके होंगे." वो हँसते हुए हे जवाब दे रहा था.

"साइकिल पर इतना बोझ लिए हर रोज आप यहाँ अपने गाँव से आते हो? मतलब ये दोनों ड्रम भारी भी है ऊपर से ये साइकिल. गांव भी तोह कोई 3-4 कम होगा." अर्जुन पहली बार

किसी ऐसे इंसान से मिल रहा था तोह वो भी jaan-na चाहता था के इस सबकी वजह क्या है.

"बीटा 35 किलो दूध रोज मई यहाँ 2 कॉलोनी में सुबह पहुँचता हु. और 4 कोस की दुरी कोई ज्यादा थोड़ी न है. अभी साइकिल चलते आया था तोह थोड़ा पैदल चलने लगा

लेकिन 25 मिनट में तोह मई पहले घर में दूध दे हे देता हु रोज नियम से." ये आदमी रोज 8 कम आता है और 8 कम जाता है, साइकिल पर इतना बोझ लिए. वाह ऋ दुनिया

एक तरफ तोह लोग सुविधा के लिए कार, दुपहिया और जाने क्या क्या लेकर ऐश करते है दूसरी तरफ ये लोग भी है.

"अरे बीटा ज्यादा मत सोचो. हमारे घर में पशुधर और खेतीबाड़ी भी है. और फिर रोज का काम है अपना ये तोह. मेरा बीटा भी है तुम्हारी उम्र का एक लेकिन वह

अब शहर में अपनी मोटरसाइकिल से दूध डालने जाता है. उसका कॉलेज भी उधर हे है. ाचा तोह बीटा अब मई भी निकलता हु देखो कॉलोनी में आ हे गए." अर्जुन ने

बस उस आदमी को फुर्ती से पैदल मारते देखा जो अब रिहायशी इलाके में आ चुके थे. फिर बस मुस्कुराता हुआ वो तेज कदमो से घर की तरफ चल दिए.

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"आज ज्यादा हे देर नहीं कर दी घर आने में? मई तोह अलार्म लगा के उठी थी की तुझे समय से दूध तैयार करके दूंगी." गेट के अंदर आते हे ऋतू दीदी की आवाज ने

उसका स्वागत किआ. संजीव भैया भी बहार हे कार को धोने में लगे हुए थे.

"वो आज मई कुछ ज्यादा हे दूर निकल गया था दीदी. ये अगले सेक्टर से आगे की और जहा जंगल है उस तरफ. तोह आने में देरी हो गई थोड़ी." अर्जुन भैया को इशारे

से गुड मॉर्निंग करता ऋतू दीदी का हाथ पकड़ अंदर की तरफ चल दिए.

"क्या बताऊ दीदी कैसी जगह थी वो. इतनी सुन्दर और हसीं, गहरी शांति और हर तरफ हरियाली थी." चहकता हुआ सा वो छोटे बचे की तरह उनसे चिपकता अंदर

आया तोह ऋतू दीदी भी उसकी और हँसते देखती बोली, "तू न सचमुच अभी बचा हे है. और चल बैठ यहाँ मई दूध लेके आई." वो जाने लगी तोह अर्जुन ने उनके ढीले

शरीर को झटके में अपनी तरफ करते हुए कहा, "आपको लगता है मई बचा हु?" अपना चेहरा उनके पास करता वो बोलै तोह ऋतू दीदी वही जम्म सी गई और हँसते हुए अर्जुन

ने उन्हें छोड़ दिए.

"सुधर जा तू नहीं तोह तेरी खैर नहीं." रसोईघर में जाती ऋतू के चेहरे पे अब एक हंसी सी थी थोड़ी शर्म के साथ. अर्जुन ने तोह एक पल में हे शिकार कर लिए था.

दूध पीने के बाद वो टीशर्ट वही कुर्सी पे रखता बहार आ गया और जूते खोल के खुद गाडी को गीले कपडे से साफ़ करता पानी डालने लगा. संजीव भैया खुद एक

तरफ हो गए क्योंकि अर्जुन ने आते हे कपडा किसी चील के जैसा हड़प लिए था.

"तू बड़ा कब होगा रे? ये हरकते तेरी कभी बदलने वाली नहीं." वह मुस्कुराते से बोलने लगे तोह अर्जुन उन्हें आँख मारते हुए बोलै, "अभी छोटा होना हे ठीक है पता नहीं फिर क्या क्या हादसे होने लगे.." उसके सर पर चपत जमाते हुए वो अंदर चले गए पुराण अखबार लाने का बोलकर. कोई आधे घंटे बाद गाडी साफ़ हो चुकी थी और अर्जुन वही आँगन में फर्श पर बैठ कर हे नाहा रहा था. संजीव भैया अंदर बाथरूम में तैयार होने लगे थे. वो बहार भी आ गए तब भी अर्जुन एक बाल्टी को

पानी से भरता और दूसरी को अपने ऊपर उड़ेलता हे मिला. "बस कर अब. ये शायद तू भूल रहा है के नहाना था. तू तोह जैसे कसरत कर रहा है दोनों बाल्टी से." फिर

आखिरी बाल्टी ऊपर गिराने के बाद वाइपर से फर्श पोंछता अर्जुन बदन सूखने लगा. सामने वाले घर की तरफ नजर गई तोह एक लड़की या औरत laal-peele सूट में छत्त

पर से वापिस पलट कर जाती दिखी. मैं का वहां समझ वो टोलिया लपेट कर बहार की सीढ़ियों से हे ऊपर अपने कमरे में आ गया. तैयार हो कर अंदर की तरफ से हे निचे जाने लगा तोह एक नजर तारा पर भी दाल ली. उसके शरीर पर अब रात वाली जमुनी टीशर्ट और निक्कर थी. वापिस कंधे तक चद्दर दाल कर वो निचे चल दिए.

8 बजने वाले थे.

"जा प्रीती को बुला के ले आ नाश्ते के लिए. मैंने उसकी पसंद के परांठे बनाये है." प्रियंका दीदी की बात सुनकर अर्जुन हैरत से उन्हें देखने लगा. एक दिन में उनको

प्रीती की पसंद भी पता लग गई.

"ाचा जाता हु." बिना हे कुछ और कहे वो छोल साहब के घर चल दिए. इधर ऋतू दीदी प्रियंका दीदी को ताली मरती हंस दी.

"भैया अंदर आ जाओ आप, दीदी बोल रही है." पारवती की आवाज सुनकर अर्जुन गलियारे से होता हुआ घर के अंदर दाखिल हो गया. ड्राइंग रूम में प्रीती को न देख वो

सीधा उसके कमरे के अंदर दाखिल हो गया था, दरवाजे को धकेलते हुए. यहाँ प्रीती आईने के सामने कड़ी ब्रा के ऊपर एक पतली बनियान सी पहने कड़ी थी. अर्जुन

की नजर नीचे तोह गई नहीं और पारवती को उसने पिछले आँगन में जाते देख हे लिए था. उसने पीछे से हे प्रीती को बाहों में भर लिए. एक पल को तोह वो सकते में

हे आ गई फिर सामने अलमारी के सीहसे में अर्जुन को अपना सर उसके कंधे पर रखे देख मुस्कुराने लगी.

"इस लिए अंदर हे बुला लिए तुमने मुझे?" गर्दन पर अपने होंठ फिरते उसने ये कहा तोह मजे से आँखे बंद करती प्रीती ने कमर से उसको पीछे धकेलते कहा, "यहाँ

कमरे में नहीं बुलाया था. और ये सब तोह करने को बिलकुल नहीं कहा था." वो पलट ते हुए बोली तोह अर्जुन वापिस उसको गले लगते बोलै, "तोह क्या बात हो गई. मेरा घर

और मेरी तुम. मई किसी से परमिशन थोड़ी न लूंगा." बात तोह प्यार से कही थी लेकिन जैसे हे उसके हाथ कमर से निचे सरके तोह दोनों का ध्यान इस बात पर गया

की प्रीती सिर्फ एक लास वाली कच्ची में थी और उसके नंगे कूल्हों पर अर्जुन के दोनों हाथ जमे थे. प्रीती अपने इस शरीर का ज्ञान लेते हे जोर से अर्जुन से चिपक गई.

"तुम कभी कुछ देख कर नहीं कर सकते? मैंने कपडे पूरे भी नहीं पहने हुए." वो हलके से अर्जुन के कान के पास बोली तोह अर्जुन ने दोनों नितम्भ पर थोड़ा नरमी से

हाथ फिरते कहा, "तुम देखने नहीं दे रही. देखो खुद हे चिपकी हुई हो. फिर कैसे देख कर करू.?" उसकी चुहल से कही बात सुनकर प्रीती रूठने जैसे शकल

बनती हुई कहने लगी, "बस करो न. घर में पारवती भी है और दरवाजा खुल्ला. Ritu-Alka दीदी भी आ सकती है. प्लीज आँखें बंद करके बहार जाओ मई 2 मिनट में

आ जाउंगी." प्रीती के होंठो पर प्यार से एक किश करते हुए अर्जुन बहार निकल आया और एक पल तक प्रीती उस चुम्बन को महसूस सा करती फिर शर्मा कर बिस्टेर से

सूती पजामी उठा कर पहन ने लगी. पूरे 5 मिनट बाद वह शर्माती से बाहर आई और पारवती को अपने जाने की बात बता कर बहार निकल ली. अर्जुन मुस्कुराता हे

पीछे आ रहा था. "सुनो तोह एक बार." अर्जुन ने आवाज दी तोह गेट खोलती प्रीती नजरे झुकाये वही कड़ी हो गई.

"तुमने पंतय के अंदर कुछ और भी पहना हुआ था न?" अर्जुन की बात से प्रीती और जयादा हे शर्म से लाल हो गई थी फिर किसी मृगनी की तरह मचलती वह अर्जुन को

वही छोड़ उनके घर की तरफ निकल गई.

"मृगया" खुद से उसने सिर्फ यही लफ्ज़ बोलै और उनके घर का दरवाजा लगा के आराम से अपनी और चल दिए.

संजीव भैया अभी जैसे किसी मीटिंग में जाने को तैयार बैठे थे. एक आसमानी कमीज और उस से थोड़ी गहरी पतलून पहने वो बने सँवारे से खाने की शुरुवात करते

दिखे. एक तरफ आरती बैठी थी जो टेबल पर कोहनी तिक्यै कुछ सोच रही थी. हलके सलेटी रंग की सूती लड़कीओ वाली कमीज और सफ़ेद पजामा पहने. जैसे थोड़ी देर

हे पहले वो उठी थी. उनके साथ हे प्रीती और अलका दीदी बैठे बातें करने में लगी थी.

"अब बैठ भी जा छोटे तू. या आज खड़े खड़े हे खाना खायेगा?" भैया की बात सुनकर वो बैठा तोह ऋतू दीदी ने एक प्लेट उसके सामने रखते हुए बड़ा सा परांठा

रख दिए और उसके ऊपर घर का मक्खन आधी कड़छी.

"वैसे ये परांठे आज किस बात पर बने है?" अर्जुन ने बोलने के बाद एक निवाला मुँह में लिए तोह उसको ये स्वाद बड़ा पसंद आया. गोभी के परांठे और तजा मक्खन.

"कल प्रीती ने बताया था के उसको गोभी के परांठे बहोत पसंद है लेकिन उनके घर में परांठे नहीं बनते तोह बस आज का नाश्ता प्रीती की पसंद का है. पसंद न

हो तोह तुम्हारे लिए रोटी बना देती हु रात की सब्जी के साथ." प्रियंका दीदी की बात सुनकर उसने प्रीती को देखा जो अभी भी उसकी तरफ सिर्फ कनखियों से देख रही थी

फिर हड़बड़ाते हुए बोलै. "नहीं नहीं. मुझे ाचे लगे इसलिए पुछा. वो दादी तोह ऐसे परांठे मुझे खाने नहीं देती तभी पूछ लिए." अर्जुन की बात पर भैया भी

मुस्कुरा उठे लेकिन सामने बैठी आरती दीदी के चेहरे पर अजीब से भाव थे. जाने वो क्या सोच रही थी और कैसे अर्जुन को देखती थी थोड़ी थोड़ी देर बाद.

"प्रियंका, अर्जुन की बात बिलकुल ठीक है. इस घर में कई साल बाद ऐसे परांठे खाने को मिले है. या तोह जब तुम्हारे घर मई जाता था तब चाची खिलाती थी

या छुट्टियों में जब वह यहाँ आती थी तब. और तुम तोह उनसे भी कही ज्यादा ाचे बनाने लगी हो." संजीव भैया को तारीफ करते देख अलका भी घूरने लगी और प्रियंका

सिर्फ थैंक यू कहके वापिस तवे पर परांठा पलटने में लग गई.

"तू ऐसे क्या देख रही है? मैंने कुछ गलत कहा क्या?" मुस्कुराते हुए उन्होंने अपनी छोटी बहिन की तरफ देखा तोह अलका बस ना में गर्दन हिलती दिखी.

"ये तारा का सिस्टम समझ नहीं आता. अभी तक महारानी उठी नहीं है." ऋतू दीदी की बात सुनकर अर्जुन को करंट सा लगा वही आरती के चेहरे पर अजीब सी मुस्कान तैर

गई.

"सोने दे न उसको. और वैसे भी उसने तोह ये परांठे खाने नहीं. ब्रेड सैंडविच बना दूंगी जूस के साथ उसके लिए जब उठेगी वो. हम लोग करते है नाश्ता." ऋतू दीदी

ने तोह यहाँ जैसे अर्जुन की जान बचा ली थी.

"ाचा तुम घर पर हे रहना या ज्यादा दूर तक कही मत जाना अगर कोई काम भी हो तोह. मुझे लकी के साथ जाना है शहर से बहार तोह मई वापिस तक़रीबन 7 बजे तक

आऊंगा. स्कूटर घर पर हे है. और गुड़िया कुछ सामान चाहिए हो तोह बता दो मुझे या फिर इसको बोल देना." संजीव भैया ने रुमाल से हाथ साफ़ करने के बाद बटुए

से 100 के 5 नोट निकल कर टेबल पर अचार की शीशी के निचे रख दिए और अलका दीदी ने हामी भर दी.

"भैया वो मई क्या कह रहा था." अर्जुन ने भी उनके साथ खड़े होते कहा तोह भैया मुस्कुराते हुए बोले, "हाँ. तोह तू ये कह रहा था के जब मई घर औ तोह तेरे लिए

क्या लेके आना है?" उन्होंने अपने छोटे भाई की बात बिना कुछ जाने हे पूरी सी करदी.

"एक नै कैसेट ले आना भैया. पिछली गेम अब चलती नहीं." वो थोड़े लाड से बोलै तोह भैया उसके बाल बिखेरते बहार निकल गए.

"आरती अगर अभी खाने का मैं नहीं तोह मई बाद में लगा दूंगी तेरा खाना. प्लेट में ऐसे ठंडा करने से कोई फायदा नहीं." प्रियंका दीदी ने टेबल से प्लेट उठाते कहा

तोह आरती दीदी वापिस प्लेट लेकर खाने लगी तोह दीदी फिर प्रीती और अलका को परोसने में लग गई. अर्जुन ऊपर चला गया तोह एक बार आरती दीदी ने बस निगाह भर उसकी

और देखा और वापिस खाने लगी.

"एक बात बता, तू कोनसी सोच में खोई हुई है? कबसे देख रही हु तुझे." ऋतू दीदी प्रीती को अपने साथ कमरे में ले गई और प्रियंका दीदी भी अंदर हे आ गई उनके साथ.

बहार बैठी अलका ने जब आरती से ये बात कही तोह उसका हाथ वही रुक गया तोड़े हुए निवाले के साथ.

"ऐसा कुछ नहीं है बस कुछ अजीब सा महसूस हो रहा है." आरती का बताने का अंदाज देखते हुए जासूस अलका ने अब अपनी तरफ से सनसनी खेज जवाब दिए.

"वो क्या है न रात को तू बड़ी देर तक छत्त पर थी. फिर आई तब तेरी सांसें भी चढ़ी हुई थी. आज तू सुबह लेट उठी और उठते हे चुपचाप सी है. फिर अर्जुन को

जैसे तू देख रही थी तोह इसका मतलब है के उस से जुडी कोई बात है. लेकिन उसमे तू नहीं है क्योंकि जब प्रियंका दीदी ने तारा का जीकर किआ था तोह अर्जुन हल्का सा

परेशां हुआ था और तू खुश. मतलब की तारा और अर्जुन के बीच कोई बात हुई है और तू परेशां है." अलका का इतना सटीक जवाब या अनुमान सुनकर अब आरती के

चेहरे पे शुन्य से भाव आ गए थे. एक प्रतिशत भी उसको इस बात का गुमान नहीं था की अलका की नजर इतनी शातिर हो सकती है. ये बात तोह सिर्फ ऋतू को हे पता

थी की अलका कहा तक दिमाग दौड़ा सकती है.

"यार इसका मतलब तू जाग रही थी?" आरती ने बस इतना हे पुछा

"नहीं सो रही थी लेकिन एहसास हुआ था जब तू उठके बहार गई और फिर कोई घंटे बाद तू फिर वापिस आई. ाचा अब तू बता के क्या तूने कुछ देखा.?" अलका को भी पता नहीं था के आखिर में क्या हुआ है.

"यार देखा तोह कुछ नहीं लेकिन तारा के कमरे से कुछ दर्द और फिर बाद में थोड़े मजे की सी आवाज आती सुनी. बीच बीच में अर्जुन की भी लेकिन ऐसा कैसे मुमकिन है

की वो दोनों कुछ कर रहे हो? मई यही सोच रही थी क्योंकि वो बुआ की बेटी है और अर्जुन से बड़ी भी है. उनके बीच में ऐसा कुछ होना गलत हे कहा जायेगा. और फिर

वो अभी तक उठी भी नहीं." आरती ये बात पूरी करती की तब तक तारा एकदम साढ़े कदमो से गुड मॉर्निंग बोलती दोनों के सामने आ बैठी. अलका को उसकी चाल में जरा

भी बदलाव न दिखा लेकिन आरती की बात का मतलब था के अर्जुन ने किआ है. अर्जुन का हथियार जैसा था उसका अंजाम अलका ने ऋतू और माधुरी दीदी के बदली चाल

में अनुभव किआ था लेकिन यहाँ तोह वो ाचे से आई और मुस्कुराती बैठ थी.

"बड़ी देर तक आराम कर रही थी तारा?" अलका ने ये बोलै तोह तारा वैसे हे मुस्कुराती जवाब देने लगी, "यार ऊपर ऐरकण्डीशनर में पता हे नहीं चलता के कितना सो

चुकी या बहार क्या टाइम हो गया होगा. बस अभी अर्जुन के khatar-patar करने की आवाज सुनकर मई उठ गई और फ्रेश होने के बाद आ गई."

आरती भी सब देख समझ रही थी लेकिन विश्वास तोह उसको भी नहीं हो रहा था के कैसे रात को ये लड़की दर्द और मस्ती में थी अब बिलकुल सही सलामत.

"तू बैठ मई कॉफ़ी बनती हु." अलका ये कहती उठ कर कॉफ़ी बनाने अंदर गई तोह तारा आरती से बात करने लगी.

"तू सुना क्या करती रही इतनी जल्दी उठने के बाद?"

"कुछ नहीं यार. मई कहा जल्दी उठी हु, साढ़े सात बजे आँख खुली थी मेरी और अभी नाश्ता किआ है. वैसे एक बात बता, अकेले तुझे ऊपर नींद आ जाती है?"

"अकेले? रात को बिस्टेर पर एक तरफ अर्जुन और एक तरफ मई सो रही थी. फिर अकेले कैसे हुई." तारा ने आधा सच खुद हे बोल दिए था क्योंकि उसको ये लगा की ये बात

छुपाना तोह बेवकूफी हे होगी.

"ाची बात है. वैसे अर्जुन के साथ भी ाची जमती है तेरी."

"क्यों न जमेगी यार? ाचा लड़का है और ध्यान भी रखता है. इतनी परवाह करता है के रात को नस चढ़ गई थी मेरी तोह आधे घंटे तक मालिश करने के बाद

वो बेचारा सोया. कोई इतना ध्यान रखने वाला हो तोह मई ऐसे के साथ पूरी ज़िन्दगी गुजर दू. दिखने में भी तोह कुछ कम् नहीं वह." तारा सचमुच एक टेढ़ी खीर हे थी

आरती के तोह सब संदेह धुंआ हो गए थे. वो आवाज जो उसने सुनी थी रात में, वो सीत्कार.. इन दोनों का एक कमरे में होना. उसको अब महसूस हो गया था के शायद वो खुद

अर्जुन की तरफ खींचती जा रही है तोह हर लड़की के साथ उसको वही नजर आता है.

"सही कहा यार तूने. लड़का ाचा भी है मेहनती भी. नहीं तोह आजकल के लड़के इस उम्र में घर पे काम और बहार ज्यादा आवारागर्दी करते नजर आते है. और यहाँ भी

सब उसका उतना हे ख़याल रखते है." कुछ याद करती आरती अपनी बात कहती गई और इधर अलका कॉफ़ी के 3 कप बना के ले आई तोह तारा अपनी आँख रागादि बाथरूम जाने

का बोलकर उठ गई.

"कर ली chaan-bin अपनी?" अलका की बात पर आरती मुस्कुरा उठी.

