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अपडेट- 46 (ा) (मेघा अपडेट)
" तो फुट जाएगी तो फटने दो na...........waise भी गांड फूटने के लिए hi होती hain..........aur मैं तो चाहता हूँ की तुम्हारी छेद इतनी बड़ी कर दूँ की उसमें कुछ भी आसानी से चला जाये..........." और रघु इस बार अपने उँगलियों को काव्य के गांड के सूराख पर रख देता हैं और बहुत एआरएम से उसपर अपने उँगलियों को सहलाने लगता hain........wahin काव्य फिर से सिसक पड़ती हैं और रघु के जिस्म से और भी बुरी तरह से चिपक जाती hain..............wahin कुछ दूर पर खड़ा जीतू बस उन दोनों के इस चुदाई भरे खेल को बस देखे जा रहा tha.................aur सोच रहा था की आगे रघु अपनी मेमसाहेब के साथ न जाने और क्या क्या खेल khelega............ye सोचकर उसका हाथ एक बार फिर से अपने लुंड पर चला जाता हैं...............................................
अब आगे..................................................................................
रघु फ़ौरन काव्य को अपनी बाँहों में समेत लेता हैं और एक बार फिर से उसके नरम होंठों को चूसने लगता hain..........apne डेंटन से कसकर काटने लगता hain...........aab उसकी भी बेकरारी पल पल बढ़ती जा रही thi...........wo भी चाहता था की अपने अंदर की उठ रही उस प्यास को कैसे भी करके शांत kare...........upar से चींटी के कटे जाने से उसकी छूट और गांड दोनों सूझ गयी थी जिससे वहां हाथ लगाने से काव्य को काफी रहत मिल रही thi.........aurr ऊपर से रघु का सूपड़ा भी काफी मोटा दिख रहा था.......
" मुझे प्यार करो न jaan.............jaisa मैं तुम्हें करता hoon.........sir से लेकर पवन तक............" और इस बार रघु काव्य की आँखों में आँखें डेल आहिस्ता से बोल पड़ता hain..........wahin काव्य एक नज़र रघु की तरफ देखती हैं फिर वो धीरे से मुस्कुराते हुए आगे बढ़ती हैं और इस बार रघु की होंठों को खुद hi चूसने लगती hain.......chaatney लगती hain..........sach तो ये था की उसे भी अब इस खेल में मज़ा आने लगा tha............choot में जो आग अब दहक रही थी अब उसे संभाले नहीं जा रही थी...........
वो अपने जीभ को रघु के गंदे काळा जिस्म पर धीरे धीरे से फेरने लगती hain...........uske होंठों से नीचे उसके चीन par............jaise जैसे काव्य के जीभ रघु के जिस्म पर फिरते जा रहे थे वैसे वैसे रघु का लौड़ा भी सख्त होता जा रहा tha..........wahin कुछ दूर बैठा जीतू किसी मूवी की तरह सब कुछ देख रहा tha.............magar बड़े ध्यान से..............
काव्य अपना जीभ जीतू के गुर्दें पर ले जाती हैं और वहां उसके जिस्म पर जमा कुछ मेल अपने जीभ से चटनी लगती hain........uske जिस्म से निकलने वाले पसीने की एक एक बूँद को वो अपने जिस्म में उतरने लगती hain..............apne होंठों के zariye.........aab सब कुछ उसे ाचा लग रहा tha..........jaise कोई नशा सा उसपर चाय ho........ek अजीब सा खुमार...............
वो फिर अपने हाथों को इस बार रघु के नंगे काळा सीने पर ले जाती हैं और उसके दोनों कला काळा छोटे निप्पल्स को अपनी उँगलियों के बीच दबाकर खींचने लगती hain...........masalney लगती hain...........apne बड़े बड़े नाख़ून से उसके निप्पल्स को कुरेदने लगती hain......wahin रघु दर्द और मज़े से सिसक उठता हैं और काव्य के चूचियों को फिर से थम लेता हैं और इस बार कसकर वो उन्हें मसल देता hain.......mano वो उससे बदला निकल रहा हो.............