"कभी कभी दिमाग ज्यादा चल जाये तोह हमारे अनुमान भी वैसे हे होने लगते है. मेरा सिर्फ वहां था और तारा ने खुद बताया के अर्जुन उसके साथ हे सोया था और

रात को उसकी नस चढ़ गई थी तोह फिर अर्जुन ने हे मालिश की. कोई आधा घंटा. लेकिन एक बात तोह फिर भी मई कहूँगी की तारा के दिल में अर्जुन के लिए कुछ न कुछ

जरूर है." आरती की बात पर अलका भी हंसती सी बोली, "वो जवान है और अर्जुन भी कुछ काम तोह नहीं. आकर्षण होना एक स्वाभाविक चीज है. और एक इंसान जिसको आप

ाचे से समझते और जानते हो वो शायद आपके ज्यादा करीब होता है. बस यही बात होगी की तारा को अर्जुन पसंद हो." अलका के इतने सुलझे जवाब से आरती के मैं में

भी अब अर्जुन का नाम उतरने लगा था.

सभी अपने काम से फारिग हो कर बैठे थे. घर की सब साफ़ सफाई हो चुकी थी तोह लड़कियों ने बहार वाली बैठक में टेलीविज़न देखने का सोचा और सभी उधर

चल दी. ऋतू दीदी नहाने का बोलकर अंदर की तरफ आ गई थी तोह वो सब फिल्म देखने बैठ गई. रविवार था तोह फिल्म भी ाची हे देखने को मिल गई. सभी अपनी

सुविधा के अनुसार sofe-diwan और कुर्सी पर बैठ गई थी. इधर ऋतू दीदी अपने कुछ कपडे लेकर ऊपर आ गई जहा अर्जुन संजीव भैया के कमरे में इतनी गहराई में डूबा

था के ऋतू दीदी के कदमो की आहात तक पता नहीं चली. वैसे भी वो नंगे पाँव हे थी.

"ऐसे क्या पढ़ रहा है?" उनकी आवाज से बस अर्जुन ने नजर ऊपर की लेकिन ऋतू दीदी की नजर उस किताब पर बने हुए चित्र पर रुक गई. जहा एक राजकुमार जैसे वस्त्रो

में एक लड़का किसी राजकुमारी सी लड़की की टाँगे उठाये उसका मधुरस चख रहा था और दोनों हाथ उस लड़की के गोलाकार स्तनों को पकडे हुए थे.

"आप यहाँ?" अर्जुन ने किताब बंद करते ऋतू दीदी से कहा लेकिन वो तोह शायद उस चित्र को महसूस हे करने लगी थी. खड़े होते हुए अर्जुन ने हलके से उनके गाल को हाथ

लगाया तोह वो फिर से उसकी आँखों में देखने लगी. बिना कुछ कहे वो बहार निकल गई तोह अर्जुन हैरान सा हो गया के ऐसी कोनसी गलती उस से हो गई की दीदी ने बताना

तक सही नहीं समझा. वो पलट कर किताब को रखने हे लगा था के ऋतू दीदी के दोनों हाथ उसकी काख से होते सीने से जुड़ गए.

"अब तू ये सब भी पढ़ने लग गया?" दीदी की आवाज कुछ और कह रही थी और शरीर कुछ और. अर्जुन ने खुद को आराम से उनकी पकड़ से निकलते हुए सामने से एक बार फिर

उन्हें बाहो में भर लिए. "गलत क्या है दीदी. प्यार को ाचे से समझना तो शायद ठीक बात है. मई वही सब पढ़ और समझ रहा था जिस से आपको और ज्यादा ाचा महसूस करवा सकू."

"मुझे बाथरूम में ले चल भाई. मई अंदर से कितना तड़प रही हु तुझे नहीं पता." अपने पाँव खुद हे ऋतू दीदी ने ऊपर उठाते हुए अर्जुन से लपेट लिए थे और वो भी

उनकी बात मानता बाथरूम में चल दिए. अगले एक मिनट में हे ऋतू का गोरा बदन alf-nanga बाथरूम की रौशनी से टक्कर लेता प्रतीत हो रहा था. काली बड़ी आँखे और

घने खुले बाल जैसे उनके शरीर को नजर से बचने के हे लिए इस रंग के थे. अर्जुन ने भी अपने दोनों वस्त्र उतार कर दरवाजे के पीछे लगी कील पर टांग दिए

एक बार फिर से ऋतू दीदी पहले की तरह अर्जुन के शरीर से लिपटी थी बिना हे उस भयानक लुंड के डर से जो अब ठीक उनके कूल्हों के नीचे से होता सर उठाये था.

बिछड़े प्रेमी जोड़े से दोनों बस एक ना टूटने वाले चुम्बन से जुड़े हुए थे. जब साँसे बेहाल हुई तोह दोनों के चेहरे दूर हुए.

"आप ये पानी का हैंडल घुमा दीजिये." एक हाथ से ऋतू दीदी के कूल्हे थामे और दूसरा उनके एक उभर को पकडे वो दीदी को लेकर शावर तक आ गया था. पानी की बौछार

जब दोनों के गरम शरीर पर गिरी तोह एक बार फिर दोनों एक दूसरे के होंठो को चूसने काटने में लगे थे.

"दीदी एक बार यहाँ कड़ी हो जाओ आप." ऋतू उसका कहा मानती फर्श पर सीढ़ी कड़ी हुई तोह अर्जुन इत्मीनान से उनका पूरा शरीर साफ़ करने लगा. एक शरीर पर लगाने वाले शैम्पू से उसने गर्दन से लेकर निचे पाँव तक उन्हें झाग से चिकना कर दिए था. हलकी उंगलियों से जब उसने छूट की दरार को सहलाना शुरू किआ तोह ऋतू की एड़ियां

ऊपर की तरफ उठ गई. "भाई ये क्या कर रहा है? नेहला भी खुद रहा है और आग भी लगा रहा है." उन्होंने भी अपने हाथ से उसका सख्त लुंड पकड़ कर dabana-hilana

शुरू कर दिए था. अर्जुन की अब आधी ऊँगली अंदर तक छूट के घूम रही थी. दूसरे हाथ से वो गांड की दरार को हल्का रगड़ते फिर उनकी पीठ साफ़ करने लगा था.

शावर का पानी चला कर दोनों आपस में अपने शरीर रगड़ने का आनंद लेने लगे. जब दोनों के तन्न ाचे से चमकने लगे और सारा शैम्पू उतर गया तोह फर्श पर पंजो

के बल बैठते हुए अर्जुन ने अपने दोनों हाथो से ऋतू दीदी की जांघो को खोल कर अपना मुँह उनकी छूट पर भिड़ा दिए.

"उम्म्म्म.. आह.. ये जैसे किसी सपने सा है अर्जुन. श्शहठ.. आह.. " गोरी गुलाबी छूट जो लगभग बंद हे थी अब उसमे आधी ऊँगली और जीभ एक साथ अर्जुन चलता सा

ऋतू दीदी को नहीं खुशियां दे रहा था. उसकी ऊँगली जाने क्या टटोल रही थी लेकिन ऋतू बस उसका सर जोर से दबाये अपने टाँगे खोले कड़ी थी. दूध पर लगे गुलाबी

निप्पल आज बिना चूसे हे तीखे और कड़े हो चुके थे. अर्जुन की ऊँगली किसी खास जगह लगी तोह ऋतू दीदी ने अपने दोनों हाथ पीछे की दिवार पर टिकते हुए जोर की

सिसकारी भरी.. "आह भाई.. मेरा हो गया.. तू मुँह हटा.. आह मई गई..." छूट से हल्का सा तरल निकला जो अर्जुन ने सीधा मुँह में हे जाने दिए. वैसे हे वह उस ऊँगली

से एक मुलायम से छोटे डेन को छेड़ता रहा और दोनों होंठ अलग कर jeebh/honth से ऋतू दीदी की छूट के स्वाद में नशा सा करने लगा था. मजे की अधिकता में ऋतू ने

जोर से अर्जुन के बाल खींचते हुए उसको उठाना चाहा तोह वो मुस्कुराता उठ कर उनके मुँह के सामने आ गया.

"ये क्या था भाई? और कैसे किया तूने ये सब?" अपनी हे छूट का स्वाद उनके होंठो को मिला जब अपनी बात कहने के पश्चात उन्होंने अर्जुन के होंठ अपने मुँह में भर लिए.

नमकीन और कुछ फीका सा मिला जुला स्वाद. जब चुम्बन टूटा तोह अर्जुन ने बस इतना कहा, "रति" और अपना लुंड मुठी में भरते हुए दिवार से लगी ऋतू दीदी की छूट पर

चिपका दिए जो इतनी गीली थी की खुद हे लुंड के सुपडे को चूमने लगी थी. होंठ मुँह में दबाते हुए अर्जुन ने अपना गीला लुंड एक करारे धक्के से अंदर तेल दिए जो

छूट के होंठ फैलता इस एक वार में हे 4 इंच तक अंदर जा धसा. "आह." इस दर्द से ऋतू दीदी के लम्बे नाख़ून अर्जुन के पीठ में गड्ड गए

"दीदी कुछ नहीं होगा." अब उनके अकड़े हुए एक निप्पल को चूसते हुए अर्जुन बस उन्हें आराम देने लगा था. जहा उसका हाथ या मुँह लगता था ऋतू दीदी का शरीर उस जगह से

कुछ पल के लिए लाल हो जाता. फिर दोनों गोल दूध हाथो में भरते हुए एक हर और उनके होंठ मुँह में लेते हुए उसने अलग धक्का भी पहले की तरह जड़ दिए, इसके साथ

हे 7 इंच लुंड छूट को बुरी तरह से फैलता उस नरम मखमली सुरंग में पहुंच गया. आँखों में हलके आंसू और छूट में भयंकर लुंड लिए ऋतू बस दिवार से लगी

कड़ी रही. उनकी हालत देख अर्जुन ने उनके कूल्हों को अपने एक हाथ से पीछे से घेर लिए. कुछ पल के इस ठहराव के बाद जब ऋतू दीदी ने अपना हाथ उसकी पीठ पर

सहलाया तोह अर्जुन ने हलके हलके अपनी कमर को चलना शुरू कर दिए. गीली छूट में कैसा लुंड थोड़ी म्हणत से अब धीरे धीरे अंदर बहार होने लगा था. छूट की खाल

अब ऐसे बहार नहीं आ रही थी जैसे पहले मिलान के समय हो रही थी. शायद ये अर्जुन के छूट को चूसने और तैयार करने की वजह से हे था. "आह अर्जुन.. ये क्या.. हो

रहा है भाई.. बड़ा.. आह मजा आ रहा है.. आह.. मेरे ये ब्रेस्ट्स जोर से दबा भाई.. आह." एक हाथ से अपना निप्पल खुद उमेठती ऋतू दीदी अर्जुन के हर धक्के में और

ज्यादा मजा लेती लग रही थी. इस बार अर्जुन भी लगभग आधे लुंड को बहार निकलता उतना वापिस दाल रहा था. लेकिन उसने जड़ तक अभी भी नहीं घुसाया था. मजे की

अधिकता में उसको पता भी नहीं चला कब उसने दीदी को हवा में उठा कर छोड़ना शुरू कर दिए था. ऋतू दीदी भी उसके मोठे लुंड को छूट में गहराई तक घुसता निकालता

महसूसत कर अर्जुन से किसी बैल की मानिंद चिपकी हवा में अपनी गांड खुद हिलने लगी थी. एक पल रुक कर खुद हे तेजी से अपनी गांड को लुंड पर मारती वो दूसरी बार

चरमसुख का मजा उठाने लगी. दांत गर्दन पर गदति वह फिर से उसकी पीठ के मास्स में नाखून घुसा चुकी थी. इधर लुंड पर और चिकनाई महसूस होते हे एक पल

को अर्जुन ने भी ऋतू दीदी को चरमसुख लेने दिए.

"अब कर भाई. तेरा अभी नहीं हुआ है. मुझे आराम है." उनकी आँखों में कोई वासना या शर्म नहीं थी बस एक हक़ था और प्यार. अर्जुन ने उन्हें निचे उतारते हुए खड़ा

किआ और दिवार की तरफ झुका दिए. शावर के दोनों हैंडल पकड़ वो गांड बहार को निकल अपने छोटे भाई के निर्देशानुसार कड़ी हुई तोह अर्जुन ने लुंड को एक बार उनकी

गोरी गांड की दरार में फेरते हुए छूट पर वापिस टिका दिए. गांड पर लुंड का एहसास भी ऋतू के दिल में बैठ सा गया था लेकिन अभी की स्थति को समझती वो बस चुप

चाप चुदाई सुख की तरफ हो गई. "आह भाई.. जब भी ये अंदर जाता है तोह पेट तक का हिस्सा भरा महसूस होता है.. और निकलता है तोह जैसे खाली.. आह.. तू

रेहम मत किआ कर रे.. आह.." एक धक्के में पहले जितना 7 इंच अंदर घुसने पर वो फिर से कांप गई थी लेकिन फिर मजा भी उन्हें इस दर्द से ज्यादा महसूस हुआ.. उनके

दोनों चुके झुकने के बावजूद जरा भी लटके न था, उन्हें पीछे से पकड़ कर अर्जुन अब सटासट लम्बे धक्के पेलने लगा था. यहाँ से उनकी उभरी गांड के बीच से

छूट के गुलाबी फैलते हुए होंठ इस संगम को कही ज्यादा कामुक बना रहे थे. ऐसे हे वह नजर टिकाये अर्जुन ताबड़तोड़ छूट की कुटाई में लग गया... "दीदी सच

में ऐसा लगता है के ये सिर्फ मेरे लुंड के हिसाब से हे बानी है.. ाः.. अभी भी ऐसे कैसा हुआ जा रहा है.. आह और कितनी गुलाबी है.. उम्.. " अपने भाई की बातें

सुनती ऋतू को भी एक और नया चरम शरीर में उठता महसूस हुआ.. इधर लुंड भी फूल कर टमाटर बन चूका था.. उसके बढ़ते आकर से अब छूट अंदर से और कसने

लगी थी की फिर से ऋतू आगे को होती मदहोश होने लगी.. "मुझे पकड़ ले भाई.." वो गिरने को हुई तोह अर्जुन ने पीछे से उनका सीना थाम लिए. लुंड गांड की दरार

में पिचकारियां छोड़ रहा था और उसकी हुंकार किसी शेर की तरह मुँह से निकल रही थी. लुंड की एक दो पिचकारियां गांड के छेड़ पर महसूस होते हे ऋतू का चरम

भी थोड़ा लम्बा चला. 5 मिनट बाद दोनों एक दूसरे के होंठ चूमते पानी से भीगने लगे और फिर थोड़ी देर बाद शरीर साफ़ कर बहार निकल आये.

"वैसे ये वाला एक्सपीरियंस अब तक का बेस्ट था भाई. शरीर में जान होती तोह मई रात तक नहीं बहार आने वाली थी." कमरे के अंदर अपनी कच्ची पहनती ऋतू दीदी की

और मुस्कुरा कर देखते हुए अर्जुन ने कहा, "इसलिए तोह मैंने आपको रति कहा था. मतलब वो एक ऐसी स्त्री जो अपने प्रेमी का भरपूर साथ दे और जिसका हर अंग मस्ती

से भरा हुआ हो. काम की देवी. और ऐसी स्त्री का मधुरस साफ़, नमकीन और बिना गंध का होता है. आप बिलकुल वही तोह हो. मुझ जैसे अश्व पुरुष के लिए एक वैसे

हे समकक्ष जोड़ीदार." अपना पजामा पहन कर वो अपनी बहिन को पीछे से ब्रा बांधते हुए बोलै.

"तोह उस किताब में ये सब भी लिखा है? तोह अलका और प्रीती का भी बता दे जरा." अपनी तारीफ के साथ ऋतू दीदी ने मजाक करते हुए माहौल को भी हल्का करने का प्रयास

किआ तोह अर्जुन ने उसको बरक़रार रखा. "अभी तक आपको हे पाया है दीदी. लेकिन जहा तक मेरी सोच कहती है अलका दीदी भी आपके जैसी हे होंगी लेकिन प्रीती एक मृगया

मतलब हिरानी है. देखने से शांत लेकिन मन की गहराई में चपल और चंचलता की अधिकता. जैसे कोई मादा हिरन सभी nar-hiran को अपनी और एक बेजोड़ महक से आकर-

-सहित कर लेती है लेकिन दिखावा ये करती है की वो इस सब से अनजान है, वैसे हे कस्तूरी मृगया है वह. लेकिन ये अनुमान है और मई सिर्फ आपको जानता हु जो मेरे

aatma-sharir अपने नाम लिखवा चुकी हो." उनको पूरे कपडे वो खुद पहना चूका था और अब ऋतू दीदी की जुल्फों को एक हाथ में पकड़ता रबर दाल रहा था.

"तू मेरा हे तोह है. और मई भी ये जानती हु के उन दोनों का सामान अधिकार है तेरे दिल और शरीर पर. और मेरा हक़ मई खुद हे ले लेती हु." इतना बोलकर एक मीठी

सी चुम्मी होंठो पर देती वो अपनी चाल दुरुस्त करती नीचे चल दी और अर्जुन भी बिस्टेर पर पसर गया था.
 


अपडेट 37

लव स्टोरी


"एक बार मेरा रास्ता साफ़ होने दे फिर तुझ अकेली को तोह मई मजे नहीं लेने देने वाली." ऋतू दीदी जैसे हे निचे आई थी रसोईघर से पानी की बोतल लेकर बहार

आती अलका की बात सुनकर मुस्कुरा उठी. पूरी कोशिश के बावजूद चाल में कम्पन और छूट में हल्का दर्द सा था. चेहरे की चमक एक अलग कहानी बयान कर रही थी.

"तुझे मन कब किआ मैंने. बस हिम्मत चाहिए थोड़ी और मैंने वो दिखाई लेकिन तू अभी भी भाग रही है. इधर वो तेरे से पहले हे देख लिओ तारा का नंबर न

लगा दे तोह. प्रीती भी कर गई होती लेकिन बेचारी का मंथली बीच में आ गया." ऋतू की बात ने एक बार फिर अलका को सोच में दाल दिए.

"अब तू क्या सोचने लगी." ऋतू ने उसकी हालत देखते पुछा.

"इधर बैठ." उसको कुर्सी पर बैठा कर अलका ने बात शुरू की. "यार ये तारा वाली बात मुझे सोचने पर मजबूर कर रही है. रात को आरती ने कुछ ऐसा सुना लेकिन

तारा ने शायद बड़े ाचे से हर बात को संभल लिए. उसका कहना था के अर्जुन उसके साथ सोया और सिर्फ पाँव की मालिश की. आरती ने तोह बात मान भी ली. जबकि उसके

कानो ने वह आहें और बातें सुनी थी. लेकिन मई ऊपर गई थी जब अर्जुन आँगन में नाहा रहा था. तारा बिना कपड़ो के सोइ हुई थी और उसके यहाँ एक बोतल थी." अलका

ने इशारे से ऋतू को उसकी छूट की तरफ ऊँगली कर के बताया.

"तोह फिर तूने देखा की वह कैसे चल रही थी या फिर उसको बुखार था के नहीं?" ऋतू ने भी ये बात समझते हुए हे अलका से अगला सवाल किआ.

"नहीं. उसकी चाल में तोह इतना भी फरक न था जितना अभी तेरी में है. इतने बड़ा अंदर लेने के बाद माधुरी दीदी जैसी जब बिस्टेर पर गिर गई तोह इसने तोह कमाल

कर दिए. हो सकता है के गरम पानी से फरक पड़ा हो लेकिन फिर भी."

"हम्म.. टेबलेट और शायद एक सीमा तक. मेरा दिमाग यही कहता है की दर्द और बुखार की दवा जरूर ली होगी. और संभव है तारा ने अपनी औकात तक हे उसका अंदर लिए

हो क्योंकि अर्जुन जबरदस्ती तोह करने से रहा सारा अंदर. आज हे देख ले मई पहले पूरा अंदर ले चुकी हु लेकिन उसने आज पूरा अंदर नहीं किआ. कुछ और अलग दिखा

उसके कमरे में तुझे. ये बात तोह पक्की हो गई के तारा ने कुछ मैदान तोह मार हे लिए." एक मुस्कराहट के साथ ऋतू दीदी ने अलका का धयान वापिस कमरे में देखे हालात

की और किआ तोह अलका थोड़ा और सोचने लगी.

"है. वो तकिये के लिहाफ गायब थे. याद है neeli-safed चद्दर के साथ के हे थे वह. लेकिन दोनों तकिये बिना लिहाफ के थे. और कुछ अजीब नहीं मिला. शायद अर्जुन

ने हे सब साफ़ किआ हो." अलका किस इस बात से ऋतू मुस्कुराते हुए कड़ी हो गई.

"चल अंदर चल सबके पास. और अपनी स्पीड बढ़ा थोड़ी नहीं तोह जहा तक मई जानती हु अर्जुन को प्यार करने वालो की कमी नहीं. देर सावेर में देख लिओ कोमल दीदी उसके

ऊपर न चढ़ी दिखी तोह नाम बदल डीओ मेरा." अलका उसके कूल्हों पर चपत मारती कड़ी हो गई.

"कर लेने दे जो करता है और करना चाहता है. जिस दिन मैं उसके पास गई तोह वो याद करेगा उस रात को. वैसे भी कल सोमवार है और संजीव भैया बहार. तू मदद

कर डीओ थोड़ी. या तोह सब छत्त पे सोने जाये या फिर ये तारा वह न हो."