वहीँ काव्य कोई विरोध नहीं करती और उसके निप्पल्स पर अपने हाथ और नाखूनों से वार करती रहती hain.......fir वो अपना जीभ उसके राइट निप्पल्स पर ले जाती हैं और उसके निप्पल्स को अपने मुँह में लेकर बरी बरी से चूसने लगती hain.......wahin रघु जैसे तड़प सा जाता hain..........wo फ़ौरन उसके बालों को कसकर अपनी मुट्ठी में थम लेता हैं और काव्य के चेहरे को बड़े अजीब सी नज़रियों से देखने लगता hain.........kuch सोचकर वो अपने मुँह से गधा गधा थूक निकलता हैं और इस बार वो अपने थूक को अपने निप्पल्स और सीने पर गिरने लगता hain...........wahin काव्य बड़े गौर से उसके एक एक हरकतों को देख रही थी.........
" छतो न इन्हें memsaheb...............aachey से............." और रघु अपने थूक की तरफ धीरे से इशारा करता हैं वहीँ काव्य एक नज़र रघु के चेहरे की तरफ देखती हैं फिरर वो होली से अपना जीभ निकलते हुए रघु के उस थूक को चटनी लगती hain...........aur उसे अपने हलक के नीचे उतरती चली जाती hain..........aise hi रघु दो तीन बार करता हैं और काव्य हर बार उसका थूक चाटती hain....fir वो कुछ थूक अपने लुंड पर भी गिरता hain..........aur काव्य इस बार उसका लुंड भी ाचे से चाटकर साफ़ कर देती हैं........
" धीरे धीरे काव्य उसके घुटनों के नीचे की तरफ आती हैं और उसके गंदे पवन पर भी अपना जीभ फेरने लगती hain..........saath hi साथ उसके लुंड को bhi...........chinti के काटने से उसका सूपड़ा काफी सख्त और मोटा हो गया था ...........वहीँ जब काव्य के जीभ का एहसास रघु को काफी रहत दे रहा tha.........uske अंदर एक अजीब सा प्यास धीरे धीरे बढ़ता जा रहा tha...........raghu फ़ौरन आकर वहीँ सोफे पर बैठ जाता हैं और पास में रखा तेल अपनी हाथों में उठा लेता hain..........aur काव्य को अपने ऊपर आने का इशारा करता hain............kavya भी फ़ौरन आकर उसके जांघों के बीच अपनी छूट सत्कार आराम से बैठ जाती हैं वहीँ रघु मुस्कुराकर काव्य के तरफ बड़े प्यार से एक तुक देखने लगता हैं.......
" ाचा तो मेरी रानी तैयार हैं क्या अपनी गांड मरवाने के liye................kahe तो पूरा अंदर दाल दूँ.............." और रघु अपने लुंड पर तेल गिरने लगता hain..........jo तेल उसके सुपाड़ी से बेहटा हुआ उसके ांडों तक बह रहा tha.........jissey उसका कला लुंड और भी कला और भयानक सा दिखने लगा tha.............wahin काव्य की बेचैनी भी बढ़ती जा रही थी..............
" मार लो न raghu.............mera सब कुछ अब तुम्हारा hi तो हैं................" और काव्य हौले से सिसक पड़ती hain.........wahin रघु अपने दोनों हाथों से उसकी दोनों चूचियों को थम लेता हैं जैसे वो उसकी का सहारा लिए बैठा ho.............bari बरी से वो उसके दोनों निप्पल्स को मसल रहा tha.......daba रहा था वहीँ काव्य पल पल तड़प रही थी.......
रघु कुछ तेल की बूँद अपने हाथों पर गिरता हैं और उस तेल को अगले hi पल काव्य के गांड के टाइट सूराख पर रख देता हैं और आहिस्ता आहिस्ता से एक एक ऊँगली अंदर बहार करने लगता hain......aur उस तेल को भी अंदर करता जाता hain...........is तरह हाथ लगाने से काव्य फिर से सिसक पड़ती हैं मगर रघु का विरोध नहीं karti.........raghu लगातार अपने बीच की ऊँगली पर तेल चुपड़ी काव्य की गांड के अंदर बहार कर रहा tha............aur उसके टाइट सूराख को लूसे भी करता जा रहा tha.......tel लगने से अब काव्य की गांड थोड़ी सी खुल गयी थी मगर दर्द उसे भी हो रहा tha.........jissey अब आसानी से उसकी मोती ऊँगली उसकी गांड के अंदर बहार हो रही थी.........