"चल देखते है. तेरे लिए तोह जान भी हाजिर है मेरी जान." ऋतू अलका को एक तरफ से कस्ती गाल चूमकर बोली और दोनों अंदर आ गई जहा सब टेलीविज़न देख रहे थे. प्रीती बड़े सोफे पर अकेली बैठी थी और तारा के साथ प्रियंका दीदी बैठी थी दीवान पर. आरती दीदी भी एक सोफे पर बैठी फिल्म में खोई हुई थी.

"आपने बड़ी देर लगा दी." अपने साथ बैठती ऋतू दीदी से प्रीती ने थोड़ी मुस्कान के साथ ये बात कही तोह उन्होंने बस उसके सर पर चपत लगा दी. अलका भी साथ हे

पसर सी गई. कोई रोमांटिक हॉलीवुड फिल्म चल रही थी सामने स्टार मूवीज पर "प्रीटी वुमन" और समय के हिसाब से शायद वो ख़तम हे होने वाली थी. 9:30 के बाद

हे ऋतू ऊपर गई थी और अभी कोई 11 से थोड़ा ऊपर समय हो चूका था.

"है यार मुझे तोह लगा सिर्फ तारा और आरती टाइम लगाती है नहाते हुए लेकिन तू तोह इनसे भी आगे है." प्रियंका दीदी के बात पर ऋतू संभल गई थी.

"आज थोड़ी फुर्सत थी तोह ाचे से नाहा ली. फिर कुछ कपडे भी धोने थे तोह वो काम निपटा कर अलका के साथ गप्पे लगा रही थी बहार. आप बताओ फिल्म कैसी लग रही

है. मैंने तोह ये कोमल दीदी के साथ पिछले महीने हे देख ली थी. ाची लगी थी मुझको."

"है यार. मई तोह यही सोचती थी की ये फिल्म थोड़ी वैसी होती होंगी सभी. लेकिन ये वाली देख कर ऐसा तोह नहीं लगता. ाची है बस कुछ एक दो जगह ज्यादा हे खुलापन

दिखाया लेकिन फिल्म के हिसाब से हे." प्रियंका दीदी थोड़ी सकुचाती सी बोली.

"क्या दीदी आप इस फिल्म को देख कर ये कह रही हो तोह फिर देर रात वाली देख कर पता नहीं क्या कहोगी. टीवी6 पर तोह ऐसी फिल्म आती है के आप आंख्ने बंद हे रखोगी

और अगर एक बार देख ली फिर हमेशा खुली रखोगी." तारा भी इस वार्तालाप में घुस आई थी. उसकी बात पर आरती और प्रीती को छोड़कर सब हंसने लगी थी. प्रीती को

शर्म आ रही थी और आरती बस फिल्म में हे खोई हुई थी.

"तोह फिर एक बार तोह मई देख के हे रहूंगी. ऐसा क्या होता है उनमे सो आँखें बंद हो जाएँगी. आज रात प्रीती के हे घर सही." प्रियंका दीदी की बात के आखिरी लफ्ज़

पर प्रीती चौंकती सी उनकी तरफ देखने लगी.

"अरे फ़िक्र मत कर तू. तेरे को हाथ नहीं लगाने दूंगी मई. देखते है इनका भी क्या हाल होता है फिर." ऋतू दीदी प्रीती को गले लगाती बोली तोह वो बेचारी पानी होने

लगी थी.

"कुछ भी बोलती हो दीदी आप. हमारे घर में ड्राइंग रूम में टेलीविज़न है और फिर पारवती का क्या भरोसा कब आ जाए नीचे." शर्माती सी वो बोली

"पारवती कोई अलग थोड़ी है. हाँ बस वो कला इंसान अगर नीचे आया तोह गाला काट दूंगी." ऋतू दीदी थोड़े जोश में बोली तोह उनकी बात का समर्थन प्रियंका दीदी ने

भी किआ. ये लोग बातें कर रही थी इधर फिल्म ख़तम हो गई तोह आरती ने देखा की वह ऋतू और अलका भी है. उसको छोड़कर सभी बातें कर रही थी.

"कहा जाने की बात हो रही है?" उसने हैरान होते पुछा तोह सभी उसके चेहरे की तरफ देखने लगे.

"तू नींद में थी क्या आरती? बड़ी जल्दी आँख खुल गई." अलका ने कहा और आरती झेंप सी गई.

"वो फिल्म ाची थी और मुझे रोमांटिक तोह वैसे हे बहोत पसंद है तोह बस वे देख रही थी. तुम लोग क्या प्लान बना रही थी.?"

"कुछ नहीं आज सोच रहे थे की प्रीती के घर थोड़ा मजा किआ जाये. रात के खाने के बाद देखते है कोण जाता है और कोण रहता है." ऋतू दीदी ने ये कहा तोह प्रीती

ने हलके से कोहनी मारी.

"सभी जाएँगी. ऐसा क्यों कहा आपने के कोई यहाँ रहेगा?"

"अरे मेरी गुड़िया. जैसा तू कहे. अब बताओ सब के कोण कोण चलेगा." ऋतू ने प्यार से उसको बाहो में ले सबकी तरफ नजर घुमाई.

"मई और आरती तोह पक्का." प्रियंका दीदी की बात पर आरती ने भी हामी भर दी.

"तारा दीदी. आप भी चलोगी और अलका दीदी भी." तारा ने प्रीती को मुस्कुराते हुए हां कह दिए.

"देख मुझे घर हे रहना होगा. लेकिन तुम लोग जाओ और मजे करो. एक को तोह वैसे हे घर पे देखना हे होगा पीछे से और ऋतू जानती है के मेरी नींद कमजोरी है

और वह जाकर भी 10 बजे सोने का मतलब यही सो जाउंगी." अलका दीदी की बात पर ऋतू दीदी ने भी सहमति दे दी. फिर ये लड़कियां ऐसे हे बातों में लगी थी की

अलका दीदी ने आरती को कहा, "यार ऊपर जा कर अर्जुन को उठा दे जरा. वो मार्किट से सामान भी ले आएगा और फिर दिन के खाने का भी कुछ करते है."

"ाचा. मई उठा के लाती हु. आप लोग बैठो." आरती एक पल में हे उठती निकल गई और प्रीती ने भी जाने के लिए कहा तोह ऋतू दीदी ने उसको वही रोक लिए.

"बैठी रह यार. क्या करेगी अभी वह जा कर. खाना खा के यही आराम कर लिओ मेरे पास. और थोड़ी मस्ती भी." आखिरी बात उसके कान में कही तोह प्रीती हंसती सी

उनके कंधे पर झूठा हाथ चलने लगी. "आप दिन प्रतिदिन बिगड़ती जा रही हो."

"बोल न फिर अपने मिया जी को. तेरा ध्यान वो रखे अब ये ज़िम्मा भी मेरे ऊपर दाल दिए है. दोनों को ख्याल मुझे रखना पड़ता है." कान में khusur-phusur करते देख

तारा बोल उठी.

"हम भी शायद कोई ाची बात सुन सकते है." तारा की बात पर ऋतू ने वैसा हे जवाब दिए.

"है तोह मई बस यही कह रही थी की तारा से बच के रहिओ रात को. ज्यादा हे मॉडर्न है और फिर प्रीती पे तेरा दिल आ गया तोह मई किसको सम्भालूंगी." ऋतू की हंसी

से तारा की भी तेज हंसी चूत गई..

"है यार मई तोह रश्क करने लगी हु इस से. ऐसी लड़की कभी अकेली नहीं रह सकती किसी बड़े शहर में. इतनी सुन्दर है के ाचे ाचे का ईमान दो जाए." इधर ये सब

ऐसे हंसी मजाक में लगी थी ऊपर कुछ और हे चल रहा था.

संजीव भैया के बिस्टेर पर अर्जुन ऊपर से उघड़ा हु सीधा सो रहा था. उसका मजबूत जिस्म और नींद में भी चेहरे की मुस्कान देख आरती बिना आवाज किये उसके पास बैठ

गई. उसका दिल जोरो से धड़क रहा था. कुछ सोचती सी वह अर्जुन का जहां निरिक्षण करने लगी थी. गर्दन पर हलके दांतों के निशाँ, छाती पर भी कुछ लाल लकीरे

सी बानी थी. कुछ देर सब देखने के बाद उसकी नजर पाजामे के उभार पर गई तोह हलक सूख गया. वह एक ाचा खासा उभार दिख रहा था. फिर अपनी नजर वह से

हटा के उसके मासूम चेहरे को देखने लगी. सोये हुए भी उसका चेहरा दमक रहा था और उसके होंठ भी लड़कीओ जैसे हे हलके गुलाबी से थे. कुछ आकर्षित सी होती

जैसे हे थोड़ा उसके चेहरे पर आरती झुकी तोह साथ हे उसकी कमर अर्जुन के शरीर से छु गई. जाने वह कोनसा सपना देख रहा था के नींद में हे उसके हाथो ने आरती

को अपने ऊपर झुका लिए, जो की पहले हे उसके चेहरे के ठीक ऊपर थी. अर्जुन ने तोह कोई चूमने की कोशिश की नहीं थी लेकिन बिलकुल सटीक होंठ आरती के जा मिले सोये

हुए अर्जुन से. धड़कन जैसे रुक हे गई थी. शरीर की कंपकंपी अपनी हद्द पार करने लगी तोह वह बस सोचती रही की बिना हरकत किये कैसे निकल जाये अर्जुन की बाहों

से लेकिन ये बात भी हवा हो गई. अर्जुन को नींद में हे अपने होंठो पर किसी के होंठो का स्पर्श महसूस हुआ तोह उसने अपना मुँह हलके से खोलते हुए आरती के लबों

को गीला करना शुरू कर दिए. एक तरफ हो कर बैठी आरती का ऊपर का शरीर अब अर्जुन के इशारो पर हे चल रहा था. माध्यम आकर की छातियां उसके तगड़े सीने

पर धंसी थी और सुन्न दिमाग से बस वो अपने होंठ अर्जुन से चुसवा रही थी. जब पीठ पर अर्जुन के हाथ रेंगने लगे तोह एक अलग हे सनसनी पूरे शरीर में करंट

की तरह दौड़ती लगी. Khud-ba-khud उसकी आँखें बंद हो गई और वो एहसास को शांति से महसूस करती रही. अर्जुन अब नींद से बहार आ चूका था लेकिन आँखें बंद किये

बस वो आरती के दोनों होंठ पीटा उसको अपने ऊपर लिटाये जा रहा था और वो भी किसी पतंग सी उसके इशारे पर उड़द रही थी. पहली बार उसको अपनी जांघो के बीच में

कुलबुलाहट सी होती महसूस हुई और अर्जुन का मरदाना शरीर क्या कर सकता है ये उसको बस अभी पता चल रहा था. जैसे हे अर्जुन के हाथ उसकी सलवार के इलास्टिक से होते हुए अंदर कूल्हों पर गए तोह आरती की धड़कन किसी जहाज सी होने लगी थी. "ये ऐसे तोह मुझे लिटा हे लेगा. कुछ कर आरती नहीं तोह नींद में अगर ये ऊपर चढ़

गया तोह कोई जवाब नहीं होगा तेरे पास." खुद से हे कहती जब वो ये सब सोच रही थी उसका बया उभार अर्जुन के दाए हाथ के पंजे में दबने लगा. जैसे हे ब्रा के

ऊपर से हे उसने वो गुब्बारा दबाया एक सिसकी के साथ हे आरती खुद को छुड़ा के बिना पीछे मुड़े बहार दौड़ गई. अर्जुन जब तक आँखें खोलता उसको बस किसी के जाने और

दरवाजा खुलने की आवाज हे आई. "अब ये कोण था जो ऐसे चला गया." खुद से कहता वो जब घडी को देखने लगा तोह उठ खड़ा हुआ. 12 बज चुके थे. टीशर्ट पहन कर

haath-mooh धो के वो ऐसे हे चलते हुए नीचे आ गया.

"कितना सोता है भाई तू? देख अब दोपहर होने को है और तू इस समय उठके आ रहा है." अलका दीदी ने ये बात कही तोह ऋतू दीदी के चेहरे पर भी हंसी आ गई.

"कोई काम था क्या आपको? अब मई थक जाता हु तोह खाली समय में आराम कर लेता हु. लड़कियों वाली बातें आती नहीं इसलिए आप लोगो के बीच ज्यादा बैठता नहीं."

"ाचा थोड़ी देर तक मई खाना बनती हु तू इतने ये सामान ला दे. ये कुछ सब्जियां और किरयाने का सामान है. और आरती तू अर्जुन के साथ चली जा." आरती की तोह

बोलती हे बंद हो गई अपना नाम सुनते हे जिसको ऋतू दीदी ने ाचे से ताड़ लिए था.

"अगर तुझे दिक्कत है कोई तोह मई चली जाती हु यार. वो तोह इसलिए तुझे कहा के तू भी थोड़ा मार्किट चली जाएगी. या फिर तारा और प्रीती में से कोई चली जाती

है." ऋतू की बात सुनकर आरती कड़ी हो गई अपनी कुर्सी से तोह अर्जुन अपने स्वभाव से हे हँसता हुआ आरती के कंधे पर हाथ रख उसको ठेलते हुए बहार निकल लिए.

ये कोई नै बात नहीं थी उसका अपनी बहनो से ऐसे hans-khelna. लेकिन आरती का मैं थोड़ा उलझन में घूम रहा था. स्कूटर स्टार्ट किआ तोह अर्जुन ने बैठने का इशारा

दिए. "कड़ी रहने से क्या हम मार्किट पहोच जायेंगे दीदी? बैठो भी अब." होश में आती आरती पायदान पर पांव रखती बैठ गई. एक हाथ उसके कंधे पे था लेकिन

शरीर कुछ दुरी पर. दोनों निकल लिए घर से और जैसे हे एक gati-avrodhak आया वो हल्का उछलती सी अर्जुन की पीठ पर आ लगी. "आह. देख के चला न भाई. कैसे

चला रहा है." उसके दोनों उभर हलके से डाब गए थे इस अचानक हुई घटना से.

"आप ाचे से सत् कर बैठ जाओ न फिर नहीं गिरेगी. ऐसे ब्रेकर तोह 3-4 है अभी और." अर्जुन हँसते हुए बोलै तोह आरती नजदीक खिसक गई.

'ाचे से और कितना चिपकायेगा. आज तोह होंठो के साथ मेरी छाती भी मसल दी और अब भी बोल रहा है चिपकने के.' मैं में ये बोलती वह अब अर्जुन की पीठ का

स्पर्श महसूस करती फिर से एक अलग दुनिया में आने लगी थी. क्या हो रहा है? और पहले ऐसा क्यों नहीं लगा कभी. जितना सोचती हु के भूल जाऊ और दूर राहु उतना

किस्मत साथ ला रही है. यही सब आरती को ख़याल आ रहे थे. अपने आप हे उसका हाथ अर्जुन की कमर में लिपट चूका था. जब स्कूटर के रुकने की आवाज आई तोह आरती

खयालो की दुनिया से बहार आई.

"आपको अगर अपने लिए भी कुछ लेना है तोह पहले हम वही ले लेते है." अर्जुन ने सामने कतार में बानी दुकानों की तरफ इशारा करते हुए आरती से पुछा तोह उसने ना

में सर हिला दिए. फिर वह मार्किट में पेड़ के नीचे कड़ी रेहड़ियों की तरफ चल दिए. आरती बताई हुई सब्जियां jaanch-parakh के लेने में लगी हुई थी तोह अर्जुन ने साथ

में हे लगी एक किताबो की स्टाल देखि. वह कई तरह के इंग्लिश हिंदी के उपन्यास और अलग किताबे ाचे से लगाईं गई थी. चुपके से वो उधर चल दिए क्योंकि आरती

दीदी को अभी समय लग्न था. "लव Story-Eric सीगल" "डार्ली Beloved-Mery जो पत्नी" शीर्षक की किताब उसने 150 रुपये दे कर खरीद ली और एक कागज में डलवा कर

वापिस रेहड़ी की तरफ आ गया.

"हो गयी आपकी खरीदी?" अर्जुन ने पुछा तोह आरती दीदी ने सर हिलाते हामी भर दी. सब्जी वाले को पैसे दे कर वो दोनों फिर किरयाने की दूकान पर आ गए. सामान के

साथ हे अर्जुन ने 6 चॉक्लेट भी अपनी बहनो के लिए ले ली. आरती ये देख कर पहली बार थोड़ा मुस्कुराई. दोनों थैले और बगल में वो कागज को दबाये अर्जुन स्कूटर तक

आ गया.

"आपने कुछ नहीं लिए तोह फिर मैंने खुद हे आपके लिए एक चीज ली है. मुझे पता है के आपको किताबो का शौक है तोह मेरी तरफ से ये आपके लिए." थैले स्कूटर

के आगे रखने के बाद उसने वो कागज में लिपटी दोनों किताबे आरती दीदी को पकड़ा दी. बिना हे उन्हें बहार निकले आरती ने हँसते हुए अर्जुन को थैंक यू बोलै और दोनों

वापिस घर की तरफ हो लिए. "कभी तोह लगता है के ये लड़का सबके हे साथ एक जैसा है. फिर ऐसा भी लगता है के इसका तारा के साथ एक हद्द से आगे का रिश्ता है.

लेकिन दिल कहता है की वो खुद हे तोह इसके आगे पीछे रहती है. प्रीती भी कैसे इसको प्यार से देखती है. ये खुद तोह किसी के साथ ऐसी वैसी हरकत नहीं करता.

और कितना ध्यान रखता है हर छोटी सी बात का भी. तारा कहा गलत हुई जब ये है हे ऐसा." किताबो को एक हाथ से अपने सीने से लगाती आरती को लग रहा था जैसे

ये खुद अर्जुन हे है. उसको खुद पहली बार समझ आ रहा था के ये प्यार कोनसी चिड़िया का नाम है. अर्जुन का वो स्पर्श दिमाग के साथ अब दिल में बैठ गया था. दोनों

घर के अंदर दाखिल हुए तोह आरती सीधा अंदर वाले कमरे में चली गई और अर्जुन दोनों थैले रसोईघर में ले आया. चॉकलेट बहार निकलते हुए उसने पहले प्रियंका

दीदी को दी, फिर ऋतू और अलका को, बहार आ कर एक तारा को पकड़ा कर जब उसने प्रीती की तरफ देखा तोह वो ऐसे शर्माने लगी जैसे अर्जुन सिर्फ उसके हे लिए ये लाया

हो लेकिन उसको देख सभी रहे हो. अर्जुन ने मुस्कुराते हुए पास जा कर चॉकलेट प्रीती को थमाई तोह वो ना में गर्दन हिलने लगी. "मोती नहीं हो जाएगी अगर एक छोटी

सी चॉकलेट खा लेगी. ाचा नहीं पसंद तोह फिर ले के मुझे दे डीओ. एंड थैंक्स अर्जुन." तारा की बात पर किसी बची की तरह प्रीती ने वो ले ली लेकिन फिर हाथ में हे

रख ली. आखिरी वाली आरती दीदी को देने के लिए वो ऋतू दीदी वाले कमरे की और गया तोह आरती एक किताब को लेकर बस उसके कवर में हे खोई थी. "लव स्टोरी"

"ये लीजिये आपकी चॉकलेट." उनके सामने करते हुए वो भी बिस्टेर पर धम्म से बैठ गया.

"ये बुक मैंने अपने कॉलेज की लाइब्रेरी में देखि थी. लेकिन मेरे से पहले हे किसी ने इसको अपने लिए लिखवा लिए था. थैंक यू अर्जुन." आरती की अभी की आवाज में एक

अलग से जज्बात और नरमी सी थी. अर्जुन ने उनके हाथ पर हाथ रखते हुए कहा, "मैंने अपनी प्यार बहिन को अगर कुछ दिए तोह हक़ से दिए है. कोई धन्यवाद् sun-ne

के लिए नहीं. और फिर ये जानकार ाचा लगा के आपको ये पसंद आई." उसकी बात पर आरती ने नजरे झुका ली थी. फिर चॉकलेट को खोल कर एक टुकड़ा अपने हाथो से

उसने अर्जुन की तरफ बढ़ाया तोह शरारत से उसने अपने मुँह में हे उनकी ऊँगली और चॉकलेट पकड़ ली. "ची.. गन्दा." आरती ने हंसी से ये बात कही तोह अर्जुन भी हँसते

हुए उठ खड़ा हुआ. "यहाँ मेरे साथ बैठने में दिक्कत है क्या कोई?" आरती ने ये बात भी भोलेपन से कही थी.

"पता है दीदी मई कुछ देर अगर रुका तोह आपको फिर बुरा न लग जाये. आप बहोत प्यारी और ाची हो. जो भी हुआ वो मेरी नींद में एक गलती से हुआ. और ये मुझे कैसे

पता चला तोह बस इतना कहूंगा के में हर महक को ाचे से समझ सकता हु. आपको वो बुरा लगा होगा. मई उसके लिए माफ़ी मांगता हु. लेकिन वो खुद से हो गया था.

बस अपने दिल पर मत लेना इस बात को." अर्जुन ने एक बार आरती के सर पर हाथ फिराया और उसको ऐसे हे हैरत में छोड़ वो बहार निकल आया.

'मतलब की उसको पता चल गया था के वह मई थी? और फिर भी ये इतना शांत रहा और ऊपर से इसको अपनी गलती बोल माफ़ी मांग कर चला गया. मई इसको नहीं जान पाई

के इसका दिल कैसा है. ये प्यार और इंसान की समझ रखता है लेकिन मई इस से बड़ी हो कर भी नहीं समझ पाई. ये सोचती आरती की आँखें हलकी नम्म हो गई और

एक बार फिर किताब की जिल्द पर लिखा नाम उसने देखा. "लव स्टोरी" अब यही तोह शुरू हो चुकी थी.