करीब 5 मिनट तक रघु काव्य की गांड को अपनी ऊँगली से फैलाती हैं फिर वो उसे उठकर उसी बिस्टेर पर ले जाता हैं और पेट के बल आराम से सुला देता hain..........kavya का दिल अब दुर्र से धड़कने लगा tha..............durr से उसके चेहरे पर पसीने साफ़ चालक रहे they.........janti थी वो भी बहुत ाचे से की आने वाला पल उसे कितनी तकलीफ देने वाला hai...........raghu का लुंड जब उसकी छूट में पूरा जाता तो उसे तकलीफ होती तो उस छोटे से सूराख में जब उसका लुंड पूरा घुसेगा तो उसकी क्या हालत होगी ये वो आसानी से अंदाज़ा लगा सकती thi.........magar न hi उसके अंदर अब रघु को रोकने की हिम्मत thi......aur न उसका विरोध कर पाने की ताक़त.............
रघु एक नज़र काव्य के नंगे बदन को बड़े गौर से देखता हैं फिर वो अपना दोनों हाथ उसकी गांड पर रख देता हैं और उसके गांड को दोनों तरफ से फैलाने लगता hain.............gand के दरार में जो छोटी सी सूराख थी अब नज़र आने लगी थी जो की अभी भी पूरी तरह से बंद thi..........wahan पर तेल लगा हहआ था मगर उससे कहीं ज़्यादा तेल रघु के लुंड पर नज़र आ रहा thaa...........kavya बिस्टेर पर लेती हुई अपने दोनों बाँहों को फैलाये बिस्टेर को कसकर पकड़े हुई thi.........durr से उसका कलेजा बहुत ज़ोरों से धड़क रहा tha..........wahin कुछ दूर पर जीतू भी अपने कपड़े निकल चुका था और अपने हाथों में लुंड लिए हुआ कुछ दूर पर खड़ा सब कुछ बड़े गौर से देख रहा tha...........jaise तैसे उसने खुद अपने आपको संभाला था.......
" मैं आया मेरी रानी................" रघु फ़ौरन बिस्टेर पर चाहता हैं और अपना लुंड काव्य के उस छोटे से छेद पर सेट करता hain.........aur आराम से चढ़ता हुआ काव्य के ऊपर पेट के बल आकर लेट जाता hain............aur अपना एक हाथ वो काव्य के चूचियों और बिस्टेर के बीच डालता हैं और अपने मज़बूत हाथों से उसकी दोनों चूचियों को कसकर थम लेता hain.............jakad लेता hain...........wahin वो अपना दूसरा हाथ अपने लुंड पर ले जाता हैं और इस बार अपना लुंड काव्य की गांड के सूराख पर सेट कटा हैं और धीरे धीरे फिर अपने लुंड पर दबाव डालना शुरू करता hain.........pehle तो उसका लुंड कई बार इधर उधर फिसल जाता हैं मगर रघु कहाँ इतनी आसानी से हार मानले वालों में से था...........
वो थोड़ा सा तेल फिर से अपने लुंड पर गिरता हैं औरर कुछ काव्य की गांड के सूराख par........aur फिर से वो कोशिश करता hai........aur इस बार जैसे उसकी कोशिशः रंग लगती hain..........wo एक करारा धक्का मरता हैं और अगले hi पल उसका 3.5 इंच मोटा सूपड़ा काव्य की नाजुक सी छेद को भेदता हुआ सीधा अंदर घुस जाता hain.........jahan रघु को तो मज़े आ जाते हैं वहीँ काव्य इस बार ऐसा चीखती हैं जैसे उसकी गांड में किसी ने गरम रोड दाल दिया ho............wwo कसकर अपनी बिस्टेर को मुट्ठियों के बीच मसलने लगती hain.............aur अपना सर इधर उधर करने लगती hainn..........dard से कुछ आंसूं की बूँदें उसके आँखों से चालक पड़ते है.............