समय गुजरने के साथ हे खाना भी लग गया था. इतनी देर तक अर्जुन भी वही तारा और अलका दीदी से बातें करता रहा. बीच बीच में प्रीती भी सर हिला देती थी.

कुछ हे देर बाद कमरे के अंदर से टेलीफोन की घंटी की आवाज सुनाई पड़ी तोह अलका दीदी ने फ़ोन उठाया. एक मिनट बाद हे उन्होंने प्रीती को आवाज लगाई. छोल साहब

का फ़ोन था ये और प्रीती कोई 3-4 मिनट बात करती रही फिर बहार आई तोह अलका दीदी ने पुछा.

"क्या कहा दादाजी ने?"

"कुछ नहीं बस यही कहा के वो बुआ के साथ आज हे आ रहे है. रात तक पहोच जायेंगे." उसकी बात पर सबके कान खड़े हो गए सिवाए अर्जुन के तोह प्रीती ने बात

जारी रखते हुए कहा. "मैंने उन्हें बता दिए है की वो रात देर तक आईने तोह आज मई यही रुकूंगी. ऋतू और अलका दीदी के साथ. उन्होंने भी मंजूरी दे दी."

अब कही उन सभी के चेहरे पर कुछ शान्ति आई लेकिन फिर तारा ने बात उठा दी. "एक काम करेंगे हम. मेरे कमरे में बहोत जगह है तोह हम वह एक सिंगल बीएड साथ जोड़

देंगे और अगर फिर भी काम लगा तोह 2 मैट्रेस्स सोफे हटा कर नीचे लगा लेंगे." अर्जुन को तोह कुछ समझ आ नहीं रहा था लेकिन तारा की बात पर प्रियंका और ऋतू ने

हामी भर दी. प्रीती भी वैसे मुस्कुराती सबको देखती रही. कुछ देर बाद जब सब खाना खाने लगे तोह इधर उधर की बातें करते रहे. एक बार फिर फ़ोन बजा तोह

इस बार अर्जुन उठ गया. उसका खाना हो चूका था.

"Hello."

"हाँ मेरे बचे क्या हाल है तेरा?" अपने दादा की आवाज सुनकर वह चहक उठा.

"दादाजी मई ाचा हु. आप बताओ आप सब ठीक हो वह?"

"अरे हम सभी तोह मौज में है. सब थोड़ा इधर उधर थे तोह मैंने फिर यहाँ तेरे पास फ़ोन लगा लिए."

दोनों कुछ देर बातें करते रहे फिर फ़ोन रख के अर्जुन बहार आ गया. सबको बता दिए था के दादाजी का फ़ोन था और हालचाल ले रहे थे. आरती अभी भी चोरी से

अर्जुन को देख लेती थी. उसका मैं ऊपर तक भरा हुआ था अर्जुन को ये कहने के लिए की उसकी कोई गलती नहीं थी. और भी बातें वो करना चाहती थी उस से. फिर जब

सभी का खाना हो गया तोह तारा अलका दीदी के साथ बर्तन उठा अंदर चल दी. प्रीती भी उनकी मदद करने को उठने लगी तोह ऋतू दीदी ने उसको बैठा लिए.

"टिक के बैठ जा. जब ठीक हो जाएगी तोह ाचे से काम करवाउंगी तुझ से." उनकी बात से प्रीती अपनी जगह वापिस बैठ गई.

"यार मेरा तोह सोने का दिल कर रहा है." ऋतू दीदी ने प्रियंका दीदी को देखते कहा तोह वह हंसती हुई बोली, "तोह फिर ले जा अपनी जान को और कर ले आराम. मई भी

फारिग हो के आती हु. वैसे भी रात को तोह जागना हे है." उनकी बात पर वो दोनों हलके से मुस्कुराती ऋतू दीदी के कमरे की और चल दी. अर्जुन भी उठकर दादाजी के

कमरे में आ गया. जब कोई आसपास न दिखा तोह आरती भी अर्जुन की दिशा में चल दी.

"अर्जुन. मई कुछ देर बात कर सकती हु?" अर्जुन बिस्टेर से तक लगाए बैठा था आराम से और कमरे में सिर्फ हलकी रौशनी थी. कोई लाइट नहीं जल रही थी. कमरा बैठक

के साथ था तोह यहाँ दिन में भी हल्का अँधेरा रहता था.

"आपको पूछना नहीं चाहिए. और मई तोह खाली बैठा हुआ हु." अपने पास बैठती आरती दीदी से उसने आराम से हे कहा

"वो जो भी आज दिन में हुआ. उसमे तेरी कोई गलती नै थी अर्जुन. मई खुद बस तुझको देखती खो सी गई थी. मई तुझे उठाने के लिए आई लेकिन फिर जाने कैसे मई वह

तक आ गई थी. और नींद में बस तेरा हाथ मेरी पीठ से लगा तोह वो सब हो गया." नजरे नीचे किये हुए आरती ने पहली बात राखी.

"और जब मेरी नींद खुल गई थी तब भी तोह मई नहीं रुका था न? तोह गलती तोह हो गई मुझसे." अर्जुन ने वैसे हे शांत लहजे से यहाँ भी उनका हे पक्ष लिए.

"ये अगर तेरी गलती है तोह फिर मेरी भी तोह हुई. मई खुद भी तोह अलग न हो सकीय क्योंकि ये सब मेरे साथ पहली बार हुआ था और सच कहु तोह मेरी बात का बुरा

मत maan-na. मुझे ये ाचा लगा के मई भी महसूस कर सकती हु और मुझमे कोई खामी नहीं है. जैसा अक्सर मेरी सहेलिया कहती रहती है." वो अर्जुन की जांघ

के साथ हे बैठ थी तोह अर्जुन ने अपना बया हाथ उनकी पीठ पर पीछे से रखते हुए कहा, "आप में और कोई कमी? शायद ये बात वही लड़कियां कहती होंगी जिनकी

नजरो में आप उनसे कही ज्यादा सुन्दर है लेकिन वैसे कोई हरकत नहीं करती जैसा वो सब करती है. Maan-maryada हे तोह सिखाया गया है सभी को. लेकिन मेरी नजरे

आपकी सहेलियों या उन किसी से जरा भी तवज्जो नहीं रखती जो ये कहते है की आप में कोई कमी है. सच कहु तोह एक ाची पढ़ी लिखी लड़की के साथ आप एक बेहद

हे खूसूरत इंसान हो. ये बात आप किसी भी बहिन से पूछ सकती है. और फिर जब दिल भी इतना साफ़ है तोह आप किसी ऐसे की परवाह क्यों करती हो." अर्जुन के

स्वर में किसी समझदार व्यक्ति की पूरी झलक थी. अपने से बड़ी बहिन को वह इतने प्यार से समझा रहा था.

"और अगर मई ये कहु की मुझे तू पसंद है तोह क्या फिर भी तेरी नजरो में मई वैसी हे ाची लड़की रहूंगी?"

"आप कैसी बात कर रही हो? पसंद करना अधिकार है क्योंकि ये आपका चुनाव है. दिल की बात कह देने से ाचा कुछ भी तोह नहीं. अब सिर्फ आप हे तोह नहीं जो मुझे

पसंद करती हो. मई भी तोह यही सब आप में देखता हु और पसंद भी करता हु." सीढ़ी बात करना हे तोह आता था अर्जुन को और वैसे हे उसने ये बात कह दी. अब रसोई

-घर शांत हो चूका था. आरती ने इस गहरी शान्ति को महसूस करते खुद से हे अर्जुन पर झुकते हुए उसके होंठ चूम लिए. अर्जुन ने कोई बेताबी नहीं दिखाई बस उसने

अपनी दीदी को वही करने दिए जो वो कर रही थी. जैसे हे ये चुम्बन टूटा आरती उठने हे लगी की अर्जुन ने उनका हाथ पकड़ कर अपने ऊपर गिरा लिए. "सिर्फ खुद हे करोगी

इजहार.?" अर्जुन की बात का मतलब समझ वो शर्माती सी उसके सीने पर गिरने को हुई लेकिन अर्जुन ने चेहरा थामते हुए दोनों होंठ अपने मुँह में आहिस्ता से लेते हुए बस

उनकी नर्माहट को जीभ और मुँह से महसूस सा किआ. फिर आरती ने भी उसके कंधे पर हाथ रखते हुए अपने भीगे हुए होंठ उसके होंठो से मिलते हुए अपना भरपूर

प्यार दर्शाया. कुछ हे पल के इस चुम्बन के बाद वह उठने लगी तोह उनका एक उभर अर्जुन की छाती से रगड़ता सा गया. "आह" बिना पालते वह मुस्कुराती बहार को निकल

गई. इधर अर्जुन भी वह से उठकर बहार निकल गया अपने दोस्त संदीप के घर.

दोनों दोस्त आज थोड़ा खाली थे तोह टेलीविज़न पर गेम खेलने लग गए. संदीप के घर पर सभी थे तोह ज्योति ने खुद पर काबू कर लिए था. वो बस एक बार chai-paani का पूछने के बाद उनके कमरे में नहीं गई. 3 बजे से लेकर वो दोनों अगले 3 घंटे बस गेम में हे डूबे थे की संदीप के पिताजी ने आवाज देते हुए दोनों को समय

का भान कराया और संदीप को खली डोलू देते हुए दूध लेकर आने को कहा. अर्जुन भी उसके साथ हे चल दिए. कोई 10 मिनट की दूरी पर हे ये भैंसो का तबेला था

जो की सेक्टर से पीछे एक कॉलोनी में पड़ता था. फिर वह से बहार निकले दूध डलवा कर तोह अर्जुन और संदीप की नजर सेक्टर की इस पहली गली के बहार कड़ी 2 लड़कियों

पर गई, जो घर के बहार बातें कर रही थी. लेकिन अर्जुन को देखते हुए इस लड़की ने बातें बंद कर बस ध्यान उसकी तरफ हे कर दिए और अपनी आंखों से अर्जुन का

अभिवादन करती दिखी. यही अर्जुन ने किआ लेकिन उसको झटका लगा था इस लड़कीओ को यहाँ देख कर.

"भाई ये आकांक्षा यहाँ क्या कर रही है.?" ये उसके स्कूल की वही लड़की थी जिसने अर्जुन से अपने प्यार का इजहार किआ था और अर्जुन ने भी उसकी भावनाओ को किसी ाचे

दोस्त से ज्यादा मान लिए था. स्कूल की छुट्टियों के बाद आज पहली बार हुआ था के उसने आकांक्षा को देखा था.

"ये उसका हे घर है भाई. तूने कभी मेरे से पुछा नहीं और मुझे भी ध्यान नहीं रहा तुझे बताना. खुद हे देख ले के हम दोनों पिछले 15 दिन में आज तीसरी बार हे

मिल रहे है तोह आकांक्षा की बात कहा हो पाई." अर्जुन को भी संदीप की बात ठीक लगी फिर और ज्यादा यहाँ ध्यान न करते दोनों बस घर की तरफ हो लिए. संदीप के

घर के बहार से हे वह अपने घर की तरफ हो लिए. यहाँ पंहुचा तोह संजीव भैया घर के बहार गाडी लगा रहे थे. उसको आता देख वही रुक गए और अर्जुन समझ

गया के गाडी बहार है तोह वो फिर जायेंगे.

"कहा से आ रहा है?"

"वो संदीप के घर वीडियो गेम खेल रहा था. अभी वही से सीधा घर आ रहा हु. आप क्या वापिस कही जाएंगे?"

"है छोटे लेकिन किसी को कुछ बताना नहीं. आज लकी के साथ मीटिंग करि थी एक कंपनी से तोह वह वो कॉर्पोरेट इन्शुरन्स मुझको मिल गया है. 250 लोगो का तोह लकी

ने पार्टी के लिए बोलै है इसलिए जाना पड़ेगा. कुछ और भी दोस्त होंगे तोह सोचा एक बार घर पर नजर मार लू. बाकी तू संभल हे लेगा ाचे से." संजीव भैया ऐसे

बात कर रहे थे जैस वो एक तरह से अर्जुन से अनुमति ले रहे हो.

"ाचा तोह ये तोह बात हे पार्टी वाली हुई. लेकिन मेरा तोह कोई फायदा नहीं हुआ. गेम की कैसेटटे न आपकी जेब में दिख रही है और न वो कार में होगी."

"हाहाहा.. छोटे तुझे मई नै गेम हे ला दूंगा. वो भी महंगी वाली बस आज तेरे सामने सीधा मीटिंग से आ रहा हु. मई अंदर एक बार सब देख लेता हु तू बगीचे में

पानी छोड़ दे." उसका कन्धा थपथपाते वो अंदर चले गए. टेबल पर अभी भी 500 रुपये वही शीशी के नीचे रखे थे जो उन्होंने वह से उठाते हुए अलका को आवाज

लगाईं.

"क्या बात? कोई सामान नहीं मंगवाया था क्या आज?" अलका उनके सामने आई तोह बस यही पुछा उन्होंने पैसे दिखते हुए.

"वो मार्किट में अर्जुन ने हे पैसे दे दिए थे सामान के भैया. शायद 400 के आसपास." साथ हे बहार को आई आरती ने उन्हें बताया तोह वो पैसे उन्होंने अलका को देते कहा

"ये उसको दे देना. वो छोटा है और मई कमाता हु. आज शायद मई लेट आऊंगा तोह मेरा खाना मत बनाना. ज्यादा देरी हुई तोह फिर मई सुबह में आऊंगा तैयार होने के लिए.

अपने तक रखना ये बात." संजीव भैया यहाँ भी अलका से धीमे से बात करते दिखे. अलका ने बस सर हिला दिए और आरती तोह तभी अंदर जा चुकी थी. कुछ देर बाद वो

वापिस निकल गए तैयार हो कर और इधर ये लड़कियां 7:30 बजते देख फिर से रसोईघर में जमा होने लगी. ऋतू दीदी ने जल्दी से दूध बना के एक लड्डू के साथ अलका को

थमाया, 'वो पागल बहार हे अभी तक एक घंटे से. जा जरा उसको पकड़ा के आ ये और देखिओ के लड्डू फेंक न दे. दादी को तू जानती हे है." अलका भी बात मानती बहार

चल दी जहा वो बगीचे के हर पौधे और पेड़ को पानी से भर रहा था, रबर की पाइप से.

"ोये चल ये ख़तम कर इतने मई पानी देती हु." अलका दीदी ने बगीचे में रखे लकड़ी के स्टूल पर गिलास और कटोरी राखत हुए कहा और अर्जुन से पाइप ले ली.

"दीदी ये न बड़ा बकबका सा है. लड्डू जैसा इसमें कुछ है नहीं और ऊपर से रात में गर्मी लगती है वो अलग." मुँह बनाते अर्जुन ने वो निचे रखना चाहा तोह अलका

ने हल्का गुस्सा दिखाया. अर्जुन ने दवाई की तरह बस किसी तरह वो ख़तम किआ और दूध का गिलास खली करके रख दिए.

"लाओ ये मुझे दो और आप अंदर जाओ." अँधेरा हो चला था तोह अलका भी उसको आने का बोल कर अंदर आ गई खाली बर्तन लिए.

रात का खाना हो गया तोह सभी ऊपर चल दी. अर्जुन ने बहार का दरवाजा लगा दिए और फिर संजीव भैया की बात याद करते हुए नीचे बैठक वाले दीवान पर हे 2 तकिये और चादर लेकर लेत गया था. 11:15 तक टेलीविज़न देखता रहा और उधर ऊपर वो सब लोग भी टेलीविज़न से चिपकी हुई थी. तारा के बिस्टेर पर उसके साथ आरती

और नीचे 2 गद्दे अर्जुन के बिस्टेर से लिए हुए बिछाकर प्रियंका दीदी के साथ ऋतू और प्रीती थे. अलका सबको गूडनिघत बोलकर बहार निकल आई तोह दीदी ने दरवाजा बंद

कर लिए. टेलीविज़न पर ये चैनल थोड़ी म्हणत के बाद उनको मिल गया था जिसका नाम टीवी6 था. जैसा की उस दौर में सेंसरशिप का कोई झंझट नहीं होता था रात 11 के बाद तोह इस समय भी एक व्यस्क फिल्म शुरू हो चुकी थी, कहानी वाली. लेकिन भाषा शायद रुस्सियन थी तोह सब चुपचाप बैठी थी. स्क्रीन पर एक लड़की गमलो में पानी

दे रही थी एक पुराने बड़े घर में. जिसको देख कर वो लगता था के ये रुस्सियन पतली सी लड़की यहाँ की कामवाली थी. गीले तंग कपडे, जो एक कमीज और स्कर्ट थी पहने

वो गांड हिलती हुई घर के अंदर आ गई. यहाँ वो एक आलिशान से बाथरूम में अपने सब कपडे निकल पानी से भरे टब में बैठी तोह सभी लड़कियां इस दृश्य में खो

सी गई. वो पतली लम्बी लड़की जिसके अनार बस मुट्ठी भर थे और पिछवाड़ा थोड़ा मोटा लेकिन खूबसूरत था. घर जैसे पूरा खली था वो. इतने में बहार एक लम्बी पुराणी

कार आकर रुकी जिसमे शायद घर का मालिक था. लम्बा तगड़ा बिना कोई चेहरे पर बाल के, नीली आँखों वाला रुस्सियन. आराम से वह घर में दाखिल हुआ जहा उसको कोई

दिखाई न दिए तोह एक कांच के गिलास में साफ़ पानी सा तरल डालते वो सोफे पर बैठ गया.

"ये वोडका है. हमारे घर में दादाजी के बार में भी राखी है इसकी बोतल. रुस्सियन शराब कहते है इसको." प्रीती ने ये आवाज निकली. फिर अंदर वो लड़की टब से बहार

नीली तोह उसके गोर छोटे दूध पर पतले और थोड़े अधिक लम्बे चूचक तीर जैसे फुले हुए थे. एक बार फिर शांति सी हो गई तोह ऋतू ने हलके से प्रीती की कमर पकड़

ली लेकिन प्रीती ने चेहरा फिल्म की तरफ हे रखा. वो एक टोलिया लपेट कर बहार आई तोह सामने हे घर का मालिक शराब की चुस्किया लेता दिकः. हड़बड़ाहट में उसका टोलिया शरीर से उतर गया तोह दोनों हे एक दूसरे को देखने लगे. अगले दृश्य में वो आदमी नीचे बैठ कर उस युवती की baal-rahit सफ़ेद छूट को मुँह में ले कर चूस रहा था और वो सिर्फ दिवार से लगी इसका आनंद ले रही थी. यहाँ सबकी सांसें तेज चलने लगी थी और तारा थोड़ा मस्ती में आरती को बाँहों में लिए थी. प्रियंका दीदी तोह

ये सब पहली बार देख रही थी. स्वाभाविक था की उम्र होने पर उनकी भी कामना भड़कने लगी थी लेकिन एक नजर वह ऋतू पर दाल फिरसे फिल्म देखने लगी. यहाँ अब वो

लड़की coat-pant पहने उस आदमी की ज़िप खोलकर उसका बीतते भर का लुंड मुँह में किसी कुल्फी की तरह भर के चूस रही थी. पूरा मुँह कुछ देर में सफ़ेद पानी से भर गया तोह कुछ देर बाद सन बदल गया. रात के समय वो आदमी अपने कमरे में सो रहा था. और बहार एक अकेले कमरे में वो लड़की. दरवाजे पर खटका होने से लड़की ने

उसको खोला और बहार शायद ये नौजवान उसका प्रेमी था. दोनों पागलो की तरह एक दूसरे पर झपट पड़े. कुछ देर बाद दोनों हे नंगे थे और इसका लुंड भी पहले वाले

जितना हे था जिसको एक बार चूस कर इस लड़की ने अपनी छूट पर लगाया तोह हलकी सिसकारियां लेती वो कमर हिलने लगी. यहाँ कमरे में भी अब कुछ अलग दृश्य था. प्रीती को छोड़कर अब ऋतू दीदी प्रियंका दीदी के उभारो को शरारत से सहलाने लगी थी और आरती के साथ भी तारा यही कर रही थी. बस आरती थोड़ा शर्मा रही थी

लेकिन प्रियंका दीदी फिल्म देखती रही. जैसे हे फिल्म में लड़के ने लड़की को पलट कर अपना लाल गोरा लुंड उसकी गांड के छेड़ पर रखा तोह पांचो की सांस अटक गई.

"अरे ये भी कोई करने की जगह होती है?" प्रियंका दीदी की बात पर तारा और ऋतू तोह मुस्कुरा दिए लेकिन बाकी दोनों शर्म से बस फिल्म में गड़े रहे.

"दीदी, जितने छेड़ दीखते है उतना में हे ये जाता है. मुँह, वागिना और अनुस." ऋतू की बात पर तारा ने थोड़ा और इजाफा कर दिए. "वैसे इनको आप ओरल, पुसी एंड अस्स

भी कह सकती है. और ज्यादातर फिल्मे अस्स सेक्स जरूर दिखती है."

"नहीं यार ये तोह नेचुरल नहीं होता जहा तक मैंने पढ़ा है." प्रियंका दीदी बातें तोह कर रही थी लेकिन उन्हें उस लड़की की आहें बता रही थी की गांड मरवाने में

भी उसको मजा मिल रहा था. ऐसे 3 और दृश्य और हुए फिर लाइट बुझा कर वो सब सो गई. समय भी करीब 1 का हो गया था. प्रीती के उभार सहलाती ऋतू दीदी उसके

साथ एक चद्दर में थी. प्रियंका दीदी ने एक दो बार जरूर सलवार के ऊपर से अपनी छूट सहलाई लेकिन फिर वो भी सोने लगी. ऊपर वाले बिस्टेर पर भी तारा आरती की

टीशर्ट में हाथ डाले उसके आम हलके से मसलती चिपकी हुई थी. कुछ हे पल में पूरा कमरा शांत हो गया था. लेकिन नीचे शायद एक तूफ़ान चल रहा था इनकी कल्पना

से परे.
 
नेक्स्ट डबल अपडेट कल दोपहर तक पोस्ट कर दूंगा. देरी के लिए माफ़ी :)
 


अपडेट 38

मेरी अलका मेरी जान


पहली मंज़िल पर पूरा सन्नाटा था. और अलका अपने कमरे में आने के बाद कोई आधे घंटे तक अंदर जाने क्या करती रही. फिर चुपचाप वो सामने बने कमरों से होती

हुई बैठक में आ कड़ी हुई. यहाँ टेलीविज़न चल रहा था लेकिन अर्जुन चद्दर ऊपर किये लेता हुआ था. टेलीविज़न पर वुफ की कुश्ती धीमी आवाज में चालु थी. अलका

ने सब ाचे से देखभाल कर उसके बिस्टेर का रुख किआ. चादर को एक तरफ से उठती वो उसके अंदर चली गई जहा अर्जुन अभी हलकी नींद में हे था. अलका की उत्तेजन

स्पष्ट थी क्योंकि जैसे हे वो अर्जुन से लिपटी थी उसका एक हाट सीधा अर्जुन के पाजामे के अंदर उस अर्धनिद्रा में पड़े नाग पर चला गया और वो खुद अपने होंठ उसकी

थोड़ी पर फिरने लगी थी. ऐसा बिलकुल नहीं लग रहा था के जैसे ये लड़की इस kaam-milan में कोई पहला कदम रख रही हो. गीली जीभ और अपने लुंड पर बानी एक

नरम पकड़ से अर्जुन ने हलके से आँखे खोली तोह ज्यादा कुछ नजर नहीं आया सिवाए एक लड़की जो उसपर झुक के उत्तेजना बढ़ा रही थी. अर्जुन ने अपना दया हाथ, जो

अलका दीदी की तरफ था वो उनकी कमर पर रखते उन्हें पूरा अपने ऊपर लिटा सा लिए.

"तुम जाग गए मेरे मजनू?" अलका दीदी की इस दिलेरी पर मुस्कुराता अर्जुन उनके थोड़े से फुल्ले हुए गाल को मुँह में लेता और प्यार से चूमने के बाद बोलै, "सोया हे कब

था. बस कुछ मजा नहीं आ रहा था तोह आँखें बंद किये लेता था. और अब आप आ गई हो तोह फिर ाचा हे हुआ न."

"पहली बात जब हम दोनों हो तोह तू मुझे ये आप या दीदी नहीं कहेगा, काम से काम इन पलों में जहा बस हम दोनों हे प्यार में डूबे हो. और दूसरी बात अगर तू सो भी

रहा होता तोह भी मैंने खुद हे आज कर लेना था सबकुछ तेरे साथ. ज्यादा बेचैन कर दिए तूने मुझे." एक बार कास के लुंड को दबाने के बाद अलका ने वो हाथ बहार

निकल लिए और अब दोनों टंगे उसकी कमर की दोनों तरफ करती ठीक अर्जुन के ऊपर आ गई. अर्जुन ने भी अपने हाथ जब अलका दीदी के कूल्हों पर रखे तोह पहले थोड़ा हैरान

हुआ फिर मुस्कुराने लगा. "पूरी तैयार हो कर आई हो. मतलब कोई समय ख़राब नहीं करना? सिर्फ एक पतली बिना बाजु की फ्रॉक के नीचे अलका ने कोई भी अंगवस्त्र नहीं पहना हुआ था. अर्जुन ने जब कूल्हे पकडे थे तोह वह कोई कच्ची नहीं थी जिस से उसने ये बात कही.

"शरीर पर न कही कपडे है और न कही कोई बाल. और मई चाहती हु के बस इस रात में हम दोनों जितना समय मिले, प्यार हे करे." उसका एक हाथ पकड़ती अलका दीदी

ने अपना दूध उसकी हथेली पर टिका दिए. पतले कपडे की फ्रॉक में से वो नरम गोला बिलकुल नंगा महसूस हो रहा था. रंगीन टेलीविज़न की रौशनी में अलका दीदी भी

किसी इंद्रधनुषी अप्सरा से दिख रही थी. कपडे के ऊपर से हे अर्जुन ने वो दूध मुँह में भर लिए था. अब मुद्रा इतनी उत्तेजक हो चुकी थी दोनों की. दीवान पर अर्जुन

पाँव सीधे किये बैठा था और उसकी गौड़ में टंगे अर्जुन की कमर से लपेटे अलका का सर हवा में पीछे को हो रहा था. सर को हल्का झुका कर वो दूध को ाचे से

मुँह में भर के चूसने में लगा था और अलका बस उसके सर को एक हाथ से सहलाती दूसरे हाथ से कन्धा पकडे हुए थे. फिर अर्जुन ने दोनों हाथो से थोड़ा कमर से ऊपर

थामने के बाद बारी बारी से वो उभार चूमे चाटने शुरू कर दिए थे. दिन का उजाला होता तोह शायद कपडे के भीगने से वो गोल बड़े नारंगी साफ़ हे दिखाई देते.

"ये उतार न." थोड़ा जोर लगाती अलका ने अर्जुन की टीशर्ट गौड़ में बैठे हुए हे पकड़ कर खींच दी जिस से उसका मुँह उन मॉटे दूध से हट गया था. उसकी छाती को

चूमती अलका अपनी गांड के नीचे दबे मोठे लुंड पर कमर रगड़ने लगी थी. अर्जुन भी अलका का ये जलवा देख एक नया आनंद लेने लगा था. "सम्भोग में अगर दोनों

इंसान बराबर रूचि दिखाए तोह ये परमानन्द तक ले जाता है. ऐसी क्रीड़ा कोई 50 में से 1 हे युवती कर सकती है." ये पंक्ति याद आ गई थी अर्जुन को. और अलका दीदी

बस वैसी हे जोड़ीदार दिख रही थी. उनकी फ्रॉक को ऊपर उठाने का प्रयास किआ तोह खुद अलका दीदी ने हाथ उठा लिए. इतनी रौशनी में उनके दोनों गोल चुके साफ़ नजर आ

रहे थे. कुछ पल उन्हें देखता वो अपना मुँह लेके जैसे हे उनकी तरफ बढ़ा अलका ने उसका मुँह ऊपर करते हुए उसको होंठ चूसने शुरू कर दिए. अब हाथो ने वो करना

शुरू कर दिए जो होंठ चाहते थे. रूई से नरम लेकिन रबर से लचीले और बिलकुल कैसे मॉटे दूध किसी संतरे से बड़े थे. उनके चुचुक कितनी देर से खड़े थे जिनको

अब अर्जुन अपने अंगूठे और उंगलियों के बीच भरता मसल रहा था.

"है ऐसे हे कर इनके साथ. आह दबाता भी रह नहीं तोह वो दर्द करने लगेंगे. शश.." मजे की सिसकिया लेती अलका ने एक हाथ से अर्जुन का हाथ पूरे दूध पर दबाया.

निप्पल कुछ ज्यादा हे मसल दिए थे अर्जुन ने. नीचे छूट पानी बहती पजामा गीला करने लगी तोह अर्जुन ने एक पल के अलका दीदी को खुद से अलग कर जल्दी से वो उतार

कर नीचे फेंक दिए. अलका साइड में बैठी उस बड़े विशाल लुंड को घूर रही थी, जो कुछ देर बाद आज उसके अंदर हे जाने वाला था. बिस्टेर पर कड़ी होती वो फिर से

अर्जुन के सामने आये और जांघो की तरफ नीचे बैठने लगी. गरम नंगे लुंड का आभास जैसे हे छूट के नीचे से गांड की दरार तक महसूस हुआ तोह वो अंदर तक

मचल गई. "ये है तोह बहोत बड़ा. आह.. लेकिन ाचा भी लग रहा है." एक बार ाचे से लुंड पर छूट घिसने के बाद खुद हे अपना दूध अर्जुन को पिलाती लगी.

"ाचे से चूस इन्हे तू. आह मुझे ये दीदी जैसे करने है.. आह अर्जुन.." अर्जुन भी दबा दबा कर जैसे उनमे से दूध हे निकलने लगा था. जब दोनों हे पूरे फूल कर

थोड़ा दुखने लगे तोह अर्जुन ने उनका कन्धा पकड़ते कहा. "दीदी, टाँगे ऐसे हे राखी रहने दो और पीछे लेत जाओ." उसकी बात सुनती अलका अपनी लम्बी टाँगे अर्जुन

की कमर के गिर्द रखती अपने कामुक सीने को ऊपर उठाये बिस्टेर पर लेत गई. "दीदी फिर से बोलै तोह मई बीच में उठ के जाली जाऊंगा." हलके गुस्से से अर्जुन को देखती

वो बोली तोह अर्जुन दोनों जांघो को फैला कर बस इतना हे बोलै, "जान आदत धीरे धीरे बदलती है." और फिर अपने होंठ महकती छूट के ऊपर चिपका दिए. अलका ने ये

अभी यहाँ आने से पहले हे बिलकुल चिकनी की थी और कोई हलकी गंधरहित चिकनाई लगा ली थी जिस से वह अजीब न लगे. "आह क्या करने लगा ये? तेरी जीभ तोह और

मजे देने लगी यार." अलका सर को daye-baaye हिलती कमर को उचकने लगी. लेकिन अर्जुन दोनों जांघो को ाचे से दबाये इस हलकी नमकीन छूट को तल्लीनता से पीने लगा

था. कभी पूरी जीभ ऊपर से नीचे फिरता तोह कभी उसको छेड़ में टिकता मॉटे उभरे होंठो को मुँह में भर के चूसने लगता. अर्जुन को शायद वो किताब क्या ज्ञान

मुखमैथुन के लिए हे उकसाने लगा था. उस का नतीजा था के अब वो एक बार छूट को जरूर चख के देखने लगा था. जैसे हे उत्तेजना में अलका ने दोनों जाँघे अर्जुन

के सर पर कासी उसको पता लग गया था के अलका दीदी का पहला सखलन होने लगा है. साथ हे वह उनके कूल्हों, कमर और जांघो की लचकता पर भी ध्यान दिए था.

"सब सफ़ेद दिखने लगा है.. आह.... ये मजा अलग है रे. जैसे सब खाली हो गया." निढाल होती वो पसारने लगी तोह अर्जुन ने उनकी पकड़ कर उठा लिए. "अभी नहीं.

ये सिर्फ शुरुआत थी. अभी बहोत कुछ पड़ा है अलका जो महसूस करना बाकी है." पहली बार अपनी बड़ी बहिन का नाम लेता वो उन्हें गले लगाए बिस्टेर से नीचे उतर

गया. "इसको ाचे से सेहलाओ अपने हाथो से." खुद बिस्टेर की किनारी पर बैठ दीदी को अपने सामने खड़ा कर उसने अपना लुंड उनके हाथो में थमाया. फिर उनके गुदाज

गोल कूल्हे दबाता अपने लुंड मसले जाने का मजा लेने लगा था. दोनों कभी गहरा चुम्बन करने लगते तोह कभी वो जहक कर उनके दूध को मुँह से चुभला देता.

"आप अब यहाँ मेरी जगह लेत जाओ. दोनों पेअर नीचे कर के." अलका उसके कहने के मुताबिक दीवान के बीच में अपना ऊपर का भाग रख लेत गई. इधर अर्जुन ने उनकी दोनों

टांगो को घुटने के ऊपर से पकड़ कर ऊपर उठा लिए.

"आपका जिस्म कितना लचकदार है. हर जगह जैसे आप खुद को एडजस्ट कर लेती हो." अर्जुन की बात पर अलका मुस्कुराती बोली, "नाचने से बेहतर को कसरत नहीं किसी लड़की

के लिए और यही तोह कमल है जो अब तुम देख रहे हो." ाचे से उनके कूल्हे आधे बिस्टेर पर टिकता अर्जुन अब अपना लुंड उनकी छूट पर लंबवत रखता उनके ऊपर थोड़ा झुक गया था. "दर्द होगा लेकिन बर्दाश्त कर लेना. फिर उसके बाद सिर्फ प्यार और मजा हे मिलेगा." इतना बोलकर अपना लुंड अलका दीदी के हाथ में देते उसने उन्हें लुंड का

सूपड़ा छूट पर टिका कर रखने को बोलै. अलका ने भी सख्ती से लुंड को पकड़ कर अपनी छूट के छोटे से छेड़ पर रख लिए था. दोनों जांघो को फैलाये और उनके होंठो

को मुँह में दबाये अर्जुन ने इस मखमली छूट में अब तक का सबसे जोरदार प्रहार किआ था. छूट जितनी भी गीली थी लेकिन इस भीषण लुंड के लिए सुरंग पतली और टाइट

हे थी. "Maa..aaaiiiiii." दबाये होंठो के सिरे से भी एक दर्दनाक लेकिन माध्यम सी आवाज निकल हे गई. गुलाबी छूट की दोनों फांके 3 इंच चौड़ी हो चुकी थी और

लुंड सब दीवारे तोड़ता हुआ 4 इंच से ज्यादा छूट के अंदर बैठ गया था. इस काम रौशनी में एक गहरी पतली धार छूट और लुंड के मिलान से निकलती कूल्हों की दरार तक

आ चुकी थी.

"निकाल मत लेकिन एक मिनट रुक जा. आह प्लीज.. ये तोह आफत है.. आठ.. ऋतू की हिम्मत हे hogi..ummmm जो झेल गई.. आह नीचे से कुछ.. आह निकल रहा." सर को

धीमे धीमे पटकती सी अलका इस करारे धक्के से किसी ककड़ी की तरह कटी अपनी छूट में उठते दर्द को झेलने लगी. माथे पर पसीना आ चूका था ुर जिस्म जैसे

ठंडा होने लगा था.

"अब बस थोड़ा और सेह लेना फिर उसके बाद यकीन दिलाता हु की दर्द नहीं होगा." प्यार से उनके लैब चूसने के बाद अर्जुन हौले हौले दोनों दूध के कलश मसलता बोलै.

"अहम्म्म्म्म. दर्द तोह होना हे था यार.. आठ.. मैंने आज तक ऊँगली नहीं डाली.. इस्सस.. और ये सीधा मूसल घुस गया आज.." 2 मिनट बाद जिस्म गर्माने लगा तोह अलका

ने खुद हे अपनी कमर निचे बिस्टेर पर टिका दी जो पहले उचक गई थी इस हाहाकारी झटके से. अर्जुन प्यार से थोड़ा लुंड खींचने के कोशिश कर रहा था तोह लाल

मांस भी थोड़ा चिपकता सा बहार आ रहा था. सुपडे की जड़ तक बहार निकलते हुए उसकी भी हालत पतली हो गई थी.

"अलका ये सच में कुछ ज्यादा हे छोटी थी मेरे लुंड के मुकाबले. बहार निकलने में मुझे भी जोर लगाना पड़ रहा है." पहली बार अर्जुन ने जब अपने का नाम लिए तोह

न चाहते हुए भी अलका दीदी के चेहरे पर शर्म और मुस्कुराहट सी तैर गई.

"कोई ाचा सा लफ्ज़ नहीं मिला जो ये बोल रहा है?"

"इसको पेनिस या लिंग कहूंगा तोह आपस में बातें करने में उतना मजा भी नहीं आएगा. ये आपकी वागिना को पता है क्या कहते है?" उन्हें बातों में लगाए अर्जुन अपने

शरीर को अगले धक्के के लिए तैयार कर रहा था.

"उम्म्म.. गन्दा सा नाम है मैंने सुना है अपनी सहेलियों के मुँह से. छू.. आठ मार दिए.. माँ मर्डर गई मई. रुक प्लीज मेरे पेट में आह.. जैसे आह कोई रोड दाल दी."

छूट बोलना हलक में हे रह गया था अलका का. अर्जुन ने पूरे लुंड से बस एक इंच काम हे बचाया था और बाकी सारा छूट की हद्द तक अंदर पंहुचा दिए था. टाँगे

कांप रही थी लेकिन अर्जुन उन्हें मजबूती से पकडे था. जो लकीर थोड़ा बहती सी रुक गई थी वापिस हलकी सी रिसने लगी थी. शायद छूट के अंदर इकठ्ठा बचा हुआ खून

बहार निकल आया था जगह के अभाव में. और इस नरम लेकिन तंग सुरंग में अर्जुन का लुंड भी किसी nut-bolt जैसे फिट हो गया था. टाँगे कंधे पर सत्ता के वो अलका दीदी के कूल्हों को मींजता उन्हें संभाल रहा था. पूरा नरम शरीर जैसे बेजान सा हो गया था कुछ पल के लिए. "गर्मी देनी पड़ेगी." खुद को इतना बोल कर अर्जुन ने

थोड़ा सा लुंड बहार खींचा और वापिस अंदर धकेल दिए.

"ाःह.. मई मर्डर जाउंगी ृक्क जा.."

"ऐसे करूँगा तोह ठीक हो जाओगी जल्दी हे नहीं तोह फिर ये छूट और ज्यादा दुखेगी सुक्ने पर." लुंड अंदर बैठ चूका था तोह ऐसे हे उसने अलका दीदी के पाँव थोड़े

घूमते हुए शरीर लम्बाई में बिस्टेर पर कर दिए. ये हरकत भी छूट में मिर्ची लगने का काम कर रही थी.

"तू मुझे मार हे देगा. आह अब ये क्या कर रहा है.." कराहती हुई अलका कुछ कर पाने की हालत में थी नहीं बस अर्जुन की हरकत देख हे सकती थी.

आराम से दोनों पांव हलके मोड़ते हुए अर्जुन ने उन्हें बिस्टेर पर टिका दिए अपना लुंड अंदर फंसाये हुए हे. फिर उनके ऊपर झुकता वो प्यार से उनके दूध मसलता हुआ दोनों

होंठो को पीने लगा. 2-3 इंच लुंड बड़ी होली रफ़्तार से छूट की दीवारों को रगड़ता अंदर बाहर हुआ तोह अलका का दर्द भी सर उठाने लगा लेकिन चुंचो की मसलन और

होंठो पर अर्जुन के गीले मुँह का मजा उन्हें सेहन करवाता रहा.

"अब 2 मिनट में ठीक हो जाओगी." उनपर लेटकर अपने दोनों हाथो से कूल्हों की गद्देदार फांके पकड़ता अब कुछ तेजी से वो आधा लुंड छूट में दबा के चलने लगा तोह

दर्द के बावजूद छूट पानी बहाने लगी थी.

"Aah-Aah.. करता reh..Hone दे दर्द भी.." हिम्मत दिखती अलका भी अपनी गांड कुरुदे जाने के मजे में छूट में लुंड लेने लगी थी. 10 मिनट बाद तोह हालत ये थी

की हर दूसरे धक्के पर वह खुद भी कमर आगे उचकने लगती. छूट से थोड़ा तरल जब गांड की लकीर में आने लगा तोह अर्जुन ऐसे हे धक्के लगते हुए अपनी ऊँगली

उस तरल से गीली कर गांड के उस संवेदनशील छेड़ पर रगड़ता थोड़ा अंदर करने लगता. ये छेड़ उसको ताई जी के और ज्योति के गांड के छेड़ से भी नरम और

मुलायम लग रहा था. यहाँ का मांस लचीला था जिस से बिना ज्यादा म्हणत हलके दबाव से हे आधी ऊँगली अंदर चली गई जब अलका ने गांड को नीचे किआ.

"उम्म्म.. आह ये क्या कर रहा है..? आह निकाल.. " सिर्फ बोल रही थी लेकिन गांड को ऊँगली से अलग करने का कोई प्रयास न किआ उसने इधर अब चिकनाई में भीगा चमकता

लुंड 6-7 इंच तक बाहर निकलता अंदर जा रहा था. एक बार ाचे से लुंड छूट में बैठकर अर्जुन ने अलका दीदी को बिस्टेर पर पलटा सा दिए दोनों टंगे हवा में किये.

अब उनकी चुनचे बिस्तर पर ठीके थे और गांड ऊपर की तरफ. सही तरीके से उनके घुटने बिस्टेर पर टिकता वो ये सब किसी अनुभवी की तरह कर गया था. ऊपर से अलका

दीदी का जिस्म भी काम नहीं थी. गांड जांघो के सामने आते हे अर्जुन ने नीचे हाथ बढाकर अब लुंड जड़ तक अंदर ठेलना शुरू कर दिए था. वही कुछ हे देर में

अलका की हलकी सिसकारियां अब ऊँची आहों में बदल गई थी. "Thapp-Thapp Patt-Patt" की आवाज बता रही थी की छूट ने अब उस तगड़े लुंड को अपना मान लिए था और पूरी

तरह से अंदर तक झेलने लगी थी. मुँह ऊपर को उठाये दूध के साथ अपनी गांड भी दबवाती अलका दीदी का एक तेज सखलन हुआ जो इतना तीव्र था के अगर नीचे

घर में कोई होता तोह पक्का हे वह आ जाता. "उम्म्माह.. मई गई रईईए.. आठ. पूरा घुसा दे." इस उन्माद में अलका दीदी को लगा के अर्जुन भी शायद होने वाला होगा तोह

वो उसको उकसाने लगी थी. लेकिन अर्जुन संयंम से अपनी ताक़त दिखता अब उस नरम तंग गुफा को ाचे से भेदने में लगा था.