कॉन्टिनोएड..........................................................................
" तो फुट जाएगी तो फटने दो na...........waise भी गांड फूटने के लिए hi होती hain..........aur मैं तो चाहता हूँ की तुम्हारी छेद इतनी बड़ी कर दूँ की उसमें कुछ भी आसानी से चला जाये..........." और रघु इस बार अपने उँगलियों को काव्य के गांड के सूराख पर रख देता हैं और बहुत एआरएम से उसपर अपने उँगलियों को सहलाने लगता hain........wahin काव्य फिर से सिसक पड़ती हैं और रघु के जिस्म से और भी बुरी तरह से चिपक जाती hain..............wahin कुछ दूर पर खड़ा जीतू बस उन दोनों के इस चुदाई भरे खेल को बस देखे जा रहा tha.................aur सोच रहा था की आगे रघु अपनी मेमसाहेब के साथ न जाने और क्या क्या खेल khelega............ye सोचकर उसका हाथ एक बार फिर से अपने लुंड पर चला जाता हैं...............................................
अब आगे..................................................................................
रघु फ़ौरन काव्य को अपनी बाँहों में समेत लेता हैं और एक बार फिर से उसके नरम होंठों को चूसने लगता hain..........apne डेंटन से कसकर काटने लगता hain...........aab उसकी भी बेकरारी पल पल बढ़ती जा रही thi...........wo भी चाहता था की अपने अंदर की उठ रही उस प्यास को कैसे भी करके शांत kare...........upar से चींटी के कटे जाने से उसकी छूट और गांड दोनों सूझ गयी थी जिससे वहां हाथ लगाने से काव्य को काफी रहत मिल रही thi.........aurr ऊपर से रघु का सूपड़ा भी काफी मोटा दिख रहा था.......
" मुझे प्यार करो न jaan.............jaisa मैं तुम्हें करता hoon.........sir से लेकर पवन तक............" और इस बार रघु काव्य की आँखों में आँखें डेल आहिस्ता से बोल पड़ता hain..........wahin काव्य एक नज़र रघु की तरफ देखती हैं फिर वो धीरे से मुस्कुराते हुए आगे बढ़ती हैं और इस बार रघु की होंठों को खुद hi चूसने लगती hain.......chaatney लगती hain..........sach तो ये था की उसे भी अब इस खेल में मज़ा आने लगा tha............choot में जो आग अब दहक रही थी अब उसे संभाले नहीं जा रही थी...........
वो अपने जीभ को रघु के गंदे काळा जिस्म पर धीरे धीरे से फेरने लगती hain...........uske होंठों से नीचे उसके चीन par............jaise जैसे काव्य के जीभ रघु के जिस्म पर फिरते जा रहे थे वैसे वैसे रघु का लौड़ा भी सख्त होता जा रहा tha..........wahin कुछ दूर बैठा जीतू किसी मूवी की तरह सब कुछ देख रहा tha.............magar बड़े ध्यान से..............
काव्य अपना जीभ जीतू के गुर्दें पर ले जाती हैं और वहां उसके जिस्म पर जमा कुछ मेल अपने जीभ से चटनी लगती hain........uske जिस्म से निकलने वाले पसीने की एक एक बूँद को वो अपने जिस्म में उतरने लगती hain..............apne होंठों के zariye.........aab सब कुछ उसे ाचा लग रहा tha..........jaise कोई नशा सा उसपर चाय ho........ek अजीब सा खुमार...............
वो फिर अपने हाथों को इस बार रघु के नंगे काळा सीने पर ले जाती हैं और उसके दोनों कला काळा छोटे निप्पल्स को अपनी उँगलियों के बीच दबाकर खींचने लगती hain...........masalney लगती hain...........apne बड़े बड़े नाख़ून से उसके निप्पल्स को कुरेदने लगती hain......wahin रघु दर्द और मज़े से सिसक उठता हैं और काव्य के चूचियों को फिर से थम लेता हैं और इस बार कसकर वो उन्हें मसल देता hain.......mano वो उससे बदला निकल रहा हो.............
वहीँ काव्य कोई विरोध नहीं करती और उसके निप्पल्स पर अपने हाथ और नाखूनों से वार करती रहती hain.......fir वो अपना जीभ उसके राइट निप्पल्स पर ले जाती हैं और उसके निप्पल्स को अपने मुँह में लेकर बरी बरी से चूसने लगती hain.......wahin रघु जैसे तड़प सा जाता hain..........wo फ़ौरन उसके बालों को कसकर अपनी मुट्ठी में थम लेता हैं और काव्य के चेहरे को बड़े अजीब सी नज़रियों से देखने लगता hain.........kuch सोचकर वो अपने मुँह से गधा गधा थूक निकलता हैं और इस बार वो अपने थूक को अपने निप्पल्स और सीने पर गिरने लगता hain...........wahin काव्य बड़े गौर से उसके एक एक हरकतों को देख रही थी.........
" छतो न इन्हें memsaheb...............aachey से............." और रघु अपने थूक की तरफ धीरे से इशारा करता हैं वहीँ काव्य एक नज़र रघु के चेहरे की तरफ देखती हैं फिरर वो होली से अपना जीभ निकलते हुए रघु के उस थूक को चटनी लगती hain...........aur उसे अपने हलक के नीचे उतरती चली जाती hain..........aise hi रघु दो तीन बार करता हैं और काव्य हर बार उसका थूक चाटती hain....fir वो कुछ थूक अपने लुंड पर भी गिरता hain..........aur काव्य इस बार उसका लुंड भी ाचे से चाटकर साफ़ कर देती हैं........
" धीरे धीरे काव्य उसके घुटनों के नीचे की तरफ आती हैं और उसके गंदे पवन पर भी अपना जीभ फेरने लगती hain..........saath hi साथ उसके लुंड को bhi...........chinti के काटने से उसका सूपड़ा काफी सख्त और मोटा हो गया था ...........वहीँ जब काव्य के जीभ का एहसास रघु को काफी रहत दे रहा tha.........uske अंदर एक अजीब सा प्यास धीरे धीरे बढ़ता जा रहा tha...........raghu फ़ौरन आकर वहीँ सोफे पर बैठ जाता हैं और पास में रखा तेल अपनी हाथों में उठा लेता hain..........aur काव्य को अपने ऊपर आने का इशारा करता hain............kavya भी फ़ौरन आकर उसके जांघों के बीच अपनी छूट सत्कार आराम से बैठ जाती हैं वहीँ रघु मुस्कुराकर काव्य के तरफ बड़े प्यार से एक तुक देखने लगता हैं.......
" ाचा तो मेरी रानी तैयार हैं क्या अपनी गांड मरवाने के liye................kahe तो पूरा अंदर दाल दूँ.............." और रघु अपने लुंड पर तेल गिरने लगता hain..........jo तेल उसके सुपाड़ी से बेहटा हुआ उसके ांडों तक बह रहा tha.........jissey उसका कला लुंड और भी कला और भयानक सा दिखने लगा tha.............wahin काव्य की बेचैनी भी बढ़ती जा रही थी..............
" मार लो न raghu.............mera सब कुछ अब तुम्हारा hi तो हैं................" और काव्य हौले से सिसक पड़ती hain.........wahin रघु अपने दोनों हाथों से उसकी दोनों चूचियों को थम लेता हैं जैसे वो उसकी का सहारा लिए बैठा ho.............bari बरी से वो उसके दोनों निप्पल्स को मसल रहा tha.......daba रहा था वहीँ काव्य पल पल तड़प रही थी.......
रघु कुछ तेल की बूँद अपने हाथों पर गिरता हैं और उस तेल को अगले hi पल काव्य के गांड के टाइट सूराख पर रख देता हैं और आहिस्ता आहिस्ता से एक एक ऊँगली अंदर बहार करने लगता hain......aur उस तेल को भी अंदर करता जाता hain...........is तरह हाथ लगाने से काव्य फिर से सिसक पड़ती हैं मगर रघु का विरोध नहीं karti.........raghu लगातार अपने बीच की ऊँगली पर तेल चुपड़ी काव्य की गांड के अंदर बहार कर रहा tha............aur उसके टाइट सूराख को लूसे भी करता जा रहा tha.......tel लगने से अब काव्य की गांड थोड़ी सी खुल गयी थी मगर दर्द उसे भी हो रहा tha.........jissey अब आसानी से उसकी मोती ऊँगली उसकी गांड के अंदर बहार हो रही थी.........