"आप ऊपर आओगी? कुछ देर के लिए." अर्जुन ने उनकी कमर से चिपकते हुए ये कहा तोह वो बस चुदाई के नशे में हे आगे होती लुंड निकाल हट गई. अर्जुन बिस्टेर पर

सीधा पसर गया तोह दोनों टंगे फैलाती अलका ठीक लुंड के ऊपर अपनी गांड को नीचे करती गई जहा वो सुर्ख लाल लुंड choot-ras से सारा चमक कर अपनी गुफा की

प्रतीक्षा कर रहा था..

"आह.. जैसे हे ये अंदर जाता है ... आह लगता है.. पेट तक आ गया हो." थोड़ा सा लुंड अभी बचाये वो पंजो के भार उकडू सी हो गई. यहाँ से अर्जुन को छूट

का फैलना और लुंड का अंदर बहार होना बड़ा रोमांचित कर रहा था.

"अगली बार हम दोनों ये बाथरूम में करेंगे. आठ. मई चाहता हु.. के आप भी देखो के ये अंदर जाता कैसे लगता है.. आह्हः.. आपके इस सुन्दर शरीर को भी देखना

ये कैसे हर जगह से थिरकता है." अलका दीदी की कमर पकड़ कर अर्जुन उन्हें ऊपर निचे करने में सहयोग करता हुआ कह रहा था. ऐसे हे कुछ देर बाद वो उन्हें गॉड

में बिठाये हे छोड़ने लगा था. और वो उसके कंधे को थाम कर उछाल रही थी.

"ये भी साथ में उछलते कितने प्यारे लगते है." ज्यादा रगड़े से मॉटे दूध नरम हो कर ऊपर नीचे हो रहे थे जिन्हे अब अर्जुन ने पकड़ कर दांतो से चुभलाना शुरू

कर दिए था. "हाँ.. ऐसे हे .. aah...Maja आ रहा है... अर्जुन आह कास के दबा और पी ले इन्हे." नीचे से उसका मूसल जिसकी नस्से अब फूलने लगी थी, पूरा गहराई

तक लेती अलका दीदी अपनी पूरी छुडास में थी. थोड़ी देर पहले जिस लुंड की वजह से आँखों में ganga-jamuna बह रही थी वही अब सरपट अंदर बहार होने लगा था.

"देखा अब कैसे उछाल कर पूरा अंदर ले रही हो. इसलिए कह रहा था के बस एक बार ाचे से खुलवा लो इस छूट को फिर हमेशा मजा हे मिलेगा." मुँह से एक दूध को

दबाये वो फिर से उनकी गांड हाथो से चौड़ी करता उनके छेड़ में ऊँगली धंसने लगा था. पसीने और छूट के पानी से आधी ऊँगली अंदर गई तोह एक बार रूकती अलका

बिना ज्यादा सोचे वापिस नीचे हो गई. लुंड छूट में और ऊँगली गांड में अंदर बहार होने लगी तोह मजा दोगुना हो चला था. यहाँ अर्जुन भी अपने चरम के करीब हे थे.

जैसे हे इस बार दीदी नीचे हुई तोह वह वही बैठ गई. अर्जुन ने भी एक हाथ से लुंड को जल्दी से पीछे किआ. एक हाथ जिसकी ऊँगली अभी भी गांड में थी वही रख

वो उनके पेट पर सफ़ेद पानी बरसाने लगा था. ये गरम चिपचिपा द्रव्य इस बंद कमरे में अलग सी महक भरने लगा लेकिन ये दोनों बिना किसी परवाह के ऐसे हे गले लग

कर बैठ गए. साँसे संयत हुई तोह अलका दीदी ने हे जुबान खोली, "यार ये शायद ज़िन्दगी का सबसे खुशनुमा एहसास था. और जो भी दर्द था शायद वो इस प्यार भरे

सफर की एक मात्रा कठिनाई थी. तू बहोत ाचा है रे जिसने मुझे आज वो सुख दिया जो शायद मई शादी से पहले न ले पाती." फिर से उसके गले लग गई थी अलका. जाने क्यों अब उसकी आँखों में आंसू आ गए थे जिनकी 2 बुँदे अर्जुन को अपनी पीठ पर गिरती महसूस हुई तोह उसने उनका चेहरा पकड़ के अपने सामने किआ.

"ये क्या है दीदी? आपको अब दुःख हो रहा है क्या? या कही दर्द ज्यादा होने लगा है?" वो थोड़ा घबरा गया था अपनी ाची भली बड़ी बहिन को अब रट देख

"नहीं भाई. मई बहोत खुश हु और तेरे साथ तोह कभी दुखी हो भी नहीं सकती. बस दिल भर्र आया आज इतना प्यार और सुख मिलने पर. तू हमेशा ऐसे हे मुझे प्यार

करता रहेगा न.?"

"ये ज़िन्दगी भी तोह आप तीनो के लिए हे है. फिर सवाल क्यों? आप जब कहोगी और जहा कहोगी मई परवाह नहीं करूँगा. और वैसे भी तोह आप हे मेरी सही मायने में

पहली गर्लफ्रेंड हो." आखिरी पंक्ति सुनकर अलका के चेहरे पर मुस्कान आ गई भीगी आँखों के साथ. अपने नरम होंठ प्यार से अर्जुन के होंठो पर रखते हुए वो

उसकी छाती सहलाने लगी थी. कुछ देर तक ऐसे बैठे रहने के बाद अर्जुन उन्हें गॉड में उठा कर पिछले आँगन के बाथरूम तक लेके आ गया.

"खुद को साफ़ कर ले? फिर आप एक दर्द की दवा खा कर सो जाना. 2 से ऊपर का समय हो गया है." ाचे से रगड़ कर खुद को और अलका दीदी को साफ़ करके वो उन्हें टोलिया

लपेट वापिस कमरे में ले आया.

"मुझे दवा की जरुरत नहीं है. मई बिलकुल ठीक हु और ये एहसास मुझे ाचा लग रहा है. अब तू भी सो जा मई जा रही हु." गले लग कर उसके गाल चूमती अलका दीदी

नंगी हे हाथ में फ्रॉक लिए निकल गई अँधेरे में. अर्जुन बस देखता रह गया के कैसे तोह पहले दर्द में डूबी थी और अब वह उछलती सी निकल गई इतनी तगड़ी चुदाई

होने के बावजूद. "ये अलग है. Mrigya+Rati. बड़ा अजीब है और ऐसा तोह कोई वर्णन भी नहीं था किताब में." पजामा पहन कर वो बिस्टेर पर लेत कुछ देर तक सोचता रहा फिर गहरी नींद में चला गया.

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.

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तक़रीबन 4:45 पर एक हलकी आवाज से अर्जुन की नींद उचट गई. फुर्ती से वह बिस्टेर से उठ खड़ा हुआ और बहार आँगन में आ गया. सामने वाले घर से एक कार की जलती लाइट देख कर वो निश्चिन्त सा हुआ के अपने घर में कुछ नहीं है. कार की रौशनी में देखा की salwar-kameej पहने कोई महिला या भाभी उस घर के मुख्या दरवाजे के साथ कड़ी कार में बैठे व्यक्ति को कुछ बोल रही थी या ऐसा हे कुछ था. 30 फ़ीट के लगभग दुरी से और कार के फैले हुए प्रकाश में ज्यादा समझ नहीं आ रहा था. फिर वो

कार बहार निकल गई तोह वो महिला अब अर्जुन की तरफ देखने लगी थी क्योंकि बहार निकलते हे उसने आँगन का बड़ा बल्ब जगा दिए था. कुछ 20-25 सेकंड देखने के बाद वो

अंदर चली गई लेकिन अर्जुन शरीर के सांचे के अलावा कुछ ज्यादा देख ना पाया था.

"लगता है देरी हो गई आज. और वापिस आने के बाद भैया या ऋतू दीदी से पूछूंगा के सामने वाले घर में कोण रहता है." वापिस कमरे में आने के बाद अपनी टीशर्ट पहन

कर वो बहार वाले बाथरूम में हे नित्यक्रम से फारिग हो मुँह हाथ धोकर टाला खोलने लगा. कुछ सोचकर साइकिल बहार निकल आज वो उस पर हे कल वाली दिशा में निकल लिए. सुनसान सड़क और ठन्डे वातावरण में आज साइकिल चलने का असली मजा लेता वो कुछ 8-10 मिनट में हे नए सेक्टर को पार कर गया था. जैसे हे गाँव की तरफ जाने वाले तिराहे पर आया तोह ब्रेक लगा के वह खड़ा हो कुछ सोचने सा लगा था. आज इस समय हलकी रौशनी हो चुकी थी. फिर निर्णय लेता वो गाँव की तरफ चल

दिए. यहाँ पर सड़क थोड़ी छोटी हो गई थी और दोनों तरफ अब बबूल या सफेदे के हे पेड़ लगे थे. कुछ और आगे आने पर कही कही सड़क पुराणी भी थी. साइकिल धीमी

करता वो बस दोनों तरफ देखता जा रहा था.

कुछ दुरी पर बानी कच्ची झोपड़ियां और गोबर के उपलों से बने बड़े टिल्ले से नजर आये. कही कोई गाये खूंटे से बंधी थी तोह कही कुछ बड़े एक मंजिला घरो के

बहार भैंसे और बगीचे से थे. Log-bag इधर उधर घूमते दिखे लेकिन यहाँ कोई भीड़ या साथ सट्टे मकान नहीं थे. अर्जुन बड़े गौर से ये देखता थोड़ा और आगे आया तोह यहाँ मकान लगभग ख़तम हो चुके थे. ऊँची घास और घने पेड़, उनके बीच से जाती कच्ची पगडंडिया जो कही कही नजर आ जाती थी. सड़क ज्यादा खराब हुई

तोह वह साइकिल से नीचे उतर कर चलने लगा था. "यहाँ बस 30-35 हे घर है शायद. और लगभग सभी शायद दूध और खेती हे करते है." अर्जुन सोचता सा चल रहा

था तोह आगे एक कच्ची पुलिया नजर आई जिसके किनारे पर एक कतार में हे वृक्ष और झाड़ियां उगी हुई थी. पुलिया के ऊपर आने के बाद वो उस 3 फ़ीट की सीमेंट की दिवार

पर चढ़ बैठा. नीचे हल्का सलेटी सा दीखता पानी बह रहा था. शायद दिन में नीला या हरा दीखता हो अभी तोह आसमान में हे सफ़ेद रंग आना शुरू नहीं हुआ था. जिस

तरफ सूरज उगता है बस वही थोड़ा bhagwa-peela रंग नीले से मिलता दिख रहा था. बाकि सारा आकाश हल्का नीला हे था. ऐसे हे बैठा वो आसपास के दृश्य में खोया

था के एक छोटा लड़का वह से गुजरा जिसके हाथ बे शायद खाली बियर की बोतल थी. उसको अपने पास से जाता देख बस नजरे उसपे हे लगाए था की पास की पगडण्डी से

एक लड़की हाट में लौटा लिए आने लगी. हरे रंग का घाघरा और laal-safed सा तंग चोली की तरह का कुरता पहने वो सेहमी हुई इस पुलिया की और हे आ रही थी. अर्जुन

ने उसका देखा तोह लड़की ने भी मुँह में हरे रंग की चुन्नी फंसाये अपनी आँखें उसकी तरफ उठाई. वो तोह शायद अपने अनजाने डर से उसको देख रही थी लेकिन उसकी

इतनी बड़ी और प्यारी आँखे देख अर्जुन बस खो सा गया था. एकदम पतली सी, श्री पर कही कोई ज्यादा मांस नहीं, उभार शायद बंद मुठी के बराबर लेकिन वो ताम्बे

बादाम के जैसा चेहरा अर्जुन के सीने में क़ैद सा हो गया था. इधर जल्दबाजी दिखती वह पुलिया से गुजरती गाँव की तरफ घूमी तोह उसकी चुन्नी का खुल्ला सिरा साइकिल

के घुमावदार हैंडल में जा फंसा. जो अर्जुन ने पुलिया के दूसरे सिरे पर कड़ी कर राखी थी. पूरा हे चेहरा आकर्षक था इस लड़की का. हाथ में चांदी के 2 गोल कंगन

और पूरा श्री छरहरा सा.

"देख के नहीं कड़ी कर सकते साइकिल को? यहाँ बीच में कड़ी कर राखी है इस 4 फुट की जगह में." आवाज हलकी तीखी और रोबदार थी. लेकिन चुन्नी छुड़ाते हाथ बता

रहे थे के डर ज्यादा लग रहा था उसको.

"माफ़ कीजियेगा. वह मुझे पता नहीं था के आप इधर होंगी. मैंने सोचा के यहाँ तोह जंगल है कोई होगा नहीं इसलिए बस." इतना बोलकर वो चुन्नी को अलग करने लगा जो

एक पीले सितारे की जगह से फट कर हैंडल में अटक गई थी.

"अब सुबह तोह लोग जंगल हे जायेंगे. मेरी नै चुन्नी का सत्यानाश कर दिए. 150 की लेकर आये थे पापा मार्किट से" आवाज तोह हलकी हो गई थी लड़की की लेकिन चुन्नी में हुआ छेड़ देख कर बेचारी दुखी हो गई.

"ये मेरी गलती से हुआ है तोह मई नै ला दूंगा आपको. आप बता दो कहा से ली थी या फिर मई कल सुबह पैसे ला कर दे दूंगा आपको. अभी तोह बटुआ लेकर नहीं आया."

इतनी भोली और प्यारी लड़की के चेहरे पर उदासी उसको जरा भी नहीं भा रही थी. लेकिन वो अपना वही उदास चेहरा लेकर सीढ़ी निकल गई अपने घर की तरफ. अर्जुन 2

पल और वही रुक कर साइकिल वापिस घुमा कर चल दिए. अब उसका भी दिल नहीं लग रहा था यहाँ रुकने में. थोड़ी आगे आते हे साइकिल के पैदल मरता वो धीमी रफ़्तार से

गांव से गुजरने लगा. अब आसमान साफ़ हो चूका था और ाचा उजाला था. जहा से आते समय घर शुरू होते थे वही पर एक छोटे मकान के बहार वही लड़की कड़ी थी

अपने लौटे को माटी से साफ़ करती. अर्जुन ने रफ़्तार ना के बराबर कर ली उसको दूर से देख कर. बहार एक गाये और एक उसका बछड़ा खूंटे से बंधे थे. छोटा लड़का

चाय का एक स्टील का कप लेकर दरवाजे के बहार बैठा था लेकिन और कोई नजर नहीं आया. इस घर से आगे बस वो झोपडी हे थी. उनके बराबर हे पहुंचने वाला था की

उस लड़की की नजर एक बार फिर अर्जुन से मिल गई. उसकी तरफ देखता वो सीधा सड़क किनारे कड़ी एक खाली चारे वाली रेहड़ी से टकरा गया. "ओह तेरी." सड़क पर गिरते

हे बस इतना हे कहा उसने. और खुद को झाड़ता वापिस उठ गया. हल्का सा चीरा कोहनी पर लगा थी और पजामा घुटने से एक तरफ से फट गया था. वो लड़की थोड़ा मुस्कुराती सी घर के अंदर चल दी.

"अरे पहलवान कही लगी तोह नहीं?" एक बुजुर्ग शायद 70-72 साल के उसके पास खड़े हो गए. देखा की कोहनी से पतली सी खून की धार कलाई की तरफ जा रही थी.

"मई ठीक हु अंकल जी. वो साइकिल के टायर पतले है तोह खड़े में संभल नहीं पाया और इस रेहड़ी से टकरा गया." अर्जुन मिटटी झाड़ता बोलै तोह उन बुजुर्ग ने उसका दूसरा

हाथ थाम लिए. "चल बीटा ये साफ़ कर ले यहाँ पानी से. मिटटी से जखम पक्क भी जाता है कभी कभी." ये वही आ गए जहा गाये बंधी थी.

"सविता.. ओह सविता.. एक पानी का जग और कपडा लेकर आ." इस उम्र में भी आवाज बड़ी बुलुंद थी इन बुजुर्ग की.

"तोह बीटा यहाँ कैसे इतनी सुबह सुबह?" उसके पाजामे को ऊपर कर वह की चोट देखते उन्होंने अर्जुन से पुछा तोह उसने शांत स्वर में हे जवाब दिए.

"अंकल जी, मई तोह रोज सुबह 4 या साढ़े 4 बजे दौड़ लगाने निकलता हु. वो जहा तालाब है न दूसरी सड़क की तरफ वह. आज साइकिल पर था तोह इस तरफ आ गया. मेरे

भैया ने बताया था के इधर गाँव भी है और आगे हरियाली भी. तोह बस देखता हुआ इधर आ गया."

"ाची बात है बीटा."

"बाबा ये लीजिये." अर्जुन को वह देख कर ये लड़की जिसका नाम सविता था झेंप गई थी. जग और एक सफ़ेद कपडे का टुकड़ा पकड़ती वह सर झुकाये कड़ी थी.

"ाचा गुड्डू को तैयार कर दे फिर खुद तैयार हो के रोटी बना डीओ. आज तेरा भी इम्तिहान है तोह फिर समय से निकल जैव टोका (गाँव में चलने वाली जुगाड़ गाडी) आएगा 7 बजे." उनकी बात सुनकर वो अंदर दौड़ गई इधर वो बुजुर्ग अर्जुन का हाथ साफ़ पानी से धोने के बाद कपडे को लपेटने लगी कोहनी के ऊपर.

"मेरा बीटा तोह है फ़ौज में और उसके ये दोनों बचे यहाँ है. इनके सहारे मेरा भी ाचा टाइम गुजर जाता है." बात कहते हुए उन्होंने पट्टी बाँध दी. अर्जुन ने हाथ

जोड़ते हुए धन्यवाद किआ तोह वो मुस्कुराते हुए बोले, "घर जा कर कोई मलहम लगा लेना और फिर पट्टी उतार देना. और गाँव का हवा पानी लेते रहा करो." सर पे

हाथ फेरा तोह अर्जुन वापिस सड़क की और बढ़ लिए. साइकिल पर बैठने लगा तोह देखा की सविता दरवाजे के एक पल्ले की आड़ से उसको हे देख रही थी. चेहरे पर कोई

बाव नहीं था. अर्जुन सीधा घर की तरफ चल दिए.
 
अपडेट 39

ये शाम मस्तानी (1)


"हाथ पर ये कपडा कैसे बंधा है?" गेट पर हे संजीव भैया मिल गए जिनकी नजर सबसे पहले अर्जुन के हाथ पर हे गई.

"कुछ नहीं भैया, वह गाँव वाली सड़क पर गधा था तोह साइकिल फिसल गई. ज्यादा कुछ नहीं बस हलकी सी रगड़ लगी है. एक बुड्ढे अंकल ने साफ़ करके ये कपडा बाँध दिए. लेकिन आप ये बताओ के आप आये कब और अभी फिर जा रहे हो?" अर्जुन अपनी बात कहने के बाद संजीव भैया को ऑफिस के लिए तैयार देख पूछने लगा.

"है बताया तोह था भाई के सोमवार को बहार शहर जाना है. रात भी नहीं आऊंगा तोह कल शाम हे मुलाक़ात होगी. इस पर बेटाडीन लगा लिओ ऊपर वाले कमरे में राखी है.

मई बस चलता हु लेट हो गया थोड़ा आज." संजीव भैया की आँखों में हलकी सूजन और लाली थी. लेकिन चेहरा तोह बता रहा था के वो खुश है. अर्जुन साइकिल कड़ी

करता एक बार बैठक की तरफ गया तोह वह अब चादर बदली जा चुकी थी. कमरा ाचे से साफ़ किआ जा चूका था. लेकिन अभी तोह 6 से कुछ ऊपर हे समय हुआ था.

अगले कमरे में नजर गई तोह मामला समझ आ गया उसको. ऋतू दीदी वाइपर के आगे पोछा लगाए सफाई करने में लगी थी.