करीब 5 मिनट तक रघु काव्य की गांड को अपनी ऊँगली से फैलाती हैं फिर वो उसे उठकर उसी बिस्टेर पर ले जाता हैं और पेट के बल आराम से सुला देता hain..........kavya का दिल अब दुर्र से धड़कने लगा tha..............durr से उसके चेहरे पर पसीने साफ़ चालक रहे they.........janti थी वो भी बहुत ाचे से की आने वाला पल उसे कितनी तकलीफ देने वाला hai...........raghu का लुंड जब उसकी छूट में पूरा जाता तो उसे तकलीफ होती तो उस छोटे से सूराख में जब उसका लुंड पूरा घुसेगा तो उसकी क्या हालत होगी ये वो आसानी से अंदाज़ा लगा सकती thi.........magar न hi उसके अंदर अब रघु को रोकने की हिम्मत thi......aur न उसका विरोध कर पाने की ताक़त.............
रघु एक नज़र काव्य के नंगे बदन को बड़े गौर से देखता हैं फिर वो अपना दोनों हाथ उसकी गांड पर रख देता हैं और उसके गांड को दोनों तरफ से फैलाने लगता hain.............gand के दरार में जो छोटी सी सूराख थी अब नज़र आने लगी थी जो की अभी भी पूरी तरह से बंद thi..........wahan पर तेल लगा हहआ था मगर उससे कहीं ज़्यादा तेल रघु के लुंड पर नज़र आ रहा thaa...........kavya बिस्टेर पर लेती हुई अपने दोनों बाँहों को फैलाये बिस्टेर को कसकर पकड़े हुई thi.........durr से उसका कलेजा बहुत ज़ोरों से धड़क रहा tha..........wahin कुछ दूर पर जीतू भी अपने कपड़े निकल चुका था और अपने हाथों में लुंड लिए हुआ कुछ दूर पर खड़ा सब कुछ बड़े गौर से देख रहा tha...........jaise तैसे उसने खुद अपने आपको संभाला था.......
" मैं आया मेरी रानी................" रघु फ़ौरन बिस्टेर पर चाहता हैं और अपना लुंड काव्य के उस छोटे से छेद पर सेट करता hain.........aur आराम से चढ़ता हुआ काव्य के ऊपर पेट के बल आकर लेट जाता hain............aur अपना एक हाथ वो काव्य के चूचियों और बिस्टेर के बीच डालता हैं और अपने मज़बूत हाथों से उसकी दोनों चूचियों को कसकर थम लेता hain.............jakad लेता hain...........wahin वो अपना दूसरा हाथ अपने लुंड पर ले जाता हैं और इस बार अपना लुंड काव्य की गांड के सूराख पर सेट कटा हैं और धीरे धीरे फिर अपने लुंड पर दबाव डालना शुरू करता hain.........pehle तो उसका लुंड कई बार इधर उधर फिसल जाता हैं मगर रघु कहाँ इतनी आसानी से हार मानले वालों में से था...........
वो थोड़ा सा तेल फिर से अपने लुंड पर गिरता हैं औरर कुछ काव्य की गांड के सूराख par........aur फिर से वो कोशिश करता hai........aur इस बार जैसे उसकी कोशिशः रंग लगती hain..........wo एक करारा धक्का मरता हैं और अगले hi पल उसका 3.5 इंच मोटा सूपड़ा काव्य की नाजुक सी छेद को भेदता हुआ सीधा अंदर घुस जाता hain.........jahan रघु को तो मज़े आ जाते हैं वहीँ काव्य इस बार ऐसा चीखती हैं जैसे उसकी गांड में किसी ने गरम रोड दाल दिया ho............wwo कसकर अपनी बिस्टेर को मुट्ठियों के बीच मसलने लगती hain.............aur अपना सर इधर उधर करने लगती hainn..........dard से कुछ आंसूं की बूँदें उसके आँखों से चालक पड़ते है.............
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