"आप इतनी जल्दी उठकर ये सब?" उनकी गांड में फसे आसमानी पाजामे की तरफ देखता वो बोलै तोह ऋतू दीदी पलट कर उसको देखने लगी. फिर कुछ पल बाद बोली,

"है तोह सफाई तोह पहले भी इस समय तक हो जाती थी. वो अलग बात है के आज जरा ज्यादा ाचे से करनी पड़ गई. तू न सुधर जा." उनकी बात का अर्थ समझता अर्जुन

उनके पीछे चला आया और बाहों में भरते हुए बोलै, "वो क्या है न के मुझसे भी गलती हो सकती है. फिर आप तोह हो हे मेरे लिए." पता नहीं क्या खा रहा था वो

आजकल की बस गांड पर छु भर लेने से लुंड अकड़ कर ऋतू दीदी के कूल्हों में धसने लगा था. गर्दन को हल्का मजे में पीछे करती बोली, "रात भर जागने के बाद भी

तू थकान महसूस नहीं कर रहा जो अब मेरे पीछे पड़ा है.?" उनकी बात से स्पष्ट था के अभी तक घर में कोई और नहीं उठा है. अर्जुन ने पीछे से उनके ठोस उभर

पकड़ते हुए जवाब दिए, "सच पूछो तोह मुझे लगता है की अब शरीर में पहले से ज्यादा स्फूर्ति महसूस हो रही है दीदी. और दिल कर रहा है के यही पर आपके साथ

एक प्यार का दौर शुरू कर दू." कपडे के ऊपर से उनके निप्पल ढूंढ़ता अर्जुन अब ऋतू दीदी के गले पर होंठ फिरने लगा था. लुंड पाजामे को गांड की दरार में और अंदर

ठेलने लगा तोह ऋतू दीदी फुर्ती से छिटकती दूर हो गई. "चल बड़ा आया सुबह सुबह प्यार करने वाला. प्रियंका दीदी बाथरूम में से आने वाली होंगी. तू बहार बैठ मई

आती हु फिर दूध दूंगी." मुस्कुराती सी वह अर्जुन को बहार धकेलती बोली तोह वो भी हँसता हुआ अपना तना हुआ लुंड सही करता निकल गया. बहार आकर कुर्सी पर बैठा

और वो कपडा खोलने लगा जो ब्याह पर बंधा था. जख्म सूख गया था जो की इतना गहरा भी नहीं था. लेकिन जैसे हे नजर वह से आँगन की तरफ की तोह बस अर्जुन वही

देखता रह गया. प्रियंका दीदी एक खुली पंजाबी सलवार और तंग कुर्ती पहने बाथरूम से बहार निकली. कुर्ती देख कर लग रहा था के ये शायद उनके बड़े नारियल सँभालने में असमर्थ थी ऊपर से गाला भी थोड़ा गहरा लग रहा था. बालो में लपेटा सफ़ेद टोलिया खोलकर जब वह थोड़ा झुक कर बाल सूखने लगी तोह उनकी गोरी गली

गहराई तक अर्जुन को नजर आने लगी. काली ब्रा में क़ैद वो भारी चुनचे एकदम आपस में चिपके थे. इतना जानलेवा मंजर देख अर्जुन जहा पहले अपने लुंड को ठीक करके

बैठा था अब वो वापिस सरकता हुआ सर उठाने लगा. "नहीं. अब ये सब नहीं." खुद से इतना कह कर वह टेबल पर रखे अखबार को उठा पढ़ने की कोशिश सी करने लगा.

"ओह. तू वापिस आ गया क्या सैर कर के? तेरा तोह कुछ पता हे नहीं चलता के कब आता है और कब जाता है." अब बाल को हाथो से सूखती प्रियंका दीदी चलती हुई

उसकी तरफ आ कड़ी हुई. उनके शरीर की महक अर्जुन को फिर से दीवाना करने लगी थी. पंजाब में रहने से वो भी एक bhari-puri पंजाबन हे दिखाई देती थी. बड़े चुके

उठी हुई बहार को निकली गांड, मांसल जंघे, गोरा भरा चेहरा और समतल हल्का गद्देदार सा पेट.

"हहह.. वो मेरा तोह रोज का हे ऐसा है न. सुबह अँधेरे में दौड़ लगाने निकल जाता हु. आप भी जल्दी उठ गई आज?" उनके चेहरे से नजर बचता अर्जुन बोल रहा था.

"ऐसा तोह नहीं है बस कोई आधा घंटा हे जल्दी उठ गई आज वह ऊपर ऐरकण्डीशन में सोने की आदत नहीं है तोह मई उठ कर आ गई नीचे." अपनी बात कहने के बाद

जैसे हे उनकी नजर अखबार के निचले हिस्से की और गई तोह वो डांग्ग रह गई. एक मोटा तगड़ा उभार उस ट्रैक पाजामे के ऊपर से नुमाया हो रहा था. देख कर हे लग रहा

था के वो रात में देखि उस फिल्म वाले आदमी के हथ्यार से बड़ा और मोटा होगा.

"ाची बात है. समय से नाहा भी ली आप और तैयार भी हो गई." अर्जुन की ये बात उन्हें सुनाई हे नहीं दी थी. जब अर्जुन ने उनकी नजरो का पीछा किआ तोह पाया के वो

तोह उसकी हे जांघो के बीच देख रही है. जल्दी से उसने अखबार को अपनी जांघो में ाचे से फैला लिए. प्रियंका दीदी की तन्द्रा टूटी तोह वह खुद को संभालती सी

रसोईघर की तरफ चल दी. अर्जुन ने शायद उन्हें ये करते नहीं देखा था. यही उनकी सोच थी. लेकिन अर्जुन ने देख भी लिए था और अब वो उन्हें जाती देख एक बार उनके

गोल पिछवाड़े को देख कर वापिस अखबार देखने लगा.

"ले भाई तू दूध पी और ये जरूर खा लेना. मई तब तक आरती और प्रीती को उठा के आई. रेणुका बुआ आ चुकी है उनके घर तोह वो भी जा कर उनसे मिल लेगी." ऋतू

दीदी वह दवा वाला लड्डू और एक बड़ा गिलास दूध का उसके सामने रख ऊपर चली गई.

"तेरे स्कूल कब से चालु हो रहे है अर्जुन? इस बार तोह ग्याहरवी है तोह फिर सोचा है के कोनसे सब्जेक्ट लेगा?", प्रियंका दीदी चूल्हे पर चाय और कॉफ़ी दोनों चढ़ा

चुकी थी. अब खाली बैठी थी तोह अर्जुन का भी हाल चाल लेने लगी.

"स्कूल शुरू होने में तोह अभी समय है दीदी. आज समझो पहला सोमवार है तोह तीसरे सोमवार को शुरू होंगे. लेकिन सब्जेक्ट का अभी कुछ पता नहीं मुझे बस इतना पक्का

पता है के डॉक्टर की पढ़ाई तोह मई करूँगा नहीं." अर्जुन की बात पर प्रियंका दीदी ऊपर से हंस रही थी और अंदर से सोच रही थी. 'अकाल अभी भी बचो जैसी है

इसकी और वो जैसे किसी गधे का लगा के घूम रहा हो. इतना बड़ा और इतनी काम उम्र में?'

"तोह फिर कैसे पसंद करेगा सब्जेक्ट अपने? कुछ तोह पसंद होगा तुझे?" इस बार जब वो बोल रही थी तोह चाय में दूध डालने लगी थी. यहाँ से अर्जुन को उनका भरी

पिछवाड़ा ाचे से दिख रहा था.

"आज से लाइब्रेरी जाना है तोह वह पढ़ के देखूंगा कैसी किताबे होती है बड़ी क्लास में या फिर मुझे क्या समझ में आता है. वैसे तोह मेरे इंग्लिश, सोशल साइंस,

संस्कृत, फिजिक्स और बायोलॉजी ाचे है लेकिन केमिस्ट्री पर ज्यादा ध्यान देना पड़ता है. लेकिन ऋतू दीदी बता रही थी की मेडिकल या Non-Medical दोनों में केमिस्ट्री

जरुरी है. फिर सोचा के जो होगा देखा जायेगा. पढ़ना हे है तोह फिर सभी सब्जेक्ट सही है."

"बायोलॉजी तोह तेरी बहार से ाची खासी दिख रही है. पता नहीं कैसे कोई लड़की इसका सहेगी." चाय बंद कर के अब वो कॉफ़ी को उबाल रही थी लेकिन मैं में अर्जुन और

राति के सन याद करती प्रियंका दीदी की छूट कब गीली होने लगी उन्हें भी हैरानी होने लगी. एक बार ध्यान से छूट सेहला कर गैस बंद करती वो माधुरी दीदी के

कमरे में चली गई. अर्जुन बस देखता रहा के ये एकदम से दीदी को क्या हुआ. इतने में नीचे आरती और प्रीती ऋतू दीदी के साथ आती दिखी. गुडमॉर्निंग बोलकर प्रीती धीमे से मुस्कुराती अपने घर चली गई और आरती दीदी बाथरूम में मुँह धोने.

"ये प्रियंका दीदी कहा चली गई.?" अर्जुन के सामने रखे खली गिलास और कटोरी को उठती ऋतू दीदी ने पुछा तोह अर्जुन ने कमरे की तरफ इशारा कर दिए. ऋतू दीदी

चाय को छान ने लगी 1 कप में और फिर 2 कप में कॉफ़ी दाल कर टेबल प्रे ट्रे रख दी. इतने में आरती दीदी भी आ गई वह और अर्जुन को मुस्कुरा कर अभिवादन किआ

जिसका अर्जुन ने भी वैसे हे जवाब दिए. आज आरती कुछ ज्यादा हे खिली हुई लग रही थी और अर्जुन ने भी ये बात देख ली थी.

"आरती ले तू कॉफ़ी शुरू कर मई एक बार बहार पानी की मोटर बंद करके आई." ऋतू दीदी एक कप आरती दीदी की तरफ सरकाती बहार चली गई.

"वैसे आज बड़ी खिल रही हो दीदी. एक रात में ऐसा क्या हो गया?" अर्जुन की बात पर आरती मुस्कुरा दी थोड़ी शर्म के साथ.

"कुछ नहीं हुआ ऐसा तोह. वो बस अभी मुँह धोया है तोह शायद इसलिए."

"मुँह तोह रोज हे धुलता है लेकिन अगर नहीं बताना तोह फिर जाने दो." अर्जुन ने थोड़े नखरे से कहा तोह आरती ने हाथ पकड़ते हुए कहा, "नाराज क्यों हो रहा है. अब कोई

लड़की तोह तभी खिलने लगती है जब उसको प्यार हो जाये. फिर भी तू ये पूछ रहा है." आखिरी बात उनोहोने भी नखरे से कही तोह अर्जुन ने उनकी जांघ हलके से दबा

ली. उस नरम भाग को सहलाते हुए अर्जुन बोलै, "प्यार दोनों को हुआ तोह फिर मिलना भी तोह चाहिए दोनों को. या ऐसे हे देख देख के खुश रहना है?" उसकी उंगलियां जैसे

हे आरती की कमर तक रेंगती पहुंची कॉफ़ी का कप जैसे रुक सा गया था. "ईशःठ.. मत कर यहाँ कुछ भी. चल छोड़ दे न" बिना हाथ लगाए वो अर्जुन से बोली इधर

प्रियंका दीदी भी उनकी तरफ आती दिखी. अर्जुन ने जल्दी से हाथ हटा लिए.

"आपने इतनी जल्दी सूट बदल लिए दीदी?" अर्जुन ने अब प्रियंका दीदी को एक गुलाबी टीशर्ट और सफ़ेद पाजामे में देखा तोह पूछ लिए.

"भाई वो चूल्हे के पास काम करते हुए हे पता चल गया के सूट में आराम नहीं है. सोच अगर खाना पका रही होती तोह पता नहीं उसमे क्या हाल होता. ये आरामदायक है

तोह बस यही पहन लिए." आरती के साथ वाली कुर्सी पर बैठती प्रियंका दीदी बोली. बात तोह यह थी की अब वो कच्ची भी उतार आई थी इस पाजामे के नीचे. जाँघे आपस

में सटी हुई थी उनकी तोह छूट को आराम देने के मकसद से ये कॉटन का नरम पजामा पहन लिए था.

"ये अलका नहीं दिख रही कही?" आरती दीदी की बात सुनकर अर्जुन के कान खड़े हो गए.

"सो रही है वो अपने कमरे में. संजीव भैया जल्दी आ गए थे तोह उनका नाश्ता बना के दिया और कपडे प्रेस किये. तेरे से तोह ये होना नहीं था." प्रियंका दीदी की बात

पर आरती झूठा गुस्सा दिखती मुँह फूलने लगी तोह उन्होंने उसके सर पर चपत मारते हुए कहा, "बस ये सब करवा लो तेरे से. नौटंकी कही की." इधर ऋतू दीदी भी

कॉफ़ी पीने लगी थी जिनके आने की खबर अर्जुन का जरा भी न लगी.

"चल अब उठ जा और बहार क्यारी की संभल कर थोड़ी. फिर नाहा के नाश्ता कर लिओ वैसे भी लाइब्रेरी जाना है तुझे और शाम में स्टेडियम." ऋतू दीदी की बात से वो बिना

कहे बहार चल दिए. वैसे भी इतनी देर से फ़ालतू में लड़कीओ के साथ बैठा था.

बहार बगीचे में पानी दे रहा था तोह गली में कोई ज्यादा रौनक नहीं थी इस समय बस इक्का दुक्का कोई दूधवाला या आसपास का हे कोई व्यक्ति आ जा रहा था. पानी कुछ

देर के लिए बंद कर अर्जुन खुरपी से फूलो के आसपास की जमीन नरम करने लगा. इस मौसम में छोटे छोटे khar-patwar उग्ग आते है तोह उन्हें एक जगह इकठ्ठा करता रहा वो. रामेश्वर जी ने अपने इस पोते को बागवानी का ाचा ज्ञान दिए था और आज वही सब वो कर रहा था. पसीना आने लगा तोह टीशर्ट उतार सिर्फ सफ़ेद बनियान में हे अर्जुन अमरुद और पपीते के पैदा के निचे जगह सही करने लगा. ऐसे हे सरे बगीचे में लगे छोटे बड़े पौधे और गमले दुरुस्त कर पानी की नलकी से धीमे दबाव से हर तरफ पानी देने लगा. एक जोड़ी आँखें उसको कई देर से देख रही थी लेकिन उसका धयान वह इतनी देर बाद गया. सामने वाले घर में छत्त पर कड़ी ये 24-25 साल

की नवयुवती उसने पहले भी कही देखि थी. "ये तोह मल्होत्रा अंकल की बेटी की शादी में भी आई थी. हाँ दादी बता रही थी की कश्यप अंकल के छोटे बेटे की बहु सरोज है ये. मतलब यही थी उस दिन भी छत्त पर आज सुबह भी." अब उसको पता चल गया था के सामने वाले घर में कोण है और आज तोह चेहरा ाचे से देख लिए था. जैसे हे दोनों की नजरे चार हुई अर्जुन ने स्वभाव अनुसार दोनों हाथ जोड़ दिए. और सरोज खिलखिला कर हंसने लगी अर्जुन की इस बचकानी हरकत पर. "ओह. ये क्या कर दिए मैंने." पानी की पाइप उसके हे ऊपर धार चलने लगी तोह उसने वो जमीन पर हे छोड़ दी. फिर सामने देखा तोह सरोज भाभी भी अब एक बार हाथ जोड़ कर अंदर चली गई थी, मुस्कुराती हुई. चमकदार मुस्कान, घने घुंगराले काले बाल, मांग में लाल सिन्दूर के साथ ऐसा हे laal-kala सूट. बड़ी दिलकश सी महिला लगी अर्जुन को सरोज.

"8 बज गए है और तू अभी तक मालिगिरि कर रहा है यहाँ. और कितना कीचड कर दिए है देख अपने पैरों में." ऋतू दीदी की आवाज से अर्जुन मुड़कर देखने लगा तोह वो तोह आराम से कड़ी थी लेकिन यहाँ उसके दौड़ लगाने वाले जूते पानी में आधे डूब चुके थे.

"सॉरी. वो गलती से पाइप बंद करनी भूल गया ये जंगली घास निकलते समय. कोई बात नहीं ज्यादा नुक्सान नहीं हुआ." अर्जुन गलती पर पर्दा डालता बोलै तोह ऋतू दीदी ने कमर पर हाथ रख लिए.

"नुक्सान के बचे ये कदम इस हालत में तोह घर के अंदर आने नहीं दूंगी. जूते यही धोने के बाद नंगे पाँव सीधा बाथरूम में चला जा. मई टोलिया और कपडे वही भिजवाती हु तेरे." और इतना बोलकर अंदर चली गई. अर्जुन जानता था के ऋतू दीदी को झाड़ू पूछा करना पसंद नहीं था और इतनी म्हणत करने के बाद कोई उसको गन्दा कर दे तोह वो फूलन देवी हे बन जाती.

इस बात पर एक चुटकुला याद आ गया. एक महिला ने अपने पति की गोली मार कर हत्या कर दी क्योंकि वो घर में गीले पूछे पर कदम छापता हुआ अंदर आ आ गया था. हत्या करने के जुर्म में थानेदार ने 2 सिपाही उसको घर से पकड़ कर लाने भेजे. घर थाने से 5 मिनट की दुरी पर था लेकिन दोनों सिपाही आये पूरे 40 मिनट में.

थानेदार- कम्भख्तो इतनी देर लगती है एक अकेली औरत को पकड़ कर लाने में?"

सिपाही - जनाब हम तोह वह 5 मिनट में हे पहुंच गए थे.

थानेदार- तो फिर इतनी देर क्या इसको गण सुना रहे थे.?

दूसरा सिपाही- जनाब वो क्या था न के ये औरत पूछा लगा रही थी उस समय. 30 मिनट हम उसके सूखने का इन्तजार हे करते रहे.

ऐसे हे अर्जुन नाहा कर ऊपर अपने कमरे में चला गया. टोलिया लपेटे क्योंकि ऋतू दीदी ने उसको कह दिए था के लाइब्रेरी में जीन्स शर्ट पहन कर जाना. अब ऊपर आया तोह पहले ड्राइंग में घुस गया जहा अभी तक तारा नींद के आगोश में थी. सिर्फ तोलिये में और हलके गीले बदन अर्जुन उसकी चादर में घुसता उस से जा लिप्त. अलसाई सी तारा ने मुँह सीधा किआ तोह अब अर्जुन ने उसके होंठ अपने मुँह में लेकर चूसने और एक बिना ब्रा का उभार दबाना शुरू कर दिए.

"उम्.. आह.. ये क्या तरीका है गुडमॉर्निंग करने का?" हलकी नाराजगी दिखती तारा ने जब अर्जुन को देखा तोह खुद हे अपने होंठो को उसके मुँह पर रख दिए. टीशर्ट के अंदर नंगी चूँचिया अब अर्जुन के हाथों में थी जिन्हे वो ाचे से दबाने लगा था.

"आह बस कर यार. पता है रात को तेरी बड़ी याद आई.. चल अभी छोड़ बाथरूम जाने दे न प्लीज." सिर्फ बोल रही थी तारा लेकिन कोई उठने की जल्दी नहीं थी उसकी हरकत देखते हुए.

"ये तोह कुछ और कह रहे है." उसके दोनों उभार टीशर्ट को ऊपर कर बहार निकलते हुए इतना बोलकर एक निप्पल को मुँह में भर लिए अर्जुन ने. रात को शायद वो तृप्त नहीं हुआ था ाचे से जिसका नतीजा ये था की सुबह से हे वह जोश में था. उसके बालो को सहलाती तारा भी आँखें मूंदे लेती बस उसको अपनी चूचिया चुसवाने में मजा ले रही थी. फिर कुछ याद आते हे उसने टीशर्ट झट्ट से निचे की और फुर्ती से भागती हुई बाथरूम में घुस गई.

"अगली बार सिर्फ अँधेरे में मेरे कपडे उतरना. ाचा हुआ के चादर में थे."

"अब मई तभी तुम्हारे पास आऊंगा जब तुम खुद कपडे उतार कर रौशनी में मेरे ऊपर आओगी. वादा करता हु." अर्जुन की आवाज बड़ी साफ़ और सम्भली हुई थी. कोई उतावलापन या बचपना नहीं था. तारा को अब अपनी गलती का एहसास हो चूका था की उसने क्या बोल दिए है ये. और अर्जुन की आवाज बता रही थी की वो ऐसा हे करेगा. जितनी देर में वह बहार आती अर्जुन अपने कमरे के अंदर जा कर दरवाजा लगा चूका था. तारा कुछ पल उस बंद दरवाजे को देख सर झुकाये वापिस बाथरूम में घुस गई.

"चल खाना खा ले ाचे से और एक बार छोल अंकल के घर चला जाइओ. उनका नौकर मुकेश बता के गया है अभी के अंकल ने तुझे याद किआ है." ऋतू दीदी की बात सुनकर अर्जुन बड़े आराम से नाश्ता करने में लग गया. आज सबकुछ देरी से हे हो रहा था जिसमे बड़ी वजह वो खुद हे था. सबसे ख़ास बात जो अर्जुन को अलग बनती थी वो था उसका व्यवहार. किसी से कभी नाराज या गुस्सा नहीं होता था. और अगर कभी बुरा मान भी जाता तोह उसका प्रभाव खुद पर और अपने आसपास तोह बिलकुल नहीं पड़ने देता था वो. जहा तारा कमरे में खोई सी बैठी थी अर्जुन अपना खाना ख़तम कर haath-mooh धोने के बाद छोल साहब के घर चला गया था.

"ोये तू अभी तक ऐसे हे बैठी है? तेरी चाय भी पड़ी पड़ी ठंडी हो गई है देख. ऊपर से न तू नहीं है और न हे नीचे आई है." आरती तारा के कमरे में गई तोह उसको ऐसे सुस्त बैठे देख बोली.

"कुछ नहीं यार. बस कभी कभी ज्यादा सोने से भी सर दुखने लगता है और वही आज हो रहा है. तू चल मई आती हु नाहा के." आरती को देख कर तारा को भी ऐसे बैठे रहना ठीक नहीं लगा. पता नहीं सब क्या सोचेंगे की एकदम से क्या हो गया है. इतना सोचती वो अलमारी से कपडे निकाल नहाने चली गई तोह आरती वो ठंडी चाय लेकर नीचे आ गई.

"क्या बोली राजकुमारी तारा?" अलका दीदी नाहा के बहार आ गई थी. किसी महकते गुलाब जैसे वो आज एक सुर्ख गुलाबी लिबास में हे थी.

"आ रही है नाहा कर. उसने क्या बोलना है यार. लोगो का नींद की कमी से सर दुखता है लेकिन इसका तोह ज्यादा सोने से भी सरदर्द होने लगता है." आरती की बात पर अलका और ऋतू भी हंसने लगे.

"वैसे आज तोह तू बड़ी कमाल की दिख रही है अलका. ऊपर से तेरा सूट भी क़यामत बना रहा तुझे. आज किसी ख़ास से मिलने जा रही है क्या?" प्रियंका दीदी टेबल पर अलका और अपना खाना लगाती बोली तोह अलका ना में गर्दन हिलती कुर्सी पर बैठ गई.

"वैसे भी पड़े हे रहते है ये सब अलमारी में. सोचा पहन कर खराब करना ज्यादा ठीक है. और कुछ ख़ास बात नहीं. ना किसी से मिलने जा रही न किसी को बुला रही हु. आप भी आ जाओ चलो." खाना शुरू करती वो अब चुपचाप बैठ गई थी. आरती रसोईघर में बर्तन धोने चल दी और ऋतू दीदी बाथरूम से मैले कपडे लेकर उन्हें वाशिंग मशीन में डालने बहार.

"आ मेरे शेर पुत्तर. बैठ. सब कुशल मंगल है न?" छोल साहब के पाँव छूने के बाद अर्जुन को उन्होंने गले लगाया और वही बैठक में अपने पास हे बिता लिए. उनकी रसोई से 2 महिलाओ की आवाज आ रही थी लेकिन उनमे से कोई भी प्रीती की नहीं थी.

"मई तोह आपको पता हे है दादू मजे में हे रहता हु. अब दादाजी गाँव चले गए तोह आज बगीचे की सफाई करने लगा था. फिर नहाने गया तोह मुकेश भैया का संदेसा देरी से मिला. आप सुनाओ देहरादून में सब ठीक." दोनों बातें कर रहे थे की एक उनकी बेटी रेणुका मौसम्बी के जूस के दो गिलास ट्रे में रख के वह आ गई. अर्जुन ने सूरत तोह उनकी पहली बार हे देखि थी बड़े होने के बाद लेकिन पता था के ये रेणुका बुआ है. शिष्टाचार से उसने उनके पाँव को हाथ लगाया तोह मुस्कुराती उसके सर पे हाथ फेरने के बाद बोली, "पापा ये आपका मुन्ना हे है न? मतलब ये तोह कौशल जी से भी ऊँचा हो गया और आप इसको कल सारा दिन छोटा बचा कह कर बातें कर रहे थे." डाइनिंग टेबल पर दोनों गिलास रखती वह भी एक कुर्सी खिसका कर बैठ गई उनके पास. चांदी की जारी वाले किनारे की एक बेहद आकर्षक गहरी हरी साड़ी पहने रेणुका सभ्य और कामुक महिला का एक सही मिश्रण थी. माध्यम उभार, सपाट गोरा पेट, हलके से बहार को निकले सुघड़ नितम्ब लेकिन एक दमकता गुलाबी चेहरा जो उसको छोल साहब से विरासत में मिला था. बाल सलीके से एक तरफ को किये थी जो बाहों तक की लम्बाई पर सलीके से काटे गए थे. एक फौजी की वर्दी की तरह उनकी साड़ी और शरीर पर कही सिलवट या अतिरिक्त चर्बी न थी. एक काला टिल जो माध्यम से होंठो के जोड़ पर दाए तरफ था, उनकी इस अनुपम ख़ूबसूरती को और बढ़ा देता था.

"रेणुका, ये अभी छोटा हे है और वैसे तोह ज़िन्दगी भर छोटा हे रहेगा. लेकिन 2 बातें इसकी मुझे सबसे ज्यादा पसंद है. अपने लक्ष्य के लिए दिमाग और शरीर से बराबर म्हणत करना. और कभी भी na-ummeed न होना. इतनी छोटी सी उम्र में बेशक ये ज़िन्दगी के बड़े फैंसले नहीं ले सकता लेकिन सही और गलत को जानकार सिर्फ सही बात को सीखना एक बड़ी बात है. और फिर बीटा भी तोह किसका है ये." गंभीर बात को तुरंत ख़तम करते उन्होंने उसको खुद से चिपकते अपनी बेटी की तरफ देखा जो इन दोनों को साथ देख बस मुस्कुरा रही थी.

"अब ये पत्थर उठा के तोह नहीं मारता न? या कही अभी भी मुझको चुड़ैल बोलकर हमारे घर से हे जाने को कही फिर से कहने लगे?" रेणुका की इस बात पर छोल साहब ठहका लगा कर हंसने लगे थे अर्जुन शर्मसार सा सर नीचे झुका के बैठ गया.

"चल ये जूस ख़तम कर बीटा. प्रीती बीटा जूस कड़वा हो जायेगा." एक गिलास अपने हाथ से अर्जुन को पकड़ाते उन्होंने अपनी पोती प्रीती को आवाज लगाई तोह वो कंघी से बाल पीछे को करती उनकी तरफ आ गई. एक बार सबकी तरफ देख कर वो भी अपनी बुआ के साथ वाली कुर्सी पर बैठ आराम से जूस पीने लगी.

"पापा पहले ये दोनों ऐसे जमीन पर बैठ कर माल्टोवा पीते थे और आज इतने बड़े हो गए है की कुर्सी छोटी पड़ने लगी है." रेणुका बुआ की बात पर प्रीती मुस्कुराने लगी लेकिन अर्जुन की जुबान फँसल गई इस बात को सुनकर.

"बुआ, आप पहले भी ऐसी दिखती थी और आज भी वैसी हे हो. बस बैठने का तरीका बिकुल छोटे दादू जैसा हो गया है आपका." अपनी बात कह कर वह खुद तोह झेंप गया लेकिन बाकी तीनो हंसने लगे.

"पहले तोह सिर्फ तेरे ये छोटे दादू थे जो सबको अनुशाशन पढ़ते थे लेकिन फिर शादी भी ऐसी जगह करवा दी जहा 5 बजे हे दिन शुरू हो जाता है और सूई की नोक पर सारा दिन निकलता है. चल एक बात तोह ाची लगी के तुझे मई बदली हुई नहीं दिखी." उनकी ये मुस्कराहट दिल को बड़ा सुखद सा एहसास देती थी. छोल अंकल भी बहुत प्यार करते थे अपने बचो से और वैसे हे सभी बचे उनका maan-aadar करते थे.

"बुआ ये मस्का मारना जरूर सीख गया है हॉस्टल में रह कर. मतलब इसको 10-12 साल पहले वाली हे आप दिख रही हो." प्रीती ने मौका देख कर अर्जुन की टांग खींच दी.

"चलो अब काम की बात सुनो भाई. फिर इसने पढ़ने जाना है. तुम लोग शाम में बातें करते रहना." छोल साहब ने hansi-majak में व्यवधान डालते कहा.

"ऐसा है के रेणुका के ससुराल की रिश्तेदारी में एक शादी है परसो. इसके चाचा ससुर के छोटे लड़के की. और तेरे फूफा तोह आने से रहे छुट्टी ले कर शादी के लिए. किसी ट्रेनिंग में अरुणाचल भेजा हुआ है उनको 40 दिन के लिए. शादी यही हो रही है अपने शहर में. तू शाम को मार्किट ले जाना अपनी बुआ को क्योंकि मई अगले 3 दिनों तक शायद समय पर शाम को नहीं आ सकूंगा. प्रीती के साथ जाना दोनों के लिए ठीक नहीं है और मार्किट में कार से जाना तोह तू ाचे से जानता है क्या होगा."

अर्जुन ध्यान से उनकी बात सुनता रहा और गर्दन हिलता रहा हाँ भरते हुए. "वैसे तोह रिक्शा से भी जा सकते है पापा." रेणुका बुआ ने थोड़ा सोच कर कहा था. उन्हें एकदम से यु अर्जुन को परेशां करना कुछ ठीक न लगा.

"बुआ, रिक्शा मिलेगा सेक्टर के मोड़ से और वह तक जाने में जितना समय लगेगा इतने में आप और मई मार्किट. फिर जिस रफ़्तार से वो मार्किट जायेगा इतने में तोह रात हो जाएगी. हाँ अगर आप अभी जाओगी तोह दोपहर में मार्किट और शाम को वह से चली तोह रात को घर वापिस आ हे जाओगी. 12-13 किलोमीटर है बड़ी मार्किट और फिर वह की गलियां." अर्जुन हँसते हुए बताने लगा तोह वो खुद भी उसकी बात पर मुस्कुरा दी.

"आप अपने लाडले को कार सिखवा हे दो. कब तक स्कूटर चलवाना है आपने इस से.?" रेणुका बुआ अर्जुन की तरफदारी में बोली लेकिन यहाँ छोल साहब का स्वर धीमा लेकिन सख्त था.

"बेटी, कार दोनों घरो में है. और इसके हे लिए है. लेकिन इसको खुद पता है की अभी भी जरुरत से ज्यादा मिल रहा है. कार तभी मिलेगी जब कॉलेज जायेगा. हाँ अब बड़ी कक्षा में जाने वाला है तोह मोटरसाइकिल चाहे तोह ले ले." और इतना कह कर उठ गए वह से.

"6 बजे आ जाना याद से. और आज पहला दिन है लाइब्रेरी का तोह जल्दी चले जाना." और वो अपने कमरे में चले गए तैयार होने को.

"तुम्हे कोई परेशानी तोह नहीं होगी न? मेरी वजह से? मई तोह पापा को मन कर रही थी." रेणुका बुआ ने सामने बैठे अर्जुन से कहा.

"कैसी बात करती है आप? वैसे भी स्टेडियम के बाद कुछ करने को होता नहीं इस बहाने आपके साथ मार्किट हे सही." उसने सभ्य मुस्कान के साथ कहा और एक बार प्रीती की तरफ भी देखा. "ये नहीं जाएगी क्या शादी में?"

"नहीं इसको पसंद नहीं ये सब और ऊपर से पापा भी यहाँ नहीं होंगे और होते तोह भी नहीं जाते." कुछ सोचकर रेणुका बुआ ने कहा तोह अर्जुन थोड़ा हैरान हो गया.

"परेशान मत हो ज्यादा. तू जायेगा मेरे साथ शादी में. तेरे दादा जी की पसंद नहीं ऐसी tadak-bhadak वाली जगह जहा वह ज्यादा लोगो को जानते न हो और ऊपर से सिविलियन पार्टी तोह बस उनके समझ से परे है. लेकिन प्रीती चल सकती है अगर इसको किसी का साथ मिल जाए तोह." एक निगान प्रीती पर डालती बुआ ने कहा तोह अर्जुन का दिमाग दौड़ गया.

"हाँ तोह फिर तारा हमारे साथ चल पड़ेगी न. उसको कार भी आती है तोह हमको ड्राइवर या स्कूटर की जरुरत नहीं रहेगी." अर्जुन चाहता था के वो अकेला न जाये बुआ के साथ किसी ऐसी शादी में जहा वह अकेला रह जाये. लेकिन तारा का नाम ले कर अब वो भी फंस गया था. "उसको लेकिन प्रीती खुद बोलेगी तभी." प्रीती ने हाँ में गर्दन हिला दी. इधर छोल साहब भी तैयार हो कर आ गए थे.

"ाचा बेटी मई चलता हु रात 10 बजे तक आ जाऊंगा." वो निकल गए तोह अर्जुन ने घडी की तरफ देखा, 10:30 मिनट.

"बाप रे. मई चला बुआ जी नहीं तोह पक्का मार पड़ेगी अगर पहले हे दिन लाइब्रेरी का अनुशाशन भांग किआ तोह." उसकी बात पर दोनों हंस दी. वह से निकल कर घर में बताने के बाद अर्जुन ने ईद कार्ड उठाया और साइकिल लेकर चल दिए लाइब्रेरी.

ये एक विशाल ईमारत थी जिसके चारों तरफ ाचे ped-paudhe लगाए गए थे. गेट पर कार्ड दिखने के बाद जब अंदर आया तोह बस हर तरफ बड़ी कांच की शेल्फ और खुली शेल्फ किताबो से भरी दिखी. हाल में लगी आधा दर्जन 6-7 फ़ीट चौड़ी और 15 फ़ीट लम्बी टेबल्स जिनके दोनों तरफ कुर्सियां लगी थी. चुप्चाल चलता वह विज्ञान भाग की तरफ जा कर कुछ देर देखता रहा और अंत में एक किताब उठा कर एक कुर्सी पर बैठ गया. इस समय कोई 20-22 लोग वह किताबे पढ़ रहे थे लेकिन बिलकुल ख़ामोशी के साथ. उनका अनुसरण करता वो भी किताब को समझने लगा. एक घंटे बाद एक इतिहास की किताब लेकर आ गया. ठीक 2 बजे उसने कलाई घडी में समय देखा और किताब वापिस रखता घर चल दिए.

"तबियत ठीक है न तेरी?" घर पे आरती दीदी तारा के पास ऊपर वाले कमरे में बैठी थी बाकी सब नीचे की बैठक में टेलीविज़न देख रहे थे.

"है यार तबियत बिलकुल ठीक है मेरी. थोड़ा आराम कर रही हु बस. और टेलीविज़न देखने का कोई मैं नहीं है." कोई इंग्लिश की किताब में ध्यान लगाती तारा ने इतना हे कहा तोह आरती एक बार उसकी तरफ देख नीचे आ गई. ठीक 1 बजे प्रियंका दीदी और अलका दीदी ने रसोईघर में खाना बनाना शुरू किआ तोह अगले एक घंटे में सब तैयार कर लिए था. अर्जुन भी घर आ गया था 10 मिनट बाद.

"चल आजा तेरा हे इन्तजार था. आज पहले हे दिन ज्यादा समय लगा दिए तूने." ऋतू दीदी ने उसको हाथ पोछने का टोलिया पकड़ते कहा और फिर खाना परोसने लगी.

"पता नहीं चला दीदी पढ़ाई करते समय." अलका दीदी की तरफ मुस्कुराते देख उसने कहा तोह वो शर्मा गई उसकी नजरे भांप कर. शकल ऐसी लग रही थी जैसे नवब्याहता की होती है सुहागरात के अगले दिन. कुछ देर बाद तारा भी नीचे आ गई तोह अर्जुन ने उस से भी थोड़ी बहुत बात की जो तारा को थोड़ा अजीब और सुखद लगा.

"दीदी, एक घंटे बाद जगा देना मई ऊपर आराम करने जा रहा हु." ऋतू दीदी को इतना बोलकर सबको खाना खाते छोड़ वो ऊपर चल दिए. कपडे बदल कर बिस्टेर पर लेत गया. कुछ देर बाद उसको किसी के कमरे में आने की आहात सुनाई दी लेकिन आँख बंद किये वह बस ऐसे हे लेता रहा. उसको देख कर तारा वापिस अपने कमरे में चली गई. सवा तीन बजे के करीब वो फिर से कमरे में आई और अर्जुन को उठाने लगी सर पे हाथ फेरते हुए.

"उठ गया हु जी." इतना बोलकर वो बिस्टेर से खड़ा हो गया तोह तारा वही बीएड के किनारे बैठी उसको देखने लगी जो अब अपने शरीर पर एक टीशर्ट पहन रहा था. फिर अपने बॉक्सिंग वाले कपडे जब बैग में डालने लगा तोह तारा ने नरम आवाज में उसको पुकारा..

"अर्जुन ऐसे क्यों कर रहे हो मेरे साथ? वो बात कहने का मेरा कोई ऐसा मतलब नहीं था जो तुमने इतना बड़ा फैंसला कर लिए." तारा का सर भी दुःख रहा था और मैं भी भारी हो रहा था जब से अर्जुन ने वो बात कही थी सुबह.

"मैंने कुछ किआ भी क्या तारा? तुम खुद सोच कर बताओ. तुमने पहले कहा के तुम मुझ से प्यार करती हो. मैंने तुम्हे प्यार किआ. जब दोनों साथ थे तोह पूरा ध्यान दिए के तुम्हे तकलीफ न हो. आज सुबह भी मैं प्यार हे कर रहा था. तुम्हारी हे बात रखते हुए चादर के भीतर हे थे हम. और फिर एक बार में अलग भी हो गया. लेकिन जो बात तुमने कही वो फिर कितनी सही थी कितनी गलत ये तुम बेहतर जानती हो. और मैंने भी अपनी बात बता हे दी थी. प्यार में फैंसले नहीं होते बस दोनों का एक दूसरे के लिए समर्पण और इज़्ज़त होती है. मुझे तुमसे कोई शिकायत नहीं. नीचे खाने के वक़्त मैंने तुम्हे पराया तोह नहीं किआ था न.?" इतना बोलकर वो ऐसे हे तारा को बिस्टेर पर बैठे ढेर सारे प्रश्नो में उलझा कर बाहर की तरफ से नीचे आ गया था. गेट के बहार हे प्रीती कड़ी थी उसके इन्तजार में तोह बिना ज्यादा बात किये स्कूटरी खुद संभाल कर वो चल दिए.

'मानती हु अर्जुन के मेरी बात ठीक नहीं थी. और जब शरीर और दिल दोनों हे तुम्हे दे चुकी हु तोह ये कहना बिलकुल बेवजह सा था. जिस शरीर को किसी और ने आज तक नहीं देखा वो तुम्हारे सुपुर्द था 2 रात पहले. मेरी इस छोटी सी ज़िद्द की इतनी बड़ी सजा न दो.' बिस्टेर पर स्टेडियम जाने से पहले उतारी टीशर्ट को मुँह से लगाए तारा ये कहती रो हे पड़ी थी. जब आंसू बहने रुके तोह वो खुद को हे देखने लगी की कैसे इस 3 दिन के प्यार ने आज उसका असहाये कर दिए है. और 5-6 घंटे पहले हुई इस बात से वो इतना तड़प रही है. कभी एक कटरा आँख से न बहाने वाली, नखरो से भरी आज सिर्फ उस इंसान के लिए तड़प रही थी जो उसकी एक जिद्द की वजह से अपनी ज़िद्द पर कायम हो गया था. रोने से दिल थोड़ा हल्का महसूस होने लगा तोह तारा ऐसे हे उस टीशर्ट को हाथ में लिए सोचती रही.

"तोह अब तुम्हारी तबियत कैसी है?" अर्जुन ने एक हाथ से स्कूटरी चलते हुए पीछे बैठी प्रीती की जांघ पर हाथ रखते पुछा तोह प्रीती ने अपना चेहरा उसके कंधे पर रख दिए. दोनों इस वक़्त सुनसान सड़क पर थे जहा ज्यादा चहल पहल नहीं होती थी.

"मुझे कहा कुछ हुआ है? वो तोह बस ऐसे हे." प्रीती धीमे से कान में बोली. उसको यु धीमी चलती स्कूटरी पर अर्जुन के साथ चिपक कर बैठना और उसका ऐसे हाथ फेरना बड़ा ाचा लग रहा था.

"फिर मई कुछ बोलूंगा तोह तुम नाराज हो जाओगी. पता है लड़कियों वाली वजह है लेकिन अभी अगर ठीक महसूस नहीं कर रही होती तोह खेलने नहीं आती." अर्जुन की बात पर उसने कमर में चूंटी काट दी.

"ज्यादा बनो मत. जब पता होता है तोह पूछते क्यों हो. और मई बिलकुल ठीक हु और बस 2 दिन. अब सीधा चलो कोई इधर उधर की बात नहीं." नखरे और प्यार से प्रीती ने कहा तोह अर्जुन ने भी पलट कर जवाब दिए. "जाते हुए तुम स्कूटरी चलना फिर मई देखता हु तुम्हे." उसकी बात का मतलब प्रीती ाचे से समझ गई थी. दोनों स्टेडियम आ गए तोह डिम्पी वह प्रीती का इन्तजार करती मिली.

"कैसी हो डिम्पी?" आज अर्जुन ने खुद हे हाथ मिलते हुए कहा जो की एक नै बात थी.

"मई तोह ाची हु मुन्ना लेकिन लगता है मैडम ठीक नहीं." प्रीती डिम्पी का अर्जुन को मुन्ना कहते सुनकर थोड़ी हैरत में पड़ गई.

"ऐ तुम दोनों एक दूसरे को जानते हो क्या?"

"हाँ तोह तू क्या अकेली खेली है इसके साथ बचपन में? तेरे से तोह शायद ज्यादा हे समय बिताया होगा मैंने." डिम्पी की बात पर वो दोनों को देखने लगी.

"तुम जाओ अर्जुन अपनी प्रैक्टिस के लिए." डिम्पी को लगभग खींचती प्रीती चल दी तोह अर्जुन बस हंस दिए. 'मई हमेशा तुम्हारा हु. बस याद रखना' अर्जुन ने ये बात मैं में कही थी लेकिन आगे जाती प्रीती जैसे सच में उसकी बात सुन चुकी हो. पीछे पलट कर मुस्कुराती फिर आगे चल दी.

आज भी बस वही सब हुआ जो हर रोज हो रहा था. जोगिन्दर जी बलबीर को बता कर ग्राउंड से चले गए थे तोह अगल 90 मिनट बस दोनों प्रैक्टिस में लगे रहे. बास्केटबॉल कोर्ट खाली सा दिखा उनको. ठीक 5:30 पर अर्जुन कपडे बदल कर वह से निकल आया तोह प्रीती आज उस से पहले हे वह कड़ी थी. मुस्कुराते हुए वो उसके पास आया और चाबी प्रीती की तरफ कर दी. प्रीती भी प्रतिउत्तर में मुस्कुराती चाबी ले स्कूटरी स्टार्ट कर उसके सामने आ गई थी.
 
अपडेट का दूसरा भाग रात 2 बजे.
 
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